मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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रविवार, 15 अप्रैल 2018

एक राष्ट्र एक चुनाव की परिकल्पना

                                                मोदी सरकार की देश में लोकसभा- विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाने की मंशा पर विभिन्न स्तरों पर विचार करने की दिशा में काम शुरू हो गया है पर क्या इस तरह प्रयास से आने वाले समय में देश को कोई लाभ होगा या फिर देश एक नयी तरह की तानाशाही युक्त लोकतान्त्रिक अराजकता की तरफ बढ़ जायेगा ? आज के समय भी जिस तरह से त्रिशंकु सदन बनने पर सरकार बनाना पूरी तरह से केंद्र सरकार की मंशा पर ही निर्भर हो चुका है उससे आने वाले समय में केंद्र की तरफ से पड़ने वाले अनावश्यक दबाव से राज्यों के नेता किस तरह से निपट पायेंगें यह बहुत बड़ी चुनौती होने वाला है. यह सही है कि हर वर्ष कभी भी किसी न किसी राज्य में चुनाव होने से लागू होने वाली आचार संहिता के चलते विकास कार्यों की गति में रुकावट पैदा होती है पर क्या नेताओं को यह सोचने का समय नहीं है कि आज उनको आचार संहिता लागू होने से इतना कष्ट क्यों होता है जबकि यह परंपरा आज़ादी के बाद से ही चली आ रही है ? आचार संहिता लगाने का सीधा सा मतलब यही हुआ करता था कि सत्ताधारी दल और पूरे विपक्ष के लिए चुनावों से पूर्व एक समान वातावरण में जनता के सामने जाने का विकल्प खुला रहे. आज आचार संहिता से विकास रुकने की प्रक्रिया का आरोप लगाने वाले नेता क्या यह स्वीकार कर सकते हैं कि उनकी नीतियां भी चुनावों को प्रभावित करने के लिए ही होती हैं ?
                                         एक साथ चुनाव होने पर सबसे बड़ी समस्या तब सामने आएगी जब केंद्र या किसी राज्य में कोई सरकार अल्पमत में आ जाएगी तब किस तरह से सांसदों या विधायकों की खरीद फरोख्त की जाएगी इसका अंदाज़ा आज आसानी से लगाया जा सकता है क्योंकि राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों के चुनावों में जिस तरह से कुछ हद तक धन कुबेरों को हर पार्टी मैदान में उतारती रहती है उससे अल्पमत वाली सरकार को  बचाने के लिए सरकार समर्थक धन कुबेर और उद्योगपति परदे के पीछे के खेल में धन का दुरूपयोग कर क्या लोकतंत्र का मज़ाक नहीं उड़ाएंगे ?  लोकतंत्र नैतिकता के आधार पर टिकता और चलता है पर केन्द्र की मोदी सरकार ने जिस तरह से कई राज्यों में सबसे बड़े दल की राज्यपालों के माध्यम से अनदेखी कर किसी भी परिस्थिति में अपने गठबंधन की सरकारें बनाने की गलत परंपरा शुरू कर दी है वैसी स्थिति में कोई महत्वाकांक्षी केंद्र सरकार सभी राज्यों में राजनैतिक गतिविधियों को आसानी से अपने अनुसार मोड़ने की तरफ क्या नहीं बढ़ जाएगी? भारत जैसे विविधता भरे देश में जनता के सामने हर स्तर पर अपने मनपसन्द उम्मीदवार को चुनने का अवसर संविधान की तरफ से दिया गया है जिससे आज देश के कई हिस्सों में क्षेत्रीय दल भी सफलता के साथ सरकारें चला रहे हैं पर एक साथ चुनाव होने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति भी बन सकती है जो राजनीति को केवल राष्ट्रीय दलों के बीच में ही सीमित करने का काम भी क्र सकती है ?
                                         सबसे बड़ा मुद्दा धन को बचाने और विकास की गति को निरंतर बनाये रखने से जुड़ा है तो इस मामले के लिए सबसे पहले नेताओं को अपने गिरेबान में झाँकना होगा क्योंकि सरकार कोई भी दल चलाये पर देश की समस्याएं तो वही रहती हैं तो संसद और विधान सभाओं से होने वाले विधायी कार्यों पर ध्यान देकर नीतियों को लम्बे समय के लिए लागू करने की दिशा में सोचना चाहिए जैसे एक समय देश में पञ्चवर्षीय योजनाएं और २० सूत्री कार्यक्रम चला करते थे जिससे किसी भी चुनाव के आने जाने से इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर किसी तरह की रोक नहीं होती थी. क्या आज देश के नेताओं को एक चुनाव से अधिक एक अलग सोच के साथ विकास के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है? योजना आयोग हो या बदले नाम नीति आयोग जब तक नेताओं की मंशा साफ़ नहीं होगी तब तक किसी भी परिस्थिति में चुनावी सुधारों को सही तरह से लागू नहीं किया जा सकता है।  आखिर सरकार की मंशा केवल चुनाव एक साथ कराने के सुधारों तक ही क्यों रुकी हुई है क्या देश के सम्पूर्ण चुनाव परिप्रेक्ष्य पर विचार का उसमें आज के अनुसार बदलाव करने की आवश्यकता सरकार को महसूस नहीं हो रही है ?  चुनाव सुधारों को केवल अपने परिप्रेक्ष्य में देखने से परिस्थितयां बदलने वाली नहीं है और सबसे बड़ी समस्या त्रिशंकु और अल्पमत की सरकारों वाले राज्यों में सामने आने वाली है क्योंकि वहां पर चुनाव हो नहीं पायेंगें तो क्या अघोषित रूप से केंद्र अपने हिसाब से राष्ट्रपति शासन लगाकर वहां की बागडोर सीधे अपने हाथों में नहीं ले लेगा ?
                                       इस सबसे अच्छा यही रहेगा कि चुनावों के लिए प्रति वर्ष एक महीना निर्धारित कर लिया जाये और पूरे वर्ष में कभी भी होने वाले चुनावों को केवल उसी महीने में कराने की दिशा में काम शुरू कर दिया जाये इससे जहाँ राज्यों में एक साथ एक वर्ष में चुनाव समाप्त हो जायेंगें वहीं किसी भी तरह की समस्या आने पर अगले वर्ष उसी महीने में फिर से चुनाव कराये जा सकेंगें। क्या किसी भी राज्य में चुनाव कराने के लिए आयोग को इतना लम्बा समय देना चाहिए कि नेता अपने अनुसार पूरे चुनाव को मोड़ने का समय पा जाएँ और खुलेआम लोकतंत्र का चीर हरण कर सकें ?  विकास अवरुद्ध होने  की अवधारणा सामने लाने वाले दलों को अब यह सोचना होगा कि उनकी  प्रभावित करने वाली नीतियों के चलते समस्याएं अधिक होती है न कि देश में अलग अलग समय चुनाव होने से यह सब प्रभावित होता है। 

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सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

विफल होते शासन और कानूनी बोझ

                                           सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायायधीश न्यायमूर्ति टी एस ठाकुर ने एक बार फिर सरकार से इस बात का आग्रह किया है कि उसकी तरफ से ऐसे तंत्र को बनाये जाने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे पहले से ही न्यायाधीशों की कमी से जूझ रहे न्यायालयों पर अनावश्यक काम के बोझ को कम किया जा सके. उनका यह कहना कि कई बार सरकार के तंत्र के निर्णय लेने में विफल होने पर ही अदालतों पर अनावश्यक बोझ बढ़ता है जिसे अपने स्तर से प्रक्रियागत सुधार करके सरकार इस स्थिति में सुधार भी कर सकती है. बहुत सारे ऐसे मामलें होते हैं जो थोड़ी प्रशासनिक दक्षता के साथ कोर्ट के बाहर ही सुलझाए जा सकते हैं पर आज भी वे किसी न किसी रूप में कोर्ट्स तक पहुँच कर अदालतों के आवश्यक कामों में देरी का कारण भी बनते हैं. उनका एक सुझाव यह भी था कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों का एक पैनल भी होना चाहिए जो किसी भी मामले के कोर्ट तक पहुँचने से पहले ही उसको सुलझाने का काम कर सके जिससे कोर्ट्स के बोझ का कम किया जा सके और सरकार एवं आम लोगों से जुड़े मुद्दों और मुक़दमों के लिए कोर्ट्स के पास सही समय उपलब्ध रह सके.
                                                             अभी तक जिस तरह से सरकारों की मंशा देश के स्वतंत्र न्याय तंत्र को अपने दबाव में लेने की रहा करती है कॉलेजियम सिस्टम के चलते वह पूरी नहीं हो पा रही है और नेताओं को कहीं न कहीं से यह भी लगता है कि संविधान में कोर्ट्स को जितने अधिकार दिए गए हैं वे आवश्यकता से अधिक है क्योंकि बहुत बार ऐसा भी होता है कि सरकार द्वारा लिए गए निर्णयों को कोर्ट्स में पलट दिया जाता है और उससे सरकार की किरकिरी भी होती है और उसको प्रशासनिक क्षमता पर भी सवाल उठ खड़े होते हैं. ऐसी किसी भी अप्रिय परिस्थिति से निपटने के लिए जिस तरह का सुझाव न्यायमूर्ति ठाकुर द्वारा दिया गया है वह आने वाले समय में बेहद कारगर भी हो सकता है क्योंकि उससे जहाँ विवादों को कोर्ट्स में जाने से पहले ही रोका जा सकेगा वहीं सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और अधिकारियों के पास भी किसी संभावित विवाद के बारे में पूरी स्थिति साफ़ होने के बाद उसमें संशोधन कर आवश्यकता के अनुरूप करने में मदद भी मिल जाया करेगी. इस तरह के तंत्र से कानूनी अड़चनों को दूर करने के साथ ही बेहतर समन्वय के साथ सरकार की नीतियों को पूरी तरह सुधार कर लागू किया जा सकेगा.
                                    इस तरह का प्रयास केवल शीर्ष स्तर पर ही करने के स्थान पर काम के बोझ को निचले स्तर तक बांटकर आसान भी किया जा सकता है. यदि आने वाले समय में जनपद स्तर पर भी इसी तरह की व्यवस्था की जा सके और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों का एक पैनल हर ज़िले में बनाया जा सके जो किसी भी आम व्यक्ति के लिए कोर्ट जाने से पहले सुलह सफाई का काम भी देख सकता हो तो इससे कोर्ट्स का काम काफी हद तक हल्का करने में सहायता भी मिल सकती है. जब काम एक सीमा के अंदर हो जायेगा तो उससे पहले से लंबित मुक़दमों की सुनवाई भी आसानी से करने के बाद उनका निपटारा भी आसान हो जायेगा. निश्चित तौर पर सरकार के पास इस तरह से काम करने का विकल्प भी है जिसके माध्यम से वह जजों की संख्या बढ़ाये बिना भी कोर्ट्स के काम को आसान करने की तरफ सोच सकती है. आशा की जानी चाहिए कि न्यायमूर्ति ठाकुर की इस बात पर भी सरकार गंभीर विचार कर कानून मंत्रालय के माध्यम से एक नया तंत्र विकसित करने के बारे में सोचेगी जो आने वाले समय में देश के लंबित मुक़दमों की संख्या कम करने के साथ कोर्ट्स के अनावश्यक बोझ को भी कम करने का काम करेगा.
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शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

कलिजियम - जज और न्याय

                                                              मोदी सरकार के अस्तित्व में आने के बाद जिस तेज़ी से सभी राजनैतिक दलों ने न्यायाधीशों की नियुक्ति में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज़ कराने के लिए नयी एनजेएसी व्यवस्था को अपनाने के लिए संसद में जल्दबाज़ी दिखाई थी वह आज देश के आम नागरिकों को बहुत भारी पड़ रही है. इस व्यवस्था को कोर्ट में चुनौती दिए जाने और उसके अनुपालन पर पूरी तरह से रोक लगाते हुए सभी पक्षों और जनता की राय मांगने से सम्बंधित बातों को शुरू करने से पूरे देश के उच्च न्यायालयों में जजों की पहले से ही कम संख्या पर और भी बुरा प्रभाव पड़ने लगा है. लाखों मुकदमों के बोझ से दबे हुए राज्यों के उच्च न्यायलय अब जजों की ४०% कमी से जूझ रहे हैं जिससे न्याय मिलने में और भी देरी हो रही है. इस मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस केहर सिंह की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार की इस मांग पर अपनी राय देते हुए आदेश दे दिया है कि वर्तमान कलिजियम प्रणाली से जजों की नियुक्ति को जारी रखा जा सकता है जिससे न्यायालयों के काम काज पर बुरा असर न पड़े और साथ ही उसने सुनवाई पर अपने निर्णय को सुरक्षित भी कर दिया है.
                    इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले समय में कलिजियम सिस्टम से होने वाली नियुक्तियों में उतनी पारदर्शिता नहीं होती थी जितनी एक परिपक्व लोकतंत्र में होनी चाहिए पर सरकार ने भी इस महत्वपूर्ण मसले पर केवल कानून में बदलाव कर जिस तरह से जजों की नियुक्ति में विधायिका के दखल को शुरू करने की कोशिश की थी उसका भी समर्थन नहीं किया जा सकता है. कोई भी व्यवस्था अपने आप में पूरी तरह से निरापद नहीं होती है और जब भी किसी व्यवस्था की कमियों को दूर करना हो तो उस व्यवस्था से जुड़े हुए विशेषज्ञों और कानून का अध्ययन करने के साथ ही व्यापक विचार विमर्श के साथ ही परिवर्तन के बारे में आगे बढ़ने की कोशिशें करने चाहिए जिससे नयी व्यवस्था को अविलम्ब लागू किया जा सके और उसमें किसी भी तरह की कानूनी अड़चने बाद में न आने पाएं. मोदी सरकार ने इस कदम को जिस उत्साह के साथ किया और देश के लगभग सभी दलों ने उसका आँखें बंद कर साथ दिया उससे यही लगता है कि देश की राजनैतिक शक्ति कहीं न कहीं से देश की न्यायपालिका के लिए पूर्ण नियंत्रण की बातें सोचने में लगी हुई है ?
                          देश के लोगों की नज़रों में आज भी न्यायपालिका का बहुत सम्मान है और संभवतः कानून में इतने बड़े परिवर्तन के बाद जिस तरह से इस मसले को चुनौती मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट में इस पर सुनवाई हुई उससे यही लगता है कि जजों ने भी जनता की उस भावना को समझा जिसके अंतर्गत देश का मानस जजों पर किसी भी तरह का राजनैतिक नियंत्रण स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है. अब जब इस मुद्दे पर सुनवाई पूरी हो चुकी है और संविधान पीठ के सामने बहुत सारे सुझाव भी आ चुके हैं तो अब सरकार को कोर्ट के अंतिम आदेश की प्रतीक्षा करनी चाहिए और उसके अनुरुप ही नए तंत्र का निर्माण करना चाहिए. कोर्ट के आदेश के आने तक अब सरकार के पास यह स्वतंत्रता आ चुकी है कि वह अपने स्तर से देश के उच्च न्यायालयों समेत सर्वोच्च न्यायालय के जजों की नियुक्ति के बारे में आगे बढे क्योंकि जब तक नयी व्यवस्था नहीं आती है और इन स्थानों पर जजों की नियुक्ति करना अवश्यम्भावी भी है तो इस मुद्दे पर तुरंत आगे बढ़ने के बारे में सोचना भी चाहिए. अब समय आ चुका है कि सरकार और संसद में बैठे हुए सभी नेता इस बात को अच्छी तरह से समझ लें कि संविधान ने उनको जो काम करने का अधिकार दिया है वे उसे ही पूरी तन्मयता के साथ कर लें अन्यथा देश के संवैधिनिक ढांचे को कमज़ोर करने की उनकी कोई भी कोशिश कहीं से भी उनके हित में नहीं होगी.   
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रविवार, 28 जून 2015

नीति आयोग और नयी व्यवस्था

                                                           देश में आज़ादी के बाद से ही केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों के बंटवारे को लेकर जिस तरह से विवाद बने ही रहते हैं उनसे निपटने के लिए आज तक कोई कारगर व्यवस्था नहीं बनायीं जा सकी है. आज़ादी के बाद जब पूरे देश में आर्थिक संसाधनों की बेहद कमी थी तो केंद्र सरकार ने योजना आयोग का गठन किया और केंद्रीय स्तर पर राज्यों को धन आवंटित करने की योजनाएं बनाना शुरू किया था. जब तक अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकारें रहीं तब तक मज़बूत केंद्रीय नेतृत्व के सामने किसी भी सीएम ने कभी भी कोई शिकायत नहीं की पर जब राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बननी शुरू हुई तभी से उन्होंने केंद्र पर गैर कांग्रेस शासित राज्यों के साथ भेदभाव के आरोप लगाने शुरू कर दिए थे. योजना आयोग की वार्षिक बैठक के बाद जिस तरह से केंद्र में सरकार चला रहे दल से इतर राजनैतिक दल के सीएम जब भी बाहर निकलते तो सदैव ही योजना आयोग पर कम धनराशि आवंटन का आरोप लगाते हुए ही निकलते थे और जब मोदी सरकार द्वारा संघीय प्रणाली को मज़बूत करने के उद्देश्य से नीति आयोग बनाया गया है तब भी स्थिति बदलती नहीं दिखाई दे रही है क्योंकि राज्यों को आज भी बिना किसी ज़िम्मेदारी के उसे खर्च करने की अनुमति के साथ और अधिक धन खर्च करने के लिए चाहिए.
                          नीति आयोग के उप-समूह की बैठक के बाद जिस तरह से कल यह विचार सामने आया कि आने वाले समय में केंद्रीय योजनाओं की संख्या को घटाया जाये उससे बेशक राज्यों को अपनी सुविधा और अाश्यकता के अनुसार काम करने की छूट मिल जाएगी पर इसके चलते सबसे बड़ा नुकसान यह भी संभावित है कि चुनावी वर्ष में राज्य के सीएम किसी एक योजना में आये हुए धन का दुरूपयोग अपने राजनैतिक लाभ साधने के लिए भी कर सकते हैं. अभी तक केंद्रीय योजनाओं में राज्यों का हिस्सा कम होने के चलते उनके लिए उसे किसी अन्य योजना में खर्च करना कठिन होता है पर नयी व्यवस्था में किसी दल विशेष की सरकार द्वारा लिए गए निर्णय आने वाली सरकार और जनता के लिए समस्या भी बन सकते हैं ? इन योजनाओं के लिए धनराशि आवंटित किये जाने के नियमों को और भी कठोर बनाया जाना चाहिए क्योंकि बिना किसी बड़े उत्तरदायित्व के किसी प्रदेश की जनता को सीएम के भरोसे कैसे छोड़ा जा सकता है अभी तक केंद्र की सरकार के साथ तालमेल बैठाने की अनिवार्यता के चलते योजनागत आवंटन में बदलाव उतना आसान नहीं था जो संभवतः आने वाले समय में केंद्र के लिए बड़ी समस्या भी बन सकता है.
                         जब पीएम खुद संघीय व्यवस्था को मज़बूत करने के बारे में चिंतित हैं और यह भी कहते हैं कि राज्यों के साथ भेदभाव किया जाता रहा है तो उन्हें इस संघीय व्यवस्था को और भी अधिक मज़बूत किये जाने के बारे में सोचना ही होगा. क्या नीति आयोग के लिए ऐसा संभव नहीं है कि उसकी योजनाएं राज्यों के बजाय मंडल या जनपद के आधार पर बनायीं जाएँ ? इस तरह की किसी व्यवस्था से केंद्र और संबंधित राज्य के पास देश के हर जनपद के बारे में पूरी जानकारी तो होगी ही साथ ही विभिन्न योजनाओं में उसकी कितनी सहभागिता की आवश्यकता है यह भी पता चल जायेगा. पर यह ऐसा काम होगा जिस पर राज्य संभवतः आसानी से राज़ी ही नहीं होंगें क्योंकि इसके माध्यम से उनको राजनैतिक कारणों से विभिन्न फंड्स को अपने मनपसंद जिले में खर्च करने की आज मिली हुई खुली छूट समाप्त हो जाएगी ? आज केंद्र जब बदलाव की राह पर है तो उसे योजनाओं को बिल्कुल निचले स्तर तक पहुँचाने की इस व्यवस्था के बारे में भी सोचना चाहिए इससे जहाँ देश के हर जिले को अपनी आवश्यकता के अनुसार फंड्स मिल सकेंगे वहीं आने वाले समय में कोई भी जिला विकास की इस प्रक्रिया से अछूता भी नहीं रह पायेगा. क्या मज़बूत पीएम राज्यों को इस बात के लिए आसानी से राजी कर इस तरह के काम कर पाने में सफल होंगें यह तो भविष्य ही बताएगा पर इससे कम किसी भी योजना के फण्ड को सीधे राज्यों के हवाले करने से ही धरातल पर समग्र परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.       
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शुक्रवार, 12 जून 2015

बीएसएनएल - फ्री रोमिंग और ट्राई

                                          केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने देश में सार्वजनिक क्षेत्र की दूर संचार कम्पनियों की तरफ से १५ जून १५ से फ्री इनकमिंग रोमिंग का जिस तरह से एलान किया गया था था उसके बाद यह लग रहा था कि आने वाले समय में देश को रोमिंग मुक्त करने की यह एक बेहतर शुरुवात हो सकती है पर निजी दूरसंचार कम्पनियों द्वारा ट्राई के मध्यम से जिस तरह से बीएसएनएल/ एमटीएनएल की इस कोशिश को रोकने की घटिया कोशिश की जा रही है वह अपने आप में कानून के दुरूपयोग का बहुत ही बुरा उदाहरण है. केंद्र सरकार पिछले कई वर्षों से देश में रोमिंग ख़त्म कर एक देश एक नंबर की योजना पर काम करने के बारे में सोच रही है और इस बारे में पिछली और वर्तमान सरकार की मंशा एकदम स्पष्ट है पर ट्राई जिसका गठन ही देश में दूरसंचार कम्पनियों पर नज़र रखने के लिए किया गया था उसकी तरफ से कई बार ऐसे निर्णय भी लिए जाते रहे हैं जो कहीं से भी उपभोक्ताओं के हित में नहीं दिखाई देते हैं तो इस आयोग के गठन और इसकी कार्यप्रणाली पर संदेह होने लगता है.
                    पहले भी कई बार बीएसएनएल की तरफ से उपभोक्ताओं के लिए लायी गयी किसी भी अच्छी योजना में निजी क्षेत्र की कंपनियां टांग अडाती रही हैं और सरकार तथा संचार निगम चाहकर भी इसके लिए कुछ नहीं कर पाते हैं. क्या ऐसे नियामक आयोग कि देश को आवश्यकता भी है जो कहीं से भी आम उपभोक्ताओं के हितों की व्यापक तौर पर रक्षा न कर पा रहा हो ? बेशक ट्राई के पास इस तरह की शिकायतें आती ही रहती हैं पर हमेशा सार्वजनिक क्षेत्र के लिए ही रास्ता रोकने के कामों में उसका दुरूपयोग क्यों किया जाये यह भी सोचने की बात है क्योंकि एक समय जब देश की संचार सेवाओं पर निगम का पूरा आधिपत्य था तो उसके हितों पर ट्राई के माध्यम से कानून के पीछे छिपकर निजी कम्पनियों ने बहुत हमले किये और आज निगम की इस हालत के लिए कहीं न कहीं से ट्राई भी ज़िम्मेदार है. जहाँ निजी कंपनियां केवल लाभकारी शहरी क्षेत्रों में ही अपनी सेवाएं देने के बारे में सोचती हैं वहीँ निगम को देश की सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी होने के कारण सरकार की मंशा के अनुरूप बहुत सारे घाटे वाले काम भी करने पड़ते हैं इस परिस्थिति में निगम के पास अपने वित्तीय स्वरुप को सँभालने के अवसर भी कम हो जाते हैं.
                          सरकार की तरफ से हरी झंडी मिलने के बाद अब बीएसएनएल को अपनी इस योजना को आगे बढ़ाना चाहिए साथ ही देश भर में फैले अपने लैंडलाइन कारोबार को भी तेज़ी से आगे बढ़ाने और फिर से उपयोगी बनाने के बारे में आक्रामक नीति पर काम करना चाहिए. आज भी पूरे देश में पहुँच रखने वाली वह एकमात्र कम्पनी ही है और यदि मौजूदा नेटवर्क को सुधारते हुए ब्रॉडबैंड तथा कॉल दरों को और भी आक्रामक बनाये जाने की तरफ थोड़ा भी ध्यान दे दिया जाये तो निगम अपने आपको इस दौड़ में फिर से शामिल कर सकता है. निगम की सेवाओं पर सदैव यही आरोप लगता है कि उसके मोबाइल सिग्नल कमज़ोर रहा करते हैं तो उस बारे में भी ट्राई को देखना चाहिए कि एक जैसी क्षमता के बीटीएस लगे होने के बाद क्या निजी क्षेत्र अपने सिग्नल्स को स्वीकृत मानकों से अधिक क्षमता पर तो नहीं चलाते हैं क्योंकि इससे आमलोगों के लिए स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं. खुद बीएसएनएल को भी अपने में सुधार करते हुए बेहतर सेवाओं के बारे में सोचना चाहिए और आईटीएस अधिकारी जो दूरसंचार विभाग से प्रतिनियुक्ति पर निगम में काम कर रहे हैं उनके विकल्पों को भी सीमित किये जाने की आवश्यकता भी है जिससे वे निगम को अपना कर्म क्षेत्र मान सकें.    
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शनिवार, 6 जून 2015

गंगा के बहाने जोशी का दर्द

                                                   गंगा को लेकर राजनीति करने वाली भाजपा के लिए उसके मार्गदर्शक मंडल के सदस्य डॉ मुरली मनोहर जोशी की तरफ से व्यापक स्तर पर जताई गयी चिंता के बाद जिस तरह से भाजपा के खेमे में खलबली मची हुई है उस पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी ही होगी क्योंकि यह मोदी सरकार की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसके लिए पूरी सरकार अपना दम लगा रही है. यह सही है कि गंगा की लम्बाई को देखते हुए उसे पूरी तरह से शुद्ध करना और उसमें एक बार फिर से जलपरिवहन को बढ़ावा देने की नीति से देश में गंगा के किनारे बसे हुए राज्यों के पास एक वैकल्पिक मार्ग भी उपलब्ध हो जायेगा पर साथ ही इस नयी परियोजना के अमल में आने में सदेह भी कम नहीं जताए जा रहे हैं. डॉ जोशी को केवल एक राजनेता ही नहीं माना जा सकता है क्योंकि वे विज्ञान के वरिष्ठ जानकर भी हैं तो उनके इस तरह के बयान के केवल राजनैतिक निहितार्थ निकाले जाने से कोई सफलता हाथ नहीं लगने वाली है. वरिष्ठता का अपना पैमाना और अनुभव होता है जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता है यही इस मामले में भी सही साबित हो सकता है.
                      आज भी लोग यही कहते नज़र आते हैं कि डॉ जोशी को सरकार में महत्वपूर्ण पद नहीं मिला है इसलिए वे इस तरह की बातें कर सरकार को असहज स्थिति में डालना चाहते हैं जबकि वास्तविकता कुछ और ही है क्योंकि मोदी सरकार जिस तरह से विकास के नाम पर अपने स्तर पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने में लगी हुई है वह वास्तव में बहुत ही चिंता का विषय है. पर्यावरण सम्बन्धी मामले को लेकर ही सरकार की आशंका को ग्रीन पीस जैसे संगठन पर रोक लगाने के रूप में ही देखा जा रहा है क्योंकि जिस तरह से सरकार के कुछ चहेते उद्योग समूहों के लिए उपजाऊ भूमि का तेज़ी से अधिग्रहण करने की कोशिशें लगातार की जा रही हैं वह किसी भी तरह से देश के किसानों के लिए हितकारी नहीं साबित हो सकता है. अभी तक केवल इस तरह के मामलों को विपक्षी दलों की राजनीति ही बताया जा रहा था पर अब इसमें पर्यावरण विशेषज्ञों की राय भी जुड़ती जा रही है जो आने वाले समय में मोदी सरकार के लिए नयी तरह की समस्याएं लेकर ही आने वाली है. विकास के मार्ग पर जब भी आगे बढ़ा जायेगा तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचना ही है पर विकास के साथ ही पर्यावरण को बचाये रखने की भी जुगत निरंतर किये जाने की आवश्यकता भी है.
                        बेशक मोदी सरकार पर जोशी के हमले के बाद विपक्ष हमलावर हो जाये पर विकास के हर मामले में सरकार गलत भी नहीं हो सकती है फिर भी विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने से पहले सरकार को यह तय करना चाहिए कि उससे आम लोगों और देश के पर्यावरण पर किस तरह का असर पड़ने वाला है ? मोदी के रूप में सत्ता का एकमात्र केंद्र होने से जहाँ मंत्रियों के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं होता क्योंकि मोदी किसी की बात सुनने के स्थान पर अपने मंतव्यों को पूरा होते देखने के आदी रहे है जो गुजरात जैसे राज्य में आसान था पर अखिल भारतीय स्तर पर उस मॉडल की सफलता संदेहास्पद ही अधिक लगती है. देश के लिए काम करने में हर सरकार लगी रहती है पर पर्यावरण से जुड़े मामले में अनावश्यक तेज़ी कई बार विकल्पों को सीमित भी कर दिया करती है. ऐसी परिस्थिति में अब मोदी और उनकी सरकार को विरोध के सुरों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि केवल एक-तरफा विकास के दावों के बीच आम जनता का भी पूरा ध्यान रखने की आवश्यकता भी है. दृढ इच्छाशक्ति के साथ काम करना अच्छा है पर सुधार के स्वरों को दबाने की हर कोशिश लोकतंत्र में सफलता का मन्त्र कभी भी साबित नहीं हो सकती है.         
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गुरुवार, 16 अप्रैल 2015

कैसा मैक्सिमम गवर्नेंस ?

                                            अब जब राजग सरकार अगले महीने अपनी सत्ता वापसी की पहली वर्षगांठ मानाने की तैयारी में लग चुकी है तो मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस का नारा देकर सत्ता में आई इस सरकार के कार्यों को देखकर कहीं से भी यह नहीं कहा जा सकता है कि इसकी उपलब्धि उस स्तर पर रही है जिसका वायदा इसने चुनावों से पहले किया था. इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि आज मिनिमम गवर्नेंस के नाम पर देश में केवल पीएमओ ही काम कर रहा है और बाकी सभी मंत्रालयों की स्थिति केवल फाइल्स को आगे बढ़ाने तक ही सीमित हो रही है जिससे एक तरफ पीएमओ पर अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है वहीं दूसरी तरफ महत्वपूर्ण मंत्रालयों का काम काज भी बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है. पूर्ण बहुमत और निर्णय लेने की स्पष्ट क्षमता के दावे के साथ सत्ता में आई सरकार से सामान्य सरकारी गतिविधियों को संचालित करते रहने वाले संस्थानों से जो अपेक्षा होती है क्या वह इसमें सफल हो पा रही है यह आज बहुत ही चिंता का विषय हो चुका है पर इसके बाद भी पार्टी या सरकार इस बारे में कुछ सोच कर आगे बढ़ने के बारे में गंभीर प्रयास करती नज़र नहीं आ रही है.
                           आज वैज्ञानिक एवं अनुसन्धान परिषद के महानिदेशक, देश के दो महत्वपूर्ण केंद्रीय सतर्कता आयोग सीवीसी और सीईसी के अध्यक्ष, रक्षा एवं अनुसन्धान विकास संगठन (डीआरडीओ) के अध्यक्ष, देश की तकनीकी शिक्षा को नियंत्रित करने वाले एआईसीईटी के प्रमुख, स्वास्थ्य क्षेत्र में ३० प्रयोगशालाओं के माध्यम से काम करने वाली आईसीएमआर के महानिदेशक तथा ११०० केंद्रीय विद्यालयों का सञ्चालन करने वाली केंद्रीय विद्यालय संगठन के आयुक्त के पद भी लम्बे समय से खाली पड़े हैं. देश की ज़मीनी हकीकत को बदलने का दावा करने वाली सरकार के पास आज इतना समय नहीं है कि वह इन अति महत्वपूर्ण संस्थाओं के लिए पूर्णकालिक प्रमुखों की नियुक्ति कर सके तो भाषणों में विकास और पूरे देश को बदल देने की बातें कहाँ तक हक़ीक़त में बदल पायेंगीं आज यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति के रूप में सामने आ रहा है. उल्लेखनीय बात यह भी है कि इन सभी का मोदी सरकार के उन दावों को ज़मीन पर उतारने से सीधा सम्बन्ध है जिसके बारे में सदैव ही बातें किया करती है तो क्या आज सरकार के काम करने की रफ़्तार केवल कुछ विशेष क्षेत्रों तक ही सीमित नज़र नहीं आ रही है.
                        सरकार रक्षा क्षेत्र में मेक इन इंडिया पर ज़ोर दे रही है पर डीआरडीओ के लिए उसे योग्य व्यक्ति नहीं मिल पा रहा है, उसे देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था से बहुत सारी शिकायतें हैं पर केंद्रीय विद्यालय संगठन और चिकित्सा क्षेत्र समेत वैज्ञानिक प्रयोगशालों को चलाने वाले संस्थान के लिए एक व्यक्ति की नियुक्ति करने का समय नहीं मिल पा रहा है. गुजरात में सूचना के अधिकार का गला घोंटने की प्रवृत्ति में सफल रहने के बाद क्या आज वही प्रयोग केंद्रीय स्तर पर करने की कोशिश मोदी सरकार द्वारा नहीं की जा रही है ? देश के अप्रशिक्षित लोगों को प्रशिक्षण देने के दावे तो रोज़ ही किये जा रहे हैं पर तकनीकी शिक्षा को नियंत्रित करने वाले समूह भी खाली ही पड़े हुए हैं. क्या देश में एकदम से प्रतिभाओं की इतनी कमी हो गयी है कि सरकार इन पदों के लिए योग्य व्यक्तियों को तलाश कर नियुक्तियां नहीं कर पा रही है आज इस बात का जवाब किसी के पास नहीं है ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते तेज़ी से काम करने का दावा करने वाले पीएम भी इस मामले में कुछ करते नज़र नहीं आ रहे हैं ? देश को कुछ क्षेत्रों में ही आगे बढ़ाने से पूरा परिदृश्य नहीं सुधर सकता है संभवतः पीएम की नज़रों से यह बात पूरी तरह से ओझल हो चुकी है और वे इन महत्वपूर्ण संस्थाओं को लेकर गंभीर नज़र नहीं आ रहे हैं.            
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रविवार, 5 अप्रैल 2015

आधार और बुज़ुर्गों की समस्या

                                            देश में नागरिकों की पहचान के लिए शुरू की गयी परियोजना आधार ने जहाँ बहुत सारी योजनाओं के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन में बहुत बड़ा योगदान देना शुरू कर दिया है वहीं इसमें कुछ ऐसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं जिनसे निपटने के लिए सरकार और आधार प्राधिकरण को कोई सही और स्थायी रास्ता खोजना ही पड़ेगा. यूपी के बहराइच जनपद से एक खबर के अनुसार बुजुर्गों की उँगलियों के निशान हलके हो जाने के कारण कई लोगों को आधार कैम्पों से वापस लौटना पड़ा क्योंकि आज की व्यवस्था के तहत उनकी उँगलियों के निशान मशीन से स्कैन ही नहीं हो पा रहे थे जिससे इन बुजुर्गों में इस बात को लेकर निराशा फ़ैल गयी कि वे अपनी आधार पहचान को कभी भी नहीं बनवा पायेंगें. वैसे देखा जाये तो आधार के लिए उँगलियों के निशान के साथ ही आँखों की पुतलियों को भी स्कैन किया जाता है जिससे व्यक्ति की बायोमेट्रिक पहचान को सुनिश्चित किया जा सके पर जिन लोगों के हाथों में इस तरह से निशान बढ़ती आयु के चलते धुंधले पड़ चुके हैं अब उनके बारे में सही तरह से सोचने और इस समस्या का विकल्प तलाशने की आवश्यकता सबके सामने आ गयी है.
                                         अभी तक सरकार द्वारा जिस तरह से विभिन्न तरह की योजनाओं में आधार के माध्यम से नागरिकों की सही पहचान करने में सफलता हासिल करनी शुरू कर दी है उसके बाद आधार को भी कानूनी आधार देना बहुत आवश्यक हो गया है क्योंकि आज भी सरकार द्वारा इसकी वैधानिकता को कानूनी रूप से सही नहीं किया गया है जिसके चलते देश की विभिन्न अदालतों में आधार को आवश्यक न बनाये जाने से सम्बंधित आदेश पारित होते ही रहते हैं. जब भी सरकार इस दिशा में इसकी वैधानिकता को कानूनी रूप से सही करने की दिशा में प्रयत्न करे तो उसे यह भी देखना होगा कि इन बुजुर्गों की समस्याओं के बारे में भी विचार करने की आवश्यकता सामने आ चुकी है क्योंकि जब यह प्रक्रिया शुरू की गयी थी तो इस बात के अंदेशे तो थे पर वे इतनी बड़ी समस्या हो जायेंगें यह किसी ने भी नहीं सोचा था तो अब इस परिस्थिति से निपटने के लिए सरकार को तकनीकी विशेषज्ञों से सलाह कर इसके अन्य विकल्पों पर विचार करे के बारे में प्रयास करने चाहिए. अब जब यह समस्या सामने आई है तो इसके विकल्प भी आसानी से तलाश लिए जायेंगें क्योंकि आज देश में तकनीकी रूप से बहुत विकास हो चुका है.
                                   सरकार के पास आधार के मौजूदा स्वरुप में बुजुर्गों की आधार पहचान को केवल आँखों के स्कैन से भी सम्बंधित किया जा सकता है पर किसी विशेष परिस्थिति में आँखों के किसी रोग के चलते क्या आँखों के स्कैन से भी पहचान साबित करने की कोशिश पूरी हो सकती है यह भी आज ही सोचना का विषय होगा. एक बेहतर विकल्प के रूप में इन बुजुर्गों के पति/ पत्नियों के आधार पहचान से इनकी पहचान को जोड़ा जा सकता है और इनके पास यह विकल्प न होने की दशा में उनके पुत्र / पुत्रियों के आधार से भी इनको लिंक किया जा सकता है जिससे उन बारे में सही जानकारी उनके बच्चों के आधार से मिल सकती है तथा इस तरह के प्रयास से पूरी प्रक्रिया में किसी विशेष परिवर्तन को करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ने वाली है. सरकार के पास पूरा सूचना प्रौद्योगिकी विभाग तो है ही साथ ही ऐसी किसी भी परियोजना में विकल्पों पर विचार करने या उनके लिए सुझाव देने में देश के संस्थान भी पूरा सहयोग करने के बारे में आगे आ सकते हैं और यदि सरकार चाहे तो आधार के जनक और पूर्व अध्यक्ष नंदन नीलकेणी से भी इस समस्या के उचित समाधान के बारे में बात कर सकती है. 
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सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

नीति आयोग और सञ्चालन परिषद

                                                    नीति आयोग की सञ्चालन परिषद की पहली बैठक में जिस तरह से केंद्र ने इसे काम काज को लेकर एक नयी दिशा की तरफ राज्यों का ध्यान खींचा है और राज्यों को केंद्रीय सहायता के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए कहा है वह अपने आप में नीतिगत स्तर पर अच्छा लग सकता है पर इसे धरातल पर उतारने में देश को अभी बहुत लम्बा समय तय करना है. राज्यों के मुख्यमंत्रियों से उन ६६ महत्वपूर्ण केंद्रीय योजनाओं के भविष्य के बारे में विचार करने के लिए एक उप समूह बनाया गया है जो इस बारे में अपनी राय नीति आयोग को देने वाला है और इसके अतिरिक्त जिन और उपसमूहों की बात की जा रही है वे मानव संसाधन और स्वच्छ भारत से जुडी हुई बातों पर विचार करने वाला है. इसके साथ ही राज्यों से गरीबी उन्मूलन और कृषि के लिए अपने स्तर से समूह बनाने के लिए भी कहा गया है जिससे देश की आर्थिक और सम्पूर्ण गति को तेज़ किया जा सके. इतने समूहों और समितियों के साथ काम करने वाले इस आयोग का स्वरुप क्या पिछ्ले१५ वर्षों में काम करने वाले मंत्रियों के समूहों से कुछ इतर होने वाला है जिनको मोदी सरकार ने समाप्त कर दिया है ?
                                इस आयोग की पहली बैठक में जिस तरह से भीड़ भरे माहौल में काम करने को प्राथमिकता दी जाने वाली है उसका कोई औचित्य नहीं है क्योंकि योजनाएं हर राज्य के अनुसार अलग अलग ही बनायीं जाने वाली हैं तो पुरानी प्रक्रिया की कमियों को दूर कर आगे बढ़ने के बारे में सोचा जाना चाहिए था जबकि उसके बाद केवल नए नाम से वही सारी कवायदें ही की जाने वाली हैं जिनसे कितनी तेज़ी से आगे बढ़ा जा सकेगा यह तो समय ही बताएगा क्योंकि पूरे देश से मुख्यमंत्रियों की राय कर उनके समूह से ४५ दिनों में एक राय ले पाना कठिन काम ही होने वाला है. इससे निपटने के लिए इस काम को ऑनलाइन कर दिया जाना चाहिए जिससे आम लोगों को भी सरकार के राज्य के बारे में केंद्र को की जाने वाली सिफारिशों और मांगों के बारे में पता चल सके तथा हर बार मुख्यमंत्रियों को दिल्ली बुलाये जाने और विमर्श करने की आवश्यकता से भी बचा जा सके. हर राज्य में अलग तरह की परिस्थितियां रहा करती हैं तो उस स्थिति में बार बार इनके नेताओं को दिल्ली बुलाने से विकास को किस तरह से तेज़ किया जा सकता है ? इसके स्थान पर दिल्ली में इन राज्यों के स्थायी प्रतिनिधियों को इसमें शामिल किया जाना चाहिए जिससे राज्यों की सही आवश्यकता को समझा जा सके.
                                        इस बारे में केंद्र सरकार को राज्यों से अपने एक अधिकारी और मंत्री को नीति आयोग का स्थायी प्रतिनिधि बनाये जाने के लिए कहना चाहिए क्योंकि हर बार की बैठक में सभी मुख्यमंत्रियों का पहुंचना संभव नहीं लगता है तो उन राज्यों के बारे में नीतिगत फैसले लेने में समस्या भी हो सकती है. इस आयोग को आवश्यकतानुसार काम करने के स्थान पर शुरू के वर्षों में इस तरह के एक स्थायी ढांचे के अंतर्गत काम करने की छूट मिलनी चाहिए. इसके काम को ऑनलाइन करने से राज्यों के नेताओं की अनावश्यक दिल्ली दौड़ बच सकती है वहीं दूसरी तरफ कार्य कुशलता बढ़ाये जाने में मदद भी मिल सकती है राज्यों के साथ समन्वय यदि आयोग की पहली बैठक में आवश्यक लग रहा है तो इस समन्वय के लिए एक स्थायी ढांचा भी होना चाहिए जिससे इसकी हर बैठक में राज्यों की सही रिपोर्ट मिलती रही. किसी भी उपसमूह के लिए काम कर पाना इसलिए भी बहुत कठिन होने वाला है क्योंकि आज देेश के अधिकांश राज्यों के पास इस तरह से काम करने और समन्वय बढ़ाने के लिए कोई अनुभव नहीं है. भाजपा शासित राज्य पीएम की बात से सहमत नज़र आ सकते हैं वहीं अन्य दलों में उन मुद्दों पर मतभेद भी हो सकता है तो आयोग और उपसमूहों के लिए काम करना मुश्किल ही होने वाला है सम्भावना है कि आगामी कुछ महीनों में इन व्यावहारिक कठिनाइयों के चलते नीति आयोग को इस दिशा में कुछ सोचना पड़ेगा और उसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आयेंगें.    
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रविवार, 8 फ़रवरी 2015

चुनाव के बाद की चुनौतियां

                                                इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि सत्ता में आने के लगभग ९ महीनों बाद भी केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर समग्र रूप से काम सिर्फ इसलिए ही शुरू नहीं हो पाता है क्योंकि हर दो महीनों के अन्तराल के बाद किसी न किसी राज्य में चुनाव होते ही रहे हैं. इसके लिए केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता है पर देश के राजनैतिक ढांचे में यह एक कमी की तरफ ही अवश्य संकेत करता है जिसमें राजनैतिक दलों द्वारा विभिन्न समयों पर जन साधारण से जुडी हुई योजनाओं का चुनावी लाभ उठाने के कारण ही चुनाव आयोग विकास कार्यों को भी चुनाव आचार संहिता में बाँधने के लिए विवश हुआ है. दिल्ली चुनावों के बीच ही जिस तरह से बजटीय माहौल में केंद्र सरकार देश के विभिन्न सेक्टरों के विशेषज्ञों के साथ विचार विमर्श शुरू करने की तरफ बढ़ चुकी है तो उससे अब उसका उन वास्तविकताओं से सामना होना ही है जो आर्थिक मोर्चे पर देश के लिए एक चुनौती बने हुए हैं. यह मोदी सरकार का पहला बजट होगा क्योंकि पिछली बार तो महत्वपूर्ण हिस्सा यूपीए द्वारा ही तैयार किया गया था. इन चुनौतियों से निपटने के लिए राज्यों से जिस तरह से सहयोग की आवश्यकता है संभवतः उनके विरोधियों पर अधिक हमलावर रहने के कारण वह भी स्वतः नहीं मिलने वाला है.
                                     नीति आयोग की पूर्ण बैठक में राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ विचार विमर्श के लिए जिस तरह से एक दिन निर्धारित किया गया है उसमें क्या किया जा सकता है यह भी सोचने का विषय है क्योंकि राज्यों के स्तर पर केंद्र से जिस माहौल में संवाद होना चाहिए क्या वह कुछ घंटों की बैठक में सभी मुख्यमंत्रियों के साथ एक साथ संभव है ? इससे पहले योजना आयोग राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ अलग से बैठक कर उनकी योजनाओं के बारे में विचार विमर्श किया करता था और उनकी सहमति के साथ एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिशें भी किया करता था हालाँकि वह प्रक्रिया कभी भी पूरी तरह से निरापद नहीं कही गयी क्योंकि राज्यों द्वारा जितने धन का आवंटन माँगा जाता था उतना आम तौर पर उन्हें मिल नहीं पाता था. देश के महत्वपूर्ण अर्थशास्त्रियों के साथ पीएम की बैठक के बाद जो कुछ सामने आया है वह देश के लिए चिंताजनक ही कहा जा सकता है क्योंकि एक तरफ सरकार केवल बजटीय घाटे को नियंत्रित करने की कवायद करने में लगी हुई है और इसी क्रम में वह मनरेगा जैसी बड़ी और देश के ग्रामीण इलाके को आर्थिक रूप से सबल करने वाली परियोजनाओं के स्वरुप को बदलने में लगी है जबकि अर्थशास्त्री देश के आंतरिक आर्थिक परिदृश्य के जीवंत बने रहने के लिए इसके इसी रूप में चलाये जाने के पक्ष में हैं.
                                   देश के ग्रामीण इलाकों के आर्थिक स्वरुप को सँभालने और उसे ग्राम आधारित छोटी ही सही पर एक स्वनिर्भर अर्थ व्यवस्था बनाने में मनरेगा का जो योगदान रहा है वह पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा चुका है इसे केवल इस आधार पर बंद करना या इनके बजट को सीमित करना कि इसमें भ्रष्टाचार बहुत अधिक होता है कहीं से भी सही नहीं है. आवश्यकता है कि सरकार देश के आंतरिक आर्थिक परिदृश्य को बदलने के लिए तेज़ी से काम करने वाली इस परियोजना को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की सभी कोशिशें करे और जिन राज्यों में इस तरह के भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाया जा पा रहा है केवल उनके बजट में इस तरह की कटौती करने के बारे में सोचा जाना चाहिए. किसी भी एक तरह की अर्थ व्यवस्था पर सभी अर्थशास्त्रियों की राय एक जैसी कभी भी नहीं हो सकती है पर किसी योजना के अधिकतर अच्छे प्रभाव को किन परिस्थितियों में कम किया जाना चाहिए यह भी कोई स्पष्ट रूप से बता नहीं सकता है. देश के ग्रामीण क्षेत्रों की क्रय शक्ति काम होने से क्या पूरे देश की आर्थिक प्रगति पर बुरा असर नहीं पड़ेगा यह तो अब पीएम, एफएम और उनके साथ  काम करने वाले अर्थशास्त्रियों को सोचना ही पड़ेगा.         
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मंगलवार, 6 जनवरी 2015

योजना आयोग से नीति आयोग तक

                                                                 संस्थाओं और योजनाओं के नाम बदलने के साथ अपनी पारी की शुरुवात करने वाले पीएम मोदी ने नवगठित नीति आयोग के उपाध्यक्ष समेत अन्य पूर्ण कालिक, पदेन और विशेष आमंत्रित सदस्यों की घोषणा कर दी है जिससे इस बात की आशा की जा सकती है कि पूर्ण रूप से मुक्त अर्थयवस्था के पैरोकारों के साथ चलते हुए पीएम ने देश को आगे ले जाने की कोशिशों को आगे बढ़ाने का काम कर दिया है. इस संस्था के बारे में जिस तरह से शुरू में कहा जा रहा था कि यह निर्णय लेने के मामले में पहले से बहुत अलग संस्था के रूप में काम करने वाली है तो इसके वर्तमान स्वरूप को देखकर ऐसा नहीं लगता है कि यह पहले वाले योजना आयोग से कुछ अलग साबित होने वाली है. यह सही है कि देश में संसाधनों के बंटवारे को लेकर केंद्र सरकार और उसके विरोधियों की राज्य सरकारों में सदैव ही टकराव की स्थिति बनी रहती है पर इस नए तंत्र से उस राजनीति से किस तरह पार पाया जा सकेगा जब इसमें भी विशेषज्ञों के साथ ७ मंत्रियों को पदेन और विशेष आमंत्रित सदस्यों के रूप में शामिल कर दिया गया है ?
                                      एक तरफ पीएम की तरफ से अपने मंत्रियों पर कार्यों को तेज़ी से करने का दबाव बनाया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ उन्हें इस तरह के आयोगों में भी रखा जा रहा है जिससे आयोग के काम करने की दिशा भी प्रभावित हो सकती है. वर्ष भर में वित्त मंत्रालय के साथ नीति आयोग को बहुत बार काम करना पड़ सकता है तो यदि वित्त मंत्री इस आयोग में शामिल हैं तो वह समय की मांग भी है पर गृह मंत्री, रेलमंत्री और कृषि मंत्री को इसके सदस्य बनाये जाने से बेशक मोदी की प्राथमिकताएं सामने दिखाई दे रही हैं पर अपने आप में भारी भरकम मंत्रालयों को संभाले हुए ये मंत्री आने वाले समय में आयोग में केवल शोभा मात्र ही रह जाने वाले हैं. सड़क परिवहन, जहाजरानी मंत्रालय, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता के साथ मानव संसाधन विकास मंत्रालय के मंत्रियों को इसमें शामिल किये जाने से क्या आयोग और मंत्रालय के काम पर असर नहीं पड़ने वाला है ? सरकार को इसे विशुद्ध रूप से पीएम के नेतृत्व में विशेषज्ञों के समूह के रूप में गठित करने की दिशा में काम करने की तरफ बढ़ने से यह निवर्तमान योजना आयोग से कई मामलों में वास्तविक रूप से भिन्न भी दिखाई दे सकता था.
                 हो सकता है कि आने वाले समय में इस आयोग के माध्यम से मोदी भी उसी राजनीति को आगे बढ़ाने के बारे में सोच रहे हों जिसका आरोप वे पिछली सरकार पर लगाया करते थे क्योंकि एक विशुद्ध नीति निर्माता आयोग में इतने राजनेताओं को शामिल कर आने वाले समय में इसके काम काज को प्रभावित करने की कोई छिपी हुई रणनीति भी इसमें शामिल हो सकती है. आयोगों के नाम परिवर्तन से क्या अंतर पड़ने वाला है जब काम करने का तरीका बिल्कुल वही रहने वाला है इस आयोग में इतने नेताओं / मंत्रियों को शामिल कर मोदी वह सन्देश देने में पूरी तरह से चूक गए हैं जो इसे विशुद्ध नीतिगत स्तर पर रखकर कर सकते थे. खैर यह पीएम का विशेषाधिकार है कि वे देश में वर्तमान में चल रही संस्थाओं को किन नामों और किस तरह से चलाना चाहते हैं पर उनके नाम बदलकर क्या कार्य संस्कृति को पूरी तरह से बदला जा सकता है यह इस आयोग के गठन से भी स्पष्ट नहीं हो सका है. देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को एक साथ इसकी पूर्णकालिक बैठक के लिए इकठ्ठा करना भी आयोग के लिए सदैव सरदर्द ही रहने वाला है इसे अच्छा कदम यह भी हो सकता था कि राज्यों से एक पूर्णकालिक सदस्य नीति आयोग के लिए भेजने की बात की जाती जो राज्य से जुड़े सभी मसलों पर सरकार का पक्ष पूरे वर्ष रख पाता. फिलहाल अगले कुछ वर्षों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि नीति आयोग अपने गठन को कितना सार्थक कर पाया या वह केवल नए नाम से काम करने वाला एक नया आयोग भर ही साबित हुआ.            
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सोमवार, 8 दिसंबर 2014

योजना से नीति तक आयोग का सफरनामा

                                                                    देश में राजनीति करने की दिशा से कोई भी सरकार पीछे नहीं रहना चाहती है अब योजना आयोग के मुद्दे पर जिस तरह से व्यवस्था परिवर्तन को भी राजनैतिक चश्मे से देखा जाने लगा है वह आज के परिदृश्य की राजनीति में सही नहीं कहा जा सकता है. आज़ादी के बाद १९५० से काम करने वाले योजना आयोग की परिकल्पना सबसे पहले सुभाष चन्द्र बोस की तरफ से प्रस्तुत की गयी थी और उनका मानना था कि आज़ादी मिलने के बाद देश को एक ऐसे आयोग या संस्था का गठन करना चाहिए और संभवतः आज़ादी के बाद केंद्र राज्यों में योजना पर बातचीत करने के लिए ही इस योजना आयोग की स्थापना की गयी थी पर आज इसके काम काज को सुधारने के स्थान पर केवल राजनीति के माध्यम से नाम बदलने की कोशिशें की जा रही हैं. यह सही है कि देश की जनता ने भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिया है और अब सरकार अपनी तरह से देश चलाने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र भी है पर नीतियों के निर्धारण में लगे हुए लोगों और व्यवस्था को केवल नाम बदलने की कवायद से आगे बढ़कर भी देखा जाना चाहिए.
                                                                                           चालू वित्तीय वर्ष में पी चिदंबरम ने पीएम मनमोहन सिंह की आयोग से सम्बंधित सिफारिशों पर ध्यान देते हुए योजना गत और गैर योजना गत आधार पर राज्यों के लिए धन का आवंटन करना शुरू कर ही दिया था जिसका प्रस्ताव आज मोदी कर रहे हैं. मनमोहन सिंह का आर्थिक मॉडल भारत के लिए आज भी कितना प्रासंगिक है यह इसी बात से पता चलता है कि कल की बैठक में खुद मोदी ने मनमोहन सिंह का उद्धरण प्रस्तुत किया. देश चलाने के लिए आर्थिक नीतियों के बारे में कोई भी राजनेता जितना सोच सकता है मनमोहन सिंह एक विश्व प्रसिद्द अर्थ शास्त्री होने के नाते उससे बहुत अधिक सोच सकते हैं. पिछली सरकार के द्वारा जिस तरह से योजना आयोग की शक्तियों को बजट के माध्यम से कम करने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया था अब एक दो वर्ष उसके प्रभाव का अध्ययन करना चाहिए था. इस मामले में पीएम से एक चूक तो हो ही गयी है क्योंकि अभी भी इस बैठक में पंचवर्षीय योजनाओं के बारे में कोई स्पष्ट बात सामने नहीं आई है तो जिन राज्यों को उस योजना के तहत जितना धन मिल रहा था और जो परियोजनाएं अभी चल रही हैं उनके बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं हो पायी है.
                                          आर्थिक मामलों में पहले से चल रहे मॉडल को अचानक से बदले जाने से पहले किस तरह से देश के लिए एक वैकल्पिक योजना पर विचार किया जाना चाहिए था क्या इस बात पर भी सरकार ने विचार किया है ? आज एक बार फिर से जापान से वैश्विक मंदी की आहट सुनाई दे रही है तो अपने पुराने ढांचे को विदेशों के भरोसे पूरी तरह से खोल देने की नीति क्या किसी समय समस्या बनकर सामने नहीं आ सकती है और इस बात के लिए रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुरामन ने भी चिंता जताई है कि आज के वैश्विक परिदृश्य में किसी भी सरकार के प्रयास पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ ही जुड़े हुए हैं इसलिए हमारे देश पर उसका क्या असर पड़ सकता है इसके लिए सचेत भी होना चाहिए. वैश्विक स्तर पर भारत अर्थव्यवस्था का सञ्चालन करने की स्थिति में आज नहीं है वह केवल एक उभरता हुआ बड़ा बाज़ार है जिसके माध्यम से विश्व की बड़ी अर्थव्यस्थाएं अपने हितों को साधने की कोशिशों में लगी हुई हैं. सरकार किसी भी तरह के निर्णय के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है पर साथ ही उसे परिवर्तन के खतरों से देश की आर्थिक स्थिति को बचाने मामले पर भी ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है.      
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रविवार, 7 दिसंबर 2014

योजना आयोग का विकल्प

                                            १५ अगस्त लालकिले से की गयी अपनी घोषणा के सन्दर्भ में आज पीएम योजना आयोग के विकल्प के तौर पर काम करने वाली संस्था पर विचार करने के लिए राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक करने जा रहे हैं. यह सही है कि अभी तक योजना आयोग अपने आप में राज्यों और केंद्र के बीच धन आवंटन का बहुत बड़ा साधन रहा है पर इसमें भी संभवतः उस तरह की गुंजाईश बची हुई थी कि जिसके माध्यम से सरकार पूरी व्यवस्था को एक बार फिर से दुरुस्त करने की तरफ बढ़ सकती है. देश में आज़ादी के बाद से अभी तक चल रहे योजना आयोग के बारे में सब कुछ ही गड़बड़ हो ऐसा भी नहीं है पर आज देश की आवश्यकताएं पहले के मुकाबले बहुत बदल गयी हैं और योजनगत मामलों में देश को एक बार फिर से नए सिरे से सोचने के लिए ही यह पूरी कवायद की जा रही है. इस मामले में केंद्र की तरफ से पहल की जा चुकी है और आने वाले समय में इसके नए स्वरूप के सामने आने की आशा भी है.  
                            जिस तरह से पिछले चुनाव के बाद से ही मोदी और अन्य राजनैतिक दलों के बीच कटुता का माहौल बना हुआ है उसे देखते हुए आज की बैठक महत्वपूर्ण होने वाली है क्योंकि केवल चुनावों के समय विरोधियों पर हमलावर रहने वाले मोदी भी राज्यों के प्रशासनिक मामलों में कोई दखल नहीं देते हैं जिससे आज की बैठक में माहौल के अच्छा रहने की आशा की जा सकती है.यूपी और बंगाल के मुख्यमंत्रियों की तरफ से जिस तरह के बयान आये हैं उससे लगता है कि इन राज्यों की तरफ से किसी भी सकारात्मक राजनीति और परिवर्तन का स्वागत ही किया जायेगा. इस प्रक्रिया में गैर भाजपाई राज्य तो अपनी बात मुखरता के साथ रख ही देंगें पर साथ ही भाजपा के मुख्यमंत्रियों को सम्मलेन में मोदी की छाया से बाहर आकर बात करने की ज़रुरत रहेगी क्योंकि लम्बे समय से सत्ता में बैठे हुए ये नेता भी अपने आप में बेहतर सोच के साथ अच्छे विकल्प पर चर्चा कर बैठक को सफल बनाने की तरफ बढ़ सकते हैं. अब यह सम्मलेन के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि इस मामले में सरकार की पहल को ये राज्य किस तरह से लेते हैं.
                            अभी तक आयोग के द्वारा जिस तरह से केंद्रीय राशियों का आवंटन किया जाता रहा है उसे देखते हुए आने वाले समय में राज्यों द्वारा अपने हिस्से में और भी अधिक बढ़ोत्तरी की मांग भी की जा सकती है. राज्यों को आबादी के अनुसार वित्तीय आवंटन होने से किसी को कोई दिक्कत नहीं है पर जब इस आवंटन का आज के समय में दुरूपयोग किया जाता है तो केंद्र या योजना आयोग के पास कोई ऐसा प्रावधान स्पष्ट रूप से नहीं है जिसके माध्यम से वह राज्यों को आर्थिक आधार पर दण्डित भी कर सके. देश के संसाधनों के बारे में किसी भी तरह की लापरवाही और बर्बादी के बारे में सचेत न रहने वाले राज्यों के लिए अब एक सबक भी तैयार होना चाहिए कि यदि उनके प्रदर्शन में आशातीत सुधार नहीं दिखाई देगा तो उनको मिलने वाली केंद्रीय सहायता पर पुनर्विचार और रोक लगाने के बारे में भी सोचा जा सकता है. केंद्रीय धन के आवंटन के बाद नयी बनने वाली संस्था के पास ऐसे अधिकार भी होने चाहिए कि वह राज्यों के सांसदों की एक समिति बनाकर अपने स्तर से आवंटित धन की देखरेख भी कर सके जिससे राज्यों की शिकायत को भी पूरी तरह से समझा और दूर किया जा सके.       
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सोमवार, 30 जून 2014

राष्टीय दलों की मान्यता और शर्तें

                                                  इस बार के आम चुनावों में भाजपा के अभूतपूर्व प्रदर्शन के बाद छोटे राजनैतिक दलों के सामने अपनी राष्ट्रीय पहचान बनाये रखने का बड़ा संकट उभर कर सामने आया है अब चुनाव आयोग द्वारा उस पर कानूनी मोहर लगने वाली है क्योंकि इन चुनावों में आयोग की राष्ट्रीय पार्टी होने की शर्तों पर पहले खरी उतरने वाली सीपीआई, बसपा और एनसीपी को उतने वोट और सीटें नहीं मिल पायी हैं जिनके दम पर ये दल अपने को राष्ट्रीय दल कहलाने के हक़दार बने हुए थे. चुनाव आयोग के निर्देशों के अनुसार कम से कम चार राज्यों में छह प्रतिशत वोट या फिर तीन चौथाई लोकसभा सीटों पर दो प्रतिशत मत मिलने की दशा में ही किसी दल को राष्ट्रीय दल की मान्यता दी जा सकती है और इस बार इन मानकों पर खरे न उतर पाने के कारण तीन दलों की राष्ट्रीय मान्यता खतरे में पड़ती हुई दिखाई दे रही है.
                                                 इस प्रक्रिया के अनुसार कार्यवाही करने के बाद अब केंद्र में सत्ताधारी भाजपा, विपक्षी दल कांग्रेस और सीपीआई एम ही राष्ट्रीय पार्टियों के रूप में देश में रहने वाली हैं जिससे चुनाव के समय इन दलों को ही राष्ट्रीय स्तर पर वे लाभ मिल पायेंगें जो चुनाव आयोग द्वारा निर्देशित किये जाते हैं. इस क्रम में सबसे बड़ा झटका बसपा के लिए ही होने वाला है क्योंकि उसकी प्रभावी उपस्थिति अभी तक कई राज्यों में कांग्रेस और भाजपा के वोटर्स को अपनी तरफ खींचती रही है. एक राष्ट्रीय दल के रूप में आकाशवाणी और दूरदर्शन पर चुनाव प्रचार के लिए समय आवंटन आदि से अब बसपा को दूर कर दिया जायेगा जिससे उसके लिए अखिल भारतीय स्तर पर दलितों के साथ काम करने के प्रयास और खुद को दलित पार्टी के रूप में स्थापित करने में और भी अधिक परेशानी होने वाली है. अब बसपा के लिए २०१७ में आने वाले यूपी के विधानसभा चुनाव आगे की पूरी पटकथा लिखने वाले साबित हो सकते हैं.
                                          लोकसभा चुनावों और विधान सभा के चुनावों में मुद्दे बिलकुल अलग ही हो जाया करते हैं और यदि इस बार यूपी में भाजपा का प्रदर्शन लोकसभा चुनावों की तरह ही रहा तो बसपा के साथ सपा के लिए भी बहुत मुश्किलें खड़ी होने वाली है. अब इन दलों के इन चुनावों में प्रदर्शन के बाद ही इनकी राष्ट्रीय पहचान पर कुछ किया जा सकेगा. इसी वर्ष महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों में भी यूपी के इन दोनों दलों सपा बसपा के लिए अपनी पुरानी स्थिति बचाने का संकट भी सामने होगा क्योंकि इनको यहाँ भी काफी बड़ी संख्या में वोट मिल जाया करते थे. क्षेत्रीय दलों के राष्ट्रीय स्तर पर इस पतन से जहाँ भाजपा और कांग्रेस के बीच जनता को किसी एक को चुनने की आज़ादी मिलने वाली है वहीं इन दलों को किसी भी परिस्थिति में कम करने की गलती भी दोनों राष्ट्रीय दलों को भारी पड़ सकती है. फिलहाल तो चुनाव आयोग के निर्देशों के इंतज़ार में इन पार्टियों के लिए यह समस्या दरवाज़े पर खड़ी ही दिखाई देती है.
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शुक्रवार, 9 मई 2014

चुनाव आयोग और निष्पक्षता

                                              इस बार के आम चुनावों में जिस तरह से नेताओं द्वारा अपनी खीझ को ख़त्म करने के लिए चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की रणनीति पर भी काम किया गया वह अपने आप में बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है क्योंकि आयोग के काम काज पर पूरे देश की नज़रें टिकी रहती हैं और आज के समय में आयोग के पास वह सब कुछ है जिसके दम पर वह देश में निष्पक्ष चुनाव कराने में हर बार ही सफल रहा करता है. इस बार जिस तरह से मुद्दों पर व्यक्तिगत आरोपों ने अपनी बढ़ता बना ली उसके बाद आयोग को भी इस तरह के मामलों में नेताओं को नोटिस जारी करनी पड़ीं जिनमें से कुछ मामलों में तो आयोग को नेताओं के चुनावी गतिविधि में भाग लेने पर भी रोक लगानी पड़ी. आयोग एक संवैधानिक संस्था है और इस संस्था के लिए देश के लिए कानून के अनुसार काम करने की बाध्यता है फिर भी जिस तरह से नेताओं द्वारा अपने मंतव्यों को पूरा करने के लिए आयोग पर हमले किये जाने शुरू कर दिए गए हैं उससे देश के लोकतंत्र को मज़बूती तो नहीं मिल सकती है.
                                              देश के पास आज मज़बूत चुनाव आयोग है और हर बार के चुनावों में निष्पक्षता के लिए उसे भारत समेत पूरी दुनिया से संबल मिला करता है. इतने बड़े देश में जहाँ विभिन्न तरह की समस्याएं सबके सामने आती रहती हैं उस परिस्थिति में चुनाव को शांति पूर्ण तरीके से निष्पक्षता के साथ संपन्न कराने के लिए आयोग को बहुत तैयारियां करनी पड़ती हैं. आज जब चुनाव अपने अंतिम चरण में पहुँच चुके हैं तो आयोग द्वारा अपनी निष्पक्षता साबित करने के लिए प्रेस को बुलाना पड़े तो यह देश के नेताओं के लिए चिंता की बात है क्योंकि जब तक नेताओं का व्यवहार नियमानुकूल नहीं होगा तब तक किसी भी परिस्थिति में आयोग को मज़बूती नहीं प्रदान की जा सकती है. आयोग कोई पार्टी नहीं है कि आरोपों का जवाब देने के लिए उसे बाध्य किया जा सके फिर भी वह स्थानीय प्रशासन के द्वारा भेजी गयी रिपोर्ट के दम पर ही गतिविधियों को संचालित किया करता है.
                                              किसी भी तरह के आचार संहिता के उल्लंघन पर नज़र रखने, रैलियों से लगाकर जनसभाओं तक की अनुमति के बारे में आयोग के पास करने के लिए कुछ खास नहीं होता है क्योंकि उसको स्थानीय प्रशसन द्वारा भेजी जाने वाली रिपोर्टों पर ही भरोसा करना होता है. आज नेता आयोग पर केवल तभी चिल्लाते हैं जब उनके मन पसंद काम को करने में आयोग के नियम आड़े आ जाते हैं और वे यह भूल जाते हैं कि एक प्रदेश में यदि सरकार चलाने के लिए उनके पास जनादेश है तो दूसरे में किसी और के पास तो वे हर प्रदेश में अपने राज्य की तरह प्रशासन की तरफ से सुविधाएँ नहीं पास सकते हैं. यदि नेताओं को आयोग के पूरी तरह से वास्तविक रूप में ही तटस्थ रखने की मंशा है तो उन्हें इसकी शुरवात अपने राज्य से करनी होगी जिससे उनके यहाँ भी सब कुछ ठीक तरीक से चलता रह सके. पर आज के समय में हमारे नेता केवल अपने हितों की बात ही सोचते रहते हैं जिससे भी कई बार उनके अनुसार काम न होने को वे केवल आयोग को दोषी बताने में नहीं चूकते हैं. देश के बड़े नेताओं को इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि सरकारें तो आती जाती रहती हैं पर देश की संवैधनिक संस्थाओं पर हमला करके किसी भी तरह से देश का सम्मान बढ़ाया नहीं जा सकता है.चुनाव आयोग और निष्पक्षता 
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गुरुवार, 8 मई 2014

चुनाव ड्यूटी और राज्य के अधिकारी

                                                           इस बार चुनाव होने के माहौल के साथ ही जितनी बड़ी संख्या में पार्टियों और प्रत्याशियों द्वारा मतदान के निष्पक्ष होने पर सवाल लगाये हैं वह संभवतः शेषन के युग के बाद पहली बार ही हुआ है क्योंकि इस बार चुनाव केवल राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति से बढ़कर असभ्यता की सारी सीमायें पार करते हुए ही दिखे हैं. इस सबके बीच शांति के साथ काम करने वाले किसी भी चुनाव आयुक्त की कार्यशैली संभवतः राजनैतिक दलों को रास नहीं आ रही है इसीलिए उनकी तरफ से इस बार आयोग को भी निशाना बनाया जा रहा है. आज लगभग हर दल के उन नेताओं की लम्बी सूची सामने रखी जा सकती है जिसके दम पर वे चुनाव जीतने की बात तो कर रहे हैं पर उनके द्वारा चुनाव आयोग को निशाना बनाया जाना किसी को भी दिखाई नहीं देता है. आज भी चुनाव आयोग के सामने निष्पक्ष चुनाव कराये जाने में सबसे बड़ी चुनौती केवल यही आती है कि उसके पास राज्य सरकारों से उधार में मिला हुआ एक ऐसा तंत्र होता है जो चुनाव के बाद अपनी उसी सरकार के लिए ज़िम्मेदार होता है.
                                                         ऐसी परिस्थिति में क्या चुनाव आयोग को किसी भी कर्मचारी और अधिकारी की चरित्र पत्रिका में चुनावी ड्यूटी से सम्बंधित मामलों में प्रतिकूल प्रविष्टि करने का अधिकार भी नहीं होना चाहिए जिससे कम से कम किसी दल विशेष से प्रभावित या उसका चुनावी कार्यों में समर्थन करने वाले अधिकारियों से प्रभावी तरीके से निपटने में सहायता मिल सके ? आज भी चुनाव आयोग को मज़बूरी में ही सही पर शिकायतों को ध्यान में रखते हुए आचार संहिता लागू होने के बाद भी बड़ी संख्या में तबादले करने पर मजबूर होना पड़ता है क्योंकि यह अधिकारियों का वही समूह होता है जो दल विशेष से प्रभावित होता रहता है. आज भी यह स्थिति कुछ अलग नहीं है पहले के मुकाबले इतना अवश्य हुआ है कि चुनावी ड्यूटी को कोई भी अधिकारी अब उतनी लापरवाही से नहीं लेता है जैसा पहले हुआ करता था फिर भी आज चुनाव आयोग को अघोषित अधिकारों के अधिकारों के स्थान पर स्पष्ट अधिकारों की अधिक आवश्यकता है.
                                                        अब इस पूरी कवायद को किस तरह से सुधारा जाये आज यह सबसे बड़ा प्रश्न बनकर सामने आ चुका है क्योंकि चुनावों में जिस भी दल को विजय मिल जाती है वह उन नियमों को सही मान लेता है जबकि विपक्षी दल केवल आरोप लगाने के काम में ही लगे रहते हैं. आज के युग में जब इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से चुनाव होने लगे हैं तो क्या कहीं पर इतनी आसानी से मतदान केन्द्रों पर कब्ज़ा किया जा सकता है क्योंकि इसके माध्यम से प्रति घंटे अधिकतम मत पड़ सकने की एक सीमा भी है जिससे आगे कोई भी नहीं जा सकता है. चुनाव के प्रतिशत को अनियमितता का कोई पैमाना भी नहीं बनाया जा सकता है क्योंकि किसी पार्टी विशेष के गढ़ में शत प्रतिशत मत भी किसी एक प्रत्याशी को मिल जाया करते हैं जबकि वहां से किसी भी तरह की अनियमितता की कोई शिकायत नहीं मिलती है और लम्बी कतारें भी पूरे दिन दिखाई देती रहती हैं. अब नेताओं के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता आयोग के लिए मज़बूत उपाय करने के हैं न कि हर बात पर आयोग को निशाने पर लेने के क्योंकि बिना पूरी शक्ति के आयोग के फैसलों को भी कोर्ट में चुनौती देने का सिलसिला चलता ही रहता है. 
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मंगलवार, 6 मई 2014

पेड न्यूज़- मीडिया, नेता और आयोग

                                                     २००९ के चुनावों से जुड़े एक मामले में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने भी अशोक चवन की याचिका पर स्पष्ट रूप से कहा है कि आयोग को पेड़ न्यूज़ पर कार्यवाही करने का पूरा अधिकार है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में नेताओं को इस तरह के मामलों में कोर्ट जाने से पहले सोचने को मजबूर होना पड़ेगा. इस मामले में जिस तरह से अशोक चवन ने पहले हाई कोर्ट में अपनी बात रखी पर वहां से कोई रियायत न मिलने पर वे सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे जिससे उसने भी स्पष्ट रूप से इस तरह के मामलों में आयोग के अधिकारों की स्पष्ट रूप से पुष्टि ही कर दी है. देश के कानूनों में चुनाव सम्बन्धी अभी भी बहुत सारे ऐसे मसले हैं जिन्हें अभी तक केवल नैतिकता के पैमाने पर ही नापा जा रहा था और यदि कोई नेता कानून के उल्लंघन पर उतर आता है तो आयोग के पास ऐसी शक्तियां हैं ही नहीं कि वह तेज़ी से सुनवाई करते हुए मामले में दोषिर्यों के विरुद्ध कार्यवाही कर सके.
                                                      आज के समय में जिस तरह से मीडिया का प्रभाव पूरे समाज पर बढ़ता ही जा रहा है तो उसका दुरूपयोग भी चुनाव के समय नेता लोगों द्वारा किये जाने की शिकायतें भी सामने आने लगी हैं. इस तरह के मामले को दैनिक सुनवाई के आधार पर ४५ दिनों के भीतर निपटाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जहाँ नेताओं पर भारी दबाव आने वाला है वहीं उनकी मीडिया पर दबाव बनाने या अपने मीडिया में मौजूद समर्थकों से मनचाही ख़बरें छपवाने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगने वाली है. अभी तक इस तरह के मसले केवल कोर्ट में ही जाया करते थे और उन पर भी सुनवाई राज्य सरकार के रहम पर ही हुआ करती थी पर अब जब कोर्ट ने यह आदेश कर ही दिया है तो आने वाले समय में इस पर प्रभावी रोक लग पाने की संभावनाएं भी दिखाई देने लगी हैं. देश की विधायिका आखिर इतनी कमज़ोर कैसे होती जा रही है कि वह देश को विश्वास में लेने लायक कानून भी नहीं बना सकती है और यदि कहीं से कानून में कोई कमी है तो उसका हर नेता इतना लाभ उठाने की सोच भी कैसे सकता है ?
                                                आज इस बात की बहुत आवश्यकता है कि चुनाव आयोग के पास असीमित अधिकार होने के साथ उनके पूरे वर्ष अनुपालन करवाने की शक्ति भी संविधान द्वारा दी जानी चाहिए क्योंकि जब तक केवल आचार संहिता के समय मिलने वाले अधिकारों के भरोसे आज के घाघ नेताओं से निपटने की कोशिश की जाएगी तब तक चुनावों को निष्पक्ष तरीके से करवाने की हर मंशा अधूरी ही रहने वाली है. अभी तक जिस तरह से कुछ मामलों में कानून न होने के बाद भी परंपरा के रूप में नेता कुछ मर्यादाएं बनाये रखते थे आज के पहली पंक्ति में दिखाई देने वाले नेताओं में वह शील भी गायब ही दिखाई दे रहा है तो उस परिस्थिति में आखिर केवल कानून का सहारा ही तो बचता है कि इस सबसे प्रभावी तौर से निपटा जा सके ? देश को आज नेताओं में मज़बूत संकल्प और उच्च मानदंडों की आवश्यकता है पर कहीं से भी हमारे नेता बिना कानूनी दबाव के इनको स्थापित करने से नहीं चूकते हैं पर सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश के बाद अब मजबूरी में ही सही नेताओं पर दबाव तो बनने ही वाला है.
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सोमवार, 28 अप्रैल 2014

वाड्रा विवाद में देश पीछे

                                              अब जब आम चुनाव लगातार अपने चरम की तरफ बढ़ता जा रहा है उस स्थिति में जब यूपी का महत्व भी सभी दलों को पता है इसीलिए यहाँ पर एक दूसरे को घेरने के लिए भाजपा और कांग्रेस जिस तरह से मुद्दों से पूरी तरह भटक कर व्यक्तिगत राजनीति पर उतर आई हैं उससे देश का भला कैसे होगा क्या इन दलों के नेता या प्रवक्ता इस बात पर कोई जवाब देना पसंद करेंगें ? कांग्रेस जहाँ कई चुनावों के बाद पिछली बार यूपी में कुछ सम्मानजनक सीटें जीत पायी थी वहीं भाजपा कम सीटों पर सिमट गयी थी पर इस बार सपा विरोधी माहौल में भाजपा अपने प्रदर्शन को उच्चतम स्तर तक ले जाने के लिए संकल्पित दिखाई दे रही है वहीं कांग्रेस पर अपनी पुरानी सीटें बचाने का ही दबाव अधिक है. देश का संविधान सभी को अपनी बात शालीनता की एक सीमा में कहने का अवसर देता है पर इस अवसर को लगता है कि अपनी हरकतों से नेता खुद ही गंवाना चाहते हैं पर चुनाव आयोग की भी सीमा होने से इनके बयान सभ्यता को लांघते ही जा रहे हैं.   
                                             राजनीति में शुचिता की बातें करने वाली भाजपा और उसके पीएम पद के प्रत्याशी नरेंद्र भाई मोदी ने जिस तरह से राहुल को शहज़ादा और वाड्रा को जीजाजी कहना शुरू किया उसे किस नैतिकता में सही कहा जा सकता है और अब जब सोनिया राहुल और प्रियंका उन पर हमले कर रहे हैं तो वे हद में रहने की बाते भी करने लगे हैं. गुजरात का सुशासन और विकास क्या वाड्रा के बड़ा मुद्दा नहीं है या भाजपा के पास सुशासन के लिए कुछ भी कहने को नहीं बचा है जो वह पूरे चुनाव को वाड्रा पर केंद्रित करना चाहती है ? हो सकता है कि अपने राजनैतिक रसूख का लाभ उठाते हुए वाड्रा ने भी कुछ अनियमित काम करवा लिए हों पर ऐसा ही आरोप राजस्थान की गहलोत सरकार पर भी लगाया गया था कि वह वाड्रा को कौड़ियों के भाव ज़मीन देने में लगी हुई है जबकि अशोक गहलोत के राजनैतिक जीवन के बारे में आज तक उन पर किसी भी अनियमितता का आरोप भी नहीं लगा है. यदि वास्तव में भाजपा के पास कुछ है तो वह उसे जनता के सामने क्यों नहीं लाना चाहती है और इसे केवल एक मुद्दे की तरह क्यों इस्तेमाल करना चाहती हैं इसका जवाब भी मोदी की पूरी टीम के पास नहीं है ?
                                            आखिर वाड्रा के खिलाफ ऐसा क्या है जो भाजपा कहती तो है पर उस मुद्दे पर कोई भी कार्यवाही करने के लिए तत्पर भी नहीं दिखाई देती हैं ? अब तो राजस्थान में चार महीनो से भाजपा की राजे सरकार काम कर रही है और यह भी तय है कि राजे ने भी इसे चुनाव मुद्दा बनाया था पर अभी तक क्या राजे सरकार उनके खिलाफ राजस्थान में कोई जांच शुरू कर पायी है और यदि वाड्रा या गहलोत के खिलाफ कोई अनियमितता मिली भी है तो उसका खुलासा क्यों नहीं किया जा रहा है ? यह संभव है कि वाड्रा मसले में भी गड़बड़ हो पर उसे इस तरह से केवल मुद्दा बनाये रखने से क्या दोषियों को सजा मिल पायेगी और आखिर सुशासन का भाजपा का यह कौन सा तरीका है जिसका वह अनुपालन राजस्थान में करने में लगी हुई है. यदि किसी के भी खिलाफ कुछ होता तो भाजपा इस बार सबूतों के साथ कांग्रेस पर हमलावर होती और वह सुशासन और विकास के मुद्दों को पीछे छोड़कर इस तरह से केवल बयानबाज़ी तक सीमित रहकर ही वाड्रा के पीछे नहीं पड़ती.       
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शनिवार, 26 अप्रैल 2014

गायब वोटर ज़िम्मेदार कौन ?

                                               मुंबई और ठाणे जैसी जगहों पर जिस तरह से मतदान करने पहुंचे लोगों के नाम मतदाता सूची से गायब पाये गए उससे यही लगता है कि मतदाता जागरूकता अभियान में किसी भी तरह से निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति भी नहीं होनी चाहिए क्योंकि इस बार मत प्रतिशत बढ़ाने के लिए चुनाव आयोग ने हर स्तर पर व्यापक तैयारियां की हैं. जिस तरह से अभी तक मिली प्राथमिक सूचनाओं में ही इन क्षेत्रों से लाखों लोगों के नाम वोटर लिस्ट से गायब पाये गए हैं उससे चुनाव आयोग पर सवाल उठने भी जायज़ हैं क्योंकि यह सारा काम उसकी देखरेख में ही होता है फिर भी उसके पास काम करने के लिए केवल राज्य सरकार की मशीनरी ही होती है जिसके माध्यम से वोटर लिस्ट समेत पूरे चुनाव का काम कराया जाता है. ऐसे में केवल चुनाव आयोग को ही इसके लिए ज़िम्मेदार बताये जाने से मामला हल नहीं होने वाला है और आने वाले समय के लिए कुछ ऐसे प्रयास अवश्य ही करने होंगे जिससे देश के किसी भी दुसरे हिस्से में ऐसी समस्या दोबारा सामने न आने पाये.
                                            सामान्यतया चुनाव आयोग हर चुनाव से पहले मतदाता सूची में एक निर्धारित कार्यक्रम के अंतर्गत संशोधन का एक वृहद अभियान चलाता है जिसके अंतर्गत यह मतदाता की ज़िम्मेदारी होती है कि वह सही सूचनाओं के आधार पर अपने मतों को सूची में देखने के साथ किसी भी तरह की त्रुटि के लिए भी शिकायत कर सके जिससे उसे संशोधित भी किया जा सके. इस पूरे काम में जिस तरह से आम लोगों और राजनैतिक दलों की सहभागिता होने चाहिए वह देश में नहीं दिखाई देती है जिससे भी कई बार इन सूचियों में गड़बड़ियों की शिकायत सामने आती रहती है. देश के विशाल स्वरुप को देखते हुए चुनाव आयोग के पास ऐसा कोई तंत्र नहीं ही जिसके माध्यम से वह हर जगह की सूचियों पर निगरानी रख सके इसीलिए वह सूची के संशोधन के लिए एक पूरा अभियान चलाने में लगा रहता है जिससे बहुत अच्छे परिणाम भी सामने आते हैं पर इस तरह से पिछली सूची से गायब हुए मतदाताओं की समस्या से पहली बार ही आयोग को दोचार होना पड़ा है.
                                          जिन क्षेत्रों में सूचियों में व्यापक रूप से नाम गायब पाये गए हैं वहां के जिलाधिकारी समेत चुनाव ड्यूटी में लगे हुए सभी लोगों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर त्वरित जांच किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि यह केवल किसी लापरवाही के कारण हुआ है या इसके पीछे किसी की सोची समझी रणनीति है इस बारे में जानना बहुत ही आवश्यक भी है क्योंकि इसी तरह से आने वाले समय में मतदाताओं के नाम सूची से इसी तरह से गायब किये जा सकते हैं. एक बड़ा सवाल कि क्या हम जन सामान्य अपने अधिकारों के लिए जागरूक भी रहा करते हैं या जो कुछ भी अपने आप होता रहे उसी में हम संतुष्ट होकर बैठ जाया करते हैं ? पूरे देश की बात यदि ना भी की जाये तो काम से काम मुंबई और ठाणे जैसे अधिक शिक्षित क्षेत्र के किसी भी गायब मतदाता या राजनैतिक दल ने भी इस गड़बड़ी को सूचियाँ प्रकाशित किये जाने के बाद क्यों नहीं चेक किया ? आयोग को पूरे देश का काम देखना होता है और वह ईमानदारी से काम करता है पर क्या हम नागरिक इसके लिए आयोग की मदद करना चाहते हैं ? इस मसले पर किसी भी राजनैतिक दल को बोलने का हक़ नहीं है क्योंकि जब सूचियाँ प्रकाशित की गयीं तो ये सब कहाँ थे और तब क्या इन्होने सूचियों को देखने की कोशिश की थी आज चुनाव आयोग पर निशाना लगाने वालों को अपने अंदर भी झांक कर देखना चाहिए क्योंकि आयोग देश की एक मज़बूत संवैधानिक संस्था है.
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बुधवार, 9 अप्रैल 2014

चुनाव आयोग और ममता

                                  पहले जिस तरह से हर बात में आप के नेता अरविन्द केजरीवाल कानून और संविधान में कमी की बात करके अपनी बात को सही साबित करने की कोशिशें करते रहते थे कुछ इसी तरह की बात चुनाव आयोग के सन्दर्भ में पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने भी कही हैं. यह सही है कि चुनावी माहौल में जिस तरह से पूरा प्रशासन सीधे केंद्रीय चुनाव आयोग के नियंत्रण में आ जाता है उसके बाद केंद्र और राज्यों में बैठे नेताओं की भूमिका केवल आवश्यक विधायी कार्यों को चलाते रहने तक ही सीमित हो जाती है पर ममता ने जिस तरह से अपने यहाँ पर चुनाव आयोग द्वारा सात अधिकारियों के तबादले को बड़ा राजनैतिक और प्रशासनिक मुद्दा बनाने का प्रयास किया उसका कोई औचित्य भी नहीं था. फायर ब्रांड नेता ममता बनर्जी के साथ निश्चित तौर पर बंगाल की जनता मज़बूती के साथ खड़ी है पर उसका मतलब यह तो नहीं निकला जा सकता है कि कहीं से भी कुछ भी अनर्गल प्रलाप कर वे आयोग को कटघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दें ?
                                    अधिकारियों के मसले पर चुनाव आयोग का आम तौर पर एक जैसा ही रवैया पूरे देश में रहता है कि जब भी किसी अधिकारी के लिए क्षेत्र विशेष से शिकायत की जाती है तो आयोग तीन सुझावों वाले नामों में से किसी एक नाम पर अपनी सहमति दे देता है और राज्य सरकारें भी इसका पूरी तरह से अनुपालन किया करती हैं. बहुत बार इस प्रक्रिया में आयोग कई ऐसे अधिकारियों को भी स्थानांतरित कर देता है जो कर्मठ और संवेदनशील होते हैं आयोग किसी भी तरह के विवाद में पड़ने के स्थान पर अपने स्तर से सामान्य बदलाव कर देने की नीति का ही सदैव अनुपालन किया करता है. ममता जैसे ज़मीन से जुडी हुई नेता ने जिस तरह से चुनाव आयोग पर कॉंग्रेस और भाजपा के दबाव में काम करने की बातें की उनका कोई मतलब भी नहीं निकलता है क्योंकि चुनाव आयोग लगभग ४५ दिनों में ही किसी अधिकारी के बारे में सब कुछ कैसे जान सकता है ? क्या चुनावों को और भी पारदर्शी और निष्पक्ष बनाये जाने के लिए पूरे देश के प्रशासनिक अधिकारियों के बारे में चुनाव आयोग को सब कुछ लगातार पूरे वर्ष नहीं बताना चाहिए जिससे अधिकारियों के राजनैतिक हितों को वह भी समझ सके और केंद्रीय और राज्यों के चुनाव आयोगों में एक राजनैतिक प्रशासनिक सेल भी बनाई जानी चाहिए ?
                                     आज देश में किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति पर नेताओं द्वारा इस तरह के आरोप लगाया जाना सामान्य बात हो चुकी है क्योंकि अब देश में जो पीढ़ी राज कर रही है वह कहीं से यह भी मानती है कि भारतीय संविधान में बहुत सारी कमियां हैं और उनको दुरुस्त किया जाना बहुत आवश्यक है. कमियों को ठीक किया जाये इससे किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है पर अनावश्यक रूप से केवल अपने को बड़ा दिखाने के लिए ही इस तरह की हरकतों पर रोक तो लगनी ही चाहिए वरना किसी दिन कोई नेता राष्ट्रपति और सुप्रीम कोर्ट पर भी उँगलियाँ उठाने से नहीं चूकेगा. ममता ने अपनी कम जानकारी के चलते यह बात आवेश में कह दी थी पर जब उन्हें वास्तविकता का ज्ञान हुआ तो उन्होंने अपने कदम पीछे खींचने में ही अपनी भलाई समझी जिससे एक अनावश्यक मुद्दा आगे बढ़ने से बच गया. चुनाव आयोग ने जिस तरह से स्प्ष्ट कर दिया था कि उनकी बात न मानने पर राज्य में चुनाव रद्द भी किये जा सकते हैं तो उसके बाद ममता के पास और कोई चारा भी नहीं था. अच्छा हो कि ममता या कोई अन्य नेता अपनी समस्या को इतना बड़ा न कर दें कि उससे निकलें के मार्ग दिखायी देने बंद हो जाएँ.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...