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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

साबरमती से गोमती तक-नदियों का सौंदर्यीकरण ?

                                देश में गुजरात के विकास की कहानी में सबसे आगे रखे जाने वाली साबरमती नदी के १० किमी लम्बे रिवर फ्रंट को लेकर सदैव ही चर्चा की जाती रहती है पर इस परियोजना से अहमदाबाद, साबरमती और नर्मदा के साथ कच्छ, सौराष्ट्र तथा उत्तरी गुजरात की आम जनता पर किस तरह का विपरीत असर पड़ा है इस बात की कोई चर्चा कभी भी खुले तौर पर नहीं होती है. शहरों के अंदर से बहने वाली नदियों में साफ़ सफाई होनी चाहिए इस बात से पर्यावरण विशेषज्ञ भी सहमत नज़र आते हैं पर जिस तरह से इसे विकास की अवधारणा से जोड़ने की अंधी दौड़ शुरू की जा चुकी है उससे इन शहरों के साथ नदियों को भी बहुत हानि पहुँचने वाली है. साबरमती के इस रिवर फ्रंट से निश्चित तौर पर पर्यटन आदि की गतिविधियों को बहुत बढ़ावा मिला है पर उससे खुद साबरमती और अहमदाबाद ने क्या खो दिया है इस बात के बारे में कितने लोग जानते हैं ? विकास किसी भी स्तर पर प्रकृति के साथ छेड़छाड़ करते हुए आता है तो उससे होने वाले संभावित विनाश से बचने के लिए कोई उपाय किसी के पास शेष नहीं बचते हैं और सभी केवल आपदाओं को घटते हुए ही देखने को मजबूर रहा करते हैं.
                               यूपी की राजधानी लखनऊ में भी साबरमती की तर्ज़ पर गोमती नदी को संवारने का काम शुरू किया जाने वाला है और इसमें भी ठीक उसी तरह की गलतियां किये जाने की पूरी संभावनाएं दिखाई देने लगी हैं जो गुजरात सरकार अहमदाबाद में कर चुकी है. किसी भी नदी का अपना एक पारिस्थितिकी तंत्र होता है और जब तक उसे यह सब प्राकृतिक रूप से मिलता रहता है नदी की अविरल धारा के साथ कोई दिक्कत नहीं होती है पर जिस समय एक नदी में दूसरे क्षेत्र की नदी का पानी बिना किसी सोच के डाला जाता है तो दोनों नदियों की संयुक्त पारिस्थितिकी स्थिति पूरी तरह से गड़बड़ हो जाती है. क्या आज साबरमती में वह सब मिलता है जो आज से दो दशक पहले हुआ करता था इस बात की जांच कौन करने वाला है और इस तरह के सन्दर्यीकरण से नदियों और उसके किनारों पर बसने वाले शहरों के भूगर्भीय जल स्तर पर किस तरह का असर पड़ने वाला है यह भी आज तक सोचा नहीं जा सका है. इस मामले में सरकारों को पर्यावरण विशेषज्ञों की राय करने के बाद ही आगे बढ़ना चाहिए जिससे विकास की इस अंधी दौड़ से बाहर निकला जा सके और नदियों को अपनी भावी पढियों के लिए बचाकर भी रखा जा सके.
                             गुजरात की तत्कालीन मोदी सरकार ने तो नर्मदा के उस पानी को दुनिया को दिखाने के लिए साबरमती को १० किमी लम्बी कंक्रीट की नहर बनाकर कच्छ, सौराष्ट्र और उत्तरी गुजरात के हितों के साथ समझौता कर लिया था पर क्या अखिलेश सरकार शारदा नदी के पानी के साथ इस तरह का खिलवाड़ कर सकती है ? पीलीभीत के माधोटांडा से निकलने वाले गोमती नदी किस हद तक विशुध्द रूप से हिमालयी नदी शारदा के साथ अपने एक सिस्टम के साथ जीने में सफल हो सकेगी यह तो आज कोई भी नहीं बता सकता है पर इसके साथ पर्यावरण और बहुत सारी जैविक तथा वानस्पतिक प्रजातियों के विलुप्त होने की आशंका बलवती हो चुकी है. देश के नेताओं के साथ यही समस्या रही है कि वे अपनी मंशा को पूरा करने के लिए प्रकृति से हर तरह की छेड़छाड़ करने से बाज़ नहीं आते हैं इसी क्रम में आने वाले दिनों में लखनऊ की यात्रा करने वाले पर्यटकों को कंक्रीट की नहर में बदल चुकी शारदा के पानी से भरपूर इठलाती हुई गोमती भले ही कुछ सुकून दे सके पर प्रकृति के साथ होने वाली इस अनावश्यक छेड़खानी का आने वाले समय में क्या दुष्प्रभाव दिखेगा यह कोई सोचना भी नहीं चाहता है.           
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बुधवार, 14 जनवरी 2015

नदियों को जोड़ने के लाभ-हानि

                                                      देश में एक तरफ जहाँ केंद्र सरकार गंगा नदी को एक उदाहरण मानकर सभी नदियों की सफाई को लेकर चिंतित नज़र आती है वहीं उसके द्वारा नदियों को जोड़े जाने की नीति पर पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद भी आगे बढ़ना किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है. सरकार का मानना है कि देश में बाढ़ और सूखे के दोहरे संकट से निपटने के लिए नदियों को जोड़ा जाना आवश्यक है जिससे एक जगह के अतिरिक्त पानी को दूसरी जगह कम पानी वाले क्षेत्र में उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जा सके. भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस योजना को लेकर आशंकाएं इसलिए भी अधिक व्यक्त की जा रही हैं क्योंकि लगभग एक जैसे क्षेत्र से निकलने के बाद भी नदियों के जल और जैविक विविधता में कोई समानता नहीं है जिसके चलते जब इस तरह की किन्हीं दो नदियों को आपस में जोड़ा जायेगा तो उसके पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा इसकी अभी कोई जानकारी या अध्ययन सरकार के पास नहीं है. विकास के लिए आवश्यक क़दमों को उठाया जाना ज़रूरी है पर जब तक इस विकास को पर्यावरण के अनुकूल नहीं रखा जायेगा तब तक इस विकास की कीमत तो देश को चुकानी ही पड़ेगी.
                                                     सिंचाई परियोजनाओं और जल संकट को ध्यान में रखते हुए बड़ी नदी परियोजनाओं पर काम करने के स्थान पर यदि स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन को अधिक महत्त्व दिया जाये तो इससे वास्तव में अधिक लाभ हो सकता है क्योंकि बड़ी नहर परियोजनाओं के लिए जितनी बड़ी संख्या में पलायन और भूमि के जलमग्न होने की सम्भावना रहती है छोटी परियोजनाओं द्वारा उससे भी बचा जा सकता है. आज भी देश के उत्तरी भाग में लगभग हर शहर के साथ कभी वर्ष भर जीवित रहे वाली बरसाती नदियों की उपस्थिति भी है क्योंकि पुराने समय में जलसंकट से निपटने के लिए लोग नदियों के किनारे ही बसने को प्राथमिकता दिया करते थे आज यदि नदियों को जोड़ने से पहले सरकार केवल इन नदियों को फिर से पुनर्जीवित करने के बारे में सोचना शुरू करे और इससे स्थानीय लोगों के जुड़ाव और कर्तव्य को एक साथ ला सके तो देश भर में किसी समय सदानीरा रहने वाली पर अब नाले में बदल चुकी बहुत सारी नदियां पुनर्जीवित हो सकती हैं. यह काम ऐसा होगा जिसमें जनता का जुड़ाव भी होगा साथ ही नदियों के प्रति उसके कर्तव्य की पूर्ति भी हो सकेगी और आम लोगों से जुड़ने के बाद यह अपने आप ही नदियों को साफ़ रखने के कार्य से भी जुड़ ही जाना वाला है.
                                                 देश में जल संकट से निपटने के लिए बेशक सरकार के प्रयास सही है पर पर्यावरण विशेषज्ञों की बातों को पूरी तरह से अनदेखा किया जाना क्या सरकार के उस मन्त्र के साथ सटीक बैठता है जिसमें वह "सबका साथ सबका विकास" जैसी बातें करने से पीछे नहीं रहती है ? बेशक आज सरकार के समर्थकों में ऐसे बहुत सारे वैज्ञानिक भी हो सकते हैं जिनको इस परियोजना पर कोई आपत्ति न हो पर जब मामला पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दे से जुड़ा है तो क्या सरकार केवल किसी बड़ी परियोजना को शुरू करने के लिए अन्य लोगों की अनदेखी कर सकती है. देश, समाज और विकास के लिए पर्यावरण की अनदेखी क्या आने वाले दशकों में हमें भारी नहीं पड़ने वाली है क्योंकि एक बार जिस प्राकृतिक तंत्र को हम अपने स्वार्थ के हिसाब से बदल देंगें तो क्या वह हमारे चाहने पर फिर से उसी तरह का हो पायेगा और इस प्रयास में जैविक विविधता का जो भी नुकसान हमें होने वाला है उसको क्या हम दोबारा से प्राप्त कर सकेंगें ? मोदी सरकार ने जिस तरह से विकास के लिए पर्यावरण की अनदेखी करनी शुरू कर दी है वह देश के लिए बहुत घातक ही साबित होने वाली है क्योंकि अब विकास के आगे किसी भी अन्य प्राथमिकता के बारे में सोचना सरकार बंद कर चुकी है.        
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शुक्रवार, 3 सितंबर 2010

भूजल का दोहन

हर साल बरसात में पूरे देश में एक तरह की समस्या सामने आती है जहन एक तरफ तराई के क्षेत्र में बाढ़ का खतरा हमेशा ही मंडराता रहता है वही दूसरी तरफ अन्य भूभाग में सूखे की आशंका हर सरकार को दुबला बनाये रखती है. भारत एक कृषि आधारित देश है हमारी अर्थव्यवस्था को सही ढंग से पटरी पर चलाने के लिए हमें अच्छे मानसून की हर वर्ष ज़रुरत होती है. एक तरफ जहाँ जन जागरूकता में कमी के कारण लोग पाई को बर्बाद करते रहते हैं वहीँ दूसरी तरफ कुछ स्थानों पर पानी की कमी के कारण लोग प्यासे ही रह जाते हैं. देश में सरकारी तंत्र किस तरह से काम करता है यह बात किसी से भी छिपी नहीं है बस कुछ जागरूक लोग अपने स्तर से प्रयास करते नज़र आते हैं कि कहीं से कोई बदलाव महसूस हो जाये ?
         पानी के बारे में हम सभी को जितना सचेत होना चाहिए अभी तक नहीं हो पाए हैं जिस कारण से आज भी देश के अधिकांश भू-भाग में पानी की किल्लत हमेशा ही रहती है. हालांकि पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रीय ग्रामीण गारंटी योजना के तहत कुछ भागों में पुराने तालाबों को फिर से गहरा करने का काम शुरू किया गया है जिससे आने वाले समय में इन गाँवों में पानी की उपलब्धता कुछ बढ़ने की आशा की जा सकती है. जब पानी बरसता है तो हमारे पास इसे रोकने के इन्तेजाम होते ही नहीं हैं पर जब इसकी कमी हो जाती है तो हम सभी सरकारों को इसके लिए कोसते रहते हैं ? हम सभी को एक बात तो समझनी ही होगी कि इस तरह से हम बर्बादी कर के किसी भी सरकार को इसके लिए कैसे दोषी ठहरा सकते हैं ? अगर हम पानी के महत्त्व को खुद ही समझ लें तो दूसरों की तरफ ताकने की स्थिति आने ही नहीं पायेगी ? हाँ यह भी सही है कि कुछ भाग ऐसा भी है जहाँ पर बिना सरकारी मदद के कुछ भी कर पाना असंभव हो जाता है पर ऐसे स्थान देश में बहुतायत से नहीं हैं. कुछ वर्षों पहले लेह जैसे दुर्गम इलाके में स्थानीय लोगों के प्रयासों से कृत्रिम ग्लेशिअर बनाये गए और उनका उपयोग गर्मी में उस इलाके में पानी की कमी से निपटने में किया गया.
      जब हम संसाधनों के सही उपयोग पर ध्यान देने लगेंगें तब किसी भी तरह की किल्लत हमारे सामने नहीं रहेगी. बस अब समय है कि हम यह सब सीख लें वरना कहीं ऐसा न हो कि जब हम सीखना चाहें तब तक बहुत देर हो चुकी हो......

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शनिवार, 17 अप्रैल 2010

गर्मी और पानी....

क्या किसी ने इस बात पर ध्यान दिया है कि इस बार गर्मी ने जिस तरह से अपने तेवर दिखने शुरू किये हैं उसको देखते हुए कहीं पर भी सार्वजानिक रूप से पानी पिलाने की कोई पक्की व्यवस्था कहीं भी नहीं दिखाई देती है जबकि पिछले वर्ष इसी समय हर जगह पर पानी तो क्या शरबत पिलाने तक की भी व्यवस्था हो रही थी. कारण साफ़ है कि तब नेताओं को माननीय बनने की चाह थी तो किसी की पूरी हो गयी तो कोई मुंगेरी लाल की तरह हसीन सपने देख कर ही काम चला रहा है. क्या कारण है कि चुनाव के समय नेताओं की मानवीय संवेदनाएं अचानक ही जग जाती हैं और चुनाव का मौसम ख़त्म होते ही वह सब कुछ समाप्त हो जाता है ? क्या चुनाव में वोट देने तक ही जनता को प्यास लगती है ? क्या वोट देने के बाद जनता अपने नेताओं को नोटों की प्यास बुझाने के लिए छोड़ देती है ? इस देश में जहाँ पुराने समय में आदमियों के लिए तो कौन कहे पशु पक्षियों तक के लिए खेत खलिहान तक में पानी की सुविधा रखी जाती थी कि आखिर इन पक्षियों को पानी कहाँ से मिलेगा ?
        आज के समय में जब सरकारें गिनती के लोगों को पानी मुहैय्या नहीं करा पा रही हैं तो उनसे सारी आबादी के लिए पानी जुटाने की अपेक्षा रखना ही गलत है. ज़रा केवल रेलवे को ही देख लीजिये आजकल किसी भी स्टेशन पर गाड़ी के रुकते ही पानी के लिए किस तरह से मारा-मारी मचती है कभी किसी ने नहीं देखा. बहुत बार हम सभी इस भीड़ वाले पानी के शिकार हो चुके हैं ? आज कल तो पानी के नाम पर रेलों में गन्दा पानी ही पीने को मिलता है जिसके कारण बहुत से लोग बीमार पड़ जाते हैं. क्या रेलवे इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं कर सकती है जिससे लोगों की आवश्यकतानुसार साफ़ पानी मिल सके ?
यह तो हुई सरकारी स्तर पर पानी से निपटने की योजनायें पर क्या नागरिक की हैसियत से हम सभी पानी का दुरूपयोग नहीं करते हैं ? यदि हम पानी की बहुलता वाले हिस्से में रहते हैं तो ठीक वर्ना हमारे पास सरकार को गाली देने के अलावा कोई काम नहीं होता है ? क्या हम अपने आस पास पानी के संरक्षण पर ध्यान देते हैं ? क्या हम कभी सोचते हैं कि हमें तो भरपूर मात्र में पानी मिला हुआ है पर क्यों नहीं हम देश के उन हिस्सों में रहने वाले लोगों के बारे में या अपने ही ट्रेन के सफ़र के दौरान पानी की किल्लत को देखते हुए कभी अपनी तरफ से इसे बचाने की कोई पहल क्यों नहीं करते हैं ? आज भी देश में बहुत सा पानी हमारी लापरवाहियों के कारण बरबाद होता रहता है. हमें अब जल संरक्षण के बारे में बहुत संजीदगी से सोचना ही होगा तभी हम अपने आस-पास के पानी को बचाकर अपने और पर्यावरण के संरक्षण में सहयोग कर सकते हैं.    
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