मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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रविवार, 15 अप्रैल 2018

एक राष्ट्र एक चुनाव की परिकल्पना

                                                मोदी सरकार की देश में लोकसभा- विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाने की मंशा पर विभिन्न स्तरों पर विचार करने की दिशा में काम शुरू हो गया है पर क्या इस तरह प्रयास से आने वाले समय में देश को कोई लाभ होगा या फिर देश एक नयी तरह की तानाशाही युक्त लोकतान्त्रिक अराजकता की तरफ बढ़ जायेगा ? आज के समय भी जिस तरह से त्रिशंकु सदन बनने पर सरकार बनाना पूरी तरह से केंद्र सरकार की मंशा पर ही निर्भर हो चुका है उससे आने वाले समय में केंद्र की तरफ से पड़ने वाले अनावश्यक दबाव से राज्यों के नेता किस तरह से निपट पायेंगें यह बहुत बड़ी चुनौती होने वाला है. यह सही है कि हर वर्ष कभी भी किसी न किसी राज्य में चुनाव होने से लागू होने वाली आचार संहिता के चलते विकास कार्यों की गति में रुकावट पैदा होती है पर क्या नेताओं को यह सोचने का समय नहीं है कि आज उनको आचार संहिता लागू होने से इतना कष्ट क्यों होता है जबकि यह परंपरा आज़ादी के बाद से ही चली आ रही है ? आचार संहिता लगाने का सीधा सा मतलब यही हुआ करता था कि सत्ताधारी दल और पूरे विपक्ष के लिए चुनावों से पूर्व एक समान वातावरण में जनता के सामने जाने का विकल्प खुला रहे. आज आचार संहिता से विकास रुकने की प्रक्रिया का आरोप लगाने वाले नेता क्या यह स्वीकार कर सकते हैं कि उनकी नीतियां भी चुनावों को प्रभावित करने के लिए ही होती हैं ?
                                         एक साथ चुनाव होने पर सबसे बड़ी समस्या तब सामने आएगी जब केंद्र या किसी राज्य में कोई सरकार अल्पमत में आ जाएगी तब किस तरह से सांसदों या विधायकों की खरीद फरोख्त की जाएगी इसका अंदाज़ा आज आसानी से लगाया जा सकता है क्योंकि राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों के चुनावों में जिस तरह से कुछ हद तक धन कुबेरों को हर पार्टी मैदान में उतारती रहती है उससे अल्पमत वाली सरकार को  बचाने के लिए सरकार समर्थक धन कुबेर और उद्योगपति परदे के पीछे के खेल में धन का दुरूपयोग कर क्या लोकतंत्र का मज़ाक नहीं उड़ाएंगे ?  लोकतंत्र नैतिकता के आधार पर टिकता और चलता है पर केन्द्र की मोदी सरकार ने जिस तरह से कई राज्यों में सबसे बड़े दल की राज्यपालों के माध्यम से अनदेखी कर किसी भी परिस्थिति में अपने गठबंधन की सरकारें बनाने की गलत परंपरा शुरू कर दी है वैसी स्थिति में कोई महत्वाकांक्षी केंद्र सरकार सभी राज्यों में राजनैतिक गतिविधियों को आसानी से अपने अनुसार मोड़ने की तरफ क्या नहीं बढ़ जाएगी? भारत जैसे विविधता भरे देश में जनता के सामने हर स्तर पर अपने मनपसन्द उम्मीदवार को चुनने का अवसर संविधान की तरफ से दिया गया है जिससे आज देश के कई हिस्सों में क्षेत्रीय दल भी सफलता के साथ सरकारें चला रहे हैं पर एक साथ चुनाव होने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति भी बन सकती है जो राजनीति को केवल राष्ट्रीय दलों के बीच में ही सीमित करने का काम भी क्र सकती है ?
                                         सबसे बड़ा मुद्दा धन को बचाने और विकास की गति को निरंतर बनाये रखने से जुड़ा है तो इस मामले के लिए सबसे पहले नेताओं को अपने गिरेबान में झाँकना होगा क्योंकि सरकार कोई भी दल चलाये पर देश की समस्याएं तो वही रहती हैं तो संसद और विधान सभाओं से होने वाले विधायी कार्यों पर ध्यान देकर नीतियों को लम्बे समय के लिए लागू करने की दिशा में सोचना चाहिए जैसे एक समय देश में पञ्चवर्षीय योजनाएं और २० सूत्री कार्यक्रम चला करते थे जिससे किसी भी चुनाव के आने जाने से इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर किसी तरह की रोक नहीं होती थी. क्या आज देश के नेताओं को एक चुनाव से अधिक एक अलग सोच के साथ विकास के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है? योजना आयोग हो या बदले नाम नीति आयोग जब तक नेताओं की मंशा साफ़ नहीं होगी तब तक किसी भी परिस्थिति में चुनावी सुधारों को सही तरह से लागू नहीं किया जा सकता है।  आखिर सरकार की मंशा केवल चुनाव एक साथ कराने के सुधारों तक ही क्यों रुकी हुई है क्या देश के सम्पूर्ण चुनाव परिप्रेक्ष्य पर विचार का उसमें आज के अनुसार बदलाव करने की आवश्यकता सरकार को महसूस नहीं हो रही है ?  चुनाव सुधारों को केवल अपने परिप्रेक्ष्य में देखने से परिस्थितयां बदलने वाली नहीं है और सबसे बड़ी समस्या त्रिशंकु और अल्पमत की सरकारों वाले राज्यों में सामने आने वाली है क्योंकि वहां पर चुनाव हो नहीं पायेंगें तो क्या अघोषित रूप से केंद्र अपने हिसाब से राष्ट्रपति शासन लगाकर वहां की बागडोर सीधे अपने हाथों में नहीं ले लेगा ?
                                       इस सबसे अच्छा यही रहेगा कि चुनावों के लिए प्रति वर्ष एक महीना निर्धारित कर लिया जाये और पूरे वर्ष में कभी भी होने वाले चुनावों को केवल उसी महीने में कराने की दिशा में काम शुरू कर दिया जाये इससे जहाँ राज्यों में एक साथ एक वर्ष में चुनाव समाप्त हो जायेंगें वहीं किसी भी तरह की समस्या आने पर अगले वर्ष उसी महीने में फिर से चुनाव कराये जा सकेंगें। क्या किसी भी राज्य में चुनाव कराने के लिए आयोग को इतना लम्बा समय देना चाहिए कि नेता अपने अनुसार पूरे चुनाव को मोड़ने का समय पा जाएँ और खुलेआम लोकतंत्र का चीर हरण कर सकें ?  विकास अवरुद्ध होने  की अवधारणा सामने लाने वाले दलों को अब यह सोचना होगा कि उनकी  प्रभावित करने वाली नीतियों के चलते समस्याएं अधिक होती है न कि देश में अलग अलग समय चुनाव होने से यह सब प्रभावित होता है। 

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बुधवार, 25 मई 2016

सर्बानंद सोनोवाल का असम

                                  पूर्वोत्तर भारत के राज्य असम में हाल में संपन्न हुए चुनाव में स्पष्ट बहुमत हासिल करने के बाद भाजपा ने पहली बार सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में सरकार का गठन कर लिया है जिससे राज्य के शासन में १५ वर्षों की तरुण गोगोई की स्थायी नीतियों के बाद कुछ बड़े बदलावों के बारे में लोगों में उत्सुकता जागी है. भाजपा के लिए यह जीत कितनी बड़ी थी इसका अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पीएम समेत केंद्र सरकार के अधिकांश मंत्री, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों समेत भाजपा के बड़े नेताओं ने इस कार्यक्रम में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई और पूर्वोत्तर में पार्टी के लिए संभावनाओं के द्वारा खोलने वाले सोनोवाल पर अपनी पूरी आस्था भी दिखाई. निश्चित तौर पर जब जनता से जुड़ा हुआ कोई व्यक्ति शीर्ष पद संभालता है तो उस राज्य या देश की स्थिति में धरातल पर भी बदलाव दिखाई देने लगते हैं फिर सोनोवाल की सौम्यता अपने आप में ही बहुत कुछ कह दिया करती है क्योंकि लगभग दो वर्षों तक केंद्र में मंत्री रहने के बाद भी उनकी तरफ से मोदी सरकार के अन्य मंत्रियों की तरह तल्खी भरे अंदाज़ में कभी भी किसी मुद्दे पर कोई बयान नहीं दिया गया है.
                            सीमा से लगा प्रान्त होने और बांग्लादेश के साथ अधखुली सीमा के चलते जिस तरह से असम में भी बांग्लादेशियों की घुसपैठ एक बड़ा मुद्दा है और चुनाव में सोनोवाल ने इसे पूरी तरह से अपनी प्राथमिकता में रखा उसके बाद यही लगता है कि उनकी तरफ से इस मुद्दे पर केंद्र के साथ मिलकर कोई ठोस कार्य भी किया जायेगा क्योंकि सीमा पर भौगोलिक परिस्थितियां कठिन होने के कारण भी इस घुसपैठ को रोकने की कोशिश करना पूरी तरह से संभव नहीं हो पाता है और राज्य में घुसपैठ एक बड़ा मुद्दा बनी ही रहती है. सोनोवाल के पास निश्चित तौर पर इससे निपटने के लिए कुछ कार्ययोजना अवश्य ही होगी और उस पर केंद्र सरकार की तरफ से उन्हें पूरा समर्थन भी मिलेगा तो वे स्थायी रूप से इस समस्या का समाधान निकाल पाने में सफल हो सकेंगें. राज्य में शांति के स्तर को और भी अच्छा करने के लिए यदि सीएम के आह्वाहन पर उल्फा के विभिन्न गट सरकार से बात करने के लिए सामने आते हैं तो यह भी एक अच्छा कदम हो सकता है क्योंकि राज्य में सुरक्षा का माहौल मज़बूत होने के साथ वहां पर पर्यटन की सम्भावनाएं और भी बढ़ सकती हैं जो राज्य की आय बढ़ाने में काफी हद तक सहायक हो सकती हैं.
                               निश्चित तौर पर यह भाजपा की सरकार है पर इस सरकार को बनाने में पिछले वर्ष तरुण गोगोई से नाराज़ और कांग्रेस से भाजपा में आये हेमंत सर्मा की आगे की रणनीति पर भी असम और सोनोवाल सरकार का भविष्य टिका रहने वाला है क्योंकि उनके कांग्रेस से अपने समर्थकों के साथ बाहर आने के चलते भी राज्य में समीकरण बदल गए थे और जिस पद के लिए उन्होंने अपनी पार्टी से बाहर जाना स्वीकार किया था तो उसके लिए उनकी महत्वाकांक्षा कहाँ तक रुक पायेगी इससे भी आने वाले समय में असम में बहुत अंतर पड़ने वाला है. भाजपा और सोनोवाल के लिए इस तरह के तत्वों को संतुष्ट रख पाना असम्भव तो नहीं पर कठिन अवश्य होने वाला है. राज्य के समग्र विकास के लिए यदि नेताओं की महत्वाकांक्षाएं सीमित ही रहें तो वह राज्य बहुत आगे तक जा सकता है पर दुर्भाग्य से हमारे देश में ऐसा नहीं होता है और पार्टी के अंदर के लोग ही स्थापित सरकारों के लिए लगातार संकट उत्पन्न करते रहते हैं. फिलहाल असम में इस नए परिवर्तन के साथ देश यह आशा करता है कि नयी सरकार इस राज्य को देश के विकास के साथ और भी आगे तक ले जाने के अपने प्रयासों में सफल होगी और राज्य से उग्रवाद को समाप्त करने की दिशा में भी गम्भीर प्रयास किये जा सकेंगें.   
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शुक्रवार, 26 जून 2015

राजनीति में नैतिकता के मानदंड

                          ललित मोदी से जुड़े हुए खुलासों के बाद कदाचार के मामलों को लेकर जिस तरह से भाजपा एकदम से दबाव में आती दिखी उसी बीच महाराष्ट्र से पंकजा मुड़े को लेकर किये गए भ्रष्टाचार के खुलासे से भाजपा के शीर्ष स्तर के लिए अपने को बचाने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ सकती है. संख्या बल पर कमज़ोर विपक्ष लोकसभा में तो पूरी तरह से सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलता हुआ दिखाई देने वाला है और राज्य सभा में सरकार की मुसीबतें पहले से ही कम नहीं हैं क्योंकि सरकार के पास वहां पहले ही बहुमत की समस्या आई हुई है. ऐसे में देश के विकास के लिए लिए जाने वाले महत्वपूर्ण निर्णयों को लेकर संसद किस तरह से चल पायेगी और कितना काम हो पायेगा यह सब अभी कोई नहीं बता सकता है क्योंकि अाने वाले समय में इन खुलासों से जुडी हुई कितनी बातें सामने आने वाली हैं यह कोई नहीं जनता है पर कमज़ोर पड़ी कांग्रेस ने इस मुद्दे को अपने स्तर पर उछालना शुरू कर दिया है और सरकार तथा भाजपा जिस तरह से इन नेताओं का अनमने ढंग से बचाव करने में लगी हुई है वह भी जनता की नज़रों से छिपा नहीं हुआ है.
                          सार्वजनिक जीवन में रहने के कारण कई बार नेताओं द्वारा कई ऐसे काम भी हो जाया करते हैं जो समय बीतने पर उनके लिए बहुत समस्या खडी कर देते हैं और ऐसा नहीं है कि यह केवल भाजपा के साथ ही हो रहा है क्योंकि पूरे देश में सत्ता का अपना एक स्थायी भाव है और कोई भी पार्टी या नेता सत्ता में हों सरकार चलाने की प्रक्रिया कमोबेश के जैसी ही रहा करती है अब इसे नेताओं की बाबुओं पर निर्भरता माना जाये या बाबुओं का नेताओं से अधिक प्रभावशाली होना पर सरकार के नौकरशाह हमेशा ही अपने कद को एक स्तर पर बनाये रखने में सफल रहा करते हैं. इस तरह के संदिग्ध मामलों में आखिर देश का संविधान और नैतिकता क्या कहती है इस पर सभी को विचार करने की बहुत आवश्यकता भी है क्योंकि सरकारें बदलने से देश नहीं बदला करता है और किसी भी निर्वाचित सरकार के लिए आखिर वो कौन सा पैमाना निर्धारित किया जाये जिस पर चलकर वो अपन को भ्रष्टाचार और कदाचार से पूरी तरह से मुक्त रखने में सफल हो सके. क्या देश में नेताओं को खुद ही ऐसे उच्च मानदंडों पर काम नहीं करना चाहिए जिसमें ऐसे आरोपों की गुंजाईश ही न रहे और आरोप लगने पर क्या स्वेच्छा से सभी को अपने पद छोड़ने के बारे में या सक्रिय राजनीति से अस्थायी रूप से अलग होने के बारे में नहीं सोचना चाहिए ?
                        सत्ताधारी दल पर पिछली लोकसभा में हर तरह के आरोप लगाने वाली भाजपा आज पूर्ण बहुमत से सत्ता में है पर उसका बर्ताव भी कांग्रेस से अलग दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि तब भी विपक्ष आरोपों लगाने के साथ नेताओं के इस्तीफे की मांग किया करता था और आज भी वही स्थिति है और मोदी सरकार भी ठीक मनमोहन सरकार की तरह अपने मंत्रियों/ नेताओं को बचाने में ही लगी हुई है. दोनों मामलों में एक बड़ा अंतर यह भी है कि उस समय अधिकांश मामले सहयोगी दलों के नेताओं के खिलाफ थे पर इस बार यह सारे मामले भाजपा नेताओं के खिलाफ ही हैं फिर भी सत्ता के वे उच्च मानदंड कहीं से दिखाई नहीं दे रहे हैं जिनकी बातें भाजपा विपक्ष में रहकर किया करती थी ? अब जब भाजपा खुद सत्ता में है तो उसे इस तरह के मामलों से निपटने के लिए स्वेच्छा के स्थान पर इसे कानूनी रूप देने के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि समग्र रूप से न तो कोई दल पूरा बेईमान है और न ही कोई पूरा ईमानदार. समय-समय पर दलों के नेता इस तरह कि हरकतों में शामिल रहा करते हैं जिनसे हर दल की शीर्ष सत्ता को समस्या होती है. राजनैतिक लोगों के खिलाफ लगने वाले आरोपों की खुली सुनवाई होनी चाहिए और जब तक वे निर्दोष या दोषी साबित न हो जाएँ उनके मामलों की दैनिक आधार पर सुनवाई की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा इस तरह के किसी भी भ्रष्टाचार से निपटने के लिए राज्यों के अधिकारियों का एक पूल बनाया जाना चाहिए जिसके पास इस तरह के मामलों की जाँच करने के अधिकार हों.      
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बुधवार, 6 मई 2015

नेपाल भूकम्प - सहायता और स्वाभिमान

                               विनाशकारी भूकम्प आने के बाद अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहे नेपाल के लिए विदेशों से अनियंत्रित और बेकार सामानों के साथ आने वाली मदद के बाद नेपाल सरकार को यह कहने पर मजबूर होना पड़ा है कि इस तरह से सहायता में पुराने कपडे और अनावश्यक सामान भेजने की व्यवस्था पर तुरंत रोक लगायी जानी चाहिए. भारत से बीरगंज पहुंची एक रेलगाड़ी में पुराने कपडे और अन्य बेकार के सामान को अनुपयोगी होने के कारण वहीं पर फ़ेंक दिया गया जिससे सहायता के स्वरुप पर चिंता करने की आवश्यकता महसूस हो रही है. केवल अख़बारों में फोटो छपवाने और खुद को पीड़ितों का मसीहा साबित करने में जुटे विभिन्न सामाजिक संगठनों और राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं के पास यह अपनी राजनीति चमकाने का एक और अवसर बन कर ही रह गया है. आज समय की आवश्यकता के अनुसार काम न करते हुए फालतू की सामग्री इकठ्ठा करने का कोई मतलब नहीं बनता है क्योंकि आपदा से पीड़ित और संकटग्रस्त किसी भी व्यक्ति का भी अपना एक स्वाभिमान होता है जिसके बारे में सहायता करने वाले हाथों को संवेदनशील होने की बहुत आवश्यकता है.
                            जिन वस्तुओं की नेपाल को आवश्यकता ही नहीं है देश में आपदा राहत के नाम पर उन्हें इकठ्ठा करने पर पूरी तरह से रोक लगायी जानी चाहिए जिससे आपदा राहत में अपनी दुकानें चलाने वाले लोगों को भी इस काम से रोका जा सके. पहले भी कई बार आपदा प्रबंधन में उचित सामंजस्य न होने के कारण इस तरह की समस्याएं सामने आती रही हैं फिर भी आज तक देश में सरकारी स्तर पर कोई स्पष्ट नीति नहीं बन पायी है जिसका दुष्परिणाम आज हमारे सामने हैं कि इकट्ठे किये गए पुराने कपडे खुले में फ़ेंक दिए गए हैं. आम लोगों को किसी भी आपदा पीड़ित के स्वाभिमान के बारे में सोचते हुए ही सहायता करने के बारे में आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि इस तरह की सहायता उन्हें आज यह लगने लगा है कि उनका उपहास ही उड़ाया जा रहा है संकट की इस घडी में हम सभी को अनजाने में भी इस तरह की किसी भी हरकत से बचने की हर संभव कोशिश करनी ही चाहिए जिससे किसी को भी हमारी सहायता के पहुँचने पर किसी भी तरह का मानसिक आघात न लगे. सहायता का स्वरुप भी ऐसा होना चाहिए जो किसी भी तरह से काम में आने वाला हो और पीड़ितों की समस्याएं बढ़ाने का कोई भी काम न करे.
                             देश में आपदाओं से लड़ने और आपदा पीड़ितों की मदद के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री आपदा राहत कोष मौजूद है तो हम सभी को इस बारे में आगे बढ़ते हुए अपनी किसी भी तरह की सहायता को पीएम के इस कोष में ही जमा कराने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि देश की तरफ से चलाये जाने वाले किसी भी अभियान के लिए पीएम के स्तर से इस कोष का उपयोग किया जाता है. केवल धनराशि पहुँचने से जहाँ आपदाग्रस्त क्षेत्र की सही आवश्यकता को इस धन के माध्यम से पूरा किया जा सकता है वहीं किसी भी अनावश्यक वस्तु के आपदाग्रस्त क्षेत्र में पहुँचने की संभावनाएं भी समाप्त हो सकती हैं. इस बारे में यदि आवश्यक हो तो पीएम एक बार मन की बात या राष्ट्र के नाम अपने एक विशेष सन्देश में ऐसी अपील भी कर सकते हैं जिसमें आम लोग अपने क्षेत्र के किसी भी बैंक में जाकर अपनी सहायता राशि को सीधे राहत कोष में जमा करने की तरफ बढ़ सकें. आज भी बहुत सारे लोगों को यह पता ही नहीं है कि राहत के लिए आम जनता भी इस कोष में धनराशि जमा कर सकती है तथा नेटबैंकिंग का उपयोग करने वाले लोग सीधे खुद ही यह पैसा राहत कोष में भेज सकते हैं. देश के लोगों को इस बात के लिए जागरूक करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक पुनर्वास को केंद्रित नहीं किया जायेगा तब तक किसी भी तरह से सभी पीड़ितों तक पूरी मदद नहीं पहुँच पायेगी.   
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शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

राष्ट्रपति और राजनीति

                                    पिछले एक पखवाड़े में दो ऐसी घटनाएँ हुई हैं जिनके माध्यम से देश के राष्ट्रपति को देश की सक्रिय राजनीति में शामिल लोगों द्वारा अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिशें की गयीं पर लम्बे समय तक राजनैतिक पारी खेल चुके राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने अनुभव का लाभ उठाते हुए दोनों ही बार खुद को भी इस तरह की राजनीति से एक झटके में ही दूर कर लिया. पहली घटना दागी नेताओं को संरंक्षण देने वाले अध्यादेश से जुडी है जिसमें राष्ट्रपति ने भाजपा के प्रतिनिधिमंडल से मिलने के तुरन्त बाद ही जिस तरह से सरकार के तीन वरिष्ठ मत्रियों को बुलाकर बात की थी और उसके बाद राहुल द्वारा उस अध्यादेश को बकवास बताकर उसे वापस लेने तक बात पहुँच गयी और भले ही किसी भी तरह से सही पर एक गलत अध्यादेश आने से रह गया. बिहार में नितीश और भाजपा में जिस तरह की अनबन नरेन्द्र मोदी के नाम पर हुई उसके बाद से दोनों ही दल हर मसले पर के दूसरे को नीचा दिखाने से नहीं चूक रहे हैं. इसी क्रम में मोदी की रैली वाले दिन ही राष्टपति की पटना यात्रा ने भाजपा को एक और मुद्दा नितीश के खिलाफ दे दिया था.
                                     राष्ट्रपति भवन के सूत्रों के अनुसार राष्ट्रपति ने पहले ही अपने बिहार दौरे को दो दिन से घटाकर एक दिन के लिए सीमित कर दिया था जिससे उनके पद और गरिमा को किसी भी तरह की राजनीति में न घसीटा जा सके और उसकी औपचारिक घोषणा भी राष्टपति भवन से कर दी गयी है जिसमें अब वे केवल एक दिन के लिए ही पटना में रहेंगें और आरा का कार्यक्रम रद्द कर दिया गया है. यह एक ऐसा राजनैतिक मामला था कि यदि दौरा दो दिनों का ही रहता तो भाजपा को राष्ट्रपति को भी निशाने पर लेने में देर नहीं लगती और संभवतः कुछ लोग पद और प्रणब की गरिमा का भी ध्यान नहीं रखते क्योंकि आज के समय में नरेन्द्र मोदी के अंध भक्तों के पास मोदी के खिलाफ कुछ भी करने वालों के लिए कुछ भी कह देने की होड़ सी लगी हुई है और नैतिकता की दुहाई देने वाली भाजपा अपने इन कार्यकर्ताओं को किसी भी स्तर पर रोक पाने में सफल नहीं हो पा रही है ? संभवतः प्रणब भाजपा की इस मंशा और मानसिकता को उसके जन्म के समय से ही जानते हैं और उन्होंने अपने को किसी भी राजनीति से दूर ही रखने की कोशिश ही की है.
                                    यहाँ पर सवाल इस बात का नहीं है कि किसका दौरा कब और कैसे हो पर उससे बड़ा सवाल यह भी है कि जब किसी के भी प्रयास या कुप्रयास से मोदी की रैली के दिन ही राष्ट्रपति का दौर लग गया था तो भाजपा भी अपने स्तर पर सरकार से मिली उन सारी अनुमतियों को एक दिन आगे कर देने की शर्त के साथ मोदी की रैली को कर सकती थी पर उसने भी जिस तरह से नितीश की राजनैतिक पहल पर अपने तेवर दिखाए तो राष्ट्रपति के पास अपने विवेक को इस्तेमाल करने के अलावा और कोई रास्ता ही शेष नहीं रह गया था क्योंकि भाजपा और मोदी देश, पदों, संविधान और नैतिकता की चाहे जितनी भी दुहाई दे दें पर समय आने पर अपने तर्कों के माध्यम से हर व्यक्ति को गलत साबित करने की हर संभव कोशिश करते हुए देखे जा सकते हैं. ऐसी स्थिति यदि राष्ट्रपति बिहार सरकार की मंशा के अनुरूप ही यात्रा करते तो उन पर अवश्य ही आरोप लगाये जाते और यह भी कहा जाता की नितीश के साथ मिलकर कांग्रेस ने मोदी की रैली को रोकने की कोशिश की ? एक राजनैतिक सूझ बूझ से भरे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जिस शालीनता से अपने पद की गरिमा की रक्षा की है वह निसंदेह ही प्रशंसनीय है.       
             
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बुधवार, 1 फ़रवरी 2012

लोकसेवक और कानून

        २ जी स्पेक्ट्रम घोटाले में ए राजा के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाये जाने में अनुमति देने में देर करने को लेकर केंद्र सरकार द्वारा की गयी देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ स्वामी की याचिका को मंज़ूरी दे दी है. गठबन्धन सरकार चला रही कांग्रेस के लिए एक तरफ़ यह बड़ा झटका है साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा है कि पीएमओ ने संभवतः मनमोहन सिंह को सही जानकारी नहीं दी है ? इस पूरे मसले में जहाँ केंद्र सरकार की इस घोटाले से निपटने के तरीके पर ही प्रश्न चिन्ह लग गया है वहीं कोर्ट ने इस बात को भी रेखांकित किया है कि अब समय आ गया है कि लोकसेवकों के ख़िलाफ़ की जाने वाली शिकायतों पर निर्णय लेने की एक सीमा निर्धारित की जानी चाहिए क्योंकि इस तरह से कानून को अपनी सुविधा के अनुसार चलाने से भ्रष्टाचार बढ़ता है. कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी नागरिक को भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ शिकायत करने का अधिकार संविधान से मिला हुआ है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है. देश में आज जिस तरह से नेताओं और अधिकारियों ने मिलकर भ्रष्टाचार को पोषित करना शुरू कर दिया है ऐसी स्थिति में कुछ कड़े कदम उठाये बिना काम नहीं चलने वाला है.
     लोकसेवकों के मामले में मुक़दमा चलाने की अनुमति दिए जाने के बारे में कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ४ महीनों में अनुमति नहीं दी जाती है तो इसे स्वतः अनुमति के तौर पर मान लिया जाना चाहिए. कोर्ट ने इस मामले में १९९६ के विनीत नारायण केस के अनुसार काम करने की सलाह दी क्योंकि जब तक लोकसेवकों के साथ भी विशेष परिस्थितियों में सामान्य नियमों के तहत व्यवहार निश्चित नहीं किया जायेगा तब तक देश में बड़े स्तर से भ्रष्टाचार को नहीं रोका जा सकेगा. लोकसेवकों को विशेष अधिकार मिले हुए है उनका किसी भी परिस्थिति में दुरूपयोग किया जाना अंत में देश के लिए ही बहुत घातक साबित होने वाला है. आज देश में जिस स्तर पर भ्रष्टाचार फैला हुआ है उसमें कहीं न कही से अब इस तरह से काम करने की संस्कृति विकसित करनी ही होगी जिससे किसी अधिकार के पीछे छिपकर कोई भी देश के कानून से न खेल सके. कोर्ट ने इस समय सीमा को ४ महीने का बताया और कहा है अगर किसी लोकसेवक के ख़िलाफ़ की गयी शिकायत में इन ४ महीनों में कोई कदम नहीं उठाया जाता है तो उसे स्वीकृत ही माना जाये क्योंकि हर तरह की जांच आदि करने के लिए इतना समय पर्याप्त है.
     आज सभी को लगता है कि भ्रष्टाचार ने देश को खोखला कर दिया है पर इस तरह के कदम भले ही किसी मजबूरी में उठाये जाते हों पर उनसे देश को होने वाले नुकसान को अब बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि जिन लोगों पर देश को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी है अगर वे ही इस तरह से काम करने लगेंगें तो देश में भ्रष्टाचार और बढ़ता ही जायेगा. आज देश में जो भी कानून हैं उन पर सख्ती से अमल करने की आवश्यकता है और कोई ऐसी व्यवस्था भी करनी होगी जिसके तहत किसी कानून का सहारा लेकर कोई भी इस तरह से समय न ले सके. देश को कानूनों के साथ स्वेच्छा से जीना सीखना ही होगा क्योंकि अब देश इस बात को नहीं बर्दाश्त कर सकता है कि कहीं से सबूत तलाशे जाएँ और फिर उन पर मुक़दमा चलने के लिए वर्षों तक प्रतीक्षा की जाये. देश को अगर अपनी शक्ति का सही उपयोग करना है तो सभी को आत्म अनुशासन से जीना सीखना ही होगा और किसी भी परिस्थिति में लोकसेवकों पर लगे किसी भी आरोप पर त्वरित कार्यवाही करने की प्रक्रिया निर्धारित करनी होगी भले ही इससे ईमानदार लोकसेवकों को कुछ परेशानी भी क्यों न हो क्योंकि अब देश किसी भी परिस्थिति में इस तरह की स्थितियों को बर्दाश्त नहीं कर सकता है.        
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शनिवार, 14 जनवरी 2012

यूपी और बाहुबली

            जिस तरह से यूपी में हमेशा से ही बाहुबली अपने बल को सियासी क्षेत्र में आजमाते रहते हैं उससे यही लगता है कि इस बार भी स्थिति में कुछ खास परिवर्तन नहीं होने वाला है क्योंकि हमेशा की तरह बड़ी बड़ी बातें करने वाले राजनैतिक दल आवश्यकता पड़ने पर अचानक ही भूलने की बीमारी से ग्रस्त हो जाते हैं और चुनाव छोड़ कर पूरे समय केवल बाहुबलियों और गुंडों का विरोध करने वाली उनकी बातें कहीं गायब हो जाती हैं ? जब देश की राजनीति को सुधारने की बातें होती हैं तो ये सभी लम्बी लम्बी हांकने में नहीं चूकते हैं पर जब सरकार बनाने के लिए कुछ सीटों का जुगाड़ करने की बात आती है तो यह सब आदर्श की बातें केवल क़िताब और बहस तक ही सिमट जाया करती हैं. इस सबसे देश को कितना नुकसान हो रहा है इस बात का कोई हिसाब नहीं लगाया करता है और कुछ नेता लोग अपने मन की करते रहते हैं जिससे देश के सामने आने वाले अवसर बेकार में ही कतम हो जाया करते हैं.
       आज के समय कोई भी दल इस बात को पक्के तौर पर नहीं कह सकता है कि उसके टिकट पर कोई बाहुबली नहीं मैदान में उतरेगा क्योंकि सभी को पता है कि इन बाहुबलियों के हाथों कुछ सीटों को गाढ़े समय के लिए हथिया लेने का जुगाड़ हमेशा से ही काम आता है और इस बार जिस तरह से यूपी में चुनावी खेल चल रहा है उससे यही लगता है कि शायद किसी दल को पूर्ण बहुमत न मिल पाए और उस स्थिति में सत्ता के निकट पहुँचने वाले दल को किसी भी तरह से कुछ विधायकों की ज़रुरत पड़ेगी ही और ऐसे में अपने काम या गुंडई के दम पर सीटों को बचाने में सफल रहने वाले ये बाहुबली नेता हमेशा ही किसी न किसी दल के काम आते रहते हैं. जब देश में सुधार करने की बात होती है तो सभी को आदर्श याद आते हैं पर जब कुछ करने का समय आता है तो ये सभी अचानक ही गिरगिट कि तरह अपने रुख़ को बदल दिया करते हैं. इस तरह की स्थिति देश में किसी बड़े सुधार को आने से रोकती हैं और आने वाले समय में इन बाहुबलियों के राजनीति में बढ़ते प्रभाव को और आगे बढ़ने का काम करती है.
      अब जिस तरह से राजनैतिक दल अपनी बातों को भूल जाते हैं उसमें किसी भी तरह से बाहुबलियों को सदन में पहुँचने से रोकने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से जनता पर ही आ जाती है जिससे निपटने में जनता अपने हिसाब से कुछ खास नहीं कर सकती क्योंकि इन बाहुबलियों के सामने अच्छे लोग चुनाव लड़ने से कतराते रहते हैं और वोट देने वालों के सामने कोई ऐसा विकल्प नहीं बचता है कि वे अपने लिए सही नेता का चुनाव कर सकें. वैसे तो चुनाव आयोग ने मतदाताओं को ४९-ओ के तहत यह अधिकार दे रखा है कि वे अपने लिए अच्छे प्रत्याशियों का चुनाव करें और कोई भी प्रत्याशी समझ में न आने पर अपने इस हक़ का प्रयोग करके इन सभी के विरोध में अपना मत दें पर जानकारी के अभाव में कोई भी यह काम नहीं कर पाता है. जिन क्षेत्रों में केवल बाहुबली ही चुनाव मैदान में हैं वहां पर इस बात का प्रचार करना चाहिए कि मतदाता किस तरह से सभी प्रत्याशियों का विरोध कर सकता है. अब यह जनता पर ही है कि वह इन बाहुबलियों को सदन में जाने से रोकने के लिए अपने मत का प्रयोग करे और राजनीति में शुचिता लाने की शुरुआत करे.    
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