मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 24 February 2015

राहुल गांधी की छुट्टी

                                                               अपने बुरे समय से जूझ रही कांग्रेस के पास वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी से अधिक स्वीकार्य नेता न होने से जहाँ इन दोनों के नाम पर पार्टी के लिए एक जुटता का सन्देश भी जाता है वहीं इनकी कार्यशैली के चलते कई बार ऐसे अवसर भी सामने आते रहते हैं जिनसे पार्टी को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है. वर्तमान में जब अध्यादेशों को लेकर मोदी सरकार परेशानियों से घिरी हुई है और अन्ना भी किसानों के मुद्दे पर दिल्ली में आंदोलन करने में लगे हुए हैं तो भाजपा के सामने पूरे देश में विपक्ष की भूमिका निभा सकने में समर्थ कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के चलते आज ऐसे असहज दृश्य भी दिखाई दे रहे हैं. लोकतंत्र में पार्टियों की मज़बूती अंत में लोकतंत्र के लिए ही बेहतर साबित होती हैं और किस पार्टी को किस तरह से चलाया जाना है यह भी पार्टी की परिस्थितियों पर निर्भर किया करता है आज जब अवसरवादी नेता कांग्रेस को छोड़कर दूसरी पार्टियों में जाने में लगे हुए हैं तो उसे अपने को किस तरह से सम्भालना है यह कांग्रेस के नेतृत्व पर ही निर्भर करता है.
                               आज कांग्रेस में शीर्ष स्तर पर जो भी नेता हैं वे सभी अपनी राजनैतिक पारियों को लगभग खेल ही चुके हैं और अगले चुनाव तक उम्र के चलते इसमें से कितने खुलकर मैदान में आ पाते हैं यह समय ही बतायेगा क्योंकि जब भी सरकार बनती है तो अनुभव के नाम पर इनको सरकार में मंत्री पद मिल जाया करता है और युवाओं को पार्टी में काम कर अनुभव हासिल करने के लिए कहा जाता है. राहुल गांधी के शीर्ष स्तर की राजनीति में आने के बाद जिस तरह से निचले स्तर पर पार्टी को मज़बूत किये जाने के विभिन्न उपाय किये जाने लगे थे उनसे इन वरिष्ठ नेताओं को खतरा लगने लगा है और वे समय समय पर विभिन्न स्थानों पर राहुल से असहमति दिखने की कोशिशें भी करते रहते हैं क्योंकि यह उनके अस्तित्व को बचाए रखने की कोशिश का हिस्सा ही है उनकी इस तरह की असहमति के चलते वे पार्टी नेतृत्व पर कुछ दबाव बनाने में सफल भी हो जाते हैं. आज कांग्रेस जितनी भी है वह सिर्फ सोनिया गांधी के दम पर ही १९९८ के बाद से संभाली हुई ही है क्योंकि सीताराम केसरी के समय हार की हताशा के बाद पार्टी का हाल किसी से भी छिपा नहीं था, सक्रिय और सार्थक राजनीति के दम पर सोनिया ने अटल जैसे नेतृत्व के सामने भी कांग्रेस को एक विकल्प के रूप में खड़ा करने में सफलता पायी थी.
                               सत्ता भोग चुकी हर पार्टी के लिए ऐसा समय संकट का ही होता है जब वह सत्ता से अलग हो जाये और उसके नेता केवल अपने बारे में ही सोचने लगें आज कांग्रेस के वे बड़े नाम कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं जिनके दम पर पार्टी ने १० साल तक सरकार चलायी थी और वे राहुल को शीर्ष स्तर पर उनके अनुरूप परिवर्तन भी नहीं करने दे रहे हैं तो राहुल का छुट्टी पर जाने का कदम बिलकुल सही दिशा में लगता है. सत्ता को संभाल चुके ये लोग अब सड़कों पर पार्टी के लिए कुछ संघर्ष करके भी दिखाने का साहस करें. भाजपा द्वारा इस तरह के मुद्दे पर जिस तरह से बयानबाज़ी की जा रही है उसके कोई मायने नहीं हैं क्योंकि यदि उन्हें लगता है कि इससे कांग्रेस ख़त्म हो जाएगी तो उनको मसले पर नज़र रखते हुए अपने लिए उस घड़ी की प्रतीक्षा करनी चाहिए. राहुल की मौजूदगी से सदन में वैसे भी बहुत प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि वे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के सामने बहस से दूर ही रहा करते हैं भले ही इसके लिए कारण चाहे जो भी हों. इसलिए उनके न होने से अब सरकार के लिए सदन में मुश्किलें बढ़ गयी हैं क्योंकि वरिष्ठों पर इस बात का दबाव है कि वे सदन में सरकार को घेरने का काम करें और अब अपने को साबित करने के लिए ये नेता कुछ तो करने ही वाले हैं जो संभवतः सोनिया गांधी की अभी तक सदन में स्थापित की गयी कार्यशैली से अलग भी हो सकता है.         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

No comments:

Post a Comment