मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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गुरुवार, 28 मई 2020

आपदा संकट में भ्रष्टाचार

                                                                      देश में बाढ़ सूखा जैसी नियमित और भूकंप जैसी आपदाओं के समय सदैव ही प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं जिससे संकट ग्रस्त जनता के मन में देश के सरकारी तंत्र के लिए घृणा का भाव ही उभरता है. ऐसा नहीं है कि पूरे देश में सदैव से ही भ्रष्टाचार का इतना बोलबाला रहा हो पर इसने जिस तरह से देश के राजनितिक तंत्र और नौकरशाही को अपने में जकड़ रखा है उसको देखते हुए किसी भी तरह के अप्रत्याशित सुधार की आशा नहीं की जा सकती है. इस तरह की आपदा में जिस बड़े स्तर पर लोग प्रभावित होते हैं और उसी स्तर पर केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न तरह की योजनाएं लाई जाती हैं इस भ्रष्ट तंत्र के लोग उनका हर परिस्थिति में लाभ उठाने से नहीं चूकते हैं. यह सही है कि आधार के बैंक खातों से जुड़ने के बाद जिस तरह से सहायता को सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने में सफलता मिल रही है वहीं आज भी भ्रष्टाचारियों के पास इसी व्यवस्था से अपने हिस्से को निकालने की नई नई तरकीबें सामने आ रही हैं.
                          देश के अधिकांश राज्यों में जिस तरह से सहायता में गड़बड़ी की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है. दूसरे राज्यों से आये हुए मजदूरों को आश्रय स्थल /क़्वारण्टीन सेंटर्स से घर भेजने के समय एक किट देने की व्यवस्था की गई है परन्तु उसकी लम्बी प्रक्रिया बनाकर उबाऊ कर दिया गया है जिससे अधिकांश लोग जिनमें कोई लक्षण नहीं होते सरकारी कागज़ों पर हस्ताक्षर करके अपने घरों को प्रस्थान कर जाते हैं और उनके लिए नियत किये गए किट आसानी से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं. इस तरफ किसी भी सरकार या अधिकारी का ध्यान नहीं जाता है जिससे अब यह खेल अधिकांश जगहों पर बड़े पैमाने पर खेला जाने लगा है और लाचार मजदूरों को उनके घर पहुँचने पर कुछ आवश्यक सामान के साथ भेजने की सरकारी मंशा की धज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं।
                           गुजरात से बिना मानकों को पूरा किये वेंटिलेटर्स की सप्लाई की बात भी सामने आयी पर उसमें कुछ भी कड़े कदम नहीं उठाये गए हैं इस समय यह समझने की आवश्यकता है कि इस तरह का संस्थागत भ्रष्टाचार अंत में किसी भी सरकार के लिए बड़ी समस्या ही बन सकता है तो उस पर नियंत्रण किया जाना चाहिए और जो भी लोग इसमें किसी भी स्तर पर शामिल मिलें उनके खिलाफ विशेष परिस्थितियों में रासुका लगाने की संस्तुति की जानी चाहिए जिससे आने वाले समय में ऐसी विषम परिस्थिति में लोग भ्रष्टाचार करने से पहले सौ बार सोचने को विवश किये जा सकें। जब देश के सामने इस स्तर संकट हो तो भ्रष्टाचारी को देशद्रोही से कम नहीं माना जा सकता है. हिमाचल प्रदेश में जिस तरह से पीपीई किट घोटाला सामने आया है उससे यही लगता है कि आज भी देश में ऐसे लोग मौजूद हैं जो हर परिस्थिति में भ्रष्टाचारी हो सकते हैं और उन्हें किसी के जीने मरने से कोई अंतर नहीं पड़ता है.  
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सोमवार, 25 मई 2020

कोरोना - केंद्र राज्य समन्वय

                                               मार्च से शुरू हुए लॉक डाउन के साथ ही देश में एक अलग तरह की उठापटक दिखाई दे रही है आज जब पूरे देश को मिलकर इस महामारी के सामने खड़े होने की आवश्यकता है तो देश के राजनैतिक दल और उनके शीर्ष नेता एक दुसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं. ऐसा नहीं है कि केंद्र ने इस बारे में नीतियां नहीं बनायी और राज्यों ने उन पर अमल नहीं किया पर केंद्र और राज्यों में सत्ता तथा विपक्ष से जनता ऐसे कठिन समय में जिस गंभीरता की आशा कर रही थी उसमें देश के सभी राजनैतिक दल और नेता पूरी तरह से फेल दिखायी दे रहे हैं. देश की जनता अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इन नेताओं के साथ अधिकारियों पर खर्च करती है उसके बाद भी कठिन समय में सबसे अधिक जनता को ही सहना पड़ता है.
                               पहले जोन निर्धारण को लेकर अव्यवहारिक तरीके से केंद्र का दखल रहा जिससे कई ऐसे जिले भी केवल एक मरीज होने के बाद भी ऐसे माना गया जैसे पूरे ज़िले में ही कोरोना फ़ैल गया हो इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह हुआ कि हमारे मेडिकल, पुलिस और अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े विभागों पर अनावश्यक रूप से दबाव बना जबकि उनको केवल कुछ स्थानों पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर अपने स्टाफ को लम्बे समय तक काम करने के लिए तैयार करने की आवश्यकता थी. आज इस क्षेत्र के सभी लोग कोरोना की लड़ाई में थके से लगते हैं जबकि देश में संक्रमण बढ़ने के साथ अब अधिक सतर्कता की आवश्यकता है. केंद्र राज्य में वार्तालाप शून्य होने के कारण आज देश के आर्थिक प्रगति में सबसे बड़ा योगदान देने वाला मजदूर सड़कों पर है और अभी भी उनको मिलने वाली सहायता उनकी संख्या के हिसाब से बहुत कम ही है.
                               लॉक डाउन जिस तरह से राज्यों को विश्वास में लिए बिना किया गया आज उसका खामियाज़ा पूरा देश भुगत रहा है. यदि मार्च में संक्रमण के स्तर के कम रहते ही मजदूरों और अन्य कामों से अपने घरों से बाहर निकले लोगों को वापस जाने के लिए कुछ समय दिया जाता तो आज राज्यों क्या जनपदों और तहसीलों तक संक्रमण रोकने की जो लड़ाई लड़ी जा रही है उससे लॉक डाउन में ही निपट लिया गया होता और संक्रमण को अच्छी तरह से रोकने में मजबूती से रोका भी जा सकता था. आज रेलवे की जो हालत है वह भी ख़राब समन्वय का ही नतीजा है और आज से शुरू होने वाली हवाई यात्रा को भी जिस तरह से एक नियम में नहीं बांधा जा सका है उससे इन यात्रियों के लिए समस्याएं और बढ़ने ही वाली हैं. आज के युग में भी समन्वय की इतनी कमी आखिर क्यों है क्या राज्य अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं या केंद्र सरकार खुद ही सब कुछ करने में विश्वास रखती है ? राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों के साथ सीधी बैठक कर क्या पीएम मोदी राज्यों की सत्ता को किनारे करने की कोशिशें नहीं कर रहे हैं ?अब समय है कि केंद्र को अपने स्तर से विश्वास बहाली के लिए काम शुरू करना चाहिए जिससे आपस में लड़ने के स्थान पर कोरोना से प्रभावी लड़ाई लड़ी जा सके.  
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शुक्रवार, 22 मई 2020

छिछली राजनीति

                                           कांग्रेस भाजपा के बीच शुरू हुए बस विवाद ने अब अगले चरण पर स्थान पा लिया लगता है क्योंकि देश में जो कुछ भी सामान्य प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं अभी तक उनको गोपनीय ही रखा जाता था पर यूपी रोडवेज की तरफ से राजस्थान को किये गए भुगतान को लेकर जिस तरह भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने एक ट्वीट किया तो उससे यही लगता है कि अब राज्यों के सामान्य प्रशासनिक कार्यों तक पार्टी के प्रवक्ताओं की पहुँच होने लगी है. यह भी हो सकता है कि यह पत्र गोपनीय न भी हो पर सामान्य पत्राचार का उपयोग इस तरह से एक दूसरे पर आरोप लगाने में किया जाने लगे तो देश की राजनीति का स्तर समझा जा सकता है. इस पत्र के सामने आने के बाद राजस्थान सरकार ने भी यूपी सरकार को पूरा बिल भेज दिया है और भुगतान करने की मांग भी की है जिससे मजदूरों की समस्याओं के स्थान पर इन नेताओं की लड़ाई का एक और रूप सामने आने वाला है.
                               किसी भी राज्य में ऐसी आपातकालीन परिस्थिति में स्थानीय प्रशासन से सहयोग के लिए देश का दूसरा राज्य अपने स्तर से पत्राचार करता है और उसमें बहुत सारी बातें भी होती हैं पर इस पत्र को प्रियंका गाँधी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किये जाने से किसको राजनैतिक लाभ होने वाला है ? संबित पात्रा ने कहीं पर उस पत्र का ज़िक्र नहीं किया है जो यूपी सरकार ने राजस्थान सरकार को इस सम्बन्ध में लिखा था उसमें संभवतः यूपी सरकार ने भुगतान किये जाने की बात की होगी जिसको ज्ञानी प्रवक्ता संबित द्वारा जानबूझकर छिपाया गया है ? राज्यों के सामान्य काम काज में किसी भी राजनैतिक दल का इस तरह का दखल सामान्य नहीं कहा जा सकता है और यह विचारणीय भी है. कई बार राज्य अपनी परिस्थितियों पर विचार कर एक बीच का रास्ता निकालने के लिए कई बार पत्राचार भी करते हैं पर क्या उसका राजनैतिक लाभ किसी भी दल द्वारा उठाया जाना चाहिए ?
                                 इस मामले में सभवतः जो धनराशि डीज़ल पर खर्च हुई होगी उसके बिल का भुगतान किया गया होगा जबकि राजस्थान सरकार का यह कहना है कि बसें कम पड़ने पर राजस्थान रोडवेज ने छात्रों को उनके गंतव्य तक पहुँचाया जिसका भुगतान अभी तक नहीं किया गया है ? जब ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाले केंद्र की सरकार मज़दूरों को उनके घरों तक रेल द्वारा निशुल्क नहीं भेज सकती तो हिली हुई आर्थिक परिस्थिति में राज्य सरकारों से किसी भी तरह की आर्थिक उदारता की उम्मीद आखिर कैसे की जा सकती है ? लंबी चौड़ी बातें करने वाले दल और नेता अपने यहाँ की परिस्थिति पर विचार नहीं करते हैं और किसी भी बात पर राजनीति शुरू कर देते हैं जिससे केवल जनता की परेशानियां ही बढ़ती हैं. अच्छा हो कि सभी राजनैतिक दल और उनकी सरकारें इस तरह के मामलों पर राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों से दूर ही रहें और जनता को सही तरह से सहायता करने हेतु नीतियों का क्रियान्वयन करने पर ध्यान दें.
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बुधवार, 20 मई 2020

बसों पर राजनीति

                                                          लॉक डाउन के चलते दिन में कई कई बार बदलते नियमों के कारण एक राज्य से दूसरे राज्य में अपने घर जाने वाले मजदूरों की स्थिति पर भी किस तरह की राजनीति की जा सकती है यह यूपी सरकार और कांग्रेस के बीच छिड़ी चिट्ठी वाली जंग से आसानी से समझा जा सकता है. बड़ी संख्या में मजदूरों के यूपी वापस आने और उनको लाने में तालमेल की कमी के साथ सीमित संसाधनों के चलते ये सभी प्रदेश की विभिन्न सीमाओं पर फंसे हुए हैं और लखनऊ से सरकार के स्पष्ट आदेश न होने के चलते यूपी पुलिस इन्हें बॉर्डर पर रोकने का काम कर रही है. इस परिस्थिति में कांग्रेस की तरफ से एक हज़ार बसें इन लोगों को उनके घरों तक पहुँचाने के लिए उपलब्ध कराने की बात कही गयी जिस पर यूपी सरकार ने दो दिनों में निर्णय लिया। कायदे से इस समय एक दूसरे पर आरोप लगाने के स्थान पर यूपी सरकार को कांग्रेस की तरफ से दी गयी इस पेशकश को स्वीकार कर श्रमिकों को राहत देनी चाहिए थी पर सरकार के शीर्ष स्तर से मिले निर्देशों के चलते इस मामले को सुर्खियां बना दिया गया है.
                                एक राजनैतिक दल होने के कारण यदि कांग्रेस सरकार की इस कमज़ोर स्थिति को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश में लगी दिख रही है तो उसे ऐसा करने का अधिकार भी है पर मज़बूत बहुमत वाली योगी सरकार ने कांग्रेस को लाभ मिलने की संभावनाओं को देखते हुए इसको अनावश्यक रूप से मीडिया में कवरेज देने के लिए खोल दिया। डिजिटल इंडिया के इस कथित युग में अगर इस आपदा के समय भी योगी सरकार एक आवश्यक पत्र पर दो दिनों तक निर्णय नहीं कर पाती है तो इसे क्या कहा जाये ? कांग्रेस केवल सरकार को ऐसे प्रस्ताव ही दे सकती है जिस पर श्रमिकों के हितों को देखते हुए निर्णय सरकार को ही लेना है. जिन बसों के कागज़ ठीक हैं उनको अनुमति देकर सरकार अपने काम को आसान कर सकती थी और साथ ही जिन बसों के नंबर आदि गलत और संदिग्ध होते उस पर जवाब माँगा जा सकता था पर सरकार ने खुद ही ऐसा काम शुरू कर दिया जिसकी सफाई देने में अब मुश्किल हो रही है.
                               लॉक डाउन को को देखते हुए केंद्र की तरफ से पहले ही सभी वाहनों की फिटनेस ३० जून तक बढ़ा दिया गया है हाँ बीमे पर किसी भी तरह की छूट नहीं दी जा रही है तो यूपी सरकार के कैबिनेट मंत्री द्वारा बसों की फिटनेस पर सवाल उठाना कितना तर्क संगत है ? यूपी सरकार के पास लगभग दस हज़ार बसों का बेड़ा है और ऐसे निर्देश जिलाधिकारियों को भी दिए जा चुके थे कि लोकसभा चुनावों के समय की दरों पर भुगतान कर निजी क्षेत्र की बसों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है। संकट की इस घडी में यदि कोई राजनैतिक दल किसी भी स्तर पर मदद करने के लिए सामने आ रहा है तो किसी भी दल की सरकार को अविलम्ब उसे स्वीकार कर लेना चाहिए जिससे लोगों की समस्याओं को कुछ कम किया जा सके. एक राष्ट्र की खोखली बातें करने वाला दल क्या दूसरे राज्यों से अपने गृह जनपद आने वाले लोगों की घर वापसी में भी इतना संवेदनहीन हो सकता है ? एक योगी के राज्य के मुखिया होने के बाद भी आमलोगों को इस तरह से मजबूर होना पड़ रहा है तो यह राज्य की विडंबना ही है. गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है "संत हृदय नवनीत समाना" पर यहाँ वैसा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है जिससे आम मजदूरों की समस्याओं को कम करने की कोशिशें पूरी नहीं हो पा रही हैं.    
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गुरुवार, 14 मई 2020

मजदूरों की घर वापसी का यथार्थ

                                         कोरोना संकट के चलते देश में मजदूरों को लेकर जिस तरह की अफरा तफरी दिखाई दे रही है क्या उससे कुछ बेहतर तरीके से निपटा जा सकता था आज यह सवाल हर किसी को अपने आप से ही पूछने की आवश्यकता है. देश की आज़ादी के बाद से पहली बार इतनी बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों में काम करने वाले मजदूर जिस तरह से देश के स्वर्णिम विकास की खोखली गाथा के साथ बनाये गए राष्ट्रीय राजमागों के हर हिस्से पर आत्मनिर्भरता दिखाते हुए अपने घरों की तरफ बढ़ते ही जा रहे हैं क्या उसे और अच्छी तरह से नहीं किया जा सकता था ? यहाँ सवाल केंद्र और राज्यों की सरकारों की आलोचनाओं का नहीं बल्कि उन गरीब लोगों का है जो सिर्फ बेहतर जीवन और खाने पीने लायक कमा लेने की जुगत में ही अपने घरों से सैकड़ों हज़ारों किमी दूर पहुँच गए थे. आखिर वे कौन से कारण थे जिनको केंद्र ने पूरी तरह अनदेखा किया और तीसरे लॉकडाउन के बाद इन मजदूरों ने अपने घरों की तरफ बिना कुछ विचारे ही कूच कर दिया ? विकसित देशों की कतार में खड़े होने का हमारा सपना किस तरह से चूर चूर होता दिखा आज इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है ?
                                         आज जब महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों में कोरोना ने अपना रूप दिखाना शुरू ही किया है तो उस परिस्थिति में इन प्रवासी मजदूरों को अनमने ढंग से कुछ रेलगाड़ियां चलाकर उनके राज्यों और सम्बंधित जिलों में भेजने की आधी अधूरी कोशिश की जा चुकी है वह भी अपने आप में बड़ा संकट बन सकती है. केंद्र सरकार ने इस मामले में बेहद हल्का रुख ही अपनाया क्योंकि यदि दो लॉक डाउन के बाद इन मजदूरों को घर भेजने की स्थिति सामने आ सकती थी तो इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने किस स्तर पर क्या प्रयास किये आज किसी को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. राज्यों में जिन जगहों पर ये मजदूर थे तो वे वहां पर किसी कम्पनी, ठेकेदार आदि के माध्यम से ही पहुंचे थे तो इन लोगों की शुरुवाती ४० दिनों में कोई सूची बनाने का कार्य भी आसानी से किया जा सकता था और सीमित संख्या में रेलगाड़ियां चलाकर इनको चरणबद्ध तरीके से इनके घरों तक भेजने की व्यवस्था आसानी से भी की जा सकती थी पर देश के निर्माण में लगे इन मजदूरों की गिनती आज कोई भी अपने लोगों में नहीं करना चाहता है जिससे इनके और भी दुर्दशा हो रही है.
                                           अब भी समय है कि सरकार देश के विभिन्न हिस्सों में खाली खड़ी रैक्स को बड़े शहरों के स्थान पर कुछ सौ किमी के दायरे में ही चलाकार इन के पैरों में पड़ने वाले छालों पर तरस खाये। क्या ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाला देश कुछ सौ करोड़ रूपये खर्च कर इन लोगों को आसानी से घरों तक सम्मानजनक रूप से भेजने की मूलभूत आवश्यकता को भी पूरा नहीं कर सकता ? यदि सरकार के पास आर्थिक तंगी है तो जनता इन ट्रेनों को चला सकती है केवल एक बार एक खाते का नंबर देने की आवश्यकता है और इन मजदूरों को घरों तक भेजने पर होने वाले खर्च के लिए आम लोग खुलकर मदद दे सकते हैं. भारत सरकार और रेल मंत्रालय को अविलम्ब यह उपाय करना चाहिए जिससे पूरे देश में गरीबों की इस मजबूरी और दुर्दशा को जल्दी से समाप्त किया जा सके.  
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सोमवार, 29 अप्रैल 2019

दिखावे की राजनीति

                                                        देश में जिस तरह से आम चुनावों या विधानसभाओं के चुनावों में विभिन्न दलों के प्रत्याशियों के पक्ष में सम्बंधित दलों के स्टार प्रचारकों की तरफ से रोड शो करने माहौल बनाये जाने का काम किया जाता है वह निश्चित रूप से उनका संवैधानिक अधिकार है पर पहले बड़े नेताओं की छुटपुट होने वाली बड़ी रैलियों के अलावा प्रत्याशी स्थानीय स्तर पर अपने प्रयासों से ही शांत वोटर्स को प्रभावित करने का काम किया करते थे. इधर कुछ चुनावों से रोड शो जैसा दिखावा सामने आने से इनकी चपेट में आने वाले क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन प्रभावित होने लगा है जिससे सभी राजनैतिक दलों के साथ चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन को भी इस बारे में विचार करने का समय आ गया है कि चुनाव के नाम पर आम नागरिकों को किसी भी तरह की अनावश्यक परेशानी का सामने न करना पड़े. इस बारे में केंद्रीय चुनाव आयोग को ही कुछ ठोस कदम उठाने के बारे में सोचना शुरू करना होगा क्योंकि अपने माहौल बनाने के भ्रम के चलते कोई भी राजनैतिक दल इसको रोकने की बात से सहमत नहीं होगा।
                            देश के उच्च सुरक्षा प्राप्त नेताओं के इस तरह से रोड शो करने से जहाँ सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ जाती है वहीं खुद इन बड़े नेताओं की सुरक्षा में गंभीर चूक हो जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है. इन नेताओं की चुनावी सभाओं में आम जनता का जो धन पानी की तरह बहाया जाता है वह संगठित रूप से किसी बड़े प्रोजेक्ट में डालकर उसकी गति बढ़ाने के काम भी आ सकता है पर देश के राजनैतिक दीवालियेपन के कारण इस दिशा में कोई सोचना भी नहीं चाहता है। यहाँ पर यह बात भी सामने आ सकती है कि देश के संविधान ने हर चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को अपने हिसाब से प्रचार करने की छूट दे रखी है पर साथ उसी संविधान ने देश के आम नागरिकों को भी अपनी स्वतंत्रता के साथ जीने की आज़ादी भी दे रखी है. नेताओं की इस तरह की दिखावे वाली राजनीति के चलते अब यह कौन तय करेगा कि यहाँ पर नेताओं और आम जनता के अधिकारों की रक्षा किस तरह से की जा सकती है?
                          इस बारे में सबसे सही यही रहेगा कि सभी दल मिलकर इस बारे में सोचें क्योंकि कई बार नेताओं के इस तरह से प्रचार करने के समय आम यातायात न चाहते हुए भी बाधित हो जाता है जिससे आवश्यक कार्य से आने जाने आम लोगों के साथ अति आवश्यक कार्यों में लगे हुए पुलिस, प्रशासन, फायर और एम्बुलेंस के लिए बहुत बड़ी समस्या खडी हो जाती है. क्या कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता है कि जिसमें नेताओं को समुचित रूप से अपने प्रचार को करने की छूट भी मिल जाये और आमलोगों को किसी भी परेशानी का सामना न करना पड़े ? क्या रोड शो को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए या फिर इसमें शामिल वाहनों और लोगों की संख्या को उसके मार्ग के अनुरूप सीमित रखने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे नेताओं को भी कानून के अनुरूप कार्य करने की आदत पड़ सके. इस बात को उन लोगों के बारे में सोचते हुए भी आगे बढ़ाना चाहिए जिन पर इस तरह के दिखावे का सबसे ज़्यादा असर पड़ता है क्योंकि जब तक पीड़ितों के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा जायेगा तब तक इसका कोई सही हल नहीं निकाला जा सकेगा।      

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बुधवार, 24 अप्रैल 2019

लोकतंत्र, चुनाव और शालीनता

                                                 ऐसा नहीं है कि २०१९ में देश में पहली बार कोई आम चुनाव हो रहे हैं पर वर्तमान में चल रहे चुनावों में जिस तरह से हर दल के शीर्ष नेता द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन किया जा रहा है वह भले ही उस सम्बंधित दल को कुछ वोट दिलवाने में मदद कर दे पर इससे हमारे उस लोकतंत्र की गंभीर खामी ही सामने आती है जिसमें चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था भी चाह कर कुछ ठोस नहीं कर पाती है. यह सही है कि आज चुनाव प्रचार को जिस स्तर पर ले जाया गया है उसमें पुरानी पीढ़ी के नेता अपने आपको सहज नहीं पाते हैं फिर भी उनके पास कोई अन्य रास्ता भी नहीं बचता है क्योंकि यदि उन्हें राजनीति में रहना है तो इस सबका सामना करना ही होगा. इस मामले में सभी दलों ने एक जैसा रवैया अपना रखा है इसलिए किसी एक दल की तरफ इंगित करने से काम नहीं चलने वाला है फिर भी क्या देश के राजनैतिक दलों को यह नहीं सोचना चाहिए कि चुनाव जीतने-हारने के बाद कमोबेश उन्हीं चुनिंदा बड़े नेताओं के साथ जब सदन में बैठना है तो विमर्श का स्तर इतना घटिया करने की आवश्यकता क्या है?
                                              आज की परिस्थिति में यदि देखा जाये तो हर नेता किसी भी तरह से दुसरे दल के नेता को नीचे दिखाना ही अपनी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण मानने लगा है जिससे लोकतंत्र और शिष्टाचार की वह सामान्य सीमा रेखा भी कई बार अनावश्यक रूप से लांघी जानी लगी है जिसको अभी तक सदन या चुनावों में लांघना उचित नहीं मना जाता था।  इस बात पर विचार करना भी आवश्यक है कि आखिर देश के नेताओं की यह स्थिति क्यों बन गयी है कि जो अपने चुनावी घोषणापत्रों में किये जाने वाले विकास के लम्बे चौड़े वायदों को भूलकर इतनी घटिया बातचीत पर उतर आते हैं जिसका कोई औचित्य नहीं दिखता है?  संभवतः आज नेताओं को यह लगने लगा है कि जनता से चाहे कुछ भी कह दो पर जब चुनाव हों तब जनता की बातों को गंभीर मुद्दों की तरफ मत जाने दो और हलकी छिछली राजनीति में को उलझाकर देश के समक्ष खड़े वास्तविक मुद्दों को दूर दफ़न कर दो जिससे भावनाओं में बहती हुई जनता अपनी प्राथमिकताओं को भूलकर उन्हीं घटिया बातों में उलझकर गंभीर सवाल करने की शक्ति खो दे?
                                               क्या यह सही समय है कि राजनेता अपने स्तर से एक बार फिर से चुनावी माहौल की गरिमा को वापस लौटाने का काम शुरू करें?  क्या हमारे विविधता भरे देश में अब इस बात की आवश्यकता नहीं है कि अन्य अखिल भारतीय सेवाओं की तरह चुनाव सुधार करते हुए एक चुनाव से सम्बंधित कैडर भी बनाया जाये जिसमें शुरुवात से ही चुनावी माहौल को समझने के लिए अधिकारियों को तैयार किया जाये और उनमें से ही वरिष्ठ लोगों को संवैधानिक बाध्यता के साथ शीर्ष स्तर पर काम करने का अवसर दिया जाये ? ऐसा करने से चुनाव आयोग की गरिमा तो बढ़ेगी ही साथ नेताओं को अपने प्रिय लोगों को चुनाव आयोग में बैठाने की परंपरा पर भी लगाम लगायी जा सकेगी।  निश्चित तौर पर चुनाव आयोग ने १९९१ में शेषन युग के बाद इस बार सबसे अधिक बेबसी दिखाई है क्योंकि शेषन के बाद लगभग हर चुनाव आयुक्त ने नियमों का कड़ाई से अनुपालन किया और जनता में आयोग की साख को मज़बूत किया पर वर्तमान में आयोग ने अपनी उस बनी हुई साख को गंवाना शुरू कर दिया है और कोई नहीं जानता है कि यह अभी और कितने नीचे तक जाने वाला है?  देश को मज़बूत नेता ही नहीं बल्कि मज़बूत संवैधानिक संस्थाओं की भी बहुत अधिक आवश्यकता है क्योंकि जब तक सभी सम्बंधित तंत्र मज़बूत नहीं होंगे तब तक लोकतंत्र को मज़बूत करना केवल एक सपना ही रहने वाला है.
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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अस्पष्ट जनादेश और नैतिकता

                                                               आज़ादी के बाद काफी समय तक देश की जनता ने केवल कांग्रेस को सत्ता देने को अपनी प्राथमिकता में रखा उसके बाद एक समय ऐसा भी आया जब संविधान के अनुरूप किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत का अभाव दिखाई देने लगा जिसके बाद गठबंधन और अल्पमत की सरकारों का दौर भी आया जिससे कई बार मध्यावधि चुनावों की स्थिति आयी जिसमें भी स्पष्ट बहुमत दूर की कौड़ी ही साबित हुआ. इस पूरी परिस्थिति के बारे में संभवतः संविधान में विचार किया गया था और साझा सरकारों की परिकल्पना भी की गयी होगी पर निर्णय लेने और जनहित में काम करने के लिए स्पष्ट बहुमत वाली सरकारों के हाथ सदैव खुले रहते हैं इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. केंद्रीय स्तर से लगाकर राज्यों तक में जिस तरह से मामूली या अस्पष्ट जनादेश दिखाई देना शुरू हुआ है उसके चलते क्या कोई और मार्ग नहीं सोचा जाना चाहिए जिससे फिर से चुनावों में जाने से पहले एक और विकल्प उपलब्ध कराया जा सके ?
                                  कर्णाटक से एक बार फिर से सत्ता पलट की खबरें आना शुरू हो चुकी हैं तो उस परिस्थिति में आखिर किसी के पास क्या विकल्प बचता है कि किस तरह से संवैधानिक रूप को बनाये रखते हुए सत्ता को चलाया जाये ? देश के प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा द्वारा भी समय समय पर संविधान प्रदत्त अधिकारों का जमकर दुरूपयोग किया जाता रहा है जिनके हाथों में अधिकांश समय तक देश की बागडोर रही है. आज इनमें से कोई दल अपनी सरकार के गिरने या बनने को अपनी परिस्थिति के अनुसार इसे लोकतंत्र की हत्या या लोकतंत्र की जीत बताने में कोई शर्म महसूस नहीं करते हैं. ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए जिससे देश का लोकतंत्र मज़बूत हो और जनता की अपेक्षा के अनुरूप सरकार चलाने की व्यवस्था भी की जा सके ? क्या ये दोनों दल कभी इस तरह की किसी सम्भावना पर विचार कर कोई स्पष्ट नीति बनांने के बारे में सोचेंगें या इसी तरह से अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए कुछ भी करने की तरफ बढ़ते चले जायेंगें ?
                               क्या यह संभव नहीं है कि किसी एक दल द्वारा बहुमत साबित न कर पाने की स्थिति में सभी दलों द्वारा जीती गयी सीटों के अनुपात में उन्हें सबसे बड़े दल को सीएम और मंत्रिमंडल में उपयुक्त स्थान देते हुए देश या राज्य की स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया जाए और अगले चुनावों तक उस पर अमल किया जाये ? हालाँकि भारत की राजनैतिक परिस्थितियों में इस तरह का कोई भी कार्य किया जाना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि सभी दलों की प्राथमिकताएं समग्र विकास के स्थान पर केवल अपने वोटबैंक को मज़बूत करने तक ही सीमित हैं. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा जिस जीएसटी और एफडीआई का खुलकर विरोध किया करती थी सत्ता में आने पर वह उसकी सबसे बड़ी पैरोकार दिखाई देने लगी जिससे दलीय राजनीति के चलते देश के आर्थिक सुधारों को लागू करने में अनावश्यक रुप से विलम्ब हुआ और चिंता की बात यह है कि हम देशवासी इसके लिए किसी को भी उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते हैं ? नीतियों पर राष्ट्रीय सहमति के साथ आगे बढ़ने की मानसिकता जब तक हमारे सभी दलों और राजनैतिक नेताओं में नहीं आएगी तब तक उनकी राजनैतिक अपेक्षाओं की प्रतिपूर्ति करने के लिए जनता के हितों का बलिदान किया जाता रहेगा।   
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शनिवार, 12 जनवरी 2019

सीबीआई विवाद और न्याय

                                   आज सिर्फ अपनी साख बचाने के लिए जिस तरह से मोदी सरकार ने सीबीआई वाले मामले में अनावश्यक दखलंदाज़ी की इससे यही पता चलता है कि इस सरकार के लिए संस्थाओं की साख कोई मायने नहीं रखती है क्योंकि जब सीबीआई का झगड़ा सतह पर आकर पूरे देश के लिए चिंता का विषय बना हुआ है उस समय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी किनारे करते हुए सरकार द्वारा एक दिन पहले ही पद पर पुनर्स्थापित किए गए अलोक वर्मा को इस तरह से हटाना किस संकेत की तरफ ले जाता है ? आज जो भी समस्या है उसके लिए कहीं न कहीं सरकार के स्तर पर बरती गयी हद दर्ज़े की लापरवाही भी है जिसके चलते पूरे देश के सामने सरकार अपने तोते की गर्दन उमेठती हुई दिखाई दे रही है और अपने साथ देश के सर्वोच्च संस्थाओं की गरिमा को भी धूल में मिलाने में लगी हुई है जिसका दूरगामी परिणाम आने वाले समय में दिखाई देने वाला है क्योंकि अभी तक मोदी से सहमत लोग भी इस मामले में वर्मा के साथ हुए अन्याय को स्वीकार करने लगे हैं.
                     अस्थाना की शिकायत पर जस्टिस पटनायक की सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट में आलोक वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को किसी भी स्तर पर सही नहीं पाया गया है और इस बात के बारे में खुद जस्टिस पटनायक ने इंडियन एक्सप्रेस से जो कुछ कहा है वह अपने आप में चिंताजनक ही लगता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पद पर स्थापित किये गए आलोक वर्मा की बात सुने बिना ही उनको एकतरफा तरीके से पद से हटा दिया गया अब मोदी सरकार इस निर्णय को किस तरह से सही ठहरा पायेगी यह देखने की बात होगी। हो सकता है कि आलोक वर्मा की तरफ से सेवा के दौरान कुछ अनियमितताएं भी की गई हों पर उनका पक्ष सुने बिना ही इस तरह से निर्णय करना क्या सरकार और चयन समिति के हल्केपन को नहीं दिखाता है ? यह अधिक चिंतनीय इसलिए भी हो जाता है कि इस समिति में सुप्रीम कोर्ट का प्रतिनिधित्व भी था जिसके बाद भी बिना पक्ष सुने इस तरह का निर्णय किया गया।
                     संवैधानिक मामलों के जानकारों के साथ विपक्ष भी मोदी सरकार पर देश के संवैधानिक ढांचे परम्पराओं और मूल्यों से खिलवाड़ करने के आरोप २०१४ से लगा रहे हैं फिर भी मोदी सरकार इन सारे आरोपों की अनदेखी करती चली आयी है और अब इस मामले को कांग्रेस द्वारा जिस तरह से राफेल खरीद से जोड़ना शुरू कर दिया गया है उसको देखते हुए आने वाले समय में मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ने ही वाली हैं. अच्छा होता कि एक बार में निर्णय लेने के स्थान पर अलोक वर्मा को भी अपना पक्ष समिति के सामने भी रखने का मौका दिया जाता और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाता पर सरकार की हड़बड़ी ने पूरे माहौल में संदेह पैदा करने की गुंजाइश छोड़ दी है. कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने समिति के निर्णय से असहमति जताकर यह सन्देश देने में भी सफलता पाई है कि इस मामले का राफेल खरीद से जुड़ाव हो सकता है और आगामी चुनावों में यह कांग्रेस के लिए एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाने वाला है.       
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शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

राम मंदिर और कानून

                                              किसी भी गंभीर मुद्दे पर देश के लोकतंत्र के चारों मुख्य स्तम्भों को किस तरह से कार्य करते हुए संविधान की रक्षा की तरफ कदम बढ़ाने चाहिए इस पर कोई एक राय अभी तक नहीं बन पायी है क्योंकि देश के सामने समय समय पर आने वाले विभिन्न मुद्दों पर जिस तरह की विभक्त राय सामने आती है उसमें कोई सर्वसम्मत हल निकाल पाना आसान भी नहीं है फिर भी इन मुख्य स्तम्भों की तरफ से किये जाने वाले प्रयासों को भी सही नहीं कहा जा सकता है. आज़ादी के बाद से देश में जिस तरह से विधायिका का क्षरण हुआ उसे कोई भी नकार नहीं सकता है जिससे उसका दुष्प्रभाव हर उस क्षेत्र पर भी पड़ा जहाँ उसका किसी तरह का दबाव संभव था. लोकतंत्र में भी देश को आखिर में नागरिकों के द्वारा ही चलाया जाना है और समाज में हर तरह के लोग मौजूद रहते हैं जिससे समय के साथ कार्यपालिका और न्यायपालिका में भी यह परिलक्षित होता दिखाई दिया।
                   इस कड़ी में ताज़ा मुद्दा राममंदिर भूमि के स्वामित्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने आने वाली सुनवाई है जिस पर हर स्तर पर राजनीति चालू है और जिस भी दल को जो कुछ अपने हित में लग रहा है सभी बिना कुछ सोचे समझे अपनी राजनीति चमकाने की कोशिशों में लगे हुए हैं. क्या किसी दल की राजनीति को देश से ऊपर समझा जा सकता है और यदि किसी विवादित मुद्दे पर जो कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित भी हो उस पर किसी को बयानबाज़ी करने से रोकने का कितना अधिकार खुद कोर्ट के पास है ? आज जिस स्तर पर राममंदिर को लेकर माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है उसका एक बार फिर से देश की उग्र राजनीति पर ही प्रभाव पड़ने वाला है और चुनावी वर्ष में आम लोगों से जुड़े मुद्दों को पीछे रखने का काम शुरू किया जा चुका है. क्या किसी दल को राजनैतिक लाभ मिलने या किसी दल को हानि होने की सम्भावना के बीच सुप्रीम कोर्ट के पास यह अधिकार उपयोग करने की शक्ति नहीं है कि वह किसी भी मामले को देश के माहौल के अनुरूप सुनवाई करने के लिए ले सके ?
                                    बीते तीन दशकों में राममंदिर को लेकर जिस स्तर पर राजनीति हो चुकी है क्या हमारा सुप्रीम कोर्ट उसे नहीं समझता है? आज एक बार फिर से कोर्ट के बाहर इस मुद्दे को गर्माने की कोशिशें शुरू की जा चुकी हैं क्योंकि चुनावी वर्ष में जनता के बीच आज देश चला रही भाजपा और उसके पीएम मोदी का प्रभाव कम हुआ है. वैसे पीएम मोदी ने बहुत कुछ किया है पर पिछले आम चुनावों से पहले उन्होंने जनता की आकांक्षाओं को जिस हद तक बढ़ाया था उसे पूरा करने में आज वे खुद को विफल पा रहे हैं जिससे विपक्षी दल भी इस मसले को लेकर उन पर हमलावर हैं. राममंदिर के मुद्दे को पूरी तरह से कोर्ट के निर्णय आने तक स्थगित रखना चाहिए क्योंकि इस मुद्दे पर देश में पहले ही बहुत कुछ हो चुका है और तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था यदि आज इस तरह के मामलों में उलझती है तो आने वालेसमय में देश के लिए अपने विकास की गति को बनाये रखना मुश्किल ही होने वाला है.
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सोमवार, 31 दिसंबर 2018

लोकतंत्र से भीड़तंत्र तक

                              पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न कारणों से इकठ्ठा हुई भीड़ द्वारा जिस तरह से किसी को भी दोषी बताकर मौके पर ही क़ानून हाथ में लेते हुए फैसले लेने की बढ़ती हुई प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है वह निश्चित तौर पर किसी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं हो सकता है. पहले डायन के नाम पर फिर बच्चे चुराने वाले के नाम पर फिर धर्म के नाम पर फिर गाय के नाम पर और अब केवल मनमानी के नाम पर जिस तरह से देश के सामने नयी तरह की समस्या आ रही है उससे यदि समय रहते बचने और निपटने की राह नहीं निकाली गयी तो आने वाले समय में हम एक हिंसक समाज से अधिक कुछ भी नहीं बनने वाले हैं ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते किसी समस्या कोलेकर इकठ्ठा हुए कुछ सैकड़ा लोग किसी अन्य इंसान की हत्या करने से भी नहीं चूकते हैं जबकि उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी होता है कि मामला आगे बढ़ने पर उनके व उनके परिवार के लिए बड़े स्तर पर मुश्किलें खडी हो सकती हैं ?
                              निश्चित तौर पर पिछले कुछ वर्षों में बदले राजनैतिक विमर्श और विचारधारा विशेष से असहमत होने वाले किसी भी व्यक्ति से इस तरह से निपट लेने की जो प्रवृत्ति सामने आ रही है उसके पीछे उन विचारधाराओं का भी हाथ है जो इस तरह की सामूहिक अराजकता में भी अपने लिए राजनैतिक अवसरों को खोजकर उनका लाभ उठाने से नहीं चूकती हैं. क्या आज जिस तरह से कुछ लोगों द्वारा अपना जनाधार मज़बूत किये जाने के लिए किये जाने वाले इस तरह के कामों को करने में जुटे हुए हैं तो उनको सही कहा जा सकता है ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते हमारे राजनेता भी जनता से जुड़कर काम करने और उनकी समस्याओं में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करके उन्हें दूर करने के स्थान पर विद्वेष पैदा करके अपने हितों को साधने में लगे हुए हैं ? इस मामले में लगभग सभी दलों की स्थिति एक जैसी ही कही जा सकती हैं पर आज यह प्रवृत्ति जितने बड़े पैमाने पर शुरू हो रही है वह चिंता का विषय है क्योंकि इस अराजक भीड़ ने अब कानून के रखवालों पर भी हाथ साफ़ करना शुरू कर दिया है जिससे आने वाले समय में कोई भी सुरक्षित नहीं रहने वाला है.
                          भीड़ की हिंसा के लाभ उठाने के चक्कर में जिस तरह से राजनेताओं की तरफ से भी केवल आवश्यकतानुसार बयान दिए जाते हैं और उनमें से कई बयान तो इतने शर्मनाक होते हैं कि उनका ज़िक्र करना भी उचित नहीं है फिर सुधार की गुंजाईश कहाँ बचती है ? आज तक जो प्रश्न जनता के सामने थे वे पुलिस और प्रशासन के सामने आ चुके हैं और स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि किसी दिन किसी नेता के भीड़ में फँस जाने पर उनकी हत्या की आशंका से भी नकारा नहीं जा सकता है ? इतना सब देखने के बाद भी यदि सिर्फ तात्कालिक लाभों के लिए देश की युवा पीढ़ी के मन में नफरत की दीवारों को ऊंचा कर वैमनस्यता  की खाई को केवल गहरा करने में ही कुछ लोगों को अपना लाभ दिखाई दे रहा है तो अब आम भारतीय के जागने का समय आ चुका है क्योंकि यदि हमारे बच्चे इसी तरह से अराजक माहौल का हिस्सा बनते रहे तो किसी दिन वे या तो किसी भीड़ का शिकार हो सकते हैं या खुद भीड़ में शिकारी की भूमिका में भी दिखाई दे सकते हैं जिससे अंत में हमारे परिवार, समाज और राष्ट्र को ही नुकसान होने वाला है.           

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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

टी-१८ परिचालन की राजनीति

                                                  देश में निर्मित सबसे तेज़ चलने वाली ट्रेन रैक टी-१८ के सफल परीक्षण के बाद इसके मार्ग और परिचालन के बारे में रेलवे द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है. आमतौर पर इस तरह की नई सेवा शुरू होने पर रेल मंत्री या पीएम के क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाती है जबकि इतनी महत्वपूर्ण शुरुवात के लिए इसके परिचालन की लागत के निकलने और विशेष सेवा होने के कारण इसके मंहगे होने के कारण इसे उस मार्ग पर चलाने का प्रयास किया जाना चाहिए जहाँ इसकी सेवा का मूल्य चुका यात्री इसका सही तरह से लाभ लेने की स्थिति में हों. निश्चित तौर पर पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के चलते वाराणसी को विशेष अधिकार प्राप्त है पर क्या महामना एक्सप्रेस की हालत देखकर रेलवे को इस अपनी नई सेवा की शुरुवात पीएम के क्षेत्र से करनी चाहिए ? राजनैतिक लाभ के लिए देश में आज़ादी के बाद से ही इस तरह की गतिविधियों को किया जाता रहा है और मोदी सरकार में भी यही सब जारी भी है। 
                                          अच्छा होता कि इस सेवा को दिल्ली /झाँसी या भोपाल के बीच चलाया जाता जिससे परिचालन की दृष्टि से उपलब्ध सुगम मार्ग पर इसे चलाया जा सकता और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण मथुरा आगरा झाँसी और भोपाल आने जाने वाले यात्रियों को इस तीव्र सेवा का सही लाभ मिल पाता। यह भी सही है कि देश विदेशी पर्यटकों के लिए दिल्ली आगरा के बीच चल रही गतिमान एक्सप्रेस के स्थान पर यदि इस टी-१८ को चलाया जाये तो इन स्थानों पर आने जाने वालों की यात्रा को और भी सुखद बनाया जा सकता है साथ ही दिल्ली आगरा मार्ग पर चल रही गतिमान एक्सप्रेस को वाराणसी की तरफ शिफ्ट किया जा सकता है जिससे वाराणसी के लोगों को भी नयी ट्रेन मिल जाएगी साथ ही पर्यटन स्थलों के यात्रियों को भी अपनी यात्रा का और भी लाभ मिल सकेगा। दिल्ली वाराणसी जैसे व्यस्ततम मार्ग पर टी-१८ को चलाने के लिए रेलवे को बहुत कुछ करना पड़ेगा तभी तभी यह अपनी रफ़्तार के साथ न्याय  कर पाए वर्ना यूपी में फंसती हुई ट्रेनों के बीच एक और नई गाड़ी भी विभिन्न स्टेशनों पर खडी दिखाई देने वाली है.     
                                रेल मंत्री को पहले से ही अपनी महत्वपूर्ण गाड़ियों के संचालन में आ रही बाधाओं को देखते हुए टी-१८ को वाराणसी दिल्ली के बीच चलाने से पहले आर्थिक पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे यह कम से कम अपनी परिचालन लागत को निकाल कर रेलवे को आर्थिक सहयोग भी करने की स्थिति में रहे. वैसे भी रेलवे की गलत नीतियों के चलते आज प्रीमियम किराये के कारण अधिकांश गाड़ियों में वे सीटें खाली ही रह जाती हैं जिनके लिए कभी कभी बहुत मारामारी रहा करती थी. रेलवे को पीएम के ससदीय क्षेत्र का ख्याल रखने का पूरा अधिकार है पर साथ ही क्या आज रेलवे इस स्थिति में है कि वह अपनी उन नई महत्वपूर्ण गाड़ियों को आर्थिक पहलू के स्थान पर राजनैतिक लाभ के रूप में चलाने के बारे में सोच सके ? निश्चित तौर पर यह निर्णय रेलवे बोर्ड का ही होगा पर क्या बोर्ड सरकार और मंत्री की मंशा के खिलाफ जाकर इस तरह के किसी कदम का विरोध करने की स्थिति में होता भी है ?     

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बुधवार, 26 दिसंबर 2018

औद्योगिक विकास की चुनौतियाँ

                                               छत्तीसगढ़ की नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार ने चुनाव में किये गए अपने वायदे को पूरा करते हुए बस्तर संभाग में लगने वाले टाटा स्टील प्लांट को आवंटित की गयी १७०० एकड़ जमीन कम्पनी से वापस लेकर किसानों को वापस करने के लिए आदेश जारी कर दिया है जिसके बाद स्थानीय किसानों में तो हर्ष का माहौल है पर इससे राज्य में औद्योगिक विकास को बड़ा झटका लगने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. यह भी सही है कि इस मामले में टाटा समूह द्वारा भूमि आवंटन के नियमों के अनुरूप प्लांट लगाने का काम आगे नहीं बढ़ाया गया जिससे स्थानीय लोगों में रोष भी था जिसे समझते हुए कांग्रेस ने वहां पर इसे एक मुद्दा बना लिया और जनता में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए आवंटन को रद्द भी कर दिया है. इस मामले में कहीं न कहीं कुछ ऐसी कमी अवश्य ही रही होगी जिससे टाटा जैसा समूह भी अपनी कही गयी बातों को पूरा नहीं पाया।
                                    भूपेश बघेल सरकार ने किसानों की मांग और समस्या को देखते हुए अपने वायदे को पूरा किया उसे गलत नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से यह पूरा मामला बिगड़ा अब उस पर  विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि खनिज सम्पदा से भरपूर राज्य से पूरे देश और दुनिया के औद्यौगिक समूहों में यह सन्देश भी नहीं जाना चाहिए कि यह सरकार पूरी तरह से उद्योगों की विरोधी है ? टाटा समूह के सामने आखिर वे कौन सी परिथितियाँ उत्पन्न हुईं जिसके चलते इस प्लांट का काम आगे नहीं बढ़ सका भूपेश सरकार को इस बारे में भी गंभीर विचार कर नीतियों के निर्धारण में उद्योगों का भी ख्याल रखना होगा जिससे आने वाले समय में राज्य के औद्यौगिक माहौल को सुधारा जा सके. रमन सरकार की तरफ से आखिर किन स्तरों पर क्या चूक हुई जिससे यह प्लांट मूर्त रूप नहीं ले सका और सरकार के पास क्या विकल्प थे जिसके चलते वह नियमों में सुधार कर टाटा समूह और किसानों के बीच समन्वय स्थापित कर सकती थी ?
                                  बंगाल के बाद टाटा को संभवतः दूसरी बार इस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा जब वह अपनी योजना को मूर्त रूप देने में खुद को असमर्थ पा रहा होगा ? आज टाटा समूह ही नहीं बल्कि सभी औद्यौगिक समूहों के साथ केंद्र तथा राज्य सरकारों को बेहतर समन्वय करने की आवश्यकता है जिससे आने वाले समय में कोई भी परियोजना इस तरह से बीच में न लटक जाये। चिंता की बात यह भी है कि औद्यौगिक माहौल सुधारने की बातें करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में भी इस समस्या का सही हल नहीं खोजा जा सका ? यदि समय रहते केंद्र सरकार का दखल होता या रमन सरकार खुद ही केंद्र की सहायता मांगती तो संभवतः किसानों के आंदोलन से टाटा समूह को दिक्कत न होती और मामला इतना बिगड़ने भी नहीं पाता। बात यहाँ पर किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए समग्र औद्यौगिक विकास की संभावनाएं बढाने की है जिसमें रमन सरकार पूरी तरह से चूक गयी थी पर मामले को अतिवादी होकर एकतरफा निपटने से भूपेश सरकार भी राज्य और देश का भला नहीं कर पायेगी। इसलिए राजनैतिक कारणों को दूर रखते हुए अब राज्य सरकार को नीतियों की कमियों पर ध्यान देकर उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।       
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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

राज्यों की स्थानीय नौकरियां

                                                               एमपी के सीएम कमलनाथ ने जिस तरह से राज्य में लगाए जाने वाले नए उद्योगों के लिए विभिन्न स्तरों पर छूट पाने के लिए राज्य के स्थानीय नागरिकों की शर्त लगायी है वह अपने आप में सम्पूर्ण देश के कानून और परिस्थितियों को देखते हुए सही नहीं कही जा सकती है पर विभिन्न राज्यों में इस तरह की नीति पहले सही चल रही है और आने वाले समय में इसके राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों के चलते अन्य राज्यों द्वारा भी इस तरह का मॉडल अपनाये जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस मामले में पहल करने और दूसरे राज्यों के लोगों को अक्सर निशाने पर लेने वाले महाराष्ट्र में  १९६८ से ही इस तरह की नीति लागू है जिसमें स्थानीय लोगों के लिए ८०% नौकरियों को आरक्षित किया गया था और आज भी स्थानीय दबाव के चलते प्रवासी कामगारों को नियमानुसार होने के बाद भी नौकरियों से बिना कारण बताये निकाला भी जाता है. इस मामले में तेलंगाना के कानून सबसे कड़े हैं क्योंकि वहां दूसरे राज्य के ही नहीं बल्कि राज्य के अंदर के लोग भी दूसरे क्षेत्र में नौकरी नहीं पा सकते हैं. हिमाचल, कर्णाटक ओडिशा में भी कम वेतन वाली नौकरियों को इसी तरह से स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित किया गया है।
                          ऐसी स्थिति का स्थानीय लोगों के लिए कुछ लाभ भी होता है पर उद्योगों के लिए दूसरे तरह की समस्याएं सामने आ जाती हैं जिसके चलते उनको प्रतिस्पर्धा पर सस्ता श्रम नहीं मिल पाता है और स्थानीय लोगों की अधिकता के कारण अनावश्यक श्रमिक राजनीति होने से उत्पादन आदि पर भी दुष्प्रभाव पड़ने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं. इस मामले को दूसरी तरह से देखने की आवश्यकता है जिससे उद्योगों के उत्पादन और उनके स्थापित होने की संख्या पर असर न पड़े साथ ही स्थानीय नागरिकों को भी अपने आस पास श्रम उपलब्ध हो जाये. आज वैसे भी नोटबंदी के बाद जिस तरह से निचले स्तर पर काम करने वाले श्रमिकों का अपने राज्यों में उल्टा पलायन हुआ है उससे भी समस्याएं नए स्तर पर सामने आ रही हैं. ऐसी परिस्थिति में केंद्र मनरेगा के धन आवंटन को बढ़ाकर स्थानीय स्तर पर श्रम दिवस बढ़ाये जाने का प्रयास कर सकती है जिसमें उसे राज्यों के भरपूर सहयोग की आवश्यकता पड़ने वाली है.
                         कौशल विकास योजना अपने आप में जितनी अनूठी थी उसे उतनी ही मक्कारी से भ्रष्ट तंत्र में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है क्योंकि जिस तरह से बिना सुविधाओं के लोगों ने ऐसे केंद्र खोले और सरकार से प्राप्त अनुदान में बंदरबांट की वह किसी से भी छिपी नहीं है जिससे सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना जो हर स्तर पर नागरिकों के जीवन यापन में सहयोग कर सकती थी केवल भ्रष्टाचार का स्तम्भ बनकर ही रह गयी है. यदि इसको योजना को छोटे स्तर पर चलाकर उसकी प्रगति देखी जाती साथ ही बहुत बड़ी संख्या में केंद्र खोलने के स्थान पर उनमें दी जाने वाली ट्रेनिंग की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता तो आने वाले समय में उद्योगों के लिए आवश्यकतानुसार स्थानीय श्रम भी उपलब्ध हो जाता। अब भी समय है कि स्थानीय स्तर पर पनप सकने वाले उद्योगों की पहचान कर उनके अनुरूप कार्य शुरू किया  भविष्य के लिए ऐसी समस्या से निपटा जा सके. यदि स्थानीय नागरिकों को अपने आस पास ही अच्छी सुविधा से युक्त रोज़गार मिल जायेगा तो कोई भी अपने पैतृक शहर को छोड़कर कहीं और जाने की बातें भी नहीं सोचेगा।
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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

कमलनाथ की पारी

                                                   एमपी में सत्ता सँभालने के साथ ही अपने पहले आदेश में सीएम कमलनाथ ने २ लाख रुपयों तक के कृषि ऋण के बारे में जो फैसला लिया है वह कांग्रेस के वचन पत्र के अनुरूप ही है पर इसके सही ढंग से क्रियान्वयन के लिए अब पूरा दबाव सीएम कमलनाथ पर ही आने वाला है क्योंकि कई राज्यों ने इस तरह की क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा की पर बाद में आंकड़ों की बाज़ीगरी से अधिकारियों ने किसानों का बहुत कम ऋण ही माफ़ होने दिया. कमलनाथ को जनता की समस्याओं के बारे में अच्छे से पता है और वे सरकारी मशीनरी से अच्छे से काम लेना भी जानते हैं तो उनके लिए इस दिशा में आगे बढ़ने में कठिनाइयां कम होने की संभावनाएं भी हैं. फिर भी इस काम के लिए यदि एक राज्यमंत्री की अलग से नियुक्ति कर दी जाये तो संभवतः इस निर्णय को सही तरीके से लागू किया जा सकेगा।  ऋण माफ़ी का कार्य पूरा होने के बाद उस राज्यमंत्री को अलग से किसी विभाग में स्थानांतरित किया जा सकता है। इस कार्य में सही और लाभार्थियों की सूची बनाये जाने का काम सबसे कठिन होता है इसलिए इसे दो स्तरों में किया जाना चाहिए पहले स्तर में बैंकों से सीधे किसानों के ऋण की स्थिति जानी जा सकती है वहीं दूसरे स्तर पर कांग्रेस के कार्यकर्तों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है जो किसी भी किसान को इस लाभ से वंचित होने की स्थिति पर कड़ी नज़र रखने का काम कर सके.
              इसके अतिरिक्त यदि सरकार बेरोज़गारी भत्ते के मामले में आगे बढ़ती है तो वह इन युवाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वे भी करवा सकती है जिससे सरकार को दोहरा लाभ भी हो सकता है। बेरोज़गारों को रोज़गार देने के साथ सरकार इन युवाओं से महीने में कुछ दिन काम भी ले सकती है जिससे युवाओं में काम करने की भावना के साथ सरकार को काम करने वाले युवा हाथों का सम्बल भी मिल जायेगा। जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने जनता से जुड़े मुद्दों को लोकसभा चुनावों को देखते हुए  प्राथमिकता में लिया है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि खुद सीम और कांग्रेस पार्टी इसे पीएम मोदी के बड़े खोखले बयानों के सामने काम करने की संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करने को तैयार दिखाई देते हैं।  बेशक यह राजनैतिक लाभ के लिए लिया गया निर्णय है पर इसके दूरगामी परिणाम पूरे देश पर आने वाले समय में पड़ने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।
                      स्थानीय युवकों के लिए ७०% रोज़गार देने वाले उद्योगों को सरकारी छूट देने का निर्णय सही कहा जा सकता है पर जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने इसके लिए यूपी-बिहार के लोगों द्वारा नौकरियाँ हथियाये जाने की बात की उससे कोई भी सहमत नहीं हो सकता है क्योंकि यह क्षेत्रीय पार्टियों की स्थानीय सोच जैसी बात है और यह भी सोचा जाना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि स्थानीय लोगों के रोज़गार को किस तरह से बाहर से आने वाले अन्य राज्यों के लोग पा जाते हैं ? सरकार को एमपी के युवकों में कुशलता के साथ कोई भी काम करने की इच्छाशक्ति बढ़ानी होगी तभी उद्योगों के साथ राज्य के युवाओं का विकास भी हो सकता है। .शिवसेना की तरह जय महाराष्ट्र और मराठी मानुष जैसी सोच का किसी भी अन्य राज्य में समर्थन नहीं किया जा सकता क्योंकि यह संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत जाता है।  खुद उद्योगपति होने के कारण कमलनाथ इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि सभी को कुशल कामगारों की आवश्यकता होती है और जब तक कुशलता बढ़ाई नहीं जाएगी तब तक हवाई सपने देखने से कुछ भी संभव नहीं है।     
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सोमवार, 17 दिसंबर 2018

भाजपा की राह

                                            हालिया चुनावों में जिस तरह से लम्बे समय से भाजपा के गढ़ रहे छत्तीसगढ़ में जनता ने कांग्रेस के पक्ष में प्रचंड बहुमत दिया और राजस्थान एवं एमपी में अच्छा ख़ासा समर्थन देकर भी सिर्फ सत्ता से उतार दिया है उसके बाद यदि उसके नेतृत्व द्वारा खतरे की इस घंटी को नहीं सुना गया तो २०१९ की उनकी चुनावी संभावनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है. ऐसा भी नहीं है कि ऐसा अचानक ही हुआ है क्योंकि गुजरात, गोवा, पंजाब, कर्णाटक में भाजपा के लिए राह बिलकुल भी आसान नहीं रही फिर भी उन जनादेशों की एक तरह से भाजपा नेतृत्व द्वारा पूरी अनदेखी की गयी जिसके चलते आज उसके तीन महवत्पूर्ण हिंदीभाषी राज्य विपक्षी दल कांग्रेस के हाथों में चले गए हैं। यह सही है कि अभी तक भाजपा पीएम मोदी की लोकप्रियता और अपने अध्यक्ष अमित शाह के कुशल प्रबंधन से लगातार अजेय बनी हुई थी पर अब उसकी यह छवि भी इन चुनावों से कमज़ोर हुई है कि भाजपा को कोई हरा नहीं सकता है. निश्चित तौर पर आज देश में  भाजपा के पास मज़बूत संगठन तो है ही साथ में संघ के ज़मीनी समर्थन से उसके लिए जनता के साथ जुड़ने का अवसर भी रहता है जो उसकी स्थिति को अन्य दलों के मुक़ाबले मज़बूत करने का काम करता है फिर भी जनता से जुड़े सरोकारों में जिस तरह से भाजपा पिछड़ रही है वह उसके लिए सब कुछ होने के बाद भी अनुकूल परिणाम देने से दूर जाने वाला साबित हो सकता है.
                           निश्चित तौर पर २०१४ के बाद पेट्रोलियम क्षेत्र में होने वाले मुनाफे के दम पर मोदी सरकार का खज़ाना भरा जिससे उसके पास लोक कल्याण के लिये वो धन उपलब्ध होना शुरू हो गया जो पिछली मनमोहन सरकार में केवल सब्सिडी में ही खर्च हो जाया करता था. आज भी देश में राजनैतिक इच्छाशक्ति उस स्तर पर नहीं दिखाई देती है जिसमें वह नौकरशाही के स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार में अपना हिस्सा न मांगे और भ्रष्ट नौकरशाहों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की कोशिश शुरू करे. आज क्या केंद्र सरकार और अधिकांश राज्यों में सत्ता सँभाल रही भाजपा यह बात पूरी दृढ़ता के साथ कह सकती है कि उसके द्वारा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार का अंत किया जा चुका है ? गौ रक्षक और हिन्दुओं के नाम पर क्या भाजपा और इसकी सरकारों ने ईमानदारी से काम किया है या इस मुद्दे से केवल धार्मिक भावनाएं भड़का कर वोट बटोरने तक ही मामले को सीमित किया जा चुका है ? यदि वास्तव में ऐसा कुछ है तो आने वाले समय में भाजपा को यूपी जैसे राज्यों में अपने इन कर्मों के चलते बड़े नुकसान के लिए मानसिक रूप से तैयार होना होगा क्योंकि आज भाजपा को विपक्षियों से उतना खतरा नहीं है जितना उसे अपने नेताओं और उनके अनावश्यक बयानों से होने वाला है.
                          भाजपा द्वारा जिस तरह से पूरे देश में पदयात्रा का आयोजन किया जीवंत लोकतंत्र में हर राजनैतिक दल को इस तरह के प्रयासों को अपनाना चाहिए जिससे वे जनता की समस्याओं को केवल अधिकारियों के चश्में से देखने के स्थान पर धरातल पर समझने की स्थिति में आ सकें। पद यात्रा के समय जनता का जो मूड दिखाई दिया है उससे स्थानीय नेता अवश्य ही भयभीत हुए होंगें क्योंकि यूपी जैसे राज्य में जहाँ विश्व की एकमात्र और सबसे बड़ी गोरक्ष पीठ के महंत आदित्यनाथ के सीएम होने के बाद गायों की स्थिति में गिरावट आयी है वह भी अमित शाह को पता चल गया होगा ? और यदि ज़िले और प्रदेश के नेतृत्व में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वह इस सच्चाई को ऊपर तक पहुंचा कर कोई समाधान निकाले तो आने वाले चुनावों में भाजपा के ज़मीनी संघर्ष उसकी सोच से भी बहुत बड़ा होने वाला है और पूरे प्रदेश में यह स्थिति बन सकती है कि जो भी दल भाजपा को हराने की स्थिति में होगा किसान संभवतः उसी के साथ खड़ा दिखाई देगा। २० महीने के कार्यकाल में यूपी में गायों और आवारा पशुओं से किसानों की जो दुर्दशा हुई है संभवतः २०१९ में भाजपा को बहुत भारी पड़ने वाली है क्योंकि अभी तक इस बारे में सरकार या पार्टी के स्तर पर कोई ठोस प्रशासनिक, राजनैतिक या जागरूकता का काम शुरू नहीं किया गया है जिससे आम किसान एक बार फिर उसी सम्बल से भाजपा के साथ खड़े होने को सोचे जैसा उसने २०१४ में किया था।           

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मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

अयोध्या का युद्ध

                                                अयोध्या के मंदिर मस्जिद विवाद में जिस तरह से समय के साथ स्थितियों में परिवर्तन आता चला गया है उसे देखते हुए अब यह कहा जा सकता है कि यह मुद्दा केवल चुनावी हथियार की तरह प्रयोग किया जाने वाला एक ऐसा उपाय रह गया है जिसे भाजपा हुंकार से लेकर संकल्प तक ले जा चुकी है. साथ ही आज इसकी स्थिति यह है कि देश की दो बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के इस मुद्दे पर रवैये में कोई अंतर् नहीं दिखाई दे रहा है ? कालातीत में हुई ज़बरदस्ती और धर्म परिवर्तन के लिए हुई हिंसा से कोई इंकार नहीं कर सकता है जिसके कारण देश की स्थिति में बहुत परिवर्तन भी दिखाई दिया था पर आज यह मुद्दा जिस तरह से उग्रता की तरफ लौटता दिखाई दे रहा है उससे आम हिन्दुओं में कट्टर छवि रखने वाले पर वास्तविकता में व्यापारिक हितों को प्राथमिकता देने वाले पीएम मोदी के लिए सबसे बड़ी समस्या खडी होने वाली है क्योकि अब उन के साथ पूरी भाजपा पर भी समाज और संतों का यह दबाव है कि राममंदिर के बारे में भाजपा की सरकारें अपनी घोषित प्रतिबद्धता को पूरा करें।
                              इस मुद्दे का जीवंत रहना कहीं न कहीं से संघ उसके संगठनों और राजनैतिक मंच भाजपा के लिए चुनावों में काफी सहजता ला देता है जिससे आम हिन्दू जनमानस को मंदिर की आस्था से जोड़कर उसको भाजपा के पक्ष में जोड़े रखने के लिए उचित सामग्री भी मिल जाती है. आज पीएम मोदी के सामने यह मुद्दा एक चुनौती के रूप में आ गया है पर हिन्दू संगठनों की उग्रता के खिलाफ उन्होंने जिस तरह से गुजरात में सब कुछ छोड़कर अपना और गुजरात का नया स्वरुप गढ़ा था आज संभवतः वे उसका अखिल भारतीय स्तर पर प्रदर्शन कर दें और मोदी शाह एक बड़ा खतरा उठाते हुए इस मुद्दे को पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट पर ही छोड़ दें क्योंकि उससे मोदी को अपनी उस छवि को बनाये रखने में सफलता मिलेगी जो उन्हें विकास परक नेता साबित करती है. जिस तरह से पूरे देश के साथ केंद्र में भी मोदी और उनकी सरकार के लिए कमतर आंकी जा रही कांग्रेस अपने अध्यक्ष राहुल गाँधी के साथ आँखों में आँखें डालकर बातें कर रही है और टीवी चॅनेल्स में भाजपा के प्रवक्ताओं के सामने विकल्प सीमित होते जा रहे हैं उससे भी जनता में मोदी सरकार की नकारात्मक छवि बनने का अंदेशा बढ़ता जा रहा है.
                               ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या मोदी तुरंत संतों की मांग पर ध्यान देते हुए संसद के आगामी और इस लोकसभा के अंतिम पूर्ण शीतकालीन सत्र में एक अध्यादेश के माध्यम से राममंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने की तरफ बढ़ेंगें या अपने विकास परक मन्त्र को आगे रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को फैसले लेने के लिए छोड़ देंगें ? निश्चित तौर पर अध्यादेश से वे जनता में यह सन्देश देने में सफल हो सकते हैं कि उनकी सरकार इससे अधिक कुछ भी नहीं कर सकती थी और आने वाले समय में यदि संसद में उनका पूर्ण बहुमत हुआ तो वे इसे कानून के रूप में लागू करवा सकते हैं। पर अध्यादेश से उपजने वाली परिस्थिति में विवश में देश में अस्थिरता का सन्देश भी देगा जिससे आने वाले समय में देश की आर्थिक प्रगति पर भी बुरा असर पड़ने की सम्भावना भी है. ऐसी स्थिति में मोदी स्वयं ही इस मामले को अदालत पर छोड़कर अपनी विकासपरक छवि को बनाये रखने के लिए और जतन कर सकते हैं जिससे उनकी उदार हिन्दुओं के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उदार छवि मज़बूत हो और वे अध्यादेश को अंतिम विकल्प के रूप में आज़माने की सोचकर बैठे हों.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

अमृतसर हादसा

                                                            अमृतसर में दशहरा के अंतिम दिन रावण दहन के कार्यक्रम में जिस तरह से भीषण दुर्घटना हुई उसको देखकर प्रथम दृष्टया यही लगता है कि एक ज़िम्मेदार राष्ट्र के नागरिक के रूप में जीना सीखने में अभी हम सभी भारतीयों को बहुत समय लगने वाला है. यह सही है कि इस तरह के आयोजनों के समय अनुमान से अधिक भीड़ का जुटना पूरे देश में एक सामान्य सी लगने वाली घटना है पर हमारा प्रशासन जिस तरह से अनावश्यक कामों के दबाव में ही रहा करता है उसको देखते हुए इस तरह की घटनाओं को रोक पाना उसके लिए पूरी तरह से असंभव ही है. हम सभी जानते हैं कि इस तरह के आयोजनों के लिए किस तरह से पुलिस प्रशासन को आने वाले लोगों की अनुमानित संख्या की सूचना देनी होती है और उसके अनुरूप उनसे आवश्यक व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा की जाती है पर देश भर में सार्वजनिक कार्यक्रमों में जिस तरह से कुछ भी करने की स्वघोषित छूट नागरिक स्वतः ही हासिल कर लेते हैं उनके चलते भी इस तरह की दुर्घटनाएं होती रहती हैं और हम कुछ दिनों तक पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएं दिखा कर फिर से अपनी लापरवाहियों में जुट जाते हैं.
                                 इस बारे में हमेशा की तरह राजनीति शुरू हो चुकी है जबकि इसके लिए हम सभी की यह सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि जहाँ भी लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है या वे स्वतः ही किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रहे हैं तो उनके आने जाने के मार्ग के साथ ही कार्यक्रम स्थल पर आवश्यक सुरक्षा उपाय भी किये जा रहे हैं. हमारे देश में किसी भी कार्यक्रम में विभिन्न कारणों से आम लोगों का बड़ी सख्या में आना हमारी उत्सवधर्मिता की परम्परा को मज़बूत करता है पर आयोजक के रूप में ज़िम्मेदारी निभा रहे लोगों के साथ स्थानीय प्रशासन को भी इसमें पूरी तरह से शामिल होना चाहिए जो कि विभिन्न कारणों से कभी भी नहीं होता है. क्या इस तरह के किसी भी आयोजन के लिए आवश्यक अनुमति के साथ सुरक्षात्मक व्यवस्थाओं को करने के लिए आज कोई मज़बूत कानून या दिशा निर्देश मौजूद हैं? और यदि ऐसा है तो उनके अनुपालन के लिए किन लोगों की ज़िम्मेदारी निर्धारित की गयी है यह बात भी सभी लोगों के संज्ञान में होनी चाहिए। हर बात के लिए प्रशासन को कोसने के स्थान पर क्या हम नागरिकों को अपनी ज़िम्मेदारियों के निर्वहन के बारे में भी नहीं सोचना चाहिए ?
                               एक बड़ा हादसा क्या हमारी उन नैतिक ज़िम्मेदारियों की तरफ हमें मोड़ सकता है जिनकी हम हर जगह अनदेखी करते रहते हैं ? क्या नागरिकों के रूप में हमें यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि प्रशासन को हर स्तर पर सहयोग कर हम क्या अपने लिए सुरक्षित वातावरण बनाने की ईमानदार कोशिश नहीं कर सकते हैं? इस दुर्घटना में सभी दोषी हैं पर कोई भी अपनी ज़िम्मेदारी और कमियों को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं दिखाई दे रहा है जिससे आने वाले समय में इस तरह की घटनाओं को रोकने में कोई मदद नहीं मिलने वाली है. चौतरफा दबाव में सिर्फ आयोजकों के खिलाफ ही कार्यवाही होने की पूरी सम्भावना है जबकि लापरवाही के चलते आयोजक के साथ ही स्थानीय प्रशासन, रेलवे और वहां आने वाले लोग भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं. क्या हम सभी अपनी सामूहिक ज़िम्मेदारी को समझते हुए ऐसी कोई आदर्श स्थिति की कल्पना कर सकते हैं जिसमें ऐसी घटनाओं से पूरी तरह बचने की कोई व्यवस्था हो?  केंद्र और राज्य सरकारों को इस बारे में विचार कर भीड़ वाली जगहों पर आपातकालीन स्थित में लोगों को सही व्यवहार करने के लिए उचित दिशा निर्देश बनाते हुए आयोजकों के लिए आपदा प्रबंधन के प्रमुख गुर भी सिखाने की व्यवस्था करने के बारे में सोचना चाहिए जिससे भविष्य में सभी अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर पूरे देश में होने वाले ऐसे किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम को पूरी तरह से सुरक्षित बनाने में अपना योगदान दे सकें।

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2018

कांग्रेस के यूपी में विकल्प

                                            यूपी में समय समय पर सपा बसपा के साथ चुनाव पूर्व या चुनाव बाद के तालमेल ने जहाँ पूरे राज्य में कांग्रेस को कमज़ोर किया वहीं उसके नेताओं की आरामतलबी के चलते भी राज्य में उसका वोटबैंक लगातार सिमटता चला गया. इस पूरे प्रकरण में यह माना जा रहा था कि राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यूपी से जुड़े कई बड़े परिवर्तन देखने को मिलेंगें पर अभी तक जिस तरह से पार्टी अपने पुराने ढर्रे पर चल रही है उसको देखते हुए कहीं से भी यह नहीं लगता है कि राज्य में उसकी नीतियों में कोई बड़ा परिवर्तन हुआ है. हो सकता है कि अपने दीर्घकालिक हितों को बचाने के लिए राहुल गाँधी भी यूपी की वर्तमान परिस्थिति में सपा बसपा के छोटे सहयोगी बनने को तैयार हो गए हों पर आने वाले समय में इसका सकारात्मक परिणाम सामने आने की उम्मीद कम ही है. यदि कांग्रेस को भविष्य में अपने लिए केंद्र में मज़बूत भूमिका के साथ यूपी में जड़ें मज़बूत करनी हैं तो उसे अपने उस कोर वोट बैंक पर ध्यान देना होगा जो इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी उसके साथ मज़बूती से खड़ा है.
                                         यह सही है कि समय के साथ अपने को न ढाल पाने के कारण कांग्रेस ने अपनी चुनावी ज़मीन पूरे देश में क्षेत्रीय दलों के हाथों गंवाई है और आज भी उसे संभालने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किये जा रहे हैं जिसका सीधा असर उसकी चुनावी संभावनाओं पर पड़ना तय है. यूपी की राजनीति में अब कांग्रेस को अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि खुद के प्रयासों के बिना दुसरे दलों के साथ तालमेल करने से जहाँ पार्टी के अवसरवादी नेता दुसरे दलों में चले जाते हैं वहीं उसके लिए बरसों से बनी हुई ज़मीन खोने का दुष्प्रभाव भी वोट और सीटों में कमी के रूप में सामने आता है. सपा में नेतृत्व अखिलेश के हाथों में आने के बाद वहां से गंभीर बातों पर विचार शुरू हो चुका है पर मायावती के पास दलित वोटबैंक की जो पूँजी है उसके चलते वे कभी भी कहीं भी किसी को भी ठेंगा दिखाने से नहीं चूकती हैं. इस पूरे प्रकरण में अब कांग्रेस को सबसे पहले उन २२ लोकसभा क्षेत्रों में अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए जहाँ पर २००९ में उसके सांसद थे क्योंकि निश्चित तौर पर आज उसके पास इन क्षेत्रों में कुछ कार्यकर्ता अवश्य होंगें जिनके दम पर वहां वह मुख्य लड़ाई में आने की कोशिशें आसानी से कर सकती है. साथ ही राहुल गाँधी को भी कम से कम एक बार इन क्षेत्रों में प्रचार करना चाहिए जिससे वहां के पूर्व सांसद अपनी स्थिति को २०१९ के लिए मज़बूत कर सकें।
                                      निश्चित तौर पर संयुक्त विपक्ष को यह एहसास हो गया है कि मोदी का जादू निश्चित  कम हुआ है तभी अधिकांश दल अपनी क्षमता से कम सीटों पर भी चुनाव लड़ने के लिए हामी भरते नज़र आ रहे हैं क्योंकि यदि वे किसी भी तरह से एक बार भाजपा को १६०/७० तक सीमित करने में सफल हुए तो भाजपा खुद ही मोदी से उसी तरह पीछा छुड़ाती नज़र आने वाली है जैसे उसने अडवाणी से छुड़ाया है. इस खतरे को अमित शाह भी भांप रहे हैं क्योंकि मोदी के बिना राष्ट्रीय राजनीति में उनकी स्थिति भी समाप्त हो जाने वाली है. ऐसी स्थिति में कांग्रेस को २०१९ को अधिक महत्व न देते हुए भाजपा को कड़ी चुनौती देने के लिए सबसे पहले अपने घर को मज़बूत करना चाहिए क्योंकि कई बार उसके राष्ट्रीय स्वाभाविक विकल्प वाली स्थिति आने पर उसकी उपस्थिति  हर राज्य में दिखाई देनी चाहिए जिससे भाजपा से रूठा मतदाता अपने वोटों को क्षेत्रीय दलों को देने के स्थान पर लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में डालने के बारे में सोच सकता है. किसी भी क्षेत्रीय दल की राष्ट्रीय संभावनाओं पर कांग्रेस को कभी भी अपने को कमज़ोर नहीं करना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में मज़बूत विपक्ष ही राष्ट्र के लिए उचित होता है पर जब विपक्ष क्षेत्रीय दलों में बंटा हो तो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सत्ता पक्ष आसानी से मुद्दों को भटकाने में सफल हो जाता है जिससे उसकी कमज़ोरियों पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता है।

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 20 अगस्त 2018

सिद्धू और राजनीति

                                                         क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू का इमरान खान के शपथ ग्रहण में जाना अपने आप में एक छोटी सी घटना है पर सिद्धू के पाक सेना के जेनरल से गले मिलने को लेकर भारतीय राजनीति और विशेषकर सत्ताधारी भाजपा द्वारा इतना हल्ला मचाया जा रहा है जैसे सिद्धू ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. संभवतः भाजपा और मोदी सरकार ने भी यह मुग़ालता पाल रखा होगा कि जिस तरह से मोदी ने अपने शपथ ग्रहण में पड़ोसियों को बुलाया था तो इस बार इमरान खान भी कुछ इस तरह का कदम उठायें पर उनकी तरफ से जिस ठन्डे तरह से भारत के साथ संबंधों पर शुरुवात की गयी है वह अपने आप में भाजपा के लिए सदमे से कम नहीं है क्योंकि यदि पीएम मोदी को पाक द्वारा बुलाया जाता तो भाजपा इसका भरपूर दोहन करती। इमरान ने सिद्धू के अलावा अन्य लोगों को भी बुलाया था पर संभवतः उनकी तरफ से जाने की कोई इच्छा नहीं प्रदर्शित की गयी जिससे सभी का ध्यान केवल सिद्धू की यात्रा पर ही चला गया.
                           यदि भाजपा और मोदी सरकार को सिद्धू या किसी अन्य भारतीय के इमरान के शपथ ग्रहण में शामिल होने पर कोई आपत्ति थी तो उनको जानी की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए थी पर इस मौके को भी भाजपा की तरफ से एक अवसर के रूप में देखना उनकी राजनीति को ही दर्शाता है सिद्धू के जाने को लेकर ही भाजपा कांग्रेस पर हमलावर हो गयी थी और उनके पाक जनरल बाजवा से मिलने को लेकर जिस तरह का हो हल्ला मचाया जा रहा है वह भाजपा की दोहरी नीतियों को उजागर करने वाला है. सिद्धू भारत के आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में पाक नहीं गए थे और जब उनका दौरा इस तरह का था तो क्या वे पाकिस्तान द्वारा निर्धारित किये गए किसी प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने की स्थिति में थे ? पाक अधिकृत कश्मीर के राष्ट्रपति के साथ उनके बैठने को लेकर भारत सरकार और भाजपा को गंभीर आपत्ति है जबकि सभी जानते हैं कि किसी भी समारोह में मेज़बान देश के प्रोटोकॉल का अनुपालन करना मेहमानों के लिए सामान्य शिष्टाचार होता है.
                         सिद्धू को भाजपा वैसे भी बख्शने के मूड में नहीं है क्योंकि जब पूरा देश मोदी मोदी चिल्ला रहा था तो उस स्थिति में भी सिद्धू ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस में जाने का निर्णय लिया था जो आज भी भाजपा को कचोटता रहता है इसलिए भी सिद्धू हमेशा भाजपा और अकालियों के हमले पर रहते हैं. वैसे भी सिद्धू इतने कमज़ोर नहीं है कि अपने ऊपर किये जाने वाले हमलों का बचाव न कर सकें साथ ही इस बात पर कांग्रेस को भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जब देश के पीएम बिना बुलाये दुश्मन देश के पीएम की बेटी की शादी में शामिल हो सकते हैं तो आधिकारिक रूप से निमंत्रित किये गए सिध्दू वहां पर क्या गले भी नहीं मिल सकते हैं? देश की सीमाओं पर जवान शहीद हो रहे हैं यह बिलकुल सच है पर क्या निर्णय लेने की क्षमताओं को अपने में समाहित किये पीएम मोदी पाक से मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा वापस लेने का कदम उठा सकते हैं ? क्या वे या भाजपा हाफिज सईद से वैदिक की मुलाक़ात को राष्ट्रहित मानते हैं ? देश की सीमाओं से बाहर पाक के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से हमारे सुरक्षा सलाहकार चोरी से मिलकर किस तरह से जवानों की शहादत को सम्मानित करते हैं?  देश में दबाव में आये चीनी उद्योग और गन्ना किसानों की समस्याओं को अनदेखा करते हुए पाक की चीनी आयात कर भारत में चीनी के दाम लागत से कम कर मोदी सरकार आखिर किसका भला कर रही है ?  भाजपा को यह ध्यान रखना चाहिए कि सिद्धू भारत सरकार या पंजाब सरकार के आधिकारिक प्रतिनिधि के तौर पर पाक में नहीं थे यह उनकी निजी यात्रा थी और किसी भी व्यक्ति की निजी यात्रा के दौरान इस तरह की राजनीति करने से सभी को बचने की आवश्यकता भी है.

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...