मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Friday, 19 January 2018

उग्र बच्चे उत्तरदायी कौन ?

                                                     लखनऊ के एक स्कूल में सातवीं में पढ़ने वाली एक छात्रा ने जिस तरह से पहली कक्षा के मासूम बच्चे पर जानलेवा हमला कर उसे जान से मारने की कोशिश की वह हमारे समाज की वर्तमान व्यवस्था को झकझोरने के लिए काफी है क्योंकि भले ही पहली दृष्टि में हम सभी को यह एक असामान्य घटना लगे जिसमें सिर्फ एक दिन की छुट्टी हो जाने की आशा में कोई ११ साल की लड़की इस हद तक चली गयी हो पर गंभीरता से विचार करने पर यह पूरी तरह से सामाजिक, पारिवारिक उत्तरदायित्वों को सहेज पाने की हमारी विफलता ही दिखाई देती है. अब जिस तरह से पूरे मामले को घुमाने की कोशिशें हो रही हैं वे अपने आप में इसे भी कुछ दिनों में भूल जाने वाली घटना में बदल देंगीं और जब कभी कहीं से इस मामले की किशोर न्याय बोर्ड में सुनवाई होगी तब इस बारे में हम एक बार फिर अपनी चिंताएं व्यक्त कर आगे बढ़ जायेंगें. लखनऊ के एसएसपी द्वारा जो बयान दिया गया वह वास्तव में चौंकाने वाला है कि यह छात्रा पहले भी दो बार घर से गायब हो चुकी थी जिसके बारे में पुलिस के पास भी सूचना दी गयी थी फिर भी छात्रा के परिजनों, स्कूल या पुलिस ने इतनी कम उम्र की इस छात्रा की उचित कॉउन्सिलिंग कराने के बारे में क्या कदम उठाया यह सामने नहीं आया है.
                                   अभी भी जिस तरह की जानकारियां सामने आ रही हैं उनसे यही लगता है की इस घटना के पीछे कोई अन्य कारण भी हो सकता है क्योंकि जिस तरह से स्कूल ने घटना के बारे में पुलिस प्रशासन को सूचित नहीं किया और २४ घंटे बाद इस मामले में पुलिस का हस्तक्षेप शुरू हुआ वह भी संदेह उत्पन्न करता है. नियमतः किसी भी स्कूल प्रबंधन को किसी भी दुर्घटना की जानकारी पुलिस को देना कानूनी और सामाजिक रूप से सही और आवश्यक होता है पर इस मामले में पुलिस को पता ही बहुत देर से चला जिससे प्रबंधन भी संदेह के घेरे में आ गया. यदि स्कूल की तरफ से पहले ही यह प्रयास किया जाता कि घटना पुलिस के संज्ञान में हो तो संभवतः मामला इतना नहीं बिगड़ता. यदि मौके से साक्ष्यों को मिटाने का प्रयास किया गया है तो स्कूल पर शक और भी गहरा जायेगा भले ही इसमें सिर्फ छात्रा ही शामिल रही हो. पुलिस को स्कूल और वहां पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से भी गहन पूछताछ करनी चाहिए जिससे प्रबंधन के बारे में किसी गड़बड़ी का अंदाज़ा लग सके और यह भी हो सकता है कि स्कूल ने बदनामी से बचने के लिए मामले को खुद अपने स्तर से निपटाने की कोशिश की हो जिसमें बच्चे को लगी गंभीर चोटों के कारण मामला बिगड़ गया.
                       समाज के तौर पर हमें अब अपने निरीक्षण की आवश्यकता भी है क्योंकि आखिर वे क्या कारण है कि हमारी एक बच्ची इतनी हिंसक हो जाती है कि वह दूसरे बच्चे की जान लेने तक सोच जाये ? क्या हमारे घरों में पहुंची टीवी और हाथों में आये इंटरनेट वाले मोबाइल फ़ोन इस दिशा में बच्चों के कोमल मन को प्रभावित तो नहीं कर रहे हैं ? आखिर टीवी पर कुछ भी दिखाए जाने को सही कैसे ठहराया जा सकता है क्योंकि अपराधों के बारे में आने वाले अधिकांश कार्यक्रमों में अपराधी के काम करने का तरीका क्या था यही बताया जाता है और उन कार्यक्रमों को देखने वाले हमारे बच्चे यह निर्णय नहीं कर पाते हैं कि इस जानकारी का क्या किया जाये ? संयुक्त परिवारों से दूर होते छोटे परिवारों में आज माता-पिता के पास इतना समय ही नहीं है कि वे अपने बच्चों के साथ रह पाएं और उनकी गतिविधियों पर भी ध्यान दें क्योंकि कोई बच्चा एक दिन में इतनी आपराधिक प्रवृत्ति से भर नहीं सकता है. कई बार घर में मिलने वाली उपेक्षा या अत्यधिक लाड प्यार भी उनके इस दिशा में बढ़ जाने का एक बड़ा कारण हो सकता है. आखिर क्यों आज हम समाज की एक मज़बूत इकाई बनकर जीने के स्थान पर अपने एकल इकाई में परिवारों को संभालना सीखते जा रहे हैं ? क्या इस तरह का जीवन हमारे घरों में हमारे बच्चों पर बुरा प्रभाव नहीं डाल रहा है और क्या अब इस समस्या से निपटने के लिए हमारे पारिवारिक मूल्यों की तरफ बढ़ने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है ? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हम केवल अपनी सुविधा के अनुरूप ही खोजने की कोशिशें करते रहते हैं और कुछ घट जाने पर केवल यह कहकर ही अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाते हैं कि बहुत बुरा समय आ गया है. समय बुरा नहीं आया है हमने अपने बच्चों को अच्छाइयों और बुराइयों के अंतर को समझाना बंद कर दिया है और उनके विकास के लिए उन्हें आज की दुनिया में खुला छोड़ दिया है जबकि हम सभी को यह सोचना चाहिए की खुलापन सिर्फ उतना ही हो जिसमें घुटन न हो घर के लोगों और समाज से बच्चों का अपनापन बना रहे और वे आने वाले समय में अच्छे नागरिक बनकर देश के लिए कुछ ठोस कर सकें तभी कुछ सुधार संभव है.        
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Wednesday, 3 January 2018

मानक रैक - रेलवे की नयी पहल

                                         हर वर्ष कोहरे और अन्य कारणों से भारतीय रेलवे की अधिकांश गाड़ियां अनिश्चित काल के लिए विलम्ब से चलने लगती हैं जिनसे निपटने के लिए सदैव ही रेलवे की तरफ से कई तरह के प्रयास किये जाते रहते हैं पर उनसे स्थितियों को सही करने में पूरी क्या थोड़ी भी मदद नहीं मिल पाती है जिससे रेलवे के साथ यात्रियों को भी बहुत असुविधा का सामना करना पड़ता है. इस समस्या से निपटने के लिए अब रेलवे की तरफ से एक नयी पहल की जा रही है जिससे यह आशा की जा सकती है कि यदि इसे सही तरह से लागू किया जा सका तो आने वाले समय में रेलवे अपने संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से लगातार लेट होती गाड़ियों को काफी हद तक काबू में ला सकता है. इस योजना में अब पूरे देश में चलने वाली सभी गाड़ियों की संरचना को एक नियमित मानक में कर दिया जायेगा जिससे आरक्षण से लगाकर अन्य सभी समस्याओं से बिना किसी परेशानी के निपटा जा सकेगा और बहुत देर से चलने वाली गाड़ियों के स्थान पर उपलब्ध रैक्स को उपयोग में लेकर किसी भी  स्टेशन से जाने वाली गाड़ी को सही समय से रवाना किया जा सकेगा. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि मान लीजिये लखनऊ स्टेशन से किसी गाड़ी को शाम के तीन बजे रवाना होना है पर जो रैक उस मार्ग उस गाड़ी के लिए चलायी जाती है वह किसी कारण से लेट है तो उसके आने के बाद उसको आवश्यक अनुरक्षण के कार्य के लिए यार्ड में भेजा जायेगा जिससे उसके जाने का समय भी और लेट हो जायेगा. इस स्थिति में रेलवे के मानक रैक उपलब्ध होने से सुबह समय से आयी और अनुरक्षण से वापस आ चुकी तथा देर रात में जाने वाली किसी अन्य गाड़ी के रैक को लखनऊ स्टेशन से इस गाड़ी के नंबर के साथ रवाना किया जा सकता है और देर रात जाने वाली किसी अन्य गाड़ी के समय पर लेट आने वाली गाड़ी के रैक को अनुरक्षण के बाद भेजा जा सकता है.
                                             आज रेलवे के सामने इस प्रक्रिया को शुरू करने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसकी सभी गाड़ियों के रैक्स आज की आवश्यकता के अनुसार १२, १६, १८, २२ और २६ कोच के होते हैं जिस कारण रेलवे किसी ट्रेन के लेट होने पर किसी और खड़ी ट्रेन को उसके नाम से नहीं चला पाती और मुख्य ट्रेन का आने का ही इंतजार करना पड़ता जिससे पहले सही लेट चल रही गाड़ियां और भी लेट हो जाती हैं और रेलवे के पास उनको निरस्त करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचता है. इससे जहाँ रेलवे को आर्थिक नुकसान होता है वहीँ यात्रियों के लिए भी अचानक से नयी समस्या सामने आ जाती है. रेलवे के नए प्लान के अनुसार यदि काम सही ढंग से चल पाया तो सही समय से चलने वाली एक गाड़ी के रैक का दूसरी गाड़ी में उपयोग करके गाड़ियों के लेट होने के घंटो पर नियंत्रण किया जा सकेगा साथ ही विषम से विषम परिस्थिति में भी ट्रेन को निरस्त करने जैसे कदम उठाने ही नहीं पड़ेगें क्योंकि तब लेट होने की एक सीमा निर्धारित की जा सकेगी और उसके बाद भी लेट चलने वाली गाड़ी को समय रहते ही निरस्त कर दिया जायेगा जिससे यात्रियों को अधिक समस्या का सामना न करना पड़े. ऐसी स्थिति के लिए तैयार होने के लिए रेलवे को तेज़ी से अपने अनुरक्षण से जुड़े संसाधनों को बढ़ाना होगा क्योंकि अभी कुछ जगहों पर छोटी रैक का अनुरक्षण ही किया जाता सकता है जिसके चलते वहां पर २२ डिब्बों वाली रैक का अनुरक्षण संभव नहीं हो पायेगा और जब तक पूरे देश में इस व्यवस्था को लागू नहीं किया जा सकेगा तब तक रेलवे के लिए परिचालन से जुडी समस्याएं बनी ही रहने वाली हैं.
                                               आने वाले समय में जिस तरह से भारतीय रेलवे की सभी गाड़ियों को आधुनिक एलएचबी रैक्स से बदलने की नीति पर अमल शुरू हो चुका है तो इससे भी ट्रेनों की गति और सुरक्षा पर गुणात्मक असर पड़ने वाला है. ये कोच हमारे परंपरागत कोचों से हलके और बेहद मज़बूत होते हैं साथ ही इनमें दुर्घटना के समय न पलटने की तकनीक का उपयोग किया गया है जिससे दुर्घटना की भयावहता को कम किया जा सकता है. इन कोचों को आधुनिक तरीके से बनाया जाता है जिससे इनका अनुरक्षण और सफाई करना पहले के मुक़ाबले आसान हो गया है और इस कार्य में लगने वाले समय को भी घटाने में रेलवे को अच्छी खासी मदद मिलने वाली है. आशा की जानी चाहिए कि जिन ३०० मार्गों पर चलने वाली गाड़ियों में प्रारंभिक तौर पर २२ कोचों वाली मानक रैक का उपयोग प्रारम्भ करने के बारे में विचार किया गया है उसको देखते हुए जल्दी ही गाड़ियों के लेट होने के समय को कम किया जा सकेगा साथ ही रेलवे को अत्यधिक व्यस्त मार्गों पर कोहरे के अतिरिक्त फिर से २६ कोचों के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि २६ कोच वाली हर गाड़ी में ४ कोच कम होने से गाड़ियों की परिवहन क्षमता भी कम हो जाएगी और यात्रियों का दबाव अन्य गाड़ियों पर बढ़ जायेगा जिससे इस नयी समस्या से निपटना और भी कठिन हो सकता है. इसके लिए रेलवे इसे चरणबद्ध तरीके सभी लागू कर सकता है जिसमें २२ और १८ कोचों का मानक बनाते हुए पहले पहले इन दो स्तरों पर काम किया जाये और बाद में कोचों की उपलब्धता और उत्पादन के अनुरूप एक निश्चित समय सीमा में इस नयी व्यवस्था को लागू किये जाने का प्लान भी सामने रखना चाहिए और यदि संभव हो तो इसके साथ ऐसा नियम भी जोड़ा जाना चाहिए जिससे आने वाले समय में इसके कार्य को रोका न जा सके.    
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