मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शुक्रवार, 12 जून 2020

सोशल मीडिया के स्वदेशी संस्करण

                                 आज इंटरनेट के युग में जब पढाई से लेकर मंत्रिमंडल की बैठक तक की सारी बातें केवल इंटरनेट के माध्यम से करने की कोशिशें की जा रही हैं तो उस समय आम जनता से लेकर विभिन्न सरकारी कामों तक में विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और ऍप्लिकेशन्स का उपयोग किया जा रहा है. पिछले दिनों देश में बहुत लोकप्रिय हो रहे ज़ूम ऍप में निजता से जुड़े कुछ मामले सामने आने के बाद सरकार तक ने यह कह दिया कि इसके उपयोग से बचें। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कोरोना जैसे संकट में आखिर आम भारतीय एक दूसरे से किस तरह से सुरक्षित संवाद करे जिससे सभी के लिए एक सुरक्षित मंच उपलब्ध हो सके ? दुनिया भर में भारतीय आईटी विशेषज्ञों का जो हल्ला मचा हुआ है उससे देश को क्या कोई लाभ मिल रहा है ? एक समय भारत के अपने लिनक्स आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने की बातें खूब हुई थीं पर उसका क्या हुआ यह आज किसी को पता नहीं है ?
                                     क्या भारतीय मेधा सिर्फ विदेशी कंपनियों में काम करने के लिए ही उपयुक्त है ? क्या कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में भारत के खुद के उपयोग के लिए कुछ मूलभूत प्लेटफॉर्म्स बनाये जाएँ जिससे गोपनीयता का मामला भी सामने न आये और विदेशी संस्करणों से होने वाली जो आय देश के बाहर चली जाती है उस पर भी विराम लगाया जा सके. इस बारे में सरकार कुछ सोचना ही नहीं चाहती उसके पास सिर्फ खोखले नारे ही हैं. आज जब अधिकांश कार्यालयों में सूचनाओं का आदान प्रदान ई-मेल के माध्यम से होने लगा है तब भी हर सरकारी कार्यालय या अधिकारियों के पास एनआईसी की मेल आईडी तक नहीं है और वे विभिन्न कंपनियों की मेल आईडी से काम चला रहे हैं. क्या देश को एक मज़बूत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की आवश्यकता नहीं है जिसके माध्यम से हम अपने कामों को चीन की तरह कर सकें।
                                      इस तरफ सोचने का सारा दारोमदार अब निजी क्षेत्र की कंपनियों पर ही जाता है क्योंकि मोदी सरकार हर क्षेत्र में विनिवेश की तरफ बढ़ रही है तो उस से ऐसे किसी प्रोजेक्ट पर काम करने की आशा नहीं की जा सकती है जहाँ बड़े निवेश की आवश्यकता है. आज विप्रो, टाटा, एचसीएल, टेक महिंद्रा और रिलायंस जैसी कंपनियां इस दिशा में ठोस कदम उठा सकती हैं क्योंकि इनके पास आईटी पेशेवरों की संख्या और अनुभव भी है. यहाँ एक बात और समझने की है कि जो कुछ भी बनाया जाये उसमें किसी प्रचलित प्लेटफॉर्म की नकल करने के स्थान पर उसे नए सिरे से शुरू करने के बारे में गंभीरता से सोचा जाए. देश की ज़रूरतों के अनुरूप बने इस मंच से जहाँ एक तरफ लोगों को सहायता मिलेगी वहीं देश से बाहर जाने वाले धन प्रवाह को भी रोका जा सकेगा। कम से कम इस दिशा में अब गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है क्योंकि आने वाले समय में कोई ऐसा संकट भी आ सकता है जिससे सीधे तौर पर सिर्फ इंटरनेट पर ही लड़ा जाये तो हमारे पास उपलब्ध सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अनुपलब्ध भी हो सकते हैं.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 5 जून 2020

चीन की चालें

                                                   एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया कोरोना से जूझने में लगी हुई है वहीं चीन पूरी दुनिया में अपनी विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है. भारत के साथ लगती उसकी अरुणाचल प्रदेश से लद्दाख तक की सीमा को वह समय समय पर विवादित बनाने की कोशिशों में सदैव लगा ही रहता है पर १९६२ के बाद से ही भारत की सरकारों और जनता की निगाहों में चीन की स्थति ऐसे पडोसी की हो गयी है जो ज़रा सी नज़र चूकने पर बाहर दाना चुग रही मुर्गी को चुराने से भी बाज़ नहीं आता है. पंचशील के सिद्धांतों को जिस तरह से अनदेखा करते हुए चीन ने भारत की उन सीमाओं पर युद्ध लड़ा जहाँ किसी भी तरह के युद्ध के लिए पहुँचने के लिए भारत के पास उस समय न तो धन था और न ही संसाधन जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों के बड़े भाग पर आज भी कब्ज़ा जमाकर विवाद बताकर चीन इसे मुद्दा बनाने की कोशिशों में लगा रहता है.
                            आज एक बार फिर से वही स्थिति दोहराई जा रही है और चीन भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों तक अपनी पहुँच को मज़बूत करने वाले रास्तों और सुदूरवर्ती गांवों तक संपर्क मार्ग बनाने को लेकर सदैव ही आक्रामक रहा करता है. अब उसने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भी विवाद शुरू किया हुआ है तो इस परिस्थिति से निपटने के लिए सरकार युद्ध के बजाय कूटनीतिक रास्तों से इसे हल करने का प्रयास करने में लगी हुई है. इस तरह की स्थिति में कोई भी सरकार युद्ध के बारे में नहीं सोचना चाहेगी वह भी तब जब चीन जैसा प्रतिद्वंदी सामने हो. अभी तक चीन केवल अरुणाचल, सिक्किम और लद्दाख में ही अपना विरोध दिखाता था पर जिस तरह से अब वह पूरी सीमा को ही चुनौती देने के मूड में दिखायी देने लगा है वह भारत के लिए चिंता का विषय ही है.
                              चीन से लगते अपने सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँच को सुगम करने के लिए भारत की कोशिशें लम्बे अरसे से चल रही है और वर्तमान में मोदी सरकार ने इस पर और भी तेज़ी से काम करना शुरू किया है जिससे चीन को यह अच्छा नहीं लग रहा है. भारत के पास इतने सुदूरवर्ती क्षेत्र में कारगिल जैसी एक और लड़ाई लड़ने का विकल्प सीमित ही है क्योंकि कोरोना के चलते अर्थव्यवस्था को झटका लगा है उसे निपटना वैसे ही मुश्किल हो रहा है फिर भी भारत का अपने निर्माण कार्यों को जारी रखते हुए चीन के साथ कूटनीतिक स्तर पर बातचीत को बढ़ावा देने की दिशा में बढ़ना उचित है. चीन को कहीं न कहीं इस बात का अंदेशा भी है कि आज भारत में चीन विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं जिससे आज के माहौल में निपटना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है. वैश्विक बाध्यताओं के चलते भारत सरकार चीन पर सीधे प्रतिबन्ध तो नहीं लगा सकती है पर अपनी जनता से दूसरे माध्यमों से चीनी सामान के बहिष्कार की बात तो कर ही सकती है जो कि किसी भी स्थिति में चीन के लिए सही नहीं होगा। कोरोना से उत्पन्न श्रमिक संकट से निपटने के लिए भारत देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते श्रमिकों की उपलब्धता को देखते हुए विनिर्माण क्षेत्र के लिए नई नीतियों पर काम कर चीन को सीधे तौर पर चुनौती तो दे ही सकता है.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है.... 

गुरुवार, 28 मई 2020

आपदा संकट में भ्रष्टाचार

                                                                      देश में बाढ़ सूखा जैसी नियमित और भूकंप जैसी आपदाओं के समय सदैव ही प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं जिससे संकट ग्रस्त जनता के मन में देश के सरकारी तंत्र के लिए घृणा का भाव ही उभरता है. ऐसा नहीं है कि पूरे देश में सदैव से ही भ्रष्टाचार का इतना बोलबाला रहा हो पर इसने जिस तरह से देश के राजनितिक तंत्र और नौकरशाही को अपने में जकड़ रखा है उसको देखते हुए किसी भी तरह के अप्रत्याशित सुधार की आशा नहीं की जा सकती है. इस तरह की आपदा में जिस बड़े स्तर पर लोग प्रभावित होते हैं और उसी स्तर पर केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न तरह की योजनाएं लाई जाती हैं इस भ्रष्ट तंत्र के लोग उनका हर परिस्थिति में लाभ उठाने से नहीं चूकते हैं. यह सही है कि आधार के बैंक खातों से जुड़ने के बाद जिस तरह से सहायता को सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने में सफलता मिल रही है वहीं आज भी भ्रष्टाचारियों के पास इसी व्यवस्था से अपने हिस्से को निकालने की नई नई तरकीबें सामने आ रही हैं.
                          देश के अधिकांश राज्यों में जिस तरह से सहायता में गड़बड़ी की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है. दूसरे राज्यों से आये हुए मजदूरों को आश्रय स्थल /क़्वारण्टीन सेंटर्स से घर भेजने के समय एक किट देने की व्यवस्था की गई है परन्तु उसकी लम्बी प्रक्रिया बनाकर उबाऊ कर दिया गया है जिससे अधिकांश लोग जिनमें कोई लक्षण नहीं होते सरकारी कागज़ों पर हस्ताक्षर करके अपने घरों को प्रस्थान कर जाते हैं और उनके लिए नियत किये गए किट आसानी से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं. इस तरफ किसी भी सरकार या अधिकारी का ध्यान नहीं जाता है जिससे अब यह खेल अधिकांश जगहों पर बड़े पैमाने पर खेला जाने लगा है और लाचार मजदूरों को उनके घर पहुँचने पर कुछ आवश्यक सामान के साथ भेजने की सरकारी मंशा की धज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं।
                           गुजरात से बिना मानकों को पूरा किये वेंटिलेटर्स की सप्लाई की बात भी सामने आयी पर उसमें कुछ भी कड़े कदम नहीं उठाये गए हैं इस समय यह समझने की आवश्यकता है कि इस तरह का संस्थागत भ्रष्टाचार अंत में किसी भी सरकार के लिए बड़ी समस्या ही बन सकता है तो उस पर नियंत्रण किया जाना चाहिए और जो भी लोग इसमें किसी भी स्तर पर शामिल मिलें उनके खिलाफ विशेष परिस्थितियों में रासुका लगाने की संस्तुति की जानी चाहिए जिससे आने वाले समय में ऐसी विषम परिस्थिति में लोग भ्रष्टाचार करने से पहले सौ बार सोचने को विवश किये जा सकें। जब देश के सामने इस स्तर संकट हो तो भ्रष्टाचारी को देशद्रोही से कम नहीं माना जा सकता है. हिमाचल प्रदेश में जिस तरह से पीपीई किट घोटाला सामने आया है उससे यही लगता है कि आज भी देश में ऐसे लोग मौजूद हैं जो हर परिस्थिति में भ्रष्टाचारी हो सकते हैं और उन्हें किसी के जीने मरने से कोई अंतर नहीं पड़ता है.  
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सोमवार, 25 मई 2020

कोरोना - केंद्र राज्य समन्वय

                                               मार्च से शुरू हुए लॉक डाउन के साथ ही देश में एक अलग तरह की उठापटक दिखाई दे रही है आज जब पूरे देश को मिलकर इस महामारी के सामने खड़े होने की आवश्यकता है तो देश के राजनैतिक दल और उनके शीर्ष नेता एक दुसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं. ऐसा नहीं है कि केंद्र ने इस बारे में नीतियां नहीं बनायी और राज्यों ने उन पर अमल नहीं किया पर केंद्र और राज्यों में सत्ता तथा विपक्ष से जनता ऐसे कठिन समय में जिस गंभीरता की आशा कर रही थी उसमें देश के सभी राजनैतिक दल और नेता पूरी तरह से फेल दिखायी दे रहे हैं. देश की जनता अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इन नेताओं के साथ अधिकारियों पर खर्च करती है उसके बाद भी कठिन समय में सबसे अधिक जनता को ही सहना पड़ता है.
                               पहले जोन निर्धारण को लेकर अव्यवहारिक तरीके से केंद्र का दखल रहा जिससे कई ऐसे जिले भी केवल एक मरीज होने के बाद भी ऐसे माना गया जैसे पूरे ज़िले में ही कोरोना फ़ैल गया हो इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह हुआ कि हमारे मेडिकल, पुलिस और अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े विभागों पर अनावश्यक रूप से दबाव बना जबकि उनको केवल कुछ स्थानों पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर अपने स्टाफ को लम्बे समय तक काम करने के लिए तैयार करने की आवश्यकता थी. आज इस क्षेत्र के सभी लोग कोरोना की लड़ाई में थके से लगते हैं जबकि देश में संक्रमण बढ़ने के साथ अब अधिक सतर्कता की आवश्यकता है. केंद्र राज्य में वार्तालाप शून्य होने के कारण आज देश के आर्थिक प्रगति में सबसे बड़ा योगदान देने वाला मजदूर सड़कों पर है और अभी भी उनको मिलने वाली सहायता उनकी संख्या के हिसाब से बहुत कम ही है.
                               लॉक डाउन जिस तरह से राज्यों को विश्वास में लिए बिना किया गया आज उसका खामियाज़ा पूरा देश भुगत रहा है. यदि मार्च में संक्रमण के स्तर के कम रहते ही मजदूरों और अन्य कामों से अपने घरों से बाहर निकले लोगों को वापस जाने के लिए कुछ समय दिया जाता तो आज राज्यों क्या जनपदों और तहसीलों तक संक्रमण रोकने की जो लड़ाई लड़ी जा रही है उससे लॉक डाउन में ही निपट लिया गया होता और संक्रमण को अच्छी तरह से रोकने में मजबूती से रोका भी जा सकता था. आज रेलवे की जो हालत है वह भी ख़राब समन्वय का ही नतीजा है और आज से शुरू होने वाली हवाई यात्रा को भी जिस तरह से एक नियम में नहीं बांधा जा सका है उससे इन यात्रियों के लिए समस्याएं और बढ़ने ही वाली हैं. आज के युग में भी समन्वय की इतनी कमी आखिर क्यों है क्या राज्य अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं या केंद्र सरकार खुद ही सब कुछ करने में विश्वास रखती है ? राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों के साथ सीधी बैठक कर क्या पीएम मोदी राज्यों की सत्ता को किनारे करने की कोशिशें नहीं कर रहे हैं ?अब समय है कि केंद्र को अपने स्तर से विश्वास बहाली के लिए काम शुरू करना चाहिए जिससे आपस में लड़ने के स्थान पर कोरोना से प्रभावी लड़ाई लड़ी जा सके.  
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शनिवार, 23 मई 2020

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था

                                                                        कोरोना के कारण पूरे विश्व में जिस तरह का माहौल बना हुआ है उससे निपटने के लिए सभी देश अपनी अपनी रणनीति बनाने में लगे हुए हैं. मार्च महीने में जिस तरह से देश में सम्पूर्ण लॉक डाउन किया गया वह उस समय उपलब्ध विकल्पों में सबसे अच्छा था और भारत सरकार ने भी उस पर अमल करने का प्रयास किया चूंकि उस समय उस बात पर चर्चा करना उचित नहीं था तो अब इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि हमारी नीतियों में आखिर कौन सी कमी रह गयी जिसको हम समय रहते आसानी से ठीक कर सकते थे. पीएम मोदी ने जिस तरह सिर्फ ४ घंटे की नोटिस पर लॉक डाउन की घोषणा की उससे बचा जा सकता था क्योंकि होली के बाद का माहौल था और सरकार घर गए मजदूरों को अपने घरों से अपने काम की जगहों पर जाने से रोकने का आह्वाहन कर सकती थी पर उस समय तक सरकार इसकी गंभीरता को समझ ही नहीं रही थी. साथ ही मजदूरों को अपने घरों तक पहुँचाने के लिए रेल और बसों को बंद नहीं करना चाहिए था जिसके कारण आज भी देश के एक हिस्से में काम करने वाले श्रमिक अपने घरों को लौटने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं.
                              अब सरकार को पिछली गलतियों को सुधारते हुए सिर्फ बड़े उद्योगों के बारे में ही न सोचते हुए ग्रामीण भारत को मज़बूत करना होगा क्योंकि आज भी भारत का बड़ा हिस्सा या तो गांवों में रहता है या शहरों में काम न होने के चलते अब वापस गांवों की तरफ जा चुका है. ग्रामीण भारत में आज भी बहुत सारी समस्याएं हैं और सरकार मनरेगा को विस्तार देते हुए अधिकांश ग्रामीणों को इस तरह से काम दे सकती है. कृषि लागत को कम करने के लिए सरकार एक निश्चित संख्या में छोटे और मंझोले किसानों के लिए मनरेगा के द्वार खोल सकती है जिससे मजदूरों को आगामी फसलों के समय काम मिल सके और किसानों को भी कुछ राहत मिल सके. इसके लिए अभी से एक नियम बनाकर लाभार्थी किसानों का चयन शुरू किया जाना चाहिए या फिर भूलेखों के आधार पर उनको या मनरेगा के मजदूरों को धन स्थानांतरित करने के बारे में सोचना चाहिए। इस तरह से जब ग्रामीण भारत के पास उसके गांवों में ही काम उपलब्ध होगा तो उसकी क्रय शक्ति भी बढ़ाई जा सकेगी जो अंत में देश की आर्थिक प्रगति का चक्का फिर से घुमाने में बहुत सहायक हो सकती है.
                                बरसात शुरू होते ही कई जगहों पर मनरेगा के तहत काम करवाने असुविधा होने लगती है तो इन्हीं मजदूरों के लिए एक नीति बनाकर किसानों और मजदूरों की एक साथ मदद की जा सकती है. किसान के सामने इस समय अपनी लागत को एक सीमा में रखने की चुनौती है तो मजदूरों के सामने काम की. यदि सरकार इस तरह से कोई प्रयास करे तो देश के दो बड़े क्षेत्रों की एक साथ मदद की जा सकती है और गांवों की आर्थिक स्थिति को और बिगड़ने से संभाला भी जा सकता है. फिलहाल बरसात शुरू होने से पहले गांवों में तालाबों और मार्गों को मजबूत किये जाने के काम में तेज़ी भी लाई जा सकती है जिससे सरकार को आमलोगों तक राशन पहुँचाने के लिए अपनी पूरी मशीनरी का उपयोग करने से बचाया जा सके और साथ ही इन मजदूरों के काम करने के दिनों के लिए काम के बदले अनाज योजना को भी शुरू किया जा सकता है जिससे एक साथ कई क्षेत्रों की मदद की जा सकती है. अब समय है कि देश को समग्र रूप से सोचना ही होगा तभी इस वैश्विक संकट के साथ वैश्विक मंदी से निपटा जा सकेगा।    

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शुक्रवार, 22 मई 2020

छिछली राजनीति

                                           कांग्रेस भाजपा के बीच शुरू हुए बस विवाद ने अब अगले चरण पर स्थान पा लिया लगता है क्योंकि देश में जो कुछ भी सामान्य प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं अभी तक उनको गोपनीय ही रखा जाता था पर यूपी रोडवेज की तरफ से राजस्थान को किये गए भुगतान को लेकर जिस तरह भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने एक ट्वीट किया तो उससे यही लगता है कि अब राज्यों के सामान्य प्रशासनिक कार्यों तक पार्टी के प्रवक्ताओं की पहुँच होने लगी है. यह भी हो सकता है कि यह पत्र गोपनीय न भी हो पर सामान्य पत्राचार का उपयोग इस तरह से एक दूसरे पर आरोप लगाने में किया जाने लगे तो देश की राजनीति का स्तर समझा जा सकता है. इस पत्र के सामने आने के बाद राजस्थान सरकार ने भी यूपी सरकार को पूरा बिल भेज दिया है और भुगतान करने की मांग भी की है जिससे मजदूरों की समस्याओं के स्थान पर इन नेताओं की लड़ाई का एक और रूप सामने आने वाला है.
                               किसी भी राज्य में ऐसी आपातकालीन परिस्थिति में स्थानीय प्रशासन से सहयोग के लिए देश का दूसरा राज्य अपने स्तर से पत्राचार करता है और उसमें बहुत सारी बातें भी होती हैं पर इस पत्र को प्रियंका गाँधी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किये जाने से किसको राजनैतिक लाभ होने वाला है ? संबित पात्रा ने कहीं पर उस पत्र का ज़िक्र नहीं किया है जो यूपी सरकार ने राजस्थान सरकार को इस सम्बन्ध में लिखा था उसमें संभवतः यूपी सरकार ने भुगतान किये जाने की बात की होगी जिसको ज्ञानी प्रवक्ता संबित द्वारा जानबूझकर छिपाया गया है ? राज्यों के सामान्य काम काज में किसी भी राजनैतिक दल का इस तरह का दखल सामान्य नहीं कहा जा सकता है और यह विचारणीय भी है. कई बार राज्य अपनी परिस्थितियों पर विचार कर एक बीच का रास्ता निकालने के लिए कई बार पत्राचार भी करते हैं पर क्या उसका राजनैतिक लाभ किसी भी दल द्वारा उठाया जाना चाहिए ?
                                 इस मामले में सभवतः जो धनराशि डीज़ल पर खर्च हुई होगी उसके बिल का भुगतान किया गया होगा जबकि राजस्थान सरकार का यह कहना है कि बसें कम पड़ने पर राजस्थान रोडवेज ने छात्रों को उनके गंतव्य तक पहुँचाया जिसका भुगतान अभी तक नहीं किया गया है ? जब ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाले केंद्र की सरकार मज़दूरों को उनके घरों तक रेल द्वारा निशुल्क नहीं भेज सकती तो हिली हुई आर्थिक परिस्थिति में राज्य सरकारों से किसी भी तरह की आर्थिक उदारता की उम्मीद आखिर कैसे की जा सकती है ? लंबी चौड़ी बातें करने वाले दल और नेता अपने यहाँ की परिस्थिति पर विचार नहीं करते हैं और किसी भी बात पर राजनीति शुरू कर देते हैं जिससे केवल जनता की परेशानियां ही बढ़ती हैं. अच्छा हो कि सभी राजनैतिक दल और उनकी सरकारें इस तरह के मामलों पर राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों से दूर ही रहें और जनता को सही तरह से सहायता करने हेतु नीतियों का क्रियान्वयन करने पर ध्यान दें.
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गुरुवार, 30 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-5

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-4 से आगे........
                                               देश की सबसे पुरानी पार्टी जिसने देश की आज़ादी के लिए लम्बा संघर्ष किया और जिसने आज़ादी के बाद सबसे अधिक समय तक देश की सत्ता संभाली आज उसकी यह स्थिति आ गयी है कि दो लोकसभाओं में उसके पास नेता विरोधी दल का आधिकारिक पद भी नहीं बच रहा है तो उसको अपने पूरे संगठन से लगाकर शीर्ष स्तर पर नीतियां बनाने वाली हर समिति और उसमें शामिल रहने वाले नेताओं पर ध्यान देना ही होगा। यह सही है कि आम कांग्रेस कार्यकर्त्ता नेहरू-गाँधी परिवार को पार्टी में सबसे बड़ा मानता है पर क्या पार्टी में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय नेता इस बात पर कभी ध्यान देते हैं कि आखिर उनकी जनता पर कितनी पकड़ है? क्या पार्टी में बड़े पदों को संभाल रहे यह लोग जो लम्बे समय तक केंद्र और राज्यों में मंत्री भी रह चुके हैं आज भी अपने को पार्टी के हित में ज़मीन पर उतारने का साहस रखते हैं जिससे उन्हें बदलते भारत और जनता की समस्याओं का सही तरह से आंकलन करने में सहायता मिल सके? क्या सत्ता के आदी हो चुकें नेताओं के लिए पार्टी कोई बड़ी चुनौती देकर उन्हें क्षेत्र में भेजना भी चाहती है या ये सिर्फ दिल्ली में  पार्टी मुख्यालय में सजावटी चेहरे बनकर पार्टी के लिए संघर्ष करने से दूर भागने वालों की एक जमात खडी करना चाहती है ?
                                      इस बार पार्टी की हार को लेकर राहुल गांधी की तरफ से जो कड़ा कदम उठाया जा रहा है उससे कांग्रेस खुद ही सकते में है क्योंकि पार्टी के राहुल से इस्तीफ़ा मांगने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी और इस अप्रत्याशित कदम से पार्टी की समझ में नहीं आ रहा है कि वह क्या करे ? राहुल की दूसरी शर्त जो मात्र सूत्रों के माध्यम सामने सामने आ रही है कि उनके परिवार से इतर अध्यक्ष खोजने का काम पार्टी को करना है उससे भी पार्टी को इस अँधेरी सुरंग से बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है. संभवतः राहुल पद से दूर रहकर राजनीति में सक्रिय रहने को प्रयासरत हों या हो सकता है कि आने वाले समय में पार्टी की कमान दूसरों के हाथों सौंप वे खुद केवल अपने क्षेत्र की राजनीति पर ही ध्यान देना शुरू करें। अमेठी में उनकी हार से उनका संगठन पर गुस्सा जायज़ भी है क्योंकि पूरे देश में प्रचार करने के लिए व्यस्त होने के चलते उनके पास अपने क्षेत्र के लिए समय कम था पर पार्टी के संगठन द्वारा भी उनको जिस तरह से अँधेरे में रखा गया वह भी अपने आप में बड़ी बात है और पूरे देश में संगठन का यही हाल हुआ पड़ा है यहाँ तक कि जिन तीन राज्यों में नवम्बर १८ के बाद सत्ता मिली है वहां भी संगठन का काम सुस्त या रुका पड़ा है.
                                       कांग्रेस को अपने को फिर से खड़ा करने की कोशिशों कोशिशों में  सबसे पहले उन राज्यों पर नज़र डालनी होगी जहाँ शीर्ष नेतृत्व को गलत सलाह देने के कारण राज्य के मज़बूत नेतृत्व वाले नेताओं ने अपने क्षेत्रीय संगठन बना लिए और आज वे वहां पर कांग्रेस के मुक़ाबले अधिक स्वीकार्य हैं. वाईएसआर कांग्रेस, एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस के साथ पार्टी को सम्मानजनक तरह से उनकी राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए बात करनी चाहिए और उनके साथ किसी ऐसे समझौते पर पहुंचना चाहिए जिससे आने वाले समय में कांग्रेस की विचारधारा के पैरोकार ये दल भी कांग्रेस के सहयोगी बने न कि उसके प्रतिद्वंदी। यह भी निश्चित है कि आने वाले समय में कांग्रेस की विचारधारा से निकले ये दल यदि साथ आते हैं तो पार्टी के लिए मज़बूती का काम किया जा सकेगा।  कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व को अपने उन सलाहकारों से भी पीछा छुड़ाना होगा जिनके चलते ज़मीनी आधार वाले ये नेता अपनी उपेक्षा के चलते पार्टी से अलग हो गए . राहुल अध्यक्ष पद छोड़ते हैं या फिलहाल कार्यकारी अध्यक्ष बने रहते हैं यह सब तो भविष्य के गर्भ में है पर आज भी यदि राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले अपनी स्वीकार्यता साबित की है वह भी राहुल गाँधी ही हैं. यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला है कि वह किसे किस पद पर देखना चाहती है परन्तु यदि राहुल या आने वाले किसी अन्य अध्यक्ष को पार्टी में परिवर्तन करने से रोका जाता है तो अगली बार केरल में भी पार्टी अपनी स्थिति को खोने ही वाली है क्योंकि मोदी-शाह और संघ की प्राथमिकता पर पहले से ही केरल चल रहा है.                    
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बुधवार, 29 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-4

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-3 से आगे........

                                                                     आज जिस तरह से युवा पीढ़ी की ज़िंदगी में सोशल मीडिया का दखल हो गया है उसको देखते हुए अब कांग्रेस को अपने ज़मीनी संगठन को मज़बूत करने के प्रयासों के साथ ही अगले एक साल में हल ज़िले में सोशल मीडिया टीम का गठन करना चाहिए और उसके अगले साल में यह ब्लॉक और तहसील स्तर तक के कार्यकर्ताओं के लिए अपने बात कहने का मंच बनना चाहिए जिससे राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय मुद्दों के साथ पार्टी अपने कार्यकर्ताओं से सीधे संपर्क बनाये रख सके. आवश्यकता पड़ने पर सोशल मीडिया के माध्यम से उपयोगी जानकारी भी निचले स्तर तक पहुंचाई जा सकती है. इस बार के चुनाव में कांग्रेस के तीन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी के बाद ही मोदी सरकार ने किसान सम्मान निधि आम चुनाव से पहले देने का निर्णय किया जिसका लाभ भी उसे मिला पर कांग्रेस अपनी इस उपलब्धि को घोषणापत्र से आगे बढ़ाकर जनता तक नहीं पहुंचा पायी जिसे उसे नुकसान हुआ यदि पार्टी के पास सोशल मीडिया की संगठित टीम हो तो इस तरह की जानकारी को कार्यकर्ताओं के माध्यम से आम जनता तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है.
                                    सभी जानते हैं कि भाजपा की सोशल मीडिया टीम निरंतर कांग्रेस से जुड़े आज़ादी के प्रतीकों पर सुनियोजित हमले किया करती है ऐसी परिस्थिति में जब तक कांग्रेस के पास भी उन बातों के बारे में फैलाये जा रहे भ्रम को दूर करने का काम नहीं किया जायेगा तब तक भाजपा जनता में कांग्रेस की और भी नकारात्मक छवि गढ़ने में सफल होती रहेगी। प्रतिकार करने के लिए जब सभी तैयारियां पूरी हो जाएँ तो भी सोशल मीडिया टीम को भाजपा की तरह अनाप-शनाप बातें करने के स्थान पर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बात करनी होगी और भाषाई मर्यादा का सदैव ध्यान रखना होगा क्योंकि आज भाजपा के पास बहुत बड़ी टीम है जो तथ्यों की बात करने वालों पर अपने कुतर्कों से हमले करने के लिए सदैव तैयार रहती है इसलिए इस केंद्रीय टीम में कांग्रेस के इतिहास को जानने वाले लोग रखे जाएँ या जिन लोगों को यहाँ बैठाया जाये उनको पार्टी की तरफ से पार्टी और देश के इतिहास के साथ तथ्यात्मक जानकारी दी जाये जिससे वे परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठा सकें।
                                     आज संभवतः कुछ प्रदेशों में ही सोशल मीडिया टीम कुछ हद तक काम कर पा रही है क्योंकि यहाँ भी तथ्यों के बिना बात करने वाले लोग अपने आकाओं के आशीर्वाद से जमे बैठे हैं जिनसे पार्टी को किसी भी स्तर पर कोई लाभ नहीं मिलता है और सोशल मीडिया टीम केवल दिखावा बनकर ही रह जाती है. कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ी समस्या भाजपा से मुक़ाबला करना नहीं है बल्कि अपनी कमज़ोरियों से पार पाने की है क्योंकि आज पार्टी में जो शीर्ष नीति नियंता बने बैठे हैं उनका चुनावी राजनीति से कोई सीधा सरोकार नहीं है जिसके चलते उनको चुनाव लड़ने वाले नेताओं की उन समस्याओं का कोई अंदाज़ा भी नहीं है जिसका सामना उन्हें रोज़ ही करना पड़ता है. सबसे पहले कांग्रेस को उन राज्यों में अपने सगठन और सोशल मीडिया टीम को सुधारना चाहिए जहाँ अगले एक वर्ष में चुनाव होने वाले हैं. जनता केंद्रीय स्तर पर तो मोदी के साथ दिखाई देती है पर यदि सही राजनीति के साथ आगे बढ़ा जाए तो विधानसभाओं में वह कांग्रेस या अन्य दलों को भी समर्थन देती दिखाई देती है. कांग्रेस को तुरंत काम शुरू करते हुए इन राज्यों पर अधिक ध्यान देना ही होगा तभी वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का २०२४ में धरातल पर मुक़ाबला कर पाने की स्थिति में होगी.      
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मंगलवार, 28 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-3

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-2 से आगे
                                             शीर्ष स्तर पर कांग्रेस कार्यसमिति में जिस तरह से राहुल गांधी ने पार्टी की शर्मनाक पराजय के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानते हुए इस्तीफ़ा दिया और उसे नामंज़ूर कर दिया गया उसके बारे में भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. देश के महत्वपूर्ण राज्यों में दशकों से सत्ता से बाहर होने के बाद भी आज जिस तरह से सीमित संख्या में बचे हुए कांग्रेसियों में केवल पद पर बने रहने की लालसा है यदि इस पर पूरी तरह से विराम नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में पार्टी की और भी दुर्दशा होने वाली है. आज देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है तो उसकी तरफ से उन राज्यों में आमूल-चूल परिवर्तन करते हुए अब पुराने जमे हुए घाघ नेताओं को पदों से हटाकर नए नेतृत्व को समाने लाने की कोशिश की जानी चाहिए। वर्षों से पदों पर बैठे इन चंद बड़े नामों के कारण ही पार्टी आगे नहीं बढ़ पा रही है जिससे ज़मीनी स्तर पर उसका जुड़ाव आम लोगों से भी नहीं हो पा रहा है. आज भाजपा जहाँ मज़बूत है वह वहां भी अपने संगठन पर संघ के सहयोग से बराबर स्थितियों को और भी मज़बूत बनाने का काम करने में निरंतर लगी रहती है जबकि पिछले वर्ष तीन राज्यों में चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेस की राज्य इकाइयों की तरफ से ऐसे कदम नहीं उठाये जा रहे हैं जिससे उन राज्यों में ही कांग्रेस और मज़बूती के साथ नए लोगों तक अपनी पहुच बना सके.
                                               आज जब भाजपा मोदी और शाह की जोड़ी के निर्देशन और नेतृत्व में निरंतर सफलता के नए आयाम छूती जा रही है तो उस परिस्थिति में नए लोगों को कांग्रेस से जोड़ना और भी बड़ी चुनौती होने वाला है. यदि कांग्रेस को सम्पूर्ण देश की राजनीति में एक बार फिर से प्रासंगिक होना है तो उसे अपने सेवा दल, महिला कांग्रेस, युवा कांग्रेस, छात्र कांग्रेस को पूरी तरह से सक्रिय करना ही होगा जिससे समाज के हर वर्ग के लोगों की समस्याओं के साथ संघर्ष करने की उसकी पुरानी भावना को ज़िंदा किया जा सके. राजनैतिक रूप से निर्णय लेने और उनके परिणामों के अनुरूप नेताओं की ज़िम्मेदारी तय करने के लिए अब कांग्रेस को खुद को तैयार करना ही होगा वर्ना आने वाले चुनावों में उसकी पराजय एक स्थायी भाव भी बन सकती है जिससे आज जो भी समर्पित कार्यकर्त्ता पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं वे भी पार्टी से किनारा करते नज़र आने लगेंगे। पार्टी को अंदरूनी समस्याओं से निपटने के लिए एक व्यवस्था बनानी होगी क्योंकि जो धरातल पर मज़बूत नेता हैं उसकी बातों को सुना जाना बहुत आवश्यक है. २०१३ के बाद से ऐसे बहुत से नेता सामने आये जिन्होंने नेतृत्व की तरफ से उपेक्षा के चलते पार्टी से किनारा कर लिया और आज वे भाजपा में जाकर महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं. पार्टी को इस संकट को भी देखना होगा वर्ना गलत सलाहों पर लिए गए फैसलों से पार्टी का निरंतर नुकसान होता रहेगा।
                                             पार्टी में राहुल गांधी की लाख कोशिशों के बाद भी वह परिवर्तन नहीं आ पाया है जिसमें एक सामान्य कार्यकर्ता अपनी बात को पार्टी के मंच पर रखने के लिए कोई उपयुक्त मंच पा सकता हो जब तक ज़मीन से जुड़े नेताओं की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में पार्टी के बूथ मज़बूत नहीं हो सकते हैं. अगले कुछ वर्षों तक परिणामों की चिंता न करते हुए पार्टी को महत्वपूर्ण राज्यों में बदलाव को शुरू करना ही होगा यूपी जैसे राज्य में जहाँ से केंद्र की सत्ता के समीकरण बनते बिगड़ते हैं वहां राज्य का नेतृत्व किस तरह से काम करता है यह किसी से भी छिपा नहीं है. यदि  इसी तरह के सुविधाभोगी नेताओं के हाथों में पार्टी की कमान रहती है तो यूपी में पार्टी का अभी तक बचा हुआ ६% वोट भी छिटकने में देर नहीं लगने वाली है. जब देश की लगभग १५० सीटों यूपी-बिहार-बंगाल में पार्टी के पास कुछ बचा ही नहीं है तो उससे केंद्र में सत्ता पाने की आशा भी मृग मरीचिका से अधिक कुछ नहीं कही जा सकती है. राजनैतिक परिणामों में आज कांग्रेस निम्नतम स्तर पर पहुंची हुई है और यदि इस स्थिति में जल्दी ही बड़े बदलाव न किये गए तो आने वाले समय में पार्टी के कमज़ोर संगठन को पूरी तरह ध्वस्त होने में समय नहीं लगने वाला है.
क्रमशः .........                    
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रविवार, 26 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-2

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1 से आगे ........        
                                      सबसे पहले कांग्रेस को अपने संगठन के बारे में सोचना होगा क्योंकि आज अधिकांश जगहों पर संगठन की जो स्थिति बनी हुई है उसके दम पर भाजपा के मज़बूत संगठन और संघ के जमीनी समर्थन का सामना नहीं किया जा सकता है. विचार करने योग्य यह भी है कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के चुनावी क्षेत्रों में संगठन की हालत इतनी कमज़ोर क्यों है जबकि उनके नाम पर पार्टी पूरे देश में जनादेश मांगती है?  कांग्रेस और देश में राजनीति का एक दौर वह भी था जब नीचे से आगे बढ़ने वाले कार्यकर्ताओं के लिए चुनावी राजनीति में हिस्सा लेने के लिए एक प्रक्रिया हुआ करती थी पर पिछले कुछ दशकों से इन बातों पर ध्यान देना बिलकुल ही बंद कर दिया गया है जिससे पार्टी का निचले स्तर का संगठन भी विपक्षियों के कमज़ोर होने और अपने नेता के प्रभाव के दम पर ही चुनाव लड़ने की प्राथमिकता में लगा था जिससे उसका जनता के सरोकारों से कोई मतलब ही नहीं रह गया और युवा पीढ़ी ने अपने को इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में भाजपा के निकट पाया कर उसके लिए वोट भी किया। 
                                           इस मामले में यदि अमेठी को एक उदाहरण के तौर पर देखें तो वहां के संगठन को सदैव यही लगता रहता था कि यह पार्टी और गाँधी परिवार की सीट है इसलिए यहाँ उसे कोई खतरा नहीं है जिससे संगठन ने आम जनता से संवाद बनाये रखने को इतनी प्राथमिकता नहीं दी जितनी उसे मिलनी चाहिए थी. इसका परिणाम आज सबके सामने है क्योंकि कांग्रेस का संगठन वहां केवल राहुल के भरोसे ही रहा जबकि पिछली बार  १ लाख वोटों से हारने के बाद भी भाजपा ने स्मृति ईरानी के लिए खुलकर पूरे क्षेत्र में काम किया और इस बात का प्रचार भी किया कि गाँधी परिवार ने वहां के नागरिकों के लिए कुछ भी नहीं किया। आज की युवा पीढ़ी के लिए विकास की वही छवि बन रही है जो भाजपा बनाना चाह रही है क्योंकि कांग्रेस कहीं से भी इस बात का प्रतिकार करती हुई नहीं दिखाई दी कि राज्य में उसकी सरकार न होने के कारण केंद्र में सरकार होने पर भी वह क्षेत्र के लिए उतना काम नहीं कर पायी जितना राज्य में सरकार होने से संभव था. अमेठी में कांग्रेस की इस कमज़ोरी का भाजपा ने पूरा लाभ लिया और युवाओं की सोशल मीडिया में पैठ को देखते हुए राहुल गाँधी की नकारात्मक छवि बनाने में कोई कस्र भी नहीं छोड़ी। इस मामले कांग्रेस की हिचकिचाहट ने उसके लिए और भी अधिक समस्या खडी कर दी क्योंकि उसने पूर्व सांसद राम्या को सोशल मीडिया में सीमित काम करने को कहा जबकि उनके आने के बाद कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम कई जगहों पर भाजपा की टीम पर बढ़त बनाने में सफल होती दिखाई दे रही थी.
                                       आज यह सवाल भी प्रासंगिक है कि अमेठी ने इतने वर्षों तक कांग्रेस को जितना सम्मान दिया क्या संगठन के रूप में पार्टी ने वहां के लोगों से पूरा संपर्क बनाये रखा?  निश्चित तौर पर राहुल गांधी के पास मूर्छा में पड़ी हुई कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम था और है पर क्या अमेठी की कांग्रेस कमेटी उनसे यह आशा करती है कि वे स्वयं पूरे देश के मुक़ाबले अमेठी में अधिक समय देने का काम करें?  अगर कांग्रेस के पास बूथ लेवल के माध्यम से संगठन को खड़ा करने का कोई प्लान है तो उसकी परीक्षा अमेठी में ही करनी होगी।  कांग्रेस के बड़े नेताओं को इस बार भाजपा ने जिस तरह से घेरने में सफलता पायी थी अगली बार वह इस कड़ी में और भी अधिक मुखर होने वाली है क्योंकि रायबरेली से २०२४ में सोनिया गाँधी चुनाव लड़ेंगीं या  नहीं अभी तय नहीं है पर पिछले चुनावों से इस बार के चुनावों तक उनकी जीत का अंतर तीन लाख से घटकर एक लाख साठ हज़ार पर आ गया है और मेरा यह मानना है कि भाजपा का पूरा ध्यान अब रायबरेली पर ही होने वाला है और यदि कांग्रेस संगठन ने अमेठी की तरह लापरवाही की तो निश्चित तौर पर अगली बार रायबरेली में भी अमेठी की कहानी दोहराई जाने वाली है. क्रमशः ......          
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शनिवार, 25 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1

                                          देश में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों में जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के संयुक्त नेतृत्व में भाजपा ने अपनी सफलता के नए आयाम स्थापित किये हैं उनको देखते हुए आने वाले समय में भाजपा की रणनीति का ही पता चलता है जिसमें उसने आखिल भारतीय स्तर पर उसका मुक़ाबला करने की स्थिति में आ सकने वाली पार्टी कांग्रेस को परिणामों के अनुसार बहुत कमज़ोर स्थिति में पहुंचा दिया है. इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कांग्रेस को गंभीर आत्ममंथन करने और कमियों को वास्तव में खोजने पर ध्यान देना ही होगा वर्ना पहले से कमज़ोर हुई कांग्रेस के लिए भाजपा के नेता-द्वय और भी बड़े संकट उत्पन्न करने से नहीं चूकने वाले हैं. यह बात सभी जानते हैं कि आखिर भारतीय स्तर पर केवल कांग्रेस के पास ही किसी न किसी स्तर पर संगठन और कार्यकर्त्ता मौजूद हैं जो एक सुसंगठित भाजपा के सामने कहीं ठहरते तो नहीं हैं फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वे एक विकल्प भी साबित हो सकते हैं. परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से कांग्रेस ने अपने संघर्ष करने की इच्छा को ही समाप्त कर रखा है उसमें उसकी और भी दुर्दशा होने से वह नहीं बच सकती है. 
                                मोदी-शाह की जोड़ी इस बात को अच्छी तरह समझती है कि आने वाले समय में यदि भाजपा के लिए कोई चुनौती बन सकता है तो उसमें केवल कांग्रेस का ही नाम है इसलिए वे प्रतीकात्मक तौर पर सधी हुई रणनीति के चलते कांग्रेस का मनोबल तोड़ने का काम करने में लगे हुए हैं जिसका लाभ उन्हें मिलने भी लगा है. इस चुनाव में गंभीरता से देखा जाये तो भाजपा ने अपना पूरा ध्यान कांग्रेस के उन बड़े नेताओं की सीटों पर लगाया जो भविष्य में उनके लिए चुनौती बन सकते हैं इस कड़ी में राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, दीपेंदर हुडा, सुष्मिता देव जैसे उन नामों पर अधिक ध्यान दिया जिनको हराने से कांग्रेस के मनोबल को तोडा जा सकता था और जो युवा होने के साथ संसद और सड़क पर अपनी बातों का प्रभाव दूसरों पर डालने में सक्षम भी दिखाई देते हैं. इस चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी ने कांग्रेस की इस मज़बूती पर सुनियोजित तरीके से प्रहार किया जिसका परिणाम सामने दिखाई दे रहा है. जातीय समीकरणों को साधते हुए जिस तरह से इन स्थानों पर ज़मीनी कार्यकर्ताओं को मज़बूती दी गयी उसके जवाब में उन्होंने अपने वोटों को परिणाम में बदलने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी।
           यदि कांग्रेस को आने वाले समय में अपनी बची हुई राजनैतिक ज़मीन को बचाये रखना है तो उसे पूरे देश में आगामी विधानसभाओं के कार्यकालों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न राज्यों में अपने संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही होगा क्योंकि जनता के मुद्दों पर बिना संघर्ष किये राजनीति करने वाले नेताओं के दिन अब समाप्त होने को हैं. इस संकट से बचने के लिए कांग्रेस को एक बार फिर से सदैव हमलावर रहने के स्थान पर मुद्दों पर आधारित राजनीति के अनुसार काम करने की नीति अपनाने होगी। कांग्रेस नेतृत्व को विभिन्न राज्यों में अपने दिखावे के लिए बनाये गए पार्टी अध्यक्षों से अगले एक महीने में ही पीछा छुड़ाना होगा जिससे नए नेतृत्व के लिए रास्ते खोले जा सकें।  जनता के मुद्दों से जुड़ने और विभिन्न स्थानों पर सड़कों पर संघर्ष करने के बाद ही अब कांग्रेस की स्वीकार्यता जनता में बन सकती है. पार्टी को सबसे पहले यूपी बिहार और बंगाल पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि इन तीन महतवपूर्ण राज्यों में उसके पास कोई संगठन और मज़बूत नेता नहीं बचा है जो हर बात में बिना केंद्रीय नेतृत्व की तरफ देखे अपने स्तर से विभिन्न मुद्दों पर संघर्ष कर सके. लगभग १/३ लोकसभा सीटों पर अप्रासंगिक होकर कांग्रेस कभी भी भाजपा का सामना नहीं कर पायेगी क्योंकि इन राज्यों से ही भाजपा अपने को सत्ता के निकट पहुँचाने का काम करती हुई दिखाई देती है. क्रमशः ......                      
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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

टी-१८ परिचालन की राजनीति

                                                  देश में निर्मित सबसे तेज़ चलने वाली ट्रेन रैक टी-१८ के सफल परीक्षण के बाद इसके मार्ग और परिचालन के बारे में रेलवे द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है. आमतौर पर इस तरह की नई सेवा शुरू होने पर रेल मंत्री या पीएम के क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाती है जबकि इतनी महत्वपूर्ण शुरुवात के लिए इसके परिचालन की लागत के निकलने और विशेष सेवा होने के कारण इसके मंहगे होने के कारण इसे उस मार्ग पर चलाने का प्रयास किया जाना चाहिए जहाँ इसकी सेवा का मूल्य चुका यात्री इसका सही तरह से लाभ लेने की स्थिति में हों. निश्चित तौर पर पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के चलते वाराणसी को विशेष अधिकार प्राप्त है पर क्या महामना एक्सप्रेस की हालत देखकर रेलवे को इस अपनी नई सेवा की शुरुवात पीएम के क्षेत्र से करनी चाहिए ? राजनैतिक लाभ के लिए देश में आज़ादी के बाद से ही इस तरह की गतिविधियों को किया जाता रहा है और मोदी सरकार में भी यही सब जारी भी है। 
                                          अच्छा होता कि इस सेवा को दिल्ली /झाँसी या भोपाल के बीच चलाया जाता जिससे परिचालन की दृष्टि से उपलब्ध सुगम मार्ग पर इसे चलाया जा सकता और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण मथुरा आगरा झाँसी और भोपाल आने जाने वाले यात्रियों को इस तीव्र सेवा का सही लाभ मिल पाता। यह भी सही है कि देश विदेशी पर्यटकों के लिए दिल्ली आगरा के बीच चल रही गतिमान एक्सप्रेस के स्थान पर यदि इस टी-१८ को चलाया जाये तो इन स्थानों पर आने जाने वालों की यात्रा को और भी सुखद बनाया जा सकता है साथ ही दिल्ली आगरा मार्ग पर चल रही गतिमान एक्सप्रेस को वाराणसी की तरफ शिफ्ट किया जा सकता है जिससे वाराणसी के लोगों को भी नयी ट्रेन मिल जाएगी साथ ही पर्यटन स्थलों के यात्रियों को भी अपनी यात्रा का और भी लाभ मिल सकेगा। दिल्ली वाराणसी जैसे व्यस्ततम मार्ग पर टी-१८ को चलाने के लिए रेलवे को बहुत कुछ करना पड़ेगा तभी तभी यह अपनी रफ़्तार के साथ न्याय  कर पाए वर्ना यूपी में फंसती हुई ट्रेनों के बीच एक और नई गाड़ी भी विभिन्न स्टेशनों पर खडी दिखाई देने वाली है.     
                                रेल मंत्री को पहले से ही अपनी महत्वपूर्ण गाड़ियों के संचालन में आ रही बाधाओं को देखते हुए टी-१८ को वाराणसी दिल्ली के बीच चलाने से पहले आर्थिक पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे यह कम से कम अपनी परिचालन लागत को निकाल कर रेलवे को आर्थिक सहयोग भी करने की स्थिति में रहे. वैसे भी रेलवे की गलत नीतियों के चलते आज प्रीमियम किराये के कारण अधिकांश गाड़ियों में वे सीटें खाली ही रह जाती हैं जिनके लिए कभी कभी बहुत मारामारी रहा करती थी. रेलवे को पीएम के ससदीय क्षेत्र का ख्याल रखने का पूरा अधिकार है पर साथ ही क्या आज रेलवे इस स्थिति में है कि वह अपनी उन नई महत्वपूर्ण गाड़ियों को आर्थिक पहलू के स्थान पर राजनैतिक लाभ के रूप में चलाने के बारे में सोच सके ? निश्चित तौर पर यह निर्णय रेलवे बोर्ड का ही होगा पर क्या बोर्ड सरकार और मंत्री की मंशा के खिलाफ जाकर इस तरह के किसी कदम का विरोध करने की स्थिति में होता भी है ?     

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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

राज्यों की स्थानीय नौकरियां

                                                               एमपी के सीएम कमलनाथ ने जिस तरह से राज्य में लगाए जाने वाले नए उद्योगों के लिए विभिन्न स्तरों पर छूट पाने के लिए राज्य के स्थानीय नागरिकों की शर्त लगायी है वह अपने आप में सम्पूर्ण देश के कानून और परिस्थितियों को देखते हुए सही नहीं कही जा सकती है पर विभिन्न राज्यों में इस तरह की नीति पहले सही चल रही है और आने वाले समय में इसके राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों के चलते अन्य राज्यों द्वारा भी इस तरह का मॉडल अपनाये जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस मामले में पहल करने और दूसरे राज्यों के लोगों को अक्सर निशाने पर लेने वाले महाराष्ट्र में  १९६८ से ही इस तरह की नीति लागू है जिसमें स्थानीय लोगों के लिए ८०% नौकरियों को आरक्षित किया गया था और आज भी स्थानीय दबाव के चलते प्रवासी कामगारों को नियमानुसार होने के बाद भी नौकरियों से बिना कारण बताये निकाला भी जाता है. इस मामले में तेलंगाना के कानून सबसे कड़े हैं क्योंकि वहां दूसरे राज्य के ही नहीं बल्कि राज्य के अंदर के लोग भी दूसरे क्षेत्र में नौकरी नहीं पा सकते हैं. हिमाचल, कर्णाटक ओडिशा में भी कम वेतन वाली नौकरियों को इसी तरह से स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित किया गया है।
                          ऐसी स्थिति का स्थानीय लोगों के लिए कुछ लाभ भी होता है पर उद्योगों के लिए दूसरे तरह की समस्याएं सामने आ जाती हैं जिसके चलते उनको प्रतिस्पर्धा पर सस्ता श्रम नहीं मिल पाता है और स्थानीय लोगों की अधिकता के कारण अनावश्यक श्रमिक राजनीति होने से उत्पादन आदि पर भी दुष्प्रभाव पड़ने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं. इस मामले को दूसरी तरह से देखने की आवश्यकता है जिससे उद्योगों के उत्पादन और उनके स्थापित होने की संख्या पर असर न पड़े साथ ही स्थानीय नागरिकों को भी अपने आस पास श्रम उपलब्ध हो जाये. आज वैसे भी नोटबंदी के बाद जिस तरह से निचले स्तर पर काम करने वाले श्रमिकों का अपने राज्यों में उल्टा पलायन हुआ है उससे भी समस्याएं नए स्तर पर सामने आ रही हैं. ऐसी परिस्थिति में केंद्र मनरेगा के धन आवंटन को बढ़ाकर स्थानीय स्तर पर श्रम दिवस बढ़ाये जाने का प्रयास कर सकती है जिसमें उसे राज्यों के भरपूर सहयोग की आवश्यकता पड़ने वाली है.
                         कौशल विकास योजना अपने आप में जितनी अनूठी थी उसे उतनी ही मक्कारी से भ्रष्ट तंत्र में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है क्योंकि जिस तरह से बिना सुविधाओं के लोगों ने ऐसे केंद्र खोले और सरकार से प्राप्त अनुदान में बंदरबांट की वह किसी से भी छिपी नहीं है जिससे सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना जो हर स्तर पर नागरिकों के जीवन यापन में सहयोग कर सकती थी केवल भ्रष्टाचार का स्तम्भ बनकर ही रह गयी है. यदि इसको योजना को छोटे स्तर पर चलाकर उसकी प्रगति देखी जाती साथ ही बहुत बड़ी संख्या में केंद्र खोलने के स्थान पर उनमें दी जाने वाली ट्रेनिंग की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता तो आने वाले समय में उद्योगों के लिए आवश्यकतानुसार स्थानीय श्रम भी उपलब्ध हो जाता। अब भी समय है कि स्थानीय स्तर पर पनप सकने वाले उद्योगों की पहचान कर उनके अनुरूप कार्य शुरू किया  भविष्य के लिए ऐसी समस्या से निपटा जा सके. यदि स्थानीय नागरिकों को अपने आस पास ही अच्छी सुविधा से युक्त रोज़गार मिल जायेगा तो कोई भी अपने पैतृक शहर को छोड़कर कहीं और जाने की बातें भी नहीं सोचेगा।
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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

कमलनाथ की पारी

                                                   एमपी में सत्ता सँभालने के साथ ही अपने पहले आदेश में सीएम कमलनाथ ने २ लाख रुपयों तक के कृषि ऋण के बारे में जो फैसला लिया है वह कांग्रेस के वचन पत्र के अनुरूप ही है पर इसके सही ढंग से क्रियान्वयन के लिए अब पूरा दबाव सीएम कमलनाथ पर ही आने वाला है क्योंकि कई राज्यों ने इस तरह की क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा की पर बाद में आंकड़ों की बाज़ीगरी से अधिकारियों ने किसानों का बहुत कम ऋण ही माफ़ होने दिया. कमलनाथ को जनता की समस्याओं के बारे में अच्छे से पता है और वे सरकारी मशीनरी से अच्छे से काम लेना भी जानते हैं तो उनके लिए इस दिशा में आगे बढ़ने में कठिनाइयां कम होने की संभावनाएं भी हैं. फिर भी इस काम के लिए यदि एक राज्यमंत्री की अलग से नियुक्ति कर दी जाये तो संभवतः इस निर्णय को सही तरीके से लागू किया जा सकेगा।  ऋण माफ़ी का कार्य पूरा होने के बाद उस राज्यमंत्री को अलग से किसी विभाग में स्थानांतरित किया जा सकता है। इस कार्य में सही और लाभार्थियों की सूची बनाये जाने का काम सबसे कठिन होता है इसलिए इसे दो स्तरों में किया जाना चाहिए पहले स्तर में बैंकों से सीधे किसानों के ऋण की स्थिति जानी जा सकती है वहीं दूसरे स्तर पर कांग्रेस के कार्यकर्तों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है जो किसी भी किसान को इस लाभ से वंचित होने की स्थिति पर कड़ी नज़र रखने का काम कर सके.
              इसके अतिरिक्त यदि सरकार बेरोज़गारी भत्ते के मामले में आगे बढ़ती है तो वह इन युवाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वे भी करवा सकती है जिससे सरकार को दोहरा लाभ भी हो सकता है। बेरोज़गारों को रोज़गार देने के साथ सरकार इन युवाओं से महीने में कुछ दिन काम भी ले सकती है जिससे युवाओं में काम करने की भावना के साथ सरकार को काम करने वाले युवा हाथों का सम्बल भी मिल जायेगा। जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने जनता से जुड़े मुद्दों को लोकसभा चुनावों को देखते हुए  प्राथमिकता में लिया है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि खुद सीम और कांग्रेस पार्टी इसे पीएम मोदी के बड़े खोखले बयानों के सामने काम करने की संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करने को तैयार दिखाई देते हैं।  बेशक यह राजनैतिक लाभ के लिए लिया गया निर्णय है पर इसके दूरगामी परिणाम पूरे देश पर आने वाले समय में पड़ने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।
                      स्थानीय युवकों के लिए ७०% रोज़गार देने वाले उद्योगों को सरकारी छूट देने का निर्णय सही कहा जा सकता है पर जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने इसके लिए यूपी-बिहार के लोगों द्वारा नौकरियाँ हथियाये जाने की बात की उससे कोई भी सहमत नहीं हो सकता है क्योंकि यह क्षेत्रीय पार्टियों की स्थानीय सोच जैसी बात है और यह भी सोचा जाना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि स्थानीय लोगों के रोज़गार को किस तरह से बाहर से आने वाले अन्य राज्यों के लोग पा जाते हैं ? सरकार को एमपी के युवकों में कुशलता के साथ कोई भी काम करने की इच्छाशक्ति बढ़ानी होगी तभी उद्योगों के साथ राज्य के युवाओं का विकास भी हो सकता है। .शिवसेना की तरह जय महाराष्ट्र और मराठी मानुष जैसी सोच का किसी भी अन्य राज्य में समर्थन नहीं किया जा सकता क्योंकि यह संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत जाता है।  खुद उद्योगपति होने के कारण कमलनाथ इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि सभी को कुशल कामगारों की आवश्यकता होती है और जब तक कुशलता बढ़ाई नहीं जाएगी तब तक हवाई सपने देखने से कुछ भी संभव नहीं है।     
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सोमवार, 17 दिसंबर 2018

भाजपा की राह

                                            हालिया चुनावों में जिस तरह से लम्बे समय से भाजपा के गढ़ रहे छत्तीसगढ़ में जनता ने कांग्रेस के पक्ष में प्रचंड बहुमत दिया और राजस्थान एवं एमपी में अच्छा ख़ासा समर्थन देकर भी सिर्फ सत्ता से उतार दिया है उसके बाद यदि उसके नेतृत्व द्वारा खतरे की इस घंटी को नहीं सुना गया तो २०१९ की उनकी चुनावी संभावनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है. ऐसा भी नहीं है कि ऐसा अचानक ही हुआ है क्योंकि गुजरात, गोवा, पंजाब, कर्णाटक में भाजपा के लिए राह बिलकुल भी आसान नहीं रही फिर भी उन जनादेशों की एक तरह से भाजपा नेतृत्व द्वारा पूरी अनदेखी की गयी जिसके चलते आज उसके तीन महवत्पूर्ण हिंदीभाषी राज्य विपक्षी दल कांग्रेस के हाथों में चले गए हैं। यह सही है कि अभी तक भाजपा पीएम मोदी की लोकप्रियता और अपने अध्यक्ष अमित शाह के कुशल प्रबंधन से लगातार अजेय बनी हुई थी पर अब उसकी यह छवि भी इन चुनावों से कमज़ोर हुई है कि भाजपा को कोई हरा नहीं सकता है. निश्चित तौर पर आज देश में  भाजपा के पास मज़बूत संगठन तो है ही साथ में संघ के ज़मीनी समर्थन से उसके लिए जनता के साथ जुड़ने का अवसर भी रहता है जो उसकी स्थिति को अन्य दलों के मुक़ाबले मज़बूत करने का काम करता है फिर भी जनता से जुड़े सरोकारों में जिस तरह से भाजपा पिछड़ रही है वह उसके लिए सब कुछ होने के बाद भी अनुकूल परिणाम देने से दूर जाने वाला साबित हो सकता है.
                           निश्चित तौर पर २०१४ के बाद पेट्रोलियम क्षेत्र में होने वाले मुनाफे के दम पर मोदी सरकार का खज़ाना भरा जिससे उसके पास लोक कल्याण के लिये वो धन उपलब्ध होना शुरू हो गया जो पिछली मनमोहन सरकार में केवल सब्सिडी में ही खर्च हो जाया करता था. आज भी देश में राजनैतिक इच्छाशक्ति उस स्तर पर नहीं दिखाई देती है जिसमें वह नौकरशाही के स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार में अपना हिस्सा न मांगे और भ्रष्ट नौकरशाहों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की कोशिश शुरू करे. आज क्या केंद्र सरकार और अधिकांश राज्यों में सत्ता सँभाल रही भाजपा यह बात पूरी दृढ़ता के साथ कह सकती है कि उसके द्वारा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार का अंत किया जा चुका है ? गौ रक्षक और हिन्दुओं के नाम पर क्या भाजपा और इसकी सरकारों ने ईमानदारी से काम किया है या इस मुद्दे से केवल धार्मिक भावनाएं भड़का कर वोट बटोरने तक ही मामले को सीमित किया जा चुका है ? यदि वास्तव में ऐसा कुछ है तो आने वाले समय में भाजपा को यूपी जैसे राज्यों में अपने इन कर्मों के चलते बड़े नुकसान के लिए मानसिक रूप से तैयार होना होगा क्योंकि आज भाजपा को विपक्षियों से उतना खतरा नहीं है जितना उसे अपने नेताओं और उनके अनावश्यक बयानों से होने वाला है.
                          भाजपा द्वारा जिस तरह से पूरे देश में पदयात्रा का आयोजन किया जीवंत लोकतंत्र में हर राजनैतिक दल को इस तरह के प्रयासों को अपनाना चाहिए जिससे वे जनता की समस्याओं को केवल अधिकारियों के चश्में से देखने के स्थान पर धरातल पर समझने की स्थिति में आ सकें। पद यात्रा के समय जनता का जो मूड दिखाई दिया है उससे स्थानीय नेता अवश्य ही भयभीत हुए होंगें क्योंकि यूपी जैसे राज्य में जहाँ विश्व की एकमात्र और सबसे बड़ी गोरक्ष पीठ के महंत आदित्यनाथ के सीएम होने के बाद गायों की स्थिति में गिरावट आयी है वह भी अमित शाह को पता चल गया होगा ? और यदि ज़िले और प्रदेश के नेतृत्व में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वह इस सच्चाई को ऊपर तक पहुंचा कर कोई समाधान निकाले तो आने वाले चुनावों में भाजपा के ज़मीनी संघर्ष उसकी सोच से भी बहुत बड़ा होने वाला है और पूरे प्रदेश में यह स्थिति बन सकती है कि जो भी दल भाजपा को हराने की स्थिति में होगा किसान संभवतः उसी के साथ खड़ा दिखाई देगा। २० महीने के कार्यकाल में यूपी में गायों और आवारा पशुओं से किसानों की जो दुर्दशा हुई है संभवतः २०१९ में भाजपा को बहुत भारी पड़ने वाली है क्योंकि अभी तक इस बारे में सरकार या पार्टी के स्तर पर कोई ठोस प्रशासनिक, राजनैतिक या जागरूकता का काम शुरू नहीं किया गया है जिससे आम किसान एक बार फिर उसी सम्बल से भाजपा के साथ खड़े होने को सोचे जैसा उसने २०१४ में किया था।           

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बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

नि:शुल्क बेटी वाहिनी

                                      तमाम होहल्ले और सरकारी तामझाम के बाद भी जो काम आम बेटियों के लिए संभव नहीं हो सकता था उसे गांव के रहने वाले एक रिटायर्ड शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ ने अपने पीएफ के १७ लाख रुपयों के बाद २ लाख रूपये खुद से डालकर आसान कर सरकार को भी एक राह दिखा दी है. राजस्थान के रहने वाले डॉ रामेश्वर प्रसाद यादव ने एक बार अपने गांव जाते समय रास्ते में पानी से भीगती लड़कियों को देखकर उन्हें अपनी कार में लिफ्ट दी तब उन्हें लड़कियों से बातचीत करके उनकी समस्या की गंभीरता का पता चला जिसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी से भी इस बारे में चर्चा की और अपने गांव के आस पास के गांवों की लड़कियों को लाने ले जाने के लिए एक बस खरीदने की योजना बनायीं और बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के अपने बुढ़ापे के लिए जमा की गयी पीएफ की राशि के रुपयों से एक बस खरीद कर लड़कियों को अमूल्य सौगात दी. देखने में यह काम साधारण सा ही लगता है पर इसके लिए भी उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा. आज भी वे लगभग ३६ हज़ार रूपये प्रति माह खर्च करके इस सेवा को ७० लड़कियों के लिए सुलभ बना चुके हैं.
                      इस पूरे प्रकरण में एक व्यक्ति के प्रयास से कुछ गांवों की लड़कियों इतना कुछ किया जा सका है तो इसमें सामजिक संस्थाओं, उद्योगों और सरकारों की भूमिका के पुनर्निर्धारण के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए क्योंकि जिस तरह से एक व्यक्ति कुछ गाँवों में इच्छाशक्ति से बदलाव लाने की तरफ जा सकता है तो क्या इस बारे में इसे और बड़े स्तर पर नहीं शुरू किया जा सकता है जिसमें एनजीओ, शिक्षा विभाग, महिला कल्याण विभाग और उद्योगों की तरफ से सामाजिक सरोकारों के लिए खर्च किये जाने वाले धन का क्या बेहतर उपयोग कर लड़कियों के शैक्षणिक स्तर को सुधारने का काम नहीं किया जा सकता है ? डॉ यादव का कार्य अनुकरणीय है पर उनके इस प्रयास को भी जिस तरह से कानून और नियमों के कारण अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ रही है क्या सरकारें वर्तमान कानूनों में कुछ सुधार कर उसमें कुछ राहत नहीं दे सकती हैं ? डॉ यादव के मामले में उनसे राजस्थान परिवहन विभाग ५ हज़ार रूपये प्रति माह टैक्स के रूप में वसूल रहा है जबकि उनके इस कार्य के लिए क्या गाड़ी के पंजीकरण से लगाकर टैक्स तक में पूरी छूट की व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता नहीं है ?
                      हमारे कानून और राजनेता के साथ समाज में भी एक अलग तरह की धारणा बनी हुई है  जिसके चलते किसी भी अच्छे कार्य को भी बहुत सारी अड़चनों से होकर गुज़रना पड़ता है. क्या किसी राज्य सरकार या परिवहन विभाग के मंत्री/ अधिकारी के पास इतने अधिकार नहीं होने चाहिए कि आवश्यकता पड़ने पर वे इस तरह के सराहनीय सामाजिक कार्यों को करने वाले लोगों के लिए अपने स्तर से पूरी छूट दे सकें ? क्या हर काम को उसी कानून से चलाने की आवश्यकता है जो आम लोगों के लिए सामान्य प्रशासन को संचालित करने हेतु बनाया गया है ? क्या असाधारण प्रयास से लोगों के जीवन में बदलाव करने वाले किसी भी व्यक्ति को हर स्तर पर अधिक सहायता करने की व्यवस्था करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए ? क्या हम सिर्फ कानून का अनुपालन करने वाली मशीन बनना चाहते हैं या इन कानूनों के बीच मानवीय संवेदनाओं के साथ काम करने वाले किसी डॉ यादव के प्रयासों की सराहना करते हुए उनके लिए काम करने का माहौल को और भी सुधारने का प्रयास कर सकते हैं ? यह सही है कि यदि टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा को डॉ यादव की इस पहल का पता चले तो वे स्वयं उनके प्रयासों की सराहना करते हुए उनके लिए कुछ निशुल्क बसों की व्यवस्था भी अविलम्ब करा सकते हैं फिर भी ऐसे प्रयास केवल स्थानीय सराहना के बाद कहीं खो से क्यों जाते हैं जिनका पूरे देश में प्रचार प्रसार होना चाहिए ? कम  से कम सरकारें तो इस तरह के प्रयासों के लिए अपने स्तर से टैक्स में छूट दे सकती हैं और जिस ज़िले में ऐसा काम किया जा रहा है वहां विधायक या सांसद निधि से इन बसों में नियमित डीज़ल भरवाने की व्यवस्था भी की जा सकती है.           
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शनिवार, 2 जून 2018

गैर भाजपाई गठबंधन

                                                          संसद में सबसे अधिक सदस्यों को भेजने वाले यूपी में विपक्षी तालमेल के चलते भाजपा को जिस तरह से लगातार भाजपा विरोधी वोटों के लामबंद होने से उपचुनावों में हार का मुंह देखना पड़ रहा है उससे आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि भाजपा की मोदी सरकार भी पता नहीं क्यों अटल सरकार की तरह पुनः आत्ममुग्धता का शिकार होती जा रही है ?  भाजपा के सामने २००४ का उदाहरण बहुत पुराना नहीं हुआ है फिर भी उसकी तरफ से जिस तरह से एक प्रचारवादी अभियान चलाया जाने लगा है वह कई बार धरातल की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता है जो उसके साथ पहली और पिछली बार चुनावों में जुड़े उन तटस्थ मतदाताओं को उससे दूर करने का काम करता है जिसके दम पर उसे लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला था। मोदी शाह और भाजपा को यह समझना ही होगा कि आज उनको राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की विकल्पहीनता का लाभ अधिक मिल रहा है और यदि किसी मज़बूत एजेंडे पर विपक्षी दल एकजुट होते हैं तो २०१९ का चुनाव भाजपा के लिए एक दुःस्वप्न भी बन सकता है जहाँ कम अंतर से हारने वाले उसके सांसदों की संख्या बहुत अधिक रह सकती है.
                       विपक्ष में जिस तरह से हर बड़े नेता की आकांक्षा पीएम बनने की तरफ जाती हुई दिखाई देती है उसे किसी भी स्तर पर गलत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि हर राजनीतिज्ञ के लिए आगे बढ़ना एक बड़ा सपना होता है और वह किसी भी परिस्थिति में अपने को आगे बढ़ाना भी चाहता है. जब एक बड़ी चुनौती के रूप में मोदी विपक्ष के सामने हैं तो उनसे निपटने के लिए अपनी तात्कालिक विरोध को दरकिनार कर अगर यूपी में माया मुलायम अजीत और कांग्रेस ने समझदारी से सीटों का बंटवारा कर लिया तो भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ सकती है जहाँ तक यह कहा जा रहा है कि यह बेमेल गठबंधन अधिक समय तक नहीं चल पायेगा तो यह भी संभव है कि अंतर्विरोधों के चलते गठबंधन दो साल भी न चल पाए पर उसके बीच में आकर सत्ता सँभालने से भाजपा के लिए बहुत समस्या हो सकती है क्योंकि आज मोदी शाह की जिताऊ जोड़ी की तानशाही संघ से लगाकर पार्टी के हर स्तर पर नेताओं द्वारा महसूस की जा रही है पर सत्ता हाथ से जाते ही क्या भाजपा के महत्वाकांक्षी नेता इन पर हमला नहीं करने लगेंगें ? आज जो दबी जबान से सुनाई देता है वह कल खुलेआम दिखाई भी दे सकता है जिससे खुद भाजपा की संभावनाओं पर असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है.
                         परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों पर अब राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस को खुद को साबित करने का अंतिम अवसर मिला हुआ है और जिस तरह से अपने वजूद के लिए संघर्ष करती हुई कांग्रेस ने अहमद पटेल के चुनाव के बाद से हर मोर्चे पर लड़ने की इच्छा दिखाई है उससे उनके हताश कार्यकर्ताओं का मनोबल भी मज़बूत हुआ है. राहुल गाँधी के पास अभी बहुत समय है और इस सच्चाई को वह समझ रहे हैं यह उनके और कांग्रेस के लिए अच्छी बात है क्योंकि देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने और गुजराल सरकार को समर्थन देने की राजनीति करने वाली कांग्रेस में पिछले २२ सालों में बहुत कुछ बदल चुका है. विपक्ष के पास भी अधिक समय नहीं है क्योंकि मोदी सरकार में जिस तरह से संगठित तरीके से विपक्षी नेताओं को देशविरोधी साबित करने की कोशिश की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है और यदि यह परिस्थिति २०२४ तक बनी रही तो देश के ताने बाने में बहुत कुछ बदल सकता है. कौन पीएम होगा और कौन नहीं इस बात पर विचार करना अभी जल्दबाज़ी होगी क्योंकि जब तक भाजपा की संख्या को २०० तक सीमित करने में विपक्षी दल सफल नहीं होंगें तब तक नेताओं के चयन की कोई बात कम नहीं करने वाली है राज्यों में मज़बूत दलों को अपने राज्य में खुद के लिए अधिक और कांग्रेस के लिए कम सीटें छोड़ने और केंद्र में कांग्रेस के लिए अधिक सीटें छोड़ने जैसे किसी सम्मानजनक स्तर पर बात करनी होगी तभी २०१९ में उनके लिए कुछ संभव होगा वर्ना मोदी अपनी पूरी ताकत झोंक कर एक और आजम चुनाव को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए तैयारी करने में व्यस्त हो चुके है.    
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रविवार, 18 फ़रवरी 2018

इंसानी आबादी में वन्य जीव

                                                    लखनऊ के आवासीय क्षेत्र में जिस तरह से तीन दिनों तक एक तेंदुएं के चलते आतंक मचा रहा और उससे निपटने के लिए वन विभाग की टीम के पास कोई कारगर योजना नहीं दिखाई दी उससे यही पता चलता है कि किसी हिंसक जीव के शहरी क्षेत्र में आ जाने के बाद उसको जान से मार देने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नहीं है ? तेंदुआ भी संरक्षित प्रजातियों में आता है और उसकी पुलिस की गोली से मरने के बाद वन विभाग अपनी कार्यवाही करने को तत्पर तो दिखाई देता है पर जिस तरह से पुलिस ने अकेले दम पर इस समस्या से निपटने की कोशिश क्या वह वन विभाग के ऊपर बड़ा प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती है ? यह सही है कि वहां पर विपरीत परिस्थितियां थीं और उनसे निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध नहीं थे तो आम लोगों की ज़िंदगी को बचाने के लिए कौन आगे आ सकता था ? ऐसी परिस्थिति में वन्य जीवों से निपटने की कोई ट्रेनिंग न होने के बाद भी लखनऊ पुलिस ने अपने स्तर से सभी प्रयास किये और अपनी जान बचाने के लिए तेंदुए को मारने जैसा कदम उठाना पड़ा पर इस पूरे प्रकरण में एक बात सामने आ गयी है कि ऐसी किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए जब सरकार की नाक के नीचे लखनऊ में विभिन्न विभागों के पास कोई कारगर योजना नहीं है तो ग्रामीण क्षेत्रों और संरक्षित क्षेत्रों के आस पास रहने वाले लोगों के लिए क्या किया जा सकता है ?
                          जिस तरह से बढ़ती आबादी का चलते जंगलों को काटा जा रहा है और उसके स्थान पर पेड़ लगाने का काम न के बराबर हो रहा है तो एक दिन ऐसी संघर्ष की स्थिति पूरे देश में जगह जगह पर दिखाई दे सकती है और अधिकांश स्थानों पर बिना ट्रेनिंग के काम करने वाले पुलिस और वन विभाग के लोग अंत में किसी संरक्षित जीव को मारकर अपना काम पूरा करते हुए दिखाई देने वाले हैं. इस बारे में अब संरक्षित वन क्षेत्रों में सभी सम्बंधित विभागों को और भी कठोरता से नियमानुसार काम करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक इन जीवों के लिए स्थान सुरक्षित कर उनके लिए उपयुक्त वातावरण तैयार नहीं किया जाता है तब तक इस तरह का संघर्ष बढ़ता ही जाने वाला है. इस मामले में किसी एक सरकार पर आरोप लगाने से परिस्थितियां बदलने वाली नहीं हैं क्योंकि जब तक मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच इस संघर्ष के उत्पन्न होने वाले कारणों पर रोक नहीं लगायी जाएगी तब तक कुछ भी ठीक नहीं होगा. इस घटना से सीख लेते हुए अब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को एक विस्तृत कार्य योजना पर राज्यों के साथ मिलकर चर्चा करने की आवश्यकता है क्योंकि तभी पूरे देश में वन्य जीवों और मनुष्यों के इस अप्रत्याशित संघर्ष को कम करके रोकने की स्थिति पैदा की जा सकेगी.
                            वन विभाग और लकड़ी माफियाओं के गठबंधन को तोडे बिना इस दिशा में आगे बढ़ पाना संभव ही नहीं है क्योंकि वन के सामान्य पारिस्थितिकी तंत्र तोड़ कर जब हम वन्य जीवों को वहां से निकलने के लिए मजबूर कर रहे हैं तो इस तरह की घटनाएं सामने आती ही रहेंगी. वन विभाग और पुलिस के माध्यम से अवैध वन कटान को रोकने और जहाँ जंगल कम हो गए हैं वहां उनको संरक्षित कर पुनः पेड़ लगाने के काम पर यदि सही तरह से ध्यान दिया जाये तो इन जीवों को अपने क्षेत्र का अतिक्रमण करने की आवश्यकता नहीं पड़ने वाली है. सघन वन क्षेत्रों के आस पास रहने वाले आम नागरिकों को भी इस तरह की किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए सामान्य बातें बताई जानी चाहिए जिससे उनमें व्याप्त होने वाले अनावश्यक भय को दूर रखा जा सके. सरकारें केवल नियम बना सकती हैं पर उन पर अमल करने के लिए जिस इच्छाशक्ति की निरंतरता के साथ आवश्यकता होती है उसमें हम लोगों में पूर्णतः असफल हो जाते हैं. अब इस घटना को ध्यान में रखते हुए वन विभाग की ट्रेनिंग और अन्य परिस्थितियों पर विचार कर इस संघर्ष को समाप्त करने कि दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है.  
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शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

नीरव मोदी - नीयत से नियति तक

                                                 पीएनबी की तरफ से किये गए एक खुलासे के बाद जिस तरह से २०१४ में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रचंड लहर पर सवार होकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार के लिए नीरव मोदी प्रकरण ने कई बड़े प्रश्नचिन्ह लगाने का काम कर दिया है यह सही है कि मोदी के पूर्ववर्ती पीएम मनमोहन पर भी कभी व्यक्तिगत स्तर पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा था पर भाजपा जनता में यह सन्देश भेज पाने में पूरी तरह से सफल हो गयी थी कि पूरी यूपीए सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है. भरष्टचार को लेकर विपक्षी दलों पर निर्मम हमले कर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने की पीएम मोदी की हर कोशिश अभी तक लगभग सफल होती ही आयी है पर इस वर्ष के कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले वर्ष के आम चुनावों से पहले मोदी के आभा मंडल को दूषित करने वाली ये घटनाएं मतदाताओं को काफी हद तक प्रभावित कर सकती हैं इस समभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. कोई भी आसानी से यह आरोप नहीं लगा सकता कि नीरव मोदी, गिन्नी, गीतांजलि जैसी बड़ी कंपनियों से सीधे पीएम मोदी ने कोई लाभ लिया होगा और न ही इस पर कोई विश्वास भी करेगा पर यह मामला उसी तरह का हो सकता है जैसा की २जी और अन्य मामलों में हुआ जिससे सरकार की देश और विदेश में छवि को बहुत बड़ा धक्का लग सकता है.
                                               पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्य पूर्ण यह है कि जब वित्तीय मामलों में अनियमितता का मामला सामने आया तो उससे निपटने कि लिए रक्षा मंत्री का बयान क्यों सामने आ रहा है ? इस मामले पर यदि वित्त मंत्री स्थितियों को स्पष्ट करें तो उनकी बात को गंभीरता से सुना जायेगा पर संभवतः आज भी भाजपा यह स्वीकार नहीं कर पा रही है कि वह २०१४ से सत्ता में है और निर्मला सीतारमण और रविशंकर प्रसाद जैसे नेता अब उनके प्रवक्ता नहीं बल्कि सरकार के ज़िम्मेदार मंत्री हैं ? चिंता की बात यह भी है कि रवि शंकर प्रसाद के अनुसार यह मामला २०११ से था तो २०१४ के बाद सरकार ने क्या किया और यदि इसका खुलासा पिछले वर्ष जुलाई में हो गया था तो नीरव मोदी जैसा व्यक्ति एक आरोप के अनुसार आखिर विदेश में पीएम मोदी के साथ मंच पर कैसे खड़ा हो सकता था ? क्या इस मामले में पीएमओ ने विदेश मंत्रालय और अपने मंत्रालय के लिस्ट बनाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाही की है ? हो सकता है कि पीएम मोदी को यह न पता हो पर जब वे खुद को चौकन्नी नज़रों वाला बताते हैं और उनके पीएमओ द्वारा इस मामले को संज्ञान में लिया जा चुका था तो लगाए जाने वाले अपुष्ट आरोपों के अनुसार नीरव दावोस में पीएम के बगल तक कैसे पहुँच गया इस बात को लेकर पीएम मोदी पर संदेह जताया जा सकता है ? बेशक यह अधिकारियों की लापरवाही ही हो पर पीएम मोदी की छवि पर छींटे पड़ने शुरू हो चुके हैं देश को यह भी देखना होगा कि ३० साल बाद बनी पूर्ण बहुमत की सरकार पर भी राजीव गाँधी की मिस्टर क्लीन जैसी छवि वाले मोदी की छवि को धूमिल किये जाने का बहाना मिलना शुरू हो चुका है. भ्रष्टाचार पर मुखर रहने वाले पीएम मोदी के खिलाफ इतना बड़ा मुद्दा विपक्ष भी नहीं छोड़ना चाहेगा जिससे इस मामले में बैंक के कुछ लोगों पर कार्यवाही करके इसे ठंडा किये जाने की कोशिशें शुरू की जायेंगीं.
                                                      देश को अपने पीएम से सही और सीधा जवाब ठोस कार्यवाही के रूप में चाहिए उसे दलगत राजनीति से कोई मतलब नहीं है देश की आम जनता का यह पैसा जो हर्षद मेहता से लगाकर नीरव मोदी जैसे लोग आसानी से हड़पने को तैयार बैठे हैं इनसे निपटने के लिए अब सरकार के पास क्या प्लान हैं ? क्या ये बड़े लुटेरे नाम बदलकर इसी तरह देश के सत्ता प्रतिष्ठान से अपनी नज़दीकियों का लाभ उठाकर बैंको को लूटते रहेंगें और देश की सत्ता में बैठी कोई भी सरकार कड़े कदम उठाने जैसे चिर परिचित पुराने झांसे से जनता को बरगलाने का काम करती रहेंगीं ? फिलहाल देश को खुद पीएम मोदी की तरफ से इस मामले पर जवाब की आशा है और संसद में विपक्ष भी इस मामले पर सरकार को कोई राहत देने की स्थिति में नहीं होगा जिससे आने वाले समय में मोदी सरकार की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं.       
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शनिवार, 20 जनवरी 2018

रक्षा तैयारियां और मोदी सरकार

                                                         सत्ता सँभालने के बाद से ही लगातार जिस तरह से संसद से लेकर सड़क तक भाजपा, खुद पीएम मोदी और उनकी सरकार के मंत्री जिस तरह से अपनी पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार पर आक्रामक रहा करते हैं और उस पर यह आरोप लगाया करते हैं कि उसने देश की रक्षा से समझौता किया और सेनाओं के लिए १० वर्षों तक पर्याप्त धन की व्यवस्था भी नहीं की उसकी पोल खुद उनके सांसद मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी की अध्यक्षता में गठित रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने खोल कर रख दी है. समिति ने जिस स्तर पर सरकार की आलोचना की है उससे यही लगता है कि रक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर है और हालत यहाँ तक पहुंच गयी है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में रक्षा बजट केवल २.७४ लाख करोड़ रुपयों का रखा गया है जो कि प्रस्तावित जीडीपी का १.५६ % और १९६२ के चीन युद्ध के बाद से न्यूनतम है. समिति ने सेना के आधुनिकीकरण के लिए जरूरत भर का फंड उपलब्ध नहीं कराने और रक्षा खरीदारी को फास्ट ट्रैक नहीं करने के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की है। इस वित्तीय वर्ष में आर्मी, नेवी और वायुसेना को आधुनिकीकरण की उनकी मांग की तुलना में क्रमशः महज ६०, ६७ और ५४ फीसदी फंड उपलब्ध कराया गया है। समिति ने इस बात की आशंका और चिंता भी जताई है कि फंड की अनुपलब्धता का प्रतिकूल असर सेना के ऑपरेशंस पर पड़ सकता है।
                                          समिति ने मोदी सरकार को सेना के सुस्त आधुनिकीकरण के लिए फटकार लगाई और कहा है कि चीन और पाकिस्तान की तरफ से देश की सुरक्षा के लिए खड़े किए जा रहे मौजूदा खतरों के दौरान भी सेना के आधुनिकीकरण में सुस्ती बरती जा रही है। भारतीय सेना कई मोर्चों पर कार्रवाई के लिए संसाधनों की कमी से जूझ रही है इनमें सबमरीन, फाइटर जेट, हॉवित्जर्स और हेलिकॉप्टर्स की कमी के साथ नई जेनरेशन की असॉल्ट राइफल, मशीन गन, बुलेट फ्रूफ जैकेट्स और हेल्मेट्स जैसे बेसिक संसाधनों की कमी भी शामिल हैं। ये वो आंकड़े हैं जो हमारी सेनाओं और उनके लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की वास्तविक तस्वीर को सामने लेकर स्थिति की गंभीरता को बता रहे हैं फिर भी सरकार की तरफ से केवल पूर्व की सरकार पर हमले किये जाने और उसकी आलोचना तक खुद को सीमित किया जाना आखिर किस तरह से देशहित में अच्छा कहा जा सकता है ? यह सही है कि देश में रक्षा सौदों में दलाली के चलते कोई भी सरकार कुछ भी खरीद करे उस पर आरोप बहुत आसानी से लगाए जा सकते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि हथियारों को बनाने वाले देश और निर्माण करने वाली लगभग हर कम्पनी ने पूरी दुनिया में अपने एजेंट नियुक्त कर रखे हैं जिनके माध्यम से देश और कम्पनी किसी भी सौदे में उनकी सहभागिता होने या न हो पाने की दशा में भी कमीशन का भुगतान किया करती हैं जो कि पूरे विश्व में एक सामान्य प्रक्रिया है पर भारत में इसे जिस तरह से घूस कहा जाता है वह कमीशन की श्रेणी में नहीं आ सकता है इसलिए सरकार को भी सौदों में तत्परता के लिए अपनी शर्तों में इन एजेंट्स के लिए एक सीमा तक आधिकारिक रूप से कमीशन दिए जाने को वैध कर देना चाहिए जिससे आने वाले समय में रक्षा खरीद को पटरी पर लाया जा सके और भ्रष्टाचार के कथित आरोपों से बचने के लिए सरकारें देश की सुरक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप रख पाने में सफल हो सकें.
                                   जिस तरह से पूरा देश जानता है कि देश में रक्षा खरीद की प्रक्रिया बेहद पेचीदी है जिसके चलते कोई भी सरकार केवल अपने को बचाने के प्रयास में ही लगी दिखाई देती है कि कहीं उस पर देश की सुरक्षा के मामले में समझौता करने और कमीशन लेने का आरोप न लग जाये. बोफोर्स कांड के बाद से जिस तरह से वह देश में एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बन गया था उसे देखते हुए भी वर्तमान खरीद प्रक्रिया में बेचने वाले देशों की सरकारों या कंपनियों के एजेंट्स की भूमिका को स्पष्ट करने की आवश्यकता भी सामने आ चुकी है क्योंकि अब नीतियों में व्याप्त कमियों को सुधारने की आवश्यकता अधिक है जबकि हम एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने में ही व्यस्त हैं ? हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में सेना ही सर्वोपरि है और उसके निर्णय के सामने खड़े होने का साहस कोई भी नहीं कर सकता है जिसके चलते वहां रक्षा सौदे करना आसान है और चीन अब रक्षा क्षेत्र में खुद एक उत्पादक देश के रूप में स्थापित हो रहा है जिससे उसको रक्षा खरीद के लिए दूसरे देशों पर उतना निर्भर नहीं रहना पड़ता है पर भारत की स्थिति को देखते हुए क्या संसद में ही सर्वसम्मति से एक नयी रक्षा खरीद नीति को लागू करने की आवश्यकता नहीं है जिससे आने वाले कुछ वर्षों में देश की रक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप किया जा सके ?  
                                    देश ने बहुत काम करने वाले और सादगी से भरे दो रक्षा मंत्री ए के अंटोनी और मनोहर पणिकर भी देखे पर ईमानदारी से काम करने के बाद भी वे देश की रक्षा आवश्यकतों को पूरा करने में असफल ही रहे जिसके लिए उन्हें दोषी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश की रक्षा खरीद की प्रक्रिया की पेचीदियों पर काबू पाए बिना इसे सुधारा नहीं जा सकता है. खरीद में अब एक सीमा तक कमीशन को कानूनी रूप से सही घोषित किया जाना चाहिए और उसे हर हालत में कम्पनी द्वारा ही दिया जाना चाहिए साथ ही मंत्रालय को इस बारे में गुणवत्ता की जाँच कर उसकी न्यूनतम अंतर्राष्ट्रीय कीमत पर खरीदने की अनुमति होनी चाहिए जिससे सरकार का दखल उसमें कम किया जा सके और ऐसी किसी भी खरीद को संसदीय समिति के सामने भी निश्चित समय सीमा में रखने और उसकी संस्तुतियों के आधार पर सीधे संसद से अनुमोदन कराने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए. इस तरह की पारदर्शी व्यवस्था बनाये जाने से जहाँ खरीद को आसान बनाया जा सकता है वहीं हमारी सेनाओं की आवश्यकताओं को भी हर समय पूरा रखने की एक सीमा को जल्दी ही पाया जा सकता है. मोदी सरकार को भी इक्का दुक्का मामलों को देश के सामने रखकर अपनी रक्षा तैयारियों के बारे में प्रदर्शन करने के स्थान पर पूरी सेना की समग्र तैयारियों के बारे में गभीरता से सोचना शुरू करना चाहिए जिससे सेना को सही तरह से आधुनिक किया जा सके.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...