मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

कांग्रेस के यूपी में विकल्प

                                            यूपी में समय समय पर सपा बसपा के साथ चुनाव पूर्व या चुनाव बाद के तालमेल ने जहाँ पूरे राज्य में कांग्रेस को कमज़ोर किया वहीं उसके नेताओं की आरामतलबी के चलते भी राज्य में उसका वोटबैंक लगातार सिमटता चला गया. इस पूरे प्रकरण में यह माना जा रहा था कि राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यूपी से जुड़े कई बड़े परिवर्तन देखने को मिलेंगें पर अभी तक जिस तरह से पार्टी अपने पुराने ढर्रे पर चल रही है उसको देखते हुए कहीं से भी यह नहीं लगता है कि राज्य में उसकी नीतियों में कोई बड़ा परिवर्तन हुआ है. हो सकता है कि अपने दीर्घकालिक हितों को बचाने के लिए राहुल गाँधी भी यूपी की वर्तमान परिस्थिति में सपा बसपा के छोटे सहयोगी बनने को तैयार हो गए हों पर आने वाले समय में इसका सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद कम ही है. यदि कांग्रेस को भविष्य में अपने लिए केंद्र में मज़बूत भूमिका के साथ यूपी में जड़ें मज़बूत करनी हैं तो उसे अपने उस कोर वोट बैंक पर ध्यान देना होगा जो इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी उसके साथ मज़बूती से खड़ा है.
                                         यह सही है कि समय के साथ अपने को न ढाल पाने के कारण कांग्रेस ने अपनी चुनावी ज़मीन पूरे देश में क्षेत्रीय दलों के हाथों गंवाई है और आज भी उसे संभालने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किये जा रहे हैं जिसका सीधा असर उसकी चुनावी संभावनाओं पर पड़ना तय है. यूपी की राजनीति में अब कांग्रेस को अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि खुद के प्रयासों के बिना दुसरे दलों के साथ तालमेल करने से जहाँ पार्टी के अवसरवादी नेता दुसरे दलों में चले जाते हैं वहीं उसके लिए बरसों से बनी हुई ज़मीन खोने का दुष्प्रभाव भी वोट और सीटों में कमी के रूप में सामने आता है. सपा में नेतृत्व अखिलेश के हाथों में आने के बाद वहां से गंभीर बातों पर विचार शुरू हो चुका है पर मायावती के पास दलित वोटबैंक की जो पूँजी है उसके चलते वे कभी भी कहीं भी किसी को भी ठेंगा दिखाने से नहीं चूकती हैं. इस पूरे प्रकरण में अब कांग्रेस को सबसे पहले उन २२ लोकसभा क्षेत्रों में अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहाँ पर २००९ में उसके सांसद थे क्योंकि निश्चित तौर पर आज उसके पास इन क्षेत्रों में कुछ कार्यकर्ता अवश्य होंगें जिनके दम पर वहां वह मुख्य लड़ाई में आने की कोशिशें आसानी से कर सकती है. साथ ही राहुल गाँधी को भी कम से कम एक बार इन क्षेत्रों में प्रचार करना चाहिए जिससे वहां के पूर्व सांसद अपनी स्थिति को २०१९ के लिए मज़बूत कर सकें।
                                      निश्चित तौर पर संयुक्त विपक्ष को यह एहसास हो गया है कि मोदी का जादू निश्चित  कम हुआ है तभी अधिकांश दल अपनी क्षमता से कम सीटों पर भी चुनाव लड़ने के लिए हामी भरते नज़र आ रहे हैं क्योंकि यदि वे किसी भी तरह से एक बार भाजपा को १६०/७० तक सीमित करने में सफल हुए तो भाजपा खुद ही मोदी से उसी तरह पीछा छुड़ाती नज़र आने वाली है जैसे उसने अडवाणी से छुड़ाया है. इस खतरे को अमित शाह भी भांप रहे हैं क्योंकि मोदी के बिना राष्ट्रीय राजनीति में उनकी स्थिति भी समाप्त हो जाने वाली है. ऐसी स्थिति में कांग्रेस को २०१९ को अधिक महत्व न देते हुए भाजपा को कड़ी चुनौती देने के लिए सबसे पहले अपने घर को मज़बूत करना चाहिए क्योंकि कई बार उसके राष्ट्रीय स्वाभाविक विकल्प वाली स्थिति आने पर उसकी उपस्थिति  हर राज्य में दिखाई देनी चाहिए जिससे भाजपा से रूठा मतदाता अपने वोटों को क्षेत्रीय दलों को देने के स्थान पर लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में डालने के बारे में सोच सकता है. किसी भी क्षेत्रीय दल की राष्ट्रीय संभावनाओं पर कांग्रेस को कभी भी अपने को कमज़ोर नहीं करना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में मज़बूत विपक्ष ही राष्ट्र के लिए उचित होता है पर जब विपक्ष क्षेत्रीय दलों में बंटा हो तो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सत्ता पक्ष आसानी से मुद्दों को भटकाने में सफल हो जाता है जिससे उसकी कमज़ोरियों पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता है।

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गुरुवार, 5 जून 2014

यूपी - सुशासन और छोटे राज्य

                                           यूपी में बढे हुए अपराधों के चलते भाजपा और केंद्र सरकार एक बार फिर से २०११ में मायावती सरकार द्वारा भेजे गए राज्य विभाजन के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए तैयार हो सकते हैं जिससे आने वाले समय एमन यूपी में एक नयी तरह की राजनीति सामने आ सकती है. आज जिस तरह से यूपी को हर बात में मीडिया द्वारा बहुत ही अजी तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है वह केवल राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एक मार्ग हो सकता है पर उसके माध्यम से जनता को किसी भी तरह से राहत नहीं दी जा सकती है. राज्य के विभाजन के स्थान यदि देश के बेहतर विकास के लिए छोटे राज्यों का कोई पैमाना बने जाए उससे अच्छा यही होगा कि देश में सभी राज्यों के विकास और संसाधनों की स्थिति को देखते हुए दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना की जाए जो पूरे देश में राजनैतिक और प्रशासनिक पहलुओं पर विचार करते हुए आगे बढ़ने के बारे में सोचना शुरू कर सके. वैसे लोकसभा चुनावों में प्रदेश में भाजपा के प्रदर्शन को देखते हुए अगली बार यूपी की सत्ता तक पहुँचने की आशा भी भाजपा को दिखने लगी है तो संभवतः वह इस दिशा में अभी कोई कदम न उठाना चाहे.
                                           छोटे राज्यों से जहाँ विकास की गति को बढ़ाने में सहायता मिलने वाली है वहीं संसाधनों के मुद्दे पर नए बनने वाले कई राज्य काफी पिछड़ जाने वाले भी हैं क्योंकि यूपी या देश के अन्य हिस्सों में अभी तक जिस तरह से विकास को किया गया है उससे पूरे राज्य या देश की स्थिति में कोई आमूल चूल परिवर्तन नहीं आ पाया है तो उस स्थिति में अब केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी अड़चन इसी बात को लेकर आने वाली है कि राजनैतिक लाभ के लिए विभाजन का समर्थन किया जाये या फिर बेहतर प्रशासन को आधार मानकर इस दिशा में आगे बढ़ा जाये ? यूपी से जिस तरह से भाजपा को इस बार केंद्र में स्पष्ट बहुमत लायक निर्णायक बढ़त मिली है उसके बाद भाजपा तो काम से काम इस विचार को तेज़ी से आगे बढ़ाना नहीं चाहेगी क्योंकि इससे उसकी एक जैसे प्रदर्शन पर असर पड़ने की संभावनाएं भी बन सकती हैं. हाँ यदि २०१७ के यूपी विधान सभा चुनावों में उसे आशातीत सफलता नहीं मिली तो वह यूपी के बंटवारे पर गंभीरता से सोचना शुरू कर सकती है.
                                          छोटे राज्य राष्ट्रीय पार्टियों के लिए कोई बहुत बड़े अवसर के रूप में सामने आये हों ऐसा भी नहीं क्योंकि जहाँ पर क्षेत्रीय दलों का प्रभाव था वहां आज भी राष्ट्रीय दल संघर्षरत ही दिखाई देते हैं और इससे सबसे बड़ा नुक्सान यही होता है कि क्षेत्रीय सोच राष्ट्रीय परिदृश्य को देखने लायक दृष्टि पर पर्दा डाल दिया करती है. अच्छा हो कि देश में राजनैतिक और प्रशासनिक सुधारों को तेज़ी से लागू किया जाये और आने वाले समय के लिए कुछ ऐसा भी किया जाये कि जनता को यह लगे कि सरकारें उनके लिए ही बनायीं जाती हैं. आर्थिक रूप से असमान बंटवारे वाले छोटे राज्य पूरे देश की अर्थ व्यवस्था पर ही कुप्रभाव डालने वाले हैं और किसी भी तरह के राजनैतिक रूप से अस्थिर माहौल में छोटे राज्यों में भारी भरकम मंत्रिमंडल भी दिखाई दे सकते हैं जो पूरी तरह से देश और राज्य के संसाधनों पर डाके के समान ही होते हैं. अतीत में राजनैतिक अस्थिरता का खामियाज़ा बड़े राज्य यूपी और छोटे राज्य झारखण्ड ने झेला भी है. अब समय आ गया है कि राजनैतिक रूप से अलग हटकर पूरे देश के बेहतर प्रशासनिक और राजनैतिक नियंत्रण के लिए सोचना शुरू किया जाये.
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सोमवार, 2 जून 2014

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना

                                                          भारतीय राजनीति में नए राज्य तेलंगाना के उदय के साथ वहां के लोगों की अलग राज्य के रूप में अपने अस्तित्व को बनाये रखने की वो लड़ाई समाप्त हो जाएगी जो पचास के दशक में तेलंगाना के आंध्र प्रदेश में सम्मिलित किये जाने के साथ शुरू हुई थी. देश में जिस तरह से नए राज्यों का निर्माण किया जाता है आज तक उस प्रक्रिया का कोई ठोस स्वरुप सामने नहीं आ पाया है जिस कारण से भी अभी तक नए बने राज्यों ने उतना अच्छा काम करने में सफलता नहीं पायी है जितनी उन्होंने आशा की थी फिर भी राजनैतिक रूप से स्थिर राज्यों का प्रदर्शन अस्थिर राज्यों की तुलना में अभी तक बेहतर ही बना हुआ है जिससे यह भी पता चलता है की यदि राजनैतिक इच्छा शक्ति हो तो राज्य की भौगोलिक सीमाओं से उस पर कोई अंतर नहीं पड़ा करता है और वे प्रगति के नए मानदंड स्थापित करने में सफल हो सकते हैं.
                                               एक तरफ राज्य के बंटवारे के साथ ही तेलंगाना को वह सब मिल चुका है जो उसे विकास के नाम पर चाहिए था पर साथ ही अभी भी उसके सामने बड़ी चुनौतियाँ घटने का नाम नहीं लेने वाली हैं क्योंकि एक विकसित राज्य की आर्थिक वृद्धि दर को बनाये रखना बहुत बड़ी चुनौती के रूप में नयी चंद्रशेखर राव सरकार के सामने आने वाली है. राज्य की मांग करना एक मुद्दा हो सकता है पर सफलता पूर्वक सरकार को चलाये रखने के लिए जिस मज़बूती की ज़रुरत होती है अब राव में यही खोजी जाएगी और यदि वे कहीं से भी कुछ कमज़ोर पड़ते हुए दिखाई दिए तो आने वाले समय में जनता उनसे पूरा हिसाब भी मांगने वाली है. दूसरी तरफ आंध्र प्रदेश के हिस्से में बहुत कुछ तो नहीं आने वाला है पर उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रहने वाली है कि उसे इस नयी चुनौती का सामना करने के लिए चन्द्र बाबू नायडू जैसा अनुभवी नेता सीएम के रूप में मिला है जिसके पास विकास की दृष्टि के साथ काम करने की इच्छा शक्ति भी है.
                                              तेलंगाना के ओडिशा से लगते सीमान्त चार जिलों में नक्सलियों का प्रभाव बना हुआ है और तटीय क्षेत्र होने के कारण उसे समुद्री लाभ मिलने के साथ ही समुद्र के कारण आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में भी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा. देश की पूर्वी एशियाई देशों के साथ बढ़ती हुई आर्थिक गतिविधियों के बीच आंध्र प्रदेश अपने बंदरगाहों को आयात-निर्यात के एक बड़े केंद्र के रूप भी विकसित कर सकता है यदि उसको नए राज्य के रूप में मिलने वाली सहायता और रियायतों का सही तरह से उपयोग किया जा सके. आज नए बनने वाले किसी भी राज्य के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिजली, पानी और सड़क से जुड़ी हुई होती है और यदि आंध्र और तेलंगाना ने इस दिशा में सहयोग के साथ आगे बढ़ने का क्रम बनाने में सफलता पा ली तो आने वाले समय में ये दोनों राज्य एक दूसरे के साथ मिलकर विकास की नयी गाथा भी लिख सकते हैं. कानून व्यवस्था के साथ विकास के मोर्चे पर आशा की जानी चाहिए कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना अपने उद्देश्यों को पूरा कर पाने में सफल हो सकेंगें.

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मंगलवार, 30 जुलाई 2013

तेलंगाना और सियासत

                         देश में बड़े राज्यों के प्रशासनिक कारणों से बंटवारे की मांग लगातार ही वहां के निवासियों और नेताओं द्वारा की जाती रही है पर जिस तरह से इन मसलों से निपटने की इच्छा शक्ति हमारे देश के राजनैतिक दलों और नेताओं को दिखानी चाहिए वह हमेशा से ही नदारत रहा करती है जिससे किसी का भी भला नहीं हो पाता है क्योंकि छोटे राज्य किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकते हैं हाँ यदि संसाधनों के बेहतर प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए तो बड़े राज्यों में भी तेज़ी से विकास की धारा को आगे बढ़ाया जा सकता है. छोटे राज्यों के नाम पर बनाये गए उत्तरांचल और झारखण्ड का समस्याओं ने जिस तरह साथ नहीं छोड़ा उसके लिए वहां पर राज करने वाले दलों और नेताओं को ही दोषी ठहराया जाना चाहिए न कि राज्यों के भौगोलिक ढांचे को क्योंकि जिस बिहार में कभी विकास एक सपना हुआ करता था उसने भी पिछले कुछ समय में अपने आप विकास की तेज़ गति को हासिल करने की दिशा में प्रयास कर सफलता पाई है. विकास को जब केवल राजनैतिक वायदों और महत्वाकांक्षाओं के साथ ही देखा जाता है तो समस्याएं कम होने के स्थान पर बढ़ ही जाती हैं.
                       आज़ादी के समय जिस तरह से देश के पास संसाधनों के साथ हर तर के विकास को करने के लिए धन की बेहद कमी होती थी तब प्रशासनिक खर्चों को नियंत्रित रखने के लिए बड़े राज्यों को ही प्राथमिकता दी गई थी पर आज जब देश ने विकास के नए आयाम पाने की तरफ छलांग लगा दी है और हमारे पास इस विकास के मद में खर्च करने के लिए आवश्यक धन भी उपलब्ध है तो पूरे देश में प्रशासनिक आवश्यकतों और बेहतर पहुँच के साथ राज्यों के एक बार से पुनर्गठन की बहुत बड़ी आवश्यकता है क्योंकि आज भी देश के कई राज्यों में बहने वाली बाद नदियों पर पुल आदि न होने के कारण उन स्थानों तक सरकारों की पहुँच ही नहीं हो पाती जहाँ पर उसे आसानी से अपनी उपस्थिति दर्ज करने की आवश्यकता है ? जब इस तरह से सरकारों द्वारा किसी क्षेत्र की अवहेलना की जाती है तो वहां पर असंतोष पनपने लगता है जिसका लम्बे समय तक कोई हल नहीं निकल पाता है और राज्य के विकास पर भी उसका दुष्प्रभाव पड़ने लगता है.
                       वर्तमान में कांग्रेस जिस तरह से तेलंगाना के साथ दो अन्य जिलों को भी जोड़कर आंध्र का दो बराबर हिस्सों में विभाजन चाहती है उसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि यदि इन दो जिलों को केवल क्षेत्र के स्थान पर प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने के लिए तेलंगाना में शामिल किया जा रहा है तो उससे प्रदेश का बराबर से बंटवारा भी हो जायेगा और कुछ हद तक संसाधनों के बंटवारे पर भी परिस्थितियां अनुकूल की जा सकेंगीं. जब राजग का कार्यकाल में तीन अन्य राज्यों को बनाया गया था तो यदि उस समय भी क्षेत्रवाद के स्थान पर यूपी, एमपी और बिहार का बराबर से विभाजन किया जाता तो तब इन अस्तित्व में आए नए छह राज्यों के पास विकास के बेहतर विकल्प भी होते. आज देश की आवश्यकता केवल राज्यों के विभाजन के स्थान पर राज्यों में प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाने के अनुसार विभाजन करने कि होनी चाहिए और उसके लिए एक राज्य पुनर्गठन आयोग के बारे में विचार किया जाना चाहिए और उसे अगले ५ वर्ष दिए जाने चाहिए जिससे वो पूरे देश का दौर कर राज्यों में उनके भौगोलिक स्वरुप के कारण आने वाली समस्याओं से निपटने के बारे में विचार कर अपनी राय दे सके पर राजनीति की रोटियां पकाने में लगे हमारे नेता इस बारे में कुछ भी सोचने के स्थान पर केवल उनका तात्कालिक हल निकालने पर ही सोच पाते हैं. 
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मंगलवार, 17 जुलाई 2012

कोर्ट में अमरनाथ यात्रा

      सुप्रीम कोर्ट के जजों ने वार्षिक अमरनाथ यात्रा में इस वर्ष १३ जुलाई तक ७४ श्रद्धालुओं के विभिन्न कारणों से मरने के मामले को स्वतः संज्ञान में लेते हुए केंद्र और जम्मू कश्मीर सरकार को नोटिस देकर एक हफ्ते में उनसे जवाब माँगा है. यह सही है कि इस वर्ष जितनी बड़ी संख्या में श्रद्धालु मरे है वह संख्या बहुत अधिक है पर इस मसले पर अभी तक केंद्र या राज्य सरकार ने भी अपनी तरफ से कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया था. संभवतः ऐसा मौसम के कारण ही हो रहा हो पर जिस तरह से इन मौतों पर सरकारी चुप्पी छाई हुई थी अब कोर्ट ने उसे तोड़ने का और ज़िम्मेदार लोगों से जवाब तलब करके जनता के मन की बात ही रख ली है. यह वार्षिक यात्रा कुछ वर्षों पूर्व तक केवल कुछ हज़ार यात्रियों तक ही सिमटी रहती थी पर जिस तरह से यातायात के संसाधनों से आसानी हुई और आतंकियों के इस यात्रा पर हुए कुछ हमलों के बाद देश में इस यात्रा के बारे में और लोगों को पता चला तो उसके बाद से हर वर्ष पूरे देश से श्रद्धालुओं की संख्या में निरंतर वृद्धि ही होती जा रही है. पूरी यात्रा को पहले जिस स्तर पर चलाया जाता था आज भी वही तरीक़ा इसके लिए अपनाया जा रहा है जबकि संसाधनों के हिसाब से अब इसमें भी भारी वृद्धि की आवश्यकता है.
          जम्मू और कश्मीर के लिए यह यात्रा आर्थिक और सामजिक संतुलन बनाये रखने का काम करती है क्योंकि घाटी और राज्य के अन्य स्थानों के लोग वर्ष भर इस यात्रा का इंतज़ार करते हैं जिससे उनको वर्ष भर के लिए कुछ आमदनी हो जाती है और उनकी आर्थिक दशा सुधरती है फिर भी आज तक इस यात्रा के मार्ग और मार्ग में दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में कोई गुणात्मक सुधार सरकारी स्तर पर नहीं दिखाई देता है जिससे इस यात्रा में ढेरों कमियां सामने आने लगती हैं. इस यात्रा पर आने वाले यात्री श्रीनगर और अन्य मनोरम स्थलों को देखने का मोह छोड़ नहीं पाते हैं जिससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिलता है. पूरे हालात देखकर यह नहीं लगता है कि यह स्थिति उसी राज्य में है जहाँ के माता वैष्णो देवी स्थापन बोर्ड ने यात्रियों को सुविधाएँ देने में कोई कमी नहीं छोड़ी हुई है. कुछ तो ऐसा अवश्य है कि जिससे सरकार को इस यात्रा के बारे में अधिक करने की ज़रुरत ही महसूस नहीं होती है जबकि घाटी में विपरीत मौसम के कारण पूरे वर्ष भर काम की कमी रहती है फिर भी इस यात्रा से जो भी आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है उस पर भी सरकार का ध्यान नहीं रहता है.
          अब इस बारे में सरकार का क्या रूख रहता है यह तो पता चलेगा ही पर सरकारों के पास केवल बहाने बाज़ी के स्थान पर कुछ भी करने के लिए नहीं होता है. जो लोग इस यात्रा पर जाते हैं उन्हें किसी भी समय विपरीत मौसम को भी झेलना पड़ता है जिससे बचने के लिए रास्ते में कोई व्यवस्था नहीं होती है. बालटाल और पहलगाम के रास्ते में जितनी व्यवस्था श्रद्धालुओं के विभिन्न संगठनों द्वारा की जाती है उसके मुकाबले सरकारी व्यवस्था कहीं भी नहीं टिकती है. अच्छा हो कि इस मसले पर राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारियों को इस यात्रा और राज्य के उन निवासियों के प्रति समझे जिससे इस यात्रा को सुगम बनाया जा सके और श्रद्धालुओं के इस तरह सुविधाओं की कमी के कारण मरने की संख्या को भी कम किया जा सके. राज्य सरकार को इसे अपने दोहरे कर्तव्य को निभाना चाहिए क्योंकि इन यात्रियों से पूरे राज्य और खासकर कश्मीर घाटी की देश भर के धार्मिक पर्यटकों से जो आमदनी होती है वह वहां की बेरोज़गारी की समस्या को काफ़ी हद तक कम करने का काम कर सकती है. अब यह सरकार पर है कि उसे कौन सा मार्ग पसंद आता है.        
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रविवार, 15 जुलाई 2012

मनरेगा और पीएम

          महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण गारंटी योजना ( मनरेगा ) के संकलन और समीक्षा पर बोलते हुए पीएम मनमोहन सिंह ने जिस तरह से इस योजना की ख़ामियों के बारे में अपनी राय खुले शब्दों में दी और योजना आयोग को इससे जुडी सभी समस्याओं पर विचार कर इन्हें दूर करने की कोशिश करने के निर्देश दिए उससे यही लगता है कि सरकार अपनी इस महत्वपूर्ण योजना के बारे में बहुत गंभीरता से सोचती है. यह सही है कि मनरेगा विश्व की सबसे बड़ी कल्याणकारी योजना है जिसमें वास्तव में ज़रुरत मंदों तक धन पहुँचाने में सरकार को इतनी आसानी हुई है. मनरेगा के सामजिक प्रभाव को नकार नहीं जा सकता है फिर भी आज इसमें जिस स्तर पर भ्रष्टाचार फैला हुआ है उसे कम करने से ज़मीनी हक़ीक़त में वास्तव में बहुत बड़ा बदलाव किया जा सकता है. इस योजना के क्रियान्वयन के लिए देश को जिस ढांचे की आवश्यकता थी वह हमारे पास था ही नहीं और जिन प्रयासों से इस व्यवस्था को आगे ईमानदारी से बढ़ाया जा सकता था वह भी पूरी तरह से अपनाया नहीं जा सका जिससे इसमें बहुत सारी कमियां दिखाई देने लगी हैं.
        सबसे पहले इस पूरे मसले को सामाजिक परिवर्तन की दृष्टि से देखने की ज़रुरत है क्योंकि जब तक किसी भी योजना को संचालित करने में उसके मानवीय पहलू को नज़रंदाज़ किया जाता रहेगा तब तक वह अपने असली स्वरुप को किसी भी तरह से नहीं पा सकती है ? इस योजना के लिए मूलभूत आवश्यकता लाभार्थियों के सही चयन और उनके बैंकों में खाते खुलवाने की सुविधा सबसे पहले होनी चाहिए क्योंकि जब तक इसका लाभ सीधे लाभार्थी के खाते में नहीं पहुंचेगा तब तक किसी भी तरह से बिचौलियों का वर्चस्व ख़त्म नहीं किया जा सकेगा और इन बिचौलियों के रहते यह योजना केवल कुछ अंश के रूप में ही लाभार्थियों तक पहुँच पाती है. इस मामले में योजना आयोग को इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि जब यह धन उसके माध्यम से सरकार मुहैया करा रही है और सरकारी क्षेत्र के बैंकों पर काम का बहुत दबाव है जिससे वे अपनी रोज़मर्रा की बैंकिंग भी नहीं कर पा रहे हैं तो उस स्थिति में सरकार या योजना आयोग किस तरह से इस धन को लाभार्थियों तक पहुंचा सकता है ? सरकार अगर चाहे तो असेवित क्षेत्रों में योजना आयोग और रिज़र्व बैंक की सहायता से निजी /क्षेत्रीय/ सहकारी या ग्रामीण बैंकों की सहायता मोबाइल एटीएम की व्यवस्था कर सकती है जो समय समय पर विभिन्न स्थानों पर जाकर जॉब कार्ड धारकों को धन उपलब्ध कराने का काम कर सकें या हर ग्राम सभा में एक सोलर चालित एटीएम लगाने की व्यवस्था की जा सकती है. जितने बड़े स्तर पर धन का दुरूपयोग हो रहा है उसे एक बार इस तरह के बुनियादी ढांचे पर खर्च करके काफी हद तक बचाया जा सकता है.
         योजना में कोई कमी नहीं है पर जिस तरह से योजना और देश का आकार है उसे देखते हुए भ्रष्टाचारियों के लिए इसमें धन की हेरा फेरी करना बहुत आसान हो जाता है क्योंकि कभी कोई सरकार तो कभी कोई अधिकारी ही इसमें से धन निकलने के नए नए जुगाड़ तलाश लेते हैं जिससे सही लाभार्थियों तक इसका लाभ नहीं पहुँच पाता है. अब ख़ुद पीएम और केंद्र सरकार अगर इस बारे में कोई ठोस प्रयास करने के बारे में सोच रहे है तो इससे आने वाले समय में स्थितियों में बड़ा परिवर्तन भी आ सकता है. जिस तरह से ख़ुद पीएम ने पूरे मसले की समीक्षा की है उससे यही लगता है कि अब उन्होंने ख़ुद ही सरकार के कामकाज को जनता के सामने रखने का मन बना लिया है. राजनैतिक परिस्थितयां चाहे कुछ भी हों पर एक बात पर सभी दलों को एक हो जाना चाहिए कि आम जनता और विकास से जुड़े मुद्दों पर पहले से गहन विचार विमर्श कर लिया जाये और उसमें किसी भी तरह की राजनीति को न लाया जाए क्योंकि आम लोगों को भरोसे के साथ अपना हक़ चाहिए और उसमें भी हम कहीं न कहीं से अपने क्षुद्र स्वार्थों को लेकर लड़ाई लड़ने लगते है जिसका असर पूरे देश पर पड़ता है और विकास की इस दौड़ में हम कहीं न कहीं बहुत पीछे भी रह जाते हैं.         
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गुरुवार, 5 जुलाई 2012

मेट्रो और शहरी यातायात

            देश में तेज़ी से बढ़ती आबादी के साथ ही बड़े शहरों में यातायात के संसाधनों का लगातार कम होने से जहाँ इन शहरों में समस्याएं बढ़ती जा रही हैं वहीं राज्य सरकारें इस परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए  लगातार केंद्र सरकार की तरफ़ आशा भरी नज़रों से देख रही हैं. इसी क्रम में अब केंद्र सरकार ने इस बात के लिए राज्य सरकारों आग्रह किया है कि अगर उन्हें अपने यहाँ के बड़े शहरों में मेट्रो सेवा चाहिए तो उन्हें राज्य स्तर पर मेट्रो कम्पनी की स्थापना करनी चाहिए जिससे वे अपनी ज़रुरत के अनुसार उसका विकास कर सकें. हर राज्य द्वारा मेट्रो परियोजनाओं के लिए दिल्ली मेट्रो की तरफ देखने से उसका काम भी प्रभावित हो जायेगा और बहुत अधिक बोझ के कारण दिल्ली मेट्रो की कार्य क्षमता पर भी असर पड़ने लगेगा. हरियाणा का उदाहरण इसी संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है जिसने अपने यहाँ मेट्रो कम्पनी बनकर इस क्षेत्र में काम करना शुरू कर दिया है और वहां पर मेट्रो का निर्माण भी शुरू हो चुका है. यह सही है कि जिस तरह से राज्यों को इस क्षेत्र के लिए संसाधनों की आवश्यकता है वह उनके पास उपलब्ध नहीं है ऐसे में केंद्र सरकार अपने शहरी विकास कार्यक्रम के तहत बड़े शहरों में यातायात की सुविधा बढ़ाने के लिए अपनी तरफ से मदद भी कर सकती है.
         राज्यों को अब इस मामले में अपने यहाँ स्थिति या फिर देश के बड़े उद्योगपतियों से भी संसाधनों को जुटाने के बारे में विचार करना चाहिए जिससे उसके पास इस तरह की परियोजनाओं के लिए धन की कमी भी न रहे या फिर इस तरह की परियोजनाओं को निजी क्षेत्र की भागीदारी के साथ चलाने पर भी विचार किया जाना चाहिए. अभी तक जो कुछ भी होता है उसमें राजनीति ही हावी रहा करती है और इस तरह की बड़ी परियोजनाओं को चलाने में जिस तरह की दृढ़ इच्छा शक्ति राज्यों के नेतृत्व में होनी चाहिए वह कहीं से भी दिखाई नहीं देती है. राज्यों में चाहे किसी भी दल की सरकार क्यों न हो पर आज तक देश में भविष्य की वास्तविक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कहीं भी योजनाओं को नहीं बनाया जाता है जिस कारण से भी हर नयी सरकार अपने अनुसार कुछ भी करना शुरू कर देती है जबकि किसी भी राज्य या शहर की मूल भूत समस्याएं हमेशा ही एक जैसी रहा करती हैं और उन पर किसी भी दल की सरकार के आने या जाने से कोई अंतर नहीं पड़ता है फिर भी आज हमारे पास उस सोच और दृष्टि की कमी बनी हुई है जो हमारे शहरों को विकास के मार्ग पर आगे बढ़ा सकती है.
          सबसे पहले केंद्र सरकार को बड़े शहरों के विकास के बारे में एक योजना तैयार करनी चाहिए और उसमें राज्यों की पूरी भागीदारी भी होने चाहिए क्योंकि जो योजना गाज़ियाबाद में काम कर सकती है हो सकता है कि हैदराबाद में उसकी ज़रुरत ही नहीं हो फिर केंद्र द्वारा शहरों को सुधारने के लिए एक ही तर्ज़ पर कैसे काम कर सकती है ? राज्यों से उनकी ज़रूरतों के हिसाब से अगले ३० वर्षों के लिए योजनों पर विचार करने के लिए प्रस्ताव आमंत्रित किये जाने चाहिए और फिर उन अपर विशेषज्ञ समिति अपनी राय बताये और साथ ही उस पर अमल करने में कितना खर्च होने वाला है और से कहाँ से जुटाया जायेगा इस बारे में भी पहले से ही तय कर लिया जाये. इस तरह के कामों को दिल्ली मेट्रो की तर्ज़ पर एक समय सीमा में करने को एक आवश्यकता के रूप में लिए जाये जिससे विभिन्न राज्यों की एजेंसियों द्वारा कभी किसी परिस्थिति में सहयोग न किये जाने पर भी इसे पूरा करने की तरफ आसानी से बढ़ा जा सके ? केंद्र अगर कोई योजना अपनी तरफ से भेजती है तो कम जवाबदेही होने के कारण अब राज्यों के अधिकारी उनमें कम दिलचस्पी लेते हैं जिससे इस तरह की योजनाओं का पूरी तरह से सफल हो पाना ही संदिग्ध हो जाता है. जब आज भारत एक वैश्विक ताक़त बन रहा है तो क्या हम इस तरह से अनियंत्रित तरीके से आगे बढ़ पाने में सफल हो सकेंगें ? नहीं क्योंकि जब तक हम अपनी पूरी क्षमता से पूरे देश में उपलब्ध संसाधनों का सही दिशा में उपयोग करना नहीं सीख पायेंगें तब तक हमारे कुछ बड़े शहर ही इस तरह से विकास की दौड़ में इंडिया बनकर आगे चले जाएंगे और बाकी के पिछड़े भारत के रूप में कहीं बहुत पीछे ही छूट जायेंगें.    
      
  
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शुक्रवार, 1 जून 2012

रेल दुर्घटनाएं

                            पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से एक बार फिर से रेल दुर्घटनाओं में वृद्धि होती जा रही है उससे यही लगता है की आज रेलवे में वास्तव में उन बातों पर पूरा ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है जिनके बिना सुरक्षित रेल परिचालन की कामना करना ही बेईमानी है ? ऐसा नहीं है की यह सब एक दिन में ही पैदा होने वाली समस्याएं हैं क्योंकि जब रेलवे को केवल एक पूर्वाग्रह से चलाया जा रहा है तो उसके कर्मचारियों से पूरी तरह से सही काम करने की आशा कैसे की जा सकती है. रेलवे जैसे व्यापक विस्तार वाले मंत्रालय को नरसिम्हा राव की सरकार के बाद से ऐसा पूर्णकालिक मंत्री मिला ही नहीं जो रेल को देश की अमानत समझे क्योंकि १९९६ के बाद से पता नहीं किस दबाव या समझौते के तहत रेलवे हमेशा क्षेत्रीय दलों के हाथों का खिलौना बनी हुई है जो की अपने घर के अन्दर तक रेल चलवाने से आगे कुछ सोच ही नहीं पाते हैं ? इस स्थिति में आख़िर इस मंत्रालय से इस बात की उम्मीदें कैसे लगायी जा सकती है की वह निष्पक्ष होकर अपना काम कर सकेगा ? क्या किसी राजनैतिक समझौते के तहत मिले रेल मंत्री के पद का दुरूपयोग इस तरह से रेलवे की सेहत बिगाड़ने के लिए किया जा सकता है ? क्या अब समय नहीं आ गया है की क्षेत्रीय रेलवे में राज्य सरकारों की भागीदारी भी बढ़ाई जाये और उनसे पहले बड़े शहरों में मेट्रो जैसी परियोजनाओं के सञ्चालन के समझौते किये जाएँ और आने वाले समय में रेलवे में अंशदान करने और लाभ में हिस्सा बंटाने की नीति लागू न कर दी जाये. हो सकता है की पूरे देश की स्थानीय राज्य सरकार की भागीदारी से रेलवे को वास्तविक स्थिति में लाभकारी और सामजिक दोनों स्तरों पर काम करने के अवसर मिल जाएँ ?
      संरक्षा और परिचालन से जुड़े मसलों में कितनी अनदेखी हो रही है इस बात का अंदाज़ा तब लगा जब हम्पी एक्सप्रेस दुर्घटना ग्रस्त हो गयी क्योंकि उस ट्रेन के ड्राईवर ने कई दिनों की लगातार ड्यूटी की हुई थी ? नईदिल्ली हावड़ा के मार्ग पर कानपुर सबसे व्यस्त माना जाता है और यहाँ के ड्राईवर किन हालातों में ड्यूटी कर रहे हैं इस बारे में कल ही एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक ने विस्तार से एक खबर छपी है जिससे वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा हो जाता है की जिन लोगों पर सैकड़ों लोगों को सुरक्षित गंतव्य तक पहुँचाने की ज़िम्मेदारी है वे उतना आराम भी नहीं कर पा रहे हैं जितना एक मनुष्य होने के नाते उन्हें मिलना ही चाहिए ? खुद रेलवे ने भी इस मामले में कुछ नियम बना रखे हैं पर आज उनकी खुलेआम अवहेलना हो रही है ? जब पूरे देश में व्यस्त मार्गों का यह हाल है तो आगे की बात खुद ही समझ में आ जाती है. दिल्ली हावड़ा का मार्ग वह मार्ग है जिस पर पिछले १६ वर्षों से रेल मंत्रियों का दबदबा रहा है फिर भी वे केवल अपने हितों के अलावा कुछ भी सोच नहीं सके हैं इसके लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जाये ? दिल्ली से बिहार और बंगाल को जाने वाली अधिकांश गाड़ियाँ कानपुर से होकर ही जाती हैं फिर भी इस मार्ग के बारे में उतना नहीं हो सका जितना हो जाना चाहिए था क्या इसके लिए पिछले रेल मंत्रियों से सवाल नहीं पूछे जाने चाहिए ?
      अब समय है की रेल को चलाने के लिए कम से कम ५ मंत्रियों की नियुक्ति की जाये क्योंकि जितने बड़े स्तर पर यहाँ पर फैसले करने होते हैं उनमें एक मंत्री के लिए इन सब बातों से न्याय कर पाने की उम्मीद ही करना बेईमानी है. रेल को किसी नेता के हठ के कारण इस स्थिति में नहीं पहुँचाया जा सकता है की वहां से किसी भी तरह से वापसी न की जा सके ? आज ये नेता हैं कल इनके हाथ में सत्ता नहीं होगी तब भी रेलवे को देश के लिए चलना ही होगा तब रेलवे की इस दुर्दशा के लिए किसी ज़िम्मेदार ठहराया जायेगा ? इस तरह के मंत्रालयों में बैठने वाले नेताओं के लिए उच्च आदर्शों का होना ज़रूरी है क्योंकि रेलवे को हर काम खुद ही करना होता जबकि अन्य मंत्रालयों में योजनाओं को लागू करवाने के लिए राज्य सरकारें भी आगे आकर काम करती हैं जबकि रेल के हर निर्णय केवल मंत्री स्तर से करवाने को आज भारतीय राजनीति में अपने प्रभाव को दिखाने का साधन बन चुका है. लालू और ममता जो गरीबों के हितैषी होने का दम भरते हैं क्या वे इस बात का जवाब दे पायेंगें की उनकी गलत नीतियों के कारण जो कुछ भी रेलवे का नुकसान हो गया है उससे लाखों रेलवे कर्मचारियों के परिवारों पर आने वाले समय में जो प्रभाव पड़ेगा उसकी भरपाई कौन करेगा ?    

 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 11 मई 2012

नारे और यथार्थ

     आख़िर में यूपी सरकार ने जिस तरह से वास्तविकता को स्वीकारते हुए बेरोज़गारी भत्ते देने में जिस तरह से कड़े मानदंड निर्धारित किये उससे यही लगता है कि आज भी हमारे नेता बोलने के समय कुछ भी कह दिया करते हैं और उन वादों को कभी भी वास्तविकता के धरातल पर नहीं तौला जाता है. आज जब अखिलेश के पास पूरा बहुमत है तो उनसे यह आशा करना ग़लत भी नहीं है कि वे भी आगे से किसी भी घोषणा के बारे में कुछ भी बोलने से पहले प्रदेश की सही स्थिति की जानकारी करने का प्रयास करेंगें. चुनाव के समय उन्होंने जो वादा किया था वह प्रदेश में बेरोज़गारी की स्थिति को देखते हुए किसी भी तरह से ग़लत नहीं कहा जा सकता है पर इस सरकारी घोषणा पर अमल करने के बाद जिस तरह से १५ से ६० वर्ष तक के लोगों ने रोज़गार दफ्तरों में लाइन लगा दीं उसका क्या औचित्य था ? सरकार अगर वास्तव में किसी की मदद करना चाहती है तो क्या हम नागरिकों का कोई कर्तव्य नहीं बनता है कि हम भी अपने हितों पर प्रदेश और देश के हितों से समझौता न करें ? जिन लोगों ने बेरोजगार होने के लिए पंजीकरण कराया है अगर उसकी सत्यता की जांच ही करवा दी जाये तो उन सभी लोगों के लिए जवाब देना मुश्किल हो जायेगा.
      इस तरह की योजनाओं को बनाते समय सबसे पहले इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि इसका वास्तविक लोगों तक लाभ कैसे पहुँचाया जाया क्योंकि जिस तरह से विभिन्न पार्टियों से जुड़े लोग हर सरकारी योजना में अपनी सरकार के चलते अनुचित लाभ उठाने को अपना हक़ मानते हैं उस स्थिति में और क्या किया जा सकता है ? दूसरों पर ऊँगली उठाने से पहले हम सभी को अपने गिरेबान में झांक कर देखने का प्रयास करना चहिये कि क्या हम इस तरह के किसी अनुचित लाभ की कोशिश में तो नहीं लगे हुए हैं ? इतने बड़े प्रदेश में किसी भी सरकार के लिए सब कुछ करना आसान नहीं है फिर भी यदि जनता चाहे तो अपने बीच से उन लोगों का चयन कर ही सकती है जिन्हें वास्तव में इसकी ज़रुरत है ? आख़िर हर काम के लिए हम नागरिक केवल सरकारों की तरफ़ ही क्यों ताकते रहते हैं हमारी किसी भी योजना के प्रति यह आसक्ति आख़िर प्रदेश के उन लोगों का कैसे भला कर पायेगी जिन्हें वास्तव में इसकी आवश्यकता है ? जनता के जागरूक होने का यह सही समय है क्योंकि अभी तक प्रदेश क्या देश में भी ऐसी कोई व्यवस्था लागू नहीं है जिसके द्वारा यह निर्धारित किया जा सके किसी अपात्र को किसी योजना का लाभ दिए जाने की स्थिति में किससे शिकायत की जाये और उस शिकायत को कैसे निपटाया जाया ?
       यदि सरकार चाहे तो अपनी पूरी मशीनरी को अच्छी तरह से जुटाकर पूरे प्रदेश में सही आंकड़े तो बना ही सकती है जिससे उसे यह पता चल सके कि प्रदेश की जनता की वास्तविक स्थिति क्या है और उसे किस तरह के प्रयासों से सुधारा जा सकता है ? अब आलोचनाएँ करने का समय नहीं बचा है सपा को जनता ने एक बार पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर दिया है तो सपा ने प्रदेश को युवा सीएम देकर सही काम किया है. अब समय है कि अखिलेश केवल लोकलुभावन नीतियों से बाहर आकर प्रदेश के लिए कुछ कठोर कदम उठाने का साहस भी दिखाएँ क्योंकि जनता को मुलायम और अखिलेश का अंतर दिखाई भी देना चाहिए बिना उसके जनता में सही सन्देश भेजने में अखिलेश को बहुत दिक्कत आएगी. यह बिलकुल सही समय है क्योंकि अभी सुधार करने के लिए अखिलेश के हर कदम के साथ जनता है और बेमतलब की राजनीति से बाहर आकर सरकार को ठोस काम करने चाहिए जिससे आने वाले समय में इसके असर भी दिखाई देने लगें और लोकसभा या विधान सभा आने पर सरकार के लिएइ लोक लुभावन घोषणा करने में दिक्कतें भी कम हों ? भत्ते देने में जिस दृढ़ता की ज़रुरत है अभी भी वह अखिलेश द्वारा नहीं दिखाई जा रही है सरकार के इस कदम से आने वाले समय में अखिलेश की मज़बूती और निर्णय लेने की क्षमता का सही आंकलन भी किया जा सकेगा और प्रदेश का भी कुछ भला हो जायेगा.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

राहुल भावी सीएम क्यों नहीं ?

          उत्तर प्रदेश में जिस तरह से लगातार कांग्रेस अपने खोये हुए जनाधार को वापस पाने की तरफ बढ़ती जा रही है उसे अब समीक्षक भी मानने लगे हैं अभी तक जो लोग राहुल को केवल पोस्टर बॉय के रूप में देख या दिखा रहे थे अब उन्हें यह पता चल रहा है कि जिन बातों को पिछले दो वर्षों में केवल हथकंडे के रूप में देखा जा रहा था आज वे वोट में बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं. ऐसी स्थिति में प्रदेश के लिए बहुत अच्छी खबर सामने आ सकती है कि आने वाले समय में बिहार की तरह यूपी भी जाति/ बिरादरी की इस बेडी को तोड़ फेंके ? पिछले दो चुनावों में जिस तरह से बिहार ने अपने आप को पूरी तरह से इस छोटी जकड़न दूर कर लिया है वह उल्लेखनीय है और अब समय है कि देश के विकास के साथ यूपी भी इस जकड़न से बाहर निकल आये. वर्तमान चुनाव में जिस तरह से अब राजनीतक समीक्षक भी राहुल को अधिक गंभीर नेता और विपक्षियों के लिए बड़ी चुनौती मानने लगे हैं वह कांग्रेस के लिए शुभ संकेत है. अब प्रदेश की जनता भी यह चाहती है कि देश में यूपी फिर से अपने पुराने गौरव को पा सके और आने वाले समय में प्रदेश की वही हैसियत लौट आये जो आज से २५ वर्ष पहले हुआ करती थी. 
       अभी तक कांग्रेस भी इस बात को नहीं समझ पायी है कि वह यूपी में कितने बड़े लाभ की स्थिति में है क्योंकि अब हर तरह के बंधनों से मुक्त होकर प्रदेश की जनता भी एक मज़बूत जनादेश के साथ आगे बढ़ने की आशा कर रही है पर शायद कांग्रेस अभी भी इस बात को भांप नहीं पा रही है. यह सही है कि केवल बसपा को छोड़कर किसी भी दल ने यह स्पष्ट नहीं किया है कि अगर उनके दल को बहुमत मिलता है तो मुख्यमंत्री कौन होगा ? ऐसे में जो लाभ मज़बूत नेता के रूप में किसी को पेश करके पाया जा सकता है वह सभी दल खोये दे रहे हैं. आज के समय में जब आम कांग्रेसी राहुल को केवल प्रधानमंत्री पद पर ही देखना चाहता है वह यह नहीं समझ पा रहा है कि यूपी में राहुल आख़िर किस तरह का रोल अदा करें ? राहुल के करने से जो कुछ भी होने वाला है वह हो रहा है और आने वाले समय में कांग्रेस को भी उन्हें बड़ी चुनौतियाँ लेने के लिए ख़ुद ही तैयार कर देना चाहिए जिस तरह से राहुल अपनी गंभीर शैली से विरोधियों के खेमे में हलचल मचाये दे रहे हैं उससे भी सभी को कुछ सीखना चाहिए. अभी तक जिसे विपक्षी दल राहुल की नौटंकी बताते थे आज वे उसको एक समझी हुई रणनीति का हिस्सा मानने लगे हैं. मायावती को शुरू से ही इस तरह की बातों का अंदेशा था तभी उन्होंने ख़ुद और पार्टी के स्तर पर राहुल पर हमले करना जारी रखा था. 
     आज जिस तरह से पूरे प्रदेश में राहुल की सभाओं में लोगों का समर्थन दिखाई दे रहा है अगर कांग्रेस को उसका पूरा लाभ उठाना है और राहुल की नेतृत्व क्षमता को परखने में दिलचस्पी है तो बिना देर किये अब कांग्रेस को उन्हें यूपी में बहुमत मिलने की स्थिति में सीएम के रूप में पेश कर ही देना चाहिए. जिन लोगों को यह डर सताता है कि पता नहीं राहुल कैसा कर पायें उन्हें अब यह सोचना ही होगा कि उन पर पूरा भरोसा करने का समय आ गया है और जैसा कि देश के लिए कुशल नेतृत्व की बात करने वाले लोगों में राहुल की भी गिनती होती है तो उन्हें इस समय यूपी की इस ज़िम्मेदारी को चुनौती पूर्वक स्वीकार करना ही चाहिए क्योंकि आज राहुल पार्टी के लिए वोट मांग रहे हैं और जनता भी जानती है कि कांग्रेस के बड़े दल के रूप में उभरने पर राहुल तो कम से कम सीएम नहीं बनने जा रहे हैं जो कि प्रदेश में कांग्रेस के ख़िलाफ़ जा सकता है. अब राहुल को आगे बढ़कर ख़ुद ही यह कहना चाहिए कि वे इस चुनौती के लिए तैयार हैं क्योंकि अगर वे जीत जाते हैं तो उन्हें आगे आने वाले समय में प्रधानमंत्री पद के राजनीति का अनुभव भी हो जायेगा और हार की स्थिति में उनके पास २०१४ के आम चुनाव और बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार करने की स्थिति भी होगी. राजनीति में इस तरह के क़दम बिना नफ़े नुकसान के देखे जाने चाहिए क्योंकि जब तक यह पूरा नहीं हो पायेगा तब तक देश में अच्छे नेतृत्व को विकसित करने में सफलता नहीं मिलेगी.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 16 नवंबर 2011

राज्य पुनर्गठन आयोग-1

     जिस तरह से मायावती ने उत्तर प्रदेश के बंटवारे पर विधान सभा के आखिरी सत्र में प्रस्ताव लाने की बात कही है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में इस तरह के मामलों में राजनैतिक गतिविधियाँ और भी बढ़ने वाली हैं क्योंकि जब यह प्रस्ताव राज्य विधान सभा द्वारा पारित करके केंद्र सरकार को भेजा जायेगा तो इसके बाद संसद ही इस मामले में कोई सही निर्णय लेने की हक़दार है. अभी तक जिस तरह से केवल राजनीतिक हितों के लिए ही छोटे राज्यों की मांग की जाती रही है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में इस पर और अधिक राजनीति गर्माने वाली है. इस मामले में अब सभी दलों की बैठक बुलाई जानी चाहिए जिससे देश में राज्यों के पुनर्गठन पर ध्यान दिया जाये क्योंकि इस तरह से बार बार राज्य बनाये जाने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है. राज्यों के गठन में हर पहलू का ध्यान रखा जाना चाहिए न कि केवल चंद राजनैतिक हितों के लिए इस तरह से मांगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.
     उत्तर प्रदेश विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव से वैसे भी कुछ बहुत बड़ा नहीं होने वाला है क्योंकि अगर प्रदेश को केवल दो हिस्सों में बांटने की पहल की गयी होती तो शायद यह आसानी से पूरी हो जाती पर अब जबकि इसमें चार राज्यों का प्रस्ताव किया जा रहा है जिसमें सबसे संवेदनशील बुंदेलखंड को भी अलग करने की मांग की गयी है उससे यही लगता है कि यह मामला तब तक और भी अधिक लटकता रहेगा जब तक बुंदेलखंड के मध्य प्रदेश के हिस्से को भी सम्पूर्ण बुंदेलखंड में शामिल नहीं किया जाता है. बुंदेलखंड इन दोनों प्रदेशों में फैला हुआ है जिस कारण से बुन्देली लोग एक अलग सम्पूर्ण बुंदेलखंड की मांग करने में काफी दिनों से लगे हुए हैं. अलग राज्य बनने से काफ़ी कुछ ठीक नहीं होगा बल्कि कई जगहों पर नेता केवल अपने स्वार्थ का ही ध्यान रखेंगें जैसा कि भाजपा ने उत्तराखंड में किया है. राज्य बने ११ वर्ष बीत चुके हैं पर वहां का कोई भी नेता नहीं चाहता कि उत्तराखंड को एक सम्पूर्ण पहाड़ी क्षेत्र में बनी हुई राजधानी मिले. आज भी देहरादून को काम चलाऊ राजधानी के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है ? क्यों ? नेताओं की दृष्टि में तो उत्तराखंड ने बहुमुखी तरक्की कर ली है तो एक इतनी तरक्की करने वाला प्रदेश अपने लिए एक अदद राजधानी भी बना पाने में सक्षम नहीं है क्या ? पहाड़ के नाम पर मांगे गए इस राज्य ने केवल मैदानी क्षेत्रों के दम पर ही पूरी तरक्की की है वर्ना पहाड़ों पर क्या विकास हुआ है यह सभी जानते हैं.
   आज इस तरह की सभी मांगों पर अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर विचार किये जाने की ज़रुरत है क्योंकि ऐसा तो नहीं हो सकता कि उत्तर प्रदेश के ४ टुकड़े कर दिए जाएँ और तेलंगाना वाले चुप बैठे रहें ? अब समय है कि केंद्र को सभी राज्यों को राज्य पुनर्गठन आयोग के बारे में सूचित करते हुए एक विशेषज्ञ समिति बनानी चाहिए जिसमें कोई भी नेता न हो और यह समिति केवल संसद को अपनी राय से अवगत कराये. देश में इस तरह के प्रशासनिक पुनर्गठन की बहुत आवश्यकता है क्योंकि अब पूरे देश में ऐसा किया जाना ही उचित होगा और इस मुद्दे पर सभी दलों को मिलकर एक राय बनानी होगी. अच्छे शासन से कुछ भी किया जा सकता है उसी बिहार में नितीश ने अपने दम पर सब कुछ कर दिखाया है जहाँ पर पहले कुछ भी नहीं होता था पर प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध झारखण्ड की आज क्या हालत है यह किसी से भी छिपी नहीं है. इससे यही पता चलता है कि नेता की क्षमता से विकास होता है न कि छोटे राज्यों से ? चुनाव के समय इस तरह के शगूफे छोड़ने से कुछ वोट तो मिल ही सकते हैं और अगर इतने सारे राज्य बन भी गए तो आने वाले समय में इनके संसाधनों के बारे में कैसे क्या होगा यह अभी भी भविष्य के गर्भ में छिपा है. ऐसी किसी भी मांग को करने से पहले प्रदेश को ४ प्रशासनिक इकाइयों में बाँट कर एक प्रभारी मंत्री या उप-मुख्यमंत्री बनाकर सुशासन को प्राथमिक देनी चाहिए.    
     

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...