मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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बुधवार, 9 नवंबर 2016

काले धन पर नकेल

                                             मोदी सरकार ने जिस तरह से देश को चौंकाते हुए बड़े नोटों के प्रचलन को बंद किया है वह काले धन के प्रवाह को रोकने और देश की अर्थव्यवस्था में काले धन की भूमिका को नियंत्रित करने वाला साबित हो सकता है. पहले विदेशों में जमा किये गए काले धन फिर देश के अंदर काले धन को बाहर निकालने की योजना के बाद यह परिवर्तन देश में काले धन के प्रवाह पर फिलहाल अंकुश लगाने का काम ही करने वाला है पर इस सबके बीच जिस तरह से आयकर सीमा में बढ़ोत्तरी और अन्य सुधारों की आवश्यकता है यदि उन्हें भी साथ ही लागू किया जाता तो इसके और भी बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं. इस मामले में मोदी सरकार की कोशिश पूरी तरह से सही कही जा सकती है पर जिस तरह से देश में शादियों का मौसम शुरू हो रहा है और उसमें जितने बड़े पैमाने पर ईमानदारी के धन के साथ काले धन का उपयोग होता है उसके चलते शादियों वाले घरों में समस्या ही उत्पन्न होने वाली है. जब देश की जनता स्वेच्छा से अपने स्तर पर ईमानदार होने की कोशिश करती नहीं दिखाई दे रही थी तो सरकार के पास इस तरह की सख्ती करने के अतिरिक्त कुछ और करने के विकल्प भी शेष नहीं रह गए थे.
                         काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था में देश के कुछ लाख लोगों के पास ही सब कुछ है और इससे निपटने के लिए सरकार का यह कदम इस मायने में अधिक महत्वपूर्ण है कि वह यह चाहती है कि जनता बैंकों या अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से लेनदेन करने की कोशिश करे जिससे देश की पूँजी का प्रवाह सही तरह से पता लग सके और काले धन का अर्थ व्यवस्था में प्रवाह नियंत्रित करते हुए आने वाले समय में पूरी तरह से रोका भी जा सके. सरकार के प्रयासों पर ऊँगली नहीं उठायी जा सकती है क्योंकि वह अपने आप में सही दिशा में उठाया गया कदम ही है और काले धन के प्रवाह को रोकने का काम केवल सरकार ही नहीं कर सकती है क्योंकि जब तक इसमें जन भागीदारी का सक्रिय योगदान नहीं होगा तब तक यह योजना भी पूरी तरह से सफल नहीं हो सकती है. देश की अर्थव्यवस्था पर लंबे समय में इसका सकारात्मक परिणाम दिखाई देने वाला है पर यह भी संभव है कि बाज़ार में काले धन के प्रवाह के रुकने के कारण आर्थिक गतिविधियों में कुछ सुस्ती भी दिखाई देने लगे पर यह अस्थायी प्रभाव ही होगा और धीरे धीरे इसमें सुधार भी दिखाई देने लगेगा.
                         सभी जानते हैं कि आज देश का काला धन किन जगहों पर प्रवाहित होता है देश में चुनावों में जितने बड़े पैमाने पर धन के बल पर वोटर्स को खरीदने की कोशिशें की जाती हैं और उसमें भी रोक दिखाई देने वाली है क्योंकि चुनाव आयोग की लाख कोशिशों के बाद भी इस तरह की गतिविधियों को पूरी तरह से रोका नहीं जा सका है. अगले वर्ष यूपी जैसे बड़े राज्य समेत अन्य चार राज्यों में होने वाले चुनाव में काले धन के बलबूते बहुत कुछ करने के मंसूबे पाले बैठे लोगों के लिए समस्याएं ही बढ़ने वाली हैं क्योंकि अब पुराने नोटों से काम नहीं चलने वाला है और नए नोट मिलने में जो प्रक्रिया निर्धारित की गयी है उसके चलते अभी बड़ी मात्रा में काले धन का प्रवाह संभव नहीं दिखाई दे रहा है. जनता को इस मामले में थोड़े संयम से काम लेना चाहिए और बैंक तथा पोस्ट ऑफिस के बाहर अफवाहों के चलते भीड़ लगाने से बचना भी चाहिए. इस एक कदम से सरकार ने दो काम कर लिए हैं पहले यह कि काले धन के खिलाफ कार्यवाही लोगों को दिखाई भी देने लगी है वहीं पूँजी की कमी का रोना रो रहे बैंक्स के पास इन बड़े नोटों के रूप में ३० दिसंबर तक जो धनराशि जमा हो जाएगी सरकार के पास उसे अपनी सुविधा के अनुसार वापस करने का विकल्प खुला हुआ है जिससे बैंकों में एकदम से आम लोगों की तरफ से पूँजी का प्रवाह बढ़कर आज व्याप्त पूँजी संकट को कम करने का काम भी करने वाला होगा. जनता को धैर्य से काम लेना चाहिए और देशहित में सरकार के साथ पूरा सहयोग भी करना चाहिए.      
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शनिवार, 10 सितंबर 2016

डिजिटल इंडिया की कमज़ोर बुनियाद

                                                           डिजिटल इंडिया के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से जिस तरह से कश्मीरियों को गोली मारने वाली एक कविता को शेयर किया गया उसके बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि अपने को मज़बूत कहने वाले पीएम मोदी के मंत्रालय इस तरह की हरकत करके आखिर अपनी ही सरकार और पीएम मोदी को कमज़ोर साबित करके असहज स्थिति क्यों पैदा करते रहते हैं. संघ और राहुल गांधी के विवाद में भी आकाशवाणी की तरफ से ऐसा ही राजनैतिक ट्वीट किया गया था जिस पर हंगामा होने के बाद उसे भी इस तरह से डिलीट किया गया इस मामले में ज़िम्मेदार मंत्रालय के मंत्री रविशंकर प्रसाद को भी अपना बचाव करने में परेशानी का अनुभव हुआ और उन्होंने यह बताया कि मंत्रालय का ट्विटर हैंडल संभाल रही एजेंसी के कर्मचारी की गलती से ऐसा हुआ है पर इस मामले में यह विचार करना आवश्यक हो जाता है कि आखिर मोदी सरकार ने किस मानसिकता और राजनैतिक विचारधारा के लोगों को इतने महत्वपूर्ण कामों में लगा रखा है जिससे सरकार के लिए आये दिन ही समस्याएं उत्पन्न होती रहती हैं. सरकार को तो इस तरह की गलती होने पर मजबूरी में खेद व्यक्त करना ही पड़ेगा क्योंकि उसके द्वारा नियुक्त की गयी किसी भी एजंसी की तरफ से ऐसा कुछ होने पर अंत में सारी ज़िम्मेदारी उस पर ही आ जाती है.
                           क्या पद और गोपनीयता की शपथ में इस तरह से डिजिटल मंचों पर सरकार को एजेंसी को चुनने का अधिकार है और क्या किसी भी निजी एजेंसी की तरफ से काम करने वाला कोई भी व्यक्ति सरकार की वे सारी जानकारियां पाने के लिए उपयुक्त होता है जो कई बार नीतिगत मामलों से जुडी होती हैं ? सरकार की नीतियों को इस तरह से निजी कंपनियों के हाथों में सौंपकर मोदी सरकार क्या साबित करना चाहती है क्योंकि यह कहने से काम नहीं चलने वाला है कि इन जानकारियों से देश की गोपनीयता पर असर नहीं पड़ने वाला है. आज इस तरह के मंत्रालयों में एजेंसियों का उपयोग किया जा रहा है तो आने वाले समय में अन्य महत्वपूर्ण मंत्रालयों में भी इसी परिपाटी को अपनाया जायेगा और देश की महत्वपूर्ण जानकारियां कुछ एजेंसियों के माध्यम से पूरी दुनिया के लिए खुल जाएँगी. क्या इन एजेंसियों में काम करने वाले लोगों पर सरकार को कोई नियंत्रण भी रहा करता है जिससे वे सरकार की नीतियों की जानकारियां अपने तक ही सीमित रख सकें और उनका किसी भी स्तर पर दुरूपयोग संभव न हो ? यदि ऐसा नहीं है तो सरकार किस तरह से देश की संवेदनशील जानकारी को किसी भी एजेंसी के माध्यम से इतना अधिक खोलने पर काम कर रही है.
                          किसी भी सरकार के लिए गोपनीयता के नियम बहुत कठोर होते हैं और देश में आज जिस तरह से तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त युवाओं की अच्छी खासी संख्या उपलब्ध है उसके बाद भी सरकार के आँख-कान के रूप में बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डिजिटल मंच के लिए पूर्ण कालिक युवाओं को चयनित करने के स्थान पर आखिर सरकार इसे आउट सोर्सिंग के माध्यम से क्यों करवाना चाहती है ? क्या सरकार अपनी इस मंशा को भी स्पष्ट करेगी कि किस विचार धारा के लोगों से जुडी हुई एजेंसियों को इन महत्वपूर्ण कामों के लिए किस आधार पर चुना जा रहा है और इतनी बड़ी गलती करने के बाद क्या सरकार एक बार फिर से नए दिशा निर्देश जारी करने वाली है या वह सरकार के स्तर पर ही एक मीडिया सेल बनाकर आने वाले समय में उसके माध्यम से सभी विभागों की डिजिटल आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाली है ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि २०१४ के चुनावों में जिन लोगों ने खुलेआम सोशल मीडिया पर गैर भाजपाई दलों के लिए हर स्तर पर आलोचनाओं को व्यापक स्थान दिया था आज उन्हीं लोगों को सरकार के आधिकारिक ट्विटर हैंडल थमा दिए गए हैं ? सरकार अपने स्तर से नियमानुसार कुछ भी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है पर इस मामले में मनमानी का कोई स्थान नहीं होना चाहिए.   
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शनिवार, 6 अगस्त 2016

सार्क की प्रासंगिकता

                                                                       दक्षिण एशिया के सात देशों को अपनी साझा समस्याओं और सुविधाओं को साझा करने के साथ  एक आर्थिक रूप से मजबूत क्षेत्र बनाने के सत्तर के दशक के शुरुवाती वर्षों में शुरू हुए प्रयासों ने ८ दिसंबर १९८५ को मूर्त रूप लिया जिसके बाद सार्क का गठन किया गया. इस समूह के चार्टर में शुरू से ही इस बात का उल्लेख किया गया था कि क्षेत्र के विकास के लिए सदस्य देश अपनी द्विपक्षीय समस्याओं को इन स्थान पर नहीं उठायेंगें क्योंकि इसके दो बड़े सदस्यों भारत-पाक के बीच बंटवारे के समय से ही गंभीर विवाद के रूप में कश्मीर और अंतरराष्ट्रीय सीमा मौजूद थी. आज इसके गठन के ३१ वर्ष होने पर भी पाकिस्तान ने यह बात नहीं समझी है कि इस मंच का सदुपयोग किस तरह से किया जाये क्योंकि उनको आज भी यही लगता है कि यदि भारत को पूरी छूट दे दी गयी तो वह पाकिस्तान के बाज़ार पर कब्ज़ा कर लेगा और उनके आर्थिक हित प्रभावित होने लगेंगें तभी आज भी उसकी तरफ से भारत को मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा नहीं दिया गया है और वह संगठन की मूल भावना के खिलाफ जाकर इस मंच से भी कश्मीर का मामला उठाने की कोशिशें लगातार ही करता रहता है जिसका इस संगठन के काम काज पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है और संगठन के गठन पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है.
                         हाल ही में इस्लामाबाद में सार्क देशों के गृह मंत्रियों की बैठक में पाकिस्तान ने जिस तरह का व्यवहार किया उसके बाद सार्क के होने या न होने के क्या मायने रह जाते हैं क्योंकि पूरी दुनिया जानती है कि आज पाक जेहादियों को अपरोक्ष रूप से हर तरह की मदद करता है और खास तौर पर भारत और अफगानिस्तान के लिए लगातार समस्याएं खडी करने का काम भी करता ही रहता है. इस तरह एक अंतरराष्ट्रीय मंचों से राजनयिक शिष्टाचार की अपेक्षा हर देश से की जाती है भले ही उनके आपस में कितने भी मतभेद क्यों न हों फिर भी जिस तरह से इस्लामाबाद में पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर का राग अलापकर बैठक को ख़राब करने की कोशिश की गयी उसके कोई सकारात्मक परिणाम भी सामने नहीं आने वाले हैं. जब बांग्लादेश भी पाकिस्तान के आतंक समर्थक रवैये के चलते अपने मंत्री को इस बैठक में भेजने से इंकार कर सकता है तो ऐसा करने में भारत को क्या दिक्कत है ? जिस तरह से पाकिस्तान का माहौल ख़राब होने के चलते आज वहां पर कोई भी देश क्रिकेट खेलने को राज़ी नहीं होता है ठीक इसी तरह से अब पाकिस्तान से हर तरह के अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को दूर करवाने की कोशिश अब भारत को भी करनी चाहिए.
                           सार्क के सम्बन्ध में भारत को अन्य देशों के साथ मिलकर अब पाकिस्तान को अलग थलग करने का समय आ गया है क्योंकि इसके चार्टर के अनुसार केवल एक देश ही सारी बातों के लिए ज़िम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है ? पाकिस्तान की तरफ से सार्क के हर कदम को रोकने की हर संभव कोशिशें की जाती हैं क्योंकि उसे लगता है कि देशों में इस स्तर का सहयोग बढ़ने पर भारत को ही इसका सबसे अधिक लाभ मिलेगा और वह कश्मीर जैसे विवादित मुद्दे पर बात कर पूरे माहौल को ख़राब करने की कोशिश करने में ही लगा रहता है. भारत को एक बात और भी स्पष्ट करने की आवश्यकता भी है कि पाकिस्तान के इस तरह एक रवैये के चलते अब उसके साथ सार्क स्तर पर सम्बन्ध रख पाना भी संभव नहीं है जिससे सदस्य देशों की तरफ से पाक पर कुछ दबाव भी बनाया जा सके. आज जब पूरा विश्व एक आर्थिक बाजार के रूप में सामने आ चुका है तो उस परिस्थिति में आखिर सदस्य देश इस तरह कब तक अपने आर्थिक हितों के लिए सार्क की तरफ ताकते रहेंगें ? इस पूरे मसले में भारत का ही सबसे अधिक नुकसान होता है इसलिए अब पहल उसकी तरफ से ही होनी चाहिए और सदस्य देशों की तरफ से सार्क और द्विपक्षीय व्यापारिक, आर्थिक, सामाजिक संबंधों के लिए एक समयबद्ध संरचना पर विचार करना चाहिए वार्ना सार्क अपने उद्देश्य को कभी भी हासिल नहीं कर पायेगा.           
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गुरुवार, 26 मई 2016

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते ??

                                      पुरुष प्रधान भारतीय समाज में आज जब दुनिया भर के विकास की बातें लगातार की जाती हैं तब भी उसके बीच से कहीं न कहीं से कुछ ऐसी बातें भी सामने आती रहती हैं जो आम भारतीय पुरुष की वास्तविक मानसिकता को प्रतिबिंबित ही करती रहती हैं. प्राचीन काल से ही महिलाओं के सम्बन्ध में हमारे देश में एक सूक्ति प्रचलित रही है कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता" अर्थात जहाँ नारियों की पूजा (सम्मान) की जाती है वहां देवताओं (अच्छी विचारधाराओं) का निवास होता है फिर भी समाज के हर क्षेत्र में आगे बढ़ने वाली महिलाओं को हमारे प्रगतिशील समाज कहलाया जाना पसंद करने वाले लोग भी महिलाओं पर असम्भय, छिछली और बेहद आपत्तिजनक बातें करने से नहीं चूकते हैं. देश में एक बात और भी प्रचलित है कि यदि आपको अपने परिवार के इतिहास के बारे में पूरी जानकारी न हो तो आप एक चुनाव लड़कर देख सकते हैं जिसमें विरोधी आपके परिवार से जुडी हुई सारी बातों को खुद ही खोजकर आपको आश्चर्य चकित करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगें. महिलाओं का सम्मान केवल जबान हिलाने से आगे बढ़कर उनको वास्तविक रूप से सम्मान का हक़दार मानने से ही हो सकता है पर दुर्भाग्य से फिर से विश्व गुरु बनने का सपना पाले हम भारतीय अपनी दबी छिपी कुंठाओं को व्यक्त करने का कोई उचित अवसर न मिल पाने के कारण सदैव ही अपनी भड़ास को मौका मिलने पर इसी तरह से महिलाओं को निशाने पर लेकर निकालने का काम करते रहते हैं जिससे निश्चित तौर पर हमारी दोहरी और खोखली मानसिकता का परिचय मिलता है.
                        इस कड़ी में सबसे ताज़ा उदाहरण असम में हाल के चुनावों में विधायक निर्वाचित हुई मशहूर असमिया अभिनेत्री अंगूरलता डेका से देखा जा सकता है कि चुनाव जीतने के बाद किस तरह से सोशल मीडिया पर सभ्य कहलाने वाले लोगों की तरफ से भद्दे और अश्लील कमेंट्स किये गए जिनका किसी भी स्तर पर न तो समर्थन किया जा सकता है और जो कहीं से भी स्वीकार्य नहीं हैं फिर भी इन तथाकथित सभ्य लोगों ने जिस तरह से डेका से जुडी हुई तस्वीरों के साथ जुड़े हुए मर्यादा लांघने वाले हर कमेंट को आगे बढ़ाने का काम किया उससे यही स्पष्ट होता है कि मौका मिलने पर पुरुषों के मन में दबी हुई यह उत्कंठा कहीं न कहीं से ज़ोर मारने ही लगती है. डेका एक अभिनेत्री रही हैं तो क्या उन्होंने कोई गुनाह किया है और आज फिल्मों में वही सब दिखाया भी जाता है जिसे हीन भावनाओं से ग्रसित पुरुष समाज देखना भी चाहता है तो इसमें किसी अभिनेत्री को किस तरह से ओर दोष दिया जा सकता है ? फिल्मों में जब तक "एंटरटेनमेंट" के नाम पर असभ्यता को प्रदर्शित न किया जाये तब तक सम्भवतः उसे भी सम्पूर्ण नहीं माना जाता है. आखिर कोई स्त्री अपने शरीर को इस हद तक प्रदर्शित करने को क्यों मजबूर होती है जहाँ सीमायें टूटने लगें ? यह कौन सोचेगा पर भारतीय समाज में लड़कों में बचपन से जो संस्कार कूटकूट कर भरे जाते हैं वे उनके पूरे जीवन में समाज को इसी तरह की समस्याओं से लगातार दो-चार होने को मजबूर करने लगते हैं.
                      राजनीति का दलदल तो वैसे भी बहुत बदनाम है पर क्या किसी व्यक्ति के निजी जीवन को उसके सार्वजनिक जीवन के साथ इस तरह से जोड़ना उचित कहा जा सकता है ? क्या किसी के सिर्फ राजनीति में चले जाने से पूरे समाज को उस पर किसी भी तरह की टिप्पणी करने का अधिकार मिल जाता है ? इस बात का उत्तर हमारे समाज के पास है ही नहीं क्योंकि यदि समाज में इतनी संवेदनशीलता होती तो वह नारी के बारे में सार्वजनिक रूप से इतनी अभद्रता कभी भी न कर पाता और ऐसा भी नहीं है कि समाज में यह सब पहली बार हुआ है क्योंकि अभी अधिक समय नहीं बीता है जब दिग्विजय सिंह और पीएम मोदी के साथ ही केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी पर भी इसी तरह के व्यक्तिगत हमले किये गए हैं जिनमें कहीं न कहीं निशाने पर केवल किसी महिला को ही लिया जाता रहा है. बेशक समाज को समाज में कार्य करने वाले किसी भी व्यक्ति के मूल्यांकन का अधिकार है पर क्या उस अधिकार की कोई सीमायें नहीं होनी चाहिए आलोचना करनी है तो इन नेताओं की नीतियों की खुलकर होनी चाहिए पर आलोचना में निजी जीवन पर प्रहार करना किस नैतिकता के दायरे में आता है यह कोई समझा भी नहीं सकता है. किसी भी सार्वजनिक हस्ती के कार्यों की अच्छाइयों और बुराइयों पर विमर्श होना कहीं से भी अनुचित नहीं है पर विमर्श के स्तर पर इतनी नीचता तक उतरना किसी भी समाज की वास्तविक स्थिति को ही दर्शाता है.
                      इस पूरे प्रकरण में हम सभी के अंदर के उन तत्वों के आत्मचिंतन का समय आ गया है क्योंकि समाज में ऊंचा स्थान पाये हुए किसी भी व्यक्ति ने यदि अंगूरलता मामले में उन अभद्र टिप्पणियों में किसी भी रूप में हिस्सा लिया है तो उसे अपनी मानसिकता पर विचार करना ही चाहिए क्योंकि किसी भी राष्ट्र का दर्पण उसके नागरिक होते हैं और यदि अंगूरलता के विधायक बनने से पहले तक उनकी ये तस्वीरें हमारे इसी समाज को स्वीकार्य थीं तो आज उनके राजनीति में आने के साथ ये सब इतनी आपत्तिजनक यह अभद्रता की हद तक जाने वाली कैसे बन सकती हैं ? देश के सामाजिक स्वरूप में यह सड़न सदैव से ही रही है और लम्बी चौड़ी बातें करने के लिए चाहे जिस भी सम्भ्यता और संस्कृति को उठाकर देख लिया जाये हर जगह इस तरह के लोग बड़ी संख्या में मिल जाने वाले हैं फिर हम किस तरह की बराबरी और सौजन्यता की बातें करते हैं जब हम अपने समाज के उस आधे हिस्से को ही उसका मान सम्मान दे पाने में पूरी तरह से असफल हो जाते हैं ? हम सभी के लिए यह समय है कि केवल अच्छी बातें करने और उनका समर्थन करने के स्थान पर उनमें निहित तत्वों का समावेश अपने अंदर करने की चेष्टा करें जिससे नारियों को वास्तव में वह सम्मान सके जिसकी वह सदैव हकदार है.       
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मंगलवार, 17 मई 2016

लक्ष्मण रेखाएं किसकी ?

                                                     देश के राजनेताओं को जनता का समर्थन मिल जाने पर वे जिस तरह का व्यवहार करने लगते हैं उसका सुशासन और देश की समस्याओं से कुछ भी लेना देना नहीं होता है क्योंकि जब लम्बे समय के बाद महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी नेताओं को मिलती है तो उन्हें अधिकतर मामलों में यही लगता है अब वे देश की जनता के हितों के नाम पर कुछ भी करने के लिए स्वतंत्र हो गए हैं जो कि उनकी गलत सोच को ही दर्शाता है. ३० वर्षों बाद पूर्ण बहुमत के साथ जिस तरह से २०१४ में मोदी सरकार ने सत्ता संभाली थी तो उससे पहले उसकी तरफ से लोगों को इतने बड़े बड़े सपने दिखा दिए गए थे कि आज उन के साथ न्याय कर पाना असम्भव सा ही दिखता है. किसी भी देश के लिए ५ वर्ष बहुत कम होते हैं फिर भी कुछ मुद्दों पर मोदी सरकार गम्भीरता से काम कर रही है पर मोदी सरकार में बैठे काम न करने के आदी कुछ नेताओं के चलते आज भी पीएम मोदी की प्राथमिकता वाली योजनाओं की प्रगति का हाल किसी से भी नहीं छिपा है. लोकसभा में पूर्ण बहुमत ने भाजपा के अंदर जिस तरह का दम्भ भर दिया था आज दो वर्षों बाद भी उनके नेता उससे बाहर नहीं आ पा रहे हैं और अपनी कमियों के चलते देशहित के मुद्दों पर ठोस प्रगति न होने का ठीकरा अब उसकी तरफ से दूसरों पर फोड़ने का काम शुरू किया जा चुका है.
                                          संसदीय परम्परा को दुनिया भर में शासन करने का सबसे अच्छा विकल्प माना गया है और संवैधानिक रूप से देश को चलाने के लिए जिन स्तम्भों की बात की गयी है उनमें न्यायपालिका भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जब भी देश की संसद या राजनेता किसी मसले पर निर्णय तक पहुँचने में असफल रही हैं तो न्यायपालिका ने ही उसे सही राह दिखाई है. आज़ादी के बाद से ही विधायिका को अपने काम में न्यायपालिका का किसी भी तरह का दखल अच्छा नहीं लगता है जिससे सरकार के मत से विरोधी कोई भी कडा फैसला आने पर लगभग सभी सरकारें न्यायपालिका को अपनी सीमाओं में रहने की अनावश्यक सलाहें देती ही रहती हैं इसी क्रम में अब न्यायपालिका के हाथों अपनी किरकिरी करवा रही मोदी सरकार के कानूनी जानकर और वरिष्ठतम मंत्री अरुण जेटली न्यायपालिका को उसकी लक्ष्मण रेखाओं की याद दिला रहे हैं जबकि वे यह भूल जाते हैं कि इसी न्यायपालिका के कई फैसलों को लेकर कभी भाजपा कांग्रेस पर हमलावर रहा करती थी और कुछ मसलों पर कांग्रेस के खिलाफ आये निर्णयों को उन्होंने अपने चुनावी हथियारों के रूप में भी खुले तौर पर इस्तेमाल किया था.
                                अगर न्यायपालिका की तरफ से विधायिका से जुड़े मसलों पर भी निर्णय दिए जा रहे हैं तो केंद्र तथा राज्य सरकार सरकारों के साथ सभी दलों के नेताओं को इस पर विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि आखिर वे कौन से कारण बन रहे हैं जिनके चलते सामान्य विधायी कार्यों पर भी कोर्ट्स की टिप्पणियां लगातार आने लगी हैं ? निश्चित तौर पर जिस लक्ष्मण रेखा की बात जेटली कर रहे हैं उसकी अवहेलना विधायिका द्वारा लगातार ही की जा रही है तभी कोर्ट का हस्तक्षेप इन मामलों में बढ़ता ही जा रहा है. जिन मामलों को सही कानूनी स्वरुप देकर देशहित में आगे बढ़ाया जाना चाहिए आज उसके राजनैतिक द्वन्दों में उलझने के चलते ही कोर्ट सक्रिय भूमिका निभाने को मजबूर है क्योंकि जब कोई व्यक्ति या संस्था अपनी समस्या को लेकर कोर्ट में जाते हैं तो उस पर मेरिट के आधार पर सुनवाई करने का अधिकार पूरी तरह से कोर्ट के पास होता है. विधायिका के फेल हो जाने पर यदि कोर्ट इस तरह के मामलों में निर्देश देने को मजबूर हो रहा है तो इस पर संसद और सरकार को ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि सीमाओं का ध्यान सम्भवतः संसद नहीं रख पा रही है जिसके चलते कोर्ट आगे बढ़कर मुद्दों को सुलझाने के लिए निर्णय देने में लगी हुई है.
                              देश और सरकारों को अपनी मर्ज़ी से नहीं चलाया जा सकता है यह बात अब मोदी सरकार को समझनी ही होगी क्योंकि पिछले मनमोहन सरकार की तरफ से भी इसी तरह की गलतियां की गयी थीं जिनका खामियाजा कांग्रेस भुगत रही है. संविधान द्वारा स्थापित की गयी परम्पराओं को जिस तरह से सत्ता और विपक्ष में बैठने पर हमारे देश के राजनैतिक दल अपने हिसाब से परिभाषित करने लगते हैं आज वही सबसे बड़ी समस्या है क्योंकि कभी न्यायपालिका की टिप्पणियों के आधार पर भाजपा कांग्रेस पर हमलावर हुआ करती थी तब कोर्ट उसे देश को बचाने वाली लगा करती थी पर आज वही कोर्ट उसे सरकार के काम में दखल देने वाले रूप में दिखाई देने लगी है. उत्तराखंड में जिस तरह से कोर्ट के द्वारा अपने निर्णय को वापस लेने के लिए मोदी सरकार को मजबूर होना पड़ा उससे देश की छवि को ही बट्टा लगता है तथा इससे कांग्रेस तथा भाजपा के शासन करने में कोई अंतर न होने की बात भी स्पष्ट हो जाती है. सत्ता में बैठकर निरंकुश होना सभी को अच्छा लगता है पर भारतीय संविधान के निर्माताओं ने इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के लिए पहले ही पूरी व्यवस्था कर रखी है जो आज भी कारगर है. यदि सरकार स्वयं ही अपनी लक्ष्मण रेखा की मर्यादा को बनाए रखे तो न्यायपालिका को भी खुद को अपनी तरफ से उग्र टिप्पणियों को करने से रोकना ही होगा पर सरकार में बैठे हुए लोग सदैव ही न्यायपालिका पर भी इसी तरह का दबाव बनाने की अनावश्यक कोशिशें करने से बाज़ नहीं आते हैं. नेताओं को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि जजों को वोट नहीं चाहिए होते हैं इसलिए वे अपने स्तर से निर्णय सुनाने में कड़े कदम उठाने से भी नहीं चूकते हैं पर यदि विधायिका अपने स्तर से ही सही ढंग से काम करने की तरफ बढ़ना शुरू करे तो देश में इन लक्ष्मण रेखाओं की बात करने की आवश्यकता ही समाप्त हो जाएगी.     
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शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

पीआईबी की जवाबदेही

                                                                         केंद्र सरकार की कोशिशों, निर्णयों और उपलब्धियों के बारे में समाचार पत्रों को सूचना देने के लिए बनाये गए पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) में किस तरह से काम किया जा रहा है उसकी एक बानगी कल पीएम मोदी की चेन्नई यात्रा के दौरान ही मिल गयी जिसमें पीएम के बाढ़ की स्थिति का अंदाज़ा लगाने के लिए किये गए हवाई सर्वेक्षण के लिए इस ज़िम्मेदार संस्था द्वारा जो चित्र जारी किया गया वह तकनीकी रूप से छेड़छाड़ करके बनाया गया था क्योंकि जो असली चित्र था उसमें नीचे मौसम के कारण कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था जबकि पीआईबी द्वारा जारी की गयी नकली फोटो में मकान बहुत साफ़ दिखाई दे रहे थे. इस बात से क्या यह अंदाज़ा नहीं लगता है कि सरकार के मुखिया के महत्वपूर्ण दौरों के साथ भी इस कार्यालय द्वारा किस तरह की छेड़छाड़ की जाती है क्योंकि बिना शीर्ष स्तर के दखल के किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह अपने दम पर इतना बड़ा निर्णय ले सके. आज जब तकनीक का युग है तब भी इस संस्था द्वारा इस तरह की हरकत किया जाना किस मानसिकता का प्रदर्शन है यह किसी की भी समझ से बाहर ही है.
                                इस मामले को यदि आज के सोशल मीडिया के एंगल से समझा जाये तो स्थिति स्पष्ट हो जाती है क्योंकि भाजपा के एक बड़ा तकनीक में माहिर समूह किस तरह से सामान्य फोटोज के साथ छेड़छाड़ करके पिछले चुनावों में कांग्रेस के पूर्व व वर्तमान नेताओं के बारे में जनता को गुमराह करने का काम कर चुका है वह किसी से भी छिपा नहीं है तो संभवतः उनमें से किसी अतिउत्साही व्यक्ति को मोदी सरकार ने अपनी छवि को लगातार चमकीला बनाये रखने के लिए पीआईबी में भी नियुक्त कर दिया हो और वह अपनी नियुक्ति को इसी तरह से सही साबित करने की कोशिश में लगा हुआ हो ? यह भी संभव है कि इस कार्यालय में नियुक्त किसी व्यक्ति ने अपने को पीएम का बड़ा हितैषी साबित करने के लिए ही इस तरह का काम किया हो पर इस पूरे प्रकरण से यह बात तो साबित ही हो जाती है कि जो लोग कभी सोशल मीडिया पर इस तरह की गतिविधियों में सक्रिय रहा करते थे वे आज कहीं न कहीं से सरकार के अंदर तक घुसपैठ बनाने में सफल हो चुके हैं पर इस तरह की हरकतों से प्रचार के लिए काम करते दिखने वाले पीएम पर ही सीधे तौर पर उँगलियाँ उठ जाती हैं.
                                संसद के दोनों सदनों में जिस तरह से इस बार पीएम मोदी के बदले हुए सुर सुनाई दे रहे हैं वे किसी बड़े परिवर्तन के स्थान पर राजनैतिक मजबूरी में उठाये गए कदम अधिक लगते हैं क्योंकि जब भी सरकार पर दबाव आता है तो मोदी कुछ नरम होकर उस संकट को टालने की कोशिशें भी किया करते हैं. आज खुद पीएम के स्तर पर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इस तरह की हरकतें करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए आने वाले समय में काम करना कठिन ही होने वाला है पर शायद यह सब भाजपा की रणनीति का ही हिस्सा है तभी इतने ज़िम्मेदार कार्यालय में इस तरह की हलकी हरकतें करने वाले लोग आज स्थान पाकर बैठे हुए हैं. वैसे तो यह बड़ा मुद्दा नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से खुद पीएम की फोटो के साथ ऐसी हरकत की गयी है तो संभवतः यह मामला संसद में भी उठ सकता है क्योंकि सरकार ने इस बात के लिए ज़िम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ क्या कार्यवाही की सदन यह भी जानना चाह सकता है. इस तरह की कोई भी बात सदन में सरकार को और भी असहज करने के लिए काफी होगी क्योंकि विपक्ष पहले से ही मोदी सरकार पर प्रचार की सरकार होने का आरोप लगाता रहता है और इसका सरकार की तरफ से कभी भी खंडन भी नहीं किया जाता है.    
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रविवार, 25 अक्टूबर 2015

पर्यावरण और विकास

                                                      दुनिया भर में प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर किसी भी क्षेत्र के लिए अपने को बचाये रख पाने का संकट सदैव ही बना रहता है क्योंकि आज विकास की जिस परिभाषा के लिए पूरी दुनिया की मानव शक्ति लगी हुई है वह कहीं से भी इस पर्यावरण के अनुकूल नहीं लगती है. इसी क्रम में जिस तरह से असोम में नुमालीगढ़ रिफायनरी द्वारा हाथियों के प्राकृतिक रास्ते को रोककर वहां गोल्फ कोर्स के लिए दीवार बना दी गयी है वह सैकड़ों वर्षों से हाथियों के आवागमन के मार्ग पर आ गयी है जिस कारण हाथियों का अपने मार्ग से भटकना और ग्रामीणों के साथ संघर्ष करने जैसी समस्याओं में वृद्धि हुई है. वैसे भी देखा जाये तो हाथी सदैव ही अपने पुराने मार्ग का अनुसरण करते हुए ही जंगली क्षेत्रों में आते जाते रहते हैं जिससे उस मार्ग पर किसी भी तरह का व्यवधान उनके लिए आपदा से कम नहीं होता है.
              इस मामले में यह विवाद पहले से ही ग्रीन ट्रिब्यूनल के पास विचारधीन है फिर भी उस पर कोई निर्णय आने से पहले ही एनआरएल द्वारा जिस तरह से प्रतिबंधित क्षेत्र में वनों को काटा गया और अब हाथियों के रास्ते को गोल्फ कोर्स के लिए रोका जा रहा है उससे किसी भी तरह से विकास के आयाम हासिल नहीं किये जा सकते हैं. इस तरह के मामलों का तेज़ी के साथ निपटारा करने के बारे में भी सोचा जाना चाहिए जिससे किसी भी संगठन या संस्था द्वारा अपने लाभ के लिए कानून का उल्लंघन न किया जाये। देश में विकास होना चाहिए इस बात से किसी को भी इंकार नहीं हो सकता है पर क्या विकास के लिए देश में पहले से ही संकटों का सामने कर रहे वन जीवों की कीमत पर यह सब चाहिए अब इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है. विकास और प्रगति से जुड़े हुए उद्योगों को भी यह सोचना चाहिए कि जैविक विविधता बने रहने से उनके लिए भी किसी क्षेत्र विशेष में रहना आसान ही रहने वाला है.
           जब यह मामला पहले से ही विचाराधीन है तो उसके तहत इसे लंबित ही रहना चाहिए पर एनआरएल द्वारा जिस तरह से मनमानी करते हुए दीवार बनाकर हाथियों के लिए संकट उत्पन्न किया है उस पर कड़ी कार्यवाही भी होनी चाहिए जिससे आने वाले समय में कोई भी औद्योगिक समूह चाहे वह किसी भी क्षेत्र का हो इस तरह से मनमानी न कर पाये। जब तक मुद्दे पर फैसला नहीं आता है तब तक एनआरएल को इस तरह के काम करने से रोकने की भी आवश्यकता है. यह काम सरकार आसानी के साथ कर सकती है और नियमों की जानबूझकर अनदेखी करने वाले उद्योगों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही भी कर सकती है. अब इस परिस्थिति में सभी को अपने आसपास के पर्यावरण का भी ध्यान रखना ही होगा क्योंकि जब तक सरकार इस तरह के मसलों पर सख्त नहीं होगी केवल ट्रिब्यूनल के भरोसे पर्यावरण की रक्षा नहीं की जा सकेगी।
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 28 जुलाई 2015

दीनानगर के छिपे सन्देश

                                                   आतंकी घटना में पंजाब के तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह को आत्मघाती हमले में शहीद करने के बाद पंजाब में दो दशक बाद आतंक का इतना बड़ा स्वरुप गुरदासपुर जिले में देखने को मिला है जिसकी कल्पना ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ संभवतः राज्य और केंद्र सरकारों ने भी नहीं की थी क्योंकि पंजाब में आतंक के चेहरे को पूरी तरह से नष्ट करने के बाद से अब तक इस तरह की कोई घटना भी नहीं हुई थी. देश के नेताओं में इस तरह की परिस्थितयों में भी अपने को बचाने की जो प्रवृत्ति सदैव से ही हावी रहा करती है कल पूरे दिन चले ऑपरेशन में एक बार फिर से प्रभावी दिखी जब पंजाब पुलिस की तरफ से इस पूरे अभियान को अपने दम पर चलाने की बात कही गयी. निश्चित तौर पर पंजाब की कमांडो टीम ने बहुत अच्छा काम किया और उन्होंने अपनी ट्रेनिंग को भी सार्थक कर दिखाया है पर इस तरह के अभियानों में शामिल होने वाली पंजाब पुलिस की वो पीढ़ी अब पूरी तरह से परिदृश्य से गायब है संभवतः इस बात का ख्याल पंजाब ने नहीं रखा और कुछ चूकें ऐसी भी हुईं जिसके माध्यम से हमारे जवानों की बेशकीमती जानें भी चली गयीं जिन्हें अधिक कुशलता के साथ काम करके बचाया जा सकता था.
                            कुछ हद तक पंजाब पुलिस का अपने दम पर अभियान चलाने का निर्णय सही भी था क्योंकि वह अपनी इस नयी बनी यूनिट की कुशलता का परीक्षण भी करना चाहता था पर इस तरह के हमलावरों से निपटने के लिए एनएसजी और सेना को जितने बड़े पैमाने पर महारत हासिल है यदि उनके साथ पूरे समन्वय को बनाये रखते हुए अभियान चलाया जाता तो पंजाब पुलिस को इस हमले से बहुत कुछ और भी सीखने को मिल जाता. पर अब जब उस स्तर पर चूक हो चुकी है तो उस पर विचार करते हुए भविष्य में होने वाली ऐसी किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर एक नीति बनायीं जानी चाहिए जैसा कि खुद पंजाब के सीएम की तरफ से कल कहा भी गया है. राज्य चाहकर भी आतंक से उतनी मज़बूती से नहीं निपट सकते हैं जैसे केंद्रीय एजेंसियां कर सकती है क्योंकि उनके पास पूरे देश के अलग अलग हिस्सों में विभिन्न तरह के आतंकवादियों से निपटने के लिए अधिक अनुभव है जिसको पूरे देश की पुलिस और राज्यों की ख़ुफ़िया एजेंसियों के साथ साझा किया जाना आवश्यक भी है.
                        देश के किसी भी हिस्से में आतंकवादियों से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय नीति को बनाये जाने की आवश्यकता अब महसूस होने लगी है क्योंकि इस तरह की परिस्थिति में राज्यों द्वारा केंद्रीय एजेंसियों को किस हद तक किसी भी ऑपरेशन से मना किया जा सकता है यह सोचने का विषय है. राज्यों और केंद्र की एजेंसियों के बीच अब बेहतर समन्वय की भी आवश्यकता है क्योंकि जब तक पूरे देश में आतंक से लड़ने की स्पष्ट नीति नहीं होगी तब तक राज्यों की ज़िद के चलते इस तरह से जनहानि होने से हम नहीं बच सकते है. आतंकियों के हमला करने के पसंदीदा स्थलों में सुरक्षा बलों के ठिकाने ही रहा करते हैं यह जानते हुए भी पाक की ज्वलंत सीमा से केवल १५ किमी अंदर स्थित दीनानगर में पुलिस के पास आधुनिक हथियार ही नहीं थे और वे एके ४७ का मुक़ाबला पुरानी एसएलआर से करने को मजबूर थे. पुलिस के पास मनोबल की कमी नहीं थी पर जिस तरह से उसके पास योजना और संसाधन में कमी दिखी वह अवश्य ही चिंता की बात है. आतंकी इन स्थानों को अपने हमले में लेकर यह सन्देश देना चाहते हैं कि जनता की सुरक्षा करने वाले सुरक्षा बल भी उनकी आसान पहुंच में हैं और अब पूरे देश तथा विशेषकर सीमावर्ती राज्यों में पुलिस को एक राष्ट्रीय अभियान के तहत आधुनिकीकृत किया जाना चाहिए.     
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गुरुवार, 11 जून 2015

सुरक्षा मामले और गोपनीयता

                                                          महत्वपूर्ण और सामरिक मामलों में जिस स्तर की संवेदनशीलता और गोपनीयता का परिचय ज़िम्मेदार लोगों को देना चाहिए मोदी सरकार उसमें पूरी तरह से विफल रही है. भारत-म्यांमार सीमा या सीमा पार हुए भारतीय सेना के इस अभियान पर देश में जिस तरह से बयानबाज़ी की गयी उसके बाद म्यांमार के राष्ट्रपति कार्यालय की तरफ से आया बयान भारतीय नेताओं को असहज स्थिति में डालने के लिए काफी है. सेना के बयान में जिस तरह से इस बात को बताते समय पूरी तरह से मामले की संवेदनशीलता का ध्यान रखा गया था वहीं नेताओं ने इस मुद्दे पर छिछली राजनीति करने की शुरुवात कर दी जिसमें पूर्व सैन्य अधिकारी और अब केंद्रीय राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने अपने हर बयान में बढ़-चढ़ कर बातें की जिसका असर यह हुआ है कि म्यांमार ने भारतीय नेताओं को आइना दिखाने की पहल कर दी है. म्यांमार भी भारत की तरह संप्रभु देश है भले ही वहां पर तानाशाही है पर उसका मतलब यह तो नहीं निकाला जा सकता है कि भारतीय सेना ने उसके क्षेत्र का उल्लंघन किया और वह कुछ भी नहीं कर सका ? म्यांमार से १९९५ में ही एक समझौता हो चुका है जिसमें यह स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि भारत विरोधी किसी भी आतंकी समूह को वहां पर पनपने नहीं दिया जायेगा और इसी क्रम में सेना इस तरह के कई सफल ऑपरेशन पहले भी चला चुकी है.
                                      इस घटना के बाद जिस तरह से केंद्र सरकार के ज़िम्मेदार लोगों ने इसे केवल राजनैतिक कारणों से ही परोक्ष रूप से पाकिस्तान के लिए एक चेतावनी के रूप में बताना शुरू कर दिया उसके बाद इस मामले में पाकिस्तान ने भी अपनी टांग अड़ा दी है और भारत को एक तरह से अपने स्तर पर सचेत भी कर दिया है. देश की राजनीति में थोड़े से लाभ के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किये गए किसी बेहतर कूटनीतिक प्रयास को किस तरह से बर्बाद किया जा सकता है यह इसका एक उदहारण मात्र है जबकि सैन्य सहयोग को लम्बे समय तक बनाये रखने के लिए कई बार इस तरह के अभियानों की सफलता पर भी कुछ खास बात नहीं की जाती है क्योंकि उसके दूरगामी परिणाम भी हुआ करते हैं. जिन जवानों ने इस अभियान में हिस्सा लिया उनकी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर आई हुई है आखिर सेना के इस गोपनीय अभियान की तस्वीर किस तरह से सार्वजनिक हुई इस पर सरकार कुछ सोचना चाहेगी ? जिन लोगों ने अभियान में हिस्सा लिया तो उनके बारे में ऐसी सार्वजनिक चर्चा और प्रदर्शन आखिर उनके लिए किस तरह का समर्थन कहा जा सकता है जिसमें उनके लिए खतरों को बढ़ाया ही जा रहा है पर संभवतः अपने कुछ राजनैतिक लाभ के लिए सरकार के पास इन जवानों के लिए सोचने का मौका ही नहीं है.
                                 भारतीय सेना विश्व की सर्वश्रेष्ठ सेनाओं में गिनी जाती है क्योंकि उसके मानवीय चेहरे की कदर आज पूरी दुनिया करती है तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा चलाये जाने वाले किसी भी शांति सेना के अभियान में भारतीय सेना की उपस्थिति ही लोगों के लिए संजीवनी का काम करती है क्योंकि उन्हें लगता है कि इस सेना के मानवीय पहलुओं को समझने से उनकी दिक्कतें वास्तव में ही कम होने वाली हैं. इस मामले में सेना के शीर्ष अधिकारी की तरफ से जो बयान दे दिया गया था उसके बाद केवल सेना की तारीफ करते हुए अन्य बातों को इससे क्या अलग रखने की आवश्यकता नहीं थी ? म्यांमार ने जिस तरह से भारतीय पक्ष के इस दावे का खंडन कर दिया है तो इससे क्या एक बेहतर और सटीक सामरिक प्रयास खोखली राजनीति में नहीं उलझ गया है और क्या आने वाले समय में म्यांमार की तरफ से इस तरह के अभियानों को चलाने के लिए उतनी छूट दी जाएगी जितनी अभी तक मिलती रही है ? यह सब कुछ ऐसी बातें हैं जिन पर नेताओं को चुप रहकर केवल सैन्य स्तर पर ही निपटना चाहिए क्योंकि जब तक इस तरह के सहयोग को दोनों पक्षों की तरफ से संयमित रूप से नहीं किया जायेगा तब तक सेना के लिए सही माहौल बनाया जाना संभव नहीं हो सकता है.  
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बुधवार, 10 जून 2015

म्यांमार से सैन्य समन्वय

                                          मणिपुर के चंदेल जिले में सीमापार के आतंकियों द्वारा घात लगाकर किये गए हमले में जिस तरह से ४ जून को सेना के १८ जवानों को शहीद कर दिया था उसके बाद से ही पूर्वोत्तर में सेना ने अपने पूरे मूवमेंट के साथ ही पडोसी म्यांमार से आने वाली ख़बरों पर पूरा ध्यान लगा दिया था. मंगलवार सुबह जिस तरह से भारतीय सेना ने म्यांमार की सेना के साथ मिलकर की गयी कार्यवाही में दो स्थानों पर कैंप लगाकर रह रहे आतंकियों पर हमला कर उन्हें भारी नुकसान पहुँचाया है उससे यह सबक मिलता है कि यदि किसी भी तरह के धार्मिक, क्षेत्रीय या जातीय आतंक के खिलाफ ऐसे ही पडोसी देशों में समन्वय किया जा सके तो आतंकियों को जड़ से उखाड़ा जा सकता है. इस पूरे प्रकरण को सिर्फ इस तरह से देखने की आवश्यकता है कि भारत की सेना ने अपने लम्बे समय से सैन्य सहयोगी रहे म्यांमार की सेना के साथ पुख्ता खबर के साथ जो कुछ भी किया वह देश की सुरक्षा के लिए बहुत ही आवश्यक था क्योंकि अभी तक भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमा के आस पास सभी पडोसी देशों में भारत विरोधी तत्व सक्रिय रहा करते हैं और सीमा पार का मामला होने के कारण भारत वहां पर कुछ बड़ा करने की स्थिति में नहीं होता है पिछले कुछ वर्षों में बांग्लादेश के सहयोग से वहां सीमा पार से होने वाले आतंक के निर्यात को रोकने में भी देश को बड़ी सफलता मिली है.
                                          भारत में लम्बे समय से विभिन्न क्षेत्रों में सीमापार से विभिन्न कारणों से सक्रिय आतंकी अपने पैर भारत में फ़ैलाने की कोशिशें किया करते हैं जिनमें सबसे अधिक समस्या पाक सीमा पर ही रहा करती है क्योंकि वहां पर सेना और सत्ता प्रतिष्ठान सदैव ही भारत विरोध पर ज़िंदा रहा करते हैं और आज आतंक का सबसे बुरा दौर देखने के बाद भी पाक उसमें बदलाव करने को राज़ी दिखाई नहीं देता है. सीमा पार इस तरह की कार्यवाही को हॉट परस्युट कहा जाता है जिसमें सम्बंधित देश की सेना को पक्की सूचना देकर इस तरह की कार्यवाही के लिए बात की जाती है उसके बाद स्वयं अपने दम पर या सम्बंधित देश की सेना के साथ मिलकर इस तरह की कार्यवाही को अंजाम दिया जाता है. जिस तरह से सूचना मिलने पर सेना ने पूरे मामले को उच्च स्तर पर डील किया उससे यही पता चलता है कि भारतीय सेना की तैयारियां सदैव ही बहुत अच्छी रहा करती हैं और सहयोगी देश के साथ मिलकर वह और भी घातक रूप से अपने किसी भी काम को अंजाम तक पहुँचाने का हौसला और दम भी रखती है. वर्तमान सेनाध्यक्ष जनरल दलबीर सिंह सुहाग ने पूर्वी कमान को लम्बे समय तक संभाला है इसलिए उनके पास वहां की हर जानकारी उपलब्ध रहती है और वे इस क्षेत्र से भी भली भांति परिचित भी हैं जिससे भी इस सटीक कार्यवाही की पटकथा लिखने में सेना ने कोई चूक नहीं की.
                                कभी सेना में रहे अब देश के सूचना प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर ने जिस तरह से इस मामले को राजनैतिक रूप से स्पष्ट किया संभवतः उसकी कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि इस तरह के अनावश्यक बयानों से कई बार भविष्य की किसी अन्य कार्यवाही पर भी बुरा असर पड़ सकता है. सेना के मिलिट्री ऑपरेशन के अतिरिक्त महानिदेशक मेजर जनरल रणबीर सिंह ने जिस तरह से बयान दिया वह अपने आप में बेहद सटीक था और उसमें भारतीय सेना की तरफ से म्यांमार की सहमति को पूरी अहमियत दी गयी थी क्योंकि वह एक तरह से प्रोफेशनल मामला था पर राठौर ने इसी मामले को ऐसा दिखाया जैसे कि भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा का उल्लंघन करते हुए यह काम किया हो ? इस तरह के मामलों में या तो सरकार की तरफ से वरिष्ठ मंत्रियों को ही बयान जारी करने के लिए अधिकृत किया जाना चाहिए या फिर उनको एक सटीक बयान देने के लिए कहा जाना चाहिए पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में हर मामले का राजनैतिक लाभ उठाने की कोशिश नेताओं को कहीं न कहीं से बड़बोला बना देती है. सेना की तरफ से आधिकारिक बयान आने के बाद रक्षा मंत्री का बयान इस पूरे मामले को अधिक गरिमा देने का काम कर सकता था क्योंकि उनका बयान सेना की मंशा के अनुरूप ही होता. फिलहाल देश की सेना ने अपने खाते में एक और सफल अभियान को जोड़ किया है पर साथ ही अब पूर्वोत्तर में सेना को अधिक सचेत रहने की आवश्यकता भी है क्योंकि आतंकी अब पलटवार करने की कोशिशें भी कर सकते हैं. 
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गुरुवार, 4 जून 2015

मोदी, इंटरनेट और गूगल

                                                     देश के सञ्चालन में भले ही कम्प्यूटर की भूमिका को १९८४ में ही राजीव गांधी द्वारा पहचान लिया गया था और सबसे पहले उन्होंने ही इस तरफ सोचते हुए देश में आईटी सेक्टर की पहुँच व्यापक बनाने के लिए इस काम करने की आधारशिला रखी थी पर जब तक उस क्षेत्र में देश पूरी प्रगति की तरफ बढ़ पाता दुर्भाग्य से वे यह सब देखने के लिए नहीं थे. उनके इस तकनीक के पक्ष और उसके बेहतर उपयोग से आगे बढ़ने की सोच पर गुजरात के सीएम रहते हुए नरेंद्र मोदी ने पूरा अमल किया और आज भी वे दुनिया के नेट पर सर्वाधिक सक्रिय नेताओं में से एक हैं पर इसके साथ ही नेट पर उनको लेकर जिस तरह की बातें मौजूद हैं उनसे पार पाना किसी के बस की बात नहीं है और आज संभवतः भारत सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती ही है क्योंकि पिछले वर्ष एक आपत्तिजनक नाम के साथ उनकी फोटो दिखाई देती थी और आज कल सबसे ताज़ा मामले में यह सामने आ रहा है कि भारत के दस शीर्ष अपराधियों के बारे में गूगल पर खोजने से उनकी तस्वीर भी सामने आती दिखाई दे रही है.
                                    गूगल भले ही दुनिया भर में अपने को सर्वश्रेष्ठ सर्च इंजन के लिए बेहतर मानता हो पर एक वर्ष में दोबारा इस तरह का मामला सामने आया है जिससे यही पता चलता है कि या तो गूगल के सिस्टम में कुछ ऐसा भी है जिसे वे चाहते हुए भी रोक नहीं पा रहा है या फिर कुछ लोग जानबूझकर कुछ विशेष हैशटैग के साथ मोदी की तस्वीरें नेट पर उपयोग में ला रहे हैं जिसके चलते ही गूगल इस तरह के परिणाम दिखा रहा है. देश के पीएम के रूप में इस तरह के हैशटैग के साथ मोदी का शीर्ष अपराधियों की सूची में ट्रेंड करना तकनीक के उस पक्ष को भी दिखाता है जिसके चलते परिणाम उलटे पुल्टे भी हो सकते हैं. निश्चित तौर पर आज भी जानकारी के लिए लोग नेट पर गूगल पर सबसे अधिक भरोसा किया करते हैं पर आज भी जिस तरह से नेट के दुरूपयोग की संभावनाओं को रोक पाने में पूरी सफलता नहीं मिल पायी है यह उसका एक और भद्दा उदाहरण ही लगता है. क्या इस तरह के ट्रेंड को रोकने के लिए गूगल के पास कोई तकनीक है या फिर वो किसी भी तरह से इस तरह की गतिविधियों के माध्यम से इन पर नज़र भी रखने में सक्षम है इसका जवाब आज किसी के पास भी नहीं है.
                                     भारत सरकार को इस मामले को सख्ती के साथ गूगल के साथ उठाना चाहिए कि मोदी के बारे में अच्छी बुरी सभी बातें नेट पर मौजूद हैं तो आखिर किस तरह से उन्हें देश के शीर्ष दस अपराधियों कि श्रेणी में दिखाया जा रहा है ? यह काम गलती से हो रहा है या फिर इसके पीछे भी देश के अंदर और बाहर बैठी हुई देश विरोधी कुछ ताकतें मिलजुल कर काम करने में लगी हुई हैं गूगल अपने विस्तार के लिए आज भारत को अलग करने करके कुछ सोचने की स्थिति में नहीं है क्योंकि इस बड़े बाज़ार के लिए ही आज दुनिया के हर क्षेत्र में बहुत मार मारी मची हुई है. सीएम के रूप में मोदी के बहुत सारे कदम विवादस्पद रहे हैं और आज भी दुनिया में बहुत सारे लोग उन्हें संदेह की दृष्टि से ही देखते हैं पर उसका  मतलब यह नहीं है कि नेट का इस तरह से सुनियोजित दुरूपयोग कर देश के पीएम कि प्रतिष्ठा को इस तरह का मसला बनाया जाए. मोदी से देश में बहुत सारे लोग आज भी सहमत नहीं है पर जब वे भारत के पीएम के रूप में दुनिया के सामने हैं तो यह देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ मामला हो जाता है. मोदी से मतभेद होने का मतलब यह नहीं कि उनके पिछले कार्यों को लेकर देश के पीएम पर इस तरह से निशाना लगाने की कोशिशें की जाएँ अब समय आ गया है कि सरकार की तरफ से गूगल को इस तरह के किसी भी दुष्प्रचार से बचने की स्पष्ट सलाह और चेतावनी दे देनी चाहिए जिससे देश के पीएम की गरिमा घटाने के किसी भी दुष्प्रचार को समय रहते ही रोका जा सके.  
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रविवार, 24 मई 2015

राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीयता

                                                          लगता है कि जनता द्वारा दिखाए जा रहे भरपूर समर्थन के बीच कुछ नेताओं द्वारा संविधान द्वारा मान्य और परंपरा के रूप में स्थापित मानकों का उल्लंघन करना एक नयी तरह की राजनीति करने की शुरुवात भर ही है. कश्मीर घाटी में अलगाववादियों के उकसावे और समर्थन के चलते भारतीय झंडे का अपमान किये जाने और पाकिस्तानी झंडे लहराने की ख़बरें तो आती ही रहती है पर कल जिस तरह से तमिलनाडु की सीएम जयललिता के दोबारा शपथ लेने के समय उनके महूर्त को सही समय से मिलाने के लिए राष्ट्रगान को ही संक्षिप्त रूप में बजाया गया उसे किस श्रेणी के राष्ट्रवाद में रखा जाना चाहिए ? राष्ट्रवाद की यह परिभाषा किसी भी तरह से सही नहीं कही जा सकती है क्योंकि जब तक पूरे देश में सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय या राज्य के सम्मान से जुड़े हुए प्रतीकों का ही अनादर रोकने के लिए कठोर प्रयास और अनुशासन का सहारा नहीं लिया जायेगा तब तक किसी भी तरह से किसी पर उंगली नहीं उठाई जा सकती है. राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े हुए मसलों पर देश को किस तरह से निपटना चाहिए संभवतः इस पर राजनैतिक कारण और तात्कालिक लालच अधिक प्रभावी हो जाते हैं.
                                                   यह सही है कि तमिलनाडु देश का एकमात्र ऐसा राज्य है जहाँ नेताओं के लिए उनके समर्थक बहुत आसानी से अपनी जान तक दे दिया करते हैं फिर उस राज्य में इस तरह की घटना के लिए किसी भी सरकारी या राजनैतिक स्तर पर कोई गंभीर प्रतिक्रिया नहीं सुनाई देना अपने आप में चिंताजनक भी है. यदि खुद जयललिता इस बात को गलत मानती हैं तो उन्हें इस पर कठोर कार्यवाही करने के बारे में सोचना चाहिए पर जिस भी अधिकारी के निर्देश पर यह काम किया गया होगा वह निश्चित तौर पर यह भी जानता होगा कि तमिलनाडु में रहकर किसी भी तरह से जया की हर बात का सम्मान करना ही पड़ता है भले ही उससे देश के सम्मान में कुछ कमी आती हो. ज्योतिष में बहुत अधिक विश्वास करने वाली जया के लिए इस बार का शपथग्रहण बहुत ही महत्वपूर्ण था और संभवतः इस पूरे कार्यक्रम को अधिकारियों के स्थान पर ज्योतिषियों के परामर्श से ही बनाया गया था क्योंकि केवल राष्ट्रगान का समय काटने के अलावा वहां पर लगभग सभी औपचारिकताएं पूरी ही की गयी थीं जिससे ऐसा भी लगता है कि देश की प्रतिक्रिया जाने के लिए संभवतः ऐसा किया गया हो ?
                                           अब जब बात बात में राष्ट्रीयता और देश भक्ति की बातें करने वाली राष्ट्रवादी भाजपा की सरकार है और राज्यसभा में उसकी कमज़ोर स्थिति के चलते वह अपने महत्वपूर्ण बिलों को पारित कराने के लिए किसी भी तरह से सरकार के अंदर और बाहर अधिक समर्थन जुटाने की कोशिशों में लगी हुई है तो उसका खोखला राष्ट्रवाद कहीं किसी कोने में पड़ा हुआ धूल खाता हुआ आसानी से देखा जा सकता है. कश्मीर घाटी में जिस तरह से लगभग हर शुक्रवार पाकिस्तानी झंडे लहराए जा रहे हैं उसके बाद भी भाजपा की तरफ से कुछ भी नहीं कहा जा रहा है जबकि विपक्ष में होने पर वह अलगाववादियों के बयानों पर ही बहुत हो हल्ला मचाया करती थी ? यदि राष्ट्रगान सम्बंधित यह घटना यूपी, बिहार या बंगाल में हुई होती तो भाजपा के संबित पात्रा जैसे पता नहीं कितने प्रवक्ताओं की फ़ौज़ इस बात को उखाड़ने में लगी रहती और उन पर सीधे तौर पर देश द्रोही होने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकती ? इस बार भाजपा और मोदी को दक्षिण में अम्मा की ठीक वैसी ही ज़रूरत है जैसे कि उत्तर में मुफ़्ती की इसलिए कश्मीर या तमिलनाडु में जो कुछ भी हो रहा है उसमें भाजपा के स्वार्थ और दोहरे रवैये के कारण भारतीय सम्मान को रोज़ ही कहीं किनारे रखा जा रहा है और जनता पीएम के उस नारे को याद कर रही है कि "देश नहीं झुकने दूंगा" ??? 
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शनिवार, 23 मई 2015

राष्ट्रवाद से खोखले राष्ट्रवाद तक ?

                                                     आने वाले समय में देश के पुराने पड़ चुके कर ढांचे को सुधारने के लिए संप्रग सरकार द्वारा प्रस्तावित किये गए जीएसटी बिल का देश में यदि किसी सीएम और राज्य ने घोर विरोध किया था तो वह गुजरात के तत्कालीन सीएम और गुजरात सरकार ही थी पर अब जब खुद मोदी सीएम से आगे बढ़कर पीएम की कुर्सी पर पहुँच चुके हैं तो उन्हें भी देश की वास्तविकता का अंदाज़ा हो रहा है और अब पीएम के तौर पर उन्हें मनमोहन सरकार की जीएसटी नीति बहुत लाभ का सौदा लगने लगी है जो कभी बहुत ही बेकार नीति हुआ करती थी? अपने को राष्ट्रवादी कहलवाना पसंद करने वाले पीएम मोदी और उनकी पार्टी भाजपा जिस तरह से आज लगभग रोज़ ही नीतिगत मामलों में अनावश्यक राजनीति करने की स्थिति से दो चार हो रहे हैं उससे उनकी खोखले राष्ट्रवाद की नीतियों पर से ही पर्दा उठ रहा है. एक अर्थशास्त्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने जो भी नीतियां बनायीं या प्रस्तावित की थीं आज उनको आगे बढ़ाना मोदी सरकार की मजबूरी ही है क्योंकि उनके पास अपनी आर्थिक नीति है ही नहीं तथा जिस तरह से केंद्रीय स्तर पर सीएम के रूप मोदी ने पहले मनमोहन की नीतियों का लाभ गुजरात में उठाना शुरू किया पर राष्ट्रीय स्तर पर वे अन्य राज्यों के साथ सदैव ही केवल राजनैतिक कारणों से उन नीतियों का विरोध करते रहे थे उसे किस तरह के राष्ट्रवाद की श्रेणी में रखा जा सकता है ?
                                   बेशक मोदी आज मनमोहन सरकार की ही महत्वपूर्ण नीतियों को आगे बढ़ाने का काम करने में लगे हुए हैं पर उनके और उनके मंत्रियों के बड़बोलेपन के कारण ही आज विपक्ष उन्हें और पार्टी को कई बार कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकता है तथा इस स्थिति में ये लोग अपना किसी भी स्तर पर बचाव नहीं कर पाते हैं क्योंकि वे उस समय पूरी तरह से गलत थे. जीएसटी मामले में जिस तरह से इस मामले पर विचार करने के लिए हुई सेलेक्ट कमिटी की बैठक में कांग्रेस और अन्य दलों ने गुजरात सरकार से उनके विरोध के बारे में जानने के साथ ही अन्य राज्यों के विरोध का कारण जानने के लिये उन्हें बुलाने पर निर्णय लिया है वह भाजपा के लिए और भी असहज करने वाली स्थिति होने वाली है. पीएम के तौर पर मोदी को अब सदन में यह स्पष्ट करना भी पड़ सकता है कि उनके सीएम रहते यह मामला किस तरह से गलत था और अब पीएम बनते ही वह अचानक से सही कैसे हो गया है. यह ऐसा मुद्दा है जिस पर विपक्ष सदन के अंदर भी मोदी को राष्ट्रवादी होने के मामले पर घेरने का काम कर सकता है. सेलेक्ट कमिटी अपने आप में पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से फैसला लेकर सरकार के सामने रिपोर्ट रख सकती है.
                                    आज इस तरह के कई निर्णय आज सामने आ रहे हैं जिनमें मनमोहन सरकार की अच्छी नीतियों और प्रस्तावों पर भी भाजपा ने केवल घटिया राजनीति ही की जबकि उसे पता था कि सरकार के पास बहुमत नहीं है. तब सदन में संख्या बल पर दूसरे स्थान पर होने के कारण क्या भाजपा का देश के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं था जिसको विचार कर वह इस तरह के दीर्घावधि में लाभ देने वाले मुद्दों पर समर्थन करने के बारे में सोचना शुरू करती ? इस मामले में भाजपा की सोच उसके वक्तव्यों से सदैव ही कम राष्ट्रवादी रही है क्योंकि वह राष्ट्रवाद और संस्कृति का ढिंढोरा पीटने से नहीं चूकती है और जब कुछ करने का समय आता है तो वह अचानक से घटिया राजनीति करने की अपनी मानसिकता से बाहर नहीं आ पाती है. आज यदि देश के सामने एक बार फिर से कुछ मुद्दों पर सहमति बनाने की बनाने की बातें की जा रही हैं तो उनके पीछे अब भाजपा की अपनी राजनीति ही है क्योंकि अब वह और पीएम मोदी यह दिखाना चाहते हैं कि किस तरह से वे देशहित में जुटे हुए हैं ? देश का संविधान जब हर दल को अपनी राजनीति चमकाने के भरपूर अवसर देता ही रहता है तो इस तरह से देशहित के मुद्दों पर किसी भी दल के द्वारा की जाने वाली राजनीति पर उसे दण्डित करने का प्रावधान भी होना चाहिए जिससे किसी भी दल के नेता या दल अपनी मनमानी न कर सकें.     
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गुरुवार, 21 मई 2015

दिल्ली की राह

                                                         किस तरह से केवल किसी चुनावी वायदे को पूरा करने के लिए ही आधे अधूरे राज्य को बनाना किसी राजनैतिक दल को कितना भारी पड़ सकता है यह बात अब केजरीवाल सरकार और मोदी सरकार दोनों को ही समझ में आने लगी है क्योंकि संभवतः यह पहली बार हुआ है कि दिल्ली की सरकार किसी विपरीत ध्रुव की राजनीति करने वाले केजरीवाल जैसे नेता के हाथों में है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले दुसरे दल की केंद्रीय सरकार के साथ दिल्ली सरकार का सामंजस्य और मतभेद न रहा हो पर इस बार यह पूरे देश में चिंता के साथ हास-परिहास का मसला भी बनता जा रहा है जो किसी भी तरह से देश के लोकतंत्र के लिए सही नहीं कहा जा सकता है. केंद्र में जहाँ पूरे देश से स्पष्ट बहुमत प्राप्त मोदी सरकार है वहीं दिल्ली में एक तरफ़ा बहुमत वाली केजरीवाल सरकार सत्ता में बैठी है दोनों ही परिस्थितियों में फैसला देश की जनता का ही है जहाँ उसे जो सही लगा उसने वही किया है पर अधिकारों के अस्पष्ट होने और महत्वाकांक्षाओं के चलते जिस तरह से केजरीवाल और नजीब जंग के बीच तलवारें खिंची हुई हैं उससे दिल्ली के अधिकारी पूरी तरह से भ्रमित हो गए हैं.
                                आज की स्थिति में चाहे आप या भाजपा किसी को भी अपनी बातों के लिए संविधान विशेषज्ञों का समर्थन मिल जाये और किसी एक को गलत तथा दूसरे को सही साबित कर दिया जाये पर इससे दिल्ली की किस्मत नहीं बदल सकती है. जिस तरह से केजरीवाल ने भी मोदी की तरह बहुत बड़े बड़े वायदे किये हुए हैं ऐसी परिस्थिति में उनके लिए उन पर अमल करना बहुत मुश्किल होने वाला है. दिल्ली जैसे संवैधानिक रूप से अध-कचरे राज्य को बनाने का श्रेय भाजपा को ही जाता है क्योंकि दिल्ली को राज्य बनाया जाना उसके चुनावी एजेंडे में ही था यह अलग बात है कि उसे आज तक इस राज्य को बनाये जाने का समुचित राजनैतिक लाभ नहीं मिल पाया है. पहले दिल्ली की कमान उस पीढ़ी के नेताओं के हाथों में रही है जिन्होंने अपनि ज़िंदगी में राजनीति के उतार चढाव बहुत बार देखे थे पर केजरीवाल के हाथों में यह सब अचानक से ही आया है तो उनके पास करने के लिए क्या बचा हुआ है यह किसी को नहीं दिखाई दे रहा है. अनावश्यक उलझाव से पूरा प्रशासनिक तंत्र ही ठहर जाने वाला है और उसका किसी को लाभ तो नहीं मिलेगा पर जनता के सामान्य कामकाज पर विपरीत असर दिखाई देने लगेगा.
                               देश में सरकार चाहे जिस भी दल  की ही पर प्रशासन नौकरशाही के हाथों में ही रहा करता है जब उनके वरिष्ठ अधिकारियों को राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और अधिकारों की लड़ाई में मोहरा बनाया जाने लगेगा तो आखिर सरकार किस तरह से काम कर पायेगी ? आज हर बात में दूसरे को गलत साबित करने लगे हुए केजरीवाल के लिए भी यह संक्रमण का काल ही है क्योंकि जब तक उनको सरकार चलानी है उन्हें आज की इसी व्यवस्था के साथ अपने को ढालना पड़ेगा पर किसी भी तरह से केवल दूसरे दल को सदैव ही घटिया और भ्रष्ट साबित करने की कोशिश आखिर किस तरह से सफल हो पायेगी इस बात का खुद आप के पास कोई जवाब नहीं है. इस तरह के अनावश्यक संघर्ष जिससे सरकार की गति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है उससे केजरीवाल को पूरी तरह से बचना ही होगा क्योंकि यदि उनको देश में राजनैतिक बदलाव के लिए खुद की कोशिश के साथ अन्य दलों को भी उसके लिए दबाव में लेना है तो उन्हें फिलहाल आज की व्यवस्था से ही काम चलाना होगा. तेज़ी से बदलाव के चक्कर में केजरीवाल की पूर्ण बहुमत की सरकार यदि केंद्र से इस तरह के मसलों में उलझती रहती है तो वह दिल्ली की जनता के लिए किसी भी तरह से अच्छा साबित नहीं होने वाला है.     
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शनिवार, 16 मई 2015

मर्यादाएं और राजनैतिक मतभेद

                                                       सोशल मीडिया के आने के बाद से जहाँ आम और ख़ास लोगों को अभिव्यक्ति की आपार स्वतंत्रता मिल गयी है वहीं दूसरी तरफ कुछ लोगों द्वारा जिस तरह से अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के लिए टिप्पणियां करते समय हर मर्यादा का खुला उल्लंघन भी किया जा रहा है उसे कसीभी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है. आज सबसे चिंता की बात यह है कि इस मानसिकता को सोशल मीडिया पर रोकने में सभी लोग पूरी तरह से अभी तक असफल ही साबित हुए हैं क्योंकि जिस तरह से सभी राजनैतिक दल अपने निचले स्तर के नेताओं को इस तरह की बातों के लिए खुली छूट देते रहते हैं उसे किसी भी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता है. एक मामले में हिमाचल में मुख्य संसदीय सचिव (शिक्षा) और सीएम वीरभद्र सिंह के करीबी विधायक नीरज भारती ने विपक्षी भाजपा के नेताओं पर टिप्पणियां करते समय फेसबुक पर लम्बे समय से मर्यादाओं की सारी सीमायें पार कर रखी हैं उससे यही साबित होता है कि कहीं न कहीं खुद सीएम की तरफ से भी उनकी इस बात के लिए अनदेखी की जा रही है जो कि सभ्य और लोकतान्त्रिक मूल्यों में किसी भी तरह से बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है क्योंकि किसी का भी राजनैतिक प्रतिद्वंदी होने का यह मतलब नहीं हो सकता है कि उसे कुछ भी कहने का हक़ किसी को मिल जाता है.
                                   किसी भी व्यक्ति से वैचारिक, राजनैतिक, क्षेत्रीय, व्यक्तिगत, सामाजिक मतभेद किसी के भी हो सकते हैं पर देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर क्या किसी को भी कुछ भी कहने की छूट मिली हुई है ? सरकार चला रहे नेता सदैव ही विपक्षियों के निशाने पर रहा करते हैं और कई बार चुटीले अंदाज़ में राजनेता तीखी टिप्पणियां भी करने से नहीं चूकते हैं पर उसमें हास्य व्यंग का समावेश हुआ करता है और प्रतिद्वंदी भी उसी अंदाज़ में कुछ हल्का फुल्का कहने में नहीं चूका करते हैं. पर पिछले कुछ वर्षों में यह स्थिति पूरी तरह से बदलती हुई नज़र आ रही है और नयी पीढ़ी के नेता जिस तरह से दूसरों पर बेहद निजी हमले करने में मर्यादाओं की सारी सीमाएँ तोड़ने पर आमादा दिखाई देने लगे हैं उससे कुछ भी हासिल नहीं हो सकता है. सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह भी है कि ऐसे विवादित लोगों को सरकारों में महत्वपूर्ण पद भी दिए जाने लगे हैं जिससे भी नयी पीढ़ी के नेताओं को यह लगने लगा है कि वे भी कहीं न कहीं से इस तरह के छोटे मार्ग आर चलकर अपनी राजनीति को आसानी से आगे बढ़ा सकते हैं.
                                अब समय आ गया है कि सभी राजनैतिक दलों के वरिष्ठ नेताओं को अपने निचले स्तर के नेताओं तक यह सन्देश भेजना ही चाहिए जिसमें उन्हें यह स्पष्ट किया जाए कि राजनैतिक प्रतिद्वंदिता में व्यक्तिगत हमलों की कोई जगह नहीं हो सकती है और मर्यादाओं को लांघने वालों को कुछ समय तक पार्टी और सरकार में कोई स्थान नहीं दिया जायेगा तथा उन्हें महत्वपूर्ण संसदीय समितियों में भी कोई स्थान नहीं दिया जायेगा. इस मामले पर एक दूसरे की तरफ ताकने के स्थान पर किसी के दल को ही इस गंदगी को साफ़ करने के लिए आगे आना पड़ेगा जिससे दूसरे दलों पर भी यह दबाव बनाया जा सके कि उनको भी इस तरह की गतिविधियों में निरंतर लगे रहने वाले लोगों को रोकने की दिशा में काम करने के लिए मजबूर या प्रेरित किया जा सके. यह शुरुवात किसी न किसी को तो करनी है और यह भी स्पष्ट है कि अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी एक मामले में याची को इस बात के निर्देश दिए थे कि कोई भी व्यक्ति अपनी याचिका में नेताओं के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग नहीं कर सकता है क्योंकि नेता और संसद भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली में जनता द्वारा चुने गए और सर्वोपरि हैं. इस मामले में खुद कांग्रेस को उच्च स्तर से यह सन्देश देना चाहिए कि किसी भी कैडर का कोई भी नेता इस तरह के बयान जारी नहीं कर सकता है जो निजी और मर्यादाओं के उल्लंघन की सीमा तक जाते हों.       
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सोमवार, 20 अप्रैल 2015

पाक सीमा पर चौकसी

                                      गृह मंत्रालय ने पाकिस्तान की तरफ से लगातार होने वाली घुसपैठों और सीमा पर समाज विरोधी तत्वों और अपराधियों के सांठगांठ से अशांति फ़ैलाने के प्रयासों को रोकने के लिए जिस तरह से सुरक्षा का दूसरा घेरा बनाने पर विचार कर सैद्धांतिक रूप से अपनी सहमति जता दी है वह निश्चित तौर पर भविष्य में पाक की तरफ से होने वाली घुसपैठ को कम करने में बहुत सहायक साबित होने वाली है. अस्सी के दशक में अशांत पंजाब में पाक के दखल को रोकने के लिए जिस तरह से सरकार ने सीमा पर कांटेदार बाड़ लगाने के काम पर विचार कर उसे शुरू किया था उसके बहुत ही अच्छे परिणाम सामने आये उसके बाद ही इस बात पर विचार करते हुए इसे जम्मू कश्मीर की अंतर्राष्ट्रीय सीमा और वास्तविक नियंत्रण रेखा के साथ ही राजस्थान और गुजरात में इस प्रयोग को दोहराया गया. इस पूरी कवायद में जहाँ लम्बा समय और धन खर्च होना था उससे सबसे बड़ा लाभ यह भी हुआ कि सीमा पार से आतंकियों और भारत विरोधी गतिविधियों में लगे हुए लोगों के लिए अपने काम को अंजाम देना उतना आसान भी नहीं रह गया.
                      पाक के साथ लगती हुई जम्मू कश्मीर की पूरी सीमा सदैव ही सुरक्षा बलों और सरकार के लिए बड़ी चुनौती के रूप में लगातार सामने आती रही है हालाँकि बाड़ लगाने के बाद जिस स्तर पर घुसपैठ कम हुई वह वास्तव में अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि थी पर अब भी अन्दर तक आ जाने वाले इन असामाजिक तत्वों से निपटने के लिए सीमा सुरक्षा बल को बहुत सारी अन्य समस्याओं का सामना भी लगाता करना पड़ता है. सरकार ने जम्मू क्षेत्र में लगातार हुए दो हमलों के बाद इस स्थिति की समीक्षा करने के साथ ही यह देखा कि सीमा सुरक्षा बल अपने काम को सही तरीके से अंजाम देने में लगी हुई है पर उसे जिस तरह का समर्थन सीमा के अंदर के क्षेत्रों में मिलना चाहिए वह राज्य की पुलिस और सेना से नहीं मिल पाता है जिसके बाद ही यह तय किया गया है कि इस सीमा पर कश्मीर घाटी और लद्दाख को जोड़ने वाली महत्वपूर्ण सड़क होने के चलते अब इसकी समुचित सुरक्षा के बारे में फिर से विचार किया जाये. अब सरकार ने यहाँ पर सीमा पर रहने वाले पहले घेरे के अलावा जम्मू कश्मीर पुलिस और सेना की मिली जुली व्यवस्था से इस दूसरे घेरे को संचालित करने का काम प्रस्तावित किया है.
                       अपने आप में यह एक आदर्श स्थिति ही होने वाली है जब सीमा के नज़दीक इस तरह से दोहरा सुरक्षा चक्र उपलब्ध हो जायेगा क्योंकि इससे जहाँ किसी भी तरह से सीमा में घुस आये लोगों पर प्रभावी नियंत्रण करने में मदद मिलेगी वहीं सुरक्षा बलों का मनोबल बढ़ने के साथ आम लोगों के लिए बेहतर स्थितियों को बनाया जा सकेगा. सीमा पर किसी भी तरह के नए प्रयोग से जहाँ आने वाले समय की चुनौतियों से निपटने में मदद मिलने वाली है वहीं सरकार के लिए इन क्षेत्रों में आतंकियों की घुसपैठ को पूरी तरह नियंत्रित किये जाने में और भी प्रभावी सफलता मिल सकती है. बेहतर हो कि इन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की भी नागरिक सुरक्षा समितियों में भागीदारी करवाई जाये क्योंकि एक समय में कश्मीर क्षेत्र में ग्रामीण सुरक्षा समितियों ने प्रभावी ढंग से काम करते हुए पूरे परिदृश्य को बदलने का काम किया था. इससे जहाँ आम लोगों का स्थानीय सुरक्षा से सीधा जुड़ाव हो जायेगा वहीं उनको सीमा पार से आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए पहले से ही तैयार किया जा सकेगा अब यह समय की मांग हो चुकी है कि हर तरह से सीमा के इस पूरे परिदृश्य को बदलने के लिए सही तरह से किये जाने वाले इन प्रयासों पर केंद्र सरकार पूरी तरह से आगे बढ़ने के बारे में सोचे.       
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सोमवार, 6 अप्रैल 2015

चीन-लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश

                                               भारत में चाहे किसी भी दल की सरकार क्यों न हो पर चीन-भारत की अस्पष्ट वास्तविक नियंत्रण रेखा के सम्मान से सदैव ही मुकरता रहता है जिससे इस शांत रहने वाली सीमा पर कई बार तनाव की घटनाएँ भी सामने आती रहती हैं. भारत और चीन के बीच जिस तरह से चीनी कब्ज़े से पहले तिब्बत एक बफर स्टेट के रूप में काम किया करता था आज वही समस्या देश के लिए बहुत बड़ी होती जा रही है. चीन की विस्तारवादी नीतियों से पूरी दुनिया परिचित है और लद्दाख के साथ ही अरुणाचल प्रदेश के बड़े भूभाग पर विवाद खड़े कर चीन इसे एक मुद्दा बनाये रखना चाहता है जिससे भविष्य में किसी भी परिस्थति के लिए वह अपनी बात को दुनिया के सामने रखने की स्थिति में बना रह सके. हिमालय के इस क्षेत्र में आज तक खनिज और अन्य भूगर्भीय पदार्थों के साथ तेल आदि की खोज भी नहीं की गयी है क्योंकि अभी इन कठिन क्षेत्रों तक पहुंचना ही अपने आप में बड़ी समस्या रहा है पर आने वाले दशकों में इस बात की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस क्षेत्र में भूगर्भीय सम्पदा नहीं होगी.
                         चीन इस क्षेत्र पर अपने कब्ज़े को दिखाकर उस संभावित परिदृश्य के लिए भी अपने को तैयार रखना चाहता है जिससे किसी समय भारत के साथ वह इस क्षेत्र की प्राकृतिक सम्पदाओं पर अपना अधिकार भी जमा सके. आज जिस विपरीत परिस्थिति में दोनों देशों के सैनिक इन क्षेत्रों में अपने अपने देश की सीमाओं तक गश्त करते रहते हैं तो उस परिस्थिति में उनका कई बार आमना सामना होता ही रहता है पर पाक से लगती हुई सीमा के मुकाबले इस सीमा पर किसी भी तरह का सक्रिय संघर्ष अब देखने को नहीं मिलता है जहाँ से पाक कश्मीर में गड़बड़ी करने के लिए आतंकियों की घुसपैठ का पूरा समर्थन किया करता है. इस बार मार्च में की गयी घुसपैठ में चीनी सैनिक ओल्ड पेट्रोल पॉइंट तक पहुँच गए उससे उनकी मंशा का ही पता चलता है क्योंकि एक तरफ चीन भारत के साथ हर स्तर पर व्यापर करने का इच्छुक दिखाई देता है तो वहीं दूसरी तरफ वह इस तरह की हरकतों से बाज़ नहीं आता है. उसकी मंशा को इस बात से आसानी से समझा जा सकता है कि पिछले वर्ष चीनी राष्ट्रपति के भारत दौरे के समय भी डैमचुक इलाके में चीन ने बड़े पैमाने पर सीमा का उल्लंघन किया था और संभवतः अब चीन पीएम मोदी की भविष्य की चीन यात्रा से पहले ऐसा कदम उठकर भारत को रक्षात्मक करना चाहता है.
                          पिछले वर्ष चुनावी सभाओं में जिस तरह से वर्तमान पीएम संप्रग सरकार पर कमज़ोर होने के आरोप लगाया करते थे आज क्या वे उस बात की गलती को स्वीकर करेंगें ? पिछले वर्ष आम चुनावों में यह अपने आप में बहुत बड़ा मुद्दा था कि आखिर चीन हमारी सीमाओं के अंदर तक आ रहा है पर सरकार क्या कर रही है पर आज इन मज़बूत नेताओं के सत्ता में होने के समय आखिर चीन इस तरह की हरकतें क्यों कर रहा है यह बताने के लिए सरकार और भाजपा प्रवक्ताओं में से कोई भी बोलता नज़र नहीं आता है ? यह बात सरकार को देश के सामने रखनी ही होगी कि क्या संप्रग सरकार इस मुद्दे पर कमज़ोरी के साथ काम करती थी और उस सरकार से राजग सरकार किस तरह से भिन्न है क्योंकि चीन को पीएम के सीमा रेखा के सम्मान करने के स्पष्ट सन्देश देने के बाद भी चीन की हरकतों पर कोई लगाम नहीं लग रही है ? यह बात आज देश भी जानना चाहता है कि उन चुनावी वायदों का क्या हुआ जो पिछली सरकार को चीन के संदर्भ में भाजपा के नेता चीख चीख कर किया करते थे क्या मज़बूत सरकार होना भी चीन और पाकिस्तान के सन्दर्भ में एक जुमला मात्र ही था क्योंकि खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कई महत्वपूर्ण वायदों के लिए चुनावी जुमला जैसे शब्द का इस्तेमाल कर चुके हैं ?    
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शनिवार, 7 मार्च 2015

भारत-श्रीलंका सम्बन्ध

                                                     लम्बे समय बाद किसी भारतीय पीएम की श्रीलंका यात्रा के लिए जिस स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं उससे यही लगता है कि यदि तमिलनाडु के राजनैतिक दल अनावश्यक रूप से तमिल राजनीति करना बंद कर दें तो श्रीलंका के साथ भारत के तमिलों के लिये भी इस क्षेत्र में ज़िंदगी आसान हो सकती है. श्रीलंका में तमिलों और सिंहलियों के बीच का विवाद काफी पुराना है और यह चाहे अनचाहे भारतीय राजनीति को भी प्रभावित करता ही रहता है तो इससे निपटने के लिए दोनों देशों की सरकारों को अपनी तमिल प्रांतीय सरकारों के साथ बातचीत कर के मुद्दों के स्थायी समाधान की तरफ बढ़ने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि उसके बिना तमिल राजनीति में अनावश्यक रूप से समस्यायें सामने आती ही रहने वाली है. श्रीलंका के पीएम रानिल विक्रमसिंघे ने जिस भारत और तमिलों के मुद्दे पर स्पष्ट रूप से अपनी राय दी है उससे यही लगता है कि भारतीय राजनयिकों को पीएम मोदी की आगामी यात्रा के लिए और भी अधिक मेहनत करने की आवश्यकता है क्योंकि आज भी भारत को श्रीलंका के सिंहलियों में संदेह की दृष्टि से देखा जाता है.
                                        भारतीय मछुवारों द्वारा जल क्षेत्र का उल्लंघन करने के सन्दर्भ में रानिल के गोली मारने के बयान पर चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह जल क्षेत्र एक तरह से विवाद का विषय बना हुआ है और वहां पर जाफना के मछुवारों को मछली पकड़ने की अनुमति नहीं है जिससे भी भारतीय मछुवारे वहां तक पहुँच जाया करते हैं. अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार श्रीलंका से सम्बन्ध सुधारने के लिए अब भारत को तमिलनाडु की राजनीति को भी सही तरह से साधना ही होगा क्योंकि अधिकांश मामलों में वहां की राजनीति ही कई बार विदेश नीति को प्रभावित करने लगती है. अब जब केंद्र सरकार को किसी भी तमिल पार्टी के समर्थन की आवश्यकता नहीं है तो उसे इस मामले पर कड़ा सन्देश जारी करते हुए तमिलनाडु की राजनीति को विदेश नीति से बाहर करने का काम करना ही होगा क्योंकि जब तक भारतीय तमिल पार्टियां देश के विदेशी मामलों में दखल देती  रहेंगीं तब तक स्थिति को सही नहीं किया जा सकता है. दोनों देशों के सम्बन्ध प्राचीन काल से ही रहे हैं और आज हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभुत्व के साथ क्षेत्रीय संतुलन बनाये रखने के लिए इनको आगे बढ़ाने की भी ज़रुरत दिखाई दे रही है.
                                 रानिल ने एक बात और भी स्पष्ट कर दी है जो भारत के लिए महत्वपूर्ण होने के साथ चिंताजनक भी है कि भारत और चीन के साथ श्रीलंका के संबंधों को एक ही तरह से नहीं आँका जाना चाहिए क्योंकि दोनों ही संबंधों की परिस्थितियों में बहुत अंतर है. भारत में श्रीलंका में चीन की उपस्थिति शुरू से ही बड़ा मुद्दा रहा है और इस बात के लिए पिछली यूपीए सरकार को आलोचना का शिकार भी होना पड़ता था कि चीन किस तरह से पाक के बाद श्रीलंका और मालदीव में अपनी उपस्थिति को बढ़ाता ही चला जा रहा है. द्विपक्षीय संबंधों को आक्रामक तरीके से नहीं निपटाया जा सकता है क्योंकि हर देश को अपने हितों के बारे में सोचने और उन्हें सुरक्षित रखने का पूरा अधिकार है पर भारत में यह बिना बात के ही एक मुद्दा बनकर सामने आ जाता है. हमें इस बात को इस तरह से समझना चाहिए कि हमारे सम्बन्ध शीतकाल में अमेरिका और सोवियत संघ दोनों से ही बने रहे थे और दोनों पक्षों के साथ हमने बेहतर तालमेल करने की पूरी कोशिशें भी की थीं जिनमें अधिकांश सफल भी कही जा सकती हैं. हमें अपने संबंधों को किसी अन्य देश के साथ श्रीलंका के सम्बद्न्हों के पलड़े पर नहीं तौलना चाहिए और आज जो अच्छा माहौल सामने आया है उस पर विश्वास पूर्वक आगे बढ़ना चाहिए.  
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बुधवार, 7 जनवरी 2015

पाक सीमा और नागरिक

                                      वैसे तो पाकिस्तान से लगी हुई अंतर्राष्ट्रीय सीमा और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति आम तौर पर कभी भी नहीं रहा करती है पर इस बार जिस तरह से पाक ने सामान्य गोलाबारी करने की जगह इसका रुख नागरिक इलाकों की तरफ मोड़ दिया है वह वास्तव में चिंता का विषय है. सेना और सीमा सुरक्षा बल के जवान इस तरह की परिस्थिति से निपटने और पाक के मन्सूबों से पूरी तरह से वाकिफ हैं तो उनके लिए इससे बचना आसान है पर जब बात नागरिक इलाकों तक पहुँचती है तो नागरिक प्रशासन के लिए काम करना बहुत कठिन हो जाता है. पाक की तरफ से आज भारत पर भी आरोप लगाये जा रहे हैं कि इन हमलों में उसके तरफ के नागरिक भी हताहत हो रहे हैं तो इस परिस्थिति में सीमा पर शांति किस तरह से बनायीं रखी जा सकती है. बीएसएफ के महानिदेशक का यह कहना चिंताजनक भी है कि सामान्य बैठक में पाक के रेंजर्स ने इस तरह की गोलाबारी का विरोध पत्र लेने से भी मना कर दिया और उलटे भारत पर भी इसी तरह के आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं.
                                     असामान्य संबंधों वाले पड़ोसियों के बीच इस तरह की संभावनाएं सदैव ही बनी रहती है जिसमें एक दूसरे का ध्यान बँटाने के लिए सीधे हमलों के साथ रिहायशी इलाकों पर भी कई बार हमले किये जाते हैं पर इसका उन सामान्य नागरिकों पर कितना बुरा असर पड़ता है यह सम्बंधित देश कभी भी नहीं देखना चाहते हैं. पाकिस्तान के लिए भारत का हर स्तर पर विरोध और जिहाद के नाम पर चरमपंथियों की सहायता करना मजबूरी भी है क्योंकि इन मुद्दों से ध्यान बंटने पर पाक जनता अपनी बदहाली का रोना नहीं रो पाती है और सेना तथा सरकार चला रहे दलों के लिए भी आसानी रहा करती है. युद्ध के समय हर तरह के हथकंडों को अपना कर किसी भी तरह से जीत या दुश्मन को नीचा दिखाने की कोशिश हर देश किया करता है पर शांति के समय इस तरह के छद्म युद्ध से दोनों ही देशों को कुछ भी हासिल नहीं होता है और परिस्थितियां बिगड़ती ही चली जाती है.आज जम्मू क्षेत्र में सीमा से ६ किमी अंदर तक के नागरिक पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं जो कि देश के अन्य भागों में रहने वालों के लिए कोई मुद्दा ही नहीं है.
                                    यह भी पूरी तरह से स्पष्ट है कि पाक जैसे पडोसी से निपटना आसान नहीं है क्योंकि उसके पास खोने के लिए कुछ ख़ास नहीं है पर भारत में सरकार बदलने के बाद इसे पहले से आक्रामक सरकार साबित करने के लिए ही वह ऐसे कदम उठा रहा है जिससे पूरी दुनिया के भारत में निवेश के इच्छुक लोगों में वह यह संदेश फैला सके कि देश की सीमा पर सब कुछ सामान्य नहीं है और आने वाले समय में युद्ध जैसी स्थिति भी बन सकती है. चुनावों से पहले पाक से निपट लेने की हुंकार भरने वाले नेताओं के बयानों के चलते भारतीय सेना ने नए आदेशों के तहत भी कुछ आक्रामकता दिखाई थी पर अब गृह मंत्री खुद यह कह रहे हैं कि सेना को पूरी तरह से संयम बरतने के लिए कहा गया है और अनावश्यक उलझाव काम करने की कोशिश भी की जा रही है. बयानबाज़ी और सरकार के सामने आने वाली चुनौतियों में बहुत अंतर होता है इसीलिये चुनावी रैली में पाक से निपट लेने की बातें करने वाले सरकार के दूसरे नंबर के मंत्री भी संयम का राग अलापते नज़र आते हैं. पाक कभी भी न सुधरने वालों में से है इसलिए अब सरकार को सीमावर्ती क्षेत्रों में रिहायशी इलाकों को फिर से सुरक्षित करने की किसी योजना पर काम करने की अधिक ज़रुरत है.       
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रविवार, 20 जुलाई 2014

चीन सीमा पर घुसपैठ

                                                                   चीन से लगती हुई भारतीय सीमा में अचानक से ही लद्दाख, उत्तराखंड से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक जिस तरह से घुसपैठ की घटनाओं में वृद्धि हुई है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में इस बात पर चीन की तरफ से ऐसा ही रुख अपनाया जाता रहेगा. चीन भारत का ऐसा पडोसी है जो पाकिस्तान की तरह हर समय एक सीमा तक आक्रामक तो रहता है पर उसके साथ हर विवाद कुछ दिनों तक सुर्ख़ियों में रहने के बाद कुछ समय के लिए ठंडा पड़ जाने देता है. भारतीय पक्ष के लिए सबसे कठिन काम यह है कि चीन की तरफ से तिब्बत वाले क्षेत्र से उसके लिए भारतीय सीमा का अतिक्रमण करना आसान है जबकि भारतीय क्षेत्र से इन स्थानों तक पहुंचना आज भी बहुत ही मुश्किल है. हालांकि चीन की तरफ से आसन्न इस खतरे को भांपते हुए पिछले कुछ वर्षों से भारत ने अपने रुख में बदलाव करते हुए इन सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी पहुँच को बढ़ाना शुरू किया है जिसे जानकर भी चीनी घुसपैठ और अधिक होती जा रही है.
                                                  ऐसा नहीं है कि चीन का केवल भारत के साथ ही इस तरह का विवाद चल रहा है वह अपने सभी पड़ोसियों के साथ किसी न किसी स्तर पर सीमा विवाद को ज़िंदा रखे हुए है पर कहीं भी वह इस मुद्दे पर बहुत आक्रामक नहीं दिखाई देता है और इन विवादों को बनाये रखने के लिए इस तरह कि हरकतें एक नीति के तहत ही करता रहता है. भारत की तरफ से जो भी प्रयास शुरू किये गए हैं उनको देखते हुए अब सीमा पर चौकसी बढ़ाये जाने के साथ पूरे सुरक्षा परिवेश को बेहतर बनाये जाने के लिए शुरू किये गए महत्वपूर्ण कामों को समयबद्ध तरीके से पूर्ण करने के साथ अपनी सीमाओं को मज़बूत किया जा सकता है. आज भी लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के साथ अरुणाचल प्रदेश के साथ लगती दुर्गम सीमा तक पहुँच पाना भारत के लिए कठिन है क्योंकि अधिकांश पहाड़ी ज़िलों में वर्षा के कारण हर वर्ष ही सड़कों के नेटवर्क को बहुत नुकसान पहुँचता रहता है और पूरे वर्ष तक कामकर पाने की स्थितियां न होने के कारण काम में तेज़ी भी नहीं आ पाती है.
                                 अब इस मुद्दे पर कांग्रेस को हर बार घेरने वाली भाजपा सरकार बना चुकी है और उसने अपने चुनावी अभियान में कुछ इस तरह का अतिवादी माहौल बना दिया था कि जैसे उसके सत्ता सँभालते ही पाक और चीन एकदम से सीधे हो जायेंगें तो अब उसके पास भी कहने के लिए कुछ भी शेष नहीं है. सीमा और सुरक्षा का मामला ऐसा है कि इस पर देश के राजनेताओं को किसी भी तरह की राजनीति करने से बचना चाहिए पर इस बार के चुनावों में पूरी भाजपा ने मोदी के अतिवादी रुख पर चलते हुए अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर जमकर राजनीति की और यह उन्हें भी पता है कि सीमा पार से होने वाली इन गतिविधियों को रोक पाना इतना आसान भी नहीं है. अच्छा है कि सीमित संख्या में सिमटे हुए विपक्ष ने भाजपा की तरह इस मुद्दे पर घटिया राजनीति की शुरुवात नहीं की है वर्ना अनावश्यक रूप से देश में इस मुद्दे पर आक्रोश बढ़ सकता है. आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी देश के राजनैतिक चरित्र में उन गुणों का समावेश नहीं हो पाया है जो देश के हितों को दलीय राजनीति से दूर रखकर सोच सकें जो कि बहुत बड़ा दुर्भाग्य ही है.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...