मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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सोमवार, 18 मई 2020

लॉक डाउन के नियम

                                                कोरोना संक्रमण को नियंत्रित के लिए केंद्र सरकार द्वारा लॉक डाउन के चौथे चरण की घोषणा के साथ यह स्पष्ट हो गया है कि अब नागरिकों को खुद को और अधिक अनुशासित करते हुए सामाजिक जीवन में अपने कार्यों को सम्पादित करने के लिए तैयार होना होगा. अभी तक देश के अधिकांश भागों में जिस तरह से अधिसंख्य जनसंख्या ने इसको अच्छे से माना है तो अब इस चरण में हम सभी की यह ज़िम्मेदारी बनती कि अपने समाज और देश हित में सरकार के निर्देशों को समझते हुए अपने आवश्यक कार्यों को करें जिससे इस बीमारी की रोकथाम को प्रभावी ढंग से सुनिश्चित किया जा सके. सरकार के पास दिशा निर्देश जारी करने के आलावा और कुछ ख़ास नहीं है अब यह हम नागरिकों पर ही निर्भर करता है कि हम इन निर्देशों पर कितना अमल करके खुद को आगे बढ़ाने का काम सही ढंग से कर पाते हैं.
                           लॉक डाउन के सभी चरणों में अभी तक यह देखा गया है कि सरकार की मंशा के अनुरूप अधिकारियों को काम करने में अत्यधिक कठिनाई हो रही है क्योंकि अभी तक कोरोना से निपटने के लिए विभिन्न तरह के प्रयोग पूरी दुनिया में किये जा रहे हैं जिससे कई बार कहीं पर कुछ ऐसे निर्देश भी जारी हो जाते हैं जिनसे उनका अनुपालन कराया जाना मुश्किल हो जाता है. साथ ही केंद्र और राज्य मुख्यालय द्वारा सीधे नज़र रखने से इन अधिकारियों के लिए भी समस्या हो जाती है क्योंकि टीवी पर घोषणा करने के बाद जब तक लिखित आदेश जारी होता है तब तक जनता उसको सरकार का आदेश मानकर अपनी मनमानी करने लगती है. अधिकारियों के पास किसी आदेश को लागू करने का अधिकार तभी होता है जब सरकार से स्पष्ट शासनादेश मिल जाए. बेशक देश में डिजिटल प्रणाली का उपयोग बढ़ा है पर अभी भी इन आदेशों पर तेज़ी से अमल करने के  मामले में अधिकारियों को उतने अधिकार नहीं मिले हैं जिससे आज भी वे पुरानी पद्धति से काम करने को बाध्य हैं.
                            केंद्र और राज्य सरकारों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसके आदेश का अनुपालन कराने के लिए जनता के सामने खड़े अधिकारियों को भी आदेश पर अमल करने के लिए अपने तंत्र को सक्रिय करना होता है इसलिए शासन के स्तर से भले ही कुछ देरी के साथ आदेश जारी किये जाएं पर जिन आदेशों को पारित किया जाये वे पूरी तरह से विचार विमर्श के बाद ही अनुपालन में लाएं जाएँ। अभी तक यह देखा जा रहा है कि सुबह और शाम तक आदेशों में कई बार बदलाव होने से जनता में भ्रम की स्थिति होती है और अधिकारी भी शासन की मंशा को सही ढंग से लागू नहीं करवा पाते हैं जिससे कई जगहों पर जनता और प्रशासन में टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. सरकार अपने स्तर से इस बिंदु पर अधिक ध्यान दे जिससे अधिकारियों का काम आसान हो सके और जनता भी उसको समझ कर उन पर अमल कर सके. इस समय मीडिया का रोल भी और गंभीर होना चाहिए क्योंकि ब्रेकिंग न्यूज़ के चक्कर में कई बार टीवी पर ऐसा कुछ प्रसारित हो जाता है जो आदेशों में कहीं से भी सामने नहीं आता है. जनता को भी सरकारी आदेशों की प्रति देखने के बाद अधिकारियों से तुरंत परिवर्तन की आशा नहीं करनी चाहिए क्योंकि दिल्ली या राज्य मुख्यालयों से जारी आदेशों को निचले स्तर तक पहुंचाने हेतु समय भी चाहिए होता है.
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शनिवार, 16 मई 2020

गांवों की सतर्कता

                                                 देश भर के बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से अपने घरों की तरफ जाने वाले मजदूरों के लिए अब एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है जब वे किसी भी तरह से लम्बी परेशानियाँ झेलकर अपने खुद के गाँव में पहुँच रहे हैं तो वहां इन लौटते मजदूरों से कोरोना फैलने के भ्रम और अफवाह के चलते बहुत जगहों पर उन्हें अपने घरों तक जाने नहीं दिया जा रहा है. यह एक ऐसी समस्या है जिससे केवल सही जानकारी के द्वारा ही निपटा जा सकता है. अभी तक जो कुछ भी जानकारियां देश में थीं उनका भी दुरूपयोग ही किया जा रहा है. देश की बड़ी आबादी ने पहले तो इस संकट को समझा ही नहीं फिर जब समझने की कोशिश की तो अब ज़्यादा सख्ती करने के चक्कर में अधिकांश लोग अपने लोगों को ही गाँव में आसानी से स्वीकार नहीं कर रहे हैं जिससे पुलिस का काम अनावश्यक रूप से बढ़ता जा रहा है.
                                       एक तरफ जहाँ ग्रामीण भारत का बड़ा हिस्से जिस तरह से इस बीमारी के प्रति सचेत दिखाई दे रहा है वहीं अभी भी कुछ जगहों से ऐसी ख़बरें भी सामने आ रही हैं कि लोग खुद ही भीड़ के रूप में इधर उधर घूम रहे हैं और खुद के साथ अन्य लोगों को भी संक्रमण के खतरे में डाल रहे हैं. आज की परिस्थिति में सभी को आवश्यक कार्यों के लिए ही आवश्यक दिशा निर्देशों का पालन करते हुए घरों से निकलना चाहिए जिससे समाज में संक्रमण को फैलने से रोका जा सके. ग्रामीण भारत में आज आवश्यकता है कि सभी लोग इस बात के लिए जागरूक किये जाएँ जिससे उनको खतरों का आभास तो हो ही साथ ही वे अपने लोगों को भी सही तरीके से घरों तक जाने में बाधा भी न बनें. यह सही है कि शहरों के मुक़ाबले अधिक स्थान में कम लोगों के रहने के चलते भी गाँवों में संक्रमण का फैलाव थोड़ा कम स्तर पर होता है पर संक्रमण फैलने पर समस्याएं गांवों में भी उसी तरह से सामने आती हैं.
                   इस परिस्थिति से निपटने एक लिए अब समाज को सरकार के कोरोना से बचाव के नियमों का कड़ाई से अनुपालन सीखना होगा जिसमें खुद को संक्रमण से बचाने के उपायों के साथ ही क़्वारण्टीन किये गए लोगों के साथ किये जाने वाले व्यवहार पर भी ध्यान देना होगा। प्रधान, ग्राम पंचायत सदस्यों, ग्रामीण स्वास्थ कार्यकर्ताओं, चौकीदार और ग्राम विकास विभाग के कर्मचारियों को मिलकर गांवों में नज़र रखने के लिए स्थानीय स्तर पर समितियों का गठन किया जाना चाहिए जिससे वहां आने वाले मजदूरों को सही ढंग से १४ दिनों तक निगरानी में रखा जा सके और आम लोगों के दिलों में उठने वाले सवालों के भी सही तरह से जवाब दिए जा सकें. घर के किसी एक सदस्य को ही आवश्यक कार्यों से बाहर निकलने की सीमित अनुमति होनी चाहिए और उसको भी आम लोगों से दूर रहने की सही जानकारी दी जानी चाहिए। इस तरह से कुछ मौलिक सवालों के बारे में लोगों को सही उत्तर देकर इस समस्या से सही ढंग से निपटा जा सकता है और पूरे ग्रामीण परिवेश में करोनके संभावित संक्रमण को रोकने हेतु  प्रभावी कदम भी उठाये जा सकते है.  
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शुक्रवार, 15 मई 2020

लाचार मजदूर और त्वरित सहायता

                                                 देश के हर भाग से आती मजदूरों की मजबूरी भरी सच्चाई देखने के बाद भी क्या केंद्र और राज्य सरकारों के साथ स्थानीय प्रशासन की संवेदनाएं पूरी तरह से समाप्त हो गयी हैं कि उनके लिए इतने दिनों बाद भी कोई सुधारात्मक विकल्प तलाशा नहीं जा सका है ? क्या कारण है कि इन लाचार मजदूरों को अपने परिवार के साथ चिलचिलाती धुप में अपने घरों की तरफ निर्बाध रूप से जाने दिया जा रहा है जिस क्रम में कुछ की मार्ग दुर्घटनाओं और बीमारी के कारण दुखद मृत्यु भी हुई जा रही है फिर भी कहीं से शासन प्रशासन की संवेदनाएं जगती हुई नहीं दिखाई दे रही हैं ? क्यों हमारा तंत्र इतना अंधा और बहरा साबित हो रहा है जो करोड़ों प्रवासियों में से केवल कुछ लाख के बारे में प्रयास कर अपने कर्तव्य को पूरा मान कर बैठा हुआ है ? आखिर इन सब को किस बात की प्रतीक्षा है जिसके बाद इन मजदूरों के हालात पर सोचने का समय मिलने वाला है ?
                        इतने बड़े पलायन पर बेरुखी दिखाने वाली सरकारें किस तरह से चुनाव के समय इनके लिए कुछ भी करने की कसमें खाती रहती हैं पर आज जब इस भीड़ को अपने द्वारा चुने हुए नेताओं की अधिकांश बातें खोखली ही लग रही हैं तो वह कितने भी बड़े नेता की कोई भी बात मान कर उस पर अमल करने के लिए तैयार नहीं हो पाता है ? आज जिलों के अधिकारियों राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को सिर्फ इस बात पर सोचने की आवश्यकता है कि प्राथमिकता के आधार पर इन मजदूरों को यह आश्वासन दिलाया जा सके कि आप अब जहाँ पर भी हो वहीं पर रूककर स्थानीय प्रशासन की मदद कीजिये जिससे आप लोगों को समुचित व्यवस्था कर यात्रा के कष्टों को कम करने का प्रयास किया जा सके. परन्तु पिछले कुछ समय से देश के राजनैतिक नेतृत्व की सोच के चलते आज कोई भी उस पर यकीन नहीं करना चाहता वही इस गंभीर समस्या की जड़ है.
                       हर राज्य के पास पर्याप्त संख्या में राज्य परिवहन की बसें उपलब्ध हैं और आवश्यकता पड़ने पर निजी क्षेत्र की बसों को भी इस काम में लगाया जा सकता है. एक नीति के तहत सड़क पर चलने वाले लोगों को विभिन्न श्रेणियों में बाँट कर उनको दूरी के अनुसार घरों तक पहुँचाने का काम अविलम्ब शुरू किया जाना चाहिए। ५०० किमी के दायरे या राज्य परिवहन के क्षेत्र में आने वाले और अधिक दूरी के मजदूरों को बसों द्वारा भेजने की व्यवस्था की जानी चाहिए। जो इससे अधिक दूरी के लोग हैं उनको बसों द्वारा पास के बड़े शहरों पर पहुँचाया जाये और वहां से उनको अपने गृह जनपद तक जाने के लिए ट्रेन उपलब्ध कराई जाये। जब तक इस दिशा में समन्वित और एकीकृत प्रयास नहीं किए जायेंगे तब तक इन मजदूरों की पीड़ा को कम नहीं किया जा सकता है. इस बारे में केंद्र सरकार को राज्यों से अविलम्ब चर्चा करके ठोस समाधान करने की आवश्यकता है जिससे देश के इन कामगारों को इस विषम परिस्थिति में कम से कम सुरक्षित रूप से उनके घरों तक पहुँचाया जा सके.
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गुरुवार, 14 मई 2020

मजदूरों की घर वापसी का यथार्थ

                                         कोरोना संकट के चलते देश में मजदूरों को लेकर जिस तरह की अफरा तफरी दिखाई दे रही है क्या उससे कुछ बेहतर तरीके से निपटा जा सकता था आज यह सवाल हर किसी को अपने आप से ही पूछने की आवश्यकता है. देश की आज़ादी के बाद से पहली बार इतनी बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों में काम करने वाले मजदूर जिस तरह से देश के स्वर्णिम विकास की खोखली गाथा के साथ बनाये गए राष्ट्रीय राजमागों के हर हिस्से पर आत्मनिर्भरता दिखाते हुए अपने घरों की तरफ बढ़ते ही जा रहे हैं क्या उसे और अच्छी तरह से नहीं किया जा सकता था ? यहाँ सवाल केंद्र और राज्यों की सरकारों की आलोचनाओं का नहीं बल्कि उन गरीब लोगों का है जो सिर्फ बेहतर जीवन और खाने पीने लायक कमा लेने की जुगत में ही अपने घरों से सैकड़ों हज़ारों किमी दूर पहुँच गए थे. आखिर वे कौन से कारण थे जिनको केंद्र ने पूरी तरह अनदेखा किया और तीसरे लॉकडाउन के बाद इन मजदूरों ने अपने घरों की तरफ बिना कुछ विचारे ही कूच कर दिया ? विकसित देशों की कतार में खड़े होने का हमारा सपना किस तरह से चूर चूर होता दिखा आज इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है ?
                                         आज जब महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों में कोरोना ने अपना रूप दिखाना शुरू ही किया है तो उस परिस्थिति में इन प्रवासी मजदूरों को अनमने ढंग से कुछ रेलगाड़ियां चलाकर उनके राज्यों और सम्बंधित जिलों में भेजने की आधी अधूरी कोशिश की जा चुकी है वह भी अपने आप में बड़ा संकट बन सकती है. केंद्र सरकार ने इस मामले में बेहद हल्का रुख ही अपनाया क्योंकि यदि दो लॉक डाउन के बाद इन मजदूरों को घर भेजने की स्थिति सामने आ सकती थी तो इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने किस स्तर पर क्या प्रयास किये आज किसी को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. राज्यों में जिन जगहों पर ये मजदूर थे तो वे वहां पर किसी कम्पनी, ठेकेदार आदि के माध्यम से ही पहुंचे थे तो इन लोगों की शुरुवाती ४० दिनों में कोई सूची बनाने का कार्य भी आसानी से किया जा सकता था और सीमित संख्या में रेलगाड़ियां चलाकर इनको चरणबद्ध तरीके से इनके घरों तक भेजने की व्यवस्था आसानी से भी की जा सकती थी पर देश के निर्माण में लगे इन मजदूरों की गिनती आज कोई भी अपने लोगों में नहीं करना चाहता है जिससे इनके और भी दुर्दशा हो रही है.
                                           अब भी समय है कि सरकार देश के विभिन्न हिस्सों में खाली खड़ी रैक्स को बड़े शहरों के स्थान पर कुछ सौ किमी के दायरे में ही चलाकार इन के पैरों में पड़ने वाले छालों पर तरस खाये। क्या ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाला देश कुछ सौ करोड़ रूपये खर्च कर इन लोगों को आसानी से घरों तक सम्मानजनक रूप से भेजने की मूलभूत आवश्यकता को भी पूरा नहीं कर सकता ? यदि सरकार के पास आर्थिक तंगी है तो जनता इन ट्रेनों को चला सकती है केवल एक बार एक खाते का नंबर देने की आवश्यकता है और इन मजदूरों को घरों तक भेजने पर होने वाले खर्च के लिए आम लोग खुलकर मदद दे सकते हैं. भारत सरकार और रेल मंत्रालय को अविलम्ब यह उपाय करना चाहिए जिससे पूरे देश में गरीबों की इस मजबूरी और दुर्दशा को जल्दी से समाप्त किया जा सके.  
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गुरुवार, 30 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-5

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-4 से आगे........
                                               देश की सबसे पुरानी पार्टी जिसने देश की आज़ादी के लिए लम्बा संघर्ष किया और जिसने आज़ादी के बाद सबसे अधिक समय तक देश की सत्ता संभाली आज उसकी यह स्थिति आ गयी है कि दो लोकसभाओं में उसके पास नेता विरोधी दल का आधिकारिक पद भी नहीं बच रहा है तो उसको अपने पूरे संगठन से लगाकर शीर्ष स्तर पर नीतियां बनाने वाली हर समिति और उसमें शामिल रहने वाले नेताओं पर ध्यान देना ही होगा। यह सही है कि आम कांग्रेस कार्यकर्त्ता नेहरू-गाँधी परिवार को पार्टी में सबसे बड़ा मानता है पर क्या पार्टी में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय नेता इस बात पर कभी ध्यान देते हैं कि आखिर उनकी जनता पर कितनी पकड़ है? क्या पार्टी में बड़े पदों को संभाल रहे यह लोग जो लम्बे समय तक केंद्र और राज्यों में मंत्री भी रह चुके हैं आज भी अपने को पार्टी के हित में ज़मीन पर उतारने का साहस रखते हैं जिससे उन्हें बदलते भारत और जनता की समस्याओं का सही तरह से आंकलन करने में सहायता मिल सके? क्या सत्ता के आदी हो चुकें नेताओं के लिए पार्टी कोई बड़ी चुनौती देकर उन्हें क्षेत्र में भेजना भी चाहती है या ये सिर्फ दिल्ली में  पार्टी मुख्यालय में सजावटी चेहरे बनकर पार्टी के लिए संघर्ष करने से दूर भागने वालों की एक जमात खडी करना चाहती है ?
                                      इस बार पार्टी की हार को लेकर राहुल गांधी की तरफ से जो कड़ा कदम उठाया जा रहा है उससे कांग्रेस खुद ही सकते में है क्योंकि पार्टी के राहुल से इस्तीफ़ा मांगने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी और इस अप्रत्याशित कदम से पार्टी की समझ में नहीं आ रहा है कि वह क्या करे ? राहुल की दूसरी शर्त जो मात्र सूत्रों के माध्यम सामने सामने आ रही है कि उनके परिवार से इतर अध्यक्ष खोजने का काम पार्टी को करना है उससे भी पार्टी को इस अँधेरी सुरंग से बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है. संभवतः राहुल पद से दूर रहकर राजनीति में सक्रिय रहने को प्रयासरत हों या हो सकता है कि आने वाले समय में पार्टी की कमान दूसरों के हाथों सौंप वे खुद केवल अपने क्षेत्र की राजनीति पर ही ध्यान देना शुरू करें। अमेठी में उनकी हार से उनका संगठन पर गुस्सा जायज़ भी है क्योंकि पूरे देश में प्रचार करने के लिए व्यस्त होने के चलते उनके पास अपने क्षेत्र के लिए समय कम था पर पार्टी के संगठन द्वारा भी उनको जिस तरह से अँधेरे में रखा गया वह भी अपने आप में बड़ी बात है और पूरे देश में संगठन का यही हाल हुआ पड़ा है यहाँ तक कि जिन तीन राज्यों में नवम्बर १८ के बाद सत्ता मिली है वहां भी संगठन का काम सुस्त या रुका पड़ा है.
                                       कांग्रेस को अपने को फिर से खड़ा करने की कोशिशों कोशिशों में  सबसे पहले उन राज्यों पर नज़र डालनी होगी जहाँ शीर्ष नेतृत्व को गलत सलाह देने के कारण राज्य के मज़बूत नेतृत्व वाले नेताओं ने अपने क्षेत्रीय संगठन बना लिए और आज वे वहां पर कांग्रेस के मुक़ाबले अधिक स्वीकार्य हैं. वाईएसआर कांग्रेस, एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस के साथ पार्टी को सम्मानजनक तरह से उनकी राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए बात करनी चाहिए और उनके साथ किसी ऐसे समझौते पर पहुंचना चाहिए जिससे आने वाले समय में कांग्रेस की विचारधारा के पैरोकार ये दल भी कांग्रेस के सहयोगी बने न कि उसके प्रतिद्वंदी। यह भी निश्चित है कि आने वाले समय में कांग्रेस की विचारधारा से निकले ये दल यदि साथ आते हैं तो पार्टी के लिए मज़बूती का काम किया जा सकेगा।  कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व को अपने उन सलाहकारों से भी पीछा छुड़ाना होगा जिनके चलते ज़मीनी आधार वाले ये नेता अपनी उपेक्षा के चलते पार्टी से अलग हो गए . राहुल अध्यक्ष पद छोड़ते हैं या फिलहाल कार्यकारी अध्यक्ष बने रहते हैं यह सब तो भविष्य के गर्भ में है पर आज भी यदि राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले अपनी स्वीकार्यता साबित की है वह भी राहुल गाँधी ही हैं. यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला है कि वह किसे किस पद पर देखना चाहती है परन्तु यदि राहुल या आने वाले किसी अन्य अध्यक्ष को पार्टी में परिवर्तन करने से रोका जाता है तो अगली बार केरल में भी पार्टी अपनी स्थिति को खोने ही वाली है क्योंकि मोदी-शाह और संघ की प्राथमिकता पर पहले से ही केरल चल रहा है.                    
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बुधवार, 29 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-4

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-3 से आगे........

                                                                     आज जिस तरह से युवा पीढ़ी की ज़िंदगी में सोशल मीडिया का दखल हो गया है उसको देखते हुए अब कांग्रेस को अपने ज़मीनी संगठन को मज़बूत करने के प्रयासों के साथ ही अगले एक साल में हल ज़िले में सोशल मीडिया टीम का गठन करना चाहिए और उसके अगले साल में यह ब्लॉक और तहसील स्तर तक के कार्यकर्ताओं के लिए अपने बात कहने का मंच बनना चाहिए जिससे राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय मुद्दों के साथ पार्टी अपने कार्यकर्ताओं से सीधे संपर्क बनाये रख सके. आवश्यकता पड़ने पर सोशल मीडिया के माध्यम से उपयोगी जानकारी भी निचले स्तर तक पहुंचाई जा सकती है. इस बार के चुनाव में कांग्रेस के तीन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी के बाद ही मोदी सरकार ने किसान सम्मान निधि आम चुनाव से पहले देने का निर्णय किया जिसका लाभ भी उसे मिला पर कांग्रेस अपनी इस उपलब्धि को घोषणापत्र से आगे बढ़ाकर जनता तक नहीं पहुंचा पायी जिसे उसे नुकसान हुआ यदि पार्टी के पास सोशल मीडिया की संगठित टीम हो तो इस तरह की जानकारी को कार्यकर्ताओं के माध्यम से आम जनता तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है.
                                    सभी जानते हैं कि भाजपा की सोशल मीडिया टीम निरंतर कांग्रेस से जुड़े आज़ादी के प्रतीकों पर सुनियोजित हमले किया करती है ऐसी परिस्थिति में जब तक कांग्रेस के पास भी उन बातों के बारे में फैलाये जा रहे भ्रम को दूर करने का काम नहीं किया जायेगा तब तक भाजपा जनता में कांग्रेस की और भी नकारात्मक छवि गढ़ने में सफल होती रहेगी। प्रतिकार करने के लिए जब सभी तैयारियां पूरी हो जाएँ तो भी सोशल मीडिया टीम को भाजपा की तरह अनाप-शनाप बातें करने के स्थान पर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बात करनी होगी और भाषाई मर्यादा का सदैव ध्यान रखना होगा क्योंकि आज भाजपा के पास बहुत बड़ी टीम है जो तथ्यों की बात करने वालों पर अपने कुतर्कों से हमले करने के लिए सदैव तैयार रहती है इसलिए इस केंद्रीय टीम में कांग्रेस के इतिहास को जानने वाले लोग रखे जाएँ या जिन लोगों को यहाँ बैठाया जाये उनको पार्टी की तरफ से पार्टी और देश के इतिहास के साथ तथ्यात्मक जानकारी दी जाये जिससे वे परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठा सकें।
                                     आज संभवतः कुछ प्रदेशों में ही सोशल मीडिया टीम कुछ हद तक काम कर पा रही है क्योंकि यहाँ भी तथ्यों के बिना बात करने वाले लोग अपने आकाओं के आशीर्वाद से जमे बैठे हैं जिनसे पार्टी को किसी भी स्तर पर कोई लाभ नहीं मिलता है और सोशल मीडिया टीम केवल दिखावा बनकर ही रह जाती है. कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ी समस्या भाजपा से मुक़ाबला करना नहीं है बल्कि अपनी कमज़ोरियों से पार पाने की है क्योंकि आज पार्टी में जो शीर्ष नीति नियंता बने बैठे हैं उनका चुनावी राजनीति से कोई सीधा सरोकार नहीं है जिसके चलते उनको चुनाव लड़ने वाले नेताओं की उन समस्याओं का कोई अंदाज़ा भी नहीं है जिसका सामना उन्हें रोज़ ही करना पड़ता है. सबसे पहले कांग्रेस को उन राज्यों में अपने सगठन और सोशल मीडिया टीम को सुधारना चाहिए जहाँ अगले एक वर्ष में चुनाव होने वाले हैं. जनता केंद्रीय स्तर पर तो मोदी के साथ दिखाई देती है पर यदि सही राजनीति के साथ आगे बढ़ा जाए तो विधानसभाओं में वह कांग्रेस या अन्य दलों को भी समर्थन देती दिखाई देती है. कांग्रेस को तुरंत काम शुरू करते हुए इन राज्यों पर अधिक ध्यान देना ही होगा तभी वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का २०२४ में धरातल पर मुक़ाबला कर पाने की स्थिति में होगी.      
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मंगलवार, 28 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-3

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-2 से आगे
                                             शीर्ष स्तर पर कांग्रेस कार्यसमिति में जिस तरह से राहुल गांधी ने पार्टी की शर्मनाक पराजय के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानते हुए इस्तीफ़ा दिया और उसे नामंज़ूर कर दिया गया उसके बारे में भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. देश के महत्वपूर्ण राज्यों में दशकों से सत्ता से बाहर होने के बाद भी आज जिस तरह से सीमित संख्या में बचे हुए कांग्रेसियों में केवल पद पर बने रहने की लालसा है यदि इस पर पूरी तरह से विराम नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में पार्टी की और भी दुर्दशा होने वाली है. आज देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है तो उसकी तरफ से उन राज्यों में आमूल-चूल परिवर्तन करते हुए अब पुराने जमे हुए घाघ नेताओं को पदों से हटाकर नए नेतृत्व को समाने लाने की कोशिश की जानी चाहिए। वर्षों से पदों पर बैठे इन चंद बड़े नामों के कारण ही पार्टी आगे नहीं बढ़ पा रही है जिससे ज़मीनी स्तर पर उसका जुड़ाव आम लोगों से भी नहीं हो पा रहा है. आज भाजपा जहाँ मज़बूत है वह वहां भी अपने संगठन पर संघ के सहयोग से बराबर स्थितियों को और भी मज़बूत बनाने का काम करने में निरंतर लगी रहती है जबकि पिछले वर्ष तीन राज्यों में चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेस की राज्य इकाइयों की तरफ से ऐसे कदम नहीं उठाये जा रहे हैं जिससे उन राज्यों में ही कांग्रेस और मज़बूती के साथ नए लोगों तक अपनी पहुच बना सके.
                                               आज जब भाजपा मोदी और शाह की जोड़ी के निर्देशन और नेतृत्व में निरंतर सफलता के नए आयाम छूती जा रही है तो उस परिस्थिति में नए लोगों को कांग्रेस से जोड़ना और भी बड़ी चुनौती होने वाला है. यदि कांग्रेस को सम्पूर्ण देश की राजनीति में एक बार फिर से प्रासंगिक होना है तो उसे अपने सेवा दल, महिला कांग्रेस, युवा कांग्रेस, छात्र कांग्रेस को पूरी तरह से सक्रिय करना ही होगा जिससे समाज के हर वर्ग के लोगों की समस्याओं के साथ संघर्ष करने की उसकी पुरानी भावना को ज़िंदा किया जा सके. राजनैतिक रूप से निर्णय लेने और उनके परिणामों के अनुरूप नेताओं की ज़िम्मेदारी तय करने के लिए अब कांग्रेस को खुद को तैयार करना ही होगा वर्ना आने वाले चुनावों में उसकी पराजय एक स्थायी भाव भी बन सकती है जिससे आज जो भी समर्पित कार्यकर्त्ता पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं वे भी पार्टी से किनारा करते नज़र आने लगेंगे। पार्टी को अंदरूनी समस्याओं से निपटने के लिए एक व्यवस्था बनानी होगी क्योंकि जो धरातल पर मज़बूत नेता हैं उसकी बातों को सुना जाना बहुत आवश्यक है. २०१३ के बाद से ऐसे बहुत से नेता सामने आये जिन्होंने नेतृत्व की तरफ से उपेक्षा के चलते पार्टी से किनारा कर लिया और आज वे भाजपा में जाकर महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं. पार्टी को इस संकट को भी देखना होगा वर्ना गलत सलाहों पर लिए गए फैसलों से पार्टी का निरंतर नुकसान होता रहेगा।
                                             पार्टी में राहुल गांधी की लाख कोशिशों के बाद भी वह परिवर्तन नहीं आ पाया है जिसमें एक सामान्य कार्यकर्ता अपनी बात को पार्टी के मंच पर रखने के लिए कोई उपयुक्त मंच पा सकता हो जब तक ज़मीन से जुड़े नेताओं की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में पार्टी के बूथ मज़बूत नहीं हो सकते हैं. अगले कुछ वर्षों तक परिणामों की चिंता न करते हुए पार्टी को महत्वपूर्ण राज्यों में बदलाव को शुरू करना ही होगा यूपी जैसे राज्य में जहाँ से केंद्र की सत्ता के समीकरण बनते बिगड़ते हैं वहां राज्य का नेतृत्व किस तरह से काम करता है यह किसी से भी छिपा नहीं है. यदि  इसी तरह के सुविधाभोगी नेताओं के हाथों में पार्टी की कमान रहती है तो यूपी में पार्टी का अभी तक बचा हुआ ६% वोट भी छिटकने में देर नहीं लगने वाली है. जब देश की लगभग १५० सीटों यूपी-बिहार-बंगाल में पार्टी के पास कुछ बचा ही नहीं है तो उससे केंद्र में सत्ता पाने की आशा भी मृग मरीचिका से अधिक कुछ नहीं कही जा सकती है. राजनैतिक परिणामों में आज कांग्रेस निम्नतम स्तर पर पहुंची हुई है और यदि इस स्थिति में जल्दी ही बड़े बदलाव न किये गए तो आने वाले समय में पार्टी के कमज़ोर संगठन को पूरी तरह ध्वस्त होने में समय नहीं लगने वाला है.
क्रमशः .........                    
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रविवार, 26 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-2

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1 से आगे ........        
                                      सबसे पहले कांग्रेस को अपने संगठन के बारे में सोचना होगा क्योंकि आज अधिकांश जगहों पर संगठन की जो स्थिति बनी हुई है उसके दम पर भाजपा के मज़बूत संगठन और संघ के जमीनी समर्थन का सामना नहीं किया जा सकता है. विचार करने योग्य यह भी है कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के चुनावी क्षेत्रों में संगठन की हालत इतनी कमज़ोर क्यों है जबकि उनके नाम पर पार्टी पूरे देश में जनादेश मांगती है?  कांग्रेस और देश में राजनीति का एक दौर वह भी था जब नीचे से आगे बढ़ने वाले कार्यकर्ताओं के लिए चुनावी राजनीति में हिस्सा लेने के लिए एक प्रक्रिया हुआ करती थी पर पिछले कुछ दशकों से इन बातों पर ध्यान देना बिलकुल ही बंद कर दिया गया है जिससे पार्टी का निचले स्तर का संगठन भी विपक्षियों के कमज़ोर होने और अपने नेता के प्रभाव के दम पर ही चुनाव लड़ने की प्राथमिकता में लगा था जिससे उसका जनता के सरोकारों से कोई मतलब ही नहीं रह गया और युवा पीढ़ी ने अपने को इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में भाजपा के निकट पाया कर उसके लिए वोट भी किया। 
                                           इस मामले में यदि अमेठी को एक उदाहरण के तौर पर देखें तो वहां के संगठन को सदैव यही लगता रहता था कि यह पार्टी और गाँधी परिवार की सीट है इसलिए यहाँ उसे कोई खतरा नहीं है जिससे संगठन ने आम जनता से संवाद बनाये रखने को इतनी प्राथमिकता नहीं दी जितनी उसे मिलनी चाहिए थी. इसका परिणाम आज सबके सामने है क्योंकि कांग्रेस का संगठन वहां केवल राहुल के भरोसे ही रहा जबकि पिछली बार  १ लाख वोटों से हारने के बाद भी भाजपा ने स्मृति ईरानी के लिए खुलकर पूरे क्षेत्र में काम किया और इस बात का प्रचार भी किया कि गाँधी परिवार ने वहां के नागरिकों के लिए कुछ भी नहीं किया। आज की युवा पीढ़ी के लिए विकास की वही छवि बन रही है जो भाजपा बनाना चाह रही है क्योंकि कांग्रेस कहीं से भी इस बात का प्रतिकार करती हुई नहीं दिखाई दी कि राज्य में उसकी सरकार न होने के कारण केंद्र में सरकार होने पर भी वह क्षेत्र के लिए उतना काम नहीं कर पायी जितना राज्य में सरकार होने से संभव था. अमेठी में कांग्रेस की इस कमज़ोरी का भाजपा ने पूरा लाभ लिया और युवाओं की सोशल मीडिया में पैठ को देखते हुए राहुल गाँधी की नकारात्मक छवि बनाने में कोई कस्र भी नहीं छोड़ी। इस मामले कांग्रेस की हिचकिचाहट ने उसके लिए और भी अधिक समस्या खडी कर दी क्योंकि उसने पूर्व सांसद राम्या को सोशल मीडिया में सीमित काम करने को कहा जबकि उनके आने के बाद कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम कई जगहों पर भाजपा की टीम पर बढ़त बनाने में सफल होती दिखाई दे रही थी.
                                       आज यह सवाल भी प्रासंगिक है कि अमेठी ने इतने वर्षों तक कांग्रेस को जितना सम्मान दिया क्या संगठन के रूप में पार्टी ने वहां के लोगों से पूरा संपर्क बनाये रखा?  निश्चित तौर पर राहुल गांधी के पास मूर्छा में पड़ी हुई कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम था और है पर क्या अमेठी की कांग्रेस कमेटी उनसे यह आशा करती है कि वे स्वयं पूरे देश के मुक़ाबले अमेठी में अधिक समय देने का काम करें?  अगर कांग्रेस के पास बूथ लेवल के माध्यम से संगठन को खड़ा करने का कोई प्लान है तो उसकी परीक्षा अमेठी में ही करनी होगी।  कांग्रेस के बड़े नेताओं को इस बार भाजपा ने जिस तरह से घेरने में सफलता पायी थी अगली बार वह इस कड़ी में और भी अधिक मुखर होने वाली है क्योंकि रायबरेली से २०२४ में सोनिया गाँधी चुनाव लड़ेंगीं या  नहीं अभी तय नहीं है पर पिछले चुनावों से इस बार के चुनावों तक उनकी जीत का अंतर तीन लाख से घटकर एक लाख साठ हज़ार पर आ गया है और मेरा यह मानना है कि भाजपा का पूरा ध्यान अब रायबरेली पर ही होने वाला है और यदि कांग्रेस संगठन ने अमेठी की तरह लापरवाही की तो निश्चित तौर पर अगली बार रायबरेली में भी अमेठी की कहानी दोहराई जाने वाली है. क्रमशः ......          
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शनिवार, 25 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1

                                          देश में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों में जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के संयुक्त नेतृत्व में भाजपा ने अपनी सफलता के नए आयाम स्थापित किये हैं उनको देखते हुए आने वाले समय में भाजपा की रणनीति का ही पता चलता है जिसमें उसने आखिल भारतीय स्तर पर उसका मुक़ाबला करने की स्थिति में आ सकने वाली पार्टी कांग्रेस को परिणामों के अनुसार बहुत कमज़ोर स्थिति में पहुंचा दिया है. इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कांग्रेस को गंभीर आत्ममंथन करने और कमियों को वास्तव में खोजने पर ध्यान देना ही होगा वर्ना पहले से कमज़ोर हुई कांग्रेस के लिए भाजपा के नेता-द्वय और भी बड़े संकट उत्पन्न करने से नहीं चूकने वाले हैं. यह बात सभी जानते हैं कि आखिर भारतीय स्तर पर केवल कांग्रेस के पास ही किसी न किसी स्तर पर संगठन और कार्यकर्त्ता मौजूद हैं जो एक सुसंगठित भाजपा के सामने कहीं ठहरते तो नहीं हैं फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वे एक विकल्प भी साबित हो सकते हैं. परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से कांग्रेस ने अपने संघर्ष करने की इच्छा को ही समाप्त कर रखा है उसमें उसकी और भी दुर्दशा होने से वह नहीं बच सकती है. 
                                मोदी-शाह की जोड़ी इस बात को अच्छी तरह समझती है कि आने वाले समय में यदि भाजपा के लिए कोई चुनौती बन सकता है तो उसमें केवल कांग्रेस का ही नाम है इसलिए वे प्रतीकात्मक तौर पर सधी हुई रणनीति के चलते कांग्रेस का मनोबल तोड़ने का काम करने में लगे हुए हैं जिसका लाभ उन्हें मिलने भी लगा है. इस चुनाव में गंभीरता से देखा जाये तो भाजपा ने अपना पूरा ध्यान कांग्रेस के उन बड़े नेताओं की सीटों पर लगाया जो भविष्य में उनके लिए चुनौती बन सकते हैं इस कड़ी में राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, दीपेंदर हुडा, सुष्मिता देव जैसे उन नामों पर अधिक ध्यान दिया जिनको हराने से कांग्रेस के मनोबल को तोडा जा सकता था और जो युवा होने के साथ संसद और सड़क पर अपनी बातों का प्रभाव दूसरों पर डालने में सक्षम भी दिखाई देते हैं. इस चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी ने कांग्रेस की इस मज़बूती पर सुनियोजित तरीके से प्रहार किया जिसका परिणाम सामने दिखाई दे रहा है. जातीय समीकरणों को साधते हुए जिस तरह से इन स्थानों पर ज़मीनी कार्यकर्ताओं को मज़बूती दी गयी उसके जवाब में उन्होंने अपने वोटों को परिणाम में बदलने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी।
           यदि कांग्रेस को आने वाले समय में अपनी बची हुई राजनैतिक ज़मीन को बचाये रखना है तो उसे पूरे देश में आगामी विधानसभाओं के कार्यकालों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न राज्यों में अपने संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही होगा क्योंकि जनता के मुद्दों पर बिना संघर्ष किये राजनीति करने वाले नेताओं के दिन अब समाप्त होने को हैं. इस संकट से बचने के लिए कांग्रेस को एक बार फिर से सदैव हमलावर रहने के स्थान पर मुद्दों पर आधारित राजनीति के अनुसार काम करने की नीति अपनाने होगी। कांग्रेस नेतृत्व को विभिन्न राज्यों में अपने दिखावे के लिए बनाये गए पार्टी अध्यक्षों से अगले एक महीने में ही पीछा छुड़ाना होगा जिससे नए नेतृत्व के लिए रास्ते खोले जा सकें।  जनता के मुद्दों से जुड़ने और विभिन्न स्थानों पर सड़कों पर संघर्ष करने के बाद ही अब कांग्रेस की स्वीकार्यता जनता में बन सकती है. पार्टी को सबसे पहले यूपी बिहार और बंगाल पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि इन तीन महतवपूर्ण राज्यों में उसके पास कोई संगठन और मज़बूत नेता नहीं बचा है जो हर बात में बिना केंद्रीय नेतृत्व की तरफ देखे अपने स्तर से विभिन्न मुद्दों पर संघर्ष कर सके. लगभग १/३ लोकसभा सीटों पर अप्रासंगिक होकर कांग्रेस कभी भी भाजपा का सामना नहीं कर पायेगी क्योंकि इन राज्यों से ही भाजपा अपने को सत्ता के निकट पहुँचाने का काम करती हुई दिखाई देती है. क्रमशः ......                      
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सोमवार, 29 अप्रैल 2019

दिखावे की राजनीति

                                                        देश में जिस तरह से आम चुनावों या विधानसभाओं के चुनावों में विभिन्न दलों के प्रत्याशियों के पक्ष में सम्बंधित दलों के स्टार प्रचारकों की तरफ से रोड शो करने माहौल बनाये जाने का काम किया जाता है वह निश्चित रूप से उनका संवैधानिक अधिकार है पर पहले बड़े नेताओं की छुटपुट होने वाली बड़ी रैलियों के अलावा प्रत्याशी स्थानीय स्तर पर अपने प्रयासों से ही शांत वोटर्स को प्रभावित करने का काम किया करते थे. इधर कुछ चुनावों से रोड शो जैसा दिखावा सामने आने से इनकी चपेट में आने वाले क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन प्रभावित होने लगा है जिससे सभी राजनैतिक दलों के साथ चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन को भी इस बारे में विचार करने का समय आ गया है कि चुनाव के नाम पर आम नागरिकों को किसी भी तरह की अनावश्यक परेशानी का सामने न करना पड़े. इस बारे में केंद्रीय चुनाव आयोग को ही कुछ ठोस कदम उठाने के बारे में सोचना शुरू करना होगा क्योंकि अपने माहौल बनाने के भ्रम के चलते कोई भी राजनैतिक दल इसको रोकने की बात से सहमत नहीं होगा।
                            देश के उच्च सुरक्षा प्राप्त नेताओं के इस तरह से रोड शो करने से जहाँ सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ जाती है वहीं खुद इन बड़े नेताओं की सुरक्षा में गंभीर चूक हो जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है. इन नेताओं की चुनावी सभाओं में आम जनता का जो धन पानी की तरह बहाया जाता है वह संगठित रूप से किसी बड़े प्रोजेक्ट में डालकर उसकी गति बढ़ाने के काम भी आ सकता है पर देश के राजनैतिक दीवालियेपन के कारण इस दिशा में कोई सोचना भी नहीं चाहता है। यहाँ पर यह बात भी सामने आ सकती है कि देश के संविधान ने हर चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को अपने हिसाब से प्रचार करने की छूट दे रखी है पर साथ उसी संविधान ने देश के आम नागरिकों को भी अपनी स्वतंत्रता के साथ जीने की आज़ादी भी दे रखी है. नेताओं की इस तरह की दिखावे वाली राजनीति के चलते अब यह कौन तय करेगा कि यहाँ पर नेताओं और आम जनता के अधिकारों की रक्षा किस तरह से की जा सकती है?
                          इस बारे में सबसे सही यही रहेगा कि सभी दल मिलकर इस बारे में सोचें क्योंकि कई बार नेताओं के इस तरह से प्रचार करने के समय आम यातायात न चाहते हुए भी बाधित हो जाता है जिससे आवश्यक कार्य से आने जाने आम लोगों के साथ अति आवश्यक कार्यों में लगे हुए पुलिस, प्रशासन, फायर और एम्बुलेंस के लिए बहुत बड़ी समस्या खडी हो जाती है. क्या कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता है कि जिसमें नेताओं को समुचित रूप से अपने प्रचार को करने की छूट भी मिल जाये और आमलोगों को किसी भी परेशानी का सामना न करना पड़े ? क्या रोड शो को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए या फिर इसमें शामिल वाहनों और लोगों की संख्या को उसके मार्ग के अनुरूप सीमित रखने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे नेताओं को भी कानून के अनुरूप कार्य करने की आदत पड़ सके. इस बात को उन लोगों के बारे में सोचते हुए भी आगे बढ़ाना चाहिए जिन पर इस तरह के दिखावे का सबसे ज़्यादा असर पड़ता है क्योंकि जब तक पीड़ितों के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा जायेगा तब तक इसका कोई सही हल नहीं निकाला जा सकेगा।      

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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

२०१९ की राजनीति का घमासान

                                        चुनावी वर्ष होने के कारण इस बार लम्बे समय बाद पूर्ण बहुमत की सरकार का नेतृत्व कर रहे पीएम मोदी के सामने सबसे गंभीर संकट यह है कि अपनी घोषित लोकप्रियता को वे किस हद तक आगामी चुनावों में भुनाने में सफल हो पाएंगे? जिस तरह से राफेल मामले को लेकर वे खुद निशाने पर हैं और उन्होंने जो भी सोचकर शीर्ष स्तर पर निर्णय लिया हो पर भारत के हिसाब से उसमें कई कमियां दिखाई दे रही हैं जिनको लेकर खुद वे और उनकी सरकार सहज नहीं हो पा रही है. इस बीच में पुलवामा हमले और उसके बाद बालाकोट प्रतिक्रिया से स्थिति अवश्य ही कुछ उनकी तरफ झुकती हुई दिखाई दे रही है फिर भी मामले को उतना आसान नहीं समझा जा सकता है जितना वह लग रहा है? संभवतः इसी कारण से आज पीएम मोदी समेत भाजपा का हर छोटा बड़ा नेता केवल बालाकोट निर्णय की बात करना चाह रहा है और वे जानबूझकर पूरे विमर्श को उस दिशा में ले जाने का काम करने में लगे हुए हैं जिससे विपक्षी दलों को को उनके सवालों में उलझने देने की नीति अपनायी जा रही है.
                     नि:संदेह पीएम मोदी सामने बैठे लोगों से बेहतर संवाद बनाने में माहिर हैं पर सिर्फ उनके स्तर से किया जा रहे प्रयासों को पूरा नहीं माना जा सकता है इसलिए कांग्रेस के किसी भी नेता के पुलवामा या बालाकोट से जुड़े हर बयान को जनता के सामने इस तरह से पेश किया जा रहा है जैसे खुद राहुल गांधी के निर्देश पर यह सब चल रहा है. भाजपा और पीएम मोदी कुछ भी कहें पर पुलवामा पर राजनीति न करने के विपक्षी दलों के बयान और सरकार को पूर्ण समर्थन देने के बाद भी जिस तरह से खुद पीएम मोदी और अमित शाह की तरफ से इस मसले को लेकर राजनीति की जाती रही है उसके बाद विपक्षियों कोई तरफ से सवाल उठने ही थे?  असल में मोदी सरकार अपने काम के दम पर दोबारा सत्ता के नज़दीक पहुँच नहीं पा रही है इसलिए उसे देशभक्ति और उग्र राष्ट्रवाद दो ऐसे मसले महत्वपूर्ण लग रहे हैं जिन पर सवार होकर वह अपनी चुनावी संभावनाओं को सरल बनाकर अपने पक्ष में मोड़ने का काम आसानी से कर सकती है.
                        पीएम मोदी कितने भी अच्छे वक्त क्यों न हों पर इस मामले में वे अपने बनाये जाल में खुद ही उलझे नज़र आ रहे हैं क्योंकि उनके उकसाने की भरपूर कोशिशों के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और अन्य विपक्षी दलों की तरफ से सधी हुई गंभीर प्रतिक्रियाएं ही सामने आ रही हैं जिससे भाजपा को उन पर हमला करने का उतना अच्छा अवसर नहीं मिल रहा है. भले ही शुरुवाती हमलों में कांग्रेस ने अपने को सीमित किया है पर भाजपा की तरफ से अपने समर्थक टीवी चॅनेल्स में बैठे एंकर्स के माध्यम से जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है वह खुद उसके खिलाफ भी काम कर सकता है क्योंकि जनता के लिए कुछ मुद्दे अधिक संवेदनशील होते हैं और उनसे निपटने में कोई भी चूक किसी भी दल के लिए आत्मघाती हो सकती है. बालाकोट पर जिस तरह से सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए थी वह उसमें पूरी तरह से चुकी हुई और केवल अपने वोट बढ़ाने की राजनीति में ही व्यस्त दिखाई दी है इस पूरी परिस्थिति में अभी तक विपक्षी दलों की तरफ से जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उससे लगता तो यही है कि वे मोदी और भाजपा के इस जाल से दूर रहने की प्रक्रिया को समझ चुके हैं और अपने अनुसार आगे बढ़ रहे हैं.

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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अस्पष्ट जनादेश और नैतिकता

                                                               आज़ादी के बाद काफी समय तक देश की जनता ने केवल कांग्रेस को सत्ता देने को अपनी प्राथमिकता में रखा उसके बाद एक समय ऐसा भी आया जब संविधान के अनुरूप किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत का अभाव दिखाई देने लगा जिसके बाद गठबंधन और अल्पमत की सरकारों का दौर भी आया जिससे कई बार मध्यावधि चुनावों की स्थिति आयी जिसमें भी स्पष्ट बहुमत दूर की कौड़ी ही साबित हुआ. इस पूरी परिस्थिति के बारे में संभवतः संविधान में विचार किया गया था और साझा सरकारों की परिकल्पना भी की गयी होगी पर निर्णय लेने और जनहित में काम करने के लिए स्पष्ट बहुमत वाली सरकारों के हाथ सदैव खुले रहते हैं इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. केंद्रीय स्तर से लगाकर राज्यों तक में जिस तरह से मामूली या अस्पष्ट जनादेश दिखाई देना शुरू हुआ है उसके चलते क्या कोई और मार्ग नहीं सोचा जाना चाहिए जिससे फिर से चुनावों में जाने से पहले एक और विकल्प उपलब्ध कराया जा सके ?
                                  कर्णाटक से एक बार फिर से सत्ता पलट की खबरें आना शुरू हो चुकी हैं तो उस परिस्थिति में आखिर किसी के पास क्या विकल्प बचता है कि किस तरह से संवैधानिक रूप को बनाये रखते हुए सत्ता को चलाया जाये ? देश के प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा द्वारा भी समय समय पर संविधान प्रदत्त अधिकारों का जमकर दुरूपयोग किया जाता रहा है जिनके हाथों में अधिकांश समय तक देश की बागडोर रही है. आज इनमें से कोई दल अपनी सरकार के गिरने या बनने को अपनी परिस्थिति के अनुसार इसे लोकतंत्र की हत्या या लोकतंत्र की जीत बताने में कोई शर्म महसूस नहीं करते हैं. ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए जिससे देश का लोकतंत्र मज़बूत हो और जनता की अपेक्षा के अनुरूप सरकार चलाने की व्यवस्था भी की जा सके ? क्या ये दोनों दल कभी इस तरह की किसी सम्भावना पर विचार कर कोई स्पष्ट नीति बनांने के बारे में सोचेंगें या इसी तरह से अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए कुछ भी करने की तरफ बढ़ते चले जायेंगें ?
                               क्या यह संभव नहीं है कि किसी एक दल द्वारा बहुमत साबित न कर पाने की स्थिति में सभी दलों द्वारा जीती गयी सीटों के अनुपात में उन्हें सबसे बड़े दल को सीएम और मंत्रिमंडल में उपयुक्त स्थान देते हुए देश या राज्य की स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया जाए और अगले चुनावों तक उस पर अमल किया जाये ? हालाँकि भारत की राजनैतिक परिस्थितियों में इस तरह का कोई भी कार्य किया जाना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि सभी दलों की प्राथमिकताएं समग्र विकास के स्थान पर केवल अपने वोटबैंक को मज़बूत करने तक ही सीमित हैं. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा जिस जीएसटी और एफडीआई का खुलकर विरोध किया करती थी सत्ता में आने पर वह उसकी सबसे बड़ी पैरोकार दिखाई देने लगी जिससे दलीय राजनीति के चलते देश के आर्थिक सुधारों को लागू करने में अनावश्यक रुप से विलम्ब हुआ और चिंता की बात यह है कि हम देशवासी इसके लिए किसी को भी उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते हैं ? नीतियों पर राष्ट्रीय सहमति के साथ आगे बढ़ने की मानसिकता जब तक हमारे सभी दलों और राजनैतिक नेताओं में नहीं आएगी तब तक उनकी राजनैतिक अपेक्षाओं की प्रतिपूर्ति करने के लिए जनता के हितों का बलिदान किया जाता रहेगा।   
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शनिवार, 12 जनवरी 2019

सीबीआई विवाद और न्याय

                                   आज सिर्फ अपनी साख बचाने के लिए जिस तरह से मोदी सरकार ने सीबीआई वाले मामले में अनावश्यक दखलंदाज़ी की इससे यही पता चलता है कि इस सरकार के लिए संस्थाओं की साख कोई मायने नहीं रखती है क्योंकि जब सीबीआई का झगड़ा सतह पर आकर पूरे देश के लिए चिंता का विषय बना हुआ है उस समय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी किनारे करते हुए सरकार द्वारा एक दिन पहले ही पद पर पुनर्स्थापित किए गए अलोक वर्मा को इस तरह से हटाना किस संकेत की तरफ ले जाता है ? आज जो भी समस्या है उसके लिए कहीं न कहीं सरकार के स्तर पर बरती गयी हद दर्ज़े की लापरवाही भी है जिसके चलते पूरे देश के सामने सरकार अपने तोते की गर्दन उमेठती हुई दिखाई दे रही है और अपने साथ देश के सर्वोच्च संस्थाओं की गरिमा को भी धूल में मिलाने में लगी हुई है जिसका दूरगामी परिणाम आने वाले समय में दिखाई देने वाला है क्योंकि अभी तक मोदी से सहमत लोग भी इस मामले में वर्मा के साथ हुए अन्याय को स्वीकार करने लगे हैं.
                     अस्थाना की शिकायत पर जस्टिस पटनायक की सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट में आलोक वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को किसी भी स्तर पर सही नहीं पाया गया है और इस बात के बारे में खुद जस्टिस पटनायक ने इंडियन एक्सप्रेस से जो कुछ कहा है वह अपने आप में चिंताजनक ही लगता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पद पर स्थापित किये गए आलोक वर्मा की बात सुने बिना ही उनको एकतरफा तरीके से पद से हटा दिया गया अब मोदी सरकार इस निर्णय को किस तरह से सही ठहरा पायेगी यह देखने की बात होगी। हो सकता है कि आलोक वर्मा की तरफ से सेवा के दौरान कुछ अनियमितताएं भी की गई हों पर उनका पक्ष सुने बिना ही इस तरह से निर्णय करना क्या सरकार और चयन समिति के हल्केपन को नहीं दिखाता है ? यह अधिक चिंतनीय इसलिए भी हो जाता है कि इस समिति में सुप्रीम कोर्ट का प्रतिनिधित्व भी था जिसके बाद भी बिना पक्ष सुने इस तरह का निर्णय किया गया।
                     संवैधानिक मामलों के जानकारों के साथ विपक्ष भी मोदी सरकार पर देश के संवैधानिक ढांचे परम्पराओं और मूल्यों से खिलवाड़ करने के आरोप २०१४ से लगा रहे हैं फिर भी मोदी सरकार इन सारे आरोपों की अनदेखी करती चली आयी है और अब इस मामले को कांग्रेस द्वारा जिस तरह से राफेल खरीद से जोड़ना शुरू कर दिया गया है उसको देखते हुए आने वाले समय में मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ने ही वाली हैं. अच्छा होता कि एक बार में निर्णय लेने के स्थान पर अलोक वर्मा को भी अपना पक्ष समिति के सामने भी रखने का मौका दिया जाता और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाता पर सरकार की हड़बड़ी ने पूरे माहौल में संदेह पैदा करने की गुंजाइश छोड़ दी है. कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने समिति के निर्णय से असहमति जताकर यह सन्देश देने में भी सफलता पाई है कि इस मामले का राफेल खरीद से जुड़ाव हो सकता है और आगामी चुनावों में यह कांग्रेस के लिए एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाने वाला है.       
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शनिवार, 5 जनवरी 2019

बेरोजगारी भत्ता या श्रम सृजन

                                               देश में भले ही आगामी लोकसभा की चुनावी महाभारत से पहले कांग्रेस के तीन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी की घोषणा से स्थितियां कुछ हद तक उसके पक्ष में हुई हो पर उससे किसानों की दशा पूरी तरह सुधारी नहीं जा सकती है ठीक उसी तरह से आज देश के युवाओं के सामने जिस तरह से रोजगार का संकट आ गया है उससे निपटने के लिए भी कांग्रेस ने अस्थायी रूप से युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही है. किसी भी परिस्थिति में युवाओं के ऊर्जावान हाथों में काम हो इससे किसी भी राजनैतिक दल को इंकार नहीं है पर चिंता की बात यह है कि यह सब केवल चुनावों में ही सामने आता है और जब सरकारें बन जाती हैं तो इन समस्याओं को ठन्डे बस्ते में डालने का काम शुरू कर दिया जाता है. आज भारत के पास युवाओं की बड़ी संख्या मौजूद है जिसमें कुशल कामगारों और वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकता के अनुसार रोजगार होने पर उनके लिए उचित मानव संसाधन के रूप में विकसित करने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे हैं. इस नीतिगत उपेक्षा के चलते आज युवाओं में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है जिसका दुष्प्रभाव किसी भी सत्ताधारी दल के लिए घातक हो सकता है.
                     आखिर क्या कारण है कि सरकारें और राजनैतिक दल इस दिशा में सार्थक पहल करने में कहीं बहुत पीछे दिखाई देते हैं और युवाओं की समस्या वहीं पर रह जाती है ? यदि युवाओं को उनके अनुसार बेरोजगारी भत्ता देने की कोई मंशा कांग्रेस की है तो उसे इसके लिए ठोस प्रारूप तैयार करना चाहिए जिसमें युवाओं की रूचि के अनुरूप और विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए आवश्यक मानव संसाधन के स्थानीय विकास की नीति बनानी चाहिए. यह सही है कि कोई भी सरकार सभी को रोजगार नहीं दे सकती है पर यह भी उतना ही सही है कि सरकार युवाओं को समर्थन तो दे ही सकती है जिससे वे अपने खर्चों के लिए परिवार पर कम आश्रित रहे. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आवश्यकता के अनुरूप कौशल विकास योजना जैसे कार्यक्रम से सीमित संख्या में युवाओं को विभिन्न कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जिससे वे अपने आसपास ही कुछ दिनों के लिए रोजगार पाने में सफल हो सकें। इसके लिए मनरेगा का उदाहरण लिया जा सकता है जिसके माध्यम से ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को उस समय भी गतिमान रखने में सफलता मिली थी जब पूरी दुनिया आर्थिक संकट में उलझी हुई थी.
                      इस नीति में डाक, बैंक, रोडवेज, यातायात, नगर विकास, स्वच्छता आदि क्षेत्रों में काम करने के लिए युवाओं को कुशल बनाया जा सकता है. मान लीजिये कि सरकार किसी स्थान के ५० युवाओं का चयन बेरोजगारी भत्ते के लिए करती है तो उनको ३००० रूपये प्रति मास देने के एवज में उनसे विभिन्न विभागों के सहयोगियों के रूप में कम से कम १० दिन काम भी लिया जाना चाहिए जिससे वे उस क्षेत्र की बारीकियों को समझ सकेंगे और सरकार के विभिन्न विभागों को भी स्थानीय स्तर पर काम करने वाले युवा उपलब्ध हो जायेंगें. इससे जहाँ समाज में कार्यकुशलता बढ़ेगी वहीं स्थानीय प्रशासन के पास अधिक सख्या में सहयोगी भी उपलब्ध हो जायेंगें। इस योजना के अंतर्गत काम करने वाले युवाओं के सामने सम्मान से जीने के रास्ते भी खुल सकेंगें और वे भी भत्ते के एवज में देश के लिए अपने कुछ दिन लगाकर ख़ुशी महसूस करेंगें। पहले प्रशिक्षण और फिर काम करने की बाध्यता होने से जहाँ इसमें भ्रष्टाचार की संभावनाएं खुद ही कम हो जाएँगी वहीं युवाओं को भी सही दिशा में आगे बढ़ाने में सफलता मिल सकेगी। पर देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश सरकारें केवल तात्कालिक चुनावी लाभों को देखते हुए ही निर्णय लेती हैं जिससे समाज को उसका वह लाभ नहीं मिल पाता जो एक सुनियोजित नीति के माध्यम से मिल सकता है.         
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सोमवार, 31 दिसंबर 2018

लोकतंत्र से भीड़तंत्र तक

                              पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न कारणों से इकठ्ठा हुई भीड़ द्वारा जिस तरह से किसी को भी दोषी बताकर मौके पर ही क़ानून हाथ में लेते हुए फैसले लेने की बढ़ती हुई प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है वह निश्चित तौर पर किसी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं हो सकता है. पहले डायन के नाम पर फिर बच्चे चुराने वाले के नाम पर फिर धर्म के नाम पर फिर गाय के नाम पर और अब केवल मनमानी के नाम पर जिस तरह से देश के सामने नयी तरह की समस्या आ रही है उससे यदि समय रहते बचने और निपटने की राह नहीं निकाली गयी तो आने वाले समय में हम एक हिंसक समाज से अधिक कुछ भी नहीं बनने वाले हैं ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते किसी समस्या कोलेकर इकठ्ठा हुए कुछ सैकड़ा लोग किसी अन्य इंसान की हत्या करने से भी नहीं चूकते हैं जबकि उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी होता है कि मामला आगे बढ़ने पर उनके व उनके परिवार के लिए बड़े स्तर पर मुश्किलें खडी हो सकती हैं ?
                              निश्चित तौर पर पिछले कुछ वर्षों में बदले राजनैतिक विमर्श और विचारधारा विशेष से असहमत होने वाले किसी भी व्यक्ति से इस तरह से निपट लेने की जो प्रवृत्ति सामने आ रही है उसके पीछे उन विचारधाराओं का भी हाथ है जो इस तरह की सामूहिक अराजकता में भी अपने लिए राजनैतिक अवसरों को खोजकर उनका लाभ उठाने से नहीं चूकती हैं. क्या आज जिस तरह से कुछ लोगों द्वारा अपना जनाधार मज़बूत किये जाने के लिए किये जाने वाले इस तरह के कामों को करने में जुटे हुए हैं तो उनको सही कहा जा सकता है ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते हमारे राजनेता भी जनता से जुड़कर काम करने और उनकी समस्याओं में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करके उन्हें दूर करने के स्थान पर विद्वेष पैदा करके अपने हितों को साधने में लगे हुए हैं ? इस मामले में लगभग सभी दलों की स्थिति एक जैसी ही कही जा सकती हैं पर आज यह प्रवृत्ति जितने बड़े पैमाने पर शुरू हो रही है वह चिंता का विषय है क्योंकि इस अराजक भीड़ ने अब कानून के रखवालों पर भी हाथ साफ़ करना शुरू कर दिया है जिससे आने वाले समय में कोई भी सुरक्षित नहीं रहने वाला है.
                          भीड़ की हिंसा के लाभ उठाने के चक्कर में जिस तरह से राजनेताओं की तरफ से भी केवल आवश्यकतानुसार बयान दिए जाते हैं और उनमें से कई बयान तो इतने शर्मनाक होते हैं कि उनका ज़िक्र करना भी उचित नहीं है फिर सुधार की गुंजाईश कहाँ बचती है ? आज तक जो प्रश्न जनता के सामने थे वे पुलिस और प्रशासन के सामने आ चुके हैं और स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि किसी दिन किसी नेता के भीड़ में फँस जाने पर उनकी हत्या की आशंका से भी नकारा नहीं जा सकता है ? इतना सब देखने के बाद भी यदि सिर्फ तात्कालिक लाभों के लिए देश की युवा पीढ़ी के मन में नफरत की दीवारों को ऊंचा कर वैमनस्यता  की खाई को केवल गहरा करने में ही कुछ लोगों को अपना लाभ दिखाई दे रहा है तो अब आम भारतीय के जागने का समय आ चुका है क्योंकि यदि हमारे बच्चे इसी तरह से अराजक माहौल का हिस्सा बनते रहे तो किसी दिन वे या तो किसी भीड़ का शिकार हो सकते हैं या खुद भीड़ में शिकारी की भूमिका में भी दिखाई दे सकते हैं जिससे अंत में हमारे परिवार, समाज और राष्ट्र को ही नुकसान होने वाला है.           

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बुधवार, 26 दिसंबर 2018

औद्योगिक विकास की चुनौतियाँ

                                               छत्तीसगढ़ की नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार ने चुनाव में किये गए अपने वायदे को पूरा करते हुए बस्तर संभाग में लगने वाले टाटा स्टील प्लांट को आवंटित की गयी १७०० एकड़ जमीन कम्पनी से वापस लेकर किसानों को वापस करने के लिए आदेश जारी कर दिया है जिसके बाद स्थानीय किसानों में तो हर्ष का माहौल है पर इससे राज्य में औद्योगिक विकास को बड़ा झटका लगने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. यह भी सही है कि इस मामले में टाटा समूह द्वारा भूमि आवंटन के नियमों के अनुरूप प्लांट लगाने का काम आगे नहीं बढ़ाया गया जिससे स्थानीय लोगों में रोष भी था जिसे समझते हुए कांग्रेस ने वहां पर इसे एक मुद्दा बना लिया और जनता में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए आवंटन को रद्द भी कर दिया है. इस मामले में कहीं न कहीं कुछ ऐसी कमी अवश्य ही रही होगी जिससे टाटा जैसा समूह भी अपनी कही गयी बातों को पूरा नहीं पाया।
                                    भूपेश बघेल सरकार ने किसानों की मांग और समस्या को देखते हुए अपने वायदे को पूरा किया उसे गलत नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से यह पूरा मामला बिगड़ा अब उस पर  विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि खनिज सम्पदा से भरपूर राज्य से पूरे देश और दुनिया के औद्यौगिक समूहों में यह सन्देश भी नहीं जाना चाहिए कि यह सरकार पूरी तरह से उद्योगों की विरोधी है ? टाटा समूह के सामने आखिर वे कौन सी परिथितियाँ उत्पन्न हुईं जिसके चलते इस प्लांट का काम आगे नहीं बढ़ सका भूपेश सरकार को इस बारे में भी गंभीर विचार कर नीतियों के निर्धारण में उद्योगों का भी ख्याल रखना होगा जिससे आने वाले समय में राज्य के औद्यौगिक माहौल को सुधारा जा सके. रमन सरकार की तरफ से आखिर किन स्तरों पर क्या चूक हुई जिससे यह प्लांट मूर्त रूप नहीं ले सका और सरकार के पास क्या विकल्प थे जिसके चलते वह नियमों में सुधार कर टाटा समूह और किसानों के बीच समन्वय स्थापित कर सकती थी ?
                                  बंगाल के बाद टाटा को संभवतः दूसरी बार इस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा जब वह अपनी योजना को मूर्त रूप देने में खुद को असमर्थ पा रहा होगा ? आज टाटा समूह ही नहीं बल्कि सभी औद्यौगिक समूहों के साथ केंद्र तथा राज्य सरकारों को बेहतर समन्वय करने की आवश्यकता है जिससे आने वाले समय में कोई भी परियोजना इस तरह से बीच में न लटक जाये। चिंता की बात यह भी है कि औद्यौगिक माहौल सुधारने की बातें करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में भी इस समस्या का सही हल नहीं खोजा जा सका ? यदि समय रहते केंद्र सरकार का दखल होता या रमन सरकार खुद ही केंद्र की सहायता मांगती तो संभवतः किसानों के आंदोलन से टाटा समूह को दिक्कत न होती और मामला इतना बिगड़ने भी नहीं पाता। बात यहाँ पर किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए समग्र औद्यौगिक विकास की संभावनाएं बढाने की है जिसमें रमन सरकार पूरी तरह से चूक गयी थी पर मामले को अतिवादी होकर एकतरफा निपटने से भूपेश सरकार भी राज्य और देश का भला नहीं कर पायेगी। इसलिए राजनैतिक कारणों को दूर रखते हुए अब राज्य सरकार को नीतियों की कमियों पर ध्यान देकर उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।       
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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

राज्यों की स्थानीय नौकरियां

                                                               एमपी के सीएम कमलनाथ ने जिस तरह से राज्य में लगाए जाने वाले नए उद्योगों के लिए विभिन्न स्तरों पर छूट पाने के लिए राज्य के स्थानीय नागरिकों की शर्त लगायी है वह अपने आप में सम्पूर्ण देश के कानून और परिस्थितियों को देखते हुए सही नहीं कही जा सकती है पर विभिन्न राज्यों में इस तरह की नीति पहले सही चल रही है और आने वाले समय में इसके राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों के चलते अन्य राज्यों द्वारा भी इस तरह का मॉडल अपनाये जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस मामले में पहल करने और दूसरे राज्यों के लोगों को अक्सर निशाने पर लेने वाले महाराष्ट्र में  १९६८ से ही इस तरह की नीति लागू है जिसमें स्थानीय लोगों के लिए ८०% नौकरियों को आरक्षित किया गया था और आज भी स्थानीय दबाव के चलते प्रवासी कामगारों को नियमानुसार होने के बाद भी नौकरियों से बिना कारण बताये निकाला भी जाता है. इस मामले में तेलंगाना के कानून सबसे कड़े हैं क्योंकि वहां दूसरे राज्य के ही नहीं बल्कि राज्य के अंदर के लोग भी दूसरे क्षेत्र में नौकरी नहीं पा सकते हैं. हिमाचल, कर्णाटक ओडिशा में भी कम वेतन वाली नौकरियों को इसी तरह से स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित किया गया है।
                          ऐसी स्थिति का स्थानीय लोगों के लिए कुछ लाभ भी होता है पर उद्योगों के लिए दूसरे तरह की समस्याएं सामने आ जाती हैं जिसके चलते उनको प्रतिस्पर्धा पर सस्ता श्रम नहीं मिल पाता है और स्थानीय लोगों की अधिकता के कारण अनावश्यक श्रमिक राजनीति होने से उत्पादन आदि पर भी दुष्प्रभाव पड़ने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं. इस मामले को दूसरी तरह से देखने की आवश्यकता है जिससे उद्योगों के उत्पादन और उनके स्थापित होने की संख्या पर असर न पड़े साथ ही स्थानीय नागरिकों को भी अपने आस पास श्रम उपलब्ध हो जाये. आज वैसे भी नोटबंदी के बाद जिस तरह से निचले स्तर पर काम करने वाले श्रमिकों का अपने राज्यों में उल्टा पलायन हुआ है उससे भी समस्याएं नए स्तर पर सामने आ रही हैं. ऐसी परिस्थिति में केंद्र मनरेगा के धन आवंटन को बढ़ाकर स्थानीय स्तर पर श्रम दिवस बढ़ाये जाने का प्रयास कर सकती है जिसमें उसे राज्यों के भरपूर सहयोग की आवश्यकता पड़ने वाली है.
                         कौशल विकास योजना अपने आप में जितनी अनूठी थी उसे उतनी ही मक्कारी से भ्रष्ट तंत्र में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है क्योंकि जिस तरह से बिना सुविधाओं के लोगों ने ऐसे केंद्र खोले और सरकार से प्राप्त अनुदान में बंदरबांट की वह किसी से भी छिपी नहीं है जिससे सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना जो हर स्तर पर नागरिकों के जीवन यापन में सहयोग कर सकती थी केवल भ्रष्टाचार का स्तम्भ बनकर ही रह गयी है. यदि इसको योजना को छोटे स्तर पर चलाकर उसकी प्रगति देखी जाती साथ ही बहुत बड़ी संख्या में केंद्र खोलने के स्थान पर उनमें दी जाने वाली ट्रेनिंग की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता तो आने वाले समय में उद्योगों के लिए आवश्यकतानुसार स्थानीय श्रम भी उपलब्ध हो जाता। अब भी समय है कि स्थानीय स्तर पर पनप सकने वाले उद्योगों की पहचान कर उनके अनुरूप कार्य शुरू किया  भविष्य के लिए ऐसी समस्या से निपटा जा सके. यदि स्थानीय नागरिकों को अपने आस पास ही अच्छी सुविधा से युक्त रोज़गार मिल जायेगा तो कोई भी अपने पैतृक शहर को छोड़कर कहीं और जाने की बातें भी नहीं सोचेगा।
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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

कमलनाथ की पारी

                                                   एमपी में सत्ता सँभालने के साथ ही अपने पहले आदेश में सीएम कमलनाथ ने २ लाख रुपयों तक के कृषि ऋण के बारे में जो फैसला लिया है वह कांग्रेस के वचन पत्र के अनुरूप ही है पर इसके सही ढंग से क्रियान्वयन के लिए अब पूरा दबाव सीएम कमलनाथ पर ही आने वाला है क्योंकि कई राज्यों ने इस तरह की क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा की पर बाद में आंकड़ों की बाज़ीगरी से अधिकारियों ने किसानों का बहुत कम ऋण ही माफ़ होने दिया. कमलनाथ को जनता की समस्याओं के बारे में अच्छे से पता है और वे सरकारी मशीनरी से अच्छे से काम लेना भी जानते हैं तो उनके लिए इस दिशा में आगे बढ़ने में कठिनाइयां कम होने की संभावनाएं भी हैं. फिर भी इस काम के लिए यदि एक राज्यमंत्री की अलग से नियुक्ति कर दी जाये तो संभवतः इस निर्णय को सही तरीके से लागू किया जा सकेगा।  ऋण माफ़ी का कार्य पूरा होने के बाद उस राज्यमंत्री को अलग से किसी विभाग में स्थानांतरित किया जा सकता है। इस कार्य में सही और लाभार्थियों की सूची बनाये जाने का काम सबसे कठिन होता है इसलिए इसे दो स्तरों में किया जाना चाहिए पहले स्तर में बैंकों से सीधे किसानों के ऋण की स्थिति जानी जा सकती है वहीं दूसरे स्तर पर कांग्रेस के कार्यकर्तों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है जो किसी भी किसान को इस लाभ से वंचित होने की स्थिति पर कड़ी नज़र रखने का काम कर सके.
              इसके अतिरिक्त यदि सरकार बेरोज़गारी भत्ते के मामले में आगे बढ़ती है तो वह इन युवाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वे भी करवा सकती है जिससे सरकार को दोहरा लाभ भी हो सकता है। बेरोज़गारों को रोज़गार देने के साथ सरकार इन युवाओं से महीने में कुछ दिन काम भी ले सकती है जिससे युवाओं में काम करने की भावना के साथ सरकार को काम करने वाले युवा हाथों का सम्बल भी मिल जायेगा। जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने जनता से जुड़े मुद्दों को लोकसभा चुनावों को देखते हुए  प्राथमिकता में लिया है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि खुद सीम और कांग्रेस पार्टी इसे पीएम मोदी के बड़े खोखले बयानों के सामने काम करने की संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करने को तैयार दिखाई देते हैं।  बेशक यह राजनैतिक लाभ के लिए लिया गया निर्णय है पर इसके दूरगामी परिणाम पूरे देश पर आने वाले समय में पड़ने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।
                      स्थानीय युवकों के लिए ७०% रोज़गार देने वाले उद्योगों को सरकारी छूट देने का निर्णय सही कहा जा सकता है पर जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने इसके लिए यूपी-बिहार के लोगों द्वारा नौकरियाँ हथियाये जाने की बात की उससे कोई भी सहमत नहीं हो सकता है क्योंकि यह क्षेत्रीय पार्टियों की स्थानीय सोच जैसी बात है और यह भी सोचा जाना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि स्थानीय लोगों के रोज़गार को किस तरह से बाहर से आने वाले अन्य राज्यों के लोग पा जाते हैं ? सरकार को एमपी के युवकों में कुशलता के साथ कोई भी काम करने की इच्छाशक्ति बढ़ानी होगी तभी उद्योगों के साथ राज्य के युवाओं का विकास भी हो सकता है। .शिवसेना की तरह जय महाराष्ट्र और मराठी मानुष जैसी सोच का किसी भी अन्य राज्य में समर्थन नहीं किया जा सकता क्योंकि यह संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत जाता है।  खुद उद्योगपति होने के कारण कमलनाथ इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि सभी को कुशल कामगारों की आवश्यकता होती है और जब तक कुशलता बढ़ाई नहीं जाएगी तब तक हवाई सपने देखने से कुछ भी संभव नहीं है।     
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सोमवार, 17 दिसंबर 2018

भाजपा की राह

                                            हालिया चुनावों में जिस तरह से लम्बे समय से भाजपा के गढ़ रहे छत्तीसगढ़ में जनता ने कांग्रेस के पक्ष में प्रचंड बहुमत दिया और राजस्थान एवं एमपी में अच्छा ख़ासा समर्थन देकर भी सिर्फ सत्ता से उतार दिया है उसके बाद यदि उसके नेतृत्व द्वारा खतरे की इस घंटी को नहीं सुना गया तो २०१९ की उनकी चुनावी संभावनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है. ऐसा भी नहीं है कि ऐसा अचानक ही हुआ है क्योंकि गुजरात, गोवा, पंजाब, कर्णाटक में भाजपा के लिए राह बिलकुल भी आसान नहीं रही फिर भी उन जनादेशों की एक तरह से भाजपा नेतृत्व द्वारा पूरी अनदेखी की गयी जिसके चलते आज उसके तीन महवत्पूर्ण हिंदीभाषी राज्य विपक्षी दल कांग्रेस के हाथों में चले गए हैं। यह सही है कि अभी तक भाजपा पीएम मोदी की लोकप्रियता और अपने अध्यक्ष अमित शाह के कुशल प्रबंधन से लगातार अजेय बनी हुई थी पर अब उसकी यह छवि भी इन चुनावों से कमज़ोर हुई है कि भाजपा को कोई हरा नहीं सकता है. निश्चित तौर पर आज देश में  भाजपा के पास मज़बूत संगठन तो है ही साथ में संघ के ज़मीनी समर्थन से उसके लिए जनता के साथ जुड़ने का अवसर भी रहता है जो उसकी स्थिति को अन्य दलों के मुक़ाबले मज़बूत करने का काम करता है फिर भी जनता से जुड़े सरोकारों में जिस तरह से भाजपा पिछड़ रही है वह उसके लिए सब कुछ होने के बाद भी अनुकूल परिणाम देने से दूर जाने वाला साबित हो सकता है.
                           निश्चित तौर पर २०१४ के बाद पेट्रोलियम क्षेत्र में होने वाले मुनाफे के दम पर मोदी सरकार का खज़ाना भरा जिससे उसके पास लोक कल्याण के लिये वो धन उपलब्ध होना शुरू हो गया जो पिछली मनमोहन सरकार में केवल सब्सिडी में ही खर्च हो जाया करता था. आज भी देश में राजनैतिक इच्छाशक्ति उस स्तर पर नहीं दिखाई देती है जिसमें वह नौकरशाही के स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार में अपना हिस्सा न मांगे और भ्रष्ट नौकरशाहों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की कोशिश शुरू करे. आज क्या केंद्र सरकार और अधिकांश राज्यों में सत्ता सँभाल रही भाजपा यह बात पूरी दृढ़ता के साथ कह सकती है कि उसके द्वारा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार का अंत किया जा चुका है ? गौ रक्षक और हिन्दुओं के नाम पर क्या भाजपा और इसकी सरकारों ने ईमानदारी से काम किया है या इस मुद्दे से केवल धार्मिक भावनाएं भड़का कर वोट बटोरने तक ही मामले को सीमित किया जा चुका है ? यदि वास्तव में ऐसा कुछ है तो आने वाले समय में भाजपा को यूपी जैसे राज्यों में अपने इन कर्मों के चलते बड़े नुकसान के लिए मानसिक रूप से तैयार होना होगा क्योंकि आज भाजपा को विपक्षियों से उतना खतरा नहीं है जितना उसे अपने नेताओं और उनके अनावश्यक बयानों से होने वाला है.
                          भाजपा द्वारा जिस तरह से पूरे देश में पदयात्रा का आयोजन किया जीवंत लोकतंत्र में हर राजनैतिक दल को इस तरह के प्रयासों को अपनाना चाहिए जिससे वे जनता की समस्याओं को केवल अधिकारियों के चश्में से देखने के स्थान पर धरातल पर समझने की स्थिति में आ सकें। पद यात्रा के समय जनता का जो मूड दिखाई दिया है उससे स्थानीय नेता अवश्य ही भयभीत हुए होंगें क्योंकि यूपी जैसे राज्य में जहाँ विश्व की एकमात्र और सबसे बड़ी गोरक्ष पीठ के महंत आदित्यनाथ के सीएम होने के बाद गायों की स्थिति में गिरावट आयी है वह भी अमित शाह को पता चल गया होगा ? और यदि ज़िले और प्रदेश के नेतृत्व में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वह इस सच्चाई को ऊपर तक पहुंचा कर कोई समाधान निकाले तो आने वाले चुनावों में भाजपा के ज़मीनी संघर्ष उसकी सोच से भी बहुत बड़ा होने वाला है और पूरे प्रदेश में यह स्थिति बन सकती है कि जो भी दल भाजपा को हराने की स्थिति में होगा किसान संभवतः उसी के साथ खड़ा दिखाई देगा। २० महीने के कार्यकाल में यूपी में गायों और आवारा पशुओं से किसानों की जो दुर्दशा हुई है संभवतः २०१९ में भाजपा को बहुत भारी पड़ने वाली है क्योंकि अभी तक इस बारे में सरकार या पार्टी के स्तर पर कोई ठोस प्रशासनिक, राजनैतिक या जागरूकता का काम शुरू नहीं किया गया है जिससे आम किसान एक बार फिर उसी सम्बल से भाजपा के साथ खड़े होने को सोचे जैसा उसने २०१४ में किया था।           

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शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

यूपी और कांग्रेस

                                                      दिसंबर २०१८ के विधानसभा चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में वापसी हुई है वह निश्चित रूप से देश के लोकतंत्र और खुद कांग्रेस के लिए भी किसी हद तक सही कही जा सकती है. देश में मोदी का युग शुरू होने के बाद खुद पीएम मोदी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ राज्य व तहसील स्तर के नेताओं की तरफ से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया जाने लगा था वह यथार्थ से बहुत परे था फिर भी भाजपा अपने वोटर्स को येह समझाने में कहीं न कहीं सफल होती लग रही थी कि अब देश को कांग्रेस मुक्त करने का समय आ गया है. यह हुंकार भरते समय पीएम मोदी और भाजपा ने जो सबसे बड़ी गलती की आज हिंदी बेल्ट में उसका नुकसान होने का वह भी बड़ा कारण है क्योंकि देश की जनता को राजनैतिक व्यवस्था से इतना अधिक अंतर् यहीं पड़ता जितना उसकी समस्याएं दूर न होने से पड़ता है. भाजपा कांग्रेस पर हमलावर होने के चक्कर में अधिकांश बार जनता की उस नब्ज़ को थामने में विफल सी लगी जिसके लिए उसे कांग्रेस पर प्राथमिकता दी गयी थी.
                    कांग्रेस के लिए अब यह कुछ बढ़त वाली स्थिति हो गयी है क्योंकि केंद्र का रास्ता यूपी से होकर ही जाता है. २००९ में कांग्रेस ने यूपी में जिस तरह से २० सांसदों के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार किया था तो इस बार उसके लिए यही चुनौती एक बार फिर से सामने आने वाली है. यूपी में सपा-बसपा की तरफ से अभी तक उसकी जिस तरह से अनदेखी की जा रही थी अब वह संभव नहीं होगी क्योंकि तीन राज्यों में सरकार बनाने के साथ ही कांग्रेस आने वाले समय में लोकसभा और राज्यसभा में अपनी वर्तमान स्थिति को सुधारने की स्थिति में पहुँच चुकी है. सपा बसपा के अपने मंसूबे हैं और यह भी संभव है कि वे आज भी अपने गठबंधन में कांग्रेस के लिए सम्म्मानजनक सीटें छोड़ने के लिए राज़ी न हों पर भाजपा से नाराज़ वोटर्स को कांग्रेस की तरफ होने का रुझान करने के लिए काफी है कि अब कांग्रेस पहले की तरह किसी भी समझौते पर नहीं पहुँचने वाली है. कांग्रेस को अपने दीर्घकालिक हितों के लिए अब यूपी में वही नीति अपनानी होगी जो सपा बसपा ने राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ में अपनायी थी. कांग्रेस को सपा के लिए कुछ सीटें छोड़ने की अपनी परंपरा को चालू रखते हुए अन्य सभी सीटों पर मज़बूत दावेदारी करनी ही होगी तभी वह राष्ट्रीय परिदृश्य में अपने प्रदर्शन में सुधार करने की स्थिति में आ सकेगी.
                         कम सीटों पर चुनाव लड़ने की स्थिति में जीतने का प्रतिशत कितना भी अच्छा होने अधिकतम सीटें और वोट प्रतिशत को सुधारना मुश्किल होगा जो पार्टी की दीर्घकालिक नीतियों के लिए सही नहीं होगा. आज प्रदेश में ऐसे वोटर्स की संख्या बहुत है जिन्होंने २०१४ में भाजपा का वोट दिया था पर यूपी में किसी गठबंधन के सामने आने पर वह वोट कांग्रेस को तो मिल जायेगा पर सपा बसपा में वह किसी भी परिस्थिति में जाने वाला नहीं है. इसलिए यूपी की ज़मीनी हकीकत को समझते हुए कांग्रेस के लिए यह आवश्यक होगा कि वह भाजपा से विभिन्न मुद्दों पर नाराज़ वोटर्स के लिए हर सीट पर खुद को एक मज़बूत विकल्प के रूप में रखे. सपा बसपा की संभावनाएं केवल यूपी में ही हैं और आने वाले समय में कांग्रेस यदि इनके पीछे खड़े होना चाहती है तो २०२४ तक काम चुनावों में उसके लिए सीटें बढ़ने की संभावनाएं स्वतः ही समाप्त हो जाएँगी। अब यह राहुल गाँधी और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर ही निर्भर करेगा कि वे किस तरह से आगे बढ़ना चाहते हैं क्योंकि यूपी में अकेले लड़कर २०१९ में जीतने वाले सांसदों की संख्या भले ही कम हो पर इससे पार्टी को भविष्य के लिए प्रदेश में अपना संगठन फिर से खड़ा करने में बहुत मदद मिल सकती है।         
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