मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 23 मई 2020

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था

                                                                        कोरोना के कारण पूरे विश्व में जिस तरह का माहौल बना हुआ है उससे निपटने के लिए सभी देश अपनी अपनी रणनीति बनाने में लगे हुए हैं. मार्च महीने में जिस तरह से देश में सम्पूर्ण लॉक डाउन किया गया वह उस समय उपलब्ध विकल्पों में सबसे अच्छा था और भारत सरकार ने भी उस पर अमल करने का प्रयास किया चूंकि उस समय उस बात पर चर्चा करना उचित नहीं था तो अब इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि हमारी नीतियों में आखिर कौन सी कमी रह गयी जिसको हम समय रहते आसानी से ठीक कर सकते थे. पीएम मोदी ने जिस तरह सिर्फ ४ घंटे की नोटिस पर लॉक डाउन की घोषणा की उससे बचा जा सकता था क्योंकि होली के बाद का माहौल था और सरकार घर गए मजदूरों को अपने घरों से अपने काम की जगहों पर जाने से रोकने का आह्वाहन कर सकती थी पर उस समय तक सरकार इसकी गंभीरता को समझ ही नहीं रही थी. साथ ही मजदूरों को अपने घरों तक पहुँचाने के लिए रेल और बसों को बंद नहीं करना चाहिए था जिसके कारण आज भी देश के एक हिस्से में काम करने वाले श्रमिक अपने घरों को लौटने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं.
                              अब सरकार को पिछली गलतियों को सुधारते हुए सिर्फ बड़े उद्योगों के बारे में ही न सोचते हुए ग्रामीण भारत को मज़बूत करना होगा क्योंकि आज भी भारत का बड़ा हिस्सा या तो गांवों में रहता है या शहरों में काम न होने के चलते अब वापस गांवों की तरफ जा चुका है. ग्रामीण भारत में आज भी बहुत सारी समस्याएं हैं और सरकार मनरेगा को विस्तार देते हुए अधिकांश ग्रामीणों को इस तरह से काम दे सकती है. कृषि लागत को कम करने के लिए सरकार एक निश्चित संख्या में छोटे और मंझोले किसानों के लिए मनरेगा के द्वार खोल सकती है जिससे मजदूरों को आगामी फसलों के समय काम मिल सके और किसानों को भी कुछ राहत मिल सके. इसके लिए अभी से एक नियम बनाकर लाभार्थी किसानों का चयन शुरू किया जाना चाहिए या फिर भूलेखों के आधार पर उनको या मनरेगा के मजदूरों को धन स्थानांतरित करने के बारे में सोचना चाहिए। इस तरह से जब ग्रामीण भारत के पास उसके गांवों में ही काम उपलब्ध होगा तो उसकी क्रय शक्ति भी बढ़ाई जा सकेगी जो अंत में देश की आर्थिक प्रगति का चक्का फिर से घुमाने में बहुत सहायक हो सकती है.
                                बरसात शुरू होते ही कई जगहों पर मनरेगा के तहत काम करवाने असुविधा होने लगती है तो इन्हीं मजदूरों के लिए एक नीति बनाकर किसानों और मजदूरों की एक साथ मदद की जा सकती है. किसान के सामने इस समय अपनी लागत को एक सीमा में रखने की चुनौती है तो मजदूरों के सामने काम की. यदि सरकार इस तरह से कोई प्रयास करे तो देश के दो बड़े क्षेत्रों की एक साथ मदद की जा सकती है और गांवों की आर्थिक स्थिति को और बिगड़ने से संभाला भी जा सकता है. फिलहाल बरसात शुरू होने से पहले गांवों में तालाबों और मार्गों को मजबूत किये जाने के काम में तेज़ी भी लाई जा सकती है जिससे सरकार को आमलोगों तक राशन पहुँचाने के लिए अपनी पूरी मशीनरी का उपयोग करने से बचाया जा सके और साथ ही इन मजदूरों के काम करने के दिनों के लिए काम के बदले अनाज योजना को भी शुरू किया जा सकता है जिससे एक साथ कई क्षेत्रों की मदद की जा सकती है. अब समय है कि देश को समग्र रूप से सोचना ही होगा तभी इस वैश्विक संकट के साथ वैश्विक मंदी से निपटा जा सकेगा।    

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गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

महाराष्ट्र और किसान

                                                            पूरे वर्ष में लगभग तीन हज़ार किसानों द्वारा आत्महत्या किये जाने की ख़बरों के बीच जिस तरह से केंद्र सरकार की तरफ से ३१०० करोड़ रुपयों की मदद की गयी है वह राज्य में राजनीति का नया मुद्दा भी बन गया है क्योंकि सरकार में भागीदार शिवसेना ने भी राज्य के लिए ५०००० करोड़ के पैकेज की मांग की थी. यह सही है कि सूखे और मौसम के विपरीत प्रभाव के चलते देश के कई राज्यों में किसानों के लिए संकट लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं जबकि सरकारी स्तर पर जो कुछ भी किया जा रहा है वह समस्या के समाधान के स्थान पर केवल तत्कालिक आवश्यकता की पूर्ति की तरफ जाता हुआ ही दिखाई दे रहा है. इस तरह की विपरीत परिस्थिति में यदि केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से किसानों को खेती की आधुनिकतम तकनीक के साथ परंपरागत खेती की तरफ बढ़ाया जाए तो क्या उससे इनकी स्थिति में कुछ परिवर्तन समभाव है ? आज भी किसानों के नाम पर जिस तरह से केवल दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में बैठे हुए कुछ अधिकारी और नेता पूरी नीति बना डालते हैं क्या वे देश की ज़मीनी स्थिति से मेल भी खाते हैं इस सवाल का जवाब आज किसी भी सरकार के पास नहीं है और दुर्भाग्य से कोई भी नेता या अधिकारी इस बात के लिए जागरूक तथा प्रयासरत भी नहीं दिखाई देता है.
                                    देश में सरकारें बदलने का किसानों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है और सत्ता के गलियारों में बैठे हुए नेता अपनी सीमित सोच के साथ अधिकारियों पर हावी रहा करते हैं जिससे सही नीतियां बनाये जाने के स्थान पर केवल मंत्रियों और राजनैतिक प्रतिष्ठान को खुश करने की नीतियां ही अधिक बनायीं जाती हैं. लम्बे समय से महाराष्ट्र के किसानों का मुद्दा राज्य की विधान सभा से लगाकर लोकसभा तक गूंजता रहा है और इस बीच केंद्र और राज्य में सत्ता परिवर्तन भी हो गया है पर किसानों की अनदेखी किये जाने का सवाल अभी भी उसी तरह से अनुत्तरित है. अब इस बारे में गंभीरता से सरकारी नीतियों पर विचार करने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब तक सरकार की तरफ से समस्या के सही मूल को खोजने के बारे में नहीं सोचा जायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में पूरी व्यवस्था को सुधारा नहीं जा सकता है और किसानों के परिवारों को इस तरह के संकट का सामना करने के लिए विवश होना ही पड़ेगा. खेती में जिस स्तर पर परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता और सरकारी सहयोग की अपेक्षा है भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान उसमें पूरी तरह से चूकते हुए ही नज़र आ रहे हैं.
                            यदि कांग्रेस की नीतियों में कोई कमी थी तो पिछले डेढ़ साल में भाजपा की सरकारों ने वहां पर क्या उपलब्धि हासिल की है यह केवल वाद विवाद और राजनीति का विषय ही हो सकता है क्योंकि यदि मामला किसी एक राजनैतिक दल से जुड़ा हुआ होता तो परिवर्तन की शुरुवात हो चुकी होती पर यह पूरा मसला ही अव्यवस्था से जुड़ा हुआ है और इसे सुधारने के लिए अब सरकार को नए सिरे से सोचने की आवश्यकता भी है. पुरानी लीक पर चलने के स्थान पर अब सरकार को इस बारे में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में सूखे से सर्वाधिक प्रभावित राज्यों के लिए स्थानीय स्तर पर उपयोगी वस्तुओं की खेती करने के बारे में प्रोत्साहित करने के बारे में सोचना चाहिए और उसके परिणामों पर विचार करते हुए ही अन्य सूखा प्रभावित क्षेत्रों के लिए नीतियां बनानी चाहिए पर सरकारें इस मामले में केवल आर्थिक सहायता और ऋण माफ़ी तक ही अपनी भूमिका को सीमित करने में खुश हो जाती है जिससे भी समस्या का सही समाधान नहीं दिखाई देता है. देश के किसानों को इस तरह तात्कालिक सहायता के स्थान पर पूरी तरह से नयी कारगर नीति के बारे में सरकार को नए सिरे से सोचने से ही सही समाधान को खोजा जा सकता है वर्ना इस मुद्दे पर आत्महत्या करते किसानों को लोकतंत्र के मंदिरों में नेता श्रद्धांजलि देकर अपने कर्तव्य में तो लगे ही हैं.     
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सोमवार, 16 मार्च 2015

बेमौसम बरसात- सरकार और किसान

                                                         आंकड़ों के अनुसार १९६७ के बाद सबसे अधिक वर्षा देखने वाला मार्च महीना पूरे देश के खाद्यान्न उत्पादन पर गंभीर असर डालने की तरफ बढ़ गया है क्योंकि जिस तरह से अभी तक पश्चिमी विक्षोभ के चलते मार्च महीने में ही चार बार तेज़ बारिश का सामना किसानों को करना पड़ा है वह देश की आर्थिक प्रगति पर भी बुरा असर डालने वाला साबित होने वाला है. एक तरफ जहाँ इससे लगभग तैयार होने की कगार पर पहुंची गेंहूँ की फसलों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है वहीं रोज़मर्रा की सब्ज़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति भी इससे बुरी तरह से प्रभावित हो चुकी है. आज भी मौसम की इस तरह की बेरुखी से किसान और सरकार के पास करने और बचाने एक लिए बहुत कुछ नहीं होता है पर अब इस नुकसान से किसानों को होने वाले नुकसान से किस तरह से निपटा जाये यह महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है क्योंकि मार्च का महीना होने के चलते अधिकांश सरकारी अधिकारी पूरे वित्तीय वर्ष को समेट्ने में लगे रहते हैं और साथ ही अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए विभिन्न तरह की वसूली पर भी जोर रहा करता है.
                                   किसानों को सही मदद पहुँचाने के लिए ज़िले स्तर पर कृषि विभाग और राजस्व विभाग द्वारा समन्वय कर अपने क्षेत्रों में नुकसान का सही आंकलन करने के बारे में विस्तृत कार्ययोजना पर विचार करना चाहिए और इसके साथ ही किसानों के लिए कुछ राहत के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि राज्य और केंद्र सरकारों की तरफ से जो भी मदद दी जाती है वह कहीं न कहीं से ज़िले स्तर के इन अधिकारियों और विभागों के दम पर ही होती है जिसे अधिकांश बार बड़ी ही लापरवाही के साथ तैयार किया जाता है. नुकसान के आंकलन पर ही केंद्रीय सहायता भी निर्भर किया करती है पर ऐसी विपरीत परिस्थिति में किसी भी किसान के हो चुके नुकसान की भरपाई कोई भी नहीं कर सकता है. सरकार की तरफ से किसानों की फसलों के सामूहिक बीमे के बारे में भी गहन योजना के बारे में विचार किये जाने का समय अब आ चुका है क्योंकि बीमा अब सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में नए आयाम छूने की तरफ बढ़ने ही वाला है तो इस स्थिति का दोनों ही पक्षों को लाभ उठाना चाहिए जिससे नुकसान की कुछ क्षति पूर्ति की जा सके.
                                     देश के किसान पहले ही बहुत विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहे हैं और इस तरह के प्राकृतिक नुकसान से पूरे देश की आर्थिक प्रगति पर बहुत बुरा असर पड़ सकता है जिसे सुधारने के लिए आज केंद्र सरकार राज्यों के साथ मिलकर जुटी हुई है. भारत की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए अब मौसम पर सटीक भविष्यवाणी करना संभव हो पाया है पर आज भी खेतों में तैयार खड़ी फसलों पर कुछ व्यवस्था नहीं बनायीं जा सकी है जिससे किसानों को भले ही लाभ न दिया जा सके पर उनकी लागत को पूरा करने की दिशा में सोचा जा सके. प्राकृतिक आपदाओं से खेती को बचाया नहीं जा सकता है पर किसानों के लिए सही योजनाओं के माध्यम से उनके घाटे को कम करने के बारे में सोचा जा सकता है. आज जो तंत्र राज्यों में काम कर रहा है वह पूरी तरह से गला हुआ है क्योंकि भारी भरकम विभागों के पास बेहतर संसाधन दिए जाने के बाद भी उनकी तरफ से काम को सही तरीके से नहीं किया जा रहा है. इस तरह की मौसमी मार से ज़िले स्तर के तंत्र को स्वतः ही सक्रिय होने के बारे में तैयार किया जाना चाहिए जिससे वह राज्यों की राजधानियों या केंद्र से निर्देशों को प्राप्त करने के स्थान पर स्वयं ही आगे बढ़कर काम करने के लिए तैयार हो सके.      
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बुधवार, 25 फ़रवरी 2015

खादी ग्रामोद्योग और पतंजलि योगपीठ

                                          देश में आज़ादी के पहले से ही ग्राम स्वराज्य के सपने को साकार करने के लिए जिस तरह से गांधी जी ने खादी के महत्व को पूरी तरह से रेखांकित ही नहीं किया बल्कि उस विपरीत समय में भी कुछ ऐसा कर दिखाया था कि गाँव गाँव तक खादी और हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलना शुरू हो गया था. पूरी दुनिया में अंग्रेजी औपनिवेश का काम प्रारम्भ में केवल व्यापार तक ही सीमित था पर जब उन्होंने यह देखा कि इन देशों में व्यापार करने के साथ कमज़ोर शासन प्रणाली का लाभ उठाकर राज भी किया जा सकता है तो उन्होंने अपने इस कदम को मज़बूती के साथ आगे बढ़ाना शुरू कर दिया. आज भी देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में जिस तरह से ग्रामीण परिवेश की हस्तशिल्प दिखाई देती है उसके विकास के लिए किसी विशेष प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है बस उनके सामान के खरीददार मिलने शुरू हो जाएँ. मोदी सरकार के बनने के बाद जिस तरह से योगगुरु बाबा रामदेव द्वारा खादी ग्रामोद्योग मंत्रालय के पुनर्गठन के लिए अपना मत रखने को कहा गया था उसकी देश भर में आलोचना हुई थी पर सरकार ने अपने कदम वापस लेने से इंकार किया था.
                                       माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) मिनिस्टर कलराज मिश्र ने अब जिस तरह से यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में सरकार किसी भी स्तर पर विभाग को पतंजलि के सुपुर्द नहीं करने जा रही है उससे इस मसले पर छाये हुए भ्रम दूर हो गए हैं. कलराज का यह भी कहना था कि बाबा रामदेव के सुझाव अच्छे हैं और उन पर किस तरह से विभाग को चलाया जा सकता है इस बात पर विचार किया जा रहा है और आने वाले समय में खादी ग्रामोद्योग के पुनर्गठन पर विचार करते समय इस बात पर पूरा ध्यान दिया जायेगा. वैसे सरकार ने इस बारे में व्यापक स्तर पर विचार करने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय करने के बारे में सोचा हुआ है जिससे विभिन्न तरह के सुझावों का अध्ययन करके ही इस मामले पर आगे बढ़ा जा सके. आज जिस तरह से सरकार ने मेक इन इंडिया कार्यक्रम के लिए कमर कस रखी है तो इस तरह के ग्रामीण परिवेश में आर्थिक गतिविधियों को चलए रखने वाले किसी भी काम पर वह अचानक से बड़ा निर्णय कर अपने ही फ्लैगशिप कार्यक्रम की हवा कैसे निकाल सकती है.
                                खादी को यदि सही तरह से सहकारिता के साथ जोड़ा जा सके और किसी भी बड़े प्रयास के शुरू करने से पहले उसे देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में प्रायोगिक तौर पर इस्तेमाल किये जाने की तरफ बढ़ा जाये तो संभवतः इससे नए तंत्र के लाभ हानि को आसानी से समझने में मदद मिल सकती है. समय के साथ चलने के लिए परिवर्तन बहुत आवश्यक होते हैं और जब तक इन परिवर्तनों का सही आंकलन न कर लिया जाये तब तक पूर्ण रूप से परिवर्तन करना उल्टा असर भी दिखा सकता है. सरकार की तरफ से सधे हुए क़दमों से इस मसले पर आगे बढ़ने से यह स्पष्ट हो गया है कि उसकी प्राथमिकता में विभाग को सुधारना है पर अब वह पूरे विभाग पर किसी का नियंत्रण नहीं चाहती है और खुद ही इस मुद्दे पर आगे बढ़ने के बारे में सोच रही है. सरकार के पास पूरा तंत्र है पर मशीनी युग की तरफ बढ़ने से खादी पर असर पड़ने लगा है तो नयी नीति में इस चुनौती से सरकार और विभाग को किस तरह से निपटना है यह महत्वपूर्ण है. कलराज के इस तरह से स्थिति को स्पष्ट कर देने के बाद समस्याओं से निपटना आसान ही होने वाला है और सरकार की चुनौतियाँ भी कम ही रहने वाली हैं.      
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शनिवार, 7 जुलाई 2012

अनाज भण्डारण और शौचालय

             केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने पीने योग्य पानी और स्वच्छता पर एक समीक्षा बैठक में यह कहकर आये हुए प्रतिनिधियों को चौंका दिया कि केन्द्रीय सहायता से बनाये गए शौचालयों का उपयोग गाँवों में अनाज के भण्डारण में अधिक किया जा रहा है और इसका शौचालय के रूप में उपयोग बहुत कम जगहों पर ही हो रहा है. यहाँ पर सवाल यह नहीं है कि जब गाँवों में लोगों ने सरकारी सहायता का उपयोग करके इन्हें बनवा लिया है तो इनका दूसरे कामों में उपयोग क्यों किया जा रहा है बल्कि यह है कि आख़िर गांवों में लोगों में इस बात के लिए जागरूकता कब आएगी कि उन्हें खुले में शौच जाने के स्थान पर इन नए बनाये गए शौचालयों का उपयोग करना चाहिए ? सरकारें इस तरह के कामों के लिए धनराशि या सहायता ही उपलब्ध कर सकती हैं पर जब तक लोगों में जागरूकता ही नहीं होगी तब तक किस तरह से इस तरह की योजनाओं का सही लाभ सही जगह तक कैसे पहुँच पायेगा ?
         अभी तक देश के ग्रामीण अंचलों में खुले में शौचालय जाने की आदत लोगों में रही है और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि देश की लगभग ६० % जनता खुले में ही शौच जा रही है और इसका सामजिक प्रभाव ऐसा है कि जिन जगहों पर शौचालय बन भी गए हैं वहां भी अभी तक इनका उपयोग लोगों ने करना नहीं शुरू किया है. आंकड़ों के अनुसार आबादी के अनुसार बड़े राज्यों में पूर्ण रूप से खुले में शौच जाने से रोकने के लिए संसाधनों को उपलब्ध करवाने में अभी १५ वर्ष और लगने वाले हैं और इस बार की कोई गारंटी नहीं है कि जब ये शौचालय उपलब्ध हो जायेंगें तब गाँव में रहने वाले इनका उपयोग भी शुरू कर देंगें ? इस बारे में सामाजिक जागरूकता के साथ शिक्षा के प्रसार की बहुत आवश्यकता है क्योंकि जब तक इन ग्रामीण लोगों को खुले में शौच जाने के नुकसान नहीं समझ आयेंगें तब तक किसी भी परिस्थिति में इस समस्या को ख़त्म नहीं किया जा सकेगा.
          ऐसा नहीं है कि इस दिशा में केंद्र और राज्यों की सरकारें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं फिर भी इस जागरूकता को जिस स्तर पर फैलना चाहिए थे वह उस स्तर पर नहीं फ़ैल पा रही है जिससे देश आंकड़ों में आज भी उतना ही पिछड़ा माना जाता है जितना कि वास्तव में वह है नहीं. ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा नहीं है कि लोग केवल गरीबी के कारण ही खुले में शौच जाते हैं बल्कि अधिकतर स्थानों में आर्थिक रूप से संपन्न लोग भी खुले में ही शौच जाने को एक परंपरा मानते हैं. अब इस तरह के सामाजिक बन्धनों और परम्पराओं को ख़त्म करने का समय आ गया है क्योंकि महिलाओं के खुले में शौच जाने से उनके ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों की सम्भावना हमेशा ही बनी रहती है. ऐसी स्थिति में जब गाँव के लोगों को यह ख़ुद ही समझ में आ जायेगा कि खुले में शौच जाने से सामजिक और स्वस्थ्य सम्बन्धी समस्याएं फ़ैल सकती हैं तो वे स्वयं ही इस बारे में विचार कर इस पर अमल करने का प्रयास करेंगें और तभी इस अभियान को पूरी सफलता भी मिल पायेगी.
 
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सोमवार, 29 नवंबर 2010

इन्टरनेट २०१२ तक गाँवों में

आख़िर कार देश के गाँवों की अहमियत को समझते हुए वर्तमान संप्रग सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में २०१२ तक पूरे देश के सभी गाँवों को पूरी तरह से तेज़ गति के इन्टरनेट से जोड़ने की दिशा में सही कदम उठा दिया है. इस पूरे कार्यक्रम का लाभ आने वाले वर्षों में दिखाई देगा. आज के समय में गाँवों के विकास केलिए जो भी योजनायें बनायीं जा रही हैं उनमें बहुत बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार दिखाई देता है क्योंकि आज सरकार के पास कोई भी ऐसी व्यवस्था नहीं है जो इस पूरे तंत्र की निगरानी कर सके ? वैसे भारत की विशालता और विविधता को देखते हुए कहीं से भी यह करना बहुत आसान नहीं होने जा रहा है फिर भी यदि एक चरण बद्ध तरीके से इस पर बढ़ना शुरू किया जाये तो यह लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है.
   सरकार जिस तरह से १८७० करोड़ रु० लगाकर इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर काम शुरू कर चुकी है वह देश के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यदि पूरा देश ब्राडबैंड सुविधा से जुड़ जायेगा जिससे केंद्र या राज्य सरकार द्वारा किये जाने वाले किसी भी काम को करने में और उनकी निगरानी करने में बहुत आसानी हो जाएगी. जब गाँवों तक यह पूरी सुविधा पहुँच जाएगी तो उससे इन योजनाओं से जुड़े किसी भी काम की निगरानी करनी बहुत आसानी हो जाएगी. जिस समय यह योजना पूरी तरह से संचालित होने लगेगी तो पूरे देश के किसी भी हिस्से से कुछ भी पता करना और किसी भी योजना से जुडी किसी भी जानकारी को आसानी से पाया जा सकेगा. जब यह तंत्र पूरी तरह से चालू हो जायेगा तो केवल गाँव ही क्या शहर भी अच्छी तरह से देश के राजधानी से जुड़े रह सकेंगें.
     देश में योजनाओं की कमी नहीं है पर उनको सही ढंग से लागू करवा पाने के तंत्र के न होने से हमारा देश बहुत सारे घोटालों में फँस जाता है. देश के क़ानून की कमियों का लाभ लेकर बहुत सारे लोग किसी भी हद को तोड़ कर घपले करने के लिए तैयार रहते हैं. अब समय है कि किसी भी योजना को ऐसे बनायाजाए कि उससे सम्बंधित हर जानकारी नेट पर उपलब्ध हो और वह जानकारी समय समय पर देश के नागरिकों को भी बताई जाती रहे जिससे आम लोग यह जान सकें कि देश में क्या क्या उपलब्ध है और किन योजनाओं के द्वारा उन तक देश की सरकारें क्या पहुँचाने का प्रयास कर रही हैं ? यह देश की सरकारों को समझना ही होगा कि अब देश के गाँवों को पीछे छोड़कर कोई भी विकास की इबारत नहीं लिख सकता है. देश की आत्मा गाँवों में बसती है और बिना आत्मा के बाकि शरीर कितने दिनों तक और कैसे आगे जा सकता है ?   

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रविवार, 7 फ़रवरी 2010

अब ग्रामीण चिकित्सक भी ?

देश अभी तक अघोषित रूप से शहर और गाँव में बंटा हुआ था पर अब चिकित्सा के नाम पर इसे पूरी तरह से बांटने पर विचार किया जा रहा है ? देश में एम् सी आई जो कि एलोपैथिक चिकित्सकों की हर बात के लिए ज़िम्मेदार है उसे यह अधिकार कौन दे रहा है की वे गाँव के लिए अलग से चिकित्सक तैयार करें ? यह सही है की देश के ग्रामीण अंचलों में चिकित्सकों की बहुत कमी है पर इसका मतलब यह तो नहीं कि किसी छोटे रास्ते से इस समस्या का समाधान निकला जाये ? क्या एम सी आई यह बताने का कष्ट करेगी कि  डॉक्टर बनते समय जो शपथ चिकित्सक लेते हैं उसे इतनी जल्दी कैसे भुला दिया जाता है ? हर चिकित्सक अपना भविष्य शहर में ही ढूंढता रहता है पर कोई भी यह नहीं चाहता कि गाँव में जहाँ इसकी वास्तविक आवश्यकता है कोई जाये ? इस ग्रामीण डिग्री के माध्यम से चिकित्सा के क्षेत्र में भी एक ऐसी खाई बन जाएगी जिसे कभी भी मिटाया नहीं जा सकेगा .
क्या गाँव में होने वाली समस्याओं के लिए कुछ अलग करना ज़रूरी है या फिर उन्हें भी पूरी तरह से उचित चिकित्सा उपलब्ध करायी जानी चाहिए ? यह परिषद् और इसके चिकित्सक खुले आम आयुष के चिकित्सों का विरोध करते रहते हैं पर शायद ये इस तथ्य से अनिभिज्ञ हैं कि जिसने पूरे ५ साल पढाई की है और अपनी परीक्षा को अच्छे से उत्तीर्ण भी किया है वह किस तरह से कम है ? यहाँ पर इस बात का कोई मतलब नहीं रह जाता है कि किसने किस पद्धति से अपनी पढ़ाई  की है क्योंकि क्या एलोपैथिक चिकित्सक आयुर्वेदिक आदि दवाएं नहीं लिखते हैं ? देश में चिकित्सा के स्तर को देखते हुए कुछ ऐसा किया जाना चाहिए जिससे गाँव को राहत मिले इसमें भी राजनीति नहीं होनी चाहिए. पर क्या हर तरफ स्वार्थ से भरी दुनिया में कोई वास्तव में गाँवों के बारे में सोचना चाहता है ? 


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