मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 30 जुलाई 2016

गाय, दलित और गौ-रक्षक

                                                                  देश में जिस तेज़ी से सुनियोजित तरीके से अलग अलग हिस्सों में गौ-हत्या को केंद्र में रखकर जिस तरह से राजनीति चमकाने और अपने को हिन्दू समाज का हितैषी और नेता साबित करने का एक नया चलन सामने आया है यदि उस पर समय रहते विराम नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में इससे बड़ी समस्या उत्पन्न हो सकती है. गो मांस के संदेह के आधार पर आजकल जो नया काम कथित गौ रक्षकों द्वारा किया जा रहा है उसका समाज में किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं किया जा सकता है क्योंकि इससे अवैध रूप से गौ मांस का व्यापार करने वाले चन्द लोगों के चलते इस काम से जुड़े हुए सभी लोग संदेह के घेरे में आ जाते हैं वहीं सामाजिक व्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ता है. केंद्र और राज्य सरकारों का यह दायित्व बनता है कि ऐसे किसी भी मामले में दोषियों को सख्त सजा दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए चाहे वे अवैध रूप से गौ मांस का व्यापार करने वाले लोग हों या फिर उन पर हमला करने और समाज को विभजित करने की अपनी नीति को लागू करने वाले क्योंकि इन दोनों से ही समाज का ही सबसे बड़ा नुकसान होता है.
                             लखनऊ के चानन गांव में जिस तरह से नगर निगम के आदेश पर मरी हुई दो गायों को निस्तारित करने के लिए निगम द्वारा नियुक्त किये गए ठेकेदार के दो कर्मचारियों पर गौ हत्या का आरोप लगाकर स्थानीय युवकों ने उत्पात मचाया और उनकी पिटाई की उससे यह सब एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा भी लगता है. आज स्थिति यह है कि स्थान न होने के बाद भी शहरों में लोग गायें पाल तो लेते हैं पर उनकी मृत्यु हो जाने पर उनके शवों के निस्तारण के बारे में नगर निगम से ही संपर्क करते हैं और कई बार लावारिस अवस्था में घूमती हुई गायों की मृत्यु होने पर भी नगर निगम पर ही उनके शवों को हटाने की ज़िम्मेदारी होती है. यह सफाई से जुडी एक व्यवस्था है जिसमें अनावश्यक हस्तक्षेप से क्या हो सकता है यह गुजरात में उपायुक्त कार्यालय पर दलितों ने मरे हुए पशुओं को फ़ेंक कर दिखा दिया है पर क्या सभ्य और संस्कारी समाज के रूप में हमारा केवल यही दायित्व बनता है कि बिना कुछ सोचे समझे किसी भी व्यक्ति पर इस तरह से सीधे हमला कर दें भले ही उस व्यक्ति को कोई गलती भी नहीं हो ? आज के सभ्य और शिक्षित समाज से अधिक नहीं तो इतनी आशा तो की ही जा सकती है कि वह आगे बढ़कर इस तरह के अनर्गल आरोपों और बवालों पर खुद ही रोक लगाने का काम करने का कोई ठोस प्रयास करता हुआ दिखाई देगा.
                           इस तरह से स्वच्छता से जुड़े मामलों और अवैध रूप से गौ हत्या में लगे हुए लोगों में कोई अन्तर करने के लिए खुद प्रशासन और समाज को पहल करनी होगी जिससे अनावश्यक रूप से काम काज में बाधा न पड़े और जो लोग गलत तरीके से इस काम को करने में लगे हुए हैं उन पर भी अंकुश लगाया जा सके. नगर निगमों, पालिकाओं और पंचायतों द्वारा इस काम के लिए अधिकृत किये गए लोगों के फोटोयुक्त पहचान पत्र भी जारी करने चाहिए जिससे संदेह के आधार पर घेरे जाने की स्थिति में वे खुद अपनी पहचान और गायों को ले जाने के उद्देश्य को साबित कर सके. साथ ही गौ रक्षक दलों का उद्देश्य यदि वास्तव में गायों की रक्षा करना है तो उन्हें पहले गौ पालकों को जागरूक करना चाहिए और उसके बाद इस तरह से सीधे लोगों को रोकने के बारे में सोचना चाहिए. किसी भी परिस्थिति में किसी को भी अराजकता से बचना ही चाहिए क्योंकि उससे समाज एमन गहरे स्तर तकविभाजन हो जाता है और निर्दोषों को पीटने या मार ही डालने से किस तरह से गौ रक्षा संभव है यह भी सोचने का विषय है. संदेह के आधार पर किसी भी व्यक्ति, समूह या संदिग्ध वाहन को रोक कर उससे आवश्यक जानकारी हासिल की जानी चाहिए और संदेह होने पर ही पुलिस को सूचना देनी चाहिए जिससे दोषियों पर कानूनी कार्यवाही भी की जा सके. पुलिस और प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह की किसी भी सूचना पर उसकी तरफ से प्राथमिकता के आधार पर कार्यवाही की जाये जिससे समाज में अनावश्यक विभाजन न बढे.  
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शनिवार, 21 मई 2016

मायावती और सोशल इंजीनियरिंग

                                                             यूपी विधान सभा के २००७ के चुनावों में गुपचुप तरीके से सतीश चन्द्र मिश्र जैसे सहयोगियों के भरोसे जिस सोशल इंजीनियरिंग के सहारे मायावती ने लम्बे अर्से बाद यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी तो पिछले चुनावों में हार और २०१७ के चुनावों की तैयारियों में उनकी तरफ से इसे एक बार फिर से आज़माने की कोशिश की जा रही है पर इस बार इसमें सबसे बड़ा खतरा भाजपा की तरफ से दिखाई दे रहा है. भाजपा ने जिस तरह से लोकसभा चुनावों में परंपरागत रूप से बसपा के वोटबैंक रहे पिछड़े समूहों में मज़बूत सेंधमारी की थी उससे मायावती आज भी चिंतित हैं क्योंकि समाज के दूसरे वर्गों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने और विजय पाने की उनकी मंशा तभी सफल हो सकती है जब उनका अपना वोटबैंक सुरक्षित रहे वर्ना विधान सभा चुनाव भी कहीं न कहीं से उसके लिए आशानुरूप परिणाम देने वाले नहीं होंगे. इस बात का एहसास बसपा और मायावती को भी है पर इससे पर पाने के लिए अभी तक कोई ठोस उपाय सामने नहीं आ पा रहा है. यूपी में कांग्रेस जिस तरह से लड़ाई में होती ही नहीं है तो मुस्लिम वोटों को सहेजने का काम करने के लिए इस बार मायावती विशेष प्रयास करती हुई दिखाई दे रही हैं जिससे किसी भी परिस्थिति में उनके अपने वोटबैंक में कुछ बिखराव होने के बाद भी बैलेंस बनाए रखने में परेशानी न हो.
                                      बसपा के लिए दलित-मुस्लिम गठजोड़ शुरू से ही बहुत अच्छा साबित होता रहा है और यह पूरे प्रदेश में काम भी करता है इसलिए बसपा के लिए यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है कि जहाँ मुस्लिम २०%  या उससे अधिक हैं वहां पर मज़बूत मुस्लिम प्रत्याशी बसपा के लिए बहुत अच्छा कर सकता है और इस बार ८० वर्तमान विधायकों को छोड़कर जिस तरह से इस समीकरण के माध्यम से पूरे प्रदेश को साधने की कोशिश की जा रही है उस परिस्थिति में बसपा अच्छा प्रदर्शन भी कर सकती है. भाजपा की तरफ से केशव मौर्या को प्रदेश की बागडोर सौंपे जाने के बाद यह भी संभव है कि वह बसपा के वोटबैंक में सेंध लगा सके और कुछ स्थानों पर बसपा के इन प्रयासों पर पानी भी फेर सके. दलित मुस्लिम का साथ आना बसपा के लिए जितना लाभदायक हो सकता है सही तरह से उसके साथ न्याय न किये जाने की स्थिति में वह पूरी तरह से बैकफायर भी कर सकता है क्योंकि अधिक स्थानों पर मुस्लिम चेहरे होने से भाजपा दलितों में इस आधार पर भी अपनी बात पहुँचाने का काम कर सकती है कि इन चुनावों में दलितों की हितैषी पार्टी किस तरह से उनके हितों का ध्यान नहीं रख रही है जबकि भाजपा इस बार आरक्षित वर्ग से अधिक लोगों को टिकट देने की तरफ जाती हुई दिख रही है.
                                     मायावती के पक्ष में जो बात सबसे अनुकूल है वह यही कि उनके वोटबैंक को उनके सीएम बनने की राह में कोई भी रोक नहीं सकता है क्योंकि दिल्ली का चुनाव सभी को पता था कि मायावती उसकी लड़ाई में भी नहीं है इसलिए उस समय कांग्रेस को रोकने के लिए समाज के हर वर्ग ने भाजपा के पक्ष में वोट दिए थे पर विधान सभा चुनाव में खुद मायावती के यूपी के सीएम बनने के सपने का जुड़ाव भी होता है जिससे उनका काम कुछ हद तक आसान हो जाता है. प्रदेश में मुस्लिम वोट निर्णायक साबित हो सकता हैं पर जिस तरह से उनके बड़े स्तर पर एक बार फिर से बिखराव के संकेत मिल रहे हैं तो उस परिस्थिति में उनका ज़मीन पर कितना असर दिखाई देगा यह तो समय ही बता पाएगा. ओवैसी के यूपी आने से भाजपा को सबसे बड़ा लाभ मिल सकता है क्योंकि प्रदेश के मुस्लिम कांग्रेस, सपा और बसपा की राजनीति देख भी चुके हैं और ओवैसी उनके लिए नया चेहरा भी हैं. यदि मुस्लिम वोट एकमुश्त किसी पार्टी को जाने के स्थान पर टैक्टिकल वोटिंग को अपनाता है तो बसपा का काम भले ही कुछ अधूरा रह जाये पर भाजपा को प्रदेश में रोकने का काम करने में वह सफल भी हो सकता है. फिलहाल तो मायावती के पास मुस्लिम वोटर जाने को तैयार है पर उसका कितना विपरीत असर बसपा की संभावनाओं पर पड़ सकता है यह बता पाना और समझ पाना अभी थोड़ा मुश्किल काम लग रहा है. 
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रविवार, 17 जनवरी 2016

खिमाड़ा और सामाजिक भेदभाव

                                                                               देश में हम भले ही कितने आगे जाने और आधुनिक होने की बातें करने में कभी भी पीछे नहीं रहते हों पर जब किसी सामाजिक रूढ़ि को तोड़ने की बात आती है उस समय समाज के विभिन्न वर्गों की वह प्रगतिवादी सोच कहीं छिप सी जाती है या फिर वे अपने वर्चस्व को दिखाने के लिए इस तरह के दबाव बनाने का काम किया करते हैं. राजस्थान के पाली जिले के खिमाड़ा गांव की शिक्षित और सीआईएसएफ में कॉन्स्टेबल पद पर तैनात दलित लड़की नीतू भार्गव की ने भी अन्य लड़कियों की तरह अपनी शादी में दूल्हे के घोड़ी पर बैठकर आने की इच्छा व्यक्त की थी जिस कारण समाज के उच्च वर्गों को यह सब नागवार गुजरा कि एक दलित दूल्हा सवर्णों की तरह आखिर कैसे घोड़ी पर बैठकर शादी करने आ सकता है ? जिला प्रशासन में इस बात की जानकारी पहुँचने के पुलिस व् प्रशासनिक अधिकारियों को गांव की व्यवस्था सँभालने के लिए भेज दिया गया था और प्रशासन ने दूल्हे के लिए घोड़ी का प्रबंध भी करवा लिया था पर कानून और प्रशासन के आगे विभाजनकारी सामाजिक रूढ़ियों की एक आर फिर से विजय हुई जो समाज के प्रगतिशील और आधुनिक होने के दावों की हवा निकालने के लिए काफी है.
                       हज़ारों वर्षों से चली आ रही इस तरह की रूढ़ियों और सामाजिक ग्रन्थियों के साथ जीते उच्च वर्गों और इनसे जूझते दलितों की स्थिति में आखिर इतने प्रयासों एक बाद भी परिवर्तन क्यों नहीं आ पा रहा है अब यह सोचने और समझने का विषय भी है क्योंकि जब तक समाज के उच्च वर्गों के लोग अपने इस अघोषित उच्च होने और विशिष्ट होने के झूठे दम्भ से बाहर निकलने का प्रयास नहीं करेंगें तब तक किसी भी परिस्थिति में समाज के दलित वर्ग की सामान्य आकांक्षाओं की पूर्ति भी कानून और सरकार के चाहने के बाद भी नहीं हो सकती है. देश के सामाजिक ढांचे में आज भी विकृत रूप से पारम्परिक रूढ़िवाद मौजूद है तथा जब तक इससे निपटने की व्यवस्था पर विचार नहीं किया जायेगा तब तक किसी भी तरह से दलितों को उनका यह सम्मान नहीं मिल सकता है. इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि प्रशासन और सरकार लाख चाहे पर रूढ़िवाद के साथ जी रहे समाज के लिए सुधार के उचित कार्यक्रम तब तक नहीं चला सकती है जब तक उसमें समाज के सभी वर्गों की सम्पूर्ण भागीदारी सुनिश्चित न की जा सके.
                         यदि शिक्षित होने से ही परिवर्तन संभव होता तो इस तरह की बात सामने ही नहीं आती क्योंकि नीतू भार्गव ने कुछ ऐसा नहीं माँगा था जो मिल नहीं सकता था गांव की एक शिक्षित बेटी ने यदि एक सामान्य सी इच्छा दिखाई थी तो उसे पूरा करने तथा उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से निपटने के लिए समाज को आगे आना चाहिए था पर गांव और समाज के विभिन्न उच्च वर्गों द्वारा किये गए हठ के चलते संभवतः नीतू के परिवार की यह बात प्रशासन तक पहुँच गयी. इस तरह की गंभीर मनोविकार से जुडी हुई ग्रंथि को तोड़ने के लिए अब सरकार के उच्च वर्गों के मंत्रियों को भी आगे आना चाहिए जिससे समाज में सही सन्देश दिया जा सके कि अब इस तरह की अनावश्यक दुर्भावना को सरकार भी बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है. पुलिस प्रशासन का इस तरह एक मामलों से निपटने का एक घिसा पिटा मार्ग ही होता है जिसका अच्छा परिणाम केवल तभी सामने आता है जब ड्यूटी पर तैनात अधिकारी भी अच्छी मनोदशा के साथ काम करना चाहते हों. जब देश के संविधान की शपथ लेने वाले नेता ही अपने कर्तव्य को भूल जाते हैं तो भला इन अधिकारियों को सीधे कैसे दोषी ठहराया जा सकता है ? राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे खुद उच्च सामाजिक वर्ग व आज़ादी के पहले के रजवाड़ों से आती हैं तो यदि वे इस दिशा में अपनी तरफ से कुछ सुधार के संकेत दे सकें तो उसका समाज पर सही तथा दूरगामी प्रभाव पड़ सकता है. 
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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

भारत - व्यापार का एक और बुरा दौर

                                                        पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न नीतिगत तथा राजनैतिक दलों की व्यक्तिगत लालसाओं के चलते जिस तरह से देश की आर्थिक गतिविधियों की दिशा को लेकर बहुत अधिक भ्रम बना रहा है आज संभवतः उसी के चलते पीएम मोदी को दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में घूमकर यह दर्शाना पड़ रहा है कि भारत में कारोबारियों के लिए आज भी बहुत अच्छा माहौल है. भारत में देश के विकास और समाज के उत्थान से जुड़े हुए मुद्दों पर भी जिस तरह से राजनीति होती रहती है संभवतः देश की नकारात्मक छवि बन जाने के पीछे उसका भी बहुत बड़ा योगदान रहा करता है क्योंकि मोदी ने अपने गुजरात के सीएम के कार्यकाल में जिस तरह से नए आर्थिक सुधारों की पैरोकारी की थी वे आज भी उसके लिए प्रयत्नशील दिखाई दे रहे हैं पर उस समय की भाजपा ने मनमोहन सरकार को हर तरह से रोकने की जो गलतियां की थीं उसके चलते मोदी का काम बहुत बढ़ा हुआ लगता है क्योंकि जिन नीतियों को मनमोहन सरकार देश की परिस्थितियों के अनुसार धीरे धीरे बदलना चाहती थी आज मोदी सरकार उन्हें एक झटके में बदलने के लिए लालायित दिखाई देती है पर संघ, भाजपा और उसके मजदूर संगठनों के साथ अब कांग्रेस भी इन मुद्दों पर सरकार के साथ खड़े नहीं होना चाहती है.
                                     संसद के शीतकालीन सत्र के पहले संसद की दो दिनों की विशेष बैठक में जिस तरह से पीएम मोदी ने अपनी लम्बी उपस्थिति दिखाई वह अच्छा संकेत है क्योंकि आज अन्य व्यस्तताओं के चलते पीएम के पास इतना समय ही नहीं होता है कि वे पूरा दिन सदन में गुजर सकें जिसका सीधा असर सदन की विधायी गतिविधियों पर भी दिखाई देता है. पीएम का यह परिवर्तन समाज को यह सन्देश देने की कोशिश भी हो सकता है कि भाजपा भी डॉ आंबेडकर का बहुत सम्मान करती है क्योंकि बिहार में जिस तरह से पिछड़ों के महागठबंधन ने भाजपा के सारे समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है यह खुद पीएम की समझ में भी आ रहा है. केवल राजनैतिक लाभ लेने के लिए जिस तरह से बिहार में चुनाव को अगड़े पिछड़े से लगाकर हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण तक की कोशिशें की गयीं वह किसी से भी छिपा नहीं है उसके अपेक्षित परिणाम न आने से भाजपा में बेचैनी बढ़ चुकी है क्योंकि यदि इस तरह के प्रयोग के लिए बसपा ने यूपी में कोई समझदारी भरा ऐसा ही अप्रत्याशित कदम उठा लिया तो भाजपा के लिए वहां का वनवास और भी लम्बा हो सकता है. लोकसभा चुनावों से पूरी तरह से अलग होने के कारण विधान सभा चुनावों में प्रदर्शन करने का दबाव अब भाजपा पर ही अधिक है.
                                 अंतर्राष्ट्रीय मोर्चों से आ रहे संकेतों से यही लग रहा है कि दुनिया में मंदी एक बार फिर से अपने प्रभाव को दिखाने वाली है बेशक कोई भी भारतीय नेता कुछ भी कहता रहे पर इस सत्य से किनारा नहीं किया जा सकता है कि देश पर भी मंदी का प्रभाव दिखाई दे रहा है. मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन दोनों क्षेत्रों में जिस तरह से नेगेटिव ग्रोथ ने फरवरी २०१४ के स्तर से नीचे को छू लिया है तो यह बेहद चिंता का विषय है केवल सेवा क्षेत्र में ही सुधार दिखाई दे रहा है पर उसके भरोसे अर्थव्यवस्था को संभाला तो नहीं जा सकता है. पिछले तीन फसलों के चक्र में विपरीत मौसम से घटते उत्पादन से अब मोदी सरकार को चिंतित होने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक देश के गांवों में रहने वाली ७०% आबादी के पास आमदनी के संसाधन नहीं होंगें तब तक देश के उत्पादन के उपभोक्ता कहाँ से आयेंगें ? जिस चीन मॉडल को गुजरात में लागू कर मोदी ने कोशिशें शुरू की थीं आज वह खुद ही संकट में घिरा हुआ है तो इस परिस्थिति में क्या सुधारों को एकदम से लागू करना देशहित में रहेगा यह बताने और समझने वाला कोई भी नहीं है. प्रचंड बहुमत के साथ राज्यसभा की मजबूरी ने जिस तरह मोदी सरकार पर लगाम लगा रखी है वह एक तरह से ठीक ही है क्योंकि अंधानुकरण में लागू किये गए सुधारों से भारत का कोई भला नहीं होने वाला है.   
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रविवार, 9 अगस्त 2015

भगाना - दलित, कानून और जातिवाद

                                                                    दो साल पहले हरियाणा के हिसार जनपद के भगाना गाँव में दलित लड़कियों के साथ हुए बलात्कार के बाद जिस तरह से उनको किसी भी स्तर पर आशानुरूप न्याय नहीं मिल पा रहा था उसके बाद पहले उन्होंने घर छोड़ने के बाद अब अपना धर्म छोड़ने तक का सफर भी तय कर लिया है. दिल्ली में जंतर मंतर पर चल रहे धरने में ही लगभग सौ दलित परिवारों ने हिन्दू धर्म छोड़ते हुए पूरे रीति रिवाज से इस्लाम धर्म को अपना लिया है जिसके बाद समाज की उस क्रूर मानसिकता और हज़ारों वर्षों से भारतीय समाज में व्याप्त जाति व्यवस्था का यह विद्रूप चहेरा भी सामने आया है. इस सबके बीच सबसे चिंता की बात यह है कि देश के किसी भी राजनैतिक दल में इन दलितों और प्रताड़ित किये गए वंचितों के प्रति कोई चिंता या संवेदनशीलता दिखाई नहीं देती है उसका संभवतः सबसे बड़ा कारण यही है कि अभी भी हरियाणा में दलित राजनीति उतने बड़े स्तर पर लाभकारी नहीं हुई है जैसी वह यूपी और बिहार में नेताओं को सत्ता के शिखर तक पहुँचाने में सक्षम है. ऐसे मामलों पर अपने वोट बैंक का ख्याल रखते हुए दोहरा रवैया अपनाने वाले कांग्रेस और भाजपा से इतर बसपा ने भी इस मसले पर कुछ ख़ास करने की कोशिशें नहीं की क्योंकि यदि इन पीड़ितों को कुछ सहारा मिला होता तो आज उनके सामने ऐसी परिस्थितियां ही न आई होतीं और वे सम्मान के साथ भगाना में ही रह रहे होते.
                             समाज और नेताओं के दोहरे रवैये का सभी को इस बात से ही अंदाज़ा हो जाना चाहिए जिसमें लगभग उसी समय यूपी के बदायूं कांड ने पूरे देश और दुनिया तक की ख़बरों में स्थान पाया पर भगाना के इन दलितों की बेटियों पर हुए अत्याचार को राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने भी वह महत्व नहीं दिया जो उसे दिया जाना चाहिए था. राज्य बदलने से देश की मानसिकता नहीं बदलती है और ऐसे हज़ारों उदाहरण देखे जा सकते हैं जिनमें दलितों और आर्थिक रूप से पिछड़ों को भी इसी तरह की समस्याओं का निरंतर सामना करना पड़ता है. यहाँ पर भगाना और जाटों के दलितों पर अत्याचार का ज़िक्र करने का कोई मतलब इसलिए भी नहीं बनता है क्योंकि यही काम देश एक अन्य भागों में अन्य उच्च वर्गीय और आर्थिक रूप से संपन्न जातियां भी निरंतर करती ही रहती हैं. यह ऐसी मानसिकता है जिसके साथ देश के दलित जीने को आज भी मजबूर हैं पर क्या इन समस्याओं से कोई उन्हें छुटकारा दिला सकता है ? आज देश की व्यवस्था को यह सोचने की आवश्यकता भी है क्योंकि जो समर्थ है वह आवश्यकता पड़ने पर सुविधानुसार बहुत ही आसानी से अत्याचारी भी हो जाता है और यह मानसिकता आज देश की जातीय व्यवस्था के शीर्ष पर बैठे हुए लोगों को देखकर पता चल जाती है.
                             सरकारों के बदलने से भी दलितों की स्थिति पर जातीय समीकरणों के चलते कोई ख़ास असर नहीं पड़ता है क्योंकि भगाना का अत्याचार हरियाणा और केंद्र में कांग्रेस की सरकारों के रहते शुरू हुआ था पर अब दोनों जगहों पर सरकारें बदलने और भाजपा के सत्ता में आने के बाद भी किसी सरकार ने इनकी सुध नहीं ली है क्योंकि जाटों के बड़े वर्ग को इस मुद्दे पर नाराज़ कर पाना संभवतः इन दोनों दलों की राजनैतिक परिस्थितियों पर ही असर डालने वाला साबित हो सकता है. वैसे तो देश में केंद्र और राज्य स्तर पर बहुत सारे आयोग गठित किये गए हैं पर इस मसले पर किन आयोगों ने किस स्तर पर इन दलितों के पक्ष में खड़े होना पसंद किया है यह किसी को नहीं पता है न्याय मिलना अलग बात है पर आज के आधुनिक समाज में जब हम डिजिटल इंडिया और स्किल इंडिया जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोचना शुरू कर चुके हैं तो क्या हमारी यह पुरातनपंथी जातिवादी सोच पूरे देश का दुनिया में उपहास उड़ाने के लिए काफी नहीं है ? अच्छा हो कि इस मसले पर बराबरी और सख्ती से काम किया जाये और सभी को बराबरी का जो वायदा हमारे संविधान में किया गया है उसे निभाने के लिए सभी सम्बंधित पक्ष खुलकर काम करना शुरू कर सकें. 
                              एक तरफ से जातीय व्यवस्था का शिकार हुए इन लोगों ने आसानी के साथ इस्लाम धर्म को अपना लिया है वहीं अब इस मुद्दे पर हरियाणा सरकार और भाजपा के द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर इसे मुद्दा बनाये जाने की संभावनाएं भी नज़र नहीं आती हैं क्योंकि इसमें हमारे हिन्दू समाज का एक वह चेहरा एक बार फिर से सामने आ गया है जिसमें हम हज़ारों वर्षों से साथ चल रहे अपने उन लोगों को भी सम्मान नहीं दे सकते हैं जिनकी पीढ़ियों ने हमारी चाकरी करते हुए समय गुज़ार दिया है. हालाँकि इन दलितों को यह भी पता है कि आने वाले समय में इस्लाम में भी उनके लिए सब कुछ एकदम से सही नहीं होने वाला है क्योंकि धर्म परिवर्तन भी उन्हें उनके पुराने स्थान पर बसने और सर वहां पर उठाकर जीने की कोई गारंटी नहीं दे सकता है. आज यह हिन्दू समाज के सोचने का समय इसलिए भी है कि आखिर कब तक उसके प्रभावी लोग अपने पर वर्षों से आश्रित रहे लोगों पर इस तरह से मनमानी करते रहेंगें और कब समाज में उस स्तर का परिवर्तन देखने को मिलेगा जब न्याय न मिलने के कारण कोई इस तरह से धर्म परिवर्तन करने के बारे में सोचना बंद करेगा ? सभी धर्म और जातियों से ही समाज पूरा होता है और अब देश में इस बात पर भेदभाव करने के स्थान पर आगे बढ़कर सोचने का समय आ गया है जो प्रभावशाली हैं उनके लिए यह अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए कि समाज की व्यवस्था में अभी तक चाहे कुछ भी चलता रहा हो पर अब समय आ गया है कि हम सभी को साथ लेकर उनकी शिक्षा और जीवन स्तर को सुधारने के बारे में सोचना शुरू करें. देश समाज की इन छोटी छोटी कड़ियों से ही मज़बूत होता है और आखिर कब तक हम में से कुछ प्रभावशाली लोग समाज की सभी कड़ियों को मज़बूत करने के स्थान पर कुछ को कमज़ोर करने की प्राचीन मानसिकता के साथ जीते रहेंगें ?        
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सोमवार, 11 मई 2015

दलित और सामाजिक भेदभाव

                                                         भले ही हम भारतीय अपने को कितना ही आधुनिक और प्रगतिशील बताने से नहीं चूकते हों पर आज भी समाज में बहुत सारे ऐसे पूर्वाग्रह और कुरीतियां मौजूद हैं जिनके चलते सदैव देश की छवि ख़राब ही हुआ करती है. मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के नेगरुन ग्राम में उज्जैन के ग्राम बरछा से आई एक दलित परिवार की बरात में वहां के दबंगों ने ऐसा माहौल पैदा कर दिया कि दूल्हे को हेलमेट पहनकर घुड़चढ़ी करनी पड़ी जबकि इस सबकी आशंका के चलते ही लडकी के परिवार ने स्थानीय प्रशासन से बरात निकलने के समय विवाद होने की आशंका की स्थिति पर शिकायत भी कर रखी थी जिसको देखने के लिए पुलिस व प्रशासन कई दिनों से सुलह समझौता करवाने में लगे हुए थे फिर भी इस पूरे मामले उन दबंगों की ही चली और बरात के निकलते ही उन्होंने पथराव भी किया जिस कारण उप तहसीलदार, पुलिस कर्मियों समेत बाराती भी घायल हुए पर दूल्हे के लिए पहले से ही हेलमेट की व्यवस्था किये जाने के कारण वह पूरी तरह से सुरक्षित भी रहा. आखिर वे कौन से तत्व हैं जो आज के समय में भी दलितों पर इस तरह की पाबंदियां लगाने का दुस्साहस कर जाते हैं और कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता है ?
                                     आम तौर पर यह देखा जाता है कि देश भर में किसी भी स्थान पर मोहल्ले में परिवारों में कितना भी मतभेद क्यों न हो पर बेटी की शादी में कोई भी व्यक्ति किसी भी तरह का व्यवधान उत्पन्न नहीं करता है क्योंकि यह माना जाता है यह एक सामाजिक कार्य है. पर इस मामले में जिस तरह का मामला प्रथम दृष्टया लग रहा है उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं इनके बीज देश की उस जातिगत व्यवस्था की कुरीतियों से जुड़े हुए होंगें जिसमें आज भी गांवों में ऊंची जातियों के लोग बराबरी की बातें तो किया करते हैं पर समय आने पर उस पर अमल करने से पूरी तरह किनारा कर लिया करते हैं और समाज में हज़ारों वर्षों से चली आ रही उस भेदभाव की बात को ही अपनाते रहते हैं जिसके कारण देश का बहुत नुकसान हुआ है. आखिर वे कौन से सामाजिक कारण हैं जिनके चलते एक दलित के घर सामान्य तरह से बारात नहीं आ सकती है और वे हिन्दू धर्म में होते हुए भी उन सामान्य सी रस्मों को उस तरह से नहीं निभा सकते हैं जैसी कथित उच्च जातियों में अपनायी जाती हैं ? आज भी समय आखिर इस तरह से बर्ताव कर हिन्दू समाज किस तरह का सन्देश इन दलितों को देना चाहता है जिसमें सभी लोग असमान ही माने जाएँ ?
                           एक सामाजिक रस्म को निभाने में यदि कोई समाज ही एकमत नहीं है तो वह अपनी प्रगति की बातें कैसे कर सकता है क्योंकि जिन दलितों को जिन भी कारणों से इस तरह के सामाजिक कार्यों को उच्च वर्गों की तरह करने से रोका जाता है तो हज़ारों वर्षों से इन उच्च जातियों की हर बात को मानने वाले इन दलितों के पास क्या विकल्प बचते हैं फिर भी यदि देखा जाये तो इन दलितों ने विपरीत परिस्थितियों में अपने मार्ग को सबसे कम ही छोड़ा है जबकि कथित उच्च जातियों ने अपने लाभ के लिए धर्मपरिवर्तन करने तक में कोई संकोच नहीं किया है और इतिहास भी इसी बात की पुष्टि किया करता है. इस तरह का मामला केवल मध्य प्रदेश में ही सामने आया हो ऐसा भी नहीं है पुलिस ने इस घटना के लिए ज़िम्मेदार १२ लोगों के खिलाफ कार्यवाही शुरू कर उन्हें हिरासत में ले लिया है पर क्या केवल पुलिस के स्तर से इस समस्या का समाधान निकाला जा सकता है क्योंकि यह प्रशासनिक से अधिक सामाजिक समस्या अधिक है और इसके लिए हिन्दू समाज को बैठकर अपने सभी वर्गों के लिए हर तरह कि रस्में निभाने की खुली छूट देने के बारे में सोचना चाहिए तथा किसी भी तरह की घटिया राजनीति से भी पूरी तरह बचना चाहिए क्योंकि उससे समाज में वैषम्य ही बढ़ना है.               
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बुधवार, 29 जनवरी 2014

यूपी पुलिस- कार्यशैली और मनोबल

                                        एक के बाद एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक मसलों पर लगातार असफल होती जा रही यूपी पुलिस की कार्यशैली पर ही अब संदेह होने लगा है कि क्या वह वास्तव में ज़मीन पर काम करते समय अपनी उस ट्रेनिंग को याद भी रखती है जिसे उसने सीखा होता है क्योंकि अधिकतर मामलों में जब उसकी स्पष्ट और कड़ी कार्यवाही से मामला सुलझ सकता है वहाँ पर उसके ढुलमुल रवैये के कारण ही मामला हिंसा और तनाव से भर जाता है और जब समझाने की ज़रुरत होती है तो वह डंडे फटकारती नज़र आती है ? आख़िर ऐसे वे कौन से कारण हैं जिनके बारे में यूपी पुलिस केवल सतही स्तर पर ही सोच पाती है और उसके बाद की परिस्थितियों से निपटने में भी वह जिस नौसिखिये पन का प्रदर्शन करती है वह भी यूपी के सामजिक और धार्मिक माहौल को बिगाड़ने में बहुत बड़ा सहयोग करता है और सामान्य मामले भी पूरी तरह से अनियंत्रित होकर पूरे प्रदेश के लिए एक बड़ी समस्या बन जाते हैं जिसका सीधा असर सामाजिक ताने बाने पर भी पड़ता है.
                                       ताज़ा मामले में खुर्जा के सेहड़ा फरीदपुर गाँव में एक बार फिर से दलित किशोरी से छेड़ छाड़ की घटना में पुलिस जिस तरह से मान मनौव्वल में ही लगी रही और तीन लोगों की जानें चली गयीं वह इसी बात की तरफ इशारा करता है कि या तो यूपी पुलिस की ट्रेनिंग में ही कोई कमी है या फिर वह बुरी तरह से राजनैतिक दबाव में ही सदैव काम करती रहती है क्योंकि इस तरह के मामलों में पुलिस की राजनैतिक दबाव को मानने की नीति के चलते ही आज भी मुज़फ्फरनगर में लोग खुले आसमान के नीचे भयंकर ठण्ड में किसी तरह जीने की कोशिशें करते नज़र आ रहे हैं और पुलिस और यूपी सरकार की नज़रों में सब कुछ ठीक ठाक ही है ? केवाल गाँव और उसके बाद की इतनी बड़ी घटना के बाद भी पुलिस और यूपी सरकार की समझ में यह आज तक नहीं आ पाया है कि पूरे प्रदेश में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं फिर भी उनसे निपटने का अभी भी कोई कारगर तरीका नहीं ढूँढा जा सका है.
                                      पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से यूपी पुलिस में महिला सिपाहियों की भर्ती की गयी उससे यह आशा लगायी जा रही थी कि आने वाले समय में प्रदेश में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अत्याचारों पर कुछ हद तक अंकुश लग पायेगा पर स्थिति के ठीक होने के स्थान पर और भी अधिक बिगड़ने से यही लगता है कि कहीं न कहीं यूपी पुलिस सामान्य पुलिसिंग पर भी ध्यान नहीं दे पा रही है और उसकी इस कमज़ोरी का लाभ असामाजिक तत्व अपने अनुसार उठाने में लगे हुए हैं ? यह सही है कि अचानक से अराजक हुई भीड़ के सामने पुलिस भी एकदम से थोड़े से बल प्रयोग से कुछ भी हासिल नहीं कर सकती है पर जब मामले एक दो दिन या पूरे दिन तक चलते रहें और तब भी पुलिस इस तरह से कुछ ठोस करने के स्थान पर केवल पक्षों को समझाने का प्रयास ही करती रहे तो सामजिक सद्भाव पर तो आंच ही आनी है. जब समझाने की ज़रुरत होती है तो बल प्रयोग किया जाता है और जब सख्ती की अपेक्षा की जाती है तो मनाने का काम किया जाता है क्योंकि अभी तीन दिन पहले ही विधान भवन पर आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह के बाद जलपान के समय यूपी पुलिस ने विधायकों समेत प्रदेश के आला अधिकारियों के साथ धक्का मुक्की की थी. अब अखिलेश को यूपी के पुलिस महानिदेशक से एक बात पुलिस को स्पष्ट रूप से कहनी ही होगी कि वे अपना काम ठीक से करें पर पता नहीं वे किस बात का इंतज़ार कर रहे हैं.     
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मंगलवार, 21 मई 2013

यूपी दलित स्मारक घोटाला

                               यूपी में निर्माण के समय से ही विवादों में घिरे दलित महापुरुषों के स्मारक लोकायुक्त जांच के बाद १४.८८ अरब रुपयों के घोटाले और वित्तीय अनियमितता युक्त पाए गए हैं. इस मामले में लोकायुक्त ने माया के करीबी और बसपा के ताक़तवर मंत्रियों नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी, बाबू कुशवाहा समेत १५ अभियंताओं और ढेर सारी आपूर्ति कर्ता फर्मों के विरुद्ध केस दर्ज़ कर उनसे धन वसूली करने की सिफ़ारिशें की हैं और साथ ही अधिकारियों के ख़िलाफ़ कड़ी विभागीय कार्यवाही की भी संस्तुति की है. पूरे मामले में बसपा अध्यक्ष का नाम इसलिए सामने नहीं आया है क्योंकि सीएम पद पर रह चुके किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ जांच करने का अधिकार लोकायुक्त के पास है ही नहीं तो उस स्थिति में माया के ख़िलाफ़ वह किसी भी तरह की जाँच कर पाने की स्थिति में थे ही नहीं. वैसे भी जब यह निर्माण चल रहा था तब भी कुछ लोग दबे स्वर में इसमें बड़े भ्रष्टाचार की बात किया करते थे पर यूपी में माया सरकार होते हुए किसी भी ऐसे मामले में वित्तीय अनियमितता को माया बाकायदा प्रेस वार्ता में दलित विरोधी और मनुवादियों के काम बताने में नहीं चूकती थीं.
                               इस मामले में सबसे अहम् बात यह है कि लोकायुक्त ने नेताओं और अधिकारियों से इस धन की वसूली करने की बात भी कही है तो उस स्थिति में आपूर्ति करने वाली फर्मों के सामने भी बड़ी समस्या खड़ी होने वाली है क्योंकि अब वे भविष्य में इन नामों से प्रदेश में व्यापार नहीं कर पाएंगीं और उनसे भी धन की वसूली करने की शुरुवात होने से आने वाले समय में नेताओं और अधिकारियों के साथ मिलकर इस तरह के घोटाले करने से पहले ये फर्में हज़ार बार सोचना भी चाहेंगीं ?  परिस्थितियां चाहे जो भी हों पर जब इतनी बड़ी अनियमितता सामने आई है और सरकार भी अभी तक कार्यवाही करने के मूड में दिखाई दे रही है तो इसमें आरोपित लोगों के लिए आने वाले समय में बड़ी मुश्किलें आने वाली हैं क्योंकि अब इनको बचाने के लिए माया दलित विरोधी अपना पुराना कार्ड भी नहीं चल सकती हैं और जिस तरह से ये जांचें की जा रही हैं उस स्थिति में हो सकता है कि आने वाले समय में प्रदेश सरकार किसी ऐसी संस्था से पूरी जांच भी करवाना चाहे जिसमें मायावती को भी घेरे में लिया जा सके.
                              प्रदेश या देश में दलित महापुरुषों के नाम पर कोई स्मारक या पार्क बने इससे किसी को भी परेशानी नहीं है क्योंकि हर सरकार अपने आदर्शों के लिए इस तरह के प्रयास किया करती है पर जिस तरह से यूपी में इन स्मारकों के निर्माण में खुले आम लूट मचाई गई तो उसके बाद कोई दलितों के नाम पर भ्रष्टाचार का समर्थन कैसे कर सकता है ? इस मामले में बहुत गंभीरता है और सारी जांच तथ्यों पर आधारित है तभी इसके सामने आने के बाद भी माया ने चुप्पी लगा रखी है पर वे जब भी बोलेंगीं तो उनका वही दलित स्वाभिमान से हर मुद्दे को जोड्ने का वक्तव्य ही सामने आएगा और वे इसके लिए दलित की बेटी की तरक्की मनुवादियों से देखी नहीं जाती ऐसी बातें ही करती नज़र आयेंगीं. अच्छा होता कि उन्होंने इन स्मारकों की देखरेख खुद की होती और किसी भी तरह के भ्रष्टाचार के सामने आने के बाद दोषियों को खुद ही सजा दिलवातीं क्योंकि जो लोग उनके सपनो में भी भ्रष्टाचार कर सकते हैं वे आख़िर किस तरह से उनके लिए निस्वार्थ भाव से सामने आ सकते हैं ? भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें जितनी गहरी कर ली हैं उसमें माया जैसी सख्त प्रशासक भी कुछ नहीं कर सकीं या फिर उन्होंने से भी अपने हिस्से को लेकर चुप रहना ही बेहतर समझा और दलित स्वाभिमान के इन प्रतीकों को भ्रष्टाचार का अड्डा बनने के लिए खुला छोड़ दिया.        
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शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

मूर्ति और मानसिकता

          लखनऊ में जिस तरह से गोमतीनगर स्थित अम्बेडकर पार्क में लगी प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा की अध्यक्ष मायावती की मूर्ति को कुछ शरारती तत्वों ने क्षति ग्रस्त किया उससे उनकी मानसिकता का ही पता चलता है. माया ने अपनी मूर्तियाँ पूरे प्रदेश में कई जगह पर लगवायीं और वे जिस तरह से दलित स्वाभिमान का प्रतीक आज देश में बन चुकी है उसे देखते हुए भी उनके समर्थकों ने पूरे देश में डॉ अम्बेडकर के साथ उनकी मूर्तियाँ लगायी हैं. हमारे देश में इस तरह से मूर्तियाँ लगाने की परंपरा सी रही है जिसे देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आम भारतीय अपनी श्रद्धा को इस तरह से व्यक्त करता है तो अनुचित नहीं होगा. माया सरकार के समय इन स्मारकों के रख रखाव और इनकी सुरक्षा के लिए एक सुरक्षा बल का भी गठन किया था वह अलग बात है कि उसका गठन कानूनी तौर पर सही न होने के कारण आज ख़त्म हो चुका है. जितनी बड़ी संख्या में मूर्तियाँ लगी हैं तो उनके सम्मान के लिए अब उनकी सुरक्षा का ज़िम्मा भी किसी पर होना ही चाहिए वर्ना कुछ उपद्रवी तत्व इसका दुरूपयोग आम लोगों की भावनाएं भड़काने के लिए कर सकते हैं जो कि पहले से ही खस्ता हाल कानून व्यवस्था के लिए और भी ख़तरा बन सकता है.
           इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह की जानी चाहिए कि पूरे देश में बिना जिलाधिकारी की अनुमति और आवश्यकता के साथ मूर्ति की भविष्य में सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ही लगाने की अनुमति प्रदान की जानी चाहिए क्योंकि जिस तरह से अति उत्साह में लोग कहीं पर भी मूर्तियाँ लगा देते हैं और बाद में उनके सम्मान की व्यवस्था का प्रबंध नहीं कर पाते हैं वह भावना भी कहीं न कहीं इस तरह की समस्या को जन्म देती है. भोपाल में लगी गाँधी जी की मूर्ति का चश्मा कितनी बार चुराया जा चुका है उसकी गिनती भी नहीं की जा सकती है पर किसी भी स्थान पर किसी भी लगी हुई मूर्ति के सम्मान की बात को अब कानून के दायरे में लाना चाहिए और जो लोग मूर्ति लगा रहे हैं उन पर ही भविष्य में मूर्ति की सुरक्षा का भार डाला जाना चाहिए. सरकारी स्तर पर मूर्तियाँ लगाये जाने के लिए एक स्पष्ट नियमावली होनी चाहिए वरना इस तरह से कहीं पर भी मूर्ति लगा देने से बाद में इस तरह के ख़तरे समाज में हमेशा ही बने रहते हैं. देश में अधिकारी भी इस बात के लिए तभी तक संवेदन शील रहते हैं जब तक सम्बंधित दल की सरकार होती है उसके बाद वे भी सत्ताधारी दल की प्राथमिकता पर ही ध्यान देने लगते हैं.
          परिवर्तन के तौर पर अखिलेश सरकार का कार्यकाल कुछ बड़ी आशाएं जगाने में सफल होता नहीं दिख रहा है क्योंकि फैसले लेने और पलटने के कारण उनकी अनुभवहीनता लोगों के सामने आ रही है. अब यही लगता है कि जैसे जनता ने विकल्पहीनता की स्थिति में सपा का सर्थन किया था और अखिलेश सरकार का काम औसत भी नहीं रह पा रहा है. मुद्दों को सुलझाने के स्थान पर नए नए विवाद खड़े करके सरकार की किरकिरी करवाना अब एक स्थायी भाव बनता जा रहा है. कानून व्यवस्था के मसले पर जिस तरह से पुलिस और प्रशासन काम चलाऊ तरीके से काम कर रहे हैं और अच्छा काम करने वाले अधिकारियों को काम नहीं करने दिया जा रहा है उससे सरकार की छवि ख़राब होती है. मूर्ति वाले प्रकरण के लखनऊ और मायावती से जुड़े होने के कारण पुलिस कुछ जल्दी ही हरकत में आ गयी और तेज़ी दिखाते हुए प्रशासन ने उस स्थान पर नयी मूर्ति भी लगा दी है जिससे फिलहाल विवाद कम हो गया है पर वसूली व्यवस्था के तहत पोस्टिंग पाए किसी भी अधिकारी या कर्मचारी से निष्पक्ष होकर काम करने की आशा आख़िर किस तरह से की जा सकती है ? अगर वास्तव में ज़मीनी स्तर पर कुछ सुधार करना है तो उसकेलिए अनुभव को साथ लेकर सरकार को काम करना चाहिए वरना जनता सब देखती है और अच्छे अच्छों के सपनों को धूल में मिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ती है.
     
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मंगलवार, 20 दिसंबर 2011

दलित उद्योगपति और आरक्षण

           देश में जिस तरह से केवल राजनीति के लिए हर काम किया जाने लगा है उसमें देश के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा के एक बयान में इस बात को समझने की कोशिश है कि बिना शोर शराब किये हुए भी बहुत कुछ किया जा सकता है. देश के दलितों के उद्योग संघ डिक्की के अधिवेशन में बोलते हुए हुए रतन टाटा ने यह कहा कि देश के प्रमुख औद्योगिक घरानों को देश के दलित उद्योगपतियों से प्राथमिकता के आधार पर कच्चा माल खरीदना चाहिए जिससे इन्हें काम करने में आसानी हो और देश के पिछड़े वर्गों से आने वाले उद्योगपतियों के लिए भी आसानी हो जाएगी. वैसे इस अवसर पर बोलते हुए उन्होंने सरकार से यह भी आह्वाहन किया कि इस सम्बन्ध में कुछ ऐसे नियम भी बना दिए जाएँ जिससे आने वाले समय में इन उद्योगपतियों के लिए कुछ आसानी हो जाये और गुणवत्ता वाला सामान इन्हीं के उद्योगों से पूरे उद्योग जगत को मिल सके. इस मामले में टाटा समूह के साथ फोर्ब्स मार्शल और गोदरेज समूह ने भी अपने स्तर से ही इन उद्योगपतियों से कच्चा माल खरीदने की पहल शुरू कर दी है जो कि सराहनीय है. इन उद्योगपतियों से देश के राजनीतिज्ञों को सीख लेनी चाहिए कि कुछ काम बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से भी बिना हो हल्ले के भी हो सकते हैं.
          देश में प्रगतिशील दलितों को पूरे अवसर प्रदान किये जाएँ इसमें किसी को भी आपत्ति नहीं है पर जिस तरह से इनको कमज़ोर साबित करने की कोशिश की जाती है वह देश के सभ्य समाज और विकास के लिए घातक है. यह देश दलितों का भी उतना ही है जितना अन्य लोगों का पर देश में हर बात को दलितों के कथित चश्में से देखने से काम आसान नहीं होने वाला है. यहाँ पर विचार करने वाली बात यह है कि आख़िर क्यों कड़ी मेहनत करने के बाद भी इन दलित उद्योगपतियों को इस बात का श्रेय नहीं दिया जाता कि उन्होंने बिना किसी आरक्षण की बैसाखी के इतनी प्रगति की है ? देश के दलितों को आख़िर इस बात का एहसास कब तक कराया जाता रहेगा कि वे दलित हैं जब वे अपनी मेहनत से पूरे देश को यह दिखा सकते हैं कि वे भी किसी से कम नहीं हैं तो उन्हें इस बात की बार बार याद दिलाने से क्या होने वाला है ? आज इस बात की आवश्यकता है कि जिन दलितों ने अपनी मेहनत से अपनी कोई जगह बनाई है उन्हें दलित होने का एहसास दिलाये बिना ही आगे बढ़ने से क्यों रोका जाना चाहिए. 
        यहाँ पर यह भी महत्वपूर्ण है कि इन दलितों ने अपने प्रयासों से यह स्थान पाया है आज अगर किसी को इनकी मदद करनी है तो टाटा की तरह ही करनी चाहिए जिससे इन्हें इस बात का गर्व हो कि वे दुनिया के बहुत बड़े समूह के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और साथ ही उन्हें इस बात की प्रेरणा भी मिलती रहे कि उन्हें अब गुणवत्ता के मामले में वो कर दिखाना है जिसके लिए टाटा जैसा समूह जाना और पहचाना जाता है. इस बात की कोई आवश्यकता नहीं है उन्हें बजाय गुणवत्ता के इस बात का सहारा दिया जाये कि वे दलित हैं और आने वाले समय में उनके लिए व्यापार जगत में चल रही प्रतिस्पर्धा के स्थान पर आरक्षण की बैसाखी के सहारे खड़ा करने की फ़र्ज़ी कोशिशें की जाएँ ? अब समय है कि इन लोगों को यह समझाया जाये कि केवल आरक्षण की बैसाखी थोड़ी दूर तक तो ले जा सकती है पर लम्बी दूर तक दौड़ में शामिल रहने के लिए इनकी अपनी मेहनत ही काम आने वाली है. जो बढ़कर देश के लिए अपना योगदान दे रहे हैं उन्हें अनावश्यक सहारे के स्थान पर कड़ी प्रतिस्पर्धा में जीने की आदत डालनी चाहिए जिससे वे आने वाले समय में खुद ही सब कुछ कर सकें और बात बात के लिए उन्हें आरक्षण का आसरा न ढूँढा पड़े.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...