मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 11 April 2017

आदित्यनाथ योगी और भाजपा की चुनौती

प्रदेश में हुए विधान सभा चुनावों के बाद जिस प्रचंड जनादेश के साथ पूर्वांचल में पूरी तरह से स्थापित हिन्दू युवा वाहिनी के संरक्षक, गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर और भाजपा नेता आदित्यनाथ योगी ने भाजपा के एक हफ्ते के गहन मंथन के बाद सत्ता संभाली उसके बाद भाजपा और सीएम योगी को विपक्ष से मिलने वाली चुनौतियाँ स्वतः ही कम हो गयी हैं क्योंकि सरकार के सत्ता सँभालते ही उस की आलोचना करना सही नहीं कहा जा सकता है इसलिए अभी सरकार की प्राथमिकताओं और उसके प्रारंभिक क़दमों के बारे में विश्लेषण का काम सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ ही चल रहा है. सदन के अंदर विधान सभा में तो कमज़ोर संख्या बल के कारण विपक्ष सीएम आदित्यनाथ को किसी भी तरह की चुनौती देने की स्थिति में नहीं है पर विधान परिषद् में उसकी तरफ से मुद्दों के आधार पर सरकार को रोकने की कोशिश की जा सकती है. प्रदेश की व्यापक सीमाओं और आसन्न चुनौतियों को देखते हुए सरकार के लिए चुनावों और उससे पहले अखिलेश सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर किये गए हमलों के चलते आज एक बार फिर से सीएम आदित्यनाथ के लिए यही मुद्दा सबसे बड़ा साबित होने वाला है और जिस तरह से उन्होंने गृह मंत्रालय अपने पास ही रखा हुआ है उससे कानून व्यवस्था के सभी मामलों पर विपक्ष को सीधे उन पर हमले करने के अवसर मिलते ही रहने वाले हैं.
पिछली सरकारों में प्रदेश में जिस तरह से नेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत के चलते अधिकांश जगहों पर कानून व्यवस्था की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई देता था कमोबेश खुद सीएम आदित्यनाथ की स्पष्ट चेतावनी के बाद अब भी वही स्थिति बनी हुई है और पहले जो कार्य सपा के कार्यकर्ता किया करते थे आज वह हिन्दू युवा वाहिनी और भाजपा के कार्यकर्ता करने में लगे हुए हैं. सत्ता प्रतिष्ठान के दलाल हर सत्ता में अपना हिस्सा बांटने पहुँच ही जाते हैं क्योंकि किसी भी दल में वैचारिक समानता के कारण जो लोग जुड़े होते हैं वे कभी भी आसानी से अपनी सरकार के लिए इस तरह की चुनौतियाँ उत्पन्न नहीं करते हैं पर जो लोग सत्ता के साथ चिपकने वाले और सत्ता का लाभ उठाने की कोशिश हर सरकार में करने के माहिर होते हैं वे किसी भी परिस्थिति में सत्ताधारी दल की कमज़ोर और लालची कड़ियों को खोज ही लेते हैं और अपना काम निकालने में जुट जाते हैं. इन लोगों से निपटने के लिए खुद सीएम आदित्यनाथ को अपने स्तर पर सक्रिय होना होगा वर्ना सत्ता के ये दलाल उनकी सरकार के लिए भी चुनौतियाँ खडी करने से बाज़ नहीं आएंगे. लम्बे समय बाद प्रदेश की सत्ता में आयी भाजपा के कार्यकर्ता भी जिस तरह से अपने पुराने हिसाबों को चुकता करने और हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता नई नई जगहों पर समस्याएं खड़ी करने का काम कर रहे हैं वह सरकार और प्रदेश के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता है.
खुद सीएम आदित्यनाथ न्याय की बात कर रहे हैं और गोरखपुर में उनके लम्बे धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक जीवन में न्याय की बात काफी हद तक परिलक्षित भी होती है पर प्रदेश भर में फैले हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता जिस तरह से अतिउत्साह में दिख रहे हैं और आज समाज के अराजक तत्व भी गले में केसरिया अंगौछा डालकर सत्ता का प्रभाव दिखाने में लग चुके हैं भाजपा को अविलम्ब इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि अब चुनौती विपक्ष से निपटने के स्थान पर अपने में छिपे उन तत्वों की पहचान करने और सुधार करने की है जो आने वाले समय में सरकार के लिए समस्या बन सकते हैं. सत्ता की तरफ लाभ कमाने के लिए भागने वाले इस मानसिकता के लोगों को अपने अंदर चिन्हित करने के साथ ऐसे तत्वों के संगठन में प्रवेश पर भी कड़ाई से ध्यान देना होगा जिससे आने वाले समय में सरकार के साथ खड़े लोग उसके लिए विभिन्न स्तरों पर अनावश्यक चुनौतियाँ न खडी कर सकें. वैसे तो मंत्रिमंडल चुनना सीएम का विशेषाधिकार होता है पर यूपी की विशालता और चुनौतियों को समझते हुए सीएम आदित्यनाथ यदि दो गृह राज्य मंत्रियों की नियुक्ति करने के बारे में सोचें जिन्हें पूर्वी और पश्चिमी यूपी के कुछ जनपदों की ज़िम्मेदारियों को दिया जाये और मध्य यूपी के बड़े हिस्से को खुद वे अपने नियंत्रण में रखें तो आने वाले समय में कानून व्यवस्था में गुणात्मक सुधार आ सकता है.
सरकार सँभालने के बाद अभी तक सीएम आदित्यनाथ ने किसी भी विभाग में बड़े स्तर पर स्थानांतरण नहीं किये हैं जिससे यह लगता है कि वे अधिकारियों को यह स्पष्ट सन्देश देना चाहते हैं कि जो कानून के अनुसार चलेगा उसके लिए कोई समस्या नहीं आने वाली है पर सरकार की मंशा के अनुरूप खरे न उतरने वाले अधिकारियों के लिए अब सब कुछ उतना आसान नहीं रहने वाला है. यह भी अच्छा ही है कि सीएम आदित्यनाथ खुद आगे आकर सरकार चलाने के लिए कृत संकल्पित दिखाई दे रहे हैं पर आने वाले समय में सीएम के रूप में विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी सहभागिता जितनी बढ़ती जाएगी व्यस्तता के चलते सरकार चलाने पर उनके लिए इतना ध्यान दे पाना संभव नहीं रह जायेगा इसलिए अभी से उन्हें अपने मंत्रियों और अधिकारियों के सामने पहले साल का लक्ष्य निर्धारित करना होगा जिससे वे २०१९ में होने वाले आमचुनावों तक भाजपा के २०१४ और २०१७ के प्रदर्शन को दोहराकर केंद्र में मोदी सरकार की वापसी का मार्ग भी खोल सकें. यूपी में आज भाजपा के नेताओं में पारस्परिक हितों का टकराव न के बराबर है और इस स्थिति का लाभ कहाँ तक सीएम आदित्यनाथ उठा पाते हैं यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होने वाला है. सरकार बन चुकी है और चूंकि सीएम आदित्यनाथ अधिक लोगों के लिए जवाबदेह नहीं हैं इसलिए उनके लिए कड़े निर्णय करना आसान भी रहने वाला है वे अपने और भाजपा के लिए समाज में स्वीकार्यता को कितना बढ़ा पाते हैं यह तो आने वाले एक दो सालों में स्पष्ट हो पायेगा.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 15 March 2017

ईवीएम - आरोप और तथ्य

                                                  पांच राज्यों में हुए चुनावों के रुझान और नतीजे आने के साथ ही जिस तरह से बसपा अध्यक्ष मायावती ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के माध्यम से चुनावों में हेर-फेर करने के आरोप लगाने शुरू कर दिए उसके बाद उनके वोटर्स और कुछ अन्य आम लोगों के मन में यह सवाल भी उठने शुरू हुए कि क्या ईवीएम के साथ कोई दल चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में करवा सकता है ? इसके लिए सबसे पहले हमें इन मशीनों की संरचना को समझना होगा क्योंकि वोट डालने वाले सभी लोगों ने वोटिंग मशीन और उससे जुडी हुई कण्ट्रोल यूनिट को मतदान के समय अवश्य देखा होगा. जिस मशीन में हम अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन करने के लिए उपयोग में लाते हैं वह वोटिंग यूनिट और जो पीठासीन अधिकारी के पास होती है उसे कण्ट्रोल यूनिट कहा जाता है. हर वोटिंग मशीन में अधिकतम १६ प्रत्याशियों के लिए स्थान होता है और वोटिंग मशीन की इस व्यवस्था से अधिकतम ४ यूनिट समानांतर लगाकर ६४ प्रत्याशियों के लिए व्यवस्था की जा सकती है इससे अधिक प्रत्याशी होने पर मतपर्तों द्वारा चुनाव कराना अपरिहार्य हो जायेगा. हर निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवारों के अनुरूप इन मशीनों की प्रोग्रामिंग की जाती है तथा आज उपयोग में लायी जाने वाली इन मशीनों की वोट रिकॉर्ड करने की अधिकतम सीमा ३८४० मतों की है परंतु अधिकांश बूथों पर केवल १५०० वोटर ही होते हैं जिससे क्षमता संबंधी समस्या कभी भी सामने नहीं आ सकती है. एक समय होने वाली बूथ कैप्चरिंग की घटनाओं को ईवीएम ने पूरी तरह से समाप्त ही कर दिया है क्योंकि इनकी व्यवस्था और कार्यप्रणाली कुछ इस तरह की है कि बहुत कोशिश करने के बाद भी एक मिनट में ५ से अधिक वोट नहीं डाले जा सकते हैं यह भी तब संभव है जब पीठासीन अधिकारी भी मिला हुआ है वर्ना अधिकारी के कंट्रोल यूनिट में क्लोज बटन दबाते ही नए वोटों को डालने की प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी.
                                         मतदान की यह पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है इसके बारे में भी समझना आवश्यक है क्योंकि सुबह मतदान शुरू करने से पहले आयोग की तरफ से न्यूनतम ५० वोट का मॉक पोल कराने का निर्देश भी दिया जाता है जिसमें सभी प्रत्याशियों के एजेंट शामिल किये जाते हैं और उनके सामने ही कण्ट्रोल यूनिट पर कुल पड़े वोट और उनकी गणना की जाती है तथा मशीन द्वारा सही तरह से काम करने की स्थिति को जांच जाता है जिसके बाद मशीन को फिर से न्यूट्रल करके सील किया जाता है और मतदान प्रारम्भ कराया जाता है. इस पूरी प्रकिया के बीच सेक्टर प्रभारी और अन्य तरह के प्रशासनिक और चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारी निरंतर दौरा करते रहते हैं जिससे कहीं भी किसी भी अनियमितता की स्थिति में उसे त्वरित रूप से रोका जा सके. जब हर मतदान केंद्र पर हर प्रत्याशी के एजेंट मौजूद रहते हैं और साथ ही प्रत्याशी खुद भी अपने स्तर से बूथ के बाहर पूरी चौकसी रखते हैं तो किसी भी गड़बड़ी को आखिर किस तरह से किया जा सकता है ? इस सबके बाद भी पूरे चुनाव में किसी भी एजेंट की तरफ से मशीन की कार्यप्रणाली पर कोई संदेह व्यक्त नहीं किया गया और वोटर्स ने भी किसी भी स्तर पर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई तो इस तरह के आरोपों को हताशा की उपज ही माना जा सकता है.
                                       वोटिंग मशीन में मतदान के बाद जब एजेंट्स की उपस्थिति में पीठासीन अधिकारी क्लोज बटन दबा देता है तो उसके बाद रिकॉर्डिंग यूनिट में लगी चिप से बिना किसी छेड़छाड़ के ब्यौरे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है और यह चिप आयात करने के समय से ही सील होती है इसके साथ किसी भी तरह की छेड़खानी करने से इसमें रिकॉर्ड डाटा खुद ही नष्ट हो जाता है जिससे बाद में काउंटिंग के समय इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा तो किसी के द्वारा ऐसे प्रयास ही कैसे किये जा सकते हैं. जिन स्ट्रांग रूम्स में ये मशीनें रखी जाती हैं वहां पर कई स्तरीय सुरक्षा की जाती है और सील कमरों के बाहर प्रत्याशी भी अपने ताले वहां पर लगा सकते हैं जिसके लिए आयोग ने उन्हें अधिकार दे रखे हैं पर अधिकांश मामलों में प्रत्याशी सुरक्षा से संतुष्ट होते हैं. इन मशीनों में रिकॉर्ड किये गए ब्यौरे को १० वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है हालाँकि ऐसी आवश्यकता नहीं पड़ती है. मतदान के पश्चात् मशीनों को ऑफ करके बैटरी निकाल ली जाती है जिसे काउंटिंग के दिन फिर से लगाया जाता है जिससे लंबी चुनावी प्रक्रिया के दौरान बैटरी सम्बंधित किसी भी समस्या से मशीन और रेकॉर्ड्स को नुकसान न पहुँच सके. फिर भी किसी संदिग्ध परिस्थिति में कोई समस्या आने पर उस मशीन या क्षेत्र से जुड़े मतदान को दोबारा कराने जाने का विकल्प आयोग के पास सदैव ही सुरक्षित रहता है.
                                   अब इस परिस्थिति में ईवीएम से हुए मतदान पर संदेह करने वालों की मानसिक स्थिति को समझना आवश्यक भी है क्योंकि २००९ के आम चुनावों में हार के बाद भाजपा के नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी मायावती की तरह ही इस तरह के आरोप लगाए थे और मतदान को मतपत्रों के माध्यम से मतदान कराये जाने की मांग भी की थी. इसका सीधा सा मतलब यही है कि ७० साल के लोकतंत्र में अभी भी देश के कुछ नेता इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि वे जनता के अपने विरोध में जाने को आसानी से स्वीकार कर सकें ? उन सभी नेताओं को अपनी नीतियों और उन कारणों पर विचार करना चाहिए जिनके चलते जनता ने उन्हें इन वोटिंग मशीनों के माध्यम से नकार दिया है और अगर वे अब भी नहीं सुधरे तो उनके लिए भविष्य में बचे रह पाना भी संभव नहीं हो पायेगा. अपनी कमज़ोरियों का ठीकरा इन मशीनों पर फोड़ने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है क्योंकि इन्हीं मशीनों ने कभी लाल कृष्ण आडवाणी को उप प्रधानमंत्री तथा खुद मायावती को यूपी का मुख्यमंत्री भी बनवाया था. यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि सत्ता परिवर्तन इतनी शांति के साथ हो जाया करते हैं इसलिए लोकतंत्र की मूल भावना को समझना आवश्यक है और अपनी हताशा को व्यक्त करने के स्थान पर अपने अंदर कमियों को खोजने के बारे में सोचना चाहिए जिससे लोकतंत्र को और भी मज़बूत किया जा सके.          
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...