मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शुक्रवार, 12 जून 2020

सोशल मीडिया के स्वदेशी संस्करण

                                 आज इंटरनेट के युग में जब पढाई से लेकर मंत्रिमंडल की बैठक तक की सारी बातें केवल इंटरनेट के माध्यम से करने की कोशिशें की जा रही हैं तो उस समय आम जनता से लेकर विभिन्न सरकारी कामों तक में विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स और ऍप्लिकेशन्स का उपयोग किया जा रहा है. पिछले दिनों देश में बहुत लोकप्रिय हो रहे ज़ूम ऍप में निजता से जुड़े कुछ मामले सामने आने के बाद सरकार तक ने यह कह दिया कि इसके उपयोग से बचें। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कोरोना जैसे संकट में आखिर आम भारतीय एक दूसरे से किस तरह से सुरक्षित संवाद करे जिससे सभी के लिए एक सुरक्षित मंच उपलब्ध हो सके ? दुनिया भर में भारतीय आईटी विशेषज्ञों का जो हल्ला मचा हुआ है उससे देश को क्या कोई लाभ मिल रहा है ? एक समय भारत के अपने लिनक्स आधारित ऑपरेटिंग सिस्टम बनाने की बातें खूब हुई थीं पर उसका क्या हुआ यह आज किसी को पता नहीं है ?
                                     क्या भारतीय मेधा सिर्फ विदेशी कंपनियों में काम करने के लिए ही उपयुक्त है ? क्या कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता कि आने वाले समय में भारत के खुद के उपयोग के लिए कुछ मूलभूत प्लेटफॉर्म्स बनाये जाएँ जिससे गोपनीयता का मामला भी सामने न आये और विदेशी संस्करणों से होने वाली जो आय देश के बाहर चली जाती है उस पर भी विराम लगाया जा सके. इस बारे में सरकार कुछ सोचना ही नहीं चाहती उसके पास सिर्फ खोखले नारे ही हैं. आज जब अधिकांश कार्यालयों में सूचनाओं का आदान प्रदान ई-मेल के माध्यम से होने लगा है तब भी हर सरकारी कार्यालय या अधिकारियों के पास एनआईसी की मेल आईडी तक नहीं है और वे विभिन्न कंपनियों की मेल आईडी से काम चला रहे हैं. क्या देश को एक मज़बूत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की आवश्यकता नहीं है जिसके माध्यम से हम अपने कामों को चीन की तरह कर सकें।
                                      इस तरफ सोचने का सारा दारोमदार अब निजी क्षेत्र की कंपनियों पर ही जाता है क्योंकि मोदी सरकार हर क्षेत्र में विनिवेश की तरफ बढ़ रही है तो उस से ऐसे किसी प्रोजेक्ट पर काम करने की आशा नहीं की जा सकती है जहाँ बड़े निवेश की आवश्यकता है. आज विप्रो, टाटा, एचसीएल, टेक महिंद्रा और रिलायंस जैसी कंपनियां इस दिशा में ठोस कदम उठा सकती हैं क्योंकि इनके पास आईटी पेशेवरों की संख्या और अनुभव भी है. यहाँ एक बात और समझने की है कि जो कुछ भी बनाया जाये उसमें किसी प्रचलित प्लेटफॉर्म की नकल करने के स्थान पर उसे नए सिरे से शुरू करने के बारे में गंभीरता से सोचा जाए. देश की ज़रूरतों के अनुरूप बने इस मंच से जहाँ एक तरफ लोगों को सहायता मिलेगी वहीं देश से बाहर जाने वाले धन प्रवाह को भी रोका जा सकेगा। कम से कम इस दिशा में अब गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है क्योंकि आने वाले समय में कोई ऐसा संकट भी आ सकता है जिससे सीधे तौर पर सिर्फ इंटरनेट पर ही लड़ा जाये तो हमारे पास उपलब्ध सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स अनुपलब्ध भी हो सकते हैं.  
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बुधवार, 20 मई 2020

बसों पर राजनीति

                                                          लॉक डाउन के चलते दिन में कई कई बार बदलते नियमों के कारण एक राज्य से दूसरे राज्य में अपने घर जाने वाले मजदूरों की स्थिति पर भी किस तरह की राजनीति की जा सकती है यह यूपी सरकार और कांग्रेस के बीच छिड़ी चिट्ठी वाली जंग से आसानी से समझा जा सकता है. बड़ी संख्या में मजदूरों के यूपी वापस आने और उनको लाने में तालमेल की कमी के साथ सीमित संसाधनों के चलते ये सभी प्रदेश की विभिन्न सीमाओं पर फंसे हुए हैं और लखनऊ से सरकार के स्पष्ट आदेश न होने के चलते यूपी पुलिस इन्हें बॉर्डर पर रोकने का काम कर रही है. इस परिस्थिति में कांग्रेस की तरफ से एक हज़ार बसें इन लोगों को उनके घरों तक पहुँचाने के लिए उपलब्ध कराने की बात कही गयी जिस पर यूपी सरकार ने दो दिनों में निर्णय लिया। कायदे से इस समय एक दूसरे पर आरोप लगाने के स्थान पर यूपी सरकार को कांग्रेस की तरफ से दी गयी इस पेशकश को स्वीकार कर श्रमिकों को राहत देनी चाहिए थी पर सरकार के शीर्ष स्तर से मिले निर्देशों के चलते इस मामले को सुर्खियां बना दिया गया है.
                                एक राजनैतिक दल होने के कारण यदि कांग्रेस सरकार की इस कमज़ोर स्थिति को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश में लगी दिख रही है तो उसे ऐसा करने का अधिकार भी है पर मज़बूत बहुमत वाली योगी सरकार ने कांग्रेस को लाभ मिलने की संभावनाओं को देखते हुए इसको अनावश्यक रूप से मीडिया में कवरेज देने के लिए खोल दिया। डिजिटल इंडिया के इस कथित युग में अगर इस आपदा के समय भी योगी सरकार एक आवश्यक पत्र पर दो दिनों तक निर्णय नहीं कर पाती है तो इसे क्या कहा जाये ? कांग्रेस केवल सरकार को ऐसे प्रस्ताव ही दे सकती है जिस पर श्रमिकों के हितों को देखते हुए निर्णय सरकार को ही लेना है. जिन बसों के कागज़ ठीक हैं उनको अनुमति देकर सरकार अपने काम को आसान कर सकती थी और साथ ही जिन बसों के नंबर आदि गलत और संदिग्ध होते उस पर जवाब माँगा जा सकता था पर सरकार ने खुद ही ऐसा काम शुरू कर दिया जिसकी सफाई देने में अब मुश्किल हो रही है.
                               लॉक डाउन को को देखते हुए केंद्र की तरफ से पहले ही सभी वाहनों की फिटनेस ३० जून तक बढ़ा दिया गया है हाँ बीमे पर किसी भी तरह की छूट नहीं दी जा रही है तो यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री द्वारा बसों की फिटनेस पर सवाल उठाना कितना तर्क संगत है ? यूपी सरकार के पास लगभग दस हज़ार बसों का बेड़ा है और ऐसे निर्देश जिलाधिकारियों को भी दिए जा चुके थे कि लोकसभा चुनावों के समय की दरों पर भुगतान कर निजी क्षेत्र की बसों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है। संकट की इस घडी में यदि कोई राजनैतिक दल किसी भी स्तर पर मदद करने के लिए सामने आ रहा है तो किसी भी दल की सरकार को अविलम्ब उसे स्वीकार कर लेना चाहिए जिससे लोगों की समस्याओं को कुछ कम किया जा सके. एक राष्ट्र की खोखली बातें करने वाला दल क्या दूसरे राज्यों से अपने गृह जनपद आने वाले लोगों की घर वापसी में भी इतना संवेदनहीन हो सकता है ? एक योगी के राज्य के मुखिया होने के बाद भी आमलोगों को इस तरह से मजबूर होना पड़ रहा है तो यह राज्य की विडंबना ही है. गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है "संत हृदय नवनीत समाना" पर यहाँ वैसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है जिससे आम मजदूरों की समस्याओं को कम करने की कोशिशें पूरी नहीं हो पा रही हैं.    
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रविवार, 1 जनवरी 2017

कैशलेस "भीम" और आम लोग

                                               विमुद्रीकरण के बाद हर तरह के व्यापार और लेनदेन में नकद को लेकर आने वाली समस्या से निपटने के लिये जिस तरह से सरकार ने कदम उठाने शुरू किये वे अपने आप में देश के कैशलेश होने के इच्छुक उस बड़े हिस्से के लिए सही दिशा में कहे जा सकते हैं पर ये कदम जिस तरह से उलटी तरह से उठाये जा रहे हैं संभवतः उससे ही इनकी कार्यक्षमता पर कुप्रभाव पड़ रहा है. देश में नेट बैंकिंग और कार्ड्स के माध्यम से कैशलेश होने का क्रम बहुत पहले ही शुरू हो चुका था पर आम लोग इसमें किसी तरह की धोखाधड़ी से बचने के लिए इससे कतराते हुए ही अधिक दिखाई देने लगे जिससे देश की कैशलेस अर्थ व्यवस्था में इसके माध्यम से जो लाभ उठाये जा सकते थे वे आज भी दूर की कौड़ी ही नज़र आते हैं. आज भी जिस तरह से बैंकों के एटीएम और अन्य गोपनीय सूचनाओं के लीक होने की बातें सामने आती रहती हैं उससे आम लोगों में यह विश्वास और भी मज़बूत हो जाता है कि उनकी मेहनत की कमाई कहीं इसी तरह से धोखे से न हड़प ली जाये. हालाँकि सरकार और बैंकों की तरफ से ऑनलाइन लेनदेन को सुरक्षित करने के प्रयास लगातार किये जा रहे हैं फिर भी अभी लोगों के मन में इसकी सुरक्षा के प्रति संदेह बना ही हुआ है.
                                         अब इस मामले में सरकार की तैयारियों के बीच दावों और उनके धरातल पर सत्यापन करने के लिए दो दिन पहले खुद पीएम द्वारा जनता को समर्पित यूपीआई एप्लिकेशन भीम की बात करते हैं कि वह किस तरह से काम करने वाला है. पीएम ने जितनी आसानी से खादी ग्रामोद्योग को भुगतान कर दिया उसे देखने से हर व्यक्ति को यही लगा होगा कि वह भी यह काम इतनी ही सरलता से कर सकता है पर मेरी दो दिनों में लगातार की गयी कोशिशों के बाद मोबाइल में डाउनलोड हुआ भीम मुश्किल से काम करना शुरू कर पाया जिसमें बैंकों के बारे में जानकारी जुटाने में उसे तीस से चालीस बार खाते को खोजना पड़ा जिसके बाद एप्लीकेशन में एक यूपीआई आईडी बनाने में सफलता मिल गयी. इसके बाद इस आईडी में जोड़े गए बैंक की तरफ से मोबाइल बैंकिंग सेवा शुरू करने का ओटीपी आया जिसके बारे में यह भी सूचना थी कि यह अगले पांच दिनों में बैंक की तरफ से मुझे मिलने वाली ईमेल में यह ओटीपी डालकर मोबाइल बैंकिंग सेवा शुरू की जा सकती है तब से मैं उस ईमेल की प्रतीक्षा में हूँ जो मुझे अगले चार दिनों में कभी भी मिल सकती है. जिस एप्लिकेशन को आम लोगों के लिए इतना सरल बताया जा रहा है उसके एक्टिवेशन के लिए इतनी उबाऊ प्रक्रिया करने के स्थान पर इसके डेवलपर, रिज़र्व बैंक और एनपीसीआई (भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम) को क्या इसे सीधे आधार से जोड़ने का विकल्प भी नहीं देना चाहिए था जिससे इसके माध्यम से सरलता से भुगतान किया जा सके ? जिन लोगों के पास आज नेट बैंकिंग की सेवा नहीं है वे किस तरह से इस भीम की सेवा से लाभान्वित हो पायेंगें यह समझ से पर है इसलिए सरकार को आम लोगों की वित्तीय सुरक्षा और गोपनीयता को ध्यान में रखते हुए इसके लिए आधार के विकल्प पर भी ध्यान देना चाहिए.
                                   इतने बड़े काम को शुरु करने से पहले सरकार को क्या निजी वॉलेट कंपनियों की तरह कोई ऐसा एप्लीकेशन बनाना चाहिए जिसमें ५ या दस हज़ार की सीमा के साथ लेनदेन करने के लिए एक्टिवेशन बहुत ही आसान हो जिससे अपनी छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आम लोग भी इसका उपयोग कर पाएं. एप्लिकेशन के साथ इतनी कोशिशें करने के स्थान पर आम लोग सीधे नकद में लेनदेन पर ही अधिक भरोसा रखेंगें क्योंकि कोई भी आम व्यक्ति इतनी मेहनत करने के बाद भी जब इसका उपयोग सही तरह से नहीं कर पायेगा तो उसको कैशलेस की इस अवधारणा से दूर जाने में देर नहीं लगेगी और देश में नकदी पर निर्भरता कम करने की सरकारी कोशिशों का सही फल भी नहीं मिल पायेगा. कोई भी सेवा शुरू करने से पहले उसकी व्यापक टेस्टिंग करना भी आवश्यक है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र के विभिन्न बैंकों के यूपीआई एप्लिकेशन आज भी अच्छी तरह से काम नहीं कर रहे हैं जिससे लेनदेन के सबसे सुरक्षित इस स्वरुप को आज भी आगे नहीं बढ़ाया जा सका है. देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई का एसबीआई पे एप्लिकेशन आज भी बहुत देर में खुलता है तथा लॉगिन होने काफी समय लेता है जिससे आम लोग इतनी देर प्रतीक्षा करने की स्थिति में होंगें यह भी सोचने का विषय है.
                                  विमुद्रीकरण के चलते देश में अस्थायी रूप से मुद्रा का जो संकट बना है वह कैशलेस प्रणाली के सही तरह से काम न करने की स्थिति में और भी दबाव में आ सकता है हालाँकि अब बाजार में गतिविधियां शुरू हो चुकी हैं पर दो हज़ार और पांच सौ के नए नोटों को एक बार फिर जिस तरह से एकत्रित किया जाने लगा है वह सरकार की सभी कोशिशों को पलीता लगाने के लिए काफी है क्योंकि जो राशि बाजार में आ रही है उसमें से अधिकांश को दबाया जा रहा है जिससे भी बाजार में नकदी का यह संकट अनुमान से और भी लंबे समय तक बना रह सकता है. कर सुधारों और करों के राज्यों एवं केन्द्र के बीच बंटवारे के कारगर नियमों के साथ अब आम लोगों को कर देने के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता भी है पर जब तक इस दिशा में गंभीरता से सुधारों को नहीं अपनाया जाता है कर देने वाले लोगों की संख्या नहीं बढ़ने वाली है. देश में कर दाताओं कि स्थिति का अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि एक आंकड़े के अनुसार देश में १० लाख से ऊपर की २५ लाख से अधिक कारें हैं जबकि केवल २४ लाख लोग ही अपने को १० लाख की श्रेणी से ऊपर बताकर करों का भुगतान करते हैं ? ऐसी स्थिति में सरकार को हड़बड़ी में विमुद्रीकरण जैसे कोई कदम उठाने से पहले उनकी समग्र तैयारियों पर भी ध्यान देना ही होगा जिससे प्रगति पर बढ़ने के साथ आम लोगों के लिए होने वाली समस्याओं को क़म किया जा सके.           
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बुधवार, 27 जुलाई 2016

आधार, डीबीटी और योजनाएं

                                                                                    यूपीए-२ सरकार द्वारा देश में नागरिकों की सही पहचान करने और उन्हें अपने को साबित करने के लिए शुरू किये गए आधार कार्यक्रम ने कम समय में ही बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर ली है इसके साथ ही पात्रों को किसी भी तरह की सब्सिडी का भुगतान भी सीधे उनके खातों में करने के लिए डीबीटी योजना को भी शुरू किया गया था. इस सबमें एलपीजी सब्सिडी को प्रारम्भ में प्रायोगिक तौर पर देश के कुछ जिलों में शुरू किया गया था पर जिस उद्देश्य से इस योजना को शुरु किया गया था उस समय देश का सम्पूर्ण बैंकिंग और एलपीजी तंत्र पूरी तरह से अपने उपभोक्ताओं से जुड़ा हुआ नहीं था और कुछ नए काम के होने के चलते भी इसके अनुपालन में कमियां सामने आयीं जिन्हें दूर करने के लिए तत्कालीन सरकार ने निर्देश जारी किये और योजना की रफ़्तार को धीमा कर दिया. देखा जाये तो सरकारी योजनाओं में इस तरह की संभावनाएं टटोलने का मुख्य उद्देश्य ही भ्रष्टाचार को रोकना और सही लोगों तक आर्थिक सहायता को पहुँचाना ही था जिसका लाभ आज इसके नए स्वरुप में दिखाई भी देने लगा है और सरकार को सब्सिडी के क्षेत्र में काफी बचत भी हो रही है.
                            निश्चित तौर पर यह केंद्र सरकार की बड़ी उपलब्धि ही कही जा सकती है कि जनता के पैसा का सदुपयोग हो रहा है और जो धन बच रहा है उसके माध्यम से अब नयी योजनाओं और विकास पर ध्यान केंद्रित किये जाने कि बातें भी होने लगी हैं. बॉयोमेट्रिक सिस्टम को पीडीएस में लागू करने के बाद जिस तरह से हर पांचवे व्यक्ति के भौतिक सत्यापन में सफलता नहीं मिल पा रही है उसके बाद एक बार फिर से इस समस्या पर विचार किये जाने कि आवश्यकता है क्योंकि जब तक पात्रों को इस सुविधा का लाभ नहीं मिल पायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में सरकार की मंशा पूरी नहीं हो सकती है. जिन लोगों के बॉयोमेट्रिक सत्यापन में समस्या आती है उन्हें उनके पंजीकृत मोबाइल पर आवश्यक रूप से सन्देश भेजे जाने के लिए भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए क्योंकि गांवों में रहने वाले बुजुर्गों के लिए इस सिस्टम के काम न करने पर बहुत बड़ी समस्या भी उत्पन्न हो जाती है. आज देश में निचले स्तर तक भ्रष्टाचार का जो स्वरुप हो चुका है उस पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि पंचायती राज के सबसे निचले पायदान ग्राम सभाओं में मनरेगा को लेकर ही भ्रष्टाचार चरम पर फैला हुआ है.
                         इस तरह से घरेलू गैस से बचने वाले धन को लेकर सरकार की तरफ से जो आंकड़े पेश किये जा रहे हैं कैग ने उस पर भी भारी संदेह जारी किया है और यहाँ तक कह दिया है कि सरकार १२००० करोड़ रुपयों की बचत होने कि बात कर रही है जबकि वास्तव में यह केवल २००० करोड़ रूपये ही है और इसमें जो बचत दिखाई जा रही है वह तेल मूल्यों में कमी के कारण है न कि यह बचत डीबीटी के कारण हो रही है. अब कैग या सरकार में से कोई एक ही सही कह रहा है पर कैग को किसी आंकड़े को गलत पेश करने से कुछ भी नहीं हासिल होने वाला है जबकि सरकार इन जादुई और भ्रामक आंकड़ों के माध्यम से अपनी वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ घोषित कर सकती है तथा यही आंकड़े उसके लिए चुनावों में एक बड़े मुद्दे के रूप में भी काम कर सकते हैं. राजनीति में विरोधियों को घेरने के लिए बहुत सारे मुद्दे सदैव ही उपलब्ध रहते हैं इसलिए सरकार को एक बार फिर से डीबीटी और आधार के संयोजन में होनी वाली समस्याओं पर गंभीरता से विचार करते हुए इनके निराकरण के बारे में भी सोचना चाहिए जिससे आम गरीबों को सही तरह से बिना परेशानी के ही सम्पूर्ण लाभ दिया जा सके.
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गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

रेलवे, ट्विटर और सुगम यात्रा

                                                                        पिछले १० दिनों में दूसरी बार रेल सफर के दौरान यात्री को ट्विटर के माध्यम से मदद मिलने की घटना को बड़े बदलाव के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि जिस तरह से चलती ट्रेन के कोच में बैठे हुए यात्री को किसी भी तरह की समस्या उत्पन्न होने पर यात्रा के बीच में कोई विकल्प न होने की दशा में मज़बूरी में यात्रा को जारी रखना पड़ता है उसे देखते हुए आने वाले समय में रेल यात्रियों के लिए ट्विटर बेहतरीन साधन बनकर उभर सकता है. देश में रेलवे के व्यापक नेटवर्क को देखते हुए इस तरह की स्थायी व्यवस्था के बारे में भी सोचा जाना चाहिए जिसके चलते आम नागरिकों को कुछ सहायता मिल सके और उनकी यात्रा को और भी सुगम बनाया जा सके. इस परिवर्तन का सही लाभ उठाने के लिए अब रेलवे को इसकी मज़बूत व्यवस्था भी करनी चाहिए जिससे लोगों को आवश्यकता पड़ने पर सही सहायता मिल सके और उन लोगों के मन में भय भी उत्पन्न किया जा सके जो यात्रा के दौरान सहायता न मिल पाने की मजबूरी का दुरूपयोग भी किया करते हैं और रेलवे चाहकर भी इन मामलों में कुछ नहीं कर पाती है.
                                इस प्रक्रिया को हर नागरिक के लिए सुगम बनाने के लिए ट्विटर का एक नया और अलग खाता भी होना चाहिए जिसे हर मंडल स्तर पर सुचारू रूप से देखने और तात्कालिक प्रतिक्रिया करने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए क्योंकि भले ही शुरुवाती दौर में रेल मंत्री या मंत्रालय के ट्विटर के हैंडल पर इस तरह की सहायता मिलना आसान हो पर आने वाले समय में इसके बढ़ने पर रेल मंत्री के खाते की आवश्यक जानकारियों को आम लोगों तक पहुँचाने का मकसद भी कमज़ोर पड़ सकता है. यह अच्छा है कि रेल मंत्री के खाते के अपडेट्स को लगातार देखा जाता है और लोगों को सहायता भी मिल रही है पर इसके लिए आने वाले समय में अलग व्यवस्था भी करने के बारे में रेलवे को सोचना ही होगा. एक सहायता से जुड़े अलग खाते के सञ्चालन और मंडल स्तर पर उसे फॉलो करने से जहाँ मंडल और केंद्रीय स्तर पर शिकायत या समस्या पहुँच जाएगी वहीं ट्रेन में नियुक्त स्टाफ पर भी इस बात का दबाव बन जायेगा कि अब उन पर जनता के द्वारा नज़र रखी जा रही है तथा किसी भी समस्या पर जनता सीधे मंडल कार्यालय, रेल मंत्रालय या रेलमंत्री तक अपनी पहुँच रखती है.
                               रेल कर्मियों पर इस तरह के दबाव की आवश्यकता लम्बे समय से महसूस की जा रही थी क्योंकि अभी तक जनता के पास विकल्प न होने के कारण ही जिस तरह से वह चुप रह जाती थी अब वह भी सही शिकायतों को सही जगह तक पहुंचा सकती है. इस क्रम में रेलवे को जहाँ शीघ्र ही इस तरह के ट्विटर हैंडल को जनता के लिए शुरू करना चाहिए वहीं उसका प्रचार हर टिकट पर भी होना चाहिए फिलहाल इंटरनेट से मिलने वाले टिकटों में इसकी शुरुवात तुरंत ही की जा सकती है तथा भविष्य में छपने वाले टिकटों पर भी इसका अंकन किया जा सकता है. स्टेंसिल के रूप में रेलवे जिस तरह से अपनी सूचनाओं को हर कोच में लिखती है तो इस ट्विटर हैंडल को भी हर कोच में सूचनाओं के साथ लिखा जा सकता है जिससे किसी को भी आवश्यकता पड़ने पर इसका लाभ मिल सके. जनता के हाथ में यह एक हथियार के रूप में ही आने वाला है जिसके दुरूपयोग से भी आम जनता को बचना होगा जिससे सही लोगों की शिकायतों पर रेलवे पूरा ध्यान दे सके. आना वाला समय देश के लिए महत्वपूर्ण साबित होने वाला है उसमें यदि डिजिटल क्रांति को इस तरह से आम जनता की सुविधाओं तक पहुँचाया जाने लगे तो सारा मामला बहुत आसान भी हो सकता है.  
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मंगलवार, 18 अगस्त 2015

बीएसएनएल का भविष्य ?

                                                                   आज दूरसंचार क्षेत्र में एकीकृृत सेवाएं देने में लगी हुई देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी बीएसएनएल जिस तरह से बदहाली का शिकार हुई जा रही है उससे निपटने का कोई मार्ग वर्तमान स्थितियों में दिखाई नहीं देता है क्योंकि राजग सरकारों की यह स्पष्ट नीति रही है कि सरकार को इस तरह के काम केवल निजी क्षेत्र के लिए ही छोड़ देने चाहिए पर सम्भवतः राजग के नीति निर्माता यह भूल जाते हैं कि देश के हर क्षेत्र को सीधे तौर पर बाजार के हवाले करने के अपने ही जोखिम हुआ करते हैं और आने वाले समय में उपभोक्ताओं पर इस सबकी मार निश्चित तौर पर ही पड़ती है. देश में किस तरह से काम किया जाता है इसका उदाहरण २ जी और कोयला आवंटन मामले से ही समझा जा सकता है क्योंकि केवल राजनीति के चलते ही नीतियों में समय के अनुसार परिवर्तन न कर पाने के कारण ही आज बहुत सारे क्षेत्रों में एक तरह से अराजकता का माहौल ही बनता हुआ दिखाई दे रहा है इसका सबसे बुरा प्रभाव बीएसएनएल पर पड़ा है जिसने एक आंकड़े के अनुसार लगभग दो करोड़ ग्राहकों से पिछले वित्तीय वर्ष में हाथ धो दिया है जबकि उसके पास आज विश्व स्तरीय नेटवर्क मौजूद है.
                             कभी साल में हज़ारों करोड़ का लाभांश देने वाली कम्पनी किस तरह से दीवालिया होने के कगार पर पहुंची है इसका आंकलन आर्थिक रूप से करना आवश्यक है संभवतः पूरी दुनिया में यही एकमात्र कम्पनी है जिसके पास केंद्र सरकार से प्रतिनियुक्ति पर आये हुए आईटीएस अधिकारी सर्वोपरि हैं और यह नीति अटल सरकार के समय इस कम्पनी को बनाये जाने के समय निर्धारित की गयी थी जिसमें इन अधिकारियों के सामने बीएसएनएल और दूर संचार विभाग दोनों में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया गया था पर इन अधिकारियों ने ऐसा नहीं किया और अपने मामले को कोर्ट में खींच ले गए जिससे निगम की स्थितियां और भी बदतर होती चली गयीं. दुर्भाग्य से जिन लोगों के पास बीएसएनएल के फैसले लेने का हक़ था वे किसी भी तरह से उसके लिए उत्तरदायी नहीं थे तो इसका दुष्परिणाम आज सबके सामने है. जब किसी भी विभाग या निगम में अधिकारी कर्मचारी पूरी लगन के साथ काम करने वाले होंगें तभी उसका चल पाना संभव होता है अन्यथा आज जो दशा बीएसएनएल की हो चुकी है वह किसी भी उद्यम या निगम की हो सकती है.
                              जब ज़िले स्तर के अधिकारी ही बीएसएनएल के प्रति उत्तरदायी नहीं रह गए तो उसका स्पष्ट असर निचले स्तर तक दिखाई देना शुरू हो गया और कोई भी कर्मचारी काम करने को लेकर उतना गंभीर रह ही नहीं गया जितने की उससे अपेक्षा की जाती है. ऐसी स्थिति में अब सरकार और राजनेताओं को इस तरह की परिस्थिति से निपटने के लिए एक दीर्घावधि की कार्ययोजना बनानी ही होगी जिस पर चलते हुए इसके पुराने स्वरुप को भले ही वापस न लाया जा सके पर इसको अपनी परिचालन लागत निकालने लायक तो बनाया ही जा सके. देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों तक पहुंची इसकी सेवाएं आज डिजिटल इंडिया का बहुत बड़ा सपना साकार करने की दिशा में अच्छा काम कर सकती हैं पर उसके लिए इसकी कार्यशैली में सुधार किये जाने की आवश्यकता है. कहने के लिए हर जनपद में एक दूर संचार सलाहकार समिति भी होती है जिसका काम इस दिशा में समस्याओं पर विचार करते हुए बेहतर सेवाओं के बारे में विचार करना होता है पर इसमें स्थानीय सांसद के कहने मात्र से ही किसी कोभी सदस्य बनाया जाता है और यह समिति भी अधिकांश स्थानों पर एक दिखावे की नाकारा समिति से अधिक कुछ भी नहीं होती है. अब सरकार को इस दिशा में गंभीर परिवर्तन की तरफ बढ़ना ही होगा क्योंकि उसके डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रम निजी क्षेत्र के भरोसे लम्बे समय तक नहीं चल सकते हैं.      
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गुरुवार, 2 जुलाई 2015

डिजिटल इंडिया - आशाएं और चुनौतियाँ

                                                       देश में सूचना क्रांति के पहले कदम १९८५ में पड़ने के बाद से सरकार और जनता ने कितनी तेज़ी से अब पूरी दुनिया के साथ कदम से कदम मिलकर बढ़ना शुरू किया यह आज सभी को पता है पर भारत में आधारभूत ढांचे को खड़ा करने और उसके सही तरह से संचालित होने में आने वाली कठिनाइयों के कारण आज भी हम उस स्तर पर प्रगति नहीं कर पाये हैं जो हमारे देश की क्षमता के अनुरूप कही जा सकती हो. देश को पूरी तरह से डिजिटल करने की कोशिश में केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गयी डिजिटल इंडिया परियोजना अपने आप में बहुत कारगर हो सकती है यदि सके क्रियान्वयन में सरकारी क्षेत्र के साथ आम जनता को भी जोड़ने का काम किया जा सके. सरकार इस योजना के तहत देश में नौकरियां और रोजगार सृजित करने की बात कर रही है और देश के बड़े उद्योगपतियों ने जिस तरह से पीएम मोदी के सामने केवल अपनी पीठ थपथपाने का काम किया उससे यही लगता है कि इस योजना से देश को उतना लाभ नहीं मिलने वाला है जितना सोचा जा रहा है क्योंकि पिछले कई वित्तीय वर्षों में बड़ी कम्पनियों द्वारा किये गए निवेश को भी जिस तरह से इस योजना का हिस्सा बताया गया है वह निजी क्षेत्र और सरकार की मंशा जाहिर कर देता है.
                                               देश के शहर अपने आप ही डिजिटल युग में किसी भी तरह से पहुंचे ही जा रहे हैं और इसके साथ हमारे गांवों के लिए वही समस्या बनी रहने वाली है जो आज़ादी एक बाद से ही स्थायी भाव के रूप में मौजूद है. सार्वजनिक क्षेत्र के अतिरिक्त कोई भी निजी कम्पनी आज तक भी देश के दूर दराज़ क्या शहरों से लगे हुए गांवों में अपनी किसी भी प्रकार की सेवाएं नहीं देना चाहती है क्योंकि उसे वहां पर व्यापार की संभावनाएं कम ही नज़र आती हैं. पिछले दस वर्षों में हुई मोबाइल क्रांति की बात भी हम करें तो यह भेद स्पष्ट रूप से सामने आ जायेगा कि निजी क्षेत्र की दिलचस्पी केवल शहरी क्षेत्रों में ही अधिक रही है और वे उन स्थानों पर ही अच्छा निवेश और बेहतर तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं जहाँ से उन्हें बहुत अच्छी आय दिखाई देती है. यदि गौर से देखा जाये तो देश के बड़े शहरों के आसपास की आबादी वाले गांव आज भी सरकारी क्षेत्र पर पूरी तरह से निर्भर हैं और निजी क्षेत्र वहां से पूरी तरह गायब ही है. डिजिटल इंडिया में सरकार के पास ऐसा कोई भी साधन नहीं होगा जिसके अंतर्गत यह कहा जा सके कि वह निजी क्षेत्र को भी देश के गांवों तक पहुँचने के लिए मदद करने के लिए बाध्य कर सकती है जिससे शहर और गांवों के बीच की खाई पूरी तरह से बढ़ने की भी पूरी संभावनाएं हैं.
                                           देश की साक्षरता दर अभी भी ७५% तक ही पहुँच पायी है और इसमें से भी देश के अधिकांश लोगों के पास अभी भी कम्प्यूटर और मोबाइल नहीं है तो सरकारी डिजिटल सेवाओं के लिए उनके पास एक बार फिर से उन्हीं दफ्तरों के चक्कर काटने के अतिरिक्त कोई विकल्प शेष नहीं रहने वाला है. यदि कोई स्पष्ट रूप से इन बातों पर विचार करे तो आम लोगों के लिए डिजिटल इंडिया अगले डेढ़ दशक तक सपना ही रहने वाला है हाँ यदि सरकार चाहे तो एक केंद्रीय एजेंसी के माध्यम से निजी क्षेत्र के साथ मिलकर हर गाँव में एक सौर ऊर्जा संचालित डिजिटल इंडिया केंद्र की ग्रामसभा में स्थापना कर लोगों को आसानी से यह सब उपलब्ध कर सकती है. देश भर में बिजली की उपलब्धता के कारण किसी भी योजना की सफलता पहले ही संदिग्ध हो जाती है जिसमें ऊर्जा की आवश्यकता है अब इसे निपटने के लिए भी राष्ट्रीय सौर मिशन की परिकल्पना पर तेज़ी से आगे बढ़ने के बारे में सोचने की आवश्यकता भी है. बेशक डिजिटल इंडिया को बहुत अच्छे तरह से लांच किया गया है पर इसमें किसी भी नयी बात का समावेश नहीं किया गया है क्योंकि ये सारी योजनाएं पहले भी अलग-अलग नामों से देश में संचालित की जा रही हैं पर पीएम के इसमें इतनी दिलचस्पी दिखाने के बाद क्या यह अपनी गति को बढ़ा पायेगी या यह भी स्वच्छ भारत अभियान और योग दिवस जैसा एक बड़ा शो ही बनकर रह जाने वाला है ?            

मंगलवार, 9 जून 2015

डिजिटल इंडिया नया स्वरुप

                                        देश में फ्री में मिलने वाली चीजों के लिए भारतीयों की दीवानगी किस हद तक है यह राजनीति में भी दिखाई देता है इस मामले में सबसे ताज़ा उदाहरण युवाओं में तेज़ी से बढ़ते हुए फ्री वाईफाई का भी है जो पिछली बार दिल्ली विधान सभा चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बनकर भी उभरा और माना जाता है कि इसने भी आप की सरकार बनवाने में बड़ी भूमिका निभायी थी. यदि राजनीति से इतर देखा जाये तो पिछली संप्रग सरकार ने भी कुछ इसी तरह एक प्रयासों के साथ पूरे देश को तीव्र गति के ब्रॉडबैंड से जोड़ने के लिए भारत ब्रॉडबैंड सेवा के बारे में काम करना शुरू किया था जिसे आज राजग सरकार भी डिजिटल इंडिया के नाम से पूरी तेज़ी के साथ आगे बढ़ाने में लगी हुई है. सरकारी स्तर पर जहाँ बहुत सारी औपचारिकताएं पूरी करने में लम्बा समय लगता है और महत्वपूर्ण परियोजनाएं अपनी समय सीमा में पूरी नहीं हो पाती हैं वहीं निजी क्षेत्र में इस तरह से सीमित संसाधनों के साथ किये जाने वाले प्रयास कम समय में ही शुरू हो जाते हैं और यदि इसमें निर्णय कुछ लोगों को ही लेना हो तो बात बहुत जल्दी ही बन सकती है.
                                      एमपी के साथ युवाओं ने आईएम फ्री वाईफाई सेवा को शुरू करने का सपना २०१४ में देखा था और आज शहर के दो महत्वपूर्ण स्थानों पर उनके द्वारा इस सेवा को लगभग सात हज़ार लोगों को उपलब्ध कराने की बात कही जा रही है जो कि आने वाले समय में शहर के लगभग हर महत्वपूर्ण स्थान पर इस सेवा को उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दे रहे हैं. आने वाले समय में उनकी यह परियोजना लगभग साठ हज़ार लोगों के लिए प्रतिदिन वाईफाई उपलब्ध कराने का काम करने वाली है. अभी उनकी तरफ से जो ढांचा बनाया गया है उसमें एक स्थान पर एक साथ लगभग पचास लोगों को १ एमपीबीएस की स्पीड दिए जाने की बात कही जा रही है तथा जिस योजनाबद्ध तरीके से इस सेवा के प्रायोजक आगे बढ़ने में लगे हुए हैं उससे आने वाले समय में उनको स्थानीय स्तर पर प्रायोजक भी मिलने लगे हैं जिससे इस सेवा को लगातार फ्री में उपलब्ध कराने की उनकी योजना तेज़ी से आगे भी बढ़ सकती है क्योंकि जब इसका वित्तीय प्रबंधन सही तरह से होने लगेगा तो आने वाले समय में यह आर्थिक रूप से मजबूत होकर अपने आप चलने की स्थिति में भी आ जाएगी.
                                 इस तरह के प्रयोगों के साथ क्या सरकार कोई कदम भी उठा सकती हैं जिससे उस पर संसाधनों का बोझ कम पड़े और जनता के लिए इस तरह की सुविधाओं को आसानी से उपलब्ध कराया जा सके ? यदि सरकार अपने स्तर से इस तरह की परियोजनाओं को विभिन्न शहरों में लागू करने के लिए शुरुवाती तैयारी में लगने वाले उपकरणों और आवश्यक धन की उपलब्धता युवाओं को कराने की योजना बना सके तो आने वाले समय में एक तरफ जहाँ देश में डिजिटल सेवाओं को सुधारा जा सकता है वहीं निजी क्षेत्र द्वारा काम सँभालने से स्थानीय स्तर पर रोज़गार को भी बढ़ावा मिल सकता है. बड़े सपने देखने वाले और तकनीकी रूप से शिक्षित युवाओं के लिए अपने ही शहरों में इसके माध्यम से एक नया रोज़गार सृजन करने की दिशा में काम किया जा सकता है सरकार अपने संसाधनों से इन लोगों को बेहतर नेट कनेक्टिविटी शुरुवात में रियायती दरों पर उपलब्ध करा सकती है या इसके लिए साझा रूप से लाभ में बंटवारे पर भी विचार किया जा सकता है जिससे देश के सार्वजनिक उपक्रम बीएसएनएल और बीबीएनएल को भी अधिक सक्रिय किया जा सकता है. निश्चित है कि लाभ का सौदा होने के चलते इसमें निजी क्षेत्र की कंपनियां भी आगे आना चाहेंगीं जिससे निपटने के लिए सरकार को अभी से सकारात्मक परिवर्तन के बारे में विचार करना चाहिए.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...