मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 6 June 2015

गंगा के बहाने जोशी का दर्द

                                                   गंगा को लेकर राजनीति करने वाली भाजपा के लिए उसके मार्गदर्शक मंडल के सदस्य डॉ मुरली मनोहर जोशी की तरफ से व्यापक स्तर पर जताई गयी चिंता के बाद जिस तरह से भाजपा के खेमे में खलबली मची हुई है उस पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी ही होगी क्योंकि यह मोदी सरकार की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसके लिए पूरी सरकार अपना दम लगा रही है. यह सही है कि गंगा की लम्बाई को देखते हुए उसे पूरी तरह से शुद्ध करना और उसमें एक बार फिर से जलपरिवहन को बढ़ावा देने की नीति से देश में गंगा के किनारे बसे हुए राज्यों के पास एक वैकल्पिक मार्ग भी उपलब्ध हो जायेगा पर साथ ही इस नयी परियोजना के अमल में आने में सदेह भी कम नहीं जताए जा रहे हैं. डॉ जोशी को केवल एक राजनेता ही नहीं माना जा सकता है क्योंकि वे विज्ञान के वरिष्ठ जानकर भी हैं तो उनके इस तरह के बयान के केवल राजनैतिक निहितार्थ निकाले जाने से कोई सफलता हाथ नहीं लगने वाली है. वरिष्ठता का अपना पैमाना और अनुभव होता है जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता है यही इस मामले में भी सही साबित हो सकता है.
                      आज भी लोग यही कहते नज़र आते हैं कि डॉ जोशी को सरकार में महत्वपूर्ण पद नहीं मिला है इसलिए वे इस तरह की बातें कर सरकार को असहज स्थिति में डालना चाहते हैं जबकि वास्तविकता कुछ और ही है क्योंकि मोदी सरकार जिस तरह से विकास के नाम पर अपने स्तर पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने में लगी हुई है वह वास्तव में बहुत ही चिंता का विषय है. पर्यावरण सम्बन्धी मामले को लेकर ही सरकार की आशंका को ग्रीन पीस जैसे संगठन पर रोक लगाने के रूप में ही देखा जा रहा है क्योंकि जिस तरह से सरकार के कुछ चहेते उद्योग समूहों के लिए उपजाऊ भूमि का तेज़ी से अधिग्रहण करने की कोशिशें लगातार की जा रही हैं वह किसी भी तरह से देश के किसानों के लिए हितकारी नहीं साबित हो सकता है. अभी तक केवल इस तरह के मामलों को विपक्षी दलों की राजनीति ही बताया जा रहा था पर अब इसमें पर्यावरण विशेषज्ञों की राय भी जुड़ती जा रही है जो आने वाले समय में मोदी सरकार के लिए नयी तरह की समस्याएं लेकर ही आने वाली है. विकास के मार्ग पर जब भी आगे बढ़ा जायेगा तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचना ही है पर विकास के साथ ही पर्यावरण को बचाये रखने की भी जुगत निरंतर किये जाने की आवश्यकता भी है.
                        बेशक मोदी सरकार पर जोशी के हमले के बाद विपक्ष हमलावर हो जाये पर विकास के हर मामले में सरकार गलत भी नहीं हो सकती है फिर भी विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने से पहले सरकार को यह तय करना चाहिए कि उससे आम लोगों और देश के पर्यावरण पर किस तरह का असर पड़ने वाला है ? मोदी के रूप में सत्ता का एकमात्र केंद्र होने से जहाँ मंत्रियों के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं होता क्योंकि मोदी किसी की बात सुनने के स्थान पर अपने मंतव्यों को पूरा होते देखने के आदी रहे है जो गुजरात जैसे राज्य में आसान था पर अखिल भारतीय स्तर पर उस मॉडल की सफलता संदेहास्पद ही अधिक लगती है. देश के लिए काम करने में हर सरकार लगी रहती है पर पर्यावरण से जुड़े मामले में अनावश्यक तेज़ी कई बार विकल्पों को सीमित भी कर दिया करती है. ऐसी परिस्थिति में अब मोदी और उनकी सरकार को विरोध के सुरों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि केवल एक-तरफा विकास के दावों के बीच आम जनता का भी पूरा ध्यान रखने की आवश्यकता भी है. दृढ इच्छाशक्ति के साथ काम करना अच्छा है पर सुधार के स्वरों को दबाने की हर कोशिश लोकतंत्र में सफलता का मन्त्र कभी भी साबित नहीं हो सकती है.         
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