मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 26 December 2010

जीएसएलवी-एफ़ ०६ की विफलता

        शनिवार को जीएसएलवी- एफ़ ०६ की विफलता के बाद अब देश के शीर्ष वैज्ञानिक इस के कारणों के बारे में जानकारी हासिल करने का प्रयास कर रहे हैं कि आख़िर किन कारणों से यह प्रक्षेपण विफल हुआ ? अभी तक भारत का अन्तरिक्ष प्रक्षेपण इतिहास बहुत ही अच्छा रहा है और अभी तक विफलताएं कहीं से भी इसरो को आगे बढ़ने से नहीं रोक पायी हैं. यह सही है कि बहुत बड़े स्तर पर जब भी कोई काम किये जाते हैं तो कहीं न कहीं से कुछ न कुछ कमियां रह भी सकती हैं और अन्तरिक्ष में उपग्रह प्रक्षेपण का काम बहुत ही पेचीदा होता है.
     वैसे इस वर्ष देखा जाए तो इसरो के लिए यह दूसरा बड़ा झटका रहा क्योंकि इससे पहले भी अप्रैल में इसी तरह से एक प्रक्षेपण असफल हो गया था. यह सही है कि इससे भारतीय संचार व्यवस्था को जो कुछ हासिल होने वाला था वह काफी हद तक विलंबित हो जायेगा. इन दोनों स्थितियों में जो कुछ भी हासिल हो सकता था अभी तक नहीं मिल पाया है पर ऐसा भी नहीं है कि असफलता कोई ऐसी चीज़ है कि उससे पार नहीं पाया जा सकता है. जिन वैज्ञानिकों ने दिन रात एक करके इस यान पर काम किया था अब उनके लिए इसे फिर से प्रक्षेपित करने की एक बड़ी चुनौती मिल गयी है. देश में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है पर अभी तक उसको जहाँ तक पहुंचना चाहिए था उसका स्तर वह नहीं हो पाया है.
    भारतीय वैज्ञानिक लगभग १८ सालों से इस महत्वपूर्ण तकनीक पर काम कर रहे हैं और इसे जितना सरल मान लिया जाता है ऐसा कुछ भी नहीं है अभी तक जो कुछ भी भारत द्वारा हासिल किया गया है वह हमारे लिए गर्व की बात है पर अभी भी हमारे इन वैज्ञानिकों को दोगुने हौसले से काम करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक हम पूरी तरह से इस तकनीक में महारत हासिल नहीं कर लेते हैं तब तक हमें भारी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ेगा. आज के युग में जब पूरी दुनिया हमारी प्रतिभा को मानती है तो यह हम पर और हमारी वैज्ञानिक प्रतिभाओं पर है कि इस पूरी विफलता को जांच कर नए सिरे से फिर से प्रयास करना प्रारंभ करें. अन्तरिक्ष विज्ञान में इस तरह की असफलताएं बहुत बार सामने आती ही रहती हैं जिनसे कहीं भी घबराने की ज़रुरत नहीं होती है.   

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1 comment:

  1. गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में...

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