मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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सोमवार, 29 अप्रैल 2019

दिखावे की राजनीति

                                                        देश में जिस तरह से आम चुनावों या विधानसभाओं के चुनावों में विभिन्न दलों के प्रत्याशियों के पक्ष में सम्बंधित दलों के स्टार प्रचारकों की तरफ से रोड शो करने माहौल बनाये जाने का काम किया जाता है वह निश्चित रूप से उनका संवैधानिक अधिकार है पर पहले बड़े नेताओं की छुटपुट होने वाली बड़ी रैलियों के अलावा प्रत्याशी स्थानीय स्तर पर अपने प्रयासों से ही शांत वोटर्स को प्रभावित करने का काम किया करते थे. इधर कुछ चुनावों से रोड शो जैसा दिखावा सामने आने से इनकी चपेट में आने वाले क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन प्रभावित होने लगा है जिससे सभी राजनैतिक दलों के साथ चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन को भी इस बारे में विचार करने का समय आ गया है कि चुनाव के नाम पर आम नागरिकों को किसी भी तरह की अनावश्यक परेशानी का सामने न करना पड़े. इस बारे में केंद्रीय चुनाव आयोग को ही कुछ ठोस कदम उठाने के बारे में सोचना शुरू करना होगा क्योंकि अपने माहौल बनाने के भ्रम के चलते कोई भी राजनैतिक दल इसको रोकने की बात से सहमत नहीं होगा।
                            देश के उच्च सुरक्षा प्राप्त नेताओं के इस तरह से रोड शो करने से जहाँ सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ जाती है वहीं खुद इन बड़े नेताओं की सुरक्षा में गंभीर चूक हो जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है. इन नेताओं की चुनावी सभाओं में आम जनता का जो धन पानी की तरह बहाया जाता है वह संगठित रूप से किसी बड़े प्रोजेक्ट में डालकर उसकी गति बढ़ाने के काम भी आ सकता है पर देश के राजनैतिक दीवालियेपन के कारण इस दिशा में कोई सोचना भी नहीं चाहता है। यहाँ पर यह बात भी सामने आ सकती है कि देश के संविधान ने हर चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को अपने हिसाब से प्रचार करने की छूट दे रखी है पर साथ उसी संविधान ने देश के आम नागरिकों को भी अपनी स्वतंत्रता के साथ जीने की आज़ादी भी दे रखी है. नेताओं की इस तरह की दिखावे वाली राजनीति के चलते अब यह कौन तय करेगा कि यहाँ पर नेताओं और आम जनता के अधिकारों की रक्षा किस तरह से की जा सकती है?
                          इस बारे में सबसे सही यही रहेगा कि सभी दल मिलकर इस बारे में सोचें क्योंकि कई बार नेताओं के इस तरह से प्रचार करने के समय आम यातायात न चाहते हुए भी बाधित हो जाता है जिससे आवश्यक कार्य से आने जाने आम लोगों के साथ अति आवश्यक कार्यों में लगे हुए पुलिस, प्रशासन, फायर और एम्बुलेंस के लिए बहुत बड़ी समस्या खडी हो जाती है. क्या कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता है कि जिसमें नेताओं को समुचित रूप से अपने प्रचार को करने की छूट भी मिल जाये और आमलोगों को किसी भी परेशानी का सामना न करना पड़े ? क्या रोड शो को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए या फिर इसमें शामिल वाहनों और लोगों की संख्या को उसके मार्ग के अनुरूप सीमित रखने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे नेताओं को भी कानून के अनुरूप कार्य करने की आदत पड़ सके. इस बात को उन लोगों के बारे में सोचते हुए भी आगे बढ़ाना चाहिए जिन पर इस तरह के दिखावे का सबसे ज़्यादा असर पड़ता है क्योंकि जब तक पीड़ितों के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा जायेगा तब तक इसका कोई सही हल नहीं निकाला जा सकेगा।      

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बुधवार, 24 अप्रैल 2019

लोकतंत्र, चुनाव और शालीनता

                                                 ऐसा नहीं है कि २०१९ में देश में पहली बार कोई आम चुनाव हो रहे हैं पर वर्तमान में चल रहे चुनावों में जिस तरह से हर दल के शीर्ष नेता द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन किया जा रहा है वह भले ही उस सम्बंधित दल को कुछ वोट दिलवाने में मदद कर दे पर इससे हमारे उस लोकतंत्र की गंभीर खामी ही सामने आती है जिसमें चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था भी चाह कर कुछ ठोस नहीं कर पाती है. यह सही है कि आज चुनाव प्रचार को जिस स्तर पर ले जाया गया है उसमें पुरानी पीढ़ी के नेता अपने आपको सहज नहीं पाते हैं फिर भी उनके पास कोई अन्य रास्ता भी नहीं बचता है क्योंकि यदि उन्हें राजनीति में रहना है तो इस सबका सामना करना ही होगा. इस मामले में सभी दलों ने एक जैसा रवैया अपना रखा है इसलिए किसी एक दल की तरफ इंगित करने से काम नहीं चलने वाला है फिर भी क्या देश के राजनैतिक दलों को यह नहीं सोचना चाहिए कि चुनाव जीतने-हारने के बाद कमोबेश उन्हीं चुनिंदा बड़े नेताओं के साथ जब सदन में बैठना है तो विमर्श का स्तर इतना घटिया करने की आवश्यकता क्या है?
                                              आज की परिस्थिति में यदि देखा जाये तो हर नेता किसी भी तरह से दुसरे दल के नेता को नीचे दिखाना ही अपनी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण मानने लगा है जिससे लोकतंत्र और शिष्टाचार की वह सामान्य सीमा रेखा भी कई बार अनावश्यक रूप से लांघी जानी लगी है जिसको अभी तक सदन या चुनावों में लांघना उचित नहीं मना जाता था।  इस बात पर विचार करना भी आवश्यक है कि आखिर देश के नेताओं की यह स्थिति क्यों बन गयी है कि जो अपने चुनावी घोषणापत्रों में किये जाने वाले विकास के लम्बे चौड़े वायदों को भूलकर इतनी घटिया बातचीत पर उतर आते हैं जिसका कोई औचित्य नहीं दिखता है?  संभवतः आज नेताओं को यह लगने लगा है कि जनता से चाहे कुछ भी कह दो पर जब चुनाव हों तब जनता की बातों को गंभीर मुद्दों की तरफ मत जाने दो और हलकी छिछली राजनीति में को उलझाकर देश के समक्ष खड़े वास्तविक मुद्दों को दूर दफ़न कर दो जिससे भावनाओं में बहती हुई जनता अपनी प्राथमिकताओं को भूलकर उन्हीं घटिया बातों में उलझकर गंभीर सवाल करने की शक्ति खो दे?
                                               क्या यह सही समय है कि राजनेता अपने स्तर से एक बार फिर से चुनावी माहौल की गरिमा को वापस लौटाने का काम शुरू करें?  क्या हमारे विविधता भरे देश में अब इस बात की आवश्यकता नहीं है कि अन्य अखिल भारतीय सेवाओं की तरह चुनाव सुधार करते हुए एक चुनाव से सम्बंधित कैडर भी बनाया जाये जिसमें शुरुवात से ही चुनावी माहौल को समझने के लिए अधिकारियों को तैयार किया जाये और उनमें से ही वरिष्ठ लोगों को संवैधानिक बाध्यता के साथ शीर्ष स्तर पर काम करने का अवसर दिया जाये ? ऐसा करने से चुनाव आयोग की गरिमा तो बढ़ेगी ही साथ नेताओं को अपने प्रिय लोगों को चुनाव आयोग में बैठाने की परंपरा पर भी लगाम लगायी जा सकेगी।  निश्चित तौर पर चुनाव आयोग ने १९९१ में शेषन युग के बाद इस बार सबसे अधिक बेबसी दिखाई है क्योंकि शेषन के बाद लगभग हर चुनाव आयुक्त ने नियमों का कड़ाई से अनुपालन किया और जनता में आयोग की साख को मज़बूत किया पर वर्तमान में आयोग ने अपनी उस बनी हुई साख को गंवाना शुरू कर दिया है और कोई नहीं जानता है कि यह अभी और कितने नीचे तक जाने वाला है?  देश को मज़बूत नेता ही नहीं बल्कि मज़बूत संवैधानिक संस्थाओं की भी बहुत अधिक आवश्यकता है क्योंकि जब तक सभी सम्बंधित तंत्र मज़बूत नहीं होंगे तब तक लोकतंत्र को मज़बूत करना केवल एक सपना ही रहने वाला है.
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सोमवार, 31 दिसंबर 2018

लोकतंत्र से भीड़तंत्र तक

                              पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न कारणों से इकठ्ठा हुई भीड़ द्वारा जिस तरह से किसी को भी दोषी बताकर मौके पर ही क़ानून हाथ में लेते हुए फैसले लेने की बढ़ती हुई प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है वह निश्चित तौर पर किसी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं हो सकता है. पहले डायन के नाम पर फिर बच्चे चुराने वाले के नाम पर फिर धर्म के नाम पर फिर गाय के नाम पर और अब केवल मनमानी के नाम पर जिस तरह से देश के सामने नयी तरह की समस्या आ रही है उससे यदि समय रहते बचने और निपटने की राह नहीं निकाली गयी तो आने वाले समय में हम एक हिंसक समाज से अधिक कुछ भी नहीं बनने वाले हैं ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते किसी समस्या कोलेकर इकठ्ठा हुए कुछ सैकड़ा लोग किसी अन्य इंसान की हत्या करने से भी नहीं चूकते हैं जबकि उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी होता है कि मामला आगे बढ़ने पर उनके व उनके परिवार के लिए बड़े स्तर पर मुश्किलें खडी हो सकती हैं ?
                              निश्चित तौर पर पिछले कुछ वर्षों में बदले राजनैतिक विमर्श और विचारधारा विशेष से असहमत होने वाले किसी भी व्यक्ति से इस तरह से निपट लेने की जो प्रवृत्ति सामने आ रही है उसके पीछे उन विचारधाराओं का भी हाथ है जो इस तरह की सामूहिक अराजकता में भी अपने लिए राजनैतिक अवसरों को खोजकर उनका लाभ उठाने से नहीं चूकती हैं. क्या आज जिस तरह से कुछ लोगों द्वारा अपना जनाधार मज़बूत किये जाने के लिए किये जाने वाले इस तरह के कामों को करने में जुटे हुए हैं तो उनको सही कहा जा सकता है ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते हमारे राजनेता भी जनता से जुड़कर काम करने और उनकी समस्याओं में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करके उन्हें दूर करने के स्थान पर विद्वेष पैदा करके अपने हितों को साधने में लगे हुए हैं ? इस मामले में लगभग सभी दलों की स्थिति एक जैसी ही कही जा सकती हैं पर आज यह प्रवृत्ति जितने बड़े पैमाने पर शुरू हो रही है वह चिंता का विषय है क्योंकि इस अराजक भीड़ ने अब कानून के रखवालों पर भी हाथ साफ़ करना शुरू कर दिया है जिससे आने वाले समय में कोई भी सुरक्षित नहीं रहने वाला है.
                          भीड़ की हिंसा के लाभ उठाने के चक्कर में जिस तरह से राजनेताओं की तरफ से भी केवल आवश्यकतानुसार बयान दिए जाते हैं और उनमें से कई बयान तो इतने शर्मनाक होते हैं कि उनका ज़िक्र करना भी उचित नहीं है फिर सुधार की गुंजाईश कहाँ बचती है ? आज तक जो प्रश्न जनता के सामने थे वे पुलिस और प्रशासन के सामने आ चुके हैं और स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि किसी दिन किसी नेता के भीड़ में फँस जाने पर उनकी हत्या की आशंका से भी नकारा नहीं जा सकता है ? इतना सब देखने के बाद भी यदि सिर्फ तात्कालिक लाभों के लिए देश की युवा पीढ़ी के मन में नफरत की दीवारों को ऊंचा कर वैमनस्यता  की खाई को केवल गहरा करने में ही कुछ लोगों को अपना लाभ दिखाई दे रहा है तो अब आम भारतीय के जागने का समय आ चुका है क्योंकि यदि हमारे बच्चे इसी तरह से अराजक माहौल का हिस्सा बनते रहे तो किसी दिन वे या तो किसी भीड़ का शिकार हो सकते हैं या खुद भीड़ में शिकारी की भूमिका में भी दिखाई दे सकते हैं जिससे अंत में हमारे परिवार, समाज और राष्ट्र को ही नुकसान होने वाला है.           

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शुक्रवार, 14 दिसंबर 2018

यूपी और कांग्रेस

                                                      दिसंबर २०१८ के विधानसभा चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में वापसी हुई है वह निश्चित रूप से देश के लोकतंत्र और खुद कांग्रेस के लिए भी किसी हद तक सही कही जा सकती है. देश में मोदी का युग शुरू होने के बाद खुद पीएम मोदी और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ राज्य व तहसील स्तर के नेताओं की तरफ से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया जाने लगा था वह यथार्थ से बहुत परे था फिर भी भाजपा अपने वोटर्स को येह समझाने में कहीं न कहीं सफल होती लग रही थी कि अब देश को कांग्रेस मुक्त करने का समय आ गया है. यह हुंकार भरते समय पीएम मोदी और भाजपा ने जो सबसे बड़ी गलती की आज हिंदी बेल्ट में उसका नुकसान होने का वह भी बड़ा कारण है क्योंकि देश की जनता को राजनैतिक व्यवस्था से इतना अधिक अंतर् यहीं पड़ता जितना उसकी समस्याएं दूर न होने से पड़ता है. भाजपा कांग्रेस पर हमलावर होने के चक्कर में अधिकांश बार जनता की उस नब्ज़ को थामने में विफल सी लगी जिसके लिए उसे कांग्रेस पर प्राथमिकता दी गयी थी.
                    कांग्रेस के लिए अब यह कुछ बढ़त वाली स्थिति हो गयी है क्योंकि केंद्र का रास्ता यूपी से होकर ही जाता है. २००९ में कांग्रेस ने यूपी में जिस तरह से २० सांसदों के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार किया था तो इस बार उसके लिए यही चुनौती एक बार फिर से सामने आने वाली है. यूपी में सपा-बसपा की तरफ से अभी तक उसकी जिस तरह से अनदेखी की जा रही थी अब वह संभव नहीं होगी क्योंकि तीन राज्यों में सरकार बनाने के साथ ही कांग्रेस आने वाले समय में लोकसभा और राज्यसभा में अपनी वर्तमान स्थिति को सुधारने की स्थिति में पहुँच चुकी है. सपा बसपा के अपने मंसूबे हैं और यह भी संभव है कि वे आज भी अपने गठबंधन में कांग्रेस के लिए सम्म्मानजनक सीटें छोड़ने के लिए राज़ी न हों पर भाजपा से नाराज़ वोटर्स को कांग्रेस की तरफ होने का रुझान करने के लिए काफी है कि अब कांग्रेस पहले की तरह किसी भी समझौते पर नहीं पहुँचने वाली है. कांग्रेस को अपने दीर्घकालिक हितों के लिए अब यूपी में वही नीति अपनानी होगी जो सपा बसपा ने राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ में अपनायी थी. कांग्रेस को सपा के लिए कुछ सीटें छोड़ने की अपनी परंपरा को चालू रखते हुए अन्य सभी सीटों पर मज़बूत दावेदारी करनी ही होगी तभी वह राष्ट्रीय परिदृश्य में अपने प्रदर्शन में सुधार करने की स्थिति में आ सकेगी.
                         कम सीटों पर चुनाव लड़ने की स्थिति में जीतने का प्रतिशत कितना भी अच्छा होने अधिकतम सीटें और वोट प्रतिशत को सुधारना मुश्किल होगा जो पार्टी की दीर्घकालिक नीतियों के लिए सही नहीं होगा. आज प्रदेश में ऐसे वोटर्स की संख्या बहुत है जिन्होंने २०१४ में भाजपा का वोट दिया था पर यूपी में किसी गठबंधन के सामने आने पर वह वोट कांग्रेस को तो मिल जायेगा पर सपा बसपा में वह किसी भी परिस्थिति में जाने वाला नहीं है. इसलिए यूपी की ज़मीनी हकीकत को समझते हुए कांग्रेस के लिए यह आवश्यक होगा कि वह भाजपा से विभिन्न मुद्दों पर नाराज़ वोटर्स के लिए हर सीट पर खुद को एक मज़बूत विकल्प के रूप में रखे. सपा बसपा की संभावनाएं केवल यूपी में ही हैं और आने वाले समय में कांग्रेस यदि इनके पीछे खड़े होना चाहती है तो २०२४ तक काम चुनावों में उसके लिए सीटें बढ़ने की संभावनाएं स्वतः ही समाप्त हो जाएँगी। अब यह राहुल गाँधी और कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर ही निर्भर करेगा कि वे किस तरह से आगे बढ़ना चाहते हैं क्योंकि यूपी में अकेले लड़कर २०१९ में जीतने वाले सांसदों की संख्या भले ही कम हो पर इससे पार्टी को भविष्य के लिए प्रदेश में अपना संगठन फिर से खड़ा करने में बहुत मदद मिल सकती है।         
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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

२०१८ के सन्देश

                                  पांच राज्यों में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में जिस तरह से २०१४ से मूर्छा में चल रही कांग्रेस को मतदाताओं द्वारा संजीवनी दी गयी है उससे भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती का ही पता चलता है. जीवंत लोकतंत्र की यही विशेषता होती है कि वह समय आने पर अपने लिए उचित अनुचित का चयन करने में अपनी भूमिका का सही ढंग से निर्वहन करने में कभी नहीं चूकता है. निश्चित तौर पर इन राज्यों से भाजपा के लिए कोई अच्छी खबर पहले भी नहीं आ रही थी पर जिस तरह से भाजपा ने कांग्रेस और राहुलगांधी की सोशल मीडिया पर अपने सोशल मीडिया टीम के दुष्प्रचार से एक नकारात्मक छवि बना दी थी कहीं न कहीं उसके कार्यकर्ताओं के दिल में भी यह बात घर कर गई कि राहुल गाँधी किसी भी परिस्थिति में नरेंद्र मोदी का किसी भी स्तर पर मुक़ाबला नहीं कर सकते हैं जिससे कार्यकर्ताओं की मज़बूत टीम और संघ का ज़मीनी मज़बूत समर्थन होने के बाद भी भाजपा को इन राज्यों में जनता की तरफ से एक सबक दिया गया है जो कि लोकतंत्र का एक हिस्सा ही है. भाजपा की तरफ से आत्म मुग्धता की जो स्थिति २०१४ से चल रही थी उससे बाहर निकलने के लिए पार्टी शाह या मोदी की तरफ से कोई प्रयास भी नहीं किया गया जबकि मोदी-शाह के गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस ने किस तरह से भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं और रुझानों में एक बार वह भाजपा से आगे निकलती हुई भी दिखाई दे गयी थी ? उस समय जनता के मूड और धरातल की वास्तविकता को यदि भाजपा द्वारा पहचाना गया होता तो शायद कर्णाटक में वह सरकार बनाने के साथ इन राज्यों में भी सम्मानजनक तरीके से खुद को स्थापित रख पाती। निश्चित तौर पर भाजपा अपने प्रतिद्वंदियों से राजनैतिक रुप से निपटने के लिए एक बहुत निर्दयी दल है और यह हार मोदी और शाह को अपने घर को २०१९ के लिए दुरुस्त करने के लिए और भी प्रेरित ही करने वाले हैं जिससे कांग्रेस को सचेत रहने की आवश्यकता भी है.
                  कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से यह परिणाम संतोष देने वाले हैं क्योंकि पूरे देश में उसके कार्यकताओं का मनोबल २०१४ में इतना टूट गया था जिसे संजीवनी की आवश्यकता भी थी. इन राज्यों के चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के लिए एक स्पष्ट भूमिका का निर्धारण किया और उसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी परिस्थिति में उसके नेताओं की तरफ से विरोधियों पर व्यक्तिगत और स्तरहीन हमले न किये जाये जिससे पार्टी को अनावश्यक वोटर्स की नाराज़गी न झेलनी पड़े जैसा कि गुजरात चुनाव में हुआ था. राहुल गांधी कांग्रेस को किस स्तर तक ले जायेंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है पर कुछ मामलों में उन्होंने जिस तरह की शुरुवात की है वह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत कहा जा सकता है. आज कांग्रेस ज़मीन पर उतर कर आम लोगों की समस्याओं और उनको दूर करने के लिए काम करने की इच्छुक दिखाई देती है जो कि पहले की कांग्रेस से बिलकुल अलग है. लोकतंत्र के लिए यह इस लिए भी अच्छा है कि कम से कम एक बार फिर से धार्मिक उन्माद और उग्र राष्ट्रवाद के बीच भी आम लोग भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस को कुछ हद तक विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। आज हर विमर्श में काँग्रेस के प्रवक्ताओं की नयी पौध बेहतर तैयारी के साथ मैदान में आती है और अब वह अनावश्यक मुद्दों में उलझने के स्थान पर जनता से जुड़े मुद्दों पर ही बहस को केंद्रित रखने की कोशिशें करती भी दिखती है जिससे देश के आम मध्यवर्ग में उसका सन्देश आसानी से पहुँच भी जाता है कि उसकी तरफ से कम से कम कोशिशें तो की जा रही हैं. कांग्रेस के नए युवा प्रवक्ता शालीनता के साथ अपना काम करते हैं पर आवश्यकता पड़ने पर मुद्दों पर आधारित हमलों से भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्तों को भी तथ्य हीन कर देते हैं.
                       भाजपा अब जहाँ आक्रामक रूप से कांग्रेस पर हमलावर होने जा रही है वहीं कांग्रेस के लिए भी बड़ी चुनौती के लिए तैयार होने के लिए समय कम ही बचा है. तीन राज्यों में सीएम चुनने में जिस तरह से राहुल गाँधी की तरफ से सावधानियां बरती जा रही हैं वह उनके सबको साथ लेकर बड़ी लड़ाई लड़ने की तैयारी भी कही जा सकती है क्योंकि भाजपा को किसी भी तरह से कमज़ोर मानकर अब कांग्रेस भी चुप नहीं बैठ सकती है आज भी भाजपा के पास ज़मीन पर काम करने के लिए पर्याप्त कार्यकर्त्ता और संघ का समर्थन मौजूद है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इन राज्यों में सरकार बनने के  १० दिनों के अंदर पूरे किये जाने वाले वायदों पर भी नज़र रख उन्हें अमल में लाना होगा जिससे जनता में यह सन्देश जा सके कि राहुल की कांग्रेस अब अपने वायदों को अमली जामा भी पहनाती है. भाजपा में मोदी और कांग्रेस में राहुल निर्विवाद रूप से सर्वोच्च नेता है इसलिए अब इन दोनों पर ही अपने दलों के मनोबल को उंच रख जनता से जुड़े रहने का दबाव भी आ गया है और यदि इन तीन राज्यों में कांग्रेस अपने वायदों पर चलती दिखाई दी तो २०१९ में वह मोदी के लिए मज़बूत चुनौती के रूप में सामने आ सकती है. इसलिए अब मामला रोचक स्थिति में पहुँच गया है जिसमें जनता के सरोकारों पर और भी बहस और निर्णय लेने की स्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं.                         

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मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

अयोध्या का युद्ध

                                                अयोध्या के मंदिर मस्जिद विवाद में जिस तरह से समय के साथ स्थितियों में परिवर्तन आता चला गया है उसे देखते हुए अब यह कहा जा सकता है कि यह मुद्दा केवल चुनावी हथियार की तरह प्रयोग किया जाने वाला एक ऐसा उपाय रह गया है जिसे भाजपा हुंकार से लेकर संकल्प तक ले जा चुकी है. साथ ही आज इसकी स्थिति यह है कि देश की दो बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के इस मुद्दे पर रवैये में कोई अंतर् नहीं दिखाई दे रहा है ? कालातीत में हुई ज़बरदस्ती और धर्म परिवर्तन के लिए हुई हिंसा से कोई इंकार नहीं कर सकता है जिसके कारण देश की स्थिति में बहुत परिवर्तन भी दिखाई दिया था पर आज यह मुद्दा जिस तरह से उग्रता की तरफ लौटता दिखाई दे रहा है उससे आम हिन्दुओं में कट्टर छवि रखने वाले पर वास्तविकता में व्यापारिक हितों को प्राथमिकता देने वाले पीएम मोदी के लिए सबसे बड़ी समस्या खडी होने वाली है क्योकि अब उन के साथ पूरी भाजपा पर भी समाज और संतों का यह दबाव है कि राममंदिर के बारे में भाजपा की सरकारें अपनी घोषित प्रतिबद्धता को पूरा करें।
                              इस मुद्दे का जीवंत रहना कहीं न कहीं से संघ उसके संगठनों और राजनैतिक मंच भाजपा के लिए चुनावों में काफी सहजता ला देता है जिससे आम हिन्दू जनमानस को मंदिर की आस्था से जोड़कर उसको भाजपा के पक्ष में जोड़े रखने के लिए उचित सामग्री भी मिल जाती है. आज पीएम मोदी के सामने यह मुद्दा एक चुनौती के रूप में आ गया है पर हिन्दू संगठनों की उग्रता के खिलाफ उन्होंने जिस तरह से गुजरात में सब कुछ छोड़कर अपना और गुजरात का नया स्वरुप गढ़ा था आज संभवतः वे उसका अखिल भारतीय स्तर पर प्रदर्शन कर दें और मोदी शाह एक बड़ा खतरा उठाते हुए इस मुद्दे को पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट पर ही छोड़ दें क्योंकि उससे मोदी को अपनी उस छवि को बनाये रखने में सफलता मिलेगी जो उन्हें विकास परक नेता साबित करती है. जिस तरह से पूरे देश के साथ केंद्र में भी मोदी और उनकी सरकार के लिए कमतर आंकी जा रही कांग्रेस अपने अध्यक्ष राहुल गाँधी के साथ आँखों में आँखें डालकर बातें कर रही है और टीवी चॅनेल्स में भाजपा के प्रवक्ताओं के सामने विकल्प सीमित होते जा रहे हैं उससे भी जनता में मोदी सरकार की नकारात्मक छवि बनने का अंदेशा बढ़ता जा रहा है.
                               ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या मोदी तुरंत संतों की मांग पर ध्यान देते हुए संसद के आगामी और इस लोकसभा के अंतिम पूर्ण शीतकालीन सत्र में एक अध्यादेश के माध्यम से राममंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने की तरफ बढ़ेंगें या अपने विकास परक मन्त्र को आगे रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को फैसले लेने के लिए छोड़ देंगें ? निश्चित तौर पर अध्यादेश से वे जनता में यह सन्देश देने में सफल हो सकते हैं कि उनकी सरकार इससे अधिक कुछ भी नहीं कर सकती थी और आने वाले समय में यदि संसद में उनका पूर्ण बहुमत हुआ तो वे इसे कानून के रूप में लागू करवा सकते हैं। पर अध्यादेश से उपजने वाली परिस्थिति में विवश में देश में अस्थिरता का सन्देश भी देगा जिससे आने वाले समय में देश की आर्थिक प्रगति पर भी बुरा असर पड़ने की सम्भावना भी है. ऐसी स्थिति में मोदी स्वयं ही इस मामले को अदालत पर छोड़कर अपनी विकासपरक छवि को बनाये रखने के लिए और जतन कर सकते हैं जिससे उनकी उदार हिन्दुओं के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उदार छवि मज़बूत हो और वे अध्यादेश को अंतिम विकल्प के रूप में आज़माने की सोचकर बैठे हों.
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शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

अमृतसर हादसा

                                                            अमृतसर में दशहरा के अंतिम दिन रावण दहन के कार्यक्रम में जिस तरह से भीषण दुर्घटना हुई उसको देखकर प्रथम दृष्टया यही लगता है कि एक ज़िम्मेदार राष्ट्र के नागरिक के रूप में जीना सीखने में अभी हम सभी भारतीयों को बहुत समय लगने वाला है. यह सही है कि इस तरह के आयोजनों के समय अनुमान से अधिक भीड़ का जुटना पूरे देश में एक सामान्य सी लगने वाली घटना है पर हमारा प्रशासन जिस तरह से अनावश्यक कामों के दबाव में ही रहा करता है उसको देखते हुए इस तरह की घटनाओं को रोक पाना उसके लिए पूरी तरह से असंभव ही है. हम सभी जानते हैं कि इस तरह के आयोजनों के लिए किस तरह से पुलिस प्रशासन को आने वाले लोगों की अनुमानित संख्या की सूचना देनी होती है और उसके अनुरूप उनसे आवश्यक व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा की जाती है पर देश भर में सार्वजनिक कार्यक्रमों में जिस तरह से कुछ भी करने की स्वघोषित छूट नागरिक स्वतः ही हासिल कर लेते हैं उनके चलते भी इस तरह की दुर्घटनाएं होती रहती हैं और हम कुछ दिनों तक पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएं दिखा कर फिर से अपनी लापरवाहियों में जुट जाते हैं.
                                 इस बारे में हमेशा की तरह राजनीति शुरू हो चुकी है जबकि इसके लिए हम सभी की यह सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि जहाँ भी लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है या वे स्वतः ही किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रहे हैं तो उनके आने जाने के मार्ग के साथ ही कार्यक्रम स्थल पर आवश्यक सुरक्षा उपाय भी किये जा रहे हैं. हमारे देश में किसी भी कार्यक्रम में विभिन्न कारणों से आम लोगों का बड़ी सख्या में आना हमारी उत्सवधर्मिता की परम्परा को मज़बूत करता है पर आयोजक के रूप में ज़िम्मेदारी निभा रहे लोगों के साथ स्थानीय प्रशासन को भी इसमें पूरी तरह से शामिल होना चाहिए जो कि विभिन्न कारणों से कभी भी नहीं होता है. क्या इस तरह के किसी भी आयोजन के लिए आवश्यक अनुमति के साथ सुरक्षात्मक व्यवस्थाओं को करने के लिए आज कोई मज़बूत कानून या दिशा निर्देश मौजूद हैं? और यदि ऐसा है तो उनके अनुपालन के लिए किन लोगों की ज़िम्मेदारी निर्धारित की गयी है यह बात भी सभी लोगों के संज्ञान में होनी चाहिए। हर बात के लिए प्रशासन को कोसने के स्थान पर क्या हम नागरिकों को अपनी ज़िम्मेदारियों के निर्वहन के बारे में भी नहीं सोचना चाहिए ?
                               एक बड़ा हादसा क्या हमारी उन नैतिक ज़िम्मेदारियों की तरफ हमें मोड़ सकता है जिनकी हम हर जगह अनदेखी करते रहते हैं ? क्या नागरिकों के रूप में हमें यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि प्रशासन को हर स्तर पर सहयोग कर हम क्या अपने लिए सुरक्षित वातावरण बनाने की ईमानदार कोशिश नहीं कर सकते हैं? इस दुर्घटना में सभी दोषी हैं पर कोई भी अपनी ज़िम्मेदारी और कमियों को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं दिखाई दे रहा है जिससे आने वाले समय में इस तरह की घटनाओं को रोकने में कोई मदद नहीं मिलने वाली है. चौतरफा दबाव में सिर्फ आयोजकों के खिलाफ ही कार्यवाही होने की पूरी सम्भावना है जबकि लापरवाही के चलते आयोजक के साथ ही स्थानीय प्रशासन, रेलवे और वहां आने वाले लोग भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं. क्या हम सभी अपनी सामूहिक ज़िम्मेदारी को समझते हुए ऐसी कोई आदर्श स्थिति की कल्पना कर सकते हैं जिसमें ऐसी घटनाओं से पूरी तरह बचने की कोई व्यवस्था हो?  केंद्र और राज्य सरकारों को इस बारे में विचार कर भीड़ वाली जगहों पर आपातकालीन स्थित में लोगों को सही व्यवहार करने के लिए उचित दिशा निर्देश बनाते हुए आयोजकों के लिए आपदा प्रबंधन के प्रमुख गुर भी सिखाने की व्यवस्था करने के बारे में सोचना चाहिए जिससे भविष्य में सभी अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर पूरे देश में होने वाले ऐसे किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम को पूरी तरह से सुरक्षित बनाने में अपना योगदान दे सकें।

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गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

कांग्रेस के यूपी में विकल्प

                                            यूपी में समय समय पर सपा बसपा के साथ चुनाव पूर्व या चुनाव बाद के तालमेल ने जहाँ पूरे राज्य में कांग्रेस को कमज़ोर किया वहीं उसके नेताओं की आरामतलबी के चलते भी राज्य में उसका वोटबैंक लगातार सिमटता चला गया. इस पूरे प्रकरण में यह माना जा रहा था कि राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यूपी से जुड़े कई बड़े परिवर्तन देखने को मिलेंगें पर अभी तक जिस तरह से पार्टी अपने पुराने ढर्रे पर चल रही है उसको देखते हुए कहीं से भी यह नहीं लगता है कि राज्य में उसकी नीतियों में कोई बड़ा परिवर्तन हुआ है. हो सकता है कि अपने दीर्घकालिक हितों को बचाने के लिए राहुल गाँधी भी यूपी की वर्तमान परिस्थिति में सपा बसपा के छोटे सहयोगी बनने को तैयार हो गए हों पर आने वाले समय में इसका सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद कम ही है. यदि कांग्रेस को भविष्य में अपने लिए केंद्र में मज़बूत भूमिका के साथ यूपी में जड़ें मज़बूत करनी हैं तो उसे अपने उस कोर वोट बैंक पर ध्यान देना होगा जो इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी उसके साथ मज़बूती से खड़ा है.
                                         यह सही है कि समय के साथ अपने को न ढाल पाने के कारण कांग्रेस ने अपनी चुनावी ज़मीन पूरे देश में क्षेत्रीय दलों के हाथों गंवाई है और आज भी उसे संभालने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किये जा रहे हैं जिसका सीधा असर उसकी चुनावी संभावनाओं पर पड़ना तय है. यूपी की राजनीति में अब कांग्रेस को अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि खुद के प्रयासों के बिना दुसरे दलों के साथ तालमेल करने से जहाँ पार्टी के अवसरवादी नेता दुसरे दलों में चले जाते हैं वहीं उसके लिए बरसों से बनी हुई ज़मीन खोने का दुष्प्रभाव भी वोट और सीटों में कमी के रूप में सामने आता है. सपा में नेतृत्व अखिलेश के हाथों में आने के बाद वहां से गंभीर बातों पर विचार शुरू हो चुका है पर मायावती के पास दलित वोटबैंक की जो पूँजी है उसके चलते वे कभी भी कहीं भी किसी को भी ठेंगा दिखाने से नहीं चूकती हैं. इस पूरे प्रकरण में अब कांग्रेस को सबसे पहले उन २२ लोकसभा क्षेत्रों में अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहाँ पर २००९ में उसके सांसद थे क्योंकि निश्चित तौर पर आज उसके पास इन क्षेत्रों में कुछ कार्यकर्ता अवश्य होंगें जिनके दम पर वहां वह मुख्य लड़ाई में आने की कोशिशें आसानी से कर सकती है. साथ ही राहुल गाँधी को भी कम से कम एक बार इन क्षेत्रों में प्रचार करना चाहिए जिससे वहां के पूर्व सांसद अपनी स्थिति को २०१९ के लिए मज़बूत कर सकें।
                                      निश्चित तौर पर संयुक्त विपक्ष को यह एहसास हो गया है कि मोदी का जादू निश्चित  कम हुआ है तभी अधिकांश दल अपनी क्षमता से कम सीटों पर भी चुनाव लड़ने के लिए हामी भरते नज़र आ रहे हैं क्योंकि यदि वे किसी भी तरह से एक बार भाजपा को १६०/७० तक सीमित करने में सफल हुए तो भाजपा खुद ही मोदी से उसी तरह पीछा छुड़ाती नज़र आने वाली है जैसे उसने अडवाणी से छुड़ाया है. इस खतरे को अमित शाह भी भांप रहे हैं क्योंकि मोदी के बिना राष्ट्रीय राजनीति में उनकी स्थिति भी समाप्त हो जाने वाली है. ऐसी स्थिति में कांग्रेस को २०१९ को अधिक महत्व न देते हुए भाजपा को कड़ी चुनौती देने के लिए सबसे पहले अपने घर को मज़बूत करना चाहिए क्योंकि कई बार उसके राष्ट्रीय स्वाभाविक विकल्प वाली स्थिति आने पर उसकी उपस्थिति  हर राज्य में दिखाई देनी चाहिए जिससे भाजपा से रूठा मतदाता अपने वोटों को क्षेत्रीय दलों को देने के स्थान पर लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में डालने के बारे में सोच सकता है. किसी भी क्षेत्रीय दल की राष्ट्रीय संभावनाओं पर कांग्रेस को कभी भी अपने को कमज़ोर नहीं करना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में मज़बूत विपक्ष ही राष्ट्र के लिए उचित होता है पर जब विपक्ष क्षेत्रीय दलों में बंटा हो तो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सत्ता पक्ष आसानी से मुद्दों को भटकाने में सफल हो जाता है जिससे उसकी कमज़ोरियों पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता है।

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 8 जुलाई 2018

व्हाट्सऐप - समाज के लिए खतरा

                                                                        देश में तेज़ी से बढ़ती इंटरनेट की रफ़्तार और उसके साथ आने वाली सुविधाओं के साथ जिस तरह से एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है उसके बारे में देश का कानून, सरकार, सोशल मीडिया कंपनियां और समाज तैयार किसी भी स्तर पर तैयार नहीं दिखता है जिसके चलते विशेष उद्देश्यों से फैलाये गए सुनियोजित उन्माद या अफवाह से आज देश के विभिन्न हिस्सों से भीड़ द्वारा निर्दोषों की हत्या किये जाने की घटनाओं में निरंतर वृद्धि होती जा रही है. आंकड़ों के अनुसार जिस तरह से अब भारत में २० करोड लोगों के हाथों में स्मार्ट फ़ोन हैं और जिस तेज़ी के साथ इंटरनेट की कीमतें गिरी हैं उसके चलते अब समाज के हर वर्ग तक इसकी पहुँच हो चुकी है जो कि चाहे अनचाहे इस तरह की समस्याओं को जन्म देने का काम कर रही है. आज जिस तरह से भारत सरकार ने व्हाट्सऐप से इस तरह की झूठी और भ्रामक ख़बरों को रोकने के लिए कम्पनी से कड़े कदम उठाने के लिए कहा है और कपनी ने भी इस मसले पर कुछ करने की बात कही है केवल उतने से निर्दोषों की हत्याएं नहीं रुक सकती हैं क्योंकि इसमें देश के राजनैतिक दल और प्रिंट मीडिया के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भी बहुत बड़ा हाथ है और जब तक ये सब मिलकर प्रयास नहीं करेंगें यह स्थिति बदलने वाली नहीं है.
                                                             इस पूरी समस्या के तह में जाने के लिए हमें २०१३ की तरफ लौटना होगा जब नरेंद्र मोदी ने भाजपा के मुख्य चुनाव प्रचार में सोशल मीडिया का भरपूर दोहन किया था और आज यह स्पष्ट हो चूका है कि केवल वोट मांगने और समाज में राजनैतिक लाभ के लिए उनकी तरफ से जो सुनियोजित अभियान चलाया गया था उसने मनमोहन सरकार की छवि को बहुत धूमिल किया जिसका असर चुनाव परिणामों पर भी दिखाई दिया था. आज यह सामने आ चुका है कि उस समय भाजपा की सोशल मीडिया टीम समेत खुद मोदी ने जिस तरह झूठ का सहारा लेकर प्रचार किया था तो क्या आज के समय में बढ़ रहे दुरूपयोग के लिए उनको दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए ? आज भी लगातार जिस तरह से भाजपा के कट्टर समर्थक विपक्षी दलों पर हमलावर हैं उसको देखते हुए आखिर इस सबकी ज़िम्मेदारी किस पर डाली जा सकती है ? क्या हमारा देश ऐसा था जिसमें किसी विपक्षी दल की प्रवक्ता को सीधे उसकी बेटी से रेप करने की धमकी दी जा सकती थी?  मानसिक रूप से विक्षिप्त कोई व्यक्ति ऐसा करे तो उसका कोई अंतर पड़ता पर जब सत्ताधारी दल के शीर्ष नेता उस व्यक्ति को फॉलो कर रहे हों तो यह अवश्य ही चिंता का विषय होना चाहिए। क्या खुद पीएम और शीर्ष भाजपा नेताओं को इस मुद्दे पर सोचकर सबसे पहले अपने यहाँ सुधार का प्रारम्भ नहीं करना चाहिए ?
                                   सरकार को स्पष्ट रूप से कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है क्योंकि कोई भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपभोक्ताओं की निजता का हवाला देकर अपनी उस सामाजिक ज़िम्मेदरी से पल्ला नहीं झाड़ सकता है जिसके दम पर उसका व्यापार चल रहा है? निःसंदेह उपभोक्ताओं की निजता सम्मान होना चाहिए पर जब यह निजता समाज और मानवता के लिए खतरा बनने की तरफ अग्रसर हो तब निजता का खोखला आवरण उधेड़ देना चाहिए। यदि इन सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा निजता का रोना रोया जाता है तो उनको अपने काम काज को समेट्ने के लिए कह देने का समय आ चुका है क्योंकि पहले भी निजता के लेकर बहुत तरह की समस्याएं सामने आयी थीं जिसके चलते बीच का राह निकाला गया था पर आज संभवतः सरकार अपनी चिंताओं को केवल चिंता के स्तर तक ही रखना चाहती क्योंकि आगामी आम चुनावों में भाजपा को इस मीडिया का एक बार फिर से दोहन करना है जिसके चलते वह कोई कडा कदम उठाने के बारे में सोच भी नहीं सकती है. आखिर किसी शहर में कानून व्यवस्था की समस्या सामने आने पर आज वहां का प्रशासन इस बात का निर्णय लेता हैं कि इनटरनेट को बंद क्र दिया जाये तो क्या इससे समस्या का समाधान हो जाता है? आज आवश्यकता है कि किसी भी स्थान पर भीड़ द्वारा किये गए इस तरह के कृत्य में हत्या होने के बाद उस स्थान विशेष पर कम से कम एक हफ्ते के लिए इंटरनेट को दंड स्वरुप बंद किया जाए. किसी भी राजनैतिक दल के लोगों के शामिल होने पर उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही के साथ आगामी दो चुनाव लड़ने पर भी रोक लगायी जानी चाहिए जिससे सभी सम्बंधित पक्षों के साथ बराबर की सख्ती का सन्देश समाज में जा सके.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

वैचारिक अभिव्यक्ति और विभेद

                                                  अभी तक के स्थापित मानकों के अनुसार जिस तरह से यह समझा और कहा जाता कि शिक्षा बढ़ने के साथ मनुष्य का सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत विकास अच्छी तरह से हो सकता है पर पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से अशिक्षितों के साथ शिक्षितों की मानसिक स्थिति भी एक जैसी ही होती जा रही है वह सम्पूर्ण मानव जाति के लिए आने वाले समय में एक खतरा बन सकती है. विश्व के कई देशों में इस्लाम के नाम पर चल रहे चरमपंथ को जिस तरह से उच्च शिक्षित लोगों का समर्थन मिलने लगा उससे पुरानी धारणा टूटने की तरफ बढ़ गयी की शिक्षा से मनुष्य अधिक सामाजिक हो जाता है. सौभाग्य से भारत में इस तरह की घटनाएं बहुत कम या नहीं ही दिखाई देती थीं पर अब इसमें भी तेज़ी से बदलाव दिखाई दे रहा है जिसका पूरा और विपरीत असर समाज पर आने वाले समय में गंभीर रूप से पड़ने के अब इंकार नहीं किया जा सकता है. बंगलुरु में एक महिला ने अपनी कैब सिर्फ इसलिए कैंसल कर दी क्योंकि उस पर आज ट्रेंड में चल रहे गुस्से भरे हनुमान जी का चित्र अंकित था जिसे उन्होंने कठुआ और उन्नाव में हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा आरोपितों के पक्ष में खड़े होने के चलते खुद अपनी सुरक्षा से जोड़ते हुए ही उसे एक खतरा मान लिए था. इसके बाद एक व्यक्ति ने लखनऊ से अपनी कैब राइड सिर्फ इसलिए कैंसल कर दी क्योंकि उसका चालक मुसलमान था ?
                                            देखने में ये घटनाएं सामान्य से लगती हैं पर क्या ये समाज में हर स्तर पर पनप रहे अनदेखे विभाजन की तरफ संकेत नहीं करती हैं ? क्या इंटरनेट और सोशल मीडिया को चलाने वाले किसी भी उच्च शिक्षित नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस निम्न स्तर पर जाकर समाज के निर्धारित ताने बाने को झकझोरने का काम करे जिससे अंत में उसको भी कहीं न कहीं नुकसान ही होने वाला है ? क्या शिक्षा का स्तर और संस्कारों की पकड़ को इस तरह के मामलों में महसूस किया जा सकता है ? किसी भी महिला या पुरुष को किसी विशेष परिस्थिति में अपने लिए कोई स्थिति प्रतिकूल लग सकती है पर क्या उस प्रतिकूल परिस्थिति को इस तरह से देश के निम्न होते राजनैतिक विमर्श से गंभीरता से जोड़ने को उचित कहा जा सकता है ? क्या बाहरी दिखावे से कोई शत प्रतिशत किसी के व्यक्तित्व के बारे में एक बार में ही सब कुछ जान समझ सकता है और क्या उसका यह आंकलन यह सही भी हो सकता है ? एक महिला को यदि किसी चिन्ह विशेष के कारण असुरक्षा दिखाई दी तो क्या उसे इस तरह से दिखाना उचित था या एक पुरुष को उस महिला के ट्वीट का जवाब देने के लिए एक मुस्लिम चालक की कैब राइड का इंतज़ार कर उसे कैंसिल कर ट्वीट करना उचित था ? बेशक दोनों की अपनी सुरक्षा सम्बन्धी चिंताएं हो सकती हैं पर उन्हें इस तरह से परिभाषित किये जाने को आखिर क्या कहा जाये ?
                                            क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल महिला और पुरुष अपने आस पास देखकर यह बता सकते हैं कि धर्म और प्रतीक चिन्हों के नाम पर अपने को समाज से अलग कर कथित रूप से सुरक्षित करके क्या वे भारतीय समाज में जीवित रह सकते हैं ? क्या देश के विभिन्न धार्मिक अनुयायियों के बिना उनके लिए सामान्य जीवन यापन कर पाना संभव हो सकेगा या वे अपनी इस मानसिकता के साथ पूरे समाज में एक विभाजन की खरोंच लगाने का काम करते रहेंगें जो भविष्य में गहरी खाई भी बन सकती है ? आप चिन्ह विशेष लगाए होने के कारण किसी की सेवाएं नहीं ले सकते हो पर जो चिन्ह लगाकर लगातार धोखा देने का काम कर रहे हैं उनसे खुद को सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय करने वाले हैं ?  जिनको लगता है कि चालक मुस्लिम है इसलिए वे सुरक्षित नहीं हैं तो हो सकता है कि उस कार को उनके जैसी मानसिकता वाले किसी मुस्लिम मिस्त्री ने भी यह सोचकर ठीक किया हो कि इसमें कोई हिन्दू यात्री बैठेगा इसलिए इसके ब्रेक ख़राब कर देता हूँ तो सोचिये हमारे समाज का क्या हाल होगा ? अच्छा हो कि आम नागरिक नेताओं की विभाजनकारी नीतियों के बारे में गंभीरता से सोचें और अपने लिए वही रास्ता अपनाएं जो समाज में समरसता की तरफ ले जाने का काम करता हो क्योंकि सामाजिक वैमनस्यता का खमियाज़ा आमतौर पर नेताओं को नहीं बल्कि आम जनता को ही भुगतना पड़ता है।  
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रविवार, 4 फ़रवरी 2018

अधिकारियों का सरकार प्रेम

ऐसा नहीं है कि देश में पहले कभी अधिकारियों द्वारा सरकार या पार्टी की नीतियों और मंशा के अनुरूप काम न किया जाता हो पर जिस तरह से अयोध्या विवाद में यूपी के डीजी होमगार्ड्स ने भाजपा से जुड़े मुसलमानों के एक मंच पर उनके साथ भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए शपथ खायी उससे यही लगता है कि अब अधिकारियों में कार्यवाही का डर ही नहीं रह गया है. यह सही है कि हर व्यक्ति की निजी ज़िंदगी भी होती है और देश का संविधान उसे अपने धर्म, परंपरा और मूल्यों के अनुरूप जीवन जीने की पूरी स्वतंत्रता भी देता है पर जब कोई शासन या प्रशासन में जाता है उसे भारत के संविधान के प्रति शपथ लेनी होती है. फिर भी जिस तरह से पहले बरेली के डीएम ने कानून व्यवस्था में रोज़ ही सामने आने वाली नयी समस्या को लेकर प्रश्न उठाया वह भी सर्विस रूल के अनुसार गलत ही कहा जायेगा पर उनकी मंशा उन लोगों की तरफ इशारा करने की थी जो किसी भी परिस्थिति में अपनी ज़िद के कारण यूपी में लगातार प्रशासन के लिए सर दर्द बनते जा रहे हैं. डीजी होमगार्ड्स ने जिस तरह से एक कार्यक्रम में शपथ ली उससे स्थिति की गंभीरता को आसानी से समझा जा सकता है अयोध्या मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और किसी भी विचाराधीन मामले पर टिप्पणियां करने या उनके पक्ष विपक्ष के किसी कार्यक्रम को आयोजित करने से कोर्ट की अवमानना होती है. वैसे तो देश के सभी राजनैतिक दल अपने चुनावी लाभ को देखकर विभिन्न मुद्दों पर कोर्ट के आदेशों कि धज्जियाँ उड़ाते रहते हैं पर एक वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी जिस पर कानून व्यवस्था को बनाये रखने की ज़िम्मेदारी हो ऐसे विचाराधीन मामले में किस तरह से ऐसा कर सकता है ? बरेली के डीएम के मामले में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने उनके पार्टी प्रवक्ता जैसी बात करने और अनुशासन में रहने की बात की थी पर डीजी के मामले में अभी तक चुप्पी संदेहों को जन्म देती है.   
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शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

२ जी घोटाला वास्तविक या काल्पनिक ?

                                   लम्बे समय के बाद जिस तरह से २०१० की कैग रिपोर्ट में सामने आये २ जी घोटाले को लेकर सभी आरोपियों को विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में छोड़ दिया है वह देश की राजनीति, जाँच एजेंसियों अभियोजन और न्यायालय की सीमाओं पर गभीर सवाल पैदा करता है क्योंकि जिस घोटाले को देश का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक घोटाला माना गया या जनता के सामने उसे इस तरह से प्रस्तुत किया गया जैसा उसके माध्यम से मनमोहन सिंह की सरकार ने देश को बड़े राजस्व की चोट दी है आज वह कहीं से भी कानूनी दलीलों के सामने टिक नहीं पाया ? आज देश की जनता यह सोच रही है कि जिस घोटाले को लेकर इतना बड़ा राजनैतिक तूफ़ान खड़ा किया गया था उसकी परिणिति इतनी हास्यास्पद होगी ? यह सही है कि नीतिगत समस्याओं के चलते या उन नीतियों के पीछे छिपकर अपने या सहयोगियों के लिए किसी तरह का लाभ उठाये जाने की कोशिशों का संदेह आज भी इस पूरे मामले से छंटता हुआ नहीं दिख रहा है फिर भी कहीं न कहीं से यह अवश्य दिख रहा है कि यह मामला आर्थिक घोटाले से अधिक राजनैतिक लाभ लेने का अधिक है.
                                   जिस मामले को खुद पीएम के भाजपा उम्मीदवार होने के बाद से लगातार अपनी २०१४ की चुनावी सभाओं में उठाया जाता रहा था और पीएम मोदी के सत्ता सँभालने के साढ़े तीन साल बाद यदि उसकी यह स्थिति है कि देश की सर्वोच्च अभियोजक सीबीआई को किसी भी तरह के ऐसे सबूत नहीं मिले जिनके आधार पर न्यायालय उन्हें दोषी मानता तो इस मामले का स्तर आसानी से समझा जा सकता है. निश्चित तौर पर इतने सालों से चल रहे मामले में निश्चित तौर पर मोदी सरकार ने सब कुछ किया होगा पर आज जब सभी आरोपी सबूतों के आधार पर बरी कर दिए गए हैं तो इस मामले की वास्तविकता पर संदेह होने लगता है. जिस तरह के आंकड़े एकदम से बताये गए थे आज वे कहीं से भी किसी वित्तीय अनियमितता के चलते किये गए हों ऐसा साबित नहीं  हो पाना आखिर देश के लिए किस तरह से सही कहा जा सकता है ? नीतिगत मामलों के चलते जिन कंपनियों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था और केवल उस समय स्पेक्ट्रम आवंटित होने के चलते लगभग सभी कंपनियों को भ्रष्टाचारी मान लिया गया था और सुप्रीम कोर्ट ने १२२ लइसेंस निरस्त भी कर दिए थे तो आज उन कंपनियों के लिए क्या सरकार माफ़ी मांगने को तैयार है ?
                               इस पूरे प्रकरण से यह बात तो स्पष्ट ही है कि कैग की एक रिपोर्ट में नीतिगत परिवर्तन न किया जाने के चलते एक अनुमान भर लगाया गया था जिसको भ्रष्टाचार का प्रतीक मान लिया गया और जिसके चलते ही कांग्रेस सत्ता से भ्रष्टाचारी के रूप में जनता के द्वारा सीमित संख्या में बाहर कर दी गयी पर सभी को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस नीति के चलते देश में दूरसंचार क्रांति भी आयी थी जिसने हर भारतीय के हाथों तक संचार के आधुनिक स्वरुप को पहुँचाने का काम भी किया था. राजनीति अपनी जगह है पर केवल सत्ता पाने या दूसरे दल को नीचा दिखाने के लिए इस तरह के हथकंडों का दुरूपयोग करके अंत में देश की छवि को ही नुकसान पहुँचाया जाता रहा है. राजनैतिक दल और उनकी सत्ता अस्थायी होती है पर देश स्थायी है और जिस परिकल्पना के साथ देश में संसद की स्थापना की गयी थी अब केवल सत्ताधारी दल के निर्णयों और मंशा के स्थान पर संसद में सर्वानुमति की राजनीति पर ध्यान देने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब सभी की सहमति से नीतियों का निर्धारण किया जायेगा तो देश आगे बढ़ पायेगा. निश्चित तौर पर सीबीआई और सरकार के पास अगली अदालत में जाने के विकल्प खुले हुए हैं पर जो सीबीआई पहले ही सबूत जुटाने में सफल नहीं हो पायी अब उसके जुटाए गए सबूत किस आधार पर न्यायालय में टिक पायेंगें यह सोचने का विषय है पर कांग्रेस को भ्रष्टाचारी साबित करने के लिए मोदी के लिए इस मामले को आगे बढ़ाना ही होगा अन्यथा गुजरात में सुधरे प्रदर्शन के चलते कांग्रेस मोदी पर पूरी क्षमता के साथ भजपाऔर मोदी पर पलटवार करने के लिए तैयार दिख रही है.   
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शनिवार, 25 नवंबर 2017

इंटरनेट बैन समस्या या समाधान ?

                                          निश्चित तौर पर इंटरनेट आज के समय में आम लोगों के बीच संवाद का बड़ा मंच बन चुका है जिसके चलते इसका दुरूपयोग रोकने के लिए सरकार की तरफ से कानून व्यवस्था से निपटने के लिए विभिन्न जगहों पर इस पर अस्थायी रोक लगाए जाने की परंपरा सी शुरू कर दी है जिससे आम लोगों को बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है. हरियाणा में एक जाट संस्था और सत्ताधारी दल के एक सांसद की जनसभा से आखिर वहां की कानून व्यवस्था किस तरह बिगड़ सकती है यह समझ से परे है पर इन सभाओं को लेकर राज्य के १३ जिलों में इंटरनेट सेवाओं पर २६ नवम्बर की मध्यरात्रि से तीन दिनों के लिए रोक लगा दी जाएगी. यहाँ पर यह समझना आवश्यक है कि आखिर सरकारों को इस तरह के कदम उठाने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ती है और संविधान से मिले लोकतान्त्रिक तरीके से जनसभा के अधिकार के साथ कोई भी सरकार ऐसे कैसे कर सकती है ? क्या आज इंटरनेट इतना प्रभावी है कि उसके चलते सरकारों के ख़ुफ़िया तंत्र खोखले और कमज़ोर साबित हो जाते हैं या आमलोगों में ही अपने अधिकारों के दुरूपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है जिसके चलते सरकारें भी सोशल मीडिया की इस शक्ति से निपटने के लिए इस पर रोक लगाने को ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प मानने लगी हैं ?
                                           यह ऐसा मुद्दा है जिसके बारे में कोई भी स्पष्ट रूप से यह नहीं खोज सकता है कि आखिर गलती किसकी है और किस तरह से इससे निपटा जाना चाहिए क्योंकि आज के युग में जब देश को डिजिटल बनाये जाने की कोशिशें की जा रही हैं तो समय समय पर इस डिजिटल युग में यह ब्लैक आउट किस तरह से सही ठहराया जा सकता है ? निश्चित तौर पर आज आमलोगों के बहुत से काम इंटरनेट के माध्यम से ही होते हैं बैंकिंग सेवाओं से लगाकर अधिकांश प्रशासनिक कार्यों को भो जिस तरह से नेट के माध्यम से किये जाने की सुविधाएँ देने के साथ सरकार इनको बढ़ावा देने में लगी है तो इस तरह की रोक आखिर इस अभियान को कहाँ तक सफल होने देगी ? जिन लोगों के आवश्यक बैंक या अन्य कार्य इंटरनेट के माध्यम से किये जाने होंगे वे भी इस अवधि में नहीं हो सकते जिससे इन ज़िलों की बहुत बड़ी आबादी को व्यापक रूप से समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. इस बारे में सरकार को भी अन्य विकल्पों पर सोचना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर ऐसे कदम उठाने के स्थान पर केवल सोशल मीडिया पर ही प्रतिबन्ध लगाए जाने की व्यवस्था पर काम करना चाहिए क्योंकि सरकार की समस्या पूरा इंटरनेट नहीं बल्कि सोशल मीडिया अधिक होता है और इससे निपटने के लिए सही दिशा में सही तरह से काम किये जाने की आवश्यकता भी है.  
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रविवार, 12 नवंबर 2017

छवि बचाने के संकट में मोदी

                                                           २०१४ में अपने मज़बूत प्रचार और सटीक नीति के चलते गुजरात के सीम नरेंद्र मोदी ने जिस बड़े परिदृश्य का उपयोग करके देश की जनता के सामने कुछ ऐसा दिखाने में सफलता पायी थी जिसके चलते उन पर विश्वास करके देश ने उन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए स्पष्ट जनादेश दिया था. गुजरात में गुजराती अस्मिता और विकास की बातें करके जिस तरह से उन्होंने कई क्षेत्रों में बड़े बदलाव करने में सफलता पायी थी संभवतः वही उनकी राजनैतिक शक्ति भी थी पर पूर्ण बहुमत की भारत सरकार को भी बिना किसी जवाबदेही के गुजरात सरकार की तरह चलाने की मूलभूत गलती प्रारम्भ से ही मोदी और उनकी सरकार द्वारा की जाती रही है और कहा तो यहाँ तक जाता है कि यह केवल दो लोगों की सरकार है और उससे आगे वहां किसी की भी कोई सुनवाई नहीं होती है. अपने से लम्बे राजनैतिक और प्रशासनिक अनुभव रखने वाले नेताओं को मोदी की टीम द्वारा जिस तरह से किनारे किया गया था आज संभवतः उसके चलते भी कुछ मामलों में सरकार के पास ऐसे नेताओं की कमी दिखाई देती है जो सड़क से संसद तक सामने आने वाले मुद्दों पर गंभीरता से विपक्ष और जनता के साथ विश्वसीय संवाद बनाये रखने की हैसियत रखते हों.
                              ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने की अभी तक मोदी और उनकी टीम को कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी थी क्योंकि सत्ता में आने के साढ़े तीन वर्षों से वे, उनके मंत्री और भाजपा की तरफ से केवल कांग्रेस पर हमले ही किये जाते रहे हैं और भ्रष्टाचार के अधिकांश मामलों केंद्र और सम्बंधित राज्यों में भाजपा की सरकार होने के बाद भी कोई विशेष प्रगति दिखाई नहीं देती है जिससे कहीं न कहीं जनता के उस वर्ग में संदेह उत्पन्न होने लगता है जो किसी भी दल से जुड़ा हुआ नहीं है पर २०१४ में उसने मोदी के नाम पर भाजपा को वोट दिया था. यह एक विचारशील वर्ग का वोट है जो किसी भी समय किसी एक दल के साथ नहीं रहता है और समय आने पर अपने विवेक के अनुरूप काम करता है. आज भाजपा की मोदी सरकार और संघ जिस तरह से अपने मूलभूत वैचारिक सिद्धांतों पर जिस तरह से एक दूसरे के सामने खड़े नज़र आते हैं तो भाजपा की मोदी सरकार और विपक्ष में रहते हुए बयान देने वाली भाजपा में बहुत अंतर् दिखाई देता है. राष्ट्रवाद के नाम पर दूसरों को दबाने और स्वयं उस दिशा में कोई ठोस प्रयास न करने के कारण ही आज मोदी अपनी छवि को लेकर सोचने के लिए मजबूर होते दिख रहे हैं ऐसा नहीं है कि आज उनकी छवि बहुत कमज़ोर हो चुकी है पर जब इसी तरह की परिस्थिति में उलझ कर अटल सरकार जा चुकी हो तो संघ, भाजपा और मोदी के लिए यह सोचने का सही समय कहा जा सकता है.
            देश के बहुत सारे मामलों पर जिस तरह से संघ भाजपा और मोदी एक सुर में बोलते रहते थे उन पर सरकार में आने पर मोदी की तरफ से कुछ ख़ास नहीं जा सका है कश्मीरी पंडितों, धारा ३७०, राम मंदिर और समान नागरिक संहिता पर इतनी अधिक बातें की जा चुकी थीं कि आज पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार को उसे बोझ समझ कर ढोना पड़ रहा है साथ ही उसे इन ज्वलंत मुद्दों से बचने का कोई रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा है. कश्मीर में महबूबा सरकार में शामिल भाजपा आज जम्मू और लद्दाख के हितों की बात ही नहीं कर पाती है जबकि आज की परिस्थिति में जम्मू और लद्दाख को कश्मीर घाटी की राजनीति से मुक्त करने की कोशिश करने का एक अवसर भाजपा के पास था. चुनावी जीत के लिए मुद्दों को बनाये रखना एक बात है पर सत्ता में होकर उन पर निर्णय कर पाना बहुत ही मुश्किल काम है. अभी तक कांग्रेस को भ्रष्टाचार और नीतिगत जड़ता के मामले पर लगातार घेरने वाले पीएम की तरफ से आर्थिक मोर्चे पर कोई ऐसा काम नहीं किया गया है जिससे देश को कांग्रेस की नीतियों से हटकर चलने का मार्ग दिखाई देता ? एफडीआई, जीएसटी आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन पर भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए कभी देशहित में मनमोहन सरकार का साथ नहीं दिया और लागू करने के बाद जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण कर सुधार को जिस तरह से मज़ाक बना दिया गया है आज वह सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती है.
               अभी तक २०१४ की हार से मूर्छा में पड़ी कांग्रेस को अपने अतिवादी और जबरदस्ती उठाये जाने वाले क़दमों से अपने गृह राज्य गुजरात में जिस तरह से सामने खड़े होने का अवसर मोदी ने दिया है आज वह उनकी गलतियों का परिणाम ही अधिक लगता है क्योंकि एक तरफ आज वित्त मंत्रालय और सरकार जीएसटी के अनाप शनाप तरीके से निर्धारित किये गए स्लैब्स को सुधारने की कोशिशों में लगे हुए हैं वहीँ हाशिये पर पहुँच चुके कांग्रेस उपाध्यक्ष गुजरात के व्यापारियों के सामने हुंकार भरकर कहते हैं कि वे १८% के एक स्लैब के लिए संघर्ष करते रहेंगें और मौका मिलने पर वे केवल एक स्लैब करने की दिशा में काम भी करेंगें. यदि गौर से देखा जाये तो संघ-भाजपा के हिंदुत्व और विकास की प्रयोगशाला में कहीं न कहीं कुछ ऐसा अवश्य हो गया है जिसने पूरे देश में भाजपा का सामना न कर पाने की स्थिति में पहुंची कांग्रेस को गुजरात में दहाड़ने का मौका दे दिया है. इसके चुनावी परिणाम जो भी हों पर कांग्रेस और राहुल गांधी इस बात को रेखांकित करने में सफल होते दिख रहे हैं कि मोदी सरकार व्यापारियों और आम जनता के हितों पर विचार किये बिना ही हर सुधार को ज़बरदस्ती थोपने की कोशिशों में लगी हुई है.
                           आज भले ही व्यापारियों की समस्याओं के चलते सरकार जीएसटी के स्लैब्स का पुनर्निधारण कर रही हो पर इस मामले पर पहले से हमलावर रहने वाली कांग्रेस को यह कहने का मौका हर बार मिलता जा रहा है कि यह उसके द्वारा विरोध किये जाने का परिणाम है और उसके राज में केवल १८% का एक ही स्लैब होगा. आज मोदी के साथ खड़े रहने वाले भाजपा के नेताओं में भी कमी सी दिखाई देती है क्योंकि उन्होंने अपने संदेह असुरक्षा की भावना के चलते बड़े नेताओं को कुछ ख़ास ज़िम्मेदारी दे ही नहीं रखी है और उसके साथ ही अब जिस तरह से अधिकारियों द्वारा दिए गए आंकड़ों के आधार पर मंत्री बयान देते नज़र आते हैं उससे जनता को कोई जुड़ाव महसूस नहीं होता है. फिलहाल ४२ महीनों में मोदी के नायकत्व पर उनकी नीतियों के चलते उठते हुए सवाल आज उन्हें वो सब करने के लिए मजबूर कर रहे हैं जिनके लिए वे कभी कांग्रेस पर हमले किया करते थे.
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शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

राष्ट्रपति और राजनीति

                                                       निर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के जीतने पर एक बार फिर से उनके दलित्त होने को मुखर रूप से समाचारों में रेखांकित किया जा रहा है जबकि उनके जीत जाने के बाद इस तरह की बातें किये जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी. निश्चित तौर पर अपने प्रत्याशी को जिताने लायक संख्या होने पर कोई भी सरकार या पीएम अपनी पसंद के कम समस्या पैदा करने वाले व्यक्ति को ही राष्ट्रपति पद पर देखने के आकांक्षी होते हैं और साथ ही देश के राजनैतिक पटल पर भी अपने समीकरणों को साधने की कोशिशें करते हुए देखे जाते हैं तो ऐसी स्थिति में पीएम मोदी और भाजपा की तरफ से यदि ऐसा किया गया तो कोई बड़ी बात नहीं है. वैसे भी पीएम मोदी के बारे में कहा जाता है कि उन्हें असहमति के शब्द अच्छे नहीं लगते हैं तो आज किसी को भी इस पद तक पहुँचाने की स्थिति में मज़बूत पीएम मोदी ने भी देश के सर्वोच्च पद के लिए कोविंद का चुनाव करके एक तरह से अपनी स्थिति को और मज़बूत ही किया है. सरकार किस व्यक्ति को इस पद पर देखना चाहती है यह उसकी मर्ज़ी है और उस पर सवाल लगाने का कोई मतलब भी नहीं बनता है पर दलित होने के साथ विवादों से दूर रहना कोविंद के लिए उस समय बहुत काम आया जब पीएम मोदी उनके जैसे व्यक्ति को खोज रहे थे.
                                     देश में राष्ट्रपति पद पर बैठे राजनैतिक व्यक्तित्वों में से कई लोगों ने तो अपने पद के साथ पूरी तरह से न्याय किया वहीं कई लोगों की तरफ से केवल सरकार के रबर स्टैम्प की भूमिका ही निभाई गयी. एक समय इंदिरा गाँधी कि हाँ में हाँ मिलाने वाले ज्ञानी जैल सिंह ने भी राजीव गाँधी की मज़बूत सरकार के लिए परेशानी भरे पल पैदा कर देने में कोई कस्र नहीं छोड़ी थी. देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी जिस तरह से इस पद की गरिमा को बचाये रखने के लिए लगातार कोशिशें की थीं वे अपने आप में एक उदाहरण हैं और आज कोविंद से उस तरह एक आचरण की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. आम तौर पर पार्टी में सक्रिय नेताओं को जीवन के अंतिम चरण में राष्ट्रपति बनाकर पुरुस्कार देने की परंपरा सी चलती आयी है पर इस मामले में सबसे चौंकाने वाला निर्णय कमज़ोर कहे जाने वाले पीएम मनमोहन सिंह की तरफ से उठाया गया था जब वे राजनैतिक स्तर पर संसद से सड़क तक घिरे हुए थे तो भी उन्होंने अपनी सरकार में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले और विभिन्न विपरीत परिस्थितियों में उनकी सरकार को संकट से उबारने वाले लम्बे राजनैतिक जीवन के अनुभवी प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए आगे किया था.
                                प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल अपने आप में बहुत अच्छा कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने देश में पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ बनने वाली भाजपा की सरकार और पीएम मोदी के साथ तीन वर्षों से भी अधिक समय तक काम किया और कहीं से भी सरकार या विपक्ष के साथ किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार या पक्ष का पोषण नहीं किया. बिहार के राज्यपाल के रूप में कोविंद का कार्यकाल भी बहुत अच्छा रहा तभी जेडीयू ने विपक्ष से अलग चलते हुए उनके लिए वोट करने के बारे में सोचा था. कोविंद से भी पूरा देश निष्पक्ष रूप से अपनी राय रखने और सरकार के साथ विपक्ष और देश के मौजूदा हालातों पर नज़र रखने की अपेक्षा ही रखता है. मज़बूत पीएम मोदी अपने गुरु आडवाणी या सुषमा स्वराज जैसे राजनैतिक रूप से बेहद मुखर नेता को इस पद तक पहुँचाने का वो साहस नहीं दिखा पाए जो पीएम के रूप में मनमोहन सिंह ने अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी को यहाँ पहुंचाकर किया था. वैसे तो राष्ट्रपति के लिए करने को कुछ ख़ास नहीं होता है फिर भी कोविंद से देश यह आशा तो कर ही सकता है कि अब वे भी केवल संघ, भाजपा या मोदी के पीएम के स्थान पर पूरे देश के राष्ट्रपति बनकर उसी तरह का आचरण दिखाएंगें जैसा उनके पूर्ववर्ती प्रणब मुखर्जी द्वारा दिखाया गया है.   
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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

सोशल मीडिया और समाज


                                              देश में जिस तरह से बढ़ते हुए इंटरनेट के प्रसार से आम लोगों तक सूचनाएं पहुंचनी शुरू हो चुकी हैं वहीं इस तीव्र माध्यम का दुरूपयोग कर समाज में वैमनस्यता फ़ैलाने के लिए भी किया जा रहा है. धार्मिक, सामाजिक, भाषाई और राजनैतिक आधार पर जिस तरह से देश के किसी न किसी हिस्से में बिना सोचे समझे तनाव बढ़ाने वाले लोग सक्रिय हो चुके हैं उनसे निपटने का कोई कारगर तरीका सरकार, पुलिस या प्रशासन के पास नहीं है. ऐसी किसी भी परिस्थिति में सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी आम नागरिकों की ही हो जाती है क्योंकि उनकी तरफ से किये जाने वाले किसी भी अनुचित व्यवहार से पूरे समाज या क्षेत्र में तनाव व्याप्त हो जाता है. इस तरह की परिस्थिति से निपटने के लिए एक स्पष्ट नीति की आवश्यकता है क्योंकि देश में आज कहीं डायन, कहीं गाय के हत्यारे और कहीं पैगम्बर और देवी देवताओं के लिए अपमानजनक पोस्ट लिखने से लगातार तनाव फैलने की ख़बरें आती ही रहती हैं. चुनावी दृष्टि से संवेदनशील राज्यों में यह बहुत अधिक दिखाई देता है क्योंकि हर राजनैतिक दल अपने वोटों के ध्रुवीकरण के लिए इस तरह की गतिविधियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल रहा करता है.
                                                      ऐसी किसी भी परिस्थिति को रोकने के लिए सबसे पहले सभी धर्मों के धर्म गुरुओं को सामने आना होगा क्योंकि ऐसी परिस्थिति से राजनैतिक लाभ मिलने के चलते कोई भी राजनैतिक दल महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाना चाहेगा. सोशल मीडिया पर किसी भी अनजान व्यक्ति के कुछ भी लिख देने से क्या किसी धर्म का अहित हो सकता है यह सोचने समझने की बात है और उस व्यक्ति की कैसी समझ है क्या इस पर भी विचार नहीं किया जाना चाहिए ? भारतीय जिस तरह से अपने को प्रगतिशील और आधुनिक दिखाने का ढोंग करते हैं वे पल भर में ही कितने असभ्य हो जाते हैं इसका उदाहरण आज़ादी के बाद से आज तक होने वाले हर दंगे में दिखाई देता रहा है. जिन लोगों के साथ आम लोग बचपन से ही रहते आ रहे होते हैं धर्म की आभासी दीवार और उस पर आसन्न संकटों को हम कितनी आसानी से सही मान लेते हैं और जो धर्म हमारे जीवन का अंग होना चाहिए वह प्रदर्शन का विषय बन जाता है और हम एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं. जिन लोगों की तरफ से इस तरह के पोस्ट डाले जाते हैं उनके खिलाफ शिकायत मिलने पर कानून को सख्ती से काम करना चाहिए और आने वाले समय में उस जैसी मानसिकता को बढ़ने से रोकने के लिए भी ठोस कदम उठाने चाहिए.
                                                    सोशल मीडिया का इस तरह से दुरूपयोग करना किसी भी तरह से समाज के हित में नहीं कहा जा सकता है क्योंकि कुछ लोगों की दूषित मानसिकता के कारण पूरे इलाके में तनाव फैलता है जिसमें कई बार निर्दोषों की जान भी चली जाती हैं और उस मसले से किसी भी धर्म का कुछ नहीं बिगड़ता है. जो ज़िम्मेमदार लोग सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं उन्हें भी पूरी तरह से अपने उन मित्रों पर नज़र रखनी चाहिए जिनकी तरफ के कई बार जाने अनजाने में ही सामाजिक, धार्मिक रूप से आपत्तिजनक पोस्ट्स को आगे बढ़ाया जाता है. इस बात की सफलता असफलता को इस तरह से भी देखना चाहिए कि हम इस तरह की पोस्ट्स को रोकने के लिए कितने ज़िम्मेदारी से आगे आते हैं क्योंकि अधिकांश लोगों को यह भी नहीं पता होता है कि वे किसी भी आपत्तिजनक पोस्ट को आगे भेजकर कानून का उल्लंघन कर रहे होते हैं और इस स्थिति में उनके लिए बहुत समस्याएं भी खडी हो सकती हैं. सोशल मीडिया के लिए भी क्या अब पुलिस की सोशल मीडिया लैब्स के अतिरिक्त समाज में भी शांति समितियों की आवश्यकता नहीं है जो इस तरह के किसी भी विवाद के सामने आने पर उनको सामाजिक स्तर पर सुलझाने का प्रयास करें और समाज में अलगाव पैदा करने की कोशिशें करने वाले सभी तत्वों की कोशिशों को पूरी तरह से नाकाम करने का काम कर सकें. देश हमारा है समाज हमारा है तो इसकी संरचना की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी भी हम सभी को मिलकर ही उठानी होगी दूसरों को कोसने से कभी भी समाज का हित नहीं हो सकता है.     
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गुरुवार, 29 जून 2017

सेना और राजनैतिक समझ

                                                       देश की आज़ादी के बाद से ही जिस तरह से महत्वपूर्ण मामलों में सेना की तरफ से सीधे बयान देने के अतिरिक्त किसी अन्य मसले पर कुछ भी बोलने पर के तरह से अघोषित रूप से राजनैतिक समझ बनी हुई थी और उस पर सरकार के साथ विपक्षी दल भी सहमत ही रहा करते थे अब उस स्थिति में व्यापक बदलाव दिखाई दे रहा है जिसके चलते सेना को जहाँ विभिन्न मुद्दों पर बोलने की छूट मिली है वहीं उस पर विपक्षी दलों की तरफ से राजनैतिक हमलों में भी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है. यह ऐसी स्थिति है जिससे सेना को पूरी तरह से अलग रखे जाने की आवश्यकता है क्योंकि देश के संविधान को बनाने वालों ने किसी कमज़ोर और विपरीत राजनैतिक परिस्थिति में मज़बूत सेना की तरफ से सत्ता पर कब्ज़ा किये जाने की संभावनाओं पर विचार करते हुए ही इस तरह की व्यवस्था की थी जिसमें राष्ट्पति, सरकार, रक्षा मंत्रालय के बीच में शक्तियों का बहुत अच्छा समन्वय भी किया गया था. आज जिस तरह से सेना को राजनैतिक रूप से संवेदनशील मसलों पर भी बोलने की छूट दी जा रही है वह मोदी सरकार की रणनीति है जिसमें वह उन बयानों को सेना के माध्यम से दिलवाने की कोशिश में है जिन पर उसके बोलने पर सवाल खड़े किये जा सकते हैं और बाद में वह सरकार पर सवाल खड़े करने वालों पर खुद प्रश्नचिन्ह लगाती है कि विपक्षी दल सेना पर हमले कर रहे हैं जिससे अपने पर आने वाले राजनैतिक दबाव को वह सेना की तरफ मोड़ने में सफल होते भले ही दिख रहे हैं पर भविष्य में इसके खतरे तब सामने आ सकते हैं जब मोदी भारत के राजनैतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके होंगे.
                                              भारतीय सेना को ऐसे ही संयुक्त राष्ट्र मिशन और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले द्विपक्षीय मिशनों में शामिल नहीं किया जाता है पूरा विश्व जानता है कि हमारी सेना पूरी तरह से राजनीति से सिर्फ इसलिए दूर रहती है क्योंकि उसके लिए संविधान में स्पष्ट प्रावधान किये गए हैं और कुछ भी अस्पष्ट नहीं है. भारतीय सेना ने सदैव ही विदेशों तक में अपनी कर्तव्यनिष्ठा के बल पर देश के मान सम्मान को बढ़ाने का काम किया है. वर्तमान में जिस तरह से सरकार की तरफ से सेना के अधिकारियों को प्रेस के सामने लाया जा रहा है वह सेना की उस छवि से मेल नहीं खाता है और इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं. सितम्बर में सेना की सर्जिकल स्ट्राइक का प्रारम्भ में सभी राजनैतिक दलों ने स्वागत किया पर जब सरकार की तरफ से उसका दुरूपयोग किया गया तो टीवी से लगाकर प्रेस तक उसके सबूत मांगने वाले नेता भी सामने आते दिखाई दिए. इस घटना से नेताओं की वह समझ ख़त्म सी होती लगी जिसमें वे अघोषित रूप से ही सही पर सेना को लेकर अनावश्यक वियवादों से दूर ही रहा करते थे. भारत के सेनाध्यक्ष की पूरी दुनिया में बहुत इज़्ज़त की जाती है वह सिर्फ इसलिए नहीं कि भारतीय सेना विश्व की बड़ी सेनाओं में है बल्कि इसलिए कि उनके नेतृत्व में काम करने वाली यह सेना पूरी तरह से अपनी कर्तव्य निष्ठा के लिए जानी जाती है.
                                             पहले संदीप दीक्षित फिर आज़म खान की तरफ से आने वाले बयानों से उनकी पार्टियों ने सिर्फ इसलिए ही पल्ला झाड़ लिए क्योंकि ये बयान अनावश्यक थे और इनका केवल राजनैतिक दुरूपयोग ही किया जा सकता है. इसके बाद यह सोचा जाना चाहिए कि जिन परिस्थितियों में सेना काम करती है उसमें उससे क्या अपेक्षाएं की जानी चाहिए और सेना के संयम की क्या सीमा होनी चाहिए ? नेता तो कुछ भी बोल देते हैं पर जब उस पर विवाद बढ़ता है तो वे बेशर्मी के साथ अपने बयानों के और दूसरे मतलब भी समझाने लगते हैं. संदीप दीक्षित और आज़म खान कोई कल के युवा नेता नहीं है जिनको इस बात का एहसास नहीं है कि कब क्या कहा जाना चाहिए फिर भी यदि उनकी तरफ से ऐसे बयान आते हैं तो मामले के दोनों पक्षों को भी गौर से देखा जाना चाहिए. देश की संसद जिसके पास कानून बनाने की क्षमता है और वहां बैठने वाले जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए यह समय सोचने का है कि उनकी तरफ से आखिर क्या गलती की जा रही है जिससे आज सेना उनके आपसी राजनैतिक विवादों का मोहरा बनती हुई नज़र आ रही है ? क्या सदन के दोनों पक्षों के पास इतनी समझदारी नहीं बची है कि वे सेना से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से कुछ भी बोल देने से बचने की तरफ सोचना शुरू करें ? विभिन्न राजनैतिक दलों को क्या कुछ कड़े अनुशासन के बारे में नहीं सोचना चाहिए जिसका अनुपालन करना सभी नेताओं के लिए अनिवार्य हो और उनमें विफल होने पर क्या नेताओं के लिए पार्टी स्तर पर कोई दंडात्मक प्रावधान भी नहीं होने चाहिए ? जब तक सत्ता के लिए सेना को भी बैसाखी के रूप में उपयोग कर लेने की प्रवृत्ति से छुटकारा नहीं पाया जायेगा तब तक नेताओं की इस नई बीमारी को समाप्त नहीं किया जा सकता है.
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शनिवार, 20 मई 2017

तीन तलाक़

                                  मुसलमानों में तीन तलाक़ की स्थिति को लेकर जिस तरह से हर पक्ष अपनी अपनी बातों को लेकर स्पष्टीकरण देने में लगा हुआ है उससे यही लगता है कि यह पूरा मामला इस्लाम में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से सम्बंधित होते हुए भी कानूनी उलझनों और बिना बात के बयानों में उलझता जा रहा है. किसी भी देश में नागरिकों को मिले मौलिक अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त हैं और भारतीय संविधान लिंग, धर्म, जाति, भाषा और नस्ल के आधार पर किसी भी भेदभाव के खिलाफ अपनी मंशा दिखाता है पर साथ ही मौलिक अधिकारों के अनुपालन में सभी नागरिकों से यह अपेक्षा भी रखता है कि वे संवैधानिक और कानूनी मुद्दों से टकराने वाले विभिन्न धार्मिक मुद्दों पर स्वयं ही कोई राह निकालने की मंशा भी रखें जिससे हर बात पर अनावश्यक रूप से विवाद न खड़े हो सकें. निश्चित तौर पर तीन तलाक़ की व्यवस्था इस्लामी निकाह में है पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट में यह स्वीकार किया कि वह भी मानता है कि तीन तलाक़ का ज़िक्र पवित्र क़ुरान में नहीं है उससे यही लगता है कि बोर्ड में भी तीन तलाक़ को लेकर मतभेद रहे हैं कि इस मुद्दे से किस तरह से निपटा जाये जिससे महिलाओं के अधिकारों की समग्र रक्षा भी हो सके और समाज की इस परंपरा पर कोई अनावश्यक रूप से उंगली भी न उठा सके.
                                 भारतीय मीडिया में जिस तरह से तीन तलाक़ को ख़त्म किये जाने की बात कही जा रही है असलियत में वैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि हर पक्ष अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बयान देने में लगा हुआ है और वह तथ्यों को अपने अनुसार मोड़ने का काम भी करने से नहीं चूक रहा है. मसला तीन तलाक़ को पूर्ण रूप से ख़त्म करने का कभी भी नहीं रहा है क्योंकि इस व्यवस्था को इस्लामिक माना जाता है अभी भारत में तीन तलाक़ की जो व्यवस्था चल रही है उसका क़ुरान में कहीं भी ज़िक्र नहीं है यह बात अब बोर्ड ने भी मानी है क्योंकि एक साँस में तीन बार तलाक़ बोले जाने को वर्षों दशकों पहले कई इस्लामिक देशों में खत्म किया जा चुका है जिसमें पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देश भी शामिल हैं. देश की आम जनता जिसमें हिन्दू मुसलमान सभी शामिल है उनको यह लग रहा है कि इस बार कोर्ट या सरकार तीन तलाक़ को ही ख़त्म कर देगी जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है क्योंकि मामला असलियत में तलाक़ दिए जाने की प्रक्रिया पर ही टिका हुआ है जिससे भ्रम की स्थिति बनती जा रही है. यह भी अच्छी बात है कि खुद बोर्ड की तरफ से भी निकाह के समय ही मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ से सम्बंधित और अधिकार दिए जाने सम्बन्धी संशोधनों और मुस्लिम समाज में तीन तलाक़ के वर्तमान स्वरूप के बारे में स्पष्टीकरण देने और समाज को जागरूक करने की बात की जा रही है क्योंकि समाज के अंदर की कमियों को समाज के प्रबुद्ध वर्ग और समाज के लिए काम करने वाले संगठनों के माध्यम से ही बड़े परिवर्तन बिना किसी विरोध के आसानी से किये जा सकते हैं.
                           सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ ने इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है और आने वाले समय में उसका इस मुद्दे पर निर्णय भी आ सकता है ऐसी स्थिति में जो भी निर्णय हो पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को अपने स्तर से भारत के इस्लामी समाज में वे वदलाव लाने के बारे में प्रयास शुरू करने ही चाहिए जिससे केवल तीन तलाक़ ही नहीं बल्कि अन्य मुद्दों पर भी जहाँ मुसलमानों को विभिन्न तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है उन पर भी सुधारात्मक प्रयास शुरू करने चाहिए. इस प्रयास से जहाँ पूरे समाज में विमर्श और सुधार की प्रक्रिया को शुरू करने में आसानी होगी वहीं आस्था से जुड़े वे मुद्दे जो समय के साथ परंपरा में बदल गए उन पर भी क़ुरान के अनुसार चलने की व्याख्या की जा सकेगी. मुस्लिम समाज में इस्लाम धर्म से जुड़े उन मसलों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को यदि बोर्ड समझता है तो यह भारत के मुसलमानों और देश के लिए अच्छा ही साबित होगा क्योंकि मुद्दों को टालने से उन पर विवाद बढ़ते हैं जो अंत में न्यायिक समीक्षा और कानून बनाने की स्थिति तक चले जाते हैं. यदि विभिन्न इस्लामिक देशों में तीन तलाक़ के भारतीय स्वरुप को गैर इस्लामिक किया जा चुका है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भी इस मुद्दे पर तभी निर्णय ले लेना चाहिए था जिससे इस्लाम के मूल सिद्धांतों की अनदेखी किये बिना ही सही रास्ते पर चलने के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ जाती.          
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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

आदित्यनाथ योगी और भाजपा की चुनौती

प्रदेश में हुए विधान सभा चुनावों के बाद जिस प्रचंड जनादेश के साथ पूर्वांचल में पूरी तरह से स्थापित हिन्दू युवा वाहिनी के संरक्षक, गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर और भाजपा नेता आदित्यनाथ योगी ने भाजपा के एक हफ्ते के गहन मंथन के बाद सत्ता संभाली उसके बाद भाजपा और सीएम योगी को विपक्ष से मिलने वाली चुनौतियाँ स्वतः ही कम हो गयी हैं क्योंकि सरकार के सत्ता सँभालते ही उस की आलोचना करना सही नहीं कहा जा सकता है इसलिए अभी सरकार की प्राथमिकताओं और उसके प्रारंभिक क़दमों के बारे में विश्लेषण का काम सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ ही चल रहा है. सदन के अंदर विधान सभा में तो कमज़ोर संख्या बल के कारण विपक्ष सीएम आदित्यनाथ को किसी भी तरह की चुनौती देने की स्थिति में नहीं है पर विधान परिषद् में उसकी तरफ से मुद्दों के आधार पर सरकार को रोकने की कोशिश की जा सकती है. प्रदेश की व्यापक सीमाओं और आसन्न चुनौतियों को देखते हुए सरकार के लिए चुनावों और उससे पहले अखिलेश सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर किये गए हमलों के चलते आज एक बार फिर से सीएम आदित्यनाथ के लिए यही मुद्दा सबसे बड़ा साबित होने वाला है और जिस तरह से उन्होंने गृह मंत्रालय अपने पास ही रखा हुआ है उससे कानून व्यवस्था के सभी मामलों पर विपक्ष को सीधे उन पर हमले करने के अवसर मिलते ही रहने वाले हैं.
पिछली सरकारों में प्रदेश में जिस तरह से नेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत के चलते अधिकांश जगहों पर कानून व्यवस्था की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई देता था कमोबेश खुद सीएम आदित्यनाथ की स्पष्ट चेतावनी के बाद अब भी वही स्थिति बनी हुई है और पहले जो कार्य सपा के कार्यकर्ता किया करते थे आज वह हिन्दू युवा वाहिनी और भाजपा के कार्यकर्ता करने में लगे हुए हैं. सत्ता प्रतिष्ठान के दलाल हर सत्ता में अपना हिस्सा बांटने पहुँच ही जाते हैं क्योंकि किसी भी दल में वैचारिक समानता के कारण जो लोग जुड़े होते हैं वे कभी भी आसानी से अपनी सरकार के लिए इस तरह की चुनौतियाँ उत्पन्न नहीं करते हैं पर जो लोग सत्ता के साथ चिपकने वाले और सत्ता का लाभ उठाने की कोशिश हर सरकार में करने के माहिर होते हैं वे किसी भी परिस्थिति में सत्ताधारी दल की कमज़ोर और लालची कड़ियों को खोज ही लेते हैं और अपना काम निकालने में जुट जाते हैं. इन लोगों से निपटने के लिए खुद सीएम आदित्यनाथ को अपने स्तर पर सक्रिय होना होगा वर्ना सत्ता के ये दलाल उनकी सरकार के लिए भी चुनौतियाँ खडी करने से बाज़ नहीं आएंगे. लम्बे समय बाद प्रदेश की सत्ता में आयी भाजपा के कार्यकर्ता भी जिस तरह से अपने पुराने हिसाबों को चुकता करने और हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता नई नई जगहों पर समस्याएं खड़ी करने का काम कर रहे हैं वह सरकार और प्रदेश के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता है.
खुद सीएम आदित्यनाथ न्याय की बात कर रहे हैं और गोरखपुर में उनके लम्बे धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक जीवन में न्याय की बात काफी हद तक परिलक्षित भी होती है पर प्रदेश भर में फैले हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता जिस तरह से अतिउत्साह में दिख रहे हैं और आज समाज के अराजक तत्व भी गले में केसरिया अंगौछा डालकर सत्ता का प्रभाव दिखाने में लग चुके हैं भाजपा को अविलम्ब इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि अब चुनौती विपक्ष से निपटने के स्थान पर अपने में छिपे उन तत्वों की पहचान करने और सुधार करने की है जो आने वाले समय में सरकार के लिए समस्या बन सकते हैं. सत्ता की तरफ लाभ कमाने के लिए भागने वाले इस मानसिकता के लोगों को अपने अंदर चिन्हित करने के साथ ऐसे तत्वों के संगठन में प्रवेश पर भी कड़ाई से ध्यान देना होगा जिससे आने वाले समय में सरकार के साथ खड़े लोग उसके लिए विभिन्न स्तरों पर अनावश्यक चुनौतियाँ न खडी कर सकें. वैसे तो मंत्रिमंडल चुनना सीएम का विशेषाधिकार होता है पर यूपी की विशालता और चुनौतियों को समझते हुए सीएम आदित्यनाथ यदि दो गृह राज्य मंत्रियों की नियुक्ति करने के बारे में सोचें जिन्हें पूर्वी और पश्चिमी यूपी के कुछ जनपदों की ज़िम्मेदारियों को दिया जाये और मध्य यूपी के बड़े हिस्से को खुद वे अपने नियंत्रण में रखें तो आने वाले समय में कानून व्यवस्था में गुणात्मक सुधार आ सकता है.
सरकार सँभालने के बाद अभी तक सीएम आदित्यनाथ ने किसी भी विभाग में बड़े स्तर पर स्थानांतरण नहीं किये हैं जिससे यह लगता है कि वे अधिकारियों को यह स्पष्ट सन्देश देना चाहते हैं कि जो कानून के अनुसार चलेगा उसके लिए कोई समस्या नहीं आने वाली है पर सरकार की मंशा के अनुरूप खरे न उतरने वाले अधिकारियों के लिए अब सब कुछ उतना आसान नहीं रहने वाला है. यह भी अच्छा ही है कि सीएम आदित्यनाथ खुद आगे आकर सरकार चलाने के लिए कृत संकल्पित दिखाई दे रहे हैं पर आने वाले समय में सीएम के रूप में विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी सहभागिता जितनी बढ़ती जाएगी व्यस्तता के चलते सरकार चलाने पर उनके लिए इतना ध्यान दे पाना संभव नहीं रह जायेगा इसलिए अभी से उन्हें अपने मंत्रियों और अधिकारियों के सामने पहले साल का लक्ष्य निर्धारित करना होगा जिससे वे २०१९ में होने वाले आमचुनावों तक भाजपा के २०१४ और २०१७ के प्रदर्शन को दोहराकर केंद्र में मोदी सरकार की वापसी का मार्ग भी खोल सकें. यूपी में आज भाजपा के नेताओं में पारस्परिक हितों का टकराव न के बराबर है और इस स्थिति का लाभ कहाँ तक सीएम आदित्यनाथ उठा पाते हैं यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होने वाला है. सरकार बन चुकी है और चूंकि सीएम आदित्यनाथ अधिक लोगों के लिए जवाबदेह नहीं हैं इसलिए उनके लिए कड़े निर्णय करना आसान भी रहने वाला है वे अपने और भाजपा के लिए समाज में स्वीकार्यता को कितना बढ़ा पाते हैं यह तो आने वाले एक दो सालों में स्पष्ट हो पायेगा.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 15 मार्च 2017

ईवीएम - आरोप और तथ्य

                                                  पांच राज्यों में हुए चुनावों के रुझान और नतीजे आने के साथ ही जिस तरह से बसपा अध्यक्ष मायावती ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के माध्यम से चुनावों में हेर-फेर करने के आरोप लगाने शुरू कर दिए उसके बाद उनके वोटर्स और कुछ अन्य आम लोगों के मन में यह सवाल भी उठने शुरू हुए कि क्या ईवीएम के साथ कोई दल चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में करवा सकता है ? इसके लिए सबसे पहले हमें इन मशीनों की संरचना को समझना होगा क्योंकि वोट डालने वाले सभी लोगों ने वोटिंग मशीन और उससे जुडी हुई कण्ट्रोल यूनिट को मतदान के समय अवश्य देखा होगा. जिस मशीन में हम अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन करने के लिए उपयोग में लाते हैं वह वोटिंग यूनिट और जो पीठासीन अधिकारी के पास होती है उसे कण्ट्रोल यूनिट कहा जाता है. हर वोटिंग मशीन में अधिकतम १६ प्रत्याशियों के लिए स्थान होता है और वोटिंग मशीन की इस व्यवस्था से अधिकतम ४ यूनिट समानांतर लगाकर ६४ प्रत्याशियों के लिए व्यवस्था की जा सकती है इससे अधिक प्रत्याशी होने पर मतपर्तों द्वारा चुनाव कराना अपरिहार्य हो जायेगा. हर निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवारों के अनुरूप इन मशीनों की प्रोग्रामिंग की जाती है तथा आज उपयोग में लायी जाने वाली इन मशीनों की वोट रिकॉर्ड करने की अधिकतम सीमा ३८४० मतों की है परंतु अधिकांश बूथों पर केवल १५०० वोटर ही होते हैं जिससे क्षमता संबंधी समस्या कभी भी सामने नहीं आ सकती है. एक समय होने वाली बूथ कैप्चरिंग की घटनाओं को ईवीएम ने पूरी तरह से समाप्त ही कर दिया है क्योंकि इनकी व्यवस्था और कार्यप्रणाली कुछ इस तरह की है कि बहुत कोशिश करने के बाद भी एक मिनट में ५ से अधिक वोट नहीं डाले जा सकते हैं यह भी तब संभव है जब पीठासीन अधिकारी भी मिला हुआ है वर्ना अधिकारी के कंट्रोल यूनिट में क्लोज बटन दबाते ही नए वोटों को डालने की प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी.
                                         मतदान की यह पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है इसके बारे में भी समझना आवश्यक है क्योंकि सुबह मतदान शुरू करने से पहले आयोग की तरफ से न्यूनतम ५० वोट का मॉक पोल कराने का निर्देश भी दिया जाता है जिसमें सभी प्रत्याशियों के एजेंट शामिल किये जाते हैं और उनके सामने ही कण्ट्रोल यूनिट पर कुल पड़े वोट और उनकी गणना की जाती है तथा मशीन द्वारा सही तरह से काम करने की स्थिति को जांच जाता है जिसके बाद मशीन को फिर से न्यूट्रल करके सील किया जाता है और मतदान प्रारम्भ कराया जाता है. इस पूरी प्रकिया के बीच सेक्टर प्रभारी और अन्य तरह के प्रशासनिक और चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारी निरंतर दौरा करते रहते हैं जिससे कहीं भी किसी भी अनियमितता की स्थिति में उसे त्वरित रूप से रोका जा सके. जब हर मतदान केंद्र पर हर प्रत्याशी के एजेंट मौजूद रहते हैं और साथ ही प्रत्याशी खुद भी अपने स्तर से बूथ के बाहर पूरी चौकसी रखते हैं तो किसी भी गड़बड़ी को आखिर किस तरह से किया जा सकता है ? इस सबके बाद भी पूरे चुनाव में किसी भी एजेंट की तरफ से मशीन की कार्यप्रणाली पर कोई संदेह व्यक्त नहीं किया गया और वोटर्स ने भी किसी भी स्तर पर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई तो इस तरह के आरोपों को हताशा की उपज ही माना जा सकता है.
                                       वोटिंग मशीन में मतदान के बाद जब एजेंट्स की उपस्थिति में पीठासीन अधिकारी क्लोज बटन दबा देता है तो उसके बाद रिकॉर्डिंग यूनिट में लगी चिप से बिना किसी छेड़छाड़ के ब्यौरे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है और यह चिप आयात करने के समय से ही सील होती है इसके साथ किसी भी तरह की छेड़खानी करने से इसमें रिकॉर्ड डाटा खुद ही नष्ट हो जाता है जिससे बाद में काउंटिंग के समय इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा तो किसी के द्वारा ऐसे प्रयास ही कैसे किये जा सकते हैं. जिन स्ट्रांग रूम्स में ये मशीनें रखी जाती हैं वहां पर कई स्तरीय सुरक्षा की जाती है और सील कमरों के बाहर प्रत्याशी भी अपने ताले वहां पर लगा सकते हैं जिसके लिए आयोग ने उन्हें अधिकार दे रखे हैं पर अधिकांश मामलों में प्रत्याशी सुरक्षा से संतुष्ट होते हैं. इन मशीनों में रिकॉर्ड किये गए ब्यौरे को १० वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है हालाँकि ऐसी आवश्यकता नहीं पड़ती है. मतदान के पश्चात् मशीनों को ऑफ करके बैटरी निकाल ली जाती है जिसे काउंटिंग के दिन फिर से लगाया जाता है जिससे लंबी चुनावी प्रक्रिया के दौरान बैटरी सम्बंधित किसी भी समस्या से मशीन और रेकॉर्ड्स को नुकसान न पहुँच सके. फिर भी किसी संदिग्ध परिस्थिति में कोई समस्या आने पर उस मशीन या क्षेत्र से जुड़े मतदान को दोबारा कराने जाने का विकल्प आयोग के पास सदैव ही सुरक्षित रहता है.
                                   अब इस परिस्थिति में ईवीएम से हुए मतदान पर संदेह करने वालों की मानसिक स्थिति को समझना आवश्यक भी है क्योंकि २००९ के आम चुनावों में हार के बाद भाजपा के नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी मायावती की तरह ही इस तरह के आरोप लगाए थे और मतदान को मतपत्रों के माध्यम से मतदान कराये जाने की मांग भी की थी. इसका सीधा सा मतलब यही है कि ७० साल के लोकतंत्र में अभी भी देश के कुछ नेता इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि वे जनता के अपने विरोध में जाने को आसानी से स्वीकार कर सकें ? उन सभी नेताओं को अपनी नीतियों और उन कारणों पर विचार करना चाहिए जिनके चलते जनता ने उन्हें इन वोटिंग मशीनों के माध्यम से नकार दिया है और अगर वे अब भी नहीं सुधरे तो उनके लिए भविष्य में बचे रह पाना भी संभव नहीं हो पायेगा. अपनी कमज़ोरियों का ठीकरा इन मशीनों पर फोड़ने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है क्योंकि इन्हीं मशीनों ने कभी लाल कृष्ण आडवाणी को उप प्रधानमंत्री तथा खुद मायावती को यूपी का मुख्यमंत्री भी बनवाया था. यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि सत्ता परिवर्तन इतनी शांति के साथ हो जाया करते हैं इसलिए लोकतंत्र की मूल भावना को समझना आवश्यक है और अपनी हताशा को व्यक्त करने के स्थान पर अपने अंदर कमियों को खोजने के बारे में सोचना चाहिए जिससे लोकतंत्र को और भी मज़बूत किया जा सके.          
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...