मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

महिला अपराध और सरकारी संरक्षण

                                            देश में विमर्श का स्तर जितना नीचे गिरता जा रहा है उसे देखते हुए आने वाले समय में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों में भी अगर धर्म जाति को देखकर सरकारें काम करना शुरू कर देंगीं तो संविधान की मूल भावना का साथ किस तरह से न्याय किया जा सकेगा ?  ताज़ा प्रकरणों में जिस तरह से कठुआ और उन्नाव में लड़कियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में भी पार्टी और धर्म के साथ जातियों को भी प्राथमिकता दी जा रही है उससे निश्चित तौर पर सरकार और सत्ताधारी दल कटघरे में आ जाते हैं.  वैसे यह कोई नयी बात नहीं है क्योंकि इस तरह के मामले सामने आने पर अधिकांश जगहों पर इस तरह की दलीलें सरकारें हमेशा से ही देती रही हैं पर आज़ादी के बाद से जिस तरह से कांग्रेस समेत अन्य दलों पर जनसंघ और भाजपा यह आरोप लगाती रहती थी कि सरकार में बैठे लोग पूरी तरह से अपने लोगों की रक्षा करते रहते हैं पर अब जब जम्मू कश्मीर और यूपी में वह खुद सरकार चला रही है तो आरोपितों के साथ वह खुद भी उसी तरह का व्यवहार कर रही है जिससे विपक्ष में रहते हुए उन्हें सबसे बड़ी आपत्ति होती थी.
                                  कठुआ मामला जिस तरह से धार्मिक और पार्टी साथ राष्ट्रीय झंडों के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है वह निश्चित रूप से पूरे समाज को इस तरह के आवरणों के पीछे  छिपकर कुछ भी अनैतिक करके बच निकलने का मार्ग नहीं दिखा रहा है ?  धर्म के आधार पर एक ८ साल की लड़की के साथ हुए दुष्कर्म और उसकी निर्मम हत्या के बाद भी यदि राष्ट्रीय महिला आयोग, बाल आयोग और साथ ही अन्य ज़िम्मेदार लोग यदि बोलना भी उचित नहीं समझ रहे हैं तो समाज की स्थिति और नेताओं की मानसिकता को अच्छी तरह से समझा जा सकता है।  जम्मू क्षेत्र में आरोपपत्र दाखिल होने से रोकने के लिए वकील सामने आ जाते हैं तो श्रीनगर में अलगाववादी इस मौके को आज़ादी से आगे ले जाकर निजाम-ए -मुस्तफा तक पहुँचाने में लगे हैं क्योंकि आज़ादी का मामला उन्हें उतना लाभ नहीं दिलवा पा रहा है।
                                  यूपी में जिस तरह से एक आरोपी विधायक के खिलाफ क़ानून अपने आप को लचर पा रहा है वह क्या सत्ता की विफलता और सरकार की संविधान में निष्ठा पर संदेह उत्पन्न नहीं करता है फिर भी सरकार की तरफ से कानून की रक्षा किस तरह से की जाएगी ? अच्छा होता कि सरकार की तरफ से इस मामले में आरोपों के आधार पर स्वतः ही कार्यवाही शुरू की जाती और आरोपों की निष्पक्ष जांच की जाती जिससे पीड़िता और आम लोगों को यह लगता कि सरकार सही मंशा से काम कर रही है फिर भी इस मामले में सरकार की तरफ से जानबूझ कर किये गए विलम्ब से केवल उसकी छवि को ही नुकसान पहुंचा है. इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जिस तरह से इस मामले में दायर की गयी याचिका को जनहित याचिका में बदल दिया गया है उससे अब सरकार को न चाहते हुए भी वही सब करना होगा जिससे बचने की कोशिश में वह लगी थी.     
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शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

सैनिकों का मानवाधिकार

यह अच्छा ही हुआ कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस बात पर विचार करने के लिए सैन्य अधिकारियों के तीन बच्चों की मांग को स्वीकार कर रक्षा मंत्रालय से जवाब माँगा है और यह भी पूछा है कि सैनिकों के मानवाधिकार को सुरक्षित रखने के बारे में सरकार और रक्षा मंत्रालय की क्या नीति है ? आज जब कश्मीर समेत देश के हर हिस्से में सुरक्षा बलों और पुलिस के साथ आम नाराज़ लोगों, माओवादियों, आतंकियों और आतंक का समर्थन करने वाले पत्थर बाज़ों से निपटने में सरकारें बिना किसी नीति के काम कर रही हैं तो क्या इस परिस्थिति में अब यह सोचना का समय नहीं है कि सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस में भी हमारे देश के जवान ही भर्ती होते हैं जो विषम परिस्थितियों में अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहते हैं तो क्या उनके भी आम मानव का जैसे अधिकारों का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए ? सोचा जाना चाहिए कि क्या पत्थरबाजों से अपनी जान बचाने के लिए आत्मरक्षा में चलायी गयी गोलियों में पत्थरबाजों के मरने पर सैन्य अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज़ करना उचित है ? अब समय आ गया है कि सरकार स्पष्ट करे और यदि इस दिशा में अभी तक देश में कोई नीति नहीं है तो संसद में अविलम्ब एक विधेयक लाकर हमारे जवानों की सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले कानून को पारित कराये जिससे देश की सीमा और अशांत क्षेत्रों में काम करने वाले सैनिकों समेत उनके परिवार के लोग भी राजनैतिक दबाव या लाभ में दर्ज़ होने वाले मुक़दमों से बच सकें . 

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मंगलवार, 11 जुलाई 2017

श्री अमरनाथ यात्रा और सुरक्षा

                                               जम्मू-कश्मीर स्थिति श्री अमरनाथ बाबा की पवित्र गुफा में दर्शन की वार्षिक यात्रा पर जिस तरह से अंनतनाग में आतंकियों ने हमला किया है वह अपने आप में बड़ी घटना तो है ही साथ ही व्यवस्था से अलग चलने वालों के लिए एक सबक भी है प्रारंभिक खबरों में अधिकारियों की तरफ से जिस तरह से यह बात कही गयी कि यह बस नियमों का उल्लंघन करके रात के प्रतिंबंधित समय में चल रही थी वहीं बस मालिक का कहना है कि उसकी बस भी यात्रा में शामिल थी पर टायर पंक्चर होने के चलते वे काफिले से अलग हो गया थे. यह वार्षिक यात्रा विभिन्न सुरक्षा कारणों से सदैव ही केंद्र और राज्य सरकार के लिए चुनौती और चिंता का विषय बनी रहती है और पिछले वर्ष इस यात्रा से पहले ही आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से लगातार यात्रा पर भी प्रभाव पड़ता नज़र आ रहा है. घाटी में संपन्न होने वाली यह वार्षिक यात्रा दक्षिणी कश्मीर के लिए व्यापार के व्यापक आयामों को लेकर आती है क्योंकि पूरे देश और विदेशों से भी आने वाले यात्रियों से उनको अच्छी खासी कमाई भी हो जाती है पर पिछले दशक से जिस तरह से पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा इस यात्रा को निशाने पर लेकर सुरक्षा सम्बन्धी चिंताओं को उभारने का काम किया जा रहा है उसके बाद भी यात्रियों की संख्या में कोई कमी नज़र नहीं आ रही है.
                     निश्चित तौर पर हर मुद्दे पर राजनीति करने वालों के लिए एक दूसरे पर आरोप लगाने के लिए यह सही समय है पर इस सबके बीच केंद्र और जम्मू कश्मीर राज्य सरकारों को एक बार फिर से इस पर विचार करना चाहिए कि भविष्य में इस तरह की स्थिति से किस तरह बचा जा सकता है. यात्रा में शामिल किसी वाहन के ख़राब होने की दशा में यात्रा सुरक्षा प्रभारी के पास क्या विकल्प शेष बचते हैं यह सोचने और उस पर अमल किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि किसी तकनीकी गड़बड़ी से यात्रा में शामिल कोई भी वाहन कभी भी ख़राब भी हो सकता है. इसके साथ ही जम्मू से निकलते समय यात्रा में शामिल सभी वाहनों की सघन जांच भी तेज़ी से किये जाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे इस तरह की परिस्थिति सामने आने की दर को और कम या नगण्य किया जा सके. यह ऐसी परिस्थिति थी जिसके बारे में संभवतः सरकार ने भी नहीं सोचा था इसलिए यात्रा के बीच में ही किसी भी ख़राब होने वाले वाहन के यात्रियों की सुरक्षा के बारे में अब नए सिरे से रणनीति बनाये जाने की आवश्यता भी है. विशेष अपरिहार्य परिस्थितयों में पूरे काफिले को रोकना अधिक खतरनाक हो सकता है इसलिए यदि संभव हो तो घाटी में पड़ने वाले यात्रा मार्ग में हर १० किमी पर एक वैकल्पिक बस की व्यवस्था किये जाने के बारे में सोचा जाना चाहिए या फिर यात्रा के साथ हर दिन एक खाली बस भी इस तरह की किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए चलनी चाहिए.
                 सुरक्षा इनपुट्स के बाद इस परिस्थिति में यात्रा के साथ चलने वाले जवानों को भी इस बात के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश होने चाहिए कि इस तरह की परिस्थितियों में उनके लिए क्या विकल्प उपलब्ध हैं और उन्हें किन पर अमल करना चाहिए. यात्रा के महत्व और उससे जुडी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ही मजबूर होकर अलगाववादियों तक को इस घटना की निंदा करनी पड़ी है और अभी तक किसी भी आतंकी संगठन ने इस हमले की ज़िम्मेदारी भी नहीं ली है. यह ऐसा समय है जब पूरे देश के लोगों को मारे गए लोगों के साथ संवेदना है और साथ ही इस बात की आशा भी है कि पूरा देश इस परिस्थिति से भी निपटने में सक्षम है. जिन लोगों ने इस यात्रा में भाग लिया है वे जानते हैं कि यात्रा मार्ग कितना दुरूह और दुर्गम है तो ऐसे किसी भी माहौल में सरकार से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी की बात करना ही बेमानी है क्योंकि हर सरकार की तरफ से इसे सकुशल संपन्न कराने के लिए यथ संभव प्रयास किये जाते रहे है फिर भी कभी कभी इस तरह की घटनाएं होती ही रहती हैं. यात्रा में जाने वाले यात्रियों और उनके वाहन चालकों से भी इस बात की अपेक्षा की जाती है कि वे नियमों का पूर्ण रूप से पालन करेंगें तथा किसी भी विपरीत परिस्थिति में उसी तरह से धैर्य बनाये रखेंगे जैसे कल की घटना में चालक सलीम ने घटना स्थलपर चल रही गोलियों के बीच से गाड़ी को भगाने में सफलता पायी थी जिससे बहुत सारी जाने बचायी जा सकीं.  
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शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

सोशल मीडिया और समाज


                                              देश में जिस तरह से बढ़ते हुए इंटरनेट के प्रसार से आम लोगों तक सूचनाएं पहुंचनी शुरू हो चुकी हैं वहीं इस तीव्र माध्यम का दुरूपयोग कर समाज में वैमनस्यता फ़ैलाने के लिए भी किया जा रहा है. धार्मिक, सामाजिक, भाषाई और राजनैतिक आधार पर जिस तरह से देश के किसी न किसी हिस्से में बिना सोचे समझे तनाव बढ़ाने वाले लोग सक्रिय हो चुके हैं उनसे निपटने का कोई कारगर तरीका सरकार, पुलिस या प्रशासन के पास नहीं है. ऐसी किसी भी परिस्थिति में सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी आम नागरिकों की ही हो जाती है क्योंकि उनकी तरफ से किये जाने वाले किसी भी अनुचित व्यवहार से पूरे समाज या क्षेत्र में तनाव व्याप्त हो जाता है. इस तरह की परिस्थिति से निपटने के लिए एक स्पष्ट नीति की आवश्यकता है क्योंकि देश में आज कहीं डायन, कहीं गाय के हत्यारे और कहीं पैगम्बर और देवी देवताओं के लिए अपमानजनक पोस्ट लिखने से लगातार तनाव फैलने की ख़बरें आती ही रहती हैं. चुनावी दृष्टि से संवेदनशील राज्यों में यह बहुत अधिक दिखाई देता है क्योंकि हर राजनैतिक दल अपने वोटों के ध्रुवीकरण के लिए इस तरह की गतिविधियों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल रहा करता है.
                                                      ऐसी किसी भी परिस्थिति को रोकने के लिए सबसे पहले सभी धर्मों के धर्म गुरुओं को सामने आना होगा क्योंकि ऐसी परिस्थिति से राजनैतिक लाभ मिलने के चलते कोई भी राजनैतिक दल महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाना चाहेगा. सोशल मीडिया पर किसी भी अनजान व्यक्ति के कुछ भी लिख देने से क्या किसी धर्म का अहित हो सकता है यह सोचने समझने की बात है और उस व्यक्ति की कैसी समझ है क्या इस पर भी विचार नहीं किया जाना चाहिए ? भारतीय जिस तरह से अपने को प्रगतिशील और आधुनिक दिखाने का ढोंग करते हैं वे पल भर में ही कितने असभ्य हो जाते हैं इसका उदाहरण आज़ादी के बाद से आज तक होने वाले हर दंगे में दिखाई देता रहा है. जिन लोगों के साथ आम लोग बचपन से ही रहते आ रहे होते हैं धर्म की आभासी दीवार और उस पर आसन्न संकटों को हम कितनी आसानी से सही मान लेते हैं और जो धर्म हमारे जीवन का अंग होना चाहिए वह प्रदर्शन का विषय बन जाता है और हम एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं. जिन लोगों की तरफ से इस तरह के पोस्ट डाले जाते हैं उनके खिलाफ शिकायत मिलने पर कानून को सख्ती से काम करना चाहिए और आने वाले समय में उस जैसी मानसिकता को बढ़ने से रोकने के लिए भी ठोस कदम उठाने चाहिए.
                                                    सोशल मीडिया का इस तरह से दुरूपयोग करना किसी भी तरह से समाज के हित में नहीं कहा जा सकता है क्योंकि कुछ लोगों की दूषित मानसिकता के कारण पूरे इलाके में तनाव फैलता है जिसमें कई बार निर्दोषों की जान भी चली जाती हैं और उस मसले से किसी भी धर्म का कुछ नहीं बिगड़ता है. जो ज़िम्मेमदार लोग सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं उन्हें भी पूरी तरह से अपने उन मित्रों पर नज़र रखनी चाहिए जिनकी तरफ के कई बार जाने अनजाने में ही सामाजिक, धार्मिक रूप से आपत्तिजनक पोस्ट्स को आगे बढ़ाया जाता है. इस बात की सफलता असफलता को इस तरह से भी देखना चाहिए कि हम इस तरह की पोस्ट्स को रोकने के लिए कितने ज़िम्मेदारी से आगे आते हैं क्योंकि अधिकांश लोगों को यह भी नहीं पता होता है कि वे किसी भी आपत्तिजनक पोस्ट को आगे भेजकर कानून का उल्लंघन कर रहे होते हैं और इस स्थिति में उनके लिए बहुत समस्याएं भी खडी हो सकती हैं. सोशल मीडिया के लिए भी क्या अब पुलिस की सोशल मीडिया लैब्स के अतिरिक्त समाज में भी शांति समितियों की आवश्यकता नहीं है जो इस तरह के किसी भी विवाद के सामने आने पर उनको सामाजिक स्तर पर सुलझाने का प्रयास करें और समाज में अलगाव पैदा करने की कोशिशें करने वाले सभी तत्वों की कोशिशों को पूरी तरह से नाकाम करने का काम कर सकें. देश हमारा है समाज हमारा है तो इसकी संरचना की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी भी हम सभी को मिलकर ही उठानी होगी दूसरों को कोसने से कभी भी समाज का हित नहीं हो सकता है.     
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गुरुवार, 11 मई 2017

कश्मीर की कश्मीरियत


कश्मीर के कुलगाम में जिस तरह से आतंकियों ने छुट्टी पर आये सेना के अधिकारी की एक शादी समारोह से अगवा करने के बाद गोली मारकर कर दी उसके बाद कश्मीर के लोगों को यह सोचना ही पड़ेगा कि वे अब भी पाकिस्तान के इशारों पर चलकर किसका नुकसान करने में लगे हुए हैं. इस्लाम की सीखों पर चलने के सपने के साथ इस्लामी राज्य बना पाकिस्तान किस तरह से धार्मिक कट्टरता और फिर आतंकियों के पोषक के रूप में आज पूरी दुनिया में जाना जाता है वह सब जानते हैं. पाकिस्तान में एक समय जिन्होंने तालिब बनकर समाज में स्वीकार्यता बधाई थी वे तालिबान और फिर अलग नाम के समूह बनकर उसी इस्लामी धार्मिक समाज का कितना नुकसान कर चुके हैं ? एक समय पाकिस्तान कि सेना के आश्रय में पलने वाले ये इस्लामी चरमपंथी आज सीधे पाकिस्तानी सेना को ही चुनौती देने में लग चुके हैं इस बात की अनदेखी भी नहीं की जा सकती है. दक्षिणी कश्मीर घाटी में जिस तरह से चार जिलों में पाक समर्थित आतंकियों का अधिकांश मौन एवं सीमित खुला समर्थन बढ़ रहा है वह घाटी को भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान के रास्ते पर ले जाने का काम ही करने वाला है. आज कुलगाम के एक कश्मीरी मुसलमान सेना अधिकारी की सुनियोजित हत्या की गयी है कल को वे कश्मीरी मुसलमान सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय लोगों को सीधे ही निशाना बनाने लगेंगें ऐसी परिस्थिति में उन लोगों के वे बहकावे सामने आ जायेंगें जिसके तहत उन्होंने नब्बे के दशक में घाटी को कश्मीरी पंडितों से खाली करवा लिया था और आने वाले समय में यदि स्थानीय लोग इसी तरह से इन आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब इनकी बंदूकों की नलियां आम कश्मीरी मुसलमान की तरफ ही होंगीं. कश्मीर के लोगों, वहां की सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के साथ सम्पूर्ण भारत को इस मसले पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है वर्ना पानी सर से ऊपर होने में देर नहीं लगेगी और सुरक्षा बलों को अपनी सख्ती में और बढ़ोत्तरी करने को मजबूर होना पड़ेगा जिससे आखिर में वहां का स्थानीय निवासी होने के कारण आम कश्मीरी मुसलमान ही परेशानी झेलने वाला है.

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शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

कश्मीरी पंडित और घाटी

                                           कश्मीर के मुद्दे पर स्थलीय परिस्थितियों को समझे बिना ही जिस तरह से केंद्र और जम्मू कश्मीर सरकार की तरफ से अनावश्यक बयानबाज़ी होती रही उसके बाद ही पिछले वर्ष घाटी में अलगाववादियों को एक बार फिर से अपने मंसूबों को पूरा करने लायक माहौल बनाने में काफी मदद मिली थी जिसका असर पिछले वर्ष घाटी में लगातार होने वाले उग्र प्रदर्शनों में भी दिखाई दिया था. इससे पहले होने वाले अधिकांश प्रदर्शन कुछ दिनों में ही समाप्त हो जाते थे पर इस बार कश्मीरियों को अलगाववादी यह समझाने में सफल रहे थे कि घाटी में अलग से पंडितों के लिए बसाई जाने वाली कॉलोनी पूरी घाटी में आने वाले समय में फिलस्तीन जैसा माहौल बना देंगीं और घाटी में अन्य लोगों के आने और बसने का रास्ता भी खुल जायेगा. मानसिक तौर पर कश्मीरी मुसलमान इस बात पर पहले से ही बहुत सख्त रुख अपनाते हैं और इस बार भी उनकी प्रतिक्रिया अलगाववादियों कि मंशा के अनुरूप ही थी हालाँकि उनके इस सख्त रुख का कश्मीरी पंडितों के जीवन पर बहुत बुरा असर ही पड़ा है क्योंकि हमेशा भाईचारे की बातें करने वाले ये सभी लोग उस समय डर या धार्मिक कारणों से इन कश्मीरी पंडितों की बर्बादी को ख़ामोशी से देखते रहे थे जब १९८९ से उन पर चुन चुन कर अत्याचार शुरू किये गए थे.
                          वैसे सरकार की इस पहल से कश्मीरी पंडितों में भी कोई बहुत उत्साह नहीं दिखाई दिया था क्योंकि अलग कॉलोनी में वे रह तो सकते थे पर विभिन्न कामों के लिए उन्हें कभी न कभी बाहर भी जाना ही पड़ता और अलग जगह रहने के कारण उन  पर आते जाते हमले करना या डराना अलगाववादियों के लिए आसान ही होने वाला था. भाजपा ने अभी तक कश्मीरी पंडितों को लेकर जो रुख अपनाया हुआ था मोदी सरकार ने भी उसका ही समर्थन किया और कश्मीर की महबूबा सरकार को भी इसी तरह से सोचने को मजबूर किया जिसका परिणाम पिछले वर्ष सामने आ चुका है. हालाँकि अब भाजपा अपने इस एजेंडे से फिलहाल पूरी तरह पीछे हट चुकी है इस बात की आधिकारिक घोषणा उसकी तरफ से कभी भी नहीं की गयी पर संसद में झूठ बोल पाना किसी भी सरकार के लिए सबसे कठिन काम होता है इसलिए एक सवाल के जवाब में मोदी सरकार की यह नीति स्पष्ट रूप से तब सामने आ गयी जब ७ फरवरी को संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए गृह राज्य मंत्री हंसराज गंगाराम अहीर ने बताया कि कश्मीरी पंडितों के लिए अलग से रिहाइशी कॉलोनी बसाने का न तो कोई प्रस्ताव है और न ही सैनिक कॉलोनियां ही बसाई जाएंगी.
                           सरकार ने इस तथ्य को इतनी जल्दी स्वीकार कर लिया यह अच्छा ही है क्योंकि जब तक कश्मीर में विश्वास बहाली के और अधिक कदम नहीं उठाये जाते हैं तथा केंद्र और राज्य सरकार एक सुर में बोलना नहीं सीख लेती हैं तब तक इस तरह के मुद्दों पर बात करना भी कठिन ही होने वाला है. घाटी के मौसम और परिस्थितियों के अनुरूप यदि सरकार वहां पर सूचना प्रौद्योगिकी और उससे जुड़े अन्य क्षेत्रों में रोज़गार सृजन पर काम करना शुरू करे तो आने वाले समय में घाटी में काफी कुछ बदलाव लाये जा सकते हैं पर यह सब कुछ वैसा ही है कि कृत्रिम रूप से अशांत दिखने वाले इस क्षेत्र में कोई निवेशक क्यों आना चाहेगा ? इस माहौल में बदलाव के लिए अब बयानबाज़ी के स्थान पर कुछ ठोस कदम उठाकर घाटी के युवाओं के लिए रोज़गार बढ़ाने की दिशा में आवश्यक कदम भी उठाये जाने चाहिए. वहां सबसे बड़ी समस्या यह है कि दोनों सत्तारूढ़ दलों के वोटबैंक परस्पर एक दूसरे के घोर विरोधी और देखकर ही चिढ़ते हैं और दोनों दलों को अपने वोटबैंक को सुरक्षित रखने के लिए इस तरह की बयानबाज़ी करनी ही पड़ती है जिससे अंत में कश्मीर और देश का ही नुकसान होता है. जम्मू और घाटी के नेताओं समेत भाजपा के केंद्रीय नेताओं को भी अब यह समझना ही होगा कि कठोर बयान केवल पाकिस्तान के सन्दर्भ में ही दिए जा सकते हैं पर घाटी को लेकर इस तरह की बयानबाज़ी किसी भी तरह से उनके और देश के लिए उचित साबित नहीं हो सकती है.         
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बुधवार, 4 जनवरी 2017

प्रतिद्वंदिता से संघर्ष तक

                                                         देश के हर हिस्से से कभी न कभी सत्ताधारी दल के नेताओं कार्यकर्ताओं द्वारा दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं और नेताओं के विरोध के व्यक्तिगत या संस्थागत हमले के साथ आपसी संघर्ष में बदलने की ख़बरें आती ही रहती हैं. इस मामले में कुछ राज्यों में राजनैतिक हत्याओं का रिकॉर्ड काफी ख़राब है वहीं अधिकांश राज्यों में सत्ताधारी दल सत्ता के बलबूते विरोधियों पर दमन चक्र चलाने से पीछे नहीं रहते हैं. बंगाल से तृणमूल संसद सुदीप बंद्योपाध्याय को हिरासत में लिए जाने के बाद जिस तरह से विरोध स्वरुप पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भाजपा के राज्य कार्यालय के सामने उग्र प्रदर्शन किया और उसके बाद दोनों दलों के कार्यकर्ताओं में हिंसक झड़प होने के भी समाचार हैं उससे यही लगता है कि हमारे लोकतंत्र में अभी भी नेताओं और दलों को यह समझने की आवश्यकता है कि किस तरह से समाज में रहकर अपने कर्तव्यों का अनुपालन किया जाये और किस तरह से लोकतंत्र में दूसरों को भी अभिव्यक्ति को समुचित स्थान दिया जाये ? देश में आज जिस तरह से राजनैतिक विचारधाराओं पर गंभीर विभाजन होता चला जा रहा है उसको रोकने के लिए कहीं न कहीं से शीर्ष स्तर से सभी दलों को कार्यवाही करने की आवश्यकता भी है.
                                      बंगाल में चिटफण्ड घोटालों के चक्कर में सत्ताधारी तृणमूल सदैव से ही केंद्र सरकार के निशाने पर रही है और जिस तरह से भाजपा और तृणमूल दोनों दलों के शीर्ष नेताओं में दूरियां बढ़ रही हैं उनको देखते हुए अब कोई भी यह नहीं कह सकता है कि आने वाले समय में इनके कार्यकर्ताओं में पनप रही कटुता को कम किया जा सकता है. बंगाल, केरल, त्रिपुरा  और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में विरोध के स्वरों को हर तरह से दबाने की कोशिशें की जाती हैं जिनके फलस्वरूप कहीं न कहीं से सत्ताधारी दलों के कार्यकर्ताओं को भी यह सन्देश मिल जाता है कि भले ही उनके नेता कुछ भी कहते रहें पर इतने उग्र होने का पार्टी में लाभ भी मिल सकता है बस यहीं से लोकतंत्र में विरोध हिंसक हो जाता है और मरने-मारने की स्थिति स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है. ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए क्या अब देश के सभी राजनैतिक दलों को स्व-नियंत्रण पर ध्यान नहीं देना चाहिए जिससे आने वाले समय में राजनैतिक प्रतिद्वंदिता के चलते कार्यकर्ताओं और नेताओं पर इस तरह से होने वाले जानलेवा हमलों को पूरी तरह से रोका जा सके ?
                      ममता बनर्जी की तरफ से जिस तरह केंद्र की मोदी सरकार पर आरोप लगाए जा रहे हैं कि वह सीबीआई और अन्य केंद्रीय एजेंसियों का दुरूपयोग तृणमूल नेताओं के दमन में कर रही है और उनके नेताओं को फ़र्ज़ी मामलों में फ़साने की कोशिशें कर रही है तो उसके बाद यह संघर्ष थमने का नाम नहीं लेने वाला है. केंद्रीय एजेंसियों का दुरूपयोग भारतीय राजनीति में नया नहीं है अक्सर केंद्र में सत्ता सँभालने वाला दल अपनी राजनैतिक आवश्यकताओं के अनुरूप इन एजेंसियों का दुरूपयोग करता ही रहता है और भाजपा भी इसमें अलग साबित नहीं हो रही है. जो भी दोषी हैं उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी ही चाहिए देश का यही मत है पर पहले की जांचों को रोककर किसी राज्य या दल विशेष के नेताओं के खिलाफ जांचों में तेज़ी आने से क्या इन एजेंसियों के दुरूपयोग की संभावनाओं को नकारा जा सकता है ? इस तरह के मामलों में देश का हर राजनैतिक दल दोषी है क्योंकि उनके नेताओं द्वारा विरोधियों के प्रति उठाये जाने वाले क़दमों के बाद ही कार्यकर्ताओं के हौसले इतने बुलंद हो जाते हैं कि वे एक दूसरे पर जानलेवा हमले करने की नीचता तक उतर जाते हैं. अब देश को इस तरह की राजनीति में निर्दोषों को पीसने से बचने के लिए कड़े कदम उठाने ही होंगें जिससे सभी दलों के कार्यकर्ताओं को लोकतंत्र कि मर्यादा के अनुरूप पूरी तरह से सुरक्षित किया जा सके.      
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बुधवार, 9 नवंबर 2016

काले धन पर नकेल

                                             मोदी सरकार ने जिस तरह से देश को चौंकाते हुए बड़े नोटों के प्रचलन को बंद किया है वह काले धन के प्रवाह को रोकने और देश की अर्थव्यवस्था में काले धन की भूमिका को नियंत्रित करने वाला साबित हो सकता है. पहले विदेशों में जमा किये गए काले धन फिर देश के अंदर काले धन को बाहर निकालने की योजना के बाद यह परिवर्तन देश में काले धन के प्रवाह पर फिलहाल अंकुश लगाने का काम ही करने वाला है पर इस सबके बीच जिस तरह से आयकर सीमा में बढ़ोत्तरी और अन्य सुधारों की आवश्यकता है यदि उन्हें भी साथ ही लागू किया जाता तो इसके और भी बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं. इस मामले में मोदी सरकार की कोशिश पूरी तरह से सही कही जा सकती है पर जिस तरह से देश में शादियों का मौसम शुरू हो रहा है और उसमें जितने बड़े पैमाने पर ईमानदारी के धन के साथ काले धन का उपयोग होता है उसके चलते शादियों वाले घरों में समस्या ही उत्पन्न होने वाली है. जब देश की जनता स्वेच्छा से अपने स्तर पर ईमानदार होने की कोशिश करती नहीं दिखाई दे रही थी तो सरकार के पास इस तरह की सख्ती करने के अतिरिक्त कुछ और करने के विकल्प भी शेष नहीं रह गए थे.
                         काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था में देश के कुछ लाख लोगों के पास ही सब कुछ है और इससे निपटने के लिए सरकार का यह कदम इस मायने में अधिक महत्वपूर्ण है कि वह यह चाहती है कि जनता बैंकों या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लेनदेन करने की कोशिश करे जिससे देश की पूँजी का प्रवाह सही तरह से पता लग सके और काले धन का अर्थ व्यवस्था में प्रवाह नियंत्रित करते हुए आने वाले समय में पूरी तरह से रोका भी जा सके. सरकार के प्रयासों पर ऊँगली नहीं उठायी जा सकती है क्योंकि वह अपने आप में सही दिशा में उठाया गया कदम ही है और काले धन के प्रवाह को रोकने का काम केवल सरकार ही नहीं कर सकती है क्योंकि जब तक इसमें जन भागीदारी का सक्रिय योगदान नहीं होगा तब तक यह योजना भी पूरी तरह से सफल नहीं हो सकती है. देश की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय में इसका सकारात्मक परिणाम दिखाई देने वाला है पर यह भी संभव है कि बाज़ार में काले धन के प्रवाह के रुकने के कारण आर्थिक गतिविधियों में कुछ सुस्ती भी दिखाई देने लगे पर यह अस्थायी प्रभाव ही होगा और धीरे धीरे इसमें सुधार भी दिखाई देने लगेगा.
                         सभी जानते हैं कि आज देश का काला धन किन जगहों पर प्रवाहित होता है देश में चुनावों में जितने बड़े पैमाने पर धन के बल पर वोटर्स को खरीदने की कोशिशें की जाती हैं और उसमें भी रोक दिखाई देने वाली है क्योंकि चुनाव आयोग की लाख कोशिशों के बाद भी इस तरह की गतिविधियों को पूरी तरह से रोका नहीं जा सका है. अगले वर्ष यूपी जैसे बड़े राज्य समेत अन्य चार राज्यों में होने वाले चुनाव में काले धन के बलबूते बहुत कुछ करने के मंसूबे पाले बैठे लोगों के लिए समस्याएं ही बढ़ने वाली हैं क्योंकि अब पुराने नोटों से काम नहीं चलने वाला है और नए नोट मिलने में जो प्रक्रिया निर्धारित की गयी है उसके चलते अभी बड़ी मात्रा में काले धन का प्रवाह संभव नहीं दिखाई दे रहा है. जनता को इस मामले में थोड़े संयम से काम लेना चाहिए और बैंक तथा पोस्ट ऑफिस के बाहर अफवाहों के चलते भीड़ लगाने से बचना भी चाहिए. इस एक कदम से सरकार ने दो काम कर लिए हैं पहले यह कि काले धन के खिलाफ कार्यवाही लोगों को दिखाई भी देने लगी है वहीं पूँजी की कमी का रोना रो रहे बैंक्स के पास इन बड़े नोटों के रूप में ३० दिसंबर तक जो धनराशि जमा हो जाएगी सरकार के पास उसे अपनी सुविधा के अनुसार वापस करने का विकल्प खुला हुआ है जिससे बैंकों में एकदम से आम लोगों की तरफ से पूँजी का प्रवाह बढ़कर आज व्याप्त पूँजी संकट को कम करने का काम भी करने वाला होगा. जनता को धैर्य से काम लेना चाहिए और देशहित में सरकार के साथ पूरा सहयोग भी करना चाहिए.      
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गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

घाटी में चौपट शिक्षा

                                           जुलाई माह से कश्मीर घाटी में शुरू हुए बंद और हिंसक प्रदर्शनों के दौर के बीच जहाँ व्यापार पर बहुत बुरा असर पड़ा है वहीं घाटी में बच्चों की शिक्षा पूरी तरह से ठप हो गयी है. अलगाववादियों की तरफ से जिस तरह से स्कूलों को भी निशाने पर लिया जा रहा है वह अपने आप में बहुत ही चिंताजनक बात है क्योंकि जब ये बच्चे पढ़ने नहीं जा पायेंगें तो उनके आस पास चल रही हिंसक गतिविधों से लगाकर विरोध प्रदर्शनों तक का उन पर बुरा प्रभाव पड़ने से इनकार नहीं किया जा सकता है. कई बार ऐसा देखने में भी आया है कि छोटे बच्चे भी अलगाववादियों और सुरक्षा बलों के संघर्षों में फंसकर गंभीर रूप से घायल हो गए हैं या फिर उनकी मृत्यु तक हो गयी है. इस परिस्थिति से निपटने के लिए आखिर किस स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है आज यह समझने की ज़रुरत तो है ही साथ ही आने वाले समय में इस तरह के माहौल में बच्चों को किस तरह से पूरी तरह से इससे बाहर रखा जाये एक नीति के तौर पर उस पर भी विचार किये जाने की तरफ सोचा जाना आवश्यक होता जा रहा है क्योंकि केवल घाटी को छोड़कर जम्मू, लद्दाख और सीमावर्ती जिलों में स्थिति पूरी तरह से सामान्य ही है और वहां पर शिक्षा काम सही तरह से चल भी रहा है तो आने वाले समय में घाटी के बच्चों का पूरा एक साल ख़राब होने की स्थिति भी बनती हुई दिखाई दे रही है.
                                           जिस तरह से केवल कश्मीर घाटी और विशेषकर पुराने श्रीनगर में अलगाववादियों को समर्थन मिलता है आज उस परिस्थिति को बदलने के लिए काम करने की ज़रुरत है क्योंकि कोई भी सरकार इस तरह की भावनाओं को एकदम से निकाल कर बाहर नहीं कर सकती है तो उसे कम से कम उन बातों पर सोचना ही होगा जिसमें उसकी तरफ से शिक्षा को सही तरह से चलाते रहा जाये. अलगाववादियों के प्रभाव वाले विशेष क्षेत्रों में राहत पुनर्वास और विश्वास बहाली के मज़बूत कदम उठाने के बारे में सोचना चाहिए जिससे घाटी के इन लोगों में भी कानून के अनुपालन और अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचने का समय मिल सके. आतंकियों की यही चाल है कि पहले व्यवसाय को चौपट किया जाये और भले ही सीमित संख्या में ही सही पर बच्चों को किसी भी तरह से स्कूल तक जाने से भी रोक लगायी जाये जिससे वे अलगाववादियों और आतंकियों की अगली पीढ़ी के रूप में उपलब्ध हो सकें. पुराने शहर में सुरक्षा के स्तर को और भी अधिक मज़बूत करने और जवानों के स्थान पर उपग्रह आधारित निगरानी पर भी तेज़ी लाने का काम करना चाहिए जिससे सुरक्षा बलों की तैनाती किये बिना ही इन खतरे वाली जगहों पर नज़र रखी जा सके. इसरो के प्रयासों से देश के पास ऐसी व्यवस्था भी उपलब्ध है जिसमें इस तरह की निगरानी को और भी आसानी से किया जा सकता है तो इस विकल्प पर विचार करने की आवश्यकता भी है.
                                       पुलिस प्रशासन और सेना के संयुक्त प्रयासों से इस तरह की गतिविधियों पर अंकुश भी लगाया जा सकता है और आतंकियों तथा उनके समर्थकों पर बहुत ही सटीक कार्यवाही करके उन्हें निष्क्रिय भी किया जा सकता है. शिक्षा भविष्य का द्वार खोलती है इसलिए अब समय आ गया है कि घाटी में स्थानीय लोगों की सहभागिता से स्कूलों को लगातार खोलने का दबाव आतंकियों पर बनाया जा सके और यदि उनकी तरफ से शिक्षा में व्यवधान डाला जाए तो स्थानीय अधिकारियों से पहले नागरिकों को ही इसके लिए आगे आना सीखना होगा क्योंकि जन-बल के आगे कोई भी शक्ति इस तरह से नहीं टिक सकती है. यह घाटी के लोगों को ही तय करना होगा कि उन्हें अपने बच्चों की शिक्षा चाहिए या अलगाववादियों का साथ देना है क्योंकि उनके बाद यदि उनकी अगली पीढ़ी भी इसी तरह से असमंजस में उलझी रहती है तो आने वाले समय में घाटी में तरक्की को कैसा लाया जा सकता है ? घाटी के लोगों को यह भी समझना होगा कि जिहाद के नाम पर जितने भी देशों में जेहादी लगे हुए हैं उनमें आम नागरिकों को ही सबसे अधिक नुकसान हो रहा है और जब वे जेहादियों के साथ रहने का विकल्प अपनाएंगें तो जेहादी मानसिकता उन पर हावी भी हो जाएगी तथा बच्चों की पीढ़ी पूरी तरह से बर्बाद हो जाएगी जो कि आतंकियों की मंशा को ही पूरा करने वाली होगी.                                       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

चीनी सामान का बहिष्कार ?

                           देश में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों के लगातार होते हमलों के और चीन द्वारा पाकिस्तान में बैठे कश्मीर की आज़ादी का समर्थन करने वाले जेहादी संगठनों के समर्थन किये जाने के बाद जिस तरह से आम जनमानस में चीन में बने समान का बहिष्कार करने की इच्छा बलवती हो रही है उसे देखते हुए व्यापारिक स्तर पर चीन के साथ अब भारत के रिश्ते बिगड़ने ही वाले हैं. अभी तक भारत चीन में बने हर तरह के सामान का प्रमुख बाजार बना हुआ है उस परिस्थिति में यदि आम जनता की तरफ से इस पर स्वेच्छा से रोक लगायी जाती है तो यह स्थिति मोदी सरकार के लिए चीन से संबंधों में विकट परिस्थियों को उत्पन्न कर सकती है जिससे निपटने के लिए सरकार के पास संभवतः कोई मार्ग शेष नहीं बचने वाला है. बेशक राजनीति और व्यापार अपनी जगह पर हैं पर दुनिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वही भारत है जिसके नागरिकों ने १९६५ की लड़ाई में पीएम शास्त्री के आह्वाहन पर एक समय का खाना भी छोड़ दिया था तो आज जब स्थितियां देश के पक्ष में झुकी हुई हैं तो किसी देश विशेष के सामान का बहिष्कार करना कोई मुश्किल काम भी नहीं है पर सरकार की स्थिति इस पूरे प्रकरण में अजीब सी होने वाली है क्योंकि उसकी तरफ से देश की आर्थिक प्रगति के लिए भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं.
                                                  पूरी दुनिया में कम टिकाऊ साबित होने बाद भी चीनी सामान अपनी सस्ती कीमत के दम पर आम लोगों तक पहुँच बना सकने की क्षमता के चलते मज़बूत पैठ बनाये हुए हैं जिससे अन्य देशों के व्यापारिक हितों पर गंभीर चोट पहुँच रही है इस परिस्थिति में यदि भारत जैसे बहुत बड़े बाज़ार में चीन की पहुँच राष्ट्र के नाम पर कम होती है तो यह उसके व्यापारिक हितों के खिलाफ भी जाने वाला हो सकता है इसलिए ही चीन की तरफ से विशेषज्ञों ने स्टील आदि उद्योगों पर एंटी डंपिंग शुल्क लगाकर भारत द्वारा अपने उद्योगों की रक्षा करने की कोशिशें का विरोध भी शुरू कर दिया हैं. ऐसे में यदि आम भारतीय भी पाकिस्तान का आँख मूंदकर समर्थन करने के कारण चीन से नाराज़ होकर उसके यहाँ बनी वस्तुओं का उपयोग चरणबद्ध तरीके से बंद करना शुरू कर दे तो चीन के लिए एक बड़ा संकट भी खड़ा हो सकता है क्योंकि दुनिया भर में आर्थिक/ व्यापारिक गतिविधियां वैसे भी कम ही चल रही हैं तो उस परिस्थिति में चीन के लिए इतना बड़ा नया बाज़ार खोज पाना काफी मुश्किल भरा काम भी हो सकता है जिसके चलते वह भारत पर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में दबाव बना सकता है.
                                       यह उचित भी है कि चीन का पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए भारत को सभी तरह के विकल्पों पर विचार करना आवश्यक है पर अति उत्साह में क्या हम अपने व्यापारियों का ही अहित नहीं करने जा रहे हैं ? उरी हमले के बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों में जिस स्तर पर भारत में पाक के खिलाफ आम लोगों का गुस्सा चरम पर है उसे कम करने के लिए ही सर्जिकल स्ट्राइक के भरपूर प्रचार के माध्यम से सरकार ने अपने प्रयास कर ही दिए हैं उसके बाद अब जिस तरह से भारत की जनता पाक और चीन के विरुद्ध किसी भी तरह के संबंधों पर पुनर्विचार के लिए अड़ सी गयी है तो उसमें सरकार के चाहने या न चाहने का कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है. दीवाली के लिए जिस तरह से व्यापारियों ने अपने गोदामों को चीन के सामान से भर लिया है और उसमें से बहुत सा हिस्सा खुदरा व्यापारियों तक पहुँच भी गया है उससे यह सन्देश समझना चाहिए कि चीन ने तो इसमें लाभ कमा लिया है पर अब बहिष्कार से केवल हमारे अपने लोगों को ही हानि पहुँचने वाली है. इस वर्ष भी थोड़ी मात्रा में ही सही अपने व्यापारियों का समर्थन और चीन का विरोध करते हुए आमलोगों को अपने लोगों के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए और जो चीनी सामान बाज़ार में उपलब्ध है उसकी खरीद पर उतनी सख्ती नहीं करनी चाहिए और व्यापारियों को भी यह समझना चाहिए कि अब चीन के सस्ते सामान के स्थान अपर कुछ मंहगा साबित हो रहा भारतीय सामान ही प्राथमिकता में रहने वाला है इसलिए आने वाले समय में उन्हें भी चीन के सामान से किनारा करने के बारे में गंभीरता से सोचना ही होगा.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 28 सितंबर 2016

भारत-पाक-सार्क और आतंक

                                             जिस भावना के साथ एक समय दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल के स्तर पर सहयोग करने के लिए सार्क देशों के समूह की स्थापना की गयी थी लगता है अब वह पाकिस्तान के आतंक समर्थक रवैये के चलते समाप्त होने की कगार पर है. अस्सी के दशक से पाक और भारत के बीच सीमा पर आतंक को लेकर चल रही शंकाओं और आरोप प्रत्यारोप के बीच ही सार्क नेताओं ने इस समूह का गठन भी किया गया था पर हर मामले में भारत से लाभ उठाने वाले पाकिस्तान ने समय आने पर कभी भी कोई ऐसा सहयोगात्मक रवैया नहीं अपनाया जिससे यह समझा जा सकता कि वह भी इस संगठन को मज़बूती से आगे बढाकर पूरे क्षेत्र की तरक्की के लिए काम करना चाहता है. पहले पंजाब और फिर कश्मीर में आतंकी संगठनों को हर तरह का सहयोग के साथ ही उसने देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपने यहाँ प्रशिक्षित आतंकियों के लिए जिस तरह से हर स्तर पर सुरक्षा उपलब्ध कराई उससे वह पूरी वैश्विक बिरादरी के सामने बेनकाब तो हो गया पर पाकिस्तान जैसा हाँ में हाँ मिलाने वाला कोई दूसरा क्षेत्रीय देश न होने के कारण अमेरिका और अन्य देश भी उस पर मजबूरी में भरोसा करते हुए दिखाई देते हैं. अमेरिका ने अपने सबसे बड़े शत्रु ओसामा को भी पाकिस्तान में घुसकर मार पर अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते आज वह फिर से पाकिस्तान पर भरोसा करने के लिए मजबूर ही दिखाई देता है जबकि उसकी छोटी सी कोशिश भी पाक के जेहादी समूहों से निपटने में बहुत कारगर साबित हो सकती है.
                                   भारत ने जिस तरह से आगामी सार्क शिखर सम्मलेन से किनारा किया है उसके बाद अब पाकिस्तान के लिए इस समस्या से निपट पाना बहुत मुश्किल ही साबित होने वाला है क्योंकि हर तरह एक तनाव के बीच भी भारत ने इस सहयोग पर अपने पाकिस्तान के साथ चल रहे बेहद ख़राब द्विपक्षीय संबंधों के चलते कोई आंच नहीं आने दी. सार्क चार्टर के अनुसार यदि एक भी देश का प्रमुख इसमें आने से मना करता है तो यह बैठक हो ही नहीं सकती है इसलिए अब पाकिस्तान पर इस शिखर बैठक को कराने का दबाव भी आ गया है. आज जिस तरह से पाक का रवैया है और भारत की तरफ से युद्ध से पहले के हर उस विकल्प पर गौर किया जा रहा है वह मोदी सरकार की सही नीति को ही दिखाता है क्योंकि किसी भी मामले में युद्ध केवल अंतिम विकल्प ही होना चाहिए उसे सबसे पहले शुरू करने से हर पक्ष का नुकसान ही होता है. बिना युद्ध किये भी भारत के पास बहुत सारे ऐसे विकल्प खुले पड़े हैं जिसके चलते वह पाकिस्तान के लिए कुछ वर्षों के लिए बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है जिससे उबरने में पाकिस्तान की कोई भी देश मदद नहीं कर पायेगा. सिंधु नदी के समझौते को रद्द करने से पहले भारत के पास यह विकल्प भी उपलब्ध है कि वह अपने हिस्से में मिले २०% पानी का पूरा उपयोग करना शुरू कर दे और पाकिस्तान के लिए कृषि क्षेत्र में एक बड़ा संकट उत्पन्न कर दे. भारत जम्मू कश्मीर में पहले से ही सिंधु और अन्य नदियों पर अपने २०% हिस्से के उपयोग के सम्बन्ध में पन-बिजली परियोजनाओं को बनाना शुरू कर चुका है और आने वाले समय में बगलिहार जैसी अन्य परियोजनाएं भी सामने आ सकती हैं जिससे कश्मीरियों के लिए तो आसानी होगी पर पाकिस्तान के लिए हर स्तर पर परेशानियों का दौर शुरू हो जायेगा. घाटी के लोग सिंधु समझौते को अपने खिलाफ भी मानते रहे हैं तो इसे रद्द किये जाने की किसी भी घोषणा या संसाधनों के भरपूर दोहन से जुड़े मसलों में भी घाटी का पूरा सहयोग भी साथ ही रहने वाला है.
                                   भारत की तरफ से १९९६ में हुए डब्लूटीओ समझौते के चलते ही पाकिस्तान को अपनी तरफ से मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा दिया गया है पर अभी तक पाकिस्तान ने ऐसा कदम नहीं उठाया है जबकि सार्क में भी इस तरह के द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने के लिए व्यापक चर्चाएं होती रहती है. यदि सिंधु नदी के समझौते को तोड़ने से पहले भारत केवल अपने हिस्से के पानी का इस्तेमाल करने के साथ ही पाकिस्तान के साथ सहयोगी व्यापार के स्थान पर इसे रोकने के बारे में विचार करे जिससे पाक को भी अन्य सभी तरह के टैक्स भी देने पढ़ें तो वहां सबसे अधिक कपड़ा कारोबार ही प्रभवित होने वाला है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के साथ कपडा उद्योग में पाक और बांग्लादेश ही कड़ी प्रतिस्पर्धा में रहा करते हैं. यदि भारत की तरफ से पाक को डब्लूटीओ के तहत मिली सुविधाएँ वापस ले ली गयीं तो उसके कपडा उद्योग के लिए सस्ते कच्चे माल का विकल्प समाप्त हो जायेगा तथा पाक सरकार पर भी उद्योग जगत का दबाव बन सकता है. आम घरों में रोज़ ही उपयोग में आने वाली बहुत सारी वस्तुएं भी पाकिस्तान को एमएफएन के चलते ही सही मूल्य पर भारत से आसानी से मिल जाती हैं जिससे वहां मंहगाई पर भी नियंत्रण रहा करता है पर आने वाले समय में इन सभी वस्तुओं के मंहगे होने के बाद आम जनता के लिए भी समस्याएं बढ़ सकती है जिससे पाकिस्तान सरकार और सेना पर भी दबाव बन सकता है. भारत सरकार की तरफ से अब इस दिशा में आगे बढ़ने का सही समय आ गया है क्योंकि पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा तो है और उसे सबक सिखाने की एक चाह भी बढ़ती जा रही है ऐसी स्थिति में युद्ध से पहले ही पाकिस्तान को आर्थिक स्तर पर कमज़ोर करके और वहां की जनता में सरकार के क़दमों के प्रति गुस्सा उत्पन्न कर ही उसे रणनीतिक मात दी जा सकती है.
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बुधवार, 21 सितंबर 2016

सेना के असुरक्षित कैंप

                                                         पठानकोट के बाद उरी में हुए आतंकी फिदायीन हमले जिस तरह से सेना के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित कैम्प्स की सुरक्षा से जुड़े हुए गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं वहीं इस बात पर भी विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे सैनिक इस तरह के हालात में रह रहे हैं जहाँ पर उनके लिए अपनी सुरक्षा कर पाना भी मुश्किल हो रहा है ? यह सही है कि स्थायी छावनी और विभिन्न तरह के अस्थायी कैम्प्स में सुविधाओं में बड़ा अंतर हुआ करता है फिर भी जब इन कैम्प्स के माध्यम से ही हमारे जवान सीमावर्ती क्षेत्रों से लगाकर अपनी छावनी तक आते जाते हैं तो इनकी सुरक्षा को इस तरह से कैसे रखा जा सकता है ? देश में बढ़ता हुआ रक्षा बजट हमेशा से ही विदेशों में चिंता का विषय बनता रहता है पर जब हमारे सैनिकों और सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा की बात सामने आती है तो हम क्यों इसके प्रति लापरवाह हो जाते हैं ? जिन सैनिकों के दिलों में देश के लिए लड़ने की चाहत होती है वे आखिर क्यों इस तरह से छिपकर किये गए हमलों में शहीद हो जाते हैं अब देश और सरकार के साथ सेना को भी इस विषय पर सोचने की आवश्यकता है क्योंकि पाक के रवैये को देखते हुए आने वाले समय में भी सीमा और घाटी के अंदर परिस्थितियों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आने वाला है जिससे हमारे सैनिक सदैव ही इस तरह के हमलों की जद में ही रहने वाले हैं.
                                 आज़ादी के बाद एक समय ऐसा भी था जब आर्थिक संसाधनों की कमी के चलते देश के पास अपने जवानों के लिए सर्दियों और बर्फीले क्षेत्रों में उपयोग करने लायक वर्दी खरीदने के पैसे भी नहीं होते थे पर आज स्थिति उससे बहुत अलग है तो क्यों नहीं हम एक ऐसी नीति पर आगे बढ़ने की सोचते हैं जिसमें देश भर में फैले सेना के सभी प्रतिष्ठानों को मज़बूत सुरक्षा घेरे में लाने के लिए प्रयास शुरू किये जाएँ. यह सही है कि देश के समग्र विकास के लिए सुरक्षा के अतिरिक्त हर क्षेत्र में प्रगति आवश्यक होती है पर आज जब हम सुरक्षा पर अतिरिक्त धन खर्च करने के लिए सक्षम हैं तो सेना के सभी प्रतिष्ठानों के बारे में गंभीरता से सोचने का समय भी आ गया है. एक नीति के अंतर्गत सबसे पहले सेना के आतंक प्रभावित क्षेत्रों के सभी स्थलों की सुरक्षा के लिए मज़बूत दीवार और सही डिज़ायन पर काम किया जाना चाहिए जिससे सुरक्षा संबंधी इस तरह की समस्याएं भी सामने न आने पाएं कि कोई आतंकी समूह बहुत आसानी से तार काटकर इस तरह से हमारे सोते हुए सैनिकों पर हमला कर सके. छद्म युद्ध को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता है इसलिए संसाधनों की कमी के चलते उससे होने वाली क्षति को नियंत्रित करने के बारे में तो सही दिशा में आगे बढ़ा ही जा सकता है. सेना के लिए हर तरह की व्यवस्था करते समय इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए और बैरक आदि इस तरह से बनाई जानी चाहिए कि किसी भी आतंकी हमले के समय सेना कम से कम नुकसान के साथ उनसे अच्छे से निपट सके.
                                   इस बारे में अब केंद्र सरकार अवश्य ही गंभीरता से कुछ सोच रही होगी और अब उसे अपनी सुरक्षा संबंधी नीति पर एक बार फिर से इस तरह से विचार करना ही चाहिए जिससे एक समय सीमा में हम अपने सभी सैन्य शिविरों और अन्य सामरिक महत्त्व के प्रतिष्ठानों की एक व्यापक नीति के अंतर्गत सुरक्षा कर सकें. अस्सी के दशक में पंजाब आतंक के दौर में जब राजीव सरकार ने सीमा पर कांटेदार बाड़ लगाने का काम शुरू किया था वह पूरा होने पर घुसपैठ को पूरी तरह से रोकने में सफलता मिल गयी थी तथा बाद में सरकारों ने एलओसी तथा जम्मू कश्मीर की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर भी सफलता पूर्वक लगाकर देश को पहले के मुक़ाबले अधिक सुरक्षित कर लिया है. जम्मू कश्मीर में जिस तरह की भौगोलिक परिस्थितियां हैं उनके चलते बाड़ अक्सर ख़राब हो जाती है जिसे ठीक भी किया जाता है पर आज हमें एक निश्चित बजट के साथ भविष्य में सेना के शिविरों को सुरक्षित करने के लिए अनिवार्य रूप से एक समय सीमा निर्धारित करने की आवश्यकता भी है जिससे देश की रक्षा करने वाले सैनिकों को शिविरों में और भी अधिक सुरक्षित किया जा सके. ये सैनिक भी हमारे ही परिवार का हिस्सा हैं और अब हम इनको इस तरह से असुरक्षित वातावरण में नहीं रख सकते हैं.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 19 सितंबर 2016

कायरता की श्रृंखला


                                                                      उरी में एक बार फिर से पाक समर्थित लश्कर द्वारा जिस तरह से सेना के कैंप पर सुबह हमला किया गया उसके बाद एक बात स्पष्ट हो गयी है कि पाक की तरफ से भारतीय कश्मीर में अलगाववाद को हवा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है और जब सीमा पर चौकसी के चलते उनके लिए घुसपैठ आसान नहीं रह जाती है तो वे इस तरह से छापामार तरीके से अपने फिदायीन हमलों को अंजाम दिया करता है जिससे कश्मीर अंतरराष्ट्रीय सुर्ख़ियों में लगातार बना रहे. किसी भी परिस्थिति में जब सीमा पार से जिहाद और इस्लाम के नाम पर इस तरह से का व्यापक समर्थन किया जा रहा हो तो पर्वतीय क्षेत्र में सीमा पर चौकसी बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि इस तरह से कुछ लोगों के दिमाग में जिहाद का ज़हर भरकर उन्हें भारत में भेजना पाक के लिए बहुत ही आसान होता है. ऐसी स्थिति में भारत के पास संभावित विकल्प कम ही होते जा रहे हैं और लगातार इस तरह के हमले झेल रहे भारत की तरफ से व्यापक प्रतिक्रिया को लेकर अब पूरे विश्व में चर्चा हो सकती है. किसी भी देश को अपनी रक्षा का पूरा अधिकार होता है और अपने हितों के लिए अमेरिका तो दूसरे देशों में अतिक्रमण करने से भी नहीं चूकता है पर भारत पाक के सन्दर्भ में उसकी और वैश्विक बिरादरी की दोहरी नीति सदैव ही भारत को परेशान करने वाली ही रहा करती है.
                              विपक्ष में बैठकर सरकार पर बयानों से हमला करने और खुद निर्णय लेने में बहुत बड़ा अंतर हुआ करता है यह बात अब पीएम मोदी और उनके मंत्रियों को अच्छी तरह से समझ भी आ रही होगी क्योंकि यदि भाजपा की सरकार न होती तो अब तक वह पता नहीं कितने आरोप सरकार पर लगा चुकी होती पर जब खुद निर्णय लेने की बात सामने आ रही है तो उसके प्रवक्ताओं को उचित जवाब तक नहीं सूझ रहे हैं और स्थिति यहाँ तक है कि २०१४ के आम चुनावों में इसे एक मुद्दा बनाने वाले पीएम और उनकी सरकार के पास भी आज ठोस विकल्प नहीं हैं. केवल बयान देने और ऐसी घटनाओं की कड़ी निंदा करने से यह सब नहीं रुकने वाला है और हमारे चुप रह जाने से एक बार फिर से पाक और जेहादियों को बल ही मिल जाता है. मोदी सरकार ने अटल सरकार के समय की गयी गलतियों से कुछ भी नहीं सीखा और एक बार फिर से पाक को पुचकारने की शुरूवात की पर उसकी तरफ से किसी भी स्तर पर कोई सहयोग न करने के बाद भी पीएम मोदी अपने फैसलों से दुनिया को चौंकाते ही रहे पर उसका धरातल पर कोई असर कहीं से भी नहीं दिखाई दिया तो अब पीएम मोदी और उनके मंत्रिमंडल के लोग पाकिस्तान के खिलाफ बयान देने की शुरुवात कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर भी मोदी सरकार के लिए अपना बचाव करना मुश्किल हो रहा है क्योंकि उनकी तरफ से ऐसा दिखाया गया था कि जैसे उनके सत्ता में आते ही पाक की तरफ से सारी अलगववादी गतिविधियां बंद हो जायेंगीं.
                      निश्चित रूप से यह समय दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देश के बारे में सोचने का ही है पर क्या भाजपा अपने उस पूर्वाग्रह से बाहर आना चाहेगी जो उसने विपक्षी दल के रूप में पाल रखा था ? आज भाजपा के पास खुद को बचाने के अवसर नहीं  बचे हैं क्योंकि लगभग सभी विपक्षी दलों ने एक सुर में सरकार के हर कदम का समर्थन करने का ऐलान कर दिया है. इस तरह से पासा उल्टा पड़ता देखकर भाजपा के पास अपने चेहरे को बचाने के लिए कड़ी कार्यवाही करने के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं है क्योंकि उसकी तरफ से मनमोहन सरकार पर तुष्टिकरण के चलते कार्यवाही न करने के आरोप लगाए जाते रहते थे तो अब भाजपा के समर्थकों और उग्र राष्ट्रवादियों को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि आखिर मोदी चुप क्यों है ? भाजपा को इस मुद्दे पर किसी भी तरह की राजनीति से बचना चाहिए और सत्ता में होने के कारण सबसे अधिक ज़िम्मेदारी उस पर ही आती है. इस हमले की तुलना में पिछले हमलों को याद कर उस सरकार की विफलता की बातें करने से अब कुछ हासिल नहीं होने वाला है. अच्छा हो कि मोदी सरकार की तरफ से एक पहल करते हुए इस मुद्दे पर संसद का विशेष सत्र बुलाया जाये और वहां से भी सर्वसम्मत से पाक के खिलाफ हर उपयुक्त कार्यवाही करने पर संसद को सहमत किया जाये जिससे विश्व के नेताओं को यह समझ में आ जाये कि इस बार भारत चुप नहीं बैठेगा और पूरा देश इस मुद्दे पर भारत सरकार और भारतीय सेना के साथ खड़ा है.     मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 12 सितंबर 2016

सीमापार से आतंक

                                                                कश्मीर घाटी में जिस तरह से दो महीनों से अराजकता की स्थिति बनी हुई है उसी बीच पाकिस्तान की तरफ से एक बार फिर से सर्दियाँ बढ़ने और बर्फ पड़ने से पहले आतंकियों की नयी खेप भारत में भेजने की कोशिशें तेज़ कर दी गयी हैं. एक ही दिन में सीमा पर जिस तरह से कई स्थानों पर आतंकी कार्यवाही देखने को मिली उससे यही लगता है कि इस मोर्चे पर अब पाक के साथ और अधिक सख्ती करने का समय आ गया है और यह काम केवल स्थानीय सीमा पर ही नहीं किया जाना चाहिए बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसे कूटनैतिक, राजनैतिक और आर्थिक हर तरह के मोर्चे आज़माया जाना चाहिए जिससे पाकिस्तान पर वास्तव में कुछ ठोस दबाव डाला जा सके. विपक्ष में रहने पर पाक के खिलाफ मुखर रहने वाली भाजपा ही सत्ता में आने पर पाक से हर तरह के सम्बन्ध मज़बूत करने की बात करने लगती है क्योंकि विपक्ष के रूप में कभी भी कांग्रेस की तरफ से बातचीत का उस स्तर पर राजनैतिक कारणों से विरोध नहीं किया जाता है जैसा करने में भाजपा को महारत हासिल है. संसद ने भी जिस तरह से कश्मीर की अशांति पर एकमत से मोदी सरकार का समर्थन किया उससे उसे आगे बढ़ने की शक्ति भी मिली और दुनिया में सन्देश भी चला गया है कि भारत के राजनैतिक दलों में चाहे कितने भी मतभेद क्यों न हों पर राष्ट्रीय मसलों पर वे सदैव एक साथ ही खड़े दिखाई देते हैं.
                                  २६/११ के बाद से जिस तरह से मनमोहन सरकार ने पाक से किसी भी तरह की द्विपक्षीय संबंधों पर एक तरह से रोक ही लगा दी थी वह २०१४ तक उसी तरह चलती रही और यहाँ तक दोनों देशों के बीच खेलों तक पर भी इस राजनैतिक कटुता का असर भी पड़ा था और एक नीति के तहत बिना कुछ बोले ही मनमोहन सरकार ने पाक को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग थलग कर दिया था पर मोदी सरकार ने अपनी पारी शुरू करते समय एक बार फिर से सभी दक्षिण एशियाई देशों को बुलाने के साथ पाक को न्योता दिया जिसका उसने अभी तक नाजायज़ फायदा ही उठाया है. सरकार बनने के लगभग दो साल बाद अब पीएम मोदी को यह लगा रहा है कि पाक को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग थलग करना आवश्यक हो गया है तो क्या सरकार की तरफ से पाकिस्तान के आंकलन में कमी नहीं रह गयी या कूटनैतिक मोर्चों पर मोदी सरकार ने पाक के सम्बन्ध में जो कुछ सोचा था वह वैसा नहीं हो पाया ? पाक आज़ादी के समय से ही विश्वसनीय नहीं रहा है तो उस स्थिति में अटल सरकार के साथ कारगिल के समय किये गए बर्ताव के बारे में आंकलन करने में मोदी सरकार से चूक तो हो ही गयी है जिसे सुधारने के लिए अब वे पाक को अलग थलग करने की बात करने लगे हैं.
                          इस मामले में अब भारत द्वारा पाक को दिया गया मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा अविलंब वापस लेना चाहिए क्योंकि आज पाक की नीतियों से परेशान बांग्लादेश और अफगानिस्तान तक उसके खिलाफ अपने विरोध को खुलेआम प्रदर्शित कर रहे हैं जबकि चुनावी भाषणों में पाक को चुटकियों में मसलने की बाते करने वाले पीएम मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी अब पाक को लेकर निर्णय ही नहीं कर पा रहे हैं. पाक के आतंक निर्यात करने के कारण जनता और राजनैतिक दलों में उसके खिलाफ सख्त क़दमों की राय सदैव ही रही है पर अब जब पाक किसी भी तरह से मान नहीं रहा है तो समय आ गया है कि उसको पूरी तरह से अलग थलग करने के प्रयास भी शुरू किये जाएँ तथा वह मध्य एशिया तक माल की आवाजाही पर जितनी रोक लगता है उतनी ही अब भारत को भी पाक पर लगानी चाहिए. सीमा पर व्यापार को एक चेतावनी के रूप में एक दायरे में सीमित कर देना चाहिए तथा पाक की तरफ से बदलाव न दिखाई देने की स्थिति में सीमा पर व्यापार को पूरी तरह से प्रतिबंधित भी कर देना चाहिए. केवल एक तरफ व्यापार से पाक को ही अधिक लाभ मिल रहा है तो उस परिस्थिति में भारत को कड़े कदम उठाने और पाक पर दबाव बनाने से भी नहीं चूकना चाहिए तभी पाक पर सही मायनों में दबाव बनाया जा सकेगा.    
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रविवार, 28 अगस्त 2016

कश्मीर में वार्ता की राह

                                                                   बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से ही पाक के इशारे पर सुलग रही कश्मीर घाटी के लिए अब केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग और मतभेदों के साथ वार्ता की बात भी सामने आ रही है. निश्छित तौर पर इस परिस्थिति से  केवल कानून का सहारा नहीं लिया जा सकता है पर जिस तरह से इस महत्वपुर्ण मुद्दे पर भारत और केंद्र सरकार की छवि पर आंच आ रही है उस पर तत्काल कदम उठाये जाने की आवश्यक भी है. पहले गृह मंत्री राजनाथ सिंह की घाटी यात्रा और फिर सीएम महबूब मुफ़्ती का दिल्ली में पीएम मोदी से मिलना यही दर्शाता है कि अभी तक बातचीत का विरोध करने वाली राज्य सरकार ने भी अपने तेवरों में कुछ नरमी दिखाई है और अब वह केंद्र की तरह से भी कुछ आश्वासन चाहती है जिससे राज्य में इस गतिरोध को तोड़ा जा सके तथा जनजीवन को सामान्य किया जा सके. सीएम महबूबा का कहना कि केवल ५% लोगों ने पूरी घाटी को बंधक बना रखा है कहीं तक सही है पर बाकि ९५% अपनी जान बचाने के चक्कर में सामने आने से डर भी रहे हैं और जब तक यह डर कम नहीं होगा घाटी के आम लोग सामने नहीं आ पायेंगें.
                             अपने गठन के समय से बुरहान वानी के मारे जाने तक मोदी सरकार ने पाक और नवाज़ शरीफ से हर स्तर पर सम्बन्ध सुधारने की हर संभव कोशिशें की पर पाक की इन्हीं हरकतों के चलते उसे मुम्बई हमले के बाद अलग थलग करने के लिए ही मनमोहन सरकार ने किसी भी द्विपक्षीय मुद्दे पर हर स्तर पर पाक से वार्ताएं बंद कर दी थीं और केवल उन्हीं मंचों से पाक से सम्बन्ध रखा जा रहा था जो अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अन्तर्गत आते थे. मोदी सरकार के सम्बन्ध सुधारने के प्रयासों को किसी भी तरह से गलत नहीं कहा जा सकता है पर केवल सुधारने के लिए ही अटल सरकार ने लाहौर बस यात्रा के साथ हो रही कारगिल घुसपैठ पर ध्यान नहीं दिया जिसकी बड़ी कीमत हमें अपने जवानों को खोकर चुकानी पड़ी थी. अब जिस तरह से पीडीपी-भाजपा सरकार में फिर से घाटी और जम्मू का बंटवारा दिखाई दे रहा है वह कहीं से भी मामले को शांत नहीं कर सकता है क्योंकि आज़ादी के बाद से ही कश्मीर को लेकर दिए गए अति उग्र राष्ट्रवादी बयानों में भाजपा ने जो कुछ भी कहा था आज वह उसे वार्ता के लिए राज़ी होने से रोक रहा है पर मोदी लीक से हटकर चलने में विश्वास करते हैं तो हो सकता है कि संघ और पार्टी की लाइन से हटकर वे अलगाववादियों से बात करने की पहल भी कर दें।
                            धर्मगुरु श्री श्री रविशंकर ने कल जिस तरह से बुरहान वानी के पिता के साथ आश्रम में ली गयी अपनी एक फोटो ट्विटर पर शेयर की उससे लगता है कि बातचीत के लिए मोदी सरकार मन बना चुकी है पर उसके लिए सही समय और शर्तों पर बात चल रही है. यदि श्री श्री के हस्तक्षेप से ही कश्मीर का गतिरोध टूट सकता है तो उसमें कोई बुराई नहीं है पर जिन राष्ट्रवादियों को बुरहान वानी के पिता के स्कूल मास्टर होने पर आपत्ति थी वे श्री श्री के साथ उनकी फोटो देखकर अवश्य ही निराश होंगें। सरकार की इस तरह की हर दिशा में की जा रही कोशिशों को सही कहा जा सकता है पर उसके मंत्रियों, संघ विचारकों और पार्टी पदाधिकारियों को भी यह समझना होगा कि अब भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है और देश के सामने आने वाली इस तरह की किसी भी समस्या का समाधान उसे ही करना है. एक तरफ पीएम, एचएम् और डीएम पीओके की बात करते हैं तथा कहते हैं कि कश्मीर कोई मसला ही नहीं है वहीँ विदेश राज्य मंत्री अकबर कहते हैं कि कश्मीर द्विपक्षीय मामला है और पाक इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर कुछ भी हासिल नहीं क्र सकता है. सरकार को इस तरह की राजनीति से आगे बढ़कर कश्मीर घाटी के लिए ठोस बातचीत का माहौल बनाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए.
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बुधवार, 24 अगस्त 2016

अशांत कश्मीर और पाकिस्तान

                                                         पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े के चलते जम्मू कश्मीर देश के लिए आज़ादी के बाद से ही एक बड़ी समस्या के रूप में लगातार सामने आता रहा है क्योंकि पाकिस्तान को यह लगता है कि भारत के बंटवारे के समय जो नीति अपनायी गयी थी वह सही नहीं थी और कश्मीर में अधिक मुस्लिम आबादी होने के कारण पाकिस्तान का हिस्सा ही होना चाहिए भले ही वहां के शासक कुछ भी कहते रहें पर साथ ही वह गिलगित बाल्टिस्तान और बलोचिस्तान के लिए इस सूत्र को लागू नहीं करना चाहता जहाँ की जनता के लिए आज भी सामान्य जीवन जीना कठिन ही है. पाकिस्तान की राजनीति में सर्वाधिक प्रभावी पंजाबी समुदाय ने जिस तरह से सेना के साथ हर क्षेत्र में बढ़त बनायीं हुई है और वह आज भी अन्य क्षेत्रों और लोगों के दमन में लगा हुआ है उसके बाद उसके लिए कभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं. पाकिस्तान के चीन को छोड़कर अपने किसी भी पडोसी से मधुर सम्बन्ध नहीं है और आज भी उसके साथ केवल यही तमगा काम करता है कि वह मुसलमानों के लिए अलग से बनाया गया राष्ट्र है जो मुस्लिम समुदाय के लिए सर्वोत्तम साबित हो सकता है पर अपने गठन के तीन दशक में ही इस्लाम के नाम पर बनाये गए इस राष्ट्र ने बांग्लादेश में अपनी बढ़त खो दी थी जब मुक्तिवाहिनी के संघर्ष और पाकिस्तान के दमन के चलते पूर्वी पाकिस्तान उससे अलग हो गया था.
                                            निश्चित तौर पर पाकिस्तान में सेना सबसे आगे है पर सैन्य समाधान सदैव सही नहीं हुआ करते हैं और देश को सही दिशा देने के लिए राजनैतिक पहल भी आवश्यक हुआ करती है. अमेरिका के सन्दर्भ में यदि गौर से देखा जाये तो पाकिस्तान से जिस दिन उसका मतलब समाप्त हो जायेगा और वह उसके काम आना बंद हो जायेगा तो वह नाटो और अन्य क्षेत्रीय संगठनों को साथ लेकर उसके वर्तमान स्वरुप को बिगाड़ने का काम भी आसानी से कर सकता है. वर्तमान रूप का अखंड पाकिस्तान केवल तब तक ही दुनिया के नक़्शे पर है जब तक उसके पास अमेरिका की शक्ति है और जब भी अमेरिका के हितों पर पाकिस्तान से सीधे चोट की जाएगी तो वह इसके टुकड़े करने से भी बाज़ नहीं आएगा यह बात पाकिस्तान की समझ में नहीं आ रही है. आने वाले समय में पाकिस्तान के सिमटते स्वरुप से जहाँ पश्चिमी देशों को आसानी होगी वहीं वे इसके लिए अपनी सुविधा के अनुसार मानवाधिकार की बातें करते हुए पाकिस्तान पर भी हमला करने से नहीं चूकेंगें. वैसे भी केवल इस्लाम और सेना के नाम पर ही पाकिस्तान एक है वर्ना आज वहां के हर क्षेत्र में बड़ा असंतोष आसानी से महसूस किया जा सकता है जो कभी भी एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान के लिए समस्या खड़ी कर सकता है.
                                        पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के दावे को कश्मीर में सही नहीं माना जा सकता है सिर्फ इसलिये ही आज तक संयुक्त राष्ट्र से लगाकर किसी भी अन्य मंच से पाकिस्तान द्वारा यह मामला लगातार उठाये जाने के बाद भी उसे कोई मजबूत समर्थन या आश्वासन नहीं मिल पाया है जबकि अमेरिका उसकी आज़ादी के बाद से उसके साथ हर तरह की सुविधा और सहायता लेकर मौजूद रहा करता है. आने वाले समय में अराजक होते पाकिस्तान के खिलाफ उसका परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र होना ही बहुत बड़ा हथियार बन सकता है क्योंकि किसी एक बड़ी घटना के बाद पाकिस्तान के असुरक्षित परमाणु ज़खीरे को निष्क्रिय करने के लिए पूरी दुनिया में एक सहमति भी बन सकती है. भारत से पाकिस्तान की चाहे जितनी भी असहमति हो पर खुले तौर पर भारत के खिलाफ परमाणु हथियार का उपयोग करने के दुष्परिणाम से पाकिस्तान अच्छी तरह से वाकिफ है और वह जेहादियों को विभिन्न हथियारों की जानकारी देकर पश्चिमी देशों और अमेरिका के खिलाफ उन्हें उकसाने का काम करने में ही अपने हित भी देखता है. भारत यदि पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों उसी तरह से हस्तक्षेप करने लगे जैसा पाकिस्तान किया करता है तो उसके लिए अपने अस्तित्व को बचाये रखना भी कठिन होने वाला है यह बात खुद पाकिस्तान की सेना और राजनेताओं के संज्ञान में है संभवतः इसलिए ही वे कश्मीर में हर तरह का परोक्ष समर्थन देकर उसकी आज़ादी की बातें किया करते हैं और कश्मीरियों को भड़काने का काम करते रहते हैं.
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शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

कश्मीरी, कश्मीरियत और ज़िन्दगी

                                                                                      आज़ादी के बाद से ही जिस तरह से कश्मीर घाटी को भारत पाकिस्तान के बीच विवादित क्षेत्र घोषित करवाने के लिए पाकिस्तान ने पूरा ज़ोर लगाया हुआ है उसके सभी प्रयासों के बाद भी उसे कुछ ख़ास मिलता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है इससे हताश होकर वह अपने कुछ किराये के आतंकियों (जिन्हें वह जेहादी कहता है) के माध्यम से घाटी का माहौल बिगाड़ने की हर संभव कोशिश भी करता रहता है. १९४७ में जिस तरह से अपनी आज़ादी के बाद भारत ने खुद को संभालना शुरू किया था और बहुत सारे विवादित मसलों पर अंग्रेजों की मध्यस्थता से पाकिस्तान से बातचीत भी चल रही थी उसे देखते हुए कबाइलियों के वेश में पाकिस्तान की नियमित सेना का ओल्ड मुग़ल रोड पर कब्ज़ा करने और कश्मीर को भारत से अलग करने की कोशिशों को तत्कालीन भारतीय नेतृत्व और भारतीय सेना ने जिस तरह से विफल किया वह इतिहास का हिस्सा और आरोप प्रत्यारोप लगाने का विषय बना हुआ है. आज भी कश्मीर में इतने आधुनिकतम संचार और सुरक्षा उपकरणों के होते हुए घुसपैठ को रोक पाना आसान नहीं है तो १९४७ की इस सैन्य विहीन इलाके की में भारत की स्थिति का अंदाज़ा भी आसानी से लगाया जा सकता है.
                          पिछले एक महीने से कर्फ्यू झेल रही कश्मीरी जनता के पास अब कितने विकल्प शेष बचते हैं क्योंकि एक आतंकी के मारे जाने पर यदि मुट्ठी भर हुर्रियत और अलगावाद समर्थक लोग पूरी घाटी को इस तरह से जीने के लिए मजबूर कर सकते हैं तो इसके लिए केवल सरकार, सेना और प्रशासन को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है. जब इतने बड़े पैमाने पर पुलिस पर सुनियोजित तरीके से हमला किया जाता है तो उससे बचने के लिए सुरक्षा बलों के पास क्या विकल्प शेष रह जाते हैं ? भारतीय सुरक्षा बलों पर जिस तरह से कश्मीरियों के दमन का आरोप लगाया जाता है उसकी सच्चाई इस बात से ही पता चल जाती है कि सुरक्षा बलों की तरफ से सीमित बल प्रयोग करने की नीति का किस तरह से अलगाववादी नाजायज़ फायदा उठा रहे हैं क्योंकि आधुनिक हथियारों से लैस सुरक्षा बल यदि फायरिंग करने पर आमादा होते तो उनके ३५०० से अधिक जवान भी इस संघर्ष में घायल नहीं होते. आम कश्मीरी को ही अब यह तय करना होगा कि उसके लिए आतंकियों की मौत पर इस तरह की प्रतिक्रिया देना किस हद तक सही है क्योंकि पाक समर्थक आतंकी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि यदि आम लोगों की रोज़ी रोटी आराम से चलती रहेगी तो वे जेहाद के बारे सोचना भी नहीं चाहेंगें और उनकी नीति बुरी तरह विफल हो जाएगी इसलिए ही वह लगभग हर साल किसी न किसी बहाने से कश्मीरियों के लिए कमाई वाली वार्षिक अमरनाथ यात्रा के समय ही इस तरह से घाटी को अशांत करने की कोशिश करते हैं.
                                      आज बहुत सारे लोग मानवीयता की बातें कर रहे हैं पर मानवाधिकार क्या आम लोगों के ही होते हैं और क्या सुरक्षा बलों में काम करने वाले चाहे वे कश्मीरी हों या कोई अन्य उनके लिए मानवाधिकारों के विकल्प बंद होते हैं ? दोनों तरफ के घायलों की संख्या को देखते हुए अब यह कहना कठिन ही है कि मानवाधिकारों का उल्लंघन किस तरफ से हो रहा है ? युवाओं के मारे जाने या घायल होने पर उनके भविष्य की बातें तो की जाती हैं पर जिन युवाओं ने बेहतर भविष्य के लिए सुरक्षा बलों में जाने का विकल्प चुना उनके भविष्य के बारे में को इन सोचेगा ? क्या घाटी में तैनात सुरक्षा बल आमलोगों पर किसी तरह की ज्यादती रोज़ ही करते हैं जिसके विरोध में कश्मीरी इतने उग्र हो जाते हैं ? आज घाटी की अंदरूनी सुरक्षा व्यवस्था में जम्मू कश्मीर पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल ही तैनात हैं तो सेना की भूमिका पर बिना बात के संदेह करने से क्या हासिल होने वाला है ? जम्मू कश्मीर पुलिस में भी कश्मीरी युवा हैं और अलगाववादियों के समर्थन में सड़कों पर हाथों में पत्थर लिए सामने आने वाले भी कश्मीरी युवा ही हैं पर एक कश्मीर को शांत रखने की कोशिशों में हैं तो दूसरे पाक के प्रभाव में आकर अपनों से ही लड़ने पर आमादा हैं. कश्मीरियत अगर ज़िंदा होती तो आतंकियों द्वारा केरन में मारे गए युवा शौकत के लिए भी उसका दर्द दिखाई देना चाहिए था पर आज ऐसा कुछ भी सामने नहीं आता है और पाक के चक्कर में पड़कर कश्मीरी खुद ही अपनी ज़िन्दगी को और भी परेशानी भरी करने पर आमादा दिखाई देते हैं.
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रविवार, 7 अगस्त 2016

गाय पर चर्चा

                                                                       २०१४ के आम चुनावों के बाद जिस तरह से देश में सनातन धर्म और हिंदुत्व की विचारधारा को बदनाम करने के लिए कुछ संगठनों की तरफ से लगातार प्रयास किये जा रहे हैं आज उनका असर देश की राजनीति पर भी दिखाई देने लगा है. बहुत सारे विवादित मुद्दों या अभी तक विवाद से पर रहने वाले कुछ मुद्दे अचानक ही सुर्ख़ियों में आने से जहाँ समाज में एक नए विभाजन का खतरा बढ़ता हुआ दिखाई देने लगा है वहीं केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से इन मुद्दों पर केवल न्यूनतम कानूनी कार्यवाही करने से मामले और भी उलझते से ही नज़र आने लगे हैं. अमेरिकी अख़बार में गौ हत्या पर देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता के बारे में मोदी सरकार से एक तरह से खुला जवाब मांग लिया गया जिसका असर इंदिरा गाँधी स्टेडियम में हुए पीएम मोदी के पहले टाउन हॉल कार्यक्रम में स्पष्ट रूप से दिखाई भी दिया. हालाँकि अपने क़दमों से सभी को चौंकाने की राजनीति करने वाले मोदी इतनी जल्दी इस मुद्दे पर बोलेंगें इसकी उम्मीद किसी को भी नहीं थी पर दादरी, गुजरात और एमपी के दलितों/मुस्लिमों पर गाय के नाम पर किये गए अत्याचारों के बाद मोदी सरकार भी दबाव में तो थी जिस दबाव को अपनी राय के बाद पीएम ने कम करने की एक कोशिश कर दी है.
                            पीएम का यह कहना कि ८०% गो रक्षकों को "गोरखधंधे" में लिप्त बताया इससे पता चलता है कि केंद्र सरकार इस बात को अच्छी तरह से समझ रही है कि मसला कहाँ पर पहुंच हुआ है फिर भी जिस तरह से राज्यों से इस मसले पर गृह मंत्रालय से रिपोर्ट मंगवाने और पूरे देश की रिपोर्ट तैयार करवाने के लिए कुछ ठोस आश्वासन देने के स्थान पर मोदी ने केवल खानापूरी ही कर दी है. चुनावी राज्यों में छोटी छोटी बातों पर भी राजनाथ सिंह का बयान आ जाता है कि राज्य सरकार से रिपोर्ट मंगवाई गयी है पर गो रक्षकों द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों पर आज तक गृह मंत्रालय स्वतः संज्ञान क्यों नहीं ले पा रहा है ? ज़ाहिर है कि देश के अंदर विवाद खड़ा करने वाले मुद्दों पर पीएम इस तरह से केवल बयानबाज़ी करके ही अपने को सुरक्षित साबित कर देना चाहते हैं और साथ ही यह भी कि कड़े शब्दों में बयान दिए जाएँ जिससे यह विदेशों में यह सन्देश भी चला जाये कि केंद्र सरकार इस तरह की बातों का समर्थन नहीं करती है. यहाँ पर पीएम यह भूल जाते हैं कि विदेशी निवेशकों का इस तरह की घटनाओं पर लगातार ध्यान बना ही रहता है और किसी भी परिस्थिति में सरकार की दोहरी नीति का लाभ देश को नहीं मिलने वाला है.
                         यदि सरकार को लगता है कि गो रक्षकों में अराजक तत्व घुसे हुए हैं तो सबसे पहले उसे अपनी तरफ से एक नीति बनाने के बारे में सोचना चाहिए जिसमें गाय समेत सभी तरह के पशु तस्करों को नियन्त्रति करने के लिए एक सामाजिक व्यवस्था बनायीं जा सके और इस मुद्दे पर राजनीति को बंद किया जाये. राजस्थान में सरकार के संरक्षण में चलने वाली गौ शाला के कर्मचारियों को तीन महीने से वेतन नहीं मिला है जिससे वहां से लगभग ५०० गायों के मर जाने की सूचनाएं आज सबके सामने हैं शुक्र है कि घटना राजस्थान की है यदि यूपी की होती तो अखिलेश यादव से जवाब देते नहीं बनता और सरकार पर यह आरोप लगाए जाते कि वह गौ और हिन्दू विरोधी है. राजे सरकार के खिलाफ कौन से हिंदूवादी संगठन और गौ रक्षक दल प्रदर्शन करने गए यह आज तक पता नहीं चल पाया है. राजनीति में पांसे किस तरह से उलटे भी पड़ जाते हैं यह मोदी के बयान और राजे सरकार की गायों के प्रति निष्ठा और समर्पण से समझ जा सकता है. कुछ दिन पहले तक जो "अराजक" ८०% लोग मोदी को सबसे बड़ा गो रक्षक बता रहे थे आज उनकी स्थिति का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है पर मोदी सरकार इस मामले में ज़मीनी हकीकत को सुधारने के लिए अपने इस बयान से आगे भी बढ़ पायेगी इसमें बहुत संदेह भी है.
                        आज मरने के बाद गाय जिस तरह से आर्थिक रूप से बहुत लाभ देने वाली साबित हो रही है उसे देखते हुए यह समझने की बहुत आवश्यकता है कि आखिर पिछले एक दशक में गाय की तस्करी क्यों बढ़ रही है. सामान्य रूप से डेढ़ दो हज़ार रूपये की गाय मरने के बाद आसानी से पांच सात हज़ार रुपयों में बिक जाती है तो मांस का व्यापार करने वालों के बीच में गाय इसलिए भी आय बढ़ाने के बेहतर साधन के रूप में प्रचलित होती जा रही है. गांवों में जिस तरह से दूध न देने वाले गोवंश को औने पौने दामों में बेचा जाता है उसके बाद उनके मांस के लिए उनको मारा भी जाता है क्योंकि जो लोग इन्हें खरीदते हैं वे कोई गोशाला खोलकर नहीं बैठे हैं इसलिए गायों की रक्षा के लिए सबसे पहले ग्राम समाज के स्तर पर चारागाह और अन्य संसाधनों को उपलब्ध कराये जाने के बारे में सोचना चाहिए. केवल गाय की महिमा बताने से उनकी स्थिति पर कोई ख़ास अंतर नहीं पड़ता है और कहीं से भी गाय के संरक्षण में सफलता भी नहीं मिलती है उसके लिए निचले स्तर से संसाधनों को दुरुस्त किये जाने की आवश्यकता भी है. गुजरात में गाय के मुद्दे पर दलितों के साथ हुए अन्याय के बाद आज हिंदुत्व की प्रयोगशाला के परिणाम अच्छे नहीं दिखाई दे रहे हैं जिसके चलते वहां नेता का परिवर्तन करने के लिए मोदी को बाध्य होना पड़ा है. दुर्भाग्य से आज गाय भी केवल हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण का साधन ही बन कर रह गयी है और उसके लिए ठोस काम किये जाने में सरकार समाज और कानून पूरी तरह से विफल ही साबित हो रहे हैं. 
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रविवार, 31 जुलाई 2016

सहनशील से उग्र होते भारतीय

                                                पिछले वर्ष असहिष्णुता का मामला जिस तरह से चर्चा के केंद्र में रहा था और उस पर सभी दलों के नेताओं की तरफ से जमकर राजनीति भी की गयी थी उसके बाद यह मामला अपने आप ही शांत हो गया था पर गाहे बगाहे मीडिया में असहिष्णुता का मामला सामने भी आता रहा है. अपनी नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस में अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने जिस तरह से भारत में सहिष्णुता को लेकर पूछे गए सवाल पर ओबामा प्रशासन की चिंताओं को स्पष्ट किया उसके बाद देश में एक बार इसी मुद्दे पर राजनीति शुरू हो सकती है. देश में कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता है कि केंद्र में भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद उसके वैचारिक संगठन और उसके अनुषांगिक संगठनों की तरफ से जिस तरह से समाज में नयी रेखाएं खींचने का प्रयास किया जा रहा है उसका असर सीधे देश की प्रगति पर भी पड़ने वाला है और किसी भी परिस्थिति में सरकार के किये गए अच्छे प्रयासों पर पानी फेरने के लिए यह एक बड़ा कारण भी बन सकता है फिर भी खुद पीएम की तरफ से इस तरह के मुद्दों पर जिस तरह से चुप्पी लगायी जाती है उसको उनके उग्र समर्थक मौन स्वीकृति ही मान लेते हैं.
                           १९९१ के बाद शुरू हुए व्यापक आर्थिक सुधारों के माध्यम से देश ने जिस तेज़ी के साथ विकास के नए आयामों पर अपने आप को लगातार खरा साबित करने का क्रम बनाये रखा है वह इस सरकार में भी चलता हुआ दिखाई दे रहा है पर कुछ संगठनों और गौ रक्षकों द्वारा जिस स्तर पर देश की प्रतिष्ठा को अनावश्यक मुद्दों के साथ ठेस पहुंचाई जा रही है वह निश्चित रूप से ही चिंतनीय है. कोई भी वैश्विक व्यापारिक प्रतिष्ठान या समूह किसी भी देश में केवल तभी निवेश करता है जब उसे अपने किये गए निवेश का समग्र बाज़ार दिखाई दे और उस एक निश्चित समय में अपने निवेश से लाभ होने की स्थिति भी दिखाई दे भारत में बड़ा बाज़ार तो है पर जिस तरह से यहाँ के सामाजिक माहौल में बदलाव करने की कोशिशें की जा रही हैं उससे आने वाले दिनों में निवेश के लायक कितना माहौल बना रह सकेगा यह तो समय ही बता पायेगा. वोट लेने की मजबूरी के चलते खुद पीएम और भाजपा इन संगठनों के खिलाफ कड़े कदम उठा पाने की स्थिति में नहीं है क्योंकि राजनैतिक रूप से बेहद संवेदनशील और सर्वाधिक लोकसभा सदस्यों वाले राज्य यूपी में अगले वर्ष होने वाले चुनावों में २०१४ के प्रदर्शन को दोहराने का दबाव अब स्पष्ट रूप से भाजपा पर पड़ा हुआ है.
                         देश के कानून का राजनैतिक हितों को साधने के लिए लगभग हर पार्टी की राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा दुरूपयोग किया जाता है पर अब इस सब पर पूरी तरह से रोक भी लगायी जानी चाहिए क्योंकि पार्टी दफ्तरों में बदलते थाने और प्रशासनिक भवन किस भी तरह से आम जन के अनुकूल नहीं हो सकते हैं. केवल भाषणों से आगे बढ़कर यदि देश को वास्तव में प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाने की कोशिश करनी है तो देश में राजनैतिक प्रशासनिक ढांचे को भी विशुद्ध प्रशासनिक ढांचे में बदलना ही होगा तभी देश की छवि कानून के सही अनुपालन करने वाले देश के रूप में पूरे विश्व में सुधर पायेगी. हम अमेरिका के इस तरह एक बयान को भले ही आसानी से एक झटके में खारिज़ कर दें पर उससे होने वाले दुष्प्रभावों को रोक पाने में हम कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं. अच्छा हो यदि इस तरह के मुद्दों पर अब तक के सबसे मुखर पीएम मोदी खुद ही अपने लोगों को कड़े अनुशासन का पाठ पढ़ाएं क्योंकि पूरे विश्व में भारत की छवि चमकाने के लिए वे जिस हद तक कोशिशें कर रहे हैं उस पर उनके अपने सहयोगी ही सबसे अधिक पानी फेरने का काम कर रहे हैं. पार्टी भी आज उनके दबाव में है और वे भाजपा में इतने शक्तिशाली भी हैं कि संघ के किसी प्रयास को देश की बेहतर आर्थिक स्थिति के लिए अनदेखा कर पाने की स्थिति में भी हैं फिर भी यदि उनकी तरफ से इस तरह की घटनाओं पर चुप्पी ही लगायी जाती रहेगी तो आने वाले समय में सरकार के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर परिस्थितियां और भी ख़राब ही होने वाली हैं.
                     आज पूरे विश्व में कितने ऐसे देश हैं जहाँ पर लंबे समय के लिए कोई उद्योगपति बड़ा निवेश करना चाहेगा पर सौभाग्य से हमारे देश की सहिष्णुता को पूरे विश्व में लंबे समय से सराहा जाता रहा है. आज जिन कारणों से हमारे इस स्वभावजन्य गुण पर भी संदेह के बादल घुमड़ने लगे हैं तो उससे बचाव करने की कोशिश भी ठोस रूप में करने की आवश्यकता है. किसी भी परिस्थिति में किसी भी दल या उसके कार्यकर्ताओं को कानून हाथ में लेने की रत्ती भर भी छूट नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर लोग इस छूट का व्यापक दुरूपयोग करने लगते हैं. देश में राजनीति कभी सेवा का विषय हुआ करती थी पर अब यहाँ आने वाले अधिकांश लोग भी अपने लाभ को खोजने लगे हैं जिससे भी देश में राजनीति का स्तर गिरता दिखाई दे रहा है. धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता का जिस हद तक हम भारतीय दुरूपयोग किया करते हैं उसकी कोई मिसाल अन्य देश में नहीं मिल सकती है. अपने को मिली आज़ादी की व्याख्या अपने पक्ष में करने के लिए हम किसी भी हद तक चले जाते हैं और जब दूसरे उसी तरह से आगे बढ़ते हैं तो हम उन्हें पलक झपकते है अराजक साबित करने में लग जाते हैं. अच्छा हो कि सदैव की तरह हम अपनी कमी को खुद ही खोज कर उसे दूर करने की कोशिशें शुरू कर दें जिससे आने वाली पीढ़ी को हम एक मज़बूत और गंभीर भारत का हस्तांतरण कर सकें.       
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शनिवार, 30 जुलाई 2016

गाय, दलित और गौ-रक्षक

                                                                  देश में जिस तेज़ी से सुनियोजित तरीके से अलग अलग हिस्सों में गौ-हत्या को केंद्र में रखकर जिस तरह से राजनीति चमकाने और अपने को हिन्दू समाज का हितैषी और नेता साबित करने का एक नया चलन सामने आया है यदि उस पर समय रहते विराम नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में इससे बड़ी समस्या उत्पन्न हो सकती है. गो मांस के संदेह के आधार पर आजकल जो नया काम कथित गौ रक्षकों द्वारा किया जा रहा है उसका समाज में किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं किया जा सकता है क्योंकि इससे अवैध रूप से गौ मांस का व्यापार करने वाले चन्द लोगों के चलते इस काम से जुड़े हुए सभी लोग संदेह के घेरे में आ जाते हैं वहीं सामाजिक व्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ता है. केंद्र और राज्य सरकारों का यह दायित्व बनता है कि ऐसे किसी भी मामले में दोषियों को सख्त सजा दिए जाने की व्यवस्था होनी चाहिए चाहे वे अवैध रूप से गौ मांस का व्यापार करने वाले लोग हों या फिर उन पर हमला करने और समाज को विभजित करने की अपनी नीति को लागू करने वाले क्योंकि इन दोनों से ही समाज का ही सबसे बड़ा नुकसान होता है.
                             लखनऊ के चानन गांव में जिस तरह से नगर निगम के आदेश पर मरी हुई दो गायों को निस्तारित करने के लिए निगम द्वारा नियुक्त किये गए ठेकेदार के दो कर्मचारियों पर गौ हत्या का आरोप लगाकर स्थानीय युवकों ने उत्पात मचाया और उनकी पिटाई की उससे यह सब एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा भी लगता है. आज स्थिति यह है कि स्थान न होने के बाद भी शहरों में लोग गायें पाल तो लेते हैं पर उनकी मृत्यु हो जाने पर उनके शवों के निस्तारण के बारे में नगर निगम से ही संपर्क करते हैं और कई बार लावारिस अवस्था में घूमती हुई गायों की मृत्यु होने पर भी नगर निगम पर ही उनके शवों को हटाने की ज़िम्मेदारी होती है. यह सफाई से जुडी एक व्यवस्था है जिसमें अनावश्यक हस्तक्षेप से क्या हो सकता है यह गुजरात में उपायुक्त कार्यालय पर दलितों ने मरे हुए पशुओं को फ़ेंक कर दिखा दिया है पर क्या सभ्य और संस्कारी समाज के रूप में हमारा केवल यही दायित्व बनता है कि बिना कुछ सोचे समझे किसी भी व्यक्ति पर इस तरह से सीधे हमला कर दें भले ही उस व्यक्ति को कोई गलती भी नहीं हो ? आज के सभ्य और शिक्षित समाज से अधिक नहीं तो इतनी आशा तो की ही जा सकती है कि वह आगे बढ़कर इस तरह के अनर्गल आरोपों और बवालों पर खुद ही रोक लगाने का काम करने का कोई ठोस प्रयास करता हुआ दिखाई देगा.
                           इस तरह से स्वच्छता से जुड़े मामलों और अवैध रूप से गौ हत्या में लगे हुए लोगों में कोई अन्तर करने के लिए खुद प्रशासन और समाज को पहल करनी होगी जिससे अनावश्यक रूप से काम काज में बाधा न पड़े और जो लोग गलत तरीके से इस काम को करने में लगे हुए हैं उन पर भी अंकुश लगाया जा सके. नगर निगमों, पालिकाओं और पंचायतों द्वारा इस काम के लिए अधिकृत किये गए लोगों के फोटोयुक्त पहचान पत्र भी जारी करने चाहिए जिससे संदेह के आधार पर घेरे जाने की स्थिति में वे खुद अपनी पहचान और गायों को ले जाने के उद्देश्य को साबित कर सके. साथ ही गौ रक्षक दलों का उद्देश्य यदि वास्तव में गायों की रक्षा करना है तो उन्हें पहले गौ पालकों को जागरूक करना चाहिए और उसके बाद इस तरह से सीधे लोगों को रोकने के बारे में सोचना चाहिए. किसी भी परिस्थिति में किसी को भी अराजकता से बचना ही चाहिए क्योंकि उससे समाज एमन गहरे स्तर तकविभाजन हो जाता है और निर्दोषों को पीटने या मार ही डालने से किस तरह से गौ रक्षा संभव है यह भी सोचने का विषय है. संदेह के आधार पर किसी भी व्यक्ति, समूह या संदिग्ध वाहन को रोक कर उससे आवश्यक जानकारी हासिल की जानी चाहिए और संदेह होने पर ही पुलिस को सूचना देनी चाहिए जिससे दोषियों पर कानूनी कार्यवाही भी की जा सके. पुलिस और प्रशासन को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तरह की किसी भी सूचना पर उसकी तरफ से प्राथमिकता के आधार पर कार्यवाही की जाये जिससे समाज में अनावश्यक विभाजन न बढे.  
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