मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 31 October 2018

नि:शुल्क बेटी वाहिनी

                                      तमाम होहल्ले और सरकारी तामझाम के बाद भी जो काम आम बेटियों के लिए संभव नहीं हो सकता था उसे गांव के रहने वाले एक रिटायर्ड शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ ने अपने पीएफ के १७ लाख रुपयों के बाद २ लाख रूपये खुद से डालकर आसान कर सरकार को भी एक राह दिखा दी है. राजस्थान के रहने वाले डॉ रामेश्वर प्रसाद यादव ने एक बार अपने गांव जाते समय रास्ते में पानी से भीगती लड़कियों को देखकर उन्हें अपनी कार में लिफ्ट दी तब उन्हें लड़कियों से बातचीत करके उनकी समस्या की गंभीरता का पता चला जिसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी से भी इस बारे में चर्चा की और अपने गांव के आस पास के गांवों की लड़कियों को लाने ले जाने के लिए एक बस खरीदने की योजना बनायीं और बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के अपने बुढ़ापे के लिए जमा की गयी पीएफ की राशि के रुपयों से एक बस खरीद कर लड़कियों को अमूल्य सौगात दी. देखने में यह काम साधारण सा ही लगता है पर इसके लिए भी उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा. आज भी वे लगभग ३६ हज़ार रूपये प्रति माह खर्च करके इस सेवा को ७० लड़कियों के लिए सुलभ बना चुके हैं.
                      इस पूरे प्रकरण में एक व्यक्ति के प्रयास से कुछ गांवों की लड़कियों इतना कुछ किया जा सका है तो इसमें सामजिक संस्थाओं, उद्योगों और सरकारों की भूमिका के पुनर्निर्धारण के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए क्योंकि जिस तरह से एक व्यक्ति कुछ गाँवों में इच्छाशक्ति से बदलाव लाने की तरफ जा सकता है तो क्या इस बारे में इसे और बड़े स्तर पर नहीं शुरू किया जा सकता है जिसमें एनजीओ, शिक्षा विभाग, महिला कल्याण विभाग और उद्योगों की तरफ से सामाजिक सरोकारों के लिए खर्च किये जाने वाले धन का क्या बेहतर उपयोग कर लड़कियों के शैक्षणिक स्तर को सुधारने का काम नहीं किया जा सकता है ? डॉ यादव का कार्य अनुकरणीय है पर उनके इस प्रयास को भी जिस तरह से कानून और नियमों के कारण अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ रही है क्या सरकारें वर्तमान कानूनों में कुछ सुधार कर उसमें कुछ राहत नहीं दे सकती हैं ? डॉ यादव के मामले में उनसे राजस्थान परिवहन विभाग ५ हज़ार रूपये प्रति माह टैक्स के रूप में वसूल रहा है जबकि उनके इस कार्य के लिए क्या गाड़ी के पंजीकरण से लगाकर टैक्स तक में पूरी छूट की व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता नहीं है ?
                      हमारे कानून और राजनेता के साथ समाज में भी एक अलग तरह की धारणा बनी हुई है  जिसके चलते किसी भी अच्छे कार्य को भी बहुत सारी अड़चनों से होकर गुज़रना पड़ता है. क्या किसी राज्य सरकार या परिवहन विभाग के मंत्री/ अधिकारी के पास इतने अधिकार नहीं होने चाहिए कि आवश्यकता पड़ने पर वे इस तरह के सराहनीय सामाजिक कार्यों को करने वाले लोगों के लिए अपने स्तर से पूरी छूट दे सकें ? क्या हर काम को उसी कानून से चलाने की आवश्यकता है जो आम लोगों के लिए सामान्य प्रशासन को संचालित करने हेतु बनाया गया है ? क्या असाधारण प्रयास से लोगों के जीवन में बदलाव करने वाले किसी भी व्यक्ति को हर स्तर पर अधिक सहायता करने की व्यवस्था करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए ? क्या हम सिर्फ कानून का अनुपालन करने वाली मशीन बनना चाहते हैं या इन कानूनों के बीच मानवीय संवेदनाओं के साथ काम करने वाले किसी डॉ यादव के प्रयासों की सराहना करते हुए उनके लिए काम करने का माहौल को और भी सुधारने का प्रयास कर सकते हैं ? यह सही है कि यदि टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा को डॉ यादव की इस पहल का पता चले तो वे स्वयं उनके प्रयासों की सराहना करते हुए उनके लिए कुछ निशुल्क बसों की व्यवस्था भी अविलम्ब करा सकते हैं फिर भी ऐसे प्रयास केवल स्थानीय सराहना के बाद कहीं खो से क्यों जाते हैं जिनका पूरे देश में प्रचार प्रसार होना चाहिए ? कम  से कम सरकारें तो इस तरह के प्रयासों के लिए अपने स्तर से टैक्स में छूट दे सकती हैं और जिस ज़िले में ऐसा काम किया जा रहा है वहां विधायक या सांसद निधि से इन बसों में नियमित डीज़ल भरवाने की व्यवस्था भी की जा सकती है.           
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Tuesday, 30 October 2018

अयोध्या का युद्ध

                                                अयोध्या के मंदिर मस्जिद विवाद में जिस तरह से समय के साथ स्थितियों में परिवर्तन आता चला गया है उसे देखते हुए अब यह कहा जा सकता है कि यह मुद्दा केवल चुनावी हथियार की तरह प्रयोग किया जाने वाला एक ऐसा उपाय रह गया है जिसे भाजपा हुंकार से लेकर संकल्प तक ले जा चुकी है. साथ ही आज इसकी स्थिति यह है कि देश की दो बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के इस मुद्दे पर रवैये में कोई अंतर् नहीं दिखाई दे रहा है ? कालातीत में हुई ज़बरदस्ती और धर्म परिवर्तन के लिए हुई हिंसा से कोई इंकार नहीं कर सकता है जिसके कारण देश की स्थिति में बहुत परिवर्तन भी दिखाई दिया था पर आज यह मुद्दा जिस तरह से उग्रता की तरफ लौटता दिखाई दे रहा है उससे आम हिन्दुओं में कट्टर छवि रखने वाले पर वास्तविकता में व्यापारिक हितों को प्राथमिकता देने वाले पीएम मोदी के लिए सबसे बड़ी समस्या खडी होने वाली है क्योकि अब उन के साथ पूरी भाजपा पर भी समाज और संतों का यह दबाव है कि राममंदिर के बारे में भाजपा की सरकारें अपनी घोषित प्रतिबद्धता को पूरा करें।
                              इस मुद्दे का जीवंत रहना कहीं न कहीं से संघ उसके संगठनों और राजनैतिक मंच भाजपा के लिए चुनावों में काफी सहजता ला देता है जिससे आम हिन्दू जनमानस को मंदिर की आस्था से जोड़कर उसको भाजपा के पक्ष में जोड़े रखने के लिए उचित सामग्री भी मिल जाती है. आज पीएम मोदी के सामने यह मुद्दा एक चुनौती के रूप में आ गया है पर हिन्दू संगठनों की उग्रता के खिलाफ उन्होंने जिस तरह से गुजरात में सब कुछ छोड़कर अपना और गुजरात का नया स्वरुप गढ़ा था आज संभवतः वे उसका अखिल भारतीय स्तर पर प्रदर्शन कर दें और मोदी शाह एक बड़ा खतरा उठाते हुए इस मुद्दे को पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट पर ही छोड़ दें क्योंकि उससे मोदी को अपनी उस छवि को बनाये रखने में सफलता मिलेगी जो उन्हें विकास परक नेता साबित करती है. जिस तरह से पूरे देश के साथ केंद्र में भी मोदी और उनकी सरकार के लिए कमतर आंकी जा रही कांग्रेस अपने अध्यक्ष राहुल गाँधी के साथ आँखों में आँखें डालकर बातें कर रही है और टीवी चॅनेल्स में भाजपा के प्रवक्ताओं के सामने विकल्प सीमित होते जा रहे हैं उससे भी जनता में मोदी सरकार की नकारात्मक छवि बनने का अंदेशा बढ़ता जा रहा है.
                               ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या मोदी तुरंत संतों की मांग पर ध्यान देते हुए संसद के आगामी और इस लोकसभा के अंतिम पूर्ण शीतकालीन सत्र में एक अध्यादेश के माध्यम से राममंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने की तरफ बढ़ेंगें या अपने विकास परक मन्त्र को आगे रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को फैसले लेने के लिए छोड़ देंगें ? निश्चित तौर पर अध्यादेश से वे जनता में यह सन्देश देने में सफल हो सकते हैं कि उनकी सरकार इससे अधिक कुछ भी नहीं कर सकती थी और आने वाले समय में यदि संसद में उनका पूर्ण बहुमत हुआ तो वे इसे कानून के रूप में लागू करवा सकते हैं। पर अध्यादेश से उपजने वाली परिस्थिति में विवश में देश में अस्थिरता का सन्देश भी देगा जिससे आने वाले समय में देश की आर्थिक प्रगति पर भी बुरा असर पड़ने की सम्भावना भी है. ऐसी स्थिति में मोदी स्वयं ही इस मामले को अदालत पर छोड़कर अपनी विकासपरक छवि को बनाये रखने के लिए और जतन कर सकते हैं जिससे उनकी उदार हिन्दुओं के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उदार छवि मज़बूत हो और वे अध्यादेश को अंतिम विकल्प के रूप में आज़माने की सोचकर बैठे हों.
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