मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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रविवार, 18 फ़रवरी 2018

इंसानी आबादी में वन्य जीव

                                                    लखनऊ के आवासीय क्षेत्र में जिस तरह से तीन दिनों तक एक तेंदुएं के चलते आतंक मचा रहा और उससे निपटने के लिए वन विभाग की टीम के पास कोई कारगर योजना नहीं दिखाई दी उससे यही पता चलता है कि किसी हिंसक जीव के शहरी क्षेत्र में आ जाने के बाद उसको जान से मार देने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा नहीं है ? तेंदुआ भी संरक्षित प्रजातियों में आता है और उसकी पुलिस की गोली से मरने के बाद वन विभाग अपनी कार्यवाही करने को तत्पर तो दिखाई देता है पर जिस तरह से पुलिस ने अकेले दम पर इस समस्या से निपटने की कोशिश क्या वह वन विभाग के ऊपर बड़ा प्रश्नचिन्ह नहीं लगाती है ? यह सही है कि वहां पर विपरीत परिस्थितियां थीं और उनसे निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन भी उपलब्ध नहीं थे तो आम लोगों की ज़िंदगी को बचाने के लिए कौन आगे आ सकता था ? ऐसी परिस्थिति में वन्य जीवों से निपटने की कोई ट्रेनिंग न होने के बाद भी लखनऊ पुलिस ने अपने स्तर से सभी प्रयास किये और अपनी जान बचाने के लिए तेंदुए को मारने जैसा कदम उठाना पड़ा पर इस पूरे प्रकरण में एक बात सामने आ गयी है कि ऐसी किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए जब सरकार की नाक के नीचे लखनऊ में विभिन्न विभागों के पास कोई कारगर योजना नहीं है तो ग्रामीण क्षेत्रों और संरक्षित क्षेत्रों के आस पास रहने वाले लोगों के लिए क्या किया जा सकता है ?
                          जिस तरह से बढ़ती आबादी का चलते जंगलों को काटा जा रहा है और उसके स्थान पर पेड़ लगाने का काम न के बराबर हो रहा है तो एक दिन ऐसी संघर्ष की स्थिति पूरे देश में जगह जगह पर दिखाई दे सकती है और अधिकांश स्थानों पर बिना ट्रेनिंग के काम करने वाले पुलिस और वन विभाग के लोग अंत में किसी संरक्षित जीव को मारकर अपना काम पूरा करते हुए दिखाई देने वाले हैं. इस बारे में अब संरक्षित वन क्षेत्रों में सभी सम्बंधित विभागों को और भी कठोरता से नियमानुसार काम करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक इन जीवों के लिए स्थान सुरक्षित कर उनके लिए उपयुक्त वातावरण तैयार नहीं किया जाता है तब तक इस तरह का संघर्ष बढ़ता ही जाने वाला है. इस मामले में किसी एक सरकार पर आरोप लगाने से परिस्थितियां बदलने वाली नहीं हैं क्योंकि जब तक मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच इस संघर्ष के उत्पन्न होने वाले कारणों पर रोक नहीं लगायी जाएगी तब तक कुछ भी ठीक नहीं होगा. इस घटना से सीख लेते हुए अब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को एक विस्तृत कार्य योजना पर राज्यों के साथ मिलकर चर्चा करने की आवश्यकता है क्योंकि तभी पूरे देश में वन्य जीवों और मनुष्यों के इस अप्रत्याशित संघर्ष को कम करके रोकने की स्थिति पैदा की जा सकेगी.
                            वन विभाग और लकड़ी माफियाओं के गठबंधन को तोडे बिना इस दिशा में आगे बढ़ पाना संभव ही नहीं है क्योंकि वन के सामान्य पारिस्थितिकी तंत्र तोड़ कर जब हम वन्य जीवों को वहां से निकलने के लिए मजबूर कर रहे हैं तो इस तरह की घटनाएं सामने आती ही रहेंगी. वन विभाग और पुलिस के माध्यम से अवैध वन कटान को रोकने और जहाँ जंगल कम हो गए हैं वहां उनको संरक्षित कर पुनः पेड़ लगाने के काम पर यदि सही तरह से ध्यान दिया जाये तो इन जीवों को अपने क्षेत्र का अतिक्रमण करने की आवश्यकता नहीं पड़ने वाली है. सघन वन क्षेत्रों के आस पास रहने वाले आम नागरिकों को भी इस तरह की किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए सामान्य बातें बताई जानी चाहिए जिससे उनमें व्याप्त होने वाले अनावश्यक भय को दूर रखा जा सके. सरकारें केवल नियम बना सकती हैं पर उन पर अमल करने के लिए जिस इच्छाशक्ति की निरंतरता के साथ आवश्यकता होती है उसमें हम लोगों में पूर्णतः असफल हो जाते हैं. अब इस घटना को ध्यान में रखते हुए वन विभाग की ट्रेनिंग और अन्य परिस्थितियों पर विचार कर इस संघर्ष को समाप्त करने कि दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है.  
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मंगलवार, 21 नवंबर 2017

राष्ट्रीय राजधानी - बिजली और प्रदूषण

                                                         हमारे देश में सरकार चलाने वाले दलों, नेताओं और अधिकारियों को पता नहीं आम लोगों से जुड़े हर सरोकार के बारे में सोचने का मौका कभी मिलता भी है या नहीं क्योंकि पिछले दो दशकों से जिस तरह से जनहित से जुड़े हर मुद्दे पर देश के विभिन्न राज्यों के उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय की तरफ से लगातार स्पष्टीकरण मांग कर आवश्यक निर्देश दिए जाते रहे हैं वे निश्चित तौर पर इस समय में देश चलाने वाली सरकारों और नेताओं के ज़मीनी हकीकत की समझ को ही दर्शाते हैं. ताज़ा मामले में जिस तरह से एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में २४ घंटे बिजली की उपलब्धता सुनिश्चित किये जाने को लेकर केंद्र सरकार को नोटिस जारी की हैं वह आज की स्थिति को ही दर्शाती है क्योंकि एक तरफ एनजीटी के निर्देशों के चलते स्मॉग से निपटने की दिल्ली सरकार की कोशिशें रुक गयी हैं वहीँ केंद्र की तरफ से इस मामले में पूरी उदासीनता बरती जा रही है जो स्थिति को विधायिका से निकाल कर न्यायपालिका तक पहुँचाने की स्थिति उत्पन्न करने वाली है. केंद्रीय मंत्रियों को लगता है कि देश की न्यायपालिका अधिक सक्रियता दिखा रही है जबकि वास्तविकता यह है कि जिन कामों के लिए सरकारों को चुना जाता है वे उनमें पूरी तरह से विफल हो जाती हैं तभी सुप्रीम कोर्ट तक को किसी मामले में हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर होना पड़ता है.
                                  विकास के मामले में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की अवधारणा शुरु किये जाने से पहले ही दिल्ली के आस पास बिजली की अच्छी उपलब्धता के कारण छोटे बड़े उद्योग लगने शुरू हो चुके थे जिसको बाद में नियमित करने और सुनियोजित औद्योगिक विकास के लिए एक कड़ी के रूप में जाना जाता है पर आज उस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की क्या हालत है यह किसी से भी छिपी नहीं है. इस परिस्थिति में यदि एनसीआर को २४ घंटे विद्युत् आपूर्ति की श्रेणी में लाया जा सके तो उससे यूपी हरियाणा में अन्य वैकल्पिक उपायों से होने वाले प्रदूषण से भी आसानी से निपटा जा सकता है. एनसीआर को २४ घंटे बिजली मिले यह कैसे संभव हो सकता है और यह बिजली कोयले के स्थान पर गैस से बन सके तो क्या सरकार इस बारे में कुछ सोच रही है ? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जो सुप्रीम कोर्ट की तरफ से केंद्र सरकार से पूछे गए हैं. आमतौर पर ऐसे सवालों के जवाब आधिकारिक स्तर पर ही खोजे और दिए जाते हैं जिनका धरातल से कोई लेना देना नहीं होता है पर आज जिस तरह से सोलर पॉवर का उपयोग और उपलब्धता बढ़ती जा रही है तो इस परिस्थिति में एनसीआर के साथ पूरे देश के लिए दीर्घकालिक सोलर पॉलिसी बनाये जाने की आवश्यकता आ चुकी है क्योंकि दूर दराज के क्षेत्रों में बिजली का उत्पादन करना और उसे वितरण के लिए लाना अपने आप में ही बहुत बड़ी समस्या बना हुआ है.
                                   निश्चित तौर पर सरकार इस बारे में कुछ सोच रही होगी फिर भी यदि सोलर पॉवर की रूफ टॉप हार्वेस्टिंग के मॉडल को देश में लागू किये जाने पर विचार किया जाये तो आने वाले समय में एनसीआर के साथ देश के हर क्षेत्र में बिजली के संकट और उपलब्धता के मामले में महत्वपूर्ण सफलता पायी जा सकती है. इस पूरे परिदृश्य को बदलने के लिए अब सरकारों की सोलर पॉलिसी के स्थान पर कम से कम १० वर्षीय योजना पर काम अविलम्ब शुरू कर दिया जाना चाहिए. साथ ही सरकारी तंत्र की लूट से मुक्त होने के लिए किसी भी तरह की सब्सिडी को सीधे आवेदक लाभार्थी के खाते में भेजने की व्यवस्था भी होनी चाहिए. घरेलू सोलर प्लांट लगाने के लिए न्यूनतम कागज़ी कार्यवाही के साथ बैंकों को निर्देश दिए जाने चाहिए कि वे ऐसे मामलों को सम्पूर्ण रूप से स्वीकृत कर निपटाने के लिए समय सीमा में रहकर काम करें. इस पॉलिसी में देश में सोलर मॉड्यूल बनाने की व्यवस्था पर मेक इन इंडिया के अंतर्गत अभी से काम शुरू किया जाये जिससे बैंकों से धनराशि उपलब्ध होने की स्थिति में उपभोक्ताओं के पास अच्छे सस्ते और गुणवत्तापरक मॉड्यूल उपलब्ध हो सकें. यह आशा की जा सकती है कि आने वाले समय में हर क्षेत्र में इच्छुक लोगों के यहाँ इस तरह की योजना को पायलट प्रोजेक्ट के रूप चलाकर उसमें आने वाली समस्याओं पर ध्यान दिया जाये जिससे केवल एनसीआर ही नहीं बल्कि पूरे देश के ऊर्जा परिदृश्य को पूरी तरह से बदलने की योजना को सफल किया जा सके.       
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गुरुवार, 13 अक्टूबर 2016

पराली और प्रदूषण

                                                                            हमारे देश में महत्वपूर्ण मुद्दों की तरफ ध्यान न देना अपने आप में एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है क्योंकि इस वर्ष मानसून के अन्तिम चरण में पहुँच जाने और उत्तर भारत के खेतों में धान की कटाई के बाद उसकी पराली को सही तरह से उपयोग करने के लिए जो भी कोशिशें पिछले वर्ष की गयी थीं उनके कोई सकारात्मक परिणाम सामने आते नहीं दिखाई दे रहे हैं. आज एक बार फिर से उत्तर भारत की हवाओं में इस पराली के खेतों में जलाये जाने के चलते प्रदूषण का स्तर बढ़ना शुरू हो चुका है और जिस तरह से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में फसल को काटने के बाद आवश्यकता से अधिक बची हुई पराली को खेतों में ही जलाने का काम शुरू हो चुका है वह अपने आप में चिंतनीय भी है. इस मामले में पिछले वर्ष जिस तरह से सक्रियता दिखाई गयी थी इस वर्ष सभी पक्ष चुप और लापरवाह ही दिखाई दे रहे हैं जिससे दिल्ली जैसे महानगरों के साथ उत्तर भारत के अन्य बड़े शहरों के साथ गांवों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा तो बनना शुरू ही हो चुका है. देश की समस्या यह है कि हमारी नीतियों में समय से काम करने और विभिन्न सरकारी विभागों और सरकारों के समन्वय की जो रूपरेखा है वह केवल कागज़ी खानापूरी तक ही सीमित रह गयी है पर भारत ने जिस तरह से जलवायु परिवर्तन के समझौते पर सहमति दिखाई है तो आने वाले समय में पराली भी हमारे लिए एक बड़ी समस्या का कारण बन सकती है.
                      सबसे पहले हमें इस बात पर विचार करना होगा कि पहले के मुक़ाबले अब पराली की समस्या इतनी विकराल क्यों होती जा रही है क्योंकि देश में खेती हमेशा से ही होती रही है पर यह समस्या के रूप में अब हमारे सामने आनी शुरू हुई है. पिछले कुछ दशकों में जिस तरह से खेती का आधुनिकीकरण हुआ है उसके चलते गांवों में पशुओं की संख्या में कमी आनी शुरू हुई है और पहले जो किसान खेती के साथ पशुधन को भी एक समानांतर अर्थ व्यवस्था के रूप में चलाते थे आज वे अन्य कामों की तरफ मुड़े हुए दिखाई देते हैं जिससे खेती में अनाज के अतिरिक्त होने वाले अन्य पदार्थों का उपयोग पशुओं के लिए कम होने लगा है. खेती के आधुनिकीकरण से जहाँ पैदावार में बढ़ोत्तरी हुई वहीं अनाज के अतिरिक्त उसके अन्य पदार्थों के उपयोग के सही तरह से निस्तारण के बारे में कोई स्पष्ट नीति नहीं बनायीं गयी जिसके चलते अपनी आवश्यकता से अधिक पराली को किसानों द्वारा खेतों में ही जलाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गयी. एक संसय जब यह सीमित मात्रा में थी तो इस पर किसी का ध्यान भी नहीं जाता था पर आज जब अधिकांश किसानों की तरफ से अनावश्यक पराली ने निपटने के लिए यह तरीका अपनाया जाने लगा है तो इसका पूरे वायु मंडल में हवा की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ने लगा है.
              इस बारे में सबसे पहले यह विचार किया जाना चाहिए कि खेती के इस तरह के पदार्थों का किस तरह से निस्तारण करना उचित है और यदि इसके बारे में कोई कारगर प्रक्रिया बनाई जा सके तो आने वाले समय में इसका दोहरा लाभ भी किसानों को मिल सकता है. अपनी आवश्यकता से अधिक पराली को किसानों को जलाने से रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर सरकार और पंचायतों को इसके माध्यम से खाद बनाने और अन्य कामों में उपयोग करने के बार में स्पष्ट और कारगर नीति की आवश्यकता है. एक अनुमान के अनुसार भारत में लगभग ५० टन पराली होती है जिसमें से केवल आधी ही उपयोग में लायी जाती है शेष को खेतों में ही जला दिया जाता है ऐसी स्थिति में जब किसानों को पराली से निपटने का कोई कारगर रास्ता नहीं मिलता है तो वे इसे जलाकर अपने खेतों को खाली करने का काम किया करते हैं. सरकार को अब इस समस्या से निपटने के लिए कुछ ठोस प्रारूप बनान ही होगा जिससे आने वाले समय में इसका सही उपयोग किया जा सके और किसानों को कुछ लाभ के अलावा देश के पर्यावरण को सही रखने में मदद भी मिल सके.
               चीन में इस समय से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर बायो एनर्जी के साथ जैविक खाद बनाने में भी इसका उपयोग किया जाता है जिससे पर्यावरण को नुकसान भी नहीं होता और किसानों को कुछ अतिरिक्त लाभ भी मिल जाता है. हमारे देश में इस प्रक्रिया को यदि पूरी तरह से सरकारी योजना के रूप में लागू किया गया तो इसके चल पाने की संभावनाएं कम ही दिखाई देती हैं क्योंकि हर स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार से योजना के लिए आवंटित धन की बंदरबांट तो आसानी से हो जाएगी पर जिस उद्देश्य से इसे शुरू किया जायेगा वह पूरा नहीं हो पायेगा. प्रायोगिक तौर पर अगले वर्ष से इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए सरकार को आधारभूत ढांचा अभी से बनाने के बारे में अभी दे सोचना होगा इसका जैविक खाद के रूप में उपयोग करना सबसे आसान विकल्प होगा क्योंकि इसे ब्लॉक स्तर पर भी कम लागत से छोटे कारखाने लगाकर तैयार करने की कोशिशें की जा सकती हैं. हर जिले में एक केंद्रीय स्थान को खोजकर वहां पर जैविक खाद और बायो एनर्जी के बड़े प्लांट लगाकर भी इसका उपयोग किया जा सकता है. यदि अभी से इसके बारे में सीधे किसानों को दोषी बनाने के स्थान पर उनको जागरूक कर इसके बारे में सही तरह से निस्तारण की जानकारियां दी जाएँ तो पंजाब और हरियाणा के किसान इससे भरपूर लाभ भी उठा सकते हैं. अच्छा हो कि आने वाले समय में इस पराली से स्वच्छ ऊर्जा और जैविक खाद बनाने की दिशा में देश और आगे बढ़ जाये जिससे किसानों की खुशहाली के साथ पर्यावरण की रक्षा भी अच्छी तरह से हो सके.
                   
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शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

यूपी-अवैध खनन की सीबीआई जाँच

                                                                                     लंबे समय से गैर कानूनी कार्यों को नेताओं और अधिकारयों की मदद से लगातार संगठित रूप से चलाने में माहिर यूपी के खनन माफियाओं के लिए इलाहबाद हाई कोर्ट की तरफ से एक बड़ा झटका लगा है जिसमें कोर्ट ने यूपी के मुख्य सचिव के हलफनामें से पूरी तरह असंतुष्ट होते हुए इससे सम्बंधित  सारे मामलों की जाँच सीबीआई को सौंप दी है. प्रदेश भर में चल रहे इस कार्य को रोकने के लिए दायर की गयी विभिन्न जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते समय कोर्ट ने सरकार से यह पूछा था कि प्रदेश में अवैध खनन की क्या स्थिति है इस पर जो जवाब आया उससे कोई भी सहमत नहीं दिखा क्योंकि सरकार की नाक के नीचे लखनऊ में भी अवैध खनन होता है पर सरकार ने पूरे प्रदेश के बारे में ही एक रिपोर्ट लगा दी कि अधिकारियों और गठित की गयी टीमों की रिपोर्ट के अनुसार कहीं भी अवैध खनन की कोई सूचना नहीं है. निश्चित तौर पर यह ऐसा जवाब था जिस पर हाई कोर्ट को गुस्सा आना ही था और उसकी प्रतिक्रिया इतनी अधिक होगी कि मामला सीबीआई को सौंप दिया जायेगा इसकी कल्पना तो सरकार ने भी नहीं की थी.
                                   सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में जिस तरह से नदियों का संजाल बिछा हुआ है उसके चलते ही लगभग हर दूसरे जिले में अवैध खनन की भरपूर संभावनाएं मौजूद हैं और जिन ज़िलों में नदियां नहीं बहती हैं वहां विकास कार्यों के लिए मानकों को ताक पर रखकर मिटटी का भरपूर खनन किया जाता है और कई बार तो गरीब किसानों के खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी खनन माफियाओं द्वारा खोद ली जाती है तथा किसान कुछ भी नहीं कर पाता है ऐसी परिस्थिति में सरकार और स्थानीय प्रशासन से किसान को कोई मदद नहीं मिल पाती है और वह दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हो जाता है. इस तरह के परिवेश में यदि हाई कोर्ट की तरफ से ऐसा कहा जा रहा है तो निश्चित तौर पर ही यह प्रदेश के लिए अच्छा ही साबित होने वाला है क्योंकि अब इस अवैध खनन पर काफी हद तक लगाम लगाए जाने की दिशा में सही प्रयास उठाये भी जा सकते हैं. हर महत्वपुर्ण मामले में यदि कोर्ट का हस्तक्षेप इतना आवश्यक हो गया है कि आज विधान सभाओं और संसद की प्रासंगिकता पर भी सवालिया निशान लगता दिखाई देता है विधायिका की तरफ से पूरी शक्तियां मिलने के बाद भी इस तरह से अनिर्णय की स्थिति किसी भी तरह से अच्छी नहीं कही जा सकती है.
                                     खनन पूरे देश में ही एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आया है इससे निपटने के लिए नए कानूनों की नहीं बल्कि जो कानून मौजूद हैं उनको सही तरह से लागू करने की आवश्यकता है क्योंकि राजनैतिक इच्छाशक्ति न होने के कारण ही आज खनन माफियाओं के हौसले इतने बढे हुए हैं. इस सबके जड़ में असली समस्या निचले स्तर के पार्टी कार्यकर्ताओं की है क्योंकि उनके आर्थिक हितों को साधने के लिए विभिन्न दलों के पास कोई विकल्प नहीं होता है इसलिए ही सत्ताधारी पार्टियों द्वारा अपने विधायकों-सांसदों के माध्यम से कार्यकर्ताओं को इस अवैध खनन के द्वारा ही साधने का काम किया जाता है. लगभग हर प्रदेश और हर दल की सरकार को यह सब पता है पर कोई भी मुख्यमंत्री अपने स्तर से इसे रोकने का कोई प्रयास करता भी नहीं दिखाई देता है जिससे इन अवैध खनन माफियाओं को अपना काम करने की पूरी छूट भी मिल जाती है. अब समय आ गया है जब कोर्ट के प्रयास से ही सही पर इन सभी पर लगाम कसी जा सकती है और आर्थिक अपराधों के साथ पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने में भी सफलता मिल सकती है पर यह सब केवल कोर्ट पर ही छोड़ने के बजाय यदि राजनेता ही अपने स्तर से इच्छाशक्ति दिखाएँ तो सारा कुछ बहुत आसान हो सकता है तथा कोर्ट का बहुमूल्य समय भी बच सकता है.  
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बुधवार, 13 अप्रैल 2016

ट्रेनों की पॉवर कार का विकल्प

                                                     देश में राजधानी, शताब्दी श्रेणी की महत्वपूर्ण ट्रेनों को बिजली आपूर्ति बनाए रखने के लिए अभी तक जिस तरह से दो पॉवर कार्स का उपयोग करना रेलवे की मजबूरी होती थी अब उससे निजात पाने के लिए आरडीएसओ लखनऊ द्वारा खोजी गयी नयी तकनीक से ट्रेन खींचने वाले डीज़ल इंजन से ही बिजली आपूर्ति किये जाने का सफल परीक्षण किया जा चुका है जिससे रेलवे के पास इन ट्रेनों में दो कोच बढ़ाये जाने के विकल्प खुलते हुए नज़र आ रहे हैं. इससे पहले बिजली से चलने वाले ५००० श्रेणी के इंजन का सफलतापूर्वक विकास करने के बाद उसका कालका शताब्दी में परीक्षण भी किया जा चुका है जो अपने आप में पूरी तरह से खरा साबित हुआ है. इस नयी तकनीक के विकास के बाद जिस तरह से इन नयी श्रेणी के इंजनों का उपयोग कर इन महत्वपूर्ण गाड़ियों का परिचालन और भी कुशल तरीके से बेहतर क्षमता के साथ किया जा सकेगा वहीं यात्रियों के लिए कुछ अतिरिक्त सीट्स की व्यवस्था किये जाने में भी सफलता मिल सकेगी. प्रयोग के तौर पर जिस तरह से ट्रेनों की छतों पर सोलर पैनल लगाए जाने काम भी शुरू किया गया है उससे भी काफी हद तक गाड़ियों के दिन में सञ्चालन के समय ऊर्जा बचत के लक्ष्य को पाने में मदद ही मिलने वाली है.
                                                     पिछले दो दशकों से देश में जिस स्तर पर नयी तकनीक और आरामदायक कोचों के निर्माण की तरफ ध्यान देना शुरू किया गया और उसके लिए विदेशों की कम्पनियों के साथ समझौते कर उनको देश में तकनीक हस्तांतरित करने के साथ बनाने की नीति पर काम शुरु किया गया उसके बाद ट्रेन का सफर आरामदायक तो हुआ है पर इस क्षेत्र में जिस स्तर पर अनुसन्धान किये जाने चाहिए हमारी आरडीएसओ उसमें कहीं से पिछड़ती हुई नज़र आती है. निश्चित रूप से यह संस्था अपने आप में बहुत ही अच्छा काम कर रही है पर इसे जितने व्यवसायिक स्तर पर प्रयास करने चाहिए वे अभी तक अनुसन्धान के क्षेत्र में नहीं दिखाई देते हैं अब इसे और भी परिश्रम के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है जिससे भारतीय रेल के सफर को और भी सुरक्षित और आरामदायक बनाने में इसकी भूमिका और क्षमता का दोहन किया जा सके. अपने आप में अब इस संस्था को सरकारी विभाग की कार्य संस्कृति से बाहर निकलना ही होगा क्योंकि इसरो जैसी सरकारी कम्पनी भी आज अपने दम पर पूरे विश्व में नाम कमा रही है.
                                                इस नए इंजन के विकास से जहाँ राजधानी और शताब्दी ट्रेनों की कुशलता बढ़ाने में मदद मिलने वाली है वहीं इनके परिचालन और रखरखाव पर भी रेलवे का खर्च कम होने वाला है. अभी तक जहाँ नियमित रूप से पूरी यात्रा के दौरान दो पॉवर कार्स ऑन रहा करती थीं और उनको देखने के लिए अतिरिक्त स्टाफ भी रखना पड़ता था अब यह आवश्यक ऊर्जा इंजन से ही मिल जाने के बाद पॉवर कार्स के स्टाफ को कम किया जा सकेगा साथ ही दो अतिरिक्त कोचों के लगने से रेलवे की आमदनी में भी बढ़ोत्तरी हो सकेगी. इस दिशा में अब सोलर एनर्जी के भरपूर दोहन के माध्यम से रेलवे को अपनी बचत के नए आयाम खोजने की आवश्यकता भी है क्योंकि यदि दिन के समय ही ट्रेनों को सूरज की ऊर्जा पर चलाया जा सकेगा तो दिन में चलने वाली हज़ारों गाड़ियों में करोड़ों रुपयों की बचत होना शुरू हो जाएगी. रेलवे के अनुसन्धान प्रकल्प को अब पुरानी तकनीक के स्थान पर आधुनिकतम तकनीक की तरफ ध्यान लगाना ही होगा जिससे वे अपने इन नए उत्पादों को भारतीय रेल में उपयोग करने के बाद इनके बड़े पैमाने पर निर्माण और निर्यात के बारे में भी सोचना शुरू कर सके. नयी तकनीक के माध्यम से जहाँ आरडीएसओ रेलवे को सहारा दे सकेगा वहीं आने वाले समय में अपने व्यापार से देश के लिए विदेशी मुद्रा भी अर्जित कर सकेगा.         
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शुक्रवार, 11 दिसंबर 2015

उत्तर भारत का कोहरा

                                                                      हर वर्ष की तरह इस बार भी सर्दियों के मौसम की शुरुवात के साथ ही देश के यातायात पर कोहरे की मार पड़नी शुरू हो चुकी है जिससे सड़क तथा हवाई दोनों ही मार्गों से उत्तर भारत में यात्रा करने वाले सभी लोग परेशान भी हैं. यह एक ऐसी प्राकृतिक समस्या है जिससे चाहकर भी पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता है और आने वाले समय में जिस तरह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते हुए प्रदूषण का भी असर इन सब पर दिखाई देना शुरू हो चुका है तो उस परिस्थिति में समस्याएं और भी अधिक बढ़ने की तरफ ही जा रही हैं. देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं का स्वरुप इस कोहरे के मौसम में और भी घातक हो जाता है क्योंकि लगभग पूरा उत्तर भारत ही इसकी चपेट में रहता है जिससे सरकारी और नागरिक स्तर पर की जाने वाले ढेरों लापरवाहियों के चलते ये दुर्घटनाएं बढ़ती ही जाती हैं. देश में यही समय गन्ने की ढुलाई का भी होता है जिसके चलते सड़कों पर बैलगाड़ी से लेकर हर तरह के सुस्त और तेज़ गति वाले वाहन भी गर्मियों के मुकाबले अधिक संख्या में आ जाते हैं जिससे भी दुर्घटनाएं बढ़ने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं.
                              कोहरे के कारण सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए सरकार और नागरिक किस स्तर पर प्रयास कर सकते हैं यह सोचने का विषय है क्योंकि जब हम कोहरे को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं तो हमें उससे बेहतर तरीके से निपटने के बारे में सोचना ही होगा जिससे लापरवाही के कारण होने वाले नुकसान को काम करने में मदद की सके और अनमोल जिंदगियों को भी असमय काल के गाल में जाने से रोका जा सके. हमारे देश में परिवहन विभाग में भी जिस स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ा हुआ है उससे भी कई स्तरों पर कठिनाइयां ही होती रहती हैं क्योंकि यदि परिवहन विभाग और यातायात पुलिस की तरफ से अपने कर्तव्य का निर्वहन किया जाने लगे तो आने वाले समय में लापरवाही से होने वाली दुर्घटनाओं को पूरी तरह से रोका भी जा सकता है. आज सड़क परिवहन के लिए जितने बड़े पैमाने पर सुधार करने की बातें की जा रही हैं यदि उनको धरातल पर उतारने में थोड़ी भी सफलता मिल सके तो सड़क यातायात को और भी सुरक्षित किया जा सकता है कानून बनाने से अधिक उनके सही अनुपालन पर देश पता नहीं कब ध्यान देना शुरू कर पायेगा क्योंकि इससे सीधे जानमाल का नुकसान जुड़ा रहता है.
                             नागरिकों के रूप में हम सभी को अपने वाहनों में हर उस सुरक्षा तंत्र को इस मौसम में पूरी तरह से सही रखने की आवश्यकता है क्योंकि सड़कों पर चलते समय गाड़ियों में उजाले के साथ सही रिफ्लेक्टर न होने के कारण ही अधिकांश दुर्घटनएं होती रहती हैं. सड़क पर चलने वाले हर निजी, व्यावसायिक वाहन के साथ राज्य परिवहन की बसों में सुरक्षा व्यवस्था सही स्तर पर की जानी चाहिए और इन पर चलने वाले लोगों की ही यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए की किसी भी खराबी को वे तुरंत ही दुरुस्त करवाने की कोशिश भी करें. आमतौर पर परिवहन निगमों की बसों का हाल बहुत ही ख़राब रहा करता है जबकि देश के हर हिस्से में ये बड़ी संख्या में चलती रहती हैं इसलिए इनमें रात के साथ कोहरे में भी चलने की सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की जानी चाहिए. सड़कों पर लम्बी दूरी तक माल ढोने वाले ट्रक आम तौर पर सही होते हैं पर स्थानीय स्तर पर चलने वाले पुराने ट्रक किसी भी मानक पर खरे नहीं उतरते हैं. हमें आम् नागरिकों के रूप में भी अपने वाहनों को सही रखने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि सरकार हर बात पर नियंत्रण नहीं रख सकती है साथ ही पुलिस के साथ मिलकर नवम्बर से जनवरी तक हर माह विद्यालयों से लेकर सड़कों तक इस बारे में लोगों को जागरूक करने की कोशिशें भी जनता के सहयोग से की जानी चाहिए जिससे हमारी सड़क यात्रायें सुखद हो सकें.      
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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

भारत - व्यापार का एक और बुरा दौर

                                                        पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न नीतिगत तथा राजनैतिक दलों की व्यक्तिगत लालसाओं के चलते जिस तरह से देश की आर्थिक गतिविधियों की दिशा को लेकर बहुत अधिक भ्रम बना रहा है आज संभवतः उसी के चलते पीएम मोदी को दुनिया के महत्वपूर्ण देशों में घूमकर यह दर्शाना पड़ रहा है कि भारत में कारोबारियों के लिए आज भी बहुत अच्छा माहौल है. भारत में देश के विकास और समाज के उत्थान से जुड़े हुए मुद्दों पर भी जिस तरह से राजनीति होती रहती है संभवतः देश की नकारात्मक छवि बन जाने के पीछे उसका भी बहुत बड़ा योगदान रहा करता है क्योंकि मोदी ने अपने गुजरात के सीएम के कार्यकाल में जिस तरह से नए आर्थिक सुधारों की पैरोकारी की थी वे आज भी उसके लिए प्रयत्नशील दिखाई दे रहे हैं पर उस समय की भाजपा ने मनमोहन सरकार को हर तरह से रोकने की जो गलतियां की थीं उसके चलते मोदी का काम बहुत बढ़ा हुआ लगता है क्योंकि जिन नीतियों को मनमोहन सरकार देश की परिस्थितियों के अनुसार धीरे धीरे बदलना चाहती थी आज मोदी सरकार उन्हें एक झटके में बदलने के लिए लालायित दिखाई देती है पर संघ, भाजपा और उसके मजदूर संगठनों के साथ अब कांग्रेस भी इन मुद्दों पर सरकार के साथ खड़े नहीं होना चाहती है.
                                     संसद के शीतकालीन सत्र के पहले संसद की दो दिनों की विशेष बैठक में जिस तरह से पीएम मोदी ने अपनी लम्बी उपस्थिति दिखाई वह अच्छा संकेत है क्योंकि आज अन्य व्यस्तताओं के चलते पीएम के पास इतना समय ही नहीं होता है कि वे पूरा दिन सदन में गुजर सकें जिसका सीधा असर सदन की विधायी गतिविधियों पर भी दिखाई देता है. पीएम का यह परिवर्तन समाज को यह सन्देश देने की कोशिश भी हो सकता है कि भाजपा भी डॉ आंबेडकर का बहुत सम्मान करती है क्योंकि बिहार में जिस तरह से पिछड़ों के महागठबंधन ने भाजपा के सारे समीकरणों को ध्वस्त कर दिया है यह खुद पीएम की समझ में भी आ रहा है. केवल राजनैतिक लाभ लेने के लिए जिस तरह से बिहार में चुनाव को अगड़े पिछड़े से लगाकर हिन्दू मुस्लिम ध्रुवीकरण तक की कोशिशें की गयीं वह किसी से भी छिपा नहीं है उसके अपेक्षित परिणाम न आने से भाजपा में बेचैनी बढ़ चुकी है क्योंकि यदि इस तरह के प्रयोग के लिए बसपा ने यूपी में कोई समझदारी भरा ऐसा ही अप्रत्याशित कदम उठा लिया तो भाजपा के लिए वहां का वनवास और भी लम्बा हो सकता है. लोकसभा चुनावों से पूरी तरह से अलग होने के कारण विधान सभा चुनावों में प्रदर्शन करने का दबाव अब भाजपा पर ही अधिक है.
                                 अंतर्राष्ट्रीय मोर्चों से आ रहे संकेतों से यही लग रहा है कि दुनिया में मंदी एक बार फिर से अपने प्रभाव को दिखाने वाली है बेशक कोई भी भारतीय नेता कुछ भी कहता रहे पर इस सत्य से किनारा नहीं किया जा सकता है कि देश पर भी मंदी का प्रभाव दिखाई दे रहा है. मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन दोनों क्षेत्रों में जिस तरह से नेगेटिव ग्रोथ ने फरवरी २०१४ के स्तर से नीचे को छू लिया है तो यह बेहद चिंता का विषय है केवल सेवा क्षेत्र में ही सुधार दिखाई दे रहा है पर उसके भरोसे अर्थव्यवस्था को संभाला तो नहीं जा सकता है. पिछले तीन फसलों के चक्र में विपरीत मौसम से घटते उत्पादन से अब मोदी सरकार को चिंतित होने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक देश के गांवों में रहने वाली ७०% आबादी के पास आमदनी के संसाधन नहीं होंगें तब तक देश के उत्पादन के उपभोक्ता कहाँ से आयेंगें ? जिस चीन मॉडल को गुजरात में लागू कर मोदी ने कोशिशें शुरू की थीं आज वह खुद ही संकट में घिरा हुआ है तो इस परिस्थिति में क्या सुधारों को एकदम से लागू करना देशहित में रहेगा यह बताने और समझने वाला कोई भी नहीं है. प्रचंड बहुमत के साथ राज्यसभा की मजबूरी ने जिस तरह मोदी सरकार पर लगाम लगा रखी है वह एक तरह से ठीक ही है क्योंकि अंधानुकरण में लागू किये गए सुधारों से भारत का कोई भला नहीं होने वाला है.   
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सोमवार, 17 अगस्त 2015

सौर ऊर्जा की मिसाल कोच्चि हवाई अड्डा

                                                        देश की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जिस तरह से सरकारें विभिन्न स्तरों पर प्रयास कर रही हैं उससे आने वाले समय में बहुत ही अच्छे परिणाम सामने आने की आशा दिखाई देने लगी है. आज भी देश की सौर क्षमता का सही तरह से दोहन नहीं किया जा पा रहा है जिससे कोयले और बिजली आधारित बहुत बड़े ऊर्जा संयत्रों पर ही देश की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए निर्भर होना एक मजबूरी ही बनी हुई है. इस दिशा में कोच्चि हवाई अड्डे ने पूरे देश को एक राह दिखाने की कोशिश करते हुए आदर्श भी स्थापित किया है क्योंकि यह देश का पहला हवाई अड्ड़ा बन गया है जो अपनी बिजली आवश्यकता के लिए पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर निर्भर हो चुका है. इस काम की शुरुवात २०१३ में हवाई अड्डे के आगमन टर्मिनल पर १०० किलोवाट बिजली पैदा करने लायक एक संयंत्र लगाकर की गयी थी फिर ४०० सोलर पैनल के साथ बने इस संयंत्र की क्षमता साल भर में बढ़ा कर १,००० किलोवाट कर दी गई इसके बाद यहां १२ मेगावाट क्षमता का संयंत्र लगाया गया इसके लिए ४५ एकड़ ज़मीन पर ४६,१५० सौर पैनल लगाए गए और आज इसका ऊर्जा में आत्मनिर्भर होने का सफर इस तरह से आगे बढ़ा है.
                                               यदि देश के अन्य हवाई अड्डे भी इस तरह से सोचना शुरू करें तो आने वाले समय में इस दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है कोच्चि हवाई अड्डे और केरल सरकार ने रिकॉर्ड छह महीने में इसे स्थापित कर एक बहुत ही प्रभावशाली काम भी किया है क्योंकि आज भी बिजली के लिए देश के सभी उपभोक्ता राज्य विद्युत निगमों पर ही निर्भर हैं और इस मामले में केरल सरकार ने तेज़ी दिखाते हुए समझौते को आगे बढ़ाते हुए एक मानक स्थापित कर दिया है. इस संयंत्र से उत्पादित बिजली केरल बिजली बोर्ड को जाएगी जिसे कोच्चि हवाई अड्डा बोर्ड से अपनी आवश्यकता के अनुरूप वापस खरीद लेगा. लगभग ६५ करोड़ रूपये की लागत से बने इस संयंत्र के माध्यम से जहाँ १२ मेगावाट बिजली बनेगी वहीं एक अनुमान के अनुसार इससे लगभग १.७५ लाख मीट्रिक टन कार्बन उत्सर्जन को भी कम किया जा सकेगा. किसी भी तरह के प्रदूषण से मुक्त और पर्यावरण के लिए उपयोगी साबित होने वाली इस परियोजना को यदि देश के हर हवाई अड्डे पर लगाने के बारे में राज्य सरकारें प्रयास करें तो आने वाले समय में सहभागिता के नए आयाम स्थापित होने के साथ हरित ऊर्जा की दिशा में भी देश को बढ़ाया जा सकेगा.
                       यह राज्य और केंद्रीय विभागों के बीच सामंजस्य का एक बहुत ही अच्छा उदाहरण भी कहा जा सकता है जहाँ दोनों पक्षों ने मिलकर बहुत तेज़ी से इस काम को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ने में सफलता भी पायी है. आज भी नीतियों के स्तर पर जिस तरह से विभिन्न विभागों के बीच बहुत अधिक रोड़े अटकाए जाते हैं उससे भी देश की प्रगति में बाधा आती है. यह योजना आावश्यकता और जगह की उपलब्धता के आधार पर लगभग हर राज्य में शुरू की जा सकती है साथ ही रेलवे स्टेशनों और  बस अड्डों पर भी इस तरह से सौर ऊर्जा आधारित संयंत्रों की स्थापना की जा सकती है इससे जहाँ ऊर्जा क्षेत्र में निवेश भी विभिन्न स्तरों से आने लगेगा वहीं राज्य के बिजली विभागों पर पड़ने वाले दबाव को भी कम किया जा सकेगा. देश के लिए आज जो भी योजनाएं महत्वपूर्ण हैं उनको अविलम्ब लागू करने के बारे में सरकारों को सोचना ही होगा जिससे देश में उपलब्ध सौर ऊर्जा का सही तरीके से दोहन भी किया जा सके और देश को हरित ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ाया जा सके. इसके लिए केवल सरकारी प्रयास ही नहीं बल्कि आम लोगों को भी अपने घरों की छतों पर आावश्यकता के अनुसार छोटे सौर संयत्र लगाने के लिए नीतियों को सुधारने की ज़रुरत है जो देश में सौर ऊर्जा पर निर्भरता और इससे जुड़े हुए उद्योग के लिए बहुत ही अच्छे स्तर पर लाभ देने की स्थिति तक पहुँच सकता है. 
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रविवार, 12 जुलाई 2015

"स्वच्छ भारत अभियान" के सच्चे दूत

                                                             पिछले वर्ष पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान चलाये जाने के साथ ही देश में सफाई को लेकर कुछ जागरूकता आने के बाद अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना शेष है क्योंकि जिन लोगों ने केवल राजनैतिक कारणों के लिए ही इस अभियान के साथ जुड़ना शुरू किया था आज वे कहीं पर भी दिखाई नहीं दे रहे हैं और धरातल पर परिवर्तन कहीं से भी दिखाई नहीं दे रहा है. देश की सफाई केवल इंटरनेट पर पोस्ट करके नहीं हो सकती है इस बात को समझने के लिए अभी देश का जनमानस तैयार भी नहीं दिखता है. सफाई से जुड़े हुए सच्चे सपूतों के बारे में मीडिया भी कुछ अच्छी ख़बरें देना नहीं चाहता क्योंकि आज मीडिया का अधिकांश हिस्सा केवल राजनैतिक चाटुकारिता और विज्ञापन हासिल करने तक ही सिमटा हुआ है. ऐसे में पंजाब के कपूरथला से एक बेहतर खबर सामने आई है जिसके बारे में पूरे देश को जानना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि यह एक ऐसा उदाहरण है जिसमें पंजाब पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर सुखविंदर सिंह की कोशिश से थाने के आस पास लगभग ३५ किमी की दूरी तक सफाई के हर मानक पूरे दिखाई देने लगे हैं और वह भी बिना किसी प्रचार और सरकारी सहायता के जिसे अपने आप में बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है.
                                                     एक घटना पर यदि कोई एक व्यक्ति ही गंभीरता के साथ सोचना शुरू कर दे तो किस तरह से पूरे इलाके की सोच बदल सकती है इस बात को सब इंस्पेक्टर सुखविंदर सिंह ने पूरी तरह सच साबित कर दिया है नकोदर में २०१३ में एक वन और ट्रक के बीच हुई टक्कर में १८ छात्रों की मौत हो गयी थी जिसके बाद सुखविंदर सिंह ने इस तरह की घटनाओं को पूरी तरह से रोकने की ठान ली थी और इसके लिए उन्होंने सड़क के किनारे लगी हुई झाड़ियों और उगने वाले पौधों को पूरी तरह से साफ़ करने का बीड़ा उठाया था.इस काम के लिए उन्होंने अपने स्तर पर प्रयास शुरू करते हुए ग्राम पंचायतों को यह समझने में सफलता पायी कि इन सबके चलते ही सड़कों पर बड़ी दुर्घटनाएं होती रहती हैं. उनके इस प्रयास का सभी सम्बंधित ग्राम पंचायतों ने पूरी तरह से समर्थन किया और अपने क्षेत्रों में पड़ने वाली सभी सड़कों कि किनारे उगने वाले झाड़ झंखाड़ को पूरी तरह से हटाने का प्रयास शुरू कर दिया जिसका नतीजा आज यह है कि सड़क के किनारे साफ हुए होने से वाहन चालक भी को आसपास के यातायात पर भी अच्छी नज़र रख पाने में में सहायक हुए जिससे इस तरह से होने वाली दुर्घटनों को काफी हद तक रोका भी जा सका है.
                                                   सुखविंदर सिंह ने अपने प्रयास यही पर नहीं रोके और हर थाने में पुलिस कर्मियों के लिए उचित शौचालयों की व्यवस्था करने के बारे में भी निर्णय लिया और पीपीपी के आधार पर जनता से सहयोग लेकर थानों में शौचालयों के निर्माण की दिशा में भी कदम उठाने शुरू किये जिससे आज तक उन्हें १०७ शौचालयों के निर्माण में सफलता मिल गई है और उनका यह काम निरंतर ही आगे बढ़ता जा रहा है. सामान्य पुलिस कर्मियों के लिए थानों में शौचालयों की समुचित व्यवस्था न होने की दशा में उनका यह प्रयास पुलिस कर्मियों के लिए एक वरदान बनकर सामने आया है. क्या पंजाब और केंद्र सरकार को उनके इस कार्य को एक मानक मान कर पूरे देश में सडकों की सफाई और अन्य स्वच्छता अभियान से जुड़े हुए मसलों पर एक व्यापक कार्य योजना नहीं बनानी चाहिए ? बेहतर योजनाएं केवल नीति आयोग में ही नहीं बन सकती हैं देश के आम नागरिक भी आवश्यकता पड़ने पर अपने लिए कोई न कोई मार्ग निकाल ही लिया करते हैं पर इन बातों का मीडिया में सही प्रचार नहीं हो पाता है जिससे इन अच्छे कार्यों से अन्य लोगों को इनका अनुसरण करने की प्रेरणा भी नहीं मिल पाती है. अच्छा है कि पंजाब पुलिस ने अपने इस योद्धा का इस बार स्वतंत्रता दिवस पर सम्मान करने का प्रयास भी शुरू कर दिया है जो कि आने वाले समय में और लोगों को जागरूक करने का काम भी करने वाला है.
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शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान

                               यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल और देश की दूसरी ऊंची छोटी के साथ बसे उत्तराखंड स्थित नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान की यात्रा कर लौटे हुए विशेषज्ञों की रिपोर्टों के आधार पर पर्यावरण और पारिस्थितिकी के बारे में सुखद समाचार मिलना एक अच्छी बात है. एक समय इस क्षेत्र में मानवीय गतिविधियों के बहुत अधिक हो जाने के कारण यहाँ पर पाये जाने वाले जीव जंतुओं की संख्या में तेज़ी से गिरावट होने लगी थी और एक बार तो ऐसा लगने लगा था कि विश्व के सामने अब इस सुन्दर स्थान को दोबारा उस स्थिति में नहीं लाया जा सकेगा. इन्हीं चिंताओं के बीच १९८३ में केंद्र सरकार ने नंदा देवी राष्ट्रीय उद्यान में हर तरह की मानवीय गतिविधि पर रोक लगा दी थी और उस रोक का क्या परिणाम सामने आ रहा है उसको जांचने के लिए १९९३ में पहली बार और फिर उसके बाद २००३ की संक्षिप्त यात्रा के बाद इस वर्ष जून जुलाई में ३१ सदस्यीय टीम की रिपोर्ट अपने आप में बहुत ही अच्छी मानी जा सकती है क्योंकि सरकार की तरफ से रोक लगाये जाने के सकारात्मक परिणाम सामने आने शुरू हो चुके हैं.
                           वर्ष १९९३ में पार्क में गई टीम की रिपोर्ट से तुलना करें तो इस बार हिम तेंदुआ, काला भालू, कस्तूरी मृग, भरल, हिमालयन थार, सेराव, रेड फॉक्स, बीजे के अलावा पक्षियों की करीब १३० प्रजातियां, जिसमें मोनाल, कोकलास, स्नो कोक आदि भी देखे गए तथा वनस्पतियों की करीब ४०० प्रजातियां देखी गयी. इस रिपोर्ट के बाद अब केंद्र और राज्य सरकारों के पास अपनी धरोहरों को भविष्य के लिए बचाये रखने के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने के बारे में भी अब आसानी होने वाली है. ऐसा नहीं है कि देश में इस तरह के प्राकृतिक स्थान नहीं हैं पर जनता में जागरूकता और भ्रष्टाचार के चलते इससे जुड़े हुए लोगों द्वारा ही इन स्थानों को अधिक नुकसान पहुँचाया जाता रहता है. इस उत्साहवर्धक रिपोर्ट के बाद क्या सरकार इस तरह से अन्य स्थानों को सुरक्षित रखने के लिए इस तरह के कदम उठाने के बारे में सोचना शुरू करेगी या मानवीय गतिविधियों को कुछ कड़ी शर्तों के साथ चलने देने की अनुमति प्रदान करना चाहेगी यह तो आने वाले समय में ही पता चल पायेगा.
                        आज भी इसी तरह की स्थिति में पहुंचे देश के बहुत सारे अन्य प्राकृतिक स्थानों के बारे में अब केंद्र और राज्य सरकारों को मिल-जुल कर कुछ सोचना होगा जिससे मानवीय हस्तक्षेप को नियंत्रित किया जा सके और साथ ही प्रकृति प्रेमियों को भी इन स्थानों पर आने जाने की छूट भी हो. आम तौर पर अभी भारत में प्रकृति के प्रति लोगों में वह जागरूकता नहीं आ पायी है जिससे उन स्थानों को सुरक्षित और संरक्षित रखने के बारे में सोचा जा सके पर कुछ हद तक सरकारी प्रयासों और स्वयं सेवी संगठनों के कामों के चलते अच्छे परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं. सरकार को इस तरह के रोमांचक पर्यटन पर पूरी रोक लगाने के स्थान पर उसको नियंत्रित करने के बारे में सोचना चाहिए जिससे प्रकृति प्रेमी इन स्थानों को देखने से वंचित भी न रहें और इनके मूल स्वरुप को बचाये भी रखा जा सके. आज भी हम आम भारतीय अपने लापरवाह कामों से अपने आस पास के पर्यावरण और प्रकृति को बहुत जाने अनजाने नुकसान पहुँचाने में लगे ही रहते हैं जिससे देश की बहुमूल्य प्राकृतिक धरोहर सिमटती ही जा रही है. स्थानीय पर्यावरण और प्रकृति को बचाये रखने के लिए केवल उसके लिए जागरूक होने की आवश्यकता ही है और यही हम सभी नागरिकों का देश को सबस बड़ा उपहार भी होगा जिसमें हम देश को वैसा ही बनाये रखने में सफलता पायेंगें जैसा कि वह हमें अपनी पुरानी पीढ़ियों से कभी मिला था.        
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रविवार, 21 जून 2015

जयदेव पेयंग के उगाये जंगल

                                                                             निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर आगे बढ़ते हुए किसी बड़े काम को अपने हाथों में ले लेने की कोशिशें भी किस तरह से रंग लाती हैं यह देखने के लिए असोम की राजधानी गुवाहाटी से केवल ३५० किमी की दूरी पर बसे हुए १३०० एकड़ के मोलाई जंगल को देखकर जानी जा सकती है. १९७९ में ब्रह्मपुत्र नदी के घेरे में आई लगभग १४०० एकड़ जमीन से मिटटी उखड़ने की समस्या से परेशान होकर एक सामान्य ग्रामीण नागरिक जयदेव पेयंग ने खुद अपने दम पर ही आगे बढ़ने का जो संकल्प लिया था आज वह उनकी कीर्ति को बढ़ाने के साथ ही उनके गाँव और आसपास के क्षेत्रों को स्वच्छ हवा उपलब्ध कराने का काम करने में लगा हुआ है. बेशक उनकी यह कोशिश किसी तरह से अपने नाम को आगे बढ़ाने या किसी पुरुस्कार के लालच में शुरू नहीं की गयी थी पर आज जब उनके प्रयासों को पूरे भारत के साथ दुनिया में सम्मान मिल रहा है तो यह देश और उनके खुद के लिए बहुत ही गर्व की बात तो है साथ ही हमारे देश के केंद्रीय और राज्यों के पर्यावरण तथा वन मंत्रालय के लिए एक उदाहरण भी है कि ईमानदार कोशिशें की जाएँ तो देश में हरित क्षेत्र को आसानी से बढ़ाया जा सकता है.
                                  एक व्यक्ति के इस तरह से किये गए प्रयासों से आखिर किस तरह से इस क्षेत्र में पूरे पर्यावरण को सही दिशा में लाने की कोशिश सफल हुई हैं यह इस बात से ही जाना जा सकता है कि इस क्षेत्र में बेस हुए इस जंगल में अब बड़े पैमाने पर स्थानीय जीव जंतुओं की प्रजातियां भी पनप चुकी हैं जो जंगल के स्वरुप को और भी सुन्दर बनती हैं तथा पारिस्थितिकी संतुलन को भी पूरी तरह से बनाये रखने में सफल हो रही हैं. बिना किसी सरकारी सहायता के इतने बड़े पैमाने पर सफल प्रयोग करने वाले जयदेव को भारत सरकार ने इस वर्ष पद्म पुरुस्कार से भी सम्मानित किया है तथा उनके इस काम के चर्चे अब पूरे विश्व में हो रहे हैं सीधी सी बात है कि उनका यह काम यह सोचकर नहीं शुरू किया गया था पर अब जब उनके काम को सरकार ने भी बहुत बड़ा मानकर उन्हें सम्मनित किया है तो यह उनके गांव और असोम के लिए भी सम्मान की बात है. बड़े पैमाने पर बाढ़ और विद्रोही गतिविधियों से जूझ रहे असोम से इस तरह की ख़बरें निश्चित तौर पर राहत पहुँचाने का काम ही किया करती हैं क्योंकि जब तक आम लोगों का अपनी जमीन से जुड़ाव और भी मज़बूत नहीं होगा उनका प्रकृति से सही सम्बन्ध नहीं हो पायेगा.
                                  इस तरह के प्रयासों के लिए क्या अब देश को स्थानीय स्तर पर वन समितियों की आवश्यकता नहीं है जो देश के हर गाँव तक में इस तरह के कुछ प्रयास कर पाने की दिशा में काम करना शुरू कर सकें ? क्या पंचायती राज कानून के साथ ग्राम सभाओं के लिए अपनी भूमि पर इस तरह के उपलब्धता के अनुसार जंगल विकसित करने को आवश्यक नहीं किया जाना चाहिए ? क्या पर्यावरण दिवस को केवल सरकारी कार्यक्रमों से बाहर निकाल कर अब जनता के अभियान के रूप में नहीं शुरू किया जाना चाहिए ? यदि देश के गांवों में इस तरह के छोटे ही सही पर कुछ हरित क्षेत्र विकसित किये जा सकें तो क्या पूरे देश के पर्यावरण को सुधारने का बड़ा काम छोटे स्तर पर ही नहीं किया जा सकता है ? अब यह कुछ ऐसे मसले हैं जिन पर राज्यों को गंभीरता के साथ सोचने की आवश्यकता है क्योंकि भूमि राज्यों के पास होने के कारण केंद्रीय मंत्रालय केवल सहायक की भूमिका ही निभा सकता है. राज्यों में जिस तरह से वन माफिया सक्रिय हैं अब उन पर भी कड़ा अंकुश लगाकर पर्यावरण को सुधारने का काम सभी को मिलकर आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ पर्यावरण देने की दिशा में हम सही काम कर सकें.   
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सोमवार, 8 जून 2015

भूमि अधिग्रहण बिल पर संभावनाएं

                                                    केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री डीवी सदानंद गौड़ा के एक बयान के बाद ऐसे संकेत मिलने शुरू हो चुके हैं कि भूमि अधिग्रहण बिल पर कोई बीच का रास्ता निकलने के बारे में मोदी सरकार ने गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया है क्योंकि आने वाले समयमें बिहार चुनावों से पहले भाजपा और मोदी किसी भी दशा में इस मुद्दे को राजनैतिक मुद्दा बनने से रोकने की हर कोशिश करने वाले हैं जबकि राहुल गांधी की तरफ से इस मामले पर सीधे मोदी प्रत्यक्ष हमले करने से आज भाजपा को अपने कदम रोकने पर मजबूर होना पड़ रहा है क्योंकि इस विधेयक के कुछ प्रावधान ऐसे भी हैं जिनके कृषि और अन्य विशेषज्ञ भी देशहित में विरोध करने में लगे हैं. इस एक सूत्र को पकड़कर राहुल गांधी ने जिस तरह से देश के कई हिस्सों में मोदी सरकार पर करारे हमले किये हैं उससे मोदी की छवि किसान विरोधी बनाने के विपक्षी दलों के अभियान को कुछ गति और जनता की तरफ से समर्थन भी मिलने लगा है. सत्ता में बैठकर किसी मुद्दे पर सरकार का बचाव करना और विपक्ष में बैठकर सत्ता पक्ष को जनविरोधी साबित करना बहुत आसान हुआ करता है और यह काम भाजपा पिछली लोकसभा में सफलता पूर्वक कर भी चुकी है.
                                          आज लैंड बिल पर मोदी सरकार दोहरे पाटों के बीच में फंसी हुई दिखाई दे रही है क्योंकि उस पर इस मुद्दे पर काम न करने का आरोप उद्योग जगत की तरफ से लगाया जाना भी शुरू हो चूका है वहीं उस पर तीखे राजनैतिक हमले भी शुरू हो चुके हैं तो उस परिस्थिति में गौड़ा की तरफ से बीच का रास्ता निकालने की बात करना हर तरह से देशहित में ही है क्योंकि अभी तक सरकार के कड़े और अड़ियल रुख के कारण उसकी लगातार किरकिरी ही हो रही है और कांग्रेस इस मुद्दे पर सरकार को हर तरह से घेरने के लिए तैयार भी दिखती है उसी क्रम में कांग्रेस ने संयुक्त संसदीय समिति का बहिष्कार करने की घोषणा भी कर दी है. इस तरह से दोनों पक्षों के अपने अपने रुख पर अड़े रहने का कोई मतलब नहीं बनता है पर कांग्रेस भी अपने हाथ आये इस हथियार को आसानी से छोड़ने के मूड में कहीं से भी दिखाई नहीं दे रही है और इस मुद्दे पर संसद से लेकर राज्यों तक राहुल गांधी ने लगातार सरकार पर हमले करने की योजना भी बना रखी है और इस मुद्दे पर कांग्रेस और राहुल गांधी अपनी बात किसानों और आम लोगों तक पहुँचाने में सफल भी हुए हैं.
                                    अब यहाँ पर यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि सरकार आखिर क्यों इतना कड़ा रुख अपना कर बैठी हुई है जबकि उसे भी पता है कि इस मुद्दे पर उसकी राजनैतिक लोकप्रियता भी कम हो रही है ? आज स्थिति यहाँ तक है कि किसी भी भाजपाई सांसद/ विधायक या अन्य नेता के पास स्थानीय स्तर पर भी कांग्रेस के इस सवाल का कोई जवाब नहीं होता है कि सरकार इस ज़मीन को उद्योगपतियों के लिए सदैव के लिए क्यों लेना चाहती है ? संभवतः सरकार की तरफ से उस मुद्दे पर ही अपने कदम पीछे खींचने की शुरुवात की जा रही है और पांच साल में काम शुरु न होने पर भूमि वापस करने की बात पर सहमति भी बन सकती है क्योंकि यही वह मुद्दा है जिस पर विपक्ष सबसे अधिक हमलावर है और सरकार यही से अपना बचाव करने की शुरुवात करना चाहती है. संयुक्त संसदीय समिति में यदि विपक्ष ही नहीं हुआ तो सरकार के लिए यह एक और किरकिरी वाली बात होने वाली है कि वह अब तक के कमज़ोर विपक्ष को भी सदन और सदन के बाहर साधने में पूरी तरह से विफल ही रह गयी. यदि दोनों पक्षों की तरफ से कुछ सहमति की बात पर आगे बढ़ा जाये तो अंततः यह देश के लिए ही सुखद और बेहतर होने वाला है.    
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शनिवार, 6 जून 2015

गंगा के बहाने जोशी का दर्द

                                                   गंगा को लेकर राजनीति करने वाली भाजपा के लिए उसके मार्गदर्शक मंडल के सदस्य डॉ मुरली मनोहर जोशी की तरफ से व्यापक स्तर पर जताई गयी चिंता के बाद जिस तरह से भाजपा के खेमे में खलबली मची हुई है उस पर अभी कुछ भी कहना जल्दबाज़ी ही होगी क्योंकि यह मोदी सरकार की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है जिसके लिए पूरी सरकार अपना दम लगा रही है. यह सही है कि गंगा की लम्बाई को देखते हुए उसे पूरी तरह से शुद्ध करना और उसमें एक बार फिर से जलपरिवहन को बढ़ावा देने की नीति से देश में गंगा के किनारे बसे हुए राज्यों के पास एक वैकल्पिक मार्ग भी उपलब्ध हो जायेगा पर साथ ही इस नयी परियोजना के अमल में आने में सदेह भी कम नहीं जताए जा रहे हैं. डॉ जोशी को केवल एक राजनेता ही नहीं माना जा सकता है क्योंकि वे विज्ञान के वरिष्ठ जानकर भी हैं तो उनके इस तरह के बयान के केवल राजनैतिक निहितार्थ निकाले जाने से कोई सफलता हाथ नहीं लगने वाली है. वरिष्ठता का अपना पैमाना और अनुभव होता है जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता है यही इस मामले में भी सही साबित हो सकता है.
                      आज भी लोग यही कहते नज़र आते हैं कि डॉ जोशी को सरकार में महत्वपूर्ण पद नहीं मिला है इसलिए वे इस तरह की बातें कर सरकार को असहज स्थिति में डालना चाहते हैं जबकि वास्तविकता कुछ और ही है क्योंकि मोदी सरकार जिस तरह से विकास के नाम पर अपने स्तर पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने में लगी हुई है वह वास्तव में बहुत ही चिंता का विषय है. पर्यावरण सम्बन्धी मामले को लेकर ही सरकार की आशंका को ग्रीन पीस जैसे संगठन पर रोक लगाने के रूप में ही देखा जा रहा है क्योंकि जिस तरह से सरकार के कुछ चहेते उद्योग समूहों के लिए उपजाऊ भूमि का तेज़ी से अधिग्रहण करने की कोशिशें लगातार की जा रही हैं वह किसी भी तरह से देश के किसानों के लिए हितकारी नहीं साबित हो सकता है. अभी तक केवल इस तरह के मामलों को विपक्षी दलों की राजनीति ही बताया जा रहा था पर अब इसमें पर्यावरण विशेषज्ञों की राय भी जुड़ती जा रही है जो आने वाले समय में मोदी सरकार के लिए नयी तरह की समस्याएं लेकर ही आने वाली है. विकास के मार्ग पर जब भी आगे बढ़ा जायेगा तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचना ही है पर विकास के साथ ही पर्यावरण को बचाये रखने की भी जुगत निरंतर किये जाने की आवश्यकता भी है.
                        बेशक मोदी सरकार पर जोशी के हमले के बाद विपक्ष हमलावर हो जाये पर विकास के हर मामले में सरकार गलत भी नहीं हो सकती है फिर भी विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने से पहले सरकार को यह तय करना चाहिए कि उससे आम लोगों और देश के पर्यावरण पर किस तरह का असर पड़ने वाला है ? मोदी के रूप में सत्ता का एकमात्र केंद्र होने से जहाँ मंत्रियों के पास कहने के लिए कुछ भी नहीं होता क्योंकि मोदी किसी की बात सुनने के स्थान पर अपने मंतव्यों को पूरा होते देखने के आदी रहे है जो गुजरात जैसे राज्य में आसान था पर अखिल भारतीय स्तर पर उस मॉडल की सफलता संदेहास्पद ही अधिक लगती है. देश के लिए काम करने में हर सरकार लगी रहती है पर पर्यावरण से जुड़े मामले में अनावश्यक तेज़ी कई बार विकल्पों को सीमित भी कर दिया करती है. ऐसी परिस्थिति में अब मोदी और उनकी सरकार को विरोध के सुरों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि केवल एक-तरफा विकास के दावों के बीच आम जनता का भी पूरा ध्यान रखने की आवश्यकता भी है. दृढ इच्छाशक्ति के साथ काम करना अच्छा है पर सुधार के स्वरों को दबाने की हर कोशिश लोकतंत्र में सफलता का मन्त्र कभी भी साबित नहीं हो सकती है.         
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बुधवार, 22 अप्रैल 2015

सब्सिडी क्षेत्र में सुधार

                               देश में विभिन्न तरह की सब्सिडी को अधिक तार्किक बनाने के लिए किये जाने वाले उपायों को आगे बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से कुछ नए उपाय किये जाने की सम्भावनांएं सामने आती दिखाई दे रही हैं. यह सही है कि पिछले कुछ दशकों में देश के आर्थिक परिदृश्य में बड़े परिवर्तन हुए हैं और उसके बाद से ही लोगों की आमदनी में बड़ा बदलाव हुआ है इस सब के बीच जहाँ सरकार पर बढ़ती हुई आबादी और संसाधनों की सीमित उपलब्धता के चलते दबाव बढ़ा है वहीं पिछले कुछ वर्षों में सब्सिडी के मोर्चे पर किये जाने वाले संगठित भ्रष्टाचार ने सरकार और उपभोक्ताओं की समस्याओं को हर स्तर पर बढ़ाने का ही काम किया है. अब इस पूरे प्रकरण से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने वाणिज्य, कृषि, खाद्य एवं उर्वरक मंत्रालयों के साथ मिलकर जिस तरह से सब्सिडी के मोर्चे को और भी सही करने के बारे में विचार करना शुरू किया है वह देश के लिए बहुत अच्छा साबित होने वाला है.
                          अब जब देश में अधिकांश लोगों के पास बैंक में खाते उपलब्ध हो गये हैं तो इन खातों के माध्यम से विभिन्न सरकारी योजनाओं के सफल सञ्चालन और सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी में व्याप्त कमियों को दूर करते हुए आगे बढ़ा जा सकता है. आज भी खाद और उर्वरकों पर जितनी बड़ी मात्रा में सरकार सब्सिडी देती है  उसका सही लाभ किसानों तक नहीं पहुँच पाता है क्योंकि संगठित भ्रष्टाचार के चलते सब्सिडी वाली खाद की दुकानों में खाद समय होने पर उपलब्ध ही नहीं होती है और प्रति वर्ष सरकार के लिए उसकी समुचित उपलब्धता बनाये रखना एक बड़ी चुनौती होती है. सरकार के सब्सिडी देने के प्रयासों के बाद भी किसानों को उसका लाभ नहीं मिल पाता है जिससे कहीं न कहीं देश की आर्थिक और कृषि प्रगति पर बुरा असर पड़ता है. आने वाले समय में जब खाद और उर्वरक की सब्सिडी को भी पूरी तरह से किसानों के खातों में पहुँचाने की व्यवस्था को भी सुचारू रूप से शुरू कर लिया जायेगा तब सरकार की इस मद में भी बहुत बड़ी बचत होने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.
                       इन बड़े मदों के अतिरिक्त आज गरीबों को सस्ता केरोसिन के नाम भी सरकार बहुत अधिक धन सब्सिडी के रूप में प्रतिमाह जारी किया करती है और संभवतः इस क्षेत्र में सबसे अधिक भ्रष्टाचार है जो कि सरकार गरीबों और पर्यावरण को एक साथ ही नुकसान पहुँचाने का काम किया करता है। आज देश में लगभग हर क्षेत्र में केरोसिन को डीज़ल व पेट्रोल में मिलाने का काम व्यापक स्तर पर चल रहा है जिसे स्थानीय नेताओं, प्रशासन और पुलिस के साथ तेल विपणन कंपनियों का भी संरक्षण मिला रहता है. यदि केरोसिन की सब्सिडी को भी गैस की तरह अविलम्ब खातों में भेजने की व्यवस्था कर ली जाये या उसे चरणबद्ध तरीके से लागू करने की नीति बनायी जा सके तो आने वाले समय में सरकार की बहुत बचत हो सकती है क्योंकि आज केरोसिन से सरकार को बहुत नुकसान हो रहा है. इसके साथ ही वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा देने और पर्यावरण को सही रखने के उपाय के तौर पर जिन घरों में घरेलू गैस है उनको केरोसिन के स्थान पर सोलर लालटेन उपलब्ध करने के बारे में सोचा जाना चाहिए क्योंकि सरकार जिस धन को प्रतिमाह सब्सिडी के रूप में देती है यदि उसे चरण बद्ध तरीके से खत्म करते हुए उपभोक्ताओं को केवल लागत पर ही सोलर लालटेन उपलब्ध करा दे तो सभी को आसानी हो सकती है. प्राथमिकता के आधार पर केरोसिन से मुक्ति का अभियान चलाये जाने की बहुत बड़ी आवश्यकता आज सबके सामने आ चुकी है जिस पर अब सरकार को निर्णय लेना है.
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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

साबरमती से गोमती तक-नदियों का सौंदर्यीकरण ?

                                देश में गुजरात के विकास की कहानी में सबसे आगे रखे जाने वाली साबरमती नदी के १० किमी लम्बे रिवर फ्रंट को लेकर सदैव ही चर्चा की जाती रहती है पर इस परियोजना से अहमदाबाद, साबरमती और नर्मदा के साथ कच्छ, सौराष्ट्र तथा उत्तरी गुजरात की आम जनता पर किस तरह का विपरीत असर पड़ा है इस बात की कोई चर्चा कभी भी खुले तौर पर नहीं होती है. शहरों के अंदर से बहने वाली नदियों में साफ़ सफाई होनी चाहिए इस बात से पर्यावरण विशेषज्ञ भी सहमत नज़र आते हैं पर जिस तरह से इसे विकास की अवधारणा से जोड़ने की अंधी दौड़ शुरू की जा चुकी है उससे इन शहरों के साथ नदियों को भी बहुत हानि पहुँचने वाली है. साबरमती के इस रिवर फ्रंट से निश्चित तौर पर पर्यटन आदि की गतिविधियों को बहुत बढ़ावा मिला है पर उससे खुद साबरमती और अहमदाबाद ने क्या खो दिया है इस बात के बारे में कितने लोग जानते हैं ? विकास किसी भी स्तर पर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करते हुए आता है तो उससे होने वाले संभावित विनाश से बचने के लिए कोई उपाय किसी के पास शेष नहीं बचते हैं और सभी केवल आपदाओं को घटते हुए ही देखने को मजबूर रहा करते हैं.
                               यूपी की राजधानी लखनऊ में भी साबरमती की तर्ज़ पर गोमती नदी को संवारने का काम शुरू किया जाने वाला है और इसमें भी ठीक उसी तरह की गलतियां किये जाने की पूरी संभावनाएं दिखाई देने लगी हैं जो गुजरात सरकार अहमदाबाद में कर चुकी है. किसी भी नदी का अपना एक पारिस्थितिकी तंत्र होता है और जब तक उसे यह सब प्राकृतिक रूप से मिलता रहता है नदी की अविरल धारा के साथ कोई दिक्कत नहीं होती है पर जिस समय एक नदी में दूसरे क्षेत्र की नदी का पानी बिना किसी सोच के डाला जाता है तो दोनों नदियों की संयुक्त पारिस्थितिकी स्थिति पूरी तरह से गड़बड़ हो जाती है. क्या आज साबरमती में वह सब मिलता है जो आज से दो दशक पहले हुआ करता था इस बात की जांच कौन करने वाला है और इस तरह के सन्दर्यीकरण से नदियों और उसके किनारों पर बसने वाले शहरों के भूगर्भीय जल स्तर पर किस तरह का असर पड़ने वाला है यह भी आज तक सोचा नहीं जा सका है. इस मामले में सरकारों को पर्यावरण विशेषज्ञों की राय करने के बाद ही आगे बढ़ना चाहिए जिससे विकास की इस अंधी दौड़ से बाहर निकला जा सके और नदियों को अपनी भावी पढियों के लिए बचाकर भी रखा जा सके.
                             गुजरात की तत्कालीन मोदी सरकार ने तो नर्मदा के उस पानी को दुनिया को दिखाने के लिए साबरमती को १० किमी लम्बी कंक्रीट की नहर बनाकर कच्छ, सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात के हितों के साथ समझौता कर लिया था पर क्या अखिलेश सरकार शारदा नदी के पानी के साथ इस तरह का खिलवाड़ कर सकती है ? पीलीभीत के माधोटांडा से निकलने वाले गोमती नदी किस हद तक विशुध्द रूप से हिमालयी नदी शारदा के साथ अपने एक सिस्टम के साथ जीने में सफल हो सकेगी यह तो आज कोई भी नहीं बता सकता है पर इसके साथ पर्यावरण और बहुत सारी जैविक तथा वानस्पतिक प्रजातियों के विलुप्त होने की आशंका बलवती हो चुकी है. देश के नेताओं के साथ यही समस्या रही है कि वे अपनी मंशा को पूरा करने के लिए प्रकृति से हर तरह की छेड़छाड़ करने से बाज़ नहीं आते हैं इसी क्रम में आने वाले दिनों में लखनऊ की यात्रा करने वाले पर्यटकों को कंक्रीट की नहर में बदल चुकी शारदा के पानी से भरपूर इठलाती हुई गोमती भले ही कुछ सुकून दे सके पर प्रकृति के साथ होने वाली इस अनावश्यक छेड़खानी का आने वाले समय में क्या दुष्प्रभाव दिखेगा यह कोई सोचना भी नहीं चाहता है.           
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शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

राजमार्ग और टोल प्लाजा

                                             पिछले पंद्रह वर्षों में जिस तरह से केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने देश के महत्वपूर्ण राजमार्गों की व्यवस्था सुधारने के लिए इस क्षेत्र में पीपीपी मॉडल को लागू किया और उसके माध्यम से जहाँ देश के राजमार्गों की दशा में बड़ा परिवर्तन आया वहीं हर थोड़ी दूर पर बनाये गए टोल प्लाजा के माध्यम से जिस तरह से सड़कों के यातायात में रुकावट आने लगी तो उससे भी नयी तरह की समस्याएं सामने आई हैं. अब इनसे निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक प्रस्ताव के माध्यम से १२५ ऐसे प्लाजा हटाने का प्रस्ताव किया है जिससे इन मार्गों पर यातायात को सुचारू रूप से चलने में मदद मिल सके. इसके साथ ही सरकार उन प्रोजेक्ट्स को भी चिन्हित करवाने का प्रयास कर रही हैं जिनकी कॉस्ट रिकवरी हो चुकी है पर विभिन्न कारणों से अभी तक वहां के टोल प्लाजा हटाये नहीं गए हैं क्योंकि यह मुद्दा विशुद्ध रूप से प्रशासनिक है इसलिए इसके लिए उसी स्तर पर कड़े निर्णयों से परिस्थितियों को सुधारने का काम किया जाना वाला है. अपनी लगत को वसूल किये जाने के बाद भी बड़े पैमाने पर टोल प्लाजा काम करने में लगे हुए हैं जो कि पूरी तरह से अनुचित है.
                                    केंद्र सरकार को इस तरह के प्रयास में अपने संसाधनों के सही प्रयोग के बाद तय करने का पूरा अधिकार है कि किस मार्ग की लागत वसूली जा चुकी है या फिर उस पर कब तक इस तरह से टोल टैक्स लिया जा सकता है. अभी तक देश में सबसे बड़ी समस्या यही रहा करती है कि सड़क विकास और बेहतर परिवहन के लिए घोषित किये जाने वाले महत्वपूर्ण कामों में उसकी घोषणा और धरातल में उतरने पर बहुत अंतर होता है जिससे पूरे प्रोजेक्ट की कीमत भी बढ़ जाया करती है इस तरह की परिस्थिति में सरकार के पास इन योजनाओं पर उस तरह से नज़र रखने का कोई अन्य विकल्प अभी तक नहीं है जिसके माध्यम से वह इन पर पूरा नियंत्रण भी रख सके. बढ़ी हुई परियोजना लागत की इसी तरह से अवैध वसूली सदैव ही अधिकांश मार्गों पर प्रपत्रों में हेरफेर करके की जाती रहती है. किसी भी परियोजना को समय से पूरा करने के लिए अब राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र के बीच बेहतर समन्वय पर भी ज़ोर दिया जाना चाहिए क्योंकि इसके माध्यम से ही इनकी लागत और वसूली पर समुचित नियंत्रण रखा जा सकेगा.
                                  पिछले कुछ वर्षों से मालवाहक गाड़ियों के लिए ई टोल का सिस्टम शुरू किया जा रहा है इससे टोल प्लाजा पर एक अनुमान के अनुसार ८८,००० करोड़ रूपये के ईंधन की बर्बादी को रोकने में सहायता मिलने वाली है. इन सभी स्थानों पर किसी भी वाहन चालक को भी यह पता नहीं चल पाता है कि उसे कितनी देर में इससे निकल पाने में सफलता मिलेगी तो अधिकांश लोग अपनी गाड़ियों को चालू ही रखा करते हैं जिससे ईंधन की बड़े पैमाने पर बर्बादी होती रहती है. अब विकास के इस तरह के स्वरूपों को आवश्यकता के अनुरूप किये जाने के बारे में सोचना शुरू करने का समय आ गया है और अच्छी बात यह भी है कि अब मंत्रालय स्तर पर इस कोशिश को आगे बढ़ाया जा रहा है. महाराष्ट्र चूंकि मंत्री नितिन गडकरी का गृह राज्य भी है इसलिए वहां की अच्छी जानकारी होने के कारण ही वे इसकी शुरुवात दिल्ली मुंबई मार्ग से कर रहे हैं और आने वाले समय में इसे पूरे देश में लागू किये जाने की आशा बलवती होने लगी है. देश में विकास की रफ़्तार के साथ आर्थिक पहलू को ध्यान में रखने से जहाँ किसी भी तरह की बर्बादी को रोकने में सहायता मिलने वाली है वहीं आम लोगों को हर स्तर पर बेहतर यात्रा का आनंद भी मिलने वाला है.          
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शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

पश्चिमी घाट - पर्यावरण और विकास

                                                               देश के सबसे घने जंगलों, सुंदरता और जैव विविधता के लिए विख्यात पश्चिमी घाट के नाम से प्रसिद्द क्षेत्रों में विकास की गतिविधियों पर जिस तरह से राजनीति की जा रही है उससे अंत में आने वाले समय में देश के पर्यावरण पर ही बुरा असर पड़ने वाला है. किसी भी देश के बेहतर विकास के लिए वहां के संसाधनों का भरपूर और उचित दोहन आवश्यक होता है पर भारत में सक्रिय वैश्विक औद्योगिक लॉबी की मंशाओं के चलते जिस तरह से उद्योगों को प्रश्रय देने वाली वर्तमान केंद्र सरकार ने काम करना शुरू कर दिया है उससे भविष्य में क्या दुष्परिणाम सामने आयेंगें यह कोई भी नहीं जान पा रहा है. आज भी देश के जिन भागों में जंगलों के अंधाधुंध कटान और पर्यावरण विरुद्ध औद्योगिक विकास के चलते किस तरह से मौसम में बड़ा परिवर्तन दिखाई देने लगा है यह भी यदि सरकार नहीं देखना चाहती है तो इसका कोई अन्य उपाय भी नहीं है और भविष्य की पीढ़ियों को अब उस समस्या के साथ जीने की आदत डालनी ही होगी.
                                                              पश्चिमी घाट की विकास और औद्योगिक गतिविधियों के प्रति संवेदनशीलता को देखते हुए ही पर्यावरण विद माधव गाडगिल ने एक रिपोर्ट तैयार की थी जिसमें उन्होंने इस पूरे क्षेत्र को ही पर्यावरण की दृष्टि से अति-संवेदनशील बताया था वहीं दूसरी ओर के कस्तूरीरंगन समिति ने इस मामले में अपनी राय कुछ बहुत अलग तरीके से दी थी. गाडगिल जहाँ इस पूरे क्षेत्र को ऐसे ही संजोये रखने की बात करते हैं वहीं कस्तूरीरंगन को इसका केवल ४०% हिस्सा ही संवेदनशील लगता है ? एक ही मुद्दे पर इतने बड़े मतभेद के होने के बाद सरकार को इस तरफ इतनी तेज़ी से चलने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि पर्यावरण को यदि एक बार नुकसान होना शुरू हो गया तो सरकार और कोर्ट भी मिलकर उसको हमेशा के लिए आसानी से नहीं रोक पाती है. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में सरकार ने जिस तरह से दो टूक शब्दों में अपना जवाब दिया है उससे इस मुद्दे पर कुछ विचार किये जाने की संभावनाएं भी ख़त्म ही हो गयी हैं.
                                                              बेशक सरकार को किसी भी तरह की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों को चलाने की पूरी छूट होती है पर जिस तरह से किसी एक मुद्दे पर इतने बड़े मतभेद सामने आ रहे हों तब सरकार का ही यह दायित्व बनता है कि वह दोनों समितियों के त्वरित तुलनात्मक अध्ययन के बारे में सोचे और एक निश्चित समय सीमा में इसके आर्थिक पहलू के साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले सभी मसलों पर गंभीरता से विचार करे. सरकार की विकास परकमंशा से किसी को भी कोई आपत्ति नहीं है पर यदि दोनों समितियों के भूभाग के उपयोग में थोड़ी असमानता होती तो उसे माना जा सकता था पर यहाँ तो एक रिपोर्ट इसके लिए तैयार ही नहीं है तो दूसरी रिपोर्ट इसके ६०%  आर्थिक उपयोग को सही मानती है ? इस बारे में गाडगिल के पक्ष में केवल एक बात जाती है कि वे जाने माने पर्यावरण विद हैं और इसी पश्चिमी घाट के स्थानीय निवासी भी हैं तो उनके अध्ययन पर शक करने से कुछ खास हासिल नहीं हो सकता है. इस क्षेत्र के बारे में कुछ तो ऐसा विवादित अवश्य ही है जिसके चलते देश में आर्थिक क्रांति को लाने वाले मनमोहन सिंह भी इस क्षेत्र में चाहते हुए भी इस तरह की तीव्र आर्थिक गतिविधियों को शुरू नहीं कर सके थे ? अच्छा हो कि सरकार तेज़ी से निर्णय लेने के साथ देश की दीर्घकालीन पर्यावरण चिंताओं की अनदेखी नहीं करे और वैज्ञानिकों की बातों का सम्मान करे.          
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मंगलवार, 10 जनवरी 2012

बिजली में नयी संभावनाएं

       पूर्व राष्ट्रपति डॉ0 ए पी जे अब्दुल कलाम ने भविष्य की ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए जिस तरह के प्रस्ताव का सुझाव दिया है अगर उस पर अमल किया जा सके तो पूरी दुनिया के ऊर्जा परिदृश्य को बदलने में बहुत बड़ी सहायता मिलने वाली है. चेन्नई के अन्ना विश्वविद्यालय में २० वें लेज़र सिम्पोसियम में बोलते हुए उन्होंने कहा कि अगर सूरज की रौशनी का एक हिस्सा भी हम सही तरह से इस्तेमाल करना सीख पाए तो ऊर्जा की इस तरह की ज़रूरतों को पूरा करने में सफलता निश्चित तौर पर मिलेगी. इस तरह के अनुसन्धान से आने वाले समय में हमें ऊर्जा की ज़रूरतों के साथ ही सूरज के बारे में और अधिक जानने का अवसर भी मिलने वाला है. जैसा कि हम सभी जानते हैं कि सौर ऊर्जा अक्षय ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है पर अभी तक जिस तरह से हम सौर ऊर्जा को उपयोग में ला रहे हैं वह काफी खर्चीली प्रक्रिया है जिससे इस क्षेत्र में बहुत तेज़ी से अनुसन्धान नहीं हो पा रहे हैं.  पर अब समय है कि धरती के सीमित संसाधनों पर विचार करते हुए इस तरह के अन्य कार्यक्रमों के लिए सरकार और शीर्ष वैज्ञानिक संस्थाएं तेज़ी से काम करें.
      जिस तरह से अन्तरिक्ष में स्थापित ये सोलर पॉवर प्लांट काम करने वाले हैं उससे इनकी सफलता पर भी संदेह नहीं किया जा सकता हैं क्योंकि धरती के मुकाबले अन्तरिक्ष में २४ घंटे सौर ऊर्जा उपलब्ध रहती है साथ ही वहां पर धरती के मौसम की तरह भी कोई अन्य प्रभाव काम नहीं करता है जिससे ये प्लांट २४ घंटे ऊर्जा उत्पादन में सफल हो सकेंगें. इस तरह के सौर ऊर्जा के पॉवर प्लांट अभी तक अन्तरिक्ष केन्द्रों को ऊर्जा देते रहते हैं और अभी तक इन्होंने सफलता पूर्वक अपना काम किया है जिससे यह बात तो साबित हो ही जाती है कि भविष्य में ऊर्जा ज़रूरतों के लिए अन्तरिक्ष की तरफ देखा जा सकता है. इस पूरे कार्य में सबसे बड़ी चुनौती अन्तरिक्ष में बनायीं गयी बिजली को धरती तक लाने की होने वाली है क्योंकि वहां पर बिजली बनाना मुश्किल नहीं है बल्कि वहां से बिजली को धरती पर लाकर अपने उपयोग में लाने का काम आज भी चुनौती बना हुआ है.  इस क्षेत्र में दुनिया भर में काम चल रहा है क्योंकि इस तरह से बनायीं गयी बिजली पर्यावरण को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचा पायेगी.
        इस सम्बन्ध में डॉ कलाम कहते हैं कि इस बिजली को हम धरती तक भेजने के लिए माइक्रोवेव या लेज़र तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं जिससे यह हमें सुगमता से उपलब्ध हो जाये. इस बारे में अब यही अनुसन्धान का विषय होना चाहिए कि किस तरह से माइक्रोवेव या लेज़र तकनीक को इतना उन्नत बनाया जाए कि वह ऊर्जा का बड़े पैमाने पर प्रवाह कर सके और इस ऊर्जा को हम ज़मीन पर इकठ्ठा करके अपने काम में ले सकें. इस आयु में भी डॉ कलाम जिस तरह से मानवता के कल्याण बारे में अपने वैज्ञानिक मस्तिष्क को लगाये हुए हैं वह प्रेरणा के क़ाबिल है क्योंकि आज लोगों में केवल अपने हित के बारे में सोचने के बाद कुछ और करने की इच्छा शक्ति ही नहीं रह जाती है फिर देश के शीर्ष वैज्ञानिक के बाद राष्ट्रपति के पद से रिटायर होकर भी वे आज जिस तरह से लगातार वैज्ञानिक कामों और अनुसंधानों में लगे हुए हैं वह अपने आप में अद्भुत है. आशा की जानी चाहिए कि आने वाले समय में हमारे युवा वैज्ञानिक इस बारे में सोचेंगें और इनकी इस तरह की वैज्ञानिक सोच को मूर्त रूप देने में सफल हो सकेंगें.            
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बुधवार, 3 अगस्त 2011

गंगा अब कूड़ेदान ?

आस्ट्रेलिया में एक रेडियो एंकर द्वारा गंगा को कूड़ेदान और भारत को बेकार जगह कहे जाने का विवाद बढ़ता ही जा रहा है. इस मामले पर वहां पर बसे भारतीयों ने अपना कड़ा विरोध जताया है और इस पूरे मसले पर सम्बंधित एंकर से माफ़ी मांगने को भी कहा है. ऐसा न करने पर यह मसला वहां की प्रसारण नियामक संस्था के समक्ष उठाये जाने की धमकी भी दी है. सवाल यह है की आज कर आस्ट्रेलिया में ऐसा क्या हो रहा है जिससे वहा के लोग इस तरह से भारतीयों और भारतीय सम्मान से जुडी बातों पर इस तरह से आक्रामक हुए जा रहे हैं. पूरी दुनिया में भारतीयों को शांतिप्रिय माना जाता है और कहीं पर भी किसी भी तरह की अराजक गतिविधि में लिप्त नहीं रहते हैं फिर ऐसा क्या है कि आस्ट्रेलिया के लोग हमें आसानी से पचा नहीं पा रहे हैं ? कहीं ऐसा तो नहीं कि भारतीयों की मेधा शक्ति के आगे आस्ट्रेलिया के लोग पिछड़ रहे हैं इसलिए ही वे हताशा में कुछ इस तरह से भारतीय सम्मान से जुड़ी बातों को लेकर अपमान करने से नहीं चूक रहे हैं.
    कहीं ऐसा तो नहीं कि भारतीय समुदाय के कुछ लोग ही वहां पर ऐसी हरकतें करके लोगों को भारत के ख़िलाफ़ भड़कने का अवसर दे रहे हैं ? कहीं न कहीं से वहां बसे भारतीय समुदाय के मंथन करने का समय है क्योंकि जब तक हम अपनी कमी को ढूँढने का प्रयास नहीं करेंगें तब तक यह निश्चित नहीं हो पायेगा कि आख़िर ग़लती कहाँ से हो रही है और बिना इसका सही कारण जाने हम इसको दूर कर पाने में भी सफल नहीं होने वाले हैं. भारत के लोगों को आम तौर पर पूरी दुनिया में पसंद किया जाता है फिर भी कहीं न कहीं से इस तरह की बातें उठाये जाने के पीछे कोई कारण तो अवश्य ही होगा. जहाँ तक गंगा को कूड़ेदान कहने का सवाल है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि आज की तारीख़ में हम भारतीयों ने अपनी पुण्य सलिला, मोक्ष दायिनी और पवित्रतम नदी को गन्दा करने में कोई कसंर नहीं छोड़ी है और आज भी हम इसके प्रति जागरूक नहीं हो पाए हैं जिस कारण से ही कुछ लोग इस तरह से अपमानजनक बातें करने में सक्षम हो पा रहे हैं.
   क्या हुआ अगर किसी विदेशी ने हमें सच्चाई का आइना दिखा दिया तो इससे क्या भारत की प्रतिष्ठा घट गयी ? अभी तक जब हम स्वयं ही अपनी इस पुण्य नदी के बारे में कुछ सोच नहीं पाए हैं तो फिर आगे आने वाले समय में अगर दूसरे इस बात को हमसे बताते हैं तो हमें बुरा क्यों लगता है ? आज वास्तव में गंगा की जो हालत है वह किसी विदेशी ने नहीं की है वह सिर्फ और सिर्फ हमारी ही ग़लती है और अब जब सच्चाई से हमारा वास्ता पड़ रहा है तो हम दूसरों पर ऊँगली क्यों उठा रहे हैं ? दुनिया में हर तरह के लोग रहते हैं और इस तरह से किसी के भी बारे में कुछ भी कहने और करने वाले बहुत सारे लोग हैं जो किसी पूर्वाग्रह के चलते दूसरों को ठेस पहुँचाना चाहते हैं पर इससे उनकी सोच का ही पता चलता है. भारत के बारे में पूरी दुनिया में जो भी भ्रांतियां अगर हैं तो उन्हें दूर करने का उत्तरदायित्व भी हम भारतीयों का है और अपनी धरोहर गंगा को अगर हम साफ़ रख सकने में सफल हुए होते तो कोई इस नदी को कूड़ेदान कहने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाता.      
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रविवार, 19 जून 2011

धान की भूसी और बिजली

      देश में व्याप्त ऊर्जा संकट को देखते हुए कहीं से भी यह नहीं कहा जा सकता है कि देश अपने साधनों से कभी ख़ुद को ऊर्जा के मामले में आत्म निर्भर बना पाने में सक्षम होगा क्योंकि जिस तरह की सरकाई नीतियां बनायीं जाती हैं उसके लिए बहुत संसाधनों की आवश्यकता होती है और उतने संसाधन जुटा पाना आज के समय में सरकारों के लिए कठिन होता जा रहा है. ऐसे में बिहार जिसे देश में हर तरह के अँधेरे के लिए जाना जाता है उसने ही एक बार फिर से अपनी जीवटता और लगन से धान की भूसी से बिजली पैदा करके गाँवों को रोशन कर दिया है. यह सब किसी बड़े लाभ के लिए नहीं किया गया बल्कि इसको पूरी तरह से सेवा भाव के साथ शुरू किया गया और बिहार के तमकुआ गाँव में पहली बार इसी तरह से पैदा की गयी बिजली ने पूरे गाँव को रोशन कर दिया. जो गाँव पहले प्रति परिवार १५० रु० खर्च करने के बाद भी अँधेरे में डूबा रहता था वही अब पूरी रात सिर्फ १०० रु० खर्च करके रोशन रहता है. 
     यहाँ पर सवाल यह नहीं है कि आख़िर इस तरह से कितने लोगों तक बिजली पहुंचाई जा सकती है बल्कि यह है कि जिन गाँवों तक आज तक रौशनी की किरण नहीं पहुंची है उन्हें इस तरह की परियोजनाओं के द्वारा जोड़कर बिजली पहुँचाने का काम क्यों नहीं किया जा सकता है ? आज भी सरकारी तंत्र की कमियों के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है पर इस तरह के प्रयासों में अगर सरकारी तंत्र भी जुड़ जाए तो पूरे देश की तकदीर भी बदल सकती है. आज पूरे देश में बायोमास पर आधारित जैव कचरे और अन्य उपलब्ध वस्तुओं से बिजली बनाने का काम पूरी लगन से किया जाना चाहिए. इस परियोजना से जुड़े रत्नेश यादव ने बताया कि पूरे भारत में भूसी की उपलब्धता को देखते हुए यह आंकलन लगाया गया है कि इससे २७ गीगा वॉट बिजली बनाई जा सकती है जो देश को कम संसाधनों से ही पूरी तरह से बिजली के मामले में आत्म निर्भर बना सकती है. आज भी सरकारी नीतियां कुछ इस तरह से बनाई जाती हैं जिन पर सरकार का नियंत्रण पूरी तरह से होता है जो हमेशा ही काम काज में बाधा डालता रहता है.
    आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र सरकार इस तरह की छोटी परियोजनाओं पर विचार करे जिससे गाँवों में ही रोजगार उपलब्ध होने के साथ ही बिजली भी बन सके ? पहले ही देश में चीनी मीलों के माध्यम से बनायीं गयी बिजली का उपयोग किया जा रहा है इससे जहाँ एक तरफ बड़ी परियोजनाओं में लगने वाला धन बच रहा है और साथ ही बनी बनायीं बिजली मिल रही है जिसका तय मूल्य ही केवल सरकार को चुकाना होता है. यदि दूर दराज के गाँवों में इस तरह की स्वावलंबी योजनायें लागू हो सकें तो कहीं न कहीं से ये गाँवों की तकदीर बदलने में कामयाब हो सकेंगीं. आने वाले समय में केंद्र सरकार ने जिस तरह से गाँवों में देश पैसा देने की योजना तैयार की है तो इस तरह की योजनाओं में पैसे लगाकर बिजली की लाइन हानियों को कम किया जा सकता है साथ ही स्थानीय स्तर पर इसका नियंत्रण होने से आंधी पानी के समय विद्युत आपूर्ति में बाधा पड़ने की सम्भावना भी बिलकुल न के बराबर होगी. पर क्या इस तरह की सोच अभी भारत में विकसित होने की तरफ जा भी रही है.....      
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