मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 6 जून 2020

बढ़ता संक्रमण और नागरिकों के कर्तव्य

                                                       देश विश्व स्वाथ्य संगठन के निर्देशों के अनुरूप ७८ दिनों का लॉक डाउन ८ जून के बाद से चरणबद्ध तरीके से अनलॉक होना शुरू होने वाला है इसके पहले ही १ जून से बहुत सारे राज्यों ने आने यहाँ विभिन्न तरह की गतिविधियों को शुरू कर दिया है. यह सही है कि लॉक डाउन के साथ जीने की एक नई विधा आम नागरिकों के सामने आई है और आने वाले समय में जब तक देश को इस वायरस से निपटने का कारगर उपाय नहीं मिल जाता है हम सभी को कुछ प्रतिबंधों और अपने आचरण से इस बीमारी के संक्रमण को रोकने की दिशा में काम करना होगा. लॉक डाउन को लेकर राजनैतिक बहस चाहे जिस भी स्तर पर हो पर इससे होने वाले लाभ और हानियों के बारे में आम जनता को सोचना ही होगा क्योंकि अस्पतालों में बढ़ती भीड़ में राजनेताओं को कोई परेशानी नहीं होने वाली है सिर्फ आम जनता के लिए ही वहां पहुंचना और सुविधाएँ ले पाना हमेशा की तरह बड़ी चुनौती बनने वाला है.
                          सरकार ने लॉक डाउन के माध्यम से देश को एक हद तक कोरोना के संक्रमण के पीक पर पहुँचने पर उससे लड़ने के लिए तैयार करने का काम ही किया है. अब जब हम लोग इससे जुडी सावधानियों के साथ जीना सीख चुके हैं तो इस बात पर एक बार फिर से विचार करने की आवश्यकता है कि हमें अब यह अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा क्योंकि जब तक बीमारी है तब तक इससे बचने के लिए सभी को आवश्यक सावधानियों पर ध्यान देना ही होगा। अब अपने को इस बीमारी से बचाने की ज़िम्मेदारी एक तरह से हम नागरिकों की ही है. सरकार हर जगह ध्यान नहीं दे सकती है इसलिए खुद एवं अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए अब समय समय पर जारी होने वाले निर्देशों को मानना हम लोगों पर ही है. इन उपायों पर ध्यान रखकर ही हम अपने को सुरक्षित रखते हुए पूरे समाज को बीमारी से मुक्त रख सकते हैं.
                         सबसे पहले तो यही ध्यान रखना होगा कि १० वर्ष से कम के बच्चे और ६५ से ऊपर के बुजुर्ग के साथ गर्भवती महिलाओं के बाहर निकलने पर हम लोग स्वतः ही प्रतिबन्ध लगाएं जिससे हमारे परिवार का यह हिस्सा सुरक्षित रह सके. जो लोग स्वस्थ हैं वे भी बहुत आवश्यक कार्यों से ही बाहर निकले और काम करने वाले महिला पुरुष अपने कार्यस्थल पर पूरी तरह से सरकार की सूची के अनुरूप ही अपने बचाव को सुनिश्चित करें। ऐसी किसी भी परिस्थिति में जब हमारा बाहर निकलना आवश्यक हो तो अपने काम को समाप्त कर जल्दी से वापस अपने घरों में आ जाना चाहिए क्योंकि अभी जिस तरह से समुदाय में संक्रमण फैलना शुरू हुआ है तो कोई भी संक्रमित व्यक्ति हमारे संपर्क में आ सकता है जिसमें बीमारी के कोई लक्षण तो न हों पर वह संक्रमण का कैरियर हो और इस संक्रमित व्यक्ति से यह बीमारी हमारे घर तक भी आ सकती है. ऐसी परिस्थिति में हम सभी को एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का परिचय देना होगा और बीमारी से खुद को बचाते हुए इसके प्रसार को रोकने में अपना योगदान देना ही होगा।
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शुक्रवार, 5 जून 2020

चीन की चालें

                                                   एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया कोरोना से जूझने में लगी हुई है वहीं चीन पूरी दुनिया में अपनी विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है. भारत के साथ लगती उसकी अरुणाचल प्रदेश से लद्दाख तक की सीमा को वह समय समय पर विवादित बनाने की कोशिशों में सदैव लगा ही रहता है पर १९६२ के बाद से ही भारत की सरकारों और जनता की निगाहों में चीन की स्थति ऐसे पडोसी की हो गयी है जो ज़रा सी नज़र चूकने पर बाहर दाना चुग रही मुर्गी को चुराने से भी बाज़ नहीं आता है. पंचशील के सिद्धांतों को जिस तरह से अनदेखा करते हुए चीन ने भारत की उन सीमाओं पर युद्ध लड़ा जहाँ किसी भी तरह के युद्ध के लिए पहुँचने के लिए भारत के पास उस समय न तो धन था और न ही संसाधन जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों के बड़े भाग पर आज भी कब्ज़ा जमाकर विवाद बताकर चीन इसे मुद्दा बनाने की कोशिशों में लगा रहता है.
                            आज एक बार फिर से वही स्थिति दोहराई जा रही है और चीन भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों तक अपनी पहुँच को मज़बूत करने वाले रास्तों और सुदूरवर्ती गांवों तक संपर्क मार्ग बनाने को लेकर सदैव ही आक्रामक रहा करता है. अब उसने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भी विवाद शुरू किया हुआ है तो इस परिस्थिति से निपटने के लिए सरकार युद्ध के बजाय कूटनीतिक रास्तों से इसे हल करने का प्रयास करने में लगी हुई है. इस तरह की स्थिति में कोई भी सरकार युद्ध के बारे में नहीं सोचना चाहेगी वह भी तब जब चीन जैसा प्रतिद्वंदी सामने हो. अभी तक चीन केवल अरुणाचल, सिक्किम और लद्दाख में ही अपना विरोध दिखाता था पर जिस तरह से अब वह पूरी सीमा को ही चुनौती देने के मूड में दिखायी देने लगा है वह भारत के लिए चिंता का विषय ही है.
                              चीन से लगते अपने सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँच को सुगम करने के लिए भारत की कोशिशें लम्बे अरसे से चल रही है और वर्तमान में मोदी सरकार ने इस पर और भी तेज़ी से काम करना शुरू किया है जिससे चीन को यह अच्छा नहीं लग रहा है. भारत के पास इतने सुदूरवर्ती क्षेत्र में कारगिल जैसी एक और लड़ाई लड़ने का विकल्प सीमित ही है क्योंकि कोरोना के चलते अर्थव्यवस्था को झटका लगा है उसे निपटना वैसे ही मुश्किल हो रहा है फिर भी भारत का अपने निर्माण कार्यों को जारी रखते हुए चीन के साथ कूटनीतिक स्तर पर बातचीत को बढ़ावा देने की दिशा में बढ़ना उचित है. चीन को कहीं न कहीं इस बात का अंदेशा भी है कि आज भारत में चीन विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं जिससे आज के माहौल में निपटना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है. वैश्विक बाध्यताओं के चलते भारत सरकार चीन पर सीधे प्रतिबन्ध तो नहीं लगा सकती है पर अपनी जनता से दूसरे माध्यमों से चीनी सामान के बहिष्कार की बात तो कर ही सकती है जो कि किसी भी स्थिति में चीन के लिए सही नहीं होगा। कोरोना से उत्पन्न श्रमिक संकट से निपटने के लिए भारत देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते श्रमिकों की उपलब्धता को देखते हुए विनिर्माण क्षेत्र के लिए नई नीतियों पर काम कर चीन को सीधे तौर पर चुनौती तो दे ही सकता है.
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रविवार, 31 मई 2020

निगरानी में लापरवाही

                                                           देश में कोरोना से लड़ने के लिए जिस स्तर पर प्रयास किये जा रहे हैं उनमें कहीं न कहीं किसी स्तर पर शामिल लोगों द्वारा कई बार की जा रही लापरवाहियां देश के लिए चिंता एवं हंसी का विषय बन रही हैं, यह सही है कि सरकार की मंशा को पूरा करने का ज़िम्मा निचले स्तर के अधिकारियों और कर्मचारियों का ही होता है पर महत्वपूर्ण स्थल पर तैनात लोगों द्वारा की गयी लापरवाही से आज नई तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं. बिना पूर्व सूचना के इतनी गर्मी के मौसम में पहले तो निर्धारित मार्ग से नए मार्ग पर श्रमिक स्पेशल गाड़ियों को चलाया गया जिसके बारे में नए मार्ग पर पड़ने वाले स्टेशनों पर इन श्रमिकों के लिए कोई व्यवस्था करने के स्पष्ट आदेश नहीं थे जिससे अनावश्यक रूप से इन लोगों को अपनी यात्रा पूरी करने में अधिक समय लगा और इनको अधिक कष्टों का सामना भी करना पड़ा. यदि इस मामले में थोड़ी से सावधानी बरती जाती तो श्रमिकों की समस्याओं पर पहले से ध्यान दिया जा सकता था.
                                     कल एक खबर ऐसी भी आई जिससे पूरी दुनिया में देश की छवि को धक्का लगा है जिसमें मास्को जा रहे एयर इंडिया के विमान के पायलट के कोरोना पॉजिटिव होने का पता दोबारा की जाने वाली चेकिंग में हुआ तब तक वह दिल्ली से दो घंटे की उड़ान पूरी कर चुका था. यह लापरवाही उस स्तर पर हुई जहाँ छोटी सी चूक भी बहुत बड़ी समस्या का कारण बन सकती है. कहा जा रहा है कि पहले इस पायलट की पॉजिटिव रिपोर्ट को नेगेटिव पढ़ लिया गया जिसके चलते उसे उड़ान पर जाने की अनुमति दे दी गयी पर जब उसकी जाँच दोबारा की गई तो उसके पॉजिटिव होने की खबर भी सामने आयी. इस मामले में निश्चित तौर पर किसी कर्मचारी की लापरवाही ही है पर इससे पूरी दुनिया में देश की साख को बट्टा भी लगता है. इस तरह के मामलों में पूरी सतर्कता बरतने की आवश्यकता है जिससे भविष्य में किसी भी समस्या से बचा जा सके.
                                      इसी तरह कोरोना के सैंपल ले जाने वाले के पास से एक बन्दर सैंपल उठाकर ले गया जो की निश्चित रूप से लापरवाही की श्रेणी में ही आता है पर इससे हमारे द्वारा इकट्ठे किये जा सैम्पल्स को कुछ जगहों पर कितनी लापरवाही से लाया ले जाया जा रहा है यह भी सामने आ गया है. ऐसा नहीं कि ऐसी बहुत सारी घटनाएं हैं पर सैंपल के मामले में बन्दर उसे कहीं भी फ़ेंक सकता है और उसके बाद उस स्थान पर सैंपल के खुलने से संक्रमण फैलने का खतरा भी हो सकता है. देश में निश्चित तौर पर लाखों लोग कोरोना से निपटने में विभिन्न स्तरों पर मज़बूती से जूझ रहे हैं फिर भी इनमें से कुछ कर्मचारियों की लापरवाही से पूरे तंत्र का मज़ाक उड़ाने वालों को मौका मिल जाता है. ऐसी विषम परिस्थिति में ड्यूटी लगाते समय इन कर्मचारियों के पिछले रिकॉर्ड पर भी चाहिए और जो घोषित लापरवाह हैं उनको ७५% वेतन पर घर भेज देना चाहिए जिससे उनको इस बात का एहसास भी हो कि उनकी लापरवाही की कीमत खुद उन्हें चुकानी होगी क्योंकि देश अब उनके झेलने के लिए तैयार नहीं है.
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शनिवार, 23 मई 2020

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था

                                                                        कोरोना के कारण पूरे विश्व में जिस तरह का माहौल बना हुआ है उससे निपटने के लिए सभी देश अपनी अपनी रणनीति बनाने में लगे हुए हैं. मार्च महीने में जिस तरह से देश में सम्पूर्ण लॉक डाउन किया गया वह उस समय उपलब्ध विकल्पों में सबसे अच्छा था और भारत सरकार ने भी उस पर अमल करने का प्रयास किया चूंकि उस समय उस बात पर चर्चा करना उचित नहीं था तो अब इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि हमारी नीतियों में आखिर कौन सी कमी रह गयी जिसको हम समय रहते आसानी से ठीक कर सकते थे. पीएम मोदी ने जिस तरह सिर्फ ४ घंटे की नोटिस पर लॉक डाउन की घोषणा की उससे बचा जा सकता था क्योंकि होली के बाद का माहौल था और सरकार घर गए मजदूरों को अपने घरों से अपने काम की जगहों पर जाने से रोकने का आह्वाहन कर सकती थी पर उस समय तक सरकार इसकी गंभीरता को समझ ही नहीं रही थी. साथ ही मजदूरों को अपने घरों तक पहुँचाने के लिए रेल और बसों को बंद नहीं करना चाहिए था जिसके कारण आज भी देश के एक हिस्से में काम करने वाले श्रमिक अपने घरों को लौटने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं.
                              अब सरकार को पिछली गलतियों को सुधारते हुए सिर्फ बड़े उद्योगों के बारे में ही न सोचते हुए ग्रामीण भारत को मज़बूत करना होगा क्योंकि आज भी भारत का बड़ा हिस्सा या तो गांवों में रहता है या शहरों में काम न होने के चलते अब वापस गांवों की तरफ जा चुका है. ग्रामीण भारत में आज भी बहुत सारी समस्याएं हैं और सरकार मनरेगा को विस्तार देते हुए अधिकांश ग्रामीणों को इस तरह से काम दे सकती है. कृषि लागत को कम करने के लिए सरकार एक निश्चित संख्या में छोटे और मंझोले किसानों के लिए मनरेगा के द्वार खोल सकती है जिससे मजदूरों को आगामी फसलों के समय काम मिल सके और किसानों को भी कुछ राहत मिल सके. इसके लिए अभी से एक नियम बनाकर लाभार्थी किसानों का चयन शुरू किया जाना चाहिए या फिर भूलेखों के आधार पर उनको या मनरेगा के मजदूरों को धन स्थानांतरित करने के बारे में सोचना चाहिए। इस तरह से जब ग्रामीण भारत के पास उसके गांवों में ही काम उपलब्ध होगा तो उसकी क्रय शक्ति भी बढ़ाई जा सकेगी जो अंत में देश की आर्थिक प्रगति का चक्का फिर से घुमाने में बहुत सहायक हो सकती है.
                                बरसात शुरू होते ही कई जगहों पर मनरेगा के तहत काम करवाने असुविधा होने लगती है तो इन्हीं मजदूरों के लिए एक नीति बनाकर किसानों और मजदूरों की एक साथ मदद की जा सकती है. किसान के सामने इस समय अपनी लागत को एक सीमा में रखने की चुनौती है तो मजदूरों के सामने काम की. यदि सरकार इस तरह से कोई प्रयास करे तो देश के दो बड़े क्षेत्रों की एक साथ मदद की जा सकती है और गांवों की आर्थिक स्थिति को और बिगड़ने से संभाला भी जा सकता है. फिलहाल बरसात शुरू होने से पहले गांवों में तालाबों और मार्गों को मजबूत किये जाने के काम में तेज़ी भी लाई जा सकती है जिससे सरकार को आमलोगों तक राशन पहुँचाने के लिए अपनी पूरी मशीनरी का उपयोग करने से बचाया जा सके और साथ ही इन मजदूरों के काम करने के दिनों के लिए काम के बदले अनाज योजना को भी शुरू किया जा सकता है जिससे एक साथ कई क्षेत्रों की मदद की जा सकती है. अब समय है कि देश को समग्र रूप से सोचना ही होगा तभी इस वैश्विक संकट के साथ वैश्विक मंदी से निपटा जा सकेगा।    

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शुक्रवार, 22 मई 2020

छिछली राजनीति

                                           कांग्रेस भाजपा के बीच शुरू हुए बस विवाद ने अब अगले चरण पर स्थान पा लिया लगता है क्योंकि देश में जो कुछ भी सामान्य प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं अभी तक उनको गोपनीय ही रखा जाता था पर यूपी रोडवेज की तरफ से राजस्थान को किये गए भुगतान को लेकर जिस तरह भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने एक ट्वीट किया तो उससे यही लगता है कि अब राज्यों के सामान्य प्रशासनिक कार्यों तक पार्टी के प्रवक्ताओं की पहुँच होने लगी है. यह भी हो सकता है कि यह पत्र गोपनीय न भी हो पर सामान्य पत्राचार का उपयोग इस तरह से एक दूसरे पर आरोप लगाने में किया जाने लगे तो देश की राजनीति का स्तर समझा जा सकता है. इस पत्र के सामने आने के बाद राजस्थान सरकार ने भी यूपी सरकार को पूरा बिल भेज दिया है और भुगतान करने की मांग भी की है जिससे मजदूरों की समस्याओं के स्थान पर इन नेताओं की लड़ाई का एक और रूप सामने आने वाला है.
                               किसी भी राज्य में ऐसी आपातकालीन परिस्थिति में स्थानीय प्रशासन से सहयोग के लिए देश का दूसरा राज्य अपने स्तर से पत्राचार करता है और उसमें बहुत सारी बातें भी होती हैं पर इस पत्र को प्रियंका गाँधी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किये जाने से किसको राजनैतिक लाभ होने वाला है ? संबित पात्रा ने कहीं पर उस पत्र का ज़िक्र नहीं किया है जो यूपी सरकार ने राजस्थान सरकार को इस सम्बन्ध में लिखा था उसमें संभवतः यूपी सरकार ने भुगतान किये जाने की बात की होगी जिसको ज्ञानी प्रवक्ता संबित द्वारा जानबूझकर छिपाया गया है ? राज्यों के सामान्य काम काज में किसी भी राजनैतिक दल का इस तरह का दखल सामान्य नहीं कहा जा सकता है और यह विचारणीय भी है. कई बार राज्य अपनी परिस्थितियों पर विचार कर एक बीच का रास्ता निकालने के लिए कई बार पत्राचार भी करते हैं पर क्या उसका राजनैतिक लाभ किसी भी दल द्वारा उठाया जाना चाहिए ?
                                 इस मामले में सभवतः जो धनराशि डीज़ल पर खर्च हुई होगी उसके बिल का भुगतान किया गया होगा जबकि राजस्थान सरकार का यह कहना है कि बसें कम पड़ने पर राजस्थान रोडवेज ने छात्रों को उनके गंतव्य तक पहुँचाया जिसका भुगतान अभी तक नहीं किया गया है ? जब ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाले केंद्र की सरकार मज़दूरों को उनके घरों तक रेल द्वारा निशुल्क नहीं भेज सकती तो हिली हुई आर्थिक परिस्थिति में राज्य सरकारों से किसी भी तरह की आर्थिक उदारता की उम्मीद आखिर कैसे की जा सकती है ? लंबी चौड़ी बातें करने वाले दल और नेता अपने यहाँ की परिस्थिति पर विचार नहीं करते हैं और किसी भी बात पर राजनीति शुरू कर देते हैं जिससे केवल जनता की परेशानियां ही बढ़ती हैं. अच्छा हो कि सभी राजनैतिक दल और उनकी सरकारें इस तरह के मामलों पर राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों से दूर ही रहें और जनता को सही तरह से सहायता करने हेतु नीतियों का क्रियान्वयन करने पर ध्यान दें.
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शनिवार, 16 मई 2020

गांवों की सतर्कता

                                                 देश भर के बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से अपने घरों की तरफ जाने वाले मजदूरों के लिए अब एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है जब वे किसी भी तरह से लम्बी परेशानियाँ झेलकर अपने खुद के गाँव में पहुँच रहे हैं तो वहां इन लौटते मजदूरों से कोरोना फैलने के भ्रम और अफवाह के चलते बहुत जगहों पर उन्हें अपने घरों तक जाने नहीं दिया जा रहा है. यह एक ऐसी समस्या है जिससे केवल सही जानकारी के द्वारा ही निपटा जा सकता है. अभी तक जो कुछ भी जानकारियां देश में थीं उनका भी दुरूपयोग ही किया जा रहा है. देश की बड़ी आबादी ने पहले तो इस संकट को समझा ही नहीं फिर जब समझने की कोशिश की तो अब ज़्यादा सख्ती करने के चक्कर में अधिकांश लोग अपने लोगों को ही गाँव में आसानी से स्वीकार नहीं कर रहे हैं जिससे पुलिस का काम अनावश्यक रूप से बढ़ता जा रहा है.
                                       एक तरफ जहाँ ग्रामीण भारत का बड़ा हिस्से जिस तरह से इस बीमारी के प्रति सचेत दिखाई दे रहा है वहीं अभी भी कुछ जगहों से ऐसी ख़बरें भी सामने आ रही हैं कि लोग खुद ही भीड़ के रूप में इधर उधर घूम रहे हैं और खुद के साथ अन्य लोगों को भी संक्रमण के खतरे में डाल रहे हैं. आज की परिस्थिति में सभी को आवश्यक कार्यों के लिए ही आवश्यक दिशा निर्देशों का पालन करते हुए घरों से निकलना चाहिए जिससे समाज में संक्रमण को फैलने से रोका जा सके. ग्रामीण भारत में आज आवश्यकता है कि सभी लोग इस बात के लिए जागरूक किये जाएँ जिससे उनको खतरों का आभास तो हो ही साथ ही वे अपने लोगों को भी सही तरीके से घरों तक जाने में बाधा भी न बनें. यह सही है कि शहरों के मुक़ाबले अधिक स्थान में कम लोगों के रहने के चलते भी गाँवों में संक्रमण का फैलाव थोड़ा कम स्तर पर होता है पर संक्रमण फैलने पर समस्याएं गांवों में भी उसी तरह से सामने आती हैं.
                   इस परिस्थिति से निपटने एक लिए अब समाज को सरकार के कोरोना से बचाव के नियमों का कड़ाई से अनुपालन सीखना होगा जिसमें खुद को संक्रमण से बचाने के उपायों के साथ ही क़्वारण्टीन किये गए लोगों के साथ किये जाने वाले व्यवहार पर भी ध्यान देना होगा। प्रधान, ग्राम पंचायत सदस्यों, ग्रामीण स्वास्थ कार्यकर्ताओं, चौकीदार और ग्राम विकास विभाग के कर्मचारियों को मिलकर गांवों में नज़र रखने के लिए स्थानीय स्तर पर समितियों का गठन किया जाना चाहिए जिससे वहां आने वाले मजदूरों को सही ढंग से १४ दिनों तक निगरानी में रखा जा सके और आम लोगों के दिलों में उठने वाले सवालों के भी सही तरह से जवाब दिए जा सकें. घर के किसी एक सदस्य को ही आवश्यक कार्यों से बाहर निकलने की सीमित अनुमति होनी चाहिए और उसको भी आम लोगों से दूर रहने की सही जानकारी दी जानी चाहिए। इस तरह से कुछ मौलिक सवालों के बारे में लोगों को सही उत्तर देकर इस समस्या से सही ढंग से निपटा जा सकता है और पूरे ग्रामीण परिवेश में करोनके संभावित संक्रमण को रोकने हेतु  प्रभावी कदम भी उठाये जा सकते है.  
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गुरुवार, 14 मई 2020

मजदूरों की घर वापसी का यथार्थ

                                         कोरोना संकट के चलते देश में मजदूरों को लेकर जिस तरह की अफरा तफरी दिखाई दे रही है क्या उससे कुछ बेहतर तरीके से निपटा जा सकता था आज यह सवाल हर किसी को अपने आप से ही पूछने की आवश्यकता है. देश की आज़ादी के बाद से पहली बार इतनी बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों में काम करने वाले मजदूर जिस तरह से देश के स्वर्णिम विकास की खोखली गाथा के साथ बनाये गए राष्ट्रीय राजमागों के हर हिस्से पर आत्मनिर्भरता दिखाते हुए अपने घरों की तरफ बढ़ते ही जा रहे हैं क्या उसे और अच्छी तरह से नहीं किया जा सकता था ? यहाँ सवाल केंद्र और राज्यों की सरकारों की आलोचनाओं का नहीं बल्कि उन गरीब लोगों का है जो सिर्फ बेहतर जीवन और खाने पीने लायक कमा लेने की जुगत में ही अपने घरों से सैकड़ों हज़ारों किमी दूर पहुँच गए थे. आखिर वे कौन से कारण थे जिनको केंद्र ने पूरी तरह अनदेखा किया और तीसरे लॉकडाउन के बाद इन मजदूरों ने अपने घरों की तरफ बिना कुछ विचारे ही कूच कर दिया ? विकसित देशों की कतार में खड़े होने का हमारा सपना किस तरह से चूर चूर होता दिखा आज इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है ?
                                         आज जब महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों में कोरोना ने अपना रूप दिखाना शुरू ही किया है तो उस परिस्थिति में इन प्रवासी मजदूरों को अनमने ढंग से कुछ रेलगाड़ियां चलाकर उनके राज्यों और सम्बंधित जिलों में भेजने की आधी अधूरी कोशिश की जा चुकी है वह भी अपने आप में बड़ा संकट बन सकती है. केंद्र सरकार ने इस मामले में बेहद हल्का रुख ही अपनाया क्योंकि यदि दो लॉक डाउन के बाद इन मजदूरों को घर भेजने की स्थिति सामने आ सकती थी तो इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने किस स्तर पर क्या प्रयास किये आज किसी को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. राज्यों में जिन जगहों पर ये मजदूर थे तो वे वहां पर किसी कम्पनी, ठेकेदार आदि के माध्यम से ही पहुंचे थे तो इन लोगों की शुरुवाती ४० दिनों में कोई सूची बनाने का कार्य भी आसानी से किया जा सकता था और सीमित संख्या में रेलगाड़ियां चलाकर इनको चरणबद्ध तरीके से इनके घरों तक भेजने की व्यवस्था आसानी से भी की जा सकती थी पर देश के निर्माण में लगे इन मजदूरों की गिनती आज कोई भी अपने लोगों में नहीं करना चाहता है जिससे इनके और भी दुर्दशा हो रही है.
                                           अब भी समय है कि सरकार देश के विभिन्न हिस्सों में खाली खड़ी रैक्स को बड़े शहरों के स्थान पर कुछ सौ किमी के दायरे में ही चलाकार इन के पैरों में पड़ने वाले छालों पर तरस खाये। क्या ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाला देश कुछ सौ करोड़ रूपये खर्च कर इन लोगों को आसानी से घरों तक सम्मानजनक रूप से भेजने की मूलभूत आवश्यकता को भी पूरा नहीं कर सकता ? यदि सरकार के पास आर्थिक तंगी है तो जनता इन ट्रेनों को चला सकती है केवल एक बार एक खाते का नंबर देने की आवश्यकता है और इन मजदूरों को घरों तक भेजने पर होने वाले खर्च के लिए आम लोग खुलकर मदद दे सकते हैं. भारत सरकार और रेल मंत्रालय को अविलम्ब यह उपाय करना चाहिए जिससे पूरे देश में गरीबों की इस मजबूरी और दुर्दशा को जल्दी से समाप्त किया जा सके.  
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बुधवार, 24 अप्रैल 2019

लोकतंत्र, चुनाव और शालीनता

                                                 ऐसा नहीं है कि २०१९ में देश में पहली बार कोई आम चुनाव हो रहे हैं पर वर्तमान में चल रहे चुनावों में जिस तरह से हर दल के शीर्ष नेता द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन किया जा रहा है वह भले ही उस सम्बंधित दल को कुछ वोट दिलवाने में मदद कर दे पर इससे हमारे उस लोकतंत्र की गंभीर खामी ही सामने आती है जिसमें चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था भी चाह कर कुछ ठोस नहीं कर पाती है. यह सही है कि आज चुनाव प्रचार को जिस स्तर पर ले जाया गया है उसमें पुरानी पीढ़ी के नेता अपने आपको सहज नहीं पाते हैं फिर भी उनके पास कोई अन्य रास्ता भी नहीं बचता है क्योंकि यदि उन्हें राजनीति में रहना है तो इस सबका सामना करना ही होगा. इस मामले में सभी दलों ने एक जैसा रवैया अपना रखा है इसलिए किसी एक दल की तरफ इंगित करने से काम नहीं चलने वाला है फिर भी क्या देश के राजनैतिक दलों को यह नहीं सोचना चाहिए कि चुनाव जीतने-हारने के बाद कमोबेश उन्हीं चुनिंदा बड़े नेताओं के साथ जब सदन में बैठना है तो विमर्श का स्तर इतना घटिया करने की आवश्यकता क्या है?
                                              आज की परिस्थिति में यदि देखा जाये तो हर नेता किसी भी तरह से दुसरे दल के नेता को नीचे दिखाना ही अपनी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण मानने लगा है जिससे लोकतंत्र और शिष्टाचार की वह सामान्य सीमा रेखा भी कई बार अनावश्यक रूप से लांघी जानी लगी है जिसको अभी तक सदन या चुनावों में लांघना उचित नहीं मना जाता था।  इस बात पर विचार करना भी आवश्यक है कि आखिर देश के नेताओं की यह स्थिति क्यों बन गयी है कि जो अपने चुनावी घोषणापत्रों में किये जाने वाले विकास के लम्बे चौड़े वायदों को भूलकर इतनी घटिया बातचीत पर उतर आते हैं जिसका कोई औचित्य नहीं दिखता है?  संभवतः आज नेताओं को यह लगने लगा है कि जनता से चाहे कुछ भी कह दो पर जब चुनाव हों तब जनता की बातों को गंभीर मुद्दों की तरफ मत जाने दो और हलकी छिछली राजनीति में को उलझाकर देश के समक्ष खड़े वास्तविक मुद्दों को दूर दफ़न कर दो जिससे भावनाओं में बहती हुई जनता अपनी प्राथमिकताओं को भूलकर उन्हीं घटिया बातों में उलझकर गंभीर सवाल करने की शक्ति खो दे?
                                               क्या यह सही समय है कि राजनेता अपने स्तर से एक बार फिर से चुनावी माहौल की गरिमा को वापस लौटाने का काम शुरू करें?  क्या हमारे विविधता भरे देश में अब इस बात की आवश्यकता नहीं है कि अन्य अखिल भारतीय सेवाओं की तरह चुनाव सुधार करते हुए एक चुनाव से सम्बंधित कैडर भी बनाया जाये जिसमें शुरुवात से ही चुनावी माहौल को समझने के लिए अधिकारियों को तैयार किया जाये और उनमें से ही वरिष्ठ लोगों को संवैधानिक बाध्यता के साथ शीर्ष स्तर पर काम करने का अवसर दिया जाये ? ऐसा करने से चुनाव आयोग की गरिमा तो बढ़ेगी ही साथ नेताओं को अपने प्रिय लोगों को चुनाव आयोग में बैठाने की परंपरा पर भी लगाम लगायी जा सकेगी।  निश्चित तौर पर चुनाव आयोग ने १९९१ में शेषन युग के बाद इस बार सबसे अधिक बेबसी दिखाई है क्योंकि शेषन के बाद लगभग हर चुनाव आयुक्त ने नियमों का कड़ाई से अनुपालन किया और जनता में आयोग की साख को मज़बूत किया पर वर्तमान में आयोग ने अपनी उस बनी हुई साख को गंवाना शुरू कर दिया है और कोई नहीं जानता है कि यह अभी और कितने नीचे तक जाने वाला है?  देश को मज़बूत नेता ही नहीं बल्कि मज़बूत संवैधानिक संस्थाओं की भी बहुत अधिक आवश्यकता है क्योंकि जब तक सभी सम्बंधित तंत्र मज़बूत नहीं होंगे तब तक लोकतंत्र को मज़बूत करना केवल एक सपना ही रहने वाला है.
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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अस्पष्ट जनादेश और नैतिकता

                                                               आज़ादी के बाद काफी समय तक देश की जनता ने केवल कांग्रेस को सत्ता देने को अपनी प्राथमिकता में रखा उसके बाद एक समय ऐसा भी आया जब संविधान के अनुरूप किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत का अभाव दिखाई देने लगा जिसके बाद गठबंधन और अल्पमत की सरकारों का दौर भी आया जिससे कई बार मध्यावधि चुनावों की स्थिति आयी जिसमें भी स्पष्ट बहुमत दूर की कौड़ी ही साबित हुआ. इस पूरी परिस्थिति के बारे में संभवतः संविधान में विचार किया गया था और साझा सरकारों की परिकल्पना भी की गयी होगी पर निर्णय लेने और जनहित में काम करने के लिए स्पष्ट बहुमत वाली सरकारों के हाथ सदैव खुले रहते हैं इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. केंद्रीय स्तर से लगाकर राज्यों तक में जिस तरह से मामूली या अस्पष्ट जनादेश दिखाई देना शुरू हुआ है उसके चलते क्या कोई और मार्ग नहीं सोचा जाना चाहिए जिससे फिर से चुनावों में जाने से पहले एक और विकल्प उपलब्ध कराया जा सके ?
                                  कर्णाटक से एक बार फिर से सत्ता पलट की खबरें आना शुरू हो चुकी हैं तो उस परिस्थिति में आखिर किसी के पास क्या विकल्प बचता है कि किस तरह से संवैधानिक रूप को बनाये रखते हुए सत्ता को चलाया जाये ? देश के प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा द्वारा भी समय समय पर संविधान प्रदत्त अधिकारों का जमकर दुरूपयोग किया जाता रहा है जिनके हाथों में अधिकांश समय तक देश की बागडोर रही है. आज इनमें से कोई दल अपनी सरकार के गिरने या बनने को अपनी परिस्थिति के अनुसार इसे लोकतंत्र की हत्या या लोकतंत्र की जीत बताने में कोई शर्म महसूस नहीं करते हैं. ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए जिससे देश का लोकतंत्र मज़बूत हो और जनता की अपेक्षा के अनुरूप सरकार चलाने की व्यवस्था भी की जा सके ? क्या ये दोनों दल कभी इस तरह की किसी सम्भावना पर विचार कर कोई स्पष्ट नीति बनांने के बारे में सोचेंगें या इसी तरह से अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए कुछ भी करने की तरफ बढ़ते चले जायेंगें ?
                               क्या यह संभव नहीं है कि किसी एक दल द्वारा बहुमत साबित न कर पाने की स्थिति में सभी दलों द्वारा जीती गयी सीटों के अनुपात में उन्हें सबसे बड़े दल को सीएम और मंत्रिमंडल में उपयुक्त स्थान देते हुए देश या राज्य की स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया जाए और अगले चुनावों तक उस पर अमल किया जाये ? हालाँकि भारत की राजनैतिक परिस्थितियों में इस तरह का कोई भी कार्य किया जाना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि सभी दलों की प्राथमिकताएं समग्र विकास के स्थान पर केवल अपने वोटबैंक को मज़बूत करने तक ही सीमित हैं. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा जिस जीएसटी और एफडीआई का खुलकर विरोध किया करती थी सत्ता में आने पर वह उसकी सबसे बड़ी पैरोकार दिखाई देने लगी जिससे दलीय राजनीति के चलते देश के आर्थिक सुधारों को लागू करने में अनावश्यक रुप से विलम्ब हुआ और चिंता की बात यह है कि हम देशवासी इसके लिए किसी को भी उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते हैं ? नीतियों पर राष्ट्रीय सहमति के साथ आगे बढ़ने की मानसिकता जब तक हमारे सभी दलों और राजनैतिक नेताओं में नहीं आएगी तब तक उनकी राजनैतिक अपेक्षाओं की प्रतिपूर्ति करने के लिए जनता के हितों का बलिदान किया जाता रहेगा।   
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शनिवार, 12 जनवरी 2019

सीबीआई विवाद और न्याय

                                   आज सिर्फ अपनी साख बचाने के लिए जिस तरह से मोदी सरकार ने सीबीआई वाले मामले में अनावश्यक दखलंदाज़ी की इससे यही पता चलता है कि इस सरकार के लिए संस्थाओं की साख कोई मायने नहीं रखती है क्योंकि जब सीबीआई का झगड़ा सतह पर आकर पूरे देश के लिए चिंता का विषय बना हुआ है उस समय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी किनारे करते हुए सरकार द्वारा एक दिन पहले ही पद पर पुनर्स्थापित किए गए अलोक वर्मा को इस तरह से हटाना किस संकेत की तरफ ले जाता है ? आज जो भी समस्या है उसके लिए कहीं न कहीं सरकार के स्तर पर बरती गयी हद दर्ज़े की लापरवाही भी है जिसके चलते पूरे देश के सामने सरकार अपने तोते की गर्दन उमेठती हुई दिखाई दे रही है और अपने साथ देश के सर्वोच्च संस्थाओं की गरिमा को भी धूल में मिलाने में लगी हुई है जिसका दूरगामी परिणाम आने वाले समय में दिखाई देने वाला है क्योंकि अभी तक मोदी से सहमत लोग भी इस मामले में वर्मा के साथ हुए अन्याय को स्वीकार करने लगे हैं.
                     अस्थाना की शिकायत पर जस्टिस पटनायक की सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट में आलोक वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को किसी भी स्तर पर सही नहीं पाया गया है और इस बात के बारे में खुद जस्टिस पटनायक ने इंडियन एक्सप्रेस से जो कुछ कहा है वह अपने आप में चिंताजनक ही लगता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पद पर स्थापित किये गए आलोक वर्मा की बात सुने बिना ही उनको एकतरफा तरीके से पद से हटा दिया गया अब मोदी सरकार इस निर्णय को किस तरह से सही ठहरा पायेगी यह देखने की बात होगी। हो सकता है कि आलोक वर्मा की तरफ से सेवा के दौरान कुछ अनियमितताएं भी की गई हों पर उनका पक्ष सुने बिना ही इस तरह से निर्णय करना क्या सरकार और चयन समिति के हल्केपन को नहीं दिखाता है ? यह अधिक चिंतनीय इसलिए भी हो जाता है कि इस समिति में सुप्रीम कोर्ट का प्रतिनिधित्व भी था जिसके बाद भी बिना पक्ष सुने इस तरह का निर्णय किया गया।
                     संवैधानिक मामलों के जानकारों के साथ विपक्ष भी मोदी सरकार पर देश के संवैधानिक ढांचे परम्पराओं और मूल्यों से खिलवाड़ करने के आरोप २०१४ से लगा रहे हैं फिर भी मोदी सरकार इन सारे आरोपों की अनदेखी करती चली आयी है और अब इस मामले को कांग्रेस द्वारा जिस तरह से राफेल खरीद से जोड़ना शुरू कर दिया गया है उसको देखते हुए आने वाले समय में मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ने ही वाली हैं. अच्छा होता कि एक बार में निर्णय लेने के स्थान पर अलोक वर्मा को भी अपना पक्ष समिति के सामने भी रखने का मौका दिया जाता और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाता पर सरकार की हड़बड़ी ने पूरे माहौल में संदेह पैदा करने की गुंजाइश छोड़ दी है. कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने समिति के निर्णय से असहमति जताकर यह सन्देश देने में भी सफलता पाई है कि इस मामले का राफेल खरीद से जुड़ाव हो सकता है और आगामी चुनावों में यह कांग्रेस के लिए एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाने वाला है.       
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शनिवार, 5 जनवरी 2019

बेरोजगारी भत्ता या श्रम सृजन

                                               देश में भले ही आगामी लोकसभा की चुनावी महाभारत से पहले कांग्रेस के तीन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी की घोषणा से स्थितियां कुछ हद तक उसके पक्ष में हुई हो पर उससे किसानों की दशा पूरी तरह सुधारी नहीं जा सकती है ठीक उसी तरह से आज देश के युवाओं के सामने जिस तरह से रोजगार का संकट आ गया है उससे निपटने के लिए भी कांग्रेस ने अस्थायी रूप से युवाओं को बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही है. किसी भी परिस्थिति में युवाओं के ऊर्जावान हाथों में काम हो इससे किसी भी राजनैतिक दल को इंकार नहीं है पर चिंता की बात यह है कि यह सब केवल चुनावों में ही सामने आता है और जब सरकारें बन जाती हैं तो इन समस्याओं को ठन्डे बस्ते में डालने का काम शुरू कर दिया जाता है. आज भारत के पास युवाओं की बड़ी संख्या मौजूद है जिसमें कुशल कामगारों और वर्तमान तथा भविष्य की आवश्यकता के अनुसार रोजगार होने पर उनके लिए उचित मानव संसाधन के रूप में विकसित करने की दिशा में कोई सार्थक प्रयास नहीं किये जा रहे हैं. इस नीतिगत उपेक्षा के चलते आज युवाओं में आक्रोश बढ़ता ही जा रहा है जिसका दुष्प्रभाव किसी भी सत्ताधारी दल के लिए घातक हो सकता है.
                     आखिर क्या कारण है कि सरकारें और राजनैतिक दल इस दिशा में सार्थक पहल करने में कहीं बहुत पीछे दिखाई देते हैं और युवाओं की समस्या वहीं पर रह जाती है ? यदि युवाओं को उनके अनुसार बेरोजगारी भत्ता देने की कोई मंशा कांग्रेस की है तो उसे इसके लिए ठोस प्रारूप तैयार करना चाहिए जिसमें युवाओं की रूचि के अनुरूप और विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए आवश्यक मानव संसाधन के स्थानीय विकास की नीति बनानी चाहिए. यह सही है कि कोई भी सरकार सभी को रोजगार नहीं दे सकती है पर यह भी उतना ही सही है कि सरकार युवाओं को समर्थन तो दे ही सकती है जिससे वे अपने खर्चों के लिए परिवार पर कम आश्रित रहे. ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आवश्यकता के अनुरूप कौशल विकास योजना जैसे कार्यक्रम से सीमित संख्या में युवाओं को विभिन्न कार्यों के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जिससे वे अपने आसपास ही कुछ दिनों के लिए रोजगार पाने में सफल हो सकें। इसके लिए मनरेगा का उदाहरण लिया जा सकता है जिसके माध्यम से ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था को उस समय भी गतिमान रखने में सफलता मिली थी जब पूरी दुनिया आर्थिक संकट में उलझी हुई थी.
                      इस नीति में डाक, बैंक, रोडवेज, यातायात, नगर विकास, स्वच्छता आदि क्षेत्रों में काम करने के लिए युवाओं को कुशल बनाया जा सकता है. मान लीजिये कि सरकार किसी स्थान के ५० युवाओं का चयन बेरोजगारी भत्ते के लिए करती है तो उनको ३००० रूपये प्रति मास देने के एवज में उनसे विभिन्न विभागों के सहयोगियों के रूप में कम से कम १० दिन काम भी लिया जाना चाहिए जिससे वे उस क्षेत्र की बारीकियों को समझ सकेंगे और सरकार के विभिन्न विभागों को भी स्थानीय स्तर पर काम करने वाले युवा उपलब्ध हो जायेंगें. इससे जहाँ समाज में कार्यकुशलता बढ़ेगी वहीं स्थानीय प्रशासन के पास अधिक सख्या में सहयोगी भी उपलब्ध हो जायेंगें। इस योजना के अंतर्गत काम करने वाले युवाओं के सामने सम्मान से जीने के रास्ते भी खुल सकेंगें और वे भी भत्ते के एवज में देश के लिए अपने कुछ दिन लगाकर ख़ुशी महसूस करेंगें। पहले प्रशिक्षण और फिर काम करने की बाध्यता होने से जहाँ इसमें भ्रष्टाचार की संभावनाएं खुद ही कम हो जाएँगी वहीं युवाओं को भी सही दिशा में आगे बढ़ाने में सफलता मिल सकेगी। पर देश का दुर्भाग्य है कि अधिकांश सरकारें केवल तात्कालिक चुनावी लाभों को देखते हुए ही निर्णय लेती हैं जिससे समाज को उसका वह लाभ नहीं मिल पाता जो एक सुनियोजित नीति के माध्यम से मिल सकता है.         
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शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

राम मंदिर और कानून

                                              किसी भी गंभीर मुद्दे पर देश के लोकतंत्र के चारों मुख्य स्तम्भों को किस तरह से कार्य करते हुए संविधान की रक्षा की तरफ कदम बढ़ाने चाहिए इस पर कोई एक राय अभी तक नहीं बन पायी है क्योंकि देश के सामने समय समय पर आने वाले विभिन्न मुद्दों पर जिस तरह की विभक्त राय सामने आती है उसमें कोई सर्वसम्मत हल निकाल पाना आसान भी नहीं है फिर भी इन मुख्य स्तम्भों की तरफ से किये जाने वाले प्रयासों को भी सही नहीं कहा जा सकता है. आज़ादी के बाद से देश में जिस तरह से विधायिका का क्षरण हुआ उसे कोई भी नकार नहीं सकता है जिससे उसका दुष्प्रभाव हर उस क्षेत्र पर भी पड़ा जहाँ उसका किसी तरह का दबाव संभव था. लोकतंत्र में भी देश को आखिर में नागरिकों के द्वारा ही चलाया जाना है और समाज में हर तरह के लोग मौजूद रहते हैं जिससे समय के साथ कार्यपालिका और न्यायपालिका में भी यह परिलक्षित होता दिखाई दिया।
                   इस कड़ी में ताज़ा मुद्दा राममंदिर भूमि के स्वामित्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने आने वाली सुनवाई है जिस पर हर स्तर पर राजनीति चालू है और जिस भी दल को जो कुछ अपने हित में लग रहा है सभी बिना कुछ सोचे समझे अपनी राजनीति चमकाने की कोशिशों में लगे हुए हैं. क्या किसी दल की राजनीति को देश से ऊपर समझा जा सकता है और यदि किसी विवादित मुद्दे पर जो कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित भी हो उस पर किसी को बयानबाज़ी करने से रोकने का कितना अधिकार खुद कोर्ट के पास है ? आज जिस स्तर पर राममंदिर को लेकर माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है उसका एक बार फिर से देश की उग्र राजनीति पर ही प्रभाव पड़ने वाला है और चुनावी वर्ष में आम लोगों से जुड़े मुद्दों को पीछे रखने का काम शुरू किया जा चुका है. क्या किसी दल को राजनैतिक लाभ मिलने या किसी दल को हानि होने की सम्भावना के बीच सुप्रीम कोर्ट के पास यह अधिकार उपयोग करने की शक्ति नहीं है कि वह किसी भी मामले को देश के माहौल के अनुरूप सुनवाई करने के लिए ले सके ?
                                    बीते तीन दशकों में राममंदिर को लेकर जिस स्तर पर राजनीति हो चुकी है क्या हमारा सुप्रीम कोर्ट उसे नहीं समझता है? आज एक बार फिर से कोर्ट के बाहर इस मुद्दे को गर्माने की कोशिशें शुरू की जा चुकी हैं क्योंकि चुनावी वर्ष में जनता के बीच आज देश चला रही भाजपा और उसके पीएम मोदी का प्रभाव कम हुआ है. वैसे पीएम मोदी ने बहुत कुछ किया है पर पिछले आम चुनावों से पहले उन्होंने जनता की आकांक्षाओं को जिस हद तक बढ़ाया था उसे पूरा करने में आज वे खुद को विफल पा रहे हैं जिससे विपक्षी दल भी इस मसले को लेकर उन पर हमलावर हैं. राममंदिर के मुद्दे को पूरी तरह से कोर्ट के निर्णय आने तक स्थगित रखना चाहिए क्योंकि इस मुद्दे पर देश में पहले ही बहुत कुछ हो चुका है और तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था यदि आज इस तरह के मामलों में उलझती है तो आने वालेसमय में देश के लिए अपने विकास की गति को बनाये रखना मुश्किल ही होने वाला है.
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शुक्रवार, 28 दिसंबर 2018

टी-१८ परिचालन की राजनीति

                                                  देश में निर्मित सबसे तेज़ चलने वाली ट्रेन रैक टी-१८ के सफल परीक्षण के बाद इसके मार्ग और परिचालन के बारे में रेलवे द्वारा निर्णय लेने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है. आमतौर पर इस तरह की नई सेवा शुरू होने पर रेल मंत्री या पीएम के क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाती है जबकि इतनी महत्वपूर्ण शुरुवात के लिए इसके परिचालन की लागत के निकलने और विशेष सेवा होने के कारण इसके मंहगे होने के कारण इसे उस मार्ग पर चलाने का प्रयास किया जाना चाहिए जहाँ इसकी सेवा का मूल्य चुका यात्री इसका सही तरह से लाभ लेने की स्थिति में हों. निश्चित तौर पर पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के चलते वाराणसी को विशेष अधिकार प्राप्त है पर क्या महामना एक्सप्रेस की हालत देखकर रेलवे को इस अपनी नई सेवा की शुरुवात पीएम के क्षेत्र से करनी चाहिए ? राजनैतिक लाभ के लिए देश में आज़ादी के बाद से ही इस तरह की गतिविधियों को किया जाता रहा है और मोदी सरकार में भी यही सब जारी भी है। 
                                          अच्छा होता कि इस सेवा को दिल्ली /झाँसी या भोपाल के बीच चलाया जाता जिससे परिचालन की दृष्टि से उपलब्ध सुगम मार्ग पर इसे चलाया जा सकता और पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण मथुरा आगरा झाँसी और भोपाल आने जाने वाले यात्रियों को इस तीव्र सेवा का सही लाभ मिल पाता। यह भी सही है कि देश विदेशी पर्यटकों के लिए दिल्ली आगरा के बीच चल रही गतिमान एक्सप्रेस के स्थान पर यदि इस टी-१८ को चलाया जाये तो इन स्थानों पर आने जाने वालों की यात्रा को और भी सुखद बनाया जा सकता है साथ ही दिल्ली आगरा मार्ग पर चल रही गतिमान एक्सप्रेस को वाराणसी की तरफ शिफ्ट किया जा सकता है जिससे वाराणसी के लोगों को भी नयी ट्रेन मिल जाएगी साथ ही पर्यटन स्थलों के यात्रियों को भी अपनी यात्रा का और भी लाभ मिल सकेगा। दिल्ली वाराणसी जैसे व्यस्ततम मार्ग पर टी-१८ को चलाने के लिए रेलवे को बहुत कुछ करना पड़ेगा तभी तभी यह अपनी रफ़्तार के साथ न्याय  कर पाए वर्ना यूपी में फंसती हुई ट्रेनों के बीच एक और नई गाड़ी भी विभिन्न स्टेशनों पर खडी दिखाई देने वाली है.     
                                रेल मंत्री को पहले से ही अपनी महत्वपूर्ण गाड़ियों के संचालन में आ रही बाधाओं को देखते हुए टी-१८ को वाराणसी दिल्ली के बीच चलाने से पहले आर्थिक पहलुओं पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे यह कम से कम अपनी परिचालन लागत को निकाल कर रेलवे को आर्थिक सहयोग भी करने की स्थिति में रहे. वैसे भी रेलवे की गलत नीतियों के चलते आज प्रीमियम किराये के कारण अधिकांश गाड़ियों में वे सीटें खाली ही रह जाती हैं जिनके लिए कभी कभी बहुत मारामारी रहा करती थी. रेलवे को पीएम के ससदीय क्षेत्र का ख्याल रखने का पूरा अधिकार है पर साथ ही क्या आज रेलवे इस स्थिति में है कि वह अपनी उन नई महत्वपूर्ण गाड़ियों को आर्थिक पहलू के स्थान पर राजनैतिक लाभ के रूप में चलाने के बारे में सोच सके ? निश्चित तौर पर यह निर्णय रेलवे बोर्ड का ही होगा पर क्या बोर्ड सरकार और मंत्री की मंशा के खिलाफ जाकर इस तरह के किसी कदम का विरोध करने की स्थिति में होता भी है ?     

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बुधवार, 26 दिसंबर 2018

औद्योगिक विकास की चुनौतियाँ

                                               छत्तीसगढ़ की नवनिर्वाचित कांग्रेस सरकार ने चुनाव में किये गए अपने वायदे को पूरा करते हुए बस्तर संभाग में लगने वाले टाटा स्टील प्लांट को आवंटित की गयी १७०० एकड़ जमीन कम्पनी से वापस लेकर किसानों को वापस करने के लिए आदेश जारी कर दिया है जिसके बाद स्थानीय किसानों में तो हर्ष का माहौल है पर इससे राज्य में औद्योगिक विकास को बड़ा झटका लगने की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. यह भी सही है कि इस मामले में टाटा समूह द्वारा भूमि आवंटन के नियमों के अनुरूप प्लांट लगाने का काम आगे नहीं बढ़ाया गया जिससे स्थानीय लोगों में रोष भी था जिसे समझते हुए कांग्रेस ने वहां पर इसे एक मुद्दा बना लिया और जनता में अपनी विश्वसनीयता साबित करने के लिए आवंटन को रद्द भी कर दिया है. इस मामले में कहीं न कहीं कुछ ऐसी कमी अवश्य ही रही होगी जिससे टाटा जैसा समूह भी अपनी कही गयी बातों को पूरा नहीं पाया।
                                    भूपेश बघेल सरकार ने किसानों की मांग और समस्या को देखते हुए अपने वायदे को पूरा किया उसे गलत नहीं कहा जा सकता है पर जिस तरह से यह पूरा मामला बिगड़ा अब उस पर  विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि खनिज सम्पदा से भरपूर राज्य से पूरे देश और दुनिया के औद्यौगिक समूहों में यह सन्देश भी नहीं जाना चाहिए कि यह सरकार पूरी तरह से उद्योगों की विरोधी है ? टाटा समूह के सामने आखिर वे कौन सी परिथितियाँ उत्पन्न हुईं जिसके चलते इस प्लांट का काम आगे नहीं बढ़ सका भूपेश सरकार को इस बारे में भी गंभीर विचार कर नीतियों के निर्धारण में उद्योगों का भी ख्याल रखना होगा जिससे आने वाले समय में राज्य के औद्यौगिक माहौल को सुधारा जा सके. रमन सरकार की तरफ से आखिर किन स्तरों पर क्या चूक हुई जिससे यह प्लांट मूर्त रूप नहीं ले सका और सरकार के पास क्या विकल्प थे जिसके चलते वह नियमों में सुधार कर टाटा समूह और किसानों के बीच समन्वय स्थापित कर सकती थी ?
                                  बंगाल के बाद टाटा को संभवतः दूसरी बार इस तरह की परिस्थिति का सामना करना पड़ेगा जब वह अपनी योजना को मूर्त रूप देने में खुद को असमर्थ पा रहा होगा ? आज टाटा समूह ही नहीं बल्कि सभी औद्यौगिक समूहों के साथ केंद्र तथा राज्य सरकारों को बेहतर समन्वय करने की आवश्यकता है जिससे आने वाले समय में कोई भी परियोजना इस तरह से बीच में न लटक जाये। चिंता की बात यह भी है कि औद्यौगिक माहौल सुधारने की बातें करने वाली मोदी सरकार के कार्यकाल में भी इस समस्या का सही हल नहीं खोजा जा सका ? यदि समय रहते केंद्र सरकार का दखल होता या रमन सरकार खुद ही केंद्र की सहायता मांगती तो संभवतः किसानों के आंदोलन से टाटा समूह को दिक्कत न होती और मामला इतना बिगड़ने भी नहीं पाता। बात यहाँ पर किसानों के हितों का ध्यान रखते हुए समग्र औद्यौगिक विकास की संभावनाएं बढाने की है जिसमें रमन सरकार पूरी तरह से चूक गयी थी पर मामले को अतिवादी होकर एकतरफा निपटने से भूपेश सरकार भी राज्य और देश का भला नहीं कर पायेगी। इसलिए राजनैतिक कारणों को दूर रखते हुए अब राज्य सरकार को नीतियों की कमियों पर ध्यान देकर उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।       
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शनिवार, 15 दिसंबर 2018

राजनीति का अपराधीकरण ?

                                 एमपी में हुए चुनावों के बाद जिस तरह से वहां जीते हुए विधायकों के बारे में सूचना सामने आयी है वह वास्तव में चौंकाने वाली है क्योंकि २३० की विधान सभा में ९४ विधायकों के खिलाफ मुक़दमें दर्ज़ हैं जो लगभग ४१% होते हैं. इसमें भी ४५ के खिलाफ गंभीर किस्म के मामले दर्ज़ हैं तो ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक ही है कि क्या आने वाले दिनों में राज्य की सत्ता सँभालने वाली कमलनाथ सरकार इनके मामलों में कुछ तेज़ी लाने का प्रयास करेगी ? यह भी संभव है कि कुछ नेताओं के खिलाफ मात्र राजनैतिक दुर्भावना के तहत ही मामले दर्ज़ हों पर जिन लोगों के खिलाफ गंभीर मुक़दमे चल रहे हैं उनके लिए अब केवल एमपी सरकार ही नहीं बल्कि केंद्रीय स्तर पर भी कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है. एक राज्य के प्रयासों को पूरे देश में लागू नहीं किया जा सकता है इसके लिए सुरीम कोर्ट की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए अब ठोस और प्रभावी क़दमों के बारे में सोचना शुरू करना ही होगा.
                        देश की राजनीति में अपराधियों का प्रभाव बढ़ने की घटना पर विचार करना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि एक समय अपनी लोकप्रियता में कमी आने के कारन कुछ स्थानों पर नेताओं ने स्थानीय अपराधियों के माध्यम से मतदान केंद्रों पर कब्ज़े कर चुनाव जीतना शुरू कर दिया था. कुछ समय बाद अपराधियों की समझ में यह आया कि जब इन हथकंडों से वे किसी नेता को चुनाव जितवा सकते हैं तो इनका अपने लिए उपयोग क्यों नहीं कर सकते हैं ? भारतीय राजनीति के अपराधीकरण की पृष्ठभूमि यहीं से तैयार हुई जो आज देश की विधायिका के लिए भले ही चिंता की बात न हो पर न्यायपालिका ने अपने स्तर से कई बार इस बारे में कड़े कानून बनाने के लिए निर्देशित भी किया है परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि अपराधियों से सांठगांठ के चलते आज किसी भी दल के लिए अपने दल को अपराधियों और उनके प्रभाव से मुक्त करने की इच्छाशक्ति ही नहीं बची है।
                       अब समय आ गया है कि किसी एक राज्य से इस परिवर्तन को शुरू किया जाये जिससे भारतीय राजनीति को आज़ादी के बाद की स्वच्छता के स्तर पर लाया जा सके. क्या स्वच्छ भारत अभियान सिर्फ भौतिक कूड़े कचरे से निपटने के लिए ही चलाया जा रहा है ? क्या अब समय नहीं आ गया है कि इस स्वच्छ भारत अभियान में हर तरफ की सफाई को शामिल किया जाये जिससे समाज को राजनीति का वह स्वरुप दिख सके जिसकी परिकल्पना भारतीय संविधान में की गयी है।  नेताओं को केवल वही बातें अच्छी लगती हैं और वे केवल उन्हीं पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित रखना चाहते हैं जिनसे उन्हें तात्कालिक और दूरगामी परिणाम मिलते रहते हैं. अब समय आ गया है कि जनता भी अपने स्तर से यह देखे कि किस राजनैतिक दल ने किस श्रेणी के अपराधों में शामिल लोगों को अपने प्रत्याशी बना रखा है इससे राजनैतिक दलों पर भी समुचित दबाव बनाया जा सके और आने वाले समय में देश की राजनीति में अपराधियों के स्तर को कम करने में सफलता पायी जा सके.   

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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

२०१८ के सन्देश

                                  पांच राज्यों में हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में जिस तरह से २०१४ से मूर्छा में चल रही कांग्रेस को मतदाताओं द्वारा संजीवनी दी गयी है उससे भारतीय लोकतंत्र की मज़बूती का ही पता चलता है. जीवंत लोकतंत्र की यही विशेषता होती है कि वह समय आने पर अपने लिए उचित अनुचित का चयन करने में अपनी भूमिका का सही ढंग से निर्वहन करने में कभी नहीं चूकता है. निश्चित तौर पर इन राज्यों से भाजपा के लिए कोई अच्छी खबर पहले भी नहीं आ रही थी पर जिस तरह से भाजपा ने कांग्रेस और राहुलगांधी की सोशल मीडिया पर अपने सोशल मीडिया टीम के दुष्प्रचार से एक नकारात्मक छवि बना दी थी कहीं न कहीं उसके कार्यकर्ताओं के दिल में भी यह बात घर कर गई कि राहुल गाँधी किसी भी परिस्थिति में नरेंद्र मोदी का किसी भी स्तर पर मुक़ाबला नहीं कर सकते हैं जिससे कार्यकर्ताओं की मज़बूत टीम और संघ का ज़मीनी मज़बूत समर्थन होने के बाद भी भाजपा को इन राज्यों में जनता की तरफ से एक सबक दिया गया है जो कि लोकतंत्र का एक हिस्सा ही है. भाजपा की तरफ से आत्म मुग्धता की जो स्थिति २०१४ से चल रही थी उससे बाहर निकलने के लिए पार्टी शाह या मोदी की तरफ से कोई प्रयास भी नहीं किया गया जबकि मोदी-शाह के गृह राज्य गुजरात में कांग्रेस ने किस तरह से भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थीं और रुझानों में एक बार वह भाजपा से आगे निकलती हुई भी दिखाई दे गयी थी ? उस समय जनता के मूड और धरातल की वास्तविकता को यदि भाजपा द्वारा पहचाना गया होता तो शायद कर्णाटक में वह सरकार बनाने के साथ इन राज्यों में भी सम्मानजनक तरीके से खुद को स्थापित रख पाती। निश्चित तौर पर भाजपा अपने प्रतिद्वंदियों से राजनैतिक रुप से निपटने के लिए एक बहुत निर्दयी दल है और यह हार मोदी और शाह को अपने घर को २०१९ के लिए दुरुस्त करने के लिए और भी प्रेरित ही करने वाले हैं जिससे कांग्रेस को सचेत रहने की आवश्यकता भी है.
                  कांग्रेस के लिए निश्चित रूप से यह परिणाम संतोष देने वाले हैं क्योंकि पूरे देश में उसके कार्यकताओं का मनोबल २०१४ में इतना टूट गया था जिसे संजीवनी की आवश्यकता भी थी. इन राज्यों के चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के लिए एक स्पष्ट भूमिका का निर्धारण किया और उसके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि किसी भी परिस्थिति में उसके नेताओं की तरफ से विरोधियों पर व्यक्तिगत और स्तरहीन हमले न किये जाये जिससे पार्टी को अनावश्यक वोटर्स की नाराज़गी न झेलनी पड़े जैसा कि गुजरात चुनाव में हुआ था. राहुल गांधी कांग्रेस को किस स्तर तक ले जायेंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है पर कुछ मामलों में उन्होंने जिस तरह की शुरुवात की है वह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत कहा जा सकता है. आज कांग्रेस ज़मीन पर उतर कर आम लोगों की समस्याओं और उनको दूर करने के लिए काम करने की इच्छुक दिखाई देती है जो कि पहले की कांग्रेस से बिलकुल अलग है. लोकतंत्र के लिए यह इस लिए भी अच्छा है कि कम से कम एक बार फिर से धार्मिक उन्माद और उग्र राष्ट्रवाद के बीच भी आम लोग भाजपा के मुक़ाबले कांग्रेस को कुछ हद तक विकल्प के रूप में देखने लगे हैं। आज हर विमर्श में काँग्रेस के प्रवक्ताओं की नयी पौध बेहतर तैयारी के साथ मैदान में आती है और अब वह अनावश्यक मुद्दों में उलझने के स्थान पर जनता से जुड़े मुद्दों पर ही बहस को केंद्रित रखने की कोशिशें करती भी दिखती है जिससे देश के आम मध्यवर्ग में उसका सन्देश आसानी से पहुँच भी जाता है कि उसकी तरफ से कम से कम कोशिशें तो की जा रही हैं. कांग्रेस के नए युवा प्रवक्ता शालीनता के साथ अपना काम करते हैं पर आवश्यकता पड़ने पर मुद्दों पर आधारित हमलों से भाजपा के वरिष्ठ प्रवक्तों को भी तथ्य हीन कर देते हैं.
                       भाजपा अब जहाँ आक्रामक रूप से कांग्रेस पर हमलावर होने जा रही है वहीं कांग्रेस के लिए भी बड़ी चुनौती के लिए तैयार होने के लिए समय कम ही बचा है. तीन राज्यों में सीएम चुनने में जिस तरह से राहुल गाँधी की तरफ से सावधानियां बरती जा रही हैं वह उनके सबको साथ लेकर बड़ी लड़ाई लड़ने की तैयारी भी कही जा सकती है क्योंकि भाजपा को किसी भी तरह से कमज़ोर मानकर अब कांग्रेस भी चुप नहीं बैठ सकती है आज भी भाजपा के पास ज़मीन पर काम करने के लिए पर्याप्त कार्यकर्त्ता और संघ का समर्थन मौजूद है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इन राज्यों में सरकार बनने के  १० दिनों के अंदर पूरे किये जाने वाले वायदों पर भी नज़र रख उन्हें अमल में लाना होगा जिससे जनता में यह सन्देश जा सके कि राहुल की कांग्रेस अब अपने वायदों को अमली जामा भी पहनाती है. भाजपा में मोदी और कांग्रेस में राहुल निर्विवाद रूप से सर्वोच्च नेता है इसलिए अब इन दोनों पर ही अपने दलों के मनोबल को उंच रख जनता से जुड़े रहने का दबाव भी आ गया है और यदि इन तीन राज्यों में कांग्रेस अपने वायदों पर चलती दिखाई दी तो २०१९ में वह मोदी के लिए मज़बूत चुनौती के रूप में सामने आ सकती है. इसलिए अब मामला रोचक स्थिति में पहुँच गया है जिसमें जनता के सरोकारों पर और भी बहस और निर्णय लेने की स्थितियां बनती दिखाई दे रही हैं.                         

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

अमृतसर हादसा

                                                            अमृतसर में दशहरा के अंतिम दिन रावण दहन के कार्यक्रम में जिस तरह से भीषण दुर्घटना हुई उसको देखकर प्रथम दृष्टया यही लगता है कि एक ज़िम्मेदार राष्ट्र के नागरिक के रूप में जीना सीखने में अभी हम सभी भारतीयों को बहुत समय लगने वाला है. यह सही है कि इस तरह के आयोजनों के समय अनुमान से अधिक भीड़ का जुटना पूरे देश में एक सामान्य सी लगने वाली घटना है पर हमारा प्रशासन जिस तरह से अनावश्यक कामों के दबाव में ही रहा करता है उसको देखते हुए इस तरह की घटनाओं को रोक पाना उसके लिए पूरी तरह से असंभव ही है. हम सभी जानते हैं कि इस तरह के आयोजनों के लिए किस तरह से पुलिस प्रशासन को आने वाले लोगों की अनुमानित संख्या की सूचना देनी होती है और उसके अनुरूप उनसे आवश्यक व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा की जाती है पर देश भर में सार्वजनिक कार्यक्रमों में जिस तरह से कुछ भी करने की स्वघोषित छूट नागरिक स्वतः ही हासिल कर लेते हैं उनके चलते भी इस तरह की दुर्घटनाएं होती रहती हैं और हम कुछ दिनों तक पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएं दिखा कर फिर से अपनी लापरवाहियों में जुट जाते हैं.
                                 इस बारे में हमेशा की तरह राजनीति शुरू हो चुकी है जबकि इसके लिए हम सभी की यह सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि जहाँ भी लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है या वे स्वतः ही किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रहे हैं तो उनके आने जाने के मार्ग के साथ ही कार्यक्रम स्थल पर आवश्यक सुरक्षा उपाय भी किये जा रहे हैं. हमारे देश में किसी भी कार्यक्रम में विभिन्न कारणों से आम लोगों का बड़ी सख्या में आना हमारी उत्सवधर्मिता की परम्परा को मज़बूत करता है पर आयोजक के रूप में ज़िम्मेदारी निभा रहे लोगों के साथ स्थानीय प्रशासन को भी इसमें पूरी तरह से शामिल होना चाहिए जो कि विभिन्न कारणों से कभी भी नहीं होता है. क्या इस तरह के किसी भी आयोजन के लिए आवश्यक अनुमति के साथ सुरक्षात्मक व्यवस्थाओं को करने के लिए आज कोई मज़बूत कानून या दिशा निर्देश मौजूद हैं? और यदि ऐसा है तो उनके अनुपालन के लिए किन लोगों की ज़िम्मेदारी निर्धारित की गयी है यह बात भी सभी लोगों के संज्ञान में होनी चाहिए। हर बात के लिए प्रशासन को कोसने के स्थान पर क्या हम नागरिकों को अपनी ज़िम्मेदारियों के निर्वहन के बारे में भी नहीं सोचना चाहिए ?
                               एक बड़ा हादसा क्या हमारी उन नैतिक ज़िम्मेदारियों की तरफ हमें मोड़ सकता है जिनकी हम हर जगह अनदेखी करते रहते हैं ? क्या नागरिकों के रूप में हमें यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि प्रशासन को हर स्तर पर सहयोग कर हम क्या अपने लिए सुरक्षित वातावरण बनाने की ईमानदार कोशिश नहीं कर सकते हैं? इस दुर्घटना में सभी दोषी हैं पर कोई भी अपनी ज़िम्मेदारी और कमियों को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं दिखाई दे रहा है जिससे आने वाले समय में इस तरह की घटनाओं को रोकने में कोई मदद नहीं मिलने वाली है. चौतरफा दबाव में सिर्फ आयोजकों के खिलाफ ही कार्यवाही होने की पूरी सम्भावना है जबकि लापरवाही के चलते आयोजक के साथ ही स्थानीय प्रशासन, रेलवे और वहां आने वाले लोग भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं. क्या हम सभी अपनी सामूहिक ज़िम्मेदारी को समझते हुए ऐसी कोई आदर्श स्थिति की कल्पना कर सकते हैं जिसमें ऐसी घटनाओं से पूरी तरह बचने की कोई व्यवस्था हो?  केंद्र और राज्य सरकारों को इस बारे में विचार कर भीड़ वाली जगहों पर आपातकालीन स्थित में लोगों को सही व्यवहार करने के लिए उचित दिशा निर्देश बनाते हुए आयोजकों के लिए आपदा प्रबंधन के प्रमुख गुर भी सिखाने की व्यवस्था करने के बारे में सोचना चाहिए जिससे भविष्य में सभी अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर पूरे देश में होने वाले ऐसे किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम को पूरी तरह से सुरक्षित बनाने में अपना योगदान दे सकें।

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

अधिकारियों का सरकार प्रेम

ऐसा नहीं है कि देश में पहले कभी अधिकारियों द्वारा सरकार या पार्टी की नीतियों और मंशा के अनुरूप काम न किया जाता हो पर जिस तरह से अयोध्या विवाद में यूपी के डीजी होमगार्ड्स ने भाजपा से जुड़े मुसलमानों के एक मंच पर उनके साथ भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए शपथ खायी उससे यही लगता है कि अब अधिकारियों में कार्यवाही का डर ही नहीं रह गया है. यह सही है कि हर व्यक्ति की निजी ज़िंदगी भी होती है और देश का संविधान उसे अपने धर्म, परंपरा और मूल्यों के अनुरूप जीवन जीने की पूरी स्वतंत्रता भी देता है पर जब कोई शासन या प्रशासन में जाता है उसे भारत के संविधान के प्रति शपथ लेनी होती है. फिर भी जिस तरह से पहले बरेली के डीएम ने कानून व्यवस्था में रोज़ ही सामने आने वाली नयी समस्या को लेकर प्रश्न उठाया वह भी सर्विस रूल के अनुसार गलत ही कहा जायेगा पर उनकी मंशा उन लोगों की तरफ इशारा करने की थी जो किसी भी परिस्थिति में अपनी ज़िद के कारण यूपी में लगातार प्रशासन के लिए सर दर्द बनते जा रहे हैं. डीजी होमगार्ड्स ने जिस तरह से एक कार्यक्रम में शपथ ली उससे स्थिति की गंभीरता को आसानी से समझा जा सकता है अयोध्या मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और किसी भी विचाराधीन मामले पर टिप्पणियां करने या उनके पक्ष विपक्ष के किसी कार्यक्रम को आयोजित करने से कोर्ट की अवमानना होती है. वैसे तो देश के सभी राजनैतिक दल अपने चुनावी लाभ को देखकर विभिन्न मुद्दों पर कोर्ट के आदेशों कि धज्जियाँ उड़ाते रहते हैं पर एक वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी जिस पर कानून व्यवस्था को बनाये रखने की ज़िम्मेदारी हो ऐसे विचाराधीन मामले में किस तरह से ऐसा कर सकता है ? बरेली के डीएम के मामले में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने उनके पार्टी प्रवक्ता जैसी बात करने और अनुशासन में रहने की बात की थी पर डीजी के मामले में अभी तक चुप्पी संदेहों को जन्म देती है.   
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रविवार, 12 नवंबर 2017

छवि बचाने के संकट में मोदी

                                                           २०१४ में अपने मज़बूत प्रचार और सटीक नीति के चलते गुजरात के सीम नरेंद्र मोदी ने जिस बड़े परिदृश्य का उपयोग करके देश की जनता के सामने कुछ ऐसा दिखाने में सफलता पायी थी जिसके चलते उन पर विश्वास करके देश ने उन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए स्पष्ट जनादेश दिया था. गुजरात में गुजराती अस्मिता और विकास की बातें करके जिस तरह से उन्होंने कई क्षेत्रों में बड़े बदलाव करने में सफलता पायी थी संभवतः वही उनकी राजनैतिक शक्ति भी थी पर पूर्ण बहुमत की भारत सरकार को भी बिना किसी जवाबदेही के गुजरात सरकार की तरह चलाने की मूलभूत गलती प्रारम्भ से ही मोदी और उनकी सरकार द्वारा की जाती रही है और कहा तो यहाँ तक जाता है कि यह केवल दो लोगों की सरकार है और उससे आगे वहां किसी की भी कोई सुनवाई नहीं होती है. अपने से लम्बे राजनैतिक और प्रशासनिक अनुभव रखने वाले नेताओं को मोदी की टीम द्वारा जिस तरह से किनारे किया गया था आज संभवतः उसके चलते भी कुछ मामलों में सरकार के पास ऐसे नेताओं की कमी दिखाई देती है जो सड़क से संसद तक सामने आने वाले मुद्दों पर गंभीरता से विपक्ष और जनता के साथ विश्वसीय संवाद बनाये रखने की हैसियत रखते हों.
                              ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने की अभी तक मोदी और उनकी टीम को कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी थी क्योंकि सत्ता में आने के साढ़े तीन वर्षों से वे, उनके मंत्री और भाजपा की तरफ से केवल कांग्रेस पर हमले ही किये जाते रहे हैं और भ्रष्टाचार के अधिकांश मामलों केंद्र और सम्बंधित राज्यों में भाजपा की सरकार होने के बाद भी कोई विशेष प्रगति दिखाई नहीं देती है जिससे कहीं न कहीं जनता के उस वर्ग में संदेह उत्पन्न होने लगता है जो किसी भी दल से जुड़ा हुआ नहीं है पर २०१४ में उसने मोदी के नाम पर भाजपा को वोट दिया था. यह एक विचारशील वर्ग का वोट है जो किसी भी समय किसी एक दल के साथ नहीं रहता है और समय आने पर अपने विवेक के अनुरूप काम करता है. आज भाजपा की मोदी सरकार और संघ जिस तरह से अपने मूलभूत वैचारिक सिद्धांतों पर जिस तरह से एक दूसरे के सामने खड़े नज़र आते हैं तो भाजपा की मोदी सरकार और विपक्ष में रहते हुए बयान देने वाली भाजपा में बहुत अंतर् दिखाई देता है. राष्ट्रवाद के नाम पर दूसरों को दबाने और स्वयं उस दिशा में कोई ठोस प्रयास न करने के कारण ही आज मोदी अपनी छवि को लेकर सोचने के लिए मजबूर होते दिख रहे हैं ऐसा नहीं है कि आज उनकी छवि बहुत कमज़ोर हो चुकी है पर जब इसी तरह की परिस्थिति में उलझ कर अटल सरकार जा चुकी हो तो संघ, भाजपा और मोदी के लिए यह सोचने का सही समय कहा जा सकता है.
            देश के बहुत सारे मामलों पर जिस तरह से संघ भाजपा और मोदी एक सुर में बोलते रहते थे उन पर सरकार में आने पर मोदी की तरफ से कुछ ख़ास नहीं जा सका है कश्मीरी पंडितों, धारा ३७०, राम मंदिर और समान नागरिक संहिता पर इतनी अधिक बातें की जा चुकी थीं कि आज पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार को उसे बोझ समझ कर ढोना पड़ रहा है साथ ही उसे इन ज्वलंत मुद्दों से बचने का कोई रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा है. कश्मीर में महबूबा सरकार में शामिल भाजपा आज जम्मू और लद्दाख के हितों की बात ही नहीं कर पाती है जबकि आज की परिस्थिति में जम्मू और लद्दाख को कश्मीर घाटी की राजनीति से मुक्त करने की कोशिश करने का एक अवसर भाजपा के पास था. चुनावी जीत के लिए मुद्दों को बनाये रखना एक बात है पर सत्ता में होकर उन पर निर्णय कर पाना बहुत ही मुश्किल काम है. अभी तक कांग्रेस को भ्रष्टाचार और नीतिगत जड़ता के मामले पर लगातार घेरने वाले पीएम की तरफ से आर्थिक मोर्चे पर कोई ऐसा काम नहीं किया गया है जिससे देश को कांग्रेस की नीतियों से हटकर चलने का मार्ग दिखाई देता ? एफडीआई, जीएसटी आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन पर भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए कभी देशहित में मनमोहन सरकार का साथ नहीं दिया और लागू करने के बाद जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण कर सुधार को जिस तरह से मज़ाक बना दिया गया है आज वह सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती है.
               अभी तक २०१४ की हार से मूर्छा में पड़ी कांग्रेस को अपने अतिवादी और जबरदस्ती उठाये जाने वाले क़दमों से अपने गृह राज्य गुजरात में जिस तरह से सामने खड़े होने का अवसर मोदी ने दिया है आज वह उनकी गलतियों का परिणाम ही अधिक लगता है क्योंकि एक तरफ आज वित्त मंत्रालय और सरकार जीएसटी के अनाप शनाप तरीके से निर्धारित किये गए स्लैब्स को सुधारने की कोशिशों में लगे हुए हैं वहीँ हाशिये पर पहुँच चुके कांग्रेस उपाध्यक्ष गुजरात के व्यापारियों के सामने हुंकार भरकर कहते हैं कि वे १८% के एक स्लैब के लिए संघर्ष करते रहेंगें और मौका मिलने पर वे केवल एक स्लैब करने की दिशा में काम भी करेंगें. यदि गौर से देखा जाये तो संघ-भाजपा के हिंदुत्व और विकास की प्रयोगशाला में कहीं न कहीं कुछ ऐसा अवश्य हो गया है जिसने पूरे देश में भाजपा का सामना न कर पाने की स्थिति में पहुंची कांग्रेस को गुजरात में दहाड़ने का मौका दे दिया है. इसके चुनावी परिणाम जो भी हों पर कांग्रेस और राहुल गांधी इस बात को रेखांकित करने में सफल होते दिख रहे हैं कि मोदी सरकार व्यापारियों और आम जनता के हितों पर विचार किये बिना ही हर सुधार को ज़बरदस्ती थोपने की कोशिशों में लगी हुई है.
                           आज भले ही व्यापारियों की समस्याओं के चलते सरकार जीएसटी के स्लैब्स का पुनर्निधारण कर रही हो पर इस मामले पर पहले से हमलावर रहने वाली कांग्रेस को यह कहने का मौका हर बार मिलता जा रहा है कि यह उसके द्वारा विरोध किये जाने का परिणाम है और उसके राज में केवल १८% का एक ही स्लैब होगा. आज मोदी के साथ खड़े रहने वाले भाजपा के नेताओं में भी कमी सी दिखाई देती है क्योंकि उन्होंने अपने संदेह असुरक्षा की भावना के चलते बड़े नेताओं को कुछ ख़ास ज़िम्मेदारी दे ही नहीं रखी है और उसके साथ ही अब जिस तरह से अधिकारियों द्वारा दिए गए आंकड़ों के आधार पर मंत्री बयान देते नज़र आते हैं उससे जनता को कोई जुड़ाव महसूस नहीं होता है. फिलहाल ४२ महीनों में मोदी के नायकत्व पर उनकी नीतियों के चलते उठते हुए सवाल आज उन्हें वो सब करने के लिए मजबूर कर रहे हैं जिनके लिए वे कभी कांग्रेस पर हमले किया करते थे.
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शनिवार, 30 सितंबर 2017

रेलवे की आधारभूत आवश्यकताएं

                                                     मुंबई के एल्फिंस्टन-परेल स्टेशन के यात्री उपरिगामी सेतु पर हुए हादसे के बाद एक बार फिर से वही बातें दोहराए जाने का क्रम शुरू हो चुका है जिसके चलते पूरे देश में हज़ारों जाने जा चुकी हैं या फिर हर समय हज़ारों यात्री इस खतरे के साथ ही जीने को मजबूर हैं. यह सही है कि भारतीय रेल का पूरा नेटवर्क आज की आवश्यकता के अनुसार क्षमता को कहीं से भी पूरा नहीं कर पाता है जिससे थोड़ी सी बात पर अफवाह फैल जाती हैं और पलक झपकते ही कोई हादसा हमारी आँखों के सामने होता है. यह सही है कि दशकों पुराने ढांचे को सुधारने में समय तो लगना ही है पर १८५३ में भारतीय रेल के शुरू होने के बाद से आज तक भी तो रेल का परिचालन होता रहा है और उसकी आवश्यकता के अनुरूप सुधार भी किये जाते रहे हैं पर पिछले कुछ दशकों से इसमें किसी न किसी स्तर पर कमियां अवश्य ही दिखाई दे रही हैं जिसके चलते अब पूरे रेल नेटवर्क में रख-रखाव से जुडी समस्याएं सामने आने लगी हैं और यदि समय रहते इनसे नहीं निपटा गया तो आने वाले समय में रेलवे और रेल यात्रियों के लिए समस्याएं बढ़ती ही जाने वाली हैं. अब सरकार को इस क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए रेलवे के पेंच कसने की तरफ ध्यान देना ही होगा जिससे देश में यातायात के इस सुगम साधन को और भी सुरक्षित किया जा सके.
                   लम्बे समय तक लगातार उपयोग में आने के कारण रेलवे में रखरखाव सदैव ही एक बड़ी चुनौती रहा है जिसके चलते रेलवे के अधिकारियों की तरफ से भी कुछ लापरवाहियां की जाती रहती हैं कई बार धन की कमी का रोना भी रहता है पर इस सबमें सबसे बड़ी समस्या रेलवे के लिए समय के साथ बदलाव को न करते रहना भी है. रेलवे में हर एक अवस्थापना और संरचना की एक निश्चित आयु होती है जिसके चलते उसे उस समय से पहले ही बदलने की आवश्यकता पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत होती है कई बार काम के दबाव या रेल परिचालन में संभावित व्यवधान को देखते हुए इस कार्य को लम्बे समय तक टाल दिया जाता है और ट्रेनों तक को लम्बे समय तक समस्या वाले स्थानों से धीमी गति से निकाल कर काम चलाया जाता है. इस पूरी कवायद में जहाँ यात्रा का समय बढ़ता है वहीं आसपास के बड़े स्टेशनों पर अनावश्यक रूप से दबाव भी बनता है जो कि रेलवे के समयबद्ध और सुरक्षित परिचालन में एक बड़ा व्यवधान साबित होता है और इससे निपटने के लिए रेलवे के पास कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नीति या कार्ययोजना का अभाव दिखाई देता है जिससे भी समस्याएं कम होने के स्थान पर बढ़ ही जाती हैं.
                   यदि आने वाले समय में रेलवे को देश के तेज़ी से बदलते हवाई यातायात से मुक़ाबला करना है तो उसे अपने आधारभूत कामों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पड़ने वाली है क्योंकि पीपीपी के आधार पर कोई भी निजी निवेशक केवल रेलवे की खाली पड़ी कीमती भूमि का उपयोग करने की दिशा में ही काम करने वाला है और उसका रेलवे की मूलभूत आवश्यकता से कोई सरोकार नहीं रहने वाला है तो उस परिस्थिति के लिए रेलवे को सीमित संख्या में निजी क्षेत्र को आमंत्रित करने की दिशा में सोचना चाहिए जिससे उसकी कीमती भूमि भविष्य में उसके विस्तार और अन्य परियोनाओं के लिए उपलब्ध रह सके. मुंबई हादसे के बाद रेल मंत्रालय को सबसे पहले पूरे देश में इस तरह के बड़े स्टेशनों पर मूलभूत संरचनाओं के बारे में एक श्वेत पत्र जारी कर यह बताना चाहिए कि आज इन स्टेशनों पर इनकी क्या स्थिति है और एक समय सारिणी के अनुरूप आने वाले दो या तीन वर्षों में इस तरह की समस्या से निपटने की कार्ययोजना पर अमल करना चाहिए जिसमें सबसे पहले यात्रियों की संख्या के अनुरूप बड़े स्टेशनों पर आवश्यक सुविधाओं को उपलब्ध कराया जाना चाहिए और उसके बाद उनके रख रखाव की समुचित व्यवस्था पर भी ध्यान देने के लिए एक मज़बूत और उत्तरदायी तंत्र बनाना चाहिए.
                     हर मंडल में इस तरह के काम को देखने के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए जिससे अन्य अधिकारी काम के बोझ के चलते इन कामों पर ध्यान न दिए जाना का बहाना न बना सकें और काम को समय से पूरा भी किया जा सके. रेलवे को मेट्रो रेलवे की तरह एक नयी टीम बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ना ही होगा क्योंकि जब तक दक्ष और कार्यकुशल लोगों के हाथों में यह सब पूरी तरह से नहीं दिया जायेगा तब तक कुछ भी सही नहीं हो सकता है. इन्हीं परिस्थितियों में देश भर की मेट्रो रेलवे आखिर किस तरह से समयबद्ध होकर हर काम कर सकती हैं जबकि वहां पर गए अधिकांश कर्मचारी भी रेलवे से या उसकी धारणा के अनुसार ही होते हैं ? मतलब स्पष्ट है कि रेलवे में अभी उस तरह की कार्यसंस्कृति का विकास नहीं हो पाया है जैसा मेट्रो ने कम समय में विकसित कर लिया है और उसके चलते ही आज देश में स्थापित विभिन्न शहरों की मेट्रो अपने काम को समय से पूरा करने के लिए जानी जाती हैं.
                       अब समय आ गया है कि पूरी परिस्थिति पर ध्यान देते हुए एक विस्तृत कार्ययोजना बनायीं जाये और उसकी बागडोर ऐसे अधिकारियों के हाथों में होनी चाहिए जो आगामी दो या तीन वर्षों में रिटायर न हो रहे हों जिससे अधिकारियों को बीच में बदलने से काम प्रभावित न हो सके. जब इतनी अधिक उम्र में ई श्रीधरन अपने काम को सही समय से करने के लिए जाने जाते हैं तो यह सब काम करने वाले श्रीधरन जैसे और मेट्रो मैन हम सामने क्यों नहीं ला सकते हैं ? कहीं न कहीं इच्छा शक्ति में कमी के चलते ही यह सब नहीं हो पा रहा है और अब इस पर ध्यान देकर रेल यात्रा को सुरक्षित किये जाने का समय आ चुका है क्योंकि इसमें चूकने पर रेलवे के साथ सरकार और देश के नागरिकों के जीवन पर व्याप्त संकट को किसी भी तरह से कम नहीं किया जा सकता है.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...