मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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गुरुवार, 30 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-5

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-4 से आगे........
                                               देश की सबसे पुरानी पार्टी जिसने देश की आज़ादी के लिए लम्बा संघर्ष किया और जिसने आज़ादी के बाद सबसे अधिक समय तक देश की सत्ता संभाली आज उसकी यह स्थिति आ गयी है कि दो लोकसभाओं में उसके पास नेता विरोधी दल का आधिकारिक पद भी नहीं बच रहा है तो उसको अपने पूरे संगठन से लगाकर शीर्ष स्तर पर नीतियां बनाने वाली हर समिति और उसमें शामिल रहने वाले नेताओं पर ध्यान देना ही होगा। यह सही है कि आम कांग्रेस कार्यकर्त्ता नेहरू-गाँधी परिवार को पार्टी में सबसे बड़ा मानता है पर क्या पार्टी में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय नेता इस बात पर कभी ध्यान देते हैं कि आखिर उनकी जनता पर कितनी पकड़ है? क्या पार्टी में बड़े पदों को संभाल रहे यह लोग जो लम्बे समय तक केंद्र और राज्यों में मंत्री भी रह चुके हैं आज भी अपने को पार्टी के हित में ज़मीन पर उतारने का साहस रखते हैं जिससे उन्हें बदलते भारत और जनता की समस्याओं का सही तरह से आंकलन करने में सहायता मिल सके? क्या सत्ता के आदी हो चुकें नेताओं के लिए पार्टी कोई बड़ी चुनौती देकर उन्हें क्षेत्र में भेजना भी चाहती है या ये सिर्फ दिल्ली में  पार्टी मुख्यालय में सजावटी चेहरे बनकर पार्टी के लिए संघर्ष करने से दूर भागने वालों की एक जमात खडी करना चाहती है ?
                                      इस बार पार्टी की हार को लेकर राहुल गांधी की तरफ से जो कड़ा कदम उठाया जा रहा है उससे कांग्रेस खुद ही सकते में है क्योंकि पार्टी के राहुल से इस्तीफ़ा मांगने की किसी की हिम्मत नहीं होती थी और इस अप्रत्याशित कदम से पार्टी की समझ में नहीं आ रहा है कि वह क्या करे ? राहुल की दूसरी शर्त जो मात्र सूत्रों के माध्यम सामने सामने आ रही है कि उनके परिवार से इतर अध्यक्ष खोजने का काम पार्टी को करना है उससे भी पार्टी को इस अँधेरी सुरंग से बाहर निकलने का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है. संभवतः राहुल पद से दूर रहकर राजनीति में सक्रिय रहने को प्रयासरत हों या हो सकता है कि आने वाले समय में पार्टी की कमान दूसरों के हाथों सौंप वे खुद केवल अपने क्षेत्र की राजनीति पर ही ध्यान देना शुरू करें। अमेठी में उनकी हार से उनका संगठन पर गुस्सा जायज़ भी है क्योंकि पूरे देश में प्रचार करने के लिए व्यस्त होने के चलते उनके पास अपने क्षेत्र के लिए समय कम था पर पार्टी के संगठन द्वारा भी उनको जिस तरह से अँधेरे में रखा गया वह भी अपने आप में बड़ी बात है और पूरे देश में संगठन का यही हाल हुआ पड़ा है यहाँ तक कि जिन तीन राज्यों में नवम्बर १८ के बाद सत्ता मिली है वहां भी संगठन का काम सुस्त या रुका पड़ा है.
                                       कांग्रेस को अपने को फिर से खड़ा करने की कोशिशों कोशिशों में  सबसे पहले उन राज्यों पर नज़र डालनी होगी जहाँ शीर्ष नेतृत्व को गलत सलाह देने के कारण राज्य के मज़बूत नेतृत्व वाले नेताओं ने अपने क्षेत्रीय संगठन बना लिए और आज वे वहां पर कांग्रेस के मुक़ाबले अधिक स्वीकार्य हैं. वाईएसआर कांग्रेस, एनसीपी और तृणमूल कांग्रेस के साथ पार्टी को सम्मानजनक तरह से उनकी राजनैतिक परिस्थितियों को देखते हुए बात करनी चाहिए और उनके साथ किसी ऐसे समझौते पर पहुंचना चाहिए जिससे आने वाले समय में कांग्रेस की विचारधारा के पैरोकार ये दल भी कांग्रेस के सहयोगी बने न कि उसके प्रतिद्वंदी। यह भी निश्चित है कि आने वाले समय में कांग्रेस की विचारधारा से निकले ये दल यदि साथ आते हैं तो पार्टी के लिए मज़बूती का काम किया जा सकेगा।  कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व को अपने उन सलाहकारों से भी पीछा छुड़ाना होगा जिनके चलते ज़मीनी आधार वाले ये नेता अपनी उपेक्षा के चलते पार्टी से अलग हो गए . राहुल अध्यक्ष पद छोड़ते हैं या फिलहाल कार्यकारी अध्यक्ष बने रहते हैं यह सब तो भविष्य के गर्भ में है पर आज भी यदि राष्ट्रीय स्तर पर किसी ने नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले अपनी स्वीकार्यता साबित की है वह भी राहुल गाँधी ही हैं. यह कांग्रेस का अंदरूनी मामला है कि वह किसे किस पद पर देखना चाहती है परन्तु यदि राहुल या आने वाले किसी अन्य अध्यक्ष को पार्टी में परिवर्तन करने से रोका जाता है तो अगली बार केरल में भी पार्टी अपनी स्थिति को खोने ही वाली है क्योंकि मोदी-शाह और संघ की प्राथमिकता पर पहले से ही केरल चल रहा है.                    
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बुधवार, 29 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-4

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-3 से आगे........

                                                                     आज जिस तरह से युवा पीढ़ी की ज़िंदगी में सोशल मीडिया का दखल हो गया है उसको देखते हुए अब कांग्रेस को अपने ज़मीनी संगठन को मज़बूत करने के प्रयासों के साथ ही अगले एक साल में हल ज़िले में सोशल मीडिया टीम का गठन करना चाहिए और उसके अगले साल में यह ब्लॉक और तहसील स्तर तक के कार्यकर्ताओं के लिए अपने बात कहने का मंच बनना चाहिए जिससे राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय, प्रादेशिक और स्थानीय मुद्दों के साथ पार्टी अपने कार्यकर्ताओं से सीधे संपर्क बनाये रख सके. आवश्यकता पड़ने पर सोशल मीडिया के माध्यम से उपयोगी जानकारी भी निचले स्तर तक पहुंचाई जा सकती है. इस बार के चुनाव में कांग्रेस के तीन राज्यों में किसानों की कर्जमाफी के बाद ही मोदी सरकार ने किसान सम्मान निधि आम चुनाव से पहले देने का निर्णय किया जिसका लाभ भी उसे मिला पर कांग्रेस अपनी इस उपलब्धि को घोषणापत्र से आगे बढ़ाकर जनता तक नहीं पहुंचा पायी जिसे उसे नुकसान हुआ यदि पार्टी के पास सोशल मीडिया की संगठित टीम हो तो इस तरह की जानकारी को कार्यकर्ताओं के माध्यम से आम जनता तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है.
                                    सभी जानते हैं कि भाजपा की सोशल मीडिया टीम निरंतर कांग्रेस से जुड़े आज़ादी के प्रतीकों पर सुनियोजित हमले किया करती है ऐसी परिस्थिति में जब तक कांग्रेस के पास भी उन बातों के बारे में फैलाये जा रहे भ्रम को दूर करने का काम नहीं किया जायेगा तब तक भाजपा जनता में कांग्रेस की और भी नकारात्मक छवि गढ़ने में सफल होती रहेगी। प्रतिकार करने के लिए जब सभी तैयारियां पूरी हो जाएँ तो भी सोशल मीडिया टीम को भाजपा की तरह अनाप-शनाप बातें करने के स्थान पर ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बात करनी होगी और भाषाई मर्यादा का सदैव ध्यान रखना होगा क्योंकि आज भाजपा के पास बहुत बड़ी टीम है जो तथ्यों की बात करने वालों पर अपने कुतर्कों से हमले करने के लिए सदैव तैयार रहती है इसलिए इस केंद्रीय टीम में कांग्रेस के इतिहास को जानने वाले लोग रखे जाएँ या जिन लोगों को यहाँ बैठाया जाये उनको पार्टी की तरफ से पार्टी और देश के इतिहास के साथ तथ्यात्मक जानकारी दी जाये जिससे वे परिस्थितियों के साथ सामंजस्य बैठा सकें।
                                     आज संभवतः कुछ प्रदेशों में ही सोशल मीडिया टीम कुछ हद तक काम कर पा रही है क्योंकि यहाँ भी तथ्यों के बिना बात करने वाले लोग अपने आकाओं के आशीर्वाद से जमे बैठे हैं जिनसे पार्टी को किसी भी स्तर पर कोई लाभ नहीं मिलता है और सोशल मीडिया टीम केवल दिखावा बनकर ही रह जाती है. कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ी समस्या भाजपा से मुक़ाबला करना नहीं है बल्कि अपनी कमज़ोरियों से पार पाने की है क्योंकि आज पार्टी में जो शीर्ष नीति नियंता बने बैठे हैं उनका चुनावी राजनीति से कोई सीधा सरोकार नहीं है जिसके चलते उनको चुनाव लड़ने वाले नेताओं की उन समस्याओं का कोई अंदाज़ा भी नहीं है जिसका सामना उन्हें रोज़ ही करना पड़ता है. सबसे पहले कांग्रेस को उन राज्यों में अपने सगठन और सोशल मीडिया टीम को सुधारना चाहिए जहाँ अगले एक वर्ष में चुनाव होने वाले हैं. जनता केंद्रीय स्तर पर तो मोदी के साथ दिखाई देती है पर यदि सही राजनीति के साथ आगे बढ़ा जाए तो विधानसभाओं में वह कांग्रेस या अन्य दलों को भी समर्थन देती दिखाई देती है. कांग्रेस को तुरंत काम शुरू करते हुए इन राज्यों पर अधिक ध्यान देना ही होगा तभी वह राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का २०२४ में धरातल पर मुक़ाबला कर पाने की स्थिति में होगी.      
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मंगलवार, 28 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-3

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-2 से आगे
                                             शीर्ष स्तर पर कांग्रेस कार्यसमिति में जिस तरह से राहुल गांधी ने पार्टी की शर्मनाक पराजय के लिए खुद को ज़िम्मेदार मानते हुए इस्तीफ़ा दिया और उसे नामंज़ूर कर दिया गया उसके बारे में भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है. देश के महत्वपूर्ण राज्यों में दशकों से सत्ता से बाहर होने के बाद भी आज जिस तरह से सीमित संख्या में बचे हुए कांग्रेसियों में केवल पद पर बने रहने की लालसा है यदि इस पर पूरी तरह से विराम नहीं लगाया गया तो आने वाले समय में पार्टी की और भी दुर्दशा होने वाली है. आज देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है तो उसकी तरफ से उन राज्यों में आमूल-चूल परिवर्तन करते हुए अब पुराने जमे हुए घाघ नेताओं को पदों से हटाकर नए नेतृत्व को समाने लाने की कोशिश की जानी चाहिए। वर्षों से पदों पर बैठे इन चंद बड़े नामों के कारण ही पार्टी आगे नहीं बढ़ पा रही है जिससे ज़मीनी स्तर पर उसका जुड़ाव आम लोगों से भी नहीं हो पा रहा है. आज भाजपा जहाँ मज़बूत है वह वहां भी अपने संगठन पर संघ के सहयोग से बराबर स्थितियों को और भी मज़बूत बनाने का काम करने में निरंतर लगी रहती है जबकि पिछले वर्ष तीन राज्यों में चुनाव जीतने के बाद भी कांग्रेस की राज्य इकाइयों की तरफ से ऐसे कदम नहीं उठाये जा रहे हैं जिससे उन राज्यों में ही कांग्रेस और मज़बूती के साथ नए लोगों तक अपनी पहुच बना सके.
                                               आज जब भाजपा मोदी और शाह की जोड़ी के निर्देशन और नेतृत्व में निरंतर सफलता के नए आयाम छूती जा रही है तो उस परिस्थिति में नए लोगों को कांग्रेस से जोड़ना और भी बड़ी चुनौती होने वाला है. यदि कांग्रेस को सम्पूर्ण देश की राजनीति में एक बार फिर से प्रासंगिक होना है तो उसे अपने सेवा दल, महिला कांग्रेस, युवा कांग्रेस, छात्र कांग्रेस को पूरी तरह से सक्रिय करना ही होगा जिससे समाज के हर वर्ग के लोगों की समस्याओं के साथ संघर्ष करने की उसकी पुरानी भावना को ज़िंदा किया जा सके. राजनैतिक रूप से निर्णय लेने और उनके परिणामों के अनुरूप नेताओं की ज़िम्मेदारी तय करने के लिए अब कांग्रेस को खुद को तैयार करना ही होगा वर्ना आने वाले चुनावों में उसकी पराजय एक स्थायी भाव भी बन सकती है जिससे आज जो भी समर्पित कार्यकर्त्ता पार्टी के साथ जुड़े हुए हैं वे भी पार्टी से किनारा करते नज़र आने लगेंगे। पार्टी को अंदरूनी समस्याओं से निपटने के लिए एक व्यवस्था बनानी होगी क्योंकि जो धरातल पर मज़बूत नेता हैं उसकी बातों को सुना जाना बहुत आवश्यक है. २०१३ के बाद से ऐसे बहुत से नेता सामने आये जिन्होंने नेतृत्व की तरफ से उपेक्षा के चलते पार्टी से किनारा कर लिया और आज वे भाजपा में जाकर महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं. पार्टी को इस संकट को भी देखना होगा वर्ना गलत सलाहों पर लिए गए फैसलों से पार्टी का निरंतर नुकसान होता रहेगा।
                                             पार्टी में राहुल गांधी की लाख कोशिशों के बाद भी वह परिवर्तन नहीं आ पाया है जिसमें एक सामान्य कार्यकर्ता अपनी बात को पार्टी के मंच पर रखने के लिए कोई उपयुक्त मंच पा सकता हो जब तक ज़मीन से जुड़े नेताओं की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया जायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में पार्टी के बूथ मज़बूत नहीं हो सकते हैं. अगले कुछ वर्षों तक परिणामों की चिंता न करते हुए पार्टी को महत्वपूर्ण राज्यों में बदलाव को शुरू करना ही होगा यूपी जैसे राज्य में जहाँ से केंद्र की सत्ता के समीकरण बनते बिगड़ते हैं वहां राज्य का नेतृत्व किस तरह से काम करता है यह किसी से भी छिपा नहीं है. यदि  इसी तरह के सुविधाभोगी नेताओं के हाथों में पार्टी की कमान रहती है तो यूपी में पार्टी का अभी तक बचा हुआ ६% वोट भी छिटकने में देर नहीं लगने वाली है. जब देश की लगभग १५० सीटों यूपी-बिहार-बंगाल में पार्टी के पास कुछ बचा ही नहीं है तो उससे केंद्र में सत्ता पाने की आशा भी मृग मरीचिका से अधिक कुछ नहीं कही जा सकती है. राजनैतिक परिणामों में आज कांग्रेस निम्नतम स्तर पर पहुंची हुई है और यदि इस स्थिति में जल्दी ही बड़े बदलाव न किये गए तो आने वाले समय में पार्टी के कमज़ोर संगठन को पूरी तरह ध्वस्त होने में समय नहीं लगने वाला है.
क्रमशः .........                    
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रविवार, 26 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-2

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1 से आगे ........        
                                      सबसे पहले कांग्रेस को अपने संगठन के बारे में सोचना होगा क्योंकि आज अधिकांश जगहों पर संगठन की जो स्थिति बनी हुई है उसके दम पर भाजपा के मज़बूत संगठन और संघ के जमीनी समर्थन का सामना नहीं किया जा सकता है. विचार करने योग्य यह भी है कि कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के चुनावी क्षेत्रों में संगठन की हालत इतनी कमज़ोर क्यों है जबकि उनके नाम पर पार्टी पूरे देश में जनादेश मांगती है?  कांग्रेस और देश में राजनीति का एक दौर वह भी था जब नीचे से आगे बढ़ने वाले कार्यकर्ताओं के लिए चुनावी राजनीति में हिस्सा लेने के लिए एक प्रक्रिया हुआ करती थी पर पिछले कुछ दशकों से इन बातों पर ध्यान देना बिलकुल ही बंद कर दिया गया है जिससे पार्टी का निचले स्तर का संगठन भी विपक्षियों के कमज़ोर होने और अपने नेता के प्रभाव के दम पर ही चुनाव लड़ने की प्राथमिकता में लगा था जिससे उसका जनता के सरोकारों से कोई मतलब ही नहीं रह गया और युवा पीढ़ी ने अपने को इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में भाजपा के निकट पाया कर उसके लिए वोट भी किया। 
                                           इस मामले में यदि अमेठी को एक उदाहरण के तौर पर देखें तो वहां के संगठन को सदैव यही लगता रहता था कि यह पार्टी और गाँधी परिवार की सीट है इसलिए यहाँ उसे कोई खतरा नहीं है जिससे संगठन ने आम जनता से संवाद बनाये रखने को इतनी प्राथमिकता नहीं दी जितनी उसे मिलनी चाहिए थी. इसका परिणाम आज सबके सामने है क्योंकि कांग्रेस का संगठन वहां केवल राहुल के भरोसे ही रहा जबकि पिछली बार  १ लाख वोटों से हारने के बाद भी भाजपा ने स्मृति ईरानी के लिए खुलकर पूरे क्षेत्र में काम किया और इस बात का प्रचार भी किया कि गाँधी परिवार ने वहां के नागरिकों के लिए कुछ भी नहीं किया। आज की युवा पीढ़ी के लिए विकास की वही छवि बन रही है जो भाजपा बनाना चाह रही है क्योंकि कांग्रेस कहीं से भी इस बात का प्रतिकार करती हुई नहीं दिखाई दी कि राज्य में उसकी सरकार न होने के कारण केंद्र में सरकार होने पर भी वह क्षेत्र के लिए उतना काम नहीं कर पायी जितना राज्य में सरकार होने से संभव था. अमेठी में कांग्रेस की इस कमज़ोरी का भाजपा ने पूरा लाभ लिया और युवाओं की सोशल मीडिया में पैठ को देखते हुए राहुल गाँधी की नकारात्मक छवि बनाने में कोई कस्र भी नहीं छोड़ी। इस मामले कांग्रेस की हिचकिचाहट ने उसके लिए और भी अधिक समस्या खडी कर दी क्योंकि उसने पूर्व सांसद राम्या को सोशल मीडिया में सीमित काम करने को कहा जबकि उनके आने के बाद कांग्रेस की सोशल मीडिया टीम कई जगहों पर भाजपा की टीम पर बढ़त बनाने में सफल होती दिखाई दे रही थी.
                                       आज यह सवाल भी प्रासंगिक है कि अमेठी ने इतने वर्षों तक कांग्रेस को जितना सम्मान दिया क्या संगठन के रूप में पार्टी ने वहां के लोगों से पूरा संपर्क बनाये रखा?  निश्चित तौर पर राहुल गांधी के पास मूर्छा में पड़ी हुई कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम था और है पर क्या अमेठी की कांग्रेस कमेटी उनसे यह आशा करती है कि वे स्वयं पूरे देश के मुक़ाबले अमेठी में अधिक समय देने का काम करें?  अगर कांग्रेस के पास बूथ लेवल के माध्यम से संगठन को खड़ा करने का कोई प्लान है तो उसकी परीक्षा अमेठी में ही करनी होगी।  कांग्रेस के बड़े नेताओं को इस बार भाजपा ने जिस तरह से घेरने में सफलता पायी थी अगली बार वह इस कड़ी में और भी अधिक मुखर होने वाली है क्योंकि रायबरेली से २०२४ में सोनिया गाँधी चुनाव लड़ेंगीं या  नहीं अभी तय नहीं है पर पिछले चुनावों से इस बार के चुनावों तक उनकी जीत का अंतर तीन लाख से घटकर एक लाख साठ हज़ार पर आ गया है और मेरा यह मानना है कि भाजपा का पूरा ध्यान अब रायबरेली पर ही होने वाला है और यदि कांग्रेस संगठन ने अमेठी की तरह लापरवाही की तो निश्चित तौर पर अगली बार रायबरेली में भी अमेठी की कहानी दोहराई जाने वाली है. क्रमशः ......          
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सोमवार, 29 अप्रैल 2019

दिखावे की राजनीति

                                                        देश में जिस तरह से आम चुनावों या विधानसभाओं के चुनावों में विभिन्न दलों के प्रत्याशियों के पक्ष में सम्बंधित दलों के स्टार प्रचारकों की तरफ से रोड शो करने माहौल बनाये जाने का काम किया जाता है वह निश्चित रूप से उनका संवैधानिक अधिकार है पर पहले बड़े नेताओं की छुटपुट होने वाली बड़ी रैलियों के अलावा प्रत्याशी स्थानीय स्तर पर अपने प्रयासों से ही शांत वोटर्स को प्रभावित करने का काम किया करते थे. इधर कुछ चुनावों से रोड शो जैसा दिखावा सामने आने से इनकी चपेट में आने वाले क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन प्रभावित होने लगा है जिससे सभी राजनैतिक दलों के साथ चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन को भी इस बारे में विचार करने का समय आ गया है कि चुनाव के नाम पर आम नागरिकों को किसी भी तरह की अनावश्यक परेशानी का सामने न करना पड़े. इस बारे में केंद्रीय चुनाव आयोग को ही कुछ ठोस कदम उठाने के बारे में सोचना शुरू करना होगा क्योंकि अपने माहौल बनाने के भ्रम के चलते कोई भी राजनैतिक दल इसको रोकने की बात से सहमत नहीं होगा।
                            देश के उच्च सुरक्षा प्राप्त नेताओं के इस तरह से रोड शो करने से जहाँ सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ जाती है वहीं खुद इन बड़े नेताओं की सुरक्षा में गंभीर चूक हो जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है. इन नेताओं की चुनावी सभाओं में आम जनता का जो धन पानी की तरह बहाया जाता है वह संगठित रूप से किसी बड़े प्रोजेक्ट में डालकर उसकी गति बढ़ाने के काम भी आ सकता है पर देश के राजनैतिक दीवालियेपन के कारण इस दिशा में कोई सोचना भी नहीं चाहता है। यहाँ पर यह बात भी सामने आ सकती है कि देश के संविधान ने हर चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को अपने हिसाब से प्रचार करने की छूट दे रखी है पर साथ उसी संविधान ने देश के आम नागरिकों को भी अपनी स्वतंत्रता के साथ जीने की आज़ादी भी दे रखी है. नेताओं की इस तरह की दिखावे वाली राजनीति के चलते अब यह कौन तय करेगा कि यहाँ पर नेताओं और आम जनता के अधिकारों की रक्षा किस तरह से की जा सकती है?
                          इस बारे में सबसे सही यही रहेगा कि सभी दल मिलकर इस बारे में सोचें क्योंकि कई बार नेताओं के इस तरह से प्रचार करने के समय आम यातायात न चाहते हुए भी बाधित हो जाता है जिससे आवश्यक कार्य से आने जाने आम लोगों के साथ अति आवश्यक कार्यों में लगे हुए पुलिस, प्रशासन, फायर और एम्बुलेंस के लिए बहुत बड़ी समस्या खडी हो जाती है. क्या कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता है कि जिसमें नेताओं को समुचित रूप से अपने प्रचार को करने की छूट भी मिल जाये और आमलोगों को किसी भी परेशानी का सामना न करना पड़े ? क्या रोड शो को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए या फिर इसमें शामिल वाहनों और लोगों की संख्या को उसके मार्ग के अनुरूप सीमित रखने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे नेताओं को भी कानून के अनुरूप कार्य करने की आदत पड़ सके. इस बात को उन लोगों के बारे में सोचते हुए भी आगे बढ़ाना चाहिए जिन पर इस तरह के दिखावे का सबसे ज़्यादा असर पड़ता है क्योंकि जब तक पीड़ितों के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा जायेगा तब तक इसका कोई सही हल नहीं निकाला जा सकेगा।      

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बुधवार, 24 अप्रैल 2019

लोकतंत्र, चुनाव और शालीनता

                                                 ऐसा नहीं है कि २०१९ में देश में पहली बार कोई आम चुनाव हो रहे हैं पर वर्तमान में चल रहे चुनावों में जिस तरह से हर दल के शीर्ष नेता द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन किया जा रहा है वह भले ही उस सम्बंधित दल को कुछ वोट दिलवाने में मदद कर दे पर इससे हमारे उस लोकतंत्र की गंभीर खामी ही सामने आती है जिसमें चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था भी चाह कर कुछ ठोस नहीं कर पाती है. यह सही है कि आज चुनाव प्रचार को जिस स्तर पर ले जाया गया है उसमें पुरानी पीढ़ी के नेता अपने आपको सहज नहीं पाते हैं फिर भी उनके पास कोई अन्य रास्ता भी नहीं बचता है क्योंकि यदि उन्हें राजनीति में रहना है तो इस सबका सामना करना ही होगा. इस मामले में सभी दलों ने एक जैसा रवैया अपना रखा है इसलिए किसी एक दल की तरफ इंगित करने से काम नहीं चलने वाला है फिर भी क्या देश के राजनैतिक दलों को यह नहीं सोचना चाहिए कि चुनाव जीतने-हारने के बाद कमोबेश उन्हीं चुनिंदा बड़े नेताओं के साथ जब सदन में बैठना है तो विमर्श का स्तर इतना घटिया करने की आवश्यकता क्या है?
                                              आज की परिस्थिति में यदि देखा जाये तो हर नेता किसी भी तरह से दुसरे दल के नेता को नीचे दिखाना ही अपनी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण मानने लगा है जिससे लोकतंत्र और शिष्टाचार की वह सामान्य सीमा रेखा भी कई बार अनावश्यक रूप से लांघी जानी लगी है जिसको अभी तक सदन या चुनावों में लांघना उचित नहीं मना जाता था।  इस बात पर विचार करना भी आवश्यक है कि आखिर देश के नेताओं की यह स्थिति क्यों बन गयी है कि जो अपने चुनावी घोषणापत्रों में किये जाने वाले विकास के लम्बे चौड़े वायदों को भूलकर इतनी घटिया बातचीत पर उतर आते हैं जिसका कोई औचित्य नहीं दिखता है?  संभवतः आज नेताओं को यह लगने लगा है कि जनता से चाहे कुछ भी कह दो पर जब चुनाव हों तब जनता की बातों को गंभीर मुद्दों की तरफ मत जाने दो और हलकी छिछली राजनीति में को उलझाकर देश के समक्ष खड़े वास्तविक मुद्दों को दूर दफ़न कर दो जिससे भावनाओं में बहती हुई जनता अपनी प्राथमिकताओं को भूलकर उन्हीं घटिया बातों में उलझकर गंभीर सवाल करने की शक्ति खो दे?
                                               क्या यह सही समय है कि राजनेता अपने स्तर से एक बार फिर से चुनावी माहौल की गरिमा को वापस लौटाने का काम शुरू करें?  क्या हमारे विविधता भरे देश में अब इस बात की आवश्यकता नहीं है कि अन्य अखिल भारतीय सेवाओं की तरह चुनाव सुधार करते हुए एक चुनाव से सम्बंधित कैडर भी बनाया जाये जिसमें शुरुवात से ही चुनावी माहौल को समझने के लिए अधिकारियों को तैयार किया जाये और उनमें से ही वरिष्ठ लोगों को संवैधानिक बाध्यता के साथ शीर्ष स्तर पर काम करने का अवसर दिया जाये ? ऐसा करने से चुनाव आयोग की गरिमा तो बढ़ेगी ही साथ नेताओं को अपने प्रिय लोगों को चुनाव आयोग में बैठाने की परंपरा पर भी लगाम लगायी जा सकेगी।  निश्चित तौर पर चुनाव आयोग ने १९९१ में शेषन युग के बाद इस बार सबसे अधिक बेबसी दिखाई है क्योंकि शेषन के बाद लगभग हर चुनाव आयुक्त ने नियमों का कड़ाई से अनुपालन किया और जनता में आयोग की साख को मज़बूत किया पर वर्तमान में आयोग ने अपनी उस बनी हुई साख को गंवाना शुरू कर दिया है और कोई नहीं जानता है कि यह अभी और कितने नीचे तक जाने वाला है?  देश को मज़बूत नेता ही नहीं बल्कि मज़बूत संवैधानिक संस्थाओं की भी बहुत अधिक आवश्यकता है क्योंकि जब तक सभी सम्बंधित तंत्र मज़बूत नहीं होंगे तब तक लोकतंत्र को मज़बूत करना केवल एक सपना ही रहने वाला है.
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शुक्रवार, 8 मार्च 2019

२०१९ की राजनीति का घमासान

                                        चुनावी वर्ष होने के कारण इस बार लम्बे समय बाद पूर्ण बहुमत की सरकार का नेतृत्व कर रहे पीएम मोदी के सामने सबसे गंभीर संकट यह है कि अपनी घोषित लोकप्रियता को वे किस हद तक आगामी चुनावों में भुनाने में सफल हो पाएंगे? जिस तरह से राफेल मामले को लेकर वे खुद निशाने पर हैं और उन्होंने जो भी सोचकर शीर्ष स्तर पर निर्णय लिया हो पर भारत के हिसाब से उसमें कई कमियां दिखाई दे रही हैं जिनको लेकर खुद वे और उनकी सरकार सहज नहीं हो पा रही है. इस बीच में पुलवामा हमले और उसके बाद बालाकोट प्रतिक्रिया से स्थिति अवश्य ही कुछ उनकी तरफ झुकती हुई दिखाई दे रही है फिर भी मामले को उतना आसान नहीं समझा जा सकता है जितना वह लग रहा है? संभवतः इसी कारण से आज पीएम मोदी समेत भाजपा का हर छोटा बड़ा नेता केवल बालाकोट निर्णय की बात करना चाह रहा है और वे जानबूझकर पूरे विमर्श को उस दिशा में ले जाने का काम करने में लगे हुए हैं जिससे विपक्षी दलों को को उनके सवालों में उलझने देने की नीति अपनायी जा रही है.
                     नि:संदेह पीएम मोदी सामने बैठे लोगों से बेहतर संवाद बनाने में माहिर हैं पर सिर्फ उनके स्तर से किया जा रहे प्रयासों को पूरा नहीं माना जा सकता है इसलिए कांग्रेस के किसी भी नेता के पुलवामा या बालाकोट से जुड़े हर बयान को जनता के सामने इस तरह से पेश किया जा रहा है जैसे खुद राहुल गांधी के निर्देश पर यह सब चल रहा है. भाजपा और पीएम मोदी कुछ भी कहें पर पुलवामा पर राजनीति न करने के विपक्षी दलों के बयान और सरकार को पूर्ण समर्थन देने के बाद भी जिस तरह से खुद पीएम मोदी और अमित शाह की तरफ से इस मसले को लेकर राजनीति की जाती रही है उसके बाद विपक्षियों कोई तरफ से सवाल उठने ही थे?  असल में मोदी सरकार अपने काम के दम पर दोबारा सत्ता के नज़दीक पहुँच नहीं पा रही है इसलिए उसे देशभक्ति और उग्र राष्ट्रवाद दो ऐसे मसले महत्वपूर्ण लग रहे हैं जिन पर सवार होकर वह अपनी चुनावी संभावनाओं को सरल बनाकर अपने पक्ष में मोड़ने का काम आसानी से कर सकती है.
                        पीएम मोदी कितने भी अच्छे वक्त क्यों न हों पर इस मामले में वे अपने बनाये जाल में खुद ही उलझे नज़र आ रहे हैं क्योंकि उनके उकसाने की भरपूर कोशिशों के बाद भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और अन्य विपक्षी दलों की तरफ से सधी हुई गंभीर प्रतिक्रियाएं ही सामने आ रही हैं जिससे भाजपा को उन पर हमला करने का उतना अच्छा अवसर नहीं मिल रहा है. भले ही शुरुवाती हमलों में कांग्रेस ने अपने को सीमित किया है पर भाजपा की तरफ से अपने समर्थक टीवी चॅनेल्स में बैठे एंकर्स के माध्यम से जिस तरह का माहौल बनाया जा रहा है वह खुद उसके खिलाफ भी काम कर सकता है क्योंकि जनता के लिए कुछ मुद्दे अधिक संवेदनशील होते हैं और उनसे निपटने में कोई भी चूक किसी भी दल के लिए आत्मघाती हो सकती है. बालाकोट पर जिस तरह से सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए थी वह उसमें पूरी तरह से चुकी हुई और केवल अपने वोट बढ़ाने की राजनीति में ही व्यस्त दिखाई दी है इस पूरी परिस्थिति में अभी तक विपक्षी दलों की तरफ से जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उससे लगता तो यही है कि वे मोदी और भाजपा के इस जाल से दूर रहने की प्रक्रिया को समझ चुके हैं और अपने अनुसार आगे बढ़ रहे हैं.

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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अस्पष्ट जनादेश और नैतिकता

                                                               आज़ादी के बाद काफी समय तक देश की जनता ने केवल कांग्रेस को सत्ता देने को अपनी प्राथमिकता में रखा उसके बाद एक समय ऐसा भी आया जब संविधान के अनुरूप किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत का अभाव दिखाई देने लगा जिसके बाद गठबंधन और अल्पमत की सरकारों का दौर भी आया जिससे कई बार मध्यावधि चुनावों की स्थिति आयी जिसमें भी स्पष्ट बहुमत दूर की कौड़ी ही साबित हुआ. इस पूरी परिस्थिति के बारे में संभवतः संविधान में विचार किया गया था और साझा सरकारों की परिकल्पना भी की गयी होगी पर निर्णय लेने और जनहित में काम करने के लिए स्पष्ट बहुमत वाली सरकारों के हाथ सदैव खुले रहते हैं इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. केंद्रीय स्तर से लगाकर राज्यों तक में जिस तरह से मामूली या अस्पष्ट जनादेश दिखाई देना शुरू हुआ है उसके चलते क्या कोई और मार्ग नहीं सोचा जाना चाहिए जिससे फिर से चुनावों में जाने से पहले एक और विकल्प उपलब्ध कराया जा सके ?
                                  कर्णाटक से एक बार फिर से सत्ता पलट की खबरें आना शुरू हो चुकी हैं तो उस परिस्थिति में आखिर किसी के पास क्या विकल्प बचता है कि किस तरह से संवैधानिक रूप को बनाये रखते हुए सत्ता को चलाया जाये ? देश के प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा द्वारा भी समय समय पर संविधान प्रदत्त अधिकारों का जमकर दुरूपयोग किया जाता रहा है जिनके हाथों में अधिकांश समय तक देश की बागडोर रही है. आज इनमें से कोई दल अपनी सरकार के गिरने या बनने को अपनी परिस्थिति के अनुसार इसे लोकतंत्र की हत्या या लोकतंत्र की जीत बताने में कोई शर्म महसूस नहीं करते हैं. ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए जिससे देश का लोकतंत्र मज़बूत हो और जनता की अपेक्षा के अनुरूप सरकार चलाने की व्यवस्था भी की जा सके ? क्या ये दोनों दल कभी इस तरह की किसी सम्भावना पर विचार कर कोई स्पष्ट नीति बनांने के बारे में सोचेंगें या इसी तरह से अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए कुछ भी करने की तरफ बढ़ते चले जायेंगें ?
                               क्या यह संभव नहीं है कि किसी एक दल द्वारा बहुमत साबित न कर पाने की स्थिति में सभी दलों द्वारा जीती गयी सीटों के अनुपात में उन्हें सबसे बड़े दल को सीएम और मंत्रिमंडल में उपयुक्त स्थान देते हुए देश या राज्य की स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया जाए और अगले चुनावों तक उस पर अमल किया जाये ? हालाँकि भारत की राजनैतिक परिस्थितियों में इस तरह का कोई भी कार्य किया जाना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि सभी दलों की प्राथमिकताएं समग्र विकास के स्थान पर केवल अपने वोटबैंक को मज़बूत करने तक ही सीमित हैं. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा जिस जीएसटी और एफडीआई का खुलकर विरोध किया करती थी सत्ता में आने पर वह उसकी सबसे बड़ी पैरोकार दिखाई देने लगी जिससे दलीय राजनीति के चलते देश के आर्थिक सुधारों को लागू करने में अनावश्यक रुप से विलम्ब हुआ और चिंता की बात यह है कि हम देशवासी इसके लिए किसी को भी उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते हैं ? नीतियों पर राष्ट्रीय सहमति के साथ आगे बढ़ने की मानसिकता जब तक हमारे सभी दलों और राजनैतिक नेताओं में नहीं आएगी तब तक उनकी राजनैतिक अपेक्षाओं की प्रतिपूर्ति करने के लिए जनता के हितों का बलिदान किया जाता रहेगा।   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 15 अप्रैल 2018

एक राष्ट्र एक चुनाव की परिकल्पना

                                                मोदी सरकार की देश में लोकसभा- विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाने की मंशा पर विभिन्न स्तरों पर विचार करने की दिशा में काम शुरू हो गया है पर क्या इस तरह प्रयास से आने वाले समय में देश को कोई लाभ होगा या फिर देश एक नयी तरह की तानाशाही युक्त लोकतान्त्रिक अराजकता की तरफ बढ़ जायेगा ? आज के समय भी जिस तरह से त्रिशंकु सदन बनने पर सरकार बनाना पूरी तरह से केंद्र सरकार की मंशा पर ही निर्भर हो चुका है उससे आने वाले समय में केंद्र की तरफ से पड़ने वाले अनावश्यक दबाव से राज्यों के नेता किस तरह से निपट पायेंगें यह बहुत बड़ी चुनौती होने वाला है. यह सही है कि हर वर्ष कभी भी किसी न किसी राज्य में चुनाव होने से लागू होने वाली आचार संहिता के चलते विकास कार्यों की गति में रुकावट पैदा होती है पर क्या नेताओं को यह सोचने का समय नहीं है कि आज उनको आचार संहिता लागू होने से इतना कष्ट क्यों होता है जबकि यह परंपरा आज़ादी के बाद से ही चली आ रही है ? आचार संहिता लगाने का सीधा सा मतलब यही हुआ करता था कि सत्ताधारी दल और पूरे विपक्ष के लिए चुनावों से पूर्व एक समान वातावरण में जनता के सामने जाने का विकल्प खुला रहे. आज आचार संहिता से विकास रुकने की प्रक्रिया का आरोप लगाने वाले नेता क्या यह स्वीकार कर सकते हैं कि उनकी नीतियां भी चुनावों को प्रभावित करने के लिए ही होती हैं ?
                                         एक साथ चुनाव होने पर सबसे बड़ी समस्या तब सामने आएगी जब केंद्र या किसी राज्य में कोई सरकार अल्पमत में आ जाएगी तब किस तरह से सांसदों या विधायकों की खरीद फरोख्त की जाएगी इसका अंदाज़ा आज आसानी से लगाया जा सकता है क्योंकि राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों के चुनावों में जिस तरह से कुछ हद तक धन कुबेरों को हर पार्टी मैदान में उतारती रहती है उससे अल्पमत वाली सरकार को  बचाने के लिए सरकार समर्थक धन कुबेर और उद्योगपति परदे के पीछे के खेल में धन का दुरूपयोग कर क्या लोकतंत्र का मज़ाक नहीं उड़ाएंगे ?  लोकतंत्र नैतिकता के आधार पर टिकता और चलता है पर केन्द्र की मोदी सरकार ने जिस तरह से कई राज्यों में सबसे बड़े दल की राज्यपालों के माध्यम से अनदेखी कर किसी भी परिस्थिति में अपने गठबंधन की सरकारें बनाने की गलत परंपरा शुरू कर दी है वैसी स्थिति में कोई महत्वाकांक्षी केंद्र सरकार सभी राज्यों में राजनैतिक गतिविधियों को आसानी से अपने अनुसार मोड़ने की तरफ क्या नहीं बढ़ जाएगी? भारत जैसे विविधता भरे देश में जनता के सामने हर स्तर पर अपने मनपसन्द उम्मीदवार को चुनने का अवसर संविधान की तरफ से दिया गया है जिससे आज देश के कई हिस्सों में क्षेत्रीय दल भी सफलता के साथ सरकारें चला रहे हैं पर एक साथ चुनाव होने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति भी बन सकती है जो राजनीति को केवल राष्ट्रीय दलों के बीच में ही सीमित करने का काम भी क्र सकती है ?
                                         सबसे बड़ा मुद्दा धन को बचाने और विकास की गति को निरंतर बनाये रखने से जुड़ा है तो इस मामले के लिए सबसे पहले नेताओं को अपने गिरेबान में झाँकना होगा क्योंकि सरकार कोई भी दल चलाये पर देश की समस्याएं तो वही रहती हैं तो संसद और विधान सभाओं से होने वाले विधायी कार्यों पर ध्यान देकर नीतियों को लम्बे समय के लिए लागू करने की दिशा में सोचना चाहिए जैसे एक समय देश में पञ्चवर्षीय योजनाएं और २० सूत्री कार्यक्रम चला करते थे जिससे किसी भी चुनाव के आने जाने से इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर किसी तरह की रोक नहीं होती थी. क्या आज देश के नेताओं को एक चुनाव से अधिक एक अलग सोच के साथ विकास के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है? योजना आयोग हो या बदले नाम नीति आयोग जब तक नेताओं की मंशा साफ़ नहीं होगी तब तक किसी भी परिस्थिति में चुनावी सुधारों को सही तरह से लागू नहीं किया जा सकता है।  आखिर सरकार की मंशा केवल चुनाव एक साथ कराने के सुधारों तक ही क्यों रुकी हुई है क्या देश के सम्पूर्ण चुनाव परिप्रेक्ष्य पर विचार का उसमें आज के अनुसार बदलाव करने की आवश्यकता सरकार को महसूस नहीं हो रही है ?  चुनाव सुधारों को केवल अपने परिप्रेक्ष्य में देखने से परिस्थितयां बदलने वाली नहीं है और सबसे बड़ी समस्या त्रिशंकु और अल्पमत की सरकारों वाले राज्यों में सामने आने वाली है क्योंकि वहां पर चुनाव हो नहीं पायेंगें तो क्या अघोषित रूप से केंद्र अपने हिसाब से राष्ट्रपति शासन लगाकर वहां की बागडोर सीधे अपने हाथों में नहीं ले लेगा ?
                                       इस सबसे अच्छा यही रहेगा कि चुनावों के लिए प्रति वर्ष एक महीना निर्धारित कर लिया जाये और पूरे वर्ष में कभी भी होने वाले चुनावों को केवल उसी महीने में कराने की दिशा में काम शुरू कर दिया जाये इससे जहाँ राज्यों में एक साथ एक वर्ष में चुनाव समाप्त हो जायेंगें वहीं किसी भी तरह की समस्या आने पर अगले वर्ष उसी महीने में फिर से चुनाव कराये जा सकेंगें। क्या किसी भी राज्य में चुनाव कराने के लिए आयोग को इतना लम्बा समय देना चाहिए कि नेता अपने अनुसार पूरे चुनाव को मोड़ने का समय पा जाएँ और खुलेआम लोकतंत्र का चीर हरण कर सकें ?  विकास अवरुद्ध होने  की अवधारणा सामने लाने वाले दलों को अब यह सोचना होगा कि उनकी  प्रभावित करने वाली नीतियों के चलते समस्याएं अधिक होती है न कि देश में अलग अलग समय चुनाव होने से यह सब प्रभावित होता है। 

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

एक साथ चुनाव

                               देश में इस समय लोकसभा और विधानसभा चुनावों के एक साथ कराये जाने की संभावनाओं पर गंभीर विचार शुरू भी नहीं हुआ है पर जिस तरह से इस पर बातें की जा रही हैं वे कहीं न कहीं से इस बात को रेखांकित अवश्य करती हैं कि सरकर चुनाव आयोग इस दिशा में सोच अवश्य रहे हैं. यह बात कहने में जितनी आसान लगती है क्या उसे धरातल पर उतार पाना भी संभव है अब इस बात पर विचार की आवश्यकता भी है. लोकतंत्र में राजनैतिक अस्थिरता के आने के साथ ही १९६७ में लोकसभा और विधान सभा चुनावों का साथ छूट सा गया और उसके पहले होने वाले चुनावों की गति टूटती सी नज़र आयी क्योंकि केंद्र और राज्यों में स्पष्ट बहुमत या गठबंधन की सरकारों के न चल पाने से चुनावों की तिथियां एक दूसरे से अलग होती चली गयी जिसका आज का स्वरुप हम सबके सामने है. आज जो परिस्थिति है उसमें भाजपा या एनडीए शासित राज्य तो पीएम की इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए राज़ी हो सकते हैं पर विपक्षी दलों की तरफ से जहाँ उसकी सरकारें अभी दो वर्ष पुरानी भी नहीं है क्यों इस प्रयोग का साथ दिया जायेगा ? आज पीएम मोदी की जो छवि है उसके साथ दोनों चुनाव एक साथ होने की दशा में भाजपा का काम आसान हो जायेगा वहीं विपक्षी दलों के लिए लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों को संभाल पाना कठिन ही होने वाला है इसलिए राजनैतिक स्तर पर इस विचार को बहुत अधिक समर्थन नहीं मिलने वाला है क्योंकि यह सब बिना संविधान संशोधन के संभव नहीं हो सकता है जिसके लिए केंद्र को दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी.
                         यह सही है कि इस तरह से एक साथ होने वाले चुनावों में समय और धन की बर्बादी को रोका जा सकता है पर क्या सभी चुनाव एक साथ कराने के लिए सरकार चुनाव आयोग को इतना धन दे पाने में समर्थ हो सकती है ? एक अनुमान के अनुसार यदि पूरे देश के लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाते हैं तो आयोग को वीवीपैट मशीनों के लिए लगभग २००० करोड़ रुपयों की आवश्यकता पड़ेगी साथ ही जब ये चुनाव एक साथ होंगें तो इन मशीनों का १५ वर्ष की आयु होने के कारण केवल तीन बार ही उपयोग किया जा सकेगा तो क्या केंद्र सरकार इस तरह के खर्चे को वहन करने के लिए तैयार है जिसमें सरकार को हर वर्ष आज की कीमत के अनुसार १०० करोड़ रूपये प्रतिवर्ष से भी अधिक खर्च करने पड़ेंगें ? सरकार की सोच सही हो सकती है पर इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए लम्बा समय लगने वाला है जिसके लिए अभी हमारे देश में संसाधन ही उपलब्ध नहीं हैं. यदि यह मान लिया जाये कि आगामी २०१९ में ही यह दोनों चुनाव साथ में किये जाएँ तो उसके लिए आवश्यक धन की व्यवस्था तो हो सकती है पर इतने कम समय में वीवीपैट मशीनों की उपलब्धता के बारे में पहले से ही विचार करने की ज़रुरत होगी क्योंकि उनके बिना इस तरह के चुनाव करा पाना संभव ही नहीं होगा.
                            सरकार का यह कहना कुछ हद तक सही है कि लगातार कहीं न कहीं होते रहने वाले चुनावों से विकास की गति आचार संहिता के कारण धीमी पड़ती रहती है जिसको कुछ हद तक सही माना जा सकता है पर समस्या यहाँ विकास के धीमे होने की नहीं बल्कि अपनी अपनी दलीय राजनीति को चमकाने को लेकर ही है क्योंकि सदनों में राज्यों और केंद्र की योजनाएं केवल अपने हितों को साधकर बनाये जाने की जो परंपरा चल पड़ी है जब तक इस पर राजनैतिक दल खुद ही अंकुश नहीं लगायेंगें तब तक विकास अपनी गति को नहीं पा सकता है. क्या सरकारें बदल जाने से जनता के विकास से जुड़े सरोकार बदल जाते हैं ? क्या राजनैतिक दलों को भी इसके लिए संविधान में उत्तरदायी नहीं बनाया जाना चाहिए कि वे सदनों में बैठकर कुछ मुद्दों पर कम से कम बीस वर्षों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनायें और उस पर हर दल चलने को बाध्य हो साथ ही समय समय पर उसकी समीक्षा के साथ आवश्यक संशोधनों को भी करने की व्यवस्था भी की जाये जिससे सब कुछ सही दिशा में सही तरह से चल सके. कोई भी दल केवल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए इस तरह के विचारों को सामने लाता है तो उसको स्वीकार कर पाने में सभी को कठिनता होने वाली है.
                          इस दिशा में शुरुवात इस तरह से की जा सकती है कि देश भर में जहाँ भी विधान सभा चुनाव होने हैं उसका समय वर्ष भर में एक महीने में ही कर दिया जाये जिससे हर वर्ष आयोग और सरकार चुनावों के लिए तैयार रह सकें. जैसे किसी राज्य में जनवरी किसी में अप्रैल और किसी में अक्टूबर नवम्बर में चुनाव होने हैं तो उनको वर्ष के एक महीने में ही कराने की दिशा में कदम बढ़ाये जाएँ जिससे पूरे वर्ष होने वाले इस चुनावी उत्सव को कुछ महीनों में ही निपटाया जा सके. यदि यह प्रक्रिया सही तरह से पटरी पर आ जाती है तो आने वाले समय में लोकसभा और विधान सभा चुनावों को भी एक साथ कराने की दिशा में सोचा जा सकता है. पर्वतीय राज्यों में चुनाव गर्मियों के मौसम में कराये जाने के बारे में सोचा जाना चाहिए जिससे प्रशासन को कम चुनौतियों का सामना करना पड़े और जनता की भागीदारी को भी बढ़ाया जा सके. केंद्र सरकार को इस दिशा में केवल बयान देने के स्थान पर सर्वदलीय बैठक से शुरुवात करनी चाहिए फिर जिन राज्यों के चुनाव लोकसभा के १ साल के आगे पीछे होने हैं वहां की सरकारों और विधानसभा अध्यक्षों की एक बैठक बुलानी चाहिए जिससे इस पर सही दिशा में आगे बढ़ने पर सफलता मिलने की सम्भावना बढ़ सके.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 7 मार्च 2017

चुनाव सुधार में नैतिकता

                                                       देश में होने वाले चुनावों में नेताओं की भाषा और नैतिकता का स्तर जिस तरह से निरंतर रसातल की तरफ जा रहा है उसको देखते हुए अब चुनाव सुधारों में ही इस बात की आवश्यकता भी समझी जानी चाहिए कि नेताओं को दंड के भय से अनुचित बातें कहने और आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने से रोकने के बारे में भी उचित और कठोर संशोधन किये जाएँ. एक समय था जब बड़े नेताओं से लगाकर छोटे स्तर तक की राजनीति में सक्रिय लोग किसी भी परिस्थिति में नैतिकता की सीमाओं का सम्मान किया करते थे पर आज जिस तरह से हम आधुनिक हुए उसके साथ ही हम अपनी सभ्यता और शिष्टाचार के साथ संस्कारों को कहीं बहुत पीछे छोड़ चुके हैं. इसका समाज पर तो कुछ कम असर दिखाई देता है पर राजनेता हर स्तर पर निरंतर अपने निम्नतम स्तर तक पहुँचने में लगे हुए हैं. इस परिस्थिति से निपटने के लिए अब चुनाव आयोग के पास केवल प्राथमिकी दर्ज कराने से आगे बढ़कर तुरंत ही इस पर सुनवाई करके नेताओं को त्वरित रूप से प्रचार से वंचित कर दिया जाना चाहिए जिससे वे आने प्रचार को ध्यान में रखते हुए शालीनता को किसी भी स्तर पर छोड़ने से पहले कई बार सोचने को मजबूर हो जाएँ.
                                  आज सोशल मीडिया चुनाव प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा है पर उसके लिये स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं होने के चलते वहां पर भी चुनावी लाभ के लिए विभिन्न दलों द्वारा विरोधी दलों पर हमले करने के लिए फ़र्ज़ी वेबसाइट्स चलायी जा रही हैं और जिनके माध्यम से समाज में विभाजन के माध्यम से वोट बटोरने के काम किया जाता रहता है. नियमों में कमी के चलते आज चुनाव आयोग केवल शिकायतों के सही पाए जाने पर प्राथमिकी दर्ज करने तक ही सीमित रह जाता है और नेता भी जानते हैं कि उनकी इस समाज को विभाजित करने वाली भाषा या व्यक्तिगत आरोपों से जो चुनावी लाभ मिलना है वह तो मिल ही जायेगा पर आयोग तुरंत उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पायेगा. आज जब आयोग के पास सीमित अधिकार ही हैं तो उन्हें बढ़ाये जाने की आवश्यकता पर कोई क्यों विचार नहीं करता है ? किसी भी चुनावी क्षेत्र में किसी भी नेता द्वारा आचार संहिता का उल्लंघन करने के मामले को चुनाव आयोग के प्रेक्षक को शिकायत आने के स्थान पर स्वतः संज्ञान के माध्यम से देखना चाहिए और राज्य या केंद्रीय स्तर पर इस पर विचार करने के स्थान पर जिला जज की अदालत में उपलब्ध सबूतों के आधार पर विशेष चुनावी अदालत में एक सुनवाई में ही फैसला देने का प्रावधान किया जाना चाहिए और जिस नेता के विरुद्ध मामला दर्ज हो जाये उसे फैसला आने तक प्रचार से दूर कर दिया जाना चाहिए.
                                  एक ज्वलंत प्रश्न यह भी है कि आज की परिस्थिति में चुनाव आयोग को क्या देश कि विधायिका इतनी अधिक शक्तियां देना भी चाहेगी क्योंकि अंत में यह उनके कुछ भी बकवास करने के असीमित अधिकार पर ही वार करने में प्रयुक्त किये जाने वाला हैं ? पर अब समय आ गया है कि सभी दलों को इस बारे में विचार करना ही होगा वर्ना एक दिन किसी जनहित याचिका की सुनवाई में कोर्ट की तरफ से ऐसा कोई आदेश आ जायेगा जिसमें ऐसे संशोधनों को करने के अतिरिक्त संसद और सरकार के पास विकल्प शेष ही नहीं बचेंगें. इसलिए इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर अनमने ढंग से संशोधन करने के स्थान पर एक चुनाव संशोधन आयोग बनाया जाए जिसमें केंद्र और राज्य चुनाव आयोग के पूर्व आयुक्तों के साथ सभी पक्षों की राय को व्यापक रूप से जानने का प्रयास किया जाये तथा इंटरनेट और पत्राचार के माध्यम से आम जनता को भी इस मामले में अपनी राय देने के लिए कहा जाये. इतना महवपूर्ण संधोधन केवल संसद के माध्यम से ही न किया जाए क्योंकि आम लोग इस बारे में क्या कमियां पाते हैं इस पर भी विचार अवश्य किया जाना चाहिए. चुनाव संशोधन में समग्रता की आवश्यकता है क्योंकि आज चुनाव देश की आवश्यकता से अधिक विकास और नीतियों से जुड़े हुए हो गए हैं कोई भी राजनैतिक दल अपने लाभ के लिए किसी भी स्तर पर मनमानी न कर सके इसे रोकने के बारे में अब सोचने का सही समय आ गया है.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

चुनाव सुधार-इन्टरनेट और मतदान

                                                       चुनाव सुधारों के साथ ही बेहतर मतदान प्रतिशत में जिस तरह से हमारे देश ने पिछले ढाई दशकों में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है उसे किसी भी स्तर पर कम नहीं कहा जा सकता है फिर भी इतनी बड़ी आबादी में हर बूथ पर लगभग १५०० अधिकतम मतदाताओं से सीमित समय में मतदान करवा पाना आयोग के साथ मतदान कर्मियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती के रूप में बचा हुआ है. देश की घनी आबादी वाले राज्यों में आज भी कुछ मतदान केंद्रों पर इतने अधिक मतदाता हैं कि समय सीमा में उनसे वोट डलवाने में हर बार समस्या ही होती रहती है. इससे निपटने के लिए जहाँ हज़ार की आबादी पर मतदान केंद्र सुनिश्चित किया जाना चाहिए वहीं मतदान कर्मियों को भी इस बात के लिए जागरूक किया जाना चाहिए कि सम्पूर्ण काम तेज़ी से किया जाये जिससे मतदान में लगातार तेज़ी बनी रहे और मतदान के प्रतिशत को भी बढ़ावा दिया जा सके. इसके अतिरिक्त कुछ क्षेत्रों में प्रायोगिक तौर पर इन्टरनेट से मतदान करवाने की प्रक्रिया पर भी विचार किया जाना चाहिए जिससे जो आम लोग इन्टरनेट का उपयोग करते हैं वे इसका उपयोग करके देश के सुरक्षित भविष्य के लिए अपनी भागीदारी भी सुनिश्चित कर सकें और भीड़ का बहन बनाकर मतदान न करने वालों को भी चुनावी प्रक्रिया में सफलता से जोड़ा जा सके.
                                  इसके लिए तैयारियों के रूप में सबसे पहले वोटर आईडी को आधार संख्या से जोड़ना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिससे फ़र्ज़ी रूप से दो जगह वोट डालने और इन्टरनेट पर पहचान को सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाये जा सकें. इन्टरनेट से चुनाव की तैयारियों के लिए आयोग को नेट पर ही लोकसभा/ विधान सभा/ स्थानीय निकाय/ पंचायतों के लिए क्षेत्र के अनुसार वेबसाइट्स बनानी होंगीं जिन पर अंतिम रूप से वोटिंग मशीन की जो प्रतिकृति हो उसे प्रदर्शित किया जाये जिससे इच्छुक मतदाता इस पेज पर जाकर अपना वोट डाल सकें. इसके बाद जो भी मतदाता इस सुविधा का उपयोग करना चाहता हो उसके लिए मतदान शुरू होने से तीन दिन पूर्व ही अपने आधार से जुड़े मोबाइल या इन्टरनेट के माध्यम से सम्बंधित क्षेत्र की वोटिंग के लिए पंजीकरण करना भी आवश्यक हो इस पंजीकरण के साथ ही मतदाता को उसके पंजीकृत मोबाइल पर एक ओटीपी भेजा जाये जिसका उपयोग मतदान के समय किया जाये तथा केवल इससे ही नहीं वरन इन्टरनेट से मतदान करने के समय अपनी वोटिंग मशीन का बटन दबाने के पूर्व एक और ओटीपी भेजा जाये जिसके भरने के बाद ही वोट को वैध माना जाये वरना उस वोट की गिनती नहीं होनी चाहिए. इस तरह की दोहरी व्यवस्था से जहाँ फ़र्ज़ी रूप से मतदान को रोकने में मदद मिलेगी वहीं मतदाता को भी यह आश्वासन मिल जायेगा कि उसका मतदान सुरक्षित और गोपनीय तरीके से हो चुका है. मतदान के बाद मतदाता को उसके वोट के बारे में एक सन्देश भेजा जाये जिसमे यह बताया जाये कि उसका वोट किस प्रत्याशी को गया है जिससे मतदाता के अधिकार भी सुरक्षित रह सकें.
                         इसके साथ ही आधार से जुड़े मतदाताओं के लिए आने वाले समय में जब देश भर में ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क और भारत ब्रॉडबैंड सेवाएं पूरी तरह से चालू हो जायेंगीं तब मोबाइल वोटिंग वैन/ बूथ के बारे में भी सोचा जा सकता है जिसमें वोटिंग मशीन में बायोमेट्रिक व्यवस्था भी की जाए और इन्टरनेट से जुड़े होने के कारण यह मतदाता की पहचान को सुनिश्चित करने के बाद उसे वोट डालने की अनुमति दे सकता है जिससे सुरक्षा और अन्य खर्चों में कटौती के साथ बहुत कुछ तेज़ी से सुरक्षित मतदान को किया जा सकता है. एक वैन की सुरक्षा में उतने पुलिस बल की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी और न ही किसी अन्य तरह के मतदान कर्मियों की क्योंकि एक बार जिसका वोट पड़ जायेगा वह दोबारा वोट नहीं डाल सकता है. एक सम्भावना यह भी हो सकती है कि पहले इन्टरनेट से वोट डालने के बाद मतदाता बूथ पर जाकर भी वोट डालने का प्रयास करे तो उस स्थिति से निपटने के लिए इन्टरनेट की वोटिंग बूथ की वोटिंग बंद होने के बाद पांच बजे से ही खोली जा सकती है जिससे इस समस्या से भी बचा जा सके. इस वोटिंग को अगले दिन शाम पांच बजे तक खुला भी रखा जा सकता है क्योंकि इन वोटों की गिनती मशीन से अलग इन्टरनेट के माध्यम से ही होगी. इस पूरी प्रक्रिया में निश्चित तौर पर राजनैतिक दल हो हल्ला ही मचाने वाले हैं क्योंकि उनको यही लगता रहेगा कि इसका दुरूपयोग होगा जबकि इनकी तरफ से सबसे पहले वोटिंग मशीनों के उपयोग को शुरू करने के समय भी यह सब कहा गया था और उनका यह संदेह पूरी तरह से निराधार ही साबित हुआ है. इसलिए अब चुनाव आयोग को नेट आधारित डिजिटल चुनाव के बारे में भी विचार करना चाहिए और तकनीक का पूरा लाभ आम मतदाताओं तक भी पहुँचाना चाहिए.            
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

चुनाव सुधार की तरफ

                                                       केंद्र सरकार की तरफ से चुनाव सुधारों पर कुछ पहल करते हुए जिस तरह से लोकसभा और राज्यों के विधान सभा चुनावों के एक साथ कराने की बात कही जा रही है उससे निश्चित तौर पर देश के धन को बचाने में मदद मिलेगी पर क्या भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में इस तरह की किसी गतिविधि से केंद्र में शासन कर रहा दल निरंकुश नहीं हो सकता है ? आज की परिस्थिति में चूंकि कहीं न कहीं किसी राज्य में प्रतिवर्ष चुनाव होते रहते है तो उनके कारण कुछ कदम उठाने से पहले सरकारों को सोचना भी पड़ता है पर जब यह सब पूरी तरह से ख़त्म हो जायेगा तो सरकारों पर किसी भी तरह का अंकुश नहीं रहेगा और स्पष्ट जनादेश को कुछ भी करने की मनमानी वाली व्याख्या के साथ राजनैतिक दल देश के लिए कभी भी बड़ी समस्या खड़ी कर सकते हैं जिससे किसी भी स्तर पर लोकतंत्र को मज़बूत नहीं किया जा सकेगा. इसके साथ ही किसी भी राज्य में राजनैतिक अस्थिरता आने पर क्या वहां की सरकार को भंग कर राष्ट्रपति शासन के माध्यम से कमान केंद्र को सौंप दी जाएगी या दलों के विधायकों की संख्या के आधार पर एक प्रादेशिक सरकार बना दी जाएगी जो अगले चुनाव तक सामान्य शासन चलाने के लिए अधिकृत होगी ? खर्च बचाने के लिए जिस तरह के बेतुके तर्क आज सामने आ रहे हैं तो क्या सरकार चला रहे दलों और उनके नेताओं से यह सवाल भी नहीं पूछा जाना चाहिए कि जनता के पैसों को वे राज्यों में घूमकर क्यों बर्बाद करते रहते हैं ? क्या वे देश को डिजिटल करने के साथ अपने घूमने फिरने पर होने वाले खर्च को रोकने के लिए तत्पर हैं क्योंकि देखा जाये तो अधिकांश बर्बादी हमारे नेताओं की तरफ से होती रहती है.
                              किसी भी तरह के सुधार से पहले देश को शत प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करने के बारे में अधिक ध्यान लगाना होगा जिसके लिए डिजिटल मंच का उपयोग विभिन्न परीक्षणों के बाद किया जा सकता है. जो लोग डिजिटल तरीके से अपने वोट को देना चाहते हों उनकी वोटर पहचान संख्या को सबसे पहले आधार से जोड़ने का काम किया जाना चाहिए जिससे उनकी पहचान के बारे में सुनिश्चित हुआ जा सके इसके बाद जिन क्षेत्रों में चुनाव हो रहा है उनकी वोटिंग मशीन के अंतिम प्रारूप को चुनाव सम्बंधित आयोग की वेबसाइट पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए. जो भी मतदाता डिजिटल माध्यम से अपने वोट को डालना चाहते हैं उनको मतदान से पहले एक सन्देश के माध्यम से पंजीकरण कि सुविधा देनी चाहिए तथा मतदान शुरू होने के बाद मतदाता को फिर से अपने चुनाव क्षेत्र के पेज पर जाकर अपनी जानकारी भरनी हो जिसके बाद एक ओटीपी सन्देश मतदाता के मोबाइल पर आये जिसे समुचित स्थान पर भरकर मतदाता अंतिम रूप से अपने वोट को देने का पात्र बन सके. इस तरह से मिलने वाले सभी वोटों को नेट पर ही सुरक्षित रखे जाने के साथ ही भविष्य में वोटिंग मशीनों को भी नेट से जोड़ना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिससे सारे वोट एक साथ में जोड़े जा सकें और मशीनों को भी सिंक्रोनाइज़ किया जा सके. इसके बाद मतगणना केंद्रों पर एजेंटों कि उपस्थिति में यह सारा काम करने के बाद परिणाम जानने की तरफ बढ़ना चाहिए. इस पूरी व्यवस्था से जहाँ सरकार के संसाधनों को कम किया जा सकता है वहीं भीड़ के कारण मतदान का प्रतिशत कम होने की समस्या से भी निपटा जा सकता है क्योंकि आज बहुत से मतदाता भीड़ के चलते भी वोट डालने से परहेज़ कर जाते हैं.
                                       ऐसी परिस्थिति में क्या चुनावों को भी राष्ट्रीयकृत करने सरकार की तरफ से चुनावी खर्च दिए जाने की बातें नहीं होनी चाहिए ? क्या देश में धर्म और जातियों पर आधारित हो चुकी हमारी राजनैतिक व्यवस्था को भी इस मसले के साथ ही हल किये जाने की आवश्यकता नहीं है ? हमारे चुनाव सुधारों में कुछ ऐसे प्रयास भी होने चाहिए कि विभिन्न राजनैतिक दल केवल पार्टी के नाम पर ही वोट मांग सकें हालाँकि भारत जैसे विविधता वाले देश में यह बहुत ही कठिन काम साबित होने वाला है फिर भी यदि प्रयास किये जाएँ तो कुछ भी कठिन नहीं है. आज टिकट वितरण से लगाकर सीएम और मंत्रियों के चुनाव तक में भी जातीय, क्षेत्रीय और धार्मिक आधार पर विचार करना एक मजबूरी सी बन गयी है और सभी राजनैतिक दल इस समस्या को खड़ी करने के बाद अब इससे जूझते ही नज़र आते हहिं जिससे जातीय और धार्मिक आधार पर बनती हुई जनता को भी सही विकल्प नहीं मिल पाते हैं और कई बार दलीय निष्ठा के चलते बहुत बुरे विकल्प जनता के सामने चुनाव में दिखाई देने लगते हैं. चुनाव आयोग और संसद को इस मसले पर गंभीरता से विचार करना ही होगा तभी राजनीति के नाम पर जो सामाजिक विद्वेष लगातार बढ़ाया जाता है उस पर अंकुश लगाया जा सकता है साथ ही चुनावी माहौल में बढ़ती हुई कटुता को भी कम किया जा सकता है.
                                       देश के लिए समग्र नीति नेताओं के स्थान पर विशेषज्ञों से बनवाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि एक बार जब हमारे लिए दीर्घावधि की योजनाएं बन जाएंगीं तो उन पर चलना लगभग हर सरकार की मजबूरी ही हो जायेगा इन दीर्घ कालीन नीतियों में बदलाव के लिए संसद के २/३ बहुमत की आवश्यकता भी अनिवार्य की जानी चाहिए जिससे अच्छी नीतियों को केवल विरोध के कारण कोई भी राजनैतिक दल अनावश्यक रूप से रोक न सके. क्या हमारे नेता इस मसले पर भी एक मत नहीं हैं कि देश के लिए क्या आवश्यक है और क्या प्राथमिकताएं होनी चाहिए क्योंकि जब तक हम लंबे काल के लिए सोचना शुरू नहीं करेंगें दलीय प्रतिबद्धताएं हमारे हर क्षेत्र में बाधाएं खड़ी करती रहने वाली हैं. चुनाव पूरी तरह बिना अनाप-शनाप खर्च के संपन्न होना चाहिए और इसमें आयोग को भी तकनीक का अधिक उपयोग करते हुए सुरक्षा बलों और अन्य मदों में होने वाले खर्चों को रोकने की कोशिश करने में विधायिका को पूरी मदद भी देनी चाहिए जिससे देश में आदर्श रूप से चुनाव  कराये जाने की परिस्थितियों को लाया जा सके.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

चुनाव, चंदा और राजनीति

                                                                   देश के राजनैतिक दलों को जिस तरह से अपने संसाधनों के रूप आम लोगों से चंदा लेने के लिए जो छूट दी गई थी वह टीएन शेषन के ज़माने से ही चुनाव आयोग के निशाने पर रही है फिर भी उस पर नये सिरे से कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया जा सका है जिससे आज नोटबंदी के समय में सभी राजनैतिक दल इस बात के लिए आम लोगों के लिए और भी अधिक संदेहास्पद बन गए हैं कि नियम केवल आम लोगों के लिए हैं और राजनेताओं को उससे हर स्तर पर पूरी छूट दी गयी है. निश्चित रूप से यह बहुत ही विवादास्पद मुद्दा रहने वाला है क्योंकि जब भी इस पर कोई बात संसद के बाहर उठायी जाती है राजनैतिक दलों की तरफ से बहुत ही ठंडी प्रतिक्रिया सामने आती है क्योंकि उनको यह लगता है कि देश में केवल आम जनता, उद्योगपति और व्यवसायी ही करों की चोरी करते हैं और राजनैतिक तंत्र अपने आप में ईमानदारी की जीती जागती प्रतिमूर्ति है जबकि वास्तविक स्थिति इससे उलट ही है और आज देश में भ्रष्टाचार की सूची में राजनेताओं को ही सबसे ऊंचा स्थान मिलता रहता है और यह किसी से भी छिपा नहीं है क्योंकि चुनाव जीतने के बाद जिस तरह से अधिकांश नेताओं के रहन सहन में अप्रत्याशित सुधार आ जाता है वह किसी आम व्यक्ति के लिए पूरे जीवन एक सपना ही रह जाता है.
                                                    चुनाव आयोग ने एक बार फिर से चंदे के बारे में जिस तरह से बिना लिखा-पढ़ी के दो हज़ार रुपयों से अधिक के चंदे के लेन-देन पर रोक लगाने के लिए सरकार को फिर से प्रस्ताव दिया है वह अमल में लाया ही जाना चाहिए क्योंकि जब तक खुद राजनेता अपने तंत्र में ईमानदारी को नहीं लायेंगें तब तक उनकी तरफ से देशभक्ति और ईमानदारी के सारे आह्वाहन केवल खोखले ही साबित होने वाले हैं. इस मसले पर सरकार को अविलंब एक प्रस्ताव लाकर उस पर कानून मंत्रालय समेत सभी राजनैतिक दलों के साथ विमर्श शुरू करने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि यह मुद्दा केवल सरकार के लिए ही आवश्यक नहीं है बल्कि देश के हर राजनैतिक दल के लिये इसका उतना ही महत्व है. जजों की नियुक्ति में हस्तक्षेप, वेतन भत्तों में बढोत्तरी आदि मसलों पर जितनी आसानी से सदन में सहमति दिखाई देती है क्या कभी वैसी सहमति देशहित के इस मुद्दे पर भी दिखाई देगी या कुछ छोटे दल ही अपने स्तर से इस राजनैतिक कदाचार के लिए अपर्याप्त संघर्ष करते रहने वाले हैं ? निश्चित तौर पर आज के समय में इस तरह की नीतियां अंत में देश को ही नुकसान पहुंचती हैं और जब राजनैतिक दल खुद ही इस तरह के भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में लगे रहेंगें तो उनके नेताओं से ईमानदारी की अपेक्षा किस दम पर रखी जा सकती है ?
                                                १९६१ में जब यह कानून बनाया गया तो २०००० रूपये बहुत होते थे पर आज क्या इस तरह की छूट की आवश्यकता है या देश के चुनाव सुधारों के रूप में सबसे पहले राजनैतिक दलों के अवैध तरीके से लिए जाने वाले इस चंदे पर ही रोक नहीं लगायी जानी चाहिए ? आखिर ये सुधार किये जाएँ इसके लिए चुनाव आयोग कब तक सरकार को सुझाव ही भेजता रहेगा और सरकार उन्हें हमेशा की तरह कूड़े के ढेर में डालती रहेगी ? अब समय आ चुका है कि चुनाव सुधारों को व्यापक रूप में लागू किया जाये और आने वाले समय में देश की राजनीति को और भी स्वच्छ बनाने की कोशिशों को और भी आगे बढ़ाया जाये पर इसके लिए क्या देश के नेता और राजनैतिक दल कुछ विचार करने के लिए तैयार भी हैं या नहीं या वे चुनाव आयोग की केवल चुनाव के समय असीमित और सामान्य समय में बेहद सीमित शक्तियों में ही खुश हैं ? आज़ादी के कई दशकों तक चुनावों में पैसा इतना प्रभावी नहीं होता था जिससे इस तरह की छूट समझ में आती थी पर आज जब लोग राजनीति को भी धंधे के रूप में अपनाने लगे हैं तो इसे भी उसी श्रेणी में रखा ही जाना चाहिए. देश में ऐसे संगठनों की कमी है जो इस मुद्दे पर जान आंदोलन खड़ा कर सकें और देश का कानून भी सुप्रीम कोर्ट तक को सामान्य विधायी कार्यों में दखल देने से रोकता है तो उस स्थिति में आखिर चुनाव आयोग के पास सरकार से अनुरोध करने के अतिरिक्त क्या विकल्प शेष बचते हैं ?    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 20 मई 2016

कांग्रेस, भाजपा और देश की राजनीति

                                                   पांच राज्यों में हुए विधान सभा चुनावों में जिस तरह से कांग्रेस के लिए कोई अच्छी खबर नहीं आई और भाजपा ने २०१४ के अपने प्रदर्शन को सुधारते हुए आगे बढ़ने का क्रम जारी रखने में सफलता पायी है उससे यही लगता है कि जिन राज्यों में वह सीधे कांग्रेस से मुक़ाबले में है वहां पर उसकी तरफ से बेहतर प्रबंधन किया जा रहा है और संघ के कार्यकर्ताओं की भूमिका की इस पूरी कवायद में अनदेखी नहीं की जा सकती है. असम में २०१४ के प्रदर्शन के बाद भाजपा को यह लगने लगा था कि यह राज्य उसके लिए भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के समूह के प्रवेश द्वार के रूप में काम कर सकता है और अंत में उसकी यही सोच राज्य में उसके लिए बड़ी कामयाबी का कारण भी बनी. कांग्रेस के लिए इस मामले में स्थिति इतनी ख़राब तो नहीं थी पर उसका अकेल ही चुनाव लड़ने का फैसला सम्भवतः उसके लिए सबसे बड़ी समस्या बन गया क्योंकि भाजपा ने असम के चारों हिस्सों में जिस तरह से अलग अलग रणनीति पर काम करते हुए काम किया वहीं कांग्रेस अपने असंतुष्ट नेताओं को समझा पाने में भी सफल नहीं रही और सरमा जैसे नेता ने अपने भविष्य के रूप में भाजपा में जाना पसंद किया और भाजपा को भरपूर लाभ भी दिया. रणनीति कई बार उल्टा असर भी कर देती है और कई बार बहुत ही कारगर तरीके से उसके बेहतर परिणाम भी सामने आते हैं.
                                                कांग्रेस के सामने अब सबसे बड़ी समस्या यही है कि आज राज्यों में उसके सत्ता का सुख भोगने वाले बुजुर्ग होते नेताओं के बाद प्रभावी नयी पीढ़ी नज़र नहीं आती है और राज्यों के बड़े नेता केवल अपने केंद्रीय नेताओं के सहारे ही सरकार चलाने की कोशिशें किया करते हैं. जिन राज्यों में कांग्रेस लम्बे समय से सत्ता से बाहर है वहां पर आज केवल बड़े नाम ही नेता के रूप में बचे हैं वैसे तो तरुण गोगोई के खिलाफ ऐसा कोई माहौल भी नहीं था पर प्रबंधन के स्तर पर केंद्र और राज्य में समन्वय न होने की दिशा में कांग्रेस ने जिन नेताओं को खुले हाथ दिए वहां पर असंतुष्ट नेताओं ने खुद ही विद्रोह किया या वे आसानी से भाजपा ने चले गए. इन नेताओं ने अपने सीमित प्रभाव के बाद भी कांग्रेस को बड़ा नुकसान करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. भाजपा ने इन नेताओं के सीमित महत्व को समझते हुए सदैव ही इन्हें अपने पाले में किया और इनके प्रभाव का अपने दल के लिए सही तरीके से इस्तेमाल भी किया. आज इन दोनों दलों के लिए देश की ५०% आबादी पर ही आपस में राज करने का विकल्प शेष बचा है क्योंकि यूपी, बिहार, बंगाल, उड़ीसा केरल और तमिलनाडु जैसे बड़ी आबादी वाले राज्यों में इन दोनों ही दलों के लिए क्षेत्रीय दलों से निपटना आसान नहीं रहा है पर यूपी के अगले वर्ष के विधान सभा चुनावों में यह भी स्पष्ट हो सकता है कि भाजपा वहां पर २०१४ का प्रदर्शन दोहरा पाती है या नहीं.
                                          इतने बड़े देश में आज एक पार्टी के लिए समग्र स्वीकर्ता बना पाना आसान भी नहीं है और जिस तरह से भाजपा उन राज्यों तक पहुँचने का काम कर रही है जहाँ आज तक उसे कोई नहीं जानता था उससे उसकी नीतियां अवश्य ही आम लोगों तक पहुँचने वाली हैं और कांग्रेस को उन सभी राज्यों में अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने की आवश्यकता भी है जहाँ पर उसकी प्रभावी पहुँच तो है पर वह जनता से दूर हो चुकी है. लोगों से जुड़ने में भाजपा आज कांग्रेस से बाज़ी मारती हुई दिखाई दे रही है और कांग्रेस की सरकार को बदलकर भाजपा को राज्यों में आजमाने की एक प्रवृत्ति के चलते भी दिल्ली और असम की कांग्रेस सरकारें उसके हाथ से जा चुकी हैं. शीला दीक्षित और तरुण गोगोई के लिए दिल्ली और असम में कोई बड़ा विरोध तो नहीं था पर वे भाजपा के उस प्रचार से नहीं बच सके जिसमें कांग्रेस पर लगातार आरोप लगाए जाते रहे हैं. लोकतंत्र में हार-जीत तो होती रहती है पर जया और ममता ने भी सत्ता में रहते हुए दोबारा सत्ता को पाने की कोशिश को कम नहीं किया जबकि कांग्रेस केरल और असम में सम्भवतः आधे अधूरे मन से ही चुनाव लड़ रही थी जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा है. यदि कांग्रेस को लगता है कि उसे राहुल के हाथों पार्टी का नेतृत्व सौंप देना चाहिए तो उसे यह काम करने में विलम्ब नहीं करना चाहिए क्योंकि कांग्रेस आज बिखरे हुए विपक्ष नहीं बल्कि एक काडर आधारित पार्टी भाजपा से चुनावी समर में दो दो हाथ करती है जिसके पास केंद्र की सत्ता और संघ की शक्ति भी है. राहुल को अपने आप को साबित करने देना चाहिए क्योंकि यदि वे पार्टी को संभाल सके तो ठीक वर्ना उनके असफल होने पर अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए पार्टी नया नेतृत्व खुद ही तलाश कर लेगी.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

जागरूक या बेईमान नागरिक ?

                                                                          देश में इस बात पर अक्सर ही लम्बी चौड़ी बहसें होती रहती हैं कि नेताओं ने अपने लाभ के लिए देश के साथ बहुत अन्याय किया है और वे किसी भी परिस्थिति में देश को सबसे आगे रखकर नहीं सोच पाते हैं. मोटे तौर पर यह देखा जाये तो काफी हद तक सही भी लगता है क्योंकि पिछले कुछ दशकों में नेताओं के नैतिक स्तर में जिस तरह की गिरावट देखने को मिलती है वैसा पहले कभी भी नहीं हुआ था और आज भी इसमें गिरावट का दौर जारी ही है जिससे निपटने के लिए सरकार, समाज और चुनाव आयोग के साथ भारतीय संविधान भी अपने को लाचार ही पा रहा है. इस समस्या से निपटने के लिए कुछ भी करने से पहले क्या हम नागरिकों को यह नहीं सोचना चाहिए कि ऐसा क्यों हो रहा है और क्या इसमें हमारा भी योगदान कहीं पर शामिल है ? इसका उत्तर बहुत ही आसानी से खोजा जा सकता है क्योंकि जब भी सरकार की किसी भी बात पर निर्णय देने की बात आती है तो हम बहुत मुखर हो जाते हैं पर मौका मिलने पर हम भी इन नेताओं से अधिक सुविधाभोगी होने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं और देश संविधान को ताक पर रखने की भरपूर कोशिशें भी किया करते हैं पर साथ ही यह भी चाहते हैं कि हमारे जन प्रतिनिधि पूरी तरह से संविधान के अनुपालक ही रहें ?
                                      वर्तमान में यूपी में जिला पंचायतों के बाद ग्राम प्रधानों के चुनाव भी कई चरणों में चल रहे हैं जिससे जनता को संविधान में मिले हुए अधिकारों के हिसाब से ग्रामीण क्षेत्रों की समस्याओं और उनके निपटारे के लिए अपनी स्थानीय सरकार चुनने का अवसर मिला करता है पर क्या हम नागरिक इस सरकार को चुनने में पूरी ईमानदारी निभा पाते हैं ? इस सवाल का उत्तर सदैव न में ही मिलने वाला है क्योंकि जिस तरह से इस चुनाव के समय अन्य कोई चुनाव न होने के कारण शहरों की तरफ पलायन कर चुके और नगरीय निकायों में भी वोटर लिस्ट में होने के बाद भी अधिकतर लोग अपने गांवों में जाकर चुनाव प्रक्रिया में भाग लेते हैं और दोनों जगह वोट बननाते तथा उसका दुरूपयोग भी करते हैं उससे यही पता चलता है कि सरकारें चाहे कितना कुछ भी कर लें पर जनता भी कहीं न कहीं से चोर रास्ते खोजने में तैयार बैठी रहती है. क्या इन चुनावों में लड़ने वाले प्रत्याशियों और शहरों में बस चुके नागरिकों को यह पता नहीं है कि दो जगहों पर वोट होना खुले आम भारतीय संविधान का उल्लंघन हैं और दोषी पाये जाने पर इसमें सजा दिए जाने का प्रावधान भी है जिस पर अमल कभी भी नहीं किया जाता है क्योंकि इस तरह की शिकायतें भी नहीं होती और उन पर ध्यान भी नहीं दिया जाता है.
                                      इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को सबसे पहले कानून बनाकर वोटरलिस्ट को आधार से जोड़ने के बारे में सोचना चाहिए जिससे अवैध रूप से दो जगहों पर वोट करने वाले लोगों के नाम स्वतः ही वोटर लिस्ट से हटाये जा सकें और इस व्यवस्था के लागू होने के बाद पूरी तरह से पहली बार जो भी व्यक्ति जहाँ भी वोट करे उसे वहीं का वोटर माना जाये तथा अन्य जगहों पर उसका वोट मिलने उसे हटा भी दिया जाना चाहिए. जब तक इस तरह की व्यवस्था नहीं हो पाती है तब तक पूरे देश के हर चुनावों के लिए उपयोग में लायी जाने वाली सभी वॉटरलिस्ट्स को एकरूप कर दिया जाना चाहिए जिससे किसी भी दूसरे स्थान पर डाले गए वोट को पहचाना जा सके और एक जगह ही नाम होने की बाध्यता के चलते यह भी माना जाना चाहिए कि दूसरी जगह का नाम फ़र्ज़ी है और उसे बिना कोई अवसर दिए ही वोटर लिस्ट से हटाने की कार्यवाही की जानी चाहिए. इस एक वोटरलिस्ट के लिए पूरे देश में एक अभियान भी चलाया जा सकता है और यह सेवा लेने के लिए लोगों को अपने आधार संख्या को ऑनलाइन अपनी वोटरलिस्ट से जोड़ने की सुविधा भी दी जानी चाहिए. जब तक नागरिकों के स्तर पर इस तरह से व्याप्त अनिश्चितता को समाप्त नहीं किया जायेगा तब तक निष्पक्ष चुनावों की बातें खोखली ही साबित होती रहेंगी.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 3 नवंबर 2015

यूपी पंचायत चुनाव के परिणाम

                                                                               ज़्यादा आबादी के चलते देश की राजनीति में सबसे अहम स्थान रखने वाले यूपी में हुए पंचायती चुनावों के पहले स्तर में जिस तरह से बसपा को छोड़कर सभी दलों का प्रदर्शन आशानुरूप नहीं रहा है उससे भले ही किसी भी तरह का संकेत माना जाये पर एक बात तो तय ही है कि आने वाले समय में सत्तारूढ़ सपा और २०१७ में यूपी में मोदी के दम पर सरकार बनाने की सोच के साथ आगे बढ़ रही भाजपा के लिए मायावती ने खतरे की घंटी बजा ही दी है और इससे संभवतः प्रदेश की सबसे मज़बूत कैडर आधारित पार्टी होने के कारण उसके लिए विधान सभा चुनावों में बहुत कुछ हासिल करने का भी अवसर खुल जायेगा. आज भाजपा पर इस बात का अधिक दबाव बन चुका है कि वह २०१४ के लोकसभा चुनावों में किये गए अपने प्रदर्शन के अनुरूप कुछ पा कर दिखाए और प्रदेश में सत्ता संभाले तो वहीं अखिलेश यादव पर इस बात की दारोमदारी है कि वे भी अपने अस्तित्व को बचाये रखने का काम कर सकें. सपा का भविष्य चौपट करने में जिस तरह से बड़े सपाई नेता ही लगे हुए हैं उसके चलते भी सरकार की छवि बहुत प्रभावित हो रही है.
                 इस चुनावों का सबसे महत्वपूर्ण पहलू जो सामने आया है उस पर संभवतः अभी तक किसी की भी नज़र नहीं पड़ी है क्योंकि इस बार प्रदेश के ग्रामीण इलाकों ने भी जातिगत मुद्दों से कुछ हद तक आगे बढ़ते हुए युवाओं पर जितना भरोसा जताया है वह प्रदेश के इतिहास में पहली बार ही हुआ है और अब बुजुर्गों को जिस तरह से जनता ने स्पष्ट रूप से आराम करने की सलाह सी ही दे दी है कि अब उनको सक्रिय राजनीति से हटकर युवाओं के लिए स्थान खाली करना होगा तो यह विधान सभा चुनावों के लिए भी एक स्पष्ट सन्देश के रूप में भी देखा जा रहा है. ४५ वर्ष तक के युवाओं ने जिस तरह से प्रदेश की ६५% सीटों को कब्ज़े में लिया है वह देखने योग्य है और इनमें भी यदि ३५ वर्ष की सीमा देखी जाये तो वह ५०% से भी अधिक हो जाती है इसे जनता और युवा होते प्रदेश की मंशा ही समझा जाना चाहिए जिससे वे अपनी राजनैतिक पारी को शुरू करने के लिए पूरी तरह से तैयार भी हो सकें. आज देश युवाओं के हाथों में जाने को तैयार है पर संभवतः स्थापित नेता लोग इस मामले में कुछ भी सीखने के लिए तत्पर दिखाई नहीं दे रहे हैं.
                राजनीति में उम्र दराज़ लोगों के सदैव ही सक्रिय रहने से जहाँ युवाओं के अवसर कम हो जाते हैं वहीं नयी प्रतिभाओं को बाहर निकाल पाना भी मुश्किल हो जाता है इसलिए इसे प्रदेश का मूड समझते हुए अगले चुनावों में जो भी लोग इस पर ध्यान दे पायेंगें उनके लिए ही आगे बढ़ना और जीत हासिल करना आसान रहने वाला है. राजनीति के इस स्थायी होते युवा मंच की अनदेखी कर पाना अब किसी के बस की बात नहीं है. यूपी के सीएम अखिलेश को यदि आज भी मुलायम सिंह सरकार चलने की खुली छूट दे सकें तो वह निश्चित तौर पर सपा की गिरती हुई छवि को सँभालने में कारगर साबित हो सकते हैं पर अपनी पुरानी कमज़ोरियों को अपनी सियासती विरासत के रूप में अखिलेश को सौंपने का मन बनाये मुलायम उन्हें सपा की वह कार्यशैली अपनाने के लिए बाध्य करते हुए नज़र आते हैं जो आम जनता में सपा की छवि को करारा धक्का देने का काम करती रहती है. अखिलेश के प्रयास बेहतर और आज के समय के अनुरूप हैं पर पार्टी के विशेष तरीके से काम करने के कारण आज उनके पास भी परिणाम देने की अच्छी स्थिति नहीं दिखाई देती है.    
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रविवार, 1 नवंबर 2015

वोट के लिए कुछ भी करेगा ??

                                 देश में चुनाव के समय हमारे राजनेता कितने घटिया हो जाते हैं इसकी बानगी लगभग हर चुनाव में दिखाई देती है पर अब पाकिस्तान की तरह से ही जिस तरह से भारत के मतदाताओं को पाकिस्तान का भय दिखाकर भाजपा द्वारा अपने पक्ष में वोट करने के लिए माहौल बनाया जाना शुरू हो चुका है उसके बाद इस बात का भी पता चलता है कि हमारे पढ़े लिखे नेता भी मानसिक रूप से कितने दीवालिया हैं ? इतने बड़े पदों पर पहुंचे हुए लोगों का मानसिक संतुलन इतना कमज़ोर है कि वे जानते हुए भी भोली भाली जनता को उन बातों से बरगलाने की कोशिशें करने में नहीं चूकते हैं जिनको आज के युग में पल भर में ही झूठा साबित कर दिया जाता है. वोटों के लालच में मोदी, अमित शाह और गिरिराज सिंह से किसी नैतिकता की आशा भी नहीं की जा सकती है क्योंकि पिछले आम चुनावों में सबसे घटिया बयान देने वाले गिरिराज सिंह मोदी के चहेते मंत्री हैं.
                                मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में चुनाव पहुँचने के बाद जिस तरह से पहले अमित शाह और फिर अन्य भाजपाई नेताओं ने चुनाव प्रचार में पाकिस्तान का ज़िक्र करना शुरू किया उससे उनकी मानसिकता का ही पता चलता है क्योंकि पिछले डेढ़ वर्षों में मोदी सरकार ने देश के लिये जो कुछ भी किया है उसके परिणाम आने में समय लगने वाला है और इस परिस्थिति में जब बिहार में लोकसभा चुनावों में पायी सफलता को बचाये रखने की आवश्यकता और दबाव भाजपा पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है तो विकास के भाजपा के चुनावी पटल से गायब हो चुका है. खुद अमित शाह भी विकास के मुद्दे को भूलकर जातिवादी कुचक्र में उलझ चुके हैं और जिस जातिवाद को पिछले चुनावों में भाजपा द्वारा आसानी से तोड़ दिए जाने के ढेरों विश्लेषण सामने आये थे आज वे खुद जातिवाद की भेंट चढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं.
                      केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी द्वारा जिस तरह से बिना जानकारी नितीश का चुनाव प्रचार पाकिस्तानी अख़बारों में किये जाने की बातें की गयीं और जब डिजिटल सरकार के मंत्री रूडी को सही बात पता चली तो भी उनमें इतना साहस नहीं था कि वे अपनी गलती को मानकर ही अपना ट्वीट डिलीट करते और उन्होंने चोरी से अपना विवादित ट्वीट ही गायब कर दिया। नैतिकता के इतने ऊंचे मानदंड केवल नागपुरी संस्कृति में पले बढे लोगों के ही हो सकते हैं यह तो स्पष्ट हो गया है जो मोदी दिन रात डिजिटल इंडिया, फेसबुक और ट्वीटर के गाने गाते रहते हैं उनके मंत्री इस डिजिटल संसार के मामले में कितने निरक्षर हैं यह सभी को पता चल ही गया है. देश के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए किस तरह से मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में रहने वाली हिन्दू आबादी को कितनी बेशर्मी के साथ भारत की पहली स्वघोषित डिजिटल सरकार के ज्ञानी मंत्री बरगलाने की कोशिशों में लगे हैं यह भी देश को पता चल चुका है.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 27 सितंबर 2015

चुनाव, भ्रष्टाचार और भाजपा

                         देश में किसी भी तरह के चुनावों के समय जिस तरह से आरोपों प्रत्यारोपों की बौछार शुरू हो जाती है आज भी हमारे राजनेता इस मसले को हल कर पाने में पूरी तरह से सक्षम नहीं दिखाई देते हैं भले ही नैतिक आधार पर उनके मानदंड कितने भी ऊंचे क्यों न हों पर समय आने पर उनकी तरफ से भी भ्रष्टाचारियों को समर्थन किया जाना हमारे लोकतंत्र की व्यवस्था गत खामी को ही दर्शाता है जिसमें किसी भी व्यक्ति के चुनाव लड़ने पर रोक तब तक नहीं है जब तक वह कोर्ट द्वारा सजा पाया हुआ न हो. इस तरह की गलतियां करने या जानबूझकर ऐसे लोगों पर पार्टियों द्वारा भरोसा जताया जाने कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है जो पूरी तरह से समाज विरोधी कार्यों में लगे हुए हैं फिर भी लगभग सभी दल इस तरह की हरकतें करने से बाज़ नहीं आते हैं. देश में कांग्रेस, सपा, बसपा, राजद जैसे दल तो इस तरह की बातों के लिए लगातार भाजपा द्वारा बदनाम ही किये जाते हैं कि इन दलों की तरफ से लोकतंत्र की पवित्रता को बनाये रखने के लिए कोई ठोस उपाय नहीं किये जाते हैं जिससे समाज के अच्छे वर्गों के लोग आज राजनीति में आने ही नहीं चाहते हैं.
                      इस बात की तह तक जाने की बात पर यदि गौर किया जाये तो हमें पिछली सदी एक सातवें दशक में लौटना होगा जब आज़ादी के लिए लड़ने वाली पीढ़ी के लोग धीरे धीरे राजनैतिक परिदृश्य से ओझल होने लगे थे और सत्ता उन लोगों की तरफ बढ़ने लगी थी जो आज़ादी के समय कम उम्र के थे या उनके लिए पुराने मुद्दों पर चुनाव जीतना भारी पड़ना लगा था क्योंकि कहीं न कहीं से देश की जनता को यह महसूस होने लगा था कि उसके हाथों में लोकतंत्र की जो शक्ति है उसका सही उपयोग भी किया जा सकता है. ऐसी परिस्थिति में जब स्थापित लोगों को चुनाव जीतने में समस्याओं का सामना करना पड़ा तो उन्होंने अपने लाभ के लिए समाज में सक्रिय असामाजिक तत्वों का दुरूपयोग चुनावी मशीनरी के रूप में करना शुरू कर दिया जिससे आम लोगों में भय व्याप्त होने लगा और चुनाव के समय समाज का बड़ा वर्ग इससे दूर रहने की सोचने लगा. इस परिस्थिति का सीधा लाभ उन नेताओं को मिला क्योंकि इन समाज विरोधी लोगों द्वारा जिस तरह से चुनावी अराजकता फैलाई गयी थी उसका कोई अन्य तोड़ भी नहीं था. इससे समाज के इन अराजक तत्वों के माध्यम से एक डेढ़ दशक तक नेताओं की चुनावी नैय्या पार होती रही पर जब इन लोगों को इस बात का एहसास हुआ कि जो चुनाव हम दूसरों को जिता सकते हैं वह खुद भी जीत सकते हैं तो पूरे राजनैतिक परिदृश्य में पूरा बदलाव आ गया और चुनाव के माध्यम से देश के लोकतंत्र में अपराधियों के माननीय बनने का चलन शुरू हो गया.
                      आज यदि एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट के दबाव के कारण राजनीति में स्थापित अपराधियों का आना कम होने है तो वहीं उनके माध्यम से राजनीति करने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी देखने को मिलने लगी है. अब जो राजनेता चुनाव नहीं लड़ सकते हैं वे अपने स्तर से अपने विश्वास पात्रों को चुनाव में उतार कर खुद ही नियंत्रण अपने हाथों में रखा करते हैं जिससे परोक्ष रूप से परिस्थिति में भले ही वे तत्व सामने न हों पर उनका दबदबा तो राजनैतिक गलियारों में बना ही रहता है. देश के पूर्व गृह सचिव और अब भाजपा संसद आरके सिंह ने जिस तरह से बिहार चुनावों में भाजपा के टिकट वितरण में भ्रष्टाचार के आरोप लगाये हैं वे अपने आप में परिस्थिति के बहुत ही गंभीर होने की दिशा में इशारा करते हैं. उन्होंने खुले शब्दों में टिकट वितरण को लेकर जिस तरह से धन लेने के आरोप अपनी ही पार्टी पर लगाये उससे पूरे परिदृश्य की भयावहता का अंदाज़ा होता है. आरके सिंह अपनी बात को स्पष्ट रूप से कहने के लिए जाने जाते हैं और उनकी तरफ से बातें खुले तौर पर कही जाती हैं वे कोई राजनैतिक व्यक्तित्व नहीं हैं जिनको अपने भविष्य की चुनता करने की आवश्यकता हो और उनका यही गुण उन्हें सही बात को खुले तौर पर कहने का हौसला भी देता है. ईमानदार व्यक्ति का दुरुयोग करना भी कितना भारी पड़ सकता है यह बात अब भाजपा की समझ में आने लगी होगी क्योंकि उनके एमपी होने के कारण शायद पार्टी यह सोचती हो कि वे पार्टी लाइन से हटकर बात नहीं करने वाले हैं तो यह बात अब पूरी तरह से सामने आ चुकी है.
                     सिंह ने जिस तरह से भाजपा के इस तरह के टिकट वितरण पर घोर असंतोष जताया और साथ ही सवाल भी किया कि इस तरह अपराधियों के साथ खड़े होने से भाजपा और लालू में क्या अंतर दिखाई देगा तो भाजपा को इस स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ और उनकी तरफ से अमित शाह और राजनाथ सिंह ने आरके सिंह से खुद बात की. पूर्व अधिकारी होने के चलते आरके सिंह इस तरह का हौसला दिखा सकते हैं क्योंकि उनके पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है जबकि अन्य नेताओं के राजनैतिक भविष्य पर ऐसी किसी भी घटना का ऐसा असर हो जाता है कि उसके लिए राजनीति में टिके रहना भी कठिन हो जाता है. आरके सिंह द्वारा उठाया गया मुद्दा बेशक राजनैतिक ही है पर इसकी कानूनी तौर पर और भी मज़बूती के साथ समीक्षा करने की आवश्यकता है अब जब देश के स्थापित राजनैतिक दल खुद ही इस कीचड में घुसने को तैयार बैठे हैं तो इसका क्या विकल्प सामने बचता है ? सिंह जैसी आवाज़ें भारतीय लोकतंत्र में कम ही सुनाई देती हैं और वे शीघ्र ही ख़त्म भी हो जाती हैं क्योंकि हमारे राजनैतिक दल किसी भी परिस्थिति में राजनैतिक और चुनावी शुचिता की बातें चाहे जितनी करें पर उनकी तरफ से इसे वास्तव में करने की इच्छा शक्ति की कमी के बारे में आसानी से समझा जा सकता है.       
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शुक्रवार, 13 मार्च 2015

विधि आयोग और चुनाव सुधार

                                                                                           देश में चुनाव आयोग के हाथों में चुनाव को और भी अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के साथ अन्य समस्याओं पर जिस तरह से विधि आयोग ने सुझाव दिए हैं यदि उन पर अमल किया गया तो आने वाले समय में आम जनता के लिए चुनाव और भी अधिक सरल हो जाने वाले हैं. सबसे महत्वपूर्ण सुझाव निर्दलीयों को चुनाव लड़ने से रोकने के बारे में है क्योंकि जब तक केवल किसी व्यक्ति विशेष के वोटों को ख़राब करने की नेताओं की नियति पर पूरी तरह से रोक नहीं लगायी जा सकेगी तब तक चुनावों की पवित्रता संदेह से पर नहीं हो पायेगी. आज कई स्थानों पर सिर्फ किसी को हराने के लिए उसकी जाति, धर्म और समान नाम के लोगों को विरोधियों द्वारा चुनाव में उतार दिया जाता है जिसके बाद वोटों के बंटने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं और कई बार इस सबसे महत्वपूर्ण लोग चुनाव हार भी जाया करते हैं. हालाँकि इस तरह से चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों के लिए जिस तरह से प्रक्रिया कठोर की जा सकती है वह किसी भी व्यक्ति के चुनाव लड़ने के अधिकार की रक्षा करते हुए अनावश्यक उम्मीदवारों की भीड़ को काम करने का काम करने वाली है. चुनाव आयोग के पास पंजीकरण कराने के बाद कोई भी चुनाव लड़ सकता है ज़ाहिर है कि इस तरह से केवल गंभीर लोग ही चुनाव के लिए आगे आयेंगें और अन्य लोग स्वतः ही मैदान से हट जायेंगें.
                                 दूसरे महत्वपूर्ण सुझाव की आज बहुत ही आवश्यकता है क्योंकि आज कई नेता कई जगहों से चुनाव में खड़े हो जाते हैं और जीतने के बाद वे एक जगह से त्यागपत्र दे देते हैं जिससे दुबारा चुनाव करने की व्यवस्था करनी पड़ जाती है चूंकि उप चुनाव जल्दी ही करने पड़ते हैं तो उस स्थिति में इस खर्चे से बचने के लिए दो जगहों से चुनाव लड़ने पर पूरी तरह से रोक लगाने की बात कही गयी है पर इसके लिए नेता आसानी से राज़ी नहीं होने वाले हैं क्योंकि कई बार हार की संभावनाओं या फिर अपनी पार्टी के पक्ष में माहौल बनाये रखने के लिए भी बड़े नेता दो जगहों से चुनाव लड़ा करते हैं. दोबारा चुनाव के खर्चे को बचाने के लिए एक काम और भी किया जा सकता है कि दूसरे स्थान पर आने वाले व्यक्ति को यदि कुल पड़े वोटों या जीतने वाले व्यक्ति के वोटों के आधे से अधिक वोट मिलें तो उपचुनाव की जगह उसे विजयी घोषित कर दिया जाना चाहिए और यदि दूसरे स्थान पर आने वाले व्यक्ति को बहुत काम वोट मिले हों तो जीतने वाले व्यक्ति की पार्टी को यह अधिकार दे दिया जाना चाहिए कि वह उसके स्थान पर किसे नामित करना चाहती है जो सदन में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर सके.
                          देश में जाति, धर्म, क्षेत्र और अन्य तरह के बंधनों से मुक्त चुनाव कराने के लिए चुनाव केवल पार्टी सिंबल पर भी लड़ने के बारे में सोचा जा सकता है क्योंकि यदि निर्दलीय मैदान में नहीं होंगें तो चुनावों को पार्टी के स्तर पर लड़ने में कोई दिक्कत भी नहीं होने वाली है. जिस स्थान से जिस पार्टी को सर्वाधिक वोट मिलें वहां से पार्टी द्वारा नामित व्यक्ति को सदन में भेजने के लिए नामित किया जा सकता है. देखने में यह प्रक्रिया पेचीदा लग सकती है पर देश की राजनीति में जाति, समाज, धर्म, भाषा आदि के पचड़ों से दूर होकर सभी नेता अपने दल विशेष के लिए वोट मांगते नज़र आने वाले हैं जिससे समाज में समरसता बढ़ सकती है और जिस तरह का विद्वेष चुनाव से पूर्व और पश्चात दिखाई दे जाता है वह भी स्वतः ही कम हो जायेगा क्योंकि किसी भी नेता को यह पता ही नहीं चल पायेगा कि उसके यहाँ से चुनाव में किसे नामित किया गया है. चुनाव आयोग के पास इस तरह की पूरी सूची भी पार्टियों द्वारा चुनाव से पहले ही जमा की जा सकती है जिसमें जीतने पर किस व्यक्ति को प्रमाणपत्र दिया जायेगा या फिर कौन से व्यक्ति को नामित किया जायेगा. यदि इस तरह का आमूल चूल परिवर्तन किया जा सके तो चुनाव के कारण फैलने वाले विद्वेष को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है और चुनावों को समस्या नहीं बल्कि समाधान के तौर पर भी देखा जा सकता है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...