मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 1 June 2010

अब भी चेत जाये रेलवे....

ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस की दुर्घटना के बाद अब फिर से रेलवे में सुरक्षा को लेकर तमाम बातें की जाने लगी हैं. अब यह कहा जा रहा है कि यदि इस ट्रेन में लिंक हाफमैन बुश वाली बोगियां लगी होतीं तो शायद मरने वालों की संख्या इतनी अधिक नहीं होती ? इन बातों का अब कोई मतलब नहीं रह जाता है क्योंकि जब समय रहते सुरक्षा के उपाय नहीं किये गए तो क्या किया जा सकता था और क्या नहीं किया गया इस बात पर चर्चा करके हम केवल पीड़ित परिवारों के दुःख को बढ़ाने का काम करते हैं.
         यह सही है कि जर्मनी से आयातित इस तरह कि बोगियों को सबसे पहले लखनऊ जाने वाली स्वर्ण शताब्दी में लगाया गया था और उसके बाद भारत में इस तकनीकी के हस्तान्तरण के बाद अब सभी राजधानियों और शताब्दियों में यही बोगियां लगायी जा रही हैं. परन्तु आज के समय यह दिक्कत है कि देश में इस तरह कि बोगियां बनाने की क्षमता केवल ३०० ही है जिसको बढ़ा कर ५०० किये जाने का प्रस्ताव किया गया है पर भारतीय रेल के विस्तृत नेटवर्क को देखते हुए सभी गाड़ियों में इस तरह कि बोगियां लगाये जाने के लिए हर साल २५०० बोगियों की आवश्यकता होगी. कीमत  के लिहाज़ से भी इन बोगियों में अधिक पैसा लगता है जिस कारण भी शायद रेलवे अभी तक इसकी कोई तोड़ नहीं ढूंढ पाया है. जहाँ परम्परगत बोगी डेढ़ करोड़ में बन जाती है वहीं यह आधुनिक बोगी लगभग ३ करोड़ की पड़ती है.
      पिछले कई वर्षों के नाटक के बाद रायबरेली उत्तर प्रदेश में रेल काच फैक्ट्री लगायी जा रही है अभी तक यह तय नहीं है कि वहां पर नयी तकनीकी की बोगियां बनाये जाने की भी व्यवस्था होगी या नहीं ? पर आज के समय जब हर जगह आधुनिकीकरण किया जा रहा है तो किसी भी स्थान पर नए उपक्रम नयी तकनीकी वाले ही लगाये जाने चाहिए.  इस नयी तकनीकी वाले लिंक हाफमैन बुश कोच की सुरक्षा तब परखी जा चुकी है जब अभी गया के पास राजधानी एक्सप्रेस के ८ डिब्बे पटरी से उतरे थे और कोई भी यात्री गंभीर रूप से घायल नहीं हुआ था. इस तकनीकी में काच परंपरागत लोहे के स्थान पर अलुमिनियम से बने होते हैं और इनके शौचालयों में ऐसी तकनीकी का प्रयोग किया जाता है कि किसी भी दुर्घटना में केवल सारा झटका वहीं पर रह जाता है और पूरी बोगी के यात्री सुरक्षित रहते हैं. अलुमिनियम से बने होने के कारण भी यह आसानी से उलटते नहीं हैं जिससे किसी भी दुर्घटना की तीव्रता कम हो जाती है. आशा है कि अपने अन्य संसाधनों में कटौती करके रेलवे अपनी इन कोचों को बनाने की क्षमता में वृद्धि करेगा और अगर रेलवे नहीं कर सकता तो देश के औद्योगिक घरानों को छूट दी जानी चाहिए कि वे भी इनका निर्माण करें जिससे भारत की ज़रूरतें पूरी हो सकें और इनके निर्यात से कुछ व्यापार भी किया जा सके.     

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कर्म से चिकित्सक और बहुत कुछ करने की आशा के साथ जीवन की अनवरत यात्रा पर बढ़ने का क्रम जारी.....