मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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रविवार, 3 दिसंबर 2017

डॉक्टर-लैब-फार्मा कम्पनी गठजोड़

                                                       एक समय में चिकित्सा व्यवसाय को सबसे अच्छा माना जाता था और यह भी माना जाता था कि कोई भी डॉक्टर किसी भी परिस्थिति में अपने यहाँ आये हुए किसी भी रोगी के हित के लिए ही सदैव प्रयत्नशील रहता है पर आज के बदलते परिवेश में जिस तरह की ख़बरें और घटनाएं सामने आती हैं उनसे आम लोगों की इस धारणा को बहुत धक्का भी लगता है. नयी दवाओं और चिकित्सा जगत में होने वाले नए अनुसंधानों से देश के विभिन्न भागों में काम कर रहे डॉक्टर्स को परिचित कराने तथा उनको रोगियों के हितों में उपयोग करने के लिए लगभग हर दवा कम्पनी अपने स्तर से प्रयास करती है और अपने उत्पादों की बिक्री के लिए डॉक्टर्स को विभिन्न तरह के उपहारों से उपकृत भी करती रहती है. जब तक चिकित्सा जगत में व्यावसायिक घरानों की पैठ नहीं हुई थी तब तक सब कुछ ठीक ही चल रहा था पर जब से दवा कंपनियों ने फार्मा लाइन से जुड़े हुए डी फार्मा, बी फार्मा और एम फार्मा अभ्यर्थियों के स्थान पर एमबीए किये हुए लोगों के हाथों में बिक्री को सौंप दिया है तब से इस क्षेत्र का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है और दूसरी कम्पनी के बिकते हुए उत्पादों की होड़ में अब हर छोटी बड़ी कम्पनी कुछ भी बनाकर बेचने की राह पर चल चुकी हैं और इसमें दुर्भाग्य की बात यह है कि डॉक्टर्स सब कुछ जानते हुए भी सिर्फ अपने लालच के कारण इन कंपनियों के जाल में उलझे हुए हैं.
                                       यह सही है कि कई बार लक्षणों के आधार पर रोग का पता लगा पाना कठिन हो जाता है और दिखाई देने वाले लक्षणों के अतिरिक्त कोई और रोग भी किसी रोगी में हो सकता है जिसे जानने के लिए विभिन्न तरह की जांचें करवाने की आवश्यकता भी पड़ती रहती है. जब तक आवश्यकता हो तब तक इसे सही समझा जा सकता है पर जब यह भी कमाई का एक और जरिया बन जाए तो इस पर लगाम लगाने की आवश्यकता आ जाती है. आज बड़े शहरों में बड़ी लैब्स के साथ हज़ारों छोटी लैब्स मौजूद हैं जो अपने असली काम के साथ इस तरह के काम में भी लिप्त हैं पर सोचने वाली बात यह है कि लाखों रुपयों के खर्च के बाद स्थापित होने वाली लैब्स आखिर छोटे शहरों और कस्बों तक में कैसे खुलती जा रही हैं जबकि उनके पास आवश्यक चिकित्सक और लैब सुविधाएँ भी नहीं हैं ? यदि इन छोटे शहरों में बैठे हुए झोलाछाप चिकित्सकों और इन कुकुरमुत्तों की तरह उग आयी लैब्स पर ध्यान दिया जाये तो पूरे देश में यह हज़ारों करोड़ का अनैतिक कार्य सामने आ सकता है. इन कथित चिकित्सकों के पास कोई डिग्री नहीं होती जिससे वे केवल लैब से मिलने वाले अपने कमीशन के चक्कर में भी अनाप शनाप जांचें कराते रहते हैं जिससे पहले से ही परेशान रोगी पर और अधिक आर्थिक दबाव पड़ता है पर इस दिशा में सोचने का समय संभवतः किसी के पास नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों की नज़रें अभी तक इस गठजोड़ पर नहीं पड़ रही हैं.
                               इन सबसे बचने के लिए आखिर किस स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है अभी हमारे देश में किसी को भी इस बात की जानकारी भी नहीं है क्योंकि लोग आज भी भरोसे के चलते आँखें बंद करके अपने डॉक्टर और उसके बताये रास्ते पर चलते हैं. बंगलुरु में जिस तरह से चिकित्सकों और लैब के बीच का गठजोड़ सामने आया है और उसमें करोड़ों रुपयों की ज़ब्ती के साथ विदेशी मुद्रा भी मिली है तो क्या केंद्र सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अविलम्ब इस बात पर सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आखिर यह सब कैसे रोका जाना चाहिए ? ऐसा नहीं है कि नेताओं और अधिकारियों को यह नहीं पता है पर उनके अपने स्वार्थ हर तरह की परिस्थिति में सिद्ध हो जाते हैं तो उन्हें आम लोगों की इस समस्या पर सोचने की आवश्यकता ही नहीं है. इस बारे में अब सरकार को हर डॉक्टर की डिग्री को आधार से जोड़कर उसके द्वारा पूरे साल में कराई जाने वाली जांचों पर नज़र रखने के लिए एक व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जिससे यह पता चल सकेगा कि वह डॉक्टर कितने रोगी देख रहा है और कितना धन लैब्स से ले रहा है साथ ही आयकर देने और उसके इस तरह की आमदनियों के बीच किस तरह का सामंजस्य है भी या नहीं ? इस तरह के कदम से जहाँ सरकार को अधिक राजस्व मिल सकता है वहीँ रोगियों के लिए सही जांचों तक डॉक्टर्स और लैब्स को सीमित किया जा सकता है.
                             ऐसा भी नहीं है कि आज सारे चिकित्सक लैब्स और फार्मा कंपनियां इस तरह के कामों में लिप्त है फिर भी यह मानकर काम नहीं चलाया जा सकता है कि हर जगह कुछ लोग गलत तरह से काम करते हैं. सरकार को इस दिशा में सुधार के लिए पहले एक व्यापक नीति बनानी होगी जिसके बाद ही उसको कानून का रूप दिया जा सकता है. रोगियों को अच्छी सुविधाएँ देने के लिए जन औषधि केंद्रों की तरह लैब्स की अवधारणा को भी मूर्त रूप दिया जा सकता है कम से कम जिला अस्पतालों की क्षमता को इतना अधिक बढ़ाये जाने पर बल दिया जाना चाहिए जो कम से कम अपने जिले के रोगियों को इस तरह की सुविधाएँ उचित दरों पर उपलब्ध कराने के केंद्र के रूप में विकसित किये जा सकें. इसके लिए सरकार को चिकित्सा में उच्च शिक्षा के लिए व्यापक सुधार करते हुए एमडी डीएम आदि स्तरों पर शिक्षा की अधिक व्यवस्था के बारे में सोचना ही होगा साथ ही आयुष मंत्रालय को इस दिशा में और अधिक कारगर बनाये जाने की आवश्यकता पर ही ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे रोगी के सामने हर स्तर की चिकित्सा सेवा लेने का विकल्प खुल सके और वह अपनी समस्या में किसी बड़े व्यावसायिक गठबंधन का शिकार न हो जाए.        
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सोमवार, 4 मई 2015

पुत्र जीवक बीज और विवाद

                                         दो तीन माह पहले आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थ भाव प्रकाश निघन्टु में वर्णित पुत्रजीवक बीज को लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह का अभियान शुरू हुआ था वह अब संसद तक पहुँच गया है क्योंकि इस औषधि के माध्यम से नेताओं को स्वामी रामदेव पर प्रत्यक्ष हमला करने का अवसर मिला है और इस हमले को नेता लोग अपरोक्ष रूप से मोदी तक ले जाना चाहते हैं. मोदी पर राजनैतिक कारणों से हमले करने के राजनीति में बहुत सरे अन्य अवसर भी आने वाले हैं तो इस तरह से आयुर्वेद को घटिया राजनीति में मोहरा बनाने की किसी भी कोशिश का पूरी तरह से विरोध किया जाना चाहिए. यह सही है कि इसके नाम को भारतीय संविधान की धारा १४/१५ का आज के अनुसार स्पष्ट उल्लंघन भी कहा जा सकता है जिसमें धर्म, जाति, समूह, भाषा लिंग आदि के आधार पर किसी के साथ किसी भी तरह का भेदभाव देश में स्वीकार नहीं किया जा सकता है. आज जिस तरह से इस मामले को लेकर राजनीति शुरू हो गयी है वह देश के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही है क्योंकि केवल इसके नाम को लेकर ही जिस तरह का हल्ला मचाया जा रहा है वह इस बात को स्पष्ट कर देता है कि इस मुद्दे को राजनैतिक कारणों से हवा दी जा रही है जो कि स्पष्ट रूप से संविधान की ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना का भी उल्लंघन ही है. देश में बहुत सारे अन्य ज्वलंत मुद्दे हैं जिन पर संसद में बहस होनी चाहिए न कि इस तरह के मुद्दों पर जिनको बेवजह मुद्दा बनाने की कोशिशें हो रही हैं.
                              भाव प्रकाश निघन्टु अपने आप में आयुर्वेद का बहुत मानक ग्रन्थ है और इसमें ही पुत्रजीवक बीज का वर्णन किया गया है जहाँ पर इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं है कि इसके सेवन से केवल पुत्र ही पैदा होते हैं. वहां पर इसका उल्लेख स्त्री रोगों और बन्ध्यत्व को लेकर किया गया है जो कि आज भी संतान प्राप्ति में बहुत सारे लोगों के लिए लाभकारी साबित होता है. आयुर्वेद में सदैव से ही इस बात का चलन है कि जो भी योग किसी भी ग्रन्थ में वर्णित है उसे उसके नाम से ही बनाया जाता है और साथ ही यह भी लिखा जाता है कि यह औषधि किस प्रामाणिक ग्रन्थ के आधार पर तैयार की गयी है और आज बाजार में बहुत सारी आयुर्वेदिक कंपनियां आज भी इसी मानक का पालन करते हुए औषधियों का निर्माण कर ग्रंथों के नाम भी लिखती हैं. वैज्ञानिक आधार पर यदि देखा जाये तो गुणसूत्रों के आधार महिला की तरफ से लिंग निर्धारण में एक जैसे ही गुणसूत्र होते हैं जबकि पुरुष की तरफ से आने वाले गुणसूत्र ही बच्चे के लिंग निर्धारण का निर्णय करते हैं तो किसी भी महिला को यह औषधि खिलाने से केवल पुत्र ही कैसे पैदा हो सकते हैं इस बात को आज के वैज्ञानिक युग में समझने की बहुत आवश्यकता है. यदि आज के आधुनिक विज्ञान को माना जाये तो इस तरह की औषधि से पुत्र की प्राप्ति केवल संयोग ही हो सकती है पर इस नाम का दुरूपयोग कर किसी को ठगने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती है.
                            अब इस बात पर ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि आखिर प्राचीन समय में इसका नामकरण इस तरह से क्यों किया गया तो भारतीय समाज की सदैव ही पुत्र प्राप्ति की इच्छा के साथ इसे जोड़कर देखा जाना चाहिए क्योंकि भले ही हम कितने भी आधुनिक होने का ढंग क्यों न कर लें पर कितने लोग ऐसे हैं जो घर में पुत्री के जन्म पर भी उसी तरह से दिल से प्रसन्न होते हैं जितना पुत्र के जन्म पर ? यह सवाल बहुत कड़वा और चुभने वाला है क्योंकि पुत्र से कुल चलने की बातें सोचकर बैठे हुए लोग आखिर किस तरह से एक ऐसी औषधि को आसानी से स्वीकार करते जो उनके झूठे अहम को संतुष्ट ही नहीं कर सकती हो ? आयुर्वेद अधिकांश समय राज्याश्रित भी रहा है क्योंकि किसी भी आयुर्वेद से जुड़े हुए व्यक्ति के लिए शोध करना उस समय भी इतना ही कठिन काम था जितना यह आज भी है इसलिए मात्र पुत्रजीवक नाम होने से इस बात को कटघरे में किसी को खड़ा करने से पहले हमें खुद अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए कि कैसे आम भारतीय के मन में पुत्र प्राप्ति की उत्कंठा आज भी रहा करती है ? सामाजिक दबाव में यदि हज़ारों वर्ष पहले भी समाज ने इस तरह के नाम को स्वीकार किया था तो आज किस आधार पर इससे पल्ला झाड़ा जा सकता है और एक बात और भी विचारणीय है कि क्या संसद और सरकार के पास इस बात के अधिकार हैं भी कि वे किसी आयुर्वेद के ग्रन्थ या संहिता में वर्णित किसी भी योग का नाम केवल राजनैतिक विरोध के चलते ही बदलने की कोशिश करने लगें ? पुत्रजीवक बीज तो हज़ारों वर्षों से अस्तित्व में है और बन्ध्यत्व में इसके प्रयोग से हज़ारों महिलाओं को बाँझ जैसे शब्दों से मुक्ति मिली है फिर भी इस पर हमला करने से क्या हसिल होने वाला है जबकि इस तरह से देखा जाये तो पूरे देश में ही लिंग अनुपात बिगड़ने का काम केवल अल्ट्रासाउंड सुविधा आने के बाद से ही व्यापक स्तर पर शुरू हुआ तो क्या कल कोई सांसद इस आधार पर ही पूरे देश में अल्ट्रासाउंड जांच पर लिंग निर्धारण में दोषी होने के कारण प्रतिबन्ध लगवाने की मांग कर सकता है ?   
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गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

आयुष चिकित्सकों पर यूपी सरकार का निर्णय

                                          देश की सबसे बड़ी आबादी को अपने में समेटे यूपी में जिस तरह से सरकार के गंभीर प्रयासों के बाद भी स्वास्थ्य सेवाएं पटरी पर आने का नाम नहीं ले रही थीं उनको देखते हुए अखिलेश सरकार ने प्रदेश के ग्रामीण अंचलों से लगाकर शहरों तक में अपनी सेवाएं दे रहे आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सकों को सीमित अधिकार के साथ एलोपैथिक दवाइयों के इस्तेमाल की अनुमति के बाद वास्तव में प्रदेश के स्वास्थ्य परिदृश्य पर कितना असर पड़ेगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा पर इस मामले को लेकर एक बार फिर से आईएमए के विरोध स्वरुप कोर्ट तक जाने की संभावनाएं बन गयी हैं. ऐसा नहीं है कि यूपी में पहली बार ऐसा किया गया क्योंकि इससे पहले महाराष्ट्र सरकार ने इस तरह की छूट देकर अपने यहाँ स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता सुधारने की कोशिशें की थीं और उनका सकारात्मक परिणाम भी सामने आया है. यहाँ पर सवाल यह भी उठता है कि क्या इन आयुष चिकित्सकों को यह अधिकार दिया जाना चाहिए या नहीं और यूपी जैसे राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए आखिर किस तरह के मानकों का उपयोग किया जाये जिससे सरकार आम लोगों तक सरकारी या निजी क्षेत्र की चिकित्सा सुविधाएँ पहुँचाने में कुछ आगे बढ़ सके.
                          आज यूपी के अधिकांश सरकारी एलोपैथिक चिकित्सकों को किसी भी जुगाड़ या बहाने से बड़े शहरों के आस पास ही पोस्टिंग चाहिए होती है और उनमें से अधिकांश की अपनी ड्यूटी निभाने में कोई दिलचस्पी नहीं होती है इसलिए उनका अपने तैनाती स्थलों तक पहुंचना ही संभव नहीं होता है. वे किस भी तरह से काम चलाऊ तरीके से अपने शुरुवाती सेवा वर्षों को काटना चाहते हैं जिसके बाद उन्हें तहसील और जिला स्तरीय चिकित्सालयों में पोस्टिंग मिलने लगती है पर इस सारी जुगाड़बाजी के बीच आम जनता के लिए सरकार इन पर जो भी खर्च करती है उसका लाभ इन तक नहीं पहुँच पाता है. आईएमए से जुड़े हुए चिकित्सकों को इस मामले में थोड़ी उदारता बरतनी चाहिए क्योंकि सरकार के इस प्रयास से प्रदेश के उन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पटरी पर वापस लायी जा सकती हैं जहाँ पर अभी यह सब पूरी तरह से चरमराई हुई हैं इसके साथ ही आयुष चिकित्सकों को भी अपनी सीमाओं का ध्यान रखना ही होगा क्योंकि किसी स्तर पर की जाने वाली चूक कभी भी उनके खिलाफ कोर्ट में जाने का बड़ा आधार बन सकती है. आज भी प्रदेश सरकार अपने स्वास्थ्य केन्द्रों पर आयुष चिकित्सकों की बड़ी संख्या के दम पर ही स्वास्थ्य सेवाओं को संभाले हुए हैं और इस तरह के क़दमों से इनमें और भी सुधार आने की पूरी संभावनाएं भी हैं.
                           आईएमए का इस मामले में विरोध इसलिए भी पूरी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है क्योंकि आज भी प्रदेश में जनसँख्या के अनुपात में चिकित्सकों की भारी कमी है जिससे बचने के लिए किसी के पास कोई संसाधन भी नहीं है तथा प्रति वर्ष सरकार जितनी रिक्तियां निकालती हैं उनके लिए अभ्यर्थियों का हमेशा ही कमी रहा करती है इसके बाद भी आईएमए यदि पूरे मामले में कानूनी लड़ाई लड़ती है तो इसे उसका पूर्वाग्रह ही कहा जा सकता है. वैसे इस मामले में यदि अब वे कोर्ट जाना भी चाहें तो उन्हें लम्बी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी क्योंकि इस बारे में सुप्रीम कोर्ट एक निर्णय पहले ही दे चुका है जिसमें परिस्थितियों के अनुसार इस तरह का निर्णय लेने का अधिकार राज्य सरकारों पर छोड़ दिया गया है. आईएमए को इस बारे में अपनी सोच बदलनी चाहिए क्योंकि आज देश के आयुष चिकित्सकों को अपनी इस डिग्री के बूते अमेरिका तक में अन्य विशेषज्ञता वाले कोर्सेस में प्रवेश मिल जाता है पर देश की स्वास्थ्य सेवाएं सुधारने के लिए इस तरह की किसी भी योजना पर आईएमए कानून का सहारा लेने की कोशिश करने लगता है. देश के स्वास्थ्य परिदृश्य को बदलने के लिए अब केंद्र और राज्य स्तर पर आयुष चिकित्सकों को भी विभिन्न तरह के कोर्स करने की छूट मिलनी चाहिए क्योंकि चिकित्सा विज्ञान के मूलभूत विषयों की पढाई सभी तरह की पद्धतियों में दी जाती है.        
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शनिवार, 27 जुलाई 2013

अमेरिका, आयुर्वेद और विरोध

                             अपने आर्थिक हितों की हर स्तर पर रक्षा करने वाले अमेरिका के लिए अब आयुर्वेदिक दवाइयों के बढ़ते हुए उपयोग के ग्राफ से चिंता होने लगी है क्योंकि जिस तरह से विकसित देशों में तेज़ी के साथ इन निरापद औषधियों ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है उसके बाद एलोपैथिक दवा कम्पनियों के व्यापारिक हितों पर आने वाले समय में बड़ी चोट पड़ने की सम्भावना भी है क्योंकि जब से मानव का विकास हुआ है तब से ही उसके शरीर में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ है और किसी भी बड़े परिवर्तन में जिस तरह से लाखों वर्ष लगा करते हैं उसको देखते हुए अभी आने वाले हजारों वर्षों में भी कुछ बदलाव नहीं होने वाला है जिससे एलोपैथिक कम्पनियों के लिए भी व्यापार करने में अदि दिक्कतें सामने आ सकती हैं. एक समय था जब दुनिया के अधिकांश भागों पर अंग्रेजों का शासन हो चुका था तब उन्होंने अपनी पद्धति में विकास लाने के लिए उसे पूरी दुनिया में फैलाया और उसमें नए अनुसंधानों पर भी काफी जोर दिया. जिसके परिणाम स्वरुप पूरी दुनिया में एलोपैथी का तेज़ी से प्रसार हुआ था और आज भी आपातकालीन परिस्थितियों में इस पद्धति से लोगों को तेज़ी से आराम देने में सफलता मिला करती है.
                               आयुर्वेदिक औषधियों को यदि शास्त्रोक्त विधियों से बनाया जाए तो वे किसी भी परिस्थिति में मनुष्यों के शरीर पर किसी भी तरह का दुष्प्रभाव नहीं डाल सकती हैं फिर भी उस पर पश्चिमी देशों में लगातार यह दबाव बनाया जाता है कि उनके उपयोग से शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है और इन्हें बिना किसी अनुसन्धान के ही बना दिया गया है ? विश्व में आयुर्वेद ही एक मात्र ऐसे चिकित्सा पद्धति है जिसे पूरी तरह से अपने विकास के दौरान अनुसंधानों से पूरी तरह से गुज़ारना पड़ा था और उस समय के किये गए अनुसंधान इतने कारगर थे कि आज भी उन पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगा पाया है पर नालंदा और तक्षशिला जैसे शिक्षा केन्द्रों के नष्ट हो जाने से आज आयुर्वेद के पास उन अनुसंधानों को साबित करने के लिए कुछ भी नहीं बचा है ? आज जिस तरह से अपने व्यापारिक हितों को बचाए रखने के लिए एलोपैथिक कम्पनियां विश्व स्वास्थ्य संगठन तक में जुगाड़ कर दवाएं बेचने में विश्वास करने लगी हैं उससे बचने के स्थान पर केवल व्यापारिक हितों की बात ही की जा रही है जिससे आयुर्वेद के प्रचार प्रसार पर प्रभाव पड़ने के साथ ही उसके निरापद उपचार होने पर भी प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है.
                               आज भी जिस तरह से नवीन अनुसंधान वाली औषधियां कितनी मंहगी होती हैं और उन पर पेटेंट कानून भी लागू होते हैं तो उस दशा में यदि आयुर्वेद के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य को सुधारने और बचाए रखने में मदद मिलती है तो इसमें क्या बुराई है ? आज के समय में आयुर्वेद को बचाए रखने और आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी भारत में आयुष विभाग पर है पर उसे इसके लिए जितना बजट मिलना चाहिए वह कहीं से भी नहीं मिल पाता है और इस काम में जिस स्तर के विशेषज्ञों को लगाया जाना चाहिए उसका भी हमारी तरफ से सदैव ही अभाव रहा करता है ? अमेरिका को यदि आज हमारी चिकित्सा पद्धति पर ऊँगली उठाने का अवसर मिल रहा है तो इसमें कहीं न कहीं से हमारी ही कमी है हमें अपने यहाँ उत्पादित की जाने वाली किसी भी आयुर्वेदिक औषधि की गुणवत्ता और निरापद होने पर जिस तरह से नज़र रखनी चाहिए हमारा तंत्र उसमें पूरी तरह से विफल हो जाया करता है जिससे भी आयुर्वेद से जुड़े हुए नए लोगों में इस तरह का कोई भी दुष्प्रचार ही काम कर जाता है इससे बचने के लिए अब देश की आयुर्वेदिक दवा कम्पनियों को यदि पूरे विश्व में अपने व्यापार को फैलाना है तो उन्हें अब गुणवत्ता पर स्वतः ही ध्यान देना ही होगा.   
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सोमवार, 2 अगस्त 2010

भारत का ज्ञान और पटेंट

एक खबर के मुताबिक भारत की प्राचीन आयुर्वेद चिकित्सा से सम्बंधित केवल ३ मामलों में ही पटेंट मिल सका है जबकि पूरी दुनिया से लगभग ६००० पटेंट इस को लेकर हासिल किये जा चुके हैं. आज के युग में जब हर चीज़ का व्यावसायिकी करण किया जा रहा है तो भारतीय ज्ञान के प्रति हमारी उदासीनता कहीं हमें हमारे घरेलू नुस्खों से ही वंचित न कर दे ? यह पूरी दुनिया में सभी जानते हैं की आयुर्वेद का उद्भव और पोषण भारत में ही हुआ है फिर भी बहुत सारे लोग अपने हितों को साधने के लिए पता नहीं कितने योगों का पटेंट ले चुके हैं साथ ही यह भी सही है कि इन सभी ने इस बात को भी स्वीकार है कि कहीं न कहीं वे सभी भारतीय मूल से ही उपजे हुए हैं. हम यह मानते हैं कि चाहे जो हो हमारे ज्ञान को कौन लिए भागा जा रहा है पर यहाँ पर हम सभी यह भूल जाते हैं कि दुनिया उतनी सरल नहीं रह गयी है जितनी कभी हुआ करती थी.
           आज जब हर चीज़ को विश्व व्यापी बनने से कोई रोक नहीं सकता है तो फिर किस तरह से हमारे यहाँ के ज्ञान को चुराने से रोका जायेगा ? हमारी धरती पर आकर ही ब्रितानी प्रधानमंत्री कह गए कि वे कोहिनूर हीरा नहीं लौटा सकते हैं क्योंकि उसके बाद वहां देखने लायक रह ही क्या जायेगा ? नियमों की दुहाई देने वाले देश, नैतिकता की बातें करने वाले देश, लोकतंत्र के प्रहरी कहलाने वाले देश का जब यह हाल है तो आने वाले समय में और देश पता नहीं किस तरह से अपने बर्ताव को सही रख पायेंगें ? कल को कहीं ऐसा न हो कि हम केवल कोहनूर के इतिहास की तरह भारत की चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के प्रचार प्रसार को देख कर ही खुश होने की स्थिति में ही रह जाये और कुछ भी प्रयोग करने केलिए हमें कुछ शुल्क दूसरों को देना पड़े ?
        यह भी सही है कि काफी देर से ही सही पर भारतीय ज्ञान की पूरी डिजिटल जानकारी उपलब्ध करने की दिशा में किये जा रहे प्रयासों के बाद हजारों वर्षों से प्रयोग में लाये जा रहे हमारे ज्ञान को सुरक्षित रखने में काफी हद तक मदद मिल जाएगी. फिर भी भारत के ज्ञान को सुरक्षित रखने के लिए हर नागरिक को कुछ न कुछ प्रयास तो करने ही होंगें क्योंकि जिस तरह से सरकारें काम करती हैं उससे कुछ भी सुरक्षित बचने की सम्भावना कम ही हो जाती है. आज यह केवल चिंता करने का विषय नहीं है बल्कि इसके लिए आयुर्वेद से जुड़े सरकारी विभागों को सही दिशा में काम करने की ज़रुरत है. यदि इस मामले में सरकारें कुछ नहीं करती हैं तो उन पर दबाव डालने के लिए कुछ न कुछ आयुर्वेद से जुड़े लोगों को तो करना ही होगा.    

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