मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

कृषि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कृषि लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 9 जून 2017

समग्र कृषि नीति की आवश्यकता

                                                                 म० प्र० और महाराष्ट्र में किसानों की तरफ से शुरू किया गया असहयोग आंदोलन मंदसौर में हिंसक होकर ५ परिवारों के लिए अँधेरे लेकर ही आया और अब इस पर सीधे आरोप प्रत्यारोपों के साथ, मीडिया और सोशल मीडिया पर सरकार समर्थक और विरोधी एक दूसरे को गलत साबित करने में लगे हुए हैं. जहाँ तक मंदसौर की बात है तो यह इलाका हर प्रकार से संपन्न और शांत ही माना जाता है और यहाँ से कभी भी किसी भी प्रकार के हिंसक आंदोलनों की लगातार होने वाली घटनाएं भी सामने नहीं आयी हैं तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि किसान इतने उग्र हो गए और मामला पुलिस की तरफ से फायरिंग तक जा पहुंचा. सरकार का यह कहना भी उचित है कि शांति व्यवस्था और हाईवे पर यातायात सुचारु बनाये रखने के लिए ऐसा करना आवश्यक था पर उसकी तरफ से मामले को सही तरह से सम्भालने में किसी न किसी स्तर पर कोई चूक तो अवश्य ही हुई है जिसे उसे आज नहीं तो कल स्वीकारना ही होगा. सरकार को उस परिस्थितियों पर भी विचार करना होगा जिनके चलते इन दोनों राज्यों के किसानों ने एक तरह से खाद्य आपूर्ति रोकने की तरफ इतना बड़ा कदम बढ़ा दिया ? इस मामले में महाराष्ट्र सरकार ने अपनी तरफ से पहल करते हुए किसानों के सगठनों से बात की और कुछ अश्वासनों के साथ ठोस कार्यवाही करने की बात की जिसके बाद वहां का आंदोलन कुछ ठंडा पड़ा पर अभी भी वहां भी सभी किसान इस समाधान से खुश नहीं है जिसके लिए फडणवीस सरकार को और अधिक संवेदनशील होकर काम करना होगा. इस मुद्दे को शिवराज सरकार ने या तो हलके में लिया या फिर उन्हें वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा ही नहीं था कि मामला कहाँ तक पहुँच गया है जिस कारण उससे इतनी बड़ी चूक हुई.
                                       निश्चित तौर पर ऐसे मामलों में विपक्ष के पास करने के लिए कुछ खास नहीं होता है अलबत्ता वह पीड़ितों तक सरकार से पहले पहुंचकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिशें अवश्य ही करता है. देश में केंद और राज्यों की सत्ता दलीय व्यवस्था में बदलती रहती है पर कहीं से भी उसमें वो गुणात्मक परिवर्तन दिखाई नहीं देता है जो देश की आवश्यकताओं को बिना किसी राजनीति के समझने और उसे पूरा करने के लिए आगे बढ़ने की कोशिश में लगा हुआ दिखाई दे. विभिन्न कारणों से देश के हर राज्य का किसान बदहाल है पर उसके लिए स्थायी समाधान खोजने के स्थान पर तात्कालिक उपायों से समस्या को अस्थायी रूप से टालने पर ही सभी नेताओं का ध्यान रहा करता है जिससे कुछ समय बाद समस्या और भी विकराल स्वरुप में सामने आती है. आज कृषि को देश की आवश्यकताओं के अनुरूप करने और किसानों को पूरी तरह से जागरूक करने की आवश्यकता है क्योंकि प्राचीन काल से चली आ रही मिश्रित और परंपरागत खेती को छोड़कर किसान आज नकदी वाली फसलों पर अधिक ध्यान देने लगा है जिससे मानसून पर आधारित क्षेत्र के किसानों के लिए लगातार समस्या ही बनी रहती है क्योंकि कम पैदावर होने उसके पास लागत निकालना एक बड़ी समस्या होती है और मौसम के साथ देने पर अधिक उत्पादन भी कम मूल्य के कारण उसको लागत नहीं दे पाता है. क्या इस समस्या से निपटने के लिए अब एक बार देश के किसानों को मिश्रित खेती के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता नहीं है जिससे वे स्थानीय खपत के अनुरूप फसलों का उत्पादन कर सकें और अपने साथ देश के विकास में भी उचित योगदान दे सकें.
                                     आज भी हमारे देश में किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यही है कि उन्हें पारिवारिक रूप से विरासत में मिली खेती को उन्नत करने और आवश्यकता अनुरूप मिश्रित खेती करने के लाभ के बारे में जागरूक नहीं किया जाता है जिससे वह आसानी से एक नकदी फसल पर निर्भर होकर काम करता है. किसी भी तरह की विपरीत परिस्थिति में उसके पास अपने क़र्ज़ चुकाने से लगाकर कृषि लागत पाने तक की समस्या एकदम से सामने आ जाती है जिसका उसे कोई समाधान दिखाई नहीं देता है. इसके लिए तात्कालिक उपायों पर विचार करने के स्थान पर देश के कुछ राज्यों के अधिक समस्याग्रस्त जिलों में किसानों के लिए इस तरह की निगरानी वाली खेती करने का पायलट प्रोजेक्ट चला कर देखना चाहिए और उसके परिणामों पर विचार कर उसे देश के किसानों के सामने विकल्प के रूप में रखना और अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. इस तरह से संभव है कि किसानों की समस्या का कोई स्थायी समाधान सामने आये. देश की सरकार अर्थ व्यवस्था को सुधारने की कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले पर मानसून में कमी की कोई भी खबर सत्ता प्रतिष्ठान के चेहरे की रंगत को उड़ाने के लिए काफी होती है. सामान्य मानसून जिस तरह से पूरे देश के लिए समृद्धि लेकर आता है और किसानों को भी मानसून के साथ झूमने और अपनी प्रगति के बारे में जागरूक करने पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समग्र विचार करने की आवश्यकता है.
                                        आज देश का लगभग ९५% हिस्सा आकाशवाणी के प्रसारण क्षेत्र में आता है तो इसके सभी चॅनेल्स के माध्यम से नियमित तौर पर सुबह और शाम स्थनीय कृषि विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों की तरफ से मौसम पर विचार करने के बाद फसलों के अनुरूप सलाह दी जानी चाहिए जिससे किसानों को सही सलाह रोज़ ही मिल सके. किसान चॅनेल अपने अनुसार सही काम कर रहा है. खेत में पहुंचे हुए किसान के लिए रेडियो आसान होता है इसलिए संचार के इन माध्यमों का सदुपयोग करने किसानों को नियमित तौर पर जागरूक करने के बारे में सोचना चाहिए एक पूरा चॅनेल उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना समय पर सुबह शाम दी जाने वाली सलाह क्योंकि किसान चॅनेल दूसरे तरह से सहायता कर पा रहा है पर इसे अभी भी और अधिक दूर तक पहुँचाने की आवश्यकता है जिससे किसानों को खेती के इस अनदेखे दबाव से बचाया जा सके जो न चाहते हुए भी उन पर लगातार बना रहता है.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

काले धन के स्वरुप

                                                 देश के अंदर प्रवाहित होने वाले काले धन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए अब सरकार को इनकम टैक्स के साथ अन्य टैक्स सुधारों पर भी आज की मंहगाई की दरों के अनुरूप काम करना ही होगा वर्ना समय के साथ एक बार फिर से १९४८, १९६० और १९६८ में नोट बंद करने की गयी कवायद की तरह २०१६ के नोट बंद होने के बाद पाकिस्तान से आये नकली नोट और टैक्स चोरी वाली काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था के खड़े होने में देर नहीं लगेगी। देश में काफी सुधारात्मक प्रयासों के बाद भी मोदी सरकार रेटिंग एजेंसियों को यह भरोसा दिला पाने में नाकाम रही है कि देश में आर्थिक गतिविधियां सही रास्ते पर हैं जिससे देश की रेटिंग में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई दिया है जिस पर खुद पीएम मोदी ने अधिकारियों से सभी सम्बंधित विभागों की रिपोर्ट मांगी है। आज भी सरकारी खर्च को कम करना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है और जब तक इसमें सफलता नहीं मिलती तब तक स्थितियां सुधरने वाली नहीं हैं। सरकार को भी यह समझना होगा कि विनिवेश भारतीय परिस्थितियों में अल्पकालिक उपाय ही हो सकता है पर वह सरकार के खर्चों को कम करने का साधन नहीं बन सकता है।
                                 काले धन को कृषि के माध्यम से कुछ हद तक स्वीकार्य बनाये जाने की कोशशें भी देश में शुरू हो चुकी हैं इसलिए अब सरकार के लिए नयी तरह की चुनौतियाँ भी सामने आने वाली हैं क्योंकि बड़े किसानों के रूप में अब वे लोग भी सक्रिय होने लगे हैं जिनका कृषि से कोई मतलब कभी भी नहीं रहा है. कृषि योग्य आये के करमुक्त होने के कारण वे अब कृषि भूमि में निवेश करने लगे हैं तथा उससे होने वाली आय को अपनी आयकर विवरणी में दिखाकर काले धन के कुछ हिस्से को कानून सम्मत बनाने के प्रयास करते हुए दिखाई देने लगे हैं.इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को कृषि क्षेत्र में भी कुछ सुधार करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तब बड़े किसानों के रूप में काले धन वालों पर यहाँ भी कोई नियंत्रण नहीं लगाया जायेगा तब तक इस तरह की छोटी गतिविधियों से भी अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार लाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकती है. निश्चित तौर पर सरकार की नज़र हर ऐसे क्षेत्र पर है जिससे काले धन को कानूनन सम्मत बनाने की गतिविधयों का सञ्चालन किया जा सकता है पर अब हमें खुद ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में आगे बढ़कर स्वयं को सुधारना होगा.
                                   हर सुधार की अपेक्षा केवल सरकार से करने की मानसिकता से भी अब देश को बाहर आना ही होगा क्योंकि देश केवल सरकार चला रहे लोगों का ही नहीं होता है उसमें बड़ा योगदान आम जनता का होता है सरकारें और नेतृत्व तो बदलते रहते हैं पर हमें अपने पूरे जीवन में एक जैसी परिस्थितियों में ही रहना होता है. देश का आम नागरिक टैक्स चोरी करने में लिप्त नहीं होना चाहता है अब अगर सरकार करों के ढांचे में आज की आवश्यकता के अनुरूप सुधार कर पाने में सफल हो तो उसके टैक्स में बदले ही पहले कुछ सालों में कुछ कमी दिखायी दे पर आने वाले समय में टैक्स देने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी होने से कर संग्रह अभूतपूर्व तरीके से बढ़ सकता है. सरकारी पारदर्शिता को और भी अधिक जवाबदेह और कारगर बनाने से जहाँ एक तरफ आम लोगों का भरोसा सरकार में बढ़ सकता है वहीं उसके आह्वाहन पर जनता की तरफ से सकारात्मक रुझान भी दिखाई दे सकता है. शिक्षा को सस्ता करने की दिशा में भी कदम उठाये जाने के बाद ही लोगों में भ्रष्टाचार करने की मानसिकता को कम किया जा सकता है क्योंकि शिक्षा का बाज़ारीकरण हो जाने से आज हर अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के लिए चिंतित दिखाई देता है. अब समय आ गया है कि हर बात में सरकार की तरफ ताकने के स्थान पर हम नागरिक खुद भी अपने स्तर से देश के लिए सही कार्यों में रूचि लेना प्रारम्भ करने जिससे भविष्य में किसी सरकार को इतना बड़ा और कडा निर्णय न लेना पड़े.   
                                        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 16 मार्च 2016

कृषि, कर और चोरी

                                                देश के बारे में कोई भी जानकारी देते समय अक्सर ही यह कहकर बात की शुरुवात की जाती है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहाँ के ग्रामीण क्षेत्र की अधिकांश जनता आज भी कृषि आधारित अर्थ-व्यवस्था पर ही अपनी जीविका के लिए निर्भर है. देश के किसानों के पास आज भी पूरी तरह से आधुनिक खेती करने की सभी संसाधन उपलब्ध नहीं हो पाये हैं इसलिए ही संविधान में कृषि से होने वाली आय को आयकर और किसी भी तरह के अन्य कर से मुक्त रखा गया है. इस तरह की छूट देने के पीछे सरकार की यह मंशा स्पष्ट थी कि खेती में सब कुछ सदैव निर्धारित तरीके से ही होता रहे इस बात की निश्चितता नहीं होती है इसलिए ही किसानों को अपने उत्पाद के आधार पर हर तरह के अनावश्यक करों से मुक्ति दे दी जाये और आयकर के किसी भी मानक में उन्हें कहीं से भी न रखा जाये जिससे उनकी अनिश्चित आमदनी होने के चलते उन पर कोई अनावश्यक बोझ भी न पड़ जाये पर सरकार की इस मंशा का दुरूपयोग अमीरों ने किस तरह से किया इसका उदाहरण इस बात से ही समझा जा सकता है कि इस नियम के माध्यम से कर चोरी करने को एक बड़ा उपाय मान लिया गया है.
                 मात्र कुछ लोगों की कृषि से होने वाली आय कुछ अरब रुपयों से बढ़कर किस तरह से लाखों करोड़ों तक पहुंच गयी इस बात का जवाब किसी के पास भी नहीं है क्योंकि आयकर के सलाहकारों और इस नियम का लाभ उठाने वालों ने इस बात पर कभी गौर ही नहीं किया कि जिस सोच के साथ वे एक जिले में काम कर रहे हैं कहीं न कहीं यही सोच पूरे देश में काम कर रही है इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि एक पूर्व आयकर अधिकारी द्वारा मांगी गयी सूचना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया जिसमें यह पता चला कि वर्ष २०११/१२ में आयकर चुकाने वाले लोगों की कृषि आधारित आय २००० लाख करोड़ रुपयों से भी अधिक हो गयी ? बेशक इस धनराशि पर सरकार की कोई नज़र नहीं होती है और इसको केवल कागज़ों पर दिखाकर कालेधन को सफ़ेद करने का काम ही आसानी से किया जाता है तो यह भी मान जाना चाहिए कि देश में एक वित्तीय वर्ष में इतना कालाधन इस योजना का माध्यम से सफ़ेद किया गया ? किसी भी सरकार के पास क्या यही होना चाहिए कि जिस मद से उसे टैक्स नहीं मिल रहा है उस मद में आम लोगों द्वारा किया कहा जा रहा है इस बात की जांच भी न की जाये और इन लोगों को सुविधा के नाम पर बनाये गए नियमों की कमी का खुला लाभ उठाने के लिए छोड़ दिया जाये ?
                  संसद में यह मामला उठाये जाने के बाद जिस तरह से वित्त मंत्री का बयान आया कि इस सूची में कुछ बड़े नाम भी हो सकते हैं तो विपक्ष उन पर राजनीति करने के आरोप लगाने से बचे इस पर विपक्षी बेंचों से इस सूची को जारी करने की माँग भी की गयी पर इस मांग को वित्त मंत्री ने पूरी तरह से अनसुना ही कर दिया. किसानों के लाभ के लिए बनाये गए इस नियम का जिन भी लोगों ने दुरूपयोग किया है देश को उनके नाम जानने का पूरा अधिकार है और विभिन्न नियमों के पीछे छिपकर कर चोरी करने में जो भी लोग आगे हैं वे भले ही किसी भी श्रेणी के क्यों न हों उनके बारे में सरकार को संसद में पूरी जानकारी देनी चाहिए. देश को यह जानना है कि किसानों के लिए बनाये गए इस नियम के पीछे किन लोगों ने अपने काले धन को सफ़ेद करने के लिए पूरा लाभ उठाया है और उनकी कृषि कितनी बड़ी है कि देश में इतनी बड़ी संपत्ति कृषि से बनायीं जा सकती है जबकि आम किसान लगातार आत्महत्या करने पर मजबूर होता जा रहा है ? इस मामले में किसी को भी छोड़ा नहीं जाना चाहिए भले ही वह कितना भी प्रभावशाली ही क्यों न हो क्योंकि यह तो एक बानगी है यदि पूरे कानूनों का आंकलन किया जाये तो संभवतः पूरे देश में कालेधन की एक समानांतर अर्थव्यवस्था के भी चलने से इंकार नहीं किया जा सकता है.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 18 जनवरी 2016

देश का आर्थिक परिदृश्य

                                                                     देश में राजनैतिक कारणों से जहाँ वैश्विक आवश्यकता के अनुरूप बहुत सारे बड़े सुधारात्मक परिवर्तन करने के लिए मुख्य राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा के बीच रस्सा कशी के चलते रोड़े अटकते ही रहते हैं उसी परिस्थिति में आज चीन के चलते सामने आ रही वैश्विक मंदी के कारण देश पर भी उसका असर पड़ना शुरू हो चुका है. आज जिस तरह से पूरे विश्व में आर्थिक गतिविधियों में गिरावट देखी जा रही है और मई २०१४ में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सरकार की तरफ से आवश्यक आर्थिक सुधारों को लेकर जिस आशा और विश्वास का प्रदर्शन किया गया था आज वह उसमें कहीं से भी खरी उतरती नहीं दिख रही है. यह देश के लिए एक ऐसा समय है जिससे बच पाने का कोई रास्ता अभी दिखाई भी नहीं दे रहा है.जिन सुधारों के भरोसे सरकार देश की आर्थिक स्थिति को बदलना चाहती है आज इन सुधारों को लागू कर चुके देश भी गंभीर संकट से जूझ रहे हैं और इस तरह के सुधारों को ही भारत की उच्च आर्थिक प्रगति के लिए अंतिम नहीं माना जा सकता है क्योंकि घरेलू आर्थिक परिदृश्य के अनुरूप व्यवस्था को न ढालने का दुष्परिणाम भविष्य में देश को भुगतना ही पड़ेगा.
                    मूलतः कृषि पर आधारित भारतीय अर्थ व्यवस्था के लिए क्या विदेशों में अपनाये जा रहे किसी भी मॉडल से राहत लायी जा सकती है सबसे पहले इस पर गंभीर विचार आवश्यक है क्योंकि सरकार में चाहे कोई भी दल हो पर देश की आर्थिक संरचना से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है. भारत यदि २००८ की मंदी की चपेट में बुरी तरह से आने से बच गया था तो उसका मुख्य कारण हमारी मिश्रित अर्थव्यवस्था भी थी क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर से मांग में कमी आने की स्थिति में घरेलू बाज़ार ने भी देश की न्यूनतम आर्थिक गतिविधियों को जीवंत बनाये रखा जिससे देश ने यदि उस दौर में कुछ ख़ास पाया नहीं तो उसके पास खोने के नाम पर भी कुछ नहीं गया. हमारे देश के किसानों की स्थिति सुधारने के लिए अब सही दिशा में राष्ट्रीय नीति के माध्यम से कदम उठाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक हम अपने देश की कृषक आबादी की क्रय शक्ति को बेहतर नहीं कर पाते हैं तब तक हमारे उद्योगों के लिये केवल निर्यात पर टिके रहकर चल पाना संभव नहीं रहने वाला है. इस स्थिति में परिवर्तन अब बहुत आवश्यक है और सिक्किम में केंद्र सरकार इस विषय पर जो मंथन करने जा रही है उसके बेहतर परिणाम सामने आने की पूरी सम्भावना भी है.
                   आज सरकार और नीति आयोग द्वारा जिस तरह से आर्थिक विकास दर के ८% तक जाने की जो आशा दिखाई जा रही है उससे यही लगता है कि सरकार ने केवल अपनी बात को आगे रखने की कसम खा रखी है क्योंकि निर्यात दर और अन्य सूचकांक कहीं से भी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत नहीं दिखा रहे हैं और इन आंकड़ों से ज़्यादा असर बाज़ार पर दिखाई दे रहा है. अच्छा हो कि सरकार इस तरह के आंकड़ों में उलझने के स्थान पर अब संसद से लगाकर संसदीय समितियों तक में इस बात पर गंभीर चर्चा शुरू करे क्योंकि आज विपक्ष के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं है तो इस स्थिति में पहल सरकार को ही करनी होगी. महत्वपूर्ण बिलों पर दबाव के साथ आगे बढ़ने के स्थान पर विमर्श पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि राजनैतिक कारणों से किये जाने वाले विरोध को साथ में बैठकर सुलझाने से ही नीतिगत सुधार किये जा सकते हैं. अब देश के नेताओं को दलीय राजनीति से आगे बढ़कर यह देखना ही होगा कि इस समस्या से किस तरह से निपटा जा सकता है. राजनीति करने के लिए अन्य बहुत से अवसर भी हैं पर सत्ता और विपक्ष में हावी होने की राजनीति से देश का किसी भी तरह से भला नहीं होने वाला है.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

महाराष्ट्र और किसान

                                                            पूरे वर्ष में लगभग तीन हज़ार किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने की ख़बरों के बीच जिस तरह से केंद्र सरकार की तरफ से ३१०० करोड़ रुपयों की मदद की गयी है वह राज्य में राजनीति का नया मुद्दा भी बन गया है क्योंकि सरकार में भागीदार शिवसेना ने भी राज्य के लिए ५०००० करोड़ के पैकेज की मांग की थी. यह सही है कि सूखे और मौसम के विपरीत प्रभाव के चलते देश के कई राज्यों में किसानों के लिए संकट लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं जबकि सरकारी स्तर पर जो कुछ भी किया जा रहा है वह समस्या के समाधान के स्थान पर केवल तत्कालिक आवश्यकता की पूर्ति की तरफ जाता हुआ ही दिखाई दे रहा है. इस तरह की विपरीत परिस्थिति में यदि केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से किसानों को खेती की आधुनिकतम तकनीक के साथ परंपरागत खेती की तरफ बढ़ाया जाए तो क्या उससे इनकी स्थिति में कुछ परिवर्तन समभाव है ? आज भी किसानों के नाम पर जिस तरह से केवल दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में बैठे हुए कुछ अधिकारी और नेता पूरी नीति बना डालते हैं क्या वे देश की ज़मीनी स्थिति से मेल भी खाते हैं इस सवाल का जवाब आज किसी भी सरकार के पास नहीं है और दुर्भाग्य से कोई भी नेता या अधिकारी इस बात के लिए जागरूक तथा प्रयासरत भी नहीं दिखाई देता है.
                                    देश में सरकारें बदलने का किसानों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और सत्ता के गलियारों में बैठे हुए नेता अपनी सीमित सोच के साथ अधिकारियों पर हावी रहा करते हैं जिससे सही नीतियां बनाये जाने के स्थान पर केवल मंत्रियों और राजनैतिक प्रतिष्ठान को खुश करने की नीतियां ही अधिक बनायीं जाती हैं. लम्बे समय से महाराष्ट्र के किसानों का मुद्दा राज्य की विधान सभा से लगाकर लोकसभा तक गूंजता रहा है और इस बीच केंद्र और राज्य में सत्ता परिवर्तन भी हो गया है पर किसानों की अनदेखी किये जाने का सवाल अभी भी उसी तरह से अनुत्तरित है. अब इस बारे में गंभीरता से सरकारी नीतियों पर विचार करने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक सरकार की तरफ से समस्या के सही मूल को खोजने के बारे में नहीं सोचा जायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में पूरी व्यवस्था को सुधारा नहीं जा सकता है और किसानों के परिवारों को इस तरह के संकट का सामना करने के लिए विवश होना ही पड़ेगा. खेती में जिस स्तर पर परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता और सरकारी सहयोग की अपेक्षा है भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान उसमें पूरी तरह से चूकते हुए ही नज़र आ रहे हैं.
                            यदि कांग्रेस की नीतियों में कोई कमी थी तो पिछले डेढ़ साल में भाजपा की सरकारों ने वहां पर क्या उपलब्धि हासिल की है यह केवल वाद विवाद और राजनीति का विषय ही हो सकता है क्योंकि यदि मामला किसी एक राजनैतिक दल से जुड़ा हुआ होता तो परिवर्तन की शुरुवात हो चुकी होती पर यह पूरा मसला ही अव्यवस्था से जुड़ा हुआ है और इसे सुधारने के लिए अब सरकार को नए सिरे से सोचने की आवश्यकता भी है. पुरानी लीक पर चलने के स्थान पर अब सरकार को इस बारे में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सूखे से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के लिए स्थानीय स्तर पर उपयोगी वस्तुओं की खेती करने के बारे में प्रोत्साहित करने के बारे में सोचना चाहिए और उसके परिणामों पर विचार करते हुए ही अन्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए नीतियां बनानी चाहिए पर सरकारें इस मामले में केवल आर्थिक सहायता और ऋण माफ़ी तक ही अपनी भूमिका को सीमित करने में खुश हो जाती है जिससे भी समस्या का सही समाधान नहीं दिखाई देता है. देश के किसानों को इस तरह तात्कालिक सहायता के स्थान पर पूरी तरह से नयी कारगर नीति के बारे में सरकार को नए सिरे से सोचने से ही सही समाधान को खोजा जा सकता है वर्ना इस मुद्दे पर आत्महत्या करते किसानों को लोकतंत्र के मंदिरों में नेता श्रद्धांजलि देकर अपने कर्तव्य में तो लगे ही हैं.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 29 जून 2015

एफसीआई और गेंहूँ का भंडार

                                                      इस वर्ष असमय वर्षा और लगातार मौसम ख़राब रहने के चलते जिस तरह से सरकारी क्षेत्र की गेंहूँ खरीद में स्थापित नियमों में ढिलाई दी गयी थी और एफसीआई द्वारा लगभग २७ मलियन टन गेंहूँ का स्टॉक जमा कर लिया गया था आज वह उसके लिए बड़ी समस्या बनता हुआ दिखाई दे रहा है. एफसीआई के अनुसार यह गेंहूँ गुणवत्ता में कुछ कमज़ोर साबित हो रहा है क्योकि सरकार की तरफ से उसे नियमों के अनुपालन में ढील देने की बात कही गयी थी जिससे किसानों के नुकसान को कम करने में मदद की जा सके. केंद्रीय स्तर पर लिए गए इस फैसले से निश्चित तौर पर किसानों को लाभ मिला और उन्हें अपनी कुछ कम गुणवत्ता की फसल के भी सही दाम मिल गए थे पर अब यही खरीद एफसीआई के लिए बड़ी समस्या बन गयी है और एक अनुमान के अनुसार उसके लिए लगभग ७ मिलियन टन गेंहूँ को खुले बाज़ार में बेचने को मजबूर होना पड़ सकता है जहाँ पहले से ही वर्तमान आयात नीतियों के चलते सस्ते आयातित गेंहूँ की भरमार है.
                        एक अनुमान के अनुसार देश के पीडीएस सिस्टम में लगभग २० मिलियन टन गेंहूँ की खपत की सम्भावना है पर इस कम गुणवत्ता के गेंहूँ के चलते अब एफसीआई इससे सम्बंधित किसी भी स्थिति में इससे अधिक स्टॉक को बाजार में बेचने को बाध्य होगी क्योंकि इसका लम्बे समय तक भण्डारण भी नहीं किया जा सकता है. आज इस ७ मिलियन टन गेंहूँ और इसमें लगे जनता के पैसे के सदुपयोग के लिए गेंहूँ आयत की नीतियों में इस वर्ष कुछ परिवर्तन करने की आवश्यकता है जिससे आयातित गेंहूँ के सामने घरेलू गेंहूँ को भी समय रहते बाजार में बेचा जा सके. यदि सरकार की तरफ से इस वर्ष गेंहूँ आयात के नियमों में आयात शुल्क इतना बढ़ा दिया जाये कि वह घरेलू से कम मूल्य पर नहीं बेचा जा सके तो एफसीआई की समस्या का सही तरह से समाधान भी हो सकता है. आवश्यकता पड़ने पर आयात किये जाने की नीति का सरकार को पूरा ख्याल रखना चाहिए पर एफसीआई और जनता से जुड़े मद्दों पर भी समय रहते ध्यान देने की आवश्यकता भी है.
                        यदि इस मामले में समय रहते सरकार की तरफ से कोई ठोस नीतिगत निर्णय नहीं लिया गया तो निश्चित तौर पर एफसीआई के लिए गंभीर स्थिति बन सकती है. इसके हितों को ध्यान में रखते हुए अब सरकार को पहल कर देनी चाहिए क्योंकि निजी आयातकों के लिए सही समय से यदि स्पष्ट नीतियां सामने नहीं आयीं तो विदेशों से आयातित गेंहूँ को आने में समय नहीं लगेगा और निजी क्षेत्र द्वारा इस कम गुणवत्ता के गेंहूँ की खरीद से पूरी तरह से किनारा कर लिया जायेगा. यदि देश के किसानों के सामने कोई संकट आता है तो केवल सरकार ही क्यों हम आम लोग भी उससे निपटने के लिए कुछ करने के लिए तत्पर दिखाई देने चाहिए तथा देश के खाद्य व्यापार से जुड़े हुए लोगों को भी विचार करते हुए इस गेंहूँ की खरीद पर भी ध्यान देना चाहिए जिससे सरकार का घाटा भी नियंत्रण में रहे और आने वाले समय में देश के किसानों की समस्याओं और उनके हितों से आमलोग जुड़ाव भी महसूस कर सकें. इस छोटे से सहयोग से आम लोग उस किसान के लिए परिस्थितियों में सुधार करने में अपना छोटा पर अत्यंत महत्वपूर्ण सहयोग कर सकते हैं जो हर विपरीत परिस्थिति में भी देश का पेट भरने का काम करने में लगा रहता है.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 7 जून 2015

किसानों को सब्सिडी

                                            आज देश जब प्रगति के आयामों पर आगे बढ़ता ही जा रहा है तो उस स्थिति में किसानों के लिए बनायीं जाने वाली किसी भी योजना में किसी भी स्तर पर होने वाली देरी से जहाँ समस्याएं और भी गहराती जा रही हैं वहीं पिछले कई वर्षों से किसानों को कालाबाज़ारी से मुक्ति दिलवाने के लिए खाद और डीज़ल पर डायरेक्ट सब्सिडी दिए जाने के कई कार्यक्रमों पर भी सही दिशा में प्रगति नहीं हो पा रही है. इस पूरे मामले में अभी तक केंद्र सरकार के प्रयास इसलिए भी सफल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि यह मामले केंद्र से अधिक राज्यों की कोशिशों पर ही निर्भर कर रहे है तथा केंद्र के पास केवल नीतियां बनाने के अलावा कुछ भी नहीं है. राज्यों की तरफ से इस महत्वपूर्ण परियोजना के लिए आवश्यक कार्यवाही नहीं की जा रही है जिससे भी केंद्र के चाहने के बाद भी अभी यह सब केवल कागज़ों में ही सिमटा हुआ सा लगता है और आज भी किसानों को सही तरह से सब्सिडी का लाभ देने के लिए कोई कारगर व्यवस्था नहीं बन पायी है. पहले से ही परेशान किसानों के लिए जब तक केंद्र और राज्य मिलकर काम नहीं करेंगें तब तक खेतों और किसानों को सही सहायता नहीं मिलने वाली है.
                     आज जब अधिकांश राज्यों में राजग की सरकार है तो इस स्थिति को सुधारने के लिए खुद पीएम को ही प्रयास करने की आवश्यकता दिखाई देने लगी है क्योंकि संभवतः राज्यों को यह योजना समझ ही नहीं आ रही है या फिर राज्यों के स्तर पर उपेक्षा करते हुए इस योजना को समाप्त करने की कोई ऐसी योजना भी बनायीं जा रही है जिससे केंद्र की यह महवपूर्ण योजना अपने आप ही दम तोड़ दे ? आज देश में संप्रग सरकार द्वारा शुरू की गयी डायरेक्ट कैश बेनिफिट की योजना के माध्यम से बहुत कुछ सुधारने की कवायद चल रही है क्योंकि यह एक ऐसी परिकल्पना है जिसमें केंद्र द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी के हर तरह के दुरूपयोग को रोकने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किये जाने हैं. इस तरह की किसी भी योजना में सबसे बड़ी बात यही रहती है कि भ्रष्टाचारियों के पास करने के लिए कुछ शेष नहीं रह जाता है और सरकारी धन और संसाधनों के हर तरह के दुरूपयोग पर काफी हद तक नियंत्रण लग जाता है आज भी देश के कमज़ोर वर्गों तक सब्सिडी पहुंचाए जाने की कवायद को सही तरीके से लागू नहीं किया जा सका है और यह केंद्र के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने भी आ रहा है.
                   देश की बड़ी आबादी वाले राज्यों यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि में इस योजना के लिए जिला स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है केंद्र के प्रयासों से जहाँ काफी बड़ी संख्या में जन-धन खाते खुल चुके हैं वहीं अब किसानों के खेतों के ब्योरे को बैंकों से जोड़ने और उनकी आधार संख्या को तेज़ी से बनाये जाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक पूरी तरह से हर स्तर पर सही पहचान को नहीं नहीं अपनाया जायेगा तब तक डीबीटी के दुरूपयोग की भी संभावनाएं बनी रहने वाली हैं. अच्छा हो कि इस काम को करने के लिए राज्यों को कुछ प्रोत्साहन भी दिया और खराब काम करने वाले राज्यों को दण्डित करने का प्रयास भी होना चाहिए जिससे राज्यों को इस मूलभूत ढांचे को सुधारने के लिए दबाव भी महसूस हो सके. यदि राजग के बाहर के राजनैतिक दल इस मामले में सही दिशा में सहयोग नहीं कर रहे हैं तो केंद्रीय कृषि विभाग द्वारा यह आंकड़े भी सार्वजनिक रूप से जारी किये जाने चाहिए जिनमें राज्यों द्वारा इस कार्य के लिए किये गए प्रयासों को जनता के सामने लाया जाये तथा अन्य दलों के किसी भी तरह के दुष्प्रचार के बारे में भी जनता को सही स्थिति स्पष्ट करने में मदद मिल सके. अब महत्वपूर्ण परियोजनाओं और प्रयासों में राजनैतिक दुरूपयोग को रोकने के लिए हर स्तर पर प्रयास आवश्यक हो चुके हैं जागरूक जनता के सामने इन मुद्दों को भी उठाया जाना चाहिए जिससे जागरूक तथा काम ना करने वाली राज्य सरकारों के काम के बारे में जनता जान सके.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 16 मार्च 2015

बेमौसम बरसात- सरकार और किसान

                                                         आंकड़ों के अनुसार १९६७ के बाद सबसे अधिक वर्षा देखने वाला मार्च महीना पूरे देश के खाद्यान्न उत्पादन पर गंभीर असर डालने की तरफ बढ़ गया है क्योंकि जिस तरह से अभी तक पश्चिमी विक्षोभ के चलते मार्च महीने में ही चार बार तेज़ बारिश का सामना किसानों को करना पड़ा है वह देश की आर्थिक प्रगति पर भी बुरा असर डालने वाला साबित होने वाला है. एक तरफ जहाँ इससे लगभग तैयार होने की कगार पर पहुंची गेंहूँ की फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है वहीं रोज़मर्रा की सब्ज़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति भी इससे बुरी तरह से प्रभावित हो चुकी है. आज भी मौसम की इस तरह की बेरुखी से किसान और सरकार के पास करने और बचाने एक लिए बहुत कुछ नहीं होता है पर अब इस नुकसान से किसानों को होने वाले नुकसान से किस तरह से निपटा जाये यह महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है क्योंकि मार्च का महीना होने के चलते अधिकांश सरकारी अधिकारी पूरे वित्तीय वर्ष को समेट्ने में लगे रहते हैं और साथ ही अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए विभिन्न तरह की वसूली पर भी जोर रहा करता है.
                                   किसानों को सही मदद पहुँचाने के लिए ज़िले स्तर पर कृषि विभाग और राजस्व विभाग द्वारा समन्वय कर अपने क्षेत्रों में नुकसान का सही आंकलन करने के बारे में विस्तृत कार्ययोजना पर विचार करना चाहिए और इसके साथ ही किसानों के लिए कुछ राहत के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि राज्य और केंद्र सरकारों की तरफ से जो भी मदद दी जाती है वह कहीं न कहीं से ज़िले स्तर के इन अधिकारियों और विभागों के दम पर ही होती है जिसे अधिकांश बार बड़ी ही लापरवाही के साथ तैयार किया जाता है. नुकसान के आंकलन पर ही केंद्रीय सहायता भी निर्भर किया करती है पर ऐसी विपरीत परिस्थिति में किसी भी किसान के हो चुके नुकसान की भरपाई कोई भी नहीं कर सकता है. सरकार की तरफ से किसानों की फसलों के सामूहिक बीमे के बारे में भी गहन योजना के बारे में विचार किये जाने का समय अब आ चुका है क्योंकि बीमा अब सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में नए आयाम छूने की तरफ बढ़ने ही वाला है तो इस स्थिति का दोनों ही पक्षों को लाभ उठाना चाहिए जिससे नुकसान की कुछ क्षति पूर्ति की जा सके.
                                     देश के किसान पहले ही बहुत विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहे हैं और इस तरह के प्राकृतिक नुकसान से पूरे देश की आर्थिक प्रगति पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है जिसे सुधारने के लिए आज केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर जुटी हुई है. भारत की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए अब मौसम पर सटीक भविष्यवाणी करना संभव हो पाया है पर आज भी खेतों में तैयार खड़ी फसलों पर कुछ व्यवस्था नहीं बनायीं जा सकी है जिससे किसानों को भले ही लाभ न दिया जा सके पर उनकी लागत को पूरा करने की दिशा में सोचा जा सके. प्राकृतिक आपदाओं से खेती को बचाया नहीं जा सकता है पर किसानों के लिए सही योजनाओं के माध्यम से उनके घाटे को कम करने के बारे में सोचा जा सकता है. आज जो तंत्र राज्यों में काम कर रहा है वह पूरी तरह से गला हुआ है क्योंकि भारी भरकम विभागों के पास बेहतर संसाधन दिए जाने के बाद भी उनकी तरफ से काम को सही तरीके से नहीं किया जा रहा है. इस तरह की मौसमी मार से ज़िले स्तर के तंत्र को स्वतः ही सक्रिय होने के बारे में तैयार किया जाना चाहिए जिससे वह राज्यों की राजधानियों या केंद्र से निर्देशों को प्राप्त करने के स्थान पर स्वयं ही आगे बढ़कर काम करने के लिए तैयार हो सके.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 22 फ़रवरी 2015

भूमि अधिग्रहण कानून और विरोध

                                                              प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई मोदी सरकार ने उद्योगपतियों के साथ अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को कामकाजी सरकार के रूप में दिखाने के चक्कर में जिस तरह से प्रस्तावित भूमि अधिग्रहण कानून में किसानों की पूरी तरह से अनदेखी की थी यह उसका ही दुष्प्रभाव है कि गाँधीवादी समाज सेवी अन्ना हज़ारे ने इसके खिलाफ बाकायदा अनशन शुरू कर दिया है. इस बिल के प्रस्ताव करने के साथ ही आम किसानों की चिंताओं को किनारे किये जाने की आशंकाएं सामने आने लगी थीं पर संभवतः कमज़ोर विपक्ष के चलते मोदी सरकार को ऐसा आभास होने लगा था कि इस बिल को कानून बनाने में कोई अड़चन सामने नहीं आने वाली है पर यहीं पर उसने एक महत्वपूर्ण गलती कर दी थी जिससे उसके किसान विरोधी होने के एहसास जनता को होने लगा है. मोदी की कार्यशैली प्रारम्भ से एक तरफ़ा रहा करती है और यह गुजरात में काफी हद तक कामयाब भी रही पर उसी शैली को अपनाने में उनको दिल्ली में क्या कुछ झेलना पड़ सकता है यह सामने आने लगा है व्यापरिक हितों पर कृषि प्रधान देश के किसानों की अनदेखी कैसे संभव है यह मोदी भूल गए लगते हैं ?
                      अपने तानाशाही रवैये के चलते मोदी इसे कानूनी रूप देने में सफल भी हो सकते थे पर राज्यसभा में कांग्रेस के समर्थन के बिना कोई भी बिल आसानी से पारित नहीं हो सकता है जिस कारण से मोदी के लिए बड़ा संकट सामने आ गया है और कांग्रेस ने शुरू से ही इस बिल के कुछ प्रावधानों पर अपनी आपत्ति जता दी थी. भाजपा और मोदी की इस मामले में रणनीतिक चूक यही रही है कि खुद भाजपा ने पिछली लोकसभा में जिन मुद्दों पर बाकायदा विरोध कर संशोधन कराये थे वे अब इस नए बिल से गायब कर दिए गए हैं. कांग्रेस की तरफ से विरोध के चलते मोदी इन बिलों को संसद के संयुक्त अधिवेशन में पारित करा सकते हैं पर पूरे प्रकरण में भाजपा और मोदी की छवि किसान विरोधी बनने की पूरी सम्भावना भी है जो कि आज भाजपा नहीं चाहती है. पहले जम्मू कश्मीर में अपने मुद्दों से पीछे हटने, दिल्ली में अप्रत्याशित हार और बिहार में रणनीतिक चूक के बाद अब क्या भाजपा/ सरकार के शीर्ष नेतृत्व के रूप में शाह/ मोदी इस स्थिति में रह गए हैं कि वे किसी भी मसले पर उतनी मनमानी कर सकें जैसी अभी तक वे करते रहे हैं ? देश के विकास के लिए कानूनों में बदलाव होना चाहिए पर इतने मूलभूत परिवर्तन जो अंग्रेज़ों के ज़माने के हैं उनकी तरफ लौटने से आखिर देश को क्या हासिल हो सकता है ?
                              मोदी सरकार इन परिवर्तनों के बारे में कुछ भी नहीं सोचती यदि अन्ना ने इस मसले पर आंदोलन न शुरू किया होता और दिल्ली की तरफ कूच भी न किया होता ऐसे आंदोलनों से एकदम से कुछ असर नहीं पड़ता है पर जिस तरह से संघ के किसान मज़दूर संगठनों ने भी अन्ना के आंदोलन के साथ होने की घोषणा कर दी तो सरकार के लिए अपने कदम पीछे खींचना अपरिहार्य सा लगने लगा है. इस परिस्थिति केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह की तरफ से किसान नेताओं से मिलने की पहल की गयी है और उनके मसलों पर गंभीरता से बात करने के लिए उन्हें समय भी दिया गया है तो यह एक अच्छा संकेत ही है. देश विकास करे पर किसानों की उर्वरा भूमि के दम पर क्या किसी भी औद्योगिक विकास का समर्थन किया जा सकता है यह सोचने का विषय है जिस पर मोदी सरकार ने कोई ध्यान ही नहीं दिया था. गुजरात और देश के अन्य क्षेत्रों में बहुत अंतर है क्योंकि गुजरात में विभिन्न कारणों से खाली पड़ी भूमि बहुत मात्रा में थी और उसके औद्योगिक उपयोग से किसी को कोई अंतर नहीं पड़ने वाला था पर जब पूरे देश की उपजाऊ भूमि के इस अराजक तरीके से अधिग्रहण के मंसूबे सरकार ने पाल रखें हों तो संगठनों और राजनैतिक दलों के सक्रिय होने से ही बात बनती है. देश हित में मोदी सरकार को अब राजनैतिक दृढ़ता के साथ संवेदनशील होने और निर्णय करने की ज़रुरत आ चुकी है.                 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

अक्षय ऊर्जा और राजनीति

                                                पीएम मोदी ने विज्ञान भवन में आयोजित अक्षय ऊर्जा वैश्विक निवेश सम्मलेन में बोलते हुए राजनैतिक दलों और सरकारों पर निशुल्क बिजली दिए जाने के लुभावने मुद्दे पर जिस तरह से हमला बोला वह कहीं न कहीं से सीधे दिल्ली में हाल में बनी आप सरकार के उन दावों पर प्रश्नचिन्ह की तरह ही है जिसमें आप ने दिल्ली में बिजली और पानी के बिलों में बड़ी कटौती किये जाने के लिए हर संभव प्रयास किये जाने की बात कही है. पीएम को इस तरह के किसी भी मुद्दे पर बोलने से पहले यह देखना चाहिए कि देश की ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए केंद्र और राज्यों में किस तरह से बेहतर समन्वय के साथ आगे बढ़ा जा सकता है और जहाँ तक फ्री या कम दरों पर बिजली देने कई बात है तो पीएम के इस तरह के बयान का कोई सार्थक मतलब इसलिए भी नहीं निकल सकता है क्योंकि खुद पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार किसानों को फ्री में पहले से ही बिजली देने में लगी हुई है और जब तक इस तरह की प्रवृत्तियों पर पूरी तरह से कानूनी अंकुश नहीं लगाया जाता है तब तक केवल सम्मेलनों में बयान देने से स्थितियां तो नहीं सुधरने वाली हैं.
                                                    अपने गुजरात में सरकार चलाने के समय जिस तरह से मोदी ने वहां पर उपलब्ध पवन ऊर्जा के सटीक दोहन के बारे में नीतियां बनायीं और उसके बाद सौर ऊर्जा को भी बढ़ावा दिया तो ठीक उसी तरह से देश कि विभिन्न राज्यों के भौगोलिक स्वरुप के अनुसार प्राकृतिक संसाधनों से बिना छेड़छाड़ किये यदि हम बिजली के उत्पादन की तरफ बढ़ सकते हैं तो वह अपने आप में सही मार्ग हो सकता है. पीएम द्वारा सांकेतिक रुप से आप की सरकार के दावों पर प्रश्नचिन्ह लगाने से उनकी खुद की गरिमा ही कम होती है क्योंकि अब आप का कोई भी छुटभैय्या नेता उनके इस बयान पर अपनी बात कह सकता है. देश के संसाधनों के बेहतर उपयोग के द्वारा ही देश के हर राज्य को आगे बढ़ाया जा सकता है पर ऐसा भी नहीं है कि हर राज्य की परिस्थितियां उतनी आसान हों जितनी गुजरात की रही थीं ? उस दशा में अक्षय ऊर्जा के लिए एक राष्ट्रीय नीति को बनाये जाने की आज बहुत आवश्यकता है जिसे उस पर चलने वाले राज्यों के संस्थानों और नागरिकों को अक्षय ऊर्जा के संयन्त्रों की बेहतर आपूर्ति के बारे में आगे बढ़कर काम किया जा सके. इस बारे में कोई पायलट प्रोजेक्ट बनाकर एक जैसे भौगोलिक वातावरण में देश के विभिन्न स्थानों पर उसे प्रायोगिक तौर पर लागू किये जाने के बारे में सोचा जा सकता है.
                                 आज देश के उत्तरी राज्यों में आबादी अधिक होने के कारण ऊर्जा का संकट अधिक दिखाई देता है तो इसके लिए इन राज्यों में उपभोक्ताओं को सीधे ही अपने उपयोग के लिए बिजली उत्पादन के बारे में जागरूक कर विभिन्न तरह की योजनाएं सामने लानी चाहिए. यदि एक सामान्य स्थिति में किसी क्षेत्र विशेष में सौर ऊर्जा से सम्बंधित घरेलू संयंत्रों को लगाने के लिए सरकार बैंकों के माध्यम से सस्ती दरों पर लोन की व्यवस्था कर सके तो आने वाले दिनों में आम लोग भी इन संयंत्रों को अपने घरों पर आवश्यकता के अनुसार लगाने के बारे में सोचना शुरू कर सकते हैं. देश को धरातल पर कारगर नीतियों की आवश्यकता है और अब जब गैस सब्सिडी के चलते सरकार के पास नागरिकों के विभिन्न तरह के खातों की जानकारी भी है तो इस स्थिति में इन संयंत्रों पर दी जाने वाली किसी भी सहायता में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को सीधे उपभोक्ता को हस्तांतरित किया जा सकता है. देश के आर्थिक पुनर्निर्माण के साथ मेक इन इंडिया की अवधारणा को सार्थक करने में इस तरह की नीतियां बहुत कारगर साबित हो सकती है क्योंकि इससे जहाँ ऊर्जा के संकट को दूर किये जाने में मदद मिलेगी वहीं एक स्थायी मांग बने रहने के चलते यह उद्योग लम्बे समय तक टिके रहने में सफल होने वाला साबित हो जायेगा. संयंत्रों के देश में निर्माण पर छूट देकर स्थानीय कामगारों के लिए रोज़गार के अवसरों को बढ़ाया जा सकता है और इसके साथ ही बैंकों के कारोबार में निचले स्तर तक गतिशीलता भी लायी जा सकती है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 14 जनवरी 2015

नदियों को जोड़ने के लाभ-हानि

                                                      देश में एक तरफ जहाँ केंद्र सरकार गंगा नदी को एक उदाहरण मानकर सभी नदियों की सफाई को लेकर चिंतित नज़र आती है वहीं उसके द्वारा नदियों को जोड़े जाने की नीति पर पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा आपत्ति जताए जाने के बाद भी आगे बढ़ना किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है. सरकार का मानना है कि देश में बाढ़ और सूखे के दोहरे संकट से निपटने के लिए नदियों को जोड़ा जाना आवश्यक है जिससे एक जगह के अतिरिक्त पानी को दूसरी जगह कम पानी वाले क्षेत्र में उपयोग के लिए उपलब्ध कराया जा सके. भारतीय परिप्रेक्ष्य में इस योजना को लेकर आशंकाएं इसलिए भी अधिक व्यक्त की जा रही हैं क्योंकि लगभग एक जैसे क्षेत्र से निकलने के बाद भी नदियों के जल और जैविक विविधता में कोई समानता नहीं है जिसके चलते जब इस तरह की किन्हीं दो नदियों को आपस में जोड़ा जायेगा तो उसके पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका क्या दुष्प्रभाव पड़ेगा इसकी अभी कोई जानकारी या अध्ययन सरकार के पास नहीं है. विकास के लिए आवश्यक क़दमों को उठाया जाना ज़रूरी है पर जब तक इस विकास को पर्यावरण के अनुकूल नहीं रखा जायेगा तब तक इस विकास की कीमत तो देश को चुकानी ही पड़ेगी.
                                                     सिंचाई परियोजनाओं और जल संकट को ध्यान में रखते हुए बड़ी नदी परियोजनाओं पर काम करने के स्थान पर यदि स्थानीय स्तर पर जल प्रबंधन को अधिक महत्त्व दिया जाये तो इससे वास्तव में अधिक लाभ हो सकता है क्योंकि बड़ी नहर परियोजनाओं के लिए जितनी बड़ी संख्या में पलायन और भूमि के जलमग्न होने की सम्भावना रहती है छोटी परियोजनाओं द्वारा उससे भी बचा जा सकता है. आज भी देश के उत्तरी भाग में लगभग हर शहर के साथ कभी वर्ष भर जीवित रहे वाली बरसाती नदियों की उपस्थिति भी है क्योंकि पुराने समय में जलसंकट से निपटने के लिए लोग नदियों के किनारे ही बसने को प्राथमिकता दिया करते थे आज यदि नदियों को जोड़ने से पहले सरकार केवल इन नदियों को फिर से पुनर्जीवित करने के बारे में सोचना शुरू करे और इससे स्थानीय लोगों के जुड़ाव और कर्तव्य को एक साथ ला सके तो देश भर में किसी समय सदानीरा रहने वाली पर अब नाले में बदल चुकी बहुत सारी नदियां पुनर्जीवित हो सकती हैं. यह काम ऐसा होगा जिसमें जनता का जुड़ाव भी होगा साथ ही नदियों के प्रति उसके कर्तव्य की पूर्ति भी हो सकेगी और आम लोगों से जुड़ने के बाद यह अपने आप ही नदियों को साफ़ रखने के कार्य से भी जुड़ ही जाना वाला है.
                                                 देश में जल संकट से निपटने के लिए बेशक सरकार के प्रयास सही है पर पर्यावरण विशेषज्ञों की बातों को पूरी तरह से अनदेखा किया जाना क्या सरकार के उस मन्त्र के साथ सटीक बैठता है जिसमें वह "सबका साथ सबका विकास" जैसी बातें करने से पीछे नहीं रहती है ? बेशक आज सरकार के समर्थकों में ऐसे बहुत सारे वैज्ञानिक भी हो सकते हैं जिनको इस परियोजना पर कोई आपत्ति न हो पर जब मामला पर्यावरण जैसे संवेदनशील मुद्दे से जुड़ा है तो क्या सरकार केवल किसी बड़ी परियोजना को शुरू करने के लिए अन्य लोगों की अनदेखी कर सकती है. देश, समाज और विकास के लिए पर्यावरण की अनदेखी क्या आने वाले दशकों में हमें भारी नहीं पड़ने वाली है क्योंकि एक बार जिस प्राकृतिक तंत्र को हम अपने स्वार्थ के हिसाब से बदल देंगें तो क्या वह हमारे चाहने पर फिर से उसी तरह का हो पायेगा और इस प्रयास में जैविक विविधता का जो भी नुकसान हमें होने वाला है उसको क्या हम दोबारा से प्राप्त कर सकेंगें ? मोदी सरकार ने जिस तरह से विकास के लिए पर्यावरण की अनदेखी करनी शुरू कर दी है वह देश के लिए बहुत घातक ही साबित होने वाली है क्योंकि अब विकास के आगे किसी भी अन्य प्राथमिकता के बारे में सोचना सरकार बंद कर चुकी है.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 20 मई 2014

मानसून और भारतीय कृषि

                                             अभी तक अल नीनो प्रभाव के कारण मानसून के कमज़ोर या अलग तरीके से व्यवहार करने के अनुमानों को गलत साबित करते हुए जिस तरह से बंगाल की खाड़ी से मानसून ने अपनी सामान्य गतिविधियाँ शुरू कर दी हैं और मौसम वैज्ञानिक उसकी प्रगति पूरी तरह सही बता रहे हैं वह देश के कृषि क्षेत्र के लिए एक बड़ी उत्साहजनक खबर है. आज भी भारतीय कृषि का अधिकतर हिस्सा मानसून पर ही आधारित है तथा उसके किसी भी तरह से कमज़ोर या अलग व्यवहार करने भारतीय अर्थ व्यवस्था पर उसका कुप्रभाव आसानी से ही पड़ जाया करता है. आज भारतीय मौसम वैज्ञानिकों के पास पहले के मुकाबले मौसम की अधिक सटीक पूर्वानुमान लगाने की क्षमता आ चुकी है तो उस परिस्थिति में अब कृषि से जुडी योजनाएं बनाने और किसी भी विपरीत परिस्थिति से निपटने के मामलों में देश पहले के मुकाबले अधिक आत्म निर्भर हो चुका है. इस परिदृश्य को अभी और भी सुधारने की आवश्यकता है क्योंकि कृषि भारतीय अर्थ व्यवस्था की रीढ़ सदैव ही बनी रहने वाली है.
                                            भारत ने मौसम के क्षेत्र में जिस तरह से पूर्वानुमान लगाने की तकनीक में धीरे धीरे महारत हासिल करने की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं उसका ही असर है कि आज देश में लोगों को मौसम विभाग पर भरोसा होने लगा है फिर भी रोज़ ही इस सम्बन्ध में आने वाली तकनीकी पर देश को विचार करने और उनकी स्थापना के बारे में सोचने की आवश्यकता भी है. केंद्रीय स्तर पर जो सफलता मौसम विभाग को मिल रही है अब विकसित देशों की तरह उन सूचनाओं को सही तरह से उपयोग में लाने की कला का विकास भी देश को सीखना ही होगा क्योंकि केंद्र सरकार या केन्दीय मौसम विभाग के पास केवल इस तरह के अनुमानों को लगाने की क्षमता ही है और उसका धरातल पर क्रियान्वयन राज्यों को ही करना होता है. राज्य सरकारों को भी अब अपने यहाँ के कृषि वैज्ञानिकों के साथ केंद्रीय स्तर से मिलने वाली सूचनाओं को ध्यान में रखते हुए सरकारी योजनाओं पर अमल करने की आवश्यकता है. देश के विकास में अब केंद्र और राज्यों के समवेत प्रयासों की आवश्यकता है पर दुर्भाग्य से इन दोनों सत्ता केन्द्रों के बीच अभी तलवारें ही खिंची रहा करती हैं.
                                            आज जब मानसून पूरी भारतीय अर्थ व्यवस्था के साथ दक्षिण एशिया की आर्थिक गतिविधियों का सञ्चालन भी करता है तो उसके लिए सरकारी प्रयासों के साथ नागरिकों को भी बेहतर सूचनाएँ देने की व्यवस्था की जानी चाहिए. इस पूरी कवायद में आज तेज़ी से आगे बढ़ते हुए टेलीकॉम उद्योग को भी अपनी निशुल्क सेवाएं देनी चाहिए और मौसम से जुड़े विभिन्न अलर्ट नि:शुल्क सभी मोबाइल उपभोक्ताओं को हफ्ते में एक बार तो जारी ही करने चाहिए. इसके अतिरिक्त यदि मौसम में किसी बड़े परिवर्तन का पूर्वानुमान लगाया जा रहा हो तो उसको सभी मोबाइल कम्पनियों के लिए उपभोक्ताओं को भेजा जाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए जिससे जहाँ सरकार को नागरिकों तक सूचनाएं भेजने का एक और विकल्प मिल जायेगा वहीं नागरिकों को भी इससे काफी अधिक सुविधा होगी. केंद्रीय मौसम विभाग के पूर्वानुमानों को मानने के लिए राज्यों के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश भी होने चाहिए क्योंकि जनता से जुड़े किसी भी मुद्दे पर केंद्र और राज्य की घटिया राजनीति को बीच में लाने की कोई आवश्यकता नहीं है. साथ ही जिला स्तर पर जिला कृषि अधिकारी को इसका नोडल अधिकारी बनाया जाना चाहिए जो मौसम की गतिविधियों के साथ किसानों के साथ समन्वय बनाये रख सकें.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

मानसून, कृषि और भण्डारण

                              एक लम्बे अन्तराल के बाद देश में मानसून की सक्रियता की अवधि लम्बी होने से जहाँ कृषि विशेषज्ञ अच्छी पैदावार की आशा लगा रहे हैं वहीं हमेशा की तरह बहुत अच्छी पैदावार होने पर किसानों को होने वाली समस्याओं पर विचार करने के लिए आज तक भी देश के पास मज़बूत भण्डारण की व्यवस्था नहीं हो पायी है जिससे असमय वर्षा के कारण पूरे देश से ही सरकार द्वारा खरीद कर रखे गए अनाज के भीगने की ख़बरें सुर्खियाँ बटोरती रहती हैं. भारत में आज भी कृषि के मुख्य रूप से मानसून पर आधारित होने से जहाँ सब कुछ नहीं तो बहुत सारी आर्थिक गतिविधियाँ भी उस पर निर्भर करती हैं उसके बाद भी किसानों को सही मूल्य मिलने के साथ अनाज के भण्डारण की समस्या सदैव ही सामने आती रहती है. इस बारे में सरकार को अब एक स्पष्ट नीति बनाकर उसके अनुसार ही अनाज को देश में रखना चाहिए और शेष अतिरिक्त अनाज को विदेशों में निर्यात करने की छूट भी समय रहते देनी चाहिए जिससे कृषि उत्पादक किसानों को भी उसका सही मूल्य मिल सके.
                                ऐसा नहीं है कि देश में सरकारों द्वारा अभी तक इस दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं कए गए हैं पर उन प्रयासों को जितने निचले स्तर तक पहुंचना चाहिए अभी वहां तक वे नहीं पहुँच पाए हैं क्योंकि अभी भी देश के अधिकांश जिलों में कृषि विभाग के दफ्तरों में क्या कार्य होता है यह आम किसान को ही नहीं पता होता है तो इस स्थिति के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है ? आज भी देश में भण्डारण के लिए केवल जिला स्तरीय व्यवस्था होने के कारण जहाँ सरकार को उनके रख रखाव में अनावाश्यक रूप से बहुत धन खर्च करना पड़ता है वहीं उसकी समय से उपलब्धता भी सुनिश्चित करवा पाने में कई बार बहुत समस्या होती है. दूरस्थ स्थानों के अनाज क्रय केन्द्रों से खरीदे गए अनाज को पहले जिला स्तरीय गोदामों में पहुँचाने में समय और श्रम शक्ति के साथ धन की बर्बादी होती है और फिर उसे वहां से निकाल कर वापस राशन की दुकानों तक पहुँचाने के लिए भी फिर से इसी प्रक्रिया को उलटी तरफ घुमाना पड़ता है जिससे एक अनाज पर सरकार को दो बार म्हणत और धन बर्बाद करना पड़ता है जिसका कोई औचित्य नहीं है.
                                किसी समय में जब आर्थिक रूप से देश की यह हालत नहीं थी कि तहसील मुख्यालयों पर अन्न भण्डारण किया जा सके तो अब इसे करने में क्या समस्या आ रही है ? आज यदि इस भण्डारण की व्यवस्था की फिर से समीक्षा की जाये और सुरक्षित स्थानों पर तहसील और ब्लॉक मुख्यालयों पर ही क्षेत्रीय आवश्यकता के अनुसार भण्डारण की नीति बनायीं जाये तो कुछ वर्षों में ही इस पर खर्च होने वाले धन को बचाया जा सकेगा क्योंकि प्रति वर्ष अन्न को एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाने ले जाने में लगने वाले धन को भी बचाने में सहायता भी मिल सकती है. तहसील मुख्यालयों में पूर्ति और कृषि विभाग को और सक्रिय करने के साथ ही यदि उनके काम को ब्लॉक तक पहुँचाया जा सके तो उससे भी आम लोगों को बहुत आसानी हो सकती है. आज जो भी भण्डारण नीति चल रही है वह देश की आज की आवश्यकताओं के अनुरूप कहीं से भी नहीं लगती है इसलिए इस पर अविलम्ब ध्यान देकर कुछ जिलों में नयी नीति को बनाकर प्रायोगिक तौर पर लागू करने का प्रयास किया जाना चाहिए जिससे उससे होने वाले लाभ और आने वाली समस्यायों पर भी ध्यान देकर उन्हें सुलझाने की दिशा में कदम उठाया जा सके.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 9 अगस्त 2013

गेंहूँ निर्यात और नीतियां

                              आर्थिक मामलों की केन्द्रीय मंत्रिमंडल की समिति ने एक बार फिर से ३०० डॉलर प्रति टन की दर से २० लाख टन गेंहूँ का निर्यात करने को मंज़ूरी दे दी है जिस बारे में सरकार का कहना है कि इससे उसके पास वर्तमान में भंडारण की समस्या से मुक्ति मिलेगी वहीं भंडारण के प्रबंधन को और भी अच्छे तरीके से संचालित किया जा सकेगा. यह सुखद सच ही है कि एक समय अनाज का आयात करने वाला भारत आज अपने अतिरिक्त अनाज को इस तरह से अन्य देशों को निर्यात भी करने की स्थिति में आ चुका है पर इस काम के लिए जिस तरह से प्रभावी नीति होनी चाहिए वह आज भी नहीं दिखाई देती है क्योंकि अनाज के बेहतर होते उत्पादन के बाद भी जितना अनाज हमारे यहाँ भंडारण क्षमता की कमी होने के कारण ख़राब हो जाता है उसको नियंत्रित करने के लिए अभी भी सरकार के पास कोई बेहतर कार्य योजना नहीं है और संभवतः इस मसले पर केवल काम चलाऊ नीतियों से समय काटा जाता है जबकि इस पर अब एक स्पष्ट नीति होनी ही चाहिए.
                            देश में निरंतर बढ़ते हुए अनाज उत्पादन के बाद भी जिस स्तर पर कृषि विभाग को और अधिक वैज्ञानिक ढंग से खेती करने के अपने दायित्व को निभाना चाहिए उसमें वह पूरी तरह से निष्क्रिय ही रहा करता है उसके पास केवल खाना पूरी करने के लिए ही नीतियों का प्रचार करने का समय है बाक़ी सब भ्रष्टाचार की भेंट ही चढ़ जाया करता है. पंजाब और हरियाणा में जिस तरह से खेती योग्य भूमि की निरन्तर कमी होती चली गई जिससे वहां के प्रगति शील किसानों ने देश के अन्य हिस्सों की तरफ़ जाना शुरू किया और वहां पर उन्नत तरीके से खेती शुरू की जिसका असर सीधे वहां के स्थानीय किसानों पर भी पड़ा और वे भी धीरे धीरे प्रगतिशील और आधुनिक खेती की तरफ़ अपना रुख मोड़ने लगे जिससे भी पूरे देश से उन हिस्सों से अनाज के उत्पादन में तेज़ी दिखी जहाँ पर अभी तक किसान बदहाली का शिकार रहा करते थे ? इस तरह से जो काम सरकार का कृषि विभाग आज़ादी के बाद से नहीं कर पाया था उसे इन मेहनती किसानों ने अपने दम पर करके दिखा दिया जो अनाज उत्पादन के लक्ष्यों को पाने में बड़ा साधन साबित हुआ है.
                            आज भी सरकार के पास देश की वास्तविक आवश्यकता के अनुसार अनाज भण्डारण की सुविधा नहीं है जिससे अनाज का बहुत बड़ा हिस्सा बर्बाद भी होता रहता है इससे बचने के लिए अब सरकारों को ग्राम सभा स्तर पर ही छोटे भण्डारण के बारे में सोचना शुरू करना चाहिए क्योंकि गांवों में पैदा हुए अनाज को लाने ले जाने में जितने धन की बर्बादी होती है उससे किसी अन्य काम को अंजाम दिया जा सकता है. ग्राम सभा स्तर के वार्षिक उपयोग से अधिक अनाज को ब्लॉक, तहसील और जनपद स्तर के गोदामों में भेजना चाहिए और किसी भी जिले की आवश्यकता से अधिक अनाज को सीधे निकटतम सीमावर्ती राज्यों में बंदरगाहों के निकट ही भंडारित करना चहिये और उनको पूरी तरह से निर्यात करने के लिए ही रखा जाना चाहिए साथ ही निर्यात के लिए इस तरह की औपचारिकतायें भी नहीं होनी चाहिए जिनमे बहुत लम्बा समय लगा करता है ? इस तरह से कई स्तरों पर भण्डारण करने से जहाँ अनाज की बर्बादी को रोका जा सकेगा वहीं देश को विदेशों से कुछ धन भी मिल सकेगा. इतने बड़े स्तर पर भण्डारण सुविधा बनाए जाने के लिए इस योजना को मनरेगा और खाद्य सुरक्षा अधिनियम के साथ भी जोड़ दिया जाना चाहिए जिससे आधारभूत ढांचे को भी ग्राम सभा स्तर पर ही आसानी से बनाया जा सके.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 10 अप्रैल 2013

किसान क्रेडिट कार्ड- विकास किसका ?

                                 बैंकों द्वारा किसानों को सस्ता कृषि लोन देने के लिए शुरू किए किसान क्रेडिट कार्ड ने निश्चित तौर पर देश में किसानों की समय समय पर पड़ने वाली आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करने में बड़ी सफलता पाई है पर अभी हाल ही में एक रिपोर्ट ऐसी भी आई जिसने विवादों के नए पिटारे को खोल दिया और साथ ही देश में उपलब्ध कराये जानी वाली विभिन्न योजनाओं के दुरूपयोग को भी बड़े पैमाने पर सामने लाने का काम किया है. एक विशेष नीति की तहत किसानों को स्थानीय साहूकारों के चंगुल से बचाने के लिए जिस तरह से सरकार ने उन्हें सस्ते ऋण उपलब्ध करने की दिशा में काम किया उससे बहुत बड़े स्तर पर परिवर्तन हुआ हो ऐसा भी नहीं है पर इस सुविधा का लाभ उठाकर किसानों द्वारा अन्य उपभोक्ता वस्तुओं को खरीदने में किए जाने की बात भी सामने आई है. एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में मंहगे उपभोक्ता उत्पादों की खरीद क्षमता बढ़ने के कारण देश में मंहगाई बढ़ रही है जिस पर बहुत विवाद हुआ पर साथ ही इस सुविधा के दुरूपयोग पर भी विचार किए जाने की आवश्यकता भी महसूस की गयी है.
                        अभी तक केवल कृषि आधारित खरीद को आवश्यकता पड़ने पर किसानों को आर्थिक रूप से सक्षम करने जो सुविधा किसानों को दी गई है यदि उससे कृषि क्षेत्र में आगे बढ़ने का काम किया जाए तो देश में किसी को भी कोई आपत्ति नहीं होगी पर जब इसका दुरूपयोग केवल उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद के लिए ही किया जाने लगे तो आख़िर किस तरह से और किस कानून के तहत बैंक इन कार्डों के इस तरह के दुरूपयोग को रोक पाने में सफल हो सकते हैं ? कृषि क्षेत्र के ऋण को बैंकों की भाषा में बहुत सुरक्षित नहीं माना जाता है और इस तरह से कृषि से इतर क्षेत्र में इस धन की निकासी तो कर ली जाती है जिससे कृषि को तो कोई बढ़ावा नहीं मिलता है पर अन्य उपभोक्ता क्षेत्रों को समर्थन अवश्य मिलता है. इस स्थिति में सरकार और बैंक के पास क्या विकल्प शेष बचते हैं जिन पर अमल कर वे अपने मूल धन को सुरक्षित रख पाने में सफल हो सकें और इस तरह की पूल धनराशि का सही क्षेत्र में उपयोग करवाने के लिए किसानों को और अधिक सुविधाएँ दे पाने में सक्षम हो सकें ?
                        इस स्थिति में सरकार केवल एक ही दिशा निर्देश जारी कर सकती है कि यदि कृषि क्षेत्र से जुडी किसी खरीद को इस कार्ड के माध्यम से किया जा रहा है तो उसे वह लाभ मिलना ही चाहिए जिसके लिए यह योजना बनाई गई है पर यदि किसी अन्य उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद में इस धन का दुरूपयोग किया जा रहा है तो बैंक के सॉफ्टवेयर में ही यह व्यवस्था होनी चाहिए कि वह स्वतः ही खरीद को चेक कर कुछ मंहगी दर पर और नई शर्तों के साथ इस धन को किसानों को उपलब्ध कराए. देखने में यह काम कठिन अवश्य लगता है पर यदि एक बार इस तरह के परिवर्तन के लिए आवश्यकताओं के अनुसार बैंकों में परिवर्तन कर दिया जाये तो इसका दुरूपयोग रोक जा सकेगा. केवल अधिक ब्याज लेने से ही बैंकों का काम आसान नहीं होने वाला है उसके लिए इस राशि की वसूली के लिए और सख्त नियम भी बनाए जाने की आवश्यकता है क्योंकि यदि धन की वसूली के ठोस उपायों के बिना ही धन बांटा जाता रहेगा तो किसी भी दशा में बैंक अपनी क्षमता को बनाये नहीं रख पायेंगें जो देश के अन्य क्षेत्रों में बैंकों के धन उपलब्ध कराने की शक्ति पर भी अंकुश लगाने का काम करेगी. देश में सब कुछ ठीक तरह से चलता रहे उसके लिए नीतियों में पारदर्शिता के साथ उन पर अमल करवाने की ठोस व्यवस्था भी किया जाना आवश्यक है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 6 मार्च 2013

खेती और मनरेगा

                    लोकसभा में कृषि राज्य मंत्री तारिक़ अनवर ने एक सर्वेक्षण का ज़िक्र करते हुए अपने उत्तर में बताया कि मनरेगा के चलते कृषि क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की संख्या में कमी आई है जिससे मंहगी होती मजदूरी के कारण कृषि की उत्पादन लागत बढ़ गयी है. यहाँ पर इस सवाल और सर्वेक्षण के निहितार्थ भी तलाशे जाने की ज़रुरत है क्योंकि मनरेगा एक ऐसी योजना है जिसके माध्यम से पूरे देश के ग्रामीण स्वरुप को बदलने में देश के राजनैतिक और प्रशासनिक तंत्र को बहुत आसानी हो सकती है पर आज तक जिस तरह से इस महत्वपूर्ण परियोजना में भी भ्रष्टाचार ने अपने पैर जमा रखे हैं यदि उससे किसी भी तरह कम किया जा सके या पूरी तरह से छुटकारा पाया जा सके तो आने वाले समय में देश की आर्थिक और सामाजिक स्थिति में बहुत बड़ा परिवर्तन देखा जा सकता है. इस योजना की शुरुआत जिस तरह से की गयी थी और अभी तक इसके लिए जितने बड़े पैमाने पर धन का आवंटन किया जाता रहा है उसके बाद इसे बनाने वालों की नियति पर शक़ नहीं किया जा सकता है पर भ्रष्टाचार के कारण इसके क्रियान्वयन पर राज्य सरकारों द्वारा वो अंकुश नहीं लगाया जा सका जो इसकी सफलता की और अच्छी कहानी बन सकता था ?
                         यह सही है कि सर्वेक्षण में इसके इस दुष्प्रभाव के कारण ही जो कुछ अच्छा हुआ है उसका भी ज़िक्र किया गया है पर साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भूजल के संवर्धन और अन्य सामाजिक कार्यों में इसके महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता है क्योंकि इसी मनरेगा ने देश के उन दूर दराज़ के क्षेत्रों में लोगों को पहली बार मजदूरी देने और काम देने के बारे में सोचा था. इसके सामाजिक परिवर्तन से जहाँ पूरे देश में आर्थिक प्रगति का चक्का और तेज़ी से घूम सकता है वहीं सामान्य उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कम्पनियों के लिए भी बाज़ार के नए अवसर खुल सकते हैं. कृषि क्षेत्र में सुधार के साथ ही बढ़ते बाज़ार को आज की आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार ढाला जा सकता है जो आने वाले समय में देश के किसानों को अधिक लाभ वाली फ़सलों की तरफ़ भी ले जा सकता है. पूरे देश के विभिन्न विभागों में योजनाओं को लेकर जिस तरह के तालमेल की आवश्यकता है आज वह कहीं से भी दिखाई नहीं देती है जिसके दुष्प्रभाव स्वरुप भी आज इस मनरेगा के कृषि क्षेत्र पर दुष्प्रभाव पर इस तरह के सर्वेक्षण की आवश्यकता पड़ी है.
                       मनरेगा का मुख्य उद्देश्य गांवों में ही रोज़गार का सृजन करना था और इसमें यह पूरी तरह से सफल भी हुई है बिहार जैसे राज्यों ने जहाँ इस पर अधिक ध्यान देकर अपने यहाँ अन्य बातों को सुधार कर श्रम शक्ति के पालयन पर रोक लगाने में बड़ी सफलता पायी है वहीं श्रम शक्ति के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर रहने वाले राज्यों में कृषि और औद्योगिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है. मनरेगा का कृषि पर कोई असर न पड़े इसके लिए इसके मूल में जाना ज़रूरी है क्योंकि इसके द्वारा केवल सौ दिनों के रोज़गार की व्यवस्था की गयी थी और बाकी दिनों को केवल इसीलिए छोड़ा गया था कि मजदूर अपने गाँव या आस-पास के इलाकों में ही इस तरह का रोज़गार तलाश कर लें. इस उद्देश्य को पाने के लिए जब कृषि क्षेत्र में मजदूरों की अधिक आवश्यकता होती है तो मनरेगा के काम बंद करा दिए जाने चाहिए जिससे उन्हें इस दौरान अन्य उपायों से जीविका चलाने के लिए धन मिलता रहे और जब खेतों में काम कम हो तब मनरेगा के काम कराये जाएँ पर आज ग्राम प्रधान अपने खेतों में काम करने के लिए फ्री में मजदूरों की कमी इस योजना से पूरी करते देखे जा सकते हैं जिसके कारण भी आम किसानों के लिए बुवाई-कटाई के समय मजदूरों की किल्लत हो जाती है. अब आवश्यकता है कि इस योजना को और सही ढंग से लागू कर किसानों के साथ मजदूरों की आर्थिक स्थिति को भी सुधारने के लिए काम किया जाए.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 17 मार्च 2012

सब्सिडी की राजनीति

   
केंद्रीय बजट में जिस तरह से विभिन्न क्षेत्रों में दी जाने वाली सब्सिडी के बारे में एक नए सिरे से विचार कर इस पूरी तरह से सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाने की जिस तरह से वक़ालत की गयी है उससे यही लगता है कि सरकार ने इस पूरे क्षेत्र को सुधारने का मन बना रखा है क्योंकि जिस तरह से विभिन्न मदों में दी जाने वाली सब्सिडी से बिचौलियों को लाभ मिलता है और आम लोगों के लिए यह एक बुरा सपना जैसा ही हो जाता है उस स्थिति में ऐसा कुछ किये जाने की आवश्यकता थी जो इस क्षेत्र में सुधार की शुरुवात तो कर ही सके ? आज देश के संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा सब्सिडी में ही चला जाता है जबकि उसके सही प्रबंधन से यह धनराशि किसी अन्य कल्याणकारी योजना में लगायी जा सकती है. सब्सिडी की राजनीति कुछ ऐसा रूप ले चुकी है कि कोई भी राजनैतिक दल चाहते हुए भी इसके बारे में खुलकर बात नहीं करना चाहता जबकि यह देश की आर्थिक सेहत से जुड़ा हुआ मामला है. केवल कुछ लोकप्रिय क़दमों के चलते कोई भी दल किसी भी स्थिति में इस क्षेत्र को छेड़ना नहीं चाहता है जबकि आज इस पर प्राथमिकता के आधार पर काम करने की ज़रुरत है क्योंकि इस पर जिस तरह से राजनीति हावी होती जा रही है उसके बाद आने वाले समय में सरकारों के पास धन ही नहीं होगा जो इस तरह की सब्सिडी की व्यवस्था कर सके ?

    कृषि और खाद्य क्षेत्र में दी जाने वाली सब्सिडी की आवश्यकता तो हमेशा ही रहेगी पर इस क्षेत्र से किसी भी तरह का कर /राजस्व सरकार को नहीं मिलता है ? जिस तरह से बड़ी मात्रा में इस क्षेत्र के लिए सब्सिडी दी जाती है फिर भी आवश्यकता पड़ने पर राज्य सरकारें इस बात पर अंकुश नहीं लगा पाती हैं कि उनकी संस्थाओं के माध्यम से बिकने वाली कृषि उपयोग की सामग्री पर कोई कालाबाजारी न होने पाए तो जिस उद्देश्य से यह सब्सिडी दी जाती है वह पूरी तरह से विफल हो जाता है. क्या केंद्र से मिलने वाली इस तरह की कोई भी सहायता पर राज्यों की कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती है ? हर वर्ष पूरे देश में जब खाद की आवश्यकता होती है तो किसानों को वह मिल ही नहीं पाती और क्या वह खुले बाज़ार से सरकारी खाद विक्रेताओं से कालाबाज़ारी के जरिये इसे खरीदने के लिए मजबूर नहीं होता है ? इस बात की ज़िम्मेदारी आख़िर किस पर डाली जाए कि यह सब्सिडी सही लाभार्थी तक पहुँच जाये क्या आज एक समय में केंद्र के पास ऐसा कोई कानून है जिसके तहत वह किसानों को सीधे यह लाभ दे सके ? उसके ऐसा करने पर अकर्मण्य राज्यों को यह लगने लगता है कि यह देश के संघीय ढांचे पर चोट है और राज्यों के अधिकारों का हनन पर जब किसान अपनी ज़रूरतों के लिए भटकता रहता है तो इन्हें यह नहीं दिखाई देता है कि किसके अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है.
           आज देश को समग्र रूप से सोचने की ज़रुरत है केवल अच्छी विकास दर से आगे जा रहे राज्यों को सोचकर बनायीं गयी कोई भी नीति पूरे देश को किसी भी तरह से आगे नहीं ले जा पायेगी. जिस तरह से ५० जिलों में मोबाइल फर्टीलायज़र प्रबंध को प्रायोगिक तौर पर लागू करने की बात वित्त मंत्री ने कहा है उसके लिए केवल प्रावधान से ही काम नहीं चलने वाला है इसके लिए जिन राज्यों के जिन जिलों को चयित किया जा रहा है उनकी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि देश के विकास में मील का पत्थर साबित हो सकने वाली इस योजना को पूरे मनोयोग से लागू करवाने के प्रयास करें. इस पूरे तंत्र के प्रबंधन में खास और कर्मठ अधिकारियों की तैनाती भी करें जिससे इनकी प्रगति और आने वाली समस्याओं के बारे में सही ढंग से केंद्र तक आवाज़ पहुंचाई जा सके. केवल राजनीति के लिए और भी बहुत सारे अवसर आयेंगें और उनके माध्यम से तब भी अपनी राजनीति को चमकाया जा सकता है ? केवल स्वार्थी राजनीति से आगे बढ़कर सोचने का अब यही सही समय है और केंद्र को भी राज्यों के साथ बेहतर तालमेल के लिए कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे दोनों के राजनैतिक हित जहाँ पर टकराने की सम्भावना हो वहां पर देश हित की बात को आगे रखकर सरकार को निर्णय लेने पर किसी भी तरह की राजनीति न किये जाने का आश्वासन भी देना चाहिए क्योंकि आज जो सरकार में है कल वे विपक्ष में भी हो सकते हैं तो उन्हें भी इस तरह की समस्या का सामना करना ही होगा.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 21 जनवरी 2012

इन्टरनेट और विकास गति

        क्या देश में इन्टरनेट की पहुँच बढ़ने का सीधा सम्बन्ध देश की विकास गति से हो सकता है ? सुनने में यह भले ही अटपटा लगे पर यह सच्चाई है जो दिल्ली में इन्टरनेट और मोबाइल एसोसियेशन ऑफ़ इंडिया के एक अध्ययन में सामने आई है. अभी तक इन सभी के बारे में यह माना जाता था कि इनसे केवल शहरी क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर पैदा होते हैं पर अब यह बात सामने आई है कि जिन राज्यों में इन्टरनेट और मोबाइल का जितना अधिक फैलाव होगा भविष्य में उसका सीधा लाभ उस राज्य के विकास पर पड़ता हुआ दिखाई देगा. इस अध्ययन के लिए कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोज़गार और सामुदायिक सेवाओं को मानक के रूप में चुना गया. यह सही है कि देश में इन सभी क्षेत्रों में विकास करने की असीम संभावनाएं है और जिस तरह से हमारा देश कृषि प्रधान है अगर इस मूलभूत काम को किसी तरह से इससे जोड़ा जा सके तो आने वाले समय में इसका बहुत बड़ा प्रभाव दिखाई देने लगेगा.  समय पर होने वाली बारिश किस तरह से सकल घरेलु उत्पाद पर असर डालती है यह हम सभी जानते हैं तो इस क्षेत्र की उपेक्षा करके अब केवल शहरों में बसने वाला भारत देश को आगे नहीं ले जा सकता है.
     देश के गाँवों में कृषि उत्पाद आसानी से मिल जाया करते हैं पर वहां पर आज भी सरकारी कृषि विभाग केवल खानापूरी करने के लिए ही हैं जबकि अगर ये विभाग अपना काम ठीक ढंग से करना शुरू कर दें तो पूरे देश की तकदीर केवल कृषि क्षेत्र ही बदलने की शक्ति रखता है. इसके लिए जितने मनोयोग से कृषि अनुसन्धान के नए आयामों को आम किसान तक पहुँचाना होगा वहीं उसके साथ उर्वरक आदि अन्य ज़रूरतों की भी पूर्ति समय से करनी होगी. नेट के माध्यम से उत्पाद को बेचे जाने के लिए ये किसान स्वतंत्र होंगें जिससे उनकी आमदनी में वृद्धि होगी और उनकी क्रय शक्ति भी बढ़ेगी जो अंत में देश के बाज़ार को मज़बूत करने का काम ही करेगी. आज भी देश में हर क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं में बहुत सुधार की गुंजाइश है पर इस बारे में जो भी योजनायें बनायीं जाती हैं वे अपने उद्देश्यों को नहीं पूरा कर पाती हैं. अच्छा है कि सरकार इस दिशा में दृढ़ता से काम कर रही है और आने वाले कुछ वर्षों में जिस तरह से हर चीज़ नेट पर आधारित होने जा रही है उसके लिए देश तैयार हो रहा है.
    इस तरह के काम को केवल सरकारी स्तर पर ही पूरा नहीं किया जा सकता है क्योंकि वहां पर व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण एक बार हर काम रुक जाता है इसलिए अब निजी क्षेत्र के लिए हर तरह के दरवाज़े खोलने ही होंगें और सरकार को उन पर कड़ी नज़र रखनी होगी जिससे निजी क्षेत्र मनमानी पर न उतर आये ? इस अवसर पर इस रिपोर्ट से सहमत दूर संचार सचिव आर चंद्रशेखर ने भी यह कहा कि इस तरह की अधिकांश बातों और योजनाओं पर सरकारी अभी से सचेत है और कई क्षेत्रों में काम पहले से ही शुरू किया जा चुका है. देश को आगे बढ़ाने में देश के युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होने वाली है और ऐसी स्थति में अभी ये इस युवा ऊर्जा को सही ढंग से समायोजित करने और उचित दिश दिखने की आवश्यकता है बाकी का सारा काम ये खुद ही कर पाने में सक्षम है. अब उन लोगों को भी चुप होकर बैठ जाना चिय जो केवल परंपरागत तरीके से विकास की बातें किया करते हैं क्योंकि अब देश की बड़ी आबादी की शक्ति का सही उपयोग ही हमें फिर से दुनिया में आगे ला सकता है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

कोहरा और सुरक्षा

       उत्तर भारत में ठण्ड बढ़ने के साथ ही घने कोहरे की चादर फैलना शुरू हो जाती है और इससे होने वाली समस्याओं से निपटना भी आसान काम नहीं होता है. इसका सबसे ज़्यादा असर सभी तरह के यातायात पर पड़ता है. यह एक प्राकृतिक घटना है और इसको रोका नहीं जा सकता है फिर भी थोड़ी चौकसी और पहले से की गयी तैयारियों के साथ इसके प्रभाव से निपटने में दक्षता पायी जा सकती है. हवाई और रेल यातायात पर इसका असर विलम्ब के रूप में पड़ता है जबकि सड़क यातायात में इस समय दुर्घटनाएं बहुत बढ़ जाया करती हैं. जिस तरह से परिवहन विभाग काम करता है उसके बाद इन दुर्घटनाओं की संभावनाएं और भी अधिक हो जाया करती हैं. परिवहन विभाग केवल समय आने पर केवल कुछ अवैध वसूली पर ही ध्यान देता है और सड़क सुरक्षा से जुड़े नियमों की तरफ़ तो उसका ध्यान भी नहीं होता है.
      सड़क मार्ग पर आजकल सबसे अधिक बाधा का कारण गन्ने की ढुलाई करने वाले वाहनों के कारण होती है इसी समय गन्ना किसान अपने खेतों से गन्ने को क्रय केन्द्रों या चीनी मिल तक पहुँचाने का काम करते हैं जिससे सड़क पर समस्या बढ़ जाया करती है. कृषि भारत का अभिन्न अंग है और इसके बिना जीने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है पर जिस तरह के जर्जर वाहनों से गन्ने को ढोया जाता है वह मुख्य समस्या का कारण बन जाया करता है. आज भी खेतों में चलने वाले ट्रैक्टर ट्राली किस अवस्था में होते हैं इसका सभी को अंदाज़ा है पर इससे तब तक समस्या नहीं होती जब तक ये खेतों में चलते हैं पर जिस दिन से ये सड़कों पर चलना शुरू करते हैं तो सभी तरह की समस्या उत्पन होने लगती है क्योंकि इनमें प्रकाश की ही समुचित व्यवस्था नहीं होती है जिससे ये समय आने पर सड़क दुर्घटना का बड़ा कारण बन जाया करते हैं.  इससे निपटने के लिए इनके मालिकों को भी इस बात के लिए जागरूक किया जाना चाहिए और उनके सहयोग से इस तरह की घटनाओं को कम करने का प्रयास किया जाना चाहिए.
     इस समस्या से निपटने के लिए अब कड़े क़दम उठाने की आवश्यकता है जिससे इन वाहनों पर उचित संकेतक लगाये जा सकें क्योंकि बिना इन संकेतकों के कुछ भी कर पाना असंभव ही है और इस तरह की दुर्घटनाओं को रोका जाना भी कठिन है. इस तरह की दुर्घटनाओं पर रोक लगाकर जान माल की उस हानि को बचाया जा सकता है जो केवल लापरवाही के कारण ही हो जाया करती है. हर जनपद के परिवहन विभाग को पुलिस से मिलकर यह तय करना चाहिए की सभी वाहनों में उचित प्रकाश सहित अँधेरे में चमकने वाले संकेतक भी लगे हों क्योंकि इनके बिना खड़े वाहन को घने कोहरे में देख पाना असंभव होता है. यदि पुलिस विभाग थोड़ी सी ईमानदारी से इस काम को करवाने में दिलचस्पी लेने लगे और एक समय सीमा दिए जाने के बाद वाहन स्वामी द्वारा इस तरह की व्यवस्था न किये जाने पर उसके खिलाफ कठोर दंड की व्यवस्था करे जिससे इस मामले में होने वाली लापरवाही को कम किया जा सके. आम तौर पर नवम्बर माह में उत्तर प्रदेश में यातायात माह मनाया जाता है तो उसी समय इस बात पर ध्यान देकर बड़ी संख्या में वाहनों पर इस तरह के सुरक्षात्मक उपाय किये जा सकते हैं.            
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 3 दिसंबर 2011

चिंतित उद्योग जगत

जिस तरह से हर मामले में राजनैतिक उठापटक ने अब देश में पहला स्थान पा लिया है उसके बाद यही लगता है कि देश में अब आर्थिक सुधारों की गाड़ी पटरी पर लाने के लिए कोई भी सहमति बन पाना आसान काम नहीं रह गया है. अब देश के प्रमुख उद्योगपति और टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने भी सरकार के फैसले लेने की गति पर प्रश्न चिन्ह लगाया है उससे यही लगता है कि देश के राजनैतिक तंत्र में अब भी विश्व के साथ चलने की समझ विकसित नहीं हो पाई है. ऐसा नहीं है कि रतन टाटा पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने इस तरह के मामलों पर राजनैतिक चक्काजाम पर अपने विचार व्यक्त किये हैं उनसे पहले महिंद्रा, विप्रो, रिलायंस के प्रमुखों की तरफ से भी ऐसी बातें कही जा चुकी हैं. यह सही है कि हर देश/ व्यापारी/ संस्था या व्यक्ति किसी भी काम को शुरू करने से पहले अपने लाभ हानि के बारे में विचार करते हैं तो अगर इस मामले में हमारे देश में भी खुले तौर पर विचार विमर्श हो तो इसमें क्या बुराई है पर अभी तक हमारे देश के राजनैतिक तंत्र में महत्वपूर्ण मुद्दों पर असहमति दिखाने के लिए संसद को ठप करने का विचार सबसे आगे दिखाई देता है.
    देश में कोई भी सरकार यह नहीं चाहती कि उसके किसी फैसले से उसकी पार्टी और सरकार को राजनैतिक नुकसान हो फिर भी जिस तरह से संसद से सड़क तक केवल धरना प्रदर्शन की बातें ही की जाती हैं उससे क्या साबित होता है कि कहीं न कहीं हमारे नेताओं ने लोकतंत्र का अपहरण कर रखा है और वे लोकतान्त्रिक मूल्यों की दुहाई देते हुए ही लोकतंत्र का चीरहरण करने का प्रयास करते दिखाई देते हैं. खुदरा बाज़ार में विदेशी व्यापारियों के आने से क्या अंतर पड़ने वाला है इसका जवाब किसी के पास नहीं है हर व्यक्ति इसी चिंता से घुला जा रहा है कि आगे क्या होगा ? अभी केवल जिन शहरों के लिए इस तरह का प्रस्ताव किया गया है वहां पर पहले से ही भारतीय ब्रांड मौजूद हैं और उनकी मौजूदगी से किसे अभी तक नुकसान हुआ है क्या इस बात का पता किसी ने लगाने की कोशिश की है ? किसी परिवर्तन के साथ अपने को ढालने के स्थान पर हम केवल उन परिवर्तनों से लुट जाने की बातें ही क्यों करते रहते हैं ? क्या हमारे उद्योग धंधे और हमारे छोटे व्यवसायी इतने कमज़ोर हैं कि कुछ विदेशी कंपनियों के आने से ही उनका सब कुछ ख़त्म हो जाने वाला है ?
    क्या कोई यह बताने को तैयार है कि जब हमारे देश के उद्योगपतियों ने विदेशों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है तो हमारे छोटे व्यापारी ऐसा क्यों नहीं कर सकते ? असल में इस तरह की गतिविधियों से कृषि क्षेत्र को वास्तव में बहुत बड़ा लाभ होने वाला है और जब देश की आत्मा गाँवों में ही बसती है तो फिर गाँवों को बचाने के लिए कुछ किया जाना कहाँ से ग़लत है ? इन निर्णय को अपने लिए परेशानी के स्थान पर अवसर के रूप में देखना चाहिए और इसी बहाने पहले से अपने घरेलू व्यवसायियों को इस तरह की प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जाना चाहिए. भारत की अर्थव्यवस्था में इतनी मज़बूती है कि उसने वैश्विक मंदी से समय भी बेहतर नतीजे दिए जिस बात का लोहा आज दुनिया के बड़े बड़े अर्थशास्त्री भी मानते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि इस निर्णय से केवल कुछ बड़े व्यवसायियों के कारोबार पर बड़ा असर पड़ने की सम्भावना के चलते ही ये लोग छोटे व्यापारियों को इस तरह से डराने का काम करने में लगे हुए हैं जिससे सरकार को भी यह लगे कि ऐसे फ़ैसले से उसको बहुत बड़ा राजनैतिक नुकसान हो जायेगा. इस बिल की आशंकाओं को दूर करने के लिए विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि केवल हल्ला मचाने से कुछ भी ठीक नहीं होगा हमें अपनेको इसके लिए मजबूती से तैयार करना ही होगा.      
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...