मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सुधार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सुधार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 20 मई 2020

बसों पर राजनीति

                                                          लॉक डाउन के चलते दिन में कई कई बार बदलते नियमों के कारण एक राज्य से दूसरे राज्य में अपने घर जाने वाले मजदूरों की स्थिति पर भी किस तरह की राजनीति की जा सकती है यह यूपी सरकार और कांग्रेस के बीच छिड़ी चिट्ठी वाली जंग से आसानी से समझा जा सकता है. बड़ी संख्या में मजदूरों के यूपी वापस आने और उनको लाने में तालमेल की कमी के साथ सीमित संसाधनों के चलते ये सभी प्रदेश की विभिन्न सीमाओं पर फंसे हुए हैं और लखनऊ से सरकार के स्पष्ट आदेश न होने के चलते यूपी पुलिस इन्हें बॉर्डर पर रोकने का काम कर रही है. इस परिस्थिति में कांग्रेस की तरफ से एक हज़ार बसें इन लोगों को उनके घरों तक पहुँचाने के लिए उपलब्ध कराने की बात कही गयी जिस पर यूपी सरकार ने दो दिनों में निर्णय लिया। कायदे से इस समय एक दूसरे पर आरोप लगाने के स्थान पर यूपी सरकार को कांग्रेस की तरफ से दी गयी इस पेशकश को स्वीकार कर श्रमिकों को राहत देनी चाहिए थी पर सरकार के शीर्ष स्तर से मिले निर्देशों के चलते इस मामले को सुर्खियां बना दिया गया है.
                                एक राजनैतिक दल होने के कारण यदि कांग्रेस सरकार की इस कमज़ोर स्थिति को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश में लगी दिख रही है तो उसे ऐसा करने का अधिकार भी है पर मज़बूत बहुमत वाली योगी सरकार ने कांग्रेस को लाभ मिलने की संभावनाओं को देखते हुए इसको अनावश्यक रूप से मीडिया में कवरेज देने के लिए खोल दिया। डिजिटल इंडिया के इस कथित युग में अगर इस आपदा के समय भी योगी सरकार एक आवश्यक पत्र पर दो दिनों तक निर्णय नहीं कर पाती है तो इसे क्या कहा जाये ? कांग्रेस केवल सरकार को ऐसे प्रस्ताव ही दे सकती है जिस पर श्रमिकों के हितों को देखते हुए निर्णय सरकार को ही लेना है. जिन बसों के कागज़ ठीक हैं उनको अनुमति देकर सरकार अपने काम को आसान कर सकती थी और साथ ही जिन बसों के नंबर आदि गलत और संदिग्ध होते उस पर जवाब माँगा जा सकता था पर सरकार ने खुद ही ऐसा काम शुरू कर दिया जिसकी सफाई देने में अब मुश्किल हो रही है.
                               लॉक डाउन को को देखते हुए केंद्र की तरफ से पहले ही सभी वाहनों की फिटनेस ३० जून तक बढ़ा दिया गया है हाँ बीमे पर किसी भी तरह की छूट नहीं दी जा रही है तो यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री द्वारा बसों की फिटनेस पर सवाल उठाना कितना तर्क संगत है ? यूपी सरकार के पास लगभग दस हज़ार बसों का बेड़ा है और ऐसे निर्देश जिलाधिकारियों को भी दिए जा चुके थे कि लोकसभा चुनावों के समय की दरों पर भुगतान कर निजी क्षेत्र की बसों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है। संकट की इस घडी में यदि कोई राजनैतिक दल किसी भी स्तर पर मदद करने के लिए सामने आ रहा है तो किसी भी दल की सरकार को अविलम्ब उसे स्वीकार कर लेना चाहिए जिससे लोगों की समस्याओं को कुछ कम किया जा सके. एक राष्ट्र की खोखली बातें करने वाला दल क्या दूसरे राज्यों से अपने गृह जनपद आने वाले लोगों की घर वापसी में भी इतना संवेदनहीन हो सकता है ? एक योगी के राज्य के मुखिया होने के बाद भी आमलोगों को इस तरह से मजबूर होना पड़ रहा है तो यह राज्य की विडंबना ही है. गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है "संत हृदय नवनीत समाना" पर यहाँ वैसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है जिससे आम मजदूरों की समस्याओं को कम करने की कोशिशें पूरी नहीं हो पा रही हैं.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 25 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1

                                          देश में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों में जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के संयुक्त नेतृत्व में भाजपा ने अपनी सफलता के नए आयाम स्थापित किये हैं उनको देखते हुए आने वाले समय में भाजपा की रणनीति का ही पता चलता है जिसमें उसने आखिल भारतीय स्तर पर उसका मुक़ाबला करने की स्थिति में आ सकने वाली पार्टी कांग्रेस को परिणामों के अनुसार बहुत कमज़ोर स्थिति में पहुंचा दिया है. इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कांग्रेस को गंभीर आत्ममंथन करने और कमियों को वास्तव में खोजने पर ध्यान देना ही होगा वर्ना पहले से कमज़ोर हुई कांग्रेस के लिए भाजपा के नेता-द्वय और भी बड़े संकट उत्पन्न करने से नहीं चूकने वाले हैं. यह बात सभी जानते हैं कि आखिर भारतीय स्तर पर केवल कांग्रेस के पास ही किसी न किसी स्तर पर संगठन और कार्यकर्त्ता मौजूद हैं जो एक सुसंगठित भाजपा के सामने कहीं ठहरते तो नहीं हैं फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वे एक विकल्प भी साबित हो सकते हैं. परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से कांग्रेस ने अपने संघर्ष करने की इच्छा को ही समाप्त कर रखा है उसमें उसकी और भी दुर्दशा होने से वह नहीं बच सकती है. 
                                मोदी-शाह की जोड़ी इस बात को अच्छी तरह समझती है कि आने वाले समय में यदि भाजपा के लिए कोई चुनौती बन सकता है तो उसमें केवल कांग्रेस का ही नाम है इसलिए वे प्रतीकात्मक तौर पर सधी हुई रणनीति के चलते कांग्रेस का मनोबल तोड़ने का काम करने में लगे हुए हैं जिसका लाभ उन्हें मिलने भी लगा है. इस चुनाव में गंभीरता से देखा जाये तो भाजपा ने अपना पूरा ध्यान कांग्रेस के उन बड़े नेताओं की सीटों पर लगाया जो भविष्य में उनके लिए चुनौती बन सकते हैं इस कड़ी में राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, दीपेंदर हुडा, सुष्मिता देव जैसे उन नामों पर अधिक ध्यान दिया जिनको हराने से कांग्रेस के मनोबल को तोडा जा सकता था और जो युवा होने के साथ संसद और सड़क पर अपनी बातों का प्रभाव दूसरों पर डालने में सक्षम भी दिखाई देते हैं. इस चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी ने कांग्रेस की इस मज़बूती पर सुनियोजित तरीके से प्रहार किया जिसका परिणाम सामने दिखाई दे रहा है. जातीय समीकरणों को साधते हुए जिस तरह से इन स्थानों पर ज़मीनी कार्यकर्ताओं को मज़बूती दी गयी उसके जवाब में उन्होंने अपने वोटों को परिणाम में बदलने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी।
           यदि कांग्रेस को आने वाले समय में अपनी बची हुई राजनैतिक ज़मीन को बचाये रखना है तो उसे पूरे देश में आगामी विधानसभाओं के कार्यकालों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न राज्यों में अपने संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही होगा क्योंकि जनता के मुद्दों पर बिना संघर्ष किये राजनीति करने वाले नेताओं के दिन अब समाप्त होने को हैं. इस संकट से बचने के लिए कांग्रेस को एक बार फिर से सदैव हमलावर रहने के स्थान पर मुद्दों पर आधारित राजनीति के अनुसार काम करने की नीति अपनाने होगी। कांग्रेस नेतृत्व को विभिन्न राज्यों में अपने दिखावे के लिए बनाये गए पार्टी अध्यक्षों से अगले एक महीने में ही पीछा छुड़ाना होगा जिससे नए नेतृत्व के लिए रास्ते खोले जा सकें।  जनता के मुद्दों से जुड़ने और विभिन्न स्थानों पर सड़कों पर संघर्ष करने के बाद ही अब कांग्रेस की स्वीकार्यता जनता में बन सकती है. पार्टी को सबसे पहले यूपी बिहार और बंगाल पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि इन तीन महतवपूर्ण राज्यों में उसके पास कोई संगठन और मज़बूत नेता नहीं बचा है जो हर बात में बिना केंद्रीय नेतृत्व की तरफ देखे अपने स्तर से विभिन्न मुद्दों पर संघर्ष कर सके. लगभग १/३ लोकसभा सीटों पर अप्रासंगिक होकर कांग्रेस कभी भी भाजपा का सामना नहीं कर पायेगी क्योंकि इन राज्यों से ही भाजपा अपने को सत्ता के निकट पहुँचाने का काम करती हुई दिखाई देती है. क्रमशः ......                      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 29 अप्रैल 2019

दिखावे की राजनीति

                                                        देश में जिस तरह से आम चुनावों या विधानसभाओं के चुनावों में विभिन्न दलों के प्रत्याशियों के पक्ष में सम्बंधित दलों के स्टार प्रचारकों की तरफ से रोड शो करने माहौल बनाये जाने का काम किया जाता है वह निश्चित रूप से उनका संवैधानिक अधिकार है पर पहले बड़े नेताओं की छुटपुट होने वाली बड़ी रैलियों के अलावा प्रत्याशी स्थानीय स्तर पर अपने प्रयासों से ही शांत वोटर्स को प्रभावित करने का काम किया करते थे. इधर कुछ चुनावों से रोड शो जैसा दिखावा सामने आने से इनकी चपेट में आने वाले क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन प्रभावित होने लगा है जिससे सभी राजनैतिक दलों के साथ चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन को भी इस बारे में विचार करने का समय आ गया है कि चुनाव के नाम पर आम नागरिकों को किसी भी तरह की अनावश्यक परेशानी का सामने न करना पड़े. इस बारे में केंद्रीय चुनाव आयोग को ही कुछ ठोस कदम उठाने के बारे में सोचना शुरू करना होगा क्योंकि अपने माहौल बनाने के भ्रम के चलते कोई भी राजनैतिक दल इसको रोकने की बात से सहमत नहीं होगा।
                            देश के उच्च सुरक्षा प्राप्त नेताओं के इस तरह से रोड शो करने से जहाँ सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ जाती है वहीं खुद इन बड़े नेताओं की सुरक्षा में गंभीर चूक हो जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है. इन नेताओं की चुनावी सभाओं में आम जनता का जो धन पानी की तरह बहाया जाता है वह संगठित रूप से किसी बड़े प्रोजेक्ट में डालकर उसकी गति बढ़ाने के काम भी आ सकता है पर देश के राजनैतिक दीवालियेपन के कारण इस दिशा में कोई सोचना भी नहीं चाहता है। यहाँ पर यह बात भी सामने आ सकती है कि देश के संविधान ने हर चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को अपने हिसाब से प्रचार करने की छूट दे रखी है पर साथ उसी संविधान ने देश के आम नागरिकों को भी अपनी स्वतंत्रता के साथ जीने की आज़ादी भी दे रखी है. नेताओं की इस तरह की दिखावे वाली राजनीति के चलते अब यह कौन तय करेगा कि यहाँ पर नेताओं और आम जनता के अधिकारों की रक्षा किस तरह से की जा सकती है?
                          इस बारे में सबसे सही यही रहेगा कि सभी दल मिलकर इस बारे में सोचें क्योंकि कई बार नेताओं के इस तरह से प्रचार करने के समय आम यातायात न चाहते हुए भी बाधित हो जाता है जिससे आवश्यक कार्य से आने जाने आम लोगों के साथ अति आवश्यक कार्यों में लगे हुए पुलिस, प्रशासन, फायर और एम्बुलेंस के लिए बहुत बड़ी समस्या खडी हो जाती है. क्या कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता है कि जिसमें नेताओं को समुचित रूप से अपने प्रचार को करने की छूट भी मिल जाये और आमलोगों को किसी भी परेशानी का सामना न करना पड़े ? क्या रोड शो को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए या फिर इसमें शामिल वाहनों और लोगों की संख्या को उसके मार्ग के अनुरूप सीमित रखने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे नेताओं को भी कानून के अनुरूप कार्य करने की आदत पड़ सके. इस बात को उन लोगों के बारे में सोचते हुए भी आगे बढ़ाना चाहिए जिन पर इस तरह के दिखावे का सबसे ज़्यादा असर पड़ता है क्योंकि जब तक पीड़ितों के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा जायेगा तब तक इसका कोई सही हल नहीं निकाला जा सकेगा।      

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

औद्योगिक विकास की चुनौतियाँ

                                               छत्तीसगढ़ की नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार ने चुनाव में किये गए अपने वायदे को पूरा करते हुए बस्तर संभाग में लगने वाले टाटा स्टील प्लांट को आवंटित की गयी १७०० एकड़ जमीन कम्पनी से वापस लेकर किसानों को वापस करने के लिए आदेश जारी कर दिया है जिसके बाद स्थानीय किसानों में तो हर्ष का माहौल है पर इससे राज्य में औद्योगिक विकास को बड़ा झटका लगने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. यह भी सही है कि इस मामले में टाटा समूह द्वारा भूमि आवंटन के नियमों के अनुरूप प्लांट लगाने का काम आगे नहीं बढ़ाया गया जिससे स्थानीय लोगों में रोष भी था जिसे समझते हुए कांग्रेस ने वहां पर इसे एक मुद्दा बना लिया और जनता में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए आवंटन को रद्द भी कर दिया है. इस मामले में कहीं न कहीं कुछ ऐसी कमी अवश्य ही रही होगी जिससे टाटा जैसा समूह भी अपनी कही गयी बातों को पूरा नहीं पाया।
                                    भूपेश बघेल सरकार ने किसानों की मांग और समस्या को देखते हुए अपने वायदे को पूरा किया उसे गलत नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से यह पूरा मामला बिगड़ा अब उस पर  विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि खनिज सम्पदा से भरपूर राज्य से पूरे देश और दुनिया के औद्यौगिक समूहों में यह सन्देश भी नहीं जाना चाहिए कि यह सरकार पूरी तरह से उद्योगों की विरोधी है ? टाटा समूह के सामने आखिर वे कौन सी परिथितियाँ उत्पन्न हुईं जिसके चलते इस प्लांट का काम आगे नहीं बढ़ सका भूपेश सरकार को इस बारे में भी गंभीर विचार कर नीतियों के निर्धारण में उद्योगों का भी ख्याल रखना होगा जिससे आने वाले समय में राज्य के औद्यौगिक माहौल को सुधारा जा सके. रमन सरकार की तरफ से आखिर किन स्तरों पर क्या चूक हुई जिससे यह प्लांट मूर्त रूप नहीं ले सका और सरकार के पास क्या विकल्प थे जिसके चलते वह नियमों में सुधार कर टाटा समूह और किसानों के बीच समन्वय स्थापित कर सकती थी ?
                                  बंगाल के बाद टाटा को संभवतः दूसरी बार इस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा जब वह अपनी योजना को मूर्त रूप देने में खुद को असमर्थ पा रहा होगा ? आज टाटा समूह ही नहीं बल्कि सभी औद्यौगिक समूहों के साथ केंद्र तथा राज्य सरकारों को बेहतर समन्वय करने की आवश्यकता है जिससे आने वाले समय में कोई भी परियोजना इस तरह से बीच में न लटक जाये। चिंता की बात यह भी है कि औद्यौगिक माहौल सुधारने की बातें करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में भी इस समस्या का सही हल नहीं खोजा जा सका ? यदि समय रहते केंद्र सरकार का दखल होता या रमन सरकार खुद ही केंद्र की सहायता मांगती तो संभवतः किसानों के आंदोलन से टाटा समूह को दिक्कत न होती और मामला इतना बिगड़ने भी नहीं पाता। बात यहाँ पर किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए समग्र औद्यौगिक विकास की संभावनाएं बढाने की है जिसमें रमन सरकार पूरी तरह से चूक गयी थी पर मामले को अतिवादी होकर एकतरफा निपटने से भूपेश सरकार भी राज्य और देश का भला नहीं कर पायेगी। इसलिए राजनैतिक कारणों को दूर रखते हुए अब राज्य सरकार को नीतियों की कमियों पर ध्यान देकर उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

यूपी और कांग्रेस

                                                      दिसंबर २०१८ के विधानसभा चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में वापसी हुई है वह निश्चित रूप से देश के लोकतंत्र और खुद कांग्रेस के लिए भी किसी हद तक सही कही जा सकती है. देश में मोदी का युग शुरू होने के बाद खुद पीएम मोदी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ राज्य व तहसील स्तर के नेताओं की तरफ से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया जाने लगा था वह यथार्थ से बहुत परे था फिर भी भाजपा अपने वोटर्स को येह समझाने में कहीं न कहीं सफल होती लग रही थी कि अब देश को कांग्रेस मुक्त करने का समय आ गया है. यह हुंकार भरते समय पीएम मोदी और भाजपा ने जो सबसे बड़ी गलती की आज हिंदी बेल्ट में उसका नुकसान होने का वह भी बड़ा कारण है क्योंकि देश की जनता को राजनैतिक व्यवस्था से इतना अधिक अंतर् यहीं पड़ता जितना उसकी समस्याएं दूर न होने से पड़ता है. भाजपा कांग्रेस पर हमलावर होने के चक्कर में अधिकांश बार जनता की उस नब्ज़ को थामने में विफल सी लगी जिसके लिए उसे कांग्रेस पर प्राथमिकता दी गयी थी.
                    कांग्रेस के लिए अब यह कुछ बढ़त वाली स्थिति हो गयी है क्योंकि केंद्र का रास्ता यूपी से होकर ही जाता है. २००९ में कांग्रेस ने यूपी में जिस तरह से २० सांसदों के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार किया था तो इस बार उसके लिए यही चुनौती एक बार फिर से सामने आने वाली है. यूपी में सपा-बसपा की तरफ से अभी तक उसकी जिस तरह से अनदेखी की जा रही थी अब वह संभव नहीं होगी क्योंकि तीन राज्यों में सरकार बनाने के साथ ही कांग्रेस आने वाले समय में लोकसभा और राज्यसभा में अपनी वर्तमान स्थिति को सुधारने की स्थिति में पहुँच चुकी है. सपा बसपा के अपने मंसूबे हैं और यह भी संभव है कि वे आज भी अपने गठबंधन में कांग्रेस के लिए सम्म्मानजनक सीटें छोड़ने के लिए राज़ी न हों पर भाजपा से नाराज़ वोटर्स को कांग्रेस की तरफ होने का रुझान करने के लिए काफी है कि अब कांग्रेस पहले की तरह किसी भी समझौते पर नहीं पहुँचने वाली है. कांग्रेस को अपने दीर्घकालिक हितों के लिए अब यूपी में वही नीति अपनानी होगी जो सपा बसपा ने राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ में अपनायी थी. कांग्रेस को सपा के लिए कुछ सीटें छोड़ने की अपनी परंपरा को चालू रखते हुए अन्य सभी सीटों पर मज़बूत दावेदारी करनी ही होगी तभी वह राष्ट्रीय परिदृश्य में अपने प्रदर्शन में सुधार करने की स्थिति में आ सकेगी.
                         कम सीटों पर चुनाव लड़ने की स्थिति में जीतने का प्रतिशत कितना भी अच्छा होने अधिकतम सीटें और वोट प्रतिशत को सुधारना मुश्किल होगा जो पार्टी की दीर्घकालिक नीतियों के लिए सही नहीं होगा. आज प्रदेश में ऐसे वोटर्स की संख्या बहुत है जिन्होंने २०१४ में भाजपा का वोट दिया था पर यूपी में किसी गठबंधन के सामने आने पर वह वोट कांग्रेस को तो मिल जायेगा पर सपा बसपा में वह किसी भी परिस्थिति में जाने वाला नहीं है. इसलिए यूपी की ज़मीनी हकीकत को समझते हुए कांग्रेस के लिए यह आवश्यक होगा कि वह भाजपा से विभिन्न मुद्दों पर नाराज़ वोटर्स के लिए हर सीट पर खुद को एक मज़बूत विकल्प के रूप में रखे. सपा बसपा की संभावनाएं केवल यूपी में ही हैं और आने वाले समय में कांग्रेस यदि इनके पीछे खड़े होना चाहती है तो २०२४ तक काम चुनावों में उसके लिए सीटें बढ़ने की संभावनाएं स्वतः ही समाप्त हो जाएँगी। अब यह राहुल गाँधी और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर ही निर्भर करेगा कि वे किस तरह से आगे बढ़ना चाहते हैं क्योंकि यूपी में अकेले लड़कर २०१९ में जीतने वाले सांसदों की संख्या भले ही कम हो पर इससे पार्टी को भविष्य के लिए प्रदेश में अपना संगठन फिर से खड़ा करने में बहुत मदद मिल सकती है।         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

२०१८ के सन्देश

                                  पांच राज्यों में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में जिस तरह से २०१४ से मूर्छा में चल रही कांग्रेस को मतदाताओं द्वारा संजीवनी दी गयी है उससे भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती का ही पता चलता है. जीवंत लोकतंत्र की यही विशेषता होती है कि वह समय आने पर अपने लिए उचित अनुचित का चयन करने में अपनी भूमिका का सही ढंग से निर्वहन करने में कभी नहीं चूकता है. निश्चित तौर पर इन राज्यों से भाजपा के लिए कोई अच्छी खबर पहले भी नहीं आ रही थी पर जिस तरह से भाजपा ने कांग्रेस और राहुलगांधी की सोशल मीडिया पर अपने सोशल मीडिया टीम के दुष्प्रचार से एक नकारात्मक छवि बना दी थी कहीं न कहीं उसके कार्यकर्ताओं के दिल में भी यह बात घर कर गई कि राहुल गाँधी किसी भी परिस्थिति में नरेंद्र मोदी का किसी भी स्तर पर मुक़ाबला नहीं कर सकते हैं जिससे कार्यकर्ताओं की मज़बूत टीम और संघ का ज़मीनी मज़बूत समर्थन होने के बाद भी भाजपा को इन राज्यों में जनता की तरफ से एक सबक दिया गया है जो कि लोकतंत्र का एक हिस्सा ही है. भाजपा की तरफ से आत्म मुग्धता की जो स्थिति २०१४ से चल रही थी उससे बाहर निकलने के लिए पार्टी शाह या मोदी की तरफ से कोई प्रयास भी नहीं किया गया जबकि मोदी-शाह के गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस ने किस तरह से भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं और रुझानों में एक बार वह भाजपा से आगे निकलती हुई भी दिखाई दे गयी थी ? उस समय जनता के मूड और धरातल की वास्तविकता को यदि भाजपा द्वारा पहचाना गया होता तो शायद कर्णाटक में वह सरकार बनाने के साथ इन राज्यों में भी सम्मानजनक तरीके से खुद को स्थापित रख पाती। निश्चित तौर पर भाजपा अपने प्रतिद्वंदियों से राजनैतिक रुप से निपटने के लिए एक बहुत निर्दयी दल है और यह हार मोदी और शाह को अपने घर को २०१९ के लिए दुरुस्त करने के लिए और भी प्रेरित ही करने वाले हैं जिससे कांग्रेस को सचेत रहने की आवश्यकता भी है.
                  कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से यह परिणाम संतोष देने वाले हैं क्योंकि पूरे देश में उसके कार्यकताओं का मनोबल २०१४ में इतना टूट गया था जिसे संजीवनी की आवश्यकता भी थी. इन राज्यों के चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के लिए एक स्पष्ट भूमिका का निर्धारण किया और उसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी परिस्थिति में उसके नेताओं की तरफ से विरोधियों पर व्यक्तिगत और स्तरहीन हमले न किये जाये जिससे पार्टी को अनावश्यक वोटर्स की नाराज़गी न झेलनी पड़े जैसा कि गुजरात चुनाव में हुआ था. राहुल गांधी कांग्रेस को किस स्तर तक ले जायेंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है पर कुछ मामलों में उन्होंने जिस तरह की शुरुवात की है वह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत कहा जा सकता है. आज कांग्रेस ज़मीन पर उतर कर आम लोगों की समस्याओं और उनको दूर करने के लिए काम करने की इच्छुक दिखाई देती है जो कि पहले की कांग्रेस से बिलकुल अलग है. लोकतंत्र के लिए यह इस लिए भी अच्छा है कि कम से कम एक बार फिर से धार्मिक उन्माद और उग्र राष्ट्रवाद के बीच भी आम लोग भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस को कुछ हद तक विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। आज हर विमर्श में काँग्रेस के प्रवक्ताओं की नयी पौध बेहतर तैयारी के साथ मैदान में आती है और अब वह अनावश्यक मुद्दों में उलझने के स्थान पर जनता से जुड़े मुद्दों पर ही बहस को केंद्रित रखने की कोशिशें करती भी दिखती है जिससे देश के आम मध्यवर्ग में उसका सन्देश आसानी से पहुँच भी जाता है कि उसकी तरफ से कम से कम कोशिशें तो की जा रही हैं. कांग्रेस के नए युवा प्रवक्ता शालीनता के साथ अपना काम करते हैं पर आवश्यकता पड़ने पर मुद्दों पर आधारित हमलों से भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्तों को भी तथ्य हीन कर देते हैं.
                       भाजपा अब जहाँ आक्रामक रूप से कांग्रेस पर हमलावर होने जा रही है वहीं कांग्रेस के लिए भी बड़ी चुनौती के लिए तैयार होने के लिए समय कम ही बचा है. तीन राज्यों में सीएम चुनने में जिस तरह से राहुल गाँधी की तरफ से सावधानियां बरती जा रही हैं वह उनके सबको साथ लेकर बड़ी लड़ाई लड़ने की तैयारी भी कही जा सकती है क्योंकि भाजपा को किसी भी तरह से कमज़ोर मानकर अब कांग्रेस भी चुप नहीं बैठ सकती है आज भी भाजपा के पास ज़मीन पर काम करने के लिए पर्याप्त कार्यकर्त्ता और संघ का समर्थन मौजूद है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इन राज्यों में सरकार बनने के  १० दिनों के अंदर पूरे किये जाने वाले वायदों पर भी नज़र रख उन्हें अमल में लाना होगा जिससे जनता में यह सन्देश जा सके कि राहुल की कांग्रेस अब अपने वायदों को अमली जामा भी पहनाती है. भाजपा में मोदी और कांग्रेस में राहुल निर्विवाद रूप से सर्वोच्च नेता है इसलिए अब इन दोनों पर ही अपने दलों के मनोबल को उंच रख जनता से जुड़े रहने का दबाव भी आ गया है और यदि इन तीन राज्यों में कांग्रेस अपने वायदों पर चलती दिखाई दी तो २०१९ में वह मोदी के लिए मज़बूत चुनौती के रूप में सामने आ सकती है. इसलिए अब मामला रोचक स्थिति में पहुँच गया है जिसमें जनता के सरोकारों पर और भी बहस और निर्णय लेने की स्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं.                         

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

नि:शुल्क बेटी वाहिनी

                                      तमाम होहल्ले और सरकारी तामझाम के बाद भी जो काम आम बेटियों के लिए संभव नहीं हो सकता था उसे गांव के रहने वाले एक रिटायर्ड शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ ने अपने पीएफ के १७ लाख रुपयों के बाद २ लाख रूपये खुद से डालकर आसान कर सरकार को भी एक राह दिखा दी है. राजस्थान के रहने वाले डॉ रामेश्वर प्रसाद यादव ने एक बार अपने गांव जाते समय रास्ते में पानी से भीगती लड़कियों को देखकर उन्हें अपनी कार में लिफ्ट दी तब उन्हें लड़कियों से बातचीत करके उनकी समस्या की गंभीरता का पता चला जिसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी से भी इस बारे में चर्चा की और अपने गांव के आस पास के गांवों की लड़कियों को लाने ले जाने के लिए एक बस खरीदने की योजना बनायीं और बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के अपने बुढ़ापे के लिए जमा की गयी पीएफ की राशि के रुपयों से एक बस खरीद कर लड़कियों को अमूल्य सौगात दी. देखने में यह काम साधारण सा ही लगता है पर इसके लिए भी उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा. आज भी वे लगभग ३६ हज़ार रूपये प्रति माह खर्च करके इस सेवा को ७० लड़कियों के लिए सुलभ बना चुके हैं.
                      इस पूरे प्रकरण में एक व्यक्ति के प्रयास से कुछ गांवों की लड़कियों इतना कुछ किया जा सका है तो इसमें सामजिक संस्थाओं, उद्योगों और सरकारों की भूमिका के पुनर्निर्धारण के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए क्योंकि जिस तरह से एक व्यक्ति कुछ गाँवों में इच्छाशक्ति से बदलाव लाने की तरफ जा सकता है तो क्या इस बारे में इसे और बड़े स्तर पर नहीं शुरू किया जा सकता है जिसमें एनजीओ, शिक्षा विभाग, महिला कल्याण विभाग और उद्योगों की तरफ से सामाजिक सरोकारों के लिए खर्च किये जाने वाले धन का क्या बेहतर उपयोग कर लड़कियों के शैक्षणिक स्तर को सुधारने का काम नहीं किया जा सकता है ? डॉ यादव का कार्य अनुकरणीय है पर उनके इस प्रयास को भी जिस तरह से कानून और नियमों के कारण अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ रही है क्या सरकारें वर्तमान कानूनों में कुछ सुधार कर उसमें कुछ राहत नहीं दे सकती हैं ? डॉ यादव के मामले में उनसे राजस्थान परिवहन विभाग ५ हज़ार रूपये प्रति माह टैक्स के रूप में वसूल रहा है जबकि उनके इस कार्य के लिए क्या गाड़ी के पंजीकरण से लगाकर टैक्स तक में पूरी छूट की व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता नहीं है ?
                      हमारे कानून और राजनेता के साथ समाज में भी एक अलग तरह की धारणा बनी हुई है  जिसके चलते किसी भी अच्छे कार्य को भी बहुत सारी अड़चनों से होकर गुज़रना पड़ता है. क्या किसी राज्य सरकार या परिवहन विभाग के मंत्री/ अधिकारी के पास इतने अधिकार नहीं होने चाहिए कि आवश्यकता पड़ने पर वे इस तरह के सराहनीय सामाजिक कार्यों को करने वाले लोगों के लिए अपने स्तर से पूरी छूट दे सकें ? क्या हर काम को उसी कानून से चलाने की आवश्यकता है जो आम लोगों के लिए सामान्य प्रशासन को संचालित करने हेतु बनाया गया है ? क्या असाधारण प्रयास से लोगों के जीवन में बदलाव करने वाले किसी भी व्यक्ति को हर स्तर पर अधिक सहायता करने की व्यवस्था करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए ? क्या हम सिर्फ कानून का अनुपालन करने वाली मशीन बनना चाहते हैं या इन कानूनों के बीच मानवीय संवेदनाओं के साथ काम करने वाले किसी डॉ यादव के प्रयासों की सराहना करते हुए उनके लिए काम करने का माहौल को और भी सुधारने का प्रयास कर सकते हैं ? यह सही है कि यदि टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा को डॉ यादव की इस पहल का पता चले तो वे स्वयं उनके प्रयासों की सराहना करते हुए उनके लिए कुछ निशुल्क बसों की व्यवस्था भी अविलम्ब करा सकते हैं फिर भी ऐसे प्रयास केवल स्थानीय सराहना के बाद कहीं खो से क्यों जाते हैं जिनका पूरे देश में प्रचार प्रसार होना चाहिए ? कम  से कम सरकारें तो इस तरह के प्रयासों के लिए अपने स्तर से टैक्स में छूट दे सकती हैं और जिस ज़िले में ऐसा काम किया जा रहा है वहां विधायक या सांसद निधि से इन बसों में नियमित डीज़ल भरवाने की व्यवस्था भी की जा सकती है.           
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

कांग्रेस के यूपी में विकल्प

                                            यूपी में समय समय पर सपा बसपा के साथ चुनाव पूर्व या चुनाव बाद के तालमेल ने जहाँ पूरे राज्य में कांग्रेस को कमज़ोर किया वहीं उसके नेताओं की आरामतलबी के चलते भी राज्य में उसका वोटबैंक लगातार सिमटता चला गया. इस पूरे प्रकरण में यह माना जा रहा था कि राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यूपी से जुड़े कई बड़े परिवर्तन देखने को मिलेंगें पर अभी तक जिस तरह से पार्टी अपने पुराने ढर्रे पर चल रही है उसको देखते हुए कहीं से भी यह नहीं लगता है कि राज्य में उसकी नीतियों में कोई बड़ा परिवर्तन हुआ है. हो सकता है कि अपने दीर्घकालिक हितों को बचाने के लिए राहुल गाँधी भी यूपी की वर्तमान परिस्थिति में सपा बसपा के छोटे सहयोगी बनने को तैयार हो गए हों पर आने वाले समय में इसका सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद कम ही है. यदि कांग्रेस को भविष्य में अपने लिए केंद्र में मज़बूत भूमिका के साथ यूपी में जड़ें मज़बूत करनी हैं तो उसे अपने उस कोर वोट बैंक पर ध्यान देना होगा जो इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी उसके साथ मज़बूती से खड़ा है.
                                         यह सही है कि समय के साथ अपने को न ढाल पाने के कारण कांग्रेस ने अपनी चुनावी ज़मीन पूरे देश में क्षेत्रीय दलों के हाथों गंवाई है और आज भी उसे संभालने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किये जा रहे हैं जिसका सीधा असर उसकी चुनावी संभावनाओं पर पड़ना तय है. यूपी की राजनीति में अब कांग्रेस को अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि खुद के प्रयासों के बिना दुसरे दलों के साथ तालमेल करने से जहाँ पार्टी के अवसरवादी नेता दुसरे दलों में चले जाते हैं वहीं उसके लिए बरसों से बनी हुई ज़मीन खोने का दुष्प्रभाव भी वोट और सीटों में कमी के रूप में सामने आता है. सपा में नेतृत्व अखिलेश के हाथों में आने के बाद वहां से गंभीर बातों पर विचार शुरू हो चुका है पर मायावती के पास दलित वोटबैंक की जो पूँजी है उसके चलते वे कभी भी कहीं भी किसी को भी ठेंगा दिखाने से नहीं चूकती हैं. इस पूरे प्रकरण में अब कांग्रेस को सबसे पहले उन २२ लोकसभा क्षेत्रों में अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहाँ पर २००९ में उसके सांसद थे क्योंकि निश्चित तौर पर आज उसके पास इन क्षेत्रों में कुछ कार्यकर्ता अवश्य होंगें जिनके दम पर वहां वह मुख्य लड़ाई में आने की कोशिशें आसानी से कर सकती है. साथ ही राहुल गाँधी को भी कम से कम एक बार इन क्षेत्रों में प्रचार करना चाहिए जिससे वहां के पूर्व सांसद अपनी स्थिति को २०१९ के लिए मज़बूत कर सकें।
                                      निश्चित तौर पर संयुक्त विपक्ष को यह एहसास हो गया है कि मोदी का जादू निश्चित  कम हुआ है तभी अधिकांश दल अपनी क्षमता से कम सीटों पर भी चुनाव लड़ने के लिए हामी भरते नज़र आ रहे हैं क्योंकि यदि वे किसी भी तरह से एक बार भाजपा को १६०/७० तक सीमित करने में सफल हुए तो भाजपा खुद ही मोदी से उसी तरह पीछा छुड़ाती नज़र आने वाली है जैसे उसने अडवाणी से छुड़ाया है. इस खतरे को अमित शाह भी भांप रहे हैं क्योंकि मोदी के बिना राष्ट्रीय राजनीति में उनकी स्थिति भी समाप्त हो जाने वाली है. ऐसी स्थिति में कांग्रेस को २०१९ को अधिक महत्व न देते हुए भाजपा को कड़ी चुनौती देने के लिए सबसे पहले अपने घर को मज़बूत करना चाहिए क्योंकि कई बार उसके राष्ट्रीय स्वाभाविक विकल्प वाली स्थिति आने पर उसकी उपस्थिति  हर राज्य में दिखाई देनी चाहिए जिससे भाजपा से रूठा मतदाता अपने वोटों को क्षेत्रीय दलों को देने के स्थान पर लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में डालने के बारे में सोच सकता है. किसी भी क्षेत्रीय दल की राष्ट्रीय संभावनाओं पर कांग्रेस को कभी भी अपने को कमज़ोर नहीं करना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में मज़बूत विपक्ष ही राष्ट्र के लिए उचित होता है पर जब विपक्ष क्षेत्रीय दलों में बंटा हो तो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सत्ता पक्ष आसानी से मुद्दों को भटकाने में सफल हो जाता है जिससे उसकी कमज़ोरियों पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता है।

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 12 जून 2018

सड़क सुरक्षा - नियम और अनुपालन

                           देश में तेज़ी से बेहतर होती सड़कों और वाहनों में नयी तकनीक आने के बाद बढ़ती हुई रफ़्तार ने जिस तरह से आम लोगों के सफर को आसान किया है वहीँ कुछ लापरवाहियों से उनकी ज़िंदगियों को बहुत खतरे में डालना शुरू कर दिया है अब इस पर व्यापक विचार विमर्श और राजमार्गों पर चलते समय नियमों का पूरी तरह पालन करने की तरफ सोचने का समय आ गया है. संत कबीर नगर के छात्र छात्रों का एक टूर हरिद्वार के लिए निकला था जिसमें से एक बस में डीज़ल ख़त्म हो जाने के कारण पूरा काफिला एक्सप्रेस वे पर ही रुक गया था. एक बस से प्राचार्य समेत कुछ  लोग डीजल की व्यवस्था के लिए गए हुए थे उसी समय शिक्षकों और छात्रों ने एक्सप्रेस वे पर ही घूमना शुरू कर दिया जो कि अपने आप में बहुत बड़ी चूक ही कही जा सकती है क्योंकि सुबह सवेरे तीन बजे क्या एक्सप्रेस वे पर किसी भी समय इस तरह से पैदल घूमना अपने आप एक बहुत बड़ा खतरा ही है फिर भी इस रास्ते और यातायात से अनजान इस समूह ने जाने अनजाने जो गलती की उसके फलस्वरूप ही कई छात्रों और एक शिक्षक की जान भी चली गयी. इस पूरी घटना के लिए अब किसी को भी ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है पर क्या हम एक नागरिक के तौर पर सड़क सुरक्षा से जुडी अपनी ज़िम्मेदारियों का अनुपालन करते हैं अब खुद से यह गंभीर सवाल पूछने का समय आ गया है.
                                  इस दुर्घटना में जब नुकसान हो चुका है तो क्या आगे आने वाले समय में इस तरह की पुनरावृत्ति रोकने के लिए हम सब को जागरूक होने की आवश्यकता नहीं है? आखिर क्यों हम अपनी लापरवाही  से खुद और दूसरों की जान से खिलवाड़ क्यों करते हैं? क्या हम सभी की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती है कि खुद को सुरक्षित रखते हुए दूसरों को भी सुरक्षित महसूस कराने की तरफ कदम बढ़ायें? निश्चित तौर पर सरकार की तरफ स इस मामले में बहुत कुछ नहीं किया जा सकता है क्योंकि आजकल जिस तरह से सामान्य प्रशासनिक कार्यों तक के लिए जनहित याचिकाओं के माध्यम से सरकार को काम करने के लिए मजबूर करने की स्थिति बन चुकी है उस परिस्थिति में सरकार और यातायात पुलिस पूरे वर्ष खुद इस कार्य के लिए तत्पर रहेगी यह सोचना ही गलत है क्योंकि सभी कार्य केवल राजनैतिक हानि लाभ और व्यक्तिगत सुविधा को ध्यान में रखते हुए ही किये जाने की जो परंपरा देश में विकसित हो चुकी है उससे पार पाने की आवश्यकता भी है. अच्छा हो कि हमारे शैक्षिण विषयों  में यातायात से जुड़े हुए कुछ अध्याय अवश्य होने चाहिए जिससे भविष्य के नागरिक हमारे बच्चे सड़क पर सामने आने वाली समस्याओं और चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करना सीख सकें। एक विषय के रूप में यह भले ही न पढ़ाया जा सके पर इसकी आवश्यकता पर विचार करने की मजबूरी आज सामने आ चुकी है.
                                   यदि इस टूर पर जाने वाले समूह के लोगों को एक्सप्रेस वे पर घूमने के  संभावित खतरों के बारे में जानकारी होती तो निश्चित रूप से वे सचेत रहते और पूरे समूह को सचेत रखने का प्रयास भी करते पर जिस तरह से यह दुर्घटना हुई वह थोड़ी सावधानी से टाली अवश्य जा सकती थी. अच्छा हो कि पूरे देश के राजमार्गों और एक्सप्रेस वेज़ के बारे में सड़क परिवहन मंत्रालय को अपनी वेबसाइट पर पूरी जानकारी और सावधानियों को दिखाना चाहिए और निजी क्षेत्र या पीपीपी मॉडल पर बनने वाले हर एक्सप्रेस वे के लिए अपनी वेबसाइट बनाना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिसमें उस पूरे मार्ग पर उपलब्ध सुविधाओं आपातकालीन सेवाओं तथा दुर्घटना सम्भाव्य स्थानों के बारे में वहां जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए जिससे इन मार्गों का उपयोग करने वाले यह जानकारी पहले से ही ले सकें। एक नागरिक और यात्री के रूप में हम सभी को भी यह समझना होगा कि सरकार हमें अच्छी सड़कें दे सकती है पर उस पर चलने के लिए हमें खुद ही सभी कानूनों का अनुपालन करना होगा जिससे खुद सुरक्षित चलते हुए दूसरों को भी सुरक्षा का एहसास दिला सकें। लम्बी दूरी के यात्रियों के लिए एक वीडियो जारी किया जाना चाहिए जिसे रास्ते में पड़ने वाले पेट्रोल पम्प्स और टोल केंद्रों पर एक हाल में चलाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे आराम करते समय चालक और अन्य यात्री इन सावधानियों के बारे में जानकारी ले सकें और हमारी यात्रा सुगम होने के साथ सुरक्षित भी हो सके.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

वैचारिक अभिव्यक्ति और विभेद

                                                  अभी तक के स्थापित मानकों के अनुसार जिस तरह से यह समझा और कहा जाता कि शिक्षा बढ़ने के साथ मनुष्य का सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत विकास अच्छी तरह से हो सकता है पर पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से अशिक्षितों के साथ शिक्षितों की मानसिक स्थिति भी एक जैसी ही होती जा रही है वह सम्पूर्ण मानव जाति के लिए आने वाले समय में एक खतरा बन सकती है. विश्व के कई देशों में इस्लाम के नाम पर चल रहे चरमपंथ को जिस तरह से उच्च शिक्षित लोगों का समर्थन मिलने लगा उससे पुरानी धारणा टूटने की तरफ बढ़ गयी की शिक्षा से मनुष्य अधिक सामाजिक हो जाता है. सौभाग्य से भारत में इस तरह की घटनाएं बहुत कम या नहीं ही दिखाई देती थीं पर अब इसमें भी तेज़ी से बदलाव दिखाई दे रहा है जिसका पूरा और विपरीत असर समाज पर आने वाले समय में गंभीर रूप से पड़ने के अब इंकार नहीं किया जा सकता है. बंगलुरु में एक महिला ने अपनी कैब सिर्फ इसलिए कैंसल कर दी क्योंकि उस पर आज ट्रेंड में चल रहे गुस्से भरे हनुमान जी का चित्र अंकित था जिसे उन्होंने कठुआ और उन्नाव में हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा आरोपितों के पक्ष में खड़े होने के चलते खुद अपनी सुरक्षा से जोड़ते हुए ही उसे एक खतरा मान लिए था. इसके बाद एक व्यक्ति ने लखनऊ से अपनी कैब राइड सिर्फ इसलिए कैंसल कर दी क्योंकि उसका चालक मुसलमान था ?
                                            देखने में ये घटनाएं सामान्य से लगती हैं पर क्या ये समाज में हर स्तर पर पनप रहे अनदेखे विभाजन की तरफ संकेत नहीं करती हैं ? क्या इंटरनेट और सोशल मीडिया को चलाने वाले किसी भी उच्च शिक्षित नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस निम्न स्तर पर जाकर समाज के निर्धारित ताने बाने को झकझोरने का काम करे जिससे अंत में उसको भी कहीं न कहीं नुकसान ही होने वाला है ? क्या शिक्षा का स्तर और संस्कारों की पकड़ को इस तरह के मामलों में महसूस किया जा सकता है ? किसी भी महिला या पुरुष को किसी विशेष परिस्थिति में अपने लिए कोई स्थिति प्रतिकूल लग सकती है पर क्या उस प्रतिकूल परिस्थिति को इस तरह से देश के निम्न होते राजनैतिक विमर्श से गंभीरता से जोड़ने को उचित कहा जा सकता है ? क्या बाहरी दिखावे से कोई शत प्रतिशत किसी के व्यक्तित्व के बारे में एक बार में ही सब कुछ जान समझ सकता है और क्या उसका यह आंकलन यह सही भी हो सकता है ? एक महिला को यदि किसी चिन्ह विशेष के कारण असुरक्षा दिखाई दी तो क्या उसे इस तरह से दिखाना उचित था या एक पुरुष को उस महिला के ट्वीट का जवाब देने के लिए एक मुस्लिम चालक की कैब राइड का इंतज़ार कर उसे कैंसिल कर ट्वीट करना उचित था ? बेशक दोनों की अपनी सुरक्षा सम्बन्धी चिंताएं हो सकती हैं पर उन्हें इस तरह से परिभाषित किये जाने को आखिर क्या कहा जाये ?
                                            क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल महिला और पुरुष अपने आस पास देखकर यह बता सकते हैं कि धर्म और प्रतीक चिन्हों के नाम पर अपने को समाज से अलग कर कथित रूप से सुरक्षित करके क्या वे भारतीय समाज में जीवित रह सकते हैं ? क्या देश के विभिन्न धार्मिक अनुयायियों के बिना उनके लिए सामान्य जीवन यापन कर पाना संभव हो सकेगा या वे अपनी इस मानसिकता के साथ पूरे समाज में एक विभाजन की खरोंच लगाने का काम करते रहेंगें जो भविष्य में गहरी खाई भी बन सकती है ? आप चिन्ह विशेष लगाए होने के कारण किसी की सेवाएं नहीं ले सकते हो पर जो चिन्ह लगाकर लगातार धोखा देने का काम कर रहे हैं उनसे खुद को सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय करने वाले हैं ?  जिनको लगता है कि चालक मुस्लिम है इसलिए वे सुरक्षित नहीं हैं तो हो सकता है कि उस कार को उनके जैसी मानसिकता वाले किसी मुस्लिम मिस्त्री ने भी यह सोचकर ठीक किया हो कि इसमें कोई हिन्दू यात्री बैठेगा इसलिए इसके ब्रेक ख़राब कर देता हूँ तो सोचिये हमारे समाज का क्या हाल होगा ? अच्छा हो कि आम नागरिक नेताओं की विभाजनकारी नीतियों के बारे में गंभीरता से सोचें और अपने लिए वही रास्ता अपनाएं जो समाज में समरसता की तरफ ले जाने का काम करता हो क्योंकि सामाजिक वैमनस्यता का खमियाज़ा आमतौर पर नेताओं को नहीं बल्कि आम जनता को ही भुगतना पड़ता है।  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 22 अप्रैल 2018

सामाजिक समस्या का कानूनी हल ?

                                                                   निर्भया की मौत के बाद देश के कानून में बलात्कारियों को कड़ी सजा देने के लिए बनाये गए पाक्सो कानून के बाद भी महिलाओं/ बच्चियों के साथ होने वाले यौन अपराधों की स्थिति में कुछ बदलाव दिखाई नहीं दिए जबकि उस समय भी सरकार द्वारा यही कहा गया था कि कड़े कानून होने से लोग इस अपराध को करने के बारे में सोचेंगें भी नहीं पर रसाना और उन्नाव की बड़ी चर्चित घटनाओं के बाद जिस तरह से सत्ताधारी दल के लोगों की संलिप्तता के चलते पीड़ितों को न्याय मिलने से रोकने की कोशिशें की जाती रहीं उसके बाद केंद्र सरकार दबाव में आ गयी और उसकी परिणिति एक और कानूनी संशोधन के रूप में सामने आती दिखाई दी है. यह समय क्या हमें एक देश और समाज के रूप में यह फिर से सोचने को मजबूर नहीं करता है कि इतने कानूनी प्रयासों के बाद भी आखिर ये अपराध रुकने का नाम क्यों नहीं लेते हैं ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते समाज में आज भी वो लोग उसी संख्या में मौजूद हैं जो मनुष्यों के विकास के समय से होते रहे हैं ?
                                        इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले तो जिस सामाजिक चेतना को बढ़ाये जाने की आवश्यकता है हम उसमें पूरी तरह से निकम्मे साबित हो रहे हैं क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को घर, समाज, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर जिस तरह का व्यवहार झेलना पड़ता है उसको सुधारने की दिशा में आज भी कोई कदम नहीं उठाये जा रहे हैं जिससे समाज में शिक्षितों की संख्या बढ़ने के बाद भी समाज की रूढ़ियों के चलते आज भी महिलाओं को  पुरुषों से निम्न स्तर का समझा जाता है. आज भी हर आम भारतीय परिवार की प्राथमिकता परिवार की हर पीढ़ी में एक लड़के की चाहत से लड़कियों की स्थिति कमज़ोर होना शुरू हो जाती है. बेटियों के साथ जो समाज गर्भ से ही दोहरा व्यवहार करना शुरू क्र देता हो उससे किसी कानून के डर से अपराधों की तरफ न मुड़ने की आशा करना हो मूर्खता है और हम केवल कानून के सहारे इस सामाजिक बुराई से लड़ने की खोखली कोशिशें करने में ही अपने कर्तव्य को पूरा मान लेते हैं?
                                 आज समस्या जिस स्तर पर है पर उससे निपटने के लिए हमें कानूनी स्तर पर प्रयास करने के स्थान पर सामजिक स्तर पर अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता है और धरातल पर समाज की मानसिकता को बदलने के साथ महिलाओं के लिए पुलिसिंग को सुधारने की दिशा में गंभीरता गंभीरता से सोचने की ज़रुरत है यह सही है कि अपराधों को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता है पर यदि आने वाली पीढ़ी में लड़कियों और महिलाओं को बराबरी के दर्ज़े पर रखने की कोशिश अभी से शुरू की जाये तो दो तीन दशकों में इसके परिणाम सामने आ सकते हैं. केवल कानूनों को कड़ा करते जाने से क्या समाज की मानसिकता को बदला जा सकता है आज यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि कानून किसी के घर और समाज में घुसकर मानसिकता में बदलाव नहीं कर सकता है क्योंकि उसकी अपनी सीमायें भी हैं. जब तक समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं होगा और यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते नारों से निकल कर दिलों में नहीं आएगा और जब तक कन्या पूजन नवरात्रि से आगे बढ़कर समाज की दिनचर्या का हिस्सा नहीं बनेगा तब तक बच्चियों और महिलाओं के प्रति होने वाले इन अपराधों से निपटा नहीं जा सकेगा।          
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 15 अप्रैल 2018

एक राष्ट्र एक चुनाव की परिकल्पना

                                                मोदी सरकार की देश में लोकसभा- विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाने की मंशा पर विभिन्न स्तरों पर विचार करने की दिशा में काम शुरू हो गया है पर क्या इस तरह प्रयास से आने वाले समय में देश को कोई लाभ होगा या फिर देश एक नयी तरह की तानाशाही युक्त लोकतान्त्रिक अराजकता की तरफ बढ़ जायेगा ? आज के समय भी जिस तरह से त्रिशंकु सदन बनने पर सरकार बनाना पूरी तरह से केंद्र सरकार की मंशा पर ही निर्भर हो चुका है उससे आने वाले समय में केंद्र की तरफ से पड़ने वाले अनावश्यक दबाव से राज्यों के नेता किस तरह से निपट पायेंगें यह बहुत बड़ी चुनौती होने वाला है. यह सही है कि हर वर्ष कभी भी किसी न किसी राज्य में चुनाव होने से लागू होने वाली आचार संहिता के चलते विकास कार्यों की गति में रुकावट पैदा होती है पर क्या नेताओं को यह सोचने का समय नहीं है कि आज उनको आचार संहिता लागू होने से इतना कष्ट क्यों होता है जबकि यह परंपरा आज़ादी के बाद से ही चली आ रही है ? आचार संहिता लगाने का सीधा सा मतलब यही हुआ करता था कि सत्ताधारी दल और पूरे विपक्ष के लिए चुनावों से पूर्व एक समान वातावरण में जनता के सामने जाने का विकल्प खुला रहे. आज आचार संहिता से विकास रुकने की प्रक्रिया का आरोप लगाने वाले नेता क्या यह स्वीकार कर सकते हैं कि उनकी नीतियां भी चुनावों को प्रभावित करने के लिए ही होती हैं ?
                                         एक साथ चुनाव होने पर सबसे बड़ी समस्या तब सामने आएगी जब केंद्र या किसी राज्य में कोई सरकार अल्पमत में आ जाएगी तब किस तरह से सांसदों या विधायकों की खरीद फरोख्त की जाएगी इसका अंदाज़ा आज आसानी से लगाया जा सकता है क्योंकि राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों के चुनावों में जिस तरह से कुछ हद तक धन कुबेरों को हर पार्टी मैदान में उतारती रहती है उससे अल्पमत वाली सरकार को  बचाने के लिए सरकार समर्थक धन कुबेर और उद्योगपति परदे के पीछे के खेल में धन का दुरूपयोग कर क्या लोकतंत्र का मज़ाक नहीं उड़ाएंगे ?  लोकतंत्र नैतिकता के आधार पर टिकता और चलता है पर केन्द्र की मोदी सरकार ने जिस तरह से कई राज्यों में सबसे बड़े दल की राज्यपालों के माध्यम से अनदेखी कर किसी भी परिस्थिति में अपने गठबंधन की सरकारें बनाने की गलत परंपरा शुरू कर दी है वैसी स्थिति में कोई महत्वाकांक्षी केंद्र सरकार सभी राज्यों में राजनैतिक गतिविधियों को आसानी से अपने अनुसार मोड़ने की तरफ क्या नहीं बढ़ जाएगी? भारत जैसे विविधता भरे देश में जनता के सामने हर स्तर पर अपने मनपसन्द उम्मीदवार को चुनने का अवसर संविधान की तरफ से दिया गया है जिससे आज देश के कई हिस्सों में क्षेत्रीय दल भी सफलता के साथ सरकारें चला रहे हैं पर एक साथ चुनाव होने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति भी बन सकती है जो राजनीति को केवल राष्ट्रीय दलों के बीच में ही सीमित करने का काम भी क्र सकती है ?
                                         सबसे बड़ा मुद्दा धन को बचाने और विकास की गति को निरंतर बनाये रखने से जुड़ा है तो इस मामले के लिए सबसे पहले नेताओं को अपने गिरेबान में झाँकना होगा क्योंकि सरकार कोई भी दल चलाये पर देश की समस्याएं तो वही रहती हैं तो संसद और विधान सभाओं से होने वाले विधायी कार्यों पर ध्यान देकर नीतियों को लम्बे समय के लिए लागू करने की दिशा में सोचना चाहिए जैसे एक समय देश में पञ्चवर्षीय योजनाएं और २० सूत्री कार्यक्रम चला करते थे जिससे किसी भी चुनाव के आने जाने से इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर किसी तरह की रोक नहीं होती थी. क्या आज देश के नेताओं को एक चुनाव से अधिक एक अलग सोच के साथ विकास के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है? योजना आयोग हो या बदले नाम नीति आयोग जब तक नेताओं की मंशा साफ़ नहीं होगी तब तक किसी भी परिस्थिति में चुनावी सुधारों को सही तरह से लागू नहीं किया जा सकता है।  आखिर सरकार की मंशा केवल चुनाव एक साथ कराने के सुधारों तक ही क्यों रुकी हुई है क्या देश के सम्पूर्ण चुनाव परिप्रेक्ष्य पर विचार का उसमें आज के अनुसार बदलाव करने की आवश्यकता सरकार को महसूस नहीं हो रही है ?  चुनाव सुधारों को केवल अपने परिप्रेक्ष्य में देखने से परिस्थितयां बदलने वाली नहीं है और सबसे बड़ी समस्या त्रिशंकु और अल्पमत की सरकारों वाले राज्यों में सामने आने वाली है क्योंकि वहां पर चुनाव हो नहीं पायेंगें तो क्या अघोषित रूप से केंद्र अपने हिसाब से राष्ट्रपति शासन लगाकर वहां की बागडोर सीधे अपने हाथों में नहीं ले लेगा ?
                                       इस सबसे अच्छा यही रहेगा कि चुनावों के लिए प्रति वर्ष एक महीना निर्धारित कर लिया जाये और पूरे वर्ष में कभी भी होने वाले चुनावों को केवल उसी महीने में कराने की दिशा में काम शुरू कर दिया जाये इससे जहाँ राज्यों में एक साथ एक वर्ष में चुनाव समाप्त हो जायेंगें वहीं किसी भी तरह की समस्या आने पर अगले वर्ष उसी महीने में फिर से चुनाव कराये जा सकेंगें। क्या किसी भी राज्य में चुनाव कराने के लिए आयोग को इतना लम्बा समय देना चाहिए कि नेता अपने अनुसार पूरे चुनाव को मोड़ने का समय पा जाएँ और खुलेआम लोकतंत्र का चीर हरण कर सकें ?  विकास अवरुद्ध होने  की अवधारणा सामने लाने वाले दलों को अब यह सोचना होगा कि उनकी  प्रभावित करने वाली नीतियों के चलते समस्याएं अधिक होती है न कि देश में अलग अलग समय चुनाव होने से यह सब प्रभावित होता है। 

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

इंसानी आबादी में वन्य जीव

                                                    लखनऊ के आवासीय क्षेत्र में जिस तरह से तीन दिनों तक एक तेंदुएं के चलते आतंक मचा रहा और उससे निपटने के लिए वन विभाग की टीम के पास कोई कारगर योजना नहीं दिखाई दी उससे यही पता चलता है कि किसी हिंसक जीव के शहरी क्षेत्र में आ जाने के बाद उसको जान से मार देने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नहीं है ? तेंदुआ भी संरक्षित प्रजातियों में आता है और उसकी पुलिस की गोली से मरने के बाद वन विभाग अपनी कार्यवाही करने को तत्पर तो दिखाई देता है पर जिस तरह से पुलिस ने अकेले दम पर इस समस्या से निपटने की कोशिश क्या वह वन विभाग के ऊपर बड़ा प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती है ? यह सही है कि वहां पर विपरीत परिस्थितियां थीं और उनसे निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध नहीं थे तो आम लोगों की ज़िंदगी को बचाने के लिए कौन आगे आ सकता था ? ऐसी परिस्थिति में वन्य जीवों से निपटने की कोई ट्रेनिंग न होने के बाद भी लखनऊ पुलिस ने अपने स्तर से सभी प्रयास किये और अपनी जान बचाने के लिए तेंदुए को मारने जैसा कदम उठाना पड़ा पर इस पूरे प्रकरण में एक बात सामने आ गयी है कि ऐसी किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए जब सरकार की नाक के नीचे लखनऊ में विभिन्न विभागों के पास कोई कारगर योजना नहीं है तो ग्रामीण क्षेत्रों और संरक्षित क्षेत्रों के आस पास रहने वाले लोगों के लिए क्या किया जा सकता है ?
                          जिस तरह से बढ़ती आबादी का चलते जंगलों को काटा जा रहा है और उसके स्थान पर पेड़ लगाने का काम न के बराबर हो रहा है तो एक दिन ऐसी संघर्ष की स्थिति पूरे देश में जगह जगह पर दिखाई दे सकती है और अधिकांश स्थानों पर बिना ट्रेनिंग के काम करने वाले पुलिस और वन विभाग के लोग अंत में किसी संरक्षित जीव को मारकर अपना काम पूरा करते हुए दिखाई देने वाले हैं. इस बारे में अब संरक्षित वन क्षेत्रों में सभी सम्बंधित विभागों को और भी कठोरता से नियमानुसार काम करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक इन जीवों के लिए स्थान सुरक्षित कर उनके लिए उपयुक्त वातावरण तैयार नहीं किया जाता है तब तक इस तरह का संघर्ष बढ़ता ही जाने वाला है. इस मामले में किसी एक सरकार पर आरोप लगाने से परिस्थितियां बदलने वाली नहीं हैं क्योंकि जब तक मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच इस संघर्ष के उत्पन्न होने वाले कारणों पर रोक नहीं लगायी जाएगी तब तक कुछ भी ठीक नहीं होगा. इस घटना से सीख लेते हुए अब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को एक विस्तृत कार्य योजना पर राज्यों के साथ मिलकर चर्चा करने की आवश्यकता है क्योंकि तभी पूरे देश में वन्य जीवों और मनुष्यों के इस अप्रत्याशित संघर्ष को कम करके रोकने की स्थिति पैदा की जा सकेगी.
                            वन विभाग और लकड़ी माफियाओं के गठबंधन को तोडे बिना इस दिशा में आगे बढ़ पाना संभव ही नहीं है क्योंकि वन के सामान्य पारिस्थितिकी तंत्र तोड़ कर जब हम वन्य जीवों को वहां से निकलने के लिए मजबूर कर रहे हैं तो इस तरह की घटनाएं सामने आती ही रहेंगी. वन विभाग और पुलिस के माध्यम से अवैध वन कटान को रोकने और जहाँ जंगल कम हो गए हैं वहां उनको संरक्षित कर पुनः पेड़ लगाने के काम पर यदि सही तरह से ध्यान दिया जाये तो इन जीवों को अपने क्षेत्र का अतिक्रमण करने की आवश्यकता नहीं पड़ने वाली है. सघन वन क्षेत्रों के आस पास रहने वाले आम नागरिकों को भी इस तरह की किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए सामान्य बातें बताई जानी चाहिए जिससे उनमें व्याप्त होने वाले अनावश्यक भय को दूर रखा जा सके. सरकारें केवल नियम बना सकती हैं पर उन पर अमल करने के लिए जिस इच्छाशक्ति की निरंतरता के साथ आवश्यकता होती है उसमें हम लोगों में पूर्णतः असफल हो जाते हैं. अब इस घटना को ध्यान में रखते हुए वन विभाग की ट्रेनिंग और अन्य परिस्थितियों पर विचार कर इस संघर्ष को समाप्त करने कि दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

सैनिकों का मानवाधिकार

यह अच्छा ही हुआ कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस बात पर विचार करने के लिए सैन्य अधिकारियों के तीन बच्चों की मांग को स्वीकार कर रक्षा मंत्रालय से जवाब माँगा है और यह भी पूछा है कि सैनिकों के मानवाधिकार को सुरक्षित रखने के बारे में सरकार और रक्षा मंत्रालय की क्या नीति है ? आज जब कश्मीर समेत देश के हर हिस्से में सुरक्षा बलों और पुलिस के साथ आम नाराज़ लोगों, माओवादियों, आतंकियों और आतंक का समर्थन करने वाले पत्थर बाज़ों से निपटने में सरकारें बिना किसी नीति के काम कर रही हैं तो क्या इस परिस्थिति में अब यह सोचना का समय नहीं है कि सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस में भी हमारे देश के जवान ही भर्ती होते हैं जो विषम परिस्थितियों में अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहते हैं तो क्या उनके भी आम मानव का जैसे अधिकारों का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए ? सोचा जाना चाहिए कि क्या पत्थरबाजों से अपनी जान बचाने के लिए आत्मरक्षा में चलायी गयी गोलियों में पत्थरबाजों के मरने पर सैन्य अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज़ करना उचित है ? अब समय आ गया है कि सरकार स्पष्ट करे और यदि इस दिशा में अभी तक देश में कोई नीति नहीं है तो संसद में अविलम्ब एक विधेयक लाकर हमारे जवानों की सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले कानून को पारित कराये जिससे देश की सीमा और अशांत क्षेत्रों में काम करने वाले सैनिकों समेत उनके परिवार के लोग भी राजनैतिक दबाव या लाभ में दर्ज़ होने वाले मुक़दमों से बच सकें . 

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

एक साथ चुनाव

                               देश में इस समय लोकसभा और विधानसभा चुनावों के एक साथ कराये जाने की संभावनाओं पर गंभीर विचार शुरू भी नहीं हुआ है पर जिस तरह से इस पर बातें की जा रही हैं वे कहीं न कहीं से इस बात को रेखांकित अवश्य करती हैं कि सरकर चुनाव आयोग इस दिशा में सोच अवश्य रहे हैं. यह बात कहने में जितनी आसान लगती है क्या उसे धरातल पर उतार पाना भी संभव है अब इस बात पर विचार की आवश्यकता भी है. लोकतंत्र में राजनैतिक अस्थिरता के आने के साथ ही १९६७ में लोकसभा और विधान सभा चुनावों का साथ छूट सा गया और उसके पहले होने वाले चुनावों की गति टूटती सी नज़र आयी क्योंकि केंद्र और राज्यों में स्पष्ट बहुमत या गठबंधन की सरकारों के न चल पाने से चुनावों की तिथियां एक दूसरे से अलग होती चली गयी जिसका आज का स्वरुप हम सबके सामने है. आज जो परिस्थिति है उसमें भाजपा या एनडीए शासित राज्य तो पीएम की इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए राज़ी हो सकते हैं पर विपक्षी दलों की तरफ से जहाँ उसकी सरकारें अभी दो वर्ष पुरानी भी नहीं है क्यों इस प्रयोग का साथ दिया जायेगा ? आज पीएम मोदी की जो छवि है उसके साथ दोनों चुनाव एक साथ होने की दशा में भाजपा का काम आसान हो जायेगा वहीं विपक्षी दलों के लिए लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों को संभाल पाना कठिन ही होने वाला है इसलिए राजनैतिक स्तर पर इस विचार को बहुत अधिक समर्थन नहीं मिलने वाला है क्योंकि यह सब बिना संविधान संशोधन के संभव नहीं हो सकता है जिसके लिए केंद्र को दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी.
                         यह सही है कि इस तरह से एक साथ होने वाले चुनावों में समय और धन की बर्बादी को रोका जा सकता है पर क्या सभी चुनाव एक साथ कराने के लिए सरकार चुनाव आयोग को इतना धन दे पाने में समर्थ हो सकती है ? एक अनुमान के अनुसार यदि पूरे देश के लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाते हैं तो आयोग को वीवीपैट मशीनों के लिए लगभग २००० करोड़ रुपयों की आवश्यकता पड़ेगी साथ ही जब ये चुनाव एक साथ होंगें तो इन मशीनों का १५ वर्ष की आयु होने के कारण केवल तीन बार ही उपयोग किया जा सकेगा तो क्या केंद्र सरकार इस तरह के खर्चे को वहन करने के लिए तैयार है जिसमें सरकार को हर वर्ष आज की कीमत के अनुसार १०० करोड़ रूपये प्रतिवर्ष से भी अधिक खर्च करने पड़ेंगें ? सरकार की सोच सही हो सकती है पर इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए लम्बा समय लगने वाला है जिसके लिए अभी हमारे देश में संसाधन ही उपलब्ध नहीं हैं. यदि यह मान लिया जाये कि आगामी २०१९ में ही यह दोनों चुनाव साथ में किये जाएँ तो उसके लिए आवश्यक धन की व्यवस्था तो हो सकती है पर इतने कम समय में वीवीपैट मशीनों की उपलब्धता के बारे में पहले से ही विचार करने की ज़रुरत होगी क्योंकि उनके बिना इस तरह के चुनाव करा पाना संभव ही नहीं होगा.
                            सरकार का यह कहना कुछ हद तक सही है कि लगातार कहीं न कहीं होते रहने वाले चुनावों से विकास की गति आचार संहिता के कारण धीमी पड़ती रहती है जिसको कुछ हद तक सही माना जा सकता है पर समस्या यहाँ विकास के धीमे होने की नहीं बल्कि अपनी अपनी दलीय राजनीति को चमकाने को लेकर ही है क्योंकि सदनों में राज्यों और केंद्र की योजनाएं केवल अपने हितों को साधकर बनाये जाने की जो परंपरा चल पड़ी है जब तक इस पर राजनैतिक दल खुद ही अंकुश नहीं लगायेंगें तब तक विकास अपनी गति को नहीं पा सकता है. क्या सरकारें बदल जाने से जनता के विकास से जुड़े सरोकार बदल जाते हैं ? क्या राजनैतिक दलों को भी इसके लिए संविधान में उत्तरदायी नहीं बनाया जाना चाहिए कि वे सदनों में बैठकर कुछ मुद्दों पर कम से कम बीस वर्षों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनायें और उस पर हर दल चलने को बाध्य हो साथ ही समय समय पर उसकी समीक्षा के साथ आवश्यक संशोधनों को भी करने की व्यवस्था भी की जाये जिससे सब कुछ सही दिशा में सही तरह से चल सके. कोई भी दल केवल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए इस तरह के विचारों को सामने लाता है तो उसको स्वीकार कर पाने में सभी को कठिनता होने वाली है.
                          इस दिशा में शुरुवात इस तरह से की जा सकती है कि देश भर में जहाँ भी विधान सभा चुनाव होने हैं उसका समय वर्ष भर में एक महीने में ही कर दिया जाये जिससे हर वर्ष आयोग और सरकार चुनावों के लिए तैयार रह सकें. जैसे किसी राज्य में जनवरी किसी में अप्रैल और किसी में अक्टूबर नवम्बर में चुनाव होने हैं तो उनको वर्ष के एक महीने में ही कराने की दिशा में कदम बढ़ाये जाएँ जिससे पूरे वर्ष होने वाले इस चुनावी उत्सव को कुछ महीनों में ही निपटाया जा सके. यदि यह प्रक्रिया सही तरह से पटरी पर आ जाती है तो आने वाले समय में लोकसभा और विधान सभा चुनावों को भी एक साथ कराने की दिशा में सोचा जा सकता है. पर्वतीय राज्यों में चुनाव गर्मियों के मौसम में कराये जाने के बारे में सोचा जाना चाहिए जिससे प्रशासन को कम चुनौतियों का सामना करना पड़े और जनता की भागीदारी को भी बढ़ाया जा सके. केंद्र सरकार को इस दिशा में केवल बयान देने के स्थान पर सर्वदलीय बैठक से शुरुवात करनी चाहिए फिर जिन राज्यों के चुनाव लोकसभा के १ साल के आगे पीछे होने हैं वहां की सरकारों और विधानसभा अध्यक्षों की एक बैठक बुलानी चाहिए जिससे इस पर सही दिशा में आगे बढ़ने पर सफलता मिलने की सम्भावना बढ़ सके.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 28 जनवरी 2018

कासगंज - समस्या से सबक तक ?

                                                  गणतंत्र दिवस पर निकाली जा रही तिरंगा यात्रा को लेकर कासगंज में जिस तरह से सुनियोजित उपद्रव किया गया उससे यही लगता है कि आज भी यूपी के विभिन्न जिलों में महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे अधिकारी बैठे हुए हैं जिन्हें समुचित प्रशासनिक अनुभव नहीं है या फिर वे किसी दबाव में काम नहीं कर पा रहे हैं. दुनिया की सबसे बड़ी पुलिस फोर्स यूपी पुलिस के नए मुखिया ने आते ही जिस तरह से पूरे बल को एक कड़े सिस्टम के अंतर्गत चलाने की बात कही और यूपी के सीएम आदित्यनाथ ने भी पुलिस को कानून व्यवस्था सुधारने में खुला हाथ देने की छूट दी फिर भी २६ जनवरी के हाई अलर्ट वाले दिन कितनी आसानी से कुछ अराजक तत्वों ने पूरे शहर को नफरत की आग में झोंक दिया और पूरे प्रदेश में चिंताएँ बढा दीं. आखिर किन कारणों से पुलिस और ख़ुफ़िया तंत्र इस साज़िश का पता नहीं लगा पाए यह जाँच का विषय होना चाहिए और जो भी ज़िम्मेदार लोग इस तंत्र में लगे हुए हों उनसे स्पष्टीकरण भी माँगा जाना चाहिए जिससे आने वाले समय में अधिकारियों और कर्मचारियों पर सही काम करने का दबाव बनाया जा सके और लापरवाही में होने वाली इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति पूरी तरह से रोकी जा सके.
                       इतने महत्वपूर्ण दिन जब आम नागरिकों को ख़बरों में यही सुनाई और दिखाई देता है कि पूरा देश हाई एलर्ट पर है फिर इतनी बड़ी घटना और लगातार उपद्रव जैसी स्थिति बनी रहे तो सरकार और व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगता ही है पर इसके लिए केवल सरकार को ही सदैव दोषी नहीं बताया जा सकता है क्योंकि लोकतंत्र में जिस दल की सरकार होती है उसके समर्थक अपने अनुसार कानून व्यवस्था को चलाने की कोशिशें करते रहते हैं जिससे पुलिस प्रशासन पर अनावश्यक दबाव भी पड़ता है और आने वाले समय के लिए उनका मनोबल भी टूटता है. सबसे बड़ी विचारणीय बात यह है कि पूरे शहर में बिना अनुमति के तिरंगा यात्रा कैसे निकाली जा रही थी और कुछ युवक इस तरह से सड़कों पर बिना अनुमति यात्रा निकालते रहे पर पुलिस प्रशासन सिर्फ इस बात से अनभिज्ञ रहा या अनभिज्ञ बना रहा इस बात का जवाब आज किसी के पास नहीं है. किसी भी तरह की यात्रा निकालने के लिए नियमतः उसके मार्ग, समय शामिल होने वाले लोगों की अनुमानित संख्या के बारे में लिखित अनुमति लिए जाने का प्रावधान है फिर इस मूलभूत प्रशानिक चूक के लिए किसको ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए ? बेशक कुछ लोग यह कह सकते हैं कि यह देश के लिए निकाली जाने वाली तिरंगा यात्रा थी पर क्या देश के लिए निकाली जाने वाली कोई भी यात्रा या उसे निकालने वाले कानून से ऊपर हो सकते है ? यात्रा के आयोजकों की तरफ से यह क्यों किया गया इस बात का जवाब भी सामने आना बाकी है क्योंकि देशहित के लिए क्या देश के कानून को किनारे किया जा सकता है ?
                    घटना के बाद भी जिस तरह से अगले दिन भी उपद्रव जारी रहा इससे यही पता चलता है कि स्थानीय प्रशासन को वहां की सही स्थिति का कोई अंदाज़ा ही नहीं है और वह केवल ऊपरी तौर पर काम करने की कोशिश करने में लगा हुआ है ? शुक्रवार की घटना के बाद अगले दिन तक जिस तरह से शहर की अराजकता शहर के बाहर तक चली गयी उससे यही लगता है कि प्रशासनिक अक्षमता वहां पर चरम पर है और उससे निपटने के लिए ठोस कदम भी नहीं उठाये जा रहे हैं. सबसे चिंता की बात यह है कि लखनऊ में बैठे प्रमुख गृह सचिव तक को वस्तु स्थिति से अवगत नहीं कराया जा रहा है जिससे उनके और मंडल स्तर के अधिकारियों के बयानों में भी बड़ी भिन्नता दिखाई दे रही है. सीएम आदित्यनाथ के लिए यूपी के पुलिस प्रशासन में जमे इस रोग की पहचान करना और उसको दूर करने की कोशिश करना ही अब सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि जब तक पुलिस प्रशासन सही तरह से काम नहीं करेंगे तब तक इस स्थिति को संभाला और रोका नहीं जा सकता है. स्थानीय प्रशासन से परिणाम देने की आशा केवल तभी की जा सकती है जब तेज़ तर्रार अधिकारियों को फील्ड पोस्टिंग दी जाये और साथ ही उनके तबादलों के लिए एक नीति का निर्धारण भी किया जाये जिससे वे अपने तैनाती स्थल के बारे में कुछ जान समझ भी सकें तथा विपरीत परिस्थिति आने पर उसे सँभालने के उपाय भी खुद ही खोज सकें.
                       शासन स्तर पर भी अब खुद सीएम आदित्यनाथ के लिए सोचने का समय आ गया है कि उन्हें प्रदेश की कानून व्यवस्था को वास्तव में सुधारना है या केवल इसके लिए चिंतित ही रहना है क्योंकि प्रदेश में लम्बे समय पुलिस सुधार की सिफारिशों पर कोई कार्यवाही किसी भी सरकार द्वारा नहीं की जा रही है जिससे पुलिस बल को मनमानी करने का अवसर मिल रहा है जिसका फल जनता को भुगतना पड़ता है. साथ ही एक प्रश्न यह भी है कि क्या अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की तरह सीएम आदित्यनाथ की भी सोच वही है कि सीएम के पास यूपी जैसे राज्य का गृह विभाग सही तरह से काम कर सकता है ? परिवर्तन की शुरुवात खुद सीएम को अपने से करनी चाहिए और प्रदेश को एक पूर्णकालिक गृह मंत्री (जिसके साथ कम से कम तीन ऊर्जावान गृह राज्यमंत्री भी तैनात हों) यूपी को देना चाहिए जिससे इस विभाग में व्याप्त गड़बड़ियों को सही तरह से ठीक किया जा सके और विभाग की चिंताओं और समस्याओं पर भी विचार किया जा सके. आशा की जा सकती है कि नए पुलिस मुखिया द्वारा इस दिशा में सरकार के सामने एक कार्ययोजना प्रस्तुत की जाएगी जिस पर सरकार को अमल करने के बारे में सोचना भी होगा. पुलिसिंग में निचले स्तर पर आज से तीन दशक पहले की पीस कमेटियों को फिर से जीवित करना होगा जिससे समाज के लोग साथ में बैठकर स्वयं समस्याओं पर विचार कर सकें. आज के समय में चल रही पीस कमेटियों पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि उनमें केवल वही लोग स्थान पाए रहते हैं जो सीधे पुलिस से जुड़े होते हैं और समाज का सही प्रतिनिधित्व भी नहीं करते हैं.
                 निश्चित तौर पर कासगंज ने सीएम आदित्यनाथ के लिए चुनौती प्रस्तुत की है और अब यह उन पर ही निर्भर करता है कि वे यूपी के गृह विभाग को किस तरह से चलाना चाहते हैं और क्या उनकी मंशा वास्तव में प्रदेश की कानून व्यवस्था में सुधार करने की है तो क्या उसकी शुरुवात वे लोकभवन में शक्तियों के विकेन्द्रीकरण से करने के बारे में मानसिक रूप से तैयार भी हैं ? सीएम के पास ४ वर्षों से अधिक का समय है जिसका उपयोग वे गृह विभाग में सुधारात्मक क़दमों के लिए आसानी से कर सकते हैं साथ ही बड़े शहरों में पुलिस आयुक्त की अवधारणा पर भी काम किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि सत्ता में बैठे किसी भी दल के सीएम की खोखली चेतावनी से यह विभाग सदैव ही रूबरू रहता है और यह भी जानता है कि कासगंज जैसी घटनाओं से किस तरह उबरा जाता है पर अब प्रदेश को कुछ ठोस क़दमों की आवश्यकता है और अब यह आशा पूरी करना सिर्फ सीएम आदित्यनाथ पर ही निर्भर है.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 20 जनवरी 2018

रक्षा तैयारियां और मोदी सरकार

                                                         सत्ता सँभालने के बाद से ही लगातार जिस तरह से संसद से लेकर सड़क तक भाजपा, खुद पीएम मोदी और उनकी सरकार के मंत्री जिस तरह से अपनी पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार पर आक्रामक रहा करते हैं और उस पर यह आरोप लगाया करते हैं कि उसने देश की रक्षा से समझौता किया और सेनाओं के लिए १० वर्षों तक पर्याप्त धन की व्यवस्था भी नहीं की उसकी पोल खुद उनके सांसद मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी की अध्यक्षता में गठित रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने खोल कर रख दी है. समिति ने जिस स्तर पर सरकार की आलोचना की है उससे यही लगता है कि रक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर है और हालत यहाँ तक पहुंच गयी है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में रक्षा बजट केवल २.७४ लाख करोड़ रुपयों का रखा गया है जो कि प्रस्तावित जीडीपी का १.५६ % और १९६२ के चीन युद्ध के बाद से न्यूनतम है. समिति ने सेना के आधुनिकीकरण के लिए जरूरत भर का फंड उपलब्ध नहीं कराने और रक्षा खरीदारी को फास्ट ट्रैक नहीं करने के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की है। इस वित्तीय वर्ष में आर्मी, नेवी और वायुसेना को आधुनिकीकरण की उनकी मांग की तुलना में क्रमशः महज ६०, ६७ और ५४ फीसदी फंड उपलब्ध कराया गया है। समिति ने इस बात की आशंका और चिंता भी जताई है कि फंड की अनुपलब्धता का प्रतिकूल असर सेना के ऑपरेशंस पर पड़ सकता है।
                                          समिति ने मोदी सरकार को सेना के सुस्त आधुनिकीकरण के लिए फटकार लगाई और कहा है कि चीन और पाकिस्तान की तरफ से देश की सुरक्षा के लिए खड़े किए जा रहे मौजूदा खतरों के दौरान भी सेना के आधुनिकीकरण में सुस्ती बरती जा रही है। भारतीय सेना कई मोर्चों पर कार्रवाई के लिए संसाधनों की कमी से जूझ रही है इनमें सबमरीन, फाइटर जेट, हॉवित्जर्स और हेलिकॉप्टर्स की कमी के साथ नई जेनरेशन की असॉल्ट राइफल, मशीन गन, बुलेट फ्रूफ जैकेट्स और हेल्मेट्स जैसे बेसिक संसाधनों की कमी भी शामिल हैं। ये वो आंकड़े हैं जो हमारी सेनाओं और उनके लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की वास्तविक तस्वीर को सामने लेकर स्थिति की गंभीरता को बता रहे हैं फिर भी सरकार की तरफ से केवल पूर्व की सरकार पर हमले किये जाने और उसकी आलोचना तक खुद को सीमित किया जाना आखिर किस तरह से देशहित में अच्छा कहा जा सकता है ? यह सही है कि देश में रक्षा सौदों में दलाली के चलते कोई भी सरकार कुछ भी खरीद करे उस पर आरोप बहुत आसानी से लगाए जा सकते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि हथियारों को बनाने वाले देश और निर्माण करने वाली लगभग हर कम्पनी ने पूरी दुनिया में अपने एजेंट नियुक्त कर रखे हैं जिनके माध्यम से देश और कम्पनी किसी भी सौदे में उनकी सहभागिता होने या न हो पाने की दशा में भी कमीशन का भुगतान किया करती हैं जो कि पूरे विश्व में एक सामान्य प्रक्रिया है पर भारत में इसे जिस तरह से घूस कहा जाता है वह कमीशन की श्रेणी में नहीं आ सकता है इसलिए सरकार को भी सौदों में तत्परता के लिए अपनी शर्तों में इन एजेंट्स के लिए एक सीमा तक आधिकारिक रूप से कमीशन दिए जाने को वैध कर देना चाहिए जिससे आने वाले समय में रक्षा खरीद को पटरी पर लाया जा सके और भ्रष्टाचार के कथित आरोपों से बचने के लिए सरकारें देश की सुरक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप रख पाने में सफल हो सकें.
                                   जिस तरह से पूरा देश जानता है कि देश में रक्षा खरीद की प्रक्रिया बेहद पेचीदी है जिसके चलते कोई भी सरकार केवल अपने को बचाने के प्रयास में ही लगी दिखाई देती है कि कहीं उस पर देश की सुरक्षा के मामले में समझौता करने और कमीशन लेने का आरोप न लग जाये. बोफोर्स कांड के बाद से जिस तरह से वह देश में एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बन गया था उसे देखते हुए भी वर्तमान खरीद प्रक्रिया में बेचने वाले देशों की सरकारों या कंपनियों के एजेंट्स की भूमिका को स्पष्ट करने की आवश्यकता भी सामने आ चुकी है क्योंकि अब नीतियों में व्याप्त कमियों को सुधारने की आवश्यकता अधिक है जबकि हम एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने में ही व्यस्त हैं ? हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में सेना ही सर्वोपरि है और उसके निर्णय के सामने खड़े होने का साहस कोई भी नहीं कर सकता है जिसके चलते वहां रक्षा सौदे करना आसान है और चीन अब रक्षा क्षेत्र में खुद एक उत्पादक देश के रूप में स्थापित हो रहा है जिससे उसको रक्षा खरीद के लिए दूसरे देशों पर उतना निर्भर नहीं रहना पड़ता है पर भारत की स्थिति को देखते हुए क्या संसद में ही सर्वसम्मति से एक नयी रक्षा खरीद नीति को लागू करने की आवश्यकता नहीं है जिससे आने वाले कुछ वर्षों में देश की रक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप किया जा सके ?  
                                    देश ने बहुत काम करने वाले और सादगी से भरे दो रक्षा मंत्री ए के अंटोनी और मनोहर पणिकर भी देखे पर ईमानदारी से काम करने के बाद भी वे देश की रक्षा आवश्यकतों को पूरा करने में असफल ही रहे जिसके लिए उन्हें दोषी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश की रक्षा खरीद की प्रक्रिया की पेचीदियों पर काबू पाए बिना इसे सुधारा नहीं जा सकता है. खरीद में अब एक सीमा तक कमीशन को कानूनी रूप से सही घोषित किया जाना चाहिए और उसे हर हालत में कम्पनी द्वारा ही दिया जाना चाहिए साथ ही मंत्रालय को इस बारे में गुणवत्ता की जाँच कर उसकी न्यूनतम अंतर्राष्ट्रीय कीमत पर खरीदने की अनुमति होनी चाहिए जिससे सरकार का दखल उसमें कम किया जा सके और ऐसी किसी भी खरीद को संसदीय समिति के सामने भी निश्चित समय सीमा में रखने और उसकी संस्तुतियों के आधार पर सीधे संसद से अनुमोदन कराने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए. इस तरह की पारदर्शी व्यवस्था बनाये जाने से जहाँ खरीद को आसान बनाया जा सकता है वहीं हमारी सेनाओं की आवश्यकताओं को भी हर समय पूरा रखने की एक सीमा को जल्दी ही पाया जा सकता है. मोदी सरकार को भी इक्का दुक्का मामलों को देश के सामने रखकर अपनी रक्षा तैयारियों के बारे में प्रदर्शन करने के स्थान पर पूरी सेना की समग्र तैयारियों के बारे में गभीरता से सोचना शुरू करना चाहिए जिससे सेना को सही तरह से आधुनिक किया जा सके.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

उग्र बच्चे उत्तरदायी कौन ?

                                                     लखनऊ के एक स्कूल में सातवीं में पढ़ने वाली एक छात्रा ने जिस तरह से पहली कक्षा के मासूम बच्चे पर जानलेवा हमला कर उसे जान से मारने की कोशिश की वह हमारे समाज की वर्तमान व्यवस्था को झकझोरने के लिए काफी है क्योंकि भले ही पहली दृष्टि में हम सभी को यह एक असामान्य घटना लगे जिसमें सिर्फ एक दिन की छुट्टी हो जाने की आशा में कोई ११ साल की लड़की इस हद तक चली गयी हो पर गंभीरता से विचार करने पर यह पूरी तरह से सामाजिक, पारिवारिक उत्तरदायित्वों को सहेज पाने की हमारी विफलता ही दिखाई देती है. अब जिस तरह से पूरे मामले को घुमाने की कोशिशें हो रही हैं वे अपने आप में इसे भी कुछ दिनों में भूल जाने वाली घटना में बदल देंगीं और जब कभी कहीं से इस मामले की किशोर न्याय बोर्ड में सुनवाई होगी तब इस बारे में हम एक बार फिर अपनी चिंताएं व्यक्त कर आगे बढ़ जायेंगें. लखनऊ के एसएसपी द्वारा जो बयान दिया गया वह वास्तव में चौंकाने वाला है कि यह छात्रा पहले भी दो बार घर से गायब हो चुकी थी जिसके बारे में पुलिस के पास भी सूचना दी गयी थी फिर भी छात्रा के परिजनों, स्कूल या पुलिस ने इतनी कम उम्र की इस छात्रा की उचित कॉउन्सिलिंग कराने के बारे में क्या कदम उठाया यह सामने नहीं आया है.
                                   अभी भी जिस तरह की जानकारियां सामने आ रही हैं उनसे यही लगता है की इस घटना के पीछे कोई अन्य कारण भी हो सकता है क्योंकि जिस तरह से स्कूल ने घटना के बारे में पुलिस प्रशासन को सूचित नहीं किया और २४ घंटे बाद इस मामले में पुलिस का हस्तक्षेप शुरू हुआ वह भी संदेह उत्पन्न करता है. नियमतः किसी भी स्कूल प्रबंधन को किसी भी दुर्घटना की जानकारी पुलिस को देना कानूनी और सामाजिक रूप से सही और आवश्यक होता है पर इस मामले में पुलिस को पता ही बहुत देर से चला जिससे प्रबंधन भी संदेह के घेरे में आ गया. यदि स्कूल की तरफ से पहले ही यह प्रयास किया जाता कि घटना पुलिस के संज्ञान में हो तो संभवतः मामला इतना नहीं बिगड़ता. यदि मौके से साक्ष्यों को मिटाने का प्रयास किया गया है तो स्कूल पर शक और भी गहरा जायेगा भले ही इसमें सिर्फ छात्रा ही शामिल रही हो. पुलिस को स्कूल और वहां पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से भी गहन पूछताछ करनी चाहिए जिससे प्रबंधन के बारे में किसी गड़बड़ी का अंदाज़ा लग सके और यह भी हो सकता है कि स्कूल ने बदनामी से बचने के लिए मामले को खुद अपने स्तर से निपटाने की कोशिश की हो जिसमें बच्चे को लगी गंभीर चोटों के कारण मामला बिगड़ गया.
                       समाज के तौर पर हमें अब अपने निरीक्षण की आवश्यकता भी है क्योंकि आखिर वे क्या कारण है कि हमारी एक बच्ची इतनी हिंसक हो जाती है कि वह दूसरे बच्चे की जान लेने तक सोच जाये ? क्या हमारे घरों में पहुंची टीवी और हाथों में आये इंटरनेट वाले मोबाइल फ़ोन इस दिशा में बच्चों के कोमल मन को प्रभावित तो नहीं कर रहे हैं ? आखिर टीवी पर कुछ भी दिखाए जाने को सही कैसे ठहराया जा सकता है क्योंकि अपराधों के बारे में आने वाले अधिकांश कार्यक्रमों में अपराधी के काम करने का तरीका क्या था यही बताया जाता है और उन कार्यक्रमों को देखने वाले हमारे बच्चे यह निर्णय नहीं कर पाते हैं कि इस जानकारी का क्या किया जाये ? संयुक्त परिवारों से दूर होते छोटे परिवारों में आज माता-पिता के पास इतना समय ही नहीं है कि वे अपने बच्चों के साथ रह पाएं और उनकी गतिविधियों पर भी ध्यान दें क्योंकि कोई बच्चा एक दिन में इतनी आपराधिक प्रवृत्ति से भर नहीं सकता है. कई बार घर में मिलने वाली उपेक्षा या अत्यधिक लाड प्यार भी उनके इस दिशा में बढ़ जाने का एक बड़ा कारण हो सकता है. आखिर क्यों आज हम समाज की एक मज़बूत इकाई बनकर जीने के स्थान पर अपने एकल इकाई में परिवारों को संभालना सीखते जा रहे हैं ? क्या इस तरह का जीवन हमारे घरों में हमारे बच्चों पर बुरा प्रभाव नहीं डाल रहा है और क्या अब इस समस्या से निपटने के लिए हमारे पारिवारिक मूल्यों की तरफ बढ़ने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है ? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हम केवल अपनी सुविधा के अनुरूप ही खोजने की कोशिशें करते रहते हैं और कुछ घट जाने पर केवल यह कहकर ही अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाते हैं कि बहुत बुरा समय आ गया है. समय बुरा नहीं आया है हमने अपने बच्चों को अच्छाइयों और बुराइयों के अंतर को समझाना बंद कर दिया है और उनके विकास के लिए उन्हें आज की दुनिया में खुला छोड़ दिया है जबकि हम सभी को यह सोचना चाहिए की खुलापन सिर्फ उतना ही हो जिसमें घुटन न हो घर के लोगों और समाज से बच्चों का अपनापन बना रहे और वे आने वाले समय में अच्छे नागरिक बनकर देश के लिए कुछ ठोस कर सकें तभी कुछ सुधार संभव है.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 3 जनवरी 2018

मानक रैक - रेलवे की नयी पहल

                                         हर वर्ष कोहरे और अन्य कारणों से भारतीय रेलवे की अधिकांश गाड़ियां अनिश्चित काल के लिए विलम्ब से चलने लगती हैं जिनसे निपटने के लिए सदैव ही रेलवे की तरफ से कई तरह के प्रयास किये जाते रहते हैं पर उनसे स्थितियों को सही करने में पूरी क्या थोड़ी भी मदद नहीं मिल पाती है जिससे रेलवे के साथ यात्रियों को भी बहुत असुविधा का सामना करना पड़ता है. इस समस्या से निपटने के लिए अब रेलवे की तरफ से एक नयी पहल की जा रही है जिससे यह आशा की जा सकती है कि यदि इसे सही तरह से लागू किया जा सका तो आने वाले समय में रेलवे अपने संसाधनों के बेहतर प्रबंधन से लगातार लेट होती गाड़ियों को काफी हद तक काबू में ला सकता है. इस योजना में अब पूरे देश में चलने वाली सभी गाड़ियों की संरचना को एक नियमित मानक में कर दिया जायेगा जिससे आरक्षण से लगाकर अन्य सभी समस्याओं से बिना किसी परेशानी के निपटा जा सकेगा और बहुत देर से चलने वाली गाड़ियों के स्थान पर उपलब्ध रैक्स को उपयोग में लेकर किसी भी  स्टेशन से जाने वाली गाड़ी को सही समय से रवाना किया जा सकेगा. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि मान लीजिये लखनऊ स्टेशन से किसी गाड़ी को शाम के तीन बजे रवाना होना है पर जो रैक उस मार्ग उस गाड़ी के लिए चलायी जाती है वह किसी कारण से लेट है तो उसके आने के बाद उसको आवश्यक अनुरक्षण के कार्य के लिए यार्ड में भेजा जायेगा जिससे उसके जाने का समय भी और लेट हो जायेगा. इस स्थिति में रेलवे के मानक रैक उपलब्ध होने से सुबह समय से आयी और अनुरक्षण से वापस आ चुकी तथा देर रात में जाने वाली किसी अन्य गाड़ी के रैक को लखनऊ स्टेशन से इस गाड़ी के नंबर के साथ रवाना किया जा सकता है और देर रात जाने वाली किसी अन्य गाड़ी के समय पर लेट आने वाली गाड़ी के रैक को अनुरक्षण के बाद भेजा जा सकता है.
                                             आज रेलवे के सामने इस प्रक्रिया को शुरू करने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसकी सभी गाड़ियों के रैक्स आज की आवश्यकता के अनुसार १२, १६, १८, २२ और २६ कोच के होते हैं जिस कारण रेलवे किसी ट्रेन के लेट होने पर किसी और खड़ी ट्रेन को उसके नाम से नहीं चला पाती और मुख्य ट्रेन का आने का ही इंतजार करना पड़ता जिससे पहले सही लेट चल रही गाड़ियां और भी लेट हो जाती हैं और रेलवे के पास उनको निरस्त करने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं बचता है. इससे जहाँ रेलवे को आर्थिक नुकसान होता है वहीँ यात्रियों के लिए भी अचानक से नयी समस्या सामने आ जाती है. रेलवे के नए प्लान के अनुसार यदि काम सही ढंग से चल पाया तो सही समय से चलने वाली एक गाड़ी के रैक का दूसरी गाड़ी में उपयोग करके गाड़ियों के लेट होने के घंटो पर नियंत्रण किया जा सकेगा साथ ही विषम से विषम परिस्थिति में भी ट्रेन को निरस्त करने जैसे कदम उठाने ही नहीं पड़ेगें क्योंकि तब लेट होने की एक सीमा निर्धारित की जा सकेगी और उसके बाद भी लेट चलने वाली गाड़ी को समय रहते ही निरस्त कर दिया जायेगा जिससे यात्रियों को अधिक समस्या का सामना न करना पड़े. ऐसी स्थिति के लिए तैयार होने के लिए रेलवे को तेज़ी से अपने अनुरक्षण से जुड़े संसाधनों को बढ़ाना होगा क्योंकि अभी कुछ जगहों पर छोटी रैक का अनुरक्षण ही किया जाता सकता है जिसके चलते वहां पर २२ डिब्बों वाली रैक का अनुरक्षण संभव नहीं हो पायेगा और जब तक पूरे देश में इस व्यवस्था को लागू नहीं किया जा सकेगा तब तक रेलवे के लिए परिचालन से जुडी समस्याएं बनी ही रहने वाली हैं.
                                               आने वाले समय में जिस तरह से भारतीय रेलवे की सभी गाड़ियों को आधुनिक एलएचबी रैक्स से बदलने की नीति पर अमल शुरू हो चुका है तो इससे भी ट्रेनों की गति और सुरक्षा पर गुणात्मक असर पड़ने वाला है. ये कोच हमारे परंपरागत कोचों से हलके और बेहद मज़बूत होते हैं साथ ही इनमें दुर्घटना के समय न पलटने की तकनीक का उपयोग किया गया है जिससे दुर्घटना की भयावहता को कम किया जा सकता है. इन कोचों को आधुनिक तरीके से बनाया जाता है जिससे इनका अनुरक्षण और सफाई करना पहले के मुक़ाबले आसान हो गया है और इस कार्य में लगने वाले समय को भी घटाने में रेलवे को अच्छी खासी मदद मिलने वाली है. आशा की जानी चाहिए कि जिन ३०० मार्गों पर चलने वाली गाड़ियों में प्रारंभिक तौर पर २२ कोचों वाली मानक रैक का उपयोग प्रारम्भ करने के बारे में विचार किया गया है उसको देखते हुए जल्दी ही गाड़ियों के लेट होने के समय को कम किया जा सकेगा साथ ही रेलवे को अत्यधिक व्यस्त मार्गों पर कोहरे के अतिरिक्त फिर से २६ कोचों के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि २६ कोच वाली हर गाड़ी में ४ कोच कम होने से गाड़ियों की परिवहन क्षमता भी कम हो जाएगी और यात्रियों का दबाव अन्य गाड़ियों पर बढ़ जायेगा जिससे इस नयी समस्या से निपटना और भी कठिन हो सकता है. इसके लिए रेलवे इसे चरणबद्ध तरीके सभी लागू कर सकता है जिसमें २२ और १८ कोचों का मानक बनाते हुए पहले पहले इन दो स्तरों पर काम किया जाये और बाद में कोचों की उपलब्धता और उत्पादन के अनुरूप एक निश्चित समय सीमा में इस नयी व्यवस्था को लागू किये जाने का प्लान भी सामने रखना चाहिए और यदि संभव हो तो इसके साथ ऐसा नियम भी जोड़ा जाना चाहिए जिससे आने वाले समय में इसके कार्य को रोका न जा सके.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 3 दिसंबर 2017

डॉक्टर-लैब-फार्मा कम्पनी गठजोड़

                                                       एक समय में चिकित्सा व्यवसाय को सबसे अच्छा माना जाता था और यह भी माना जाता था कि कोई भी डॉक्टर किसी भी परिस्थिति में अपने यहाँ आये हुए किसी भी रोगी के हित के लिए ही सदैव प्रयत्नशील रहता है पर आज के बदलते परिवेश में जिस तरह की ख़बरें और घटनाएं सामने आती हैं उनसे आम लोगों की इस धारणा को बहुत धक्का भी लगता है. नयी दवाओं और चिकित्सा जगत में होने वाले नए अनुसंधानों से देश के विभिन्न भागों में काम कर रहे डॉक्टर्स को परिचित कराने तथा उनको रोगियों के हितों में उपयोग करने के लिए लगभग हर दवा कम्पनी अपने स्तर से प्रयास करती है और अपने उत्पादों की बिक्री के लिए डॉक्टर्स को विभिन्न तरह के उपहारों से उपकृत भी करती रहती है. जब तक चिकित्सा जगत में व्यावसायिक घरानों की पैठ नहीं हुई थी तब तक सब कुछ ठीक ही चल रहा था पर जब से दवा कंपनियों ने फार्मा लाइन से जुड़े हुए डी फार्मा, बी फार्मा और एम फार्मा अभ्यर्थियों के स्थान पर एमबीए किये हुए लोगों के हाथों में बिक्री को सौंप दिया है तब से इस क्षेत्र का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है और दूसरी कम्पनी के बिकते हुए उत्पादों की होड़ में अब हर छोटी बड़ी कम्पनी कुछ भी बनाकर बेचने की राह पर चल चुकी हैं और इसमें दुर्भाग्य की बात यह है कि डॉक्टर्स सब कुछ जानते हुए भी सिर्फ अपने लालच के कारण इन कंपनियों के जाल में उलझे हुए हैं.
                                       यह सही है कि कई बार लक्षणों के आधार पर रोग का पता लगा पाना कठिन हो जाता है और दिखाई देने वाले लक्षणों के अतिरिक्त कोई और रोग भी किसी रोगी में हो सकता है जिसे जानने के लिए विभिन्न तरह की जांचें करवाने की आवश्यकता भी पड़ती रहती है. जब तक आवश्यकता हो तब तक इसे सही समझा जा सकता है पर जब यह भी कमाई का एक और जरिया बन जाए तो इस पर लगाम लगाने की आवश्यकता आ जाती है. आज बड़े शहरों में बड़ी लैब्स के साथ हज़ारों छोटी लैब्स मौजूद हैं जो अपने असली काम के साथ इस तरह के काम में भी लिप्त हैं पर सोचने वाली बात यह है कि लाखों रुपयों के खर्च के बाद स्थापित होने वाली लैब्स आखिर छोटे शहरों और कस्बों तक में कैसे खुलती जा रही हैं जबकि उनके पास आवश्यक चिकित्सक और लैब सुविधाएँ भी नहीं हैं ? यदि इन छोटे शहरों में बैठे हुए झोलाछाप चिकित्सकों और इन कुकुरमुत्तों की तरह उग आयी लैब्स पर ध्यान दिया जाये तो पूरे देश में यह हज़ारों करोड़ का अनैतिक कार्य सामने आ सकता है. इन कथित चिकित्सकों के पास कोई डिग्री नहीं होती जिससे वे केवल लैब से मिलने वाले अपने कमीशन के चक्कर में भी अनाप शनाप जांचें कराते रहते हैं जिससे पहले से ही परेशान रोगी पर और अधिक आर्थिक दबाव पड़ता है पर इस दिशा में सोचने का समय संभवतः किसी के पास नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों की नज़रें अभी तक इस गठजोड़ पर नहीं पड़ रही हैं.
                               इन सबसे बचने के लिए आखिर किस स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है अभी हमारे देश में किसी को भी इस बात की जानकारी भी नहीं है क्योंकि लोग आज भी भरोसे के चलते आँखें बंद करके अपने डॉक्टर और उसके बताये रास्ते पर चलते हैं. बंगलुरु में जिस तरह से चिकित्सकों और लैब के बीच का गठजोड़ सामने आया है और उसमें करोड़ों रुपयों की ज़ब्ती के साथ विदेशी मुद्रा भी मिली है तो क्या केंद्र सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अविलम्ब इस बात पर सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आखिर यह सब कैसे रोका जाना चाहिए ? ऐसा नहीं है कि नेताओं और अधिकारियों को यह नहीं पता है पर उनके अपने स्वार्थ हर तरह की परिस्थिति में सिद्ध हो जाते हैं तो उन्हें आम लोगों की इस समस्या पर सोचने की आवश्यकता ही नहीं है. इस बारे में अब सरकार को हर डॉक्टर की डिग्री को आधार से जोड़कर उसके द्वारा पूरे साल में कराई जाने वाली जांचों पर नज़र रखने के लिए एक व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जिससे यह पता चल सकेगा कि वह डॉक्टर कितने रोगी देख रहा है और कितना धन लैब्स से ले रहा है साथ ही आयकर देने और उसके इस तरह की आमदनियों के बीच किस तरह का सामंजस्य है भी या नहीं ? इस तरह के कदम से जहाँ सरकार को अधिक राजस्व मिल सकता है वहीँ रोगियों के लिए सही जांचों तक डॉक्टर्स और लैब्स को सीमित किया जा सकता है.
                             ऐसा भी नहीं है कि आज सारे चिकित्सक लैब्स और फार्मा कंपनियां इस तरह के कामों में लिप्त है फिर भी यह मानकर काम नहीं चलाया जा सकता है कि हर जगह कुछ लोग गलत तरह से काम करते हैं. सरकार को इस दिशा में सुधार के लिए पहले एक व्यापक नीति बनानी होगी जिसके बाद ही उसको कानून का रूप दिया जा सकता है. रोगियों को अच्छी सुविधाएँ देने के लिए जन औषधि केंद्रों की तरह लैब्स की अवधारणा को भी मूर्त रूप दिया जा सकता है कम से कम जिला अस्पतालों की क्षमता को इतना अधिक बढ़ाये जाने पर बल दिया जाना चाहिए जो कम से कम अपने जिले के रोगियों को इस तरह की सुविधाएँ उचित दरों पर उपलब्ध कराने के केंद्र के रूप में विकसित किये जा सकें. इसके लिए सरकार को चिकित्सा में उच्च शिक्षा के लिए व्यापक सुधार करते हुए एमडी डीएम आदि स्तरों पर शिक्षा की अधिक व्यवस्था के बारे में सोचना ही होगा साथ ही आयुष मंत्रालय को इस दिशा में और अधिक कारगर बनाये जाने की आवश्यकता पर ही ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे रोगी के सामने हर स्तर की चिकित्सा सेवा लेने का विकल्प खुल सके और वह अपनी समस्या में किसी बड़े व्यावसायिक गठबंधन का शिकार न हो जाए.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...