मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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रविवार, 3 दिसंबर 2017

डॉक्टर-लैब-फार्मा कम्पनी गठजोड़

                                                       एक समय में चिकित्सा व्यवसाय को सबसे अच्छा माना जाता था और यह भी माना जाता था कि कोई भी डॉक्टर किसी भी परिस्थिति में अपने यहाँ आये हुए किसी भी रोगी के हित के लिए ही सदैव प्रयत्नशील रहता है पर आज के बदलते परिवेश में जिस तरह की ख़बरें और घटनाएं सामने आती हैं उनसे आम लोगों की इस धारणा को बहुत धक्का भी लगता है. नयी दवाओं और चिकित्सा जगत में होने वाले नए अनुसंधानों से देश के विभिन्न भागों में काम कर रहे डॉक्टर्स को परिचित कराने तथा उनको रोगियों के हितों में उपयोग करने के लिए लगभग हर दवा कम्पनी अपने स्तर से प्रयास करती है और अपने उत्पादों की बिक्री के लिए डॉक्टर्स को विभिन्न तरह के उपहारों से उपकृत भी करती रहती है. जब तक चिकित्सा जगत में व्यावसायिक घरानों की पैठ नहीं हुई थी तब तक सब कुछ ठीक ही चल रहा था पर जब से दवा कंपनियों ने फार्मा लाइन से जुड़े हुए डी फार्मा, बी फार्मा और एम फार्मा अभ्यर्थियों के स्थान पर एमबीए किये हुए लोगों के हाथों में बिक्री को सौंप दिया है तब से इस क्षेत्र का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है और दूसरी कम्पनी के बिकते हुए उत्पादों की होड़ में अब हर छोटी बड़ी कम्पनी कुछ भी बनाकर बेचने की राह पर चल चुकी हैं और इसमें दुर्भाग्य की बात यह है कि डॉक्टर्स सब कुछ जानते हुए भी सिर्फ अपने लालच के कारण इन कंपनियों के जाल में उलझे हुए हैं.
                                       यह सही है कि कई बार लक्षणों के आधार पर रोग का पता लगा पाना कठिन हो जाता है और दिखाई देने वाले लक्षणों के अतिरिक्त कोई और रोग भी किसी रोगी में हो सकता है जिसे जानने के लिए विभिन्न तरह की जांचें करवाने की आवश्यकता भी पड़ती रहती है. जब तक आवश्यकता हो तब तक इसे सही समझा जा सकता है पर जब यह भी कमाई का एक और जरिया बन जाए तो इस पर लगाम लगाने की आवश्यकता आ जाती है. आज बड़े शहरों में बड़ी लैब्स के साथ हज़ारों छोटी लैब्स मौजूद हैं जो अपने असली काम के साथ इस तरह के काम में भी लिप्त हैं पर सोचने वाली बात यह है कि लाखों रुपयों के खर्च के बाद स्थापित होने वाली लैब्स आखिर छोटे शहरों और कस्बों तक में कैसे खुलती जा रही हैं जबकि उनके पास आवश्यक चिकित्सक और लैब सुविधाएँ भी नहीं हैं ? यदि इन छोटे शहरों में बैठे हुए झोलाछाप चिकित्सकों और इन कुकुरमुत्तों की तरह उग आयी लैब्स पर ध्यान दिया जाये तो पूरे देश में यह हज़ारों करोड़ का अनैतिक कार्य सामने आ सकता है. इन कथित चिकित्सकों के पास कोई डिग्री नहीं होती जिससे वे केवल लैब से मिलने वाले अपने कमीशन के चक्कर में भी अनाप शनाप जांचें कराते रहते हैं जिससे पहले से ही परेशान रोगी पर और अधिक आर्थिक दबाव पड़ता है पर इस दिशा में सोचने का समय संभवतः किसी के पास नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों की नज़रें अभी तक इस गठजोड़ पर नहीं पड़ रही हैं.
                               इन सबसे बचने के लिए आखिर किस स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है अभी हमारे देश में किसी को भी इस बात की जानकारी भी नहीं है क्योंकि लोग आज भी भरोसे के चलते आँखें बंद करके अपने डॉक्टर और उसके बताये रास्ते पर चलते हैं. बंगलुरु में जिस तरह से चिकित्सकों और लैब के बीच का गठजोड़ सामने आया है और उसमें करोड़ों रुपयों की ज़ब्ती के साथ विदेशी मुद्रा भी मिली है तो क्या केंद्र सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अविलम्ब इस बात पर सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आखिर यह सब कैसे रोका जाना चाहिए ? ऐसा नहीं है कि नेताओं और अधिकारियों को यह नहीं पता है पर उनके अपने स्वार्थ हर तरह की परिस्थिति में सिद्ध हो जाते हैं तो उन्हें आम लोगों की इस समस्या पर सोचने की आवश्यकता ही नहीं है. इस बारे में अब सरकार को हर डॉक्टर की डिग्री को आधार से जोड़कर उसके द्वारा पूरे साल में कराई जाने वाली जांचों पर नज़र रखने के लिए एक व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जिससे यह पता चल सकेगा कि वह डॉक्टर कितने रोगी देख रहा है और कितना धन लैब्स से ले रहा है साथ ही आयकर देने और उसके इस तरह की आमदनियों के बीच किस तरह का सामंजस्य है भी या नहीं ? इस तरह के कदम से जहाँ सरकार को अधिक राजस्व मिल सकता है वहीँ रोगियों के लिए सही जांचों तक डॉक्टर्स और लैब्स को सीमित किया जा सकता है.
                             ऐसा भी नहीं है कि आज सारे चिकित्सक लैब्स और फार्मा कंपनियां इस तरह के कामों में लिप्त है फिर भी यह मानकर काम नहीं चलाया जा सकता है कि हर जगह कुछ लोग गलत तरह से काम करते हैं. सरकार को इस दिशा में सुधार के लिए पहले एक व्यापक नीति बनानी होगी जिसके बाद ही उसको कानून का रूप दिया जा सकता है. रोगियों को अच्छी सुविधाएँ देने के लिए जन औषधि केंद्रों की तरह लैब्स की अवधारणा को भी मूर्त रूप दिया जा सकता है कम से कम जिला अस्पतालों की क्षमता को इतना अधिक बढ़ाये जाने पर बल दिया जाना चाहिए जो कम से कम अपने जिले के रोगियों को इस तरह की सुविधाएँ उचित दरों पर उपलब्ध कराने के केंद्र के रूप में विकसित किये जा सकें. इसके लिए सरकार को चिकित्सा में उच्च शिक्षा के लिए व्यापक सुधार करते हुए एमडी डीएम आदि स्तरों पर शिक्षा की अधिक व्यवस्था के बारे में सोचना ही होगा साथ ही आयुष मंत्रालय को इस दिशा में और अधिक कारगर बनाये जाने की आवश्यकता पर ही ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे रोगी के सामने हर स्तर की चिकित्सा सेवा लेने का विकल्प खुल सके और वह अपनी समस्या में किसी बड़े व्यावसायिक गठबंधन का शिकार न हो जाए.        
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शनिवार, 12 अगस्त 2017

गोरखपुर-लापरवाही से मौतें

                                            अगस्त का महीना बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के गंभीर मरीज़ों पर कितना भारी पड़ा यह ऑक्सीजन की कमी के चलते होने वाली मौतों को देखकर समझा जा सकता है क्योंकि गोरखपुर के ही योगी आदित्यनाथ के यूपी के सीएम बनने के बाद जिस तरह से पूर्वांचल की किस्मत संवरने की बातें की जा रही थीं यह लापरवाही उस पूरी व्यवस्था और संकल्प का पोल खोलने के लिए काफी है. इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक बात यह भी है कि खुद सीएम आदित्यनाथ ने कुछ दिन पहले ही मेडिकल कॉलेज का दौरा किया था जिसमें सब कुछ सही होने का दावा किया गयाथा पर उसके तुरंत बाद ही इस तरह की अव्यवस्था सामने आयी है ? पूरे मामले में एक बात सामने आ रही है कि कॉलेज को ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली निजी फर्म की तरफ से १ अगस्त को ही कॉलेज प्रशासन को सूचित कर दिया गया था कि लगभग ६५ लाख के बकाये का भुगतान न होने की दशा में उसके लिए निर्बाध ऑक्सीजन सप्लाई कर पाना संभव नहीं होगा इसके बाद भी कॉलेज प्रशासन, जिला प्रशासन या राज्य शासन की तरफ से इस मामले में कोई सार्थक पहल नहीं की गयी जो कि अपने आप में बहुत ही चिंताजनक है. मानसून का यह महीना वैसे भी पूर्वांचल के लोगों पर जापानी बुखार के चलते कई दशकों से अभिशाप ही बना हुआ है पर इस बार मानवीय लापरवाहियों के चलते इस तरह की मौतें होने की घटना पहली बार सामने आयी है.
                            निश्चित तौर पर यह खुद सीएम आदित्यनाथ और भाजपा के लिए बहुत शर्मिंदगी की बात है क्योंकि उनकी तरफ से पूरी व्यवस्था को सुधारने की बात कही जा रही है पर साथ ही इस तरह की घटनाओं से यह भी दिखाई देने लगता है कि सरकार मूलभूत बिंदुओं को नज़रअंदाज़ करते हुए अपने अनुसार ही सब कुछ चलाना चाहती है जबकि बहुत सारी व्यवस्थाएं अपने आप में पूर्ण रूप से पहले से ही निरापद हैं बस उनके सञ्चालन में लगे हुए लोगों को सही दिशा में निर्णय लेने की आवश्यकता है. इस तरह की लापरवाही में निश्चित तौर पर सीधे तौर पर सरकार का कोई हाथ नहीं होता है पर विपक्षी दल सदैव ही इस तरह के मामलों में अपनी राजनीति को आगे करने की कोशिशें करते रहते हैं तो इस बार भी यूपी और केंद्र में विपक्षी दलों को इस मामले को हवा देने का काम ही करना है. सरकार की तरफ से कुछ समितियां बनाकर लोगों को निलंबित करने का काम ही किया जाना है क्योंकि उसे अपने ऊपर आने वाले दबाव को पूरी तरह से हटाना भी है तथा यह भी सन्देश देना है कि उनकी प्राथमिकता में सब कुछ सुधारना भी है और दोषियों को किसी भी स्तर पर छोड़ा भी नहीं जायेगा भले ही वह कितने ऊंचे पद पर ही क्यों न हो. पर इस तरह की सजा देने और भूल जाने की प्रवृत्ति के चलते ही आज भी ऐसे हादसे होते रहते हैं जिनको थोड़ी सावधानी के साथ पूरी तरह से रोका भी जा सकता है.
                            जिन निर्दोषों की मौत इस घटना में हुई उनके प्रति संवेदना के साथ सरकार को आगे के लिए ऐसी व्यवस्था बनाने के बारे में सोचना चाहिए जिससे कोई भी निजी फर्म इस तरह से केवल पत्राचार के माध्यम से ही ऑक्सीजन सप्लाई या अन्य अतिआवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य को रोक न सके. इसके लिए खुद सरकार को भी यह नियम बनाना होगा कि किसी भी निजी फर्म का बकाया भी समय से चुकाया जाये क्योंकि इस मामले में भुगतान न होना ही समस्या का मूल कारण बताया जा रहा है. स्थानीय एजेंसियों के भुगतान में असफल रहने पर उसकी सूचना स्वतः ही राज्य मुख्यालय तक पहुँचने की एक केंद्रीयकृत व्यवस्था भी होनी चाहिए. साथ ही सरकार को और भी संवेदनशील होने की आवश्यकता है क्योंकि जिस तरह से सरकार की तरफ से यह कहा गया कि मौतें ऑक्सीजन की कमी से नहीं बल्कि अन्य कारणों से हुई हैं तो वह सरकार का झूठ खोलने का काम करने वाला ही साबित हुआ क्योंकि इस बारे में गोरखपुर दैनिक जागरण ने पहले ही एक खबर प्रकाशित की थी जिसमें इस खतरे के बारे में आगाह किया गया था. इस मामले में जहाँ मेडिकल कॉलेज प्रशासन, मंडल और जिला प्रशासन की लापरवाही सामने आ रही है वहीं एसएसबी और निजी क्षेत्र के चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े लोगों के अभूतपूर्व सहयोग की बात भी सामने आ रही है जिनके प्रयासों से मौतों के सिलसिले को रोकने में मदद मिली थी. सीएम आदित्यनाथ को इस मामले को अपने स्तर से देखना चाहिए क्योंकि गड़बड़ी कहाँ से अधिक हुई यह खुद गोरखपुर में उनके अपने समर्थक आसानी से स्पष्ट कर सकते हैं जिससे उन्हें इस तरह की घटनाओं को रोकने में सहायता मिल सकती है.         
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शनिवार, 13 जून 2015

डॉक्टर - पर्चे और जेनेरिक दवाएं

                                                     केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की तरफ से एक बार एक अच्छी पहल की जा रही है जिसमें डॉक्टर्स के लिए एक अधिसूचना जारी की जाने वाली है उसके तहत पर्चे पर कैपिटल लेटर्स में साफ़ साफ़ दवाएं लिखने के साथ ही उसके जेनेरिक नाम का उल्लेख करना भी आवश्यक कर दिया जायेगा. आज जिस तरह से दवा कम्पनियों और डॉक्टर्स के बीच एक खतरनाक गठजोड़ पनप चुका है उसको देखते यदि ऐसा कोई प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले समय में मरीज़ों को बहुत आसानी हो सकती है पर मेडिकल एथिक्स के नाम पर पूरी पोथियाँ पढने के बाद भी अगर सरकार को इस तरह की बातें डॉक्टर्स पर थोपने को मजबूर होना पड़ रहा है तो यह अवश्य ही चिंता का विषय है क्योंकि डॉक्टर को आज भी समाज में बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है. यदि सरकार इस तरह की बातों को लागू करने के बारे में आगे बढ़ रही है तो निश्चित तौर पर यह चिकित्सा जगत के लिए आत्म चिंतन का समय है जिसमें रोगियों को हर स्तर पर किसी न किसी तरह से अधिक पैसे खर्च करने के लिए मजबूर किया जाता है और उसके पास संभवतः कोई अन्य विकल्प भी नहीं होता है.
                                   यह अपने आप में बिलकुल सही कदम है कि डॉक्टर्स को साफ़ अक्षरों में दवाएं लिखने के लिए निर्देशित किया जाये क्योंकि आज जिस तरह से हर डॉक्टर के पास एक मेडिकल स्ट्रोर है जहाँ पर वह अपने जुगाड़ वाली दवाएं ही रखना और बेचना चाहते हैं तो उन पर कड़ी लगाम लगाया जाना आवश्यक है क्योंकि वे दवाओं एक नाम इस तरह से लिख देते हैं कि उनके मेडिकल स्टोर के अतिरिक्त किसी और के लिए उसे पढ़ पाना असंभव सा ही होता. इस क्षेत्र में यदि किसी भी तरह से सुधार किया जा सके तो यह आम जनता के लिए बहुत ही लाभकारी कदम साबित हो सकता है पर यदि कोई अपनी राइटिंग ख़राब होने का बहाना लगाकर इसी तरह से लिखता रहे तो उस पर क्या कोई कार्यवाही संभव हो पायेगी क्योंकि आज अधिकांश डॉक्टर्स की राइटिंग ऐसी हो चुकी है जिसे पढ़ पाना सबके वश की बात नहीं है. इस मामले में सुधार दोनों तरफ से अपेक्षित है क्योंकि जब तक खुद अपने से बदलाव आने के बारे में डॉक्टर्स नहीं सोचेंगें तब तक उन पर किस तरह से यह नियम लागू किया जा सकता है इसलिए मामला कानूनी से स्वतः सुधार करने का अधिक बन चुका है पहले भी कई बार डॉक्टर्स को लेकर सरकार कई निर्देश जारी कर चुकी है पर अब तक उनका कोई व्यापक असर कहीं भी नहीं दिखाई देता है.
                                 जेनेरिक दवाओं के उपयोग से निश्चित तौर पर आम रोगियों को बहुत लाभ हो सकता है पर हमारे देश में जिस तरह किसी भी क्षेत्र में गुणवत्ता पर नियंत्रण की कोई मज़बूत व्यवस्था अभी तक नहीं बन पाई है तो उस स्थिति में सरकार जेनेरिक दावों का मानकीकरण किस तरह से कर पायेगी ? जब तक जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया जाता है तब तक यदि डॉक्टर्स द्वारा यह दवाएं लिखी भी जाती हैं तो आने वाले समय में रोगियों को कैसी दवाएं मिल पा रही हैं इस बात का भी सही तरह से पता नहीं चल पायेगा और रोगियों को सही दवाएं उपलब्ध कराने का सपना फिर से अधूरा ही रह जाने वाला है. सबसे पहले केंद्र और राज्य सरकारों के स्तर पर इन दवाओं की गुणवत्ता नियमित और औचक रूप से करने के तंत्र को विकसित करने की आवश्यकता है क्योंकि केवल जेनेरिक नाम लिखने से असली या नकली दवाओं के बारे में आम लोग कैसे जान पायेंगें ? निश्चित तौर पर इस काम को करने में केंद्र सरकार की मंशा अच्छी ही है पर बिना तैयारियों के इस तरह एक आदेश धरातल पर कितना असर डाल पायेंगें यह चिंता का विषय है यह काम केवल उपलब्धि गिनाने के स्थान पर ठोस कार्य योजना के साथ भले ही कुछ समय लेकर लागू किया जाये तभी इसका वास्तविक लाभ आम जनता तक पहुँच सकता है.           
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रविवार, 16 नवंबर 2014

छत्तीसगढ़ और परिवार नियोजन

                                                                     छत्तीसगढ़ में नलबंदी ऑपरेशन के बाद महिलाओं को दी गयी दवा में चूहेमार दवा के मिश्रण के पाये जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि रमन सरकार इस मामले से जिस तरह से निपटने का प्रयास कर रही यही वह केवल लीपापोती की श्रेणी में ही आता है क्योंकि इस पूरे मामले में ऑपरेशन में कोई कमी नहीं पायी गयीं है और सारी खामी दवा में विषैले रसायन के कारण ही दिखाई दे रही है. आज जिस तरह से छत्तीसगढ़ सरकार पूरे देश के साथ दुनिया की नज़रों में है उससे यही पता चलता है कि वहां कुछ न कुछ ऐसा अवश्य ही चल रहा था जिसकी भनक सरकार को भी थी शायद इसी कारण सीएम ने बिना किसी जांच के पूरा हुए ही अपने स्वास्थ्य मंत्री को क्लीन चिट दे दी थी और पूरे मामले में निर्दोष डॉक्टर को सजा दी जिसमें उसका कोई दोष ही नहीं था ? अब अपने कथित सु-शासन को बचाये रखने के लिए रमन सरकार ने जो किया वह कहीं से भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है.
                                    सरकार को अब अपनी गलती सुधारते हुए निलंबित किये हुए डॉ को तत्काल बहाल करना चाहिए और उनसे इस बात के लिए माफ़ी भी मांगनी चाहिए क्योंकि सरकार के मनमाने रुख से उनकी प्रतिष्ठा को धक्का लगा है और उनकी मानहानि भी हुई है. जिस बेशर्मी से आज भी सरकार को अपनी कमी नहीं दिखाई दे रही है उससे तो यही लगता है कि छत्तीसगढ़ में मज़बूत विपक्ष के न होने का खामियाज़ा पता नहीं और किस किस तरह से जनता भुगत रही है ? नक्सली हमले में यदि कांग्रेस की राज्य इकाई के बड़े नेताओं की हत्या न हुई होती तो संभवतः पिछले वर्ष के चुनावों में नतीजा कुछ और ही आ सकता था. किसी भी गलती को सुधारने का कोई समय नहीं होता है यदि रमन सिंह में नैतिकता बची है तो उन्हें निलंबित डॉ को तुरंत बहाल करते हुए पूरे मामले की सीबीआई द्वारा जांच करने चाहिए क्योंकि अत्यधिक बजट होने के कारण कहीं इसमें भी यूपी के स्वास्थ्य विभाग घोटाले की तरह कोई बड़े नाम सामने आ सकते हैं.
                                    इस पूरे मामले में एक बात और भी सामने आई है कि जिन महिलाओं की नलबंदी की जा रही थी उनकी बैगा जनजाति को परिवार नियोजन के कार्यक्रम से मुक्त रखा गया है तो इस मामले में सरकार यहाँ पर भी दोषी पायी जाती है. बैगा जनजाति के अस्तित्व पर आसन्न खतरे को देखते हुए उनको परिवार नियोजन के कार्यक्रम से मुक्त रखा गया है और किस आदेश के द्वारा इन लोगों के माध्यम से सरकार अपने आंकड़े सुधारने में लगी हुई थी यह भी चिंताजनक है. एक मामले के खुलने में जिस तरह से पूरी छत्तीसगढ़ सरकार ही कटघरे में खड़ी दिखाई देने लगी है और अपनी गलती को सरकार के मुखिया और अन्य नेता जिस बेशर्मी से डॉक्टरों पर डालने में लगे हुए हैं उससे उसकी कार्यशैली का ही पता चलता है. अच्छा हो कि केवल आंकड़ों के स्थान पर मानवीयता को देश के हर राज्य में प्राथमिकता दी जाये और सरकारी कार्यक्रमों को जनता से वास्तविक रूप से जोड़ने के प्रयास शुरू किये जाएँ जिससे इनके सही परिणाम सामने आ सकें.   
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रविवार, 7 जुलाई 2013

यूपी और स्वास्थ्य विभाग

                                   राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन में धन के आवंटन के बाद भी जनता तक सुविधाएँ न पहुँच पाने की स्थितियों को सँभालने में लगी हुई केंद्र सरकार ने जिस तरह से आधुनिक तकनीक का सहारा लेकर आशा बहुओं और एएनएम तक आम जनता और विभाग की पहुँच बनाने के लिए सीयूजी नेटवर्क बनाने के लिए काम करना शुरू कर दिया है इससे जहाँ एक तरफ स्वास्थ्य विभाग के इन निचले स्तर के कर्मचारियों तक सरकार की पहुँच हो जाएगी वहीं दूसरी तरफ़ आम लोगों को भी इन लोगों तक आवश्यकता पड़ने पर संपर्क करने में आसानी होने लगेगी. इस परियोजना का शुभारम्भ पूरे देश में यूपी से ही शुरू किया जा रहा है क्योंकि इसके लिए सबसे पहले आगे आने वाले राज्य के रूप में यूपी ही सामने आया और एनआरएचएम में पिछले कुछ वर्षों में धन का दुरूपयोग सबसे अधिक इसी राज्य में हुआ और पैसे की बंदरबांट में सीएमओ स्तर के दो अधिकारियों की राजधानी में हत्या तक कर दी गयी. वर्तमान में यूपी की स्वास्थ्य सेवाओं में गुणवत्तापरक सुधार महसूस भी किया जा रहा है क्योंकि शायद एक लम्बे अरसे बाद इस विभाग के पास एक गंभीरता से काम करने वाले मंत्री के रूप में पूर्व आईपीएस अधिकारी अहमद हसन उपलब्ध हैं.
                                    यूपी में आज भी जिस तरह से हर व्यक्ति को सरकारी नौकरी चाहिए और काम करने के नाम पर उसे कुछ भी न करना पड़े यह एक ऐसी बीमारी हो चुकी है जिससे पार पाना अब किसी भी सरकार के लिए बिना सख्ती किए संभव नहीं था और वर्तमान में इस से निपटने के लिए जिस तरह से अहमद हसन ने पहले ऊपरी स्तर से पेंच कसने शुरू किए उसका असर यह हुआ कि अस्पतालों में आज रोगियों के लिए प्रचुर मात्रा में दवाइयों की उपलब्धता हो चुकी है इसके बाद उन्होंने जिला और उच्चीकृत स्वास्थ्य केन्द्रों पर तैनाती पाए चिकित्सकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने की तरफ़ सख्ती से ध्यान देना शुरू किया जिसका असर आज सरकारी अस्पतालों में बदलाव के रूप में दिखाई देने लगा है पर अब भी इस बिगड़े हुए प्रदेश में बहुत कुछ सुधारना आवश्यक है जिसके लिए हसन एक कठोर प्रशासक के रूप में सख्ती से काम करने में लगे हुए हैं और आज उनकी दृढ इच्छा शक्ति का परिणाम पूरे प्रदेश में कहीं का कहीं से थोड़ा बहुत दिखाई भी देने लगा है.
                                  किसी भी बड़े बदलाव के समय सरकारी अधिकारी और कर्मचारी जिस तरह से अपने गोटियाँ बैठाकर नौकरी करने में विश्वास रखा करते थे आज उनके लिए काम करने में कुछ दिक्कत अवश्य ही हो रही है क्योंकि सभी को अपनी तैनाती वाली जगहों पर जाना ही पड़ता है जबकि अभी तक वे तैनाती स्थल के आस पास के किसी बड़े शहर के निजी नर्सिंग होम में काम किया करते थे और आम जनता के लिए उनकी उपलब्धता लगभग शून्य ही हुआ करती थी. आज जिस तरह से पूरे विभाग में निचले स्तर तक तकनीक का उपयोग करने की दिशा में यूपी सरकार और केंद्र सरकार मिलाकर काम करना शुरू कर चुकी हैं उससे लोगों को निश्चित तौर पर बहुत लाभ भी मिलेगा. किसी भी बड़ी सरकारी परियोजना के लिए बड़े और महत्वपूर्ण मंत्रालयों में जिस स्तर पर राज्य मंत्रियों की तैनाती होनी चाहिए आज देश के राजनैतिक दल और पार्टियाँ उसे भूल चुकी हैं जिसका सीधा दुष्परिणाम आज दिखाई देता है और कुछ विभागों को छोड़कर अन्य जगहों पर काम होता हुआ नहीं दिखाई देता है या फिर केवल उन्हीं लोगों का काम होता है जो किसी भी प्रकार से काम करने में माहिर होते हैं. फिलहाल हो सकता है कि हर मामले में बदनाम रहा यूपी आने वाले समय में पूरे देश के स्वास्थ्य सेवाओं के लिए एक आदर्श के रूप में विकसित हो जाए और लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं भी मिलने लगें.                                              

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शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

फार्मा नीति और चोर बाज़ारी

                 मंत्रियों के समूह ने आख़िर में लम्बे विचार विमर्श के बाद नयी फार्मा नीति के बारे में सहमति दे दी है जिसके बाद इसे विचार के लिए कैबिनेट में रखा जायेगा जहाँ पर इसे मंज़ूरी मिल जाने की पूरी सम्भावना है. अभी तक जिस तरह से पेटेंट और अन्य कानूनों के चलते जहाँ दवाओं के मूल्य बाज़ार में अंतर के साथ दिखाई देते थे अब सरकार ने इस इस बारे में भी विचार करके यह तय किया है कि इनमें समानता लायी जाये और नियंत्रित मूल्य वाली दवाओं की संख्या में भी वृद्धि की जाये जिससे आम लोगों को आवश्यक दवाएं उनके सही मूल्य पर मिल सकें. अभी तक केवल ७४ दवाओं के मूल्य को ही नियंत्रण में रखा गया है जिसमें से लगभग आधी आज प्रयोग में नहीं है तो ऐसे में इस तरह के नियंत्रण की क्या आवश्यकता है जब आवश्यक दवाओं पर कोई नियंत्रण ही न हो ? अब सरकारी मंशा के अनुसार ३४८ दवाओं को मूल्य नियंत्रण के अंतर्गत रखा जायेगा जिससे आम लोगों को यह दवाएं नियंत्रित मूल्य पर मिल सकेंगीं जिसका आम लोगों को  निश्चित तौर पर लाभ होगा पर केवल कानून बना देने से ही सब कुछ नहीं हो जाता है आज सरकार को इसके अनुपालन के बारे में भी विचार करना चाहिए जिससे उसकी मंशा का धरातल पर कुछ असर भी दिखे.
        मूल्य नियंत्रित करने की सरकारी मंशा पर दवा कम्पनियां किस तरह से पानी फेर सकती हैं उसक एक उदाहरण डाक्सीसायक्लिन नामक एक एंटीबायोटिक से देखा जा सकता है. पहले यह दवा मूल्य नियंत्रण में नहीं थी तब इसे १ रु० से लेकर ७ रु० तक बाज़ार में विभिन्न कम्पनियों द्वारा बेचा जाता था पर कुछ वर्षों पहले इसे नियंत्रित मूल्य वाली सूची में डाल दिया गया और इसका अधिकतम मूल्य १ रु० तय कर दिया गया जिसके बाद से इसका बाज़ार एकदम से बहुत बढ़ा पर बढ़ते बाज़ार में लाभ कमाने के लिए काम करने वाली दवा कम्पनियों को यह लगा कि यदि यह दवा मूल्य नियंत्रण से बाहर हो जाये तो उनका मुनाफ़ा बहुत बढ़ सकता है. सरकारी नियमों के तहत वे इसे १ रु० से अधिक का नहीं बेच सकते थे इसलिए उन्होंने एक चोर रास्ता निकला और इसमें १ रु० से भी कम मूल्य में उपलब्ध अन्य दवा लैक्टोबैसिलस मिलाना शुरू कर दिया जिसके पीछे तर्क यह दिया गया कि एंटीबायोटिक होने के कारण इसके पेट पर होने वाले दुष्प्रभाव को रोकने के लिए ऐसे किया गया है पर उनकी मंशा तभी स्पष्ट हो गयी जब इस नए कॉम्बिनेशन की दवा उन्होंने ४ से ८ रु० में बेचनी शुरू कर दी जिससे जिन रोगियों को इस सस्ते पर कारगर एंटीबायोटिक लाभ मिल जाता था वह मिलना बंद हो गया. क्या किसी भी दवा कम्पनी को इस बात की छूट दी जा सकती है कि वह किन्हीं दो दवाओं का सम्मिश्रण केवल अपने हित लाभ के लिए इस रास्ते से कर सकें ?
        सरकार को दवा क्षेत्र में भी एक पूर्ण अधिकार प्राप्त नियामक बनाना चाहिए जो दवा कम्पनियों और बाज़ार की ज़रूरतों पर पूरी तरह से नज़र रखे और आम लोगों तक सरकारी मंशा के अनुसार सस्ती दवाएं पहुँचाने में आने वाली बाधाओं पर भी ध्यान रखे. अभी तक एक बार नीति बन जाने के बाद जब तक कोई बड़ी शिकायत न हो कोई कार्यवाही इन दवा कम्पनियों पर सरकार नहीं कर सकती है क्योंकि उनके बाज़ार का भी सरकार पर दबाव रहता है. ऐसी स्थित में सरकार को इस पूरे नियंत्रण के खेल से खुद को अलग कर देना चाहिए और नियामक के सुझावों पर ही अमल करते हुए आगे की नीतियों को निर्धारित करना चाहिए. पूरी दुनिया में सिर्फ़ भारतीय रोगियों के साथ नए नए दवा सम्मिश्रणों के साथ जो खिलवाड़ किया जा रहा है उससे आज कोई भी चिकित्सक सहमत नहीं है पर ऐसे बिरले ही चिकित्सक होंगें जो इन सम्मिश्रणों को लिखने से मना करने का साहस दिखा पाते हों ? ऐसे स्थिति में जब रोगी चिकित्सक के पास विश्वास के साथ जाता है तो हर स्तर पर उसके साथ ठगी की जाती है. इस पूरे परिदृश्य को बदलने की ज़रुरत है क्योंकि यदि रोगियों को सही सरकारी नीतियों के कड़े अनुपालन के साथ सही मूल्य पर दवाएं उपलब्ध हो जाएँ तो उसके लिए बहुत बड़ी मदद हो सकती है पर आज के परिदृश्य में इसे सुधरने के लिए सरकार के पास कितने विकल्प हैं यह सभी जानते हैं.  
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शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

बड़े अस्पताल अब दूर नहीं..

एक ख़बर आई कि अब उत्तर प्रदेश, बिहार में दिल्ली जैसे उच्च स्तरीय अस्पतालों की स्थापना की जायेगी। चलो अब जा कर सरकार को सुध तो आई कि इन स्थानों पर भी ऐसे अस्पतालों की आवश्यकता है जो वास्तव में गुणवत्ता युक्त चिकित्सा आसानी से उपलब्ध करा सकते हों आज इस बात की अधिक आवश्यकता है कि जो अस्पताल चल रहे हैं उनमें चिकित्सक नियुक्त किए जायें और वे अपने कार्य को पूरी तन्मयता से करें। मात्र अस्पताल बनने से कुछ भी नहीं होने वाला है आज सभी को यह सोचना होगा कि हम अपने कार्य को ठीक से क्यों नहीं करते हैं ? सरकारें योजना बना सकती हैं पर हर योजना का लाभ कौन उठा रहा है इस बात को तो हम सभी को ही देखना होगा। आज कितनी ऐसी योजनायें हैं जिनको चंद लोगों ने कब्जे में कर रखा है, जबकि जिन तक उसका लाभ पहुंचना चाहिए वे आज भी इससे वंचित ही हैं। अब समय आ गया है कि हम सभी अपनी तरफ़ से यह प्रयास करें कि हम अपने यहं पर अपने स्तर से सभी योजनाओं को देखने का प्रयास करते रहेंगें तभी इस देश में कुछ हों पायेगा । मात्र सरकार की तरफ़ ताकने से आज कुछ भी नहीं होने वाला है। हम सभी को कुछ तो करना ही होगा जिससे यह सारा तंत्र कुछ सही रास्ते पर चल सके। आज भी हम सदैव की भांति सोते ही रहे तो यह अस्पताल भी केवल नाम मात्र के ही रह जायेंगें। आज किसी को सैफई के अस्पताल की याद है कि वहां पर कितनी सुविधाएँ थीं और अब वहां पर क्या बचा है ?