मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

२०१९ की राजनीति का घमासान

                                        चुनावी वर्ष होने के कारण इस बार लम्बे समय बाद पूर्ण बहुमत की सरकार का नेतृत्व कर रहे पीएम मोदी के सामने सबसे गंभीर संकट यह है कि अपनी घोषित लोकप्रियता को वे किस हद तक आगामी चुनावों में भुनाने में सफल हो पाएंगे? जिस तरह से राफेल मामले को लेकर वे खुद निशाने पर हैं और उन्होंने जो भी सोचकर शीर्ष स्तर पर निर्णय लिया हो पर भारत के हिसाब से उसमें कई कमियां दिखाई दे रही हैं जिनको लेकर खुद वे और उनकी सरकार सहज नहीं हो पा रही है. इस बीच में पुलवामा हमले और उसके बाद बालाकोट प्रतिक्रिया से स्थिति अवश्य ही कुछ उनकी तरफ झुकती हुई दिखाई दे रही है फिर भी मामले को उतना आसान नहीं समझा जा सकता है जितना वह लग रहा है? संभवतः इसी कारण से आज पीएम मोदी समेत भाजपा का हर छोटा बड़ा नेता केवल बालाकोट निर्णय की बात करना चाह रहा है और वे जानबूझकर पूरे विमर्श को उस दिशा में ले जाने का काम करने में लगे हुए हैं जिससे विपक्षी दलों को को उनके सवालों में उलझने देने की नीति अपनायी जा रही है.
                     नि:संदेह पीएम मोदी सामने बैठे लोगों से बेहतर संवाद बनाने में माहिर हैं पर सिर्फ उनके स्तर से किया जा रहे प्रयासों को पूरा नहीं माना जा सकता है इसलिए कांग्रेस के किसी भी नेता के पुलवामा या बालाकोट से जुड़े हर बयान को जनता के सामने इस तरह से पेश किया जा रहा है जैसे खुद राहुल गांधी के निर्देश पर यह सब चल रहा है. भाजपा और पीएम मोदी कुछ भी कहें पर पुलवामा पर राजनीति न करने के विपक्षी दलों के बयान और सरकार को पूर्ण समर्थन देने के बाद भी जिस तरह से खुद पीएम मोदी और अमित शाह की तरफ से इस मसले को लेकर राजनीति की जाती रही है उसके बाद विपक्षियों कोई तरफ से सवाल उठने ही थे?  असल में मोदी सरकार अपने काम के दम पर दोबारा सत्ता के नज़दीक पहुँच नहीं पा रही है इसलिए उसे देशभक्ति और उग्र राष्ट्रवाद दो ऐसे मसले महत्वपूर्ण लग रहे हैं जिन पर सवार होकर वह अपनी चुनावी संभावनाओं को सरल बनाकर अपने पक्ष में मोड़ने का काम आसानी से कर सकती है.
                        पीएम मोदी कितने भी अच्छे वक्त क्यों न हों पर इस मामले में वे अपने बनाये जाल में खुद ही उलझे नज़र आ रहे हैं क्योंकि उनके उकसाने की भरपूर कोशिशों के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और अन्य विपक्षी दलों की तरफ से सधी हुई गंभीर प्रतिक्रियाएं ही सामने आ रही हैं जिससे भाजपा को उन पर हमला करने का उतना अच्छा अवसर नहीं मिल रहा है. भले ही शुरुवाती हमलों में कांग्रेस ने अपने को सीमित किया है पर भाजपा की तरफ से अपने समर्थक टीवी चॅनेल्स में बैठे एंकर्स के माध्यम से जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है वह खुद उसके खिलाफ भी काम कर सकता है क्योंकि जनता के लिए कुछ मुद्दे अधिक संवेदनशील होते हैं और उनसे निपटने में कोई भी चूक किसी भी दल के लिए आत्मघाती हो सकती है. बालाकोट पर जिस तरह से सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए थी वह उसमें पूरी तरह से चुकी हुई और केवल अपने वोट बढ़ाने की राजनीति में ही व्यस्त दिखाई दी है इस पूरी परिस्थिति में अभी तक विपक्षी दलों की तरफ से जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उससे लगता तो यही है कि वे मोदी और भाजपा के इस जाल से दूर रहने की प्रक्रिया को समझ चुके हैं और अपने अनुसार आगे बढ़ रहे हैं.

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शनिवार, 5 जनवरी 2019

बेरोजगारी भत्ता या श्रम सृजन

                                               देश में भले ही आगामी लोकसभा की चुनावी महाभारत से पहले कांग्रेस के तीन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी की घोषणा से स्थितियां कुछ हद तक उसके पक्ष में हुई हो पर उससे किसानों की दशा पूरी तरह सुधारी नहीं जा सकती है ठीक उसी तरह से आज देश के युवाओं के सामने जिस तरह से रोजगार का संकट आ गया है उससे निपटने के लिए भी कांग्रेस ने अस्थायी रूप से युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही है. किसी भी परिस्थिति में युवाओं के ऊर्जावान हाथों में काम हो इससे किसी भी राजनैतिक दल को इंकार नहीं है पर चिंता की बात यह है कि यह सब केवल चुनावों में ही सामने आता है और जब सरकारें बन जाती हैं तो इन समस्याओं को ठन्डे बस्ते में डालने का काम शुरू कर दिया जाता है. आज भारत के पास युवाओं की बड़ी संख्या मौजूद है जिसमें कुशल कामगारों और वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकता के अनुसार रोजगार होने पर उनके लिए उचित मानव संसाधन के रूप में विकसित करने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे हैं. इस नीतिगत उपेक्षा के चलते आज युवाओं में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है जिसका दुष्प्रभाव किसी भी सत्ताधारी दल के लिए घातक हो सकता है.
                     आखिर क्या कारण है कि सरकारें और राजनैतिक दल इस दिशा में सार्थक पहल करने में कहीं बहुत पीछे दिखाई देते हैं और युवाओं की समस्या वहीं पर रह जाती है ? यदि युवाओं को उनके अनुसार बेरोजगारी भत्ता देने की कोई मंशा कांग्रेस की है तो उसे इसके लिए ठोस प्रारूप तैयार करना चाहिए जिसमें युवाओं की रूचि के अनुरूप और विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए आवश्यक मानव संसाधन के स्थानीय विकास की नीति बनानी चाहिए. यह सही है कि कोई भी सरकार सभी को रोजगार नहीं दे सकती है पर यह भी उतना ही सही है कि सरकार युवाओं को समर्थन तो दे ही सकती है जिससे वे अपने खर्चों के लिए परिवार पर कम आश्रित रहे. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आवश्यकता के अनुरूप कौशल विकास योजना जैसे कार्यक्रम से सीमित संख्या में युवाओं को विभिन्न कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जिससे वे अपने आसपास ही कुछ दिनों के लिए रोजगार पाने में सफल हो सकें। इसके लिए मनरेगा का उदाहरण लिया जा सकता है जिसके माध्यम से ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को उस समय भी गतिमान रखने में सफलता मिली थी जब पूरी दुनिया आर्थिक संकट में उलझी हुई थी.
                      इस नीति में डाक, बैंक, रोडवेज, यातायात, नगर विकास, स्वच्छता आदि क्षेत्रों में काम करने के लिए युवाओं को कुशल बनाया जा सकता है. मान लीजिये कि सरकार किसी स्थान के ५० युवाओं का चयन बेरोजगारी भत्ते के लिए करती है तो उनको ३००० रूपये प्रति मास देने के एवज में उनसे विभिन्न विभागों के सहयोगियों के रूप में कम से कम १० दिन काम भी लिया जाना चाहिए जिससे वे उस क्षेत्र की बारीकियों को समझ सकेंगे और सरकार के विभिन्न विभागों को भी स्थानीय स्तर पर काम करने वाले युवा उपलब्ध हो जायेंगें. इससे जहाँ समाज में कार्यकुशलता बढ़ेगी वहीं स्थानीय प्रशासन के पास अधिक सख्या में सहयोगी भी उपलब्ध हो जायेंगें। इस योजना के अंतर्गत काम करने वाले युवाओं के सामने सम्मान से जीने के रास्ते भी खुल सकेंगें और वे भी भत्ते के एवज में देश के लिए अपने कुछ दिन लगाकर ख़ुशी महसूस करेंगें। पहले प्रशिक्षण और फिर काम करने की बाध्यता होने से जहाँ इसमें भ्रष्टाचार की संभावनाएं खुद ही कम हो जाएँगी वहीं युवाओं को भी सही दिशा में आगे बढ़ाने में सफलता मिल सकेगी। पर देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश सरकारें केवल तात्कालिक चुनावी लाभों को देखते हुए ही निर्णय लेती हैं जिससे समाज को उसका वह लाभ नहीं मिल पाता जो एक सुनियोजित नीति के माध्यम से मिल सकता है.         
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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

टी-१८ परिचालन की राजनीति

                                                  देश में निर्मित सबसे तेज़ चलने वाली ट्रेन रैक टी-१८ के सफल परीक्षण के बाद इसके मार्ग और परिचालन के बारे में रेलवे द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है. आमतौर पर इस तरह की नई सेवा शुरू होने पर रेल मंत्री या पीएम के क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाती है जबकि इतनी महत्वपूर्ण शुरुवात के लिए इसके परिचालन की लागत के निकलने और विशेष सेवा होने के कारण इसके मंहगे होने के कारण इसे उस मार्ग पर चलाने का प्रयास किया जाना चाहिए जहाँ इसकी सेवा का मूल्य चुका यात्री इसका सही तरह से लाभ लेने की स्थिति में हों. निश्चित तौर पर पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के चलते वाराणसी को विशेष अधिकार प्राप्त है पर क्या महामना एक्सप्रेस की हालत देखकर रेलवे को इस अपनी नई सेवा की शुरुवात पीएम के क्षेत्र से करनी चाहिए ? राजनैतिक लाभ के लिए देश में आज़ादी के बाद से ही इस तरह की गतिविधियों को किया जाता रहा है और मोदी सरकार में भी यही सब जारी भी है। 
                                          अच्छा होता कि इस सेवा को दिल्ली /झाँसी या भोपाल के बीच चलाया जाता जिससे परिचालन की दृष्टि से उपलब्ध सुगम मार्ग पर इसे चलाया जा सकता और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण मथुरा आगरा झाँसी और भोपाल आने जाने वाले यात्रियों को इस तीव्र सेवा का सही लाभ मिल पाता। यह भी सही है कि देश विदेशी पर्यटकों के लिए दिल्ली आगरा के बीच चल रही गतिमान एक्सप्रेस के स्थान पर यदि इस टी-१८ को चलाया जाये तो इन स्थानों पर आने जाने वालों की यात्रा को और भी सुखद बनाया जा सकता है साथ ही दिल्ली आगरा मार्ग पर चल रही गतिमान एक्सप्रेस को वाराणसी की तरफ शिफ्ट किया जा सकता है जिससे वाराणसी के लोगों को भी नयी ट्रेन मिल जाएगी साथ ही पर्यटन स्थलों के यात्रियों को भी अपनी यात्रा का और भी लाभ मिल सकेगा। दिल्ली वाराणसी जैसे व्यस्ततम मार्ग पर टी-१८ को चलाने के लिए रेलवे को बहुत कुछ करना पड़ेगा तभी तभी यह अपनी रफ़्तार के साथ न्याय  कर पाए वर्ना यूपी में फंसती हुई ट्रेनों के बीच एक और नई गाड़ी भी विभिन्न स्टेशनों पर खडी दिखाई देने वाली है.     
                                रेल मंत्री को पहले से ही अपनी महत्वपूर्ण गाड़ियों के संचालन में आ रही बाधाओं को देखते हुए टी-१८ को वाराणसी दिल्ली के बीच चलाने से पहले आर्थिक पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे यह कम से कम अपनी परिचालन लागत को निकाल कर रेलवे को आर्थिक सहयोग भी करने की स्थिति में रहे. वैसे भी रेलवे की गलत नीतियों के चलते आज प्रीमियम किराये के कारण अधिकांश गाड़ियों में वे सीटें खाली ही रह जाती हैं जिनके लिए कभी कभी बहुत मारामारी रहा करती थी. रेलवे को पीएम के ससदीय क्षेत्र का ख्याल रखने का पूरा अधिकार है पर साथ ही क्या आज रेलवे इस स्थिति में है कि वह अपनी उन नई महत्वपूर्ण गाड़ियों को आर्थिक पहलू के स्थान पर राजनैतिक लाभ के रूप में चलाने के बारे में सोच सके ? निश्चित तौर पर यह निर्णय रेलवे बोर्ड का ही होगा पर क्या बोर्ड सरकार और मंत्री की मंशा के खिलाफ जाकर इस तरह के किसी कदम का विरोध करने की स्थिति में होता भी है ?     

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बुधवार, 26 दिसंबर 2018

औद्योगिक विकास की चुनौतियाँ

                                               छत्तीसगढ़ की नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार ने चुनाव में किये गए अपने वायदे को पूरा करते हुए बस्तर संभाग में लगने वाले टाटा स्टील प्लांट को आवंटित की गयी १७०० एकड़ जमीन कम्पनी से वापस लेकर किसानों को वापस करने के लिए आदेश जारी कर दिया है जिसके बाद स्थानीय किसानों में तो हर्ष का माहौल है पर इससे राज्य में औद्योगिक विकास को बड़ा झटका लगने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. यह भी सही है कि इस मामले में टाटा समूह द्वारा भूमि आवंटन के नियमों के अनुरूप प्लांट लगाने का काम आगे नहीं बढ़ाया गया जिससे स्थानीय लोगों में रोष भी था जिसे समझते हुए कांग्रेस ने वहां पर इसे एक मुद्दा बना लिया और जनता में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए आवंटन को रद्द भी कर दिया है. इस मामले में कहीं न कहीं कुछ ऐसी कमी अवश्य ही रही होगी जिससे टाटा जैसा समूह भी अपनी कही गयी बातों को पूरा नहीं पाया।
                                    भूपेश बघेल सरकार ने किसानों की मांग और समस्या को देखते हुए अपने वायदे को पूरा किया उसे गलत नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से यह पूरा मामला बिगड़ा अब उस पर  विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि खनिज सम्पदा से भरपूर राज्य से पूरे देश और दुनिया के औद्यौगिक समूहों में यह सन्देश भी नहीं जाना चाहिए कि यह सरकार पूरी तरह से उद्योगों की विरोधी है ? टाटा समूह के सामने आखिर वे कौन सी परिथितियाँ उत्पन्न हुईं जिसके चलते इस प्लांट का काम आगे नहीं बढ़ सका भूपेश सरकार को इस बारे में भी गंभीर विचार कर नीतियों के निर्धारण में उद्योगों का भी ख्याल रखना होगा जिससे आने वाले समय में राज्य के औद्यौगिक माहौल को सुधारा जा सके. रमन सरकार की तरफ से आखिर किन स्तरों पर क्या चूक हुई जिससे यह प्लांट मूर्त रूप नहीं ले सका और सरकार के पास क्या विकल्प थे जिसके चलते वह नियमों में सुधार कर टाटा समूह और किसानों के बीच समन्वय स्थापित कर सकती थी ?
                                  बंगाल के बाद टाटा को संभवतः दूसरी बार इस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा जब वह अपनी योजना को मूर्त रूप देने में खुद को असमर्थ पा रहा होगा ? आज टाटा समूह ही नहीं बल्कि सभी औद्यौगिक समूहों के साथ केंद्र तथा राज्य सरकारों को बेहतर समन्वय करने की आवश्यकता है जिससे आने वाले समय में कोई भी परियोजना इस तरह से बीच में न लटक जाये। चिंता की बात यह भी है कि औद्यौगिक माहौल सुधारने की बातें करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में भी इस समस्या का सही हल नहीं खोजा जा सका ? यदि समय रहते केंद्र सरकार का दखल होता या रमन सरकार खुद ही केंद्र की सहायता मांगती तो संभवतः किसानों के आंदोलन से टाटा समूह को दिक्कत न होती और मामला इतना बिगड़ने भी नहीं पाता। बात यहाँ पर किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए समग्र औद्यौगिक विकास की संभावनाएं बढाने की है जिसमें रमन सरकार पूरी तरह से चूक गयी थी पर मामले को अतिवादी होकर एकतरफा निपटने से भूपेश सरकार भी राज्य और देश का भला नहीं कर पायेगी। इसलिए राजनैतिक कारणों को दूर रखते हुए अब राज्य सरकार को नीतियों की कमियों पर ध्यान देकर उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।       
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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

कमलनाथ की पारी

                                                   एमपी में सत्ता सँभालने के साथ ही अपने पहले आदेश में सीएम कमलनाथ ने २ लाख रुपयों तक के कृषि ऋण के बारे में जो फैसला लिया है वह कांग्रेस के वचन पत्र के अनुरूप ही है पर इसके सही ढंग से क्रियान्वयन के लिए अब पूरा दबाव सीएम कमलनाथ पर ही आने वाला है क्योंकि कई राज्यों ने इस तरह की क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा की पर बाद में आंकड़ों की बाज़ीगरी से अधिकारियों ने किसानों का बहुत कम ऋण ही माफ़ होने दिया. कमलनाथ को जनता की समस्याओं के बारे में अच्छे से पता है और वे सरकारी मशीनरी से अच्छे से काम लेना भी जानते हैं तो उनके लिए इस दिशा में आगे बढ़ने में कठिनाइयां कम होने की संभावनाएं भी हैं. फिर भी इस काम के लिए यदि एक राज्यमंत्री की अलग से नियुक्ति कर दी जाये तो संभवतः इस निर्णय को सही तरीके से लागू किया जा सकेगा।  ऋण माफ़ी का कार्य पूरा होने के बाद उस राज्यमंत्री को अलग से किसी विभाग में स्थानांतरित किया जा सकता है। इस कार्य में सही और लाभार्थियों की सूची बनाये जाने का काम सबसे कठिन होता है इसलिए इसे दो स्तरों में किया जाना चाहिए पहले स्तर में बैंकों से सीधे किसानों के ऋण की स्थिति जानी जा सकती है वहीं दूसरे स्तर पर कांग्रेस के कार्यकर्तों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है जो किसी भी किसान को इस लाभ से वंचित होने की स्थिति पर कड़ी नज़र रखने का काम कर सके.
              इसके अतिरिक्त यदि सरकार बेरोज़गारी भत्ते के मामले में आगे बढ़ती है तो वह इन युवाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वे भी करवा सकती है जिससे सरकार को दोहरा लाभ भी हो सकता है। बेरोज़गारों को रोज़गार देने के साथ सरकार इन युवाओं से महीने में कुछ दिन काम भी ले सकती है जिससे युवाओं में काम करने की भावना के साथ सरकार को काम करने वाले युवा हाथों का सम्बल भी मिल जायेगा। जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने जनता से जुड़े मुद्दों को लोकसभा चुनावों को देखते हुए  प्राथमिकता में लिया है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि खुद सीम और कांग्रेस पार्टी इसे पीएम मोदी के बड़े खोखले बयानों के सामने काम करने की संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करने को तैयार दिखाई देते हैं।  बेशक यह राजनैतिक लाभ के लिए लिया गया निर्णय है पर इसके दूरगामी परिणाम पूरे देश पर आने वाले समय में पड़ने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।
                      स्थानीय युवकों के लिए ७०% रोज़गार देने वाले उद्योगों को सरकारी छूट देने का निर्णय सही कहा जा सकता है पर जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने इसके लिए यूपी-बिहार के लोगों द्वारा नौकरियाँ हथियाये जाने की बात की उससे कोई भी सहमत नहीं हो सकता है क्योंकि यह क्षेत्रीय पार्टियों की स्थानीय सोच जैसी बात है और यह भी सोचा जाना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि स्थानीय लोगों के रोज़गार को किस तरह से बाहर से आने वाले अन्य राज्यों के लोग पा जाते हैं ? सरकार को एमपी के युवकों में कुशलता के साथ कोई भी काम करने की इच्छाशक्ति बढ़ानी होगी तभी उद्योगों के साथ राज्य के युवाओं का विकास भी हो सकता है। .शिवसेना की तरह जय महाराष्ट्र और मराठी मानुष जैसी सोच का किसी भी अन्य राज्य में समर्थन नहीं किया जा सकता क्योंकि यह संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत जाता है।  खुद उद्योगपति होने के कारण कमलनाथ इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि सभी को कुशल कामगारों की आवश्यकता होती है और जब तक कुशलता बढ़ाई नहीं जाएगी तब तक हवाई सपने देखने से कुछ भी संभव नहीं है।     
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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

२०१८ के सन्देश

                                  पांच राज्यों में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में जिस तरह से २०१४ से मूर्छा में चल रही कांग्रेस को मतदाताओं द्वारा संजीवनी दी गयी है उससे भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती का ही पता चलता है. जीवंत लोकतंत्र की यही विशेषता होती है कि वह समय आने पर अपने लिए उचित अनुचित का चयन करने में अपनी भूमिका का सही ढंग से निर्वहन करने में कभी नहीं चूकता है. निश्चित तौर पर इन राज्यों से भाजपा के लिए कोई अच्छी खबर पहले भी नहीं आ रही थी पर जिस तरह से भाजपा ने कांग्रेस और राहुलगांधी की सोशल मीडिया पर अपने सोशल मीडिया टीम के दुष्प्रचार से एक नकारात्मक छवि बना दी थी कहीं न कहीं उसके कार्यकर्ताओं के दिल में भी यह बात घर कर गई कि राहुल गाँधी किसी भी परिस्थिति में नरेंद्र मोदी का किसी भी स्तर पर मुक़ाबला नहीं कर सकते हैं जिससे कार्यकर्ताओं की मज़बूत टीम और संघ का ज़मीनी मज़बूत समर्थन होने के बाद भी भाजपा को इन राज्यों में जनता की तरफ से एक सबक दिया गया है जो कि लोकतंत्र का एक हिस्सा ही है. भाजपा की तरफ से आत्म मुग्धता की जो स्थिति २०१४ से चल रही थी उससे बाहर निकलने के लिए पार्टी शाह या मोदी की तरफ से कोई प्रयास भी नहीं किया गया जबकि मोदी-शाह के गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस ने किस तरह से भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं और रुझानों में एक बार वह भाजपा से आगे निकलती हुई भी दिखाई दे गयी थी ? उस समय जनता के मूड और धरातल की वास्तविकता को यदि भाजपा द्वारा पहचाना गया होता तो शायद कर्णाटक में वह सरकार बनाने के साथ इन राज्यों में भी सम्मानजनक तरीके से खुद को स्थापित रख पाती। निश्चित तौर पर भाजपा अपने प्रतिद्वंदियों से राजनैतिक रुप से निपटने के लिए एक बहुत निर्दयी दल है और यह हार मोदी और शाह को अपने घर को २०१९ के लिए दुरुस्त करने के लिए और भी प्रेरित ही करने वाले हैं जिससे कांग्रेस को सचेत रहने की आवश्यकता भी है.
                  कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से यह परिणाम संतोष देने वाले हैं क्योंकि पूरे देश में उसके कार्यकताओं का मनोबल २०१४ में इतना टूट गया था जिसे संजीवनी की आवश्यकता भी थी. इन राज्यों के चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के लिए एक स्पष्ट भूमिका का निर्धारण किया और उसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी परिस्थिति में उसके नेताओं की तरफ से विरोधियों पर व्यक्तिगत और स्तरहीन हमले न किये जाये जिससे पार्टी को अनावश्यक वोटर्स की नाराज़गी न झेलनी पड़े जैसा कि गुजरात चुनाव में हुआ था. राहुल गांधी कांग्रेस को किस स्तर तक ले जायेंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है पर कुछ मामलों में उन्होंने जिस तरह की शुरुवात की है वह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत कहा जा सकता है. आज कांग्रेस ज़मीन पर उतर कर आम लोगों की समस्याओं और उनको दूर करने के लिए काम करने की इच्छुक दिखाई देती है जो कि पहले की कांग्रेस से बिलकुल अलग है. लोकतंत्र के लिए यह इस लिए भी अच्छा है कि कम से कम एक बार फिर से धार्मिक उन्माद और उग्र राष्ट्रवाद के बीच भी आम लोग भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस को कुछ हद तक विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। आज हर विमर्श में काँग्रेस के प्रवक्ताओं की नयी पौध बेहतर तैयारी के साथ मैदान में आती है और अब वह अनावश्यक मुद्दों में उलझने के स्थान पर जनता से जुड़े मुद्दों पर ही बहस को केंद्रित रखने की कोशिशें करती भी दिखती है जिससे देश के आम मध्यवर्ग में उसका सन्देश आसानी से पहुँच भी जाता है कि उसकी तरफ से कम से कम कोशिशें तो की जा रही हैं. कांग्रेस के नए युवा प्रवक्ता शालीनता के साथ अपना काम करते हैं पर आवश्यकता पड़ने पर मुद्दों पर आधारित हमलों से भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्तों को भी तथ्य हीन कर देते हैं.
                       भाजपा अब जहाँ आक्रामक रूप से कांग्रेस पर हमलावर होने जा रही है वहीं कांग्रेस के लिए भी बड़ी चुनौती के लिए तैयार होने के लिए समय कम ही बचा है. तीन राज्यों में सीएम चुनने में जिस तरह से राहुल गाँधी की तरफ से सावधानियां बरती जा रही हैं वह उनके सबको साथ लेकर बड़ी लड़ाई लड़ने की तैयारी भी कही जा सकती है क्योंकि भाजपा को किसी भी तरह से कमज़ोर मानकर अब कांग्रेस भी चुप नहीं बैठ सकती है आज भी भाजपा के पास ज़मीन पर काम करने के लिए पर्याप्त कार्यकर्त्ता और संघ का समर्थन मौजूद है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इन राज्यों में सरकार बनने के  १० दिनों के अंदर पूरे किये जाने वाले वायदों पर भी नज़र रख उन्हें अमल में लाना होगा जिससे जनता में यह सन्देश जा सके कि राहुल की कांग्रेस अब अपने वायदों को अमली जामा भी पहनाती है. भाजपा में मोदी और कांग्रेस में राहुल निर्विवाद रूप से सर्वोच्च नेता है इसलिए अब इन दोनों पर ही अपने दलों के मनोबल को उंच रख जनता से जुड़े रहने का दबाव भी आ गया है और यदि इन तीन राज्यों में कांग्रेस अपने वायदों पर चलती दिखाई दी तो २०१९ में वह मोदी के लिए मज़बूत चुनौती के रूप में सामने आ सकती है. इसलिए अब मामला रोचक स्थिति में पहुँच गया है जिसमें जनता के सरोकारों पर और भी बहस और निर्णय लेने की स्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं.                         

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सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

एक साथ चुनाव

                               देश में इस समय लोकसभा और विधानसभा चुनावों के एक साथ कराये जाने की संभावनाओं पर गंभीर विचार शुरू भी नहीं हुआ है पर जिस तरह से इस पर बातें की जा रही हैं वे कहीं न कहीं से इस बात को रेखांकित अवश्य करती हैं कि सरकर चुनाव आयोग इस दिशा में सोच अवश्य रहे हैं. यह बात कहने में जितनी आसान लगती है क्या उसे धरातल पर उतार पाना भी संभव है अब इस बात पर विचार की आवश्यकता भी है. लोकतंत्र में राजनैतिक अस्थिरता के आने के साथ ही १९६७ में लोकसभा और विधान सभा चुनावों का साथ छूट सा गया और उसके पहले होने वाले चुनावों की गति टूटती सी नज़र आयी क्योंकि केंद्र और राज्यों में स्पष्ट बहुमत या गठबंधन की सरकारों के न चल पाने से चुनावों की तिथियां एक दूसरे से अलग होती चली गयी जिसका आज का स्वरुप हम सबके सामने है. आज जो परिस्थिति है उसमें भाजपा या एनडीए शासित राज्य तो पीएम की इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए राज़ी हो सकते हैं पर विपक्षी दलों की तरफ से जहाँ उसकी सरकारें अभी दो वर्ष पुरानी भी नहीं है क्यों इस प्रयोग का साथ दिया जायेगा ? आज पीएम मोदी की जो छवि है उसके साथ दोनों चुनाव एक साथ होने की दशा में भाजपा का काम आसान हो जायेगा वहीं विपक्षी दलों के लिए लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों को संभाल पाना कठिन ही होने वाला है इसलिए राजनैतिक स्तर पर इस विचार को बहुत अधिक समर्थन नहीं मिलने वाला है क्योंकि यह सब बिना संविधान संशोधन के संभव नहीं हो सकता है जिसके लिए केंद्र को दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी.
                         यह सही है कि इस तरह से एक साथ होने वाले चुनावों में समय और धन की बर्बादी को रोका जा सकता है पर क्या सभी चुनाव एक साथ कराने के लिए सरकार चुनाव आयोग को इतना धन दे पाने में समर्थ हो सकती है ? एक अनुमान के अनुसार यदि पूरे देश के लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाते हैं तो आयोग को वीवीपैट मशीनों के लिए लगभग २००० करोड़ रुपयों की आवश्यकता पड़ेगी साथ ही जब ये चुनाव एक साथ होंगें तो इन मशीनों का १५ वर्ष की आयु होने के कारण केवल तीन बार ही उपयोग किया जा सकेगा तो क्या केंद्र सरकार इस तरह के खर्चे को वहन करने के लिए तैयार है जिसमें सरकार को हर वर्ष आज की कीमत के अनुसार १०० करोड़ रूपये प्रतिवर्ष से भी अधिक खर्च करने पड़ेंगें ? सरकार की सोच सही हो सकती है पर इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए लम्बा समय लगने वाला है जिसके लिए अभी हमारे देश में संसाधन ही उपलब्ध नहीं हैं. यदि यह मान लिया जाये कि आगामी २०१९ में ही यह दोनों चुनाव साथ में किये जाएँ तो उसके लिए आवश्यक धन की व्यवस्था तो हो सकती है पर इतने कम समय में वीवीपैट मशीनों की उपलब्धता के बारे में पहले से ही विचार करने की ज़रुरत होगी क्योंकि उनके बिना इस तरह के चुनाव करा पाना संभव ही नहीं होगा.
                            सरकार का यह कहना कुछ हद तक सही है कि लगातार कहीं न कहीं होते रहने वाले चुनावों से विकास की गति आचार संहिता के कारण धीमी पड़ती रहती है जिसको कुछ हद तक सही माना जा सकता है पर समस्या यहाँ विकास के धीमे होने की नहीं बल्कि अपनी अपनी दलीय राजनीति को चमकाने को लेकर ही है क्योंकि सदनों में राज्यों और केंद्र की योजनाएं केवल अपने हितों को साधकर बनाये जाने की जो परंपरा चल पड़ी है जब तक इस पर राजनैतिक दल खुद ही अंकुश नहीं लगायेंगें तब तक विकास अपनी गति को नहीं पा सकता है. क्या सरकारें बदल जाने से जनता के विकास से जुड़े सरोकार बदल जाते हैं ? क्या राजनैतिक दलों को भी इसके लिए संविधान में उत्तरदायी नहीं बनाया जाना चाहिए कि वे सदनों में बैठकर कुछ मुद्दों पर कम से कम बीस वर्षों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनायें और उस पर हर दल चलने को बाध्य हो साथ ही समय समय पर उसकी समीक्षा के साथ आवश्यक संशोधनों को भी करने की व्यवस्था भी की जाये जिससे सब कुछ सही दिशा में सही तरह से चल सके. कोई भी दल केवल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए इस तरह के विचारों को सामने लाता है तो उसको स्वीकार कर पाने में सभी को कठिनता होने वाली है.
                          इस दिशा में शुरुवात इस तरह से की जा सकती है कि देश भर में जहाँ भी विधान सभा चुनाव होने हैं उसका समय वर्ष भर में एक महीने में ही कर दिया जाये जिससे हर वर्ष आयोग और सरकार चुनावों के लिए तैयार रह सकें. जैसे किसी राज्य में जनवरी किसी में अप्रैल और किसी में अक्टूबर नवम्बर में चुनाव होने हैं तो उनको वर्ष के एक महीने में ही कराने की दिशा में कदम बढ़ाये जाएँ जिससे पूरे वर्ष होने वाले इस चुनावी उत्सव को कुछ महीनों में ही निपटाया जा सके. यदि यह प्रक्रिया सही तरह से पटरी पर आ जाती है तो आने वाले समय में लोकसभा और विधान सभा चुनावों को भी एक साथ कराने की दिशा में सोचा जा सकता है. पर्वतीय राज्यों में चुनाव गर्मियों के मौसम में कराये जाने के बारे में सोचा जाना चाहिए जिससे प्रशासन को कम चुनौतियों का सामना करना पड़े और जनता की भागीदारी को भी बढ़ाया जा सके. केंद्र सरकार को इस दिशा में केवल बयान देने के स्थान पर सर्वदलीय बैठक से शुरुवात करनी चाहिए फिर जिन राज्यों के चुनाव लोकसभा के १ साल के आगे पीछे होने हैं वहां की सरकारों और विधानसभा अध्यक्षों की एक बैठक बुलानी चाहिए जिससे इस पर सही दिशा में आगे बढ़ने पर सफलता मिलने की सम्भावना बढ़ सके.   
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शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

उग्र बच्चे उत्तरदायी कौन ?

                                                     लखनऊ के एक स्कूल में सातवीं में पढ़ने वाली एक छात्रा ने जिस तरह से पहली कक्षा के मासूम बच्चे पर जानलेवा हमला कर उसे जान से मारने की कोशिश की वह हमारे समाज की वर्तमान व्यवस्था को झकझोरने के लिए काफी है क्योंकि भले ही पहली दृष्टि में हम सभी को यह एक असामान्य घटना लगे जिसमें सिर्फ एक दिन की छुट्टी हो जाने की आशा में कोई ११ साल की लड़की इस हद तक चली गयी हो पर गंभीरता से विचार करने पर यह पूरी तरह से सामाजिक, पारिवारिक उत्तरदायित्वों को सहेज पाने की हमारी विफलता ही दिखाई देती है. अब जिस तरह से पूरे मामले को घुमाने की कोशिशें हो रही हैं वे अपने आप में इसे भी कुछ दिनों में भूल जाने वाली घटना में बदल देंगीं और जब कभी कहीं से इस मामले की किशोर न्याय बोर्ड में सुनवाई होगी तब इस बारे में हम एक बार फिर अपनी चिंताएं व्यक्त कर आगे बढ़ जायेंगें. लखनऊ के एसएसपी द्वारा जो बयान दिया गया वह वास्तव में चौंकाने वाला है कि यह छात्रा पहले भी दो बार घर से गायब हो चुकी थी जिसके बारे में पुलिस के पास भी सूचना दी गयी थी फिर भी छात्रा के परिजनों, स्कूल या पुलिस ने इतनी कम उम्र की इस छात्रा की उचित कॉउन्सिलिंग कराने के बारे में क्या कदम उठाया यह सामने नहीं आया है.
                                   अभी भी जिस तरह की जानकारियां सामने आ रही हैं उनसे यही लगता है की इस घटना के पीछे कोई अन्य कारण भी हो सकता है क्योंकि जिस तरह से स्कूल ने घटना के बारे में पुलिस प्रशासन को सूचित नहीं किया और २४ घंटे बाद इस मामले में पुलिस का हस्तक्षेप शुरू हुआ वह भी संदेह उत्पन्न करता है. नियमतः किसी भी स्कूल प्रबंधन को किसी भी दुर्घटना की जानकारी पुलिस को देना कानूनी और सामाजिक रूप से सही और आवश्यक होता है पर इस मामले में पुलिस को पता ही बहुत देर से चला जिससे प्रबंधन भी संदेह के घेरे में आ गया. यदि स्कूल की तरफ से पहले ही यह प्रयास किया जाता कि घटना पुलिस के संज्ञान में हो तो संभवतः मामला इतना नहीं बिगड़ता. यदि मौके से साक्ष्यों को मिटाने का प्रयास किया गया है तो स्कूल पर शक और भी गहरा जायेगा भले ही इसमें सिर्फ छात्रा ही शामिल रही हो. पुलिस को स्कूल और वहां पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से भी गहन पूछताछ करनी चाहिए जिससे प्रबंधन के बारे में किसी गड़बड़ी का अंदाज़ा लग सके और यह भी हो सकता है कि स्कूल ने बदनामी से बचने के लिए मामले को खुद अपने स्तर से निपटाने की कोशिश की हो जिसमें बच्चे को लगी गंभीर चोटों के कारण मामला बिगड़ गया.
                       समाज के तौर पर हमें अब अपने निरीक्षण की आवश्यकता भी है क्योंकि आखिर वे क्या कारण है कि हमारी एक बच्ची इतनी हिंसक हो जाती है कि वह दूसरे बच्चे की जान लेने तक सोच जाये ? क्या हमारे घरों में पहुंची टीवी और हाथों में आये इंटरनेट वाले मोबाइल फ़ोन इस दिशा में बच्चों के कोमल मन को प्रभावित तो नहीं कर रहे हैं ? आखिर टीवी पर कुछ भी दिखाए जाने को सही कैसे ठहराया जा सकता है क्योंकि अपराधों के बारे में आने वाले अधिकांश कार्यक्रमों में अपराधी के काम करने का तरीका क्या था यही बताया जाता है और उन कार्यक्रमों को देखने वाले हमारे बच्चे यह निर्णय नहीं कर पाते हैं कि इस जानकारी का क्या किया जाये ? संयुक्त परिवारों से दूर होते छोटे परिवारों में आज माता-पिता के पास इतना समय ही नहीं है कि वे अपने बच्चों के साथ रह पाएं और उनकी गतिविधियों पर भी ध्यान दें क्योंकि कोई बच्चा एक दिन में इतनी आपराधिक प्रवृत्ति से भर नहीं सकता है. कई बार घर में मिलने वाली उपेक्षा या अत्यधिक लाड प्यार भी उनके इस दिशा में बढ़ जाने का एक बड़ा कारण हो सकता है. आखिर क्यों आज हम समाज की एक मज़बूत इकाई बनकर जीने के स्थान पर अपने एकल इकाई में परिवारों को संभालना सीखते जा रहे हैं ? क्या इस तरह का जीवन हमारे घरों में हमारे बच्चों पर बुरा प्रभाव नहीं डाल रहा है और क्या अब इस समस्या से निपटने के लिए हमारे पारिवारिक मूल्यों की तरफ बढ़ने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है ? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हम केवल अपनी सुविधा के अनुरूप ही खोजने की कोशिशें करते रहते हैं और कुछ घट जाने पर केवल यह कहकर ही अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाते हैं कि बहुत बुरा समय आ गया है. समय बुरा नहीं आया है हमने अपने बच्चों को अच्छाइयों और बुराइयों के अंतर को समझाना बंद कर दिया है और उनके विकास के लिए उन्हें आज की दुनिया में खुला छोड़ दिया है जबकि हम सभी को यह सोचना चाहिए की खुलापन सिर्फ उतना ही हो जिसमें घुटन न हो घर के लोगों और समाज से बच्चों का अपनापन बना रहे और वे आने वाले समय में अच्छे नागरिक बनकर देश के लिए कुछ ठोस कर सकें तभी कुछ सुधार संभव है.        
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बुधवार, 3 जनवरी 2018

मानक रैक - रेलवे की नयी पहल

                                         हर वर्ष कोहरे और अन्य कारणों से भारतीय रेलवे की अधिकांश गाड़ियां अनिश्चित काल के लिए विलम्ब से चलने लगती हैं जिनसे निपटने के लिए सदैव ही रेलवे की तरफ से कई तरह के प्रयास किये जाते रहते हैं पर उनसे स्थितियों को सही करने में पूरी क्या थोड़ी भी मदद नहीं मिल पाती है जिससे रेलवे के साथ यात्रियों को भी बहुत असुविधा का सामना करना पड़ता है. इस समस्या से निपटने के लिए अब रेलवे की तरफ से एक नयी पहल की जा रही है जिससे यह आशा की जा सकती है कि यदि इसे सही तरह से लागू किया जा सका तो आने वाले समय में रेलवे अपने संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से लगातार लेट होती गाड़ियों को काफी हद तक काबू में ला सकता है. इस योजना में अब पूरे देश में चलने वाली सभी गाड़ियों की संरचना को एक नियमित मानक में कर दिया जायेगा जिससे आरक्षण से लगाकर अन्य सभी समस्याओं से बिना किसी परेशानी के निपटा जा सकेगा और बहुत देर से चलने वाली गाड़ियों के स्थान पर उपलब्ध रैक्स को उपयोग में लेकर किसी भी  स्टेशन से जाने वाली गाड़ी को सही समय से रवाना किया जा सकेगा. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि मान लीजिये लखनऊ स्टेशन से किसी गाड़ी को शाम के तीन बजे रवाना होना है पर जो रैक उस मार्ग उस गाड़ी के लिए चलायी जाती है वह किसी कारण से लेट है तो उसके आने के बाद उसको आवश्यक अनुरक्षण के कार्य के लिए यार्ड में भेजा जायेगा जिससे उसके जाने का समय भी और लेट हो जायेगा. इस स्थिति में रेलवे के मानक रैक उपलब्ध होने से सुबह समय से आयी और अनुरक्षण से वापस आ चुकी तथा देर रात में जाने वाली किसी अन्य गाड़ी के रैक को लखनऊ स्टेशन से इस गाड़ी के नंबर के साथ रवाना किया जा सकता है और देर रात जाने वाली किसी अन्य गाड़ी के समय पर लेट आने वाली गाड़ी के रैक को अनुरक्षण के बाद भेजा जा सकता है.
                                             आज रेलवे के सामने इस प्रक्रिया को शुरू करने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसकी सभी गाड़ियों के रैक्स आज की आवश्यकता के अनुसार १२, १६, १८, २२ और २६ कोच के होते हैं जिस कारण रेलवे किसी ट्रेन के लेट होने पर किसी और खड़ी ट्रेन को उसके नाम से नहीं चला पाती और मुख्य ट्रेन का आने का ही इंतजार करना पड़ता जिससे पहले सही लेट चल रही गाड़ियां और भी लेट हो जाती हैं और रेलवे के पास उनको निरस्त करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचता है. इससे जहाँ रेलवे को आर्थिक नुकसान होता है वहीँ यात्रियों के लिए भी अचानक से नयी समस्या सामने आ जाती है. रेलवे के नए प्लान के अनुसार यदि काम सही ढंग से चल पाया तो सही समय से चलने वाली एक गाड़ी के रैक का दूसरी गाड़ी में उपयोग करके गाड़ियों के लेट होने के घंटो पर नियंत्रण किया जा सकेगा साथ ही विषम से विषम परिस्थिति में भी ट्रेन को निरस्त करने जैसे कदम उठाने ही नहीं पड़ेगें क्योंकि तब लेट होने की एक सीमा निर्धारित की जा सकेगी और उसके बाद भी लेट चलने वाली गाड़ी को समय रहते ही निरस्त कर दिया जायेगा जिससे यात्रियों को अधिक समस्या का सामना न करना पड़े. ऐसी स्थिति के लिए तैयार होने के लिए रेलवे को तेज़ी से अपने अनुरक्षण से जुड़े संसाधनों को बढ़ाना होगा क्योंकि अभी कुछ जगहों पर छोटी रैक का अनुरक्षण ही किया जाता सकता है जिसके चलते वहां पर २२ डिब्बों वाली रैक का अनुरक्षण संभव नहीं हो पायेगा और जब तक पूरे देश में इस व्यवस्था को लागू नहीं किया जा सकेगा तब तक रेलवे के लिए परिचालन से जुडी समस्याएं बनी ही रहने वाली हैं.
                                               आने वाले समय में जिस तरह से भारतीय रेलवे की सभी गाड़ियों को आधुनिक एलएचबी रैक्स से बदलने की नीति पर अमल शुरू हो चुका है तो इससे भी ट्रेनों की गति और सुरक्षा पर गुणात्मक असर पड़ने वाला है. ये कोच हमारे परंपरागत कोचों से हलके और बेहद मज़बूत होते हैं साथ ही इनमें दुर्घटना के समय न पलटने की तकनीक का उपयोग किया गया है जिससे दुर्घटना की भयावहता को कम किया जा सकता है. इन कोचों को आधुनिक तरीके से बनाया जाता है जिससे इनका अनुरक्षण और सफाई करना पहले के मुक़ाबले आसान हो गया है और इस कार्य में लगने वाले समय को भी घटाने में रेलवे को अच्छी खासी मदद मिलने वाली है. आशा की जानी चाहिए कि जिन ३०० मार्गों पर चलने वाली गाड़ियों में प्रारंभिक तौर पर २२ कोचों वाली मानक रैक का उपयोग प्रारम्भ करने के बारे में विचार किया गया है उसको देखते हुए जल्दी ही गाड़ियों के लेट होने के समय को कम किया जा सकेगा साथ ही रेलवे को अत्यधिक व्यस्त मार्गों पर कोहरे के अतिरिक्त फिर से २६ कोचों के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि २६ कोच वाली हर गाड़ी में ४ कोच कम होने से गाड़ियों की परिवहन क्षमता भी कम हो जाएगी और यात्रियों का दबाव अन्य गाड़ियों पर बढ़ जायेगा जिससे इस नयी समस्या से निपटना और भी कठिन हो सकता है. इसके लिए रेलवे इसे चरणबद्ध तरीके सभी लागू कर सकता है जिसमें २२ और १८ कोचों का मानक बनाते हुए पहले पहले इन दो स्तरों पर काम किया जाये और बाद में कोचों की उपलब्धता और उत्पादन के अनुरूप एक निश्चित समय सीमा में इस नयी व्यवस्था को लागू किये जाने का प्लान भी सामने रखना चाहिए और यदि संभव हो तो इसके साथ ऐसा नियम भी जोड़ा जाना चाहिए जिससे आने वाले समय में इसके कार्य को रोका न जा सके.    
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मंगलवार, 7 नवंबर 2017

एक्सप्रेस वे और सुगमता


देश के हर कोने में यातायात को सुगम बनाने के उद्देश्य से बनने वाले किसी भी एक्सप्रेस वे से निश्चित तौर पर दो बड़े शहरों के बीच की दूरी भले ही सिमट जाती हो पर जिस उद्देश्य को लेकर इनका निर्माण शुरू किया गया था हमारे देश में वह कहाँ तक पहुँच पाया है संभवतः इस पर अभी किसी का भी ध्यान नहीं गया है. राज्य सरकारों राजमार्ग प्राधिकरण और बीओटी के अंतर्गत निजी क्षेत्र द्वारा बनाये जाने वाले विभिन्न एक्सप्रेस वे पर यदि कोई समग्र रिपोर्ट तैयार की जाये तो वह कहीं से भी बहुत उत्साहजनक नहीं होगी क्योंकि इनकी वर्तमान अवधारणा और उसके आस-पास बसे हुए शहरों को इनसे कितना लाभ हुआ है इस पर अभी तक कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. अब भी इस बारे में नीतिगत सुधार नहीं किये गए तो आने वाले दिनों में इनको बनाने वाली सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की संस्थाओं के लिए बैंकों से लिए गए लोन के ब्याज के खर्चे निकलना भी मुश्किल हो सकता है और देश में शहरों को जोड़ने के लिए अच्छे, सुरक्षित तथा सस्ते मार्ग उपलब्ध कराने की पूरी कवायद पर भी पानी फिर सकता है. इस बारे में पहले से बनाये गए एक्सप्रेस मार्गों की पूरी स्थितियों का आंकलन करके अब नए सिरे से इन्हें नई नीति के अंतर्गत बनाये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि दो दशक पहले की नीतियां आज के समय में उतनी प्रभावशाली साबित नहीं हो सकती हैं.
इस बात को समझने के लिए देश में सबसे कम समय में बिना किसी विवाद के उच्च गुणवत्ता से बनने वाले आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे का उदाहरण लिया जा सकता है जो निश्चित तौर पर आने-जाने वालों को पसंद आ रहा है पर इसके साथ जिन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए संभवतः आज भी सरकार का ध्यान वहां तक नहीं पहुंचा है जिससे यह बेहद उपयोगी साबित हो सकने वाला मार्ग आज भी उपेक्षा का शिकार सा लगता है. इस तरह से बनने वाले हर एक्सप्रेस वे के बारे में विस्तृत योजना अवश्य बनायीं जानी चाहिए जिससे इसके दोनों तरफ बसने वाले लगभग १०० किमी दूरी तक के शहरों से यहाँ तक पहुँचने के लिए कम से कम टू लेन मार्ग व्यवस्था होनी चाहिए और यदि कहीं पर यातायात अधिक है तो वहां की आवश्यकता के अनुरूप इसे फोर लेन करने के बारे में कार्य किया जाना चाहिए. आज यदि दिल्ली से चलने वाले तीर्थयात्री या पर्यटक आगरा से नैमिषारण्य (सीतापुर) तक जाना चाहें तो उनके पास अच्छा मार्ग होने के साथ ही छोटा मार्ग चुनने का विकल्प नहीं है जिससे वे मजबूरी में अच्छे और लम्बे मार्ग से चलने को अभिशप्त हैं और उन जगहों पर अनावश्यक यातायात बढ़ रहा है जहाँ पर इसको नहीं होना चाहिए साथ ही पुराने बसे शहरों में जाम की समस्या और भी विकराल होती जा रही है. कन्नौज से नैमिषारण्य की दूरी लगभग ८० किमी से भी कम है पर सीधे गंगा नदी पार कर प्रतापनगर चौराहे आने वाले मार्ग की दशा आज भी अच्छी नहीं है जिससे यह यातायात या तो हरदोई या फिर बांगरमऊ होते हुए नैमिषारण्य तक आ सकता है जिसमें समय ईंधन आदि बर्बाद होते हैं. यदि इस सीधे मार्ग को सीतापुर से अच्छी सड़क से जोड़ दिया जाये तो इस मार्ग का उपयोग करने वाले आसानी से बिना किसी जाम में फंसे अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं.
यह तो एक मात्र उदाहरण ही है क्योंकि जब इस तरह से एक्सप्रेस मार्गों तक पहुँच को अच्छा बनाया जायेगा तो इनका उपयोग भी बढ़ाया जा सकता है जिससे इनको बनाने और चलाने में लगने वाली लागत को भी कम किया जा सकेगा. आज मंहगे टोल के चलते भी निजी गाड़ियों से कभी-कभार सफर करने वाले लोग इन मार्गों से सिर्फ इसलिए भी बचने की कोशिशें करते हैं क्योंकि उन्हें टोल के रूप में भी काफी धन खर्च करना पड़ जाता है. यदि प्रयास कर इन मार्गों तक पहुँच को अच्छा बनाया जाये और टोल को भी तर्क संगत किया जा सके तो आने वाले समय में इनको बनाने वाली संस्थाओं के पास अपनी लागत को वापस पाने के बेहतर विकल्प उपलब्ध हो जायेंगें जिस वे अन्य जगहों पर मार्गों को बनाना के लिए अपने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर पाने के लिए स्वतंत्र हो सकेंगें. हम भारतीय जिस तरह से लम्बी दूरी की सड़क यात्रा में आनंद को खोजते हैं तो नीतियों में उन पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है और जहाँ से अन्य शहरों को जाने के लिए कट बनाये गए हैं वहां पर खाने-पीने, गाड़ियों की मरम्मत से जुडी व्यवस्थाओं के बारे में भी काम किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि ४/५ घंटे के सफर में एक दो स्थानों पर रुकने की आवश्यकता भी होती है जिसको किसी भी स्तर पर अनदेखा नहीं किया जा सकता है. आने वाले समय के लिए इन स्थानों के समग्र विकास से लम्बी दूरी की यात्रा करने वालों के लिए यह बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं.
अब समय आ गया है कि यूपी जैसी घनी आबादी वाले राज्यों में बनने वाले एक्सप्रेस मार्गों और पहले से बने हुए मार्गों कि बारे में आंकड़े इकट्ठे किये जाएँ जिससे आने वाले समय में आज होने वाली समस्याओं से निपटने में सहायता मिल सके तथा जिन उद्देश्यों से इनका निर्माण किया जा रहा है उसकी पूर्ति भी हो सके. आज की स्थितियों कि अनुरूप यदि भविष्य की योजनाओं के बारे में विचार नहीं किया गया तो इन एक्सप्रेस मार्गों की दशा भी पहले से उपलब्ध राजमार्गों जैसी ही हो जाने वाली है. बड़े राज्यों में राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर इस दिशा में अभी से सोचने की आवश्यकता है जिससे आबादी और यातायात के दबाव को झेलने के हिसाब से पूरे देश में राजमार्गों और एक्सप्रेस मार्गों का सही उपयोग किया जा सके. आर्थिक रूप से उपयोग में सस्ते और सुरक्षित होने के साथ इन पर भरपूर यातायात भी हो जिससे इनकी लागत को समय से निकाला जा सके और देश में राजमार्गों के विकास के वर्तमान परिदृश्य को और भी सुधारा जा सके अब यही समय की आवश्यकता हो गयी है.मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 30 सितंबर 2017

रेलवे की आधारभूत आवश्यकताएं

                                                     मुंबई के एल्फिंस्टन-परेल स्टेशन के यात्री उपरिगामी सेतु पर हुए हादसे के बाद एक बार फिर से वही बातें दोहराए जाने का क्रम शुरू हो चुका है जिसके चलते पूरे देश में हज़ारों जाने जा चुकी हैं या फिर हर समय हज़ारों यात्री इस खतरे के साथ ही जीने को मजबूर हैं. यह सही है कि भारतीय रेल का पूरा नेटवर्क आज की आवश्यकता के अनुसार क्षमता को कहीं से भी पूरा नहीं कर पाता है जिससे थोड़ी सी बात पर अफवाह फैल जाती हैं और पलक झपकते ही कोई हादसा हमारी आँखों के सामने होता है. यह सही है कि दशकों पुराने ढांचे को सुधारने में समय तो लगना ही है पर १८५३ में भारतीय रेल के शुरू होने के बाद से आज तक भी तो रेल का परिचालन होता रहा है और उसकी आवश्यकता के अनुरूप सुधार भी किये जाते रहे हैं पर पिछले कुछ दशकों से इसमें किसी न किसी स्तर पर कमियां अवश्य ही दिखाई दे रही हैं जिसके चलते अब पूरे रेल नेटवर्क में रख-रखाव से जुडी समस्याएं सामने आने लगी हैं और यदि समय रहते इनसे नहीं निपटा गया तो आने वाले समय में रेलवे और रेल यात्रियों के लिए समस्याएं बढ़ती ही जाने वाली हैं. अब सरकार को इस क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए रेलवे के पेंच कसने की तरफ ध्यान देना ही होगा जिससे देश में यातायात के इस सुगम साधन को और भी सुरक्षित किया जा सके.
                   लम्बे समय तक लगातार उपयोग में आने के कारण रेलवे में रखरखाव सदैव ही एक बड़ी चुनौती रहा है जिसके चलते रेलवे के अधिकारियों की तरफ से भी कुछ लापरवाहियां की जाती रहती हैं कई बार धन की कमी का रोना भी रहता है पर इस सबमें सबसे बड़ी समस्या रेलवे के लिए समय के साथ बदलाव को न करते रहना भी है. रेलवे में हर एक अवस्थापना और संरचना की एक निश्चित आयु होती है जिसके चलते उसे उस समय से पहले ही बदलने की आवश्यकता पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत होती है कई बार काम के दबाव या रेल परिचालन में संभावित व्यवधान को देखते हुए इस कार्य को लम्बे समय तक टाल दिया जाता है और ट्रेनों तक को लम्बे समय तक समस्या वाले स्थानों से धीमी गति से निकाल कर काम चलाया जाता है. इस पूरी कवायद में जहाँ यात्रा का समय बढ़ता है वहीं आसपास के बड़े स्टेशनों पर अनावश्यक रूप से दबाव भी बनता है जो कि रेलवे के समयबद्ध और सुरक्षित परिचालन में एक बड़ा व्यवधान साबित होता है और इससे निपटने के लिए रेलवे के पास कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नीति या कार्ययोजना का अभाव दिखाई देता है जिससे भी समस्याएं कम होने के स्थान पर बढ़ ही जाती हैं.
                   यदि आने वाले समय में रेलवे को देश के तेज़ी से बदलते हवाई यातायात से मुक़ाबला करना है तो उसे अपने आधारभूत कामों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पड़ने वाली है क्योंकि पीपीपी के आधार पर कोई भी निजी निवेशक केवल रेलवे की खाली पड़ी कीमती भूमि का उपयोग करने की दिशा में ही काम करने वाला है और उसका रेलवे की मूलभूत आवश्यकता से कोई सरोकार नहीं रहने वाला है तो उस परिस्थिति के लिए रेलवे को सीमित संख्या में निजी क्षेत्र को आमंत्रित करने की दिशा में सोचना चाहिए जिससे उसकी कीमती भूमि भविष्य में उसके विस्तार और अन्य परियोनाओं के लिए उपलब्ध रह सके. मुंबई हादसे के बाद रेल मंत्रालय को सबसे पहले पूरे देश में इस तरह के बड़े स्टेशनों पर मूलभूत संरचनाओं के बारे में एक श्वेत पत्र जारी कर यह बताना चाहिए कि आज इन स्टेशनों पर इनकी क्या स्थिति है और एक समय सारिणी के अनुरूप आने वाले दो या तीन वर्षों में इस तरह की समस्या से निपटने की कार्ययोजना पर अमल करना चाहिए जिसमें सबसे पहले यात्रियों की संख्या के अनुरूप बड़े स्टेशनों पर आवश्यक सुविधाओं को उपलब्ध कराया जाना चाहिए और उसके बाद उनके रख रखाव की समुचित व्यवस्था पर भी ध्यान देने के लिए एक मज़बूत और उत्तरदायी तंत्र बनाना चाहिए.
                     हर मंडल में इस तरह के काम को देखने के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए जिससे अन्य अधिकारी काम के बोझ के चलते इन कामों पर ध्यान न दिए जाना का बहाना न बना सकें और काम को समय से पूरा भी किया जा सके. रेलवे को मेट्रो रेलवे की तरह एक नयी टीम बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ना ही होगा क्योंकि जब तक दक्ष और कार्यकुशल लोगों के हाथों में यह सब पूरी तरह से नहीं दिया जायेगा तब तक कुछ भी सही नहीं हो सकता है. इन्हीं परिस्थितियों में देश भर की मेट्रो रेलवे आखिर किस तरह से समयबद्ध होकर हर काम कर सकती हैं जबकि वहां पर गए अधिकांश कर्मचारी भी रेलवे से या उसकी धारणा के अनुसार ही होते हैं ? मतलब स्पष्ट है कि रेलवे में अभी उस तरह की कार्यसंस्कृति का विकास नहीं हो पाया है जैसा मेट्रो ने कम समय में विकसित कर लिया है और उसके चलते ही आज देश में स्थापित विभिन्न शहरों की मेट्रो अपने काम को समय से पूरा करने के लिए जानी जाती हैं.
                       अब समय आ गया है कि पूरी परिस्थिति पर ध्यान देते हुए एक विस्तृत कार्ययोजना बनायीं जाये और उसकी बागडोर ऐसे अधिकारियों के हाथों में होनी चाहिए जो आगामी दो या तीन वर्षों में रिटायर न हो रहे हों जिससे अधिकारियों को बीच में बदलने से काम प्रभावित न हो सके. जब इतनी अधिक उम्र में ई श्रीधरन अपने काम को सही समय से करने के लिए जाने जाते हैं तो यह सब काम करने वाले श्रीधरन जैसे और मेट्रो मैन हम सामने क्यों नहीं ला सकते हैं ? कहीं न कहीं इच्छा शक्ति में कमी के चलते ही यह सब नहीं हो पा रहा है और अब इस पर ध्यान देकर रेल यात्रा को सुरक्षित किये जाने का समय आ चुका है क्योंकि इसमें चूकने पर रेलवे के साथ सरकार और देश के नागरिकों के जीवन पर व्याप्त संकट को किसी भी तरह से कम नहीं किया जा सकता है.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 1 जनवरी 2017

कैशलेस "भीम" और आम लोग

                                               विमुद्रीकरण के बाद हर तरह के व्यापार और लेनदेन में नकद को लेकर आने वाली समस्या से निपटने के लिये जिस तरह से सरकार ने कदम उठाने शुरू किये वे अपने आप में देश के कैशलेश होने के इच्छुक उस बड़े हिस्से के लिए सही दिशा में कहे जा सकते हैं पर ये कदम जिस तरह से उलटी तरह से उठाये जा रहे हैं संभवतः उससे ही इनकी कार्यक्षमता पर कुप्रभाव पड़ रहा है. देश में नेट बैंकिंग और कार्ड्स के माध्यम से कैशलेश होने का क्रम बहुत पहले ही शुरू हो चुका था पर आम लोग इसमें किसी तरह की धोखाधड़ी से बचने के लिए इससे कतराते हुए ही अधिक दिखाई देने लगे जिससे देश की कैशलेस अर्थ व्यवस्था में इसके माध्यम से जो लाभ उठाये जा सकते थे वे आज भी दूर की कौड़ी ही नज़र आते हैं. आज भी जिस तरह से बैंकों के एटीएम और अन्य गोपनीय सूचनाओं के लीक होने की बातें सामने आती रहती हैं उससे आम लोगों में यह विश्वास और भी मज़बूत हो जाता है कि उनकी मेहनत की कमाई कहीं इसी तरह से धोखे से न हड़प ली जाये. हालाँकि सरकार और बैंकों की तरफ से ऑनलाइन लेनदेन को सुरक्षित करने के प्रयास लगातार किये जा रहे हैं फिर भी अभी लोगों के मन में इसकी सुरक्षा के प्रति संदेह बना ही हुआ है.
                                         अब इस मामले में सरकार की तैयारियों के बीच दावों और उनके धरातल पर सत्यापन करने के लिए दो दिन पहले खुद पीएम द्वारा जनता को समर्पित यूपीआई एप्लिकेशन भीम की बात करते हैं कि वह किस तरह से काम करने वाला है. पीएम ने जितनी आसानी से खादी ग्रामोद्योग को भुगतान कर दिया उसे देखने से हर व्यक्ति को यही लगा होगा कि वह भी यह काम इतनी ही सरलता से कर सकता है पर मेरी दो दिनों में लगातार की गयी कोशिशों के बाद मोबाइल में डाउनलोड हुआ भीम मुश्किल से काम करना शुरू कर पाया जिसमें बैंकों के बारे में जानकारी जुटाने में उसे तीस से चालीस बार खाते को खोजना पड़ा जिसके बाद एप्लीकेशन में एक यूपीआई आईडी बनाने में सफलता मिल गयी. इसके बाद इस आईडी में जोड़े गए बैंक की तरफ से मोबाइल बैंकिंग सेवा शुरू करने का ओटीपी आया जिसके बारे में यह भी सूचना थी कि यह अगले पांच दिनों में बैंक की तरफ से मुझे मिलने वाली ईमेल में यह ओटीपी डालकर मोबाइल बैंकिंग सेवा शुरू की जा सकती है तब से मैं उस ईमेल की प्रतीक्षा में हूँ जो मुझे अगले चार दिनों में कभी भी मिल सकती है. जिस एप्लिकेशन को आम लोगों के लिए इतना सरल बताया जा रहा है उसके एक्टिवेशन के लिए इतनी उबाऊ प्रक्रिया करने के स्थान पर इसके डेवलपर, रिज़र्व बैंक और एनपीसीआई (भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम) को क्या इसे सीधे आधार से जोड़ने का विकल्प भी नहीं देना चाहिए था जिससे इसके माध्यम से सरलता से भुगतान किया जा सके ? जिन लोगों के पास आज नेट बैंकिंग की सेवा नहीं है वे किस तरह से इस भीम की सेवा से लाभान्वित हो पायेंगें यह समझ से पर है इसलिए सरकार को आम लोगों की वित्तीय सुरक्षा और गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए इसके लिए आधार के विकल्प पर भी ध्यान देना चाहिए.
                                   इतने बड़े काम को शुरु करने से पहले सरकार को क्या निजी वॉलेट कंपनियों की तरह कोई ऐसा एप्लीकेशन बनाना चाहिए जिसमें ५ या दस हज़ार की सीमा के साथ लेनदेन करने के लिए एक्टिवेशन बहुत ही आसान हो जिससे अपनी छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आम लोग भी इसका उपयोग कर पाएं. एप्लिकेशन के साथ इतनी कोशिशें करने के स्थान पर आम लोग सीधे नकद में लेनदेन पर ही अधिक भरोसा रखेंगें क्योंकि कोई भी आम व्यक्ति इतनी मेहनत करने के बाद भी जब इसका उपयोग सही तरह से नहीं कर पायेगा तो उसको कैशलेस की इस अवधारणा से दूर जाने में देर नहीं लगेगी और देश में नकदी पर निर्भरता कम करने की सरकारी कोशिशों का सही फल भी नहीं मिल पायेगा. कोई भी सेवा शुरू करने से पहले उसकी व्यापक टेस्टिंग करना भी आवश्यक है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न बैंकों के यूपीआई एप्लिकेशन आज भी अच्छी तरह से काम नहीं कर रहे हैं जिससे लेनदेन के सबसे सुरक्षित इस स्वरुप को आज भी आगे नहीं बढ़ाया जा सका है. देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई का एसबीआई पे एप्लिकेशन आज भी बहुत देर में खुलता है तथा लॉगिन होने काफी समय लेता है जिससे आम लोग इतनी देर प्रतीक्षा करने की स्थिति में होंगें यह भी सोचने का विषय है.
                                  विमुद्रीकरण के चलते देश में अस्थायी रूप से मुद्रा का जो संकट बना है वह कैशलेस प्रणाली के सही तरह से काम न करने की स्थिति में और भी दबाव में आ सकता है हालाँकि अब बाजार में गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं पर दो हज़ार और पांच सौ के नए नोटों को एक बार फिर जिस तरह से एकत्रित किया जाने लगा है वह सरकार की सभी कोशिशों को पलीता लगाने के लिए काफी है क्योंकि जो राशि बाजार में आ रही है उसमें से अधिकांश को दबाया जा रहा है जिससे भी बाजार में नकदी का यह संकट अनुमान से और भी लंबे समय तक बना रह सकता है. कर सुधारों और करों के राज्यों एवं केन्द्र के बीच बंटवारे के कारगर नियमों के साथ अब आम लोगों को कर देने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता भी है पर जब तक इस दिशा में गंभीरता से सुधारों को नहीं अपनाया जाता है कर देने वाले लोगों की संख्या नहीं बढ़ने वाली है. देश में कर दाताओं कि स्थिति का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि एक आंकड़े के अनुसार देश में १० लाख से ऊपर की २५ लाख से अधिक कारें हैं जबकि केवल २४ लाख लोग ही अपने को १० लाख की श्रेणी से ऊपर बताकर करों का भुगतान करते हैं ? ऐसी स्थिति में सरकार को हड़बड़ी में विमुद्रीकरण जैसे कोई कदम उठाने से पहले उनकी समग्र तैयारियों पर भी ध्यान देना ही होगा जिससे प्रगति पर बढ़ने के साथ आम लोगों के लिए होने वाली समस्याओं को क़म किया जा सके.           
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

"बाइ अमेरिकन्स हायर अमेरिकन्स" की नीति

                                   अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तरफ से रोज़ ही जिस तरह के चौंकाने वाले बयान दिए जा रहे हैं आने वाले समय में वे अमेरिका के साथ सम्पूर्ण विश्व के लिए बड़े बदलाव और संकट लाने वाले भी साबित हो सकते हैं क्योंकि अभी तक जिस बयानों और नीतियों को ट्रम्प की चुनावी बातें समझ जा रहा था वह मूर्त रूप लेने की तरफ बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है. आज जिस वैश्विक गाँव की बात  की जाती है वह पूरी तरह से अमेरिका और पश्चिमी देशों की तरफ से किये गए प्रयासों का ही नतीजा है पर आज जब दुनिया के अधिकांश देश अपने यहाँ खुले व्यापार की नीतियों को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं उस परिस्थिति में अमेरिका द्वारा अपने यहाँ आने वाले प्रशिक्षित प्रवासियों के लिए इस तरह से दरवाज़े बंद करने की प्रक्रिया को किसी भी स्तर पर कितना सही माना जा सकता है ? हर देश और उसके नेतृत्व को अपने देश के अनुसार नीतियों को बदलने और संशोधित करने का अधिकार मिला हुआ है पर जिस तरह से कुछ देशों में उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों की भावनाओं को भड़का कर दूसरे देशों के लिए अवसर समाप्त किये जाते हैं वह किसी भी दशा में उस देश और सम्पूर्ण विश्व के लिए लाभदायक नहीं हो सकते हैं.
                                  आज इस बात को भारत जैसे देशों को समझना ही होगा क्योंकि अपने तेज़ विकास, बेहतर संसाधन और खुली नीतियों के चलते अभी तक अमेरिका पूरी दुनिया के प्रवासियों और विशेषज्ञों के लिए एक स्वप्न जैसा बना हुआ है तो ट्रम्प की नयी नीतियां पूरी दुनिया पर किस तरह का प्रभाव डालने वाली सिद्ध हो सकती हैं ? आज जब पूरे विश्व में सभी देशों की एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ती ही जा रही है तथा प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के साथ अन्य विकासपरक कामों में हर देश और कंपनी अपने यहाँ सबसे अच्छे लोगों को काम पर रखने के लिए इच्छुक होते हैं तो इस परिस्थिति में अब आखिर किस तरह से कुछ बड़े देश अपने यहाँ इस तरह की बंदिशें लगा सकते हैं ? इस तरह से काम करने पर और नए सिरे से नौकरियां देने पर लगने वाली पाबन्दी के चलते आने वाले समय में जहाँ भारत जैसे देशों के व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त लोगों के लिए अवसर समाप्त होंगें वहीं देश में अच्छे अवसर न होने से उनकी प्रतिभाओं का सही उपयोग भी नहीं हो पायेगा. इस चिंता से निपटने के लिए अब भारत की निजी कंपनियों और सरकार को भी अपनी नीतियों में परिवर्तन करने और बेहतर मूलभूत संसाधन जुटाने के बारे में सोचना ही होगा जिसे उनकी नौकरियों और जीवन स्तर पर विपरीत प्रभाव न पड़े.
                                ऐसा नहीं है कि भारत के लिए यह करना बहुत मुश्किल होने वाला है पर यदि नीतियों में सही बदलाव कर शिक्षा को केवल जीविकोपार्जन से आगे बढ़कर देश और समाज के हित में व्यापक बनाने की तरफ काम शुरू किया जाये तो आने वाले समय में बहुत आसानी से ही हम अपने लक्ष्य को पा सकते हैं. पोखरण-२ के बाद जिस तरह से हमारे इसरो ने विदेशों और यहाँ तक रूस से भी तकनीक न मिलने की स्थिति में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने में सफलता पायी थी आज अन्य क्षेत्रों में भी उस प्रक्रिया को दोहराया जा सकता है पर सारा देश इसरो की तरह पूरी निष्ठा के साथ काम करने के लिए तैयार हो यह भी इस सफलता के लिए बहुत आवश्यक होगा. हमें भी अपने संसाधनों को बेहतर तरीके से प्रबंधन के स्तर पर लाने की कोशिशें करनी होंगी जिससे देश के विकास पर बुरा प्रभाव न पड़े. चीन के साथ ट्रम्प के संबंधों को देखते हुए आने वाले समय में अमेरिका की रूस के साथ मित्रता बढ़ सकती है और चीन को घेरने का काम और भी आसानी से अमेरिका द्वारा किया जा सकता है. भारत को अपने हितों को ध्यान में रखते हुए ही आगे की परिस्थितियों के लिए अभी से वैकल्पिक उपायों पर विचार करना ही होगा तभी हम अपने विकास के पैमाने को ऊंचा बनाये रख पाने में सफल हो सकेंगें.  
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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

विमुद्रीकरण की समस्याएं

                                                 देश में बड़े नोटों के विमुद्रीकरण को एक महीना बीत जाने के बाद भी जिस तरह से आम लोगों की समस्यायों का अंत होता नहीं दिखाई दे रहा है उससे यही लगता है कि इतने बड़े फैसले पर सरकार और रिज़र्व बैंक के आंकलन में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक भी हुई है जिससे पूरे देश में बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. यह भी सही है कि आम लोग आज भी सरकार के इस फैसले को पूरी आशा के साथ पूरा होते हुए देखने के आकांक्षी भी हैं पर उनकी दैनिक जीवनचर्या जिस तरह से प्रभावित हुई है वह कब कम हो पायेगी इस बात का जवाब भी खोजते हुए सभी दिखाई दे रहे हैं. अब यह भी स्पष्ट हो रहा है कि अगले वर्ष पञ्च राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों को देखते हुए ही सरकार ने आनन फानन में इतनी बड़ी घोषणा कर दी जबकि उसके पास नकदी के सम्बन्ध में सटीक आंकड़े भी नहीं थे क्योंकि जिन १४ लाख करोड़ से कुछ अधिक नोटों में से ५/६ लाख करोड़ रूपये कालेधन के रूप में होने का सरकार को अनुमान था विभिन्न कारणों से वह ध्वस्त हो चुका है और सरकार का यह कहना पूरी तरह से बेमानी लगता है कि इससे वह आम लोगों की भलाई के लिए नयी योजनाएं शुरू कर पायेगी क्योंकि जितनी भलाई होनी है उससे अधिक नुकसान तो देश में आर्थिक माहौल थमने से हो ही चुका है.
                                   अब स्थिति यह है कि सरकार अपनी कवायद को विभिन्न कारणों से सफल बताना चाहती है पर उसके पास इन बातों के समर्थन में प्रस्तुत करने लायक आंकड़े ही नहीं हैं और उसकी इस मजबूरी का लाभ विपक्ष उठाना चाहता है जिससे वह भी जनता की समस्याओं में अपनी राजनीति को सम्मिलित कर सके. जैसी कि खबर दी जा रही है कि पौने चार लाख करोड़ की नकदी एक महीने में बाज़ार में बैंकों के माध्यम से पहुँच चुकी है तो अभी भी सरकार को लगभग १४ लाख करोड़ की व्यवस्था करनी है जिसमें संभवतः ६ महीने या उससे भी अधिक समय लग सकता है. यह एक लंबी प्रक्रिया थी जिस के लिये कई महीनों की समग्र तैयारी की आवश्यकता भी थी पर इस बारे में एक ही झटके में फैसला ले लिए गया था जिसके दुष्परिणाम आज सामने आ रहे हैं. यह सही है कि देश में लोगों की पहुँच आधुनिक संसाधनों की तरफ बढ़ रही है जिससे वे अधिक जागरूक भी हो रहे हैं पर जिस तरह से निजी वालेट कंपनियों को इस क्षेत्र में खुली छूट मिल गयी है उससे हमारे बैंकिंग सिस्टम पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की पूरी संभावनाएं भी हैं क्योंकि एनपीसीए की तरफ से जारी किये गए यूपीआई एप्लीकेशन्स के बारे में न तो बैंक ही जागरूक हैं और न ही जनता को इस बारे में पहले से बताया गया था. साथ ही प्रारंभिक स्तर पर होने के कारण अधिकांश ग्राहक अपने पंजीकरण को भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं जिससे निजी वालेट पर उनकी निर्भरता बढ़ती ही जा रही है.
                                   देश के अपने ढांचे को मज़बूत करने के लिए जिस तरह से कोशिशें की जानी चाहिए थीं आज वे अधूरी ही है और आने वाले समय में नोटबंदी के चलते अब उनको समय से पूरा कर पाना भी संभव नहीं है जिससे स्थितियां और भी खराब होती जा रही हैं. एक अच्छी बात यह है कि सरकार ने तकनीकी विशेषज्ञ, आधार के जनक और कांग्रेसी नेता नंदन नीलकेणी के साथ मिलकर आज की स्थितियों को सँभालने के लिए एक समिति बना दी है जो देश को नकदी पर निर्भरता कम करने के लिए उचित काम करने की दिशा में बढ़ना शुरू कर चुकी है जिससे कुछ मोर्चों पर तो अगले कुछ हफ़्तों में ही परिवर्तन महसूस हो सकता है. अब समय आ गया है कि सरकार और विपक्ष संसद में चल रहे गतिरोध को आगे बढ़कर समाप्त करने के बारे में सोचें जिससे देश की जनता के लिए कष्टों पर बात करने के स्थान पर कुछ ठोस कदम भी उठाए जा सकें. देश को काले धन के नाम पर उपजी इस समस्या के उचित समाधान की आवश्यकता भी है जिससे सम्पूर्ण रूप से देश की आर्थिक गतिविधियों को वापस पटरी पर लाया जा सके पर वर्तमान परिस्थिति में देश का राजनैतिक तंत्र अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभा पाने में पूरी तरह से असफल  होता ही दिखाई दे रहा है.         
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मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

प्रीमियम ट्रेन और समस्या

                                                                     सीमित रूप से आर्थिक रूप से सक्षम यात्रियों को राजधानी जैसी सुविधाओं से युक्त ट्रेन के संचालन के साथ बेहतर सेवाएं देने के उद्देश्य के साथ २०१३ में शुरू की गयी भारतीय रेलवे की प्रीमियम ट्रेन सेवा शुरुवाती परीक्षणों में बहुत सफल रही थी जिसके बाद केंद्र में सरकार बदलने के बाद उन नीतियों पर संभवतः पुनर्विचार किया गया कि रेलवे की आमदनी को बढ़ाने में इन प्रीमियम ट्रेनों का उपयोग किस तरह से किया जा सकता है. इस मामले में संभवतः रेल मंत्री के सामने केवल लाभ के आंकड़े ही प्रस्तुत किये गए जिससे उन्हें यह बात समझ में आयी कि विभिन्न मार्गों पर चलने वाली अन्य महत्वपूर्ण ट्रेनों में भी इस तरह की व्यवस्था को लागू करने से रेलवे की आमदनी को बिना अतिरिक्त संसाधनों के ही बढ़ाया जा सकता है. यह योजना सफल नहीं हो सकती है इस बात पर पहले से ही आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं पर सितंबर में सर्ज प्राइसिंग लागू होने के बाद जिस तरह से उच्च श्रेणियों में रेलवे को त्यौहारी सीजन के बावजूद आमदनी में मामूली बढ़त के साथ बड़ी संख्या में यात्रियों को खोना पड़ा है उसके बहुत ही दूरगामी परिणाम आ सकते हैं और छोटी दूरी तक यात्रा करने वाले यात्री हमेशा के लिए रेलवे से दूर भी जा सकते हैं.
                                            इसे इस तरह से समझ जा सकता है कि यदि एक परिवार के पांच लोग किसी अवसर पर ५०० से ७०० किमी की यात्रा रेल से करना चाहते हैं तो सामान्य किराये में वे रेलवे को ही प्राथमिकता दिया करते थे पर सर्ज प्राइसिंग लागू होने के बाद उनका यह किराया निजी टैक्सी लेकर जाने से भी मंहगा पड़ जाता है जिसमें स्टेशन तक आने जाने और सामान उठाने आदि के खर्चे भी लगते हैं पर अपनी बुक की हुई टैक्सी से जहाँ यात्रा आसानी घर से घर तक की जा सकती है वहीं अपने सामान के बारे में भी अधिक चिंता नहीं करनी पड़ती है. इस तरह से एक बार यात्रियों का यह समूह यदि रेलवे से अलग होकर इस तरह की यात्राओं का आदी जो जाता है तो रेलवे के लिए उन्हें दोबारा अपने से जोड़ पाना भी आसान नहीं होने वाला है क्योंकि रेलवे की तरफ से जब तक इन किरायों को दोबारा तर्क संगत करने के बारे में सोचा जायेगा तब तक राजमार्गों पर दबाव बढ़ ही जाने वाला है. इससे जहाँ एक तरफ रेलवे को नुकसान होना है वहीं देश के पर्यवरण को भी बहुत नुकसान होने वाला है क्योंकि हज़ारों यात्रियों को एक साथ सफर पर ले जाने वाली रेल के यात्री भी सड़क मार्गों पर भीड़ बढ़ाते हुए नज़र आने वाले हैं जिससे पहले से ही दबाव को झेल रहे मार्गो की हालत और भी ख़राब ही होने वाली है.
                                        अच्छा हो कि रेलवे अपनी इस नीति पर पुनर्विचार करे और आने वाले समय में हर ट्रेन में सर्ज प्राइसिंग लागू करने के स्थान पर केवल विशेष श्रेणियों की नयी ट्रेनों का सञ्चालन करे और आम यात्रियों से अनावश्यक रूप से खास किराया वसूलने और अपने घाटे को कम करने के तरीके से बच सके. यदि रेलवे यात्रियों को बहुत अच्छी सुविधाएँ देने में सफल होता है तो वह यात्रियों से तर्क संगत रूप में किराया लेने का हक़दार भी है पर जिस तरह से केवल आंकड़ों के हेरफेर से आमदनी को बढाए जाने की कोशिशें की जा रही है वे लंबे समय में रेलवे के आर्थिक हितों पर भी चोट करने वाली ही साबित होने वाली है. रेलवे इस बात के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे पर उसे यह भी ध्यान में रखना होगा कि रेलवे पूरे देश की रगों में दौड़ते हुए खून की तरह है जिससे सभी को जीवन मिलता है कहीं ऐसा न हो कि आमदनी बढ़ाने के चक्कर में रेलवे आम लोगों से बहुत दूर चली जाये और आने वाले समय में इसे फिर से पटरी पर लौटाना कठिन साबित हो जाये. आज जब खुद पीएम देश में बुलेट ट्रेन चलाये जाने के लिए बहुत गंभीर हैं तो रेलवे के बाकी हिस्से को अपने दम पर प्रचालन के योग्य बनाये रखना भी अपने आप में बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी ही साबित होने वाली है.       
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बुधवार, 9 नवंबर 2016

काले धन पर नकेल

                                             मोदी सरकार ने जिस तरह से देश को चौंकाते हुए बड़े नोटों के प्रचलन को बंद किया है वह काले धन के प्रवाह को रोकने और देश की अर्थव्यवस्था में काले धन की भूमिका को नियंत्रित करने वाला साबित हो सकता है. पहले विदेशों में जमा किये गए काले धन फिर देश के अंदर काले धन को बाहर निकालने की योजना के बाद यह परिवर्तन देश में काले धन के प्रवाह पर फिलहाल अंकुश लगाने का काम ही करने वाला है पर इस सबके बीच जिस तरह से आयकर सीमा में बढ़ोत्तरी और अन्य सुधारों की आवश्यकता है यदि उन्हें भी साथ ही लागू किया जाता तो इसके और भी बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं. इस मामले में मोदी सरकार की कोशिश पूरी तरह से सही कही जा सकती है पर जिस तरह से देश में शादियों का मौसम शुरू हो रहा है और उसमें जितने बड़े पैमाने पर ईमानदारी के धन के साथ काले धन का उपयोग होता है उसके चलते शादियों वाले घरों में समस्या ही उत्पन्न होने वाली है. जब देश की जनता स्वेच्छा से अपने स्तर पर ईमानदार होने की कोशिश करती नहीं दिखाई दे रही थी तो सरकार के पास इस तरह की सख्ती करने के अतिरिक्त कुछ और करने के विकल्प भी शेष नहीं रह गए थे.
                         काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था में देश के कुछ लाख लोगों के पास ही सब कुछ है और इससे निपटने के लिए सरकार का यह कदम इस मायने में अधिक महत्वपूर्ण है कि वह यह चाहती है कि जनता बैंकों या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लेनदेन करने की कोशिश करे जिससे देश की पूँजी का प्रवाह सही तरह से पता लग सके और काले धन का अर्थ व्यवस्था में प्रवाह नियंत्रित करते हुए आने वाले समय में पूरी तरह से रोका भी जा सके. सरकार के प्रयासों पर ऊँगली नहीं उठायी जा सकती है क्योंकि वह अपने आप में सही दिशा में उठाया गया कदम ही है और काले धन के प्रवाह को रोकने का काम केवल सरकार ही नहीं कर सकती है क्योंकि जब तक इसमें जन भागीदारी का सक्रिय योगदान नहीं होगा तब तक यह योजना भी पूरी तरह से सफल नहीं हो सकती है. देश की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय में इसका सकारात्मक परिणाम दिखाई देने वाला है पर यह भी संभव है कि बाज़ार में काले धन के प्रवाह के रुकने के कारण आर्थिक गतिविधियों में कुछ सुस्ती भी दिखाई देने लगे पर यह अस्थायी प्रभाव ही होगा और धीरे धीरे इसमें सुधार भी दिखाई देने लगेगा.
                         सभी जानते हैं कि आज देश का काला धन किन जगहों पर प्रवाहित होता है देश में चुनावों में जितने बड़े पैमाने पर धन के बल पर वोटर्स को खरीदने की कोशिशें की जाती हैं और उसमें भी रोक दिखाई देने वाली है क्योंकि चुनाव आयोग की लाख कोशिशों के बाद भी इस तरह की गतिविधियों को पूरी तरह से रोका नहीं जा सका है. अगले वर्ष यूपी जैसे बड़े राज्य समेत अन्य चार राज्यों में होने वाले चुनाव में काले धन के बलबूते बहुत कुछ करने के मंसूबे पाले बैठे लोगों के लिए समस्याएं ही बढ़ने वाली हैं क्योंकि अब पुराने नोटों से काम नहीं चलने वाला है और नए नोट मिलने में जो प्रक्रिया निर्धारित की गयी है उसके चलते अभी बड़ी मात्रा में काले धन का प्रवाह संभव नहीं दिखाई दे रहा है. जनता को इस मामले में थोड़े संयम से काम लेना चाहिए और बैंक तथा पोस्ट ऑफिस के बाहर अफवाहों के चलते भीड़ लगाने से बचना भी चाहिए. इस एक कदम से सरकार ने दो काम कर लिए हैं पहले यह कि काले धन के खिलाफ कार्यवाही लोगों को दिखाई भी देने लगी है वहीं पूँजी की कमी का रोना रो रहे बैंक्स के पास इन बड़े नोटों के रूप में ३० दिसंबर तक जो धनराशि जमा हो जाएगी सरकार के पास उसे अपनी सुविधा के अनुसार वापस करने का विकल्प खुला हुआ है जिससे बैंकों में एकदम से आम लोगों की तरफ से पूँजी का प्रवाह बढ़कर आज व्याप्त पूँजी संकट को कम करने का काम भी करने वाला होगा. जनता को धैर्य से काम लेना चाहिए और देशहित में सरकार के साथ पूरा सहयोग भी करना चाहिए.      
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गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

घाटी में चौपट शिक्षा

                                           जुलाई माह से कश्मीर घाटी में शुरू हुए बंद और हिंसक प्रदर्शनों के दौर के बीच जहाँ व्यापार पर बहुत बुरा असर पड़ा है वहीं घाटी में बच्चों की शिक्षा पूरी तरह से ठप हो गयी है. अलगाववादियों की तरफ से जिस तरह से स्कूलों को भी निशाने पर लिया जा रहा है वह अपने आप में बहुत ही चिंताजनक बात है क्योंकि जब ये बच्चे पढ़ने नहीं जा पायेंगें तो उनके आस पास चल रही हिंसक गतिविधों से लगाकर विरोध प्रदर्शनों तक का उन पर बुरा प्रभाव पड़ने से इनकार नहीं किया जा सकता है. कई बार ऐसा देखने में भी आया है कि छोटे बच्चे भी अलगाववादियों और सुरक्षा बलों के संघर्षों में फंसकर गंभीर रूप से घायल हो गए हैं या फिर उनकी मृत्यु तक हो गयी है. इस परिस्थिति से निपटने के लिए आखिर किस स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है आज यह समझने की ज़रुरत तो है ही साथ ही आने वाले समय में इस तरह के माहौल में बच्चों को किस तरह से पूरी तरह से इससे बाहर रखा जाये एक नीति के तौर पर उस पर भी विचार किये जाने की तरफ सोचा जाना आवश्यक होता जा रहा है क्योंकि केवल घाटी को छोड़कर जम्मू, लद्दाख और सीमावर्ती जिलों में स्थिति पूरी तरह से सामान्य ही है और वहां पर शिक्षा काम सही तरह से चल भी रहा है तो आने वाले समय में घाटी के बच्चों का पूरा एक साल ख़राब होने की स्थिति भी बनती हुई दिखाई दे रही है.
                                           जिस तरह से केवल कश्मीर घाटी और विशेषकर पुराने श्रीनगर में अलगाववादियों को समर्थन मिलता है आज उस परिस्थिति को बदलने के लिए काम करने की ज़रुरत है क्योंकि कोई भी सरकार इस तरह की भावनाओं को एकदम से निकाल कर बाहर नहीं कर सकती है तो उसे कम से कम उन बातों पर सोचना ही होगा जिसमें उसकी तरफ से शिक्षा को सही तरह से चलाते रहा जाये. अलगाववादियों के प्रभाव वाले विशेष क्षेत्रों में राहत पुनर्वास और विश्वास बहाली के मज़बूत कदम उठाने के बारे में सोचना चाहिए जिससे घाटी के इन लोगों में भी कानून के अनुपालन और अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचने का समय मिल सके. आतंकियों की यही चाल है कि पहले व्यवसाय को चौपट किया जाये और भले ही सीमित संख्या में ही सही पर बच्चों को किसी भी तरह से स्कूल तक जाने से भी रोक लगायी जाये जिससे वे अलगाववादियों और आतंकियों की अगली पीढ़ी के रूप में उपलब्ध हो सकें. पुराने शहर में सुरक्षा के स्तर को और भी अधिक मज़बूत करने और जवानों के स्थान पर उपग्रह आधारित निगरानी पर भी तेज़ी लाने का काम करना चाहिए जिससे सुरक्षा बलों की तैनाती किये बिना ही इन खतरे वाली जगहों पर नज़र रखी जा सके. इसरो के प्रयासों से देश के पास ऐसी व्यवस्था भी उपलब्ध है जिसमें इस तरह की निगरानी को और भी आसानी से किया जा सकता है तो इस विकल्प पर विचार करने की आवश्यकता भी है.
                                       पुलिस प्रशासन और सेना के संयुक्त प्रयासों से इस तरह की गतिविधियों पर अंकुश भी लगाया जा सकता है और आतंकियों तथा उनके समर्थकों पर बहुत ही सटीक कार्यवाही करके उन्हें निष्क्रिय भी किया जा सकता है. शिक्षा भविष्य का द्वार खोलती है इसलिए अब समय आ गया है कि घाटी में स्थानीय लोगों की सहभागिता से स्कूलों को लगातार खोलने का दबाव आतंकियों पर बनाया जा सके और यदि उनकी तरफ से शिक्षा में व्यवधान डाला जाए तो स्थानीय अधिकारियों से पहले नागरिकों को ही इसके लिए आगे आना सीखना होगा क्योंकि जन-बल के आगे कोई भी शक्ति इस तरह से नहीं टिक सकती है. यह घाटी के लोगों को ही तय करना होगा कि उन्हें अपने बच्चों की शिक्षा चाहिए या अलगाववादियों का साथ देना है क्योंकि उनके बाद यदि उनकी अगली पीढ़ी भी इसी तरह से असमंजस में उलझी रहती है तो आने वाले समय में घाटी में तरक्की को कैसा लाया जा सकता है ? घाटी के लोगों को यह भी समझना होगा कि जिहाद के नाम पर जितने भी देशों में जेहादी लगे हुए हैं उनमें आम नागरिकों को ही सबसे अधिक नुकसान हो रहा है और जब वे जेहादियों के साथ रहने का विकल्प अपनाएंगें तो जेहादी मानसिकता उन पर हावी भी हो जाएगी तथा बच्चों की पीढ़ी पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगी जो कि आतंकियों की मंशा को ही पूरा करने वाली होगी.                                       
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गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

पराली और प्रदूषण

                                                                            हमारे देश में महत्वपूर्ण मुद्दों की तरफ ध्यान न देना अपने आप में एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है क्योंकि इस वर्ष मानसून के अन्तिम चरण में पहुँच जाने और उत्तर भारत के खेतों में धान की कटाई के बाद उसकी पराली को सही तरह से उपयोग करने के लिए जो भी कोशिशें पिछले वर्ष की गयी थीं उनके कोई सकारात्मक परिणाम सामने आते नहीं दिखाई दे रहे हैं. आज एक बार फिर से उत्तर भारत की हवाओं में इस पराली के खेतों में जलाये जाने के चलते प्रदूषण का स्तर बढ़ना शुरू हो चुका है और जिस तरह से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसल को काटने के बाद आवश्यकता से अधिक बची हुई पराली को खेतों में ही जलाने का काम शुरू हो चुका है वह अपने आप में चिंतनीय भी है. इस मामले में पिछले वर्ष जिस तरह से सक्रियता दिखाई गयी थी इस वर्ष सभी पक्ष चुप और लापरवाह ही दिखाई दे रहे हैं जिससे दिल्ली जैसे महानगरों के साथ उत्तर भारत के अन्य बड़े शहरों के साथ गांवों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा तो बनना शुरू ही हो चुका है. देश की समस्या यह है कि हमारी नीतियों में समय से काम करने और विभिन्न सरकारी विभागों और सरकारों के समन्वय की जो रूपरेखा है वह केवल कागज़ी खानापूरी तक ही सीमित रह गयी है पर भारत ने जिस तरह से जलवायु परिवर्तन के समझौते पर सहमति दिखाई है तो आने वाले समय में पराली भी हमारे लिए एक बड़ी समस्या का कारण बन सकती है.
                      सबसे पहले हमें इस बात पर विचार करना होगा कि पहले के मुक़ाबले अब पराली की समस्या इतनी विकराल क्यों होती जा रही है क्योंकि देश में खेती हमेशा से ही होती रही है पर यह समस्या के रूप में अब हमारे सामने आनी शुरू हुई है. पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से खेती का आधुनिकीकरण हुआ है उसके चलते गांवों में पशुओं की संख्या में कमी आनी शुरू हुई है और पहले जो किसान खेती के साथ पशुधन को भी एक समानांतर अर्थ व्यवस्था के रूप में चलाते थे आज वे अन्य कामों की तरफ मुड़े हुए दिखाई देते हैं जिससे खेती में अनाज के अतिरिक्त होने वाले अन्य पदार्थों का उपयोग पशुओं के लिए कम होने लगा है. खेती के आधुनिकीकरण से जहाँ पैदावार में बढ़ोत्तरी हुई वहीं अनाज के अतिरिक्त उसके अन्य पदार्थों के उपयोग के सही तरह से निस्तारण के बारे में कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायीं गयी जिसके चलते अपनी आवश्यकता से अधिक पराली को किसानों द्वारा खेतों में ही जलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी. एक संसय जब यह सीमित मात्रा में थी तो इस पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता था पर आज जब अधिकांश किसानों की तरफ से अनावश्यक पराली ने निपटने के लिए यह तरीका अपनाया जाने लगा है तो इसका पूरे वायु मंडल में हवा की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा है.
              इस बारे में सबसे पहले यह विचार किया जाना चाहिए कि खेती के इस तरह के पदार्थों का किस तरह से निस्तारण करना उचित है और यदि इसके बारे में कोई कारगर प्रक्रिया बनाई जा सके तो आने वाले समय में इसका दोहरा लाभ भी किसानों को मिल सकता है. अपनी आवश्यकता से अधिक पराली को किसानों को जलाने से रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर सरकार और पंचायतों को इसके माध्यम से खाद बनाने और अन्य कामों में उपयोग करने के बार में स्पष्ट और कारगर नीति की आवश्यकता है. एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग ५० टन पराली होती है जिसमें से केवल आधी ही उपयोग में लायी जाती है शेष को खेतों में ही जला दिया जाता है ऐसी स्थिति में जब किसानों को पराली से निपटने का कोई कारगर रास्ता नहीं मिलता है तो वे इसे जलाकर अपने खेतों को खाली करने का काम किया करते हैं. सरकार को अब इस समस्या से निपटने के लिए कुछ ठोस प्रारूप बनान ही होगा जिससे आने वाले समय में इसका सही उपयोग किया जा सके और किसानों को कुछ लाभ के अलावा देश के पर्यावरण को सही रखने में मदद भी मिल सके.
               चीन में इस समय से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर बायो एनर्जी के साथ जैविक खाद बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है जिससे पर्यावरण को नुकसान भी नहीं होता और किसानों को कुछ अतिरिक्त लाभ भी मिल जाता है. हमारे देश में इस प्रक्रिया को यदि पूरी तरह से सरकारी योजना के रूप में लागू किया गया तो इसके चल पाने की संभावनाएं कम ही दिखाई देती हैं क्योंकि हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से योजना के लिए आवंटित धन की बंदरबांट तो आसानी से हो जाएगी पर जिस उद्देश्य से इसे शुरू किया जायेगा वह पूरा नहीं हो पायेगा. प्रायोगिक तौर पर अगले वर्ष से इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार को आधारभूत ढांचा अभी से बनाने के बारे में अभी दे सोचना होगा इसका जैविक खाद के रूप में उपयोग करना सबसे आसान विकल्प होगा क्योंकि इसे ब्लॉक स्तर पर भी कम लागत से छोटे कारखाने लगाकर तैयार करने की कोशिशें की जा सकती हैं. हर जिले में एक केंद्रीय स्थान को खोजकर वहां पर जैविक खाद और बायो एनर्जी के बड़े प्लांट लगाकर भी इसका उपयोग किया जा सकता है. यदि अभी से इसके बारे में सीधे किसानों को दोषी बनाने के स्थान पर उनको जागरूक कर इसके बारे में सही तरह से निस्तारण की जानकारियां दी जाएँ तो पंजाब और हरियाणा के किसान इससे भरपूर लाभ भी उठा सकते हैं. अच्छा हो कि आने वाले समय में इस पराली से स्वच्छ ऊर्जा और जैविक खाद बनाने की दिशा में देश और आगे बढ़ जाये जिससे किसानों की खुशहाली के साथ पर्यावरण की रक्षा भी अच्छी तरह से हो सके.
                   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 14 सितंबर 2016

हिंदी दिवस की सार्थकता

                                                  देश की राजभाषा के रूप में स्वीकार की गयी हिंदी आज़ादी के बाद से ही विचित्र स्थिति में उलझी हुई दिखाई देती है क्योंकि अधिकांश मामलों में केवल भाषायी राजनीति को आगे रखकर ही देश की राजभाषा के साथ अन्य प्रचलित प्रान्तीय भाषाओँ की बहुत बड़े स्तर पर अनदेखी होती रही है. वैसे तो सरकार की तरफ से विभिन्न स्तरों पर राजभाषा के विस्तार और उपयोग को बढ़ाने के लिए लगातार ही काम किये जाते रहते हैं पर जिस स्तर पर इसमें आम जनमानस की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए अभी तक वह नहीं हो पाया है और और सरकारी कामों में हिंदी केवल एक विशेष भाषा ही बनकर रह गयी है.भारत जैसे देश में जहाँ भाषायी विविधता बहुत अधिक है यदि सभी प्रचलित स्थानीय भाषाओं के साथ हिंदी का सही समन्वय नहीं किया जायेगा तो किस तरीके से अन्य भारतीय भाषा भाषी लोगों को कैसे एक मंच पर लाया जा सकेगा. निश्चित तौर पर देश की आधिकारिक भाषा का अपना महत्व होता है पर किसी भी परिस्थिति में केवल सरकारी आयोजनों तक हिंदी को छोड़ देने से उसकी स्वीकार्यता और प्रभाव कैसे बढ़ सकता है ? भाषाओं पर राजनीति के स्थान पर उनके बेहतर समन्वय पर बातचीत होनी चाहिए क्योंकि उस मार्ग पर चलकर ही आगे दूर तक चला जा सकता है.
                                 उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों में कुछ हद तक हिंदी के प्रति वैसी ही कट्टरता पायी जाती है जैसी दक्षिण भारत में हिंदी के खिलाफ दिखाई देती है तो इस विषय को सही तरीके से सुलझाने के स्थान पर कुछ भी करने से काम नहीं चलने वाला है. अच्छा हो कि देश में दो भाषाओँ का ज्ञान आवश्यक कर दिया जाये जिसमे हर विद्यार्थी को अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त किसी अन्य क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा को सीखना अनिवार्य किया जाये जिससे केवल दक्षिण भारतीयों पर हिंदी थोपने के आरोप स्वतः समाप्त हो जायेंगे और देश के नागरिकों को देश की अन्य भाषाओँ के बारे में जानने के अवसर भी मिल जायेंगें. मातृभाषा बिना किसी मेहनत के सीखी जा सकती है पर अन्य भाषाओं को सीखने से जहां विभिन्न भारतीय भाषाओँ के बीच बेहतर तालमेल बनाने में मदद मिलेगी वहीं लोगों के परस्पर संवाद में भी सुधार होने की संभावनाएं भी बढ़ जायेंगीं. अपनी भाषा को दूसरे पर थोपने के स्थान पर पहले दूसरी भाषा सीखने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए जिससे सभी भाषाओँ के समुचित सम्मान और प्रसार की व्यवस्था को सही तरीके से सुधारा भी जा सके और केवल सरकारी स्तर पर उलटे सीधे फैसले लेने के स्थान पर सही दिशा में बढ़ने के बारे में सोचा जा सके.
                              पूरे देश और दुनिया में हिंदी का जितना प्रसार भारतीय सिनेमा और टीवी ने किया है उतना सरकारें मिलकर भी नहीं कर सकी हैं क्योंकि हिंदी फिल्मों में नायकों के उदय होने के साथ जिस तरह से उनके प्रति दीवानगी बढ़ी तथा बहुत सारे उन क्षेत्रों में भी उनकी लोकप्रियता पहुंची जहां तक हिंदी का पहुंचना मुश्किल था तो उसके योगदान को किसी भी तरह से कम करके नहीं आँका जा सकता है. यह वह कला और मनोरंजन का क्षेत्र है जिसने लाखों लोगों को हिंदी के शब्दों से परिचित किया और वह आज उनके काम भी आ रहा है. भाषाएँ जटिलता के स्थान पर समरसता के साथ आगे बढ़ सकती हैं पर जिस तरह से कई बार भाषाओँ को थोपने का प्रयास किया जाता है उसके समर्थन से मामले बिगड़ भी जाते हैं. आज कम्प्यूटर के युग में इस तरफ ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि सरकार और भाषायी विविधता पर काम कर रहे अन्य संगठन भी इसी तरह से अपने को आगे बढ़ाने की कोशिशें करें जिससे दबाव के स्थान पर सहयोग को प्राथमिकता दी जा सके. सुदूर क्षेत्र की दूसरी भाषा जानने वाले लोगों को नौकरियों में कुछ प्राथमिकता देकर भी भाषाओँ की विविधता का पोषण किया जा सकता है मातृभाषा और स्थानीय बोलचाल की भाषा के अतिरिक्त हर बच्चे के लिए यदि एक और भाषा के बारे में व्यवस्था की जा सके तो इस परिदृश्य को बदलने में सहायता मिल सकती है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 4 सितंबर 2016

स्वायत्त रिज़र्व बैंक

                                                          अपने तीन साल के कार्यकाल को पूरा करने के अंतिम चरण में रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुरामन राजन ने जिस तरह से केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता के बारे में स्पष्ट रूप से एक बार फिर राय दी है वह निश्चित तौर पर सरकार को कुछ हद तक विचलित कर सकती है क्योंकि देश के अंदर की राजनैतिक परिस्थितियों के चलते कोई नेता मंत्री या स्वयं सरकार की तरफ से कैसा भी बयान सामने आता रहे पर जब केंद्रीय बैंक के गवर्नर के रूप में फैसले लेने का समय होता है तो अधिकांश मामलों में सरकारें अपने राजनैतिक और व्यापारिक घरानों से संबंधों के चलते दबाव बनाने से भी नहीं चूकती हैं. निश्चित तौर पर पूरी दुनिया में चल रही अघोषित आर्थिक सुस्ती के समय २०१३ में मनमोहन सरकार ने जिस उद्देश्य के साथ राजन की नियुक्ति की थी वे उसमें पूरी तरह से सफल भी रहे हैं. आज जब वे वापस अपने शिक्षण के काम में लौट रहे हैं तो भारत में रूपये की स्थिति स्थिर कही जा सकती है और साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार में भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ोत्तरी भी उनके कार्यकाल में ही हुई है फिर भी मोदी सरकार से काम करने की शर्तें तय न हो पाने के चलते राजन ने खुद ही दूसरे कार्यकाल के लिए काफी पहले ही अनिच्छा जता कर मोदी सरकार के लिए नए गवर्नर को चुनने का काम आसान भी कर दिया था.
                              बेशक राजन ने अपने कार्यकाल में बहुत उतार चढाव देखे और उनको देश की अर्थव्यवस्था को गति में बनाये रखने के लिए कई बार सरकार से टकराव भी मोल लेना पड़ा तथा कुछ ऐसे मुद्दों पर भी अपने विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने पड़े जिनका रिज़र्व बैंक के गवर्नर के रूप में कोई सम्बन्ध भी नहीं था क्योंकि मुखर पीएम मोदी और हर बात पर सोशल मीडिया में बात करने वाली सरकार भी कई उन मुद्दों पर चुप्पी लगाए बैठी थी जिनसे देश में संभावित निवेश पर असर पड़ रहा था. यदि विवादित मुद्दों पर सरकार की तरफ से पहले ही वक्तव्य आ जाते तो राजन को उनपर बोलकर विदेशी निवेशकों को यह सन्देश नहीं देना पड़ता कि सरकार के अलावा देश की आर्थिक प्रगति पर नज़र रखने के लिए रिज़र्व बैंक पूरी तरह से काम कर रहा है और आने वाले समय में निवेशकों के हितों का पूरा ध्यान भी रखा जायेगा. बाद में जब पीएम मोदी ने इन मुद्दों पर अपनी पार्टी के लोगों को नसीहते देनी शुरू कर दीं उसके बाद से राजन ने कभी भी इन मुद्दों पर कोई वक्तव्य नहीं दिए. आने वाले समय में ऊर्जित पटेल पर इन सभी बातों के लिए बहुत दबाव रहने वाला है पर वे मुखर होने के स्थान पर केवल अपने काम पर ध्यान देने वाले व्यक्ति हैं और राजन के साथ काम करने के अनुवभव के चलते ही मोदी सरकार ने राजन की नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए ही ऐसा कदम उठाया है.
                                 देश के मज़बूत आर्थिक माहौल के लिए रिज़र्व बैंक का स्वायत्त होना बहुत आवश्यक है क्योंकि आम तौर पर राजनैतिक दलों के पास इतनी समझ और इच्छा शक्ति नहीं होती कि वे अपने स्तर से हर आर्थिक मुद्दे की गंभीरता को समझ सकें. ऐसी परिस्थिति में यदि अर्थ क्षेत्र से जुड़ा हुआ कोई विशेषज्ञ गवर्नर के पद पर होता है तो देश को चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती है. एक स्वतंत्र निर्णय लेने वाला गवर्नर सदैव ही मज़बूत आर्थिक परिदृश्य को खड़ा करने में सफल हो सकता है पर जब समितियों के माध्यम से उसके पर करतने की कोशिशें की जाने लगती हैं तो वह देश के लिए ही दुर्भाग्यपूर्ण होता है क्योंकि निर्णय लेना सामूहिक ज़िम्मेदारी बन जाता है. हमारे देश में किसी भी आशानुरूप सफलता के न मिलने पर जिस तरह से दोष देने के लिए सबसे कमज़ोर व्यक्ति को खोजने का काम शुरू कर दिया जाता है यदि गवर्नर की शक्तियों पर वैसा ही प्रतिबन्ध लगाया गया तो देश के ये लंबे समय में वह बहुत ही घातक हो सकता है. मोदी सरकार ने गवर्नर के पर कतरने की शुरुवात भी कर दी है और हो सकता है कि इन सीमित अधिकारों के साथ राजन ने खुद को सही न पाया हो जिसके चलते ही वे दूसरे कार्यकाल के लिए खुद ही दूर हो गए थे. आशा की जानी चाहिए कि सरकार ऊर्जित पटेल को भी स्वतंत्रता के साथ काम करने देगी जिससे वे देश की मौद्रिक नीति को राजनैतिक चश्में के स्थान पर आर्थिक नज़रिये से देखने की अपनी शक्ति को और भी पैना कर सकें और देशहित आवश्यक कदम उठाने के लिए खुलकर काम कर सकें.                             
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...