मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 23 May 2016

चुनावी जीत और अराजकता

                                                               पिछले कुछ वर्षों से विधानसभा और लोकसभा के चुनावों के बाद जिस तरह से विभिन्न दलों के समर्थकों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ व्यापक अराजकता का प्रदर्शन किया जाता है और कई बार इससे होने वाली हिंसा से कार्यकर्ताओं की जान भी चली जाती है तो आज इस परिस्थिति पर सभी दलों को फिर से विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि लोकतंत्र में चुनाव केवल सांकेतिक रूप से सत्ता तक पहुँचने की लड़ाई ही होते हैं पर आज यह देखने में अधिक आने लगा है कि चुनावी प्रतिस्पर्धा लोगों के जीवन पर भारी पड़ने लगी है. इस तरह की चुनावी हिंसा देश में सदैव से पंचायत चुनावों में दिखाई देती थी जिसमें निचले स्तर के चुनाव होने के कारण लोग उसे अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लिया करते हैं. मनोनुकूल परिणाम न आने पर और अपने दल की सत्ता आने की ख़ुशी में इस अराजकता का प्रतिशत और भी बढ़ जाता है तथा कई बार कार्यकर्ताओं में निचले स्तर पर बहुत अधिक दुश्मनी हो जाती है और वह लम्बे समय तक चलती भी रहती है जिसका लोकतंत्र और चुनावी राजनीति में कोई स्थान नहीं होना चाहिए.
                                        इस तरह की चुनावी हिंसा में केरल और पश्चिम बंगाल का काफी ऊंचा स्थान सदैव ही रहा करता है जबकि हिंसा के लिए बदनाम यूपी और बिहार में भी विधान सभा चुनावों में जीतने के बाद आम तौर पर इस तरह की अतिवादी प्रतिक्रिया कम ही दिखाई देती है. इस बार केरल में वामपंथियों और पश्चिम बंगाल में ममता की सरकार फिर से बनने के संकेत के साथ साथ ही वहां भाजपा और अन्य दलों के कार्यकर्ताओं पर जिस तरह से हमले किये जाने की घटनाएं बढ़ने लगी हैं आज उस पर काबू पाने की आवश्यकता है क्योंकि चुनाव के बाद इस तरह के शक्ति प्रदर्शन का कोई मतलब नहीं होता है तथा जो जीते हैं उन्हें शालीनता के साथ अपनी विजय के उत्सव को जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने लायक बनाना चाहिए. आमतौर पर किसी भी पार्टी द्वारा इस तरह की अराजकता के चलते अपने कार्यकर्ताओं को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाये जाते हैं और अपने दल के कार्यकर्ताओं को कानूनी लीपापोती के साथ बचा लिया जाता है जिसका सीधा असर उनके अराजक चरित्र पर ही लगता है.
                                         क्या चुनाव के बाद होने वाली इस तरह की संगठित और दलीय हिंसा से बचने के लिए चुनाव आयोग के पास कोई और अधिकार भी होने चाहिए जिसका वह अपने स्तर से सीधे प्रयोग कर सके क्योंकि कई बार सरकार बदलने की स्थिति में नयी सरकार को कार्यभार ग्रहण करने में समय लगता है जिस कारण से भी पुलिस और प्रशासन चाहकर भी अराजक लोगों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठा पाते हैं. जाने वाले सीएम अपनी तरफ से कोई कडा फैसला नहीं लेना चाहते तो ऐसी स्थिति में क्या राज्यों में सत्ता सँभालने वाले दलों के कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह की अराजकता करने की खुली छूट दी जा सकती है ? इस तरह की परिस्थिति से निपटने के लिए संविधान में नयी सरकार के सत्ता सँभालने तक पुरानी सरकार से ही कार्यवाहक सरकार के रूप में आवश्यक कार्यों को करवाने की व्यवस्था की गयी है पर अब जो परिस्थिति सामने आ रही है उसके बारे में तो संविधान सभा में विचार ही नहीं किया गया था कि आने वाले दिनों में राजनीति का स्तर इतना भी गिर सकता है. ऐसी स्थिति में राज्यपाल की तरफ से भी कानून व्यवस्था से जुड़े मसले पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को नयी सरकार बनने तक सीधे आदेश देने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे राजनैतिक विद्वेष के चलते किसी भी दल के कार्यकर्ताओं का उत्पीड़न पूरी तरह से रोका जा सके.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

No comments:

Post a Comment