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Saturday, 21 May 2016

मायावती और सोशल इंजीनियरिंग

                                                             यूपी विधान सभा के २००७ के चुनावों में गुपचुप तरीके से सतीश चन्द्र मिश्र जैसे सहयोगियों के भरोसे जिस सोशल इंजीनियरिंग के सहारे मायावती ने लम्बे अर्से बाद यूपी में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी तो पिछले चुनावों में हार और २०१७ के चुनावों की तैयारियों में उनकी तरफ से इसे एक बार फिर से आज़माने की कोशिश की जा रही है पर इस बार इसमें सबसे बड़ा खतरा भाजपा की तरफ से दिखाई दे रहा है. भाजपा ने जिस तरह से लोकसभा चुनावों में परंपरागत रूप से बसपा के वोटबैंक रहे पिछड़े समूहों में मज़बूत सेंधमारी की थी उससे मायावती आज भी चिंतित हैं क्योंकि समाज के दूसरे वर्गों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने और विजय पाने की उनकी मंशा तभी सफल हो सकती है जब उनका अपना वोटबैंक सुरक्षित रहे वर्ना विधान सभा चुनाव भी कहीं न कहीं से उसके लिए आशानुरूप परिणाम देने वाले नहीं होंगे. इस बात का एहसास बसपा और मायावती को भी है पर इससे पर पाने के लिए अभी तक कोई ठोस उपाय सामने नहीं आ पा रहा है. यूपी में कांग्रेस जिस तरह से लड़ाई में होती ही नहीं है तो मुस्लिम वोटों को सहेजने का काम करने के लिए इस बार मायावती विशेष प्रयास करती हुई दिखाई दे रही हैं जिससे किसी भी परिस्थिति में उनके अपने वोटबैंक में कुछ बिखराव होने के बाद भी बैलेंस बनाए रखने में परेशानी न हो.
                                      बसपा के लिए दलित-मुस्लिम गठजोड़ शुरू से ही बहुत अच्छा साबित होता रहा है और यह पूरे प्रदेश में काम भी करता है इसलिए बसपा के लिए यह एक अच्छा विकल्प हो सकता है कि जहाँ मुस्लिम २०%  या उससे अधिक हैं वहां पर मज़बूत मुस्लिम प्रत्याशी बसपा के लिए बहुत अच्छा कर सकता है और इस बार ८० वर्तमान विधायकों को छोड़कर जिस तरह से इस समीकरण के माध्यम से पूरे प्रदेश को साधने की कोशिश की जा रही है उस परिस्थिति में बसपा अच्छा प्रदर्शन भी कर सकती है. भाजपा की तरफ से केशव मौर्या को प्रदेश की बागडोर सौंपे जाने के बाद यह भी संभव है कि वह बसपा के वोटबैंक में सेंध लगा सके और कुछ स्थानों पर बसपा के इन प्रयासों पर पानी भी फेर सके. दलित मुस्लिम का साथ आना बसपा के लिए जितना लाभदायक हो सकता है सही तरह से उसके साथ न्याय न किये जाने की स्थिति में वह पूरी तरह से बैकफायर भी कर सकता है क्योंकि अधिक स्थानों पर मुस्लिम चेहरे होने से भाजपा दलितों में इस आधार पर भी अपनी बात पहुँचाने का काम कर सकती है कि इन चुनावों में दलितों की हितैषी पार्टी किस तरह से उनके हितों का ध्यान नहीं रख रही है जबकि भाजपा इस बार आरक्षित वर्ग से अधिक लोगों को टिकट देने की तरफ जाती हुई दिख रही है.
                                     मायावती के पक्ष में जो बात सबसे अनुकूल है वह यही कि उनके वोटबैंक को उनके सीएम बनने की राह में कोई भी रोक नहीं सकता है क्योंकि दिल्ली का चुनाव सभी को पता था कि मायावती उसकी लड़ाई में भी नहीं है इसलिए उस समय कांग्रेस को रोकने के लिए समाज के हर वर्ग ने भाजपा के पक्ष में वोट दिए थे पर विधान सभा चुनाव में खुद मायावती के यूपी के सीएम बनने के सपने का जुड़ाव भी होता है जिससे उनका काम कुछ हद तक आसान हो जाता है. प्रदेश में मुस्लिम वोट निर्णायक साबित हो सकता हैं पर जिस तरह से उनके बड़े स्तर पर एक बार फिर से बिखराव के संकेत मिल रहे हैं तो उस परिस्थिति में उनका ज़मीन पर कितना असर दिखाई देगा यह तो समय ही बता पाएगा. ओवैसी के यूपी आने से भाजपा को सबसे बड़ा लाभ मिल सकता है क्योंकि प्रदेश के मुस्लिम कांग्रेस, सपा और बसपा की राजनीति देख भी चुके हैं और ओवैसी उनके लिए नया चेहरा भी हैं. यदि मुस्लिम वोट एकमुश्त किसी पार्टी को जाने के स्थान पर टैक्टिकल वोटिंग को अपनाता है तो बसपा का काम भले ही कुछ अधूरा रह जाये पर भाजपा को प्रदेश में रोकने का काम करने में वह सफल भी हो सकता है. फिलहाल तो मायावती के पास मुस्लिम वोटर जाने को तैयार है पर उसका कितना विपरीत असर बसपा की संभावनाओं पर पड़ सकता है यह बता पाना और समझ पाना अभी थोड़ा मुश्किल काम लग रहा है. 
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