मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अस्पष्ट जनादेश और नैतिकता

                                                               आज़ादी के बाद काफी समय तक देश की जनता ने केवल कांग्रेस को सत्ता देने को अपनी प्राथमिकता में रखा उसके बाद एक समय ऐसा भी आया जब संविधान के अनुरूप किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत का अभाव दिखाई देने लगा जिसके बाद गठबंधन और अल्पमत की सरकारों का दौर भी आया जिससे कई बार मध्यावधि चुनावों की स्थिति आयी जिसमें भी स्पष्ट बहुमत दूर की कौड़ी ही साबित हुआ. इस पूरी परिस्थिति के बारे में संभवतः संविधान में विचार किया गया था और साझा सरकारों की परिकल्पना भी की गयी होगी पर निर्णय लेने और जनहित में काम करने के लिए स्पष्ट बहुमत वाली सरकारों के हाथ सदैव खुले रहते हैं इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. केंद्रीय स्तर से लगाकर राज्यों तक में जिस तरह से मामूली या अस्पष्ट जनादेश दिखाई देना शुरू हुआ है उसके चलते क्या कोई और मार्ग नहीं सोचा जाना चाहिए जिससे फिर से चुनावों में जाने से पहले एक और विकल्प उपलब्ध कराया जा सके ?
                                  कर्णाटक से एक बार फिर से सत्ता पलट की खबरें आना शुरू हो चुकी हैं तो उस परिस्थिति में आखिर किसी के पास क्या विकल्प बचता है कि किस तरह से संवैधानिक रूप को बनाये रखते हुए सत्ता को चलाया जाये ? देश के प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा द्वारा भी समय समय पर संविधान प्रदत्त अधिकारों का जमकर दुरूपयोग किया जाता रहा है जिनके हाथों में अधिकांश समय तक देश की बागडोर रही है. आज इनमें से कोई दल अपनी सरकार के गिरने या बनने को अपनी परिस्थिति के अनुसार इसे लोकतंत्र की हत्या या लोकतंत्र की जीत बताने में कोई शर्म महसूस नहीं करते हैं. ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए जिससे देश का लोकतंत्र मज़बूत हो और जनता की अपेक्षा के अनुरूप सरकार चलाने की व्यवस्था भी की जा सके ? क्या ये दोनों दल कभी इस तरह की किसी सम्भावना पर विचार कर कोई स्पष्ट नीति बनांने के बारे में सोचेंगें या इसी तरह से अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए कुछ भी करने की तरफ बढ़ते चले जायेंगें ?
                               क्या यह संभव नहीं है कि किसी एक दल द्वारा बहुमत साबित न कर पाने की स्थिति में सभी दलों द्वारा जीती गयी सीटों के अनुपात में उन्हें सबसे बड़े दल को सीएम और मंत्रिमंडल में उपयुक्त स्थान देते हुए देश या राज्य की स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया जाए और अगले चुनावों तक उस पर अमल किया जाये ? हालाँकि भारत की राजनैतिक परिस्थितियों में इस तरह का कोई भी कार्य किया जाना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि सभी दलों की प्राथमिकताएं समग्र विकास के स्थान पर केवल अपने वोटबैंक को मज़बूत करने तक ही सीमित हैं. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा जिस जीएसटी और एफडीआई का खुलकर विरोध किया करती थी सत्ता में आने पर वह उसकी सबसे बड़ी पैरोकार दिखाई देने लगी जिससे दलीय राजनीति के चलते देश के आर्थिक सुधारों को लागू करने में अनावश्यक रुप से विलम्ब हुआ और चिंता की बात यह है कि हम देशवासी इसके लिए किसी को भी उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते हैं ? नीतियों पर राष्ट्रीय सहमति के साथ आगे बढ़ने की मानसिकता जब तक हमारे सभी दलों और राजनैतिक नेताओं में नहीं आएगी तब तक उनकी राजनैतिक अपेक्षाओं की प्रतिपूर्ति करने के लिए जनता के हितों का बलिदान किया जाता रहेगा।   
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सोमवार, 31 दिसंबर 2018

लोकतंत्र से भीड़तंत्र तक

                              पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न कारणों से इकठ्ठा हुई भीड़ द्वारा जिस तरह से किसी को भी दोषी बताकर मौके पर ही क़ानून हाथ में लेते हुए फैसले लेने की बढ़ती हुई प्रवृत्ति दिखाई देने लगी है वह निश्चित तौर पर किसी सभ्य समाज का हिस्सा नहीं हो सकता है. पहले डायन के नाम पर फिर बच्चे चुराने वाले के नाम पर फिर धर्म के नाम पर फिर गाय के नाम पर और अब केवल मनमानी के नाम पर जिस तरह से देश के सामने नयी तरह की समस्या आ रही है उससे यदि समय रहते बचने और निपटने की राह नहीं निकाली गयी तो आने वाले समय में हम एक हिंसक समाज से अधिक कुछ भी नहीं बनने वाले हैं ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते किसी समस्या कोलेकर इकठ्ठा हुए कुछ सैकड़ा लोग किसी अन्य इंसान की हत्या करने से भी नहीं चूकते हैं जबकि उन्हें इस बात का अंदाज़ा भी होता है कि मामला आगे बढ़ने पर उनके व उनके परिवार के लिए बड़े स्तर पर मुश्किलें खडी हो सकती हैं ?
                              निश्चित तौर पर पिछले कुछ वर्षों में बदले राजनैतिक विमर्श और विचारधारा विशेष से असहमत होने वाले किसी भी व्यक्ति से इस तरह से निपट लेने की जो प्रवृत्ति सामने आ रही है उसके पीछे उन विचारधाराओं का भी हाथ है जो इस तरह की सामूहिक अराजकता में भी अपने लिए राजनैतिक अवसरों को खोजकर उनका लाभ उठाने से नहीं चूकती हैं. क्या आज जिस तरह से कुछ लोगों द्वारा अपना जनाधार मज़बूत किये जाने के लिए किये जाने वाले इस तरह के कामों को करने में जुटे हुए हैं तो उनको सही कहा जा सकता है ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते हमारे राजनेता भी जनता से जुड़कर काम करने और उनकी समस्याओं में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करके उन्हें दूर करने के स्थान पर विद्वेष पैदा करके अपने हितों को साधने में लगे हुए हैं ? इस मामले में लगभग सभी दलों की स्थिति एक जैसी ही कही जा सकती हैं पर आज यह प्रवृत्ति जितने बड़े पैमाने पर शुरू हो रही है वह चिंता का विषय है क्योंकि इस अराजक भीड़ ने अब कानून के रखवालों पर भी हाथ साफ़ करना शुरू कर दिया है जिससे आने वाले समय में कोई भी सुरक्षित नहीं रहने वाला है.
                          भीड़ की हिंसा के लाभ उठाने के चक्कर में जिस तरह से राजनेताओं की तरफ से भी केवल आवश्यकतानुसार बयान दिए जाते हैं और उनमें से कई बयान तो इतने शर्मनाक होते हैं कि उनका ज़िक्र करना भी उचित नहीं है फिर सुधार की गुंजाईश कहाँ बचती है ? आज तक जो प्रश्न जनता के सामने थे वे पुलिस और प्रशासन के सामने आ चुके हैं और स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि किसी दिन किसी नेता के भीड़ में फँस जाने पर उनकी हत्या की आशंका से भी नकारा नहीं जा सकता है ? इतना सब देखने के बाद भी यदि सिर्फ तात्कालिक लाभों के लिए देश की युवा पीढ़ी के मन में नफरत की दीवारों को ऊंचा कर वैमनस्यता  की खाई को केवल गहरा करने में ही कुछ लोगों को अपना लाभ दिखाई दे रहा है तो अब आम भारतीय के जागने का समय आ चुका है क्योंकि यदि हमारे बच्चे इसी तरह से अराजक माहौल का हिस्सा बनते रहे तो किसी दिन वे या तो किसी भीड़ का शिकार हो सकते हैं या खुद भीड़ में शिकारी की भूमिका में भी दिखाई दे सकते हैं जिससे अंत में हमारे परिवार, समाज और राष्ट्र को ही नुकसान होने वाला है.           

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सोमवार, 17 दिसंबर 2018

भाजपा की राह

                                            हालिया चुनावों में जिस तरह से लम्बे समय से भाजपा के गढ़ रहे छत्तीसगढ़ में जनता ने कांग्रेस के पक्ष में प्रचंड बहुमत दिया और राजस्थान एवं एमपी में अच्छा ख़ासा समर्थन देकर भी सिर्फ सत्ता से उतार दिया है उसके बाद यदि उसके नेतृत्व द्वारा खतरे की इस घंटी को नहीं सुना गया तो २०१९ की उनकी चुनावी संभावनाओं पर बुरा प्रभाव पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है. ऐसा भी नहीं है कि ऐसा अचानक ही हुआ है क्योंकि गुजरात, गोवा, पंजाब, कर्णाटक में भाजपा के लिए राह बिलकुल भी आसान नहीं रही फिर भी उन जनादेशों की एक तरह से भाजपा नेतृत्व द्वारा पूरी अनदेखी की गयी जिसके चलते आज उसके तीन महवत्पूर्ण हिंदीभाषी राज्य विपक्षी दल कांग्रेस के हाथों में चले गए हैं। यह सही है कि अभी तक भाजपा पीएम मोदी की लोकप्रियता और अपने अध्यक्ष अमित शाह के कुशल प्रबंधन से लगातार अजेय बनी हुई थी पर अब उसकी यह छवि भी इन चुनावों से कमज़ोर हुई है कि भाजपा को कोई हरा नहीं सकता है. निश्चित तौर पर आज देश में  भाजपा के पास मज़बूत संगठन तो है ही साथ में संघ के ज़मीनी समर्थन से उसके लिए जनता के साथ जुड़ने का अवसर भी रहता है जो उसकी स्थिति को अन्य दलों के मुक़ाबले मज़बूत करने का काम करता है फिर भी जनता से जुड़े सरोकारों में जिस तरह से भाजपा पिछड़ रही है वह उसके लिए सब कुछ होने के बाद भी अनुकूल परिणाम देने से दूर जाने वाला साबित हो सकता है.
                           निश्चित तौर पर २०१४ के बाद पेट्रोलियम क्षेत्र में होने वाले मुनाफे के दम पर मोदी सरकार का खज़ाना भरा जिससे उसके पास लोक कल्याण के लिये वो धन उपलब्ध होना शुरू हो गया जो पिछली मनमोहन सरकार में केवल सब्सिडी में ही खर्च हो जाया करता था. आज भी देश में राजनैतिक इच्छाशक्ति उस स्तर पर नहीं दिखाई देती है जिसमें वह नौकरशाही के स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार में अपना हिस्सा न मांगे और भ्रष्ट नौकरशाहों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की कोशिश शुरू करे. आज क्या केंद्र सरकार और अधिकांश राज्यों में सत्ता सँभाल रही भाजपा यह बात पूरी दृढ़ता के साथ कह सकती है कि उसके द्वारा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार का अंत किया जा चुका है ? गौ रक्षक और हिन्दुओं के नाम पर क्या भाजपा और इसकी सरकारों ने ईमानदारी से काम किया है या इस मुद्दे से केवल धार्मिक भावनाएं भड़का कर वोट बटोरने तक ही मामले को सीमित किया जा चुका है ? यदि वास्तव में ऐसा कुछ है तो आने वाले समय में भाजपा को यूपी जैसे राज्यों में अपने इन कर्मों के चलते बड़े नुकसान के लिए मानसिक रूप से तैयार होना होगा क्योंकि आज भाजपा को विपक्षियों से उतना खतरा नहीं है जितना उसे अपने नेताओं और उनके अनावश्यक बयानों से होने वाला है.
                          भाजपा द्वारा जिस तरह से पूरे देश में पदयात्रा का आयोजन किया जीवंत लोकतंत्र में हर राजनैतिक दल को इस तरह के प्रयासों को अपनाना चाहिए जिससे वे जनता की समस्याओं को केवल अधिकारियों के चश्में से देखने के स्थान पर धरातल पर समझने की स्थिति में आ सकें। पद यात्रा के समय जनता का जो मूड दिखाई दिया है उससे स्थानीय नेता अवश्य ही भयभीत हुए होंगें क्योंकि यूपी जैसे राज्य में जहाँ विश्व की एकमात्र और सबसे बड़ी गोरक्ष पीठ के महंत आदित्यनाथ के सीएम होने के बाद गायों की स्थिति में गिरावट आयी है वह भी अमित शाह को पता चल गया होगा ? और यदि ज़िले और प्रदेश के नेतृत्व में इतनी हिम्मत नहीं बची है कि वह इस सच्चाई को ऊपर तक पहुंचा कर कोई समाधान निकाले तो आने वाले चुनावों में भाजपा के ज़मीनी संघर्ष उसकी सोच से भी बहुत बड़ा होने वाला है और पूरे प्रदेश में यह स्थिति बन सकती है कि जो भी दल भाजपा को हराने की स्थिति में होगा किसान संभवतः उसी के साथ खड़ा दिखाई देगा। २० महीने के कार्यकाल में यूपी में गायों और आवारा पशुओं से किसानों की जो दुर्दशा हुई है संभवतः २०१९ में भाजपा को बहुत भारी पड़ने वाली है क्योंकि अभी तक इस बारे में सरकार या पार्टी के स्तर पर कोई ठोस प्रशासनिक, राजनैतिक या जागरूकता का काम शुरू नहीं किया गया है जिससे आम किसान एक बार फिर उसी सम्बल से भाजपा के साथ खड़े होने को सोचे जैसा उसने २०१४ में किया था।           

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मंगलवार, 30 अक्टूबर 2018

अयोध्या का युद्ध

                                                अयोध्या के मंदिर मस्जिद विवाद में जिस तरह से समय के साथ स्थितियों में परिवर्तन आता चला गया है उसे देखते हुए अब यह कहा जा सकता है कि यह मुद्दा केवल चुनावी हथियार की तरह प्रयोग किया जाने वाला एक ऐसा उपाय रह गया है जिसे भाजपा हुंकार से लेकर संकल्प तक ले जा चुकी है. साथ ही आज इसकी स्थिति यह है कि देश की दो बड़ी पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के इस मुद्दे पर रवैये में कोई अंतर् नहीं दिखाई दे रहा है ? कालातीत में हुई ज़बरदस्ती और धर्म परिवर्तन के लिए हुई हिंसा से कोई इंकार नहीं कर सकता है जिसके कारण देश की स्थिति में बहुत परिवर्तन भी दिखाई दिया था पर आज यह मुद्दा जिस तरह से उग्रता की तरफ लौटता दिखाई दे रहा है उससे आम हिन्दुओं में कट्टर छवि रखने वाले पर वास्तविकता में व्यापारिक हितों को प्राथमिकता देने वाले पीएम मोदी के लिए सबसे बड़ी समस्या खडी होने वाली है क्योकि अब उन के साथ पूरी भाजपा पर भी समाज और संतों का यह दबाव है कि राममंदिर के बारे में भाजपा की सरकारें अपनी घोषित प्रतिबद्धता को पूरा करें।
                              इस मुद्दे का जीवंत रहना कहीं न कहीं से संघ उसके संगठनों और राजनैतिक मंच भाजपा के लिए चुनावों में काफी सहजता ला देता है जिससे आम हिन्दू जनमानस को मंदिर की आस्था से जोड़कर उसको भाजपा के पक्ष में जोड़े रखने के लिए उचित सामग्री भी मिल जाती है. आज पीएम मोदी के सामने यह मुद्दा एक चुनौती के रूप में आ गया है पर हिन्दू संगठनों की उग्रता के खिलाफ उन्होंने जिस तरह से गुजरात में सब कुछ छोड़कर अपना और गुजरात का नया स्वरुप गढ़ा था आज संभवतः वे उसका अखिल भारतीय स्तर पर प्रदर्शन कर दें और मोदी शाह एक बड़ा खतरा उठाते हुए इस मुद्दे को पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट पर ही छोड़ दें क्योंकि उससे मोदी को अपनी उस छवि को बनाये रखने में सफलता मिलेगी जो उन्हें विकास परक नेता साबित करती है. जिस तरह से पूरे देश के साथ केंद्र में भी मोदी और उनकी सरकार के लिए कमतर आंकी जा रही कांग्रेस अपने अध्यक्ष राहुल गाँधी के साथ आँखों में आँखें डालकर बातें कर रही है और टीवी चॅनेल्स में भाजपा के प्रवक्ताओं के सामने विकल्प सीमित होते जा रहे हैं उससे भी जनता में मोदी सरकार की नकारात्मक छवि बनने का अंदेशा बढ़ता जा रहा है.
                               ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या मोदी तुरंत संतों की मांग पर ध्यान देते हुए संसद के आगामी और इस लोकसभा के अंतिम पूर्ण शीतकालीन सत्र में एक अध्यादेश के माध्यम से राममंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त करने की तरफ बढ़ेंगें या अपने विकास परक मन्त्र को आगे रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को फैसले लेने के लिए छोड़ देंगें ? निश्चित तौर पर अध्यादेश से वे जनता में यह सन्देश देने में सफल हो सकते हैं कि उनकी सरकार इससे अधिक कुछ भी नहीं कर सकती थी और आने वाले समय में यदि संसद में उनका पूर्ण बहुमत हुआ तो वे इसे कानून के रूप में लागू करवा सकते हैं। पर अध्यादेश से उपजने वाली परिस्थिति में विवश में देश में अस्थिरता का सन्देश भी देगा जिससे आने वाले समय में देश की आर्थिक प्रगति पर भी बुरा असर पड़ने की सम्भावना भी है. ऐसी स्थिति में मोदी स्वयं ही इस मामले को अदालत पर छोड़कर अपनी विकासपरक छवि को बनाये रखने के लिए और जतन कर सकते हैं जिससे उनकी उदार हिन्दुओं के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उदार छवि मज़बूत हो और वे अध्यादेश को अंतिम विकल्प के रूप में आज़माने की सोचकर बैठे हों.
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शनिवार, 20 अक्टूबर 2018

अमृतसर हादसा

                                                            अमृतसर में दशहरा के अंतिम दिन रावण दहन के कार्यक्रम में जिस तरह से भीषण दुर्घटना हुई उसको देखकर प्रथम दृष्टया यही लगता है कि एक ज़िम्मेदार राष्ट्र के नागरिक के रूप में जीना सीखने में अभी हम सभी भारतीयों को बहुत समय लगने वाला है. यह सही है कि इस तरह के आयोजनों के समय अनुमान से अधिक भीड़ का जुटना पूरे देश में एक सामान्य सी लगने वाली घटना है पर हमारा प्रशासन जिस तरह से अनावश्यक कामों के दबाव में ही रहा करता है उसको देखते हुए इस तरह की घटनाओं को रोक पाना उसके लिए पूरी तरह से असंभव ही है. हम सभी जानते हैं कि इस तरह के आयोजनों के लिए किस तरह से पुलिस प्रशासन को आने वाले लोगों की अनुमानित संख्या की सूचना देनी होती है और उसके अनुरूप उनसे आवश्यक व्यवस्था में सहयोग की अपेक्षा की जाती है पर देश भर में सार्वजनिक कार्यक्रमों में जिस तरह से कुछ भी करने की स्वघोषित छूट नागरिक स्वतः ही हासिल कर लेते हैं उनके चलते भी इस तरह की दुर्घटनाएं होती रहती हैं और हम कुछ दिनों तक पीड़ितों और उनके परिवारों के प्रति अपनी संवेदनाएं दिखा कर फिर से अपनी लापरवाहियों में जुट जाते हैं.
                                 इस बारे में हमेशा की तरह राजनीति शुरू हो चुकी है जबकि इसके लिए हम सभी की यह सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि जहाँ भी लोगों को आमंत्रित किया जा रहा है या वे स्वतः ही किसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आ रहे हैं तो उनके आने जाने के मार्ग के साथ ही कार्यक्रम स्थल पर आवश्यक सुरक्षा उपाय भी किये जा रहे हैं. हमारे देश में किसी भी कार्यक्रम में विभिन्न कारणों से आम लोगों का बड़ी सख्या में आना हमारी उत्सवधर्मिता की परम्परा को मज़बूत करता है पर आयोजक के रूप में ज़िम्मेदारी निभा रहे लोगों के साथ स्थानीय प्रशासन को भी इसमें पूरी तरह से शामिल होना चाहिए जो कि विभिन्न कारणों से कभी भी नहीं होता है. क्या इस तरह के किसी भी आयोजन के लिए आवश्यक अनुमति के साथ सुरक्षात्मक व्यवस्थाओं को करने के लिए आज कोई मज़बूत कानून या दिशा निर्देश मौजूद हैं? और यदि ऐसा है तो उनके अनुपालन के लिए किन लोगों की ज़िम्मेदारी निर्धारित की गयी है यह बात भी सभी लोगों के संज्ञान में होनी चाहिए। हर बात के लिए प्रशासन को कोसने के स्थान पर क्या हम नागरिकों को अपनी ज़िम्मेदारियों के निर्वहन के बारे में भी नहीं सोचना चाहिए ?
                               एक बड़ा हादसा क्या हमारी उन नैतिक ज़िम्मेदारियों की तरफ हमें मोड़ सकता है जिनकी हम हर जगह अनदेखी करते रहते हैं ? क्या नागरिकों के रूप में हमें यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि प्रशासन को हर स्तर पर सहयोग कर हम क्या अपने लिए सुरक्षित वातावरण बनाने की ईमानदार कोशिश नहीं कर सकते हैं? इस दुर्घटना में सभी दोषी हैं पर कोई भी अपनी ज़िम्मेदारी और कमियों को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं दिखाई दे रहा है जिससे आने वाले समय में इस तरह की घटनाओं को रोकने में कोई मदद नहीं मिलने वाली है. चौतरफा दबाव में सिर्फ आयोजकों के खिलाफ ही कार्यवाही होने की पूरी सम्भावना है जबकि लापरवाही के चलते आयोजक के साथ ही स्थानीय प्रशासन, रेलवे और वहां आने वाले लोग भी उतने ही ज़िम्मेदार हैं. क्या हम सभी अपनी सामूहिक ज़िम्मेदारी को समझते हुए ऐसी कोई आदर्श स्थिति की कल्पना कर सकते हैं जिसमें ऐसी घटनाओं से पूरी तरह बचने की कोई व्यवस्था हो?  केंद्र और राज्य सरकारों को इस बारे में विचार कर भीड़ वाली जगहों पर आपातकालीन स्थित में लोगों को सही व्यवहार करने के लिए उचित दिशा निर्देश बनाते हुए आयोजकों के लिए आपदा प्रबंधन के प्रमुख गुर भी सिखाने की व्यवस्था करने के बारे में सोचना चाहिए जिससे भविष्य में सभी अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वहन कर पूरे देश में होने वाले ऐसे किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम को पूरी तरह से सुरक्षित बनाने में अपना योगदान दे सकें।

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रविवार, 8 जुलाई 2018

व्हाट्सऐप - समाज के लिए खतरा

                                                                        देश में तेज़ी से बढ़ती इंटरनेट की रफ़्तार और उसके साथ आने वाली सुविधाओं के साथ जिस तरह से एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है उसके बारे में देश का कानून, सरकार, सोशल मीडिया कंपनियां और समाज तैयार किसी भी स्तर पर तैयार नहीं दिखता है जिसके चलते विशेष उद्देश्यों से फैलाये गए सुनियोजित उन्माद या अफवाह से आज देश के विभिन्न हिस्सों से भीड़ द्वारा निर्दोषों की हत्या किये जाने की घटनाओं में निरंतर वृद्धि होती जा रही है. आंकड़ों के अनुसार जिस तरह से अब भारत में २० करोड लोगों के हाथों में स्मार्ट फ़ोन हैं और जिस तेज़ी के साथ इंटरनेट की कीमतें गिरी हैं उसके चलते अब समाज के हर वर्ग तक इसकी पहुँच हो चुकी है जो कि चाहे अनचाहे इस तरह की समस्याओं को जन्म देने का काम कर रही है. आज जिस तरह से भारत सरकार ने व्हाट्सऐप से इस तरह की झूठी और भ्रामक ख़बरों को रोकने के लिए कम्पनी से कड़े कदम उठाने के लिए कहा है और कपनी ने भी इस मसले पर कुछ करने की बात कही है केवल उतने से निर्दोषों की हत्याएं नहीं रुक सकती हैं क्योंकि इसमें देश के राजनैतिक दल और प्रिंट मीडिया के साथ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भी बहुत बड़ा हाथ है और जब तक ये सब मिलकर प्रयास नहीं करेंगें यह स्थिति बदलने वाली नहीं है.
                                                             इस पूरी समस्या के तह में जाने के लिए हमें २०१३ की तरफ लौटना होगा जब नरेंद्र मोदी ने भाजपा के मुख्य चुनाव प्रचार में सोशल मीडिया का भरपूर दोहन किया था और आज यह स्पष्ट हो चूका है कि केवल वोट मांगने और समाज में राजनैतिक लाभ के लिए उनकी तरफ से जो सुनियोजित अभियान चलाया गया था उसने मनमोहन सरकार की छवि को बहुत धूमिल किया जिसका असर चुनाव परिणामों पर भी दिखाई दिया था. आज यह सामने आ चुका है कि उस समय भाजपा की सोशल मीडिया टीम समेत खुद मोदी ने जिस तरह झूठ का सहारा लेकर प्रचार किया था तो क्या आज के समय में बढ़ रहे दुरूपयोग के लिए उनको दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए ? आज भी लगातार जिस तरह से भाजपा के कट्टर समर्थक विपक्षी दलों पर हमलावर हैं उसको देखते हुए आखिर इस सबकी ज़िम्मेदारी किस पर डाली जा सकती है ? क्या हमारा देश ऐसा था जिसमें किसी विपक्षी दल की प्रवक्ता को सीधे उसकी बेटी से रेप करने की धमकी दी जा सकती थी?  मानसिक रूप से विक्षिप्त कोई व्यक्ति ऐसा करे तो उसका कोई अंतर पड़ता पर जब सत्ताधारी दल के शीर्ष नेता उस व्यक्ति को फॉलो कर रहे हों तो यह अवश्य ही चिंता का विषय होना चाहिए। क्या खुद पीएम और शीर्ष भाजपा नेताओं को इस मुद्दे पर सोचकर सबसे पहले अपने यहाँ सुधार का प्रारम्भ नहीं करना चाहिए ?
                                   सरकार को स्पष्ट रूप से कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है क्योंकि कोई भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपभोक्ताओं की निजता का हवाला देकर अपनी उस सामाजिक ज़िम्मेदरी से पल्ला नहीं झाड़ सकता है जिसके दम पर उसका व्यापार चल रहा है? निःसंदेह उपभोक्ताओं की निजता सम्मान होना चाहिए पर जब यह निजता समाज और मानवता के लिए खतरा बनने की तरफ अग्रसर हो तब निजता का खोखला आवरण उधेड़ देना चाहिए। यदि इन सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा निजता का रोना रोया जाता है तो उनको अपने काम काज को समेट्ने के लिए कह देने का समय आ चुका है क्योंकि पहले भी निजता के लेकर बहुत तरह की समस्याएं सामने आयी थीं जिसके चलते बीच का राह निकाला गया था पर आज संभवतः सरकार अपनी चिंताओं को केवल चिंता के स्तर तक ही रखना चाहती क्योंकि आगामी आम चुनावों में भाजपा को इस मीडिया का एक बार फिर से दोहन करना है जिसके चलते वह कोई कडा कदम उठाने के बारे में सोच भी नहीं सकती है. आखिर किसी शहर में कानून व्यवस्था की समस्या सामने आने पर आज वहां का प्रशासन इस बात का निर्णय लेता हैं कि इनटरनेट को बंद क्र दिया जाये तो क्या इससे समस्या का समाधान हो जाता है? आज आवश्यकता है कि किसी भी स्थान पर भीड़ द्वारा किये गए इस तरह के कृत्य में हत्या होने के बाद उस स्थान विशेष पर कम से कम एक हफ्ते के लिए इंटरनेट को दंड स्वरुप बंद किया जाए. किसी भी राजनैतिक दल के लोगों के शामिल होने पर उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही के साथ आगामी दो चुनाव लड़ने पर भी रोक लगायी जानी चाहिए जिससे सभी सम्बंधित पक्षों के साथ बराबर की सख्ती का सन्देश समाज में जा सके.

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शुक्रवार, 18 मई 2018

केंद्र और संवैधानिक पद

                                                                   कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा के सामने आने के बाद जिस तरह से राजनैतिक घटनाक्रम में तेज़ी से बदलाव दिखाई दिया उससे किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारे नेताओं की नैतिकता केवल तभी तक रहती है जब तक उनको अनैतिक कार्य करने का मौका नहीं मिलता है और इस काम में केंद्र में सत्ताधारी दल की तरफ से सदैव ही दबाव देकर काम किया जाता रहता है. आज़ादी के बाद से जिस तरह से धीरे धीरे केंद्र सरकार ने अपने अधिकारों का नैतिकता के मापदंडों को किनारे करते हुए दुरूपयोग शुरू किया था उसका दुष्परिणाम आज सबके सामने है और सबसे अधिक चिंता की बात तो यह है कि आज़ादी के बाद से जो गलती गैर-भाजपाई दलों ने सदैव ही की थी आज उसको नज़ीर बताकर खुद भाजपा भी उससे नीचे जाने को तैयार दिखाई देती है. खुद को पार्टी विद डिफ़रेंस कहने वाली भाजपा कुछ मौकों पर यदि पूर्ववर्ती सरकारों से अलग हटकर राजयपालों को संविधान की मंशा के अनुरूप काम करने के लिए खुला छोड़ना शुरू कर देती तो वास्तव में उसकी तरफ से एक नए राजनैतिक युग की शुरुवात की जा सकती थी पर देश को येन केन प्रकारेण कांग्रेस मुक्त करने की धुन में मोदी शाह की जोड़ी भाजपा को कांग्रेस का अन्य संस्करण बनाने की तरफ बढ़ती ही जा रही है जिससे देश में मूल्यों की राजनीति के और भी नीचे जाने की संभावनाएं हैं.
                                                 निश्चित तौर पर जब संविधान लिखा गया तो उस समय देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाले नेताओं की पूरी फौज मौजूद थी जिनमें नैतिकता कूट कूट कर भरी हुई थी तो उन्होंने अपनी सोच के अनुरूप ही काम शुरू किया और राज्यों में सरकार बनाने के लिए पूरा दारोमदार राज्यपाल के विवेक पर सिर्फ इसलिए  छोड़ दिया क्योंकि यह माना गया था कि लोकतंत्र की मूल भावना बहुमत के आधार पर राज्यपाल को निर्णय लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। कालांतर में अपनी राजनीति और अपने या सहयोगी दलों की सरकारों को बचाने के लिए केंद्र सरकारों की तरफ से जिन हथकंडों का उपयोग किया उससे निश्चित तौर पर भारतीय लोकतंत्र कमज़ोर ही हुआ है और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि आम जनमानस को भाजपा से कुछ उम्मीदें थीं कि वह इस तरह के क़दमों से खुद को दूर रखेगी उसकी आशाओं पर भाजपा पूरी तरह से विफल रही है. यह भी सही है कि हर राजनैतिक दल को अपने विस्तार के लिए काम करने की पूरी छूट है पर क्या यह विस्तार किसी भी कीमत पर किसी भी तरह से किये जाने को सही माना जा सकता है ?
                                                 राज्यपालों की तरफ से लगातार विवादित फैसले लेने की स्थिति में क्या अब समय नहीं आ गया है कि देश से राज्यपाल पद की ही विदाई कर दी जाये क्योंकि उनके राजनैतिक विचारधाराओं और पूर्वाग्रह के चलते जिस तरह से अधिकांश मामले कोर्ट में पहुँचने लगे हैं तो क्यों न सरकार गठन में चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के साथ राज्यों के हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों की भूमिका को निर्धारित कर दिया जाये ?  इन दोनों संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के पास राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं लगभग नहीं होती हैं और कम से कम अभी तक तो इन दोनों संस्थाओं के काम काज से आम जनता संतुष्ट ही नज़र आती है तो संविधान के अनुरूप प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चुनने की ज़िम्मेदरी आखिर उनको क्यों नहीं दी जा सकती जिससे राज्यपाल के अनावश्यक पद पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपयों को बचाने के बारे में सोचने की ज़िम्मेदारी आखिर किसकी है ?  देश में सरकार के खर्च को कम करने में लगे हुए वित्त मंत्री को इस दिशा में कानून मंत्रालय के साथ विचार विमर्श करना चाहिए जिससे इस फालतू पद को समाप्त किया जा सके। क्या राजनीति के बूढ़े शेरों के आरक्षित अभ्यारण्य बन चुके राजभवनों को देश की वर्तमान राजनीति पर हमला करने की स्थिति से बचाने के लिए अब इन अभ्यारण्यों को बंद करने का समय नहीं आ गया है ?
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 26 अप्रैल 2018

वैचारिक अभिव्यक्ति और विभेद

                                                  अभी तक के स्थापित मानकों के अनुसार जिस तरह से यह समझा और कहा जाता कि शिक्षा बढ़ने के साथ मनुष्य का सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत विकास अच्छी तरह से हो सकता है पर पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से अशिक्षितों के साथ शिक्षितों की मानसिक स्थिति भी एक जैसी ही होती जा रही है वह सम्पूर्ण मानव जाति के लिए आने वाले समय में एक खतरा बन सकती है. विश्व के कई देशों में इस्लाम के नाम पर चल रहे चरमपंथ को जिस तरह से उच्च शिक्षित लोगों का समर्थन मिलने लगा उससे पुरानी धारणा टूटने की तरफ बढ़ गयी की शिक्षा से मनुष्य अधिक सामाजिक हो जाता है. सौभाग्य से भारत में इस तरह की घटनाएं बहुत कम या नहीं ही दिखाई देती थीं पर अब इसमें भी तेज़ी से बदलाव दिखाई दे रहा है जिसका पूरा और विपरीत असर समाज पर आने वाले समय में गंभीर रूप से पड़ने के अब इंकार नहीं किया जा सकता है. बंगलुरु में एक महिला ने अपनी कैब सिर्फ इसलिए कैंसल कर दी क्योंकि उस पर आज ट्रेंड में चल रहे गुस्से भरे हनुमान जी का चित्र अंकित था जिसे उन्होंने कठुआ और उन्नाव में हिंदुत्ववादी शक्तियों द्वारा आरोपितों के पक्ष में खड़े होने के चलते खुद अपनी सुरक्षा से जोड़ते हुए ही उसे एक खतरा मान लिए था. इसके बाद एक व्यक्ति ने लखनऊ से अपनी कैब राइड सिर्फ इसलिए कैंसल कर दी क्योंकि उसका चालक मुसलमान था ?
                                            देखने में ये घटनाएं सामान्य से लगती हैं पर क्या ये समाज में हर स्तर पर पनप रहे अनदेखे विभाजन की तरफ संकेत नहीं करती हैं ? क्या इंटरनेट और सोशल मीडिया को चलाने वाले किसी भी उच्च शिक्षित नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस निम्न स्तर पर जाकर समाज के निर्धारित ताने बाने को झकझोरने का काम करे जिससे अंत में उसको भी कहीं न कहीं नुकसान ही होने वाला है ? क्या शिक्षा का स्तर और संस्कारों की पकड़ को इस तरह के मामलों में महसूस किया जा सकता है ? किसी भी महिला या पुरुष को किसी विशेष परिस्थिति में अपने लिए कोई स्थिति प्रतिकूल लग सकती है पर क्या उस प्रतिकूल परिस्थिति को इस तरह से देश के निम्न होते राजनैतिक विमर्श से गंभीरता से जोड़ने को उचित कहा जा सकता है ? क्या बाहरी दिखावे से कोई शत प्रतिशत किसी के व्यक्तित्व के बारे में एक बार में ही सब कुछ जान समझ सकता है और क्या उसका यह आंकलन यह सही भी हो सकता है ? एक महिला को यदि किसी चिन्ह विशेष के कारण असुरक्षा दिखाई दी तो क्या उसे इस तरह से दिखाना उचित था या एक पुरुष को उस महिला के ट्वीट का जवाब देने के लिए एक मुस्लिम चालक की कैब राइड का इंतज़ार कर उसे कैंसिल कर ट्वीट करना उचित था ? बेशक दोनों की अपनी सुरक्षा सम्बन्धी चिंताएं हो सकती हैं पर उन्हें इस तरह से परिभाषित किये जाने को आखिर क्या कहा जाये ?
                                            क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल महिला और पुरुष अपने आस पास देखकर यह बता सकते हैं कि धर्म और प्रतीक चिन्हों के नाम पर अपने को समाज से अलग कर कथित रूप से सुरक्षित करके क्या वे भारतीय समाज में जीवित रह सकते हैं ? क्या देश के विभिन्न धार्मिक अनुयायियों के बिना उनके लिए सामान्य जीवन यापन कर पाना संभव हो सकेगा या वे अपनी इस मानसिकता के साथ पूरे समाज में एक विभाजन की खरोंच लगाने का काम करते रहेंगें जो भविष्य में गहरी खाई भी बन सकती है ? आप चिन्ह विशेष लगाए होने के कारण किसी की सेवाएं नहीं ले सकते हो पर जो चिन्ह लगाकर लगातार धोखा देने का काम कर रहे हैं उनसे खुद को सुरक्षित रखने के लिए क्या उपाय करने वाले हैं ?  जिनको लगता है कि चालक मुस्लिम है इसलिए वे सुरक्षित नहीं हैं तो हो सकता है कि उस कार को उनके जैसी मानसिकता वाले किसी मुस्लिम मिस्त्री ने भी यह सोचकर ठीक किया हो कि इसमें कोई हिन्दू यात्री बैठेगा इसलिए इसके ब्रेक ख़राब कर देता हूँ तो सोचिये हमारे समाज का क्या हाल होगा ? अच्छा हो कि आम नागरिक नेताओं की विभाजनकारी नीतियों के बारे में गंभीरता से सोचें और अपने लिए वही रास्ता अपनाएं जो समाज में समरसता की तरफ ले जाने का काम करता हो क्योंकि सामाजिक वैमनस्यता का खमियाज़ा आमतौर पर नेताओं को नहीं बल्कि आम जनता को ही भुगतना पड़ता है।  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 22 अप्रैल 2018

सामाजिक समस्या का कानूनी हल ?

                                                                   निर्भया की मौत के बाद देश के कानून में बलात्कारियों को कड़ी सजा देने के लिए बनाये गए पाक्सो कानून के बाद भी महिलाओं/ बच्चियों के साथ होने वाले यौन अपराधों की स्थिति में कुछ बदलाव दिखाई नहीं दिए जबकि उस समय भी सरकार द्वारा यही कहा गया था कि कड़े कानून होने से लोग इस अपराध को करने के बारे में सोचेंगें भी नहीं पर रसाना और उन्नाव की बड़ी चर्चित घटनाओं के बाद जिस तरह से सत्ताधारी दल के लोगों की संलिप्तता के चलते पीड़ितों को न्याय मिलने से रोकने की कोशिशें की जाती रहीं उसके बाद केंद्र सरकार दबाव में आ गयी और उसकी परिणिति एक और कानूनी संशोधन के रूप में सामने आती दिखाई दी है. यह समय क्या हमें एक देश और समाज के रूप में यह फिर से सोचने को मजबूर नहीं करता है कि इतने कानूनी प्रयासों के बाद भी आखिर ये अपराध रुकने का नाम क्यों नहीं लेते हैं ? आखिर वे कौन से कारण हैं जिनके चलते समाज में आज भी वो लोग उसी संख्या में मौजूद हैं जो मनुष्यों के विकास के समय से होते रहे हैं ?
                                        इस समस्या से निपटने के लिए सबसे पहले तो जिस सामाजिक चेतना को बढ़ाये जाने की आवश्यकता है हम उसमें पूरी तरह से निकम्मे साबित हो रहे हैं क्योंकि पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को घर, समाज, कार्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर जिस तरह का व्यवहार झेलना पड़ता है उसको सुधारने की दिशा में आज भी कोई कदम नहीं उठाये जा रहे हैं जिससे समाज में शिक्षितों की संख्या बढ़ने के बाद भी समाज की रूढ़ियों के चलते आज भी महिलाओं को  पुरुषों से निम्न स्तर का समझा जाता है. आज भी हर आम भारतीय परिवार की प्राथमिकता परिवार की हर पीढ़ी में एक लड़के की चाहत से लड़कियों की स्थिति कमज़ोर होना शुरू हो जाती है. बेटियों के साथ जो समाज गर्भ से ही दोहरा व्यवहार करना शुरू क्र देता हो उससे किसी कानून के डर से अपराधों की तरफ न मुड़ने की आशा करना हो मूर्खता है और हम केवल कानून के सहारे इस सामाजिक बुराई से लड़ने की खोखली कोशिशें करने में ही अपने कर्तव्य को पूरा मान लेते हैं?
                                 आज समस्या जिस स्तर पर है पर उससे निपटने के लिए हमें कानूनी स्तर पर प्रयास करने के स्थान पर सामजिक स्तर पर अधिक सक्रिय होने की आवश्यकता है और धरातल पर समाज की मानसिकता को बदलने के साथ महिलाओं के लिए पुलिसिंग को सुधारने की दिशा में गंभीरता गंभीरता से सोचने की ज़रुरत है यह सही है कि अपराधों को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता है पर यदि आने वाली पीढ़ी में लड़कियों और महिलाओं को बराबरी के दर्ज़े पर रखने की कोशिश अभी से शुरू की जाये तो दो तीन दशकों में इसके परिणाम सामने आ सकते हैं. केवल कानूनों को कड़ा करते जाने से क्या समाज की मानसिकता को बदला जा सकता है आज यह प्रश्न अधिक महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि कानून किसी के घर और समाज में घुसकर मानसिकता में बदलाव नहीं कर सकता है क्योंकि उसकी अपनी सीमायें भी हैं. जब तक समाज की मानसिकता में बदलाव नहीं होगा और यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते नारों से निकल कर दिलों में नहीं आएगा और जब तक कन्या पूजन नवरात्रि से आगे बढ़कर समाज की दिनचर्या का हिस्सा नहीं बनेगा तब तक बच्चियों और महिलाओं के प्रति होने वाले इन अपराधों से निपटा नहीं जा सकेगा।          
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

इंसानी आबादी में वन्य जीव

                                                    लखनऊ के आवासीय क्षेत्र में जिस तरह से तीन दिनों तक एक तेंदुएं के चलते आतंक मचा रहा और उससे निपटने के लिए वन विभाग की टीम के पास कोई कारगर योजना नहीं दिखाई दी उससे यही पता चलता है कि किसी हिंसक जीव के शहरी क्षेत्र में आ जाने के बाद उसको जान से मार देने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नहीं है ? तेंदुआ भी संरक्षित प्रजातियों में आता है और उसकी पुलिस की गोली से मरने के बाद वन विभाग अपनी कार्यवाही करने को तत्पर तो दिखाई देता है पर जिस तरह से पुलिस ने अकेले दम पर इस समस्या से निपटने की कोशिश क्या वह वन विभाग के ऊपर बड़ा प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती है ? यह सही है कि वहां पर विपरीत परिस्थितियां थीं और उनसे निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध नहीं थे तो आम लोगों की ज़िंदगी को बचाने के लिए कौन आगे आ सकता था ? ऐसी परिस्थिति में वन्य जीवों से निपटने की कोई ट्रेनिंग न होने के बाद भी लखनऊ पुलिस ने अपने स्तर से सभी प्रयास किये और अपनी जान बचाने के लिए तेंदुए को मारने जैसा कदम उठाना पड़ा पर इस पूरे प्रकरण में एक बात सामने आ गयी है कि ऐसी किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए जब सरकार की नाक के नीचे लखनऊ में विभिन्न विभागों के पास कोई कारगर योजना नहीं है तो ग्रामीण क्षेत्रों और संरक्षित क्षेत्रों के आस पास रहने वाले लोगों के लिए क्या किया जा सकता है ?
                          जिस तरह से बढ़ती आबादी का चलते जंगलों को काटा जा रहा है और उसके स्थान पर पेड़ लगाने का काम न के बराबर हो रहा है तो एक दिन ऐसी संघर्ष की स्थिति पूरे देश में जगह जगह पर दिखाई दे सकती है और अधिकांश स्थानों पर बिना ट्रेनिंग के काम करने वाले पुलिस और वन विभाग के लोग अंत में किसी संरक्षित जीव को मारकर अपना काम पूरा करते हुए दिखाई देने वाले हैं. इस बारे में अब संरक्षित वन क्षेत्रों में सभी सम्बंधित विभागों को और भी कठोरता से नियमानुसार काम करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक इन जीवों के लिए स्थान सुरक्षित कर उनके लिए उपयुक्त वातावरण तैयार नहीं किया जाता है तब तक इस तरह का संघर्ष बढ़ता ही जाने वाला है. इस मामले में किसी एक सरकार पर आरोप लगाने से परिस्थितियां बदलने वाली नहीं हैं क्योंकि जब तक मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच इस संघर्ष के उत्पन्न होने वाले कारणों पर रोक नहीं लगायी जाएगी तब तक कुछ भी ठीक नहीं होगा. इस घटना से सीख लेते हुए अब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को एक विस्तृत कार्य योजना पर राज्यों के साथ मिलकर चर्चा करने की आवश्यकता है क्योंकि तभी पूरे देश में वन्य जीवों और मनुष्यों के इस अप्रत्याशित संघर्ष को कम करके रोकने की स्थिति पैदा की जा सकेगी.
                            वन विभाग और लकड़ी माफियाओं के गठबंधन को तोडे बिना इस दिशा में आगे बढ़ पाना संभव ही नहीं है क्योंकि वन के सामान्य पारिस्थितिकी तंत्र तोड़ कर जब हम वन्य जीवों को वहां से निकलने के लिए मजबूर कर रहे हैं तो इस तरह की घटनाएं सामने आती ही रहेंगी. वन विभाग और पुलिस के माध्यम से अवैध वन कटान को रोकने और जहाँ जंगल कम हो गए हैं वहां उनको संरक्षित कर पुनः पेड़ लगाने के काम पर यदि सही तरह से ध्यान दिया जाये तो इन जीवों को अपने क्षेत्र का अतिक्रमण करने की आवश्यकता नहीं पड़ने वाली है. सघन वन क्षेत्रों के आस पास रहने वाले आम नागरिकों को भी इस तरह की किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए सामान्य बातें बताई जानी चाहिए जिससे उनमें व्याप्त होने वाले अनावश्यक भय को दूर रखा जा सके. सरकारें केवल नियम बना सकती हैं पर उन पर अमल करने के लिए जिस इच्छाशक्ति की निरंतरता के साथ आवश्यकता होती है उसमें हम लोगों में पूर्णतः असफल हो जाते हैं. अब इस घटना को ध्यान में रखते हुए वन विभाग की ट्रेनिंग और अन्य परिस्थितियों पर विचार कर इस संघर्ष को समाप्त करने कि दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 16 फ़रवरी 2018

नीरव मोदी - नीयत से नियति तक

                                                 पीएनबी की तरफ से किये गए एक खुलासे के बाद जिस तरह से २०१४ में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रचंड लहर पर सवार होकर सत्ता में आने वाली मोदी सरकार के लिए नीरव मोदी प्रकरण ने कई बड़े प्रश्नचिन्ह लगाने का काम कर दिया है यह सही है कि मोदी के पूर्ववर्ती पीएम मनमोहन पर भी कभी व्यक्तिगत स्तर पर भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा था पर भाजपा जनता में यह सन्देश भेज पाने में पूरी तरह से सफल हो गयी थी कि पूरी यूपीए सरकार आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुई है. भरष्टचार को लेकर विपक्षी दलों पर निर्मम हमले कर अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने की पीएम मोदी की हर कोशिश अभी तक लगभग सफल होती ही आयी है पर इस वर्ष के कई राज्यों के विधानसभा चुनावों और अगले वर्ष के आम चुनावों से पहले मोदी के आभा मंडल को दूषित करने वाली ये घटनाएं मतदाताओं को काफी हद तक प्रभावित कर सकती हैं इस समभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता है. कोई भी आसानी से यह आरोप नहीं लगा सकता कि नीरव मोदी, गिन्नी, गीतांजलि जैसी बड़ी कंपनियों से सीधे पीएम मोदी ने कोई लाभ लिया होगा और न ही इस पर कोई विश्वास भी करेगा पर यह मामला उसी तरह का हो सकता है जैसा की २जी और अन्य मामलों में हुआ जिससे सरकार की देश और विदेश में छवि को बहुत बड़ा धक्का लग सकता है.
                                               पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्य पूर्ण यह है कि जब वित्तीय मामलों में अनियमितता का मामला सामने आया तो उससे निपटने कि लिए रक्षा मंत्री का बयान क्यों सामने आ रहा है ? इस मामले पर यदि वित्त मंत्री स्थितियों को स्पष्ट करें तो उनकी बात को गंभीरता से सुना जायेगा पर संभवतः आज भी भाजपा यह स्वीकार नहीं कर पा रही है कि वह २०१४ से सत्ता में है और निर्मला सीतारमण और रविशंकर प्रसाद जैसे नेता अब उनके प्रवक्ता नहीं बल्कि सरकार के ज़िम्मेदार मंत्री हैं ? चिंता की बात यह भी है कि रवि शंकर प्रसाद के अनुसार यह मामला २०११ से था तो २०१४ के बाद सरकार ने क्या किया और यदि इसका खुलासा पिछले वर्ष जुलाई में हो गया था तो नीरव मोदी जैसा व्यक्ति एक आरोप के अनुसार आखिर विदेश में पीएम मोदी के साथ मंच पर कैसे खड़ा हो सकता था ? क्या इस मामले में पीएमओ ने विदेश मंत्रालय और अपने मंत्रालय के लिस्ट बनाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यवाही की है ? हो सकता है कि पीएम मोदी को यह न पता हो पर जब वे खुद को चौकन्नी नज़रों वाला बताते हैं और उनके पीएमओ द्वारा इस मामले को संज्ञान में लिया जा चुका था तो लगाए जाने वाले अपुष्ट आरोपों के अनुसार नीरव दावोस में पीएम के बगल तक कैसे पहुँच गया इस बात को लेकर पीएम मोदी पर संदेह जताया जा सकता है ? बेशक यह अधिकारियों की लापरवाही ही हो पर पीएम मोदी की छवि पर छींटे पड़ने शुरू हो चुके हैं देश को यह भी देखना होगा कि ३० साल बाद बनी पूर्ण बहुमत की सरकार पर भी राजीव गाँधी की मिस्टर क्लीन जैसी छवि वाले मोदी की छवि को धूमिल किये जाने का बहाना मिलना शुरू हो चुका है. भ्रष्टाचार पर मुखर रहने वाले पीएम मोदी के खिलाफ इतना बड़ा मुद्दा विपक्ष भी नहीं छोड़ना चाहेगा जिससे इस मामले में बैंक के कुछ लोगों पर कार्यवाही करके इसे ठंडा किये जाने की कोशिशें शुरू की जायेंगीं.
                                                      देश को अपने पीएम से सही और सीधा जवाब ठोस कार्यवाही के रूप में चाहिए उसे दलगत राजनीति से कोई मतलब नहीं है देश की आम जनता का यह पैसा जो हर्षद मेहता से लगाकर नीरव मोदी जैसे लोग आसानी से हड़पने को तैयार बैठे हैं इनसे निपटने के लिए अब सरकार के पास क्या प्लान हैं ? क्या ये बड़े लुटेरे नाम बदलकर इसी तरह देश के सत्ता प्रतिष्ठान से अपनी नज़दीकियों का लाभ उठाकर बैंको को लूटते रहेंगें और देश की सत्ता में बैठी कोई भी सरकार कड़े कदम उठाने जैसे चिर परिचित पुराने झांसे से जनता को बरगलाने का काम करती रहेंगीं ? फिलहाल देश को खुद पीएम मोदी की तरफ से इस मामले पर जवाब की आशा है और संसद में विपक्ष भी इस मामले पर सरकार को कोई राहत देने की स्थिति में नहीं होगा जिससे आने वाले समय में मोदी सरकार की समस्याएं बढ़ने ही वाली हैं.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

सैनिकों का मानवाधिकार

यह अच्छा ही हुआ कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस बात पर विचार करने के लिए सैन्य अधिकारियों के तीन बच्चों की मांग को स्वीकार कर रक्षा मंत्रालय से जवाब माँगा है और यह भी पूछा है कि सैनिकों के मानवाधिकार को सुरक्षित रखने के बारे में सरकार और रक्षा मंत्रालय की क्या नीति है ? आज जब कश्मीर समेत देश के हर हिस्से में सुरक्षा बलों और पुलिस के साथ आम नाराज़ लोगों, माओवादियों, आतंकियों और आतंक का समर्थन करने वाले पत्थर बाज़ों से निपटने में सरकारें बिना किसी नीति के काम कर रही हैं तो क्या इस परिस्थिति में अब यह सोचना का समय नहीं है कि सेना, अर्धसैनिक बलों और पुलिस में भी हमारे देश के जवान ही भर्ती होते हैं जो विषम परिस्थितियों में अपने कर्तव्य का निर्वहन करते रहते हैं तो क्या उनके भी आम मानव का जैसे अधिकारों का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए ? सोचा जाना चाहिए कि क्या पत्थरबाजों से अपनी जान बचाने के लिए आत्मरक्षा में चलायी गयी गोलियों में पत्थरबाजों के मरने पर सैन्य अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज़ करना उचित है ? अब समय आ गया है कि सरकार स्पष्ट करे और यदि इस दिशा में अभी तक देश में कोई नीति नहीं है तो संसद में अविलम्ब एक विधेयक लाकर हमारे जवानों की सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा करने वाले कानून को पारित कराये जिससे देश की सीमा और अशांत क्षेत्रों में काम करने वाले सैनिकों समेत उनके परिवार के लोग भी राजनैतिक दबाव या लाभ में दर्ज़ होने वाले मुक़दमों से बच सकें . 

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रविवार, 4 फ़रवरी 2018

अधिकारियों का सरकार प्रेम

ऐसा नहीं है कि देश में पहले कभी अधिकारियों द्वारा सरकार या पार्टी की नीतियों और मंशा के अनुरूप काम न किया जाता हो पर जिस तरह से अयोध्या विवाद में यूपी के डीजी होमगार्ड्स ने भाजपा से जुड़े मुसलमानों के एक मंच पर उनके साथ भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए शपथ खायी उससे यही लगता है कि अब अधिकारियों में कार्यवाही का डर ही नहीं रह गया है. यह सही है कि हर व्यक्ति की निजी ज़िंदगी भी होती है और देश का संविधान उसे अपने धर्म, परंपरा और मूल्यों के अनुरूप जीवन जीने की पूरी स्वतंत्रता भी देता है पर जब कोई शासन या प्रशासन में जाता है उसे भारत के संविधान के प्रति शपथ लेनी होती है. फिर भी जिस तरह से पहले बरेली के डीएम ने कानून व्यवस्था में रोज़ ही सामने आने वाली नयी समस्या को लेकर प्रश्न उठाया वह भी सर्विस रूल के अनुसार गलत ही कहा जायेगा पर उनकी मंशा उन लोगों की तरफ इशारा करने की थी जो किसी भी परिस्थिति में अपनी ज़िद के कारण यूपी में लगातार प्रशासन के लिए सर दर्द बनते जा रहे हैं. डीजी होमगार्ड्स ने जिस तरह से एक कार्यक्रम में शपथ ली उससे स्थिति की गंभीरता को आसानी से समझा जा सकता है अयोध्या मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और किसी भी विचाराधीन मामले पर टिप्पणियां करने या उनके पक्ष विपक्ष के किसी कार्यक्रम को आयोजित करने से कोर्ट की अवमानना होती है. वैसे तो देश के सभी राजनैतिक दल अपने चुनावी लाभ को देखकर विभिन्न मुद्दों पर कोर्ट के आदेशों कि धज्जियाँ उड़ाते रहते हैं पर एक वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी जिस पर कानून व्यवस्था को बनाये रखने की ज़िम्मेदारी हो ऐसे विचाराधीन मामले में किस तरह से ऐसा कर सकता है ? बरेली के डीएम के मामले में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने उनके पार्टी प्रवक्ता जैसी बात करने और अनुशासन में रहने की बात की थी पर डीजी के मामले में अभी तक चुप्पी संदेहों को जन्म देती है.   
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रविवार, 28 जनवरी 2018

कासगंज - समस्या से सबक तक ?

                                                  गणतंत्र दिवस पर निकाली जा रही तिरंगा यात्रा को लेकर कासगंज में जिस तरह से सुनियोजित उपद्रव किया गया उससे यही लगता है कि आज भी यूपी के विभिन्न जिलों में महत्वपूर्ण पदों पर ऐसे अधिकारी बैठे हुए हैं जिन्हें समुचित प्रशासनिक अनुभव नहीं है या फिर वे किसी दबाव में काम नहीं कर पा रहे हैं. दुनिया की सबसे बड़ी पुलिस फोर्स यूपी पुलिस के नए मुखिया ने आते ही जिस तरह से पूरे बल को एक कड़े सिस्टम के अंतर्गत चलाने की बात कही और यूपी के सीएम आदित्यनाथ ने भी पुलिस को कानून व्यवस्था सुधारने में खुला हाथ देने की छूट दी फिर भी २६ जनवरी के हाई अलर्ट वाले दिन कितनी आसानी से कुछ अराजक तत्वों ने पूरे शहर को नफरत की आग में झोंक दिया और पूरे प्रदेश में चिंताएँ बढा दीं. आखिर किन कारणों से पुलिस और ख़ुफ़िया तंत्र इस साज़िश का पता नहीं लगा पाए यह जाँच का विषय होना चाहिए और जो भी ज़िम्मेदार लोग इस तंत्र में लगे हुए हों उनसे स्पष्टीकरण भी माँगा जाना चाहिए जिससे आने वाले समय में अधिकारियों और कर्मचारियों पर सही काम करने का दबाव बनाया जा सके और लापरवाही में होने वाली इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति पूरी तरह से रोकी जा सके.
                       इतने महत्वपूर्ण दिन जब आम नागरिकों को ख़बरों में यही सुनाई और दिखाई देता है कि पूरा देश हाई एलर्ट पर है फिर इतनी बड़ी घटना और लगातार उपद्रव जैसी स्थिति बनी रहे तो सरकार और व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगता ही है पर इसके लिए केवल सरकार को ही सदैव दोषी नहीं बताया जा सकता है क्योंकि लोकतंत्र में जिस दल की सरकार होती है उसके समर्थक अपने अनुसार कानून व्यवस्था को चलाने की कोशिशें करते रहते हैं जिससे पुलिस प्रशासन पर अनावश्यक दबाव भी पड़ता है और आने वाले समय के लिए उनका मनोबल भी टूटता है. सबसे बड़ी विचारणीय बात यह है कि पूरे शहर में बिना अनुमति के तिरंगा यात्रा कैसे निकाली जा रही थी और कुछ युवक इस तरह से सड़कों पर बिना अनुमति यात्रा निकालते रहे पर पुलिस प्रशासन सिर्फ इस बात से अनभिज्ञ रहा या अनभिज्ञ बना रहा इस बात का जवाब आज किसी के पास नहीं है. किसी भी तरह की यात्रा निकालने के लिए नियमतः उसके मार्ग, समय शामिल होने वाले लोगों की अनुमानित संख्या के बारे में लिखित अनुमति लिए जाने का प्रावधान है फिर इस मूलभूत प्रशानिक चूक के लिए किसको ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए ? बेशक कुछ लोग यह कह सकते हैं कि यह देश के लिए निकाली जाने वाली तिरंगा यात्रा थी पर क्या देश के लिए निकाली जाने वाली कोई भी यात्रा या उसे निकालने वाले कानून से ऊपर हो सकते है ? यात्रा के आयोजकों की तरफ से यह क्यों किया गया इस बात का जवाब भी सामने आना बाकी है क्योंकि देशहित के लिए क्या देश के कानून को किनारे किया जा सकता है ?
                    घटना के बाद भी जिस तरह से अगले दिन भी उपद्रव जारी रहा इससे यही पता चलता है कि स्थानीय प्रशासन को वहां की सही स्थिति का कोई अंदाज़ा ही नहीं है और वह केवल ऊपरी तौर पर काम करने की कोशिश करने में लगा हुआ है ? शुक्रवार की घटना के बाद अगले दिन तक जिस तरह से शहर की अराजकता शहर के बाहर तक चली गयी उससे यही लगता है कि प्रशासनिक अक्षमता वहां पर चरम पर है और उससे निपटने के लिए ठोस कदम भी नहीं उठाये जा रहे हैं. सबसे चिंता की बात यह है कि लखनऊ में बैठे प्रमुख गृह सचिव तक को वस्तु स्थिति से अवगत नहीं कराया जा रहा है जिससे उनके और मंडल स्तर के अधिकारियों के बयानों में भी बड़ी भिन्नता दिखाई दे रही है. सीएम आदित्यनाथ के लिए यूपी के पुलिस प्रशासन में जमे इस रोग की पहचान करना और उसको दूर करने की कोशिश करना ही अब सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि जब तक पुलिस प्रशासन सही तरह से काम नहीं करेंगे तब तक इस स्थिति को संभाला और रोका नहीं जा सकता है. स्थानीय प्रशासन से परिणाम देने की आशा केवल तभी की जा सकती है जब तेज़ तर्रार अधिकारियों को फील्ड पोस्टिंग दी जाये और साथ ही उनके तबादलों के लिए एक नीति का निर्धारण भी किया जाये जिससे वे अपने तैनाती स्थल के बारे में कुछ जान समझ भी सकें तथा विपरीत परिस्थिति आने पर उसे सँभालने के उपाय भी खुद ही खोज सकें.
                       शासन स्तर पर भी अब खुद सीएम आदित्यनाथ के लिए सोचने का समय आ गया है कि उन्हें प्रदेश की कानून व्यवस्था को वास्तव में सुधारना है या केवल इसके लिए चिंतित ही रहना है क्योंकि प्रदेश में लम्बे समय पुलिस सुधार की सिफारिशों पर कोई कार्यवाही किसी भी सरकार द्वारा नहीं की जा रही है जिससे पुलिस बल को मनमानी करने का अवसर मिल रहा है जिसका फल जनता को भुगतना पड़ता है. साथ ही एक प्रश्न यह भी है कि क्या अपने पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों की तरह सीएम आदित्यनाथ की भी सोच वही है कि सीएम के पास यूपी जैसे राज्य का गृह विभाग सही तरह से काम कर सकता है ? परिवर्तन की शुरुवात खुद सीएम को अपने से करनी चाहिए और प्रदेश को एक पूर्णकालिक गृह मंत्री (जिसके साथ कम से कम तीन ऊर्जावान गृह राज्यमंत्री भी तैनात हों) यूपी को देना चाहिए जिससे इस विभाग में व्याप्त गड़बड़ियों को सही तरह से ठीक किया जा सके और विभाग की चिंताओं और समस्याओं पर भी विचार किया जा सके. आशा की जा सकती है कि नए पुलिस मुखिया द्वारा इस दिशा में सरकार के सामने एक कार्ययोजना प्रस्तुत की जाएगी जिस पर सरकार को अमल करने के बारे में सोचना भी होगा. पुलिसिंग में निचले स्तर पर आज से तीन दशक पहले की पीस कमेटियों को फिर से जीवित करना होगा जिससे समाज के लोग साथ में बैठकर स्वयं समस्याओं पर विचार कर सकें. आज के समय में चल रही पीस कमेटियों पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि उनमें केवल वही लोग स्थान पाए रहते हैं जो सीधे पुलिस से जुड़े होते हैं और समाज का सही प्रतिनिधित्व भी नहीं करते हैं.
                 निश्चित तौर पर कासगंज ने सीएम आदित्यनाथ के लिए चुनौती प्रस्तुत की है और अब यह उन पर ही निर्भर करता है कि वे यूपी के गृह विभाग को किस तरह से चलाना चाहते हैं और क्या उनकी मंशा वास्तव में प्रदेश की कानून व्यवस्था में सुधार करने की है तो क्या उसकी शुरुवात वे लोकभवन में शक्तियों के विकेन्द्रीकरण से करने के बारे में मानसिक रूप से तैयार भी हैं ? सीएम के पास ४ वर्षों से अधिक का समय है जिसका उपयोग वे गृह विभाग में सुधारात्मक क़दमों के लिए आसानी से कर सकते हैं साथ ही बड़े शहरों में पुलिस आयुक्त की अवधारणा पर भी काम किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि सत्ता में बैठे किसी भी दल के सीएम की खोखली चेतावनी से यह विभाग सदैव ही रूबरू रहता है और यह भी जानता है कि कासगंज जैसी घटनाओं से किस तरह उबरा जाता है पर अब प्रदेश को कुछ ठोस क़दमों की आवश्यकता है और अब यह आशा पूरी करना सिर्फ सीएम आदित्यनाथ पर ही निर्भर है.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 19 जनवरी 2018

उग्र बच्चे उत्तरदायी कौन ?

                                                     लखनऊ के एक स्कूल में सातवीं में पढ़ने वाली एक छात्रा ने जिस तरह से पहली कक्षा के मासूम बच्चे पर जानलेवा हमला कर उसे जान से मारने की कोशिश की वह हमारे समाज की वर्तमान व्यवस्था को झकझोरने के लिए काफी है क्योंकि भले ही पहली दृष्टि में हम सभी को यह एक असामान्य घटना लगे जिसमें सिर्फ एक दिन की छुट्टी हो जाने की आशा में कोई ११ साल की लड़की इस हद तक चली गयी हो पर गंभीरता से विचार करने पर यह पूरी तरह से सामाजिक, पारिवारिक उत्तरदायित्वों को सहेज पाने की हमारी विफलता ही दिखाई देती है. अब जिस तरह से पूरे मामले को घुमाने की कोशिशें हो रही हैं वे अपने आप में इसे भी कुछ दिनों में भूल जाने वाली घटना में बदल देंगीं और जब कभी कहीं से इस मामले की किशोर न्याय बोर्ड में सुनवाई होगी तब इस बारे में हम एक बार फिर अपनी चिंताएं व्यक्त कर आगे बढ़ जायेंगें. लखनऊ के एसएसपी द्वारा जो बयान दिया गया वह वास्तव में चौंकाने वाला है कि यह छात्रा पहले भी दो बार घर से गायब हो चुकी थी जिसके बारे में पुलिस के पास भी सूचना दी गयी थी फिर भी छात्रा के परिजनों, स्कूल या पुलिस ने इतनी कम उम्र की इस छात्रा की उचित कॉउन्सिलिंग कराने के बारे में क्या कदम उठाया यह सामने नहीं आया है.
                                   अभी भी जिस तरह की जानकारियां सामने आ रही हैं उनसे यही लगता है की इस घटना के पीछे कोई अन्य कारण भी हो सकता है क्योंकि जिस तरह से स्कूल ने घटना के बारे में पुलिस प्रशासन को सूचित नहीं किया और २४ घंटे बाद इस मामले में पुलिस का हस्तक्षेप शुरू हुआ वह भी संदेह उत्पन्न करता है. नियमतः किसी भी स्कूल प्रबंधन को किसी भी दुर्घटना की जानकारी पुलिस को देना कानूनी और सामाजिक रूप से सही और आवश्यक होता है पर इस मामले में पुलिस को पता ही बहुत देर से चला जिससे प्रबंधन भी संदेह के घेरे में आ गया. यदि स्कूल की तरफ से पहले ही यह प्रयास किया जाता कि घटना पुलिस के संज्ञान में हो तो संभवतः मामला इतना नहीं बिगड़ता. यदि मौके से साक्ष्यों को मिटाने का प्रयास किया गया है तो स्कूल पर शक और भी गहरा जायेगा भले ही इसमें सिर्फ छात्रा ही शामिल रही हो. पुलिस को स्कूल और वहां पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावकों से भी गहन पूछताछ करनी चाहिए जिससे प्रबंधन के बारे में किसी गड़बड़ी का अंदाज़ा लग सके और यह भी हो सकता है कि स्कूल ने बदनामी से बचने के लिए मामले को खुद अपने स्तर से निपटाने की कोशिश की हो जिसमें बच्चे को लगी गंभीर चोटों के कारण मामला बिगड़ गया.
                       समाज के तौर पर हमें अब अपने निरीक्षण की आवश्यकता भी है क्योंकि आखिर वे क्या कारण है कि हमारी एक बच्ची इतनी हिंसक हो जाती है कि वह दूसरे बच्चे की जान लेने तक सोच जाये ? क्या हमारे घरों में पहुंची टीवी और हाथों में आये इंटरनेट वाले मोबाइल फ़ोन इस दिशा में बच्चों के कोमल मन को प्रभावित तो नहीं कर रहे हैं ? आखिर टीवी पर कुछ भी दिखाए जाने को सही कैसे ठहराया जा सकता है क्योंकि अपराधों के बारे में आने वाले अधिकांश कार्यक्रमों में अपराधी के काम करने का तरीका क्या था यही बताया जाता है और उन कार्यक्रमों को देखने वाले हमारे बच्चे यह निर्णय नहीं कर पाते हैं कि इस जानकारी का क्या किया जाये ? संयुक्त परिवारों से दूर होते छोटे परिवारों में आज माता-पिता के पास इतना समय ही नहीं है कि वे अपने बच्चों के साथ रह पाएं और उनकी गतिविधियों पर भी ध्यान दें क्योंकि कोई बच्चा एक दिन में इतनी आपराधिक प्रवृत्ति से भर नहीं सकता है. कई बार घर में मिलने वाली उपेक्षा या अत्यधिक लाड प्यार भी उनके इस दिशा में बढ़ जाने का एक बड़ा कारण हो सकता है. आखिर क्यों आज हम समाज की एक मज़बूत इकाई बनकर जीने के स्थान पर अपने एकल इकाई में परिवारों को संभालना सीखते जा रहे हैं ? क्या इस तरह का जीवन हमारे घरों में हमारे बच्चों पर बुरा प्रभाव नहीं डाल रहा है और क्या अब इस समस्या से निपटने के लिए हमारे पारिवारिक मूल्यों की तरफ बढ़ने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है ? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हम केवल अपनी सुविधा के अनुरूप ही खोजने की कोशिशें करते रहते हैं और कुछ घट जाने पर केवल यह कहकर ही अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाते हैं कि बहुत बुरा समय आ गया है. समय बुरा नहीं आया है हमने अपने बच्चों को अच्छाइयों और बुराइयों के अंतर को समझाना बंद कर दिया है और उनके विकास के लिए उन्हें आज की दुनिया में खुला छोड़ दिया है जबकि हम सभी को यह सोचना चाहिए की खुलापन सिर्फ उतना ही हो जिसमें घुटन न हो घर के लोगों और समाज से बच्चों का अपनापन बना रहे और वे आने वाले समय में अच्छे नागरिक बनकर देश के लिए कुछ ठोस कर सकें तभी कुछ सुधार संभव है.        
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शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

२ जी घोटाला वास्तविक या काल्पनिक ?

                                   लम्बे समय के बाद जिस तरह से २०१० की कैग रिपोर्ट में सामने आये २ जी घोटाले को लेकर सभी आरोपियों को विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में छोड़ दिया है वह देश की राजनीति, जाँच एजेंसियों अभियोजन और न्यायालय की सीमाओं पर गभीर सवाल पैदा करता है क्योंकि जिस घोटाले को देश का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक घोटाला माना गया या जनता के सामने उसे इस तरह से प्रस्तुत किया गया जैसा उसके माध्यम से मनमोहन सिंह की सरकार ने देश को बड़े राजस्व की चोट दी है आज वह कहीं से भी कानूनी दलीलों के सामने टिक नहीं पाया ? आज देश की जनता यह सोच रही है कि जिस घोटाले को लेकर इतना बड़ा राजनैतिक तूफ़ान खड़ा किया गया था उसकी परिणिति इतनी हास्यास्पद होगी ? यह सही है कि नीतिगत समस्याओं के चलते या उन नीतियों के पीछे छिपकर अपने या सहयोगियों के लिए किसी तरह का लाभ उठाये जाने की कोशिशों का संदेह आज भी इस पूरे मामले से छंटता हुआ नहीं दिख रहा है फिर भी कहीं न कहीं से यह अवश्य दिख रहा है कि यह मामला आर्थिक घोटाले से अधिक राजनैतिक लाभ लेने का अधिक है.
                                   जिस मामले को खुद पीएम के भाजपा उम्मीदवार होने के बाद से लगातार अपनी २०१४ की चुनावी सभाओं में उठाया जाता रहा था और पीएम मोदी के सत्ता सँभालने के साढ़े तीन साल बाद यदि उसकी यह स्थिति है कि देश की सर्वोच्च अभियोजक सीबीआई को किसी भी तरह के ऐसे सबूत नहीं मिले जिनके आधार पर न्यायालय उन्हें दोषी मानता तो इस मामले का स्तर आसानी से समझा जा सकता है. निश्चित तौर पर इतने सालों से चल रहे मामले में निश्चित तौर पर मोदी सरकार ने सब कुछ किया होगा पर आज जब सभी आरोपी सबूतों के आधार पर बरी कर दिए गए हैं तो इस मामले की वास्तविकता पर संदेह होने लगता है. जिस तरह के आंकड़े एकदम से बताये गए थे आज वे कहीं से भी किसी वित्तीय अनियमितता के चलते किये गए हों ऐसा साबित नहीं  हो पाना आखिर देश के लिए किस तरह से सही कहा जा सकता है ? नीतिगत मामलों के चलते जिन कंपनियों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था और केवल उस समय स्पेक्ट्रम आवंटित होने के चलते लगभग सभी कंपनियों को भ्रष्टाचारी मान लिया गया था और सुप्रीम कोर्ट ने १२२ लइसेंस निरस्त भी कर दिए थे तो आज उन कंपनियों के लिए क्या सरकार माफ़ी मांगने को तैयार है ?
                               इस पूरे प्रकरण से यह बात तो स्पष्ट ही है कि कैग की एक रिपोर्ट में नीतिगत परिवर्तन न किया जाने के चलते एक अनुमान भर लगाया गया था जिसको भ्रष्टाचार का प्रतीक मान लिया गया और जिसके चलते ही कांग्रेस सत्ता से भ्रष्टाचारी के रूप में जनता के द्वारा सीमित संख्या में बाहर कर दी गयी पर सभी को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस नीति के चलते देश में दूरसंचार क्रांति भी आयी थी जिसने हर भारतीय के हाथों तक संचार के आधुनिक स्वरुप को पहुँचाने का काम भी किया था. राजनीति अपनी जगह है पर केवल सत्ता पाने या दूसरे दल को नीचा दिखाने के लिए इस तरह के हथकंडों का दुरूपयोग करके अंत में देश की छवि को ही नुकसान पहुँचाया जाता रहा है. राजनैतिक दल और उनकी सत्ता अस्थायी होती है पर देश स्थायी है और जिस परिकल्पना के साथ देश में संसद की स्थापना की गयी थी अब केवल सत्ताधारी दल के निर्णयों और मंशा के स्थान पर संसद में सर्वानुमति की राजनीति पर ध्यान देने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब सभी की सहमति से नीतियों का निर्धारण किया जायेगा तो देश आगे बढ़ पायेगा. निश्चित तौर पर सीबीआई और सरकार के पास अगली अदालत में जाने के विकल्प खुले हुए हैं पर जो सीबीआई पहले ही सबूत जुटाने में सफल नहीं हो पायी अब उसके जुटाए गए सबूत किस आधार पर न्यायालय में टिक पायेंगें यह सोचने का विषय है पर कांग्रेस को भ्रष्टाचारी साबित करने के लिए मोदी के लिए इस मामले को आगे बढ़ाना ही होगा अन्यथा गुजरात में सुधरे प्रदर्शन के चलते कांग्रेस मोदी पर पूरी क्षमता के साथ भजपाऔर मोदी पर पलटवार करने के लिए तैयार दिख रही है.   
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रविवार, 3 दिसंबर 2017

डॉक्टर-लैब-फार्मा कम्पनी गठजोड़

                                                       एक समय में चिकित्सा व्यवसाय को सबसे अच्छा माना जाता था और यह भी माना जाता था कि कोई भी डॉक्टर किसी भी परिस्थिति में अपने यहाँ आये हुए किसी भी रोगी के हित के लिए ही सदैव प्रयत्नशील रहता है पर आज के बदलते परिवेश में जिस तरह की ख़बरें और घटनाएं सामने आती हैं उनसे आम लोगों की इस धारणा को बहुत धक्का भी लगता है. नयी दवाओं और चिकित्सा जगत में होने वाले नए अनुसंधानों से देश के विभिन्न भागों में काम कर रहे डॉक्टर्स को परिचित कराने तथा उनको रोगियों के हितों में उपयोग करने के लिए लगभग हर दवा कम्पनी अपने स्तर से प्रयास करती है और अपने उत्पादों की बिक्री के लिए डॉक्टर्स को विभिन्न तरह के उपहारों से उपकृत भी करती रहती है. जब तक चिकित्सा जगत में व्यावसायिक घरानों की पैठ नहीं हुई थी तब तक सब कुछ ठीक ही चल रहा था पर जब से दवा कंपनियों ने फार्मा लाइन से जुड़े हुए डी फार्मा, बी फार्मा और एम फार्मा अभ्यर्थियों के स्थान पर एमबीए किये हुए लोगों के हाथों में बिक्री को सौंप दिया है तब से इस क्षेत्र का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है और दूसरी कम्पनी के बिकते हुए उत्पादों की होड़ में अब हर छोटी बड़ी कम्पनी कुछ भी बनाकर बेचने की राह पर चल चुकी हैं और इसमें दुर्भाग्य की बात यह है कि डॉक्टर्स सब कुछ जानते हुए भी सिर्फ अपने लालच के कारण इन कंपनियों के जाल में उलझे हुए हैं.
                                       यह सही है कि कई बार लक्षणों के आधार पर रोग का पता लगा पाना कठिन हो जाता है और दिखाई देने वाले लक्षणों के अतिरिक्त कोई और रोग भी किसी रोगी में हो सकता है जिसे जानने के लिए विभिन्न तरह की जांचें करवाने की आवश्यकता भी पड़ती रहती है. जब तक आवश्यकता हो तब तक इसे सही समझा जा सकता है पर जब यह भी कमाई का एक और जरिया बन जाए तो इस पर लगाम लगाने की आवश्यकता आ जाती है. आज बड़े शहरों में बड़ी लैब्स के साथ हज़ारों छोटी लैब्स मौजूद हैं जो अपने असली काम के साथ इस तरह के काम में भी लिप्त हैं पर सोचने वाली बात यह है कि लाखों रुपयों के खर्च के बाद स्थापित होने वाली लैब्स आखिर छोटे शहरों और कस्बों तक में कैसे खुलती जा रही हैं जबकि उनके पास आवश्यक चिकित्सक और लैब सुविधाएँ भी नहीं हैं ? यदि इन छोटे शहरों में बैठे हुए झोलाछाप चिकित्सकों और इन कुकुरमुत्तों की तरह उग आयी लैब्स पर ध्यान दिया जाये तो पूरे देश में यह हज़ारों करोड़ का अनैतिक कार्य सामने आ सकता है. इन कथित चिकित्सकों के पास कोई डिग्री नहीं होती जिससे वे केवल लैब से मिलने वाले अपने कमीशन के चक्कर में भी अनाप शनाप जांचें कराते रहते हैं जिससे पहले से ही परेशान रोगी पर और अधिक आर्थिक दबाव पड़ता है पर इस दिशा में सोचने का समय संभवतः किसी के पास नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों की नज़रें अभी तक इस गठजोड़ पर नहीं पड़ रही हैं.
                               इन सबसे बचने के लिए आखिर किस स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है अभी हमारे देश में किसी को भी इस बात की जानकारी भी नहीं है क्योंकि लोग आज भी भरोसे के चलते आँखें बंद करके अपने डॉक्टर और उसके बताये रास्ते पर चलते हैं. बंगलुरु में जिस तरह से चिकित्सकों और लैब के बीच का गठजोड़ सामने आया है और उसमें करोड़ों रुपयों की ज़ब्ती के साथ विदेशी मुद्रा भी मिली है तो क्या केंद्र सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अविलम्ब इस बात पर सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आखिर यह सब कैसे रोका जाना चाहिए ? ऐसा नहीं है कि नेताओं और अधिकारियों को यह नहीं पता है पर उनके अपने स्वार्थ हर तरह की परिस्थिति में सिद्ध हो जाते हैं तो उन्हें आम लोगों की इस समस्या पर सोचने की आवश्यकता ही नहीं है. इस बारे में अब सरकार को हर डॉक्टर की डिग्री को आधार से जोड़कर उसके द्वारा पूरे साल में कराई जाने वाली जांचों पर नज़र रखने के लिए एक व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जिससे यह पता चल सकेगा कि वह डॉक्टर कितने रोगी देख रहा है और कितना धन लैब्स से ले रहा है साथ ही आयकर देने और उसके इस तरह की आमदनियों के बीच किस तरह का सामंजस्य है भी या नहीं ? इस तरह के कदम से जहाँ सरकार को अधिक राजस्व मिल सकता है वहीँ रोगियों के लिए सही जांचों तक डॉक्टर्स और लैब्स को सीमित किया जा सकता है.
                             ऐसा भी नहीं है कि आज सारे चिकित्सक लैब्स और फार्मा कंपनियां इस तरह के कामों में लिप्त है फिर भी यह मानकर काम नहीं चलाया जा सकता है कि हर जगह कुछ लोग गलत तरह से काम करते हैं. सरकार को इस दिशा में सुधार के लिए पहले एक व्यापक नीति बनानी होगी जिसके बाद ही उसको कानून का रूप दिया जा सकता है. रोगियों को अच्छी सुविधाएँ देने के लिए जन औषधि केंद्रों की तरह लैब्स की अवधारणा को भी मूर्त रूप दिया जा सकता है कम से कम जिला अस्पतालों की क्षमता को इतना अधिक बढ़ाये जाने पर बल दिया जाना चाहिए जो कम से कम अपने जिले के रोगियों को इस तरह की सुविधाएँ उचित दरों पर उपलब्ध कराने के केंद्र के रूप में विकसित किये जा सकें. इसके लिए सरकार को चिकित्सा में उच्च शिक्षा के लिए व्यापक सुधार करते हुए एमडी डीएम आदि स्तरों पर शिक्षा की अधिक व्यवस्था के बारे में सोचना ही होगा साथ ही आयुष मंत्रालय को इस दिशा में और अधिक कारगर बनाये जाने की आवश्यकता पर ही ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे रोगी के सामने हर स्तर की चिकित्सा सेवा लेने का विकल्प खुल सके और वह अपनी समस्या में किसी बड़े व्यावसायिक गठबंधन का शिकार न हो जाए.        
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शनिवार, 25 नवंबर 2017

इंटरनेट बैन समस्या या समाधान ?

                                          निश्चित तौर पर इंटरनेट आज के समय में आम लोगों के बीच संवाद का बड़ा मंच बन चुका है जिसके चलते इसका दुरूपयोग रोकने के लिए सरकार की तरफ से कानून व्यवस्था से निपटने के लिए विभिन्न जगहों पर इस पर अस्थायी रोक लगाए जाने की परंपरा सी शुरू कर दी है जिससे आम लोगों को बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है. हरियाणा में एक जाट संस्था और सत्ताधारी दल के एक सांसद की जनसभा से आखिर वहां की कानून व्यवस्था किस तरह बिगड़ सकती है यह समझ से परे है पर इन सभाओं को लेकर राज्य के १३ जिलों में इंटरनेट सेवाओं पर २६ नवम्बर की मध्यरात्रि से तीन दिनों के लिए रोक लगा दी जाएगी. यहाँ पर यह समझना आवश्यक है कि आखिर सरकारों को इस तरह के कदम उठाने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ती है और संविधान से मिले लोकतान्त्रिक तरीके से जनसभा के अधिकार के साथ कोई भी सरकार ऐसे कैसे कर सकती है ? क्या आज इंटरनेट इतना प्रभावी है कि उसके चलते सरकारों के ख़ुफ़िया तंत्र खोखले और कमज़ोर साबित हो जाते हैं या आमलोगों में ही अपने अधिकारों के दुरूपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है जिसके चलते सरकारें भी सोशल मीडिया की इस शक्ति से निपटने के लिए इस पर रोक लगाने को ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प मानने लगी हैं ?
                                           यह ऐसा मुद्दा है जिसके बारे में कोई भी स्पष्ट रूप से यह नहीं खोज सकता है कि आखिर गलती किसकी है और किस तरह से इससे निपटा जाना चाहिए क्योंकि आज के युग में जब देश को डिजिटल बनाये जाने की कोशिशें की जा रही हैं तो समय समय पर इस डिजिटल युग में यह ब्लैक आउट किस तरह से सही ठहराया जा सकता है ? निश्चित तौर पर आज आमलोगों के बहुत से काम इंटरनेट के माध्यम से ही होते हैं बैंकिंग सेवाओं से लगाकर अधिकांश प्रशासनिक कार्यों को भो जिस तरह से नेट के माध्यम से किये जाने की सुविधाएँ देने के साथ सरकार इनको बढ़ावा देने में लगी है तो इस तरह की रोक आखिर इस अभियान को कहाँ तक सफल होने देगी ? जिन लोगों के आवश्यक बैंक या अन्य कार्य इंटरनेट के माध्यम से किये जाने होंगे वे भी इस अवधि में नहीं हो सकते जिससे इन ज़िलों की बहुत बड़ी आबादी को व्यापक रूप से समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. इस बारे में सरकार को भी अन्य विकल्पों पर सोचना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर ऐसे कदम उठाने के स्थान पर केवल सोशल मीडिया पर ही प्रतिबन्ध लगाए जाने की व्यवस्था पर काम करना चाहिए क्योंकि सरकार की समस्या पूरा इंटरनेट नहीं बल्कि सोशल मीडिया अधिक होता है और इससे निपटने के लिए सही दिशा में सही तरह से काम किये जाने की आवश्यकता भी है.  
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शनिवार, 30 सितंबर 2017

रेलवे की आधारभूत आवश्यकताएं

                                                     मुंबई के एल्फिंस्टन-परेल स्टेशन के यात्री उपरिगामी सेतु पर हुए हादसे के बाद एक बार फिर से वही बातें दोहराए जाने का क्रम शुरू हो चुका है जिसके चलते पूरे देश में हज़ारों जाने जा चुकी हैं या फिर हर समय हज़ारों यात्री इस खतरे के साथ ही जीने को मजबूर हैं. यह सही है कि भारतीय रेल का पूरा नेटवर्क आज की आवश्यकता के अनुसार क्षमता को कहीं से भी पूरा नहीं कर पाता है जिससे थोड़ी सी बात पर अफवाह फैल जाती हैं और पलक झपकते ही कोई हादसा हमारी आँखों के सामने होता है. यह सही है कि दशकों पुराने ढांचे को सुधारने में समय तो लगना ही है पर १८५३ में भारतीय रेल के शुरू होने के बाद से आज तक भी तो रेल का परिचालन होता रहा है और उसकी आवश्यकता के अनुरूप सुधार भी किये जाते रहे हैं पर पिछले कुछ दशकों से इसमें किसी न किसी स्तर पर कमियां अवश्य ही दिखाई दे रही हैं जिसके चलते अब पूरे रेल नेटवर्क में रख-रखाव से जुडी समस्याएं सामने आने लगी हैं और यदि समय रहते इनसे नहीं निपटा गया तो आने वाले समय में रेलवे और रेल यात्रियों के लिए समस्याएं बढ़ती ही जाने वाली हैं. अब सरकार को इस क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए रेलवे के पेंच कसने की तरफ ध्यान देना ही होगा जिससे देश में यातायात के इस सुगम साधन को और भी सुरक्षित किया जा सके.
                   लम्बे समय तक लगातार उपयोग में आने के कारण रेलवे में रखरखाव सदैव ही एक बड़ी चुनौती रहा है जिसके चलते रेलवे के अधिकारियों की तरफ से भी कुछ लापरवाहियां की जाती रहती हैं कई बार धन की कमी का रोना भी रहता है पर इस सबमें सबसे बड़ी समस्या रेलवे के लिए समय के साथ बदलाव को न करते रहना भी है. रेलवे में हर एक अवस्थापना और संरचना की एक निश्चित आयु होती है जिसके चलते उसे उस समय से पहले ही बदलने की आवश्यकता पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत होती है कई बार काम के दबाव या रेल परिचालन में संभावित व्यवधान को देखते हुए इस कार्य को लम्बे समय तक टाल दिया जाता है और ट्रेनों तक को लम्बे समय तक समस्या वाले स्थानों से धीमी गति से निकाल कर काम चलाया जाता है. इस पूरी कवायद में जहाँ यात्रा का समय बढ़ता है वहीं आसपास के बड़े स्टेशनों पर अनावश्यक रूप से दबाव भी बनता है जो कि रेलवे के समयबद्ध और सुरक्षित परिचालन में एक बड़ा व्यवधान साबित होता है और इससे निपटने के लिए रेलवे के पास कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नीति या कार्ययोजना का अभाव दिखाई देता है जिससे भी समस्याएं कम होने के स्थान पर बढ़ ही जाती हैं.
                   यदि आने वाले समय में रेलवे को देश के तेज़ी से बदलते हवाई यातायात से मुक़ाबला करना है तो उसे अपने आधारभूत कामों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पड़ने वाली है क्योंकि पीपीपी के आधार पर कोई भी निजी निवेशक केवल रेलवे की खाली पड़ी कीमती भूमि का उपयोग करने की दिशा में ही काम करने वाला है और उसका रेलवे की मूलभूत आवश्यकता से कोई सरोकार नहीं रहने वाला है तो उस परिस्थिति के लिए रेलवे को सीमित संख्या में निजी क्षेत्र को आमंत्रित करने की दिशा में सोचना चाहिए जिससे उसकी कीमती भूमि भविष्य में उसके विस्तार और अन्य परियोनाओं के लिए उपलब्ध रह सके. मुंबई हादसे के बाद रेल मंत्रालय को सबसे पहले पूरे देश में इस तरह के बड़े स्टेशनों पर मूलभूत संरचनाओं के बारे में एक श्वेत पत्र जारी कर यह बताना चाहिए कि आज इन स्टेशनों पर इनकी क्या स्थिति है और एक समय सारिणी के अनुरूप आने वाले दो या तीन वर्षों में इस तरह की समस्या से निपटने की कार्ययोजना पर अमल करना चाहिए जिसमें सबसे पहले यात्रियों की संख्या के अनुरूप बड़े स्टेशनों पर आवश्यक सुविधाओं को उपलब्ध कराया जाना चाहिए और उसके बाद उनके रख रखाव की समुचित व्यवस्था पर भी ध्यान देने के लिए एक मज़बूत और उत्तरदायी तंत्र बनाना चाहिए.
                     हर मंडल में इस तरह के काम को देखने के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए जिससे अन्य अधिकारी काम के बोझ के चलते इन कामों पर ध्यान न दिए जाना का बहाना न बना सकें और काम को समय से पूरा भी किया जा सके. रेलवे को मेट्रो रेलवे की तरह एक नयी टीम बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ना ही होगा क्योंकि जब तक दक्ष और कार्यकुशल लोगों के हाथों में यह सब पूरी तरह से नहीं दिया जायेगा तब तक कुछ भी सही नहीं हो सकता है. इन्हीं परिस्थितियों में देश भर की मेट्रो रेलवे आखिर किस तरह से समयबद्ध होकर हर काम कर सकती हैं जबकि वहां पर गए अधिकांश कर्मचारी भी रेलवे से या उसकी धारणा के अनुसार ही होते हैं ? मतलब स्पष्ट है कि रेलवे में अभी उस तरह की कार्यसंस्कृति का विकास नहीं हो पाया है जैसा मेट्रो ने कम समय में विकसित कर लिया है और उसके चलते ही आज देश में स्थापित विभिन्न शहरों की मेट्रो अपने काम को समय से पूरा करने के लिए जानी जाती हैं.
                       अब समय आ गया है कि पूरी परिस्थिति पर ध्यान देते हुए एक विस्तृत कार्ययोजना बनायीं जाये और उसकी बागडोर ऐसे अधिकारियों के हाथों में होनी चाहिए जो आगामी दो या तीन वर्षों में रिटायर न हो रहे हों जिससे अधिकारियों को बीच में बदलने से काम प्रभावित न हो सके. जब इतनी अधिक उम्र में ई श्रीधरन अपने काम को सही समय से करने के लिए जाने जाते हैं तो यह सब काम करने वाले श्रीधरन जैसे और मेट्रो मैन हम सामने क्यों नहीं ला सकते हैं ? कहीं न कहीं इच्छा शक्ति में कमी के चलते ही यह सब नहीं हो पा रहा है और अब इस पर ध्यान देकर रेल यात्रा को सुरक्षित किये जाने का समय आ चुका है क्योंकि इसमें चूकने पर रेलवे के साथ सरकार और देश के नागरिकों के जीवन पर व्याप्त संकट को किसी भी तरह से कम नहीं किया जा सकता है.
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शनिवार, 2 सितंबर 2017

डेरों, प्रचारकों की दुर्गति के कारण

                                                    आज के भौतिक युग में जिस तरह से हर व्यक्ति अपने ही कामों में व्यस्त रहने के लिए अभ्यस्त हो चुका है तो उसके लिये शारीरिक और मानसिक तनाव पैदा करने वाले कारकों में लगातार वृद्धि होती जा रही है जिससे अपने को बचाने का उसे कोई सुरक्षित मार्ग संसार में दिखाई नहीं देता है. यह एक ऐसी परिस्थिति होती है जब व्यक्ति के पास सांसारिक रूप से बहुत कुछ तो होता है पर उसके पास मन की शांति नहीं होती है जिसे खोजने के लिए वह अपनी निष्ठा और धर्म के अनुरूप प्रयास शुरू करता है जिसमें कई बार वह केवल अपने धर्म के बताये मार्ग पर चलकर ही आगे बढ़ने और शांति पाने का मार्ग खोज लेता है और कई बार जब उसकी मानसिक स्थिति उसे उस स्तर तक पहुँचने नहीं देती तो वह आज के सांसारिक गुरुओं की शरण में जाने के विकल्प के बारे में सोचना शुरू कर देता है जिससे उसका किसी डेरे या आश्रम के अनुयायी से संपर्क होता है और वह उस गुरु या आश्रम के साथ जुड़कर अपने को कुछ सहज बनाने के उपाय खोजने लगता है. यह ऐसी अवस्था होती है जिसमें वह व्यक्ति अपनी परेशानियों और उलझाव के चलते किसी भी तरह से सही गलत सोचने की स्थिति से आगे नहीं बढ़ पाता है और उसको डेरे या आश्रम तक ले जाने वाले व्यक्ति के प्रभाव के चलते वह वहां के पीठाधीश को अपने हर कष्ट का समाधान मानकर उनका अनुयायी बन जाता है. यहाँ पर यह विचार करने लायक है कि जो खुद अपनी परिस्थितियों से ऊबा और परेशान है वह किस तरह से अपने लिए सही गलत का चुनाव कर पाने में सफल हो सकता है ? ऐसी परिस्थिति ही उसे इस तरह से डेरों और आश्रमों तक ले जाने का काम बहुत आसानी से करती है जिसके बारे में उसे केवल अच्छी बातें ही बताई जाती हैं.
                              भारत प्राचीन समय से ही धर्म प्रधान कम धर्म भीरु अधिक रहा है और यह स्थिति कामबेश पूरे भारतीय उपमहाद्वीप की कही जा सकती है तो ऐसी परिस्थिति में हमारे यहाँ जिस तरह से आश्रमों और अखाड़ों के साथ डेरों में ऊंचे स्तर की राजनीति चलती रहती है उसका दुष्प्रभाव भी इन सगठनों पर पड़ता ही रहता है जिससे निपटने के लिए इनके समाज या सरकार के पास कोई कारगर रास्ता नहीं होता है. बहुत बार योग्य उत्तराधिकारी के होने के बाद भी किसी ऐसे को पीठ पर बैठा दिया जाता है जो स्वभाव से शातिर और दूसरों पर नियंत्रण रखने की महत्वाकांक्षा को रखता है और यहीं से उस स्थान के उद्देश्यों में भटकाव शुरू हो जाता है. क्यों नहीं इन धार्मिक आश्रमों, अखाड़ों और डेरों के लिए भी एक धार्मिक प्रक्रिया का अनुपालन किया जाना आवश्यक होना चाहिए और उन पर सदैव ही सरकार और प्रशासन की नज़र भी होनी चाहिए ? जिस तरह से ये डेरे और अखाड़े विभिन्न समयों पर सरकारों के लिए बड़ी समस्या बनते रहे हैं तो उससे निपटने के लिए अब स्पष्ट रूप से कानून भी बनाया जाना चाहिए और स्थानीय एसडीएम / डीएम स्तर के अधिकारी को डेरे के आकार के अनुरूप इसका पदेन सदस्य बनाया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिससे इन स्थानों की गतिविधियों के बारे में सरकार के पास एक समग्र जानकारी सदैव उपलब्ध रहे और आवश्यकता पड़ने पर उसका उपयोग भी किया जा सके.
                             लम्बे समय से लाखों अनुयायियों वाले किसी डेरे, आश्रम या अखाड़े में प्रमुख के बदलने के साथ वहां काम करने वालों की निष्ठाएं बदलती रहती हैं और पहले महत्वपूर्ण काम सँभाल रहे लोगों को महत्वहीन कर दिया जाता है जिससे भी संकट बढ़ता है और अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिए विरोधियों की हत्याएं तक की जाती हैं जिनका धर्म से कोई वास्ता नहीं होता है पर यह सब अनुयायियों की नज़रों से बहुत दूर होता है इसलिए उनकी श्रद्धा में कोई कमी दिखाई नहीं देती है और वे अपने गुरु के लिए कुछ भी करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं. इन डेरों को मानने वालों को केवल अपनी श्रद्धा से ही मतलब होता है और वे हर परिस्थिति में अपने गुरु को सही और सच्चा मानते रहते हैं जिसका उनको बहुत नुकसान भी होता है. वर्तमान में डेरा सच्चा सौदा के साथ उसके वर्तमान प्रमुख गुरमीत राम रहीम की हरकतों के चलते जो कुछ भी हुआ उसके लिए डेरे के अनुयायियों को गलत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि वे केवल श्रद्धा भाव से ही यहाँ आकर या अपने शहरों में डेरे का प्रचार प्रसार करते रहते थे. गुरु पद पर बैठे हुए इस तरह के किसी व्यक्ति का भंडा फोड़ होने की दशा में डेरे के द्वारा चलाये जा रहे अच्छे कार्यों पर कोई दुष्प्रभाव न पडे इसके लिए हरियाणा सरकार को अविलम्ब एक व्यवस्था बनानी होगी जिससे गुरमीत राम रहीम के डेरा सँभालने से पहले जुडी हुई डेरे के साख के कारण जुड़े हुए परिवारों को कोई समस्या न हो जो सेवा भाव से डेरे का काम किया करते थे. जिस तरह से यह भी सामने आ रहा है कि डेरे के ५०० करोड़ रुपयों के उत्पाद भी बनाये जाते थे तो उससे जुड़े लोगों को रोज़गार देने या उसे बचाये रखने के लिए अविलम्ब कार्यवाही करने की आवश्यकता है साथ ही डेरे से जुडी शिक्षण संस्थाओं, औषधि केंद्रों के नियमित सञ्चालन हेतु आवश्यक धनराशि का आवंटन भी प्रति माह सुचारु रूप से हो सके इस बात पर उचित ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है. डेरे के विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों और पढ़ाने वाले लोगों के सामने किसी तरह का आर्थिक संकट भी न उत्पन्न हो इस पर भी विचार किया जाना चाहिए. हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुसार डेरे के खातों के संचालन पर रोक और संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए स्पष्ट नीति बनाई जानी चाहिए साथ ही डेरे के माध्यम से चल रहे सामाजिक कार्यों को लगातार जारी रखने हेतु एक उचित निर्देश भी हाई कोर्ट से प्राप्त किया जाना चाहिए जिससे एक व्यक्ति की गलतियों की सजा उन लोगों को न मिले जिसमें वे शामिल भी नहीं थे. साथ ही डेरे की संचालन समिति को भी परिवारवाद को बढ़ाने के स्थान पर डेरे के किसी और स्वीकार्य संत को आध्यात्मिक प्रमुख बना कर डेरे का काम शुरू करने का विकल्प भी खोलने के लिए हाई कोर्ट से उचित आदेश प्राप्त करने चाहिए.      
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