मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 19 दिसंबर 2015

पुलिस अधिकारियों की सालाना कॉन्फरेंस

                                                                            देश भर के आला पुलिस अधिकारियों की सालाना कॉन्फरेंस इस बार गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र में आयोजित की गयी है जिसमें सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों समेत वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी भाग लिया करते हैं. इस कॉन्फरेंस को आज़ादी के बाद शुरू किया गया था जिसका उद्देश्य देश भर की पुलिस के सामने आने वाली चुनौतियों को एक मंच पर साझा करते हुए उनसे निपटने और देश में शांति बनाये रखना था. इस बार भी यह सम्मलेन शुरू हो चुका है और पीएम, गृह मंत्री के साथ अन्य विशिष्ट लोग भी इसमें मंथन करने वाले हैं सम्मलेन का उद्घाटन भाषण देते हुए जब केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इसके केंद्र में आतंकवाद और जम्म-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर पर ध्यान होने की बात करते हैं तो उनकी सरकार का खोखलापन भी दिखाई दे जाता है क्योंकि जिस जम्मू-कश्मीर पर वे चर्चा करना चाहते हैं वहां से पीडीपी-भाजपा सरकार ने अपने डीजीपी के. राजिंद्रन और आईजी अब्दुल गनी मीर को पहले स्वीकृति देने के बाद भाग लेने के लिए ही नहीं भेजा है और इस मामले पर जम्मू-कश्मीर सरकार का क्या रुख है यह भी आधिकारिक तौर पर अभी तक उसकी तरफ से स्पष्ट नहीं किया गया है.
                             पूरी दुनिया जानती है कि भारत में आतंक से सबसे अधिक प्रभावित राज्य जम्मू-कश्मीर ही है पर जब अपनी वार्षिक कॉन्फरेंस में जब देश की पुलिस के शीर्ष अधिकारी आतंकवाद पर चर्चा करने के लिए बैठते हैं तो उसमें उस राज्य के किसी भी शीर्ष अधिकारी की शिरकत दिखाई ही नहीं देती है तो उस परिस्थिति में क्या जम्मू-कश्मीर के हालात और आतंकवाद पर सार्थक चर्चा संभव भी है यह तो केंद्र की वैश्विक स्तर पर आतंवाद पर हमला करने वाली मोदी सरकार को सोचना ही चाहिए था ? यदि जम्मू-कश्मीर में किसी भी अन्य दल की सरकार होती तो क्या केंद्रीय गृह मंत्री और पीएम इस तरह से इस मसले पर चुप्पी लगाते और क्या टीवी चॅनेल्स पर हल्ला मचाने वाले भाजपाई प्रवक्ता इस मुद्दे पर इसी तरह से चुप रह जाते ? मुफ़्ती के नेतृत्व में भाजपा की साझा सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता के साथ सोचना भी चाहिए था क्योंकि कश्मीर में हालत चाहे जैसे भी हों पर क्या इस तरह से स्थानीय कारणों के चलते इतनी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कॉन्फरेंस से राज्य के प्रतिनिधित्व को अनदेखा किया जा सकता है और क्या राष्ट्रवादी भाजपा का वर्तमान संस्करण इसे सही भी मानता है ?
                        इसी कॉन्फरेंस में गृह मंत्री यह बयान देते हैं कि जम्मू-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर में हालात में काफी सुधार आया है और दूसरी तरफ राज्य सरकार बिना कारण बताये इतनी महत्वपूर्ण बैठक में अपने पुलिस अधिकारियों को अंतिम समय पर मना कर देती है तो दोनों में से कौन सही है यह बता पाना बहुत ही मुश्किल है. यदि जम्मू-कश्मीर के हालत पहले से अच्छे हो गए हैं तो के. राजिंद्रन गुजरात क्यों नहीं भेजे गए और यदि वहां हालात इतने ख़राब हैं कि राज्य सरकार अपने पुलिस प्रमुख के साथ कुछ आला अधिकारियों को केवल तीन दिनों के लिए राज्य से बाहर भी नहीं भेज सकते हैं तो किसको सही माना जाये ? यदि वास्तव में वहां के हालात इतने ख़राब हैं गृह मंत्री किस दम पर स्थिति सुधारने के दावे करने में लगे हुए हैं या यह भी संभव है कि पीडीपी-भाजपा गठबंधन में कहीं न कहीं कुछ ऐसा भी चल रहा है जो सब सामने नहीं आ पा रहा है और संभवतः मोदी को दबाव में रखने के लिए ही मुफ़्ती ने अंतिम समय में इस तरह का निर्णय लिया है. जम्मू-कश्मीर में केवल सत्ता में साझीदार बनने के लिए जिस तरह से भाजपा ने अपने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान की अनदेखी की वह आज किसी से भी छिपी नहीं है और अब भाजपा संभवतः उसी निर्णय का भुगतान करने में लगी हुई है.       
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शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान

                               यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल और देश की दूसरी ऊंची छोटी के साथ बसे उत्तराखंड स्थित नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर लौटे हुए विशेषज्ञों की रिपोर्टों के आधार पर पर्यावरण और पारिस्थितिकी के बारे में सुखद समाचार मिलना एक अच्छी बात है. एक समय इस क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों के बहुत अधिक हो जाने के कारण यहाँ पर पाये जाने वाले जीव जंतुओं की संख्या में तेज़ी से गिरावट होने लगी थी और एक बार तो ऐसा लगने लगा था कि विश्व के सामने अब इस सुन्दर स्थान को दोबारा उस स्थिति में नहीं लाया जा सकेगा. इन्हीं चिंताओं के बीच १९८३ में केंद्र सरकार ने नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में हर तरह की मानवीय गतिविधि पर रोक लगा दी थी और उस रोक का क्या परिणाम सामने आ रहा है उसको जांचने के लिए १९९३ में पहली बार और फिर उसके बाद २००३ की संक्षिप्त यात्रा के बाद इस वर्ष जून जुलाई में ३१ सदस्यीय टीम की रिपोर्ट अपने आप में बहुत ही अच्छी मानी जा सकती है क्योंकि सरकार की तरफ से रोक लगाये जाने के सकारात्मक परिणाम सामने आने शुरू हो चुके हैं.
                           वर्ष १९९३ में पार्क में गई टीम की रिपोर्ट से तुलना करें तो इस बार हिम तेंदुआ, काला भालू, कस्तूरी मृग, भरल, हिमालयन थार, सेराव, रेड फॉक्स, बीजे के अलावा पक्षियों की करीब १३० प्रजातियां, जिसमें मोनाल, कोकलास, स्नो कोक आदि भी देखे गए तथा वनस्पतियों की करीब ४०० प्रजातियां देखी गयी. इस रिपोर्ट के बाद अब केंद्र और राज्य सरकारों के पास अपनी धरोहरों को भविष्य के लिए बचाये रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने के बारे में भी अब आसानी होने वाली है. ऐसा नहीं है कि देश में इस तरह के प्राकृतिक स्थान नहीं हैं पर जनता में जागरूकता और भ्रष्टाचार के चलते इससे जुड़े हुए लोगों द्वारा ही इन स्थानों को अधिक नुकसान पहुँचाया जाता रहता है. इस उत्साहवर्धक रिपोर्ट के बाद क्या सरकार इस तरह से अन्य स्थानों को सुरक्षित रखने के लिए इस तरह के कदम उठाने के बारे में सोचना शुरू करेगी या मानवीय गतिविधियों को कुछ कड़ी शर्तों के साथ चलने देने की अनुमति प्रदान करना चाहेगी यह तो आने वाले समय में ही पता चल पायेगा.
                        आज भी इसी तरह की स्थिति में पहुंचे देश के बहुत सारे अन्य प्राकृतिक स्थानों के बारे में अब केंद्र और राज्य सरकारों को मिल-जुल कर कुछ सोचना होगा जिससे मानवीय हस्तक्षेप को नियंत्रित किया जा सके और साथ ही प्रकृति प्रेमियों को भी इन स्थानों पर आने जाने की छूट भी हो. आम तौर पर अभी भारत में प्रकृति के प्रति लोगों में वह जागरूकता नहीं आ पायी है जिससे उन स्थानों को सुरक्षित और संरक्षित रखने के बारे में सोचा जा सके पर कुछ हद तक सरकारी प्रयासों और स्वयं सेवी संगठनों के कामों के चलते अच्छे परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं. सरकार को इस तरह के रोमांचक पर्यटन पर पूरी रोक लगाने के स्थान पर उसको नियंत्रित करने के बारे में सोचना चाहिए जिससे प्रकृति प्रेमी इन स्थानों को देखने से वंचित भी न रहें और इनके मूल स्वरुप को बचाये भी रखा जा सके. आज भी हम आम भारतीय अपने लापरवाह कामों से अपने आस पास के पर्यावरण और प्रकृति को बहुत जाने अनजाने नुकसान पहुँचाने में लगे ही रहते हैं जिससे देश की बहुमूल्य प्राकृतिक धरोहर सिमटती ही जा रही है. स्थानीय पर्यावरण और प्रकृति को बचाये रखने के लिए केवल उसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता ही है और यही हम सभी नागरिकों का देश को सबस बड़ा उपहार भी होगा जिसमें हम देश को वैसा ही बनाये रखने में सफलता पायेंगें जैसा कि वह हमें अपनी पुरानी पीढ़ियों से कभी मिला था.        
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शनिवार, 27 जून 2015

आईएस- इस्लाम के नाम पर आतंक

                                                                         मुसलमानों के सबसे पवित्र महीने रमजान के शुरू होने से पहले जिस तरह से मुस्लिम धर्म गुरुओं और मौलानाओं की तरफ से विश्व भर में कथित जिहाद में लगे हुए समूहों से हिंसा से बचने की अपील की थी उसका आईएस जैसे संगठनों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है. जहाँ तक इस्लाम के अनुयायियों द्वारा जिहाद किये जाने की परिकल्पना की गयी थी आज उसका सबसे बुरा असर मुसलमानों पर ही पड़ता दिखाई दे रहा है क्योंकि आज पूरी दुनिया में केवल कुछ एक संघर्ष ऐसे कहे जा सकते हैं जहाँ आतंकियों का दूसरे धर्म के लोगों के साथ संघर्ष चल रहा है वर्ना आज के इस जिहाद का सबसे बुरा असर मुसलमानों की पूरी दुनिया की स्थिति पर ही पड़ रहा है. कल आईएस द्वारा किये और स्वीकारे गए हमलों की बात की जाये तो ट्यूनीशिया में उसने कुछ विदेशियों को मारने में सफलता हासिल की है पर कुवैत और सीरिया के कोबानी में तो उसने सिर्फ मुसलमानों को ही मारा है तो यह आखिर किस तरह से इस्लाम की विचारधारा को मज़बूत करने का काम करने वाला है यह संभवतः आईएस की समझ से बाहर है या फिर वह पूरी दुनिया को इस्लाम और अन्य के संघर्ष में घसीटना चाहता है.
                             यह सही है कि आईएस की गतिविधि आज चरम की भी हद है और वह केवल आतंक और घृणा के दम पर ही आगे बढ़ना चाह रहा है अरु जिस तरह से वह दुनिया भर में मुस्लिम युवाओं को अपनी तरफ आकर्षित करने में लगा हुआ है उससे आने वाले समय में मुसलमानों के लिए एक नयी तरह की दिक्कत भी और सामने आने वाली है. ९/११ के बाद से ही जिस तरह से अमेरिका और कुछ अन्य देशों में मुसलमानों के लिए अवसर तेज़ी से घटने शुरू हुए थे आज भी उनमें तेज़ी ही देखी जा रही है और इस देशों की आशंका का स्तर इस स्थिति तक पहुँच गया है कि भारत जैसे देशों से अमेरिका जाने वाले महत्वपूर्ण मुस्लिम लोगों को भी कड़ी सुरक्षा जांचों से गुजरना पड़ता है. सोचने का विषय यह है कि आईएस कितनी चालाकी से अल-क़ायदा के उस काम को आगे बढ़ा रहा है जिसमें पूरी दुनिया में मुसलमान अलग थलग हो जाएँ और युवा मुसलमानों के लिए अच्छी शिक्षा और प्रगति के अवसर ही समाप्त हो जाएँ ? इस स्थिति में इस्लाम के बारे में आम लोगों में जो गलत धारणा बन रही है उसका भी कोई अन्य विकल्प आज तक इस्लामी देश नहीं खोज पाये हैं जो कि पूरे विश्व के लिए ही चिंताजनक है.
                                    इस तरह की घटनाओं को रोकने और इस्लाम की सही परिभाषा को दुनिया के सामने लाने के लिए अब प्रमुख इस्लामी देशों और प्रतिष्ठित मौलानाओं को आगे आकर कुछ ठोस कदम उठाने होंगें क्योंकि आज जिस तरह से इस्लाम के नाम पर आतंकी संगठन बर्बरता को आगे बढ़ा रहे हैं उसका आज के सभ्य विश्व में कोई स्थान नहीं होना चाहिए. निश्चित तौर पर अरब देशों के शासकों ने पश्चिमी देशों के साथ मिलकर बहुत कुछ ऐसा भी क्या है जिससे आज इस्लामी विश्व में बहुत अधिक असंतोष है और धर्म के साथ राजनीति करने के खतरे के चलते आज इस्लामी देशों की राजनीति में आतंकियों का बहुत प्रभाव होने लगा है जिससे अब जाकर सऊदी अरब और ईरान को भी चिंता होनी शुरू हुई है. संभव है कि आईएस जैसे संगठन को कुचलने के लिए अब कुछ अरब देश एक साथ मिलकर काम करने के बारे में सोचना शुरू कर दें. शिया सुन्नी मतभेद का लाभ उठाकर आज नमाज़ पढ़ते हुए लोगों को गोलियों से भूनकर कुछ आतंकी सुन्नी संगठन इस्लाम के किस चेहरे को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं जो खुद मुसलमानों को ही अधिक नुकसान पहुंचा रहा है ? अब समय है कि इस्लाम के सही स्वरुप को बचाने के लिए खुद इस्लाम के अंदर से ही आवाज़ उठनी चाहिए कहीं ऐसा न हो कि तमाशा देखने के चक्कर में आईएस आगे अधिकांश अरब देशों को अपनी चपेट में लेने के अपने मंसूबे में सफल हो जाये.           
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शनिवार, 20 जून 2015

रेलवे परिचालन के विकल्प

                                                                                   अपने आप में विश्व के सबसे बड़े और कठिनतम परिचालन से जूझते हुए भारतीय रेल जिस तरह से अपनी सेवाओं को पटरी पर रखने की कोशिशें किया करती हैं उनमें यदि कोई बड़ी तकनीकी समस्या आ जाये तो उससे निपटने के लिए संभवतः उसके पास कोई कारगर विकल्प नहीं होता है क्योंकि आज तक संभवतः उसे इस तरह की किसी बड़ी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा है. मध्य प्रदेश के व्यस्ततम स्टेशन इटारसी के रुट रिले सिस्टम के आग लग जाने से पूरी तरह से नष्ट हो जाने से भारतीय रेल के सामने संभवतः पहली बार ऐसी चुनौती सामने आई है जब उसके परिचालन पर इतना बुरा असर पड़ गया है एक अनुमान के अनुसार यह कहा जा रहा है कि आने वाले समय में इस मार्ग की लगभग ५००० गाड़ियों के सञ्चालन पर दुष्प्रभाव पड़ने की संभावनाएं भी हैं और जो काम किया जाना है उसके पूरा होने में लगभग आठ महीने लगने वाले हैं. अभी से ही विभिन्न मार्गों से मुंबई जाने वाली दसियों गाड़ियों को इस समस्या के चलते निरस्त कर दिया गया है छुट्टियों के मौसम के इस आखिरी दौर में जिन लोगों ने इस मार्ग पर आने जाने का कार्यक्रम बना रखा था अब उनके लिए बहुत समस्या हो गयी है.
                                 रेलवे के अनुसार इटारसी से रोज़ लगभग १५० सवारी गाड़ियां और ६० मालगाड़ियां गुजरती हैं पर इस समस्या के कारण अब यहाँ से मुश्किल से आधी गाड़ियों का परिचालन भी हो पाना संभव नहीं लगता है क्योंकि इसे अस्थायी रूप से सुधारने में ही लगभग ३५ दिन लगने वाले हैं और पूरी तरह से सुधार करने में आठ महीने का समय लग सकता है. आज के आधुनिक युग में जब रेलवे का परिचालन मानव पर कम आश्रित हो रहा है तो ऐसी परिस्थिति में तकनीकी गड़बड़ी हो जाने पर परिचालन पूरी तरह से पटरी से उतर ही जाता है इससे निपटने के लिए संभवतः अभी रेलवे के पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके द्वारा एक दो दिनों में परिचालन को पटरी पर लाया जा सके. यह पूरा मामला तकनीकी रूप से इतना जटिल होता है कि कोई गड़बड़ी होने पर इसको सही करने में समय लग ही जाता है पर संभवतः पहली बार इतने व्यस्त मार्ग पर यह समस्या आने के बाद अब रेलवे इसके लिए कोई अन्य विकल्प सोचना शुरू कर सकता है कि ऐसी स्थिति में परिचालन को कैसे सही रखा जाये.
                                पिछले कुछ दशकों में निश्चित तौर पर रेलवे ने अपने परिचालन में गुणात्मक सुधार किया है और आने वाले समय में इसके और भी अच्छा होने की पूरी संभावनाएं है पर व्यस्त मार्गों पर इस तरह की समस्या होने की स्थिति में आम लोगों के पास क्या विकल्प शेष बचते हैं जिनका उपयोग कर वे अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हों ? क्या इस तरह की स्थिति में बड़े स्टेशन के आस पास कोई ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसके माध्यम से लम्बी दूरी के यात्रियों को बीच की कुछ दूरी बसों में करा अगले स्टेशन से फिर गाड़ी में बैठकर अपने गंतव्य तक भेजने के बारे में कुछ सोचा जाये. जले हुए सिस्टम को बदलने में बहुत समय लगता है और जब यह सारा काम परिचालन को जारी रखते हुए करना पड़ता है तो कर्मचारियों के लिए और भी बड़ी समस्या सामने आ जाती है. देश को भारतीय रेल पर गर्व है क्योंकि यह पूरे देश को एक सूत्र में पिरोने का काम भी आसानी से किया करती है. संभवतः आने वाले दिनों में इस तरह की समस्या से निपटने के लिए रेलवे के पास बेहतर संसाधन और विकल्प भी हो जायेंगें फिलहाल इस स्थिति से निपटने में आम यात्रियों को भी रेलवे का पूरा सहयोग करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि रेलवे अपनी तरफ से अच्छी यात्री सेवाओं के लिये हर स्तर पर लगातार प्रयासरत है.       
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सोमवार, 15 जून 2015

रेलवे परिचालन और समयबद्धता

                                 आम जनता द्वारा पीएम की सोशल मीडिया पर पहुँच के बाद जिस तरह से रेलवे से जुडी हुई समस्याओं के बारे में शिकायतों का अम्बार लगना शुरू हो गया उसके बाद खुद पीएमओ की पहल पर रेल मंत्रालय ने अब ट्रेनों के लेट चलने को लेकर एक रिपोर्ट तैयार करने के बारे में विचार किया है और इसके लिए उसने आईआईटी से भी मदद मांगी है. वैसे देखा जाये तो रेलवे की अधिकांश ट्रेन थोड़े या लम्बे समय के लिए रोज़ ही लेट होती रहती हैं जिनमें परिचालन से सम्बंधित मसले ही अधिक हुआ करते हैं जबकि कुछ महत्वपूर्ण ट्रेनों के संचालन में आज भी रेलवे अपनी समयबद्धता को सही ढंग से निभा पाने में पूरी तरह से सफल कही जा सकती है. पिछले वर्ष सत्ता में आने के बाद सरकार ने आपातकाल के समय ट्रेनों के सञ्चालन से जुडी फाइल्स को खंगालने का काम भी बाबुओं से करवाया था क्योंकि यह वही समय था जब देश में पहली बार और लगातार लम्बे समय तक ट्रेन अपने सही समय से चलती थीं और उनकी सेवाओं में गुणात्मक सुधार भी आ गया था तो सोचने वाली बात यह भी है कि आखिर जो काम तब हो सकता था अब उसे करने में क्या दिक्कत है ?
                         अधिकांश मामलों में परिचालन से जुड़े मामलों पर किसी भी तरह से अधिकारियों कर्मचारियों को उतना ज़िम्मेदार नहीं बनाया गया है जितना उन्हें होना चाहिए पर अब समय आ गया है तभी रेल मंत्रालय ने इस दिशा में स्टडी के माध्यम से यह जानने का प्रयास शुरू कर दिया है कि आखिर किन कारणों से ट्रेन इतना लेट चलने लगती हैं कि उन्हें सँभालने के लिए कई बार एक दिन उनकी सेवा को निरस्त करने के लिए बाध्य होना पड़ता है ? परिचालन में कर्मचारियों, पटरी, बिजली आपूर्ति, इंजनों की स्थिति और स्टेशन के कारक भी कई बार बहुत ज़िम्मेदार होते हैं क्योंकि आजकल गर्मियों में ट्रेन की सेवाएं अधिकांश बार इंजन के फेल होने से होती है या फिर स्टेशन स्टाफ के असहयोग के चलते भी ट्रेनों में सुविधाओं के नाम पर जब पानी आदि नहीं होता है तो भी उन्हें नयी जगह रोक कर इन सुविधाओं को उपलध कराया जाता है. लम्बी दूरी के ट्रेनों के परिचालन में जिस तरह से अतिरिक्त स्टाफ की तैनाती विभिन्न कारणों से की जाती है यदि उनकी ज़िम्मेदारी को भी सुनिश्चित किया जा सके तो आने वाले समय में इस व्यवस्था को सुधारने में काफी मदद मिल सकती है.
                   ट्रेन लेट होने के अधिकांश मामलों में तकनीकी कमी नहीं ही पायी जाती है फिर भी परिचालन सही नहीं हो पाता है तो अब इसके आंकलन और सुधार के लिए व्यापक प्रयास किये जाने की आवश्यकता महसूस हो रही है. रेलवे ने देश के व्यस्ततम रेल खंड दिल्ली-मुगलसराय पर इस तरह की एक स्टडी शुरू भी कर दी है जिससे संभवतः विशेष कमियों के बारे में आईआईटी अपनी राय दे पाने में सफल हो सके क्योंकि अभी तक अपने प्रयासों के बाद भी इतने महत्वपूर्ण मार्ग पर भी ट्रेनों के संचालन को पूरी तरह से पटरी पर नहीं लाया जा सका है. इतने बड़े संस्थान में अलग अलग जगहों पर अलग अलग कारणों से ट्रेन लेट हो सकती हैं पर इस पहली बार की जा रही स्टडी के माध्यम से कम से कम रेलवे को एक अंदाज़ा तो हो सकता है कि आखिर इस समस्या का समाधान कैसे निकाला जा सकता है ? यदि ट्रेन और मालगाड़ियों के परिचालन को सही किया जा सके तो रेलवे को माल ढुलाई से बहुत अधिक आमदनी हो सकती है क्योंकि एक अनुमान के अनुसार आज रेलवे लगभग एक लाख करोड़ रुपयों का घाटा केवल अपनी इस लेट लतीफी के कारण ही उठता है और इस समस्या से निपटने के लिए वह आज भी रास्ते खोजने की कोशिश में ही है.    
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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

राहुल गांधी की छुट्टी

                                                               अपने बुरे समय से जूझ रही कांग्रेस के पास वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी से अधिक स्वीकार्य नेता न होने से जहाँ इन दोनों के नाम पर पार्टी के लिए एक जुटता का सन्देश भी जाता है वहीं इनकी कार्यशैली के चलते कई बार ऐसे अवसर भी सामने आते रहते हैं जिनसे पार्टी को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है. वर्तमान में जब अध्यादेशों को लेकर मोदी सरकार परेशानियों से घिरी हुई है और अन्ना भी किसानों के मुद्दे पर दिल्ली में आंदोलन करने में लगे हुए हैं तो भाजपा के सामने पूरे देश में विपक्ष की भूमिका निभा सकने में समर्थ कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के चलते आज ऐसे असहज दृश्य भी दिखाई दे रहे हैं. लोकतंत्र में पार्टियों की मज़बूती अंत में लोकतंत्र के लिए ही बेहतर साबित होती हैं और किस पार्टी को किस तरह से चलाया जाना है यह भी पार्टी की परिस्थितियों पर निर्भर किया करता है आज जब अवसरवादी नेता कांग्रेस को छोड़कर दूसरी पार्टियों में जाने में लगे हुए हैं तो उसे अपने को किस तरह से सम्भालना है यह कांग्रेस के नेतृत्व पर ही निर्भर करता है.
                               आज कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर जो भी नेता हैं वे सभी अपनी राजनैतिक पारियों को लगभग खेल ही चुके हैं और अगले चुनाव तक उम्र के चलते इसमें से कितने खुलकर मैदान में आ पाते हैं यह समय ही बतायेगा क्योंकि जब भी सरकार बनती है तो अनुभव के नाम पर इनको सरकार में मंत्री पद मिल जाया करता है और युवाओं को पार्टी में काम कर अनुभव हासिल करने के लिए कहा जाता है. राहुल गांधी के शीर्ष स्तर की राजनीति में आने के बाद जिस तरह से निचले स्तर पर पार्टी को मज़बूत किये जाने के विभिन्न उपाय किये जाने लगे थे उनसे इन वरिष्ठ नेताओं को खतरा लगने लगा है और वे समय समय पर विभिन्न स्थानों पर राहुल से असहमति दिखने की कोशिशें भी करते रहते हैं क्योंकि यह उनके अस्तित्व को बचाए रखने की कोशिश का हिस्सा ही है उनकी इस तरह की असहमति के चलते वे पार्टी नेतृत्व पर कुछ दबाव बनाने में सफल भी हो जाते हैं. आज कांग्रेस जितनी भी है वह सिर्फ सोनिया गांधी के दम पर ही १९९८ के बाद से संभाली हुई ही है क्योंकि सीताराम केसरी के समय हार की हताशा के बाद पार्टी का हाल किसी से भी छिपा नहीं था, सक्रिय और सार्थक राजनीति के दम पर सोनिया ने अटल जैसे नेतृत्व के सामने भी कांग्रेस को एक विकल्प के रूप में खड़ा करने में सफलता पायी थी.
                               सत्ता भोग चुकी हर पार्टी के लिए ऐसा समय संकट का ही होता है जब वह सत्ता से अलग हो जाये और उसके नेता केवल अपने बारे में ही सोचने लगें आज कांग्रेस के वे बड़े नाम कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं जिनके दम पर पार्टी ने १० साल तक सरकार चलायी थी और वे राहुल को शीर्ष स्तर पर उनके अनुरूप परिवर्तन भी नहीं करने दे रहे हैं तो राहुल का छुट्टी पर जाने का कदम बिलकुल सही दिशा में लगता है. सत्ता को संभाल चुके ये लोग अब सड़कों पर पार्टी के लिए कुछ संघर्ष करके भी दिखाने का साहस करें. भाजपा द्वारा इस तरह के मुद्दे पर जिस तरह से बयानबाज़ी की जा रही है उसके कोई मायने नहीं हैं क्योंकि यदि उन्हें लगता है कि इससे कांग्रेस ख़त्म हो जाएगी तो उनको मसले पर नज़र रखते हुए अपने लिए उस घड़ी की प्रतीक्षा करनी चाहिए. राहुल की मौजूदगी से सदन में वैसे भी बहुत प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने बहस से दूर ही रहा करते हैं भले ही इसके लिए कारण चाहे जो भी हों. इसलिए उनके न होने से अब सरकार के लिए सदन में मुश्किलें बढ़ गयी हैं क्योंकि वरिष्ठों पर इस बात का दबाव है कि वे सदन में सरकार को घेरने का काम करें और अब अपने को साबित करने के लिए ये नेता कुछ तो करने ही वाले हैं जो संभवतः सोनिया गांधी की अभी तक सदन में स्थापित की गयी कार्यशैली से अलग भी हो सकता है.         
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शनिवार, 13 दिसंबर 2014

रिज़र्व बैंक- राजनीति और विकास का मॉडल

                                                                      नीतिगत मुद्दों पर मोदी सरकार के साथ शुरू से ही मतभेद रखने वाले रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने एकबार फिर से सरकार की महत्वाकांक्षी योजना "मेक इन इंडिया" पर सीधे सवालिया निशान लगा दिया है. देश के नीति निर्धारक बैंक के प्रमुख होने के नाते राजन के पास उनके अनुभव के साथ वैश्विक मामलों में जानकारी तो है पर सरकार से इतनी असहमति अपने आप में एक बड़ी बात है क्योंकि आमतौर पर अभी तक सरकार के साथ रिज़र्व बैंक के अध्यक्ष के सुर मिले हुए ही लगते हैं और आवश्यकता पड़ने पर सरकार भी उनके साथ नीतिगत मुद्दों पर चर्चा किया करती है. आज जब ताज़ा रिपोर्ट में औद्योगिक विकास दर कम होने की खबर है तो ऐसे किसी भी बड़े कार्यक्रम के प्रति राजन का संदेह जताना पूरी तरह से गलत भी नहीं हो सकता है. वैश्विक स्तर पर सरकार को देश की आर्थिक स्थिति को मज़बूत करने के हर प्रयास का समर्थन किया जाना चाहिए पर आज पूर्ण बहुमत की भारत सरकार जिस तरह से उदारीकरण को भारतीय परिप्रेक्ष्य से हटकर दुसरे देशों के आर्थिक मॉडल के अनुसार चलाने को लालायित दिखाई दे रही है तो इस तरह की चिंताएं सामने आना स्वाभाविक भी है.
                                    २००८ की वैश्विक मंदी से अगर भारत बिना किसी बड़े नुकसान के उबर पाया था तो उसके पीछे मनमोहन सरकार की वैश्विक आर्थिक नीतियों के प्रति देश में स्वयं एक तंत्र विकसित होने देने की छूट भी शामिल थी. भारत हर मामले में चीन की बराबरी नहीं कर सकता है क्योंकि वहां पर सख्त कानूनों के आगे किसी की भी नहीं चलती है और भ्रष्टाचार पर बड़े से बड़े लोगों को फांसी पर लटका दिया जाता है जब तक हमारे देश में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर बड़ी सफलता नहीं मिलती है तो केवल सरकार की अच्छी मंशा के साथ ही सब कुछ ठीक नहीं किया जा सकता है. सरकार की नियति ठीक है पर अब जब नीतियों की बात है तो देश के हर क्षेत्र को पूरी तरह से खोल देने के प्रयासों को संभलकर चरणबद्ध तरीके से लागू करने की आवश्यकता है. आज के परिप्रेक्ष्य में जब जापान से एक बार फिर से मंदी की आहट सुनाई देने लगी है तो क्या देश के आधारभूत मामलों में उस पर बहुत अधिक निर्भरता कभी धन की कमी आने से प्रभावित नहीं होने लगेगी ? केवल एक सेक्टर के लिए सरकार का इस तरह से काम करना किसी भी तरह से संतुलन भरी नीति की तरफ इशारा नहीं करता है संभवतः यही मसले हैं जिन पर राजन को समस्या दिखाई देती है.
                                    भाजपा एक समय में आर्थिक नीतियों को लेकर मनमोहन सरकार को घेरने के हर प्रयास के बाद आज जब मोदी के नेतृत्व में सरकार उन्हीं सुधारों और नीतियों को आगे बढ़ाना चाहती है तो उसकी दोहरी राजनीति भी सामने आने लगी है और सच्चाई यह है कि बीमा विधेयक पर सरकार को जब तक कांग्रेस का समर्थन नहीं मिलेगा तब तक वह पारित नहीं हो सकता है. कांग्रेस भी इसे लम्बे समय से पारित करवाना चाहती है पर अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह की इस मुद्दे पर पार्टी में अधिक नहीं सुनी जाएगी और सरकार को अगले सत्र तक इसके लिए प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है जिससे मोदी और भाजपा को भी उनकी उसी राजनीति का स्वाद चखाया जा सके जिसके चलते देश के आर्थिक विकास की रफ़्तार कम रही पर भाजपा अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में देश हितों के साथ लगातार खिलवाड़ करती रही. आज गेंद कांग्रेस के पाले में ज़रूर है पर वह भी फिलहाल केवल राजनीति करने के मूड में दिखाई दे रही है क्योंकि जब सरकार इस बीमा विधेयक को पारित नहीं करवा पायेगी तो कांग्रेस पर हमला करेगी फिर कांग्रेस उस पर आरोप लगाएगी कि इस तरह का विधेयक तो भाजपा के कारण २०११ में ही पारित नहीं हो पाया था. आर्थिक मसलों पर देश के दोनों बड़े दलों को एक सीमा तक ही राजनीति करनी चाहिए जिससे देश को सही गति दी जा सके पर इस मुद्दे पर भाजपा अपनी राजनीति तो कर ही चुकी है अब देखना यह है कि कांग्रेस इसे किस तरह से लेती है.
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रविवार, 2 नवंबर 2014

चीन की दस्तक लंका तक

                                                                           भारत सरकार द्वारा जिस तरह से चीन के साथ व्यापारिक संबंधों को बढ़ाये जाने की एकतरफा कोशिशें की जा रही हैं उसी खबर के बीच चीन और भारत का लगभग हर क्षेत्र में तनाव बढ़ता ही जा रहा है. अभी तक मुख्य रूप से चीन के साथ लगते लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में ही समस्या रहा करती थी पर भारत में सरकार बदलने के बाद से भी जिस तरह से चीन ने अपनी नीतियों में कोई परिवर्तन न करते हुए अपनी पुरानी स्थिति को ही आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है वह किसी भी दशा में भारत के दीर्घकालिक हितों के लिए सही नहीं कहा जा सकता है. चीन ने भारत के हर विरोध को अनसुना करते हुए जिस तरह से श्रीलंका में अपनी आधुनिकतम दूसरी पनडुब्बी की तैनाती की है उसके बाद यही लगाने लगा है कि भारत के साथ उसका यह संघर्ष लम्बा खिंचने वाला है और आने वाले समय में इसमें कटुता बढ़ने की संभावनाओं से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. चीन ने अपने राष्टपति के भारत दौरे के समय जिस तरह से चुमार और डैमचुक में घुसपैठ की वह उसकी मानसिकता को ही दर्शाता है.
                                                भारत के वियतनाम से बढ़ते हुए सम्बन्ध चीन को संप्रग सरकार के समय से रास नहीं आ रहे हैं जिससे अब भारत वियतनाम के साथ जिस तरह से चीनी क्षेत्र में दीर्घकालिक नीति के तहत अपनी व्यापारिक उपस्थिति बढ़ा रहा है चीन भी उतना ही श्रीलंका और बांग्लादेश के समुद्री क्षेत्रों तक पहुँचने की कोशिशें करने में लग चुका है. भारत को वियतनाम से विभिन्न समझौतों के माध्यम से व्यापारिक और लम्बे समय में सामरिक लाभ भी मिल सकते हैं पर आज जिस तरह से चीन भारत से बहुत आगे सोचते हुए हमारे बहुत पास तक दस्तक देने में लगा हुआ है उसके परिणामों से सचेत रहने की भी आवश्यकता है क्योंकि सैन्य क्षमता में आज के समय चीन हमसे बहुत आगे है और भारतीय रक्षा परिदृश्य भी चीन के मुकाबले बहुत सी अन्य बड़ी समस्याओं से घिरा हुआ लगता है यद्यपि देश में रक्षा उत्पादों को बढ़ाने और इस मामले में आत्मनिर्भर होने की कोशिशें भी लगातार ज़ारी हैं पर समस्या उतनी कम भी नहीं है.
                                              आज भारत के पास अपनी क्षमता दिखाने के स्थान पर कूटनैतिक स्तर पर प्रयास किये जाने की अधिक आवश्यकता है क्योंकि चीन की सोच पाकिस्तान जैसी नहीं है और वह हर मामले में हमसे आगे ही है तो उसके साथ पाक जैसी नीति के तहत आगे नहीं बढ़ा जा सकता है. भारत को अपनी आर्थिक बाज़ार मज़बूती के माध्यम से ही चीन को दबाना सीखना होगा क्योंकि पिछले कुछ दिनों में भारतीय पक्ष ने जितनी उग्रता भरे बयान चीन के सम्बन्ध में दिए हैं अब चीन श्रीलंका में अाकर भारत सरकार की इन नीतियों को खुलेआम चुनौती भी दे रहा है. भारत को शांतिपूर्वक अपने क्षेत्र में विकासात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने की अपनी कोशिशों को जारी रखना चाहिए जिससे आने वाले समय में हमारा ढांचा सुदृढ़ होता रहे और उसको लेकर अनावश्यक बयानबाज़ी से भी बचा जाये. पूर्वोत्तर मामलों के मंत्री सिंह के साथ गृह राज्य मंत्री रिजूजू के बयानों के सन्दर्भ में यदि देखा जाये तो भारत के लिए अभी और भी बड़ी चुनौतियाँ सामने आने वाली हैं पर अपने को सामरिक रूप से मज़बूत किये बिना चीन के साथ इस तरह से आगे बढ़ना कितना कारगर या खतरनाक होगा यह तो समय ही बताएगा.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

मजुल भार्गव की उपलब्धि

                                                                      पिछली कुछ शताब्दियों से संस्कृत को भारत में जिस तरह से केवल धार्मिक भाषा माने जाने का क्रम चल निकला है उस परिस्थिति के बीच अमेरिका से इस भाषा के प्राचीन समय में बहुत ही वैज्ञानिक होने का प्रमाण भी मिला है. प्रिंसटन यूनिवर्सिटी द्वारा १९३६ से गणित के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम करने वाले लोगों को जिस तरह से फील्ड्स मेडल पुरूस्कार दिया जा रहा है उसे इस बार संयुक्त रूप से एक भारतीय मूल के प्रोफेसर मंजुल भार्गव में ४० वर्ष की उम्र में अर्तर अविला, मार्टिन हेरेर और मरियम मिर्जाखानी के साथ संयुक्त रूप से दिया गया है. इस वर्ष के पुरुस्कारों की दूसरी बड़ी उपलब्धि यह भी है कि ईरानी मूल की मरियम इसे पाने वाली पहली महिला भी हैं क्योंकि इससे पहले पुरुषों के इस क्षेत्र में महिलाओं की रूचि काम होने के कारण अभी तक किसी भी महिला को यह पुरुस्कार नहीं मिला था. किसी भारतीय द्वारा गणित की २०० वर्षों की जटिल पहेली को इस तरह से सुलझाने का यह पहला मामला है और निश्चित तौर पर भारत के लिए गर्व का विषय है.
                                         प्राचीन काल में जिस तरह से भारतीय सभ्यता विश्व की चुनी हुई कुछ सभ्यताओं के साथ पूर्ण रूप से विकसित थी आज भी उसके प्रमाण मिलते ही रहते हैं जबकि आज पश्चिमी देशों के अंधानुकरण में हम अपनी सभ्यता और संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं. आज भी यदि प्राचीन भारत के उपलब्ध ग्रंथों का वैज्ञानिक तरीके से मंथन किया जाये तो आने वाले समय पूरे विश्व को बहुत कुछ और भी मिल सकता है जो आज तक विभिन्न कारणों से सबके सामने नहीं आ पाया है. एक समय देश में संस्कृत भाषा इतनी विकसित हुआ करती थी कि हर भारतीय की वही भाषा हुआ करती थी जिससे देश में वैज्ञानिक आधार पर शोध आदि भी हुआ करते थे पर कालांतर में जब भारतीय वर्ण व्यवस्था का दुरूपयोग किया जाने लगा और उस समय के प्रभावी लोगों ने जातियों के माध्यम से अपना प्रभाव जमाना शुरू किया तो प्रतिभा को सामने लाने के प्रयासों को बहुत धक्का लगा और पूरी सभ्यता जो एक समय अपने आप में बहुत कुछ समाहित किये हुए थी कहीं लुप्त सी होती नज़र आई.
                                         आज भी उसी वर्ण और जाति व्यवस्था का बिगड़ा हुआ स्वरुप देश में प्रभावी है जिस कारण से भी देश में विकास की गति कम नज़र आती है. अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ मिलकर इस बात के लिए एक अभियान चलायें जिसमें देश के किसी भी नागरिक के पास उपलब्ध किसी भी प्राचीन पाण्डुलिपि का डिजिटलीकरण किया जाए और उसे पर क्षेत्र विशेष के विशेषज्ञों की राय लेकर किसी भी संभव अनुसन्धान के लिए सहायता उपलब्ध करायी जाये. मंजुल भार्गव ने जिस तरह से अपने घर में रखी एक संस्कृत की प्राचीन पाण्डुलिपि के आधार पर यह काम किया है वह अपने आप में अनूठा ही है पर इस तरह की कहीं भी दबी हुई हर जानकारी को अब देश और दुनिया के सामने लाने की बहुत आवश्यकता भी है. अच्छा हो कि इस काम में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की मदद भी ली जाये क्योंकि भारतीय राजनैतिक परिवेश और संस्कृत के आज के स्वरुप के देखते हुए इसका अनावश्यक विरोध किये जाने का क्रम भी शुरू हो सकता है. मंजुल भार्गव को मिलने वाले इस सम्मान से एक बात तो स्पष्ट ही है कि यदि भारतीय ज्ञान के सागर को बिना किसी राजनीति के खोज और आगे बढ़ाया जाए तो बहुत कुछ संभव है.
  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 23 जून 2014

परमाणु ऊर्जा और विश्व

                                               १९४५ में अमेरिका द्वारा नागासाकी और हिरोशिमा पर किये गए परमाणु हमले के बाद जिस तरह से पूरी दुनिया के सामने परमाणु विज्ञान का सबसे खतरनाक स्वरुप सामने आया था उसे देखते हुए तत्कालीन सोवियत संघ ने १९५० में इसके शांतिपूर्ण उपयोग पर काम करने के बारे में सोचना शुरू किया और २६ जून १९५४ को उसने अपने पहले परमाणु ऊर्जा संयंत्र को शुरू कर पूरी दुनिया को दिखा दिया कि हर ऊर्जा के दो पहलू होते हैं और यह उसे उपयोग करने करने वाले पर है कि वह उससे बम बनाता है या अँधेरे घरों में उजाला फ़ैलाने का काम किया करता है ? जब रूस ने इस तरह की परमाणु ऊर्जा के बारे में सोचना शुरू किया तो केवल पांच साल पहले ही इसकी विभीषिका देख चुकी पूरी पीढ़ी दुनिया भर में मौजूद थी और उसे लगा कि यह भी कहीं शहरों के अंदर या कुछ दूर पर स्थापित परमाणु बम जैसे ही न साबित हो जाएँ पर रूस के वैज्ञानिकों ने इस सपने को धरातल पर उतार कर अपनी इच्छाशक्ति पर परिचय दे ही दिया था.
                                             मॉस्को से केवल १५० किमी की दूरी पर प्यातकिनो में स्थापित ओबिनिंस्क संयंत्र ने जिस तरह से पूरी दुनिया के सामने एक बेहतरीन और कामयाब ऊर्जा के विकल्प खोल दिए थे वहीं सोवियत संघ को इस मामले में बढ़त भी दे दी थी. सोवियत परमाणु कार्यक्रम के जनक आइगोर कूर्चतोव भी परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण इस्तेमाल के बड़े पक्षधर थे तभी उनकी इस कामना के साथ ही परमाणु ऊर्जा से विद्युत उत्पादन की तरफ जाने के बारे में सोचा गया वर्ना उससे पहले परमाणु ऊर्जा का विध्वंसक स्वरुप ही दुनिया ने देखा था. भारत ने इस संयंत्र को कितना महत्त्व दिया था इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी ने भी अपनी सोवियत यात्रा के दौरान इसका दौरा किया था. भारत के परमाणु ऊर्जा कार्य्रक्रम में भी सोवियत संघ ने सदैव ही भरपूर सहयोग और योगदान देकर उसे आगे बढ़ाने का काम ही किया है जो दोनों देशों के उस दौर के मज़बूत रिश्तों को भी प्रदर्शित करता है.
                                              भारतीय परिप्रेक्ष्य में आज भी अमेरिका और पश्चिमी देशों के रुख के कारण परमाणु ऊर्जा का वह व्यापक स्वरुप सामने नहीं आ पाया है जिसके माध्यम से देश की ऊर्जा आवश्यकतों को पूरा किया जा सकता है और आने वाले समय में देश के विकास की गति को भी आगे बढ़ाने में सफलता मिल सकती है. भारतीय परिस्थिति के बारे में पूरी दुनिया यह जानती है कि अभी तक जो भी नीति भारत द्वारा बनायीं गयी है उसका अनुपालन भी बहुत कठोरता के साथ किया गया है और अब देश इस स्थिति में पहुँच चुका है कि वह संवर्धित यूरेनियम के माध्यम से अपनी ऊर्जा आवश्यकतों को पूरा कर सके. देश में जिस तरह से परमाणु ऊर्जा के विकासात्मक स्वरुप की चर्चा शुरू होकर काम होना चाहिए वह अभी भी नहीं आ पाया है. सोवियत संघ के इस पहले परमाणु संयंत्र से यह बात साबित भी कर दी है कि यदि सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाये तो परमाणु ऊर्जा से अधिक प्रभावी और सस्ती ऊर्जा कहीं और से नहीं मिल सकती है. फिलहाल इस स्वच्छ ऊर्जा के २६ जून को साठ वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने यह अपने बेहतरीन स्वरुप को तो दिखा ही चुका है.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 4 नवंबर 2013

कोलम्बो राष्ट्रकुल सम्मलेन

                                      राष्टमंडल देशों के १५ से १७ नवम्बर तक श्रीलंका की राजधानी कोलम्बो में होने वाले सम्मलेन में भारतीय पीएम मनमोहन सिंह के जाने को लेकर जिस तरह से एक बार फिर से घरेलू दबाव बढ़ता जा रहा है आने वाले समय में वह देश की लम्बे समय से स्थिर रही विदेश नीति के लिए एक बड़ा झटका भी हो सकता है क्योंकि स्थानीय मुद्दों को इस तरह से अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर हावी होने देने से आने वाले समय में भारतीय विदेश नीति के पास करने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा. यह सही है कि अगले वर्ष देश में आम चुनाव होने वाले हैं और उस परिस्थिति में पूरे तमिलनाडु में तमिल भावनाओं से जुड़े श्रीलंका के मुद्दे को कोई भी सरकार राजनैतिक रूप से उतने हलके से नहीं ले सकती है जितने हलके पन से इसकी शुरुवात क्षेत्रीय राजनेताओं द्वारा शुरू कर दी जाती है. यह भी सही है कि सरकार अपने पड़ोस में होने वाले किसी भी उस घटना क्रम में चुप भी नहीं रह सकती है जिसका असर उसके वोटबैंक पर पड़ता हो ?
                                      अब सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि देश के सामने आए इस मुद्दे को ठीक उसी तरह से निपटा जैसा आज तक किया जाता रहा है क्योंकि श्रीलंका में जिस तरह से तमिल विद्रोहियों ने उसकी एकता और अखंडता के लिए चुनौतियाँ खड़ी कर दी थीं तो उस परिस्थिति में यदि सख्ती से विद्रोहियों से निपटा गया तो उसमें क्या ग़लत था ? भारत की तरफ से इस समस्या के समाधान के लिए पूरे प्रयास किये गए पर जब विद्रोहियों ने उस समय एक शांति समझौते पर पहुँचने के बाद उससे एकदम से पीछे हटने का मन बनाकर भारतीय शांति सेना को अनावश्यक युद्ध में उलझा दिया तो उससे भारत को सीख लेनी ही चाहिए क्योंकि केवल एक तरफ़ भावनाओं से समाज का कुछ भी भला नहीं हो सकता है और लिट्टे ने जिस तरह से भारत विरोधी रुख अपना लिया था उसके बाद भारत के पास विकल्प ही क्या बचे थे यदि श्रीलंका ने अपने यहाँ इस तरह के विद्रोह को कुचलने में सफलता पायी है तो अब उसको कटघरे में खड़ा करने का कोई मतलब नहीं बनता है ?
                                     पीएम को हर तरह के घरेलू दबाव को दरकिनार करते हुए इस सम्मलेन में अवश्य ही भाग लेना चाहिए क्योंकि कई बार इस तरह की छोटी सी चूक लम्बे समय में बहुत कष्ट देने लगने लगती है और जब मनमोहन सिंह के जाफ़ना के दौरे के लिए भी श्रीलंका राज़ी हो गया है तो उस परिस्थिति में यात्रा का स्थानीय कारणों से राजनैतिकीकरण नहीं किया जाना चाहिए. आज की परिस्थिति में यदि भारत श्रीलंका से खुद को अलग करने की कोई भी कोशिश करता है तो पाकिस्तान या भारत विरोधी कोई अन्य देश श्रीलंका के और भी करीब आ सकता है इसलिए आने वाले समय में भारत के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए देश के अंदर पनपने वाली इन चुनौतियों से किसी भी राजनेता या दल को लाभ उठाने की कोशिशें नहीं करनी चाहिए क्योंकि एक बार मौका हाथ से निकल जाने पर उसे सुधारने में लम्बा समय लग जाया करता है और भारत के पास में चीन, पाक, बांग्लादेश और कुछ हद तक नेपाल, मालदीव के साथ यदि श्रीलंका भी विरोध पर उतर आया तो देश के सामने चौतरफा संकट आ सकता है.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 7 सितंबर 2013

रेलवे और सुविधाएँ

                                           एक बार फिर से रेलवे ने अपनी ऑनलाइन यात्री सुविधाओं से जुड़ी कई महत्वपूर्ण वेब साइट्स को एक नई साईट नेशनल ट्रेन एन्क्वायरी में मिलाकर जिस तरह से एक नया प्रयास किया है उससे आम यात्रियों को अपने लिए सूचनाएँ एकत्रित करने में बड़ी आसानी ही होने वाली है. आज जब देश के हर क्षेत्र में आम लोगों तक इंटरनेट की पहुँच होती जा रही है उस परिस्थिति में रेलवे द्वारा उतनी तेज़ी से कोई प्रयास नहीं किये जा रहे थे जिस कारण से भी आम लोग रेलवे की इन साइट्स के माध्यम से कुछ जानना भी चाहते थे तो उनको काफी समय लगाना पड़ता था. आम लोगों और यात्री सुविधाओं से जुड़ी हुई किसी साईट के निर्माण और रखरखाव पर रेलवे को अभी तक जितना ध्यान देने की आवश्यकता थी उस पर कभी भी ध्यान नहीं दिया जाता था. आज यदि रेलवे से जुड़ी हर सूचना तीव्रता से एक जगह पर ही उपलब्ध हो जाए तो संभवतः स्टेशनों पर होने वाली अनावश्यक भीड़ को रोकने में भी कुछ सफलता हासिल की जा सके.
                                               इस नई साईट में जिस तरह से स्पॉट योर ट्रेन के माध्यम से अपनी ट्रेन के बारे में पूरी जानकारी मिल सकती है जो कि आम यात्री के लिए एक महत्वपूर्ण सूचना होती है कई बार ट्रेन के लेट होने के बाद भी लोग निर्धारित समय से स्टेशन पर पहुँच जाते हैं और अनावश्यक रूप से भीड़ बढ़ती जाती है. किसी भी स्टेशन विशेष का नाम लिखकर वहां से होकर जाने वाली सभी ट्रेनों के बारे में पलक झपकते ही सारी सूचनाएँ पाई जा सकती है जिससे कोई भी किसी भी स्टेशन पर पानी ट्रेन का सही समय जान सकता है. किन्हीं भी दो स्टेशनों के मध्य चलने वाली ट्रेनों के बारे में सूचना देने के लिए भी इस साईट पर पूरी व्यवस्था है केवल सम्बंधित स्टेशनों का नाम लिखकर वहां से आने जाने वाली किसी भी ट्रेन की सूचना पाई जा सकती है या फिर उस समय उस ट्रेन की वास्तविक स्थिति का पता भी लगाया जा सकता है कि वह किसी स्टेशन तक पहुंची हुई है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण जानकारी जिसके बारे में कभी भी रेलवे द्वारा सही सूचना नहीं दी जाती है निरस्त और दूसरे मार्ग से होकर चलायी जाने वाली ट्रेनों की सूचनाएँ है जिनके माध्यम से किसी जगह परिचालन सम्बन्धी समस्या होने पर ट्रेन किस मार्ग से जा रही है उसकी पूरी सूचना भी मिल  सकती है.     
                                             आज जितनी बड़ी संख्या में लोगों द्वारा अपने स्मार्ट फोंस के माध्यम से हर जानकारी जुटाने की चाह बढ़ती जा रही है उस स्थिति में इस साईट का मोबाइल संस्करण भी प्रबावी ढंग से काम करने वाला ही होना चाहिए क्योंकि हर जगह पर केवल नेट पर ही से ही इस तरह के काम निपटाने की बाध्यता या मोबाइल साईट के धीरे चलने के कारण उसका उपयोग के बार फिर से उस स्तर पर नहीं किया जा सकेगा जैसे हो सकने की संभावनाएं हैं. साथ ही इस साईट पर आने वाले लोगों की संख्या और समय को देखते हुए भविष्य में इसके प्रसार और तेज़ गति से चलते रहने के लिए भी उचित प्रबंध भी किये जाने चाहिए क्योंकि सरकारी क्षेत्र में एक बार अच्छा काम करने के बाद उसको जिस तरह से पूरा हुआ मान लिया जाता है उससे भी पूरी प्रक्रिया सही दिशा में नहीं चलती रह पाती है. रेलवे के पास जब क्रिस जैसा संस्थान है तो उसके पास इस साईट के लिए प्रचुर धनराशि होनी चाहिए जिससे आवश्यकता पड़ने पर उसे मंत्रालय स्तर से हर एक मंज़ूरी न लेनी पड़े. काफी समय के बाद रेलवे ने अपनी स्तर से अच्छा प्रयास किया है और आशा की जानी चाहिए कि यह काम इसी गति से आगे भी चलता और बढ़ता रहेगा.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रेलवे और सुविधाएँ

                                           एक बार फिर से रेलवे ने अपनी ऑनलाइन यात्री सुविधाओं से जुड़ी कई महत्वपूर्ण वेब साइट्स को एक नई साईट नेशनल ट्रेन एन्क्वायरी में मिलाकर जिस तरह से एक नया प्रयास किया है उससे आम यात्रियों को अपने लिए सूचनाएँ एकत्रित करने में बड़ी आसानी ही होने वाली है. आज जब देश के हर क्षेत्र में आम लोगों तक इंटरनेट की पहुँच होती जा रही है उस परिस्थिति में रेलवे द्वारा उतनी तेज़ी से कोई प्रयास नहीं किये जा रहे थे जिस कारण से भी आम लोग रेलवे की इन साइट्स के माध्यम से कुछ जानना भी चाहते थे तो उनको काफी समय लगाना पड़ता था. आम लोगों और यात्री सुविधाओं से जुड़ी हुई किसी साईट के निर्माण और रखरखाव पर रेलवे को अभी तक जितना ध्यान देने की आवश्यकता थी उस पर कभी भी ध्यान नहीं दिया जाता था. आज यदि रेलवे से जुड़ी हर सूचना तीव्रता से एक जगह पर ही उपलब्ध हो जाए तो संभवतः स्टेशनों पर होने वाली अनावश्यक भीड़ को रोकने में भी कुछ सफलता हासिल की जा सके.
                                               इस नई साईट में जिस तरह से स्पॉट योर ट्रेन के माध्यम से अपनी ट्रेन के बारे में पूरी जानकारी मिल सकती है जो कि आम यात्री के लिए एक महत्वपूर्ण सूचना होती है कई बार ट्रेन के लेट होने के बाद भी लोग निर्धारित समय से स्टेशन पर पहुँच जाते हैं और अनावश्यक रूप से भीड़ बढ़ती जाती है. किसी भी स्टेशन विशेष का नाम लिखकर वहां से होकर जाने वाली सभी ट्रेनों के बारे में पलक झपकते ही सारी सूचनाएँ पाई जा सकती है जिससे कोई भी किसी भी स्टेशन पर पानी ट्रेन का सही समय जान सकता है. किन्हीं भी दो स्टेशनों के मध्य चलने वाली ट्रेनों के बारे में सूचना देने के लिए भी इस साईट पर पूरी व्यवस्था है केवल सम्बंधित स्टेशनों का नाम लिखकर वहां से आने जाने वाली किसी भी ट्रेन की सूचना पाई जा सकती है या फिर उस समय उस ट्रेन की वास्तविक स्थिति का पता भी लगाया जा सकता है कि वह किसी स्टेशन तक पहुंची हुई है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण जानकारी जिसके बारे में कभी भी रेलवे द्वारा सही सूचना नहीं दी जाती है निरस्त और दूसरे मार्ग से होकर चलायी जाने वाली ट्रेनों की सूचनाएँ है जिनके माध्यम से किसी जगह परिचालन सम्बन्धी समस्या होने पर ट्रेन किस मार्ग से जा रही है उसकी पूरी सूचना भी मिल  सकती है.      
                                             आज जितनी बड़ी संख्या में लोगों द्वारा अपने स्मार्ट फोंस के माध्यम से हर जानकारी जुटाने की चाह बढ़ती जा रही है उस स्थिति में इस साईट का मोबाइल संस्करण भी प्रबावी ढंग से काम करने वाला ही होना चाहिए क्योंकि हर जगह पर केवल नेट पर ही से ही इस तरह के काम निपटाने की बाध्यता या मोबाइल साईट के धीरे चलने के कारण उसका उपयोग के बार फिर से उस स्तर पर नहीं किया जा सकेगा जैसे हो सकने की संभावनाएं हैं. साथ ही इस साईट पर आने वाले लोगों की संख्या और समय को देखते हुए भविष्य में इसके प्रसार और तेज़ गति से चलते रहने के लिए भी उचित प्रबंध भी किये जाने चाहिए क्योंकि सरकारी क्षेत्र में एक बार अच्छा काम करने के बाद उसको जिस तरह से पूरा हुआ मान लिया जाता है उससे भी पूरी प्रक्रिया सही दिशा में नहीं चलती रह पाती है. रेलवे के पास जब क्रिस जैसा संस्थान है तो उसके पास इस साईट के लिए प्रचुर धनराशि होनी चाहिए जिससे आवश्यकता पड़ने पर उसे मंत्रालय स्तर से हर एक मंज़ूरी न लेनी पड़े. काफी समय के बाद रेलवे ने अपनी स्तर से अच्छा प्रयास किया है और आशा की जानी चाहिए कि यह काम इसी गति से आगे भी चलता और बढ़ता रहेगा. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 26 अगस्त 2013

बैंकिंग सेवा और भर्तियाँ

                            एक रिपोर्ट के अनुसार जिस तरह से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में ५६ हज़ार पदों के रिक्त होने की बात सामने आई है उससे यही लगता है कि इन बैंकों द्वारा सरकार से मिली अनुमति के बाद भी भर्तियों में उस तरह की तेज़ी नहीं दिखाई जा रही है जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है. केंद्र सरकार ने भविष्य में अपनी अधिकांश योजनाओं से जनता तक पहुँचने वाले किसी भी तरह के धन का प्रवाह जिस तरह से बैंकों के माध्यम से चालू रखने की योजनायें बनायीं हैं उसके बाद बैंकों में सामान्य काम काज के अतिरक्त इस काम का दबाव भी और अधिक बढ़ना तय है पर बैंक जिस तरह से अपनी सेवाओं को सुधारने के लिए संकल्पित दिखाई देने चाहिए उनमें उसकी बहुत कमी भी दिखाई दे रही है. इस क्षेत्र में जिस तरह से प्रशिक्षित लोगों की आवश्यकता पड़ती है और उसको पूरा करने के लिए जिस तरह से इन्हें लगातार प्रयत्नशील रहना चाहिए उसमें ये बड़ी कोताही करते रहते हैं जिससे आम ग्राहकों को बैंकों के काम करवाने में बहुत समस्या होती रहती है और कम के बोझ से दबे इनके अधिकारियों और कर्मचारियों को झल्लाते हुए देश भर में कहीं भी देखा जा सकता है.
                           यह सही है कि इस तरह की नियुक्तियों के लिए सरकार हर बार बैंकों को निर्देशित नहीं कर सकती है क्योंकि उसके पास अन्य काम भी हैं और जब इन पदों को भरने के लिए एक व्यवस्था है तो उसको सही तरह से क्यों नहीं संचालित किया जा रहा है ? यदि बैंकों में आवश्यकता के अनुरूप अधिकारी और कर्मचारी होंगें तो उससे उसके कुल काम काज की गुणवत्ता में बहुत अधिक सुधार आ जायेगा क्योंकि अभी तक बैंकों से केवल बहुत कम लोगों का पाला पड़ा करता था पर जिस तरह से हर योजना में इसको जोड़ने का काम सरकार द्वारा किया जाने लगा है तो आने वाले समय में किसी भी तरह के वित्तीय लेन देन को इनके बिना कर पाना असम्भव हो जायेगा. सरकार जिस तरह से बैंकों के माध्यम से अभी तक चल रहे भले ही वह काले धन के प्रवाह को नियंत्रित करने की कोशिशें कर रही है उसके परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं और बड़े व्यापारियों ने बैंकों के माध्यम से अपने कारोबार को कुछ हद तक करना शुरू भी कर दिया है.
                          भविष्य में इन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सामने निजी क्षेत्र के बैंकों की तरफ़ से जो भी चुनौतियाँ आने वाली हैं यदि उनसे निपटने के लिए कुछ ठोस क़दम अभी से नहीं उठाये जायेंगें तो एक दिन अचानक किस तरह से इनके साथ प्रतिस्पर्धा की जा सकेगी ? आज निजी बैंक अपने लाभ के लिए केवल शहरी क्षेत्रों में ही अपनी शाखाएं खोलने का काम कर रहे हैं और जब उनका काम यहाँ पर जमने लगेगा तो वे तहसील मुख्यालयों की तरफ़ भी जाने के बारे में सोचना शुरू कर देंगें जिससे पहले से स्थापित बैंकों के लिए काम करना और भी कठिन हो जायेगा. अब समय है कि इस बारे में ठोस विचार कर इन बैंकों के काम काज को सुधारने के लिए आवश्यक संख्या में भर्तियों को नियमित रूप से करने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इस बारे में एक नीति बनाकर पूरे वर्ष की ज़रूरतों को क्षेत्र के अनुसार पूरा करने पर ध्यान भी दिया जाना चाहिए. आज वह समय नहीं है कि आम व्यक्ति केवल सरकारी क्षेत्र के बैंकों के माध्यम से ही अपना काम करवाना चाहे क्योंकि कम भीड़ और बेहतर प्रबंधन के साथ निजी क्षेत्र के बैंकों ने शहरी क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए चुनौती पेश कर ही दी है.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

राष्ट्रीय सम्मान और राजनीति

                                        देश में भ्रष्टाचार की वर्तमान स्थिति से दुखी अन्ना हजारे ने जिस तरह से देहरादून में एक सभा में कहा कि वे इसी मुद्दे पर पद्म श्री सरकार को लौटा चुके हैं और अब वे पद्म भूषण की उपाधि भी लौटा देंगें. देखा जाए तो आम जनता के मन में इस सम्मान पाए व्यक्तियों के लिए आज भी बहुत सम्मान है पर जिस तरह से पिछले कुछ दशकों में इनमें से अधिकांश सम्मान भी केवल राजनैतिक कारणों से ही चयनित अपने प्रिय लोगों को बांटने की सरकारी परंपरा शुरू हो चुकी है उस स्थिति में अब यह नहीं कहा जा सकता है कि इन सम्मानों का अब कितना महत्व रह गया है फिर भी आज इस सम्मान को पाने वालों के लिए यह गर्व का विषय तो होता ही है. जब अन्ना जैसे समाजसेवी इन सम्मानों को इस तरह से दुखी होकर वापस करने के बारे में सोचते हैं तो उससे यही पता चलता है कि देश में भ्रष्टाचार कितना बड़ा मुद्दा है पर हमारे नेताओं को यह दिखाई ही नहीं देता है और वे इसे कोई मुद्दा मानते ही नहीं हैं जबकि आज इसने पूरी तरह से देश में चक्का जाम जैसी स्थिति उत्पन्न कर रखी है.
                                       सम्मान देने लायक लोगों को खोजकर उनकी सेवाओं का आंकलन करने के बाद उनके प्रति देश के राजनैतिक तंत्र द्वारा जिस तरह से ये उपाधियाँ सम्मान के लिए दी जाती हैं उनमें इतने बड़े स्तर पर दबाव की राजनीति किया जाना किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता है पर जब अन्ना जैसे व्यक्ति को इतना बड़ा क़दम उठाने की आवश्यकता दोबारा पड़ रही है तो इससे यही पता चलता है कि देश में आज हालात कितने बिगड़ चुके हैं ? सबसे दुःख की बात यह है कि किसी भी दल द्वारा पूरे मन से अन्ना या किसी अन्य भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन का समर्थन नहीं किया जा रहा है जो कि देश के राजनैतिक तंत्र के लिए शर्मनाक स्थिति है. क्या राज धर्म यही कहता है कि किसी भी तरह से कुछ भी करके बस सत्ता से चिपके रहो और माहौल चाहे जैसा भी हो किसी की भी न सुनो देश में आज जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए पूरे देश की जनता और नेता ज़िम्मेदार हैं क्योंकि जब वोट देकर सही व्यक्तियों को चुनने का अवसर होता है तो देश आराम फरमा रहा होता है जिससे उन लोगों को आगे बढ़ने का अवसर मिल जाता है जो यहाँ पर कतई नहीं होने चाहिए.
                                        सम्मान रखना या लौटना अन्ना का व्यक्तिगत मामला है पर जिस तरह से वे खिन्न दिखाई देते हैं और उनके बारे में हमारे राजनैतिक चरित्र में कोई संवेदना नहीं दिखती है वह ज्वलंत मुद्दों को उपेक्षित करते रहने की हमारे देश के राजनैतिक तंत्र की एक सोची समझी साज़िश है क्योंकि आज देश के किसी भी राज्य में चाहे किसी भी दल की सरकार क्यों न हो पर भ्रष्टाचार और कुशासन का मुद्दा लगभग एक जैसा ही है. आज भी हम अपने संसाधनों को ज़रुरत मंदों तक पहुंचा पाने में असफल हैं क्योंकि हमारे नेता अपने करतबों के माध्यम से इसे वहां तक पहुँचने से रोकने लायक नीतियां बना पाने में सफल हैं ? अन्ना के आन्दोलन को पूरी दुनिया में सराहा गया है पर हमारी सरकारें और नेता लोग इसे पूरी तरह से अनदेखा करना चाहते हैं अन्ना की बातें देश हित में हैं पर साथ ही उनको सरकारों के इस बिगड़े हुए स्वरुप को सँभालने के लिए एकदम से बड़े परिवर्तन को करने के स्थान पर सरकारों से धीरे धीरे कानून बदलवाने की दिशा में काम करना चाहिए. लगभग सात दशकों में बिगड़ी हुई इस व्यवस्था को उन्हीं लोगों से एक झटके में सुलझवा पाना आसान नहीं है इसलिए अन्ना को इस तरह के दबावों के साथ परिवर्तनों को स्वीकार करने की दिशा में भी आगे बढ़ना ही होगा.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

जीत जनता की

                            जिस तरह से एक बार फिर से गुजरात में नरेन्द्र मोदी ने अपनी सरकार को एक बार फिर से बचा लिया है उससे उनकी संगठन पर मज़बूत पकड़ और जनता से जुड़े मुद्दों को समझने की शक्ति का ही पता चलता है. हिमाचल में जहाँ अच्छा काम करने के बाद भी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा उससे के बात तो साफ़ है है कि अच्छे काम करने के साथ ही संगठन की मजबूती ही किसी राजनैतिक दल के लिए चुनावों में विजय के द्वार खोल सकती है. मोदी ने जिस तरह से अपना पहला चुनाव भावनात्मक मुद्दों को उभार कर जीता था उसके बाद उन्होंने केवल सही और त्वरित काम को ही प्राथमिकता दी जिससे पूरे राज्य में उनके लिए काम करना आसान तो हुआ साथ ही पिछड़े इलाकों तक विकास की बयार पहुँचने से लोगों ने उन्हें लगातार दोबार मज़बूती देकर गुजरात के विकास को आगे बढ़ाने का फैसला किया है. आज भी देश के आम नेता जिस तरह से अपनी कमियों को समझने के स्थान पर केवल दूसरों की कमज़ोरियों के सहारे आगे बढ़ने का काम करना चाहते हैं वह उनके साथ ही लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है क्योंकि जब काम करने में कमी होती है तभी व्यक्ति अन्य रास्तों का सहारा लेने का प्रयास करता है.
                            गुजरात के बाद जिस तरह से भाजपा में मोदी का पहले से ही बढ़ा हुआ क़द और बढ़ गया है वह दिल्ली में बैठकर भाजपा की राजनीति करने वालों के लिए अवश्य ही चिंता का विषय है क्योंकि अब मोदी यह कह सकने की स्थिति में आ गए हैं कि उन्हें पता है कि चुनाव किस तरह से लड़े और जीते जाते हैं ऐसी स्थिति में अगर भाजपा उन्हें अपनी तरफ़ से पीएम बनाने के लिए पेश करती है तो आने वाले समय में संगठनात्मक स्तर पर भाजपा में बहुत कुछ करना पड़ेगा. मोदी अपने स्वभाव के अनुसार टिकट वितरण में पूरा दख़ल देना चाहेंगें जो कि अन्य लोगों को शायद ही मंज़ूर होगा जिससे जिस क्षमता के साथ मोदी ने गुजरात को जीता है उस तेज़ी को बनाकर नहीं रखा जा सकेगा. यह भाजपा का अंदरूनी और सबसे जटिल प्रश्न है क्योंकि केवल मोदी के सहारे पूरे देश में जीत हासिल करना नामुमकिन है और बिना मज़बूत सहयोगियों के भाजपा किस तरह से अगले चुनाव में खुद को मज़बूती से सरकार बनाने के लिए तैयार कर सकेगी यह भी देखने का विषय होगा. इन्हीं असहज कर देने वाले सवालों के कारण ही गुजरात जाकर नरेन्द्र को पीएम पद का स्वाभाविक उम्मीदवार बताने वाले चुनाव के बाद इसे अप्रासंगिक सवाल कहकर पूरे दिन कन्नी काटते नज़र आये.
                            अब जनता को इस बात का श्रेय दिया जाना ही चाहिए कि उसने नेताओं के सामने केवल एक ही विकल्प रखा है कि यदि वे काम नहीं करते हैं तो वह उनके लिए सत्ता के दरवाज़े बंद करने में देर नहीं लगाने वाली है और यदि वे अच्छा काम करते हैं तो उनकी कई कारगुज़ारियों को नज़र अंदाज़ भी किया जा सकता है. नेताओं के प्रति यह सोच यदि पूरे देश में बन जाये तो चुनावों से लेकर सत्ता चलाने तक के संघर्ष में सही और सटीक काम करने वालों की कमी नहीं रह जाएगी. फिर भी आज जिस तरह से कुछ नेता केवल जाति, वर्ग, धर्म और समूह की राजनीति करते रहते हैं उनके लिए काम करना मुश्किल होने वाला है. देश में शिक्षा का स्तर सुधरने के बाद से जनता की सोच में कुछ हद तक बदलाव आया है फिर भी आज जिस तरह से हमें मतदान में छिपी अपनी शक्ति के संदेश को नेताओं तक पहुँचाना चाहिए उसमें हम कहीं न कहीं चूक ही जाते हैं. हमारी चुनाव के समय की गयी चूक कई बार हमें अगले ५ वर्षों तक बुरे नेताओं को झेलने के लिए मजबूर कर देती है इसलिए अब जनता को और जागरूक तथा मुखर होकर चुनावों में भाग लेकर देश के विकास को समझने वाले नेताओं के साथ आगे बढ़ना चाहिए. भाजपा के लिए ये चुनाव जहाँ अपने को फिर से समझने के एक अवसर के रूप में हैं वहीं कांग्रेस के लिए स्पष्ट संदेश के रूप में कि यदि वह आज भी अपने संगठन को मज़बूत कर जनता तक सीधा संवाद बना सके तो जनता का उससे उतना मोह भंग नहीं हुआ है जितना टीवी पर दिल्ली में की जाने वाली चंद रैलियों में दिखाई देता है.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 31 अक्टूबर 2012

क्रिकेट और रिश्ते

           भारत और पाक के बीच एक बार फिर से रिश्तों को पटरी पर लाने की कोशिशों के तहत दिसंबर जनवरी में कई वर्षों से स्थगित पड़ी क्रिकेट श्रंखला को फिर से शुरू करने के सरकारी फ़ैसले के बाद देश के सामने एक बार फिर से वही सवाल उठा खड़ा हुआ है कि आख़िर क्रिकेट से इन चौड़े होते रिश्तों को किस तरह से पाटा जा सकता है ? अभी तक पाक ने हर बार भारत के साथ जिस तरह से दोहरा व्यवहार किया है उसके बाद यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि इस बार पाक अपनी आतंकियों को समर्थन देने की नीति से किसी भी स्तर पर समझौता करने जा रहा है क्योंकि पाक में जिस तरह से भारत का विरोध करने वाले तत्व हमेशा ही सक्रिय रहा करते हैं उस स्थिति में पाक और कुछ कर भी नहीं सकता है क्योंकि पाक में चरम पंथियों की पूरी जमात के साथ सेना कभी भी भारत के साथ अपने रिश्तों को सामान्य देखना ही नहीं चाहती है और विभिन्न कारणों से नेता भी कमोबेश इसी नीति का पालन करते हुए नज़र आते हैं.
   यह सही है कि खेल देशों के बीच पनप रही दुश्मनी को बहुत बार ख़त्म करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं पर पाक के मामले में वह हमेशा से ही अपने अनुसार इस सभी रिश्तों को चलने में विश्वास करता है और आगे आने वाले समय में भी ऐसा कुछ नहीं लगता है कि पाक कहीं से भारत के साथ खेल से आगे के रिश्ते भी सामान्य करना चाहता है ? भारत को भी पाक के साथ अब अपना रवैया बदलना ही होगा क्योंकि आख़िर कब तक पाक के हिसाब से ही सब कुछ चलता रहेगा ? अब भारत को भी पाक की क्रिकेट मजबूरियों का लाभ अपने हितों में इस्तेमाल करने की नीति पर ही चलना होगा क्योंकि भारत के साथ क्रिकेट शुरू हो जाने पर आने वाले समय में अन्य देश भी पाक में जाकर खेना शुरू कर देंगें जिससे पाक क्रिकेट बोर्ड की सेहत तो सुधर जाएगी पर भारतीय हितों को होने वाला नुकसान कभी भी नहीं रुक पायेगा ?
     इस बार जिस माहौल में यह श्रंखला खेली जाएगी तो उसके लिए किसी भी पाकिस्तानी को किसी भी तरह से भारत यात्रा की अनुमति भी नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि पिछली बार इसी क्रिकेट के बहाने भारत में जिस तरह से आतंकियों ने अपने लोगों को भेजा हमारी सुरक्षा एजेंसियां आज तक उन गायब हुए पाकिस्तानियों को खोज ही रही हैं. जब तक पाक अपनी इन हरकतों से बाज़ नहीं आ रहा है तब तक उसके साथ संबंधों की एक तरफ़ा बहाली का कोई मतलब नहीं बनता है. इस बार भारत सरकार की तरफ से भारत और पाक के क्रिकेट बोर्डों को भी यह साफ कर दिया जाना चाहिए कि आने वाले समय में पाक की तरफ़ से किसी भी तरह की आतंकी गतिविधि होने पर भारत हमेशा के लिए ही पाक से अपने खेल संबन्ध तोड़ लेगा. फिलिस्तीन का समर्थन करते हुए जब हम बहुत बार इसराइल के साथ टेनिस में नहीं खेले थे तो अब तो यह सीधे हमसे ही जुड़ा हुआ मामला है और अब कड़ी नीति अपनाये बिना काम नहीं चलने वाला है. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 23 सितंबर 2012

रडार और भारतीय आकाश

                    देश के आकाश की निगरानी और सुरक्षा के अनुसार सुरक्षित करने के उद्देश्य से लगाये जा रहे 'गगन' तंत्र के बाद भारतीय आकाश पूरी तरह से नज़र में आ जाने वाला है. जिस तरह से भारत की सुरक्षा चिंताएं बढ़ती जा रही हैं और आने वाले समय में आकाश मार्ग से होने वाले किसी भी संभावित हवाई हमले के लिए देश को तैयार करना एक बहुत बड़ी चुनौती थी. इस बात को ध्यान में रखते हुए २००७ में केंद्र सरकार ने एक महत्वकांक्षी परियोजना गगन शुरू की जिसके तहत ३० हज़ार फीट की ऊंचाई तक आकाश में होने वाली गतिविधियों पर भी निगरानी रखी जा सकेगी जिससे भारतीय आकाश और समुद्री सीमा में अधिक ऊंचाई पर देश का मज़बूत नियंत्रण हो जायेगा जो एक तरफ़ नागरिक हवाई यातायात को नियंत्रित करने में सहायक होगा वहीं दूसरी तरफ़ इससे वायु सेना और थल सेना के लिए देश के आकाश में किसी भी मिसाइल को देखना आसान हो जायेगा. इस तरह की परियोजनाओं की देश को आवश्यकता है जिससे पूरे देश में सुरक्षा सम्बन्धी ख़तरों से समय रहते निपटने में हम सक्षम हो सकें.
           देश ने इस परियोजना के लिए ३० हज़ार फीट की ऊंचाई पर ९ मोनो पल्स सेकेंडरी सर्विलांस रडार लगाने का काम शुरू किया है जिसके चालू हो जाने के बाद देश के ३८ प्रमुख हवाई अड्डे भी इस रडार के साथ स्वचालित प्रक्रिया से जोड़ दिए जायेंगें जिससे देश के आकाश में किसी भी विमान की स्थिति के बारे में कहीं से भी जानकारी ली जा सकेगी इससे जहाँ देश में हवाई यातायात सुगम हो जायेगा और हवाई अड्डों पर अधिक ट्रैफिक होने की दशा में हवा में विमानों को अधिक समय तक रखने की बाध्यता भी समाप्त हो जाएगी और कोहरे के साथ मौसम की किसी समस्या के समय भी हवाई यातायात को सुचारू ढंग से चलाने में मदद मिलेगी वहीं दूसरी तरफ़ सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी देश के आकाश में होने वाली किसी भी गतिविधि पर नज़र रखने में भी आसानी हो जाएगी. देश में हवाई यातायात जिस तेज़ी से बढ़ रहा है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आने वाले समय में इस तरह के अत्याधुनिक तंत्र के बिना आकाश में काम करना बहुत मुश्किल होने वाला है.
          इस परियोजना के प्रथम चरण में चेन्नई स्थित केंद्र को इस तंत्र से जोड़ दिया गया है और आने वाले समय में बाकी बचे मुंबई, दिल्ली और कोलकाता को भी इससे जोड़ दिया जायेगा जिसके बाद काफी हद तक हवाई यातायात को सुगम और सुरक्षित बनाया जा सकेगा. इस पूरी परियोजना के लिए जिस तरह से दक्ष लोगों की आवश्यकता होगी उसके लिए भी सरकार ने २०१६ तक व्यवस्था करने की योजना बनाई है. देश के लिए भविष्य में आवश्यक इस तरह की परियोजनाओं को स्वीकृति देने में सरकार को किसी भी तरह का विलम्ब नहीं करना चाहिए क्योंकि जब भी इस तरह के किसी भी काम को कम महत्व दिया जाता है उसका असर देश के अन्य क्षेत्रों पर दूसरी तरह से पड़ता है. देश की ज़रूरतों और भविष्य में आवश्यक संसाधनों को जुटाने के बारे में अब सरकारों को सोचना ही पड़ेगा क्योंकि जिस तरह से हमारे पास विश्व की सबसे युवा शक्ति आने वाले समय में होने वाली है उसका कोई मुकाबला नहीं कर पायेगा बस आवश्यकता केवल इस बात की है कि उस युवा शक्ति के सही इस्तेमाल करने के लिए हमारे पास कोई सटीक परियोजनाएं भी हों.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 10 अगस्त 2012

रोज़गार या मोबाइल ?

                    संप्रग-२ सरकार की तरफ से १५ अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक और लोकलुभावनी घोषणा कर सकते हैं जिसके बारे में पहले से ही मीडिया में ख़बरें आनी शुरू हो चुकी हैं. गरीबी रेखा से नीचे रहने जीवन यापन करने वाले परिवारों को सरकार की तरफ से मुफ्त मोबाइल फ़ोन देने की एक योजना पर तेज़ी से काम चल रहा है और भारतीय परंपरा के अनुसार १५ अगस्त को देश के प्रधानमंत्री देश के बारे में विकास की बातें करते समय इस तरह की घोषणाएं करते रहे हैं इसलिए औपचारिक तौर पर इस योजना को भी उसी दिन सबके सामने लाया जायेगा. सरकार ने इन चयनित लाभार्थियों के लिए जिस तरह से २०० रूपये का टॉक टाइम भी देने को कहा है उससे इनको कुछ हद तक राहत तो मिलेगी ही पर जब देश में अन्य मुद्दों पर प्राथमिकता के आधार पर काम किये जाने की ज़रुरत है तो इस तरह के केवल वोट लुभाने के हथकंडे अपनाने से कितने लोगों को वास्तव में लाभ पहुँचाया जा सकता है ? योजना आयोग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय आदि मंत्रालयों के माध्यम से यह योजना सामने तो आ सकती है पर दिल्ली में बैठकर इसको दूर दराज़ के गाँवों में सही ढंग से पहुँचाया नहीं जा सकता है.
              आज देश में इस बात की सबसे ज्यादा आवश्यकता है कि किसी भी तरह से उन वास्तविक लाभार्थियों को खोजा जाये जिन्हें वास्तव में सरकारी योजनाओं की ज़रुरत है क्योंकि आज जितनी भी इस तरह की गरीबों के नाम पर योजनायें चल रही हैं उनमें ही सबसे ज्यादा अनियमितताएं दिखाई देती है ? कहीं इसका कारण यह तो नहीं है कि इन वास्तविक गरीबों को यह पता ही नहीं चल पाता है कि उनके लिए कौन सी योजनायें सरकार द्वारा चलायी जा रही हैं ? देश में गरीबी रेखा से नीचे जीने वाले लोगों के बारे में बातें और योजनायें तो बड़े पैमाने पर केंद्र और राज्य द्वारा बनायीं जाती रहती हैं पर उनको वास्तव में अमीर लोग ही भोगते रहते हैं. क्या कारण है कि केवल कुछ राज्यों ने ही इस तरह की महत्वपूर्ण योजनाओं को अपने यहाँ ईमानदारी से लागू किया है और उससे ज़मीनी स्तर पर बड़े सुधार दिखाई भी देने लगे हैं पर आज भी अखिल भारतीय स्तर पर जिस मंशा के साथ काम करने की आवश्यकता है आज वह भी दिखाई नहीं देती है ? योजनाओं को लाने से पहले अगर एक बार सारी योजनाओं को रोककर उनको लागू करवाने वाले तंत्र को ही विकसित कर लिया जाये तो आने वाले समय में हर काम आसान हो सकता है.
               यह सही है कि जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार के पास इस तरह की योजनायें बनाने की पूरी छूट होती है पर जिस तरह से सरकारी योजना होने के कारण इसमें भारत संचार निगम को ही काम करने के अवसर मिलने वाले हैं और वहां पर बैठे आईटीएस अधिकारी जिस तरह से निगम का खून चूसने में लगे हुए हैं उसे देखते हुए यह कह पाना मुश्किल ही है कि इस योजना को कितने सही स्तर पर जनता तक पहुँचाया जा सकेगा ? नि:संदेह यह स्वीकार किया जा सकता है कि आंकड़ों के अनुसार जब देश के हर हाथ में मोबाइल पहुँचने वाला है तो बीपीएल वाले लोग इससे वंचित क्यों रह जाएँ पर जिनके हाथों में सरकार इस योजना में फ़ोन देना चाहती है वे वास्तव में कितने गरीब हैं इसको कोई भी नहीं देखने जा रहा है ? देश में जिस तरह से बिजली का संकट है उसे देखते हुए यह आशा कैसे की जा सकती है कि ये फ़ोन कभी ठीक से काम कर पायेंगें और जिन लोगों के पास घर जैसी सुविधा भी नहीं है वे आख़िर इस फ़ोन कि सुरक्षा भी कैसे कर पायेंगें ? वैसे भी इन सवालों के जवाब आज तक कोई सरकार नहीं दे पाई हैं इसलिए इस सरकार से भी इनके जवाब मिलने की आशा करना निरर्थक ही रहने वाला है. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 1 मई 2012

२ जी पर क्यों जी ?

              २जी की विवादित आवंटन प्रक्रिया के बाद जिस तरह से ट्राई ने अपनी सिफारिशें की हैं और उसके बाद टेलिकॉम उद्योग जगत में गहरी चिंता जताई जा रही है उस पर विचार करने के बारे में लगता है कि सरकार ने भी मन बना लिया है. दूरसंचार आयोग ने हाल में ट्राई द्वारा घोषित की गयी नयी आवंटन नीति के बारे में जिस तरह से स्पष्टीकरण मांगने का फैसला किया है उससे यही लगता है कि अभी जिन दरों का प्रस्ताव किया गया है वे केवल विचार के स्तर पर ही हैं और इस पर गहरे मंथन के बारे में सरकार ने भी कोशिशें करने का फैसला लिया है. देश में जिस तरह से टेलिकॉम उद्योग ने अपने पैर फैलाये उसके बाद यह देश का तेज़ी से बढ़ता हुआ उद्योग बन गया है उसके बाद इससे जुड़े हर पहलू पर अधिक ध्यान देने की ज़रुरत है क्योंकि आने वाले समय में भारत की तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था को सँभालने के लिए जिस सूचना तकनीक का राजमार्ग देश को चाहिए होगा वह भी इन नीतियों से ही निकलेगा. जिन परिस्थितियों में मोबाइल के लिए पहले आओ पहले पाओ की नीति बनायीं थी आज के परिदृश्य में वह पूरी तरह से बदल गयी हैं एक समय सरकार को यह चिंता थी कि पता नहीं इस उद्योग का देश में कैसे विकास होगा पर आज जब यह उद्योग भारत में सबसे तेज़ी से बढ़ता हुआ बन गया है तो उसके बारे में नए निर्णय और नीतियां बनाये जाने की आवश्यकता है.
             देश में सार्वजानिक क्षेत्र की कम्पनी भारत संचार निगम लिमिटेड के पतन की कहानी भी इसी से जुड़ी हुई है क्योंकि जब सरकार ने देश भर में लाइसेंस जारी किये तो उसके तहत सभी सेवा प्रदाताओं के लिए देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों तक यह सेवाएं पहुँचाने के लिए एक तरह का समझौता था पर इन निजी सेवा प्रदाताओं ने इस नियम का पालन नहीं किया है और आज भी अपनी सभी आधुनिक सेवाएं केवल बड़े शहरों में ही देना चाहते हैं और दूर दराज़ के क्षेत्रों में अपनी पहुँच बढ़ाने के बारे में वे कुछ करना भी नहीं चाहते हैं ? इससे जहाँ इन कम्पनियों का लाभ अधिक हो रहा है और वे अपनी जिम्मेदारियों से भी जी चुरा रही हैं. संचार निगम के लाभ वाले क्षेत्रों में इनका दबाव बनता जा रहा है और वह लगातार पिछड़ने वाली कम्पनी बनती जा रही है. इस तरह से जहाँ एक तरफ संचार निगम बड़े शहरों में अपनी नीतियों के कारण और कुछ अन्य कम्पनियों द्वारा नियमों की अनदेखी किये जाने से आज बड़े घाटे की तरफ बढ़ रहा है वहीं निजी कम्पनियों का लाभ लगातार बढ़ता ही जा रहा है. इस स्थिति में सभी निजी कम्पनियों को करार की शर्तों के बारे में याद दिलाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक सभी मिलकर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा में शामिल नहीं होंगें तब तक सभी का पनप पाना आसान नहीं होगा और आने वाले समय में कुछ ऐसा हो जायेगा कि सार्वजनिक क्षेत्र की संचार निगम या तो घाटे का शिकार हो जाएगी या फिर उसके बिकने का रास्ता खुल जायेगा.
          सरकार को नीतियां कुछ ऐसी बनानी चाहिए जिससे सभी पक्षों को काम करने के समान अवसर मिलते रहें और उस स्थिति में अगर कोई कम्पनी अपने को ठीक से नहीं चलती है तो वह अवश्य ही मैदान से बाहर हो जाएगी. इस स्थिति में सरकार क्या कर सकती है पर सरकार के जिम्मे जो काम देश और संविधान ने सौंपा है उसके बारे में उस दृढ़ता से विचार करने की ज़रुरत है. आज दूरसंचार क्षेत्र में इतने बड़े घोटाले के बाद से संचार निगम की प्रगति पूरी तरह से रुकी हुई है उससे संचार निगम को बहुत घाटा हो रहा है. जो कुछ हो चुका है उसको पीछे छोड़कर नयी नीतियां तुरंत बनायीं जानी चाहिए जिससे संचार निगम को आज भी अपनी स्थिति सुधरने का अवसर भी मिल सके ? किसी भी नीति को किसी भी दबाव में ऐसा नहीं बनने दिया जाना चाहिए जिसका असर सीधे आम उपभोक्ताओं पर भी पड़े. नयी कम्पनियों ने जिस तरह से बाज़ार में आते ही प्रतिस्पर्धा का नया युग शुरू किया था उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि पुरानी कम्पनियां कभी भी नहीं चाहेंगीं कि कोई भी नयी कम्पनी बाज़ार में बची रहे ? अगर पहले आओ पहले पो की नीति २००८ में ग़लत थी तो वह हमेशा ही ग़लत रही है इस लिए नयी दरों का निर्धारण करते हुए पुरानी कंपनियों से भी इस अंतर को वसूला जाना चाहिए जिससे उपभोक्ता भी बचे रहें और पुरानी कम्पनियों को आने वाले समय में मनमानी करने का अवसर भी न मिले.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...