मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

राज्यों की स्थानीय नौकरियां

                                                               एमपी के सीएम कमलनाथ ने जिस तरह से राज्य में लगाए जाने वाले नए उद्योगों के लिए विभिन्न स्तरों पर छूट पाने के लिए राज्य के स्थानीय नागरिकों की शर्त लगायी है वह अपने आप में सम्पूर्ण देश के कानून और परिस्थितियों को देखते हुए सही नहीं कही जा सकती है पर विभिन्न राज्यों में इस तरह की नीति पहले सही चल रही है और आने वाले समय में इसके राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों के चलते अन्य राज्यों द्वारा भी इस तरह का मॉडल अपनाये जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता है. इस मामले में पहल करने और दूसरे राज्यों के लोगों को अक्सर निशाने पर लेने वाले महाराष्ट्र में  १९६८ से ही इस तरह की नीति लागू है जिसमें स्थानीय लोगों के लिए ८०% नौकरियों को आरक्षित किया गया था और आज भी स्थानीय दबाव के चलते प्रवासी कामगारों को नियमानुसार होने के बाद भी नौकरियों से बिना कारण बताये निकाला भी जाता है. इस मामले में तेलंगाना के कानून सबसे कड़े हैं क्योंकि वहां दूसरे राज्य के ही नहीं बल्कि राज्य के अंदर के लोग भी दूसरे क्षेत्र में नौकरी नहीं पा सकते हैं. हिमाचल, कर्णाटक ओडिशा में भी कम वेतन वाली नौकरियों को इसी तरह से स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित किया गया है।
                          ऐसी स्थिति का स्थानीय लोगों के लिए कुछ लाभ भी होता है पर उद्योगों के लिए दूसरे तरह की समस्याएं सामने आ जाती हैं जिसके चलते उनको प्रतिस्पर्धा पर सस्ता श्रम नहीं मिल पाता है और स्थानीय लोगों की अधिकता के कारण अनावश्यक श्रमिक राजनीति होने से उत्पादन आदि पर भी दुष्प्रभाव पड़ने की संभावनाएं अधिक हो जाती हैं. इस मामले को दूसरी तरह से देखने की आवश्यकता है जिससे उद्योगों के उत्पादन और उनके स्थापित होने की संख्या पर असर न पड़े साथ ही स्थानीय नागरिकों को भी अपने आस पास श्रम उपलब्ध हो जाये. आज वैसे भी नोटबंदी के बाद जिस तरह से निचले स्तर पर काम करने वाले श्रमिकों का अपने राज्यों में उल्टा पलायन हुआ है उससे भी समस्याएं नए स्तर पर सामने आ रही हैं. ऐसी परिस्थिति में केंद्र मनरेगा के धन आवंटन को बढ़ाकर स्थानीय स्तर पर श्रम दिवस बढ़ाये जाने का प्रयास कर सकती है जिसमें उसे राज्यों के भरपूर सहयोग की आवश्यकता पड़ने वाली है.
                         कौशल विकास योजना अपने आप में जितनी अनूठी थी उसे उतनी ही मक्कारी से भ्रष्ट तंत्र में बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी गयी है क्योंकि जिस तरह से बिना सुविधाओं के लोगों ने ऐसे केंद्र खोले और सरकार से प्राप्त अनुदान में बंदरबांट की वह किसी से भी छिपी नहीं है जिससे सरकार की एक महत्वाकांक्षी योजना जो हर स्तर पर नागरिकों के जीवन यापन में सहयोग कर सकती थी केवल भ्रष्टाचार का स्तम्भ बनकर ही रह गयी है. यदि इसको योजना को छोटे स्तर पर चलाकर उसकी प्रगति देखी जाती साथ ही बहुत बड़ी संख्या में केंद्र खोलने के स्थान पर उनमें दी जाने वाली ट्रेनिंग की गुणवत्ता पर ध्यान दिया जाता तो आने वाले समय में उद्योगों के लिए आवश्यकतानुसार स्थानीय श्रम भी उपलब्ध हो जाता। अब भी समय है कि स्थानीय स्तर पर पनप सकने वाले उद्योगों की पहचान कर उनके अनुरूप कार्य शुरू किया  भविष्य के लिए ऐसी समस्या से निपटा जा सके. यदि स्थानीय नागरिकों को अपने आस पास ही अच्छी सुविधा से युक्त रोज़गार मिल जायेगा तो कोई भी अपने पैतृक शहर को छोड़कर कहीं और जाने की बातें भी नहीं सोचेगा।
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सोमवार, 20 अगस्त 2018

सिद्धू और राजनीति

                                                         क्रिकेटर से राजनेता बने नवजोत सिंह सिद्धू का इमरान खान के शपथ ग्रहण में जाना अपने आप में एक छोटी सी घटना है पर सिद्धू के पाक सेना के जेनरल से गले मिलने को लेकर भारतीय राजनीति और विशेषकर सत्ताधारी भाजपा द्वारा इतना हल्ला मचाया जा रहा है जैसे सिद्धू ने कोई बड़ा अपराध कर दिया हो. संभवतः भाजपा और मोदी सरकार ने भी यह मुग़ालता पाल रखा होगा कि जिस तरह से मोदी ने अपने शपथ ग्रहण में पड़ोसियों को बुलाया था तो इस बार इमरान खान भी कुछ इस तरह का कदम उठायें पर उनकी तरफ से जिस ठन्डे तरह से भारत के साथ संबंधों पर शुरुवात की गयी है वह अपने आप में भाजपा के लिए सदमे से कम नहीं है क्योंकि यदि पीएम मोदी को पाक द्वारा बुलाया जाता तो भाजपा इसका भरपूर दोहन करती। इमरान ने सिद्धू के अलावा अन्य लोगों को भी बुलाया था पर संभवतः उनकी तरफ से जाने की कोई इच्छा नहीं प्रदर्शित की गयी जिससे सभी का ध्यान केवल सिद्धू की यात्रा पर ही चला गया.
                           यदि भाजपा और मोदी सरकार को सिद्धू या किसी अन्य भारतीय के इमरान के शपथ ग्रहण में शामिल होने पर कोई आपत्ति थी तो उनको जानी की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए थी पर इस मौके को भी भाजपा की तरफ से एक अवसर के रूप में देखना उनकी राजनीति को ही दर्शाता है सिद्धू के जाने को लेकर ही भाजपा कांग्रेस पर हमलावर हो गयी थी और उनके पाक जनरल बाजवा से मिलने को लेकर जिस तरह का हो हल्ला मचाया जा रहा है वह भाजपा की दोहरी नीतियों को उजागर करने वाला है. सिद्धू भारत के आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में पाक नहीं गए थे और जब उनका दौरा इस तरह का था तो क्या वे पाकिस्तान द्वारा निर्धारित किये गए किसी प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने की स्थिति में थे ? पाक अधिकृत कश्मीर के राष्ट्रपति के साथ उनके बैठने को लेकर भारत सरकार और भाजपा को गंभीर आपत्ति है जबकि सभी जानते हैं कि किसी भी समारोह में मेज़बान देश के प्रोटोकॉल का अनुपालन करना मेहमानों के लिए सामान्य शिष्टाचार होता है.
                         सिद्धू को भाजपा वैसे भी बख्शने के मूड में नहीं है क्योंकि जब पूरा देश मोदी मोदी चिल्ला रहा था तो उस स्थिति में भी सिद्धू ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस में जाने का निर्णय लिया था जो आज भी भाजपा को कचोटता रहता है इसलिए भी सिद्धू हमेशा भाजपा और अकालियों के हमले पर रहते हैं. वैसे भी सिद्धू इतने कमज़ोर नहीं है कि अपने ऊपर किये जाने वाले हमलों का बचाव न कर सकें साथ ही इस बात पर कांग्रेस को भी चिंता करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जब देश के पीएम बिना बुलाये दुश्मन देश के पीएम की बेटी की शादी में शामिल हो सकते हैं तो आधिकारिक रूप से निमंत्रित किये गए सिध्दू वहां पर क्या गले भी नहीं मिल सकते हैं? देश की सीमाओं पर जवान शहीद हो रहे हैं यह बिलकुल सच है पर क्या निर्णय लेने की क्षमताओं को अपने में समाहित किये पीएम मोदी पाक से मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा वापस लेने का कदम उठा सकते हैं ? क्या वे या भाजपा हाफिज सईद से वैदिक की मुलाक़ात को राष्ट्रहित मानते हैं ? देश की सीमाओं से बाहर पाक के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार से हमारे सुरक्षा सलाहकार चोरी से मिलकर किस तरह से जवानों की शहादत को सम्मानित करते हैं?  देश में दबाव में आये चीनी उद्योग और गन्ना किसानों की समस्याओं को अनदेखा करते हुए पाक की चीनी आयात कर भारत में चीनी के दाम लागत से कम कर मोदी सरकार आखिर किसका भला कर रही है ?  भाजपा को यह ध्यान रखना चाहिए कि सिद्धू भारत सरकार या पंजाब सरकार के आधिकारिक प्रतिनिधि के तौर पर पाक में नहीं थे यह उनकी निजी यात्रा थी और किसी भी व्यक्ति की निजी यात्रा के दौरान इस तरह की राजनीति करने से सभी को बचने की आवश्यकता भी है.

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शुक्रवार, 18 मई 2018

केंद्र और संवैधानिक पद

                                                                   कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा के सामने आने के बाद जिस तरह से राजनैतिक घटनाक्रम में तेज़ी से बदलाव दिखाई दिया उससे किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारे नेताओं की नैतिकता केवल तभी तक रहती है जब तक उनको अनैतिक कार्य करने का मौका नहीं मिलता है और इस काम में केंद्र में सत्ताधारी दल की तरफ से सदैव ही दबाव देकर काम किया जाता रहता है. आज़ादी के बाद से जिस तरह से धीरे धीरे केंद्र सरकार ने अपने अधिकारों का नैतिकता के मापदंडों को किनारे करते हुए दुरूपयोग शुरू किया था उसका दुष्परिणाम आज सबके सामने है और सबसे अधिक चिंता की बात तो यह है कि आज़ादी के बाद से जो गलती गैर-भाजपाई दलों ने सदैव ही की थी आज उसको नज़ीर बताकर खुद भाजपा भी उससे नीचे जाने को तैयार दिखाई देती है. खुद को पार्टी विद डिफ़रेंस कहने वाली भाजपा कुछ मौकों पर यदि पूर्ववर्ती सरकारों से अलग हटकर राजयपालों को संविधान की मंशा के अनुरूप काम करने के लिए खुला छोड़ना शुरू कर देती तो वास्तव में उसकी तरफ से एक नए राजनैतिक युग की शुरुवात की जा सकती थी पर देश को येन केन प्रकारेण कांग्रेस मुक्त करने की धुन में मोदी शाह की जोड़ी भाजपा को कांग्रेस का अन्य संस्करण बनाने की तरफ बढ़ती ही जा रही है जिससे देश में मूल्यों की राजनीति के और भी नीचे जाने की संभावनाएं हैं.
                                                 निश्चित तौर पर जब संविधान लिखा गया तो उस समय देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाले नेताओं की पूरी फौज मौजूद थी जिनमें नैतिकता कूट कूट कर भरी हुई थी तो उन्होंने अपनी सोच के अनुरूप ही काम शुरू किया और राज्यों में सरकार बनाने के लिए पूरा दारोमदार राज्यपाल के विवेक पर सिर्फ इसलिए  छोड़ दिया क्योंकि यह माना गया था कि लोकतंत्र की मूल भावना बहुमत के आधार पर राज्यपाल को निर्णय लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। कालांतर में अपनी राजनीति और अपने या सहयोगी दलों की सरकारों को बचाने के लिए केंद्र सरकारों की तरफ से जिन हथकंडों का उपयोग किया उससे निश्चित तौर पर भारतीय लोकतंत्र कमज़ोर ही हुआ है और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि आम जनमानस को भाजपा से कुछ उम्मीदें थीं कि वह इस तरह के क़दमों से खुद को दूर रखेगी उसकी आशाओं पर भाजपा पूरी तरह से विफल रही है. यह भी सही है कि हर राजनैतिक दल को अपने विस्तार के लिए काम करने की पूरी छूट है पर क्या यह विस्तार किसी भी कीमत पर किसी भी तरह से किये जाने को सही माना जा सकता है ?
                                                 राज्यपालों की तरफ से लगातार विवादित फैसले लेने की स्थिति में क्या अब समय नहीं आ गया है कि देश से राज्यपाल पद की ही विदाई कर दी जाये क्योंकि उनके राजनैतिक विचारधाराओं और पूर्वाग्रह के चलते जिस तरह से अधिकांश मामले कोर्ट में पहुँचने लगे हैं तो क्यों न सरकार गठन में चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के साथ राज्यों के हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों की भूमिका को निर्धारित कर दिया जाये ?  इन दोनों संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के पास राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं लगभग नहीं होती हैं और कम से कम अभी तक तो इन दोनों संस्थाओं के काम काज से आम जनता संतुष्ट ही नज़र आती है तो संविधान के अनुरूप प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चुनने की ज़िम्मेदरी आखिर उनको क्यों नहीं दी जा सकती जिससे राज्यपाल के अनावश्यक पद पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपयों को बचाने के बारे में सोचने की ज़िम्मेदारी आखिर किसकी है ?  देश में सरकार के खर्च को कम करने में लगे हुए वित्त मंत्री को इस दिशा में कानून मंत्रालय के साथ विचार विमर्श करना चाहिए जिससे इस फालतू पद को समाप्त किया जा सके। क्या राजनीति के बूढ़े शेरों के आरक्षित अभ्यारण्य बन चुके राजभवनों को देश की वर्तमान राजनीति पर हमला करने की स्थिति से बचाने के लिए अब इन अभ्यारण्यों को बंद करने का समय नहीं आ गया है ?
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मंगलवार, 18 जुलाई 2017

नेता, अधिकारी और शासन

                                          देश के हर राज्य से कभी न कभी इस तरह की ख़बरें सामने आती ही रहती हैं कि किसी अधिकारी ने किसी राजनैतिक दबाव की परवाह न करते हुए केवल कानून की परवाह की और किसी भी स्तर के नेता से जुड़े मसले पर केवल कानून सम्मत कोशिशें ही की हों. ईमानदारी अधिकारियों के दंडात्मक तबादलों में देश के हर राज्य और हर राजनैतिक दल का रिकॉर्ड लगभग एक जैसा ही है इसलिए यह बहस करना ही बेमानी है कि इस समस्या से आखिर किस तरह से निपटा जा सकता है ? आज जिस तरह से आम लोगों का रुझान सरकार और उसके कामों की तरफ बढ़ता ही जा रहा है उस परिस्थिति में किसी भी नेता या सरकार की हरकत को छिपाना बहुत ही मुश्किल काम हो गया है फिर भी नेता पूरी बेशर्मी के साथ अपने काम को करने में नहीं हिचकते हैं. कहने के लिए तो पूरे देश में कानून का राज है पर इस ग़लतफ़हमी को पालने वाले अधिकांश अधिकारी किस तरह से लगभग हर दल की सरकार में केवल धक्के ही खा रहे हैं यह किसी से भी छिपा नहीं है फिर भी केंद्र सरकार ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम करने वाले अधिकारियों को हर वर्ष विभिन्न तरह के सम्मान देने की अपने खोखली प्रक्रिया को जारी रखे हुए है.
                            ताज़ा मामले में शशिकला को जेल में दी जा रही विशेष सुविधाओं से जुड़े खुलासे के बाद कर्णाटक सरकार ने जिस तरह से डी रूपा का स्थानांतरण किया वह अपने आप में नेताओं की उस मानसिकता को ही दर्शाता है जो हर परिस्थिति में अधिकारियों को दबा कर रखने में ही विश्वास किया करते हैं. कहने के लिए यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के अंतर्गत ही आता है पर इसके पीछे कितनी राजनीति छिपी होती है यह सभी जानते हैं. वैसे भी जेल में बंदी नेताओं और उनके समर्थकों को लेकर भारत भर में कानून की लगभग हर समय धज्जियाँ ही उड़ाई जाती रहती हैं पर किसी ईमानदार अधिकारी के चलते कई बार इसका खुलासा भी हो जाता है. परिस्थिति तब और गंभीर और चिंताजनक हो जाती है जब किरण बेदी जैसी अधिकारी भी सुविधा के अनुसार मामलों पर प्रतिक्रिया देने का काम करने लगती हैं. अभी कुछ समय पहले यूपी में कई अधिकारियों और भाजपा नेताओं के बीच भी इसी तरह की ख़बरें आयी थीं तब बेदी ने किसी का भी समर्थन नहीं किया क्योंकि वहां पर उनकी पार्टी की सरकार चल रही है पर कर्णाटक से जुड़ा मामला होने के कारण उन्हें अधिकारी की ईमानदारी दिखाई देने लगी है. भारतीय राजनीति के साथ सामंजस्य बैठाने में जब किरण बेदी जैसी पूर्व पुलिस अधिकारी का यह हाल हो जाता है तो आम अधिकारियों से किसी निष्ठा की आशा कैसे की जा सकती है ?
                            ऐसे किसी भी मामले से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कड़े नियम बनाने और उन पर अमल करने के बारे में सोचना ही होगा तभी कुछ सही किया जा सकता है वर्ना हमेशा की तरह कोई अधिकारी खेमका, नागपाल या रुपा की तरह तबादले ही झेलने को अभिशप्त रहने वाला है. राजनैतिक मामलों से जुड़े किसी भी प्रकरण में तबादला आखिरी हथियार होना चाहिए और इस तरह के मामलों में विधायिका के पूरी तरह से फेल हो जाने के कारण न्यायपालिका को इसमें खुला हस्तक्षेप करने की छूट भी होनी चाहिए क्योंकि ये जनहित से जुड़े मुद्दे ही होते हैं. अधिकारियों के समय पूर्व तबादले के लिए विशेष कड़े नियम होने चाहिए और उन पर अमल करना सरकार के लिए बाध्यकारी भी होना चाहिए किसी भी तरह के विवाद के सामने आने पर जिला जज, जिलाधिकारी और राज्य व केंद्र की तरफ से आये हुए प्रतिनिधियों की समिति में ही उनके तबादले पर निर्णय किया जाना चाहिए जिससे ईमानदार अधिकारियों के लिए काम करने लायक माहौल को बनाये रखा जा सके. कहने को नेता यह कह सकते हैं कि इससे सरकार की कार्यक्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ेगा और अधिकारी निरंकुश हो जायेंगें पर सोचने की बात तो यह है कि आज ऐसे कितने अधिकारी बचे हैं जो हर तरह की परिस्थिति में केवल कानून के अनुसार चलने की हिम्मत और विश्वास रखते हैं ? अधिकारियों को नेताओं के इस चंगुल से निकालने के लिए किसी न किसी को किसी न किसी स्तर पर प्रयास करना ही होगा जिससे आने वाले समय में प्रशासन और शासन के बीच इस तरह के खेल को बंद किया जा सके और ईमानदार अधिकारी अपना कार्य पूरी क्षमता के साथ कर सकें.
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सोमवार, 19 दिसंबर 2016

चुनाव, चंदा और राजनीति

                                                                   देश के राजनैतिक दलों को जिस तरह से अपने संसाधनों के रूप आम लोगों से चंदा लेने के लिए जो छूट दी गई थी वह टीएन शेषन के ज़माने से ही चुनाव आयोग के निशाने पर रही है फिर भी उस पर नये सिरे से कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया जा सका है जिससे आज नोटबंदी के समय में सभी राजनैतिक दल इस बात के लिए आम लोगों के लिए और भी अधिक संदेहास्पद बन गए हैं कि नियम केवल आम लोगों के लिए हैं और राजनेताओं को उससे हर स्तर पर पूरी छूट दी गयी है. निश्चित रूप से यह बहुत ही विवादास्पद मुद्दा रहने वाला है क्योंकि जब भी इस पर कोई बात संसद के बाहर उठायी जाती है राजनैतिक दलों की तरफ से बहुत ही ठंडी प्रतिक्रिया सामने आती है क्योंकि उनको यह लगता है कि देश में केवल आम जनता, उद्योगपति और व्यवसायी ही करों की चोरी करते हैं और राजनैतिक तंत्र अपने आप में ईमानदारी की जीती जागती प्रतिमूर्ति है जबकि वास्तविक स्थिति इससे उलट ही है और आज देश में भ्रष्टाचार की सूची में राजनेताओं को ही सबसे ऊंचा स्थान मिलता रहता है और यह किसी से भी छिपा नहीं है क्योंकि चुनाव जीतने के बाद जिस तरह से अधिकांश नेताओं के रहन सहन में अप्रत्याशित सुधार आ जाता है वह किसी आम व्यक्ति के लिए पूरे जीवन एक सपना ही रह जाता है.
                                                    चुनाव आयोग ने एक बार फिर से चंदे के बारे में जिस तरह से बिना लिखा-पढ़ी के दो हज़ार रुपयों से अधिक के चंदे के लेन-देन पर रोक लगाने के लिए सरकार को फिर से प्रस्ताव दिया है वह अमल में लाया ही जाना चाहिए क्योंकि जब तक खुद राजनेता अपने तंत्र में ईमानदारी को नहीं लायेंगें तब तक उनकी तरफ से देशभक्ति और ईमानदारी के सारे आह्वाहन केवल खोखले ही साबित होने वाले हैं. इस मसले पर सरकार को अविलंब एक प्रस्ताव लाकर उस पर कानून मंत्रालय समेत सभी राजनैतिक दलों के साथ विमर्श शुरू करने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि यह मुद्दा केवल सरकार के लिए ही आवश्यक नहीं है बल्कि देश के हर राजनैतिक दल के लिये इसका उतना ही महत्व है. जजों की नियुक्ति में हस्तक्षेप, वेतन भत्तों में बढोत्तरी आदि मसलों पर जितनी आसानी से सदन में सहमति दिखाई देती है क्या कभी वैसी सहमति देशहित के इस मुद्दे पर भी दिखाई देगी या कुछ छोटे दल ही अपने स्तर से इस राजनैतिक कदाचार के लिए अपर्याप्त संघर्ष करते रहने वाले हैं ? निश्चित तौर पर आज के समय में इस तरह की नीतियां अंत में देश को ही नुकसान पहुंचती हैं और जब राजनैतिक दल खुद ही इस तरह के भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने में लगे रहेंगें तो उनके नेताओं से ईमानदारी की अपेक्षा किस दम पर रखी जा सकती है ?
                                                १९६१ में जब यह कानून बनाया गया तो २०००० रूपये बहुत होते थे पर आज क्या इस तरह की छूट की आवश्यकता है या देश के चुनाव सुधारों के रूप में सबसे पहले राजनैतिक दलों के अवैध तरीके से लिए जाने वाले इस चंदे पर ही रोक नहीं लगायी जानी चाहिए ? आखिर ये सुधार किये जाएँ इसके लिए चुनाव आयोग कब तक सरकार को सुझाव ही भेजता रहेगा और सरकार उन्हें हमेशा की तरह कूड़े के ढेर में डालती रहेगी ? अब समय आ चुका है कि चुनाव सुधारों को व्यापक रूप में लागू किया जाये और आने वाले समय में देश की राजनीति को और भी स्वच्छ बनाने की कोशिशों को और भी आगे बढ़ाया जाये पर इसके लिए क्या देश के नेता और राजनैतिक दल कुछ विचार करने के लिए तैयार भी हैं या नहीं या वे चुनाव आयोग की केवल चुनाव के समय असीमित और सामान्य समय में बेहद सीमित शक्तियों में ही खुश हैं ? आज़ादी के कई दशकों तक चुनावों में पैसा इतना प्रभावी नहीं होता था जिससे इस तरह की छूट समझ में आती थी पर आज जब लोग राजनीति को भी धंधे के रूप में अपनाने लगे हैं तो इसे भी उसी श्रेणी में रखा ही जाना चाहिए. देश में ऐसे संगठनों की कमी है जो इस मुद्दे पर जान आंदोलन खड़ा कर सकें और देश का कानून भी सुप्रीम कोर्ट तक को सामान्य विधायी कार्यों में दखल देने से रोकता है तो उस स्थिति में आखिर चुनाव आयोग के पास सरकार से अनुरोध करने के अतिरिक्त क्या विकल्प शेष बचते हैं ?    
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शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

सैन्य अभियान और सरकार

                                                                    पाकिस्तान की तरफ से छेड़े गए छद्म युद्ध से निपटने की तरकीबें खोजने में व्यस्त भारत सरकार, रक्षा विशेषज्ञ और सेना के सामने पहले से ही कम गंभीर चुनौतियाँ नहीं है पर जिस तरह से सोशल मीडिया में कुछ समूहों और लोगों की तरफ से लगातार काग़ज़ी दबाव बनाने की कोशिशें की जा रही हैं उसके बाद इन सभी लोगों के लिए और भी अधिक मुश्किलें सामने आने वाली हैं. यह सही है कि पाकिस्तान और कश्मीर मामले पर संघ के सभी अनुषांगिक संगठनों और भाजपा द्वारा देश में जिस तरह का माहौल लगातार बनाया जाता रहा है आज उसके दबाव को खुद मोदी सरकार, संघ और भाजपा अच्छे से महसूस कर रहे हैं. विपक्ष में बैठकर ताना मारना और सरकार के खिलाफ इतने महत्वपूर्ण मुद्दों पर लगातार बयानबाज़ी और निचले स्तर की राजनीति के सहारे यह साबित करने की कोशिशें करने वाली भाजपा और संघ आज चुप हैं क्योंकि उनको खुद भी समझ नहीं आ रहा है कि आखिर वे कौन से तात्कालिक कदम उठाये जाएँ जिनके माध्यम से पाकिस्तान पर आम जनमानस की भावनाओं के अनुरूप दबाव बनाया जा सके. कुछ लोगों द्वारा जिस तरह से सीमा पार भारतीय सेना के द्वारा कार्यवाही किये जाने की अफवाह फैलाई जा रही है वह अब पूरी तरह से झूठ साबित हुई है और सेना की तरफ से भी इस बात का बाकायदा खंडन भी किया गया है कि उसने एलओसी के पार कोई कार्यवाही नहीं की है.
                                       हर तरह से तबाह पाकिस्तान के सामने आज कितने विकल्प शेष हैं यह पूरी दुनिया भी जानती है और यदि विश्व समुदाय इस बारे में बहुत अधिक आश्वस्त है तो उसके पीछे भारत की सुलझी हुई सोच भी बहुत बड़ा काम कर रही है. पाकिस्तान के खिलाफ यदि युद्ध करना है तो यह सेना से विचार विमर्श करने या आवश्यक होने पर विपक्षी दलों से विमर्श के बाद मोदी सरकार ही करेगी क्योंकि देश ने उनको अपना विश्वास सौंप हुआ है पर किसी भी दशा में अनावश्यक बातों पर ध्यान देकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिशों का हर स्तर पर विरोध होना चाहिए और जिन समूहों और सोशल मीडिया के पन्नों पर भड़काने वाली बातें की जा रही हैं उन पर भी सरकार को अपने स्तर से कार्यवाही करने के बारे में सोचना चाहिए. देश की सुरक्षा व्यवस्था कुछ मूर्खों के अनुसार नहीं चल सकती है और सेना के आधिकारिक पेज के अतिरिक्त उससे जुडी किसी भी गतिविधि को सोशल मीडिया में साझा करने वाले हर व्यक्ति को चेतावनी भी दी जानी चाहिए भले ही कितने प्रभावशाली क्यों न हों. सेना की सामान्य गतिविधि से जुडी कुछ तस्वीरों को कुछ लोगों ने इस तरह से सोशल मीडिया पर साझा करना शुरू कर दिया है जैसे उसके सञ्चालन की ज़िम्मेदारी सरकार ने इन छद्म राष्ट्रवादियों के हाथों में ही सौंप रखी है.
                                   स्मार्ट फ़ोन और व्यवसाय से जुड़े कार्यों तथा इन्टरनेट के सबके लिए उपलब्ध हो जाने के चलते आज ऐसे लोगों की संख्या बहुत हो चुकी है जिन्हें यह पता ही नहीं है कि सोशल मीडिया पर क्या शेयर करना चाहिए और क्या नहीं ? यह स्थिति बन्दर के हाथ में उस्तरे की तरह ही है पर कुछ मामलों में इसके लिए मोदी सरकार की नीतियां भी ज़िम्मेदार कही जा सकती हैं क्योंकि सरकार समर्थक टीवी चैनेल लगातार सीमा पर जाकर ऐसी संवेदनशील रिपोर्टिंग करते हुए देखे जा सकते हैं जिसका कोई मतलब नहीं है. सीमा पर बीएसएफ या सेना की क्या स्थिति है और किस तरह के सुरक्षा उपकरणों को वहां पर लगाया गया है आज यह सब दिखाया जाना भी रिपोर्टिंग का हिस्सा हो गया है पर क्या सरकार और रक्षा मंत्रालय को इस बात का अंदाज़ा भी है कि इन सभी संचारों की आज लगातार नेट पर उपलब्धता बनी रहती है तो किसी विपरीत परिस्थिति में क्या देश के दुश्मन इस तरह की जानकारी को नेट से हासिल नहीं कर सकते हैं ? पीएम मोदी और उनकी सरकार प्रचार में बहुत भरोसा करती है और उनकी २०१४ की सोशल मीडिया टीम आज भी चुनावी मोड से बाहर नहीं आ पायी है क्योंकि अधिकांश मामलों में उसकी तरफ से ही ऐसी संवेदनशील जानकारियां ही नेट पर डाली जा रही हैं. अच्छा हो कि सरकार के इस मामले में आशानुरूप गंभीर न होने पर भी हम नागरिक पूरी तरह से सचेत रहें और इतने महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार पर दबाव बनाने के स्थान पर अपने आसपास इस बात पर ध्यान रखें कि कोई संदिग्ध हमारे समाज में घुसपैठ तो नहीं कर रहा है.   
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मंगलवार, 2 अगस्त 2016

पूर्व मुख्यमंत्री और आवास

                                                                             अपने अजीब तरह के नियमों और कानूनों की तरह सदैव ही विवादों में आ जाने वाले यूपी के लिए सुप्रीम कोर्ट से आया नया आदेश नयी तरह की समस्याएं लेकर भी आने वाला है जिससे पार पाना सरकार के लिए कठिन ही होने वाला है और कानून की मदद से कुछ ऐसा तोड़ निकाले जाने की कोशिशें भी शुरू की जा सकती हैं जिससे इन नेताओं को कुछ राहत दी जा सके. असल में इस पूरे विवाद की जड़ में यूपी का १९९७ का वह कानून है जिसके अंतर्गत पूर्व मुख्यमंत्रियों को लखनऊ में आजीवन सरकारी आवास उपलब्ध करने की व्यवस्था की गयी थी पर लोक प्रहरी नामक संगठन की १२ साल पुरानी याचिका का निस्तारण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को ही गलत बताया और १५ दिन में सरकारी आवास खाली करने के १९८१ के कानून को ही कानून सम्मत बताते हुए २ महीनों में ये आवास खाली करवाने के लिए आदेश जारी कर दिए हैं जिससे कांग्रेस के एन डी तिवारी, राम नरेश यादव, भाजपा के कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और सपा के मुलायम सिंह तथा बसपा की मायावती से ये आवास खाली कराने के आदेश जारी किये गए हैं.
                                        वैसे देखा जाये तो यह आदेश पूरी तरह से सही है क्योंकि आर्थिक रूप से संघर्ष कर रहे राज्य के लिए इतनी बड़ी संख्या में अपने पूर्व मुख्यमंत्रियों के लिए प्रति माह लाखों रूपये खर्च कारण का कोई सही कारण समझ में नहीं आता है फिर भी यदि आवश्यकता हो तो परिस्थिति के अनुरूप इस तरह एक आवासों की कुछ शर्तों के साथ व्यवस्था की जा सकती है. सत्ता में रहने के कारण कुछ निर्णयों के चलते राजनेताओं के लिए खतरे बढ़ जाया करते हैं ऐसे में उन्हें उच्च श्रेणी की सुरक्षा भी दी जाती है और अपने पैतृक आवासों में रहने पर उनकी सुरक्षा को भी गंभीर खतरा हो सकता है जिसके लिए राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट में रिव्यु पिटीशन भी डाल सकती है. आज कल्याण सिंह राज्यपाल हैं तो राजनाथ सिंह गृह मंत्री तो उनकी सुरक्षा के लिए यूपी सरकार को चिंता करने की आवश्यकता भी नहीं है पर मुलायम और मायावती के विवादित फैसलों के चलते उनको सही सुरक्षा की आवश्यकता भी है. कांग्रेस के एन डी तिवारी और राम नरेश यादव से यह सुविधा अवश्य ही वापस ली जा सकती है क्योंकि आज उनके किसी प्रशासनिक फैसले के चलते उनको किसी तरह के खतरे के बारे में कोई सूचनाएँ भी नहीं हैं पर क्या केवल सुरक्षा को मुद्दा बनाकर ही सरकार यह सब इतनी आसानी से कर पायेगी जब सुप्रीम कोर्ट का रवैया इस मामले में भी सख्त ही दिख रहा है ?
                                    आज के युग में विभिन्न कारणों से बढ़ते हुए सुरक्षा संबंधी खतरों से निपटने के लिए अब एक सही नीति को बनाने की आवश्यकता भी है क्योंकि विभिन्न आवासों पर करोड़ों रूपये खर्च कारण उनको संवारने का काम राज्य संपत्ति विभाग द्वारा लगातार किया ही जाता है और इस मुद्दे पर भी कई बार बहुत हो हल्ला होता है. सुरक्षा के खतरे को देखते हुए इन नेताओं को अति सुरक्षा क्षेत्र के किसी बहुखंडी आवास में शिफ्ट किया जा सकता है जिसकी सुरक्षा कम बल लगाकर एक साथ की जा सकती है. एक ही क्षेत्र में पूर्व मुख्यमंत्रियों के रहने से जहाँ उनको सुरक्षा का एहसास भी रहेगा वहीं राज्य सरकार और सुरक्षा बलों के लिए उनकी सुरक्षा करना भी बहुत आसान ही रहेगा. इस तरह के कानून यूपी के साथ कुछ अन्य राज्यों में भी हैं अब वे भी आसानी से निरस्त किये जा सकते हैं. अच्छा हो कि नेता खुद ही इस बात को समझें कि अब जनता उतनी अनजान भी नहीं है जितना वे समझते हैं और आने वाले समय में इस तरह के बेमतलब के कानूनों से निपटने के लिए जनता के पास कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने का अवसर सदैव ही रहता है. केवल अपनी शान को दिखाने के लिए किये जाने वाले इस काम को अब सुरक्षा के पैमाने पर कसना चाहिए और जिन नेताओं को सुरक्षा की आवश्यकता है उन्हें सुरक्षा दी जानी चाहिए पर आजीवन सुरक्षा और आवास देने के इस तरह के किसी भी गैर कानूनी काम का समर्थन भी नहीं किया जाना चाहिए.   
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शुक्रवार, 1 अप्रैल 2016

धार्मिक आयोजनों में समरसता

                                                       कर्नाटक के पुत्तुर जिले के एक धार्मिक रथयात्रा कार्यक्रम उपयुक्त का नाम छापे जाने के बाद शुरू हुआ विवाद अजीब शक्ल लेता हुआ नज़र आ रहा है. पूरे मामले में इस मंदिर की वार्षिक यात्रा के समय बनते गए आमंत्रण पत्रों पर उपयुक्त एबी इब्राहिम का नाम छपा गया जो कि कर्नाटक के हिंदू रिलेजियस इंस्टीट्यूशंस एंड चैरिटेबल एनडाउमेंट ऐक्ट १९९७ की धारा ७ के अनुसार मुरजई मंदिर के निमंत्रण पत्र पर किसी गैर-हिंदू शख्स का नाम नहीं हो सकता. इस कानून के अनुसार तो जिसकी हिंदू धर्म में आस्था नहीं है, उस व्यक्ति का नाम भी निमंत्रण पत्र पर नहीं छापा जा सकता है. सरकार की तरफ से इस तरह के निमंत्रण छापे जाने विरुद्ध कुछ लोग इस मामले को उच्च न्यायालय तक ले गए जिसके बाद और भी अजीब स्थिति बन गयी क्योंकि एक तरफ चीफ जस्टिस सुभ्रो कमल मुखर्जी ने इसे अपने गृह राज्य पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा के सन्दर्भ में भी लिया और स्पष्ट किया कि वहां मुस्लिम समुदाय के लोग भी हर स्तर पर मिलजुल कर विभिन्न धार्मिक त्यौहार मनाते हैं साथ ही उन्होंने इस पूरे विवाद को ही मूर्खता पूर्ण भी कहा पर साथ ही कानूनी बाध्यता के चलते सरकार को उपायुक्त को मौके पर मौजूद न रहने के लिए व्यवस्था करने को भी कहा.
                                          इस पूरे प्रकरण में यह बात तो स्पष्ट हो ही गयी है कि हमारी विधायिका भी कानून बनाते समय किस तरह का व्यवहार करती और और कई बार कुछ ऐसा कदम भी उठा लेती है जिनके चलते इस तरह का भ्रम भी पैदा हो जाता है. कर्नाटक में १९९७ का विधेयक कुछ इस तरह की बातों को संरक्षण देता है कि हिन्दुओं के धार्मिक कार्यक्रमों में राज्य का कोई मुस्लिम इस तरह से भी शामिल नहीं हो सकता है जो कि स्पष्ट रूप से भविष्य में सरकार चलाने में एक बड़े अवरोध के रूप में काम करने वाला है. सरकार का कहना है कि सामान्य प्रोटोकॉल और शिष्टाचार के चलते ही उपायुक्त का नाम इस पत्र पर छपा गया था और उपायुक्त जिले की कानून व्यवस्था के लिए हर स्तर पर ज़िम्मेदार होता है इस परिस्थिति में अब सरकार के पास क्या विकल्प शेष बचते हैं क्योंकि कोर्ट ने उपायुक्त को मौके पर न भेजने की बात कही है तो क्या आने वाले समय में किसी हिन्दू धार्मिक कार्यक्रम के आयोजन से पहले अब सरकार यह भी सुनिश्चित करने लगेगी कि उस क्षेत्र में कोई गैर हिन्दू अधिकारी भी तैनात न हो ? फिर ऐसा भी हो सकता है कि आने वाले समय में यही बात देश के अन्य धार्मिक समूह भी ऐसी ही मांग करने लगेंगें तो उस स्थिति से आखिर किस तरह से निपटा जायेगा ? आज देश में जिस धार्मिक आधार पर बंटवारा किया जाता रहता है उस परिस्थिति में क्या सरकारी आयोजनों में इस तरह के तुगलकी विधेयकों के द्वारा कोई निर्णय लिए जाएंगें जो सामाजिक समरसता को पूरी तरह से छिन्न भिन्न करने वाले ही अधिक हैं ? क्या कम पुलिस बल से जूझ रहे राज्य आने वाले समय में पुलिस की तैनाती भी धार्मिक आयोजनों के आधार पर करने के लिए बाध्य किए जाएंगें और समाज के बीच की खाई को पाटने के स्थान पर उसे और भी गहरा करने का काम किया जाने लगेगा ?
                     राजनैतिक रूप से धार्मिक आधार पर बेहद संवेदनशील यूपी में एक मुस्लिम, चर्चित और मुखर नगर विकास मंत्री मो० आज़म खां के कारण कभी भी आज तक इस बात के कोई आरोप नहीं लगे कि उनकी तरफ से इलाहाबाद के कुम्भ या वार्षिक माघ मेले में व्यवस्था के स्तर पर कोई भेदभाव गया था ? यदि ऐसा होता तो यूपी में १९७७ की जनता सरकार में सीएम रामनरेश यादव के मंत्रिमंडल के मंत्री हाजी आबिद अली अंसारी हिन्दुओं के पवित्रतम नैमिषारण्य चक्र तीर्थ और मिश्रिख में दधीच कुंड का जीर्णोद्धार क्यों करवाते ? आज यूपी में एक तेज़ तर्रार मुस्लिम डीजीपी होने के कारण क्या उनको किसी बड़े हिन्दू धार्मिक आयोजन की तैयारियों से इसलिए वंचित किया जा सकता है कि वे मुस्लिम हैं ? यह सब बातें कुछ इस तरह से लगती हैं जैसे हम मध्ययुगीन राजाओं के समय में वापस लौट रहे हैं जहाँ बिना कुछ सोचे समझे कुछ भी कहने और करने के लिए राजाज्ञा जारी कर दी जाती है. अच्छा हो कि कर्नाटक के इस बिल को सुशासन के लिए एक बाधा मानते हुए अविलम्ब समाप्त किया जाये और इस मामले में खुद चीफ जस्टिस सुभ्रो कमल मुखर्जी को ही पहल करनी चाहिए और जनहित में स्वतः संज्ञान के माध्यम से कर्नाटक सरकार को नोटिस जारी कर इसे समाप्त करने के लिए आगे आना चाहिए. 
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गुरुवार, 10 मार्च 2016

सरकारी रोक और पलायन

                                                      अपने कर्ज़ों को न चुकाने के कारण देश और पूरी दुनिया में बदनाम हो रहे उद्योगपति और राज्यसभा से निर्दलीय सांसद विजय माल्या के बारे में केंद्र सरकार ने जिस तरह से शंका के साथ यह कहा कि ऐसा लगता है कि वे फिलहाल देश से बाहर लन्दन में किसी स्थान पर हैं उसे यही लगता है कि हमारे देश में सरकार के नियंत्रण में चलने वाली एजेंसियां किस हद तक बंधनों में जकड़ी हुई है और उनके काम काज में अनावश्यक तेज़ी तभी दिखाई देती है जब उन्हें सरकार के लोगों के निजी हितों को साधने का काम करना होता है. इस बात से इन एजेंसियों पर कोई अंतर नहीं पड़ता है कि उनके आका के रूप में कौन सा दल सरकार चला रहा है क्योंकि सीबीआई के मामले में पहले ही सुप्रीम कोर्ट उसे पिंजरे का तोता कह चुकी है और दुर्भाग्य से आज भाजपा भी कांग्रेस की तरह उसी कटघरे में खड़ी दिखाई देती है जिसके लिए कभी वह कांग्रेस की आलोचना किया करती थी. कोई भी सरकार भले ही कुछ भी कहती रहे पर जिस तरह से नेताओं के अनुरूप देश की एजेंसियों का कामकाज रहता है वह इनको कहीं न कहीं से बहुत कमज़ोर भी करता है.
                                          विजय माल्या का मामला तो सभी की जानकारी में था और उनके लिए जिस तरह से देश न छोड़ने की पेशबंदी की जा रही थी उससे यही लग रहा था कि संभवतः वे देश के कानून का सामना करने के लिए एजेंसियों के चंगुल में आ जाएँ पर इतने ऊंचे स्तर पर जाने जाने वाले एक व्यक्ति ने आखिर किस तरह से देश छोड़ दिया और देश की एजेंसियां और सरकार कुछ भी जान नहीं पायीं उससे कहीं न कहीं संदेह और भी मज़बूत होता है कि सरकारी एजेंसियों को उनके देश से बाहर जाने की पूरी खबर भी थी. आज वे जिस तरह से आर्थिक अनियमितता के आरोपी बने हुए हैं तो उनको देश के अंदर रहकर कानून का सम्मान करना चाहिए था पर उन्होंने भी ललित मोदी की तरह देश से भागने में ही अपनी भलाई समझी और आज सरकार के सामने शर्मिंदा होने के अतिरिक्त कोई अन्य चारा भी नहीं रह गया है. इससे यही लगता है कि देश के अंदर कहीं न कहीं राजनेताओं और उद्योगपतियों का कोई गठजोड़ अवश्य ही काम कर रहा है जिसको तोड़ पाने में कोई भी नेता अपने निहित स्वार्थों के चलते सफल नहीं हो सकता है.
                                         इस तरह के किसी भी व्यक्ति को आखिर किस हद तक अनियमितता करने की छूट दी जा सकती है अब यह सोचने का समय आ गया है क्योंकि इस मामले में मोदी और उनकी सरकार पर हमले होने स्वाभाविक हैं पर इन हमलों से भी मामले का हल नहीं निकल सकता है. देश की दिन प्रतिदिन पंगु होती जा रही संसद को अब इस तरह के मामलों से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि जब तक राजनैतिक इच्छाशक्ति को अपने हितों को पीछे रखते हुए मज़बूत नहीं किया जायेगा तब तक इसी तरह से कभी आतंकी संगठनों से जुड़े व्यक्ति या कभी आर्थिक मामलों में कानून का सामना करने से बचने की कोशिशें करने वाले लोग देश से भागने में सफल होते रहने वाले हैं. इसे देश की समस्या के रूप में देखने की आवश्यकता है क्योंकि यदि इसे भी दलगत राजनीति से देखने की कोशिशें की जाती रहेंगीं तो मामला और भी उलझता जायेगा और हमारी एजेंसियों के साथ सरकार को भी समय समय पर नीचा देखने को मजबूर होना पड़ेगा. इस तरह की भगोड़ी राजनीति का लगभग हर दल द्वारा समर्थन किया जाता है और अब इससे पूरी तरह से बचने के लिए कठोर कदम उठाने की आवश्यकता सामने अ गयी है और सरकार को संसद में इस मसले पर पहल करनी ही होगी. 
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रविवार, 7 फ़रवरी 2016

कश्मीर-सौदेबाज़ी और सरकार

                                                   मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद एक माह पूरा होने पर भी अभी तक जम्मू कश्मीर में नयी सरकार के गठन का रास्ता पूरी तरह से खुलता हुआ नज़र नहीं आ रहा है जो कि अभी तक सत्ता संभाल रहे पीडीपी-भाजपा गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रहा है. लम्बे समय से अशांत रहने वाले इस राज्य में अब जब स्थितियां काफी हद तक नियंत्रण में हैं तो इस परिस्थिति में वहां इस तरह से चुनी हुई सरकार के स्थान पर केंद्र का अप्रत्यक्ष दखल के चलते राज्य की जनता को एक बार फिर से अलगाववादी लोकतंत्र के खिलाफ भड़काने का काम कर सकते हैं क्योंकि अभी तक जिस तरह से राज्य में विभिन्न प्रमुख दलों के साथ राष्ट्रीय दलों ने अपनी भूमिका का निर्वाह किया है उससे भी राज्य की परिस्थितियों को सामान्य करने में महत्वपूर्ण योगदान मिला है. राजनैतिक रूप से चुनी हुई सरकार के होने पर जहाँ राज्य में सक्रिय अलगाववादी केंद्र और सेना पर आसानी से प्रतिबन्ध लगाने के झूठे आरोप नहीं लगा पाते हैं वहीं सीधे राज्यपाल शासन होने के कारण वे राजनेताओं को किनारे किये जाने और दिल्ली पर मनमानी करने के आरोप लगाने से भी नहीं चूकने वाले हैं.
                                     किसी भी बहु-दलीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था में खंडित जनादेश का आने कोई नयी बात नहीं है पर जिस तरह से कई महत्वपूर्ण राज्यों और केंद्र में कई दशकों से साझा सरकारों का दौर चलता रहा है और उसमे दलीय हितों के चलते कई बार दरारें भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं तो इस परिस्थिति से निपटने के लिए क्या अब देश को नए सिरे से सोचने की आवश्यकता नहीं है ? इस तरह की परिस्थिति में सभी दलों की एक राज्य स्तरीय सरकार बनाये जाने के विकल्प पर सोचने की बहुत आवश्यकता आ गयी है क्योंकि चुनाव के बाद परिस्थितियां बदल जाएंगीं ऐसा कोई भी नहीं कह सकता है तो जिन लोगों को जिस रूप से स्थानीय कारणों के चलते विधानसभाओं में जाने का अवसर मिला है उनके सभी के साथ मिलकर एक साझा कार्यक्रम बनाकर सरकार के गठन के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए. इससे जहाँ असमय चुनावों से बचा जा सकेगा वहीं देश के संसाधनों को बचाया जा सकेगा जो कि चुनावों में लगाने पड़ते हैं. इस बार पीडीपी और भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि दोनों के वोट बैंक बिलकुल विपरीत ध्रुवों से आते हैं और जब एक अपने हितों की बात करता है तो दूसरे के हित उससे स्पष्ट रूप से टकराने लगते हैं.
                                    वर्तमान परिस्थिति में यदि दोनों दलों के बीच कोई सामंजस्य नहीं बन पाता है तो यह राज्य के लिए अच्छा साबित नहीं होने वाला है क्योंकि भाजपा से सम्बन्ध जोड़कर पीडीपी ने निश्चित रूप से अपने वोटबैंक को नाराज़ किया है साथ ही भाजपा भी जम्मू क्षेत्र में अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने के लिए आश्वस्त नहीं दिखाई दे रही है संभवतः यही कारण है कि वह भी अगले पांच वर्षों तक सरकार चलने की संभावनाओं को लगातार टटोलने का काम करने में लगी हुई है. मुफ़्ती मोहम्मद सईद पुरानी पीढ़ी के नेता थे जिन्होंने देश की मुख्य राजनीतिक धारा के साथ भी लम्बे समय तक काम किया था जिस कारण उनके सोचने और खतरे उठाने की क्षमता का महबूबा किसी भी स्तर पर मुक़ाबला नहीं कर सकती हैं और यही तथ्य दोनों दलों के १० महीने पुराने गठबंधन को आगे चलाने के लिए रोड़े का काम कर रहा है. कश्मीर के हितों पर बात होनी चाहिए पर साथ ही जम्मू और लद्दाख के लोग जिस तरह से कश्मीर घाटी के नेताओं के नेतृत्व में बनने वाली किसी भी सरकार पर अपने क्षेत्रों की उपेक्षा के आरोप लगाते हैं आज उनसे भी निपटने की आवश्यकता है. महबूबा भाजपा पर दबाव बनाकर अपनी शर्तें मनवाना चाहती हैं और इस स्थिति में बात आगे न बढ़ने पर वे कांग्रेस के साथ भी जा सकती है यह बात भाजपा भी समझ रही है जिसके बाद राज्य की जनता को केंद्र से मिलने वाली सहायता और सहयोग में कमी आ सकती है यह बात भी सभी जान रहे हैं. फिलहाल सभी दलों कि यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वे वर्तमान में चल रहे गतिरोध को तोड़ने के लिए नए सिरे से खुले मन से सोचने का काम शुरू करें.   
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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

कीर्ति आज़ाद को फ्री हिट की आज़ादी

                                                                          बिहार में विपरीत परिस्थितियों में भी लगातार चुनाव जीतने वाले भाजपा के सांसद कीर्ति आज़ाद के मुद्दे पर जिस तरह से भाजपा ने उन्हें निलंबित कर अपनी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को कमज़ोर ही किया है वह निश्चित तौर पर उसे आने वाले समय में कठिन दौर का सामना करवा सकती है. लोकतंत्र में जनता के सामने सब कुछ खुला रहता है और संभवतः यही कारण है कि आज़ादी के इतने वर्षों बाद भारत में सत्ता परिवर्तन बहुत ही सुगम तरीके से होता रहता है. देश में भ्रष्टाचार सदैव ही एक बड़ा मुद्दा रहा है और समय समय पर विभिन्न दलों की केन्द्र और राज्य सरकारों पर भ्रष्टाचार को पोषित करने का आरोप भी लगता रहता है पर पिछली यूपीए-२ की केंद्र सरकार के खिलाफ भाजपा ने जिस तरह से भ्रष्टाचार को एक बड़े मुद्दे के रूप में जनता के सामने प्रस्तुत किया था उससे आम लोगों की यह धारणा ही बन गयी कि मनमोहन सरकार बहुत भ्रष्ट है और इस मामले में सबसे बुरी बात यह हुई कि भाजपा की तरफ से लगभग सभी नेताओं ने देश की स्थिति को बहुत ख़राब करके प्रस्तुत किया जबकि वास्तविकता में ऐसा नहीं था और आज उस किये का फल खुद भाजपा के लिए एक चुनौती बना हुआ है. देश की बिगड़ी हुई छवि को सुधारने और सही सन्देश देने में अभी भी मोदी सरकार को कड़े प्रयास करने पड़ रहे हैं.
                                           कीर्ति आज़ाद ने जिस तरह से डीडीसीए में भ्रष्टाचार का मामला लगातार उठाया है और साक्ष्यों में कमी के कारण सीधे तौर पर भले ही अरुण जेटली पर कोई आरोप साबित न हो पा रहे हों पर स्थिति बिलकुल उसी तरह की है जब कांग्रेस नीत यूपीए सरकार पर भाजपा उसके कुछ मंत्रियों के कारण आरोप लगाया करती थी और उन मंत्रियों के इस्तीफे पर भी अड़ जाया करती थी रेल मंत्री के रूप में पवन बंसल मामले में कांग्रेस पर जिस तरह से उनके इस्तीफे का दबाव बिना कुछ साबित हुए ही लगाया गया था तो भाजपा किस मुंह से उनसे इस्तीफा माँगा करती थी ? आज जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हुए अरुण जेटली सामने आये हैं तो भाजपा और खुद जेटली अपने वे दिन कैसे भूल सकते हैं जब वे केवल आरोपों पर ही संसद को ठप कर मंत्रियों से इस्तीफ़ा माँगा करते थे क्या नैतिकता के आधार पर तब इस्तीफ़ा मांगना सही था और आज विपक्ष यदि वैसा ही कर रहा है तो वह सदन को बाधित करने का आरोप कैसे लगा सकती है ? भ्रष्टाचार के मामले में मोदी का यह कहना ही पर्याप्त नहीं है कि जेटली भी आडवाणी की तरफ साफ़ निकल आयेंगें क्योंकि यदि मोदी को इतना भरोसा है तो वे जांच को तेज़ी से करवा कर जेटली से सरकार से हटने के लिए भी तो कह सकते हैं.
                                 निश्चित तौर पर इस पूरे मामले में कुछ न कुछ तो गड़बड़ है क्योंकि कीर्ति आज़ाद जैसा बेदाग व्यक्ति केवल क्रिकेट के लिए ही इतना संघर्ष कर रहा है जिसमें उसका कोई व्यक्तिगत हित भी नहीं छिपा हुआ है. कीर्ति आज़ाद को पार्टी से निकाल कर मोदी-शाह ने भले ही अनुशासनहीनता पर कठोरता प्रदर्शित करने के नाम पर कुछ हासिल कर लिया हो पर पूरे देश में एक बात तो अवश्य ही सन्देश के रूप में चली गयी है कि यदि जेटली सही हैं तो वे जांच होने तक पद से क्यों नहीं हट जाते हैं ? कीर्ति के तेवर और कल ही हॉकी इंडिया से जुड़े एक मुद्दे पर केपीएस गिल ने भी जेटली पर भ्रष्ट आचरण को लेकर निशाना लगाया है वह उनकी विश्वनीयता को और भी संदेहास्पद बना देता है. अब भाजपा और एनडीए सरकार को सही मुद्दे को खोजकर जेटली को जाँच पूरी होने तक सरकार से बाहर बैठाने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में मोदी-शाह से नाराज़ चल रहे पार्टी के लोग उनसे किस तरह से बदला लेने की सोचकर बैठे हैं यह कोई नहीं जनता है. विपक्ष में बैठकर भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात करना एक बात है और सरकार चलाते समय उससे सही तरह से निपटना बिल्कुल दूसरी बात है और यह अब मोदी-शाह को समझ में आ भी रहा होगा.      
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रविवार, 1 नवंबर 2015

वोट के लिए कुछ भी करेगा ??

                                 देश में चुनाव के समय हमारे राजनेता कितने घटिया हो जाते हैं इसकी बानगी लगभग हर चुनाव में दिखाई देती है पर अब पाकिस्तान की तरह से ही जिस तरह से भारत के मतदाताओं को पाकिस्तान का भय दिखाकर भाजपा द्वारा अपने पक्ष में वोट करने के लिए माहौल बनाया जाना शुरू हो चुका है उसके बाद इस बात का भी पता चलता है कि हमारे पढ़े लिखे नेता भी मानसिक रूप से कितने दीवालिया हैं ? इतने बड़े पदों पर पहुंचे हुए लोगों का मानसिक संतुलन इतना कमज़ोर है कि वे जानते हुए भी भोली भाली जनता को उन बातों से बरगलाने की कोशिशें करने में नहीं चूकते हैं जिनको आज के युग में पल भर में ही झूठा साबित कर दिया जाता है. वोटों के लालच में मोदी, अमित शाह और गिरिराज सिंह से किसी नैतिकता की आशा भी नहीं की जा सकती है क्योंकि पिछले आम चुनावों में सबसे घटिया बयान देने वाले गिरिराज सिंह मोदी के चहेते मंत्री हैं.
                                मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में चुनाव पहुँचने के बाद जिस तरह से पहले अमित शाह और फिर अन्य भाजपाई नेताओं ने चुनाव प्रचार में पाकिस्तान का ज़िक्र करना शुरू किया उससे उनकी मानसिकता का ही पता चलता है क्योंकि पिछले डेढ़ वर्षों में मोदी सरकार ने देश के लिये जो कुछ भी किया है उसके परिणाम आने में समय लगने वाला है और इस परिस्थिति में जब बिहार में लोकसभा चुनावों में पायी सफलता को बचाये रखने की आवश्यकता और दबाव भाजपा पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है तो विकास के भाजपा के चुनावी पटल से गायब हो चुका है. खुद अमित शाह भी विकास के मुद्दे को भूलकर जातिवादी कुचक्र में उलझ चुके हैं और जिस जातिवाद को पिछले चुनावों में भाजपा द्वारा आसानी से तोड़ दिए जाने के ढेरों विश्लेषण सामने आये थे आज वे खुद जातिवाद की भेंट चढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं.
                      केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी द्वारा जिस तरह से बिना जानकारी नितीश का चुनाव प्रचार पाकिस्तानी अख़बारों में किये जाने की बातें की गयीं और जब डिजिटल सरकार के मंत्री रूडी को सही बात पता चली तो भी उनमें इतना साहस नहीं था कि वे अपनी गलती को मानकर ही अपना ट्वीट डिलीट करते और उन्होंने चोरी से अपना विवादित ट्वीट ही गायब कर दिया। नैतिकता के इतने ऊंचे मानदंड केवल नागपुरी संस्कृति में पले बढे लोगों के ही हो सकते हैं यह तो स्पष्ट हो गया है जो मोदी दिन रात डिजिटल इंडिया, फेसबुक और ट्वीटर के गाने गाते रहते हैं उनके मंत्री इस डिजिटल संसार के मामले में कितने निरक्षर हैं यह सभी को पता चल ही गया है. देश के मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए किस तरह से मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में रहने वाली हिन्दू आबादी को कितनी बेशर्मी के साथ भारत की पहली स्वघोषित डिजिटल सरकार के ज्ञानी मंत्री बरगलाने की कोशिशों में लगे हैं यह भी देश को पता चल चुका है.      
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शनिवार, 31 अक्टूबर 2015

मोदी सरकार और कानून

                                          नई दिल्ली स्थिति केरल सरकार के आधिकारिक भवन केरल हाउस में जिस तरह से हिन्दू सेना के किसी व्यक्ति के कहने पर दिल्ली पुलिस ने तलाशी छापेमारी कर अभियान किया उसके बाद से मोदी सरकार और उसकी कार्यशैली बहुत ही विवादों के घेरे में है. इस मामले में जिस तरह से केवल एक फ़ोन पर वह सारा काम भी दिल्ली पुलिस ने कर दिखाया जो स्पष्ट रूप से उसकी सीमाओं से बाहर था तो इसे दिल्ली पुलिस की कार्यशैली और उसकी निरंकुशता के बारे में ही पता चलता है. मोदी के राष्ट्रीय राजनीति के परिदृश्य में सामने आने के बाद से ही जिस तरह से संघ, उसकी राजनैतिक इकाई भाजपा और अन्य विभिन्न नामों वाले संगठन जिस तरह से मनमानी करने आमादा हुए जा रहे हैं उसके बाद दिल्ली पुलिस का इस तरह का बर्ताव माहौल को बताने के लिए काफी है. क्या देश की राजधानी में खुद पुलिस इस तरह से बिना सक्षम अधिकारी और अधिकारों के कुछ भी करने के लिए मोदी और राजनाथ सिंह द्वारा खुली छोड़ दी गयी है ?
                             खुद पीएम मोदी और उनके द्वारा नियुक्त किये गए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने एक समय जिस तरह से गुजरात में इसी तरह की राजनीति के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ाया था आज वे उसे ही पूरे देश में दोहराना चाह रहे हैं भले ही उसके लिए उनके नेता और सरकारी मशीनरी का किसी भी हद तक कैसा भी दुरूपयोग क्यों न किया जाये। वैसे तो देश भर में पुलिस इसी अजीब तरह से काम करने के लिए कुख्यात है पर अन्य राज्यों की पुलिस के मुकाबले दिल्ली पुलिस की छवि थोड़ी अलग भी क्योंकि उसकी कार्यशैली से उसके राष्ट्रीय राजधानी की पुलिस होने के संकेत भी मिलते हैं. केरल हाउस मामले में जिस तरह से अब विवाद सीधे तौर पर केरल की अस्मिता और मोदी सरकार के बीच का दिखायी देने लगा है उसमें कुछ लोगों को बलि का बकरा बनाया ही जायेगा।
                    अभी तक मोदी सरकार के गुणगान करने वाली रेटिंग एजेंसी मूडीज़ ने भी जिस तरह से भारत में बढ़ रही असहिष्णुता पर स्पष्ट रूप से अपनी राय देते हुए कहा है कि यदि ऐसा ही होता रहा तो मोदी के बहुत सारे महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स शायद सपना बनकर ही रह जाने वाले हैं और इससे देश में विकास, निवेश और आर्थिक प्रगति सभी पर बुरा असर पड़ने की पूरी संभावनाएं भी हैं. अब इस स्थिति में यदि बिना किसी विवाद के मोदी सरकार आगे है तो उसे इन बेलगाम लोगों पर कुछ लगाम देनी ही होगी पर देश में अभी तक विभिन्न स्तरों पर सामजिक बंटवारे से जिस तरह भाजपा अपने राजनैतिक मंसूबों को हासिल करती रही है संभवतः यह मुद्दा उन सब पर भारी पड़ जाता है और राज्यसभा में अपना गणित बिहार और यूपी के माध्यम सुधारने की की कोशिश में लगे हुए मोदी भी इसकी खुले तौर अनदेखी करने से नहीं चूक रहे हैं क्योंकि विकास और गुजरात के नाम पर जो वोट मिलने थे मिल चुके हैं और अब किसी भी तरह से सरकार बनाये जाने की कोशिशें चल रही है.
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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

भारत-अफ्रीका परंपरा और संबंध

                                                                           देश के निर्माण में अपना किसी भी स्तर पर योगदान करने वाले नेताओं को भले ही सरकार पूरी तरह से भूल गयी हो पर भाजपा की कथित मीडिया टीम के लिए भारत अफ्रीका समिट में नेहरू-इंदिरा का जिक्र कहीं से भी संघ, मोदी और भाजपा को रास नहीं आया होगा। आज़ादी के बाद पूरी दुनिया में भारत को हर तरह से स्वीकार्य बनाये जाने के लिए नेहरू द्वारा किये गए प्रयासों को अनदेखा करते हुए जिस तरह से भाजपा ने पिछले चुनावों में उंनके चरित्र हनन से लेकर लगभग हर हथकंडा अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी उसकी उस मानसिकता को भी अफ्रीका के नेताओं ने पूरी दुनिया के सामने बहुत अच्छी तरह से आइना दिखा दिया है क्योंकि भारत की अभी तक की छवि पूरी तरह से सहिष्णु और सद्भाव बढ़ाने वाले राष्ट्र की ही रही है पर कहीं न कहीं से भाजपा के मातृ संगठन संघ द्वारा आज़ादी के बाद नेहरू के नेतृत्व में देश ने जो कुछ भी हासिल किया था उसे नकारने का काम ही अधिक किया जाता रहा है और उनकी कुछ नाकामियों को इस तरह से प्रदर्शित किया जाता है जैसे उन्होंने देश के लिए कुछ भी नहीं किया हो ?
                      लोकतंत्र में राजनैतिक विरोध होना अवश्यमभावी है क्योंकि विपरीत विचारधाराओं में से ही लोगों को अपने लिए सरकार चुनने की आज़ादी के बारे में अपने अधिकार का उपयोग करना होता है और इसी क्रम में देश ने कई बार शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण भी देखे हैं जो शायद दुनिया के लिए एक अचम्भे से अधिक कुछ भी नहीं हैं क्योंकि पिछली सदी में स्वातंत्र हुए देशों में जिस तरह से समस्याएं बनी रहती हैं भारत ने उससे पूरी तरह मुक्ति ही पा रखी है. संघ का देश में एक अपना ही अलग एजेंडा रहा है और उसी के तहत वह भाजपा से अपने काम करवाने की कोशिशें करता रहता है पर जिस समिट के लिए मोदी सरकार ने पूरा ज़ोर सिर्फ इस बात पर ही लगा दिया था कि यह केवल मोदी और भाजपा का ही सम्मलेन रह जाये तो दक्षिण अफ्रीका और ज़िम्बाब्वे के नेताओं ने अपनी स्पष्टवादिता से उनकी इस मंशा पर पूरी तरह से पानी ही फेर दिया जब उन्होंने मंच से ही भारत के साथ अफ्रीका महाद्वीप के रिश्तों के ज़िक्र में नेहरू और इंदिरा गांधी का ज़िक्र पूरी शिद्दत के साथ किया।
                            दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने जिस तरह से पिछली सदी में अपने देश के साथ संबंधों को बढ़ाने और विकास की बात करने के लिए नेहरू के योगदान की चर्चा की उससे यही लगता है कि भले ही देश की राजनीति में आज प्रभावी भूमिका निभा रहे संघ और मोदी सरकार के लिए नेहरू और इंदिरा की उपेक्षा करना आसान हो पर दुनिया और ख़ास तौर पर अफ्रीका के लोग आज भी उनके योगदान को नहीं भूल पाये हैं. इसी क्रम में जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रोबर्ट मुगाबे ने और भी आगे जाते हुए लम्बे समय तक भारत में राज करने वाली कांग्रेस पार्टी को भी महान बताया उससे केवल यही सीखा जा सकता है कि भले ही आज कोई भी दल या नेता अप्रभावी हो चुका हो पर उसके कार्यकाल में लिए गए फैसलों से प्रभावित होने वाले लोगों के लिए वह सदैव ही महत्वपूर्ण ही रहा करता है. आज यदि अफ्रीका के नेता इतने दिनों बाद भी नेहरू इंदिरा को याद कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर उनके काम तो बहुत ही महत्वपूर्ण रहे होंगे पर आज संघ, भाजपा और मोदी अपने देश की उस विरासत से पीछा छुड़ाना चाह रहे हैं जो अब देश के इतिहास में दर्ज़ हो चुकी है.
            लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई किसी भी सरकार को देश चलाने की पूरी स्वतंत्रता संविधान में दी गयी है पर अपनी सोच से इतर किसी अन्य को अपनी विरासत विरासत का हिस्सा न मानने वाली इस संघ की परंपरा को आज मोदी सरकार आगे बढ़ाने में लगी हुई है जिससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उसकी छोटी सोच ही प्रदर्शित होती है क्योंकि यदि विश्व के साथ लम्बे समय तक भारत के संबंधों की रखवाली करने वाले नेताओं को भी इतनी महत्वपूर्ण समिट में भुला दिया जाता है तो जिन्होंने उनके साथ काम किया या उनकी नीतियों के चलते बहुत लाभ उठाया है वे किसी भी तरह से उसे नहीं भूलने देते हैं और इस समिट में संभवतः अफ्रीका के इन शीर्ष नेताओं ने यही बात सार्वजनिक मंच से कहकर एक तरह से मोदी सरकार को सन्देश देने का काम ही किया है. दूसरे नेता इस तरह की बातों रुख अपनाते हैं यह उनकी बात है पर भारत की श्रेष्ठ परंपरा का निर्वहन करते हुए नए युग में प्रवेश करने के बारे में एक स्पष्ट सन्देश इन सीधे साधे अफ़्रीकी नेताओं स्वर तो दे ही दिया गया है.  
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गुरुवार, 17 सितंबर 2015

चुनावी खर्चे और नेता

                                                                              देश चलाने के लिए जनता द्वारा चुने जाने वाले सांसदों और उनकी पार्टियों द्वारा किस तरह से लगातार सफ़ेद झूठ बोला जाता है इसका ताज़ा उदाहरण विभिन्न दलों के पिछले आम चुनावों में जीते हुए सांसदों और उनकी पार्टियों द्वारा दिए गए ब्योरे से ही पता चल जाता है. इस सबमें सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस के सांसदों की तरफ से दिए गए आंकड़ों में भी भारी अंतर दिखाई दे रहा है. पांच राष्ट्रीय दलों के ३४२ सांसदों में से २६३ ने बताया कि उन्हें अपनी पार्टियों से ७५.७८ करोड़ रूपये मिले जबकि इन नेताओं की पार्टियों का कहना है कि उनकी तरफ से केवल १७५ सांसदों को ही ५४.७३ करोड़ रूपये दिए गए थे. अब इन आंकड़ों में देश को चलाने में लगी हुई पार्टियों को सही माना जाए या आज चुनाव जीतकर जो लोग माननीय बन चुके हैं उनकी बातों को सही कहा जाये. चुनाव आयोग के पास इस तरह के मामलों में कितनी कार्यवाही करने के अधिकार हैं यह अभी भी स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है क्योंकि नेता देश में अति सक्रिय चुनाव आयोग की परिकल्पना भी नहीं करना चाहते हैं.
                             देश में हर तरह के चुनाव में हर स्तर पर मतदाताओं को लुभाने के लिए हर हथकंडे का इस्तेमाल किया जाता रहा है और इस मामले में केवल उसी बात की पुष्टि ही होती है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रतीक संसद तक पहुँचने के लिए तरह तरह की झूठी कसमें खाने में शामिल रहने वाली हमारी पार्टियां और नेता वास्तव में आंकड़ों में किस हद तक मनमानी करते हैं. देश को हर बात पता होनी चाहिए इस बात की पारदर्शिता भी दिखाई जानी चाहिए पर कई मामले ऐसे भी सामने आये हैं जिनमें पार्टी कह रही है कि उसने चुनाव लड़ने के लिए धन नहीं दिया है जबकि नेता उसे अपने खर्चे में शामिल किये बैठे हैं. पिछले कुछ दशकों से देश के राजनैतिक चरित्र का जिस तेज़ी से पतन हुआ है वह निश्चित रूप से चिंता का विषय तो है पर कोई भी व्यक्ति कहीं से भी कुछ भी करने के लिए इतना निरंकुश ह जाये इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है. यह अपने आप में बहुत ही गंभीर मामला है क्योंकि जिन दलों और नेताओं पर जनता अपना विश्वास जताती है वे इस तरह की हरकतों में शामिल होकर आखिर क्या साबित करना चाहते हैं और वह भी उस परिस्थिति में जब नेताओं को आम जनता खुले आम अपशब्दों से नवाज़ती रहती है ?
                                क्या इस मामले को सुप्रीम कोर्ट को स्वतः संज्ञान में लेते हुए सभी मान्यता प्राप्त राजनैतिक दलों, चुनाव आयोग और लोकसभाध्यक्ष को नोटिस जारी करने के बारे में नहीं सोचना चाहिए क्योंकि यह मुद्दा जितना सरल लग रहा है उतना है भी नहीं और आने वाले समय में हर प्रभावशाली और धनी नेता इसी तरह से देश के कानून और चुनाव आयोग के आदेशों की धज्जियाँ उड़ाने से नहीं चूकने वाले हैं. क्या यह समय चेतने का नहीं है क्योंकि आज यदि ये सूचनाएँ सामने आ रही हैं और उनमें इतनी बड़ी गड़बड़ी भी खुले तौर पर स्पष्ट है तो क्या यह मामला कोर्ट में नहीं जाना चाहिए ? विधि द्वारा स्थापित संविधान की कसमें खाते समय जो कुछ भी कहा जाता है वह हमारे राजनैतिक दलों और नेताओं के लिए कितना खोखला और हल्का होता है यह तो देश के सामने ही है. कानूनी रूप से जब ये आंकड़े अब सामने आ चुके हैं तो क्या हर मामले में नियम से काम करने वाली लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन भी इस बात को अपनी तरफ से संसद के सदन में उठाएंगीं और क्या देश की गौरवशाली संसद में इन आंकड़ों में बाजीगरी करने वाले माननीयों और राजनैतिक दलों के विरुद्ध कोई निंदा प्रस्ताव सदन में पारित किया जायेगा ? या फिर देश को छिछले मुद्दों में ही भटकने की प्रक्रिया इसी तरह से चालू रहेगी और जनता और संवैधानिक संस्थाओं के सामने हमारे नेता हमेशा की तरह झूठ ही बोलते रहेंगें ?            
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मंगलवार, 25 अगस्त 2015

सूचना अधिकार और राजनैतिक दल

                                                                              जैसे कि लम्बे समय से मांग की जा रही है कि देश के सभी राजनैतिक दलों को पूरी तरह से सूचना के अधिकार के तहत लाया जाये और उनसे जुडी किसी भी बात को सार्वजनिक किये जाने के मार्ग में कानूनी रूप से कोई बाधा भी आनी चाहिए पर देश के राजनैतिक दल इस बात के लिए राज़ी नहीं दिखाई देते हैं. राजनेताओं और राजनैतिक दलों के बारे में आज भी देश की जनता को गोपनीयता के कारण बहुत सारी जानकारियां नहीं मिल पाती हैं. ऐसे में सवाल यह भी उठता है कि जब देश में लगभग सारा कुछ सूचना के अधिकार के अंतर्गत आने लगा है तो देश के राजनैतिक दलों को इस बात में क्या आपत्ति है और आज उन्हें किस बात का डर सता रहा है जिसके बारे में वे सुप्रीम कोर्ट में भी खुलकर बात नहीं कर पाते हैं और अजीब तरीके से इस मांग का विरोध करते हुए नज़र आते हैं. क्या देश में नेताओं को इतनी छूट दी जा सकती हैं कि वे हर स्तर पर मनमानी करते रहें और कोई भी उनसे उनकी हरकतों से जुड़े सवाल कसी भी स्तर पर नहीं पूछ सके ? देश को अब इस बारे में सोचना ही होगा और आने वाले समय में राजनेताओं और दलों की कितनी जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है इस बारे में भी काम करना होगा तभी कुछ परिवर्तन सामने दिखाई दे सकता है.
                                                              पहले संप्रग सरकार के समय भाजपा कुछ हद तक जानकारी को सार्वजनिक किये जाने की पक्षधर दिखाई देती थी पर अब सरकार में आने के बाद उसका रवैया भी उसी तरह का हो गया है और उसने यह स्वीकार किया है कि सूचना के अधिकार के लागू होने से राजनैतिक दलों के लिए काम करना कठिन हो जायेगा क्योंकि विरोधी दल इस बहाने से सत्ताधारी दल को परेशान करते रहेंगें. क्या देश के राजनैतिक दलों का मानसिक स्तर इतना निम्न है कि वे किसी सुविधा कर इस तरह से दुरूपयोग कर सकते हैं यह सोचने का विषय है क्योंकि भाजपा उन दलों में शामिल है जिन्होंने केवल मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर संसद में लम्बे समय तक काम ठप रखने में महारत हासिल कर रखी थी और आज वही काम कांग्रेस करती हुई दिखाई दे रही है. क्या सुप्रीम कोर्ट सरकार की तरफ से पेश की गयी इस बेमतलब की दलील को मानेगा और राजनैतिक दलों को इस बारे में कोई राहत देने का काम भी करेगा या फिर उनकी इस तरह की बातों की अनदेखी करते हुए कठोर निर्णय सुनाने की तरफ बढ़ेगा यह तो समय ही बताएगा पर आज भी देश के राजनैतिक दलों के एक दूसरे के प्रति मानसिक स्तर को देखकर यही लगता है कि संभवतः अभी इन्हें गंभीर होने में कई शताब्दियाँ भी लग जाएँगी ?
                                                  देश के लिए बनायीं जाने वाली अच्छी नीतियों को कोई भी दल अनदेखा नहीं कर सकता है क्योंकि उनके माध्यम से ही देश को विकास के रास्ते पर आगे बढ़ाया जा सकता है पर आज भी विकास के मुद्दे पर भी सभी दल जमकर राजनीति करते हैं तथा देश के लिए हितकारी फैसले लेने में दशकों बीत जाते हैं और मज़बूत सरकारों की तरफ से कठोर कदम उठाये जाने के स्थान पर कभी नरसिंह राव जैसे कमज़ोर बहुमत वाले पीएम देश की किस्मत पलटने का हौसला दिखा जाते हैं. क्या आज़ादी के इतने समय बाद देश को गंभीर सांसदों की आवश्यकता नहीं है और क्या कुछ ऐसा भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे किसी बड़े बदलाव से पहले पूरी तरह से विशषज्ञों की समिति की राय करते हुए एक दीर्घकालिक नीति बनायीं जा सके जिसमें राजनेताओं का दखल न के बराबर ही हो और उन नीतियों की प्रति वर्ष समीक्षा भी की जाये जिससे देश को सही रास्ते पर आगे बढ़ने में कसी भी दल की सरकार को मदद मिल सके ? गंभीर मुद्दों से पूरी तरह से अनजान राजनेताओं को केवल संसदीय नियमों के कारण ऐसी समितियों में रख दिया जाता है जिनके बारे में उनको कोई ज्ञान नहीं होता है और वे वहां पर केवल कोरम ही पूरा करते रहते हैं तो क्या इसे भारत के उज्ज्वल भविष्य के लिए सही कहा जा सकता है ? अब समय आ गया है कि राजनैतिक दल भी अपने काम काज में खुद ही खुलापन लाएं और देशहित के मुद्दों को केवल संसद ही नहीं अन्य मंचों पर भी विमर्श के माध्यम से तय करने की कोशिशें करना शुरू करें.     
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रविवार, 26 जुलाई 2015

संसद में "काम नहीं तो वेतन नहीं" क्यों न लागू हो ?

                                                         देश की संसद को अराजकता का अड्डा बनाने की कोशिशों में किसी भी दल की कोई सीमा नहीं है क्योंकि अपने स्वार्थों और सत्ता को घेरने के लिए यह काम अब लगभग हर लोकसभा में प्रमुखता के साथ किया जाने लगा है. क्या देश की जनता को यह पता भी है कि सरकार इन माननीयों पर कितना अनाप शनाप खर्च किया करती है क्योंकि यह सब गुपचुप तरीके से किया जाता है तथा इस पर कोई भी बड़ा समाचार भी सामने नहीं आता है. देश को सूचना के अधिकार का आभारी होना चाहिए जिससे आज इस तरह के कुछ समाचार हमारे तक पहुँचने भी लगे हैं. संसद के हंगामे के बीच ही सांसदों को लैपटॉप कम्प्यूटर खरीदने के लिए दी जाने वाली सहायता को तीन लाख रूपये करने के लिए बनायीं गयी तदर्थ समिति ने इस मांग पर मोहर लगा दी है जिससे यह पता चलता है कि सरकारें इस तरह के मामलों में कितनी लापरवाही से काम करती हैं. एक पुरानी कहावत है कि दूसरों को सुधारने से पहले वह अपेक्षित सुधार खुद में भी दिखाई देना चाहिए पर सरकार आम लोगों से तो विभिन्न सरकारी सुविधाओं को खुद ही छोड़ने की बातें करने में नहीं चूकती है पर जब उसे खुद कुछ करना होता है तो वह पानी कि तरह पैसा बहाने में लगी रहती है. तीन लाख रुपयों तक के बजट से लैपटॉप/ कम्प्यूटर और उससे जुडी अन्य सामग्री से हमारे माननीय किस तरह का काम करने वाले हैं यह किसी की भी समझ से पर ही है क्योंकि जब तक हर क्षेत्र में एक जैसा नियंत्रण नहीं होगा तो केवल बयान बाज़ी से देश का कुछ भी लाभ नहीं होने वाला है.
                                             मानसून सत्र का पहला हफ्ता अराजकता की भेंट चढ़ा गया है उसके पीछे जो भी कारण हैं उनका ज़िक्र इस मामले में करना प्रासंगिक नहीं है पर केंद्रीय स्तर पर जिस तरह से बिना काम के ही माननीयों को भत्ते रेवड़ी की तरह बांटे जा रहे हैं उनका क्या औचित्य है ? यदि पीएम गंभीर हैं तो उन्हें इस बारे में एक संविधान संशोधन भी सदन में लाना चाहिए जिसमें स्पष्ट रूप से यह प्रावधान हो कि संसद के लिए निर्धारित काम के प्रतिशत के वास्तविक प्राप्त प्रतिशत के अनुसार ही माननीयों को वेतन और भत्ते दिए जायेंगें पर संभवतः सुधार के बड़े-बड़े दावे करने वाले पीएम भी इतना साहस कभी भी नहीं जुटा पायेंगें. क्या दुनिया की सबसे बड़ी कम्प्यूटर कम्पनियों के सीईओ भी तीन लाख रुपयों के लैपटॉप पर काम करते हुए दिखाई देते हैं इस बात की खोज लेना सरकार ने भी ज़रूरी नहीं समझा पर इतनी बड़ी राशि का बोझ अचानक से ही जनता पर डाल दिया है. अच्छा होता कि सभी माननीयों को यह सुविधा देने के लिए सीधे केंद्र सरकार द्वारा पहल की जाती और जितना काम हमारे माननीयों को करना होता है उसके लिए तीस हज़ार का कोई भी लैपटॉप काम कर सकता है उसकी खरीद के बारे में केंद्र सरकार को खुद ही कदम उठाना चाहिए था. देश में संसाधनों का रोना रोने वाली सरकार के पास लगभग ८०० सांसदों पर तीन लाख के हिसाब से खर्च करने के लिए २४०० करोड़ रूपये तो हैं पर उनसे किस तरह से काम लिया जाये यह उसे पता नहीं है.
                                           सरकार को इस मसले पर गंभीरता के साथ विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि आज भी अधिकांश माननीय ऐसे ही होंगें जिनको लैपटॉप से कोई मतलब ही नहीं है फिर इस तरह से इतनी धनराशि खर्च करने का क्या औचित्य है ? २४ करोड़ रूपये वैसे तो देश के लिए ज़्यादा नहीं होते पर इसका अंदाज़ा लगाने के लिए यह जाना जा सकता है कि रेलवे ने संभवतः १५ करोड़ रूपये खर्च करके ही २०१४ में अपने आईआरसीटीसी सर्वर को अपग्रेड किया था. इससे तो अच्छा यह होता की हर ज़िले की एनआईसी में ही माननीयों को एक सीट उपलब्ध कर दी जाती जहाँ पर बैठकर वे अपने काम को आसानी से कर पाते और सरकार पर कोई बोझ भी नहीं पड़ता. क्या इस तरह की धनराशि को सही तरह से उपयोग में लाते हुए सरकार को आगे नहीं बढ़ना चाहिए ? अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को एक वर्ष के अंदर सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाने के आदेश जारी किये हैं यदि इस तरह से इस धनराशि का उपयोग उसमें कर दिया जाये तो क्या देश को एक बड़ा उपहार नहीं मिल सकता है ? क्या माननीयों की विकास निधि से ही उनके क्षेत्र के हर थाने के लिए यह धनराशि जारी नहीं की जा सकती है जिससे कोर्ट के निर्देशों का सही समय से अनुपालन हो सकेगा और जनता को  भी बड़ी राहत मिल सकेगी. पर आज देश को संभवतः केवल नारों की राजनीति में उलझाने और देश से जुड़े हर मुद्दे पर बवाल करने पर अपने हितों से जुड़े हर मुद्दे को आसानी से बिना किसी शोर शराबे के करने में हमारे राजनैतिक तंत्र को अब अधिक आसानी महसूस होने लगी है.
                       लैपटॉप मामले में सबसे हास्यास्पद बात तो यह भी सामने आई है कि पिछली बार जिन सांसदों को यह लैपटॉप दिए गए थे आज उनके पते ही लोकसभा सचिवालय को खोजने से नहीं मिल रहे हैं ? क्या इस तरह की बातें करने वाले लोगों से कोई यह पूछने वाला है कि जब उन सांसदों के पते नहीं मिल रहे हैं तो उनकी पेंशन कौन पा रहा है या वह किसे दी जा रही है ? स्पष्ट है कि इस मामले में सरकार की कमज़ोर इच्छाशक्ति ही सामने आ रही है क्योंकि जब भी इस तरह की रेवड़ियां बांटी जाती हैं उनके बारे में कोई सबूत नहीं मिलता है. अच्छा हो कि इस तरह के मद की अलग से व्यवस्था करने के स्थान पर सांसदों को सीधे ही यह सब उपलब्ध करा दिया जाये और यह उनके वेतन से कटौती करके ही पूरा किया जाये क्योंकि जिस तरह से उनको वहां के लिए सुविधाएँ दी जाती हैं तो उसी तरह उन्हें अन्य सुविधाएँ भी उनकी निश्चित रकम से ही दी जानी चाहिए. संसद में विपक्ष में चाहे जो भी दल बैठा हो पर अपने वेतन और भत्तों को बढ़ाने के लिए उनको सरकार से सहयोग करने में कभी भी शर्म नहीं आती है बाकि चाहे जिस मुद्दे पर उनका विरोध सामने आ जाये पर इस मुद्दे पर सभी मेजें थपथपाकर उस प्रस्ताव का एकमत से समर्थन कर देते हैं.
                       अब समय आ गया है कि इस तरह के अनावश्यक खर्चों से बचने के साथ "काम नहीं तो वेतन नहीं" को संसद और विधान सभाओं में लागू करने के लिए एक संविधान संशोधन लाया जाये जिससे माननीयों की इस तरह की अराजकता पर लगाम लगायी जा सके तथा उन पर भी काम करने का दबाव बनाया जा सके. संसद को अपने पूर्व निर्धारित समय के अनुसार बहस आदि न कर पाने पर सीधे तौर पर १०%  भत्तों में कटौती का प्रावधान होना चाहिए और कुल समय का २५% से अधिक समय यदि हो हल्ले में जाता है तो भत्तों को आधा कर दिया जाना चाहिए. देश की जनता ने इन लोगों को काम करने के लिए भेजा है न कि किसी और काम के लिए सदन चलना सरकार की पहली और विपक्ष की दूसरी ज़िम्मेदारी है पर जो लोग १० वर्षों तक हल्ला मचा चुके हैं आज उन्हें सदन न चल पाने कीमत का अंदाज़ा होने लगा है फिर भी विपक्ष के इस तरह के आचरण का किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं किया जा सकता है. माननीयों को यह समझना ही चाहिए कि देश है तो वे हैं १९४७ से हज़ारों माननीयों को यह देश और संसद देख चुके हैं अपने आचरण और व्यवहार को अब सँभालने का समय आ चुका है वर्ना जनता को सब दिखाई देता है और वह मौका मिलने पर कोई चूक भी नहीं करती है.       
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शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

राष्ट्रवादी हुए साबिर अली भी

                                                    देश के राजनैतिक परिदृश्य पर लम्बे समय से इस बात को लेकर ही बहस चल रही है कि राजनीति को अपराधिक और असामाजिक प्रवृत्ति के लोगों से कैसे बचाया जाये पर देश में सक्रिय लगभग हर दल इस तरह की कोरी बातें करने के अलावा कुछ भी करता हुआ नहीं दिखाई देता है क्योंकि आज के समय की चुनावी राजनीति में विचारधारा के स्तर पर कोई कुछ भी सोचना और करना नहीं चाहता है केवल चुनाव जीतने लायक चेहरों और जातीय गोटियों में किसी भी तरह फिट होकर कुछ राजनैतिक लाभ दिलवाने वाले तत्वों से हाथ मिलाने में किसी भी दल को कोई दिक्कत नहीं होती है. पिछले वर्ष आम चुनावों में जिस तरह से बिहार के जेडीयू नेता साबिर अली के मोदी की तारीफ करने और पार्टी से निकाले जाने के बाद भाजपा के निकट आने पर मुख़्तार अब्बास नक़वी ने आतंकी बताकर खुला विरोध जताया था अब उसका भी कोई मतलब नहीं रह गया है क्योंकि आज भाजपा को बिहार में एक नया मुस्लिम नेता ही चाहिए है जो बिहार की छवि के अनुरूप कुछ करने का दम रखता हो और समभवतः अपने आप भाजपा के नज़दीक आने वाले साबिर अली इससे अच्छे विकल्प के रूप में सामने नहीं लाए जा सकते थे.
                                    देश की राजनीति में अपराधियों और अराजक तत्वों के साथ पर लगभग सभी दल एक जैसा ही सोचते हैं जब तक इस तरह का कोई भी विवादित व्यक्ति दूसरे दल में होता है तब तक उससे बड़ा सामाजिक अपराधी कोई नहीं होता है पर पार्टी विशेष में आस्था दिखाने के बाद अचानक से ही वह इतना पवित्र हो जाता है कि उसकी तारीफें भी शुरू कर दी जाती हैं तो यह भारतीय राजनीति के उस घटियापन के नमूने को ही दर्शाता है जिसमें सदन के अंदर बैठे हुए यही नेता संविधान, कानून, देश प्रेम और भी न जाने किन किन बातों की कसमें खाया करते हैं पर बाहर निकलते ही उन्हें कुछ भी याद नहीं रहता और वे स्पष्ट रूप से मतिभ्रम का शिकार ही लगते हैं. यह कहा जा सकता है कि सत्ता ऐसी होती है कि वह बड़े बड़ों को आदर्शों के पथ से बहुत जल्दी ही पद्दलित कर देती है अस्थायी सफलता किस तरह से किसी दल के नैतिक मानदंडों पर अचानक से बाज़ारू नर्तकी बन जाती है और पार्टियों के नेता उसकी ताल पर मंत्रमुग्ध होकर नाचने लगते हैं और साथ ही लोकतंत्र को अपराधियों से मुक्त करने की लम्बी चौड़ी बातें भी किया करते हैं.
                                   साबिर अली से नक़वी का टकराना उनके हितों पर चोट के कारण भी हो सकता है पर राजनीति में सुधार करने की कसमों के साथ संघ के ध्वज के नीचे खड़े होकर "तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहें" का गान करने वाली भाजपा के सामने ऐसी क्या मजबूरी है कि वह साबिर अली का इस्तेमाल करने का प्रयास कर रही है ? साबिर अली और नक़वी के अपने हित हो सकते हैं और आने वाले समय में बिहार से देश की राजनीति की नयी राह फिर से निकलने की सम्भावनाएँ दिखायी दे रही हैं इन चुनावों के परिणाम एक बार फिर से यही दिखाने वाले हैं कि क्या बिहार जिसने एक दशक में प्रगति करने का स्वाद चखा है वह अपने जातीय पूर्वाग्रह से बाहर निकल पाया है या फिर मोदी पिछड़े हैं और मांझी अति पिछड़े वह आज भी फिर से उसी सोच की तरफ बढ़ने जा रहा है ? पिछले वर्ष जिस तरह आम चुनावों में पूरे उत्तर भारत में जिस तरह से मोदी के नाम पर भाजपा ने जातीय दुष्चक्र को पूरी तरह से तोड़ने में सफलता पायी थी संभवतः आज भाजपा को ही उन मोदी और उनके विकास के दावों पर भरोसा नहीं रह गया है तभी वह इस बार बिहार को एक बार फिर से उसी जातीय दलदल में उलझाने की तैयारी में लगी हुई दिखाई दे रही है.       
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सोमवार, 20 जुलाई 2015

घरेलू गैस सब्सिडी #गिवइटअप

                                                                   केंद्र सरकार के पास अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पिछले एक वर्ष में कच्चे तेल की कीमतों में आये बदलाव के बाद तेल क्षेत्र में कुछ अहम सुधारों की तरफ बढ़ने का बहुत ही अच्छा मौका आया हुआ है पर संभवतः आज सरकार इस अवसर का लाभ केवल अपने बजटीय घाटे को कम करने के लिए ही इस्तेमाल करना चाह रही है इसलिए ही उसने अभी तक यूपीए द्वारा बनायीं गयी तेल नीति में कोई बड़ा परिवर्तन करने के बारे में सोचना भी शुरू नहीं किया है. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में आज तेल की कीमतें ५५ से ६० डॉलर प्रति बैरल पर चल रही हैं और गिरावट का यह ट्रेंड पिछले एक वर्ष से ही बना हुआ है. ईरान का मामला सुलझ जाने के बाद इसमें और भी कमी की सम्भावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. शुरुवाती समय में सरकार की तरफ से यह कहा गया कि मंहगा तेल खरीदे जाने के कारण ही इसके दामों में कटौती नहीं की जा रही है जबकि वास्तविकता कुछ और ही थी क्योंकि जिस कीमत पर तेल खरीदा जाता है वह चार महीने बाद ही घरेलू बाजार पर लागू हो पाती है आज जो मूल्य चल रहा होता है वास्तव में वह चार महीने पहले के उस मूल्य से ही निर्धारित किया जाता है जिस पर तेल कम्पनियों द्वारा कच्चा तेल खरीदा जाता है.
                           मोदी सरकार के सत्ता में आने बाद ही जिस तरह से सब्सिडी छोड़ने की बात खुद पीएम की तरफ से की जाने लगी उसका ज़मीनी स्तर पर कोई विशेष प्रभाव भी नहीं दिखाई दिया क्योंकि इस मुद्दे पर कोई भी व्यक्ति लोकप्रियता के कदम उठाने से नहीं चूकता है. जब सरकार की तरफ से स्वेच्छा से यह काम करने की अपील कुछ कारगर नहीं हुई तो अब तेल कम्पनियों की तरफ से नए हथकंडे अपनाये जाने लगे हैं जिसमें आईवीआरएस के माध्यम से गैस बुक करने पर शून्य विकल्प पर जाने के साथ ही सब्सिडी एक झटके में समाप्त कर दी जाती है और इस बदले हुए सिस्टम के बारे में सरकार या कम्पनियों की तरफ से कोई जानकारी अभी तक आम उपभोक्ताओं को देने की कोई कोशिश भी नहीं की गयी है. बिना बताये इस सुविधा में परिवर्तन करने से जहाँ आज सैकड़ों लोगों को बिना पूछे ही सब्सिडी के दायरे से बाहर किया जा रहा है वहीं इसके बाद उनकी सुनवाई किस तरह से की जाये इस पर भी कोई निर्णय नहीं लिया गया है. सब्सिडी को स्वेच्छा से छोड़ने के साथ ही आय की एक सीमा के बाद आने वाले सभी लोगों की सब्सिडी समाप्त करने के बारे में सरकार को कदम उठाने चाहिए थे और सबसे पहले सांसदों, विधायकों, जिला पंचायत अध्यक्षों, नगर निगम/ पालिका परिषद के अध्यक्षों तथा ग्राम प्रधानों के साथ इसकी शुरुवात करनी चाहिए थी और इसे प्रथम श्रेणी के राजपत्रित अधिकारियों तक बढ़ाया जाना चाहिए था पर सरकार ने संभवतः इसके लिए चोर रास्ता खोजना अच्छा समझा.
                            जिन लोगों को सब्सिडी मिल रही है क्या उनके पास इस तरह की किसी भी सम्भावना से बचने के लिए कोई मार्ग नहीं होना चाहिए जिसमें गलती से सब्सिडी छोड़ने का विकल्प दब जाने पर भी एक बार में सब्सिडी खत्म न हो और उपभोक्ता को एसएमएस भेजकर अपनी इस मांग की पुष्टि करने के लिए भी कहा जाये. इस तरह से दोहरी व्यवस्था करने से जहाँ किसी भी गलत मेनू को दबाने से उपभोक्ता की सब्सिडी बंद नहीं होगी वहीं उसके पास अपनी इस गलती को सुधारने का मौका भी होगा. यदि सरकार की तरफ से इस तरह की कोई पहल नहीं की जाती है तो आने वाले समय में एजेंसियों पर इस समस्या से जूझने वाले उपभोक्ताओं की भीड़ बढ़ने ही वाली है जिससे निपटना सरकार के लिए मुश्किल होने वाला है. हर काम में पारदर्शिता का होना बहुत आवश्यक है पर क्या इस तरह से आम लोगों से जुड़े हुए मुद्दों पर सरकार के एकतरफा काम करने वाले सॉफ्टवेयर को चलाने की अनुमति दिया जाना सही है या इसमें दोहरी व्यवस्था करने की आवश्यकता भी है ? यह आम लोगों से जुड़ा हुआ मुद्दा है जिस पर चुप्पी लगाने से काम नहीं चलने वाला है और संसद का स्तर शुरू होने के चलते सरकार या पेट्रोलियम मंत्रालय को इस बात पर जवाब भी देना पड़ सकता है. 
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शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

पीएम - सुरक्षा मानकों की अनदेखी

                                         पीएम मोदी की अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी के दौरे को लेकर जिस तरह की सुरक्षा सम्बन्धी लापरवाहियां सामने आई हैं वे निश्चित तौर पर चिंता को बढ़ाने वाली ही हैं क्योंकि देश में सबसे अधिक सुरक्षा प्राप्त पीएम के कार्यक्रमों में भी किस तरह से मानकों की खुले तौर पर अनदेखी की जा रही है वाराणसी में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर से आये हुए २० वर्षीय मज़दूर देवनाथ मन्ना की करेंट लगने से होने वाली मौत इस तरफ इशारा ही करती है. यह पहली बार नहीं हुआ है कि पीएम के मंच से जुडी हुई कोई दुर्घटना सामने आई है इससे पहले छत्तीसगढ़ में भी उनकी रैली के लिए बनाये गए मंच के पूरी तरह से गिर जाने के बाद पीएम की वहां की रैली भी रद्द कर दी गयी थी. जब इस तरह की कमियां लगातार सामने आ रही हैं तो क्या पीएम की सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार लोगों को इस तरफ ध्यान देने की आवश्यकता नहीं महसूस हो रही है ? यदि पीएम के कार्यक्रम के समय इस तरह से मंच पर लगे हुए खुले तारों में करेंट आने से कोई अन्य दुर्घटना हो जाती तो उसका कौन ज़िम्मेदार होता ?
                                         पूरे प्रकरण को देखने के बाद एक बात स्पष्ट रूप से सामने आ रही है कि कहीं न कहीं कुछ तो ऐसा अवश्य ही है जिसके चलते लापरवाहियां की जा रही हैं क्योंकि ऐसा कई बार होने को महज़ एक दुर्योग ही नहीं कहा जा सकता है. आज देश दुनिया भर में अपनी बढ़ती हुई ताकत का एहसास कराने में लगा हुआ है और घरेलू मोर्चे पर हम अपने पीएम की किस घटिया स्तर पर सुरक्षा कर रहे हैं यह अब सभी को दिखाई देने लगा है. कहीं ऐसा तो नहीं है कि कुछ विशेष या चहेते ठेकेदारों को ही लाभ पहुँचाने के लिए पीएम की सुरक्षा के साथ इस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है और मामला सामने न आने पाये इसलिए उसे पूरी तरह से गोपनीय ही बताया जाता है परन्तु अपने लोगों का पक्ष केवल गुणवत्ता के स्तर पर समझौता करने पर भी नहीं लिया जा सकता है. इस मामले में मीडिया में जिस तरह से मंच पर ही खुले तार लगे होने की ख़बरें सामने आ रही हैं उससे तो यही लगता है कि इस पूरे प्रकरण में किसी बड़े को लाभ पहुँचाने की कोशिशें भी की जा रही हैं जिससे निचले स्तर का कोई भी व्यक्ति बोलने के लिए तैयार नहीं दिखाई देता है.
                                        इस प्रकरण से सबक लेते हुए अब यह देखने की आवश्यकता है कि पीएम और अन्य विशिष्ट व्यक्तियों के कार्यक्रमों के लिए एक बार फिर से उन मानकों को पढ़ा जाये जिनका ज़िक्र इनकी सुरक्षा के लिए किया गया है और यदि किसी स्तर पर पहले बनाये गए नियमों में कोई कमी भी दिखाई दे रही है तो उसमें अविलम्ब सुधार भी किये जाने चाहिए. किसी भी कार्यक्रम के ठेकदारों का विशेष पंजीकरण भी किया जाना चाहिए और उनके काम में किसी भी तरह की लापरवाही सामने आने पर उन्हें सदैव के लिए काली सूची में डाल दिया जाना चाहिए जिससे इस स्तर पर काम करने वाले ठेकेदारों पर भी कठोर अनुशासन लागू किया जा सके. फिलहाल तो वाराणसी के इस ठेकेदार को जाँच पूरी होने तक अगले किसी भी कार्यक्रम के लिए अनुबंधित ही नहीं किया जाना चाहिए जिससे ऊंचे स्तर पर काम कर रहे इन लोगों को भी कुछ कड़े सन्देश जारी किये जा सकें. मामले की गंभीरता को देखते हुए इसकी सही और गंभीर जाँच किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि शीर्ष स्तर पर किसी भी तरह की लापरवाही को बर्दाश्त करने से हमारे अति विशिष्ट लोगों की सुरक्षा पर गंभीर संकट कभी भी आ सकता है.         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...