मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 18 August 2015

बीएसएनएल का भविष्य ?

                                                                   आज दूरसंचार क्षेत्र में एकीकृृत सेवाएं देने में लगी हुई देश की सबसे बड़ी सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी बीएसएनएल जिस तरह से बदहाली का शिकार हुई जा रही है उससे निपटने का कोई मार्ग वर्तमान स्थितियों में दिखाई नहीं देता है क्योंकि राजग सरकारों की यह स्पष्ट नीति रही है कि सरकार को इस तरह के काम केवल निजी क्षेत्र के लिए ही छोड़ देने चाहिए पर सम्भवतः राजग के नीति निर्माता यह भूल जाते हैं कि देश के हर क्षेत्र को सीधे तौर पर बाजार के हवाले करने के अपने ही जोखिम हुआ करते हैं और आने वाले समय में उपभोक्ताओं पर इस सबकी मार निश्चित तौर पर ही पड़ती है. देश में किस तरह से काम किया जाता है इसका उदाहरण २ जी और कोयला आवंटन मामले से ही समझा जा सकता है क्योंकि केवल राजनीति के चलते ही नीतियों में समय के अनुसार परिवर्तन न कर पाने के कारण ही आज बहुत सारे क्षेत्रों में एक तरह से अराजकता का माहौल ही बनता हुआ दिखाई दे रहा है इसका सबसे बुरा प्रभाव बीएसएनएल पर पड़ा है जिसने एक आंकड़े के अनुसार लगभग दो करोड़ ग्राहकों से पिछले वित्तीय वर्ष में हाथ धो दिया है जबकि उसके पास आज विश्व स्तरीय नेटवर्क मौजूद है.
                             कभी साल में हज़ारों करोड़ का लाभांश देने वाली कम्पनी किस तरह से दीवालिया होने के कगार पर पहुंची है इसका आंकलन आर्थिक रूप से करना आवश्यक है संभवतः पूरी दुनिया में यही एकमात्र कम्पनी है जिसके पास केंद्र सरकार से प्रतिनियुक्ति पर आये हुए आईटीएस अधिकारी सर्वोपरि हैं और यह नीति अटल सरकार के समय इस कम्पनी को बनाये जाने के समय निर्धारित की गयी थी जिसमें इन अधिकारियों के सामने बीएसएनएल और दूर संचार विभाग दोनों में से किसी एक को चुनने का विकल्प दिया गया था पर इन अधिकारियों ने ऐसा नहीं किया और अपने मामले को कोर्ट में खींच ले गए जिससे निगम की स्थितियां और भी बदतर होती चली गयीं. दुर्भाग्य से जिन लोगों के पास बीएसएनएल के फैसले लेने का हक़ था वे किसी भी तरह से उसके लिए उत्तरदायी नहीं थे तो इसका दुष्परिणाम आज सबके सामने है. जब किसी भी विभाग या निगम में अधिकारी कर्मचारी पूरी लगन के साथ काम करने वाले होंगें तभी उसका चल पाना संभव होता है अन्यथा आज जो दशा बीएसएनएल की हो चुकी है वह किसी भी उद्यम या निगम की हो सकती है.
                              जब ज़िले स्तर के अधिकारी ही बीएसएनएल के प्रति उत्तरदायी नहीं रह गए तो उसका स्पष्ट असर निचले स्तर तक दिखाई देना शुरू हो गया और कोई भी कर्मचारी काम करने को लेकर उतना गंभीर रह ही नहीं गया जितने की उससे अपेक्षा की जाती है. ऐसी स्थिति में अब सरकार और राजनेताओं को इस तरह की परिस्थिति से निपटने के लिए एक दीर्घावधि की कार्ययोजना बनानी ही होगी जिस पर चलते हुए इसके पुराने स्वरुप को भले ही वापस न लाया जा सके पर इसको अपनी परिचालन लागत निकालने लायक तो बनाया ही जा सके. देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों तक पहुंची इसकी सेवाएं आज डिजिटल इंडिया का बहुत बड़ा सपना साकार करने की दिशा में अच्छा काम कर सकती हैं पर उसके लिए इसकी कार्यशैली में सुधार किये जाने की आवश्यकता है. कहने के लिए हर जनपद में एक दूर संचार सलाहकार समिति भी होती है जिसका काम इस दिशा में समस्याओं पर विचार करते हुए बेहतर सेवाओं के बारे में विचार करना होता है पर इसमें स्थानीय सांसद के कहने मात्र से ही किसी कोभी सदस्य बनाया जाता है और यह समिति भी अधिकांश स्थानों पर एक दिखावे की नाकारा समिति से अधिक कुछ भी नहीं होती है. अब सरकार को इस दिशा में गंभीर परिवर्तन की तरफ बढ़ना ही होगा क्योंकि उसके डिजिटल इंडिया जैसे कार्यक्रम निजी क्षेत्र के भरोसे लम्बे समय तक नहीं चल सकते हैं.      
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