मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 5 जनवरी 2019

बेरोजगारी भत्ता या श्रम सृजन

                                               देश में भले ही आगामी लोकसभा की चुनावी महाभारत से पहले कांग्रेस के तीन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी की घोषणा से स्थितियां कुछ हद तक उसके पक्ष में हुई हो पर उससे किसानों की दशा पूरी तरह सुधारी नहीं जा सकती है ठीक उसी तरह से आज देश के युवाओं के सामने जिस तरह से रोजगार का संकट आ गया है उससे निपटने के लिए भी कांग्रेस ने अस्थायी रूप से युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही है. किसी भी परिस्थिति में युवाओं के ऊर्जावान हाथों में काम हो इससे किसी भी राजनैतिक दल को इंकार नहीं है पर चिंता की बात यह है कि यह सब केवल चुनावों में ही सामने आता है और जब सरकारें बन जाती हैं तो इन समस्याओं को ठन्डे बस्ते में डालने का काम शुरू कर दिया जाता है. आज भारत के पास युवाओं की बड़ी संख्या मौजूद है जिसमें कुशल कामगारों और वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकता के अनुसार रोजगार होने पर उनके लिए उचित मानव संसाधन के रूप में विकसित करने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे हैं. इस नीतिगत उपेक्षा के चलते आज युवाओं में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है जिसका दुष्प्रभाव किसी भी सत्ताधारी दल के लिए घातक हो सकता है.
                     आखिर क्या कारण है कि सरकारें और राजनैतिक दल इस दिशा में सार्थक पहल करने में कहीं बहुत पीछे दिखाई देते हैं और युवाओं की समस्या वहीं पर रह जाती है ? यदि युवाओं को उनके अनुसार बेरोजगारी भत्ता देने की कोई मंशा कांग्रेस की है तो उसे इसके लिए ठोस प्रारूप तैयार करना चाहिए जिसमें युवाओं की रूचि के अनुरूप और विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए आवश्यक मानव संसाधन के स्थानीय विकास की नीति बनानी चाहिए. यह सही है कि कोई भी सरकार सभी को रोजगार नहीं दे सकती है पर यह भी उतना ही सही है कि सरकार युवाओं को समर्थन तो दे ही सकती है जिससे वे अपने खर्चों के लिए परिवार पर कम आश्रित रहे. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आवश्यकता के अनुरूप कौशल विकास योजना जैसे कार्यक्रम से सीमित संख्या में युवाओं को विभिन्न कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जिससे वे अपने आसपास ही कुछ दिनों के लिए रोजगार पाने में सफल हो सकें। इसके लिए मनरेगा का उदाहरण लिया जा सकता है जिसके माध्यम से ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को उस समय भी गतिमान रखने में सफलता मिली थी जब पूरी दुनिया आर्थिक संकट में उलझी हुई थी.
                      इस नीति में डाक, बैंक, रोडवेज, यातायात, नगर विकास, स्वच्छता आदि क्षेत्रों में काम करने के लिए युवाओं को कुशल बनाया जा सकता है. मान लीजिये कि सरकार किसी स्थान के ५० युवाओं का चयन बेरोजगारी भत्ते के लिए करती है तो उनको ३००० रूपये प्रति मास देने के एवज में उनसे विभिन्न विभागों के सहयोगियों के रूप में कम से कम १० दिन काम भी लिया जाना चाहिए जिससे वे उस क्षेत्र की बारीकियों को समझ सकेंगे और सरकार के विभिन्न विभागों को भी स्थानीय स्तर पर काम करने वाले युवा उपलब्ध हो जायेंगें. इससे जहाँ समाज में कार्यकुशलता बढ़ेगी वहीं स्थानीय प्रशासन के पास अधिक सख्या में सहयोगी भी उपलब्ध हो जायेंगें। इस योजना के अंतर्गत काम करने वाले युवाओं के सामने सम्मान से जीने के रास्ते भी खुल सकेंगें और वे भी भत्ते के एवज में देश के लिए अपने कुछ दिन लगाकर ख़ुशी महसूस करेंगें। पहले प्रशिक्षण और फिर काम करने की बाध्यता होने से जहाँ इसमें भ्रष्टाचार की संभावनाएं खुद ही कम हो जाएँगी वहीं युवाओं को भी सही दिशा में आगे बढ़ाने में सफलता मिल सकेगी। पर देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश सरकारें केवल तात्कालिक चुनावी लाभों को देखते हुए ही निर्णय लेती हैं जिससे समाज को उसका वह लाभ नहीं मिल पाता जो एक सुनियोजित नीति के माध्यम से मिल सकता है.         
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शनिवार, 30 सितंबर 2017

रेलवे की आधारभूत आवश्यकताएं

                                                     मुंबई के एल्फिंस्टन-परेल स्टेशन के यात्री उपरिगामी सेतु पर हुए हादसे के बाद एक बार फिर से वही बातें दोहराए जाने का क्रम शुरू हो चुका है जिसके चलते पूरे देश में हज़ारों जाने जा चुकी हैं या फिर हर समय हज़ारों यात्री इस खतरे के साथ ही जीने को मजबूर हैं. यह सही है कि भारतीय रेल का पूरा नेटवर्क आज की आवश्यकता के अनुसार क्षमता को कहीं से भी पूरा नहीं कर पाता है जिससे थोड़ी सी बात पर अफवाह फैल जाती हैं और पलक झपकते ही कोई हादसा हमारी आँखों के सामने होता है. यह सही है कि दशकों पुराने ढांचे को सुधारने में समय तो लगना ही है पर १८५३ में भारतीय रेल के शुरू होने के बाद से आज तक भी तो रेल का परिचालन होता रहा है और उसकी आवश्यकता के अनुरूप सुधार भी किये जाते रहे हैं पर पिछले कुछ दशकों से इसमें किसी न किसी स्तर पर कमियां अवश्य ही दिखाई दे रही हैं जिसके चलते अब पूरे रेल नेटवर्क में रख-रखाव से जुडी समस्याएं सामने आने लगी हैं और यदि समय रहते इनसे नहीं निपटा गया तो आने वाले समय में रेलवे और रेल यात्रियों के लिए समस्याएं बढ़ती ही जाने वाली हैं. अब सरकार को इस क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए रेलवे के पेंच कसने की तरफ ध्यान देना ही होगा जिससे देश में यातायात के इस सुगम साधन को और भी सुरक्षित किया जा सके.
                   लम्बे समय तक लगातार उपयोग में आने के कारण रेलवे में रखरखाव सदैव ही एक बड़ी चुनौती रहा है जिसके चलते रेलवे के अधिकारियों की तरफ से भी कुछ लापरवाहियां की जाती रहती हैं कई बार धन की कमी का रोना भी रहता है पर इस सबमें सबसे बड़ी समस्या रेलवे के लिए समय के साथ बदलाव को न करते रहना भी है. रेलवे में हर एक अवस्थापना और संरचना की एक निश्चित आयु होती है जिसके चलते उसे उस समय से पहले ही बदलने की आवश्यकता पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत होती है कई बार काम के दबाव या रेल परिचालन में संभावित व्यवधान को देखते हुए इस कार्य को लम्बे समय तक टाल दिया जाता है और ट्रेनों तक को लम्बे समय तक समस्या वाले स्थानों से धीमी गति से निकाल कर काम चलाया जाता है. इस पूरी कवायद में जहाँ यात्रा का समय बढ़ता है वहीं आसपास के बड़े स्टेशनों पर अनावश्यक रूप से दबाव भी बनता है जो कि रेलवे के समयबद्ध और सुरक्षित परिचालन में एक बड़ा व्यवधान साबित होता है और इससे निपटने के लिए रेलवे के पास कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नीति या कार्ययोजना का अभाव दिखाई देता है जिससे भी समस्याएं कम होने के स्थान पर बढ़ ही जाती हैं.
                   यदि आने वाले समय में रेलवे को देश के तेज़ी से बदलते हवाई यातायात से मुक़ाबला करना है तो उसे अपने आधारभूत कामों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पड़ने वाली है क्योंकि पीपीपी के आधार पर कोई भी निजी निवेशक केवल रेलवे की खाली पड़ी कीमती भूमि का उपयोग करने की दिशा में ही काम करने वाला है और उसका रेलवे की मूलभूत आवश्यकता से कोई सरोकार नहीं रहने वाला है तो उस परिस्थिति के लिए रेलवे को सीमित संख्या में निजी क्षेत्र को आमंत्रित करने की दिशा में सोचना चाहिए जिससे उसकी कीमती भूमि भविष्य में उसके विस्तार और अन्य परियोनाओं के लिए उपलब्ध रह सके. मुंबई हादसे के बाद रेल मंत्रालय को सबसे पहले पूरे देश में इस तरह के बड़े स्टेशनों पर मूलभूत संरचनाओं के बारे में एक श्वेत पत्र जारी कर यह बताना चाहिए कि आज इन स्टेशनों पर इनकी क्या स्थिति है और एक समय सारिणी के अनुरूप आने वाले दो या तीन वर्षों में इस तरह की समस्या से निपटने की कार्ययोजना पर अमल करना चाहिए जिसमें सबसे पहले यात्रियों की संख्या के अनुरूप बड़े स्टेशनों पर आवश्यक सुविधाओं को उपलब्ध कराया जाना चाहिए और उसके बाद उनके रख रखाव की समुचित व्यवस्था पर भी ध्यान देने के लिए एक मज़बूत और उत्तरदायी तंत्र बनाना चाहिए.
                     हर मंडल में इस तरह के काम को देखने के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए जिससे अन्य अधिकारी काम के बोझ के चलते इन कामों पर ध्यान न दिए जाना का बहाना न बना सकें और काम को समय से पूरा भी किया जा सके. रेलवे को मेट्रो रेलवे की तरह एक नयी टीम बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ना ही होगा क्योंकि जब तक दक्ष और कार्यकुशल लोगों के हाथों में यह सब पूरी तरह से नहीं दिया जायेगा तब तक कुछ भी सही नहीं हो सकता है. इन्हीं परिस्थितियों में देश भर की मेट्रो रेलवे आखिर किस तरह से समयबद्ध होकर हर काम कर सकती हैं जबकि वहां पर गए अधिकांश कर्मचारी भी रेलवे से या उसकी धारणा के अनुसार ही होते हैं ? मतलब स्पष्ट है कि रेलवे में अभी उस तरह की कार्यसंस्कृति का विकास नहीं हो पाया है जैसा मेट्रो ने कम समय में विकसित कर लिया है और उसके चलते ही आज देश में स्थापित विभिन्न शहरों की मेट्रो अपने काम को समय से पूरा करने के लिए जानी जाती हैं.
                       अब समय आ गया है कि पूरी परिस्थिति पर ध्यान देते हुए एक विस्तृत कार्ययोजना बनायीं जाये और उसकी बागडोर ऐसे अधिकारियों के हाथों में होनी चाहिए जो आगामी दो या तीन वर्षों में रिटायर न हो रहे हों जिससे अधिकारियों को बीच में बदलने से काम प्रभावित न हो सके. जब इतनी अधिक उम्र में ई श्रीधरन अपने काम को सही समय से करने के लिए जाने जाते हैं तो यह सब काम करने वाले श्रीधरन जैसे और मेट्रो मैन हम सामने क्यों नहीं ला सकते हैं ? कहीं न कहीं इच्छा शक्ति में कमी के चलते ही यह सब नहीं हो पा रहा है और अब इस पर ध्यान देकर रेल यात्रा को सुरक्षित किये जाने का समय आ चुका है क्योंकि इसमें चूकने पर रेलवे के साथ सरकार और देश के नागरिकों के जीवन पर व्याप्त संकट को किसी भी तरह से कम नहीं किया जा सकता है.
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बुधवार, 7 जून 2017

यूपी में कानून व्यवस्था

                                                        अखिलेश सरकार को कानून व्यवस्था पर सबसे ज़्यादा घेरने वाली भाजपा की यूपी में आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद जिस तरह से इस मोर्चे पर अभूतपूर्व सुधार की अपेक्षा जनता लगाए बैठी थी अभी तक के प्रारंभिक कार्यकाल से उसमे कोई गुणात्मक सुधार दिखाई नहीं दे रहा है हालाँकि अपने राजनैतिक जीवन में केवल सांसद रहे व्यक्ति के लिए इतने बड़े प्रदेश की बागडोर संभालना उतना आसान नहीं है जिसका सरकारी मशीनरी के साथ प्रशासनिक अनुभव लगभग शून्य ही है इसलिए इतने कम समय में उसकी समीक्षा किये जाने का कोई मतलब नहीं बनता है फिर भी जनता की तरफ से एक सवाल अवश्य ही सामने आता है कि पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद भी आखिर प्रदेश की पुलिसिंग में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है ? सीएम आदित्यनाथ ने निश्चित रूप से महंत अवैद्यनाथ की परंपरा को गोरक्षपीठ में बहुत कुशलता से आगे बढ़ाया है पर सरकारी अधिकारियों से निपटने और उनसे अपने अनुरूप काम लेने की प्रक्रिया समझने में उनको अभी भी लम्बा समय लगने वाला है. एक संस्था के प्रशासक के रूप में अर्जित अनुभव से निश्चित तौर पर उन्हें लाभ मिलने वाला है पर यदि भाजपा आपसी गुटबाज़ी छोड़ एकजुट होकर उनके साथ खड़ी हो तो इस कठिन मोर्चे को भी आसानी से जीता जा सकता है.
                                   अखिलेश सरकार का कार्यकाल भले ही जनता को रास न आया हो और उनके स्थान पर उसने भाजपा को चुन लिया है पर प्रदेश की पुलिसिंग के लिए अखिलेश के पास जो मास्टर प्लान था और उस पर वे पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ भी रहे थे आज उसे और भी तेज़ी से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि डायल १०० कि परिकल्पना को यूपी जैसे बड़े राज्य में यदि धरती पर उतारा जा सके तो पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था में गुणात्मक सुधार आसानी से दिखाई देने लगेगा. आज जो समस्या सामने दिख रही है वह सीएम आदित्यनाथ कि अनुभवहीनता से अधिक उन पर केन्दीय नियंत्रण के कारण भी हो सकती है क्योंकि जिस तरह से पिछली सरकार में नगर या गांव के किसी भी सपा नेता के कहने पर भी पुलिस अधिकारियों के तबादले हो जाया करते थे उस पर इस सरकार ने रोक तो लगाई है पर आज जिस तरह से बड़े और प्रभावशाली नेताओं के चुनावी क्षेत्रों में उनकी मनमानी आसानी से चल रही है पर अन्य जगहों पर अधिकांश पहली बार चुने गए विधायक सीएम तक अपनी बात पहुँचाने से भी डर रहे हैं जिससे एक सिपाही तक को इस बात का एहसास हो गया है कि ये नेता चाहकर भी उनका तबादला नहीं करवा सकते हैं इसलिए वे मनमानी करने पर उतारू हो चुके हैं. भाजपा के पास व्यापक संगठन और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या है फिर भी जिस तरह से पार्टी में इतने दिनों बाद सरकार बनने पर दल बदलुओं को अधिक भाव दिए जा रहे हैं उससे भी पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ रहा है. भाजपा के वोट बैंक रहे अगड़े हिन्दुओं को भी अब यह लगने लगा है कि भले ही समरसता की कितनी बातें की जा रही हों पर आज की भाजपा में पिछड़ों और अन्य वर्गों का बोलबाला हो चुका है जिस पर वे भी अनमने ढंग से प्रतिक्रिया देते हुए देखे जा सकते हैं.
                                  प्रदेश के सीएम का सपना देख रहे अन्य भाजपा नेताओं के लिए आज का समय कठिन हो चुका है तो यह भी संभव है कि सरकार और सीएम के नियंत्रण को कमज़ोर दिखाने के लिए अन्य नेताओं के समर्थक इस तरह की हरकतें करने में लगे हैं जिससे भाजपा कार्यकर्त्ता होने के चलते पुलिस उन पर सीधे तौर पर हाथ भी न डाल पाए और वे अपने उद्देश्य में सफल भी हो जाएँ ? भाजपा में सभी जानते हैं कि यदि सफल सीएम के रूप में आदित्यनाथ ने अपने को यूपी में स्थापित कर लिया तो आने वाले समय में यूपी में भाजपा के बहुमत में आने पर उनको हटा पाना असंभव होगा और वे पीएम मोदी के बाद स्वाभाविक रूप से उनके उत्तराधिकारी बन कर केंद्रीय नेताओं के लिए भी कड़ी चुनौती प्रस्तुत कर देंगें. आज कड़े सन्देश के बाद भी जिस तरह की चुनौतियाँ सीएम के रूप में आदित्यनाथ के सामने आ रही हैं उनका निश्चित रूप से विपक्षी दलों से अधिक भाजपा से ही सम्बन्ध है तभी चाहकर भी पुलिस कार्यवाही नहीं कर पा रही है और इस तरह के तत्व प्रदेश में लगातार कुछ न कुछ करते ही जा रहे हैं. सीएम आदित्यनाथ और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को यूपी की वास्तविक स्थिति और गंभीरता को समझते हुए एक पूर्णकालिक गृह मंत्री की आवश्यकता पर विचार करना चाहिए क्योंकि अच्छी मंशा होने के बाद भी अपनी सीएम के पद से जुडी व्यस्तताओं के चलते आदित्यनाथ के पास गृह मंत्रालय देखने का उतना समय नहीं होगा जितने की यूपी को आवश्यकता है तो उस स्थिति में पूरा गृह मंत्रालय अधिकारियों के हाथों में ही रहेगा जिसका दुष्प्रभाव लगातार दिखाई देता रहेगा. यूपी जैसे विशाल राज्य में बड़े शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली अविलम्ब लागू करने की आवश्यकता है साथ ही राजनैतिक स्तर पर पूरी समस्या से निपटने के लिए एक अनुभवी गृह मंत्री और उसके आधीन काम करने वाले दो युवा गृह राज्य मंत्रियों कि नियुक्ति भी की जानी चाहिए जिनके पास स्पष्ट रूप से प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी भाग की ज़िम्मेदारी हो साथ ही गृह मंत्री आतंक से जुड़े मुद्दों को सीधे अपने स्तर से देखना शुरू करें.      
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गुरुवार, 11 अगस्त 2016

अनुपयुक्त सेस और विकास

                                                        २०१४ के बाद प्रस्तुत किये लगभग हर बजट में मोदी सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने देश में विकास और कल्याण कार्यक्रमों के लिए धन की कमी की बातें कहकर सेस लगाने के साथ सर्विस टैक्स को लगातार बढ़ाने का काम भी किया है. राज्य सरकारों की तरफ से जहाँ लगातार इस बात की शिकायत की जा रही है कि उन्हें पूर्व की तरह धन नहीं मिल पा रहा है जिससे विभिन्न कार्यों को करवाने में समस्याएं सामने आ रही हैं वहीं केंद्र सरकार का यह कहना है कि उसके पास कोष में धन की कमी है क्योंकि पिछली सरकार के कारण देश आर्थिक रूप से कमज़ोर हो चुका है. यदि राजनीति से अलग होकर आर्थिक स्तर पर देश की सेहत को देखा जाये तो ऐसा कुछ भी नहीं सामने आ रहा है जिससे देश में किसी बड़े वित्तीय संकट का आभास मिलता हो हाँ अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के चलते कुछ उतार चढ़ाव पहले की तरह ही लगातार दिखाई दे रहे हैं. यदि बात सेस की हो तो सरकार को एक वर्ष में ७१,९५८.२ करोड़ रूपये मिले पर लगातार बहुत काम करने की बातें करने वाली सरकार भी इसमें से केवल २८,११२.७३ करोड़ रूपये ही खर्च कर सकी और ४३,८४५.४७ करोड़ रूपये उससे खर्च ही नहीं किये गए ? राज्यों को केंद्र की तरफ से यह बताया जाता है कि उसके पास धन की कमी है जबकि वास्तविकता में उसके पास इतना धन अनुपयुक्त रूप से पड़ा हुआ है जो जनता से सीधे सेस के नाम पर वसूला गया है.
                               सेवा कर और सेस में यही मूल अंतर है कि एकत्रित किये सेवाकर में राज्यों के योगदान के अनुसार केंद्र उनको उनका हिस्सा देने को बाध्य होता है जबकि सेस के रूप में लिए गए धन को खर्च करने के लिए केंद्र सरकार अपने अनुसार निर्णय ले सकती है. हालाँकि नियमानुसार जिस मद का सेस हो उसे उसमें ही खर्च किया जाना चाहिए पर आम तौर पर सरकार इसमें में हेरफेर कर अपने अनुसार गुपचुप परिवर्तन कर लेती है क्योंकि हर वित्तीय निर्णय का न तो खुलासा होता है और न ही संसद में इससे सम्बंधित प्रश्न पूछने की कोशिश सांसदों द्वारा की जाती है. इस अनुपयुक्त सेस के बारे में अब राज्यों की तरफ से केंद्र से अपने लिए धन के आवंटन की मांग की जा रही है वहीं केंद्र इसको देने के लिए अनिच्छुक ही दिखाई दे रहा है ऐसी स्थिति में अब इस धन को किस तरह से जनता के कल्याण और विभिन्न मदों में किस तरह से सही रूप में खर्च किया जा सकता है यह सोचने का समय किसी के पास नहीं है. राज्यों की तरफ से केन्द्रीय सहायता में कटौती की बातें की जा रही हैं तो केंद्र धन ही न होने का बहाना बनाने जुटा दिखाई दे रहा है अब इस अवरोध का कुछ सही निर्णय किया जाना चाहिए क्योंकि इससे सबसे अधिक नुकसान देश और नागरिकों का ही हो रहा है.
                               राज्यों को धन की कटौती करने के पीछे मोदी सरकार का यह तर्क भी रहा करता है कि सही योजनाओं के अभाव में इस धन में भ्रषटाचार बहुत अधिक होता है तो दो वर्षों में सरकार की तरफ से इस संस्थागत संगठित भ्रष्टाचार से निपटने के लिए क्या प्रभावी कदम उठाए गए हैं यह भी स्पष्ट नहीं है. सभी राज्यों में वित्तीय दुरूपयोग को स्वीकार करते हुए सबसे पहले केंद्र सरकार ने ग्रामीण परिवेश में परिवर्तन करने वाली और भारत की आर्थिक प्रगति के चक्के को लगातार घुमाये रखने वाली मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं में कटौती की पर जब दो सालों में उसका पहले से ही सुस्त अर्थ व्यवस्था पर कुप्रभाव पड़ा तो सरकार ने इस वर्ष मजबूरी में उसके आवंटन को बढ़ाया भी है. यह सही है कि केंद्र और राज्य स्तर के बजट आवंटन को खर्च करने में आज भी काफी हद तक भ्रष्टाचार फैला हुआ है पर योजना आयोग की जगह बनाये गए नीति आयोग के पास क्या कोई ऐसा विचार है जिससे इस भ्रष्टाचार को कम किया जा सके ? विभिन्न सेस लगाकर देश के खजाने को भरने और राज्य सरकारों पर शक़ करने से ही देश का विकास संभव नहीं है अब समय आ गया है कि केंद्र राज्यों के साथ मिलकर देश की आर्थिक प्रगति को और तेज़ करने के लिए गंभीर प्रयास शुरू करे जिससे इकठ्ठा किये गए सेस का सदुपयोग देश के विकास में किया जा सके.
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शुक्रवार, 6 मई 2016

आरोप, जाँच और वास्तविकता

                                                           २०१४ के चुनावों में घोटालों की श्रेणी में शामिल रहे बड़े कामनवेल्थ घोटाले के एक और मामले में सीबीआई की अदालत ने क्लोज़र रिपोर्ट लगाने के लिए अनुमति प्रदान कर दी है जिससे यह अवश्य ही पता चलता है कि देश में नेता, अधिकारी, ठेकेदार तो मनमानी करते ही हैं साथ ही पुलिस और अन्य जाँच एजेंसियां भी मीडिया ट्रायल के चक्कर में फंसकर बिना सबूतों पर विचार किये कोई भी मामला दर्ज़ कर लेते हैं. देश की प्रतिष्ठा पर दाग लगाने वाले बहुत सारे मामलों में से एक इस मामले में भी जिस तरह से सीबीआई को कुछ नहीं मिला और आज वह कोर्ट से यह अनुमति मांगती है कि यह मामला सबूत न मिलने के कारण बंद कर दिया जाना चाहिए तो इस तरह के मामलों के बारे में क्या देश को स्पष्ट नीति बनाने की आवश्यकता नहीं है ? एक तरफ जहाँ जजों की सीमित संख्या के चलते बहुत सारे मुक़दमों की सुनवाई समय से नहीं हो पा रही है वहीं इस तरह के बिना सबूतों वाले मुक़दमों पर कोर्ट्स और जजों का समय केवल राजनैतिक कारणों से ही क्यों बर्बाद किया जा रहा है यह भी सोचने का समय आ गया है.
                                            देश में भ्रष्टाचार जिस स्तर पर पहुंचा हुआ है उसके बाद किसी भी सरकार के लिए इसे एकदम से समाप्त कर पाना बहुत ही कठिन है पर कुछ मामलों में जाँच अभियोजन में तेज़ी लाकर भ्रष्टाचारियों को यह सन्देश तो दिया ही जा सकता है कि अब वे पहले की तरह सुरक्षित नहीं हैं और कानून उनके मामलों को तेज़ी से निपटाने की स्थिति में पहुँच गया है. आज यदि भ्रष्टाचारियों के हौसले बुलंद हैं तो उसके पीछे केवल यही सबसे बड़ा कारण है कि वे जानते हैं कि इस तरह के मामलों में सबूत मिलना आसान नहीं होता है और वे अपने पदों पर रहते हुए भी भ्रष्टाचार के किसी मामले में कानून से भी पूरी तरह से सुरक्षित रह सकते हैं. इस दिशा में किसी भी प्रयास से पहले देश में एक भ्रष्टता का पैमाना भी बनाया जाना चाहिए जिसके लिए आम जनता, नेता, अधिकारी सभी को अपनी राय देने का अधिकार हो जिससे यह पता चल सके कि देश में कौन सा राज्य कितना भ्रष्ट है या फिर कौन सा विभाग सबसे अधिक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है. ऐसे क़दमों से जहाँ विभागों पर सामाजिक दबाव बनाया जा सकता है वहीं सरकार के सामने वास्तविकता आने की स्थिति में देश में भ्रष्टाचार की सही स्थिति का अंदाजा भी हो सकता है.
                                बड़े स्तर पर काम होने की दशा में इस तरह का भ्रष्टाचार आम तौर पर देखा जाता है आज सभी जानते हैं कि सांसद/ विधायक निधि तक से काम करवाने के लिए आम जनता को किस तरह से भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ता है जबकि देश की प्रगति के लिए भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए संसद में कसमें खाने वाले सांसद भी यह वास्तविकता जानते हैं. किसी भी परिस्थिति में आखिर क्यों इस धन की बंदरबांट पर किसी नेता की नज़र क्यों नहीं जाती है आखिर वे कौन से कारण है जिनके चलते सौ दो सौ करोड़ रुपयों का भ्रष्टाचार तो बहुत बड़ा हो जाता है पर सांसद विधायक निधि के माध्यम से होने वाला भ्रष्टाचार कितना बड़ा होता है यह देखने की किसी के पास फुर्सत भी नहीं है. भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों को त्वरित कोर्टों के माध्यम से निपटा जाना चाहिए और इसमें किसी भी तरह की राजनीति को दूर रखने का प्रयास भी किया जाना चाहिए क्योंकि जब तक दोषियों के खिलाफ सही तरह से कार्यवाही नहीं की जाएगी तब तक भ्रष्टाचार से निपटने के संकल्प केवल विधायिका के सदनों तक ही सीमित रहेंगे और कुछ लोग अपनी राजनीति को सँभालने के लिए इस तरह से भ्रष्टाचार को निशाने पर लेकर गलत लोगों में ही देश को उलझाकर रखने का काम करते रहेंगें.  
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सोमवार, 2 मई 2016

उज्ज्वला योजना और भ्रष्टाचार

                                                   देश में सब्सिडी छोड़ने वाले लोगों के कारण होने वाली बचत को गरीबों के एलपीजी चूल्हे जलाने के लिए उपयोग किये जाने का वायदा पूरा करते हुए जिस तरह से पीएम मोदी ने बलिया से इसका शुभारम्भ किया वह अपने आप में गरीबों के चूल्हे के लिए एक लिए बड़ा वरदान भी बन सकती है. देश में पहले से ही गरीबों के लिए विभिन्न स्तरों पर कई प्रकार के आर्थिक सामाजिक सहायता के कार्यक्रम केंद्र और राज्य सरकारों के माध्यम से लगातार चलाये जा रहे हैं पर उनका अभी तक धरातल पर जितना प्रभाव दिखाई देना चाहिए था आज भी गरीब उसके लिए प्रतीक्षारत ही हैं तथा इन योजनाओं में लगातार हज़ारों करोड़ की धनराशि को डाला जा रहा है पर इनके लाभ को गलत आंकड़ों और चयन में अनियमितता करने के चलते सही लोगों तक पहुँचाने की कोई कारगर व्यवस्था भी नहीं बन पा रही है. देश के उन संसाधनों पर अपात्रों द्वारा लगातार अनाधिकृत रूप से अधिकार जमाया जा रहा है जिसके लिए वे कहीं से भी पात्र नहीं हैं और इसका सीधा असर गरीबों की स्थिति पर ही पड़ रहा है क्योंकि उनके हिस्से की योजनाएं भ्रष्टाचार के कारण लगातार गलत हाथों में जा रही हैं.
                                     आज भी जिस तरह से गरीबी रेखा, गरीबों, आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े नागरिकों के चयन के जो मानदंड बने हुए हैं वही इस तरह की योजनाओं की सफलता में सबसे बड़ी बाधा के रूप में सामने आ रहे हैं क्योंकि इनका चयन करने के लिए शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में जिस तरह से निचले स्तर के सरकारी कर्मचारियों का उपयोग किया जाता है तो वे उस पूरी प्रक्रिया को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं और किस हद तक पात्र परिवार छूट जाते हैं तथा अपात्रों को घूस तथा राजनैतिक दबाव के चलते इन सुविधाओं के लिए योग्य घोषित कर दिया जाता है यह भी किसी से छिपा हुआ नहीं है. क्या आज देश को केंद्रीय स्तर पर एक ऐसे कानून की आवश्यकता नहीं है जिसमें विभिन्न योजनाओं के लिए सही लाभार्थियों के चयन के लिए ही एक विशेष अभियान चलाया जाये और एक बार सही तरह से समय देकर सही लोगों का चयन भी किया जाए जिससे विभिन्न योजनाओं के लिए चयन के मानकों का हर बार उल्लंघन करके अपात्रों को आगे न बढ़ा दिया जाये. निश्चित तौर पर इस तरह के प्रयास का राज्यों की तरफ से विरोध होगा क्योंकि उनके छोटे स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं आदि के लिए ऐसी योजनाएं सदैव ही करीबी लोगों को सहायता दिलवा कर अपनी राजनीति को चमकाने का अंग रहा करती हैं.
                                      चयन की प्रक्रिया को केवल सरकारी स्तर पर किये जाने के स्थान पर लाभार्थियों के स्तर से भी शपथ पत्र लेने की नयी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए क्योंकि जब तक लाभार्थियों को इससे सीधे नहीं जोड़ा जायेगा तब तक किसी भी तरह से इस स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार को समाप्त नहीं किया जा सकता है. शपथ पत्र दिए जाने के साथ ही गलत जानकारी देने पर दण्डात्मक कार्यवाही का प्रावधान भी होना चाहिए जिसमें अगले १० वर्षों तक हर स्तर पर मताधिकार और किसी भी तरह की अन्य सरकारी सहायता और सुविधा से गलत जानकारी देने वाले परिवार को पूरी तरह से वंचित कर दिया जाना चाहिए. सरकार जब ज़िम्मेदारी से योजनाएं बना रही है तो जनता के स्तर पर भी ज़िम्मेदार भागीदारी की व्यवस्था होनी चाहिए जिससे सहायता की धनराशि का सदुपयोग हो सके तथा वह उन लोगों तक प्रचुर मात्रा में पहुँच भी सके जिन्हें इसकी बहुत आवश्यकता भी है. बिना इस तरह का परिवर्तन किये उज्ज्वला योजना भी कुछ हद तक ही वंचितों की मदद कर पाने में सफल होगी क्योंकि निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से निपटे बिना कितनी भी अच्छी योजना का बुरा हाल कर देने के लिए हम नागरिक और हमारा सरकारी तंत्र सदैव ही तैयार बैठे रहते हैं.   
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गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

ग्लेशियर और पर्यावरण

                                                                                      पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा आईआईटी कानपुर और अन्य एजेंसियों के माध्यम से हिमालयी क्षेत्र में पाये जाने वाले ग्लेशियरों की वर्तमान स्थिति पर किये जाने वाले एक अध्ययन में देश के सामने बहुत ही चिंताजनक स्थिति सामने आ रही है और यदि वर्तमान स्थिति जारी रहती है तो आने वाले ५० वर्षों में हिमालयी नदियों के प्राकृतिक जल स्रोतों के पूरी तरह से सूख जाने की आशंका सच भी साबित हो सकती है. देखने में तो यह बात बहुत ही सामान्य सी लगती है पर इसके दूरगामी परिणामों के बारे में सोचने का सम्भवतः आज किसी के पास समय नहीं है. इन नदियों के जल से जिस तरह से कृषि योग्य भूमि की सिंचाई और जल विद्युत परियोजनाओं के विकास के लिए हम इन पर पूरी तरह से निर्भर हैं तो इनके जलस्रोत सूखने की स्थिति में हिमालय की तराई में रहने वाली विश्व की ४०% आबादी के सामने किस तरह के संकट आ सकते हैं आज इस पर भी किसी तरह से विचार नहीं किया जा रहा है. पर्यावरण को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारणों पर जिस हलके स्तर पर विचार किया जाता है आज वह हमारे लिए सम्भवतः बड़ा संकट लेकर आने की चेतावनी भी है.
                        उत्तराखंड में स्थित गोमुख और सतोपंत ग्लेशियर से भागीरथी और अलकनंदा को पानी मिलता है जो कि बाद में एक में मिलकर गंगा का रूप धारण करती हैं इन दोनों ग्लेशियरों पर चार साल चलने वाले इस अध्ययन में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं क्योंकि विभिन्न स्थानों पर लिए गए पानी के नमूनों में जिस तरह से ग्लेशियर के पानी की मात्रा ३०% तक पायी जा रही है वह इनके तेज़ी से पिघलने की तरफ ही संकेत करती हैं सामान्य तौर पर इन नदियों में १५% तक ग्लेशियर से आने वाला पानी होना चाहिए जबकि इन वर्षों में यह बात सामने आ रही है कि इस पानी के आने की मात्रा दोगुनी हो चुकी है. इसका सीधा सा मतलब यह है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते हिमालयी ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं और आज भी इनको बचाने के लिए हम भारत के रूप में कोई बड़ा प्रयास नहीं कर पा रहे हैं जिससे आने वाले समय में इनके और भी सिकुड़ने या फिर पूरी तरह से समाप्त हो जाने की आशंका से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. इसरो की तरफ से हिमाचल की नदियों के अध्ययन में भी इसी तरह की चिंताएं सामने आने से पूरे हिमालयी क्षेत्र की नदियों और एक बड़ी आबादी के जीवन पर कुप्रभाव पड़ने की सम्भावना इस तरह से स्पष्ट दिखाई दे रही है.
                        अच्छा है कि इन रिपोर्ट्स के माध्यम से कम से कम सरकार और देश के पर्यावरणविद भी एक राय बना पाने में सफल होंगें और भारत समेत विश्व के कार्बन उत्सर्जन मानकों पर और भी सख्ती से अनुपालन करने की कोशिशें करते हुए नज़र आएंगें. विकसित और औद्योगिक रूप से संपन्न देशों की एक नीति ही रहा करती है कि वे अपने लाभ के लिए पूरी दुनिया के पर्यावरण से किसी भी स्तर तक छेड़खानी करने से नहीं चूकते हैं और मौका मिलने पर विकासशील देशों को हर तरह के प्रतिबंधों में बांधने से भी बाज़ नहीं आते हैं. आज यदि ग्लोबल वार्मिग का यह असर भारतीय उपमहाद्वीप पर पड़ रहा है तो आने वाले समय में इसका दुनिया के अन्य ग्लेशियरों पर भी इसी तरह से असर दिखाई देने वाला है. आज के समय ही सूखे के कारण जिस तरह से देश का ४०% हिस्सा परेशानी झेल रहा है तो इन सदानीरा नदियों के जल स्रोतों के सूखने की विकट स्थिति के बारे में समझा भी जा सकता है. इस दिशा में पूरे देश के सभी लोगों को सोचने की आवश्यकता है क्योंकि सरकारी योजनाएं तो बनायीं ही जाती रही हैं पर उनसे धरातल पर कितना अंतर आया है यह कोई जान नहीं पा रहा है इसलिए अब इसके लिए सभी के समवेत प्रयासों की आवश्यकता है क्योंकि जल के बिना जीवन की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती है.   
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शनिवार, 2 अप्रैल 2016

विकास की दौड़ में गुणवत्ता

                                         कोलकाता के व्यस्ततम क्षेत्र बड़ा बाज़ार में जिस तरह से निर्माणाधीन पुल के अचानक गिरने से २५ लोगों की जान चली गयी और अभी भी काफी लोग घायल हैं उसके बाद देश भर में उसी तरह की कवायद फिर से देखी जा रही है जो एसे हादसों के बाद अक्सर ही दिखाई देती है. आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी जब देश में तकनीक और प्रौद्योगिकी ने बहुत प्रगति कर ली है और विदेशों से निर्माण सम्बन्धी विशिष्ट उपकरणों के आयात और उपयोग से जहाँ निर्माण में लगने वाली मानव शक्ति पर रोक लगायी जा सकी है वहीं निर्माण कार्यों में अभूतपूर्व प्रगति भी दिखाई देने लगी है फिर भी इस तरह की घटनाओं को आखिर किस हद तक स्वीकार किया जा सकता है यह सोचने का समय आ चुका है. कोलकाता में भी जिस तरह से इस दो किमी लम्बे उपरिगामी सेतु का निर्माण २००१ से प्रक्रिया में आया हुआ है और आज भी यह पूरी तरह से नहीं हो पाया है उसकी जांच की जानी आवश्यक है क्योंकि आबादी और सामान्य यातायात के बीच इस तरह के काम करने में निश्चित तौर पर अधिक समय लगता है तथा इससे बचने का कोई अन्य मार्ग भी नहीं सामने दिखाई देता है फिर भी इस काम को करने में आज देश में कुशल निर्माण कम्पनियों की कमी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है.
                                                                   १९९१ के बाद बदली आर्थिक व्यवस्था में जिस तरह से देश के हर क्षेत्र में तेज़ी दिखाई देनी शुरू हुई उसके बाद निर्माण क्षेत्र को भी तेज़ी से पंख लग गए पर इस पूरी प्रक्रिया में जहाँ इसमें लगी हुई कम्पनियों के लिए उचित माहौल नहीं बन पाया और उन्हें आज की सर्वोत्तम तकनीक उपलब्ध करने के लिए सरकार ने भी कोई नीति नहीं बनायीं तो उसका लाभ उठते हुए इनमें से अधिकतर कम्पनियों ने आज के मानकों की अनदेखी करनी भी शुरू कर दी जिसके बाद विभिन्न परियोजनाओं में विभिन्न तरह की समस्याएं सामने आने लगीं. देश की बढ़ती आबादी और अतिक्रमण के साथ सिकुड़ते महत्वपूर्ण स्थानों पर स्थान की कमी होने से जहाँ लोगों के लिए इन क्षेत्रों में लगने वाले जाम से रोज़ निपटना पड़ता है वहीं इस अतिक्रमण के लिए ज़िम्मेदार सरकारी विभाग भी अपने स्तर पर कोई प्रयास करते हुए नज़र नहीं आते हैं. प्रारंभिक मिलीभगत बाद में किस स्तर पर समस्या उत्पन्न करने लगती हैं यह ऐसे किसी भी शहर में देखा जा सकता है क्योंकि शहरों में अनियंत्रित यातायात और सड़कों तक दुकान खोलने की प्रवृत्ति के चलते ही आज हमारे शहरों का स्वरुप बिगड़ा हुआ दिखाई देता है इसके लिए हम सभी बहुत हद तक उत्तरदायी हैं.
                                         देश के अधिकांश शहरों के निकायों के पास दीर्घावधि की कोई कार्ययोजना होती ही नहीं है जिसके चलते हर शहर और क़स्बा इस तरह की समस्याओं से दो चार होने को मजबूर है. क्या अब इस बारे में केंद्रीय स्तर पर कोई पहल करने की आवश्यकता नहीं है जिसमें शहरों के अंदरूनी हिस्सों को भविष्य के पूरी तरह से तैयार करने के लिए विशिष्ट अध्ययन को आवश्यक किया जाये तथा आज के यातायात और भविष्य में होने वाले यातायात की एक परिकल्पना करते हुए हर शहर और कस्बे के लिए एक योजना अवश्य ही बनायीं जाये जिसमें नए बसने वाले क्षेत्रों में सम्पूर्ण सुविधाओं के साथ अच्छे बाजार भी होने चाहिए जिससे शहरों के पुराने हिस्सों की तरफ अनावश्यक यातायात को रोका जा सके. नए क्षेत्रों में सड़कों के जाल पर पूरी तरह से ध्यान दिया जाये क्योंकि जाम से निपटने के लिए बाद में जितने पैसे खर्चे जाते हैं यदि उसके एक छोटे हिस्से का उपयोग कर शहरों की सडकों को सही किया जाये तो सभी का काम आसान हो सकता है. अनियंत्रित विकास से आज हमारे शहर और कस्बे कैसे होते जा रहे हैं यह सभी को दिखाई तो दे रहा है पर इस तरफ कोई भी गम्भीर प्रयास करता हुआ नज़र नहीं आता है और जो छुटपुट प्रयास किये भी गए वे राज्यों में व्यापत भ्रष्टाचार की भेंट ही चढ़ते है दिखाई दिए हैं.   
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बुधवार, 16 मार्च 2016

कृषि, कर और चोरी

                                                देश के बारे में कोई भी जानकारी देते समय अक्सर ही यह कहकर बात की शुरुवात की जाती है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहाँ के ग्रामीण क्षेत्र की अधिकांश जनता आज भी कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था पर ही अपनी जीविका के लिए निर्भर है. देश के किसानों के पास आज भी पूरी तरह से आधुनिक खेती करने की सभी संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाये हैं इसलिए ही संविधान में कृषि से होने वाली आय को आयकर और किसी भी तरह के अन्य कर से मुक्त रखा गया है. इस तरह की छूट देने के पीछे सरकार की यह मंशा स्पष्ट थी कि खेती में सब कुछ सदैव निर्धारित तरीके से ही होता रहे इस बात की निश्चितता नहीं होती है इसलिए ही किसानों को अपने उत्पाद के आधार पर हर तरह के अनावश्यक करों से मुक्ति दे दी जाये और आयकर के किसी भी मानक में उन्हें कहीं से भी न रखा जाये जिससे उनकी अनिश्चित आमदनी होने के चलते उन पर कोई अनावश्यक बोझ भी न पड़ जाये पर सरकार की इस मंशा का दुरूपयोग अमीरों ने किस तरह से किया इसका उदाहरण इस बात से ही समझा जा सकता है कि इस नियम के माध्यम से कर चोरी करने को एक बड़ा उपाय मान लिया गया है.
                 मात्र कुछ लोगों की कृषि से होने वाली आय कुछ अरब रुपयों से बढ़कर किस तरह से लाखों करोड़ों तक पहुंच गयी इस बात का जवाब किसी के पास भी नहीं है क्योंकि आयकर के सलाहकारों और इस नियम का लाभ उठाने वालों ने इस बात पर कभी गौर ही नहीं किया कि जिस सोच के साथ वे एक जिले में काम कर रहे हैं कहीं न कहीं यही सोच पूरे देश में काम कर रही है इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि एक पूर्व आयकर अधिकारी द्वारा मांगी गयी सूचना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया जिसमें यह पता चला कि वर्ष २०११/१२ में आयकर चुकाने वाले लोगों की कृषि आधारित आय २००० लाख करोड़ रुपयों से भी अधिक हो गयी ? बेशक इस धनराशि पर सरकार की कोई नज़र नहीं होती है और इसको केवल कागज़ों पर दिखाकर कालेधन को सफ़ेद करने का काम ही आसानी से किया जाता है तो यह भी मान जाना चाहिए कि देश में एक वित्तीय वर्ष में इतना कालाधन इस योजना का माध्यम से सफ़ेद किया गया ? किसी भी सरकार के पास क्या यही होना चाहिए कि जिस मद से उसे टैक्स नहीं मिल रहा है उस मद में आम लोगों द्वारा किया कहा जा रहा है इस बात की जांच भी न की जाये और इन लोगों को सुविधा के नाम पर बनाये गए नियमों की कमी का खुला लाभ उठाने के लिए छोड़ दिया जाये ?
                  संसद में यह मामला उठाये जाने के बाद जिस तरह से वित्त मंत्री का बयान आया कि इस सूची में कुछ बड़े नाम भी हो सकते हैं तो विपक्ष उन पर राजनीति करने के आरोप लगाने से बचे इस पर विपक्षी बेंचों से इस सूची को जारी करने की माँग भी की गयी पर इस मांग को वित्त मंत्री ने पूरी तरह से अनसुना ही कर दिया. किसानों के लाभ के लिए बनाये गए इस नियम का जिन भी लोगों ने दुरूपयोग किया है देश को उनके नाम जानने का पूरा अधिकार है और विभिन्न नियमों के पीछे छिपकर कर चोरी करने में जो भी लोग आगे हैं वे भले ही किसी भी श्रेणी के क्यों न हों उनके बारे में सरकार को संसद में पूरी जानकारी देनी चाहिए. देश को यह जानना है कि किसानों के लिए बनाये गए इस नियम के पीछे किन लोगों ने अपने काले धन को सफ़ेद करने के लिए पूरा लाभ उठाया है और उनकी कृषि कितनी बड़ी है कि देश में इतनी बड़ी संपत्ति कृषि से बनायीं जा सकती है जबकि आम किसान लगातार आत्महत्या करने पर मजबूर होता जा रहा है ? इस मामले में किसी को भी छोड़ा नहीं जाना चाहिए भले ही वह कितना भी प्रभावशाली ही क्यों न हो क्योंकि यह तो एक बानगी है यदि पूरे कानूनों का आंकलन किया जाये तो संभवतः पूरे देश में कालेधन की एक समानांतर अर्थव्यवस्था के भी चलने से इंकार नहीं किया जा सकता है.   
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शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

राइट टू एजुकेशन के लाभ-हानि

                                                                            केंद्र सरकार द्वारा एक समय में देश के बच्चों के लिए शुरू किये गए महवपूर्ण कार्यक्रम राइट टू एजुकेशन के चलते राज्यों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है जिस कारण इस कानून के लागू होने के इतने वर्षों बाद आज भी राज्य सरकारों को यह नहीं समझ में आ रहा है कि वे इस कानून को आखिर किस तरह से लागू करें जिससे पहले से चल रहे लाखों निजी स्कूलों और उनमें काम करने वाले विभिन्न स्तर के शिक्षकों और कर्मचारियों पर बुरा प्रभाव न पड़े. देश के आर्थिक संसाधनों पर विभिन्न तरह के बोझ डालने वाले अनगिनत उपाय करने के बाद भी आज देश में शिक्षा के स्तर को सरकारी विद्यालयों में सुधारने में कोई सफलता मिलती नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि आम लोगों का यही मानना है कि सरकार चाहे जितने भी प्रयास कर ले पर सरकारी स्कूलों की व्यवस्था सुधरने वाली नहीं है. आज भी जिस तरह से विभिन्न राज्यों में नए भर्ती होने वाले सरकारी शिक्षकों और जिला स्तरीय अधिकारियों/ कर्मचारियों से सेटिंग के चलते विद्यालयों से शिक्षक नदारत ही रहा करते हैं तो सरकार की तरफ से इन पर इतने धन को खर्च करने का औचित्य ही क्या है ?
                                        सरकार को इस बात का अधिकार तो है कि वह निचले स्तर की शिक्षा प्रणाली को सुधारने का काम करे पर वह किस स्तर के संस्थानों की कीमत पर किया जा रहा है इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता भी है. देश में साक्षरता बढ़ाई जानी चाहिए और गंभीर शिक्षा को इस औपचारिक रूप से शिक्षित किये जाने वाली शिक्षा से पूरी तरह अलग ही रखा जाना चाहिए क्योंकि सरकार के बहुमूल्य संसाधन इन लोगों को साक्षर करने के लिए खर्च किये जाते हैं पर यह पूरा तंत्र अपनी उपयोगिता को साबित करने में विफल ही साबित होता है. मेधावी छात्र/ छात्राओं के लिए हर पांच कि०मि० की परिधि में एक गुणवत्ता युक्त पूर्व माध्यमिक विद्यालय स्थापित किया जाना चाहिए जिससे उस क्षेत्र के पढाई में लगन से जुटने वाले बच्चों को एक बेहतर माहौल प्रदान किया जा सके इन छात्र/ छात्राओं के लिए उच्च स्तर की शिक्षा व्यवस्था को समुचित रूप से करने के बारे में भी सोचना चाहिए जिससे इनको आगे बढ़ने में कोई कठिनाई भी न हो. साथ ही केवल साक्षर करने और देश के हर व्यक्ति तक साक्षरता पहुँचाने के लिए गांवों में स्थानीय लोगों के सहयोग से विद्यालय भी चलने के बारे में सोचा जाना चाहिए.
                                 देश में शिक्षा का माहौल तब तक नहीं सुधर सकता है जब तक शिक्षकों में पढ़ाने और वास्तव में पढ़ने के इच्छुक बच्चों के लिए अलग तरह की व्यवस्था नहीं की जाएगी. आज के परिवेश में हर गांव में खुले हुए अधिकांश सरकारी स्कूल केवल जनता के धन को लुटाने का साधन ही बने हुए हैं जिनसे शिक्षा के स्तर को सुधारने का कोई भी प्रयास सफल नहीं होता दिखता है. इस परिस्थिति को समझते हुए इसमें अब आमूल चूल बदलाव की आवश्यकता भी है क्योंकि दूर जिलों के शिक्षक पढ़ाने में दिलचस्पी नहीं रखते हैं जिस कारण से भी शिक्षा के स्तर को सुधारा नहीं जा पा रहा है. मिड डे मील को हर विद्यालय में चलाने के स्थान पर ग्रामसभा में एक साँझा चूल्हा जैसी व्यवस्था पर विचार करना चाहिए जिसको सभी के सहयोग से भी चलाया जा सकता है इससे जहाँ विद्यालयों में भ्रष्टाचार कम होगा वहीं दूसरी तरफ सरकार को गांवों के गरीबों के भोजन की व्यवस्था करने में भी सुगमता ही होने वाली है. कोई भी नयी या पुरानी योजना केवल तभी सफल हो सकती है जब उसमें जुड़े हुए लोग ईमानदारी से पूरा काम करने के बारे में विचार कर सकें अन्यथा बहुत अच्छी परियोजनाओं को देश लंबे समय से कुप्रबंधन के कारण दम तोड़ते हुए देख चुका है.   
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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

कीर्ति आज़ाद को फ्री हिट की आज़ादी

                                                                          बिहार में विपरीत परिस्थितियों में भी लगातार चुनाव जीतने वाले भाजपा के सांसद कीर्ति आज़ाद के मुद्दे पर जिस तरह से भाजपा ने उन्हें निलंबित कर अपनी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमज़ोर ही किया है वह निश्चित तौर पर उसे आने वाले समय में कठिन दौर का सामना करवा सकती है. लोकतंत्र में जनता के सामने सब कुछ खुला रहता है और संभवतः यही कारण है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भारत में सत्ता परिवर्तन बहुत ही सुगम तरीके से होता रहता है. देश में भ्रष्टाचार सदैव ही एक बड़ा मुद्दा रहा है और समय समय पर विभिन्न दलों की केन्द्र और राज्य सरकारों पर भ्रष्टाचार को पोषित करने का आरोप भी लगता रहता है पर पिछली यूपीए-२ की केंद्र सरकार के खिलाफ भाजपा ने जिस तरह से भ्रष्टाचार को एक बड़े मुद्दे के रूप में जनता के सामने प्रस्तुत किया था उससे आम लोगों की यह धारणा ही बन गयी कि मनमोहन सरकार बहुत भ्रष्ट है और इस मामले में सबसे बुरी बात यह हुई कि भाजपा की तरफ से लगभग सभी नेताओं ने देश की स्थिति को बहुत ख़राब करके प्रस्तुत किया जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं था और आज उस किये का फल खुद भाजपा के लिए एक चुनौती बना हुआ है. देश की बिगड़ी हुई छवि को सुधारने और सही सन्देश देने में अभी भी मोदी सरकार को कड़े प्रयास करने पड़ रहे हैं.
                                           कीर्ति आज़ाद ने जिस तरह से डीडीसीए में भ्रष्टाचार का मामला लगातार उठाया है और साक्ष्यों में कमी के कारण सीधे तौर पर भले ही अरुण जेटली पर कोई आरोप साबित न हो पा रहे हों पर स्थिति बिलकुल उसी तरह की है जब कांग्रेस नीत यूपीए सरकार पर भाजपा उसके कुछ मंत्रियों के कारण आरोप लगाया करती थी और उन मंत्रियों के इस्तीफे पर भी अड़ जाया करती थी रेल मंत्री के रूप में पवन बंसल मामले में कांग्रेस पर जिस तरह से उनके इस्तीफे का दबाव बिना कुछ साबित हुए ही लगाया गया था तो भाजपा किस मुंह से उनसे इस्तीफा माँगा करती थी ? आज जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए अरुण जेटली सामने आये हैं तो भाजपा और खुद जेटली अपने वे दिन कैसे भूल सकते हैं जब वे केवल आरोपों पर ही संसद को ठप कर मंत्रियों से इस्तीफ़ा माँगा करते थे क्या नैतिकता के आधार पर तब इस्तीफ़ा मांगना सही था और आज विपक्ष यदि वैसा ही कर रहा है तो वह सदन को बाधित करने का आरोप कैसे लगा सकती है ? भ्रष्टाचार के मामले में मोदी का यह कहना ही पर्याप्त नहीं है कि जेटली भी आडवाणी की तरफ साफ़ निकल आयेंगें क्योंकि यदि मोदी को इतना भरोसा है तो वे जांच को तेज़ी से करवा कर जेटली से सरकार से हटने के लिए भी तो कह सकते हैं.
                                 निश्चित तौर पर इस पूरे मामले में कुछ न कुछ तो गड़बड़ है क्योंकि कीर्ति आज़ाद जैसा बेदाग व्यक्ति केवल क्रिकेट के लिए ही इतना संघर्ष कर रहा है जिसमें उसका कोई व्यक्तिगत हित भी नहीं छिपा हुआ है. कीर्ति आज़ाद को पार्टी से निकाल कर मोदी-शाह ने भले ही अनुशासनहीनता पर कठोरता प्रदर्शित करने के नाम पर कुछ हासिल कर लिया हो पर पूरे देश में एक बात तो अवश्य ही सन्देश के रूप में चली गयी है कि यदि जेटली सही हैं तो वे जांच होने तक पद से क्यों नहीं हट जाते हैं ? कीर्ति के तेवर और कल ही हॉकी इंडिया से जुड़े एक मुद्दे पर केपीएस गिल ने भी जेटली पर भ्रष्ट आचरण को लेकर निशाना लगाया है वह उनकी विश्वनीयता को और भी संदेहास्पद बना देता है. अब भाजपा और एनडीए सरकार को सही मुद्दे को खोजकर जेटली को जाँच पूरी होने तक सरकार से बाहर बैठाने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में मोदी-शाह से नाराज़ चल रहे पार्टी के लोग उनसे किस तरह से बदला लेने की सोचकर बैठे हैं यह कोई नहीं जनता है. विपक्ष में बैठकर भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात करना एक बात है और सरकार चलाते समय उससे सही तरह से निपटना बिल्कुल दूसरी बात है और यह अब मोदी-शाह को समझ में आ भी रहा होगा.      
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मंगलवार, 17 नवंबर 2015

रेलवे की खुली लूट

                                                                           कभी देश की शान और विकास की धड़कन रही रेलवे सुधारों की गाड़ी आगे बढ़ाने के नारे के साथ जिस तरह से यात्रियों के साथ मनमानी करने पर उतर आई है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में अब यात्रियों के कष्टों के बारे में सुनने वाला कोई नहीं है. सुविधाओं को उपलब्ध कराने और दलालों पर अंकुश लगाने में पूरी तरह से विफल रहने के बाद अब रेलवे ने वेटिंग टिकटों को निरस्त करने के जो नियम बनाये हैं उनके चलते हज़ारों लोगों को अपनी कमाई रेलवे के हाथों गंवानी पड़ रही है पर १२ नवम्बर से लागू हुए नए नियमों के चलते टिकट काउंटर्स पर यात्रियों के साथ क्या बीत रही है यह जानने का समय रेलवे बोर्ड और रेल मंत्रालय के साथ खुद रेलमंत्री को भी नहीं है जिसके चलते बुकिंग विंडोज पर रोज़ ही समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं तथा आम जनता रेलवे की इस खुली लूट का शिकार बन रही है. सबसे बड़ी बात यह है कि नए नियमों के चलते आम यात्रियों के साथ जो कुछ भी हो रहा है उसको देखते हुए क्या सरकार को चेतने की आवश्यकता नहीं है और क्या जनता से जुड़े हुए इस मुद्दे पर विपक्षी दलों को सरकार के इस कदम का विरोध करने की आवश्यकता नहीं है ?
                                      यदि रेलवे दलालों को रोकने के लिए वास्तव में गंभीर होती तो देश के मुख्य मार्गों पर रेल विभाग के अधिकारियों की सांठगांठ से चलने वाले दलालों के रैकेट को पकड़ने और उन पर अंकुश लगाने के बहाने आम यात्रियों के साथ इस तरह का व्यवहार नहीं करती पर वर्तमान सरकार में उसे तो हर रेल यात्री ही दलाल दिखाई देने लगा है जिसके चलते इतनी बड़ी समस्याएं सामने आ रही हैं. जिन यात्रियों के पास कन्फर्म टिकट हैं समय के बाद निरस्त किये जाने पर उनकी पूरी धनराशि को ज़ब्त करने को भी किसी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से हर तरह से रेलवे ने अपनी आमदनी दलालों को रोकने के नाम पर बढ़ाने के जन विरोधी कदम उठाने शुरू कर दिए हैं उनसे भी बात नहीं बनने वाली है. एक तरफ सरकार डिजिटल इंडिया का गुणगान करने में नहीं चूक रही है और जब उसे धरातल पर उतारने का समय आता है तो वह परंपरागत तरीकों से ही काम करना चाहती है. इस परिस्थिति में क्या एक अभियान चलाकर आईआरसीटीसी से टिकट बुक करने वाले सभी यात्रियों के खातों का वैरिफिकेशन नहीं करना चाहिए जिससे सही यात्रियों और दलालों की पहचान करने में आसानी हो जाये ?
                                टिकट बुक करते समय लोगों से उनकी आधार संख्या को भी माँगा या भरवाया जा सकता है और टिकट कन्फर्म न होने की दशा में आधार से जुड़े हुए बैंक खाते में सीधे वापसी की धनराशि भेजी जा सकती है इससे जहाँ दलालों के लिए काम करना मुश्किल हो जायेगा वहीं रेलवे को भी कोई नुकसान नहीं होगा. जो यात्री आईआरसीटीसी की सुविधा लेते हुए टिकट बनवा रहे हैं उनको सीधे तौर पर अपनी आधार संख्या को खाते से जोड़ने के बारे में कहना चाहिए जिससे जिन खातों से अधिक मात्रा में टिकट बनाये जा रहे हैं उन पर भी नज़र रखकर उन्हें बंद किया जा सकता है या बिना आधार संख्या के उनके टिकटों को कन्फर्म नहीं किये जाने का विकल्प भी अपनाया जा सकता है. अच्छे दिनों के नारे के साथ आई मोदी सरकार ने जिस तरह से रेलवे में आमूल चूल परिवर्तन का दवा किया था अभी वह तो बहुत दूर की कौड़ी है पर उच्च शिक्षित रेलमंत्री के निर्देश पर संभवतः यात्रियों से हर तरह से पैसे वसूलने की नीति को आगे बढ़ाया जा चुका है. देश काल और परिस्थिति के अनुसार काम करने के स्थान पर रेलवे ने केवल अपने लाभ को किसी भी तरह से बढ़ाने की जो नीति अपनायी है उसमें उसे अपने यात्री ही खोने पड़ेंगें क्योंकि त्यौहार स्पेशल ट्रेनों का नाम सुविधा करके जिस तरह से अतिरिक्त शुल्क भी वसूला जाना शुरू किया गया है उससे तो यही लगता है सरकार किसी भी त्यौहार के मौसम में यात्रियों की मजबूरी का लाभ उठाने के बारे में सोचे बैठी है.        
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गुरुवार, 17 सितंबर 2015

चुनावी खर्चे और नेता

                                                                              देश चलाने के लिए जनता द्वारा चुने जाने वाले सांसदों और उनकी पार्टियों द्वारा किस तरह से लगातार सफ़ेद झूठ बोला जाता है इसका ताज़ा उदाहरण विभिन्न दलों के पिछले आम चुनावों में जीते हुए सांसदों और उनकी पार्टियों द्वारा दिए गए ब्योरे से ही पता चल जाता है. इस सबमें सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के सांसदों की तरफ से दिए गए आंकड़ों में भी भारी अंतर दिखाई दे रहा है. पांच राष्ट्रीय दलों के ३४२ सांसदों में से २६३ ने बताया कि उन्हें अपनी पार्टियों से ७५.७८ करोड़ रूपये मिले जबकि इन नेताओं की पार्टियों का कहना है कि उनकी तरफ से केवल १७५ सांसदों को ही ५४.७३ करोड़ रूपये दिए गए थे. अब इन आंकड़ों में देश को चलाने में लगी हुई पार्टियों को सही माना जाए या आज चुनाव जीतकर जो लोग माननीय बन चुके हैं उनकी बातों को सही कहा जाये. चुनाव आयोग के पास इस तरह के मामलों में कितनी कार्यवाही करने के अधिकार हैं यह अभी भी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है क्योंकि नेता देश में अति सक्रिय चुनाव आयोग की परिकल्पना भी नहीं करना चाहते हैं.
                             देश में हर तरह के चुनाव में हर स्तर पर मतदाताओं को लुभाने के लिए हर हथकंडे का इस्तेमाल किया जाता रहा है और इस मामले में केवल उसी बात की पुष्टि ही होती है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रतीक संसद तक पहुँचने के लिए तरह तरह की झूठी कसमें खाने में शामिल रहने वाली हमारी पार्टियां और नेता वास्तव में आंकड़ों में किस हद तक मनमानी करते हैं. देश को हर बात पता होनी चाहिए इस बात की पारदर्शिता भी दिखाई जानी चाहिए पर कई मामले ऐसे भी सामने आये हैं जिनमें पार्टी कह रही है कि उसने चुनाव लड़ने के लिए धन नहीं दिया है जबकि नेता उसे अपने खर्चे में शामिल किये बैठे हैं. पिछले कुछ दशकों से देश के राजनैतिक चरित्र का जिस तेज़ी से पतन हुआ है वह निश्चित रूप से चिंता का विषय तो है पर कोई भी व्यक्ति कहीं से भी कुछ भी करने के लिए इतना निरंकुश ह जाये इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है. यह अपने आप में बहुत ही गंभीर मामला है क्योंकि जिन दलों और नेताओं पर जनता अपना विश्वास जताती है वे इस तरह की हरकतों में शामिल होकर आखिर क्या साबित करना चाहते हैं और वह भी उस परिस्थिति में जब नेताओं को आम जनता खुले आम अपशब्दों से नवाज़ती रहती है ?
                                क्या इस मामले को सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान में लेते हुए सभी मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों, चुनाव आयोग और लोकसभाध्यक्ष को नोटिस जारी करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए क्योंकि यह मुद्दा जितना सरल लग रहा है उतना है भी नहीं और आने वाले समय में हर प्रभावशाली और धनी नेता इसी तरह से देश के कानून और चुनाव आयोग के आदेशों की धज्जियाँ उड़ाने से नहीं चूकने वाले हैं. क्या यह समय चेतने का नहीं है क्योंकि आज यदि ये सूचनाएँ सामने आ रही हैं और उनमें इतनी बड़ी गड़बड़ी भी खुले तौर पर स्पष्ट है तो क्या यह मामला कोर्ट में नहीं जाना चाहिए ? विधि द्वारा स्थापित संविधान की कसमें खाते समय जो कुछ भी कहा जाता है वह हमारे राजनैतिक दलों और नेताओं के लिए कितना खोखला और हल्का होता है यह तो देश के सामने ही है. कानूनी रूप से जब ये आंकड़े अब सामने आ चुके हैं तो क्या हर मामले में नियम से काम करने वाली लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी इस बात को अपनी तरफ से संसद के सदन में उठाएंगीं और क्या देश की गौरवशाली संसद में इन आंकड़ों में बाजीगरी करने वाले माननीयों और राजनैतिक दलों के विरुद्ध कोई निंदा प्रस्ताव सदन में पारित किया जायेगा ? या फिर देश को छिछले मुद्दों में ही भटकने की प्रक्रिया इसी तरह से चालू रहेगी और जनता और संवैधानिक संस्थाओं के सामने हमारे नेता हमेशा की तरह झूठ ही बोलते रहेंगें ?            
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सोमवार, 14 सितंबर 2015

केंद्र सरकार - मंत्रालय और वित्तीय अनियमितता

                                               केंद्र सरकार के वित्त मंत्रालय द्वारा महत्वपूर्ण विभागों में वित्तीय मामलों में नियमों के अनुपालन न किये जाने को लेकर एक बार फिर से दिशा निर्देश जारी कर दिए हैं जिनके चलते आने वाले समय में देश में केंद्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार के लिए सुरक्षित मार्ग बनाने वाले लोगों के लिए भी बड़ी कठिनाइयां सामने आने वाली हैं. केंद्र सरकार की तरफ से इस बात के स्पष्ट दिशा निर्देश भी हैं कि किस स्तर का वित्तीय लेन देन किन मानकों के साथ किया जाना चाहिए पर इस सम्बन्ध में कुछ गड़बड़ी उजागर होने के बाद कुछ विभागों की फिर से जाँच की गयी जिसमें इस तरह के मामले सामने आये जिन्हें एक परंपरा के रूप में ही लिया जाना लगा है. नियमों के अनुसार २५००० रुपयों की सीमा के बाद के सभी भुगतान इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किये जाने के आदेश हैं पर यहाँ पर भी इस तरह के भुगतानों को चेक के ज़रिये ही किये जाने के कई मामले सामने आये हैं जिन पर महालेखा नियंत्रक ने गंभीर आपत्तियां भी जताई हैं जिसके बाद सरकार ने फिर से इस दिशा में सोचने की तरह कदम बढ़ा दिए हैं. कई मामलों में किसी और मद के खर्चे को किसी अन्य मद में खर्च किया गया है और बिना टेंडर के भी बड़े कामों को करने के भी संकेत मिले हैं.
                                        इस तरह की किसी भी परिस्थिति में कोई भी सरकार वित्तीय मामलों में केवल पारदर्शिता बढ़ाने पर ही ज़ोर दे सकती है और इसके लिए उचित माहौल बनाये जाने की तरफ कदम बढ़ा सकती है पर अंत में इनका अनुपालन तो विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों को ही करना है जिसके लिए संभवतः वे अभी मानसिक रूप से तैयार नहीं दिखाई देते हैं. किसी एक व्यक्ति की मंशा से पूरी व्यवस्था को नहीं सुधारा जा सकता है क्योंकि किसी भी सरकार के मुखिया के प्रयासों को निचले स्तर तक पहुँचाने के लिए कड़े कदम उठाने की आवश्यकता भी पड़ती है. आज भी केंद्र और राज्य सरकारों में बहुत सारे ऐसे लोग मौजूद हैं जो कम्प्यूटर पर काम करने को एक बोझ ही समझते हैं जिसके कारण इनकी लम्बी चौड़ी फ़ौज़ होने के बाद भी काम करने की प्रक्रिया में तेज़ी नहीं आ पाती है. आधुनिक व्यवस्था को समझने के स्थान पर वे आज भी पुरानी व्यवस्था से ही काम चलना चाहते हैं जिससे पूरी व्यवस्था की रफ़्तार सुस्त हो जाती है. किसी भी विभाग के काम काज को बदलने के लिए उनके अनुरूप गंभीर कार्यशालों की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे हर विभाग अपने को आज के स्वरुप में ढाल सके.
                                              इस दिशा में प्रशासनिक सुधारों की बातें लगातार किया जाने वाला काम है और जब तक आधुनिकतम सुधारों के साथ सरकारी मंत्रालय काम करना नहीं सीख लेते हैं तब तक इस प्रयास को जारी ही रखना चाहिए जिससे कहीं भी कोई कमी न रह जाये. देश को तेज़ी से काम करने वाला तंत्र चाहिए पर आज भी अधिकतर काम अपनी पुरानी रफ़्तार के साथ ही किये जा रहे हैं. मोदी सरकार ने भी केंद्र के सभी मंत्रालयों के लिए नए सिरे से दिशा निर्देश जारी किये थे पर उनके सख्त प्रशासक होने के बाद भी आज मंत्रालयों में पुरानी संस्कृति हावी है तो क्या अब इस दिशा के प्रयासों को पूरा करने के लिए कुछ कठोर दण्डों का प्रावधान भी कड़ाई से लागू नहीं किया जाना चाहिए ? प्रशासनिक सुधारों के लिए आयोजित की जाने वाली विभिन्न कार्यशालों को विशुद्ध पर्यटन मानने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध क्या अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं की जानी चाहिए क्योंकि पत्राचार के माध्यम से जितने सुधार हो सकते थे वे अब देश के सामने हैं इसलिए आने वाले समय में इस तरह से वित्तीय अनुशासन को न मानने वाले लोगों के लिए क्या कुछ कठोर व्यवस्था अब समय की मांग नहीं बन चुकी है ?         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

पुष्पक एक्सप्रेस और रेल सुरक्षा

                                                  लखनऊ मुंबई के बीच चलने वाली सबसे लोकप्रिय और महत्वपूर्ण ट्रेन पुष्पक एक्सप्रेस पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से लगातार ही चोरों के निशाने पर आ गयी है वह रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था जो कि राज्य सरकार के साथ मिलकर चलायी जाती है और रेलवे के काम करने के तरीके पर भी गंभीर सवाल उठाती है. अभी तक देश के विभिन्न हिस्सों में कभी कभी यात्रियों के साथ लूटपाट की घटनाएँ होती रहती हैं जिनके चलते रेलवे की किरकिरी होती रहती है पर पहली बार ऐसा देखा जा रहा है कि चोरों द्वारा लगेज के लिए निर्धारित डब्बे में खुलेआम लूटमार की जा रही है और राजकीय रेलवे पुलिस, रेल सुरक्षा बल इस मामले को गंभीरता से लेने के लिए तैयार ही नहीं दीखते हैं. इस मामले की गंभीरता से जांच करवाये जाने पर बहुत बड़े घोटाले के भी सामने आने की सम्भावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि जिस तरह से लगभग चार करोड़ के माल को गायब किया गया है उसके बाद उस स्तर पर कार्यवाही होती नहीं दिख रही है जिस रेलवे की तरफ से होना चाहिए. देश के गृह मंत्री राजनाथ सिंह के निर्वाचन क्षेत्र की महवपूर्ण ट्रेन की यह हालत देखकर पूरी स्थिति का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है.
                                     जैसा कि पहले से ही अनुमानित है कि रेलवे इस मामले को पुलिस पर डालने की कोशिश करेगी और पुलिस इस मामले को कर चोरी आदि से जोड़ने की तरफ ले जाना चाहेगी क्योंकि वर्तमान परिस्थिति में दोनों को ही यह सबसे अधिक उपयुक्त लगता है और कुछ दिनों में रेलवे, सरकार, व्यापारी और जनता इस लूट को भूल जाएँगें और केवल मामले की जाँचें ही होती रहेंगीं. क्या ऐसी परिस्थिति में सरकार के पास ओर मामले को देखने के लिए समय भी है या रेल मंत्रालय का ध्यान केवल बुलेट ट्रेन तक ही सीमित रहने वाला है ? बहुत ही सीमित ठहरावों के साथ चलने वाली बेहद महत्वपूर्ण ट्रेन में लुटेरे घंटों तक आराम से लूटपाट करते रहते हैं और साथ चल रहे पुलिस स्टाफ को भी यह पता नहीं चल पा रहा है जबकि चोर लोहे की चादरों तक को काटकर यह काम करने में लगे हुए हैं ? आखिर मुंबई से एक विशेष कम्पनी के माल पर ही चोर क्यों हाथ  साफ़ कर रहे हैं यह भी सोचने और समझने का विषय है और उन चोरों को यह कैसे पता चल पा रहा है कि इसमें कैसा माल जा रहा है जब तक कि व्यापारी या रेलवे से जुड़े व्यक्ति इसमें शामिल न हों ?
                                  रेलवे को इस मामले को बहुत ही गंभीरता से लेते हुए पूरे मामले की जांच करवानी चाहिए जिससे यह बात पता लगे कि कहीं रेलवे के अधिकारी भी इस रैकेट में शामिल तो नहीं हैं पूरा मामले कर चोरी से जुड़ा हुआ भी हो सकता है क्योंकि जिस तरह से मामला सामने आ रहा है तो सभी एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं. व्यापारी का कहना है कि सामान की सुरक्षा करना रेलवे की ज़िम्मेदारी है और पुलिस रिपोर्ट दर्ज़ नहीं कर रही है पर पुलिस का कहना है कि इस मामले में इन व्यापारियों के पास उचित बिल आदि भी नहीं होते हैं जिससे वे रिपोर्ट लिखवाना ही नहीं चाहते हैं ? क्या रेलवे के लोग भी बिना बिल के इस तरह अवैध रूप से बड़े पैमाने पर कर चोरी करवाने में शामिल हैं अब इस पहलू की भी पूरी जांच होनी ही चाहिए क्योंकि रेलवे के संसाधनों का दुरूपयोग करके कर चोरी को इतने बड़े पैमाने पर अंजाम दिया जाना अपने आप में ही बहुत बड़ी बात है और यदि एक मार्ग की एक ट्रेन में इस तरह से संभव हो पा रहा है तो पूरे देश के रेल नेटवर्क में क्या क्या नहीं किया जा रहा होगा यह सोचने का विषय ही है. आशा है कि इस मामले को स्वयं रेल मंंत्री अपने स्तर से दिखवाने का प्रयास करेंगें जिससे रेलवे और देश को चूना लगाने वाले लोगों को पकड़ा जा सके तथा रेलयात्रा की सुरक्षित भी बनाया जा सके.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 26 जून 2015

राजनीति में नैतिकता के मानदंड

                          ललित मोदी से जुड़े हुए खुलासों के बाद कदाचार के मामलों को लेकर जिस तरह से भाजपा एकदम से दबाव में आती दिखी उसी बीच महाराष्ट्र से पंकजा मुड़े को लेकर किये गए भ्रष्टाचार के खुलासे से भाजपा के शीर्ष स्तर के लिए अपने को बचाने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ सकती है. संख्या बल पर कमज़ोर विपक्ष लोकसभा में तो पूरी तरह से सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलता हुआ दिखाई देने वाला है और राज्य सभा में सरकार की मुसीबतें पहले से ही कम नहीं हैं क्योंकि सरकार के पास वहां पहले ही बहुमत की समस्या आई हुई है. ऐसे में देश के विकास के लिए लिए जाने वाले महत्वपूर्ण निर्णयों को लेकर संसद किस तरह से चल पायेगी और कितना काम हो पायेगा यह सब अभी कोई नहीं बता सकता है क्योंकि अाने वाले समय में इन खुलासों से जुडी हुई कितनी बातें सामने आने वाली हैं यह कोई नहीं जनता है पर कमज़ोर पड़ी कांग्रेस ने इस मुद्दे को अपने स्तर पर उछालना शुरू कर दिया है और सरकार तथा भाजपा जिस तरह से इन नेताओं का अनमने ढंग से बचाव करने में लगी हुई है वह भी जनता की नज़रों से छिपा नहीं हुआ है.
                          सार्वजनिक जीवन में रहने के कारण कई बार नेताओं द्वारा कई ऐसे काम भी हो जाया करते हैं जो समय बीतने पर उनके लिए बहुत समस्या खडी कर देते हैं और ऐसा नहीं है कि यह केवल भाजपा के साथ ही हो रहा है क्योंकि पूरे देश में सत्ता का अपना एक स्थायी भाव है और कोई भी पार्टी या नेता सत्ता में हों सरकार चलाने की प्रक्रिया कमोबेश के जैसी ही रहा करती है अब इसे नेताओं की बाबुओं पर निर्भरता माना जाये या बाबुओं का नेताओं से अधिक प्रभावशाली होना पर सरकार के नौकरशाह हमेशा ही अपने कद को एक स्तर पर बनाये रखने में सफल रहा करते हैं. इस तरह के संदिग्ध मामलों में आखिर देश का संविधान और नैतिकता क्या कहती है इस पर सभी को विचार करने की बहुत आवश्यकता भी है क्योंकि सरकारें बदलने से देश नहीं बदला करता है और किसी भी निर्वाचित सरकार के लिए आखिर वो कौन सा पैमाना निर्धारित किया जाये जिस पर चलकर वो अपन को भ्रष्टाचार और कदाचार से पूरी तरह से मुक्त रखने में सफल हो सके. क्या देश में नेताओं को खुद ही ऐसे उच्च मानदंडों पर काम नहीं करना चाहिए जिसमें ऐसे आरोपों की गुंजाईश ही न रहे और आरोप लगने पर क्या स्वेच्छा से सभी को अपने पद छोड़ने के बारे में या सक्रिय राजनीति से अस्थायी रूप से अलग होने के बारे में नहीं सोचना चाहिए ?
                        सत्ताधारी दल पर पिछली लोकसभा में हर तरह के आरोप लगाने वाली भाजपा आज पूर्ण बहुमत से सत्ता में है पर उसका बर्ताव भी कांग्रेस से अलग दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि तब भी विपक्ष आरोपों लगाने के साथ नेताओं के इस्तीफे की मांग किया करता था और आज भी वही स्थिति है और मोदी सरकार भी ठीक मनमोहन सरकार की तरह अपने मंत्रियों/ नेताओं को बचाने में ही लगी हुई है. दोनों मामलों में एक बड़ा अंतर यह भी है कि उस समय अधिकांश मामले सहयोगी दलों के नेताओं के खिलाफ थे पर इस बार यह सारे मामले भाजपा नेताओं के खिलाफ ही हैं फिर भी सत्ता के वे उच्च मानदंड कहीं से दिखाई नहीं दे रहे हैं जिनकी बातें भाजपा विपक्ष में रहकर किया करती थी ? अब जब भाजपा खुद सत्ता में है तो उसे इस तरह के मामलों से निपटने के लिए स्वेच्छा के स्थान पर इसे कानूनी रूप देने के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि समग्र रूप से न तो कोई दल पूरा बेईमान है और न ही कोई पूरा ईमानदार. समय-समय पर दलों के नेता इस तरह कि हरकतों में शामिल रहा करते हैं जिनसे हर दल की शीर्ष सत्ता को समस्या होती है. राजनैतिक लोगों के खिलाफ लगने वाले आरोपों की खुली सुनवाई होनी चाहिए और जब तक वे निर्दोष या दोषी साबित न हो जाएँ उनके मामलों की दैनिक आधार पर सुनवाई की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा इस तरह के किसी भी भ्रष्टाचार से निपटने के लिए राज्यों के अधिकारियों का एक पूल बनाया जाना चाहिए जिसके पास इस तरह के मामलों की जाँच करने के अधिकार हों.      
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शुक्रवार, 19 जून 2015

घरेलू गैस - डीबीटीएल में घोटाला

                                     यूपी और बिहार से कुछ मामलों के सामने आने के बाद जिस तरह से घरेलू गैस की सब्सिडी सीधे उपभोक्ताओं के खाते में पहुँचाने की एक महत्वपूर्ण परियोजना को संगठित भ्रष्टाचार से बड़ा झटका लगा है सरकार को उसके बारे में कुछ विशेष सोचने की आवश्यकता है. यह योजना अपने आप में पूरी तरह से सटीक है फिर भी अभी तक अपनी पूर्ववर्ती संप्रग सरकार पर हर बात में भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले राजग सरकार इस मुद्दे पर बहुत अधिक घिर भी सकती है क्योंकि यह मामला केवल अच्छी नीतियां बनाने से ही सम्बंधित नहीं है उसके सफल क्रियान्वयन से भी बहुत अधिक जुड़ा हुआ है. डीबीटीएल की पहली परिकल्पना संप्रग सरकार ने ही की थी क्योंकि उसे यह दिखाई दे रहा था कि इस क्षेत्र में सरकार द्वारा जो भी सब्सिडी दी जाती है उसका बड़े पैमाने पर दुरूपयोग होता रहता है और सरकार चाहकर भी पुरानी व्यवस्था के अंतर्गत उसे रोक पाने में पूरी तरह से विफल ही रही तो यह सोच विकसित हुई कि सब्सिडी की धनराशि सीधे ही बैंक खाते में भेजने का काम शुरू किया जाये जिससे उपभोक्ताओं तक वास्तविक मदद को पहुँचाया जा सके.
                             इस मामले के उजागर होने से यह बात स्पष्ट हो गयी है कि उपभोक्ताओं के डीबीटीएल फॉर्म भरते समय जिस तरह से मनमानी की गयी क्या उसमें अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि यूपी के पूर्वांचल में जिस स्तर पर लोगों के बैंक की गलत जानकारी भरी गयी उसके बाद यह स्पष्ट है कि गैस कंपनियों की तरफ से जो फॉर्म उपलब्ध कराये गए थे उनमें भी पूरी जानकारी के दोबारा फीड करने पर किसी भी तरह की रोक नहीं थी वर्ना सैकड़ों लोगों की सब्सिडी किसी एक खाते में जाती रही और किसी को कुछ भी पता नहीं चल पाया ? इस पूरे खेल में संभवतः ये गैस एजेंसियां भी पूरी तरह से शामिल रही हैं क्योंकि बिना संचालकों के इतने बड़े पैमाने पर हेर-फेर करने की हिम्मत आखिर कैसे की जा सकती थी इस प्रकरण में अब जाँच में जो कुछ भी सामने आये सबसे पहले उन संचालकों से डीलरशिप छीन लेने की प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए जिससे अन्य संचालकों पर भी इस बात में पारदर्शिता बरतने का दबाव बनाया जा सके तथा उपभोक्ताओं के लिए भी पूरी व्यवस्था में अपनी जानकारी को जांचने की सही व्यवस्था भी की जानी चाहिए.
                                  प्राथमिक तौर पर इस मामले में एक सार्वजनिक अधिसूचना जारी कर उन सभी उपभोक्ताओं को अपने बैंक खातों को फिर से चेक करने की व्यवस्था की जानी चाहिए जिन्हें अभी तक एक बार भी सब्सिडी नहीं मिल पाई है क्योंकि बड़ा खेल वहीं पर खेल जा रहा है साथ ही गैस कम्पनियों को अपने सॉफ्टवेयर में इस बात का संशोधन भी करना चाहिए कि जब एक व्यक्ति के नाम से दो कनेक्शन नहीं हो सकते हैं तो दो व्यक्तियों की सब्सिडी एक बैंक खाते में कैसे जा सकती है ? जहाँ कहीं भी सब्सिडी जाने के लिए एक खाते को दोबार उपयोग में लाया गया है उन्हें चिन्हित कर फिर से जाँच करने के बाद ही सब्सिडी देने की व्यवस्था पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि जब तक इस मामले में सख्ती नहीं की जाएगी तब तक सुधार संभव भी नहीं है. केंद्र सरकार के स्तर पर एक महत्वपूर्ण बदलाव यह भी किया जा सकता है कि सब्सिडी का रास्ता उल्टा कर दिया जाये जिसमें उपभोक्ताओं को गैस सब्सिडी काटकर ही पहले की तरह उपलब्ध करायी जाये और सब्सिडी की धनराशि सीधे गैस कम्पनी के खाते में भेज दी जाये जिससे कुल सब्सिडी दिए जाने में व्याप्त अनियमितता को पूरी तरह से रोका जा सकता है और तीनों गैस कम्पनियों के लिए भी यह बहुत आसान हो जायेगा कि उन्हें यह धनराशि सीधे मिलने लगेगी.              
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शनिवार, 13 जून 2015

डॉक्टर - पर्चे और जेनेरिक दवाएं

                                                     केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से एक बार एक अच्छी पहल की जा रही है जिसमें डॉक्टर्स के लिए एक अधिसूचना जारी की जाने वाली है उसके तहत पर्चे पर कैपिटल लेटर्स में साफ़ साफ़ दवाएं लिखने के साथ ही उसके जेनेरिक नाम का उल्लेख करना भी आवश्यक कर दिया जायेगा. आज जिस तरह से दवा कम्पनियों और डॉक्टर्स के बीच एक खतरनाक गठजोड़ पनप चुका है उसको देखते यदि ऐसा कोई प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले समय में मरीज़ों को बहुत आसानी हो सकती है पर मेडिकल एथिक्स के नाम पर पूरी पोथियाँ पढने के बाद भी अगर सरकार को इस तरह की बातें डॉक्टर्स पर थोपने को मजबूर होना पड़ रहा है तो यह अवश्य ही चिंता का विषय है क्योंकि डॉक्टर को आज भी समाज में बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. यदि सरकार इस तरह की बातों को लागू करने के बारे में आगे बढ़ रही है तो निश्चित तौर पर यह चिकित्सा जगत के लिए आत्म चिंतन का समय है जिसमें रोगियों को हर स्तर पर किसी न किसी तरह से अधिक पैसे खर्च करने के लिए मजबूर किया जाता है और उसके पास संभवतः कोई अन्य विकल्प भी नहीं होता है.
                                   यह अपने आप में बिलकुल सही कदम है कि डॉक्टर्स को साफ़ अक्षरों में दवाएं लिखने के लिए निर्देशित किया जाये क्योंकि आज जिस तरह से हर डॉक्टर के पास एक मेडिकल स्ट्रोर है जहाँ पर वह अपने जुगाड़ वाली दवाएं ही रखना और बेचना चाहते हैं तो उन पर कड़ी लगाम लगाया जाना आवश्यक है क्योंकि वे दवाओं एक नाम इस तरह से लिख देते हैं कि उनके मेडिकल स्टोर के अतिरिक्त किसी और के लिए उसे पढ़ पाना असंभव सा ही होता. इस क्षेत्र में यदि किसी भी तरह से सुधार किया जा सके तो यह आम जनता के लिए बहुत ही लाभकारी कदम साबित हो सकता है पर यदि कोई अपनी राइटिंग ख़राब होने का बहाना लगाकर इसी तरह से लिखता रहे तो उस पर क्या कोई कार्यवाही संभव हो पायेगी क्योंकि आज अधिकांश डॉक्टर्स की राइटिंग ऐसी हो चुकी है जिसे पढ़ पाना सबके वश की बात नहीं है. इस मामले में सुधार दोनों तरफ से अपेक्षित है क्योंकि जब तक खुद अपने से बदलाव आने के बारे में डॉक्टर्स नहीं सोचेंगें तब तक उन पर किस तरह से यह नियम लागू किया जा सकता है इसलिए मामला कानूनी से स्वतः सुधार करने का अधिक बन चुका है पहले भी कई बार डॉक्टर्स को लेकर सरकार कई निर्देश जारी कर चुकी है पर अब तक उनका कोई व्यापक असर कहीं भी नहीं दिखाई देता है.
                                 जेनेरिक दवाओं के उपयोग से निश्चित तौर पर आम रोगियों को बहुत लाभ हो सकता है पर हमारे देश में जिस तरह किसी भी क्षेत्र में गुणवत्ता पर नियंत्रण की कोई मज़बूत व्यवस्था अभी तक नहीं बन पाई है तो उस स्थिति में सरकार जेनेरिक दावों का मानकीकरण किस तरह से कर पायेगी ? जब तक जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता है तब तक यदि डॉक्टर्स द्वारा यह दवाएं लिखी भी जाती हैं तो आने वाले समय में रोगियों को कैसी दवाएं मिल पा रही हैं इस बात का भी सही तरह से पता नहीं चल पायेगा और रोगियों को सही दवाएं उपलब्ध कराने का सपना फिर से अधूरा ही रह जाने वाला है. सबसे पहले केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर इन दवाओं की गुणवत्ता नियमित और औचक रूप से करने के तंत्र को विकसित करने की आवश्यकता है क्योंकि केवल जेनेरिक नाम लिखने से असली या नकली दवाओं के बारे में आम लोग कैसे जान पायेंगें ? निश्चित तौर पर इस काम को करने में केंद्र सरकार की मंशा अच्छी ही है पर बिना तैयारियों के इस तरह एक आदेश धरातल पर कितना असर डाल पायेंगें यह चिंता का विषय है यह काम केवल उपलब्धि गिनाने के स्थान पर ठोस कार्य योजना के साथ भले ही कुछ समय लेकर लागू किया जाये तभी इसका वास्तविक लाभ आम जनता तक पहुँच सकता है.           
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बुधवार, 27 मई 2015

बोफोर्स - एक मीडिया स्कैंडल

                                                      स्वीडन की बोफोर्स कम्पनी से राजीव गांधी के पीएम रहते खरीदी गयीं बोफोर्स तोपों ने भारतीय राजनीति में जितना तहलका मचाया था वह संभवतः राष्ट्रपति के लम्बे समय बाद स्वीडन दौरे से पहले दिये गए एक महत्वपूर्ण बयान के बाद ख़त्म होने की तरफ जा सकता है क्योंकि जिस तरह से प्रणब मुखर्जी ने इसे एक मीडिया स्कैंडल कह कर बात ख़त्म की उससे यही लगता है कि अब भाजपा भी बोफोर्स के बनावटी आवरण से अपना पीछा छुड़ाना ही चाहती है क्योंकि १९८९ के आम चुनावों में उसे उस मामले का जो भी राजनैतक लाभ मिलना था उसका वह भरपूर उपयोग कर चुकी है. तीन दशक बीतने के बाद भी आज के समय तक जिस तरह से यह मुद्दा दोनों देशों के मज़बूत रिश्तों के बीच खटास का कारण बना हुआ है संभवतः मोदी सरकार भी उससे अलग होना चाहती है. आज भी स्वीडन विभिन्न तरह की तकनीक के क्षेत्र में भारत की बहुत मदद कर सकता है और संभवतः एक रणनीति के तहत राजीव सरकार के बाद से लगभग सभी सरकारों ने स्वीडन से एक दूरी बनकर रखी थी क्योंकि स्वीडन का नाम आने मात्र से ही यह मामला बोफोर्स की तरफ घूम जाया करता था और जब इसके एक समय आलोचक रहे भाजपाई नेताओं को आज उसकी सही स्थिति पता चल रही है तो संबंधों पर पड़ी धूल साफ़ करने के बारे में सोचना शुरू कर दिया गया है.
                                              संभवतः इस मामले में मोदी सरकार की तरफ से राष्ट्रपति को इस तरह के बयान देने के लिए ही कहा गया हो क्योंकि लम्बे समय तक राजीव गांधी और कांग्रेस पर बोफोर्स को लेकर हमलावर रही भाजपा और पीएम मोदी इस मसले पर कुछ भी कहने में खुद को असहज ही महसूस करते और निश्चित तौर पर उनके इस तरह के किसी बयान को एक बड़ा यू-टर्न भी माना जाता तभी सरकार ने अपने स्तर पर विचार कर यह ज़िम्मा राष्ट्रपति पर छोड़ दिया क्योंकि वे बोफोर्स मामले के सामने आने के बाद देश के रक्षा मंत्री भी रहे हैं. एक पूर्व कांग्रेसी नेता के रूप में राष्ट्रपति द्वारा इस मामले पर सधी हुई शुरुवात कर ही दी गयी है और जिस तरह से रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी राष्ट्रपति के बयान पर कोई प्रतिक्रिया देने से ही मना कर दिया गया उससे यही लगता है कि मोदी सरकार बोफोर्स के भूत से देश का पीछा छुड़ाने की तरफ बढ़ चुकी है. पर्रिकर ने जिस तरह से बोफोर्स तोपों को अच्छी गुणवत्ता का भी बताया वो भाजपा के उस बयान से मेल नहीं खाती है जिसमें बोफोर्स सौदे में राजीव गांधी पर घटिया तोपें खरीदने का इलज़ाम भाजपा रोज़ ही लगाया करती है कारगिल के युद्ध में राजीव सरकार द्वारा खरीदी गयी बोफोर्स तोपों की तैनाती के बाद ही लड़ाई का रुख पलटना शुरू हुआ था और पाक को अपने पैर पीछे खींचने पड़े थे.
                                              किसी पर भी आरोप लगाना अपने आपमें बहुत आसान ही है और बोफोर्स के मामले में मीडिया स्कैंडल या दुष्प्रचार ने ही राजीव सरकार को पूरी क्षमता से काम करने से रोक दिया था और आज भी कोई इस बात का अंदाज़ा नहीं लगा सकता है कि इस विवाद के कारण देश को कितना नुकसान उठाना पड़ा था. अन्तर्राष्टीय स्तर पर सभी सौदों में कम्पनियों द्वारा इस तरह का कमीशन आज भी अपने क्षेत्रीय प्रबंधकों को दिया जाता है और बोफोर्स मामले में भी यही हुआ था पर एक सोची समझी साज़िश के तहत जिस तरह से राजीव सरकार को केवल भ्रष्टाचार के आरोपों से ही घेरने का काम किया गया वह आज एक मूर्खतापूर्ण काम से अधिक कुछ भी नहीं लगता है. अच्छा ही है कि मोदी सरकार द्वारा भी अब इसे मीडिया स्कैंडल ही माना जाने लगा है क्योंकि यह ऐसा ही था अब मोदी पर भी सभी देशों को साथ लेकर चलने का दबाव है और दुनिया में बेहतर तकनीक में माहिर स्वीडन को किनारे रखकर कुछ भी सही नहीं किया जा सकता है सरकार यह अच्छी तरह से समझ रही है. मोदी जिस तरह से रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया पर ज़ोर देने में लगे हुए हैं यदि उन्हें उसमें और अधिक सफलता पानी है तो आज बोफोर्स मुद्दे को छोड़ने के अतिरिक्त उनके पास कोई अन्य विकल्प भी शेष नहीं है.    
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मंगलवार, 26 मई 2015

जयललिता और राजनीति

                                                 विभिन्न राजनैतिक कारणों से कई बार कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे जिन पर देश के नेताओं और राजनैतिक दलों को अपना कड़ा रुख दिखाने की आवश्यकता होती है वे पीछे छूट जाया करते हैं और उसके स्थान पर तात्कालिक राजनीति को अधिक महत्व दे दिया जाता है. इस तरह का सबसे ताज़ा उदाहरण जयललिता मामले में देखा जा सकता है जिन पर कभी जनता पार्टी के नेता रहे और अब भाजपा में शामिल सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सबसे पहले आय से अधिक संपत्ति मामले में १९ साल पहले आवाज़ उठाई थी पर आज राजनैतिक दबाव और भाजपा की रणनीतिक मजबूरी के चलते यह मामला पूरी तरह से ठन्डे बस्ते में जाता हुआ दिखाई दे रहा है क्योंकि राज्यसभा में मोदी सरकार की कमज़ोर स्थिति उसे ममता और जया जैसे नेताओं के साथ समन्वय बनाने के लिए मजबूर किया करती है. २००३ में डीएमके की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला तमिलनाडु से बाहर कर्णाटक में चलाने का आदेश जारी किया था तभी से अब तक यह कर्णाटक में चल रहा था पिछले वर्ष सेशन कोर्ट में जया को सजा सुनाने के बाद उन्हें सीएम पद छोड़ना पड़ा था पर इस वर्ष हाई कोर्ट के द्वारा उन्हें बरी किये जाने से मामला एक बार फिर से तमिलनाडु की राजनीति की दो धुरियों के बीच पहुँच गया है.
                                    अब इस मामले में जया के साथ भाजपा की पूरी नरमी को देखते हुए कांग्रेस सरकार की तरफ से कुछ भी ख़ास किये जाने की संभावनाएं नगण्य ही हैं क्योंकि इन दोनों दलों का यही मानना है कि द्रविड़ दलों के साथ अनावश्यक रूप से उलझना ठीक नहीं है क्योंकि ये आवश्यकता पड़ने पर कभी भाजपा तो कभी कांग्रेस के साथ आते जाते रहते हैं. हाई कोर्ट के फैसले के बाद कर्णाटक सरकार यदि चाहे तो सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सकती है पर अभी तक जिस तरह के संकेत दिखाई दे रहे हैं उनमें यह मुश्किल ही लगता है कि ऐसा कोई कदम सरकार की तरफ से उठाया जायेगा क्योंकि तकनीकी रूप से यह मामला तमिलनाडु का था और कर्णाटक सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर इसे अपने यहाँ चला रही थी अब इस मामले में जो मूल पक्ष डीएमके या स्वामी थे यदि चाहें तो मामले को आगे बढ़ाने की तरफ जा सकते हैं. मोदी के भाजपा में प्रभाव के चलते अब स्वामी के लिए यह मुश्किल ही होने वाला है कि वे अपनी इस लड़ाई को आगे सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने की कोशिश करें हाँ यदि वे भाजपा से बाहर आना चाहते हैं और उन्हें आज मोदी शाह की भाजपा में कोई पूछ भी नहीं रहा है तो शायद वे खुद ही विद्रोह कर अपने हाथ खोलने का प्रयास करें.
                                                    कर्णाटक सरकार की तरफ से मामला आगे ले जाया जाये या नहीं यह पूरी तरह से राजनैतिक फैसला ही होने वाला है और वर्तमान में अपने राजनैतिक सफर में कमज़ोर साबित हुई कांग्रेस अनावश्यक रूप से इस मामले में अपने हाथ नहीं जलाना चाहेगी क्योंकि यदि इस मौके पर उसकी तरफ से कोई बड़ी पहल हुई तो आने वाले समय में उसके लिए तमिलनाडु में जया की तरफ से किसी गठजोड़ की सम्भावना से भी हाथ धोना पड़ सकता है. फिर जब इस स्थिति में कांग्रेस को कोई तात्कालिक राजनैतिक लाभ नहीं मिल रहा है तो वह क्यों अपने को इसमें उलझाना चाहेगी ? फिलहाल तो भाजपा और मोदी के सामने इस बात का जवाब देने का दबाव अधिक रहने वाला है कि जब वे भ्रष्टाचार के खिलाफ बातें किया करते हैं तो जया मामले में उनकी तरफ से कोई कड़ी प्रतिक्रिया सामने क्यों नहीं आ रही है तथा स्वामी की अब तक की गतिविधियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भाजपा से उनका लगभग मोह भंग हो ही चुका है तो वे अपने को एक बार फिर से सुर्ख़ियों में बनाये रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं. वैसे भी राफेल सौदे को देश विरोधी बताते हुए उनकी तरफ से इस निर्णय के खिलाफ कोर्ट जाने की बात पहले भी की जा चुकी है.          
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...