मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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बुधवार, 26 दिसंबर 2018

औद्योगिक विकास की चुनौतियाँ

                                               छत्तीसगढ़ की नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार ने चुनाव में किये गए अपने वायदे को पूरा करते हुए बस्तर संभाग में लगने वाले टाटा स्टील प्लांट को आवंटित की गयी १७०० एकड़ जमीन कम्पनी से वापस लेकर किसानों को वापस करने के लिए आदेश जारी कर दिया है जिसके बाद स्थानीय किसानों में तो हर्ष का माहौल है पर इससे राज्य में औद्योगिक विकास को बड़ा झटका लगने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. यह भी सही है कि इस मामले में टाटा समूह द्वारा भूमि आवंटन के नियमों के अनुरूप प्लांट लगाने का काम आगे नहीं बढ़ाया गया जिससे स्थानीय लोगों में रोष भी था जिसे समझते हुए कांग्रेस ने वहां पर इसे एक मुद्दा बना लिया और जनता में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए आवंटन को रद्द भी कर दिया है. इस मामले में कहीं न कहीं कुछ ऐसी कमी अवश्य ही रही होगी जिससे टाटा जैसा समूह भी अपनी कही गयी बातों को पूरा नहीं पाया।
                                    भूपेश बघेल सरकार ने किसानों की मांग और समस्या को देखते हुए अपने वायदे को पूरा किया उसे गलत नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से यह पूरा मामला बिगड़ा अब उस पर  विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि खनिज सम्पदा से भरपूर राज्य से पूरे देश और दुनिया के औद्यौगिक समूहों में यह सन्देश भी नहीं जाना चाहिए कि यह सरकार पूरी तरह से उद्योगों की विरोधी है ? टाटा समूह के सामने आखिर वे कौन सी परिथितियाँ उत्पन्न हुईं जिसके चलते इस प्लांट का काम आगे नहीं बढ़ सका भूपेश सरकार को इस बारे में भी गंभीर विचार कर नीतियों के निर्धारण में उद्योगों का भी ख्याल रखना होगा जिससे आने वाले समय में राज्य के औद्यौगिक माहौल को सुधारा जा सके. रमन सरकार की तरफ से आखिर किन स्तरों पर क्या चूक हुई जिससे यह प्लांट मूर्त रूप नहीं ले सका और सरकार के पास क्या विकल्प थे जिसके चलते वह नियमों में सुधार कर टाटा समूह और किसानों के बीच समन्वय स्थापित कर सकती थी ?
                                  बंगाल के बाद टाटा को संभवतः दूसरी बार इस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा जब वह अपनी योजना को मूर्त रूप देने में खुद को असमर्थ पा रहा होगा ? आज टाटा समूह ही नहीं बल्कि सभी औद्यौगिक समूहों के साथ केंद्र तथा राज्य सरकारों को बेहतर समन्वय करने की आवश्यकता है जिससे आने वाले समय में कोई भी परियोजना इस तरह से बीच में न लटक जाये। चिंता की बात यह भी है कि औद्यौगिक माहौल सुधारने की बातें करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में भी इस समस्या का सही हल नहीं खोजा जा सका ? यदि समय रहते केंद्र सरकार का दखल होता या रमन सरकार खुद ही केंद्र की सहायता मांगती तो संभवतः किसानों के आंदोलन से टाटा समूह को दिक्कत न होती और मामला इतना बिगड़ने भी नहीं पाता। बात यहाँ पर किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए समग्र औद्यौगिक विकास की संभावनाएं बढाने की है जिसमें रमन सरकार पूरी तरह से चूक गयी थी पर मामले को अतिवादी होकर एकतरफा निपटने से भूपेश सरकार भी राज्य और देश का भला नहीं कर पायेगी। इसलिए राजनैतिक कारणों को दूर रखते हुए अब राज्य सरकार को नीतियों की कमियों पर ध्यान देकर उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।       
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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

राज्यों की स्थानीय नौकरियां

                                                               एमपी के सीएम कमलनाथ ने जिस तरह से राज्य में लगाए जाने वाले नए उद्योगों के लिए विभिन्न स्तरों पर छूट पाने के लिए राज्य के स्थानीय नागरिकों की शर्त लगायी है वह अपने आप में सम्पूर्ण देश के कानून और परिस्थितियों को देखते हुए सही नहीं कही जा सकती है पर विभिन्न राज्यों में इस तरह की नीति पहले सही चल रही है और आने वाले समय में इसके राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों के चलते अन्य राज्यों द्वारा भी इस तरह का मॉडल अपनाये जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस मामले में पहल करने और दूसरे राज्यों के लोगों को अक्सर निशाने पर लेने वाले महाराष्ट्र में  १९६८ से ही इस तरह की नीति लागू है जिसमें स्थानीय लोगों के लिए ८०% नौकरियों को आरक्षित किया गया था और आज भी स्थानीय दबाव के चलते प्रवासी कामगारों को नियमानुसार होने के बाद भी नौकरियों से बिना कारण बताये निकाला भी जाता है. इस मामले में तेलंगाना के कानून सबसे कड़े हैं क्योंकि वहां दूसरे राज्य के ही नहीं बल्कि राज्य के अंदर के लोग भी दूसरे क्षेत्र में नौकरी नहीं पा सकते हैं. हिमाचल, कर्णाटक ओडिशा में भी कम वेतन वाली नौकरियों को इसी तरह से स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित किया गया है।
                          ऐसी स्थिति का स्थानीय लोगों के लिए कुछ लाभ भी होता है पर उद्योगों के लिए दूसरे तरह की समस्याएं सामने आ जाती हैं जिसके चलते उनको प्रतिस्पर्धा पर सस्ता श्रम नहीं मिल पाता है और स्थानीय लोगों की अधिकता के कारण अनावश्यक श्रमिक राजनीति होने से उत्पादन आदि पर भी दुष्प्रभाव पड़ने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं. इस मामले को दूसरी तरह से देखने की आवश्यकता है जिससे उद्योगों के उत्पादन और उनके स्थापित होने की संख्या पर असर न पड़े साथ ही स्थानीय नागरिकों को भी अपने आस पास श्रम उपलब्ध हो जाये. आज वैसे भी नोटबंदी के बाद जिस तरह से निचले स्तर पर काम करने वाले श्रमिकों का अपने राज्यों में उल्टा पलायन हुआ है उससे भी समस्याएं नए स्तर पर सामने आ रही हैं. ऐसी परिस्थिति में केंद्र मनरेगा के धन आवंटन को बढ़ाकर स्थानीय स्तर पर श्रम दिवस बढ़ाये जाने का प्रयास कर सकती है जिसमें उसे राज्यों के भरपूर सहयोग की आवश्यकता पड़ने वाली है.
                         कौशल विकास योजना अपने आप में जितनी अनूठी थी उसे उतनी ही मक्कारी से भ्रष्ट तंत्र में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है क्योंकि जिस तरह से बिना सुविधाओं के लोगों ने ऐसे केंद्र खोले और सरकार से प्राप्त अनुदान में बंदरबांट की वह किसी से भी छिपी नहीं है जिससे सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना जो हर स्तर पर नागरिकों के जीवन यापन में सहयोग कर सकती थी केवल भ्रष्टाचार का स्तम्भ बनकर ही रह गयी है. यदि इसको योजना को छोटे स्तर पर चलाकर उसकी प्रगति देखी जाती साथ ही बहुत बड़ी संख्या में केंद्र खोलने के स्थान पर उनमें दी जाने वाली ट्रेनिंग की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता तो आने वाले समय में उद्योगों के लिए आवश्यकतानुसार स्थानीय श्रम भी उपलब्ध हो जाता। अब भी समय है कि स्थानीय स्तर पर पनप सकने वाले उद्योगों की पहचान कर उनके अनुरूप कार्य शुरू किया  भविष्य के लिए ऐसी समस्या से निपटा जा सके. यदि स्थानीय नागरिकों को अपने आस पास ही अच्छी सुविधा से युक्त रोज़गार मिल जायेगा तो कोई भी अपने पैतृक शहर को छोड़कर कहीं और जाने की बातें भी नहीं सोचेगा।
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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

कमलनाथ की पारी

                                                   एमपी में सत्ता सँभालने के साथ ही अपने पहले आदेश में सीएम कमलनाथ ने २ लाख रुपयों तक के कृषि ऋण के बारे में जो फैसला लिया है वह कांग्रेस के वचन पत्र के अनुरूप ही है पर इसके सही ढंग से क्रियान्वयन के लिए अब पूरा दबाव सीएम कमलनाथ पर ही आने वाला है क्योंकि कई राज्यों ने इस तरह की क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा की पर बाद में आंकड़ों की बाज़ीगरी से अधिकारियों ने किसानों का बहुत कम ऋण ही माफ़ होने दिया. कमलनाथ को जनता की समस्याओं के बारे में अच्छे से पता है और वे सरकारी मशीनरी से अच्छे से काम लेना भी जानते हैं तो उनके लिए इस दिशा में आगे बढ़ने में कठिनाइयां कम होने की संभावनाएं भी हैं. फिर भी इस काम के लिए यदि एक राज्यमंत्री की अलग से नियुक्ति कर दी जाये तो संभवतः इस निर्णय को सही तरीके से लागू किया जा सकेगा।  ऋण माफ़ी का कार्य पूरा होने के बाद उस राज्यमंत्री को अलग से किसी विभाग में स्थानांतरित किया जा सकता है। इस कार्य में सही और लाभार्थियों की सूची बनाये जाने का काम सबसे कठिन होता है इसलिए इसे दो स्तरों में किया जाना चाहिए पहले स्तर में बैंकों से सीधे किसानों के ऋण की स्थिति जानी जा सकती है वहीं दूसरे स्तर पर कांग्रेस के कार्यकर्तों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है जो किसी भी किसान को इस लाभ से वंचित होने की स्थिति पर कड़ी नज़र रखने का काम कर सके.
              इसके अतिरिक्त यदि सरकार बेरोज़गारी भत्ते के मामले में आगे बढ़ती है तो वह इन युवाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वे भी करवा सकती है जिससे सरकार को दोहरा लाभ भी हो सकता है। बेरोज़गारों को रोज़गार देने के साथ सरकार इन युवाओं से महीने में कुछ दिन काम भी ले सकती है जिससे युवाओं में काम करने की भावना के साथ सरकार को काम करने वाले युवा हाथों का सम्बल भी मिल जायेगा। जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने जनता से जुड़े मुद्दों को लोकसभा चुनावों को देखते हुए  प्राथमिकता में लिया है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि खुद सीम और कांग्रेस पार्टी इसे पीएम मोदी के बड़े खोखले बयानों के सामने काम करने की संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करने को तैयार दिखाई देते हैं।  बेशक यह राजनैतिक लाभ के लिए लिया गया निर्णय है पर इसके दूरगामी परिणाम पूरे देश पर आने वाले समय में पड़ने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।
                      स्थानीय युवकों के लिए ७०% रोज़गार देने वाले उद्योगों को सरकारी छूट देने का निर्णय सही कहा जा सकता है पर जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने इसके लिए यूपी-बिहार के लोगों द्वारा नौकरियाँ हथियाये जाने की बात की उससे कोई भी सहमत नहीं हो सकता है क्योंकि यह क्षेत्रीय पार्टियों की स्थानीय सोच जैसी बात है और यह भी सोचा जाना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि स्थानीय लोगों के रोज़गार को किस तरह से बाहर से आने वाले अन्य राज्यों के लोग पा जाते हैं ? सरकार को एमपी के युवकों में कुशलता के साथ कोई भी काम करने की इच्छाशक्ति बढ़ानी होगी तभी उद्योगों के साथ राज्य के युवाओं का विकास भी हो सकता है। .शिवसेना की तरह जय महाराष्ट्र और मराठी मानुष जैसी सोच का किसी भी अन्य राज्य में समर्थन नहीं किया जा सकता क्योंकि यह संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत जाता है।  खुद उद्योगपति होने के कारण कमलनाथ इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि सभी को कुशल कामगारों की आवश्यकता होती है और जब तक कुशलता बढ़ाई नहीं जाएगी तब तक हवाई सपने देखने से कुछ भी संभव नहीं है।     
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बुधवार, 31 अक्टूबर 2018

नि:शुल्क बेटी वाहिनी

                                      तमाम होहल्ले और सरकारी तामझाम के बाद भी जो काम आम बेटियों के लिए संभव नहीं हो सकता था उसे गांव के रहने वाले एक रिटायर्ड शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ ने अपने पीएफ के १७ लाख रुपयों के बाद २ लाख रूपये खुद से डालकर आसान कर सरकार को भी एक राह दिखा दी है. राजस्थान के रहने वाले डॉ रामेश्वर प्रसाद यादव ने एक बार अपने गांव जाते समय रास्ते में पानी से भीगती लड़कियों को देखकर उन्हें अपनी कार में लिफ्ट दी तब उन्हें लड़कियों से बातचीत करके उनकी समस्या की गंभीरता का पता चला जिसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी से भी इस बारे में चर्चा की और अपने गांव के आस पास के गांवों की लड़कियों को लाने ले जाने के लिए एक बस खरीदने की योजना बनायीं और बिना किसी बाहरी आर्थिक सहायता के अपने बुढ़ापे के लिए जमा की गयी पीएफ की राशि के रुपयों से एक बस खरीद कर लड़कियों को अमूल्य सौगात दी. देखने में यह काम साधारण सा ही लगता है पर इसके लिए भी उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा. आज भी वे लगभग ३६ हज़ार रूपये प्रति माह खर्च करके इस सेवा को ७० लड़कियों के लिए सुलभ बना चुके हैं.
                      इस पूरे प्रकरण में एक व्यक्ति के प्रयास से कुछ गांवों की लड़कियों इतना कुछ किया जा सका है तो इसमें सामजिक संस्थाओं, उद्योगों और सरकारों की भूमिका के पुनर्निर्धारण के बारे में भी विचार किया जाना चाहिए क्योंकि जिस तरह से एक व्यक्ति कुछ गाँवों में इच्छाशक्ति से बदलाव लाने की तरफ जा सकता है तो क्या इस बारे में इसे और बड़े स्तर पर नहीं शुरू किया जा सकता है जिसमें एनजीओ, शिक्षा विभाग, महिला कल्याण विभाग और उद्योगों की तरफ से सामाजिक सरोकारों के लिए खर्च किये जाने वाले धन का क्या बेहतर उपयोग कर लड़कियों के शैक्षणिक स्तर को सुधारने का काम नहीं किया जा सकता है ? डॉ यादव का कार्य अनुकरणीय है पर उनके इस प्रयास को भी जिस तरह से कानून और नियमों के कारण अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ रही है क्या सरकारें वर्तमान कानूनों में कुछ सुधार कर उसमें कुछ राहत नहीं दे सकती हैं ? डॉ यादव के मामले में उनसे राजस्थान परिवहन विभाग ५ हज़ार रूपये प्रति माह टैक्स के रूप में वसूल रहा है जबकि उनके इस कार्य के लिए क्या गाड़ी के पंजीकरण से लगाकर टैक्स तक में पूरी छूट की व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता नहीं है ?
                      हमारे कानून और राजनेता के साथ समाज में भी एक अलग तरह की धारणा बनी हुई है  जिसके चलते किसी भी अच्छे कार्य को भी बहुत सारी अड़चनों से होकर गुज़रना पड़ता है. क्या किसी राज्य सरकार या परिवहन विभाग के मंत्री/ अधिकारी के पास इतने अधिकार नहीं होने चाहिए कि आवश्यकता पड़ने पर वे इस तरह के सराहनीय सामाजिक कार्यों को करने वाले लोगों के लिए अपने स्तर से पूरी छूट दे सकें ? क्या हर काम को उसी कानून से चलाने की आवश्यकता है जो आम लोगों के लिए सामान्य प्रशासन को संचालित करने हेतु बनाया गया है ? क्या असाधारण प्रयास से लोगों के जीवन में बदलाव करने वाले किसी भी व्यक्ति को हर स्तर पर अधिक सहायता करने की व्यवस्था करने की कोशिश नहीं होनी चाहिए ? क्या हम सिर्फ कानून का अनुपालन करने वाली मशीन बनना चाहते हैं या इन कानूनों के बीच मानवीय संवेदनाओं के साथ काम करने वाले किसी डॉ यादव के प्रयासों की सराहना करते हुए उनके लिए काम करने का माहौल को और भी सुधारने का प्रयास कर सकते हैं ? यह सही है कि यदि टाटा समूह के अध्यक्ष रतन टाटा को डॉ यादव की इस पहल का पता चले तो वे स्वयं उनके प्रयासों की सराहना करते हुए उनके लिए कुछ निशुल्क बसों की व्यवस्था भी अविलम्ब करा सकते हैं फिर भी ऐसे प्रयास केवल स्थानीय सराहना के बाद कहीं खो से क्यों जाते हैं जिनका पूरे देश में प्रचार प्रसार होना चाहिए ? कम  से कम सरकारें तो इस तरह के प्रयासों के लिए अपने स्तर से टैक्स में छूट दे सकती हैं और जिस ज़िले में ऐसा काम किया जा रहा है वहां विधायक या सांसद निधि से इन बसों में नियमित डीज़ल भरवाने की व्यवस्था भी की जा सकती है.           
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शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

नीरव मोदी - नीयत से नियति तक

                                                 पीएनबी की तरफ से किये गए एक खुलासे के बाद जिस तरह से २०१४ में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रचंड लहर पर सवार होकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार के लिए नीरव मोदी प्रकरण ने कई बड़े प्रश्नचिन्ह लगाने का काम कर दिया है यह सही है कि मोदी के पूर्ववर्ती पीएम मनमोहन पर भी कभी व्यक्तिगत स्तर पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा था पर भाजपा जनता में यह सन्देश भेज पाने में पूरी तरह से सफल हो गयी थी कि पूरी यूपीए सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है. भरष्टचार को लेकर विपक्षी दलों पर निर्मम हमले कर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने की पीएम मोदी की हर कोशिश अभी तक लगभग सफल होती ही आयी है पर इस वर्ष के कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले वर्ष के आम चुनावों से पहले मोदी के आभा मंडल को दूषित करने वाली ये घटनाएं मतदाताओं को काफी हद तक प्रभावित कर सकती हैं इस समभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. कोई भी आसानी से यह आरोप नहीं लगा सकता कि नीरव मोदी, गिन्नी, गीतांजलि जैसी बड़ी कंपनियों से सीधे पीएम मोदी ने कोई लाभ लिया होगा और न ही इस पर कोई विश्वास भी करेगा पर यह मामला उसी तरह का हो सकता है जैसा की २जी और अन्य मामलों में हुआ जिससे सरकार की देश और विदेश में छवि को बहुत बड़ा धक्का लग सकता है.
                                               पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्य पूर्ण यह है कि जब वित्तीय मामलों में अनियमितता का मामला सामने आया तो उससे निपटने कि लिए रक्षा मंत्री का बयान क्यों सामने आ रहा है ? इस मामले पर यदि वित्त मंत्री स्थितियों को स्पष्ट करें तो उनकी बात को गंभीरता से सुना जायेगा पर संभवतः आज भी भाजपा यह स्वीकार नहीं कर पा रही है कि वह २०१४ से सत्ता में है और निर्मला सीतारमण और रविशंकर प्रसाद जैसे नेता अब उनके प्रवक्ता नहीं बल्कि सरकार के ज़िम्मेदार मंत्री हैं ? चिंता की बात यह भी है कि रवि शंकर प्रसाद के अनुसार यह मामला २०११ से था तो २०१४ के बाद सरकार ने क्या किया और यदि इसका खुलासा पिछले वर्ष जुलाई में हो गया था तो नीरव मोदी जैसा व्यक्ति एक आरोप के अनुसार आखिर विदेश में पीएम मोदी के साथ मंच पर कैसे खड़ा हो सकता था ? क्या इस मामले में पीएमओ ने विदेश मंत्रालय और अपने मंत्रालय के लिस्ट बनाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाही की है ? हो सकता है कि पीएम मोदी को यह न पता हो पर जब वे खुद को चौकन्नी नज़रों वाला बताते हैं और उनके पीएमओ द्वारा इस मामले को संज्ञान में लिया जा चुका था तो लगाए जाने वाले अपुष्ट आरोपों के अनुसार नीरव दावोस में पीएम के बगल तक कैसे पहुँच गया इस बात को लेकर पीएम मोदी पर संदेह जताया जा सकता है ? बेशक यह अधिकारियों की लापरवाही ही हो पर पीएम मोदी की छवि पर छींटे पड़ने शुरू हो चुके हैं देश को यह भी देखना होगा कि ३० साल बाद बनी पूर्ण बहुमत की सरकार पर भी राजीव गाँधी की मिस्टर क्लीन जैसी छवि वाले मोदी की छवि को धूमिल किये जाने का बहाना मिलना शुरू हो चुका है. भ्रष्टाचार पर मुखर रहने वाले पीएम मोदी के खिलाफ इतना बड़ा मुद्दा विपक्ष भी नहीं छोड़ना चाहेगा जिससे इस मामले में बैंक के कुछ लोगों पर कार्यवाही करके इसे ठंडा किये जाने की कोशिशें शुरू की जायेंगीं.
                                                      देश को अपने पीएम से सही और सीधा जवाब ठोस कार्यवाही के रूप में चाहिए उसे दलगत राजनीति से कोई मतलब नहीं है देश की आम जनता का यह पैसा जो हर्षद मेहता से लगाकर नीरव मोदी जैसे लोग आसानी से हड़पने को तैयार बैठे हैं इनसे निपटने के लिए अब सरकार के पास क्या प्लान हैं ? क्या ये बड़े लुटेरे नाम बदलकर इसी तरह देश के सत्ता प्रतिष्ठान से अपनी नज़दीकियों का लाभ उठाकर बैंको को लूटते रहेंगें और देश की सत्ता में बैठी कोई भी सरकार कड़े कदम उठाने जैसे चिर परिचित पुराने झांसे से जनता को बरगलाने का काम करती रहेंगीं ? फिलहाल देश को खुद पीएम मोदी की तरफ से इस मामले पर जवाब की आशा है और संसद में विपक्ष भी इस मामले पर सरकार को कोई राहत देने की स्थिति में नहीं होगा जिससे आने वाले समय में मोदी सरकार की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं.       
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शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

उग्र बच्चे उत्तरदायी कौन ?

                                                     लखनऊ के एक स्कूल में सातवीं में पढ़ने वाली एक छात्रा ने जिस तरह से पहली कक्षा के मासूम बच्चे पर जानलेवा हमला कर उसे जान से मारने की कोशिश की वह हमारे समाज की वर्तमान व्यवस्था को झकझोरने के लिए काफी है क्योंकि भले ही पहली दृष्टि में हम सभी को यह एक असामान्य घटना लगे जिसमें सिर्फ एक दिन की छुट्टी हो जाने की आशा में कोई ११ साल की लड़की इस हद तक चली गयी हो पर गंभीरता से विचार करने पर यह पूरी तरह से सामाजिक, पारिवारिक उत्तरदायित्वों को सहेज पाने की हमारी विफलता ही दिखाई देती है. अब जिस तरह से पूरे मामले को घुमाने की कोशिशें हो रही हैं वे अपने आप में इसे भी कुछ दिनों में भूल जाने वाली घटना में बदल देंगीं और जब कभी कहीं से इस मामले की किशोर न्याय बोर्ड में सुनवाई होगी तब इस बारे में हम एक बार फिर अपनी चिंताएं व्यक्त कर आगे बढ़ जायेंगें. लखनऊ के एसएसपी द्वारा जो बयान दिया गया वह वास्तव में चौंकाने वाला है कि यह छात्रा पहले भी दो बार घर से गायब हो चुकी थी जिसके बारे में पुलिस के पास भी सूचना दी गयी थी फिर भी छात्रा के परिजनों, स्कूल या पुलिस ने इतनी कम उम्र की इस छात्रा की उचित कॉउन्सिलिंग कराने के बारे में क्या कदम उठाया यह सामने नहीं आया है.
                                   अभी भी जिस तरह की जानकारियां सामने आ रही हैं उनसे यही लगता है की इस घटना के पीछे कोई अन्य कारण भी हो सकता है क्योंकि जिस तरह से स्कूल ने घटना के बारे में पुलिस प्रशासन को सूचित नहीं किया और २४ घंटे बाद इस मामले में पुलिस का हस्तक्षेप शुरू हुआ वह भी संदेह उत्पन्न करता है. नियमतः किसी भी स्कूल प्रबंधन को किसी भी दुर्घटना की जानकारी पुलिस को देना कानूनी और सामाजिक रूप से सही और आवश्यक होता है पर इस मामले में पुलिस को पता ही बहुत देर से चला जिससे प्रबंधन भी संदेह के घेरे में आ गया. यदि स्कूल की तरफ से पहले ही यह प्रयास किया जाता कि घटना पुलिस के संज्ञान में हो तो संभवतः मामला इतना नहीं बिगड़ता. यदि मौके से साक्ष्यों को मिटाने का प्रयास किया गया है तो स्कूल पर शक और भी गहरा जायेगा भले ही इसमें सिर्फ छात्रा ही शामिल रही हो. पुलिस को स्कूल और वहां पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से भी गहन पूछताछ करनी चाहिए जिससे प्रबंधन के बारे में किसी गड़बड़ी का अंदाज़ा लग सके और यह भी हो सकता है कि स्कूल ने बदनामी से बचने के लिए मामले को खुद अपने स्तर से निपटाने की कोशिश की हो जिसमें बच्चे को लगी गंभीर चोटों के कारण मामला बिगड़ गया.
                       समाज के तौर पर हमें अब अपने निरीक्षण की आवश्यकता भी है क्योंकि आखिर वे क्या कारण है कि हमारी एक बच्ची इतनी हिंसक हो जाती है कि वह दूसरे बच्चे की जान लेने तक सोच जाये ? क्या हमारे घरों में पहुंची टीवी और हाथों में आये इंटरनेट वाले मोबाइल फ़ोन इस दिशा में बच्चों के कोमल मन को प्रभावित तो नहीं कर रहे हैं ? आखिर टीवी पर कुछ भी दिखाए जाने को सही कैसे ठहराया जा सकता है क्योंकि अपराधों के बारे में आने वाले अधिकांश कार्यक्रमों में अपराधी के काम करने का तरीका क्या था यही बताया जाता है और उन कार्यक्रमों को देखने वाले हमारे बच्चे यह निर्णय नहीं कर पाते हैं कि इस जानकारी का क्या किया जाये ? संयुक्त परिवारों से दूर होते छोटे परिवारों में आज माता-पिता के पास इतना समय ही नहीं है कि वे अपने बच्चों के साथ रह पाएं और उनकी गतिविधियों पर भी ध्यान दें क्योंकि कोई बच्चा एक दिन में इतनी आपराधिक प्रवृत्ति से भर नहीं सकता है. कई बार घर में मिलने वाली उपेक्षा या अत्यधिक लाड प्यार भी उनके इस दिशा में बढ़ जाने का एक बड़ा कारण हो सकता है. आखिर क्यों आज हम समाज की एक मज़बूत इकाई बनकर जीने के स्थान पर अपने एकल इकाई में परिवारों को संभालना सीखते जा रहे हैं ? क्या इस तरह का जीवन हमारे घरों में हमारे बच्चों पर बुरा प्रभाव नहीं डाल रहा है और क्या अब इस समस्या से निपटने के लिए हमारे पारिवारिक मूल्यों की तरफ बढ़ने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है ? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हम केवल अपनी सुविधा के अनुरूप ही खोजने की कोशिशें करते रहते हैं और कुछ घट जाने पर केवल यह कहकर ही अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाते हैं कि बहुत बुरा समय आ गया है. समय बुरा नहीं आया है हमने अपने बच्चों को अच्छाइयों और बुराइयों के अंतर को समझाना बंद कर दिया है और उनके विकास के लिए उन्हें आज की दुनिया में खुला छोड़ दिया है जबकि हम सभी को यह सोचना चाहिए की खुलापन सिर्फ उतना ही हो जिसमें घुटन न हो घर के लोगों और समाज से बच्चों का अपनापन बना रहे और वे आने वाले समय में अच्छे नागरिक बनकर देश के लिए कुछ ठोस कर सकें तभी कुछ सुधार संभव है.        
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रविवार, 3 दिसंबर 2017

डॉक्टर-लैब-फार्मा कम्पनी गठजोड़

                                                       एक समय में चिकित्सा व्यवसाय को सबसे अच्छा माना जाता था और यह भी माना जाता था कि कोई भी डॉक्टर किसी भी परिस्थिति में अपने यहाँ आये हुए किसी भी रोगी के हित के लिए ही सदैव प्रयत्नशील रहता है पर आज के बदलते परिवेश में जिस तरह की ख़बरें और घटनाएं सामने आती हैं उनसे आम लोगों की इस धारणा को बहुत धक्का भी लगता है. नयी दवाओं और चिकित्सा जगत में होने वाले नए अनुसंधानों से देश के विभिन्न भागों में काम कर रहे डॉक्टर्स को परिचित कराने तथा उनको रोगियों के हितों में उपयोग करने के लिए लगभग हर दवा कम्पनी अपने स्तर से प्रयास करती है और अपने उत्पादों की बिक्री के लिए डॉक्टर्स को विभिन्न तरह के उपहारों से उपकृत भी करती रहती है. जब तक चिकित्सा जगत में व्यावसायिक घरानों की पैठ नहीं हुई थी तब तक सब कुछ ठीक ही चल रहा था पर जब से दवा कंपनियों ने फार्मा लाइन से जुड़े हुए डी फार्मा, बी फार्मा और एम फार्मा अभ्यर्थियों के स्थान पर एमबीए किये हुए लोगों के हाथों में बिक्री को सौंप दिया है तब से इस क्षेत्र का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है और दूसरी कम्पनी के बिकते हुए उत्पादों की होड़ में अब हर छोटी बड़ी कम्पनी कुछ भी बनाकर बेचने की राह पर चल चुकी हैं और इसमें दुर्भाग्य की बात यह है कि डॉक्टर्स सब कुछ जानते हुए भी सिर्फ अपने लालच के कारण इन कंपनियों के जाल में उलझे हुए हैं.
                                       यह सही है कि कई बार लक्षणों के आधार पर रोग का पता लगा पाना कठिन हो जाता है और दिखाई देने वाले लक्षणों के अतिरिक्त कोई और रोग भी किसी रोगी में हो सकता है जिसे जानने के लिए विभिन्न तरह की जांचें करवाने की आवश्यकता भी पड़ती रहती है. जब तक आवश्यकता हो तब तक इसे सही समझा जा सकता है पर जब यह भी कमाई का एक और जरिया बन जाए तो इस पर लगाम लगाने की आवश्यकता आ जाती है. आज बड़े शहरों में बड़ी लैब्स के साथ हज़ारों छोटी लैब्स मौजूद हैं जो अपने असली काम के साथ इस तरह के काम में भी लिप्त हैं पर सोचने वाली बात यह है कि लाखों रुपयों के खर्च के बाद स्थापित होने वाली लैब्स आखिर छोटे शहरों और कस्बों तक में कैसे खुलती जा रही हैं जबकि उनके पास आवश्यक चिकित्सक और लैब सुविधाएँ भी नहीं हैं ? यदि इन छोटे शहरों में बैठे हुए झोलाछाप चिकित्सकों और इन कुकुरमुत्तों की तरह उग आयी लैब्स पर ध्यान दिया जाये तो पूरे देश में यह हज़ारों करोड़ का अनैतिक कार्य सामने आ सकता है. इन कथित चिकित्सकों के पास कोई डिग्री नहीं होती जिससे वे केवल लैब से मिलने वाले अपने कमीशन के चक्कर में भी अनाप शनाप जांचें कराते रहते हैं जिससे पहले से ही परेशान रोगी पर और अधिक आर्थिक दबाव पड़ता है पर इस दिशा में सोचने का समय संभवतः किसी के पास नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों की नज़रें अभी तक इस गठजोड़ पर नहीं पड़ रही हैं.
                               इन सबसे बचने के लिए आखिर किस स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है अभी हमारे देश में किसी को भी इस बात की जानकारी भी नहीं है क्योंकि लोग आज भी भरोसे के चलते आँखें बंद करके अपने डॉक्टर और उसके बताये रास्ते पर चलते हैं. बंगलुरु में जिस तरह से चिकित्सकों और लैब के बीच का गठजोड़ सामने आया है और उसमें करोड़ों रुपयों की ज़ब्ती के साथ विदेशी मुद्रा भी मिली है तो क्या केंद्र सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अविलम्ब इस बात पर सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आखिर यह सब कैसे रोका जाना चाहिए ? ऐसा नहीं है कि नेताओं और अधिकारियों को यह नहीं पता है पर उनके अपने स्वार्थ हर तरह की परिस्थिति में सिद्ध हो जाते हैं तो उन्हें आम लोगों की इस समस्या पर सोचने की आवश्यकता ही नहीं है. इस बारे में अब सरकार को हर डॉक्टर की डिग्री को आधार से जोड़कर उसके द्वारा पूरे साल में कराई जाने वाली जांचों पर नज़र रखने के लिए एक व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जिससे यह पता चल सकेगा कि वह डॉक्टर कितने रोगी देख रहा है और कितना धन लैब्स से ले रहा है साथ ही आयकर देने और उसके इस तरह की आमदनियों के बीच किस तरह का सामंजस्य है भी या नहीं ? इस तरह के कदम से जहाँ सरकार को अधिक राजस्व मिल सकता है वहीँ रोगियों के लिए सही जांचों तक डॉक्टर्स और लैब्स को सीमित किया जा सकता है.
                             ऐसा भी नहीं है कि आज सारे चिकित्सक लैब्स और फार्मा कंपनियां इस तरह के कामों में लिप्त है फिर भी यह मानकर काम नहीं चलाया जा सकता है कि हर जगह कुछ लोग गलत तरह से काम करते हैं. सरकार को इस दिशा में सुधार के लिए पहले एक व्यापक नीति बनानी होगी जिसके बाद ही उसको कानून का रूप दिया जा सकता है. रोगियों को अच्छी सुविधाएँ देने के लिए जन औषधि केंद्रों की तरह लैब्स की अवधारणा को भी मूर्त रूप दिया जा सकता है कम से कम जिला अस्पतालों की क्षमता को इतना अधिक बढ़ाये जाने पर बल दिया जाना चाहिए जो कम से कम अपने जिले के रोगियों को इस तरह की सुविधाएँ उचित दरों पर उपलब्ध कराने के केंद्र के रूप में विकसित किये जा सकें. इसके लिए सरकार को चिकित्सा में उच्च शिक्षा के लिए व्यापक सुधार करते हुए एमडी डीएम आदि स्तरों पर शिक्षा की अधिक व्यवस्था के बारे में सोचना ही होगा साथ ही आयुष मंत्रालय को इस दिशा में और अधिक कारगर बनाये जाने की आवश्यकता पर ही ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे रोगी के सामने हर स्तर की चिकित्सा सेवा लेने का विकल्प खुल सके और वह अपनी समस्या में किसी बड़े व्यावसायिक गठबंधन का शिकार न हो जाए.        
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मंगलवार, 21 नवंबर 2017

राष्ट्रीय राजधानी - बिजली और प्रदूषण

                                                         हमारे देश में सरकार चलाने वाले दलों, नेताओं और अधिकारियों को पता नहीं आम लोगों से जुड़े हर सरोकार के बारे में सोचने का मौका कभी मिलता भी है या नहीं क्योंकि पिछले दो दशकों से जिस तरह से जनहित से जुड़े हर मुद्दे पर देश के विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से लगातार स्पष्टीकरण मांग कर आवश्यक निर्देश दिए जाते रहे हैं वे निश्चित तौर पर इस समय में देश चलाने वाली सरकारों और नेताओं के ज़मीनी हकीकत की समझ को ही दर्शाते हैं. ताज़ा मामले में जिस तरह से एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में २४ घंटे बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित किये जाने को लेकर केंद्र सरकार को नोटिस जारी की हैं वह आज की स्थिति को ही दर्शाती है क्योंकि एक तरफ एनजीटी के निर्देशों के चलते स्मॉग से निपटने की दिल्ली सरकार की कोशिशें रुक गयी हैं वहीँ केंद्र की तरफ से इस मामले में पूरी उदासीनता बरती जा रही है जो स्थिति को विधायिका से निकाल कर न्यायपालिका तक पहुँचाने की स्थिति उत्पन्न करने वाली है. केंद्रीय मंत्रियों को लगता है कि देश की न्यायपालिका अधिक सक्रियता दिखा रही है जबकि वास्तविकता यह है कि जिन कामों के लिए सरकारों को चुना जाता है वे उनमें पूरी तरह से विफल हो जाती हैं तभी सुप्रीम कोर्ट तक को किसी मामले में हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
                                  विकास के मामले में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की अवधारणा शुरु किये जाने से पहले ही दिल्ली के आस पास बिजली की अच्छी उपलब्धता के कारण छोटे बड़े उद्योग लगने शुरू हो चुके थे जिसको बाद में नियमित करने और सुनियोजित औद्योगिक विकास के लिए एक कड़ी के रूप में जाना जाता है पर आज उस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की क्या हालत है यह किसी से भी छिपी नहीं है. इस परिस्थिति में यदि एनसीआर को २४ घंटे विद्युत् आपूर्ति की श्रेणी में लाया जा सके तो उससे यूपी हरियाणा में अन्य वैकल्पिक उपायों से होने वाले प्रदूषण से भी आसानी से निपटा जा सकता है. एनसीआर को २४ घंटे बिजली मिले यह कैसे संभव हो सकता है और यह बिजली कोयले के स्थान पर गैस से बन सके तो क्या सरकार इस बारे में कुछ सोच रही है ? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जो सुप्रीम कोर्ट की तरफ से केंद्र सरकार से पूछे गए हैं. आमतौर पर ऐसे सवालों के जवाब आधिकारिक स्तर पर ही खोजे और दिए जाते हैं जिनका धरातल से कोई लेना देना नहीं होता है पर आज जिस तरह से सोलर पॉवर का उपयोग और उपलब्धता बढ़ती जा रही है तो इस परिस्थिति में एनसीआर के साथ पूरे देश के लिए दीर्घकालिक सोलर पॉलिसी बनाये जाने की आवश्यकता आ चुकी है क्योंकि दूर दराज के क्षेत्रों में बिजली का उत्पादन करना और उसे वितरण के लिए लाना अपने आप में ही बहुत बड़ी समस्या बना हुआ है.
                                   निश्चित तौर पर सरकार इस बारे में कुछ सोच रही होगी फिर भी यदि सोलर पॉवर की रूफ टॉप हार्वेस्टिंग के मॉडल को देश में लागू किये जाने पर विचार किया जाये तो आने वाले समय में एनसीआर के साथ देश के हर क्षेत्र में बिजली के संकट और उपलब्धता के मामले में महत्वपूर्ण सफलता पायी जा सकती है. इस पूरे परिदृश्य को बदलने के लिए अब सरकारों की सोलर पॉलिसी के स्थान पर कम से कम १० वर्षीय योजना पर काम अविलम्ब शुरू कर दिया जाना चाहिए. साथ ही सरकारी तंत्र की लूट से मुक्त होने के लिए किसी भी तरह की सब्सिडी को सीधे आवेदक लाभार्थी के खाते में भेजने की व्यवस्था भी होनी चाहिए. घरेलू सोलर प्लांट लगाने के लिए न्यूनतम कागज़ी कार्यवाही के साथ बैंकों को निर्देश दिए जाने चाहिए कि वे ऐसे मामलों को सम्पूर्ण रूप से स्वीकृत कर निपटाने के लिए समय सीमा में रहकर काम करें. इस पॉलिसी में देश में सोलर मॉड्यूल बनाने की व्यवस्था पर मेक इन इंडिया के अंतर्गत अभी से काम शुरू किया जाये जिससे बैंकों से धनराशि उपलब्ध होने की स्थिति में उपभोक्ताओं के पास अच्छे सस्ते और गुणवत्तापरक मॉड्यूल उपलब्ध हो सकें. यह आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में हर क्षेत्र में इच्छुक लोगों के यहाँ इस तरह की योजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप चलाकर उसमें आने वाली समस्याओं पर ध्यान दिया जाये जिससे केवल एनसीआर ही नहीं बल्कि पूरे देश के ऊर्जा परिदृश्य को पूरी तरह से बदलने की योजना को सफल किया जा सके.       
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गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

यूपी- बिजली सुधार चुनौतियाँ और संभावनाएं

                                        उत्तर प्रदेश में बिजली की मांग और आपूर्ति में बढ़ते फासले के बीच जिस तरह के कदम लगातार उठाये जाने चाहिए थे उनमें पिछले २५ वर्षों में निरंतर उपेक्षा किये जाने के कारण पिछले दशक में संभवतः प्रदेश की अधिकांश जनता को केवल ८ घंटे बिजली से काम चलना पड़ा था. यह प्रदेश की सरकारों और जनता के लिए बहुत ही चुनौती भरा काम था और स्थिति इतनी बिगड़ गयी थी कि राज्यपाल शास्त्री को यहाँ तक कहना पड़ा था कि यह सब पूर्व की सरकारों के पापों का फल है. आखिर दुनिया के कई देशों से अधिक आबादी वाला प्रदेश और उसकी चुनी हुई सरकारें बिजली की आपूर्ति के मामले में क्यों बुरी तरह से विफल हुई आज इस पर विचार किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि आज़ादी के बाद से देश में एक परंपरा सी चली आ रही थी कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए सरकारों के पास सदैव ही प्राथमिकता के आधार पर धन उपलध रहा करता था जिससे नए बिजली संयंत्र लगाने का काम लगातार चलता ही रहता था. नब्बे के शुरुवाती दशक से जिस तरह से प्रदेश में सामजिक विभाजन शुरू हुआ उसके बाद जनता भी धर्म और जाति आधारित चुनावों की तरफ मुड़ गई जिससे मूलभूत ढांचे को निरंतर विकसित करने की प्रक्रिया को लगातार बाधित किया गया और बहुत सारे अन्य क्षेत्रों में भी प्रदेश अपने उन पायदानों से भी नीचे चला गया जहाँ कभी वह आसानी से हुआ करता था.
                  संप्रग की पिछली केंद्र सरकार द्वारा पूरे देश में विद्युतीकरण की प्रतिशतता को बढ़ाये जाने के लिए राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण कार्यक्रम को लागू किया गया पर इसमें जिस तरह से राज्य सरकारों की सहमति और भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी उसके चलते तत्कालीन मायावती सरकार ने इस दिशा में नगण्य काम किया जिससे आधारभूत पारेषण और वितरण का जो नवीन ढांचा खड़ा किया जाना था वह पूरी तरह से बहुत पीछे छूट गया. अखिलेश सरकार आने के बाद उनकी तरफ से निश्चित तौर पर तहसील मुख्यालयों पर १३२ केवीए की क्षमता बनाये जाने को लेकर काम शुरू किया गया जिसके बाद प्रदेश के कुछ हिस्सों में यह काम पूरा होने के बाद वोल्टेज और बिजली की उपलब्धता आदि में गुणात्मक सुधार भी हुआ. जब तक यह काम पूरी तरह से नहीं हो जाता है तब तक प्रदेश में स्थिति पूरी तरह से सुधरने वाली भी नहीं है क्योंकि आज प्रदेश में बिजली की उत्पादन तो क्षमता के अनुरूप या उससे अधिक हो रहा है पर ऊर्जा संयंत्रों से उचित क्षमता की पारेषण लाइन उपलब्ध न होने के कारण उनका पीक ऑवर्स में भी पूरा उपयोग नहीं किया जा सकता है. निश्चित तौर पर अखिलेश सरकार ने बिजली की उपलब्धता के लिए ठोस उपायों की शुरुवात की थी जिसके चलते आज आदित्यनाथ सरकार को उसे गति देने की आवश्यकता भर है. केंद्र की सबको बिजली देने की योजना में यूपी को संतृप्त किए बिना लक्ष्य को नहीं पाया जा सकता है और यह अच्छा ही है कि अब सरकार ने एक पूर्णकालिक विद्युत मंत्री की नियुक्ति कर दी है जिससे उनके लिए पूरे प्रदेश में काम करना आसान होने वाला है.
           यूपी में बिजली की चोरी सदैव ही सबसे बड़ा मुद्दा रहा है और पिछली सरकार में जिस तरह से हर ट्रांसफार्मर तक मीटरिंग की व्यवस्था को शुरू किया गया था अब उसे हर ट्रांसफार्मर तक पहुंचाए जाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक निचले स्तर पर बिजली चोरी रोकने के लिए अधिकरियों और कर्मचारियों को उत्तरदायी नहीं बनाया जायेगा तब तक स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता है. आज भी पूरे प्रदेश में अवैध रूप से बिजली को जलाया जा रहा है जिससे विभाग को राजस्व की हानि होती है और ईमानदार उपभोक्ताओं के लिए बिजली निरंतर मंहगी होती जा रही है. इसके साथ एक मुश्त समाधान जैसी योजनाओं से पूरी तरह बचा जाना चाहिए क्योंकि इससे ईमानदार और समय से बिल चुकाने वाले उपभोक्ताओं के लिए नुकसान ही होता है तथा जो लोग विभाग पर बोझ बने रहते हैं उनके लिए सदैव ही छूट वाली योजनाएं सामने आती रहती हैं इससे जहाँ लोगों में समय से बिल जमा न करने की प्रवृत्ति बढ़ती है वहीं पूरी व्यवस्था पर कैंप आदि लगाने और अतिरिक्त काम करने का बोझ भी बढ़ता है. पावर कारपोरेशन ने जिस तरह से ऑनलाइन बिल के भुगतान की सेवा शुरू की है अब उसमें पंजीकृत उपभोक्ताओं को खुद ही रीडिंग भरने की छूट भी दी जानी चाहिए जिससे वे अपने बिल के लिए विभाग के कर्मचारियों की बाट न जोहते रहें ? आज भी अधिकांश स्थानों में बिजली का बिल समय से नहीं दिया जाता है जिससे उपभोक्ता चाहते हुए भी बिल का भुगतान नहीं कर पाते हैं आशा है कि सरकार इस दिशा में काम करने के बारे में सोचते हुए एक सरल एप्लीकेशन बनाएगी जिससे आम उपभोक्ता भी मोबाइल के माध्यम से अपने उपयोग की रीडिंग भर कर बिल का भुगतान करने में सक्षम हो सकेगा.
             बिजली की चोरी रोकने के लिए पूरे प्रदेश में सभी स्थानों पर एक निश्चित समय सीमा देकर लोगों को अपनी दुकानों के लिए कनेक्शन लेने के लिए कहा जाना चाहिए और उसमें असफल होने के बाद उनके विरुद्ध दंडात्मक कार्यवाही के बारे में सोचा जाना चाहिए. छोटे व्यापारियों के लिए वाणिज्यिक वर्ग में आधा किलोवॉट की नयी श्रेणी भी शुरू की जानी चाहिए क्योंकि बहुत सारी ऐसी दुकानें भी होती हैं जिनमें कोई लोड नहीं होता और एक किलोवॉट का कनेक्शन लेना व्यापारियों के लिए कठिन होता है जिससे वे अपने आसपास के दुकानदारों के साथ सांठगांठ करके बिजली जलाने का काम भी करने को मजबूर हो जाते हैं. विद्युत दरों में भी नए सिरे से बदलाव करने की आवश्यकता है और मीटरिंग को वैकल्पिक परिवर्तनीय लोड के साथ किये जाने के बारे में सोचना चाहिए जिससे हर उपभोक्ता अनावश्यक रूप से लोड के बोझ से न मारा जाये. प्रति माह रीडिंग लेते समय उस माह के अधिकतम लोड के अनुसार उपभोक्ता से फिक्स चार्ज लिया जाना चाहिए जिससे स्वयं उपभोक्ता भी बिजली बचाने के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर सके. उदाहरण के तौर पर इस सेवा के लागू होने पर किसी उपभोक्ता का बिल मौसम के अनुसार परिवर्तित होता रह सकता है क्योंकि अलग अलग मौसम में बिजली की आवश्यकताएं भी बदल जाती हैं साथ ही मिनिमम बिल जैसे उपभोक्ता विरोधी उपायों से पूरी तरह से बचने की आवश्यकता भी है क्योंकि फिक्स चार्ज मिनिमम बिल आदि के नाम पर अभी तक सभी निगम अपनी नाकामियों को उपभोक्ताओं से वसूलने के में लिप्त दिखाई देते हैं.            
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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

"बाइ अमेरिकन्स हायर अमेरिकन्स" की नीति

                                   अमेरिका के निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तरफ से रोज़ ही जिस तरह के चौंकाने वाले बयान दिए जा रहे हैं आने वाले समय में वे अमेरिका के साथ सम्पूर्ण विश्व के लिए बड़े बदलाव और संकट लाने वाले भी साबित हो सकते हैं क्योंकि अभी तक जिस बयानों और नीतियों को ट्रम्प की चुनावी बातें समझ जा रहा था वह मूर्त रूप लेने की तरफ बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है. आज जिस वैश्विक गाँव की बात  की जाती है वह पूरी तरह से अमेरिका और पश्चिमी देशों की तरफ से किये गए प्रयासों का ही नतीजा है पर आज जब दुनिया के अधिकांश देश अपने यहाँ खुले व्यापार की नीतियों को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं उस परिस्थिति में अमेरिका द्वारा अपने यहाँ आने वाले प्रशिक्षित प्रवासियों के लिए इस तरह से दरवाज़े बंद करने की प्रक्रिया को किसी भी स्तर पर कितना सही माना जा सकता है ? हर देश और उसके नेतृत्व को अपने देश के अनुसार नीतियों को बदलने और संशोधित करने का अधिकार मिला हुआ है पर जिस तरह से कुछ देशों में उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर लोगों की भावनाओं को भड़का कर दूसरे देशों के लिए अवसर समाप्त किये जाते हैं वह किसी भी दशा में उस देश और सम्पूर्ण विश्व के लिए लाभदायक नहीं हो सकते हैं.
                                  आज इस बात को भारत जैसे देशों को समझना ही होगा क्योंकि अपने तेज़ विकास, बेहतर संसाधन और खुली नीतियों के चलते अभी तक अमेरिका पूरी दुनिया के प्रवासियों और विशेषज्ञों के लिए एक स्वप्न जैसा बना हुआ है तो ट्रम्प की नयी नीतियां पूरी दुनिया पर किस तरह का प्रभाव डालने वाली सिद्ध हो सकती हैं ? आज जब पूरे विश्व में सभी देशों की एक दूसरे पर निर्भरता बढ़ती ही जा रही है तथा प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग के साथ अन्य विकासपरक कामों में हर देश और कंपनी अपने यहाँ सबसे अच्छे लोगों को काम पर रखने के लिए इच्छुक होते हैं तो इस परिस्थिति में अब आखिर किस तरह से कुछ बड़े देश अपने यहाँ इस तरह की बंदिशें लगा सकते हैं ? इस तरह से काम करने पर और नए सिरे से नौकरियां देने पर लगने वाली पाबन्दी के चलते आने वाले समय में जहाँ भारत जैसे देशों के व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त लोगों के लिए अवसर समाप्त होंगें वहीं देश में अच्छे अवसर न होने से उनकी प्रतिभाओं का सही उपयोग भी नहीं हो पायेगा. इस चिंता से निपटने के लिए अब भारत की निजी कंपनियों और सरकार को भी अपनी नीतियों में परिवर्तन करने और बेहतर मूलभूत संसाधन जुटाने के बारे में सोचना ही होगा जिसे उनकी नौकरियों और जीवन स्तर पर विपरीत प्रभाव न पड़े.
                                ऐसा नहीं है कि भारत के लिए यह करना बहुत मुश्किल होने वाला है पर यदि नीतियों में सही बदलाव कर शिक्षा को केवल जीविकोपार्जन से आगे बढ़कर देश और समाज के हित में व्यापक बनाने की तरफ काम शुरू किया जाये तो आने वाले समय में बहुत आसानी से ही हम अपने लक्ष्य को पा सकते हैं. पोखरण-२ के बाद जिस तरह से हमारे इसरो ने विदेशों और यहाँ तक रूस से भी तकनीक न मिलने की स्थिति में स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन बनाने में सफलता पायी थी आज अन्य क्षेत्रों में भी उस प्रक्रिया को दोहराया जा सकता है पर सारा देश इसरो की तरह पूरी निष्ठा के साथ काम करने के लिए तैयार हो यह भी इस सफलता के लिए बहुत आवश्यक होगा. हमें भी अपने संसाधनों को बेहतर तरीके से प्रबंधन के स्तर पर लाने की कोशिशें करनी होंगी जिससे देश के विकास पर बुरा प्रभाव न पड़े. चीन के साथ ट्रम्प के संबंधों को देखते हुए आने वाले समय में अमेरिका की रूस के साथ मित्रता बढ़ सकती है और चीन को घेरने का काम और भी आसानी से अमेरिका द्वारा किया जा सकता है. भारत को अपने हितों को ध्यान में रखते हुए ही आगे की परिस्थितियों के लिए अभी से वैकल्पिक उपायों पर विचार करना ही होगा तभी हम अपने विकास के पैमाने को ऊंचा बनाये रख पाने में सफल हो सकेंगें.  
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सोमवार, 12 दिसंबर 2016

सबसे पहले देश

                                                                 आज पूरे देश में विमुद्रीकरण के चलते जो स्थिति दिखाई दे रही है उसे सही तरह से सँभालने के लिए जो भी कदम उठाये जाने चाहिए उनके लिए सरकार कोशिश तो कर रही है पर जिस तरह से इस कदम की गंभीरता को समझे बिना ही आगे बढ़ने का काम किया गया है वह अब सरकार, रिज़र्व बैंक और जनता के लिए काम करने वाले बैंकों के लिए एक बहुत बड़ी समस्या लेकर आ गया है. देश को यह स्पष्ट चाहिए कि अब यह विमुद्रीकरण किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जा सकता है इसलिए देश की जनता और सरकार को यह समझना और समझाना ही होगा कि इससे किस तरह से कम समस्या के साथ निपटा जाये. सरकार यदि इस बात के लिए मन बनाये हुए थी तो सबसे आसान तरीका यही हो सकता था कि दो महीने पहले से ही बड़े नोटों की संख्या को कम करते हुए छोटे नोटों को चलन में लाने की कोशिश की जाती जिससे भुगतान और व्यापार में जो असंतुलन आज दिखाई दे रहा है उससे पूरी तरह से बचा जा सकता और आम लोगों की स्थिति पर इतना कुप्रभाव पड़ने से रोका भी जा सकता था पर इस पूरे मामले में जिस तरह की जल्दबाज़ी दिखाई गयी उससे भी परिस्थितियों को संभालना मुश्किल हो रहा है.
                                             जनता का जो हिस्सा डिजिटल बैंकिंग की तरफ बढ़ सकता है उसके लिए पहले से तैयारियों की आवश्यकता भी थी क्योंकि आज लोगों के पास खातों में पैसे तो हैं पर उनको खर्च करने लायक जगहें नहीं हैं. आज बड़े शहरों में भी लोगों की डेबिट कार्ड पर निर्भरता बहुत कम ही है तो उस स्थिति में किस तरह से पूरी स्थिति सामान्य रह सकती है ? क्या राज्य सरकारों की तरफ से इस बारे में नकदी को रोकने और डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए कोई कदम केंद्र के साथ मिलकर उठाया गया था ? आज इस स्थिति को सँभालने के लिए जिस तरह के प्रयास किये जा रहे हैं क्या वे पूरी तरह से स्थिति में अपने को फिट पा रहे हैं ? बड़े रिटेल आउटलेट और पेट्रोल पम्प्स को इस बात के लिए पहले से ही तैयार किया जाना चाहिए था कि आवश्यकता पड़ने पर वे कैश का भुगतान भी कर सकें. यह व्यवस्था अपने आप में बहुत कारगर हो सकती है क्योंकि इन जगहों पर बड़ी मात्रा में रोज़ ही कैश इकठ्ठा होता है और यदि इनको इस तरह से जनता को धन देने के लिए तैयार किया जा सका तो बैंकों में कैश के लिए लगने वाली लाइन को हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है. इससे जहाँ इन केंद्रों को बैंकों तक अधिक कैश पहुँचाने की समस्या से निजात मिल जायेगी वहीं आम जनता को भी आसानी हो जाएगी.
                                    अब इस समस्या से निपटने के लिए जो कुछ भी किया जाये वह एक क्षेत्र से समग्र रूप से होना चाहिए क्योंकि यदि पूरे देश में यह व्यवस्था करने की कोशिश की जाएगी तो इतने संसाधन जुटा पाना संभव नहीं होगा इसलिए अब केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर हर पिछड़े इलाके में समस्या का समाधान करने की पहल करनी चाहिए क्योंकि शहरों में तो किसी तरह काम चल भी रहा है पर गांवों और दूर दराज़ के क्षेत्रों में लोगों की ज़िन्दगी बहुत कठिन हो गयी है. आधार पर आधारित पेमेंट को सबसे पहले गांवों में ही लागू करना चाहिए क्योंकि उनके पास बैंक की सेवाएं भी उपलब्ध नहीं है और शहरों में जो काम साक्षरता वाली या मलिन/ पिछड़ी बस्तियां हैं वहां पर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए जिससे इन दोनों क्षेत्रों के लोगों के कष्टों को कम किया जा सके. गांवों में लोगों के लिए डेबिट कार्ड और पिन आदि संभालना भी कठिन होता है और उनके आस पास बैंकों की उपलब्धता भी नहीं है तो उस परिस्थिति में उनके लिए केवल आधार आधारित पेमेंट गेटवे स्थापित किये जाने चाहिए भले ही वे डेबिट कार्ड का उपयोग कर सकते हो और बिना किसी राजनीति के अब आधार को वोटर लिस्ट से भी जोड़ देना चाहिए जिससे आने वाले समय में एक राष्ट्रीय पहचान से आम लोग हर काम कर पाने में सफल हो सकें.  
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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

विमुद्रीकरण की समस्याएं

                                                 देश में बड़े नोटों के विमुद्रीकरण को एक महीना बीत जाने के बाद भी जिस तरह से आम लोगों की समस्यायों का अंत होता नहीं दिखाई दे रहा है उससे यही लगता है कि इतने बड़े फैसले पर सरकार और रिज़र्व बैंक के आंकलन में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक भी हुई है जिससे पूरे देश में बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. यह भी सही है कि आम लोग आज भी सरकार के इस फैसले को पूरी आशा के साथ पूरा होते हुए देखने के आकांक्षी भी हैं पर उनकी दैनिक जीवनचर्या जिस तरह से प्रभावित हुई है वह कब कम हो पायेगी इस बात का जवाब भी खोजते हुए सभी दिखाई दे रहे हैं. अब यह भी स्पष्ट हो रहा है कि अगले वर्ष पञ्च राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों को देखते हुए ही सरकार ने आनन फानन में इतनी बड़ी घोषणा कर दी जबकि उसके पास नकदी के सम्बन्ध में सटीक आंकड़े भी नहीं थे क्योंकि जिन १४ लाख करोड़ से कुछ अधिक नोटों में से ५/६ लाख करोड़ रूपये कालेधन के रूप में होने का सरकार को अनुमान था विभिन्न कारणों से वह ध्वस्त हो चुका है और सरकार का यह कहना पूरी तरह से बेमानी लगता है कि इससे वह आम लोगों की भलाई के लिए नयी योजनाएं शुरू कर पायेगी क्योंकि जितनी भलाई होनी है उससे अधिक नुकसान तो देश में आर्थिक माहौल थमने से हो ही चुका है.
                                   अब स्थिति यह है कि सरकार अपनी कवायद को विभिन्न कारणों से सफल बताना चाहती है पर उसके पास इन बातों के समर्थन में प्रस्तुत करने लायक आंकड़े ही नहीं हैं और उसकी इस मजबूरी का लाभ विपक्ष उठाना चाहता है जिससे वह भी जनता की समस्याओं में अपनी राजनीति को सम्मिलित कर सके. जैसी कि खबर दी जा रही है कि पौने चार लाख करोड़ की नकदी एक महीने में बाज़ार में बैंकों के माध्यम से पहुँच चुकी है तो अभी भी सरकार को लगभग १४ लाख करोड़ की व्यवस्था करनी है जिसमें संभवतः ६ महीने या उससे भी अधिक समय लग सकता है. यह एक लंबी प्रक्रिया थी जिस के लिये कई महीनों की समग्र तैयारी की आवश्यकता भी थी पर इस बारे में एक ही झटके में फैसला ले लिए गया था जिसके दुष्परिणाम आज सामने आ रहे हैं. यह सही है कि देश में लोगों की पहुँच आधुनिक संसाधनों की तरफ बढ़ रही है जिससे वे अधिक जागरूक भी हो रहे हैं पर जिस तरह से निजी वालेट कंपनियों को इस क्षेत्र में खुली छूट मिल गयी है उससे हमारे बैंकिंग सिस्टम पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की पूरी संभावनाएं भी हैं क्योंकि एनपीसीए की तरफ से जारी किये गए यूपीआई एप्लीकेशन्स के बारे में न तो बैंक ही जागरूक हैं और न ही जनता को इस बारे में पहले से बताया गया था. साथ ही प्रारंभिक स्तर पर होने के कारण अधिकांश ग्राहक अपने पंजीकरण को भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं जिससे निजी वालेट पर उनकी निर्भरता बढ़ती ही जा रही है.
                                   देश के अपने ढांचे को मज़बूत करने के लिए जिस तरह से कोशिशें की जानी चाहिए थीं आज वे अधूरी ही है और आने वाले समय में नोटबंदी के चलते अब उनको समय से पूरा कर पाना भी संभव नहीं है जिससे स्थितियां और भी खराब होती जा रही हैं. एक अच्छी बात यह है कि सरकार ने तकनीकी विशेषज्ञ, आधार के जनक और कांग्रेसी नेता नंदन नीलकेणी के साथ मिलकर आज की स्थितियों को सँभालने के लिए एक समिति बना दी है जो देश को नकदी पर निर्भरता कम करने के लिए उचित काम करने की दिशा में बढ़ना शुरू कर चुकी है जिससे कुछ मोर्चों पर तो अगले कुछ हफ़्तों में ही परिवर्तन महसूस हो सकता है. अब समय आ गया है कि सरकार और विपक्ष संसद में चल रहे गतिरोध को आगे बढ़कर समाप्त करने के बारे में सोचें जिससे देश की जनता के लिए कष्टों पर बात करने के स्थान पर कुछ ठोस कदम भी उठाए जा सकें. देश को काले धन के नाम पर उपजी इस समस्या के उचित समाधान की आवश्यकता भी है जिससे सम्पूर्ण रूप से देश की आर्थिक गतिविधियों को वापस पटरी पर लाया जा सके पर वर्तमान परिस्थिति में देश का राजनैतिक तंत्र अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभा पाने में पूरी तरह से असफल  होता ही दिखाई दे रहा है.         
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बुधवार, 30 नवंबर 2016

काला धन सरकार और कानून

                                                     ८ नवम्बर के विमुद्रीकरण घोषणा के बाद से जिस तरह से सरकार और रिज़र्व बैंक के सामने एक बिल्कुल नयी तरह की समस्या आ रही है उससे संभवतः कम तैयारियों के साथ शुरू किये गए विमुद्रीकरण के बहुत कमज़ोर परिणामों के साथ केंद्र सरकार और भी अधिक निशाने पर आ जाये क्योंकि इतने बड़े कदम से जहाँ सरकार को ४ से ५ लाख करोड़ रूपये बचा लेने की संभावनाएं दिखाई दे रही थीं अब यह आंकड़ा गड़बड़ाने की तरफ जाना शुरू हो चुका है तथा विमुद्रीकरण को काले धन को अर्थव्यवस्था से कम करने या पूरी तरह से हटाने के लिए एक विकल्प के रूप में अपनाये जाने की मंशा पर भी सवाल उठने लगे हैं. देश और विदेशों के अर्थशास्त्री विमुद्रीकरण को कभी भी काले धन पर अंकुश लगाने में महत्वपूर्ण कदम नहीं मानते हैं और जिस तरह से सरकार को आंकड़ों के दम पर कुछ लोग यह समझाने में सफल हुए कि इससे देश का काल धन समाप्त हो जायेगा वह भी यथार्थ पर कम और भ्रामक अधिक लगता है. इस पूरे प्रकरण में सबसे चिंताजनक बात यह है कि अपने विशुद्ध राजनैतिक लाभ हानि के साथ आर्थिक हितों को ध्यान में रखने वाले पीएम मोदी से आखिर इस तरह की बड़ी चूक कैसे हो गयी क्योंकि कहीं न कहीं उनसे निश्चित तौर पर सही आंकड़ों को या तो छिपाया गया या फिर तथ्यपरक बातें उनके सामने रखी ही नहीं गयीं.
                                    सरकार के पास इस योजना के लिए कोई बड़ा वैकल्पिक प्लान भी नहीं था क्योंकि जब तक सरकार जान पाती तब तक काले धन को सोने, प्रॉपर्टी और हवाला के माध्यम से काफी हद तक ठिकाने लगा दिया गया था और अब मजबूरी में अपने को सही साबित करने के लिए सरकार की तरफ से ५०-५० योजना को लाया गया है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिन लोगों ने बिना पूछताछ वाली ३०सितम्बर तक की आय घोषित करने की योजना में अपने राज नहीं खोले तो वे अब क्यों सामने आयेंगें ? पहले उन पर किसी भी तरह की कार्यवाही से सरकार ने खुद ही बचाने की बात की थी पर अब उन पर कुछ कानून लागू होंगें और यदि उनमें कोई गड़बड़ी पायी गयी तो आने वाले समय में उन्हें विभिन्न विभागों की जांचों का सामना भी करना पड़ सकता है. एक तरफ जहाँ काले धन वालों को कोई मुश्किल नहीं हुई वहीं आमलोगों को इससे बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा जो कि पूरा देश देख रहा है क्योंकि सरकार और खुद पीएम मोदी जनता से यह अपील कर रहे हैं कि देश के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें कुछ कष्ट उठाने के लिए तैयार रहना पड़ेगा.
                                    देश के आर्थिक परिदृश्य पर जिस तरह का नकारात्मक प्रभाव पड़ना शुरू हो चुका है उसके चलते ही जीडीपी से जुड़े हुए अनुमानों को कम किया जाने लगा है जिससे आने वाले समय में देश की आर्थिक गतिविधियों को तेज़ करने में जुटी हुई सरकार को बहुत बड़ा धक्का भी लगने वाला है क्योंकि चुनावों के समय किये गए प्रति वर्ष दो करोड़ रोजगार सृजन के स्थान पर बिना सम्पूर्ण तैयारी के किये गए इस विमुद्रीकरण से लगभग सभी क्षेत्रों में पहले से उपलब्ध रोज़गार के अवसरों पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है. अब भी समय है कि सरकार और विपक्ष को संसद में बैठकर बिना एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप के देश के आर्थिक परिदृश्य को सही करने के बारे में सोचना चाहिए. सरकार को यह नहीं मानना चाहिए कि वह जो चाहे कर सकती है और विपक्ष को भी सरकार की हर मंशा को संदेह की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए. सदन सुचारू रूप से चले यह सत्ता पक्ष की अधिक ज़िम्मेदारी होती है क्योंकि उसे ही विपक्ष को साथ में लेकर चलना भी होता है. किसी मुद्दे पर बड़े विवाद होने की सम्भावना को देखते हुए उस पर संसदीय समितियों में गहन चर्चा भी होनी चाहिए जिससे सदन में आवश्यक विधायी काम काज किया जा सके. आज सरकार भी सदन को कम से कम दिन ही चलाना चाहती है जिससे विपक्ष अपनी बात रखने के स्थान पर अपनी उपेक्षा को कार्यवाही बाधित कर दिखाने को मजबूर होता है अब इस पूरी स्थिति को बदलने की आवश्यकता भी है जिससे देश की गति को बनाये रखा जा सके.        
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गुरुवार, 10 नवंबर 2016

काले धन के स्वरुप

                                                 देश के अंदर प्रवाहित होने वाले काले धन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए अब सरकार को इनकम टैक्स के साथ अन्य टैक्स सुधारों पर भी आज की मंहगाई की दरों के अनुरूप काम करना ही होगा वर्ना समय के साथ एक बार फिर से १९४८, १९६० और १९६८ में नोट बंद करने की गयी कवायद की तरह २०१६ के नोट बंद होने के बाद पाकिस्तान से आये नकली नोट और टैक्स चोरी वाली काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था के खड़े होने में देर नहीं लगेगी। देश में काफी सुधारात्मक प्रयासों के बाद भी मोदी सरकार रेटिंग एजेंसियों को यह भरोसा दिला पाने में नाकाम रही है कि देश में आर्थिक गतिविधियां सही रास्ते पर हैं जिससे देश की रेटिंग में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई दिया है जिस पर खुद पीएम मोदी ने अधिकारियों से सभी सम्बंधित विभागों की रिपोर्ट मांगी है। आज भी सरकारी खर्च को कम करना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है और जब तक इसमें सफलता नहीं मिलती तब तक स्थितियां सुधरने वाली नहीं हैं। सरकार को भी यह समझना होगा कि विनिवेश भारतीय परिस्थितियों में अल्पकालिक उपाय ही हो सकता है पर वह सरकार के खर्चों को कम करने का साधन नहीं बन सकता है।
                                 काले धन को कृषि के माध्यम से कुछ हद तक स्वीकार्य बनाये जाने की कोशशें भी देश में शुरू हो चुकी हैं इसलिए अब सरकार के लिए नयी तरह की चुनौतियाँ भी सामने आने वाली हैं क्योंकि बड़े किसानों के रूप में अब वे लोग भी सक्रिय होने लगे हैं जिनका कृषि से कोई मतलब कभी भी नहीं रहा है. कृषि योग्य आये के करमुक्त होने के कारण वे अब कृषि भूमि में निवेश करने लगे हैं तथा उससे होने वाली आय को अपनी आयकर विवरणी में दिखाकर काले धन के कुछ हिस्से को कानून सम्मत बनाने के प्रयास करते हुए दिखाई देने लगे हैं.इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को कृषि क्षेत्र में भी कुछ सुधार करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तब बड़े किसानों के रूप में काले धन वालों पर यहाँ भी कोई नियंत्रण नहीं लगाया जायेगा तब तक इस तरह की छोटी गतिविधियों से भी अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार लाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकती है. निश्चित तौर पर सरकार की नज़र हर ऐसे क्षेत्र पर है जिससे काले धन को कानूनन सम्मत बनाने की गतिविधयों का सञ्चालन किया जा सकता है पर अब हमें खुद ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में आगे बढ़कर स्वयं को सुधारना होगा.
                                   हर सुधार की अपेक्षा केवल सरकार से करने की मानसिकता से भी अब देश को बाहर आना ही होगा क्योंकि देश केवल सरकार चला रहे लोगों का ही नहीं होता है उसमें बड़ा योगदान आम जनता का होता है सरकारें और नेतृत्व तो बदलते रहते हैं पर हमें अपने पूरे जीवन में एक जैसी परिस्थितियों में ही रहना होता है. देश का आम नागरिक टैक्स चोरी करने में लिप्त नहीं होना चाहता है अब अगर सरकार करों के ढांचे में आज की आवश्यकता के अनुरूप सुधार कर पाने में सफल हो तो उसके टैक्स में बदले ही पहले कुछ सालों में कुछ कमी दिखायी दे पर आने वाले समय में टैक्स देने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी होने से कर संग्रह अभूतपूर्व तरीके से बढ़ सकता है. सरकारी पारदर्शिता को और भी अधिक जवाबदेह और कारगर बनाने से जहाँ एक तरफ आम लोगों का भरोसा सरकार में बढ़ सकता है वहीं उसके आह्वाहन पर जनता की तरफ से सकारात्मक रुझान भी दिखाई दे सकता है. शिक्षा को सस्ता करने की दिशा में भी कदम उठाये जाने के बाद ही लोगों में भ्रष्टाचार करने की मानसिकता को कम किया जा सकता है क्योंकि शिक्षा का बाज़ारीकरण हो जाने से आज हर अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के लिए चिंतित दिखाई देता है. अब समय आ गया है कि हर बात में सरकार की तरफ ताकने के स्थान पर हम नागरिक खुद भी अपने स्तर से देश के लिए सही कार्यों में रूचि लेना प्रारम्भ करने जिससे भविष्य में किसी सरकार को इतना बड़ा और कडा निर्णय न लेना पड़े.   
                                        
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बुधवार, 9 नवंबर 2016

काले धन पर नकेल

                                             मोदी सरकार ने जिस तरह से देश को चौंकाते हुए बड़े नोटों के प्रचलन को बंद किया है वह काले धन के प्रवाह को रोकने और देश की अर्थव्यवस्था में काले धन की भूमिका को नियंत्रित करने वाला साबित हो सकता है. पहले विदेशों में जमा किये गए काले धन फिर देश के अंदर काले धन को बाहर निकालने की योजना के बाद यह परिवर्तन देश में काले धन के प्रवाह पर फिलहाल अंकुश लगाने का काम ही करने वाला है पर इस सबके बीच जिस तरह से आयकर सीमा में बढ़ोत्तरी और अन्य सुधारों की आवश्यकता है यदि उन्हें भी साथ ही लागू किया जाता तो इसके और भी बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं. इस मामले में मोदी सरकार की कोशिश पूरी तरह से सही कही जा सकती है पर जिस तरह से देश में शादियों का मौसम शुरू हो रहा है और उसमें जितने बड़े पैमाने पर ईमानदारी के धन के साथ काले धन का उपयोग होता है उसके चलते शादियों वाले घरों में समस्या ही उत्पन्न होने वाली है. जब देश की जनता स्वेच्छा से अपने स्तर पर ईमानदार होने की कोशिश करती नहीं दिखाई दे रही थी तो सरकार के पास इस तरह की सख्ती करने के अतिरिक्त कुछ और करने के विकल्प भी शेष नहीं रह गए थे.
                         काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था में देश के कुछ लाख लोगों के पास ही सब कुछ है और इससे निपटने के लिए सरकार का यह कदम इस मायने में अधिक महत्वपूर्ण है कि वह यह चाहती है कि जनता बैंकों या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लेनदेन करने की कोशिश करे जिससे देश की पूँजी का प्रवाह सही तरह से पता लग सके और काले धन का अर्थ व्यवस्था में प्रवाह नियंत्रित करते हुए आने वाले समय में पूरी तरह से रोका भी जा सके. सरकार के प्रयासों पर ऊँगली नहीं उठायी जा सकती है क्योंकि वह अपने आप में सही दिशा में उठाया गया कदम ही है और काले धन के प्रवाह को रोकने का काम केवल सरकार ही नहीं कर सकती है क्योंकि जब तक इसमें जन भागीदारी का सक्रिय योगदान नहीं होगा तब तक यह योजना भी पूरी तरह से सफल नहीं हो सकती है. देश की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय में इसका सकारात्मक परिणाम दिखाई देने वाला है पर यह भी संभव है कि बाज़ार में काले धन के प्रवाह के रुकने के कारण आर्थिक गतिविधियों में कुछ सुस्ती भी दिखाई देने लगे पर यह अस्थायी प्रभाव ही होगा और धीरे धीरे इसमें सुधार भी दिखाई देने लगेगा.
                         सभी जानते हैं कि आज देश का काला धन किन जगहों पर प्रवाहित होता है देश में चुनावों में जितने बड़े पैमाने पर धन के बल पर वोटर्स को खरीदने की कोशिशें की जाती हैं और उसमें भी रोक दिखाई देने वाली है क्योंकि चुनाव आयोग की लाख कोशिशों के बाद भी इस तरह की गतिविधियों को पूरी तरह से रोका नहीं जा सका है. अगले वर्ष यूपी जैसे बड़े राज्य समेत अन्य चार राज्यों में होने वाले चुनाव में काले धन के बलबूते बहुत कुछ करने के मंसूबे पाले बैठे लोगों के लिए समस्याएं ही बढ़ने वाली हैं क्योंकि अब पुराने नोटों से काम नहीं चलने वाला है और नए नोट मिलने में जो प्रक्रिया निर्धारित की गयी है उसके चलते अभी बड़ी मात्रा में काले धन का प्रवाह संभव नहीं दिखाई दे रहा है. जनता को इस मामले में थोड़े संयम से काम लेना चाहिए और बैंक तथा पोस्ट ऑफिस के बाहर अफवाहों के चलते भीड़ लगाने से बचना भी चाहिए. इस एक कदम से सरकार ने दो काम कर लिए हैं पहले यह कि काले धन के खिलाफ कार्यवाही लोगों को दिखाई भी देने लगी है वहीं पूँजी की कमी का रोना रो रहे बैंक्स के पास इन बड़े नोटों के रूप में ३० दिसंबर तक जो धनराशि जमा हो जाएगी सरकार के पास उसे अपनी सुविधा के अनुसार वापस करने का विकल्प खुला हुआ है जिससे बैंकों में एकदम से आम लोगों की तरफ से पूँजी का प्रवाह बढ़कर आज व्याप्त पूँजी संकट को कम करने का काम भी करने वाला होगा. जनता को धैर्य से काम लेना चाहिए और देशहित में सरकार के साथ पूरा सहयोग भी करना चाहिए.      
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मंगलवार, 11 अक्टूबर 2016

चीन-भारत सम्बन्ध

                                        मोदी सरकार की विदेश नीति में नए तत्वों को समाहित किये जाने के बाद जहाँ आम तौर पर यह धारणा मज़बूत हो रही है अब भारत ने आये अवसरों को खोजना शुरू कर दिया है तथा आने वाले समय में उसकी नीति में आवश्यकता के अनुरूप और बड़े परिवर्तन भी दिखाई देने वाले हैं. आज के समय में भारत के सामने अपने व्यापारिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सबसे कठिन काम चीन के साथ अपने रिश्तों को स्थायी रखते हुए नए आयामों की तरफ बढ़ाना भी है. चीन और भारत में मूलभूत अंतर यही है कि चीन में लंबे समय से वामपंथी सरकार चल रही है और इस  वामपंथ कि यह खासियत रही है कि इसने अपने सर्वहारा के कल्याण के साथ ही आधुनिक मामलों में खुले बाज़ार का भी समर्थन किया है जिससे आज पूरे विश्व में चीन में बने सस्ते सामान की बहुतायत देखी जा रही है. इस रूप में चीन ने अपने को एक बहुत बड़े निर्माता राष्ट्र के रूप में खड़ा करने में सफलता पायी है जबकि घरेलू राजनीति के चलते भारत में आवश्यक आर्थिक सुधारों पर भी जमकर विरोध किया गया जिससे डब्ल्यूटीओ में भारत के बाद प्रवेश करने वाला चीन तो उसका भरपूर लाभ उठाने में सफल रहा जबकि हम आज भी अपनी नीतियों को उस स्तर का बनाने में लगे हुए हैं जहाँ चीन दो दशक पूर्व हुआ करता था.
                              अपने सस्ते श्रम के चलते अब भारत भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए एक बेहतर स्थान साबित हो रहा है पर आज के समय में सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि अब भारत को चीन की पहले से मौजूदगी को भी टक्कर देने के साथ व्यापार में अपने को साबित भी करना पड़ रहा है ऐसी स्थिति में चीन की तरफ से भारत को हर स्तर पर परेशान करने की नीति का आरम्भ किया जा चुका है जिसे पाकिस्तान के सम्बन्ध में आसानी से समझा जा सकता है. साठ के दशक में जब भारत का चीन से कोई खुला संघर्ष नहीं था तब भी उसने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश को हड़पने की कोशिशें की थीं जबकि यह दोनों क्षेत्र उस समय निर्जन जानकर भारत की तरफ से वहां तक सुरक्षा के आज जैसे प्रबंध नहीं किये गए थे. चीन के तिब्बत पर कब्ज़ा करने के बाद ही उसकी भारत के प्रति नीति में बड़ा बदलाव आया और पंचशील की शांति वार्ताओं के बीच उसने भारत पर हमला भी किया तिब्बत को कमज़ोर करके भारत की सीमायें सीधे चीन के साथ मिल गयीं जिसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यही हुआ कि भारत ने उसकी बड़ी कीमत भी चुकाई.
                                आज जब भारत चीन की आर्थिक प्रगति के रास्ते में आ रहा है तो चीन उस पर कैसी कठोर प्रतिक्रिया अप्रत्यक्ष रूप से देना शुरू कर चुका है. अपने एक प्रान्त में इस्लाम के अनुयायियों पर कड़े प्रतिबन्ध लगाने के बाद भी वह पाकिस्तान की भारत में गड़बड़ी करने की हर हरकत को नज़र अंदाज़ भी करता जाता है. आज जब चीन को भारत से एक बड़ा बाज़ार मिल रहा है फिर भी वह उस तरफ से इतना लापरवाह है तो इसका मतलब यही निकाला जा सकता है कि वह जानता है कि भारत की तरफ से कोई आक्रामक कदम नहीं उठाया जायेगा. चीन आज भी लद्दाख और अरुणाचल मामले पर गाहे बगाहे प्रतिक्रिया देता रहता है जिससे यह मामला भी ज़िंदा रह सके. उसकी हरकतों का इस बात से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अपने राष्ट्रपति की २०१४ की महत्वपूर्ण भारत यात्रा के दौरान भी वह लद्दाख में घुसपैठ को ज़िंदा रखकर इसे विवादित बताने की अपने कोशिशें भी जारी रखता है. भारत के सामने आज यही बड़ा संकट है कि वह चीन से कोई खुला युद्ध नहीं कर सकता है तथा अधिकांश विवादित क्षेत्रों में चीन की तरफ से पहुंचना आसान है जबकि भौगोलिक परिस्थितियों के चलते भारत के लिए यह आज भी दुरूह और खर्चीला भी है. भारत के पास चीन पर दबाव बनाने के अवसर भी हैं पर उनका उपयोग करने से नयी तरह की समस्या सामने आ सकती है इसलिए पार्टी के रूप में भाजपा से जुड़े हुए लोग तो चीन के सामान का बहिष्कार करने की बातें करते दिखाई देते हैं जबकि सरकार चीन के साथ और भी मज़बूत संबंधों की पैरोकार ही लगती है.    
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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

चीनी सामान का बहिष्कार ?

                           देश में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों के लगातार होते हमलों के और चीन द्वारा पाकिस्तान में बैठे कश्मीर की आज़ादी का समर्थन करने वाले जेहादी संगठनों के समर्थन किये जाने के बाद जिस तरह से आम जनमानस में चीन में बने समान का बहिष्कार करने की इच्छा बलवती हो रही है उसे देखते हुए व्यापारिक स्तर पर चीन के साथ अब भारत के रिश्ते बिगड़ने ही वाले हैं. अभी तक भारत चीन में बने हर तरह के सामान का प्रमुख बाजार बना हुआ है उस परिस्थिति में यदि आम जनता की तरफ से इस पर स्वेच्छा से रोक लगायी जाती है तो यह स्थिति मोदी सरकार के लिए चीन से संबंधों में विकट परिस्थियों को उत्पन्न कर सकती है जिससे निपटने के लिए सरकार के पास संभवतः कोई मार्ग शेष नहीं बचने वाला है. बेशक राजनीति और व्यापार अपनी जगह पर हैं पर दुनिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वही भारत है जिसके नागरिकों ने १९६५ की लड़ाई में पीएम शास्त्री के आह्वाहन पर एक समय का खाना भी छोड़ दिया था तो आज जब स्थितियां देश के पक्ष में झुकी हुई हैं तो किसी देश विशेष के सामान का बहिष्कार करना कोई मुश्किल काम भी नहीं है पर सरकार की स्थिति इस पूरे प्रकरण में अजीब सी होने वाली है क्योंकि उसकी तरफ से देश की आर्थिक प्रगति के लिए भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं.
                                                  पूरी दुनिया में कम टिकाऊ साबित होने बाद भी चीनी सामान अपनी सस्ती कीमत के दम पर आम लोगों तक पहुँच बना सकने की क्षमता के चलते मज़बूत पैठ बनाये हुए हैं जिससे अन्य देशों के व्यापारिक हितों पर गंभीर चोट पहुँच रही है इस परिस्थिति में यदि भारत जैसे बहुत बड़े बाज़ार में चीन की पहुँच राष्ट्र के नाम पर कम होती है तो यह उसके व्यापारिक हितों के खिलाफ भी जाने वाला हो सकता है इसलिए ही चीन की तरफ से विशेषज्ञों ने स्टील आदि उद्योगों पर एंटी डंपिंग शुल्क लगाकर भारत द्वारा अपने उद्योगों की रक्षा करने की कोशिशें का विरोध भी शुरू कर दिया हैं. ऐसे में यदि आम भारतीय भी पाकिस्तान का आँख मूंदकर समर्थन करने के कारण चीन से नाराज़ होकर उसके यहाँ बनी वस्तुओं का उपयोग चरणबद्ध तरीके से बंद करना शुरू कर दे तो चीन के लिए एक बड़ा संकट भी खड़ा हो सकता है क्योंकि दुनिया भर में आर्थिक/ व्यापारिक गतिविधियां वैसे भी कम ही चल रही हैं तो उस परिस्थिति में चीन के लिए इतना बड़ा नया बाज़ार खोज पाना काफी मुश्किल भरा काम भी हो सकता है जिसके चलते वह भारत पर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में दबाव बना सकता है.
                                       यह उचित भी है कि चीन का पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए भारत को सभी तरह के विकल्पों पर विचार करना आवश्यक है पर अति उत्साह में क्या हम अपने व्यापारियों का ही अहित नहीं करने जा रहे हैं ? उरी हमले के बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों में जिस स्तर पर भारत में पाक के खिलाफ आम लोगों का गुस्सा चरम पर है उसे कम करने के लिए ही सर्जिकल स्ट्राइक के भरपूर प्रचार के माध्यम से सरकार ने अपने प्रयास कर ही दिए हैं उसके बाद अब जिस तरह से भारत की जनता पाक और चीन के विरुद्ध किसी भी तरह के संबंधों पर पुनर्विचार के लिए अड़ सी गयी है तो उसमें सरकार के चाहने या न चाहने का कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है. दीवाली के लिए जिस तरह से व्यापारियों ने अपने गोदामों को चीन के सामान से भर लिया है और उसमें से बहुत सा हिस्सा खुदरा व्यापारियों तक पहुँच भी गया है उससे यह सन्देश समझना चाहिए कि चीन ने तो इसमें लाभ कमा लिया है पर अब बहिष्कार से केवल हमारे अपने लोगों को ही हानि पहुँचने वाली है. इस वर्ष भी थोड़ी मात्रा में ही सही अपने व्यापारियों का समर्थन और चीन का विरोध करते हुए आमलोगों को अपने लोगों के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए और जो चीनी सामान बाज़ार में उपलब्ध है उसकी खरीद पर उतनी सख्ती नहीं करनी चाहिए और व्यापारियों को भी यह समझना चाहिए कि अब चीन के सस्ते सामान के स्थान अपर कुछ मंहगा साबित हो रहा भारतीय सामान ही प्राथमिकता में रहने वाला है इसलिए आने वाले समय में उन्हें भी चीन के सामान से किनारा करने के बारे में गंभीरता से सोचना ही होगा.  
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रविवार, 25 सितंबर 2016

दवा मूल्य नियंत्रण और यथार्थ

                                                     देश में आवश्यक दवाओं के मूल्यों को उचित दरों पर बेचे जाने के लिए समय समय पर जारी किये जाने वाले ड्रग प्राइस कण्ट्रोल ऑर्डर्स (डीपीसीओ) के माध्यम से निश्चित तौर पर रोगियों को सस्ती दवाओं का विकल्प मिलना शुरू हो गया है पर जिस तरह से एक बार सूचीबद्ध किये जाने के बाद सरकार और मूल्य नियंत्रण प्रणाली को देखने वालों की तरफ से दोबारा इस बात पर कोई विमर्श ही नहीं किया जाता है कि निर्धारित की गयी दवाएं बाजार में अब किस मूल्य पर उपलब्ध हो रही है तो उससे आमलोगों तक पहुँचने वाले लाभ को कैसे आँका जा सकता है ? एक नए चलन के रूप में दवा कंपनियों की तरफ से अब डीपीसीओ में आने वाली दवाओं के उत्पादन या उनके साथ किसी अन्य दवा को डालकर उसका मूल्य भी बढ़ाने के रास्ते खोल दिए गए हैं तो आम रोगियों को उससे क्या लाभ मिलने वाले हैं ? डीपीसीओ नीति में आज जो बड़ी कमी दिखाई दे रही है उस पर किसी का ध्यान भी नहीं जा रहा है जिससे सरकार की तरफ से घोषित की गयी सूची की अधिकांश दवाइयां रोगियों को उतनी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं जितनी पहले हो जाया करती थीं तो क्या नीति में हमें फिर से बदलाव करने की आवश्यकता नहीं है जो आम लोगों तक उचित मूल्य पर दवाओं की उपलब्धता को सुनिश्चित कर सके ?
                                             उदाहरण के तौर पर डॉक्सीसाइक्लिन नाम की एंटीबॉयोटिक जो आज भी बहुत कारगर है डीपीसीओ में आने से पहले ६/७ रूपये की मिलती थी पर इसका मूल्य निर्धारण करते समय इस बात पर कोई विचार ही नहीं किया गया कि क्या दवा कंपनियां इसे १ रु का बनाकर बेचने में दिलचस्पी दिखाएंगीं ? आज जिन कंपनियों द्वारा इस दवा को बनाया जा रहा है तो उनमें से कोई इसके साथ बेहद सस्ती लैक्टोबैसिलस या बीटा साइक्लोडेक्सट्रिन को मिलाकर आसानी से ५/६ रूपये में बेच रहे हैं तथा अधिकांश कंपनियों द्वारा इसे बनाये जाने से ही छुटकारा पा लिया गया जिससे एक महत्वपूर्ण एंटीबॉयोटिक जिसका आज तक दुरूपयोग नहीं हुआ है और जिसके खिलाफ रेसिस्टेन्स के मामले भी कम ही मिलते हैं उसे क्यों रोगियों से दूर किया जा रहा है ? क्या मूल्य निर्धारण की सूची को लंबा करने के लिए ही इस तरह की बातों को किया जाता है क्योंकि इसके वर्तमान स्वरुप से रोगियों को पहले ही मिलने वाली आवश्यक दवाएं यदि मिलनी ही बंद हो जाएँ तो उससे किसका भला होने वाला है ? जो कंपनियां इस तरह के किसी भी अन्य मिश्रण के साथ इस तरह की दवाओं को बेचने का काम कर रही हैं क्या उनके खिलाफ सरकार के पास कोई ठोस नीति है ?
                                         सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए एक बार फिर से अपनी सार्वजनिक क्षेत्र की दवा इकाइयों को पुनर्जीवित करना ही होगा क्योंकि यदि दवा का कारोबार पूरी तरह से इन व्यवसायी कंपनियों के हाथों में चला गया तो आने वाले समय में सरकार के पास डीपीसीओ की एक लंबी लिस्ट ही होगी और ये सस्ती दवाएं बाज़ार में कहीं भी दिखाई ही नहीं देंगीं. सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों को जीवित करने से दोहरा लाभ भी होने वाला है जिससे एक तरफ नियंत्रित मूल्य वाली दवाएं रोगियों को उपलब्ध होती रहेंगीं वहीं दूसरी तरफ इन इकाइयों के द्वारा बड़ी संख्या में रोज़गार का सृजन भी किया जाता रहेगा. निजी क्षेत्र की कंपनियों के सामने तब इस बड़े बाज़ार पर कब्ज़ा करने के लिए नए सिरे से सोचने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा भी नहीं बचेगा. एक समय था जब आइडीपीएल, हिदुस्तान एंटीबायोटिक्स और विभिन्न राज्य सरकारों की दवा कंपनियां सारे देश की ७०% मांग को पूरा कर दिया करती थीं पर बाद में इनमें समय के साथ बदलाव और आधुनिकीकरण को न अपनाये जाने के कारण तथा सरकार की तरफ से इसे बीमार उद्योग मान लेने के चलते कई तरह की समस्याएं भी सामने आयीं. आज एक नयी सरकारी दवा उत्पादन नीति के अन्तर्गत इन सभी केंद्र और राज्य की दवा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए और एक बड़ी कंपनी बनायीं जानी चाहिए जिससे वो पूरे देश के सरकारी अस्पतालों को दवाओं की आपूर्ति कर सके और आम लोगों को उचित मूल्य पर औषधियां उपलब्ध कराने के साथ रोजगार का सृजन भी कर सके.         
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गुरुवार, 8 सितंबर 2016

जन विरोधी फ्लेक्सी किराया

                                                        अपने काम में तेज़ी लाने के उद्देश्य से संसाधनों को जुटाने के लिए हर तरह की जुगत करने में लगे हुए रेल मंत्री की तरफ से फ्लेक्सी किराये को जिस तरह ०९ सितंबर से लागू किया जा रहा है वह आने वाले समय में रेलवे के लिए नयी तरह की समस्याएं सामने लाने वाला है. अपनी कुछ जन विरोधी नीतियों के चलते रेलवे ने जिस तरह से त्योहारों पर चलायी जाने वाली विशेष गाड़ियों को सुविधा स्पेशल के नाम से चलाने और अपने घरों को लौट रहे लोगों से अधिक किराया वसूलने की नीति बनायीं थी वह उलटी पड़ती हुई दिखाई दे रही है ऐसी परिस्थिति में जब लोगों को सुविधा युक्त समय पर चलने वाली ट्रेनों की आवश्यकता है तो उसके स्थान पर सरकार केवल अधिक किराया वसूलने की नीति पर ही अमल करना चाहती है। यह स्थिति तो तब है जब डीज़ल की कीमत पिछले सालों के मुक़ाबले निचले स्तर पर हैं और परिचालन में रेलवे को उतना खर्च नहीं करना पड़ रहा है जितना अभी तक खर्च हुआ करता था फिर भी राजधानी, दुरंतो शताब्दी के रोज़ के किरायों में इस तरह की जुगत लगाने से यात्रियों का कौन सा हित जुड़ा हुआ है यह बताने में रेलवे पूरी तरफ से चुप्पी लगाए बैठा है.

                           पिछली मनमोहन सरकार ने रेलवे के कम किरायों को चरणबद्ध तरीके से तर्कसंगत बनाये जाने के लिए रेल किराया प्राधिकरण बनाये जाने की दिशा में सकारात्मक कदम उठाये थे पर दो साल से अधिक बीत जाने पर भी मोदी सरकार उस प्राधिकरण का गठन नहीं करना चाहती है जिससे सदैव के लिए ही किराये पर होने वाली राजनीति स्वतः ही बंद हो जाएगी तथा रेलवे को भी इसके लिए संघर्ष नहीं करना पड़ेगा पर अपने कार्यों में मनमानी करने में माहिर मोदी सरकार के मंत्रालय भी उनके रवैये पर ही चल रहे हैं जिससे किराया प्राधिकरण तो नहीं बनाया जा रहा पर लोगों की जेबें काटने का जुगाड़ अवश्य ही किया जा रहा है. अच्छा होता कि सुविधा स्पेशल ट्रेनों की गिरती हुई कमाई को देखते हुए इस तरह से फ्लेक्सी किराये पर पुनर्विचार कर इसका कोई और हल निकालने की तरफ सोचा जाता पर इन विशेष गाड़ियों में सफर करने वालों के लिए बिना विचार किये ही उनके लिए यात्रा को जिस तरह से पूरे वर्ष मंहगा करने की जुगत की जा रही है वह रेलवे के लिए कितनी लाभकारी साबित होगी यह तो समय ही बताएगा।
                           रेलवे जिस तरह से यह मानकर बैठा हुआ है कि देश का हर नागरिक कितनी भी मंहगी रेलसेवा को झेलेगा वह उसकी गलतफहमी ही है क्योंकि इस तरह से उन लोगों के पास यात्रा करने के दूसरे विकल्प भी खुल जायेगें जिससे सड़कों पर दबाव बढ़ेगा और प्रदूषण में भी वृद्धि दिखाई देगी जिससे देश के पर्यावरण को नुकसान होने के साथ वाहनों की कतारें और भी लंबी होने की पूरी संभावनाएं भी हैं. निश्चित तौर पर देश में सड़कें पिछले तीन दशकों में तेज़ी से सुधरी हैं तो हज़ार किमी तक आने जाने वाले पूल करके एसयूवी के माध्यम से अपनी यात्रा करने के बारे में सोचना शुरू क्र सकते हैं जिससे रेलवे की सामान्य आमदनी पर भी बुरा असर पड़ना अवश्यम्भावी है. क्या सरकार सिर्फ अपने तरीकों से देश की आवश्यकताओं को समझे बिना ही इस तरह की नीतियां बनाकर यात्रियों का भला कर सकती हैं अब इस बात पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि अभी जो फ्लेक्सी किराया लागू किया जा रहा है उसके आने वाले दिनों में आम मेल, एक्सप्रेस ट्रेनों में भी लागू किये जाने की संभावनाएं बनती दिखाई दे रही हैं. जब राजधानी और शताब्दी के किराये में इतनी बढ़ोत्तरी कर दी जाएगी तो आने वाली तेजस श्रेणी की गाड़ियों में इससे भी अधिक किराया वसूलने का रास्ता साफ़ हो जायेगा। बेहतर सेवाओं के नाम पर इस तरह की लूट का किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं किया जा सकता है क्योंकि रेलवे के खर्चों के चलाने के लिए उन आम दाताओं के पैसे भी लगते हैं जो कभी भी रेल की यात्रा ही नहीं करते हैं.  

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 4 सितंबर 2016

स्वायत्त रिज़र्व बैंक

                                                          अपने तीन साल के कार्यकाल को पूरा करने के अंतिम चरण में रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुरामन राजन ने जिस तरह से केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता के बारे में स्पष्ट रूप से एक बार फिर राय दी है वह निश्चित तौर पर सरकार को कुछ हद तक विचलित कर सकती है क्योंकि देश के अंदर की राजनैतिक परिस्थितियों के चलते कोई नेता मंत्री या स्वयं सरकार की तरफ से कैसा भी बयान सामने आता रहे पर जब केंद्रीय बैंक के गवर्नर के रूप में फैसले लेने का समय होता है तो अधिकांश मामलों में सरकारें अपने राजनैतिक और व्यापारिक घरानों से संबंधों के चलते दबाव बनाने से भी नहीं चूकती हैं. निश्चित तौर पर पूरी दुनिया में चल रही अघोषित आर्थिक सुस्ती के समय २०१३ में मनमोहन सरकार ने जिस उद्देश्य के साथ राजन की नियुक्ति की थी वे उसमें पूरी तरह से सफल भी रहे हैं. आज जब वे वापस अपने शिक्षण के काम में लौट रहे हैं तो भारत में रूपये की स्थिति स्थिर कही जा सकती है और साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार में भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ोत्तरी भी उनके कार्यकाल में ही हुई है फिर भी मोदी सरकार से काम करने की शर्तें तय न हो पाने के चलते राजन ने खुद ही दूसरे कार्यकाल के लिए काफी पहले ही अनिच्छा जता कर मोदी सरकार के लिए नए गवर्नर को चुनने का काम आसान भी कर दिया था.
                              बेशक राजन ने अपने कार्यकाल में बहुत उतार चढाव देखे और उनको देश की अर्थव्यवस्था को गति में बनाये रखने के लिए कई बार सरकार से टकराव भी मोल लेना पड़ा तथा कुछ ऐसे मुद्दों पर भी अपने विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने पड़े जिनका रिज़र्व बैंक के गवर्नर के रूप में कोई सम्बन्ध भी नहीं था क्योंकि मुखर पीएम मोदी और हर बात पर सोशल मीडिया में बात करने वाली सरकार भी कई उन मुद्दों पर चुप्पी लगाए बैठी थी जिनसे देश में संभावित निवेश पर असर पड़ रहा था. यदि विवादित मुद्दों पर सरकार की तरफ से पहले ही वक्तव्य आ जाते तो राजन को उनपर बोलकर विदेशी निवेशकों को यह सन्देश नहीं देना पड़ता कि सरकार के अलावा देश की आर्थिक प्रगति पर नज़र रखने के लिए रिज़र्व बैंक पूरी तरह से काम कर रहा है और आने वाले समय में निवेशकों के हितों का पूरा ध्यान भी रखा जायेगा. बाद में जब पीएम मोदी ने इन मुद्दों पर अपनी पार्टी के लोगों को नसीहते देनी शुरू कर दीं उसके बाद से राजन ने कभी भी इन मुद्दों पर कोई वक्तव्य नहीं दिए. आने वाले समय में ऊर्जित पटेल पर इन सभी बातों के लिए बहुत दबाव रहने वाला है पर वे मुखर होने के स्थान पर केवल अपने काम पर ध्यान देने वाले व्यक्ति हैं और राजन के साथ काम करने के अनुवभव के चलते ही मोदी सरकार ने राजन की नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए ही ऐसा कदम उठाया है.
                                 देश के मज़बूत आर्थिक माहौल के लिए रिज़र्व बैंक का स्वायत्त होना बहुत आवश्यक है क्योंकि आम तौर पर राजनैतिक दलों के पास इतनी समझ और इच्छा शक्ति नहीं होती कि वे अपने स्तर से हर आर्थिक मुद्दे की गंभीरता को समझ सकें. ऐसी परिस्थिति में यदि अर्थ क्षेत्र से जुड़ा हुआ कोई विशेषज्ञ गवर्नर के पद पर होता है तो देश को चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती है. एक स्वतंत्र निर्णय लेने वाला गवर्नर सदैव ही मज़बूत आर्थिक परिदृश्य को खड़ा करने में सफल हो सकता है पर जब समितियों के माध्यम से उसके पर करतने की कोशिशें की जाने लगती हैं तो वह देश के लिए ही दुर्भाग्यपूर्ण होता है क्योंकि निर्णय लेना सामूहिक ज़िम्मेदारी बन जाता है. हमारे देश में किसी भी आशानुरूप सफलता के न मिलने पर जिस तरह से दोष देने के लिए सबसे कमज़ोर व्यक्ति को खोजने का काम शुरू कर दिया जाता है यदि गवर्नर की शक्तियों पर वैसा ही प्रतिबन्ध लगाया गया तो देश के ये लंबे समय में वह बहुत ही घातक हो सकता है. मोदी सरकार ने गवर्नर के पर कतरने की शुरुवात भी कर दी है और हो सकता है कि इन सीमित अधिकारों के साथ राजन ने खुद को सही न पाया हो जिसके चलते ही वे दूसरे कार्यकाल के लिए खुद ही दूर हो गए थे. आशा की जानी चाहिए कि सरकार ऊर्जित पटेल को भी स्वतंत्रता के साथ काम करने देगी जिससे वे देश की मौद्रिक नीति को राजनैतिक चश्में के स्थान पर आर्थिक नज़रिये से देखने की अपनी शक्ति को और भी पैना कर सकें और देशहित आवश्यक कदम उठाने के लिए खुलकर काम कर सकें.                             
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...