मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 12 June 2018

सड़क सुरक्षा - नियम और अनुपालन

                           देश में तेज़ी से बेहतर होती सड़कों और वाहनों में नयी तकनीक आने के बाद बढ़ती हुई रफ़्तार ने जिस तरह से आम लोगों के सफर को आसान किया है वहीँ कुछ लापरवाहियों से उनकी ज़िंदगियों को बहुत खतरे में डालना शुरू कर दिया है अब इस पर व्यापक विचार विमर्श और राजमार्गों पर चलते समय नियमों का पूरी तरह पालन करने की तरफ सोचने का समय आ गया है. संत कबीर नगर के छात्र छात्रों का एक टूर हरिद्वार के लिए निकला था जिसमें से एक बस में डीज़ल ख़त्म हो जाने के कारण पूरा काफिला एक्सप्रेस वे पर ही रुक गया था. एक बस से प्राचार्य समेत कुछ  लोग डीजल की व्यवस्था के लिए गए हुए थे उसी समय शिक्षकों और छात्रों ने एक्सप्रेस वे पर ही घूमना शुरू कर दिया जो कि अपने आप में बहुत बड़ी चूक ही कही जा सकती है क्योंकि सुबह सवेरे तीन बजे क्या एक्सप्रेस वे पर किसी भी समय इस तरह से पैदल घूमना अपने आप एक बहुत बड़ा खतरा ही है फिर भी इस रास्ते और यातायात से अनजान इस समूह ने जाने अनजाने जो गलती की उसके फलस्वरूप ही कई छात्रों और एक शिक्षक की जान भी चली गयी. इस पूरी घटना के लिए अब किसी को भी ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है पर क्या हम एक नागरिक के तौर पर सड़क सुरक्षा से जुडी अपनी ज़िम्मेदारियों का अनुपालन करते हैं अब खुद से यह गंभीर सवाल पूछने का समय आ गया है.
                                  इस दुर्घटना में जब नुकसान हो चुका है तो क्या आगे आने वाले समय में इस तरह की पुनरावृत्ति रोकने के लिए हम सब को जागरूक होने की आवश्यकता नहीं है? आखिर क्यों हम अपनी लापरवाही  से खुद और दूसरों की जान से खिलवाड़ क्यों करते हैं? क्या हम सभी की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती है कि खुद को सुरक्षित रखते हुए दूसरों को भी सुरक्षित महसूस कराने की तरफ कदम बढ़ायें? निश्चित तौर पर सरकार की तरफ स इस मामले में बहुत कुछ नहीं किया जा सकता है क्योंकि आजकल जिस तरह से सामान्य प्रशासनिक कार्यों तक के लिए जनहित याचिकाओं के माध्यम से सरकार को काम करने के लिए मजबूर करने की स्थिति बन चुकी है उस परिस्थिति में सरकार और यातायात पुलिस पूरे वर्ष खुद इस कार्य के लिए तत्पर रहेगी यह सोचना ही गलत है क्योंकि सभी कार्य केवल राजनैतिक हानि लाभ और व्यक्तिगत सुविधा को ध्यान में रखते हुए ही किये जाने की जो परंपरा देश में विकसित हो चुकी है उससे पार पाने की आवश्यकता भी है. अच्छा हो कि हमारे शैक्षिण विषयों  में यातायात से जुड़े हुए कुछ अध्याय अवश्य होने चाहिए जिससे भविष्य के नागरिक हमारे बच्चे सड़क पर सामने आने वाली समस्याओं और चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करना सीख सकें। एक विषय के रूप में यह भले ही न पढ़ाया जा सके पर इसकी आवश्यकता पर विचार करने की मजबूरी आज सामने आ चुकी है.
                                   यदि इस टूर पर जाने वाले समूह के लोगों को एक्सप्रेस वे पर घूमने के  संभावित खतरों के बारे में जानकारी होती तो निश्चित रूप से वे सचेत रहते और पूरे समूह को सचेत रखने का प्रयास भी करते पर जिस तरह से यह दुर्घटना हुई वह थोड़ी सावधानी से टाली अवश्य जा सकती थी. अच्छा हो कि पूरे देश के राजमार्गों और एक्सप्रेस वेज़ के बारे में सड़क परिवहन मंत्रालय को अपनी वेबसाइट पर पूरी जानकारी और सावधानियों को दिखाना चाहिए और निजी क्षेत्र या पीपीपी मॉडल पर बनने वाले हर एक्सप्रेस वे के लिए अपनी वेबसाइट बनाना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिसमें उस पूरे मार्ग पर उपलब्ध सुविधाओं आपातकालीन सेवाओं तथा दुर्घटना सम्भाव्य स्थानों के बारे में वहां जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए जिससे इन मार्गों का उपयोग करने वाले यह जानकारी पहले से ही ले सकें। एक नागरिक और यात्री के रूप में हम सभी को भी यह समझना होगा कि सरकार हमें अच्छी सड़कें दे सकती है पर उस पर चलने के लिए हमें खुद ही सभी कानूनों का अनुपालन करना होगा जिससे खुद सुरक्षित चलते हुए दूसरों को भी सुरक्षा का एहसास दिला सकें। लम्बी दूरी के यात्रियों के लिए एक वीडियो जारी किया जाना चाहिए जिसे रास्ते में पड़ने वाले पेट्रोल पम्प्स और टोल केंद्रों पर एक हाल में चलाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे आराम करते समय चालक और अन्य यात्री इन सावधानियों के बारे में जानकारी ले सकें और हमारी यात्रा सुगम होने के साथ सुरक्षित भी हो सके.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 2 June 2018

गैर भाजपाई गठबंधन

                                                          संसद में सबसे अधिक सदस्यों को भेजने वाले यूपी में विपक्षी तालमेल के चलते भाजपा को जिस तरह से लगातार भाजपा विरोधी वोटों के लामबंद होने से उपचुनावों में हार का मुंह देखना पड़ रहा है उससे आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि भाजपा की मोदी सरकार भी पता नहीं क्यों अटल सरकार की तरह पुनः आत्ममुग्धता का शिकार होती जा रही है ?  भाजपा के सामने २००४ का उदाहरण बहुत पुराना नहीं हुआ है फिर भी उसकी तरफ से जिस तरह से एक प्रचारवादी अभियान चलाया जाने लगा है वह कई बार धरातल की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता है जो उसके साथ पहली और पिछली बार चुनावों में जुड़े उन तटस्थ मतदाताओं को उससे दूर करने का काम करता है जिसके दम पर उसे लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला था। मोदी शाह और भाजपा को यह समझना ही होगा कि आज उनको राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की विकल्पहीनता का लाभ अधिक मिल रहा है और यदि किसी मज़बूत एजेंडे पर विपक्षी दल एकजुट होते हैं तो २०१९ का चुनाव भाजपा के लिए एक दुःस्वप्न भी बन सकता है जहाँ कम अंतर से हारने वाले उसके सांसदों की संख्या बहुत अधिक रह सकती है.
                       विपक्ष में जिस तरह से हर बड़े नेता की आकांक्षा पीएम बनने की तरफ जाती हुई दिखाई देती है उसे किसी भी स्तर पर गलत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि हर राजनीतिज्ञ के लिए आगे बढ़ना एक बड़ा सपना होता है और वह किसी भी परिस्थिति में अपने को आगे बढ़ाना भी चाहता है. जब एक बड़ी चुनौती के रूप में मोदी विपक्ष के सामने हैं तो उनसे निपटने के लिए अपनी तात्कालिक विरोध को दरकिनार कर अगर यूपी में माया मुलायम अजीत और कांग्रेस ने समझदारी से सीटों का बंटवारा कर लिया तो भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ सकती है जहाँ तक यह कहा जा रहा है कि यह बेमेल गठबंधन अधिक समय तक नहीं चल पायेगा तो यह भी संभव है कि अंतर्विरोधों के चलते गठबंधन दो साल भी न चल पाए पर उसके बीच में आकर सत्ता सँभालने से भाजपा के लिए बहुत समस्या हो सकती है क्योंकि आज मोदी शाह की जिताऊ जोड़ी की तानशाही संघ से लगाकर पार्टी के हर स्तर पर नेताओं द्वारा महसूस की जा रही है पर सत्ता हाथ से जाते ही क्या भाजपा के महत्वाकांक्षी नेता इन पर हमला नहीं करने लगेंगें ? आज जो दबी जबान से सुनाई देता है वह कल खुलेआम दिखाई भी दे सकता है जिससे खुद भाजपा की संभावनाओं पर असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है.
                         परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों पर अब राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस को खुद को साबित करने का अंतिम अवसर मिला हुआ है और जिस तरह से अपने वजूद के लिए संघर्ष करती हुई कांग्रेस ने अहमद पटेल के चुनाव के बाद से हर मोर्चे पर लड़ने की इच्छा दिखाई है उससे उनके हताश कार्यकर्ताओं का मनोबल भी मज़बूत हुआ है. राहुल गाँधी के पास अभी बहुत समय है और इस सच्चाई को वह समझ रहे हैं यह उनके और कांग्रेस के लिए अच्छी बात है क्योंकि देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने और गुजराल सरकार को समर्थन देने की राजनीति करने वाली कांग्रेस में पिछले २२ सालों में बहुत कुछ बदल चुका है. विपक्ष के पास भी अधिक समय नहीं है क्योंकि मोदी सरकार में जिस तरह से संगठित तरीके से विपक्षी नेताओं को देशविरोधी साबित करने की कोशिश की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है और यदि यह परिस्थिति २०२४ तक बनी रही तो देश के ताने बाने में बहुत कुछ बदल सकता है. कौन पीएम होगा और कौन नहीं इस बात पर विचार करना अभी जल्दबाज़ी होगी क्योंकि जब तक भाजपा की संख्या को २०० तक सीमित करने में विपक्षी दल सफल नहीं होंगें तब तक नेताओं के चयन की कोई बात कम नहीं करने वाली है राज्यों में मज़बूत दलों को अपने राज्य में खुद के लिए अधिक और कांग्रेस के लिए कम सीटें छोड़ने और केंद्र में कांग्रेस के लिए अधिक सीटें छोड़ने जैसे किसी सम्मानजनक स्तर पर बात करनी होगी तभी २०१९ में उनके लिए कुछ संभव होगा वर्ना मोदी अपनी पूरी ताकत झोंक कर एक और आजम चुनाव को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए तैयारी करने में व्यस्त हो चुके है.    
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