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बुधवार, 26 दिसंबर 2018

औद्योगिक विकास की चुनौतियाँ

                                               छत्तीसगढ़ की नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार ने चुनाव में किये गए अपने वायदे को पूरा करते हुए बस्तर संभाग में लगने वाले टाटा स्टील प्लांट को आवंटित की गयी १७०० एकड़ जमीन कम्पनी से वापस लेकर किसानों को वापस करने के लिए आदेश जारी कर दिया है जिसके बाद स्थानीय किसानों में तो हर्ष का माहौल है पर इससे राज्य में औद्योगिक विकास को बड़ा झटका लगने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. यह भी सही है कि इस मामले में टाटा समूह द्वारा भूमि आवंटन के नियमों के अनुरूप प्लांट लगाने का काम आगे नहीं बढ़ाया गया जिससे स्थानीय लोगों में रोष भी था जिसे समझते हुए कांग्रेस ने वहां पर इसे एक मुद्दा बना लिया और जनता में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए आवंटन को रद्द भी कर दिया है. इस मामले में कहीं न कहीं कुछ ऐसी कमी अवश्य ही रही होगी जिससे टाटा जैसा समूह भी अपनी कही गयी बातों को पूरा नहीं पाया।
                                    भूपेश बघेल सरकार ने किसानों की मांग और समस्या को देखते हुए अपने वायदे को पूरा किया उसे गलत नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से यह पूरा मामला बिगड़ा अब उस पर  विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि खनिज सम्पदा से भरपूर राज्य से पूरे देश और दुनिया के औद्यौगिक समूहों में यह सन्देश भी नहीं जाना चाहिए कि यह सरकार पूरी तरह से उद्योगों की विरोधी है ? टाटा समूह के सामने आखिर वे कौन सी परिथितियाँ उत्पन्न हुईं जिसके चलते इस प्लांट का काम आगे नहीं बढ़ सका भूपेश सरकार को इस बारे में भी गंभीर विचार कर नीतियों के निर्धारण में उद्योगों का भी ख्याल रखना होगा जिससे आने वाले समय में राज्य के औद्यौगिक माहौल को सुधारा जा सके. रमन सरकार की तरफ से आखिर किन स्तरों पर क्या चूक हुई जिससे यह प्लांट मूर्त रूप नहीं ले सका और सरकार के पास क्या विकल्प थे जिसके चलते वह नियमों में सुधार कर टाटा समूह और किसानों के बीच समन्वय स्थापित कर सकती थी ?
                                  बंगाल के बाद टाटा को संभवतः दूसरी बार इस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा जब वह अपनी योजना को मूर्त रूप देने में खुद को असमर्थ पा रहा होगा ? आज टाटा समूह ही नहीं बल्कि सभी औद्यौगिक समूहों के साथ केंद्र तथा राज्य सरकारों को बेहतर समन्वय करने की आवश्यकता है जिससे आने वाले समय में कोई भी परियोजना इस तरह से बीच में न लटक जाये। चिंता की बात यह भी है कि औद्यौगिक माहौल सुधारने की बातें करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में भी इस समस्या का सही हल नहीं खोजा जा सका ? यदि समय रहते केंद्र सरकार का दखल होता या रमन सरकार खुद ही केंद्र की सहायता मांगती तो संभवतः किसानों के आंदोलन से टाटा समूह को दिक्कत न होती और मामला इतना बिगड़ने भी नहीं पाता। बात यहाँ पर किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए समग्र औद्यौगिक विकास की संभावनाएं बढाने की है जिसमें रमन सरकार पूरी तरह से चूक गयी थी पर मामले को अतिवादी होकर एकतरफा निपटने से भूपेश सरकार भी राज्य और देश का भला नहीं कर पायेगी। इसलिए राजनैतिक कारणों को दूर रखते हुए अब राज्य सरकार को नीतियों की कमियों पर ध्यान देकर उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।       
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मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

कमलनाथ की पारी

                                                   एमपी में सत्ता सँभालने के साथ ही अपने पहले आदेश में सीएम कमलनाथ ने २ लाख रुपयों तक के कृषि ऋण के बारे में जो फैसला लिया है वह कांग्रेस के वचन पत्र के अनुरूप ही है पर इसके सही ढंग से क्रियान्वयन के लिए अब पूरा दबाव सीएम कमलनाथ पर ही आने वाला है क्योंकि कई राज्यों ने इस तरह की क़र्ज़ माफ़ी की घोषणा की पर बाद में आंकड़ों की बाज़ीगरी से अधिकारियों ने किसानों का बहुत कम ऋण ही माफ़ होने दिया. कमलनाथ को जनता की समस्याओं के बारे में अच्छे से पता है और वे सरकारी मशीनरी से अच्छे से काम लेना भी जानते हैं तो उनके लिए इस दिशा में आगे बढ़ने में कठिनाइयां कम होने की संभावनाएं भी हैं. फिर भी इस काम के लिए यदि एक राज्यमंत्री की अलग से नियुक्ति कर दी जाये तो संभवतः इस निर्णय को सही तरीके से लागू किया जा सकेगा।  ऋण माफ़ी का कार्य पूरा होने के बाद उस राज्यमंत्री को अलग से किसी विभाग में स्थानांतरित किया जा सकता है। इस कार्य में सही और लाभार्थियों की सूची बनाये जाने का काम सबसे कठिन होता है इसलिए इसे दो स्तरों में किया जाना चाहिए पहले स्तर में बैंकों से सीधे किसानों के ऋण की स्थिति जानी जा सकती है वहीं दूसरे स्तर पर कांग्रेस के कार्यकर्तों को भी इस कार्य में लगाया जा सकता है जो किसी भी किसान को इस लाभ से वंचित होने की स्थिति पर कड़ी नज़र रखने का काम कर सके.
              इसके अतिरिक्त यदि सरकार बेरोज़गारी भत्ते के मामले में आगे बढ़ती है तो वह इन युवाओं से ग्रामीण क्षेत्रों में सर्वे भी करवा सकती है जिससे सरकार को दोहरा लाभ भी हो सकता है। बेरोज़गारों को रोज़गार देने के साथ सरकार इन युवाओं से महीने में कुछ दिन काम भी ले सकती है जिससे युवाओं में काम करने की भावना के साथ सरकार को काम करने वाले युवा हाथों का सम्बल भी मिल जायेगा। जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने जनता से जुड़े मुद्दों को लोकसभा चुनावों को देखते हुए  प्राथमिकता में लिया है उसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि खुद सीम और कांग्रेस पार्टी इसे पीएम मोदी के बड़े खोखले बयानों के सामने काम करने की संस्कृति के रूप में प्रस्तुत करने को तैयार दिखाई देते हैं।  बेशक यह राजनैतिक लाभ के लिए लिया गया निर्णय है पर इसके दूरगामी परिणाम पूरे देश पर आने वाले समय में पड़ने से इंकार भी नहीं किया जा सकता है।
                      स्थानीय युवकों के लिए ७०% रोज़गार देने वाले उद्योगों को सरकारी छूट देने का निर्णय सही कहा जा सकता है पर जिस तरह से सीएम कमलनाथ ने इसके लिए यूपी-बिहार के लोगों द्वारा नौकरियाँ हथियाये जाने की बात की उससे कोई भी सहमत नहीं हो सकता है क्योंकि यह क्षेत्रीय पार्टियों की स्थानीय सोच जैसी बात है और यह भी सोचा जाना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों होता है कि स्थानीय लोगों के रोज़गार को किस तरह से बाहर से आने वाले अन्य राज्यों के लोग पा जाते हैं ? सरकार को एमपी के युवकों में कुशलता के साथ कोई भी काम करने की इच्छाशक्ति बढ़ानी होगी तभी उद्योगों के साथ राज्य के युवाओं का विकास भी हो सकता है। .शिवसेना की तरह जय महाराष्ट्र और मराठी मानुष जैसी सोच का किसी भी अन्य राज्य में समर्थन नहीं किया जा सकता क्योंकि यह संविधान की मूल भावनाओं के विपरीत जाता है।  खुद उद्योगपति होने के कारण कमलनाथ इस बात को अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि सभी को कुशल कामगारों की आवश्यकता होती है और जब तक कुशलता बढ़ाई नहीं जाएगी तब तक हवाई सपने देखने से कुछ भी संभव नहीं है।     
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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

२०१८ के सन्देश

                                  पांच राज्यों में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में जिस तरह से २०१४ से मूर्छा में चल रही कांग्रेस को मतदाताओं द्वारा संजीवनी दी गयी है उससे भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती का ही पता चलता है. जीवंत लोकतंत्र की यही विशेषता होती है कि वह समय आने पर अपने लिए उचित अनुचित का चयन करने में अपनी भूमिका का सही ढंग से निर्वहन करने में कभी नहीं चूकता है. निश्चित तौर पर इन राज्यों से भाजपा के लिए कोई अच्छी खबर पहले भी नहीं आ रही थी पर जिस तरह से भाजपा ने कांग्रेस और राहुलगांधी की सोशल मीडिया पर अपने सोशल मीडिया टीम के दुष्प्रचार से एक नकारात्मक छवि बना दी थी कहीं न कहीं उसके कार्यकर्ताओं के दिल में भी यह बात घर कर गई कि राहुल गाँधी किसी भी परिस्थिति में नरेंद्र मोदी का किसी भी स्तर पर मुक़ाबला नहीं कर सकते हैं जिससे कार्यकर्ताओं की मज़बूत टीम और संघ का ज़मीनी मज़बूत समर्थन होने के बाद भी भाजपा को इन राज्यों में जनता की तरफ से एक सबक दिया गया है जो कि लोकतंत्र का एक हिस्सा ही है. भाजपा की तरफ से आत्म मुग्धता की जो स्थिति २०१४ से चल रही थी उससे बाहर निकलने के लिए पार्टी शाह या मोदी की तरफ से कोई प्रयास भी नहीं किया गया जबकि मोदी-शाह के गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस ने किस तरह से भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं और रुझानों में एक बार वह भाजपा से आगे निकलती हुई भी दिखाई दे गयी थी ? उस समय जनता के मूड और धरातल की वास्तविकता को यदि भाजपा द्वारा पहचाना गया होता तो शायद कर्णाटक में वह सरकार बनाने के साथ इन राज्यों में भी सम्मानजनक तरीके से खुद को स्थापित रख पाती। निश्चित तौर पर भाजपा अपने प्रतिद्वंदियों से राजनैतिक रुप से निपटने के लिए एक बहुत निर्दयी दल है और यह हार मोदी और शाह को अपने घर को २०१९ के लिए दुरुस्त करने के लिए और भी प्रेरित ही करने वाले हैं जिससे कांग्रेस को सचेत रहने की आवश्यकता भी है.
                  कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से यह परिणाम संतोष देने वाले हैं क्योंकि पूरे देश में उसके कार्यकताओं का मनोबल २०१४ में इतना टूट गया था जिसे संजीवनी की आवश्यकता भी थी. इन राज्यों के चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के लिए एक स्पष्ट भूमिका का निर्धारण किया और उसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी परिस्थिति में उसके नेताओं की तरफ से विरोधियों पर व्यक्तिगत और स्तरहीन हमले न किये जाये जिससे पार्टी को अनावश्यक वोटर्स की नाराज़गी न झेलनी पड़े जैसा कि गुजरात चुनाव में हुआ था. राहुल गांधी कांग्रेस को किस स्तर तक ले जायेंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है पर कुछ मामलों में उन्होंने जिस तरह की शुरुवात की है वह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत कहा जा सकता है. आज कांग्रेस ज़मीन पर उतर कर आम लोगों की समस्याओं और उनको दूर करने के लिए काम करने की इच्छुक दिखाई देती है जो कि पहले की कांग्रेस से बिलकुल अलग है. लोकतंत्र के लिए यह इस लिए भी अच्छा है कि कम से कम एक बार फिर से धार्मिक उन्माद और उग्र राष्ट्रवाद के बीच भी आम लोग भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस को कुछ हद तक विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। आज हर विमर्श में काँग्रेस के प्रवक्ताओं की नयी पौध बेहतर तैयारी के साथ मैदान में आती है और अब वह अनावश्यक मुद्दों में उलझने के स्थान पर जनता से जुड़े मुद्दों पर ही बहस को केंद्रित रखने की कोशिशें करती भी दिखती है जिससे देश के आम मध्यवर्ग में उसका सन्देश आसानी से पहुँच भी जाता है कि उसकी तरफ से कम से कम कोशिशें तो की जा रही हैं. कांग्रेस के नए युवा प्रवक्ता शालीनता के साथ अपना काम करते हैं पर आवश्यकता पड़ने पर मुद्दों पर आधारित हमलों से भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्तों को भी तथ्य हीन कर देते हैं.
                       भाजपा अब जहाँ आक्रामक रूप से कांग्रेस पर हमलावर होने जा रही है वहीं कांग्रेस के लिए भी बड़ी चुनौती के लिए तैयार होने के लिए समय कम ही बचा है. तीन राज्यों में सीएम चुनने में जिस तरह से राहुल गाँधी की तरफ से सावधानियां बरती जा रही हैं वह उनके सबको साथ लेकर बड़ी लड़ाई लड़ने की तैयारी भी कही जा सकती है क्योंकि भाजपा को किसी भी तरह से कमज़ोर मानकर अब कांग्रेस भी चुप नहीं बैठ सकती है आज भी भाजपा के पास ज़मीन पर काम करने के लिए पर्याप्त कार्यकर्त्ता और संघ का समर्थन मौजूद है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इन राज्यों में सरकार बनने के  १० दिनों के अंदर पूरे किये जाने वाले वायदों पर भी नज़र रख उन्हें अमल में लाना होगा जिससे जनता में यह सन्देश जा सके कि राहुल की कांग्रेस अब अपने वायदों को अमली जामा भी पहनाती है. भाजपा में मोदी और कांग्रेस में राहुल निर्विवाद रूप से सर्वोच्च नेता है इसलिए अब इन दोनों पर ही अपने दलों के मनोबल को उंच रख जनता से जुड़े रहने का दबाव भी आ गया है और यदि इन तीन राज्यों में कांग्रेस अपने वायदों पर चलती दिखाई दी तो २०१९ में वह मोदी के लिए मज़बूत चुनौती के रूप में सामने आ सकती है. इसलिए अब मामला रोचक स्थिति में पहुँच गया है जिसमें जनता के सरोकारों पर और भी बहस और निर्णय लेने की स्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं.                         

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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

विमुद्रीकरण की समस्याएं

                                                 देश में बड़े नोटों के विमुद्रीकरण को एक महीना बीत जाने के बाद भी जिस तरह से आम लोगों की समस्यायों का अंत होता नहीं दिखाई दे रहा है उससे यही लगता है कि इतने बड़े फैसले पर सरकार और रिज़र्व बैंक के आंकलन में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक भी हुई है जिससे पूरे देश में बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. यह भी सही है कि आम लोग आज भी सरकार के इस फैसले को पूरी आशा के साथ पूरा होते हुए देखने के आकांक्षी भी हैं पर उनकी दैनिक जीवनचर्या जिस तरह से प्रभावित हुई है वह कब कम हो पायेगी इस बात का जवाब भी खोजते हुए सभी दिखाई दे रहे हैं. अब यह भी स्पष्ट हो रहा है कि अगले वर्ष पञ्च राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों को देखते हुए ही सरकार ने आनन फानन में इतनी बड़ी घोषणा कर दी जबकि उसके पास नकदी के सम्बन्ध में सटीक आंकड़े भी नहीं थे क्योंकि जिन १४ लाख करोड़ से कुछ अधिक नोटों में से ५/६ लाख करोड़ रूपये कालेधन के रूप में होने का सरकार को अनुमान था विभिन्न कारणों से वह ध्वस्त हो चुका है और सरकार का यह कहना पूरी तरह से बेमानी लगता है कि इससे वह आम लोगों की भलाई के लिए नयी योजनाएं शुरू कर पायेगी क्योंकि जितनी भलाई होनी है उससे अधिक नुकसान तो देश में आर्थिक माहौल थमने से हो ही चुका है.
                                   अब स्थिति यह है कि सरकार अपनी कवायद को विभिन्न कारणों से सफल बताना चाहती है पर उसके पास इन बातों के समर्थन में प्रस्तुत करने लायक आंकड़े ही नहीं हैं और उसकी इस मजबूरी का लाभ विपक्ष उठाना चाहता है जिससे वह भी जनता की समस्याओं में अपनी राजनीति को सम्मिलित कर सके. जैसी कि खबर दी जा रही है कि पौने चार लाख करोड़ की नकदी एक महीने में बाज़ार में बैंकों के माध्यम से पहुँच चुकी है तो अभी भी सरकार को लगभग १४ लाख करोड़ की व्यवस्था करनी है जिसमें संभवतः ६ महीने या उससे भी अधिक समय लग सकता है. यह एक लंबी प्रक्रिया थी जिस के लिये कई महीनों की समग्र तैयारी की आवश्यकता भी थी पर इस बारे में एक ही झटके में फैसला ले लिए गया था जिसके दुष्परिणाम आज सामने आ रहे हैं. यह सही है कि देश में लोगों की पहुँच आधुनिक संसाधनों की तरफ बढ़ रही है जिससे वे अधिक जागरूक भी हो रहे हैं पर जिस तरह से निजी वालेट कंपनियों को इस क्षेत्र में खुली छूट मिल गयी है उससे हमारे बैंकिंग सिस्टम पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की पूरी संभावनाएं भी हैं क्योंकि एनपीसीए की तरफ से जारी किये गए यूपीआई एप्लीकेशन्स के बारे में न तो बैंक ही जागरूक हैं और न ही जनता को इस बारे में पहले से बताया गया था. साथ ही प्रारंभिक स्तर पर होने के कारण अधिकांश ग्राहक अपने पंजीकरण को भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं जिससे निजी वालेट पर उनकी निर्भरता बढ़ती ही जा रही है.
                                   देश के अपने ढांचे को मज़बूत करने के लिए जिस तरह से कोशिशें की जानी चाहिए थीं आज वे अधूरी ही है और आने वाले समय में नोटबंदी के चलते अब उनको समय से पूरा कर पाना भी संभव नहीं है जिससे स्थितियां और भी खराब होती जा रही हैं. एक अच्छी बात यह है कि सरकार ने तकनीकी विशेषज्ञ, आधार के जनक और कांग्रेसी नेता नंदन नीलकेणी के साथ मिलकर आज की स्थितियों को सँभालने के लिए एक समिति बना दी है जो देश को नकदी पर निर्भरता कम करने के लिए उचित काम करने की दिशा में बढ़ना शुरू कर चुकी है जिससे कुछ मोर्चों पर तो अगले कुछ हफ़्तों में ही परिवर्तन महसूस हो सकता है. अब समय आ गया है कि सरकार और विपक्ष संसद में चल रहे गतिरोध को आगे बढ़कर समाप्त करने के बारे में सोचें जिससे देश की जनता के लिए कष्टों पर बात करने के स्थान पर कुछ ठोस कदम भी उठाए जा सकें. देश को काले धन के नाम पर उपजी इस समस्या के उचित समाधान की आवश्यकता भी है जिससे सम्पूर्ण रूप से देश की आर्थिक गतिविधियों को वापस पटरी पर लाया जा सके पर वर्तमान परिस्थिति में देश का राजनैतिक तंत्र अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभा पाने में पूरी तरह से असफल  होता ही दिखाई दे रहा है.         
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बुधवार, 23 नवंबर 2016

नोट बंदी जनता और जन-प्रतिनिधि

                                                   ८ नवम्बर की रात हुई घोषणा के बाद जिस तरह से देश में आम लोगों की समस्याओं में दिन प्रतिदिन बढ़ोत्तरी ही होती जा रही है उससे यही लगता है कि यह मामला अभी बहुत लंबा खिंच सकता है क्योंकि बैंकों के पास जिस संख्या में नए नोट होने चाहिए थे वह उसके कहीं से भी बराबर तो क्या चौथाई हिस्से तक भी नहीं पहुंच पा रहे हैं जिसका मुख्य कारण नए नोटों की छपाई होना भी है क्योंकि पूरी क्षमता से छापने के बाद भी इस स्थिति से निपटने और देश की ८६% करेंसी को बदलने में इस रफ़्तार से अभी भी दो महीने लग सकते हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार और देश के राजनैतिक तंत्र के पास क्या विकल्प शेष हैं जिनको अपनाकर इस समस्या की तीव्रता को कुछ कम किया जा सकता है. इस तरह की स्थिति में संसद के शीत कालीन सत्र में भी कोई काम नहीं हो पा रहा है क्योंकि सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी अपनी स्थितियों में डटे रहकर हर तरह का राजनैतिक लाभ उठाने की मंशा पाले हुए हैं. बिना ठोस तैयारी के जिस तरह से आनन् फानन में यह कदम उठाया गया उससे इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि भाजपा ने इस मामले का लाभ यूपी चुनावों में उठाने के मकसद से ऐसा किया वहीं आम लोगों की समस्याओं को उठाकर विपक्ष भी सरकार पर हर तरह से हमलावर हो रहा है जिसका देश या देश की जनता को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है.
                                          ऐसी स्थिति में संसद के शीतकालीन सत्र और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चल रहे सत्रों को पूरी तरह से स्थगित किया जाना चाहिए तथा जिन राज्यों में ये सत्र शुरू होने हैं वहां पर इनको आगे बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि देश की जनता के लिए संसद और विधानसभाओं में होने वाले हंगामे से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आम लोगों को देश के नेता इस विपरीत परिस्थिति में किस तरह से मदद पहुंचा सकते हैं. भले ही इस बात को स्वीकार न किया जाये पर ज़मीनी हकीकत को देखा जाये तो देश में आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति तो चल ही रही है लोगों के खातों में पैसा है पर बैंकों के पास भुगतान करने के लिए धन की व्यवस्था नहीं है ऐसी स्थिति में अब जनता और बैंकों के पास कितने विकल्प शेष बचते हैं ? देश के संविधान ने माननीयों को बहुत सारी सुविधाएँ दे रखी हैं तो आज की परिस्थितियों के अनुसार जब जनता को व्यवस्था की आवश्यकता है तो इन माननीयों को संसद और विधान सभाओं के स्थान पर बैंकों और डाकघरों के बाहर लाइन में खडी जनता के साथ दिखाई देना चाहिए. देश में ऐसा संकट पहली बार है जब आर्थिक व्यवस्था करीब करीब चरमरा चुकी है और जनता के पास बेहतर भविष्य के लिए इसका समर्थन करने के अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं है तो देश के राजनैतिक तंत्र को क्या जनता की मदद के लिए सड़कों पर नहीं होना चाहिए ? हमारे माननीय सदैव ही अपने को किसी और प्रजाति का मान लेते हैं जिनको जनता से जुड़े हुए सरोकारों से कोई ख़ास मतलब नहीं होता है जिससे जनता अपने को ठग हुआ महसूस करती है.
                                          सभी सांसदों और विधायकों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे अपने क्षेत्र के बैंक और डाकघरों का दौरा करें तथा स्वयं या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से जनता की समस्याओं को सुलझाने की कोशिशें भी करें. यदि हज़ारों की संख्या में माननीय अपने क्षेत्रों में निकल पड़ेंगें तो बैंकों, डाकघरों और पुलिस प्रशासन का काम आसान ही होने वाला है क्योंकि दिल्ली और मुम्बई से जारी होने वाले सरकार और रिज़र्व बैंक के निर्देशों को बैंकों तक पहुँचने में जो समय लग रहा है वह भी जनता की परेशानियों को बढ़ाने वाला ही है. समय चाहे जो भी लगे पर जनता के लिए बैंक और डाकघरों के बाहर सुचारू रूप से टोकन देने की व्यवस्था की जानी चाहिए जो सभी राजनैतिक दलों के द्वारा सहयोग से की जाये क्योंकि सबसे बड़ा सवाल यह है कि वोट मांगने के समय फैले हुए हाथ आज किसानों के खेतों तक बीज और खाद पहुंचाने के लिए सामने क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं ? जनता को आम जन प्रतिनिधि से वैसे भी कोई विशेष काम या उम्मीद नहीं होती है तो कम से कम इस आर्थिक विपत्ति में उनके खेतों तक बीज पहुँच जाये तो देश का भला हो सकता है पर क्या देश का राजनैतिक तंत्र अपनी झूठी शान से बाहर निकल कर जनता के लिए इस तरह से काम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी है ? क्या वह जनता के उन उलाहनों को सुनने की शक्ति रखता है जो लाइन में खड़े होकर परेशानी झेलते हुए उसकी तरफ से लगातार दिए जा रहे हैं ? देश में ऐसा कोई कानून ही नहीं है जिसके चलते सांसदों और विधायकों के लिए यह आवश्यक कर दिया जाए कि अपने क्षेत्र के कम से कम १०० बैंक और डाकघरों से उपस्थित रहने के प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के बाद ही उनको सदन के अगले सत्र में भाग लेने की अनुमति मिल पायेगी. यदि ऐसा कर दिया जाए तो आने वाले समय में विभिन्न समस्याओं से निपटने के लिए इस प्रमाण पत्र पर जनता की संस्तुति भी ली जाये जिससे हमारे माननीय कुछ और ज़िम्मेदार हो सकें.    
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गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

पराली और प्रदूषण

                                                                            हमारे देश में महत्वपूर्ण मुद्दों की तरफ ध्यान न देना अपने आप में एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है क्योंकि इस वर्ष मानसून के अन्तिम चरण में पहुँच जाने और उत्तर भारत के खेतों में धान की कटाई के बाद उसकी पराली को सही तरह से उपयोग करने के लिए जो भी कोशिशें पिछले वर्ष की गयी थीं उनके कोई सकारात्मक परिणाम सामने आते नहीं दिखाई दे रहे हैं. आज एक बार फिर से उत्तर भारत की हवाओं में इस पराली के खेतों में जलाये जाने के चलते प्रदूषण का स्तर बढ़ना शुरू हो चुका है और जिस तरह से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसल को काटने के बाद आवश्यकता से अधिक बची हुई पराली को खेतों में ही जलाने का काम शुरू हो चुका है वह अपने आप में चिंतनीय भी है. इस मामले में पिछले वर्ष जिस तरह से सक्रियता दिखाई गयी थी इस वर्ष सभी पक्ष चुप और लापरवाह ही दिखाई दे रहे हैं जिससे दिल्ली जैसे महानगरों के साथ उत्तर भारत के अन्य बड़े शहरों के साथ गांवों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा तो बनना शुरू ही हो चुका है. देश की समस्या यह है कि हमारी नीतियों में समय से काम करने और विभिन्न सरकारी विभागों और सरकारों के समन्वय की जो रूपरेखा है वह केवल कागज़ी खानापूरी तक ही सीमित रह गयी है पर भारत ने जिस तरह से जलवायु परिवर्तन के समझौते पर सहमति दिखाई है तो आने वाले समय में पराली भी हमारे लिए एक बड़ी समस्या का कारण बन सकती है.
                      सबसे पहले हमें इस बात पर विचार करना होगा कि पहले के मुक़ाबले अब पराली की समस्या इतनी विकराल क्यों होती जा रही है क्योंकि देश में खेती हमेशा से ही होती रही है पर यह समस्या के रूप में अब हमारे सामने आनी शुरू हुई है. पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से खेती का आधुनिकीकरण हुआ है उसके चलते गांवों में पशुओं की संख्या में कमी आनी शुरू हुई है और पहले जो किसान खेती के साथ पशुधन को भी एक समानांतर अर्थ व्यवस्था के रूप में चलाते थे आज वे अन्य कामों की तरफ मुड़े हुए दिखाई देते हैं जिससे खेती में अनाज के अतिरिक्त होने वाले अन्य पदार्थों का उपयोग पशुओं के लिए कम होने लगा है. खेती के आधुनिकीकरण से जहाँ पैदावार में बढ़ोत्तरी हुई वहीं अनाज के अतिरिक्त उसके अन्य पदार्थों के उपयोग के सही तरह से निस्तारण के बारे में कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायीं गयी जिसके चलते अपनी आवश्यकता से अधिक पराली को किसानों द्वारा खेतों में ही जलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी. एक संसय जब यह सीमित मात्रा में थी तो इस पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता था पर आज जब अधिकांश किसानों की तरफ से अनावश्यक पराली ने निपटने के लिए यह तरीका अपनाया जाने लगा है तो इसका पूरे वायु मंडल में हवा की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा है.
              इस बारे में सबसे पहले यह विचार किया जाना चाहिए कि खेती के इस तरह के पदार्थों का किस तरह से निस्तारण करना उचित है और यदि इसके बारे में कोई कारगर प्रक्रिया बनाई जा सके तो आने वाले समय में इसका दोहरा लाभ भी किसानों को मिल सकता है. अपनी आवश्यकता से अधिक पराली को किसानों को जलाने से रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर सरकार और पंचायतों को इसके माध्यम से खाद बनाने और अन्य कामों में उपयोग करने के बार में स्पष्ट और कारगर नीति की आवश्यकता है. एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग ५० टन पराली होती है जिसमें से केवल आधी ही उपयोग में लायी जाती है शेष को खेतों में ही जला दिया जाता है ऐसी स्थिति में जब किसानों को पराली से निपटने का कोई कारगर रास्ता नहीं मिलता है तो वे इसे जलाकर अपने खेतों को खाली करने का काम किया करते हैं. सरकार को अब इस समस्या से निपटने के लिए कुछ ठोस प्रारूप बनान ही होगा जिससे आने वाले समय में इसका सही उपयोग किया जा सके और किसानों को कुछ लाभ के अलावा देश के पर्यावरण को सही रखने में मदद भी मिल सके.
               चीन में इस समय से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर बायो एनर्जी के साथ जैविक खाद बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है जिससे पर्यावरण को नुकसान भी नहीं होता और किसानों को कुछ अतिरिक्त लाभ भी मिल जाता है. हमारे देश में इस प्रक्रिया को यदि पूरी तरह से सरकारी योजना के रूप में लागू किया गया तो इसके चल पाने की संभावनाएं कम ही दिखाई देती हैं क्योंकि हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से योजना के लिए आवंटित धन की बंदरबांट तो आसानी से हो जाएगी पर जिस उद्देश्य से इसे शुरू किया जायेगा वह पूरा नहीं हो पायेगा. प्रायोगिक तौर पर अगले वर्ष से इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार को आधारभूत ढांचा अभी से बनाने के बारे में अभी दे सोचना होगा इसका जैविक खाद के रूप में उपयोग करना सबसे आसान विकल्प होगा क्योंकि इसे ब्लॉक स्तर पर भी कम लागत से छोटे कारखाने लगाकर तैयार करने की कोशिशें की जा सकती हैं. हर जिले में एक केंद्रीय स्थान को खोजकर वहां पर जैविक खाद और बायो एनर्जी के बड़े प्लांट लगाकर भी इसका उपयोग किया जा सकता है. यदि अभी से इसके बारे में सीधे किसानों को दोषी बनाने के स्थान पर उनको जागरूक कर इसके बारे में सही तरह से निस्तारण की जानकारियां दी जाएँ तो पंजाब और हरियाणा के किसान इससे भरपूर लाभ भी उठा सकते हैं. अच्छा हो कि आने वाले समय में इस पराली से स्वच्छ ऊर्जा और जैविक खाद बनाने की दिशा में देश और आगे बढ़ जाये जिससे किसानों की खुशहाली के साथ पर्यावरण की रक्षा भी अच्छी तरह से हो सके.
                   
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शनिवार, 14 मई 2016

सूखा, कोर्ट और सरकारें

                                                         लगता है देश में बनने वाली सरकारों का सामाजिक सरोकारों से ध्यान हटता जा रहा है क्योंकि जिस तरह से सामान्य प्रशासन को चलाने के लिए देश में त्रिस्तरीय लोकतंत्र की व्यवस्था की गयी है उसके बाद भी यह चुने हुए प्रतिनिधि या उनके नेतृत्व में चलने वाली सरकारें आखिर क्यों वह सब नहीं कर पा रही हैं जिसकी आशा संविधान ने उनसे की थी ? यह मुद्दा किसी एक दल या उसकी सरकार से जुड़ा हुआ नहीं है क्योंकि विपरीत परिस्थितियों में जिस तरह से सरकारों का रवैया समस्या से आँखें मूंदने जैसा ही रहा करता है उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका से जुड़े मुद्दे में सरकारों के शुतुरमुर्गी रवैये की भी आलोचना की है. साथ है उसने केंद्र सरकार के साथ राज्यों में चल रही सरकारों के लिए भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है जिसका जवाब आज के सुविधाभोगी राजनेताओं के पास कहीं से भी उपलब्ध नहीं है क्योंकि देश को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनाने के चक्कर में हमारे नेता पिछले कई दशकों से अपनी उन संवैधानिक ज़िम्मेदारियों को गुपचुप तरीके से हल्का करने में लगे हुए हैं जिनमें देश के गरीब और किसान आते हैं.
                पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से देश की सामान्य समस्याओं से निपटने में हमारी विधायिका पूरी तरह से असफल ही नज़र आती है और सही नीतियां बनवाने के लिए कुछ लोग कोर्टों में जनहित याचिकाएं दखिल करने में लगे हुए हैं तो उससे क्या साबित होता है ? हमारे लोकतंत्र की मज़बूत नींव तो आज भी ठीक है पर इन लोकतंत्र के शीर्ष भवनों में बैठने वाले नेताओं में वह इच्छाशक्ति नहीं बची है जिसके दम पर कभी कम संसाधन होने के बाद भी गवर्नेंस दिखाई दिया करती थी सम्भवतः इसलिए ही रोज़ ही आम मुद्दों पर देश की कोई न कोई अदालत विधायिका पर टिप्पणी करने को मजबूर हो रही है. देश में व्याप्त सूखे को लेकर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार को निशाने पर लिया है उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं से कोर्ट को भी यह लगने लगा है कि सरकार अपना दायित्व निभा पाने में पूरी तरह से विफल ही साबित हो रही है. इस टिप्पणी को केवल मोदी सरकार के खिलाफ मानकर ही खुश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि राज्यों में अन्य दलों की सरकारें भी कुछ अच्छा नहीं कर पा रही हैं जिसके बाद उन पर भी कोर्ट ने टिप्पणी की है तथा केंद्र सरकार को यह चेताया है कि राज्यों के हाथ खींच लेने के बाद भी केंद्र की ज़िम्मेदारियाँ कम नहीं हो जाती हैं.
                  इस मुद्दे पर देश के हर जनपद में जन प्रतिनिधियों की एक समिति बनायीं जानी चाहिए जो इस तरह से सूखे का वास्तविक आंकलन करने में सक्षम हो तथा जिसमें निचले स्तर के वे अधिकारी भी शामिल किये जाएँ जिन पर जनता तक राहत पहुँचाने की ज़िम्मेदारी आती है क्योंकि किसी क्षेत्र विशेष की क्या आवश्यकता है और उससे निपटने के लिए किस तरह के प्रयासों की आवश्यकता है यह तय करना आज सब ज़रूरी भी है. दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में बैठकर ज़मीनी मसले हल कर पाना किसी भी तरह से संभव नहीं है और दुर्भाग्य से आज हमारे नेताओं ने क्षेत्र में जाना छोड़ दिया है और वे निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारियों की रिपोर्ट्स पर ही पूरी तरह से निर्भर रहने लगे हैं जिससे भी इस तरह की समस्याएं सामने आती हैं. एक समय मोदी और भाजपा की आँखों की किरकिरी रही मनरेगा के बारे में कोर्ट ने जिस तरह से स्पष्ट निर्देश दिया है वह उसके लिए एक बड़ा झटका भी है क्योंकि कोर्ट ने इस मुद्दे पर यह मान लिया है कि इस योजना के माध्यम से उन लोगों को सीधे तौर पर मदद पहुंचाई जा सकती है जो आज अपने लिए दो समय की रोटी के लिए भी संघर्षरत हैं. मनरेगा के बजट के मामले में कोर्ट ने जिस तरह से कड़ी टिप्पणी की है वह सरकार के लिए और भी बड़ी चुनौती है क्योंकि उसमें ऐसा लगता है जैसे सरकार इस योजना के लिए पैसे की कमी का बहाना ही करती रहती है. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

मानवजनित सूखा या प्राकृतिक आपदा


                                                 आईपीएल में मैदानों के रख रखाव के बहाने जिस तरह से महाराष्ट्र में सूखे का मुद्दा पूरे देश के सामने आया है वह निश्चित तौर पर सही तरीका तो नहीं कहा जा सकता है पर देश में जनता, सरकार और प्रशासन का गम्भीर मुद्दों पर जिस तरह से अनमना सा रुख ही रहा करता है उस स्थिति को सामने लाने का इससे बेहतर तरीका और हो भी नहीं सकता था. देश के हर हिस्से में हरित क्षेत्र को जिस तरह से वन माफियाओं और सरकारी अधिकारियों के गठजोड़ से लगातार साफ़ किया जा रहा है यह प्रारंभिक परिणाम उसी दिशा की तरफ संकेत करता है क्योंकि हज़ारों वर्षों से देश में वर्षा जल संचयन की जो प्रक्रिया अपनाई जाती रहती थी आज उस पर भूमि की बढ़ती कीमत के चलते अनुपालन करना पूरी तरह से बंद कर दिया गया है जिससे उन क्षेत्रों में भी भूजल लगातार नीचे खिसकता जा रहा है जहाँ जल की कभी भी समस्या ही नहीं रही है. पांच नदियों के राज्य पंजाब में खेती के लिए अनियंत्रित भूजल दोहन से परिस्थितियां कितनी विपरीत हो गईं हैं सभी को पता है फिर भी आज तक देश में भूजल भण्डारण और उनके उपयोग से सम्बंधित कोई भी सही योजना नहीं बनायीं जा सकी है.
                          सरकारें किस तरह से काम करती हैं इसका सबसे बड़ा उदाहरण महाराष्ट्र ही है क्योंकि आज देश में इसी राज्य में सबसे अधिक बांधों का निर्माण किया गया है क्योंकि सरकारी सोच यही रही कि इस तरह के बांध बनाकर वर्षा के पानी को आसानी से संचित किया जा सकता है पर वन विभाग ने कभी भी अपनी ज़िम्मेदारी की तरफ ध्यान ही नहीं दिया जिसके माध्यम से पूरे प्रदेश में वन क्षेत्र को बढ़ाये जाने की कोशिशें भी होनी चाहिए थीं. आज जब मराठवाड़ा की धरती पर हरे पेड़ ही नहीं बचे हैं तो आखिर किस तरह से बादलों को वे परिस्थितियां मिल सकती हैं जिनमें वे वर्षा किया करते हैं और इन परिस्थितियों को सही दिशा में सुधारने के स्थान पर सभी दलों की सरकारों और प्रशासन का ध्यान पूरी तरह से केवल इस बात पर ही रहता है कि किस तरह से सभी को भ्रष्टाचार में लिपटी हुई सूखा राहत सामग्री का वितरण किया जाये. यह सही है कि पीड़ित लोगों के लिए तात्कालिक उपाय भी किये जाने चाहिए पर वे उपाय इतने सतही भी नहीं होने चाहिए जिनसे कुछ भी स्थायी रूप से हासिल न किया जा सके. ग्रामीण गारंटी योजना के माध्यम से बड़े बांधों के स्थान पर गांवों में छोटे तालाब और कुंए खोदने का काम किया जाना चाहिए जिससे आने वाले वर्षों में वर्षा होने पर उसके माध्यम से भूगर्भीय जल के स्रोतों को पुनर्जीवित किया जा सके.
                                   यदि ध्यान से देखा जाये तो आज ऐसी ही स्थिति देश के हर राज्य में दिखाई देने लगी है बड़े शहरों में तो स्थिति और भी निराशाजनक ही दिखाई देती है क्योंकि उनके अनियंत्रित विकास के दौर में हमारे वे गांव भी समाप्त होते जा रहे हैं जिनके माध्यम से कभी पर्यावरण संबंधी चिंताओं को समझे बिना ही पडोसी शहर पूरा लाभ भी उठा लिया करते थे. कानून के बनाए जाने से ही समस्या का हल नहीं हो जाता है और भूगर्भीय जल के दोहन और रिचार्जिंग पर अब सभी को गम्भीरता से सोचना ही होगा क्योंकि आधुनिकता और विकास के लिए आवश्यक बिजली बनाए जाने के लिए जिस तरह से सदा नीरा नदियों पर तेज़ी से बांध बनाए जा रहे हैं उनके चलते आने वाले समय में इन नदियों में पानी ही नहीं होगा और इसी कारण से नदियों के किनारे के प्राकृतिक जल स्रोत जो नदियों को मैदानों में भी जीवित रखने का काम किया करते हैं वे अपने आप ही सूखते जा रहे हैं. देश में कड़े कानूनों के बाद भी सभी लोग इस तरह के अनैतिक कार्यों को करने के लिए जुगाड़ तलाश ही लेते हैं और सरे आम कानून और प्रशासन की आँखों में धूलझोंक कर अपने काम करते ही रहते हैं. इस बारे में अब देश के हर नागरिक को भी जागरूक होना पड़ेगा तभी पूरे देश के जल संकट से सही तरह से निपटा जा सकता है अन्यथा कोई भी व्यवस्था जुगाड़ लगाकर देश को हर स्तर पर नुकसान पहुँचाने का काम ही करने वाली है.      मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 16 मार्च 2016

कृषि, कर और चोरी

                                                देश के बारे में कोई भी जानकारी देते समय अक्सर ही यह कहकर बात की शुरुवात की जाती है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहाँ के ग्रामीण क्षेत्र की अधिकांश जनता आज भी कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था पर ही अपनी जीविका के लिए निर्भर है. देश के किसानों के पास आज भी पूरी तरह से आधुनिक खेती करने की सभी संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाये हैं इसलिए ही संविधान में कृषि से होने वाली आय को आयकर और किसी भी तरह के अन्य कर से मुक्त रखा गया है. इस तरह की छूट देने के पीछे सरकार की यह मंशा स्पष्ट थी कि खेती में सब कुछ सदैव निर्धारित तरीके से ही होता रहे इस बात की निश्चितता नहीं होती है इसलिए ही किसानों को अपने उत्पाद के आधार पर हर तरह के अनावश्यक करों से मुक्ति दे दी जाये और आयकर के किसी भी मानक में उन्हें कहीं से भी न रखा जाये जिससे उनकी अनिश्चित आमदनी होने के चलते उन पर कोई अनावश्यक बोझ भी न पड़ जाये पर सरकार की इस मंशा का दुरूपयोग अमीरों ने किस तरह से किया इसका उदाहरण इस बात से ही समझा जा सकता है कि इस नियम के माध्यम से कर चोरी करने को एक बड़ा उपाय मान लिया गया है.
                 मात्र कुछ लोगों की कृषि से होने वाली आय कुछ अरब रुपयों से बढ़कर किस तरह से लाखों करोड़ों तक पहुंच गयी इस बात का जवाब किसी के पास भी नहीं है क्योंकि आयकर के सलाहकारों और इस नियम का लाभ उठाने वालों ने इस बात पर कभी गौर ही नहीं किया कि जिस सोच के साथ वे एक जिले में काम कर रहे हैं कहीं न कहीं यही सोच पूरे देश में काम कर रही है इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि एक पूर्व आयकर अधिकारी द्वारा मांगी गयी सूचना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया जिसमें यह पता चला कि वर्ष २०११/१२ में आयकर चुकाने वाले लोगों की कृषि आधारित आय २००० लाख करोड़ रुपयों से भी अधिक हो गयी ? बेशक इस धनराशि पर सरकार की कोई नज़र नहीं होती है और इसको केवल कागज़ों पर दिखाकर कालेधन को सफ़ेद करने का काम ही आसानी से किया जाता है तो यह भी मान जाना चाहिए कि देश में एक वित्तीय वर्ष में इतना कालाधन इस योजना का माध्यम से सफ़ेद किया गया ? किसी भी सरकार के पास क्या यही होना चाहिए कि जिस मद से उसे टैक्स नहीं मिल रहा है उस मद में आम लोगों द्वारा किया कहा जा रहा है इस बात की जांच भी न की जाये और इन लोगों को सुविधा के नाम पर बनाये गए नियमों की कमी का खुला लाभ उठाने के लिए छोड़ दिया जाये ?
                  संसद में यह मामला उठाये जाने के बाद जिस तरह से वित्त मंत्री का बयान आया कि इस सूची में कुछ बड़े नाम भी हो सकते हैं तो विपक्ष उन पर राजनीति करने के आरोप लगाने से बचे इस पर विपक्षी बेंचों से इस सूची को जारी करने की माँग भी की गयी पर इस मांग को वित्त मंत्री ने पूरी तरह से अनसुना ही कर दिया. किसानों के लाभ के लिए बनाये गए इस नियम का जिन भी लोगों ने दुरूपयोग किया है देश को उनके नाम जानने का पूरा अधिकार है और विभिन्न नियमों के पीछे छिपकर कर चोरी करने में जो भी लोग आगे हैं वे भले ही किसी भी श्रेणी के क्यों न हों उनके बारे में सरकार को संसद में पूरी जानकारी देनी चाहिए. देश को यह जानना है कि किसानों के लिए बनाये गए इस नियम के पीछे किन लोगों ने अपने काले धन को सफ़ेद करने के लिए पूरा लाभ उठाया है और उनकी कृषि कितनी बड़ी है कि देश में इतनी बड़ी संपत्ति कृषि से बनायीं जा सकती है जबकि आम किसान लगातार आत्महत्या करने पर मजबूर होता जा रहा है ? इस मामले में किसी को भी छोड़ा नहीं जाना चाहिए भले ही वह कितना भी प्रभावशाली ही क्यों न हो क्योंकि यह तो एक बानगी है यदि पूरे कानूनों का आंकलन किया जाये तो संभवतः पूरे देश में कालेधन की एक समानांतर अर्थव्यवस्था के भी चलने से इंकार नहीं किया जा सकता है.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 1 मार्च 2016

गांवों की तरफ जाता बजट

                                      मोदी सरकार द्वारा पेश किया गया तीसरा बजट इस बात के लिए भी जाना जायेगा कि उसने देश की वास्तविक स्थिति को समझने में दो वर्ष लगा दिए और अब जाकर उसे यह समझ में आया कि यदि भारत की आर्थिक गाड़ी की रफ़्तार को हर हाल में बनाये रखना है तो देश के औद्योगिक विकास के साथ सबसे अहम कृषि क्षेत्र को सुधारने और उसमें अधिक धन डालने की आवश्यकता भी है क्योंकि देश की अधिकांश आबादी जो कि कृषि पर ही निर्भर करती है उसकी अनदेखी करने से किसी भी सरकार के हितों और किसानों को रक्षा नहीं की जा सकती है. जिस देश में आज भी रोजगार का ६५% हिस्सा कृषि के माध्यम से ही आता हो वहां पर सिर्फ औद्योगिकीकरण की बातों के माध्यम से देश को आगे बढ़ाना संभव भी नहीं है. जिस मनरेगा को संसद में गड्ढे खोदने वाला कार्यक्रम बताकर खुद पीएम मोदी ने पिछले वर्ष मजाक उड़ाया था आज उनकी मज़बूत सरकार को मजबूरी में ही सही पर उसके लिए अब तक का सर्वाधिक बजट देने को मजबूर होना पड़ा है जिससे यह पता चलता है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों की उपेक्षा करने से समस्या पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता है. यह भी संभव है कि मोदी सरकार राहुल गांधी के भाषणों में प्रमुखता पाने वाली सूट बूट की सरकार वाली छवि को तोड़ने का काम भी करना चाहती हो.
                                बजट बनाने के लिए देश के अर्थशास्त्रियों की गंभीर राय ली जानी चाहिए और राजनेताओं का उसमें न्यूनतम हस्तक्षेप होना चाहिए इस बात से कोई भी इंकार नहीं करता है पर जब तक राजनेता अर्थशास्त्रियों द्वारा बनायीं गयी नीतियों को पूरे मन से लागू नहीं करेंगें तब तक देश की आर्थिक प्रगति को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है. संसद में सत्ता को साधने के साथ सरकार चलाने को मजबूर नरसिंह राव और अटल बिहारी की सरकारों ने कई मामलों में देश को अच्छी नीतियां देने के साथ आर्थिक प्रगति के चक्के को तेज़ी से घुमाने में सफलता पायी क्योंकि दोनों ने ही अपने वित्त मंत्रियों को सुधारात्मक कदम उठाने की पूरी छूट दे रखी थी. वित्त मंत्री के रूप में अरुण जेटली भी कुछ अच्छा कर पाने में सफल हो सकते हैं यदि उन्हें भी पीएम की तरफ से खली छूट दी जाये और सरकार अपने फ्लोर मैनेजमेंट को थोड़ा और सुधारने का प्रयास करे. वित्त मंत्री के पास देश की आर्थिक नब्ज़ को पहचानने वाले लोगों की एक संगठित टीम होती है और वे उससे और भी अच्छा काम निकलवा सकते हैं. वैश्विक बाज़ार जैसी परिस्थितियों का लाभ उठाया जा सकता है पर अचानक से देश की मूलभूत संरचना के साथ बदलाव नहीं  किया जा सकता है जिसमें कृषि क्षेत्र सबसे महत्वपूर्ण भी है.
                             मोदी सरकार द्वारा जिस तरह से प्रारम्भ में मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियों की खुली आलोचना की गयी और उसके बाद आज वह खुद भी मनमोहन के बताये रास्ते पर ही चलती हुई नज़र आ रही है इससे पता चलता है की कई बार हमारे देश के नेता गण कभी भी कुछ भी बोल सकते हैं जिसका धरातल पर कोई अस्तित्व कभी भी नहीं होता है. बरेली में पीएम मोदी द्वारा किसानों की आय दोगुनी करने का संकल्प बहुत अच्छा है पर जिस तरह से पिछले दो वर्षों से कृषि की विकास दर १.५% पर ही टिकी हुई है तो १४% की विकास दर अचानक से कैसे हासिल की जा सकती है ? इस बात को पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने भी अपनी प्रतिक्रिया में रेखांकित भी किया है और यह दिखाई भी दे रहा है कि मौसम की मार के चलते कृषि पर संकट के बादल लगातार मंडरा रहे हैं. अच्छा हो कि मानसून इस वर्ष से कुछ सुधर जाये जिससे सरकार को अपने लक्ष्य भले ही न मिल सकें पर वह उसके कुछ नज़दीक तक तो अवश्य ही पहुँच जाये. देश की आर्थिक प्रगति का चक्र फिलहाल तो गांवों से ही घूमता है और इस बार इस बात को समझते हुए सरकार ने अपनी नीतियों में बड़ा बदलाव करने के बारे में सोच लिया है जो देश के लिए बहुत अच्छा कहा जा सकता है.    
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शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2016

एनपीए और देश

                                                             पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से देश के बड़े सरकारी बैंकों के संकट में फंसने की ख़बरें सामने आई हैं वे निश्चित रूप से ही सरकार और देश के लिए खतरे की घंटी ही है क्योंकि जिन बैंकों के भरोसे सरकार अपनी नीतियों को आम लोगों तक पहुँचाने का संकल्प लेती है यदि उनकी यह दुर्दशा होती रहेगी तो देश के आर्थिक परिदृश्य बड़े सपने देखने वाले कार्यक्रमों का भविष्य क्या होगा ? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद इस मोर्चे पर अब सरकार और बैंकों के लिए अपने को गलत तरीके से बचा पाने में बहुत दिक्कत होने वाली है क्योंकि अभी तक कर्जदारों एक बारे में जो भी नीतियां चल रही हैं संभवतः अब उन्हें आमूल चूल बदलने की ज़रुरत भी सामने आ खड़ी हुई है. एक तरफ जहाँ सरकारी क्षेत्र के बैंक गरीब किसानों और अन्य छोटे व्यापारियों द्वारा लिए गए क़र्ज़ के न चुका पाने पाने पर उनके नाम को अपने यहाँ प्रदर्शित करते हैं जबकि इन्हीं बैंकों के बड़े बकायेदारों और देश के बड़े उद्योगपतियों में शामिल लोगों के द्वारा क़र्ज़ वापस न देने पर उनके लिए अजीब तरह की गोपनीयता का आवरण ओढ़ लिया करते हैं ?
                                                              इस तरह से यह सामने आ रहा है कि क़र्ज़ चुका पाने में सक्षम उद्योगपति भी बैंकों के अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके कर दाताओं की हज़ारों करोड़ रुपयों की पूँजी को ठिकाने लगाने में लगे हुए हैं और सरकार तथा बैंक किसी भी दशा में इसे वसूल पाने के इच्छुक या समर्थ भी नहीं दिखाई देते हैं. इस परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने बड़े बकायादारों की सूची सभी बैंकों से सीलबंद लिफाफे में मांगी है जिससे वह इस बात का निर्णय कर सके कि इन बड़े कर्जदारों के खिलाफ किस तरह की कार्यवाही संभव है ? कायदे से इस बात को जनता के सामने खुले तौर पर लाने की आवश्यकता थी क्योंकि जो बड़े उद्योगपति आम लोगों के पैसों को क़र्ज़ के रूप में लेकर अब देने की मंशा नहीं रख रहे हैं उनके बारे में देश को भी कुछ पता चल सके. देश के गरीबों के बारे में इस तरह कि कोई गोपनीयता नहीं महसूस की जाती है तो जनता के पैसे से क़र्ज़ लेकर मुनाफा कमाने वाले लोगों के नाम सार्वजनिक किये जाने में किस तरह से परहेज़ किया जा सकता है ? इस बारे में अब सरकार को खुद ही नए सिरे से सोचने की आवश्यकता भी है क्योंकि अभी तक जो भी गठजोड़ रहा हो पर वह देश की आर्थिक प्रगति के हित में नहीं है यह समझने का समय आ चुका है.
                                                                एनपीए पर कड़ा नियंत्रण लगाये जाने के लिए यह बहुत आवश्यक है कि अब इस मामले में लोगों की हैसियत के स्थान पर उनको एक कर्ज़दार के रूप में देखा जाये. किंगफिशर एयरलाइन्स के मामले में सरकारी क्षेत्र के १९ बैंकों के ७००० करोड़ रूपये डूब गए हैं जो कि सीधे आम करदाताओं के हक़ों पर डाके के सामान ही है पर सरकार, बैंक अधिकारियों और उद्योगपतियों के गठजोड़ के चलते यह सब लगातार होता चला आ रहा है. यदि किसी बड़े उद्योगपति को यह लगता है कि कर्जदारों की सूची में उनका नाम आने से उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी तो अपने सम्मान को बचाने के लिए उन्हें अविलम्ब क़र्ज़ वापस करने के बारे में सोचना चाहिए और यदि वे इस परिस्थिति में नहीं हैं तो एक समयबद्ध कार्यक्रम के तहत उन्हें यह धनराशि लौटाने के बारे में अपनी सहमति भी देनी चाहिए. देश में मेक इन इंडिया के चलते शुरू होने वाले बहुत सारे उद्योगों में भी देश के बैंकों का बहुत सारा पैसा लगने वाला है और यदि उद्योग जगत इस सोच के साथ काम करने लगेगा कि एक यूनिट के घाटे का बहाना लगाकर दूसरे से सरकार पैसे को हड़पने का यह तरीका लम्बे समय तक चलता रहने वाला है तो वह स्थिति देश के आर्थिक स्वास्थ्य के साथ खुद उद्योगपतियों के लिए भी विनाशकारी साबित होने वाली है.          
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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

भारत में मनरेगा की आवश्यकता

                                                         अपने प्रारम्भ के ग्यारहवें वर्ष में पहुँच चुकी संप्रग सरकार द्वारा देश के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के साथ ही आर्थिक परिदृश्य को सुधारने के लिए शुरू की गयी महत्वाकांक्षी नरेगा (अब मनरेगा) के बारे में राजनीति से हटकर जिस तरह से सामाजिक स्तर पर केंद्र की मोदी सरकार ने सोचना शुरू कर दिया है उसके बाद यह लगने लगा है कि वैश्विक आर्थिक संकट के चलते देश पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव से निपटने के लिए सरकार ने खुद देश के अंदर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के पुराने रास्ते पर चलने का मन बना लिया है. यह सही है कि विश्व में वंचितों और गरीबों के लिए काम करने और सबसे बड़े आर्थिक परिवर्तन की साक्षी बनने वाली यह परियोजना विभिन्न कारणों से पूरे विश्व का ध्यान खींचने में सफल रही है और इसने वास्तव में धरातल पर बहुत बड़े परिवर्तन के लिए बुनियादी आवश्यकता की पूर्ति भी की है. देश काल और परिस्थिति के अनुसार आज भी भारत का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में ही बस्ता है जिससे देश की आर्थिक प्रगति का इंजन वहीं से निचले स्तर से आर्थिक परिवर्तन को शुरू कर सकता है अब सरकार की समझ में यह आने भी लगा है क्योंकि आर्थिक मंच पर कमज़ोर हो रहे विश्व के सामने आने वाली मंदी भारत पर भी बुरा असर ही डालने वाली है.
                       विश्व के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री लोगों में गिने जाने वाले पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के निर्देशन में शुरू की गयी इस परियोजना ने जिस तरह से २००८ की मंदी में भी देश को उसके बुरे प्रभाव से बचाने के लिए अच्छा काम किया था संभवतः अब मोदी सरकार भी अपने पास इकठ्ठा हो रहे धन को इस रास्ते से देश की प्रगति में लगाने के बारे में निर्णय कर चुकी है. एक समय मोदी और भाजपा इस योजना के सबसे बड़े आलोचक हुआ करते थे पर उनके और भाजपा शासित राज्यों ने इस योजना का भरपूर लाभ उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी जिसका लाभ निश्चित तौर पर उन राज्यों की ग्रामीण जनता को मिला भी है. केवल राजनैतिक कारण से किये जाने वाले विरोध के बाद इस योजना के लाभ नज़दीक से महसूस करने के बाद जेटली और मोदी के लिए इससे पूरी तरह से दूर होना भी संभव नहीं हो पाया क्योंकि जिस तरह से राहुल गांधी अपने हर भाषण में मोदी सरकार को सूट बूट की सरकार कहने में नहीं चूकते हैं तो उस परिस्थिति में अब सरकार के लिए इस आरोप का जवाब देना भी आवश्यक बनता है और इसके लिए कल्याणकारी कार्यक्रमों को चलाये रखना भी एक आवश्यकता हो सकती है.
                      लैंड बिल के बाद इस मुद्दे पर सरकार को अपने कदम पीछे खींचने को लेकर दबाव में लाने की राहुल की कोशिशें कांग्रेस के लिए कितनी सहायक होंगीं ये तो समय ही बताएगा पर जनता से जुड़े मुद्दों पर इस तरह से आक्रामक होने और उनसे मिलने वाले लाभ का बखान करने का मार्ग अवश्य ही खुल गया है. देश की बेहतर प्रगति के लिए जहाँ तेज़ आर्थिक गतिविधियों की आवश्यकता तो है वहीं जब तक देश का ग्राम बाजार खुद मज़बूत नहीं होता है तब तक देश के बढ़ते औद्योगिक उत्पादन को किस तरह से खपाया जा सकता है. निर्यात की एक सीमा होती है और वैश्विक परिदृश्यों के चलते कई बार अच्छे प्रयास भी इसी तरह से कारगर नहीं हो पाते हैं. इसलिए अब मोदी सरकार ने तेज़ आर्थिक गतिविधियों के साथ देश के वंचितों और गरीबों के लिए चलायी जा रही मनरेगा जैसी परियोजना को मज़बूत करने का  जो निर्णय लिए हैं वह सही दिशा में उठाया गया कदम है. यह भी सही है कि राज्यों के स्तर पर इनमें बहुत अधिक भ्रष्टाचार भी किया गया है तो उसे रोकने के लिए एक नए कारगर तंत्र की व्यवस्था करने की आवश्यकता भी है जिसमें प्रधानों से लगाकर अधिकारियों तक को ज़िम्मेदार ठहराया जा सके जिससे वास्तविक रूप से भ्रष्टाचार को कम करने में सफलता मिले और देश की आर्थिक प्रगति को वो आयाम मिल सकें जो मनमोहन सिंह का सपना था और अब जिसे नरेंद्र मोदी ने पूरा करने की दिशा में कदम उठा दिया है.
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शनिवार, 16 जनवरी 2016

तेल की गिरती कीमतें

                                       देश की राजनीति में तेल की कीमतें सदैव ही एक बड़ा रोल निभाती रही हैं और अंतर्राष्ट्रीय परिवेश के चलते २०१३ में कच्चे तेल की कीमतों में रिकॉर्ड ऊँचाई देखने के बाद जिस तरह से लगातार कमी होती जा रही है उसे देखते हुए केवल यही कहा जा सकता है कि यह कमी भले ही केंद्र सरकार के वार्षिक बजट घाटे को नियंत्रित करने का काम करे पर इसके कारण उत्पन्न होने वाली वैश्विक अनिश्चितता के चलते भारत सरकार द्वारा किये जा रहे विभिन्न प्रयासों का सही लाभ नहीं दिखाई देने वाला है. यह सही है कि आज चीन के कारण सामने आने वाली वैश्विक मंदी और उससे निपटने का सही उपाय दुनिया के किसी भी देश के पास नहीं है और भारत ने भी जिस तरह से अपनी आर्थिक गतिविधियों में चीन को बहुत अच्छे से शामिल किया हुआ है उस परिस्थिति में देश का आर्थिक परिदृश्य भी बहुत अच्छा नहीं रहने वाला है. जिस खुले बाज़ार की वकालत आज मोदी सरकार द्वारा की जा रही है उसे यदि कुछ समय पहले ही खोल दिया गया होता तो आज भारत पर भी इस मंदी का गहरा प्रभाव दिखाई देता पर अच्छी बात यह है कि भारत की सीमित स्तर पर खुली अर्थव्यवस्था के संचालन से आज परिस्थितियां काबू में ही हैं.
                                     अब पूरे तेल बाज़ार पर नज़र डालने से यह पता चलता है कि केंद्र सरकार द्वारा जिस तरह से ड्यूटी बढाकर जनता से इस तरफ से धन संग्रह किया जा रहा है वह कहीं से भी अनुचित नहीं है क्योंकि यदि देश की जनता मंहगे तेल को खरीद सकती है तो उसे देश के बजट घाटे को कम करने के लिए इस तरह से अपना सहयोग देना भी चाहिए. इस नयी स्थिति में जहाँ केंद्र सरकार को हज़ारों करोड़ रुपयों का लाभ हो रहा है वहीं बजट घाटे को भी नियंत्रत किया जा रहा है पर इस सस्ते तेल का दुष्प्रभाव दूसरी तरह से देश की अर्थ व्यवस्था पर पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है और रुपया एक बार फिर से अपने निम्नतम स्तर तक पहुंचा जा रहा है जिससे तेल की वास्तविक कमी को जनता तक पहुँचाने और ठोस नीति बनाने के लिए सरकार को भी मशक्कत करनी पड़ रही है. ऐसी स्थिति में देश के लिए क्या आदर्श स्थिति हो सकती है इस पर भी विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि तेल की कीमतों के भरोसे अपने बजट को साधने का काम लम्बे समय तक कारगर नहीं हो सकता है और देश को इससे विपरीत परिस्थिति में गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामने करना पड़ सकता है.
                                      सरकार द्वारा फिलहाल जिस तरह के कदम उठाये जा रहे हैं उनका विरोध केवल राजनैतिक कारणों से ही किया जा सकता है पर मौसम के चलते लगातार चौथी फसल तबाही के कगार पर पहुँच रही है ऐसी परिस्थिति में यदि सस्ते डीज़ल से किसानों को सिंचाई और अन्य कृषि कार्यों में सहायता दी जा सके तो आने वाले समय में यह देश के ग्रामीण क्षेत्र के भरोसे चलने वाली आर्थिक गतिविधियों को गति देने का काम करता रह सकता है. केंद्र सरकार के कुछ आर्थिक सुधारों की कोशिशों के बाद और अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों के चलते आज देश से निर्यात लगातार घटता ही चला जा रहा है तो इस परिस्थिति में सरकार के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम मेक इन इंडिया के लिए बाज़ार कहाँ से आएगा ? वैश्विक मंदी के समय अधिकांश खुली अर्थव्यवस्थाएं कुछ अधिक नहीं कर सकती है पर २००८ की मंदी से यदि देश अच्छी तरह से जूझ पाया था तो उसका एक बड़ा कारण हमारे घरेलू बाज़ार की मज़बूती और ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति पर निर्भर था. आज विभिन्न सामाजिक योजनाओं में मोदी सरकार द्वारा बड़ी कटौती किये जाने के बाद ग्रामीण भारत की क्रय शक्ति की स्थिति में बड़ा बदलाव आ गया है और किसानों के फसली घाटे और मनरेगा के सीमित होने से ग्रामीण भारत में मांग कम हुई है. इस परिस्थिति में केवल तेल से ही नहीं बल्कि समग्र रूप से भारतीय परिस्थितियों पर विचार कर देश को आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

महाराष्ट्र और किसान

                                                            पूरे वर्ष में लगभग तीन हज़ार किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने की ख़बरों के बीच जिस तरह से केंद्र सरकार की तरफ से ३१०० करोड़ रुपयों की मदद की गयी है वह राज्य में राजनीति का नया मुद्दा भी बन गया है क्योंकि सरकार में भागीदार शिवसेना ने भी राज्य के लिए ५०००० करोड़ के पैकेज की मांग की थी. यह सही है कि सूखे और मौसम के विपरीत प्रभाव के चलते देश के कई राज्यों में किसानों के लिए संकट लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं जबकि सरकारी स्तर पर जो कुछ भी किया जा रहा है वह समस्या के समाधान के स्थान पर केवल तत्कालिक आवश्यकता की पूर्ति की तरफ जाता हुआ ही दिखाई दे रहा है. इस तरह की विपरीत परिस्थिति में यदि केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से किसानों को खेती की आधुनिकतम तकनीक के साथ परंपरागत खेती की तरफ बढ़ाया जाए तो क्या उससे इनकी स्थिति में कुछ परिवर्तन समभाव है ? आज भी किसानों के नाम पर जिस तरह से केवल दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में बैठे हुए कुछ अधिकारी और नेता पूरी नीति बना डालते हैं क्या वे देश की ज़मीनी स्थिति से मेल भी खाते हैं इस सवाल का जवाब आज किसी भी सरकार के पास नहीं है और दुर्भाग्य से कोई भी नेता या अधिकारी इस बात के लिए जागरूक तथा प्रयासरत भी नहीं दिखाई देता है.
                                    देश में सरकारें बदलने का किसानों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और सत्ता के गलियारों में बैठे हुए नेता अपनी सीमित सोच के साथ अधिकारियों पर हावी रहा करते हैं जिससे सही नीतियां बनाये जाने के स्थान पर केवल मंत्रियों और राजनैतिक प्रतिष्ठान को खुश करने की नीतियां ही अधिक बनायीं जाती हैं. लम्बे समय से महाराष्ट्र के किसानों का मुद्दा राज्य की विधान सभा से लगाकर लोकसभा तक गूंजता रहा है और इस बीच केंद्र और राज्य में सत्ता परिवर्तन भी हो गया है पर किसानों की अनदेखी किये जाने का सवाल अभी भी उसी तरह से अनुत्तरित है. अब इस बारे में गंभीरता से सरकारी नीतियों पर विचार करने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक सरकार की तरफ से समस्या के सही मूल को खोजने के बारे में नहीं सोचा जायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में पूरी व्यवस्था को सुधारा नहीं जा सकता है और किसानों के परिवारों को इस तरह के संकट का सामना करने के लिए विवश होना ही पड़ेगा. खेती में जिस स्तर पर परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता और सरकारी सहयोग की अपेक्षा है भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान उसमें पूरी तरह से चूकते हुए ही नज़र आ रहे हैं.
                            यदि कांग्रेस की नीतियों में कोई कमी थी तो पिछले डेढ़ साल में भाजपा की सरकारों ने वहां पर क्या उपलब्धि हासिल की है यह केवल वाद विवाद और राजनीति का विषय ही हो सकता है क्योंकि यदि मामला किसी एक राजनैतिक दल से जुड़ा हुआ होता तो परिवर्तन की शुरुवात हो चुकी होती पर यह पूरा मसला ही अव्यवस्था से जुड़ा हुआ है और इसे सुधारने के लिए अब सरकार को नए सिरे से सोचने की आवश्यकता भी है. पुरानी लीक पर चलने के स्थान पर अब सरकार को इस बारे में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सूखे से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के लिए स्थानीय स्तर पर उपयोगी वस्तुओं की खेती करने के बारे में प्रोत्साहित करने के बारे में सोचना चाहिए और उसके परिणामों पर विचार करते हुए ही अन्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए नीतियां बनानी चाहिए पर सरकारें इस मामले में केवल आर्थिक सहायता और ऋण माफ़ी तक ही अपनी भूमिका को सीमित करने में खुश हो जाती है जिससे भी समस्या का सही समाधान नहीं दिखाई देता है. देश के किसानों को इस तरह तात्कालिक सहायता के स्थान पर पूरी तरह से नयी कारगर नीति के बारे में सरकार को नए सिरे से सोचने से ही सही समाधान को खोजा जा सकता है वर्ना इस मुद्दे पर आत्महत्या करते किसानों को लोकतंत्र के मंदिरों में नेता श्रद्धांजलि देकर अपने कर्तव्य में तो लगे ही हैं.     
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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

भारत - व्यापार का एक और बुरा दौर

                                                        पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न नीतिगत तथा राजनैतिक दलों की व्यक्तिगत लालसाओं के चलते जिस तरह से देश की आर्थिक गतिविधियों की दिशा को लेकर बहुत अधिक भ्रम बना रहा है आज संभवतः उसी के चलते पीएम मोदी को दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में घूमकर यह दर्शाना पड़ रहा है कि भारत में कारोबारियों के लिए आज भी बहुत अच्छा माहौल है. भारत में देश के विकास और समाज के उत्थान से जुड़े हुए मुद्दों पर भी जिस तरह से राजनीति होती रहती है संभवतः देश की नकारात्मक छवि बन जाने के पीछे उसका भी बहुत बड़ा योगदान रहा करता है क्योंकि मोदी ने अपने गुजरात के सीएम के कार्यकाल में जिस तरह से नए आर्थिक सुधारों की पैरोकारी की थी वे आज भी उसके लिए प्रयत्नशील दिखाई दे रहे हैं पर उस समय की भाजपा ने मनमोहन सरकार को हर तरह से रोकने की जो गलतियां की थीं उसके चलते मोदी का काम बहुत बढ़ा हुआ लगता है क्योंकि जिन नीतियों को मनमोहन सरकार देश की परिस्थितियों के अनुसार धीरे धीरे बदलना चाहती थी आज मोदी सरकार उन्हें एक झटके में बदलने के लिए लालायित दिखाई देती है पर संघ, भाजपा और उसके मजदूर संगठनों के साथ अब कांग्रेस भी इन मुद्दों पर सरकार के साथ खड़े नहीं होना चाहती है.
                                     संसद के शीतकालीन सत्र के पहले संसद की दो दिनों की विशेष बैठक में जिस तरह से पीएम मोदी ने अपनी लम्बी उपस्थिति दिखाई वह अच्छा संकेत है क्योंकि आज अन्य व्यस्तताओं के चलते पीएम के पास इतना समय ही नहीं होता है कि वे पूरा दिन सदन में गुजर सकें जिसका सीधा असर सदन की विधायी गतिविधियों पर भी दिखाई देता है. पीएम का यह परिवर्तन समाज को यह सन्देश देने की कोशिश भी हो सकता है कि भाजपा भी डॉ आंबेडकर का बहुत सम्मान करती है क्योंकि बिहार में जिस तरह से पिछड़ों के महागठबंधन ने भाजपा के सारे समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है यह खुद पीएम की समझ में भी आ रहा है. केवल राजनैतिक लाभ लेने के लिए जिस तरह से बिहार में चुनाव को अगड़े पिछड़े से लगाकर हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण तक की कोशिशें की गयीं वह किसी से भी छिपा नहीं है उसके अपेक्षित परिणाम न आने से भाजपा में बेचैनी बढ़ चुकी है क्योंकि यदि इस तरह के प्रयोग के लिए बसपा ने यूपी में कोई समझदारी भरा ऐसा ही अप्रत्याशित कदम उठा लिया तो भाजपा के लिए वहां का वनवास और भी लम्बा हो सकता है. लोकसभा चुनावों से पूरी तरह से अलग होने के कारण विधान सभा चुनावों में प्रदर्शन करने का दबाव अब भाजपा पर ही अधिक है.
                                 अंतर्राष्ट्रीय मोर्चों से आ रहे संकेतों से यही लग रहा है कि दुनिया में मंदी एक बार फिर से अपने प्रभाव को दिखाने वाली है बेशक कोई भी भारतीय नेता कुछ भी कहता रहे पर इस सत्य से किनारा नहीं किया जा सकता है कि देश पर भी मंदी का प्रभाव दिखाई दे रहा है. मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन दोनों क्षेत्रों में जिस तरह से नेगेटिव ग्रोथ ने फरवरी २०१४ के स्तर से नीचे को छू लिया है तो यह बेहद चिंता का विषय है केवल सेवा क्षेत्र में ही सुधार दिखाई दे रहा है पर उसके भरोसे अर्थव्यवस्था को संभाला तो नहीं जा सकता है. पिछले तीन फसलों के चक्र में विपरीत मौसम से घटते उत्पादन से अब मोदी सरकार को चिंतित होने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक देश के गांवों में रहने वाली ७०% आबादी के पास आमदनी के संसाधन नहीं होंगें तब तक देश के उत्पादन के उपभोक्ता कहाँ से आयेंगें ? जिस चीन मॉडल को गुजरात में लागू कर मोदी ने कोशिशें शुरू की थीं आज वह खुद ही संकट में घिरा हुआ है तो इस परिस्थिति में क्या सुधारों को एकदम से लागू करना देशहित में रहेगा यह बताने और समझने वाला कोई भी नहीं है. प्रचंड बहुमत के साथ राज्यसभा की मजबूरी ने जिस तरह मोदी सरकार पर लगाम लगा रखी है वह एक तरह से ठीक ही है क्योंकि अंधानुकरण में लागू किये गए सुधारों से भारत का कोई भला नहीं होने वाला है.   
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रविवार, 7 जून 2015

किसानों को सब्सिडी

                                            आज देश जब प्रगति के आयामों पर आगे बढ़ता ही जा रहा है तो उस स्थिति में किसानों के लिए बनायीं जाने वाली किसी भी योजना में किसी भी स्तर पर होने वाली देरी से जहाँ समस्याएं और भी गहराती जा रही हैं वहीं पिछले कई वर्षों से किसानों को कालाबाज़ारी से मुक्ति दिलवाने के लिए खाद और डीज़ल पर डायरेक्ट सब्सिडी दिए जाने के कई कार्यक्रमों पर भी सही दिशा में प्रगति नहीं हो पा रही है. इस पूरे मामले में अभी तक केंद्र सरकार के प्रयास इसलिए भी सफल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि यह मामले केंद्र से अधिक राज्यों की कोशिशों पर ही निर्भर कर रहे है तथा केंद्र के पास केवल नीतियां बनाने के अलावा कुछ भी नहीं है. राज्यों की तरफ से इस महत्वपूर्ण परियोजना के लिए आवश्यक कार्यवाही नहीं की जा रही है जिससे भी केंद्र के चाहने के बाद भी अभी यह सब केवल कागज़ों में ही सिमटा हुआ सा लगता है और आज भी किसानों को सही तरह से सब्सिडी का लाभ देने के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं बन पायी है. पहले से ही परेशान किसानों के लिए जब तक केंद्र और राज्य मिलकर काम नहीं करेंगें तब तक खेतों और किसानों को सही सहायता नहीं मिलने वाली है.
                     आज जब अधिकांश राज्यों में राजग की सरकार है तो इस स्थिति को सुधारने के लिए खुद पीएम को ही प्रयास करने की आवश्यकता दिखाई देने लगी है क्योंकि संभवतः राज्यों को यह योजना समझ ही नहीं आ रही है या फिर राज्यों के स्तर पर उपेक्षा करते हुए इस योजना को समाप्त करने की कोई ऐसी योजना भी बनायीं जा रही है जिससे केंद्र की यह महवपूर्ण योजना अपने आप ही दम तोड़ दे ? आज देश में संप्रग सरकार द्वारा शुरू की गयी डायरेक्ट कैश बेनिफिट की योजना के माध्यम से बहुत कुछ सुधारने की कवायद चल रही है क्योंकि यह एक ऐसी परिकल्पना है जिसमें केंद्र द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी के हर तरह के दुरूपयोग को रोकने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किये जाने हैं. इस तरह की किसी भी योजना में सबसे बड़ी बात यही रहती है कि भ्रष्टाचारियों के पास करने के लिए कुछ शेष नहीं रह जाता है और सरकारी धन और संसाधनों के हर तरह के दुरूपयोग पर काफी हद तक नियंत्रण लग जाता है आज भी देश के कमज़ोर वर्गों तक सब्सिडी पहुंचाए जाने की कवायद को सही तरीके से लागू नहीं किया जा सका है और यह केंद्र के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने भी आ रहा है.
                   देश की बड़ी आबादी वाले राज्यों यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि में इस योजना के लिए जिला स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है केंद्र के प्रयासों से जहाँ काफी बड़ी संख्या में जन-धन खाते खुल चुके हैं वहीं अब किसानों के खेतों के ब्योरे को बैंकों से जोड़ने और उनकी आधार संख्या को तेज़ी से बनाये जाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक पूरी तरह से हर स्तर पर सही पहचान को नहीं नहीं अपनाया जायेगा तब तक डीबीटी के दुरूपयोग की भी संभावनाएं बनी रहने वाली हैं. अच्छा हो कि इस काम को करने के लिए राज्यों को कुछ प्रोत्साहन भी दिया और खराब काम करने वाले राज्यों को दण्डित करने का प्रयास भी होना चाहिए जिससे राज्यों को इस मूलभूत ढांचे को सुधारने के लिए दबाव भी महसूस हो सके. यदि राजग के बाहर के राजनैतिक दल इस मामले में सही दिशा में सहयोग नहीं कर रहे हैं तो केंद्रीय कृषि विभाग द्वारा यह आंकड़े भी सार्वजनिक रूप से जारी किये जाने चाहिए जिनमें राज्यों द्वारा इस कार्य के लिए किये गए प्रयासों को जनता के सामने लाया जाये तथा अन्य दलों के किसी भी तरह के दुष्प्रचार के बारे में भी जनता को सही स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिल सके. अब महत्वपूर्ण परियोजनाओं और प्रयासों में राजनैतिक दुरूपयोग को रोकने के लिए हर स्तर पर प्रयास आवश्यक हो चुके हैं जागरूक जनता के सामने इन मुद्दों को भी उठाया जाना चाहिए जिससे जागरूक तथा काम ना करने वाली राज्य सरकारों के काम के बारे में जनता जान सके.        
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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

साबरमती से गोमती तक-नदियों का सौंदर्यीकरण ?

                                देश में गुजरात के विकास की कहानी में सबसे आगे रखे जाने वाली साबरमती नदी के १० किमी लम्बे रिवर फ्रंट को लेकर सदैव ही चर्चा की जाती रहती है पर इस परियोजना से अहमदाबाद, साबरमती और नर्मदा के साथ कच्छ, सौराष्ट्र तथा उत्तरी गुजरात की आम जनता पर किस तरह का विपरीत असर पड़ा है इस बात की कोई चर्चा कभी भी खुले तौर पर नहीं होती है. शहरों के अंदर से बहने वाली नदियों में साफ़ सफाई होनी चाहिए इस बात से पर्यावरण विशेषज्ञ भी सहमत नज़र आते हैं पर जिस तरह से इसे विकास की अवधारणा से जोड़ने की अंधी दौड़ शुरू की जा चुकी है उससे इन शहरों के साथ नदियों को भी बहुत हानि पहुँचने वाली है. साबरमती के इस रिवर फ्रंट से निश्चित तौर पर पर्यटन आदि की गतिविधियों को बहुत बढ़ावा मिला है पर उससे खुद साबरमती और अहमदाबाद ने क्या खो दिया है इस बात के बारे में कितने लोग जानते हैं ? विकास किसी भी स्तर पर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करते हुए आता है तो उससे होने वाले संभावित विनाश से बचने के लिए कोई उपाय किसी के पास शेष नहीं बचते हैं और सभी केवल आपदाओं को घटते हुए ही देखने को मजबूर रहा करते हैं.
                               यूपी की राजधानी लखनऊ में भी साबरमती की तर्ज़ पर गोमती नदी को संवारने का काम शुरू किया जाने वाला है और इसमें भी ठीक उसी तरह की गलतियां किये जाने की पूरी संभावनाएं दिखाई देने लगी हैं जो गुजरात सरकार अहमदाबाद में कर चुकी है. किसी भी नदी का अपना एक पारिस्थितिकी तंत्र होता है और जब तक उसे यह सब प्राकृतिक रूप से मिलता रहता है नदी की अविरल धारा के साथ कोई दिक्कत नहीं होती है पर जिस समय एक नदी में दूसरे क्षेत्र की नदी का पानी बिना किसी सोच के डाला जाता है तो दोनों नदियों की संयुक्त पारिस्थितिकी स्थिति पूरी तरह से गड़बड़ हो जाती है. क्या आज साबरमती में वह सब मिलता है जो आज से दो दशक पहले हुआ करता था इस बात की जांच कौन करने वाला है और इस तरह के सन्दर्यीकरण से नदियों और उसके किनारों पर बसने वाले शहरों के भूगर्भीय जल स्तर पर किस तरह का असर पड़ने वाला है यह भी आज तक सोचा नहीं जा सका है. इस मामले में सरकारों को पर्यावरण विशेषज्ञों की राय करने के बाद ही आगे बढ़ना चाहिए जिससे विकास की इस अंधी दौड़ से बाहर निकला जा सके और नदियों को अपनी भावी पढियों के लिए बचाकर भी रखा जा सके.
                             गुजरात की तत्कालीन मोदी सरकार ने तो नर्मदा के उस पानी को दुनिया को दिखाने के लिए साबरमती को १० किमी लम्बी कंक्रीट की नहर बनाकर कच्छ, सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात के हितों के साथ समझौता कर लिया था पर क्या अखिलेश सरकार शारदा नदी के पानी के साथ इस तरह का खिलवाड़ कर सकती है ? पीलीभीत के माधोटांडा से निकलने वाले गोमती नदी किस हद तक विशुध्द रूप से हिमालयी नदी शारदा के साथ अपने एक सिस्टम के साथ जीने में सफल हो सकेगी यह तो आज कोई भी नहीं बता सकता है पर इसके साथ पर्यावरण और बहुत सारी जैविक तथा वानस्पतिक प्रजातियों के विलुप्त होने की आशंका बलवती हो चुकी है. देश के नेताओं के साथ यही समस्या रही है कि वे अपनी मंशा को पूरा करने के लिए प्रकृति से हर तरह की छेड़छाड़ करने से बाज़ नहीं आते हैं इसी क्रम में आने वाले दिनों में लखनऊ की यात्रा करने वाले पर्यटकों को कंक्रीट की नहर में बदल चुकी शारदा के पानी से भरपूर इठलाती हुई गोमती भले ही कुछ सुकून दे सके पर प्रकृति के साथ होने वाली इस अनावश्यक छेड़खानी का आने वाले समय में क्या दुष्प्रभाव दिखेगा यह कोई सोचना भी नहीं चाहता है.           
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सोमवार, 30 मार्च 2015

मोदी का अर्थशास्त्र और संघ

                                                     पिछले वर्ष सत्ता केंद्र में सँभालने वाले मोदी के सामने आर्थिक मोर्चे पर बहुत बड़े परिवर्तन करने के निर्णय को लेकर संघ शुरू से ही आशंकित रहा है क्योंकि उसे भी देश के अन्य राजनैतिक दलों की तरह इस बात का खतरा दिखाई दे रहा है कि पीएम मोदी की इतनी तेज़ी से देश की आर्थिक प्रगति को लम्बे समय तक बनाये रखने में सफलता नहीं मिलने वाली है. आज मोदी जिस मॉडल की बात ज़ोर शोर से कहते हुए सुने जाते हैं वास्तव में वही मॉडल एक समय चीन की अर्थ व्यवस्था को लम्बी छलांग लगाने के लिए सहयोग कर चुका है पर आज एक बार फिर से चीन के सामने भी अपनी अर्थव्यवस्था की वर्तमान गति को बनाये रखने की बहुत बड़ी चुनौती आ गयी है. प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून से लगाकर मेक इन इंडिया तक के कार्यक्रमों को लेकर जिस तरह से ज़मीनी स्तर पर संघ अपनी नाराज़गी दिखाने में लगा है संभवतः मोदी के राजनैतिक सलाहकार उन तक ऐसी ख़बरें पहुँचने ही नहीं दे रहे हैं क्योंकि कांग्रेस आदि विपक्षी दलों के विरोध को भाजपा राजनैतिक कह सकती है पर संघ के विभिन्न संगठनों की आवाज़ के लिए ऐसे बयान देना खुद मोदी के लिए भी मुश्किल काम होने वाला है.
                                     भूमि अधिग्रहण कानून के साथ ही मोदी के मेक इन इंडिया को जिस तरह से स्वादेशी जागरण मंच ने यूपी में प्रादेशिक सम्मलेन में अपनी असहमति दिखाई वह आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर विपक्षियों को लम्बी लड़ाई लड़ने का हौसला देने वाली ही साबित होने वाली है क्योंकि संघ ने मोदी की सरकार बनाने के लिए ज़मीनी स्तर पर बहुत काम किया था फिर भी यदि किसानों और छोटे मझोले उद्योगों के साथ इस तरह का बर्ताव किया जाने लगेगा तो आने वाले समय में देश के विकास की गति को कैसे संभाला जा सकता है ? मंच ने स्पष्ट रूप से सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून के नौ संशोधनों पर विचार करने के बाद ही अपनी राय देने का फैसला किया है जिससे यही पता चलता है कि संघ इस कानून के प्रस्तावित स्वरुप को भी देश के किसानों के लिए सही नहीं मानता है. मोदी अपने निर्णयों में तानाशाही प्रवृत्ति के साथ काम करने में विश्वास रखते हैं पर जब देश के हर हिस्से में इस तरह का माहौल बनता हुआ दिखाई दे रहा है तो स्वयं उनको थोड़ा लचीला रुख अपनाते हुए इसे विशेषज्ञों की समिति के सामने भेजकर सभी पक्षों पर खुले मन से विचार करने के बारे में सोचना ही होगा.
                              मंच ने मेक इन इंडिया के बारे में भी जिस तरह की राय दी है मोदी के लिए आने वाले समय में वह भी बड़ा सरदर्द साबित होने वाला है क्योंकि मंच का उद्देश्य भारतीय उद्योगों को बढ़ावा देने का रहा है पर मोदी सरकार इससे उलटे जाकर विदेशी कम्पनियों के माध्यम से भारत में निर्माण को गति देना चाहती है मंच का यह मानना है कि इसे मेक इन इंडिया के स्थान पर मेड बाय इंडिया में बदलना ही होगा क्योंकि विदेशी कम्पनियों द्वारा अपने लाभांश को विदेशों में ले जाया जायेगा जिससे निर्माण क्षेत्र में भले ही प्रगति दिखाई दे पर भारतीय उद्योगों को बहुत बड़ा नुकसान भी होने वाला है. इस तरह की किसी भी योजना को भारतीय मेधा और उद्योगपतियों के भरोसे आगे बढ़ाने की नीति का मंच सदैव ही स्वागत करता रहता है पर इस बार खुद मंच के सामने भी बड़ी विकट समस्या आ गई है. पहले तो भाजपा के साथ स्वदेशी जागरण मंच के लोग भी मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्री होने के कारण उन पर उद्योगपतियों के दबाव में काम करने का आरोप बड़ी आसानी से लगा दिया करते थे पर अब जब देश को बिना लम्बी अवधि की किसी योजना के ही पूरी दुनिया के सामने खोला जा रहा है तो संघ, मंच और भाजपा के पास अपने बचाव में कहने और करने के लिए कुछ भी शेष नहीं है इसलिए ही वे केवल सांकेतिक विरोध कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्ति पाने में लगे हुए हैं.        
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सोमवार, 16 मार्च 2015

बेमौसम बरसात- सरकार और किसान

                                                         आंकड़ों के अनुसार १९६७ के बाद सबसे अधिक वर्षा देखने वाला मार्च महीना पूरे देश के खाद्यान्न उत्पादन पर गंभीर असर डालने की तरफ बढ़ गया है क्योंकि जिस तरह से अभी तक पश्चिमी विक्षोभ के चलते मार्च महीने में ही चार बार तेज़ बारिश का सामना किसानों को करना पड़ा है वह देश की आर्थिक प्रगति पर भी बुरा असर डालने वाला साबित होने वाला है. एक तरफ जहाँ इससे लगभग तैयार होने की कगार पर पहुंची गेंहूँ की फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है वहीं रोज़मर्रा की सब्ज़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति भी इससे बुरी तरह से प्रभावित हो चुकी है. आज भी मौसम की इस तरह की बेरुखी से किसान और सरकार के पास करने और बचाने एक लिए बहुत कुछ नहीं होता है पर अब इस नुकसान से किसानों को होने वाले नुकसान से किस तरह से निपटा जाये यह महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है क्योंकि मार्च का महीना होने के चलते अधिकांश सरकारी अधिकारी पूरे वित्तीय वर्ष को समेट्ने में लगे रहते हैं और साथ ही अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए विभिन्न तरह की वसूली पर भी जोर रहा करता है.
                                   किसानों को सही मदद पहुँचाने के लिए ज़िले स्तर पर कृषि विभाग और राजस्व विभाग द्वारा समन्वय कर अपने क्षेत्रों में नुकसान का सही आंकलन करने के बारे में विस्तृत कार्ययोजना पर विचार करना चाहिए और इसके साथ ही किसानों के लिए कुछ राहत के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि राज्य और केंद्र सरकारों की तरफ से जो भी मदद दी जाती है वह कहीं न कहीं से ज़िले स्तर के इन अधिकारियों और विभागों के दम पर ही होती है जिसे अधिकांश बार बड़ी ही लापरवाही के साथ तैयार किया जाता है. नुकसान के आंकलन पर ही केंद्रीय सहायता भी निर्भर किया करती है पर ऐसी विपरीत परिस्थिति में किसी भी किसान के हो चुके नुकसान की भरपाई कोई भी नहीं कर सकता है. सरकार की तरफ से किसानों की फसलों के सामूहिक बीमे के बारे में भी गहन योजना के बारे में विचार किये जाने का समय अब आ चुका है क्योंकि बीमा अब सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में नए आयाम छूने की तरफ बढ़ने ही वाला है तो इस स्थिति का दोनों ही पक्षों को लाभ उठाना चाहिए जिससे नुकसान की कुछ क्षति पूर्ति की जा सके.
                                     देश के किसान पहले ही बहुत विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहे हैं और इस तरह के प्राकृतिक नुकसान से पूरे देश की आर्थिक प्रगति पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है जिसे सुधारने के लिए आज केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर जुटी हुई है. भारत की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए अब मौसम पर सटीक भविष्यवाणी करना संभव हो पाया है पर आज भी खेतों में तैयार खड़ी फसलों पर कुछ व्यवस्था नहीं बनायीं जा सकी है जिससे किसानों को भले ही लाभ न दिया जा सके पर उनकी लागत को पूरा करने की दिशा में सोचा जा सके. प्राकृतिक आपदाओं से खेती को बचाया नहीं जा सकता है पर किसानों के लिए सही योजनाओं के माध्यम से उनके घाटे को कम करने के बारे में सोचा जा सकता है. आज जो तंत्र राज्यों में काम कर रहा है वह पूरी तरह से गला हुआ है क्योंकि भारी भरकम विभागों के पास बेहतर संसाधन दिए जाने के बाद भी उनकी तरफ से काम को सही तरीके से नहीं किया जा रहा है. इस तरह की मौसमी मार से ज़िले स्तर के तंत्र को स्वतः ही सक्रिय होने के बारे में तैयार किया जाना चाहिए जिससे वह राज्यों की राजधानियों या केंद्र से निर्देशों को प्राप्त करने के स्थान पर स्वयं ही आगे बढ़कर काम करने के लिए तैयार हो सके.      
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गुरुवार, 22 जनवरी 2015

बाघों की बढ़ती संख्या

                                                     आज जहाँ पूरे विश्व में बाघों की घटती संख्या को लेकर चिंताएं जताई जा रही हैं वहीं भारत में पिछले तीन वर्षों में जिस तरह से तीस प्रतिशत बाघों के बढ़ने की ख़बरें आई हैं वे निश्चित तौर पर बहुत ही अच्छी खबर है. ऐसा नहीं है कि देश में इस तरफ कुछ गंभीर प्रयास नहीं किये जा रहे थे पर इन सब प्रयासों के बाद भी जिस तरह से वन विभाग के ज़िम्मेदार लोगों द्वारा की जा रही लापरवाही के चलते निचले स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण इनका लगातार शिकार भी किया जाता रहता था अब उनमें कमी आने के चलते ही यह संभव हो पाया है. निश्चित तौर पर यह देश के वन जीव संरक्षण से जुड़े हुए लोगों की बेहतर रणनीति और विभागों के साथ बेहतर समन्वय के चलते ही संभव हो सका है आज भी देश के विभिन्न बाघ अभ्यारणों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है जिससे अभी भी हम वह संख्या प्राप्त कर पाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं जिसके बाद यह कहा जा सके कि कम से कम भारत में बाघों की प्रजाति पर कोई संकट नहीं बचा है.
                                  यदि पिछले वर्षों में इन अभ्यारणों को लेकर किये जाने वाले प्रयासों पर गौर किया जाये तो एक बात सामने आती है कि बाघों के बढ़ने की रफ़्तार तो वही है पर अब उनके संरक्षण को सही रूप में करने की दिशा में काम शुरू हो गया है. इस मामले में जहाँ इस क्षेत्र में सक्रिय अनेक एनजीओज की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है वहीं राज्य सरकारों के इस दिशा में सोचने से भी मामला आगे बढ़ता दिखाई देने लगा है. आज भी देश के सुदूर जंगलों वाले क्षेत्रों में नए बाघ और अन्य अभ्यारण्य बनाने की दिशा में काम किये जाने की बहुत आवश्यकता है जिससे इनके संरक्षण को उचित दिशा में आगे बढ़ाने में सफलता पायी जा सके हाल में जिस तरह से यूपी में कई स्थानों पर बाघों के आबादी वाले क्षेत्रों में आने जाने का सिलसिला बढ़ा है वह भी रोकने की बहुत ज़रुरत है क्योंकि जब तक इनकी संख्या बढ़ने के साथ इनके रहने लायक उपयुक्त स्थानों की व्यवस्था भी हमारे स्तर से नहीं की जाएगी तो ये संघर्ष का सिलसिला चलता ही रहने वाला है और इससे कहीं न कहीं बाघों की संख्या पर भी इसका असर दिखाई देने वाला है.
                               देश की जैव विविधता को बचाये रखने के लिए आज जिस स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है हम कहीं सभी वह तक नहीं पहुँच पा रहे हैं जिसके चलते भी समस्या बढ़ती ही जा रही है. इस पूरे प्रयास में अब केंद्र राज्य सरकार वन्यजीव संरक्षण से जुड़े संगठन और जनता के समग्र प्रयासों की बहुत आवश्यकता पड़ने वाली है क्योंकि जब तक हम आम जनता के मन में इस तरह की भावना नहीं भर पायेंगें कि उन्हें भी अपने आसपास के पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा के बारे में सोचना है तब तक कोई भी प्रयास पूरी तरह से सफल नहीं होने वाले हैं. जन जागरूकता से ही बाघ और अन्य जीवों के संरक्षित क्षेत्रों से लोगों को जागरूक किया जा सकता है और जब तक इस दिशा में काम नहीं हो पाता है तब तक यह अनावश्यक संघर्ष भी बाघों और अन्य जीवों की जान के लिए खतरा ही बने रहने वाले हैं. जब इन संरक्षित जीवों और मानव के क्षेत्रों को सख्ती के साथ अलग कर दिया जायेगा तो किसी भी बाघ का मानव बस्ती में हस्तक्षेप कम हो जायेगा साथ ही मानव को इन संरक्षित क्षेत्रों से अलग रखने के हर संभव प्रयास करने की भी बहुत आवश्यकता है.         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...