मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Sunday, 18 February 2018

इंसानी आबादी में वन्य जीव

                                                    लखनऊ के आवासीय क्षेत्र में जिस तरह से तीन दिनों तक एक तेंदुएं के चलते आतंक मचा रहा और उससे निपटने के लिए वन विभाग की टीम के पास कोई कारगर योजना नहीं दिखाई दी उससे यही पता चलता है कि किसी हिंसक जीव के शहरी क्षेत्र में आ जाने के बाद उसको जान से मार देने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नहीं है ? तेंदुआ भी संरक्षित प्रजातियों में आता है और उसकी पुलिस की गोली से मरने के बाद वन विभाग अपनी कार्यवाही करने को तत्पर तो दिखाई देता है पर जिस तरह से पुलिस ने अकेले दम पर इस समस्या से निपटने की कोशिश क्या वह वन विभाग के ऊपर बड़ा प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती है ? यह सही है कि वहां पर विपरीत परिस्थितियां थीं और उनसे निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध नहीं थे तो आम लोगों की ज़िंदगी को बचाने के लिए कौन आगे आ सकता था ? ऐसी परिस्थिति में वन्य जीवों से निपटने की कोई ट्रेनिंग न होने के बाद भी लखनऊ पुलिस ने अपने स्तर से सभी प्रयास किये और अपनी जान बचाने के लिए तेंदुए को मारने जैसा कदम उठाना पड़ा पर इस पूरे प्रकरण में एक बात सामने आ गयी है कि ऐसी किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए जब सरकार की नाक के नीचे लखनऊ में विभिन्न विभागों के पास कोई कारगर योजना नहीं है तो ग्रामीण क्षेत्रों और संरक्षित क्षेत्रों के आस पास रहने वाले लोगों के लिए क्या किया जा सकता है ?
                          जिस तरह से बढ़ती आबादी का चलते जंगलों को काटा जा रहा है और उसके स्थान पर पेड़ लगाने का काम न के बराबर हो रहा है तो एक दिन ऐसी संघर्ष की स्थिति पूरे देश में जगह जगह पर दिखाई दे सकती है और अधिकांश स्थानों पर बिना ट्रेनिंग के काम करने वाले पुलिस और वन विभाग के लोग अंत में किसी संरक्षित जीव को मारकर अपना काम पूरा करते हुए दिखाई देने वाले हैं. इस बारे में अब संरक्षित वन क्षेत्रों में सभी सम्बंधित विभागों को और भी कठोरता से नियमानुसार काम करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक इन जीवों के लिए स्थान सुरक्षित कर उनके लिए उपयुक्त वातावरण तैयार नहीं किया जाता है तब तक इस तरह का संघर्ष बढ़ता ही जाने वाला है. इस मामले में किसी एक सरकार पर आरोप लगाने से परिस्थितियां बदलने वाली नहीं हैं क्योंकि जब तक मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच इस संघर्ष के उत्पन्न होने वाले कारणों पर रोक नहीं लगायी जाएगी तब तक कुछ भी ठीक नहीं होगा. इस घटना से सीख लेते हुए अब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को एक विस्तृत कार्य योजना पर राज्यों के साथ मिलकर चर्चा करने की आवश्यकता है क्योंकि तभी पूरे देश में वन्य जीवों और मनुष्यों के इस अप्रत्याशित संघर्ष को कम करके रोकने की स्थिति पैदा की जा सकेगी.
                            वन विभाग और लकड़ी माफियाओं के गठबंधन को तोडे बिना इस दिशा में आगे बढ़ पाना संभव ही नहीं है क्योंकि वन के सामान्य पारिस्थितिकी तंत्र तोड़ कर जब हम वन्य जीवों को वहां से निकलने के लिए मजबूर कर रहे हैं तो इस तरह की घटनाएं सामने आती ही रहेंगी. वन विभाग और पुलिस के माध्यम से अवैध वन कटान को रोकने और जहाँ जंगल कम हो गए हैं वहां उनको संरक्षित कर पुनः पेड़ लगाने के काम पर यदि सही तरह से ध्यान दिया जाये तो इन जीवों को अपने क्षेत्र का अतिक्रमण करने की आवश्यकता नहीं पड़ने वाली है. सघन वन क्षेत्रों के आस पास रहने वाले आम नागरिकों को भी इस तरह की किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए सामान्य बातें बताई जानी चाहिए जिससे उनमें व्याप्त होने वाले अनावश्यक भय को दूर रखा जा सके. सरकारें केवल नियम बना सकती हैं पर उन पर अमल करने के लिए जिस इच्छाशक्ति की निरंतरता के साथ आवश्यकता होती है उसमें हम लोगों में पूर्णतः असफल हो जाते हैं. अब इस घटना को ध्यान में रखते हुए वन विभाग की ट्रेनिंग और अन्य परिस्थितियों पर विचार कर इस संघर्ष को समाप्त करने कि दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है.  
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Friday, 16 February 2018

नीरव मोदी - नीयत से नियति तक

                                                 पीएनबी की तरफ से किये गए एक खुलासे के बाद जिस तरह से २०१४ में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रचंड लहर पर सवार होकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार के लिए नीरव मोदी प्रकरण ने कई बड़े प्रश्नचिन्ह लगाने का काम कर दिया है यह सही है कि मोदी के पूर्ववर्ती पीएम मनमोहन पर भी कभी व्यक्तिगत स्तर पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा था पर भाजपा जनता में यह सन्देश भेज पाने में पूरी तरह से सफल हो गयी थी कि पूरी यूपीए सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है. भरष्टचार को लेकर विपक्षी दलों पर निर्मम हमले कर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने की पीएम मोदी की हर कोशिश अभी तक लगभग सफल होती ही आयी है पर इस वर्ष के कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले वर्ष के आम चुनावों से पहले मोदी के आभा मंडल को दूषित करने वाली ये घटनाएं मतदाताओं को काफी हद तक प्रभावित कर सकती हैं इस समभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. कोई भी आसानी से यह आरोप नहीं लगा सकता कि नीरव मोदी, गिन्नी, गीतांजलि जैसी बड़ी कंपनियों से सीधे पीएम मोदी ने कोई लाभ लिया होगा और न ही इस पर कोई विश्वास भी करेगा पर यह मामला उसी तरह का हो सकता है जैसा की २जी और अन्य मामलों में हुआ जिससे सरकार की देश और विदेश में छवि को बहुत बड़ा धक्का लग सकता है.
                                               पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्य पूर्ण यह है कि जब वित्तीय मामलों में अनियमितता का मामला सामने आया तो उससे निपटने कि लिए रक्षा मंत्री का बयान क्यों सामने आ रहा है ? इस मामले पर यदि वित्त मंत्री स्थितियों को स्पष्ट करें तो उनकी बात को गंभीरता से सुना जायेगा पर संभवतः आज भी भाजपा यह स्वीकार नहीं कर पा रही है कि वह २०१४ से सत्ता में है और निर्मला सीतारमण और रविशंकर प्रसाद जैसे नेता अब उनके प्रवक्ता नहीं बल्कि सरकार के ज़िम्मेदार मंत्री हैं ? चिंता की बात यह भी है कि रवि शंकर प्रसाद के अनुसार यह मामला २०११ से था तो २०१४ के बाद सरकार ने क्या किया और यदि इसका खुलासा पिछले वर्ष जुलाई में हो गया था तो नीरव मोदी जैसा व्यक्ति एक आरोप के अनुसार आखिर विदेश में पीएम मोदी के साथ मंच पर कैसे खड़ा हो सकता था ? क्या इस मामले में पीएमओ ने विदेश मंत्रालय और अपने मंत्रालय के लिस्ट बनाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाही की है ? हो सकता है कि पीएम मोदी को यह न पता हो पर जब वे खुद को चौकन्नी नज़रों वाला बताते हैं और उनके पीएमओ द्वारा इस मामले को संज्ञान में लिया जा चुका था तो लगाए जाने वाले अपुष्ट आरोपों के अनुसार नीरव दावोस में पीएम के बगल तक कैसे पहुँच गया इस बात को लेकर पीएम मोदी पर संदेह जताया जा सकता है ? बेशक यह अधिकारियों की लापरवाही ही हो पर पीएम मोदी की छवि पर छींटे पड़ने शुरू हो चुके हैं देश को यह भी देखना होगा कि ३० साल बाद बनी पूर्ण बहुमत की सरकार पर भी राजीव गाँधी की मिस्टर क्लीन जैसी छवि वाले मोदी की छवि को धूमिल किये जाने का बहाना मिलना शुरू हो चुका है. भ्रष्टाचार पर मुखर रहने वाले पीएम मोदी के खिलाफ इतना बड़ा मुद्दा विपक्ष भी नहीं छोड़ना चाहेगा जिससे इस मामले में बैंक के कुछ लोगों पर कार्यवाही करके इसे ठंडा किये जाने की कोशिशें शुरू की जायेंगीं.
                                                      देश को अपने पीएम से सही और सीधा जवाब ठोस कार्यवाही के रूप में चाहिए उसे दलगत राजनीति से कोई मतलब नहीं है देश की आम जनता का यह पैसा जो हर्षद मेहता से लगाकर नीरव मोदी जैसे लोग आसानी से हड़पने को तैयार बैठे हैं इनसे निपटने के लिए अब सरकार के पास क्या प्लान हैं ? क्या ये बड़े लुटेरे नाम बदलकर इसी तरह देश के सत्ता प्रतिष्ठान से अपनी नज़दीकियों का लाभ उठाकर बैंको को लूटते रहेंगें और देश की सत्ता में बैठी कोई भी सरकार कड़े कदम उठाने जैसे चिर परिचित पुराने झांसे से जनता को बरगलाने का काम करती रहेंगीं ? फिलहाल देश को खुद पीएम मोदी की तरफ से इस मामले पर जवाब की आशा है और संसद में विपक्ष भी इस मामले पर सरकार को कोई राहत देने की स्थिति में नहीं होगा जिससे आने वाले समय में मोदी सरकार की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं.       
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