मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Saturday, 23 May 2015

राष्ट्रवाद से खोखले राष्ट्रवाद तक ?

                                                     आने वाले समय में देश के पुराने पड़ चुके कर ढांचे को सुधारने के लिए संप्रग सरकार द्वारा प्रस्तावित किये गए जीएसटी बिल का देश में यदि किसी सीएम और राज्य ने घोर विरोध किया था तो वह गुजरात के तत्कालीन सीएम और गुजरात सरकार ही थी पर अब जब खुद मोदी सीएम से आगे बढ़कर पीएम की कुर्सी पर पहुँच चुके हैं तो उन्हें भी देश की वास्तविकता का अंदाज़ा हो रहा है और अब पीएम के तौर पर उन्हें मनमोहन सरकार की जीएसटी नीति बहुत लाभ का सौदा लगने लगी है जो कभी बहुत ही बेकार नीति हुआ करती थी? अपने को राष्ट्रवादी कहलवाना पसंद करने वाले पीएम मोदी और उनकी पार्टी भाजपा जिस तरह से आज लगभग रोज़ ही नीतिगत मामलों में अनावश्यक राजनीति करने की स्थिति से दो चार हो रहे हैं उससे उनकी खोखले राष्ट्रवाद की नीतियों पर से ही पर्दा उठ रहा है. एक अर्थशास्त्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने जो भी नीतियां बनायीं या प्रस्तावित की थीं आज उनको आगे बढ़ाना मोदी सरकार की मजबूरी ही है क्योंकि उनके पास अपनी आर्थिक नीति है ही नहीं तथा जिस तरह से केंद्रीय स्तर पर सीएम के रूप मोदी ने पहले मनमोहन की नीतियों का लाभ गुजरात में उठाना शुरू किया पर राष्ट्रीय स्तर पर वे अन्य राज्यों के साथ सदैव ही केवल राजनैतिक कारणों से उन नीतियों का विरोध करते रहे थे उसे किस तरह के राष्ट्रवाद की श्रेणी में रखा जा सकता है ?
                                   बेशक मोदी आज मनमोहन सरकार की ही महत्वपूर्ण नीतियों को आगे बढ़ाने का काम करने में लगे हुए हैं पर उनके और उनके मंत्रियों के बड़बोलेपन के कारण ही आज विपक्ष उन्हें और पार्टी को कई बार कटघरे में खड़ा करने से नहीं चूकता है तथा इस स्थिति में ये लोग अपना किसी भी स्तर पर बचाव नहीं कर पाते हैं क्योंकि वे उस समय पूरी तरह से गलत थे. जीएसटी मामले में जिस तरह से इस मामले पर विचार करने के लिए हुई सेलेक्ट कमिटी की बैठक में कांग्रेस और अन्य दलों ने गुजरात सरकार से उनके विरोध के बारे में जानने के साथ ही अन्य राज्यों के विरोध का कारण जानने के लिये उन्हें बुलाने पर निर्णय लिया है वह भाजपा के लिए और भी असहज करने वाली स्थिति होने वाली है. पीएम के तौर पर मोदी को अब सदन में यह स्पष्ट करना भी पड़ सकता है कि उनके सीएम रहते यह मामला किस तरह से गलत था और अब पीएम बनते ही वह अचानक से सही कैसे हो गया है. यह ऐसा मुद्दा है जिस पर विपक्ष सदन के अंदर भी मोदी को राष्ट्रवादी होने के मामले पर घेरने का काम कर सकता है. सेलेक्ट कमिटी अपने आप में पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से फैसला लेकर सरकार के सामने रिपोर्ट रख सकती है.
                                    आज इस तरह के कई निर्णय आज सामने आ रहे हैं जिनमें मनमोहन सरकार की अच्छी नीतियों और प्रस्तावों पर भी भाजपा ने केवल घटिया राजनीति ही की जबकि उसे पता था कि सरकार के पास बहुमत नहीं है. तब सदन में संख्या बल पर दूसरे स्थान पर होने के कारण क्या भाजपा का देश के प्रति कोई उत्तरदायित्व नहीं था जिसको विचार कर वह इस तरह के दीर्घावधि में लाभ देने वाले मुद्दों पर समर्थन करने के बारे में सोचना शुरू करती ? इस मामले में भाजपा की सोच उसके वक्तव्यों से सदैव ही कम राष्ट्रवादी रही है क्योंकि वह राष्ट्रवाद और संस्कृति का ढिंढोरा पीटने से नहीं चूकती है और जब कुछ करने का समय आता है तो वह अचानक से घटिया राजनीति करने की अपनी मानसिकता से बाहर नहीं आ पाती है. आज यदि देश के सामने एक बार फिर से कुछ मुद्दों पर सहमति बनाने की बनाने की बातें की जा रही हैं तो उनके पीछे अब भाजपा की अपनी राजनीति ही है क्योंकि अब वह और पीएम मोदी यह दिखाना चाहते हैं कि किस तरह से वे देशहित में जुटे हुए हैं ? देश का संविधान जब हर दल को अपनी राजनीति चमकाने के भरपूर अवसर देता ही रहता है तो इस तरह से देशहित के मुद्दों पर किसी भी दल के द्वारा की जाने वाली राजनीति पर उसे दण्डित करने का प्रावधान भी होना चाहिए जिससे किसी भी दल के नेता या दल अपनी मनमानी न कर सकें.     
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