मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

चिकित्सा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चिकित्सा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 25 मई 2020

कोरोना - केंद्र राज्य समन्वय

                                               मार्च से शुरू हुए लॉक डाउन के साथ ही देश में एक अलग तरह की उठापटक दिखाई दे रही है आज जब पूरे देश को मिलकर इस महामारी के सामने खड़े होने की आवश्यकता है तो देश के राजनैतिक दल और उनके शीर्ष नेता एक दुसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं. ऐसा नहीं है कि केंद्र ने इस बारे में नीतियां नहीं बनायी और राज्यों ने उन पर अमल नहीं किया पर केंद्र और राज्यों में सत्ता तथा विपक्ष से जनता ऐसे कठिन समय में जिस गंभीरता की आशा कर रही थी उसमें देश के सभी राजनैतिक दल और नेता पूरी तरह से फेल दिखायी दे रहे हैं. देश की जनता अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इन नेताओं के साथ अधिकारियों पर खर्च करती है उसके बाद भी कठिन समय में सबसे अधिक जनता को ही सहना पड़ता है.
                               पहले जोन निर्धारण को लेकर अव्यवहारिक तरीके से केंद्र का दखल रहा जिससे कई ऐसे जिले भी केवल एक मरीज होने के बाद भी ऐसे माना गया जैसे पूरे ज़िले में ही कोरोना फ़ैल गया हो इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह हुआ कि हमारे मेडिकल, पुलिस और अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े विभागों पर अनावश्यक रूप से दबाव बना जबकि उनको केवल कुछ स्थानों पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर अपने स्टाफ को लम्बे समय तक काम करने के लिए तैयार करने की आवश्यकता थी. आज इस क्षेत्र के सभी लोग कोरोना की लड़ाई में थके से लगते हैं जबकि देश में संक्रमण बढ़ने के साथ अब अधिक सतर्कता की आवश्यकता है. केंद्र राज्य में वार्तालाप शून्य होने के कारण आज देश के आर्थिक प्रगति में सबसे बड़ा योगदान देने वाला मजदूर सड़कों पर है और अभी भी उनको मिलने वाली सहायता उनकी संख्या के हिसाब से बहुत कम ही है.
                               लॉक डाउन जिस तरह से राज्यों को विश्वास में लिए बिना किया गया आज उसका खामियाज़ा पूरा देश भुगत रहा है. यदि मार्च में संक्रमण के स्तर के कम रहते ही मजदूरों और अन्य कामों से अपने घरों से बाहर निकले लोगों को वापस जाने के लिए कुछ समय दिया जाता तो आज राज्यों क्या जनपदों और तहसीलों तक संक्रमण रोकने की जो लड़ाई लड़ी जा रही है उससे लॉक डाउन में ही निपट लिया गया होता और संक्रमण को अच्छी तरह से रोकने में मजबूती से रोका भी जा सकता था. आज रेलवे की जो हालत है वह भी ख़राब समन्वय का ही नतीजा है और आज से शुरू होने वाली हवाई यात्रा को भी जिस तरह से एक नियम में नहीं बांधा जा सका है उससे इन यात्रियों के लिए समस्याएं और बढ़ने ही वाली हैं. आज के युग में भी समन्वय की इतनी कमी आखिर क्यों है क्या राज्य अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं या केंद्र सरकार खुद ही सब कुछ करने में विश्वास रखती है ? राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों के साथ सीधी बैठक कर क्या पीएम मोदी राज्यों की सत्ता को किनारे करने की कोशिशें नहीं कर रहे हैं ?अब समय है कि केंद्र को अपने स्तर से विश्वास बहाली के लिए काम शुरू करना चाहिए जिससे आपस में लड़ने के स्थान पर कोरोना से प्रभावी लड़ाई लड़ी जा सके.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 18 जुलाई 2015

आईपीएस शिवदीप वामन लांडे

                                         बिहार कैडर और महाराष्ट्र के मूल निवासी आईपीएस अधिकारी शिवदीप लांडे के बच्चियों को बचाने के लिए अलग तरह से प्रयास करते हुए देखना बहुत ही सुखद लगता है क्योंकि आज समाज में बड़े स्तर के अधिकारियों और पुलिस की छवि ही कुछ इस तरह की बन चुकी है जिसमें आम लोग उन पर कम ही भरोसा किया करते हैं. महिलाओं और लड़कियों के साथ ही बच्चियों को लगातार बचाने की कोशिशें करते रहने के कारण आज शिवदीप बिहार पुलिस का एक बेहतर मानवीय चेहरा बनकर भी उभरे हैं जिससे पूरे देश की पुलिस को सबक सीखने की आवश्यकता भी है. आज देश के किसी भी राज्य के थाने में महिलाएं जाने से डरा ही करती हैं संभवतः उसके लिए समाज में पुलिस द्वारा अपनी बनायीं गयी छवि ही अधिक ज़िम्मेदार है और दुखद बात यह भी है कि पुलिस में भी बहुत अच्छे लोगों के होने के बाद भी आज तक आम लोगों का भरोसा उस पर कहीं से भी बढ़ता दिखाई भी नहीं देता है जो बेहतर प्रशासन के लिए पुलिस के लिए खुद ही बड़ा सरदर्द साबित होता रहता है क्योंकि आम लोग पुलिस के साथ समाज की कोई भी बात साझा नहीं करना चाहते हैं.
                                    बिहार में पिछड़ेपन के कारण आज भी नवजात बचिचियों को लावारिस हालत में कहीं भी छोड़ देने की घटनाएँ आमतौर पर हुआ ही करती हैं तो इस सम्बन्ध में शिवदीप ने अपने स्तर से एक काम करना शुरू किया जिसमें ऐसी लावारिस हालत में मिली किसी भी नवजात बच्ची को प्राथमिक चिकित्सा और उचित माहौल देने का प्रयास करना शुरू किया गया जिसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आने लगे हैं तथा रोहतास जिले में लोग उनके इस काम की तारीफ भी करने लगे हैं. इससे पहले उन्होंने स्कूल जानी वाली बच्चियों के सामने आने वाली समस्या पर भी अपनी पहले की पोस्टिंग्स में ध्यान दिया था जिससे असामाजिक तत्वों की हरकतों पर लगाम लगाने में भी पुलिस को सफलता मिली थी. आज जिस तरह से के अधिकारी के थोड़ा संवेदनशील होने से ही एक जिले और काफी हद तक बिहार के अन्य भागों में भी इस तरह की सोच विकसित होनी शुरू हुई है तो इसके लिए शिवदीप का योगदान कम नहीं कहा जा सकता है क्योंकि बिहार जैसे मीडिया में अधिक बदनाम राज्य में ही ज़मीनी स्तर पर सुधार की बहुत आवश्यकता भी है जिसे अविलम्ब शुरू किया जाना चाहिए.
                                 ऐसा नही है कि देश के अन्य हिस्से आज भी महिलाओं और बच्चियों के लिए पूरी तरह से सुरक्षित ही हैं पर इस तरह की शुरुवात अपने आप में बहुत सही कही जा सकती है. यदि सरकारें अपने स्तर से प्रयास कर पुलिस और स्थानीय प्रशासन को इस बात के लिए निर्देशित करें तो लावारिस हालत में मिलने वाली बच्चियों को प्राथमिक उपचार के बाद सही हाथों में सौंपा भी जा सकता है. किसी भी अधिकारी के व्यक्तिगत प्रयासों से मिलने वाली सफलता और सामाजिक लाभ को यदि संस्थागत रूप से लागू करने की तरफ ध्यान दिया जाने लगे तो उस अधिकारी के स्थान विशेष से जाने के बाद भी स्थितियां वैसी ही संवेदनशील रह सकती है वर्ना पुलिस को भी अपने पुराने चरित्र में लौटने में समय कहाँ लगता है. ज़िम्मेदारियों के बोझ में उन पर यदि सामाजिकता का थोड़ा सा भार भी डाला जाये तो शायद इससे ही हमारी पुलिस फ़ोर्स में कुछ संवेदनशीलता का स्थायी समावेश भी हो सके. साथ ही उन अभिभावकों को भी कोई सीख दी जा सके जो किसी भी परिस्थिति में नवजात बच्चियों के साथ ऐसा व्यवहार किया करते हैं. सामाजिक सुधार पूरे समाज में बदलाव के साथ ही किया जा सकता है उसके लिए किसी भी स्तर पर अलग अलग मानक नहीं बनाये जा सकते हैं.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 3 मई 2015

यातायात और एम्बुलेंस

                          दिल्ली और पूरे देश में रोज़ ही शहर के मुख्य मार्गों पर जाम में फंसने वाली एंबुलेंसों के चलते मरीज़ों के परिजनों को उन्हें अस्पताल तक पहुँचाने में कितनी समस्या होती है इससे सभी वाकिफ हैं पर यह एक ऐसी समस्या है जिससे कोई भी सरकार नहीं निपट सकती है पर हम नागरिक अपनी ज़िम्मेदारियों को समझते हुए सड़क पर चलते समय यदि यातायात के नियमों का पूरी तरह से अनुपालन करना सीख लें तो काफी हद तक इस तरह की स्थिति से बचा भी जा सकता है. एक आम नागरिक नवल ने राजेन्द्र पैलेस और तिलक नगर के बीच सड़क पर जाम में फँसी हुई एम्बुलेंस को प्राथमिकता के आधार पर निकालने के प्रयास जैसे ही शुरू किये तो उनके साथ कई और लोगों ने हाथ बंटाना शुरू कर दिया जिससे हार्ट अटैक के शिकार ४५ वर्षीय राजकिशोर को समय रहते अस्पताल पहुँचाने में मदद मिली और उनकी जान भी बचायी जा सकी. यहाँ पर सोचने की बात यह भी है कि आखिर हम आवश्यक सेवाओं के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को क्यों नहीं समझते हैं और इस तरह की समस्या से किस तरह के प्रयासों के माध्यम से कुशलता से निपटा जा सकता है ?
                       यह सही है कि देश में तेज़ी से बढ़ते हुए वाहनों की संख्या को देखते हुए आज सरकार के पास सड़कों के सुधार के लिए सीमित विकल्प शेष बचते हैं क्योंकि देश भर में  जिस तरह से मुख्य मार्गों का अतिक्रमण किया जाता है उसके बाद इन सड़कों की चौड़ाई कम हो जाती है जिससे सड़क पर यातायात का अधिक दबाव बन जाता है. इस परिस्थिति से निपटने के लिए सबसे पहले दिल्ली या देश के किसी भी अन्य शहर के अंदर इस तरह की हर सड़क को चिन्हित किया जाना चाहिए और उस पर किसी भी तरह के अतिक्रमण को एक राष्ट्रीय नीति बनाकर हटाया जाना चाहिए क्योंकि कुछ राज्यों ने अपन स्तर से इस दिशा में कुछ पहल कर भी रखी है पर अधिकांश राज्यों में अभी भी इस पर काम किये जाने की आवश्यकता भी है. इस मामले में केंद्र सरकार केवल दिशा निर्देश जारी करने का काम ही कर सकती है तथा सड़क कानून में कड़े संशोधनों के माध्यम से मुख्य मार्गों पर किसी भी तरह के स्थायी या अस्थायी अतिक्रमण को रोकने के लिए पूरे देश की हर सरकार को उनका अनुपालन करने को कह सकती है क्योंकि यह राज्य के कार्य क्षेत्र में आने वाला विषय है और इस तरह के मुद्दों पर अन्य दलों द्वारा चलायी जा रही राज्य सरकारें अपनी राजनीति करने से बाज़ नहीं आती हैं.
                        देश की सरकारों के कानून बनाने से स्थिति में पूरी तरह से सुधार आ ही जायेगा ऐसा भी नहीं है क्योंकि हम अधिकांश भारतीय नागरिक केवल पुलिस या कानून के डर से ही सही रास्ते पर चलने में विश्वास करते हैं और जहाँ भी कोई तैनात नहीं दिखता है वहां हम किस तरह की मनमानी करने लगते हैं यह किसी से भी छिपा नहीं है और इस तरह से ही अधिकांश बार अनावश्यक रूप से जाम लग जाया करता है. एम्बुलेंस जैसी अति आवश्यक सेवा को हर तरह की प्राथमिकता देने के बारे में हर नागरिक को आज जागरूक होने की ज़रुरत है क्योंकि आखिर उसमें भी तो कोई किसी का अपना ही जा रहा होता है और इस तरह की सामजिक उद्दंडता के चलते यदि किसी की जान चली जाती है तो यह पूरी तरह से असहनीय ही है. हमें एक एम्बुलेंस को रास्ता देने में कितना समय लगने वाला है फिर भी हम यह मान लेते हैं कि हम लेट हो रहे हैं पर एक रोगी को यदि समय से चिकित्सकीय सहायता न मिल पाये तो उसका सब कुछ समाप्त हो सकता है अब हमें इस बात को ही समझने की आवश्यकता है. यह सुधार स्व-अनुशासन से ही आ सकता है जब हम यह तय कर लें कि कितना भी जाम क्यों न हो हम इस तरह की आपात परिस्थितियों के लिए सदैव अपने अच्छे से अच्छे प्रयास करने से नहीं चूकेंगें.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 16 नवंबर 2014

छत्तीसगढ़ और परिवार नियोजन

                                                                     छत्तीसगढ़ में नलबंदी ऑपरेशन के बाद महिलाओं को दी गयी दवा में चूहेमार दवा के मिश्रण के पाये जाने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि रमन सरकार इस मामले से जिस तरह से निपटने का प्रयास कर रही यही वह केवल लीपापोती की श्रेणी में ही आता है क्योंकि इस पूरे मामले में ऑपरेशन में कोई कमी नहीं पायी गयीं है और सारी खामी दवा में विषैले रसायन के कारण ही दिखाई दे रही है. आज जिस तरह से छत्तीसगढ़ सरकार पूरे देश के साथ दुनिया की नज़रों में है उससे यही पता चलता है कि वहां कुछ न कुछ ऐसा अवश्य ही चल रहा था जिसकी भनक सरकार को भी थी शायद इसी कारण सीएम ने बिना किसी जांच के पूरा हुए ही अपने स्वास्थ्य मंत्री को क्लीन चिट दे दी थी और पूरे मामले में निर्दोष डॉक्टर को सजा दी जिसमें उसका कोई दोष ही नहीं था ? अब अपने कथित सु-शासन को बचाये रखने के लिए रमन सरकार ने जो किया वह कहीं से भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है.
                                    सरकार को अब अपनी गलती सुधारते हुए निलंबित किये हुए डॉ को तत्काल बहाल करना चाहिए और उनसे इस बात के लिए माफ़ी भी मांगनी चाहिए क्योंकि सरकार के मनमाने रुख से उनकी प्रतिष्ठा को धक्का लगा है और उनकी मानहानि भी हुई है. जिस बेशर्मी से आज भी सरकार को अपनी कमी नहीं दिखाई दे रही है उससे तो यही लगता है कि छत्तीसगढ़ में मज़बूत विपक्ष के न होने का खामियाज़ा पता नहीं और किस किस तरह से जनता भुगत रही है ? नक्सली हमले में यदि कांग्रेस की राज्य इकाई के बड़े नेताओं की हत्या न हुई होती तो संभवतः पिछले वर्ष के चुनावों में नतीजा कुछ और ही आ सकता था. किसी भी गलती को सुधारने का कोई समय नहीं होता है यदि रमन सिंह में नैतिकता बची है तो उन्हें निलंबित डॉ को तुरंत बहाल करते हुए पूरे मामले की सीबीआई द्वारा जांच करने चाहिए क्योंकि अत्यधिक बजट होने के कारण कहीं इसमें भी यूपी के स्वास्थ्य विभाग घोटाले की तरह कोई बड़े नाम सामने आ सकते हैं.
                                    इस पूरे मामले में एक बात और भी सामने आई है कि जिन महिलाओं की नलबंदी की जा रही थी उनकी बैगा जनजाति को परिवार नियोजन के कार्यक्रम से मुक्त रखा गया है तो इस मामले में सरकार यहाँ पर भी दोषी पायी जाती है. बैगा जनजाति के अस्तित्व पर आसन्न खतरे को देखते हुए उनको परिवार नियोजन के कार्यक्रम से मुक्त रखा गया है और किस आदेश के द्वारा इन लोगों के माध्यम से सरकार अपने आंकड़े सुधारने में लगी हुई थी यह भी चिंताजनक है. एक मामले के खुलने में जिस तरह से पूरी छत्तीसगढ़ सरकार ही कटघरे में खड़ी दिखाई देने लगी है और अपनी गलती को सरकार के मुखिया और अन्य नेता जिस बेशर्मी से डॉक्टरों पर डालने में लगे हुए हैं उससे उसकी कार्यशैली का ही पता चलता है. अच्छा हो कि केवल आंकड़ों के स्थान पर मानवीयता को देश के हर राज्य में प्राथमिकता दी जाये और सरकारी कार्यक्रमों को जनता से वास्तविक रूप से जोड़ने के प्रयास शुरू किये जाएँ जिससे इनके सही परिणाम सामने आ सकें.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

क्लिनिकल टेस्ट और कानून

            भारत में आम तौर पर पानी सर से ऊपर हो जाने पर ही कुछ किये जाने की कार्यशैली के कारण कुछ बहुराष्ट्रीय दवा कम्पनियों द्वारा नयी दवाओं के रोगियों पर परीक्षा को लेकर अब सच लोगों के सामने आ रहा है. स्वास्थ्य मंत्रालय की स्थायी संसदीय समिति ने अपनी एक जांच में यह पाया है कि बिना कठोर और पारदर्शी नियमों के साथ लोगों में जागरूकता के अभाव में इस तरह के क्लिनिकल टेस्ट आसानी से किसी भी शहर में किये जा रहे हैं. समिति ने यह भी पाया कि हाल ही में रेफाक्सिमिन नामक नयी दवा का परीक्षण कोटा तथा जयपुर में किया है. इसी तरह रेमोसेट्रान का परीक्षण बैतूल, भोपाल, इंदौर और वड़ोदरा में किया गया था. यहाँ पर इस बात से कोई अंतर नहीं पड़ता है कि कहाँ पर क्या परीक्षण किया जा रहा है पर यह सारे परीक्षण जिस तरह से गोपनीयता का आवरण पहने रहते हैं वह चिंता का विषय है. देश में १६४ स्थानों पर इस तरह के टेस्ट किये जाने की अनुमति दी गयी है पर इसमें अभी तक पारदर्शिता का बहुत अभाव है.
         किसी भी नयी दवा को एक चरणबद्ध तरीके से परीक्षण के बाद ही व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए अनुमति प्रदान की जाती है पर हमारे देश में जिस तरह से बिना रोगियों को जानकारी दिए और इन दवाओं के दुष्प्रभाव के बारे में बताये ही परीक्षण किये जाते हैं वह तरीक़ा ग़लत है क्योंकि लगभग सभी मामलों में रोगियों को यह पता ही नहीं चल पाता कि वे किसी दवा कम्पनी के लिए चूहे का काम कर रहे हैं और हो सकता है उसमें उनकी जान भी चली जाये. कानूनन इस तरह के मामलों में पहले रोगियों की स्वीकृति ली जानी चाहिए और उसके बाद उन्हें नयी दवा से सम्बंधित सभी बातें भी समझाई जानी चाहिए. इन सभी बातों को जानने के बाद जब रोगी इसके लिए तैयार हो तभी इस तरह के परीक्षण किये जाने चाहिए. साथ ही जिन रोगियों पर परीक्षण चल रहे हों उनके बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट स्थानीय जिला चिकित्सालय में भी उपलब्ध होनी चाहिए जिसे जिले स्तर के अधिकारी आवश्यकता पड़ने पर चेक कर सकें और यह जान सकें कि वास्तव में कितने लोगों पर परीक्षण किये गए और उनके क्या परिणाम रहे ?
        जिस तरह से दवा क्षेत्र में अनुसंधान चल रहे हैं तो उस स्थिति में नयी दवाएं रोज़ ही सामने आती जायेंगीं और उनके साथ ही उनके मनुष्यों पर परीक्षण की भी आवश्यकता हमेशा ही बनी रहेगी पर इस पूरे मामले को जिस पारदर्शिता के साथ चलाया जाना चाहिए आज देश में उसकी कमी है. दवा कम्पनियां अपने बड़े मुनाफे के लिए तो तैयार रहती है पर किसी नयी दवा के टेस्ट के दौरान होने वाले किसी विपरीत असर को अपने पर लेने से बचने के कारण ही अब छोटे शहरों की तरफ जा रही हैं क्योंकि वहां पर इस तरह से लोग जागरूक नहीं है और किसी तरह से इन परीक्षणों के दौरान मृत्यु हो जाने पर उन्हें किसी तरह का मुआवज़ा भी किसी को नहीं देना पड़ता है. यह भी सही है कि किसी भी रोग से लड़ने के लिए नए परीक्षणों की आवश्यकता हमेशा बनी रहेगी पर उसके लिए इस तरह से चोरी छिपे परीक्षण करने को किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है. आख़िर किसी दवा कम्पनी के लाभ के लिए किसी मासूम रोगी को कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है ? अब इस बारे में स्पष्ट कानून और मुआवज़े की व्यवस्था पूरी पारदर्शिता के साथ करने की ज़रुरत है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

अब मुफ्त जेनरिक दवाएं भी

      केंद्र सरकार ने १२वीं योजना में २७ हज़ार करोड़ रुपयों की धनराशि खर्च करके देश के ज़रुरत मंदों तक अच्छी गुणवत्ता की जेनरिक दवाइयों की उपलब्धता करने का एक महत्वकांक्षी प्रस्ताव तैयार किया है. इस प्रस्ताव के अंतर्गत देश के बीमार लोगों के लिए मुफ्त में जेनरिक दवाओं को सरकार राज्य सरकारों के सहयोग से उपलब्ध करने की योजना चलाएगी और इसमें २० हज़ार करोड़ रूपये केंद्र तथा ७ हज़ार करोड़ रूपये राज्यों द्वारा वहन किये जायेंगें. यह भी पता चला है की सरकार ने मुफ्त दवाओं के इस प्रस्ताव को पिछले वर्ष ही मंज़ूरी दे दी थी पर इस वर्ष इसके लिए धनराशि के आवंटन के साथ ही इसकी घोषणा की गयी है जबकि पिछले वर्ष इसके अनुमोदन के समय इसका प्रचार प्रसार नहीं किया गया था. देश के सभी सरकारी अस्पतालों से किसी भी रोगी को डाक्टर का परचा दिखाकर यह दवाएं मिल सकेंगीं और साथ ही सरकारी डाक्टरों पर इस बात का दबाव भी बनाया जायेगा कि वे इन्हीं दवाओं को लिखें और उन पर बाज़ार की ब्रांडेड दवाइयों के लिखने पर भी पाबन्दी लगायी जाएगी.
         सरकार के इस कदम से जहाँ ब्रांडेड दवाइयों के व्यापार करने वाली उन कंपनियों में निराशा है जो भारत को एक बड़े बाज़ार के रूप में देखती हैं पर साथ ही भारतीय फार्म उद्योग ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है. इस तरह की बड़े बजट वाली किसी भी योजना में सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की होती है कि इसे पूरी पारदर्शिता के साथ चलाया जाये क्योंकि जब इतने बड़े पैमाने पर दवाओं की खरीद की जाएगी तो उसमें बड़े घोटाले होने की भी संभावनाएं बढ़ जायेंगीं. इस मामले में सरकारी खरीद को पूरी तरह से ऐसा बनाया जाना चाहिए कि कोई आसानी से इस धन का दुरूपयोग न कर सके. इसके लिए सबसे अच्छी बात यह रहेगी कि सरकारी क्षेत्र की दवा कम्पनियाँ जो आज के समय में अपने अस्तित्व को बचाने के लिए जूझ रही हैं अगर सरकार उनको भी कुछ पैकेज देकर पुनर्जीवित करने की कोशिश करे तो जहाँ एक तरफ़ लाखों कर्मचारियों के भविष्य को संवारा जा सकेगा वहीं दूसरी तरफ़ सरकारी नियंत्रण में बनने वाली इन दवाओं में गुणवत्ता पर भी आसानी से नियंत्रण रखा जा सकेगा.
          देश में जिस तरह से अच्छी योजनायें बनती है अगर उनके अनुपालन में भी उसी तरह की ईमानदारी दिखाई जाये तो आने वाले समय में देश में विकास की गति और भी तेज़ी पकड़ सकती है. अभी तक जिस तरह से कुछ सरकारी अधिकारियों के हाथों में ही चिकित्सा विभाग की पूरी खरीद रहती है उस स्थति को बदला जाना चाहिए. ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि किसी सरकारी कंपनी को पुनर्जीवित करने में दवाओं की गुणवत्ता के साथ कोई समझौता किया जाये ? इन दवा कम्पनियों के प्रबंधन को साफ़ तौर पर यह बता दिया जाना चाहिए कि अब इस बड़े व्यवसाय को पाने के लिए उनके पास भी देश भर की केंद्र और राज्य सरकारों की कम्पनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता आनी चाहिए क्योंकि सरकार एक बार ही इस तरह से मदद देकर दवाओं को खरीदेगी उसके बाद किसी के लिए भी खुले बाज़ार की तरह संभावनाएं खोल दी जायेंगीं. जिससे देश के सरकारी क्षेत्र की दवा वाली कंपनियों के लिए आगे बढ़ने का अवसर भी खुला रहे और गुणवत्ता के साथ भी किसी तरह का समझौता न करना पड़े.
                              
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 22 जून 2012

चिकित्सा नीति और स्वास्थ्य

         जब से आमिर खान ने अपने कार्यक्रम सत्यमेव जयते में चिकित्सा पेशे से जुड़ी बातों में चर्चा की है तभी से देश में इस बारे में लोग बातें करने लगे हैं. जिस तरह से आमिर ने चिकित्सा जगत में व्याप्त कदाचार की पोल खोली ऐसा नहीं है कि जनता और सरकार उससे वाकिफ़ नहीं है फिर भी आमिर की बातों को ऐसे लिए जाने लगा जैसे उन्होंने कोई बहुत बड़ी बात कह दी हो ? आज भी देश की आवश्यकता के अनुसार एक स्वास्थ्य नीति की बहुत आवश्यकता है जिसके लागू होने के बाद इस क्षेत्र की बहुत सारी समस्याओं से निजात पाई जा सकती है पर जिस तरह से केवल सनसनी फ़ैलाने के लिए ही कार्यक्रम में कुछ खास पहलू पर ही रौशनी डाली गयी उससे यही लगता है कि देश में चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े हुए सभी लोग केवल कदाचार में ही जुड़े हुए हैं ? क्या आमिर की टीम ने विभिन्न जांचों में कमीशन की बात करते समय यह जान्ने की कोशिश की कि देश में कितने डॉ ऐसे भी हैं जो इस तरह की जांचों में कोई भी कमीशन नहीं लेते हैं जब हर क्षेत्र में हर तरह के लोग हैं तो किसी एक क्षेत्र की केवल एक बात पर ही रौशनी डालने का क्या मतलब निकलता है ?
         आमिर ने निसंदेह इस बात को उठाकर चर्चा में तो ला ही दिया है पर क्या उनकी टीम इतनी सशक्त है कि वो देश की सरकार और उद्योग जगत को यह सलाह दे सकें कि देश में दवा उद्योग किस तरह से चलाया जाना चाहिए ? सस्ती दवाओं के साथ विदेशी पूँजी निवेश की सीमा बढ़ाये जाने की वकालत से देश के दवा उद्योग में नाराज़गी है क्योंकि आज कोई भी यह कह सकता है कि आमिर अपने प्रभाव का इस्तेमाल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लाभ पहुँचाने के लिए कर रहे है तो उनके पास इस बात का क्या जवाब होगा ? किसी कार्यक्रम में किसी बात की आलोचना करना बहुत अच्छा है पर जब नीतियां बानाने का समय आता है तो सभी को गहन मंथन करने की ज़रुरत होती है और क्या सरकार इस तरह से किसी एक नीति को इतनी आसानी से बना सकती है ? सरकार के लिए देश के मतलब केवल महानगर ही नहीं होते हैं और उसे दूर दराज़ के क्षेत्रो तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुँचाने के बारे में निरंतर प्रयास करने ही पड़ते हैं फिर भी यह सब इतना आसान नहीं होता जितना किसी कार्यक्रम में बैठकर कह देना होता है.
      देश के ग्रामीण अंचलों में स्वस्थ्य सेवाएं किस तरह से चरमरायी हुई हैं या फिर अधिकांश जगहों तक आज भी ये सेवाएं नहीं पहुँच पायी हैं तो इसके लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है ? सरकार अभी तक अपने संसाधनों से तहसील मुख्यालयों तक भी अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं नहीं दे पाई है ऐसे में उसके सीमित संसाधनों से जनता को कब राहत मिल पायेगी यह बात भी कोई नहीं जानता है. देश को टीवी पर दिखाई देने वाले इन कार्यक्रमों से अधिक एक व्यापक स्वास्थ्य नीति की ज़रुरत है और उसके बिना किसी भी स्तर पर कोई भी सरकार अपने दम पर कुछ नहीं कर सकती है. देश के नागरिकों के स्वास्थ्य के बारे में सभी को जागरूक होने की ज़रुरत है पर साथ ही इस बात का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि जब भी कोई किसी भी क्षेत्र की बातें करें तो वे एक पक्षीय नहीं होनी चाहिए क्योंकि उससे सम्बंधित क्षेत्र के लोगों के बारे में समाज में गलत धारणा ही बनती है. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 8 जून 2012

हेल्थ कार्ड और बच्चे

      चिकित्सा को प्राथमिकता में शामिल करते हुए यूपी सरकार ने जिस तरह से एनआरएचएम् के तहत तीन दर्ज़न जिलों में २ से १४ साल तक के बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण करवा उनको हेल्थ कार्ड देने जा रही है उससे आने वाले समय में प्रदेश में बच्चों के स्वास्थ्य को काफ़ी हद तक सुधारा जा सकता है. अभी तक आम तौर पर किसी भी सरकारी योजना में जिस तरह से काम करने की इच्छा शक्ति नहीं दिखाई देती है उस स्थिति में यह योजना भी कितनी दूर तक चल पायेगी अभी नहीं कहा जा सकता है फिर भी सरकार द्वारा इस तरफ़ नयी तरह से सोचने से यह तो स्पष्ट हो गया है कि सरकार किन क्षेत्रों में तेज़ी से काम करना चाहती है. प्रदेश में केंद्रीय योजना में जिस तरह से पिछली सरकार के अधिकारी और नेता फंसते जा रहे हैं उससे यही लगता है कि कुछ अपनों को लाभ पहुँचाने के लिए इस महत्वाकांक्षी योजना पर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया और इसके फंड की जिस तरह से लूट मचाई गयी उसने प्रदेश के पहले से ही बीमार स्वास्थ्य विभाग को कोमा में पहुंचा दिया.
      अच्छा ही है कि सपा सरकार इस मसले को केवल स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर नहीं देख रही है और इसमें मुख्य सचिव जिस तरह से ख़ुद ही इन कार्यों की समीक्षा करने की बातें कर रहे हैं उससे कहीं न कहीं से विभाग में यह संदेश तो जा ही रहा है कि अब ख़ुद अखिलेश के निर्देश पर ही यह काम ख़ुद मुख्य सचिव की निगरानी में है. ऐसा नहीं है कि सरकार के पास अच्छे और कर्मठ अधिकारीयों की कोई कमी है पर जब कहीं पर ख़ुद के स्वार्थ प्रदेश के हित पर हावी हो जाते हैं तो फिर किसी भी सरकार का कोई भी मंत्री या अधिकारी नियमों की अवहेलना कर सकता है. प्रदेश में बच्चों के स्वास्थ्य पर अभी तक कोई ध्यान ही नहीं दिया जाता है और जिस तरह से प्रदेश की स्थिति है उसमें बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं केवल सपना ही बनकर रह जाती हैं. इस स्थिति को तेज़ी से बदलने की ज़रुरत है और इसमें किसी भी तरह की राजनीति भी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि इन बच्चों का किसी भी राजनीति से कोई मतलब नहीं है और उन्हें केवल कुछ सुविधाओं से ही बहुत राहत पहुंचाई जा सकती है.  
      प्रदेश सरकार ने डीजी स्तर से खोले गए सभी खातों को भी बंद करने के आदेश जारी किये और पुरानी व्यवस्था को फिर से लागू कर देने के आदेश भी दिए हैं क्योंकि इस नयी व्यवस्था में अलग से खोले गए खातों में इस मिशन की धनराशि को स्थानांतरित कर दिया गया और वहां पर इसमें जमकर धांधली की गयी जिसका पूरा असर आज प्रदेश की बदतर स्वास्थ्य सेवाओं पर दिखाई दे रहा है. अखिलेश सरकार को अपनी प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में अनुभवी मंत्रियों के साथ नयी उम्र और ऊर्जावान युवा मंत्रियों को लगाने का काम भी करना चाहिए क्योंकि जब तक अनुभव के साथ ऊर्जा का समावेश नहीं किया जायेगा तब तक स्थिति को बदलने में कोई सफलता नहीं मिल पायेगी ? साथ ही महत्वपूर्ण मंत्रालयों में सही मंत्रियों की तैनाती की जानी चाहिए जिससे सरकार के काम को लोग महसूस भी कर सकें. लखनऊ में बैठकर कोई भी योजना बनाना बहुत आसान है पर बेहतर तालमेल और इच्छा शक्ति के अभाव में उसे लागू करवा पाना बहुत ही कठिन है फिर भी आशा की जानी चाहिए कि इस योजना से बच्चों के स्वास्थ्य में गुणात्मक सुधार और बदलाव लाने में सफलता अवश्य ही मिलेगी.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 25 मई 2012

डॉक्टर निगरानी में

          यू पी में बदहाल चिकित्सा व्यवस्था को सुधारने के लिए प्रदेश के सरकारी डॉक्टरों को सरकार ने सीयूजी मोबाइल के साथ एक मोबाइल लोकशन का चिप लगाने के बारे में निर्णय लिया है जिससे इन सरकारी डॉक्टरों की सही स्थिति का पल भर में पता लगाया जा सकेगा कि वे अपने तैनाती स्थल के अस्पताल में हैं या कहीं और गायब हैं ? सरकारी नौकरी शुरू करते समय विभिन्न तरह के वायदों को करने वाले बहुत सारे सरकारी डॉक्टर जल्दी ही इन सबको भूल कर केवल जुगाड़ के सहारे ही शहरों में नौकरी करते रहते हैं जिससे प्रदेश के दूर दराज़ के क्षेत्रों तक चिकित्सा सुविधाएँ पहुँचाने की सरकारी मंशा पर लगातार पानी फिरता रहता है और ग्रामीण क्षेत्रों या तहसील मुख्यालयों के अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी हमेशा ही बनी रहती है. इस मामले में जब तक सरकार के इन ठोस प्रयासों के साथ इन डॉक्टरों की प्रतिबद्धतता नहीं जुड़ेगी तब तक प्रदेश के बदहाल चिकित्सा तंत्र को सुधारने में कोई सफलता नहीं मिलने वाली है.
        यह अच्छा ही है कि यह सरकार केवल बातें करने के स्थान पर कुछ काम करने की तरफ़ जाती हुई भी दिखाई दे रही है पर ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के कड़े कदम प्रदेश में पहले नहीं उठाये गए हैं पर एक बार इनकी शुरुवात तो तेज़ी से की जाती है पर कुछ समय बीतने के बाद फिर से विभाग में नए जुगाड़ करके इनसे निपटने की तरकीबें खोज ली जाती हैं जिससे कोई भी अच्छा प्रयास कारगर नहीं हो पाता है. इस तरह की योजनाओं के बारे में विभाग को नए सिरे से सोचने की आवश्यकता रहेगी क्योंकि इसके बिना यह सब कुछ दिनों तक तो ठीक तरह से चलता रहेगा और एक समय आने के बाद इनका अनुपालन कम होता चला जायेगा और फिर से पूरी व्यवस्था पुरानी पटरी पर लौटती नज़र आने लगेगी. इससे निपटने के लिए अब सरकार को भी कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे उसके प्रयासों का सही लाभ जनता तक पहुँच सके.
        इसके साथ ही सरकार को डॉक्टरों के इस तरह से गायब रहने के मूल कारणों पर भी गौर करना ही होगा क्योंकि जिस तरह से यह प्रदेश में एक समस्या है वैसी अन्य प्रदेशों में नहीं है ? इससे यही लगता है कि बड़े स्तर पर मंत्रालय स्तर से इस पूरे मामले में दखल रहता है जिससे जिस डॉक्टर की लखनऊ में सेट्टिंग होती है वह कभी भी काम पर जाना ही नहीं चाहता है और किसी तरह से जुगाड़ करके खुद को जिला मुख्यालय से अटैच करवा लेता है और हफ्ते में मुश्किल से एक या दो दिन ही अपनी तैनाती के स्थल तक जाने के बारे में सोचता है ? इस स्थिति में सरकार के इस क़दम से इन जुगाडू डॉक्टरों के लिए बड़ी समस्या आने वाली है पर प्रदेश के लिए सबसे अच्छी बात यह हो सकती है कि या तो ये सभी सुधर जायेंगें या फिर नौकरी छोड़कर अन्य लोगों के लिए जगह खाली कर देंगें. जिससे नए डॉक्टरों की भर्ती में सरकार को आसानी होगी और साथ ही प्रदेश की जनता को भी कुछ सुधरी हुई चिकिसा सेवाएं मिल सकेंगीं. यह सब केवल दृढ संकल्प से ही किया जा सकता है और फिलहाल सरकार में यह दृढ़ता दिखाई भी दे रही है अगर यह पूरे ५ साल तक बनी रही तो प्रदेश में बहुत कुछ सही होने में देर नहीं लगने वाली है.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

इलेक्ट्रानिक वेस्ट और कानून

       देश में बढ़ते हुए मोबाइल और कंप्यूटर की संख्या को देखते हुए अब इनके पुराने हो जाने पर इनका सही तरह से निस्तारण किये जाने के बारे में सरकार एक कानून लाने जा रही है जो 1 मई १२ से पूरे देश में प्रभावी होने जा रहा है. इस कानून के तहत अब किसी भी नागरिक को अपने पुराने इलेक्ट्रानिक उपकरण जैसे कंप्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल, टीवी, फ़ोन, फ्रिज, एलसीडी आदि सभी को पुराना हो जाने पर सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त केंद्र तक पहुँचाना होगा और इसमें विफल रहने पर स्थानीय प्रशासन को कानूनन कार्यवाही करने के अधिकार भी दिए जा रहे हैं. इस तरह के सभी उपकरणों में बहुत सारे ऐसे तत्वों का प्रयोग किया जाता है जो मनुष्यों समेत सभी जीव-जंतुओं, वनस्पति, जल और वायु के लिए हानिकारक हैं और इसके सही तरह से निस्तारण न करने से स्वस्थ्य सम्बन्धी बड़ी समस्याएं सामने आ सकती हैं. पश्चिमी देशों में पहले से ही इस तरह के कानून लागू हैं और उनका कडाई से अनुपालन भी करवाया जा रहा है साथ ही भारत में भी इस तरह के इ वेस्ट के आयात पर काफी पहले से ही प्रतिबन्ध लगा हुआ है.   
           इस काम को सुचारू ढंग से चलाने के लिए पहले जागरूकता बढ़ाने पर भी ज़ोर दिया जायेगा जिससे आम नागरिक यह समझ सकें कि इस तरह के सामान को कबाड़ी को बेचने से उनके ही स्वास्थ्य पर बुरा असर भी पड़ सकता है और इनसे निकले वाले अपशिष्ट पदार्थ ज़मीन में पड़े रहकर कई तरह के प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार बन सकते हैं. इस काम को चरण बद्ध तरीके से शुरू करने केलिए सबसे पहले लगभग ४०० बड़े उपभोक्ताओं की पहचान की गयी है जहाँ पर इनका बड़े स्तर पर प्रयोग किया जाता है क्योंकि जब तक बड़े स्तर से शुरुवात नहीं की जाएगी तब तक इसे धरातल पर उतार पाना आसान नहीं होगा. साथ ही इन उत्पादों को बेचने वाली कम्पनियों से भी इस बात की उम्मीद की जा रही है कि वे अपने उत्पाद बेचते समय ही ग्राहकों को इस तरह के ख़तरों के बारे में सचेत करेंगीं और यदि उनके पास कोई सम्बंधित पुराना उपकरण है तो उसे सही तरह से निस्तारित करवाने की व्यवस्था कराने की व्यवस्था भी करेंगीं. भारत में जिस तरह से पुराने उत्पाद के बदले नए उत्पाद लेने की ख़ास आदत है उसे यह काम काफ़ी हद तक आसान हो सकता है क्योंकि इससे पुराने उपकरण आसानी से निस्तारित किये जा सकते हैं.
       अभी तक के अनुमान के अनुसार देश में प्रति वर्ष लगभग ४ लाख टन ई-वेस्ट निकलता है जिसमें से केवल १० % ही सही तरह से निस्तारित किया जाता है और बाकी स्थानीय कबाड़ियों के हाथों में चला जाता है जो कि केवल उपयोग में आने वाले सामान को ही निकाल कर अन्य भाग को ऐसे ही फ़ेंक देते हैं जिससे इनसे होने वाले प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है. हमें अपने पूरे उपकरणों को बच्चों को खिलौने की तरह भी नहीं इस्तेमाल करने देना चाहिए क्योंकि बच्चे उन्हें अपने मुंह में डालते रहते हैं जो उनके लिए खतरनाक हो सकता है. अब इस तरह के कानून के लागू होने के बाद नागरिकों को इस बारे में जागरूक करने के लिए देश में विभिन्न स्तरों पर काम करने वाले एनजीओ कि भी भागीदारी करवाने के प्रयास किये जा रहे हैं. ई-वेस्ट आगे आने वाले समय में देश के लिए बड़ी समस्या न बन जाए इसके लिए अभी से हम सभी को जागरूक होने की ज़रुरत है. सरकार कानून बना सकती है जिससे प्रशासन के पास नागरिकों को समझाने और दण्डित करने का प्रावधान रहे पर सही अर्थों में किसी मामले में जागरूकता तभी आ सकती है जब हम सभी नागरिक इस बारे में केवल सोचें ही नहीं वरन समय रहते काम भी करना शुरू कर दें जिससे आने वाली पीढ़ी हमें इस बात के लिए दोषी न माने कि हमने उनके लिए सांस लेने लायक हवा और पीने लायक पानी नहीं छोड़ा था...  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 13 नवंबर 2010

शिशु मृत्यु दर और भारत

चिकित्सा जगत की प्रतिष्ठित पत्रिका "द लांसेट" ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है की भारत में शिशु मृत्यु दर में निश्चित तौर पर कमी आई है फिर भी अभी इस मामले में बहुत कुछ किया जाना शेष है.  भारत में पूरी दुनिया के २० % बच्चों की ५ साल के होने से पहले ही मृत्यु हो जाती है जिससे यह पता चलता है कि कुछ ठोस करके इस तरह से होने वाली मृत्यु दर को कम किया जा सकता है ? शिशुओं की मृत्यु में मुख्या रूप से ज़िम्मेदार दस्त और निमोनिया पर अगर समय से काबू पा लिया जाये तो यह पूरा परिदृश्य पलटा जा सकता है अभी तक ग्रामीण भारत और गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के लिए जिस तरह की योजनायें बनायीं जाती हैं उनसे यही पता चलता है कि उनका धरातल पर पूरी तरह से अनुपालन नहीं किया जाता है ?
          केंद्र सरकार द्वारा विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के माध्यम से बहुत सारी योजनायें चलायी जा रही हैं पर उनको जिस तत्परता से लिया जाना चाहिए आज तक वैसे कभी भी नहीं लिए जाने के कारण हमारी बहुत सारी योजनायें अपने आप ही असफल हो जाया करती हैं. आज भी देश कि तहसीलों तक में चिकित्सकों का अभाव है और कुछ सरकारी नीतियां और उनके साथ चिकित्सा विभाग की उदासीनता के कारण यह स्थिति और भी विकट हो जाती है. सरकारें केवल पैसा दे सकती हैं पर स्थानीय स्तर पर चिकित्सक आकर कुछ कर भी रहे हैं या नहीं इस बात को देखने के लिए अभी भी कोई तंत्र हमारे पास नहीं है जिसका लाभ उठाकर लोग कुछ पैसे ले देकर अपने घर पर प्रैक्टिस करते रहते हैं और माह में एक दो बार जाकर ही अपनी उपस्थिति पूरी कर आते हैं.
      योजनायें बनाने से अधिक आवश्यकता आज इस बात की है कि जिन स्थाओं पर चिकित्सा सुविधाएँ नहीं हैं उनको पूरी तत्परता से पहुँचाया जाए और साथ ही इस बात का भी ध्यान रखा जाये कि कहीं से इसमें ढिलाई न होने पाए. सेवा में किसी को भी पूरी तरह से नियमित न किया जाये उनको पूरा पैसा भी दिया जाये और उनकी उपस्थिति लगाने के लिए स्थानीय स्तर पर भी कुछ व्यवस्था भी की जाये जिससे इन कर्मचारियों पर पूरी नज़र रखी जा सके. जब तक इस तरह के किसी भी तंत्र को हम पूरी तरह से एक सुचारू व्यवस्था के तहत नहीं लेकर आयेंगें तब तक कुछ भी करना संभव नहीं हो सकेगा.   

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 2 अगस्त 2010

भारत का ज्ञान और पटेंट

एक खबर के मुताबिक भारत की प्राचीन आयुर्वेद चिकित्सा से सम्बंधित केवल ३ मामलों में ही पटेंट मिल सका है जबकि पूरी दुनिया से लगभग ६००० पटेंट इस को लेकर हासिल किये जा चुके हैं. आज के युग में जब हर चीज़ का व्यावसायिकी करण किया जा रहा है तो भारतीय ज्ञान के प्रति हमारी उदासीनता कहीं हमें हमारे घरेलू नुस्खों से ही वंचित न कर दे ? यह पूरी दुनिया में सभी जानते हैं की आयुर्वेद का उद्भव और पोषण भारत में ही हुआ है फिर भी बहुत सारे लोग अपने हितों को साधने के लिए पता नहीं कितने योगों का पटेंट ले चुके हैं साथ ही यह भी सही है कि इन सभी ने इस बात को भी स्वीकार है कि कहीं न कहीं वे सभी भारतीय मूल से ही उपजे हुए हैं. हम यह मानते हैं कि चाहे जो हो हमारे ज्ञान को कौन लिए भागा जा रहा है पर यहाँ पर हम सभी यह भूल जाते हैं कि दुनिया उतनी सरल नहीं रह गयी है जितनी कभी हुआ करती थी.
           आज जब हर चीज़ को विश्व व्यापी बनने से कोई रोक नहीं सकता है तो फिर किस तरह से हमारे यहाँ के ज्ञान को चुराने से रोका जायेगा ? हमारी धरती पर आकर ही ब्रितानी प्रधानमंत्री कह गए कि वे कोहिनूर हीरा नहीं लौटा सकते हैं क्योंकि उसके बाद वहां देखने लायक रह ही क्या जायेगा ? नियमों की दुहाई देने वाले देश, नैतिकता की बातें करने वाले देश, लोकतंत्र के प्रहरी कहलाने वाले देश का जब यह हाल है तो आने वाले समय में और देश पता नहीं किस तरह से अपने बर्ताव को सही रख पायेंगें ? कल को कहीं ऐसा न हो कि हम केवल कोहनूर के इतिहास की तरह भारत की चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के प्रचार प्रसार को देख कर ही खुश होने की स्थिति में ही रह जाये और कुछ भी प्रयोग करने केलिए हमें कुछ शुल्क दूसरों को देना पड़े ?
        यह भी सही है कि काफी देर से ही सही पर भारतीय ज्ञान की पूरी डिजिटल जानकारी उपलब्ध करने की दिशा में किये जा रहे प्रयासों के बाद हजारों वर्षों से प्रयोग में लाये जा रहे हमारे ज्ञान को सुरक्षित रखने में काफी हद तक मदद मिल जाएगी. फिर भी भारत के ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए हर नागरिक को कुछ न कुछ प्रयास तो करने ही होंगें क्योंकि जिस तरह से सरकारें काम करती हैं उससे कुछ भी सुरक्षित बचने की सम्भावना कम ही हो जाती है. आज यह केवल चिंता करने का विषय नहीं है बल्कि इसके लिए आयुर्वेद से जुड़े सरकारी विभागों को सही दिशा में काम करने की ज़रुरत है. यदि इस मामले में सरकारें कुछ नहीं करती हैं तो उन पर दबाव डालने के लिए कुछ न कुछ आयुर्वेद से जुड़े लोगों को तो करना ही होगा.    

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 24 जुलाई 2010

वायदे और यथार्थ

एक ऐसी खबर जो कभी भी सरकार के लिए सर दर्द बन सकती है पर इस बात की किसी को फ़िक्र ही नहीं. कुछ माह पहले सीतापुर, उत्तर प्रदेश के जिला चिकित्सालय के एक्स रे तकनीकी सहायक सेवा निवृत्त हो गए. कुछ समझ नहीं आ रहा है न कि आखिर ये किस तरह की पोस्ट है और क्या कोई सेवा निवृत्त नहीं हो सकता है ? जी नहीं आयु हो जाने पर सभी सेवा निवृत्त हो जाते हैं पर हमारे उलटे प्रदेश में कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ पर दूसरी जगहों पर कहानी ख़त्म हो जाया करती है ? जिला चिकित्सालय जैसा महत्वपूर्ण स्थान जहाँ पर दिन भर बहुत सारी जांचों की आवश्यकता कानूनी मसलों के लिए पड़ती ही रहती है वहां पर इस तरह से महीनों तक कोई महत्वपूर्ण पद कैसे खाली रखा जा सकता है ? ऐसा नहीं है कि शासन की नज़रों में सीतापुर का रुतबा कुछ कम हो एक मंत्री, थोक के भाव विधायक और सांसद सब कुछ हो सत्ताधारी पार्टी का है यहाँ पर फिर भी किसी की नज़र आखिर क्यों नहीं पड़ती है इस तरह की घटनाओं पर ? अफ़सोस इस बात का है कि दलित के साथ दुष्कर्म के प्रयास की खबर तो अखबार के पहले पन्ने पर आ जाती है और जनता से जुड़ी इस समस्या कि खबर अन्दर के पन्नों में खो जाती है.
        इस तरह की लापरवाही कभी भी स्थानीय प्रशासन को भारी पड़ सकती है क्योंकि जिले के सभी विचाराधीन कैदियों को इस समय जांचों के लिए पडोसी जनपद लखीमपुर भेजा जा रहा है. पुलिस अभिरक्षा में उत्तर प्रदेश में कैदी कितने आराम से भाग जाते हैं यह प्रदेश की पुलिस और सरकार भी जानती है फिर भी इस तरह से रोज़ ही न जाने कितने कैदियों को बसों से ढोकर लाया ले जाया जाता है ? समस्या यहाँ पर यह नहीं है कि क्या कैदियों को इधर उधर न किया जाए पर समस्या यह है कि क्या जो सरकार राजनैतिक लाभ के लिए नए जनपद को एक मिनट में सृजित कर देती है वह इस तरह के छोटे परन्तु महत्वपूर्ण पदों परसमय रहते भर्ती क्यों नहीं कर पाती है ? ऐसा भी नहीं है कि कोई अचानक ही सेवा निवृत्त हो गया हो ? इस तरह की घटनाओं से यह पता चलता है कि आज के समय में सरकारें किस क़दर आम जनता के हितों से दूर होती चलली जा रही हैं. आज शायद इस तरह की नियुक्तियों से सरकार को कोई तुरंत लाभ नहीं होने वाला है बस इसलिए ही इनको सेवा योजन विभाग के लिए छोड़ दिया जाता है. आख़िर इतने मंत्रालय और इतने मंत्री सरकारी खजाने पर इतना बड़ा बोझ डाल कर कौन सी सुविधाएँ प्रदेश की जनता को दे पा रहे हैं ?
       इसमें जनता का ही दोष है कि उसको ही कुछ दिखाई नहीं देता, एक सरकार जो संविधान की शपथ खाकर देश हित में सब कुछ करने की लम्बी चौड़ी बातें करती है वह किस तरह से कुछ समय बाद ही अपने हर कर्त्तव्य को भूल जाती है ? यहाँ पर बात उत्तर प्रदेश की हैं इसलिए यहाँ की सरकार को ही कहा जायेगा पर सारे देश की यही स्थिति है कि कहीं भी नज़र डालकर देख ली जाये हर जगह की सरकारें इस तरह से संवेदन हीन होकर काम कर रही हैं. सही ही कहा गया है कि पद और प्रतिष्ठा मिलने पर सभी को अभिमान हो जाता है.......      

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

अब ग्रामीण चिकित्सक भी ?

देश अभी तक अघोषित रूप से शहर और गाँव में बंटा हुआ था पर अब चिकित्सा के नाम पर इसे पूरी तरह से बांटने पर विचार किया जा रहा है ? देश में एम् सी आई जो कि एलोपैथिक चिकित्सकों की हर बात के लिए ज़िम्मेदार है उसे यह अधिकार कौन दे रहा है की वे गाँव के लिए अलग से चिकित्सक तैयार करें ? यह सही है की देश के ग्रामीण अंचलों में चिकित्सकों की बहुत कमी है पर इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी छोटे रास्ते से इस समस्या का समाधान निकला जाये ? क्या एम सी आई यह बताने का कष्ट करेगी कि  डॉक्टर बनते समय जो शपथ चिकित्सक लेते हैं उसे इतनी जल्दी कैसे भुला दिया जाता है ? हर चिकित्सक अपना भविष्य शहर में ही ढूंढता रहता है पर कोई भी यह नहीं चाहता कि गाँव में जहाँ इसकी वास्तविक आवश्यकता है कोई जाये ? इस ग्रामीण डिग्री के माध्यम से चिकित्सा के क्षेत्र में भी एक ऐसी खाई बन जाएगी जिसे कभी भी मिटाया नहीं जा सकेगा .
क्या गाँव में होने वाली समस्याओं के लिए कुछ अलग करना ज़रूरी है या फिर उन्हें भी पूरी तरह से उचित चिकित्सा उपलब्ध करायी जानी चाहिए ? यह परिषद् और इसके चिकित्सक खुले आम आयुष के चिकित्सों का विरोध करते रहते हैं पर शायद ये इस तथ्य से अनिभिज्ञ हैं कि जिसने पूरे ५ साल पढाई की है और अपनी परीक्षा को अच्छे से उत्तीर्ण भी किया है वह किस तरह से कम है ? यहाँ पर इस बात का कोई मतलब नहीं रह जाता है कि किसने किस पद्धति से अपनी पढ़ाई  की है क्योंकि क्या एलोपैथिक चिकित्सक आयुर्वेदिक आदि दवाएं नहीं लिखते हैं ? देश में चिकित्सा के स्तर को देखते हुए कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे गाँव को राहत मिले इसमें भी राजनीति नहीं होनी चाहिए. पर क्या हर तरफ स्वार्थ से भरी दुनिया में कोई वास्तव में गाँवों के बारे में सोचना चाहता है ? 


मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 15 नवंबर 2009

अस्पताल में मौत...

उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में ३ दिन पहले एक ऐसी घटना हुई जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था। जनपद के महिला चिकित्सालय में एक बिस्तर पर दो दो प्रसूताओं को उनके बच्चों के साथ रखा जा रहा था जिसके कारण एक नवजात की बिस्तर से गिरकर मौत हो गई.... देश में आबादी के कारण बहुत सी दिक्कतें हैं पर उन दिक्कतों को किस तरह से बढ़ाने का काम यहाँ पर किया जाता है यह बहुत सोचने की बात है। सरकारी दबाव में बहुत सारे काम किए जाते हैं पर क्या कोई ऐसी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती जिसमें कुछ ऐसा किया जा सके जो इन नवजात बच्चों और उनकी माताओं के लिए भी कुछ कर सके ? यह भी सही है कि पिछले कुछ दिनों से स्थानीय अख़बारों द्वारा ठेलिया, गाड़ी आदि में प्रसव की बहुत सारी खबरें छापी गयीं हैं जिसके दबाव में ही सारे बच्चों को भरती करने का प्रयास किया गया होगा। इस दबाव एवं प्रयास का एक माँ पर क्या असर हुआ होगा जो कि अपने बच्चे के साथ पता नहीं कितने सपने बुनकर यहाँ आई होगी ? क्या सरकार के पास कोई आंकड़ा होता है कि किसी क्षेत्र विशेष में कितनी गर्भवती महिलाएं है ? यदि ऐसा कुछ हो तो शायद योजनाएं ठीक से चल सकें। हम जनता के लोग भी किस तरह से व्यवहार करते हैं कभी भी इस तरह के किसी भी अभियान को कोई समर्थन नहीं देते हैं। आज कल सूचना क्रांति का युग है कुछ ऐसा होना चाहिए कि एक संदेश भेजकर लोग गर्भावस्था की जानकारी किसी नम्बर पर दे सकें। जिससे सरकार के पास कम से कम एक आंकडा तो रहे कि तहसील, जिले या राज्य स्तर पर कितनी महिलाएं गर्भवती हैं ? इससे जनपद में कुछ समस्या हल हो जायेगी तथा लोगों को भी कुछ सुविधाएँ मिलने में आसानी हो जायेगी। अभी भी यह देखना है कि क्या कुछ करके देश में इस तरह की घटनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकता है ? आशा है कि अब किसी माँ की गोद बिस्तर से बच्चे के गिरने के कारण सूनी नहीं होगी ........

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

बड़े अस्पताल अब दूर नहीं..

एक ख़बर आई कि अब उत्तर प्रदेश, बिहार में दिल्ली जैसे उच्च स्तरीय अस्पतालों की स्थापना की जायेगी। चलो अब जा कर सरकार को सुध तो आई कि इन स्थानों पर भी ऐसे अस्पतालों की आवश्यकता है जो वास्तव में गुणवत्ता युक्त चिकित्सा आसानी से उपलब्ध करा सकते हों आज इस बात की अधिक आवश्यकता है कि जो अस्पताल चल रहे हैं उनमें चिकित्सक नियुक्त किए जायें और वे अपने कार्य को पूरी तन्मयता से करें। मात्र अस्पताल बनने से कुछ भी नहीं होने वाला है आज सभी को यह सोचना होगा कि हम अपने कार्य को ठीक से क्यों नहीं करते हैं ? सरकारें योजना बना सकती हैं पर हर योजना का लाभ कौन उठा रहा है इस बात को तो हम सभी को ही देखना होगा। आज कितनी ऐसी योजनायें हैं जिनको चंद लोगों ने कब्जे में कर रखा है, जबकि जिन तक उसका लाभ पहुंचना चाहिए वे आज भी इससे वंचित ही हैं। अब समय आ गया है कि हम सभी अपनी तरफ़ से यह प्रयास करें कि हम अपने यहं पर अपने स्तर से सभी योजनाओं को देखने का प्रयास करते रहेंगें तभी इस देश में कुछ हों पायेगा । मात्र सरकार की तरफ़ ताकने से आज कुछ भी नहीं होने वाला है। हम सभी को कुछ तो करना ही होगा जिससे यह सारा तंत्र कुछ सही रास्ते पर चल सके। आज भी हम सदैव की भांति सोते ही रहे तो यह अस्पताल भी केवल नाम मात्र के ही रह जायेंगें। आज किसी को सैफई के अस्पताल की याद है कि वहां पर कितनी सुविधाएँ थीं और अब वहां पर क्या बचा है ?