मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 28 August 2012

विधायक यूपी के वोट उत्तराखंड में ?

            लगता है छोटे राज्यों के विरोध में होने के कारण सपा के विधायक भी अभी तक यूपी और उत्तराखंड को अलग अलग राज्य के रूप में स्वीकार नहीं कर पाए हैं तभी एक ताज़ा मामले में विधान सभा बरहज (देवरिया) से सपा के विधायक प्रेम प्रकाश सिंह ने उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर की सितार गंज सीट पर जाकर वोट डाल कानूनी तौर पर अपने लिए मुसीबत मोल ले ली है ? यह मामला पूरी तरह से जनप्रतिनिधित्व कानून १९५० की धारा १७-१८ का खुला उल्लंघन है क्योंकि देश का संविधान जहाँ अपने नागरिकों को वोट देने का अधिकार देता है वहीं दूसरी तरफ वह किसी भी मतदाता को ग़लत तरीके से दो जगहों से वोट देने से रोकता भी है. इस मामले में विधायक ने पूरी तरह से झूठ बोला है क्योंकि पहले वे यह कहते रहे कि उन्होंने सितारगंज में हुए मतदान में भाग नहीं लिया है पर ऊधम सिंह नगर के जिलाधिकारी ने जांच के बाद इस बात की पुष्टि कर दी है कि वोट डाला गया है. अब इस स्थिति में विधायक पर जुर्माना एक साल की सजा या ज़ुर्माना या दोनों ही लगाये जा सकते हैं.
            देश में संविधान को अपने कामों के लिए इस्तेमाल किये जाने की इस तरह की छोटी छोटी पर संविधान और कानून की धज्जियाँ उड़ाने वाली घटनाएँ लगातार बढ़ती ही जा रही हैं और उनको रोकने के लिए चुनाव आयोग और सरकार के पास कोई रास्ता नहीं है. जनप्रतिनिधित्व कानून में समय समय पर संशोधन किये जाते रहे हैं फिर भी आज तक सो जगह से मतदाता होने और मतदान करने के दोषी पाए जाने पर केवल एक साल की साधारण क़ैद का प्रावधान ही किया गया है जो आज के समय के हिसाब से बहुत कम है. अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए नेता लोग किस तरह से कई कई जगहों पर मतदाता हैं और इसी वोटर लिस्ट के दम पर वे कई कई राजनैतिक पदों पर जमे हुए हैं जिससे अन्य लोगों के लिए चुनाव में भाग लेना कठिन होता जा रहा है. ऐसे बहुत सारे राजनैतिक परिवार आज देखे जा सकते हैं जो महिला आरक्षण का लाभ उठाकर घर में महिलाओं समेत सभी को कोई न कोई पद दिलवा कर खुद सभी जगहों पर राज कर रहे हैं ? परिवार वाद की दुहाई देने वाले दल भी आज इसी तरह की राजनीति करने में विश्वास करने लगे हैं तो सुधार की आशा किससे की जाये ?
            क्या किसी विधायक के लिए जानते हुए जनप्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन करने पर केवल एक साल की सज़ा या कुछ आर्थिक दंड से ही काम चलाया जाना चाहिए ? आज इस धारा में संशोधन करके सज़ा कम से कम ५ वर्ष की जानी चाहिए और किसी विधायी पद पर बैठे हुए व्यक्ति के इसमें लिप्त पाए जाने पर उसको उसके परिवार समेत अगले १० वर्षों तक किसी भी तरह के चुनाव में मत देने और चुनाव लड़ने पर रोक लगायी जानी चाहिए और सरकारी स्तर पर मिलने वाली किसी भी तरह की सुविधा पर भी रोक का प्रावधान किया जाना चाहिए. जब विधायिक में शामिल लोग ही उस कानून का उल्लंघन करेंगें जिसको वे विभिन्न सदनों में बैठकर बनाते हैं तो उनके प्रति किसी भी तरह की रियायत आख़िर क्यों की जाये ? इस देश का जितना नुकसान आज के समय में विधायिका में शामिल कुछ लोगों द्वारा किया जा रहा है वह इससे पहले कभी भी नहीं देखा और सुना गया है तो इस स्थिति में अब कड़े क़दम उठाने की बारी विधायिका की ही है पर "घर के परोसने वाले और अँधेरी रात" का लाभ उठाने में माहिर ये माननीय क्या अपने ख़िलाफ़ कोई कड़ा कानून बनायेंगें यह देखने का विषय होगा. फ़िलहाल तो सभी लोकतंत्र की बहती गंगा में हाथ धोकर उसे गन्दा करने में लगे हुए हैं.         
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