मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 25 February 2015

खादी ग्रामोद्योग और पतंजलि योगपीठ

                                          देश में आज़ादी के पहले से ही ग्राम स्वराज्य के सपने को साकार करने के लिए जिस तरह से गांधी जी ने खादी के महत्व को पूरी तरह से रेखांकित ही नहीं किया बल्कि उस विपरीत समय में भी कुछ ऐसा कर दिखाया था कि गाँव गाँव तक खादी और हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलना शुरू हो गया था. पूरी दुनिया में अंग्रेजी औपनिवेश का काम प्रारम्भ में केवल व्यापार तक ही सीमित था पर जब उन्होंने यह देखा कि इन देशों में व्यापार करने के साथ कमज़ोर शासन प्रणाली का लाभ उठाकर राज भी किया जा सकता है तो उन्होंने अपने इस कदम को मज़बूती के साथ आगे बढ़ाना शुरू कर दिया. आज भी देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में जिस तरह से ग्रामीण परिवेश की हस्तशिल्प दिखाई देती है उसके विकास के लिए किसी विशेष प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है बस उनके सामान के खरीददार मिलने शुरू हो जाएँ. मोदी सरकार के बनने के बाद जिस तरह से योगगुरु बाबा रामदेव द्वारा खादी ग्रामोद्योग मंत्रालय के पुनर्गठन के लिए अपना मत रखने को कहा गया था उसकी देश भर में आलोचना हुई थी पर सरकार ने अपने कदम वापस लेने से इंकार किया था.
                                       माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज (एमएसएमई) मिनिस्टर कलराज मिश्र ने अब जिस तरह से यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में सरकार किसी भी स्तर पर विभाग को पतंजलि के सुपुर्द नहीं करने जा रही है उससे इस मसले पर छाये हुए भ्रम दूर हो गए हैं. कलराज का यह भी कहना था कि बाबा रामदेव के सुझाव अच्छे हैं और उन पर किस तरह से विभाग को चलाया जा सकता है इस बात पर विचार किया जा रहा है और आने वाले समय में खादी ग्रामोद्योग के पुनर्गठन पर विचार करते समय इस बात पर पूरा ध्यान दिया जायेगा. वैसे सरकार ने इस बारे में व्यापक स्तर पर विचार करने के बाद ही कोई अंतिम निर्णय करने के बारे में सोचा हुआ है जिससे विभिन्न तरह के सुझावों का अध्ययन करके ही इस मामले पर आगे बढ़ा जा सके. आज जिस तरह से सरकार ने मेक इन इंडिया कार्यक्रम के लिए कमर कस रखी है तो इस तरह के ग्रामीण परिवेश में आर्थिक गतिविधियों को चलए रखने वाले किसी भी काम पर वह अचानक से बड़ा निर्णय कर अपने ही फ्लैगशिप कार्यक्रम की हवा कैसे निकाल सकती है.
                                खादी को यदि सही तरह से सहकारिता के साथ जोड़ा जा सके और किसी भी बड़े प्रयास के शुरू करने से पहले उसे देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में प्रायोगिक तौर पर इस्तेमाल किये जाने की तरफ बढ़ा जाये तो संभवतः इससे नए तंत्र के लाभ हानि को आसानी से समझने में मदद मिल सकती है. समय के साथ चलने के लिए परिवर्तन बहुत आवश्यक होते हैं और जब तक इन परिवर्तनों का सही आंकलन न कर लिया जाये तब तक पूर्ण रूप से परिवर्तन करना उल्टा असर भी दिखा सकता है. सरकार की तरफ से सधे हुए क़दमों से इस मसले पर आगे बढ़ने से यह स्पष्ट हो गया है कि उसकी प्राथमिकता में विभाग को सुधारना है पर अब वह पूरे विभाग पर किसी का नियंत्रण नहीं चाहती है और खुद ही इस मुद्दे पर आगे बढ़ने के बारे में सोच रही है. सरकार के पास पूरा तंत्र है पर मशीनी युग की तरफ बढ़ने से खादी पर असर पड़ने लगा है तो नयी नीति में इस चुनौती से सरकार और विभाग को किस तरह से निपटना है यह महत्वपूर्ण है. कलराज के इस तरह से स्थिति को स्पष्ट कर देने के बाद समस्याओं से निपटना आसान ही होने वाला है और सरकार की चुनौतियाँ भी कम ही रहने वाली हैं.      
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