मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शुक्रवार, 5 जून 2020

चीन की चालें

                                                   एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया कोरोना से जूझने में लगी हुई है वहीं चीन पूरी दुनिया में अपनी विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है. भारत के साथ लगती उसकी अरुणाचल प्रदेश से लद्दाख तक की सीमा को वह समय समय पर विवादित बनाने की कोशिशों में सदैव लगा ही रहता है पर १९६२ के बाद से ही भारत की सरकारों और जनता की निगाहों में चीन की स्थति ऐसे पडोसी की हो गयी है जो ज़रा सी नज़र चूकने पर बाहर दाना चुग रही मुर्गी को चुराने से भी बाज़ नहीं आता है. पंचशील के सिद्धांतों को जिस तरह से अनदेखा करते हुए चीन ने भारत की उन सीमाओं पर युद्ध लड़ा जहाँ किसी भी तरह के युद्ध के लिए पहुँचने के लिए भारत के पास उस समय न तो धन था और न ही संसाधन जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों के बड़े भाग पर आज भी कब्ज़ा जमाकर विवाद बताकर चीन इसे मुद्दा बनाने की कोशिशों में लगा रहता है.
                            आज एक बार फिर से वही स्थिति दोहराई जा रही है और चीन भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों तक अपनी पहुँच को मज़बूत करने वाले रास्तों और सुदूरवर्ती गांवों तक संपर्क मार्ग बनाने को लेकर सदैव ही आक्रामक रहा करता है. अब उसने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भी विवाद शुरू किया हुआ है तो इस परिस्थिति से निपटने के लिए सरकार युद्ध के बजाय कूटनीतिक रास्तों से इसे हल करने का प्रयास करने में लगी हुई है. इस तरह की स्थिति में कोई भी सरकार युद्ध के बारे में नहीं सोचना चाहेगी वह भी तब जब चीन जैसा प्रतिद्वंदी सामने हो. अभी तक चीन केवल अरुणाचल, सिक्किम और लद्दाख में ही अपना विरोध दिखाता था पर जिस तरह से अब वह पूरी सीमा को ही चुनौती देने के मूड में दिखायी देने लगा है वह भारत के लिए चिंता का विषय ही है.
                              चीन से लगते अपने सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँच को सुगम करने के लिए भारत की कोशिशें लम्बे अरसे से चल रही है और वर्तमान में मोदी सरकार ने इस पर और भी तेज़ी से काम करना शुरू किया है जिससे चीन को यह अच्छा नहीं लग रहा है. भारत के पास इतने सुदूरवर्ती क्षेत्र में कारगिल जैसी एक और लड़ाई लड़ने का विकल्प सीमित ही है क्योंकि कोरोना के चलते अर्थव्यवस्था को झटका लगा है उसे निपटना वैसे ही मुश्किल हो रहा है फिर भी भारत का अपने निर्माण कार्यों को जारी रखते हुए चीन के साथ कूटनीतिक स्तर पर बातचीत को बढ़ावा देने की दिशा में बढ़ना उचित है. चीन को कहीं न कहीं इस बात का अंदेशा भी है कि आज भारत में चीन विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं जिससे आज के माहौल में निपटना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है. वैश्विक बाध्यताओं के चलते भारत सरकार चीन पर सीधे प्रतिबन्ध तो नहीं लगा सकती है पर अपनी जनता से दूसरे माध्यमों से चीनी सामान के बहिष्कार की बात तो कर ही सकती है जो कि किसी भी स्थिति में चीन के लिए सही नहीं होगा। कोरोना से उत्पन्न श्रमिक संकट से निपटने के लिए भारत देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते श्रमिकों की उपलब्धता को देखते हुए विनिर्माण क्षेत्र के लिए नई नीतियों पर काम कर चीन को सीधे तौर पर चुनौती तो दे ही सकता है.
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शनिवार, 20 जनवरी 2018

रक्षा तैयारियां और मोदी सरकार

                                                         सत्ता सँभालने के बाद से ही लगातार जिस तरह से संसद से लेकर सड़क तक भाजपा, खुद पीएम मोदी और उनकी सरकार के मंत्री जिस तरह से अपनी पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार पर आक्रामक रहा करते हैं और उस पर यह आरोप लगाया करते हैं कि उसने देश की रक्षा से समझौता किया और सेनाओं के लिए १० वर्षों तक पर्याप्त धन की व्यवस्था भी नहीं की उसकी पोल खुद उनके सांसद मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी की अध्यक्षता में गठित रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने खोल कर रख दी है. समिति ने जिस स्तर पर सरकार की आलोचना की है उससे यही लगता है कि रक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर है और हालत यहाँ तक पहुंच गयी है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में रक्षा बजट केवल २.७४ लाख करोड़ रुपयों का रखा गया है जो कि प्रस्तावित जीडीपी का १.५६ % और १९६२ के चीन युद्ध के बाद से न्यूनतम है. समिति ने सेना के आधुनिकीकरण के लिए जरूरत भर का फंड उपलब्ध नहीं कराने और रक्षा खरीदारी को फास्ट ट्रैक नहीं करने के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की है। इस वित्तीय वर्ष में आर्मी, नेवी और वायुसेना को आधुनिकीकरण की उनकी मांग की तुलना में क्रमशः महज ६०, ६७ और ५४ फीसदी फंड उपलब्ध कराया गया है। समिति ने इस बात की आशंका और चिंता भी जताई है कि फंड की अनुपलब्धता का प्रतिकूल असर सेना के ऑपरेशंस पर पड़ सकता है।
                                          समिति ने मोदी सरकार को सेना के सुस्त आधुनिकीकरण के लिए फटकार लगाई और कहा है कि चीन और पाकिस्तान की तरफ से देश की सुरक्षा के लिए खड़े किए जा रहे मौजूदा खतरों के दौरान भी सेना के आधुनिकीकरण में सुस्ती बरती जा रही है। भारतीय सेना कई मोर्चों पर कार्रवाई के लिए संसाधनों की कमी से जूझ रही है इनमें सबमरीन, फाइटर जेट, हॉवित्जर्स और हेलिकॉप्टर्स की कमी के साथ नई जेनरेशन की असॉल्ट राइफल, मशीन गन, बुलेट फ्रूफ जैकेट्स और हेल्मेट्स जैसे बेसिक संसाधनों की कमी भी शामिल हैं। ये वो आंकड़े हैं जो हमारी सेनाओं और उनके लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की वास्तविक तस्वीर को सामने लेकर स्थिति की गंभीरता को बता रहे हैं फिर भी सरकार की तरफ से केवल पूर्व की सरकार पर हमले किये जाने और उसकी आलोचना तक खुद को सीमित किया जाना आखिर किस तरह से देशहित में अच्छा कहा जा सकता है ? यह सही है कि देश में रक्षा सौदों में दलाली के चलते कोई भी सरकार कुछ भी खरीद करे उस पर आरोप बहुत आसानी से लगाए जा सकते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि हथियारों को बनाने वाले देश और निर्माण करने वाली लगभग हर कम्पनी ने पूरी दुनिया में अपने एजेंट नियुक्त कर रखे हैं जिनके माध्यम से देश और कम्पनी किसी भी सौदे में उनकी सहभागिता होने या न हो पाने की दशा में भी कमीशन का भुगतान किया करती हैं जो कि पूरे विश्व में एक सामान्य प्रक्रिया है पर भारत में इसे जिस तरह से घूस कहा जाता है वह कमीशन की श्रेणी में नहीं आ सकता है इसलिए सरकार को भी सौदों में तत्परता के लिए अपनी शर्तों में इन एजेंट्स के लिए एक सीमा तक आधिकारिक रूप से कमीशन दिए जाने को वैध कर देना चाहिए जिससे आने वाले समय में रक्षा खरीद को पटरी पर लाया जा सके और भ्रष्टाचार के कथित आरोपों से बचने के लिए सरकारें देश की सुरक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप रख पाने में सफल हो सकें.
                                   जिस तरह से पूरा देश जानता है कि देश में रक्षा खरीद की प्रक्रिया बेहद पेचीदी है जिसके चलते कोई भी सरकार केवल अपने को बचाने के प्रयास में ही लगी दिखाई देती है कि कहीं उस पर देश की सुरक्षा के मामले में समझौता करने और कमीशन लेने का आरोप न लग जाये. बोफोर्स कांड के बाद से जिस तरह से वह देश में एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बन गया था उसे देखते हुए भी वर्तमान खरीद प्रक्रिया में बेचने वाले देशों की सरकारों या कंपनियों के एजेंट्स की भूमिका को स्पष्ट करने की आवश्यकता भी सामने आ चुकी है क्योंकि अब नीतियों में व्याप्त कमियों को सुधारने की आवश्यकता अधिक है जबकि हम एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने में ही व्यस्त हैं ? हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में सेना ही सर्वोपरि है और उसके निर्णय के सामने खड़े होने का साहस कोई भी नहीं कर सकता है जिसके चलते वहां रक्षा सौदे करना आसान है और चीन अब रक्षा क्षेत्र में खुद एक उत्पादक देश के रूप में स्थापित हो रहा है जिससे उसको रक्षा खरीद के लिए दूसरे देशों पर उतना निर्भर नहीं रहना पड़ता है पर भारत की स्थिति को देखते हुए क्या संसद में ही सर्वसम्मति से एक नयी रक्षा खरीद नीति को लागू करने की आवश्यकता नहीं है जिससे आने वाले कुछ वर्षों में देश की रक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप किया जा सके ?  
                                    देश ने बहुत काम करने वाले और सादगी से भरे दो रक्षा मंत्री ए के अंटोनी और मनोहर पणिकर भी देखे पर ईमानदारी से काम करने के बाद भी वे देश की रक्षा आवश्यकतों को पूरा करने में असफल ही रहे जिसके लिए उन्हें दोषी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश की रक्षा खरीद की प्रक्रिया की पेचीदियों पर काबू पाए बिना इसे सुधारा नहीं जा सकता है. खरीद में अब एक सीमा तक कमीशन को कानूनी रूप से सही घोषित किया जाना चाहिए और उसे हर हालत में कम्पनी द्वारा ही दिया जाना चाहिए साथ ही मंत्रालय को इस बारे में गुणवत्ता की जाँच कर उसकी न्यूनतम अंतर्राष्ट्रीय कीमत पर खरीदने की अनुमति होनी चाहिए जिससे सरकार का दखल उसमें कम किया जा सके और ऐसी किसी भी खरीद को संसदीय समिति के सामने भी निश्चित समय सीमा में रखने और उसकी संस्तुतियों के आधार पर सीधे संसद से अनुमोदन कराने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए. इस तरह की पारदर्शी व्यवस्था बनाये जाने से जहाँ खरीद को आसान बनाया जा सकता है वहीं हमारी सेनाओं की आवश्यकताओं को भी हर समय पूरा रखने की एक सीमा को जल्दी ही पाया जा सकता है. मोदी सरकार को भी इक्का दुक्का मामलों को देश के सामने रखकर अपनी रक्षा तैयारियों के बारे में प्रदर्शन करने के स्थान पर पूरी सेना की समग्र तैयारियों के बारे में गभीरता से सोचना शुरू करना चाहिए जिससे सेना को सही तरह से आधुनिक किया जा सके.  
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मंगलवार, 11 जुलाई 2017

श्री अमरनाथ यात्रा और सुरक्षा

                                               जम्मू-कश्मीर स्थिति श्री अमरनाथ बाबा की पवित्र गुफा में दर्शन की वार्षिक यात्रा पर जिस तरह से अंनतनाग में आतंकियों ने हमला किया है वह अपने आप में बड़ी घटना तो है ही साथ ही व्यवस्था से अलग चलने वालों के लिए एक सबक भी है प्रारंभिक खबरों में अधिकारियों की तरफ से जिस तरह से यह बात कही गयी कि यह बस नियमों का उल्लंघन करके रात के प्रतिंबंधित समय में चल रही थी वहीं बस मालिक का कहना है कि उसकी बस भी यात्रा में शामिल थी पर टायर पंक्चर होने के चलते वे काफिले से अलग हो गया थे. यह वार्षिक यात्रा विभिन्न सुरक्षा कारणों से सदैव ही केंद्र और राज्य सरकार के लिए चुनौती और चिंता का विषय बनी रहती है और पिछले वर्ष इस यात्रा से पहले ही आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से लगातार यात्रा पर भी प्रभाव पड़ता नज़र आ रहा है. घाटी में संपन्न होने वाली यह वार्षिक यात्रा दक्षिणी कश्मीर के लिए व्यापार के व्यापक आयामों को लेकर आती है क्योंकि पूरे देश और विदेशों से भी आने वाले यात्रियों से उनको अच्छी खासी कमाई भी हो जाती है पर पिछले दशक से जिस तरह से पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा इस यात्रा को निशाने पर लेकर सुरक्षा सम्बन्धी चिंताओं को उभारने का काम किया जा रहा है उसके बाद भी यात्रियों की संख्या में कोई कमी नज़र नहीं आ रही है.
                     निश्चित तौर पर हर मुद्दे पर राजनीति करने वालों के लिए एक दूसरे पर आरोप लगाने के लिए यह सही समय है पर इस सबके बीच केंद्र और जम्मू कश्मीर राज्य सरकारों को एक बार फिर से इस पर विचार करना चाहिए कि भविष्य में इस तरह की स्थिति से किस तरह बचा जा सकता है. यात्रा में शामिल किसी वाहन के ख़राब होने की दशा में यात्रा सुरक्षा प्रभारी के पास क्या विकल्प शेष बचते हैं यह सोचने और उस पर अमल किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि किसी तकनीकी गड़बड़ी से यात्रा में शामिल कोई भी वाहन कभी भी ख़राब भी हो सकता है. इसके साथ ही जम्मू से निकलते समय यात्रा में शामिल सभी वाहनों की सघन जांच भी तेज़ी से किये जाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे इस तरह की परिस्थिति सामने आने की दर को और कम या नगण्य किया जा सके. यह ऐसी परिस्थिति थी जिसके बारे में संभवतः सरकार ने भी नहीं सोचा था इसलिए यात्रा के बीच में ही किसी भी ख़राब होने वाले वाहन के यात्रियों की सुरक्षा के बारे में अब नए सिरे से रणनीति बनाये जाने की आवश्यता भी है. विशेष अपरिहार्य परिस्थितयों में पूरे काफिले को रोकना अधिक खतरनाक हो सकता है इसलिए यदि संभव हो तो घाटी में पड़ने वाले यात्रा मार्ग में हर १० किमी पर एक वैकल्पिक बस की व्यवस्था किये जाने के बारे में सोचा जाना चाहिए या फिर यात्रा के साथ हर दिन एक खाली बस भी इस तरह की किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए चलनी चाहिए.
                 सुरक्षा इनपुट्स के बाद इस परिस्थिति में यात्रा के साथ चलने वाले जवानों को भी इस बात के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश होने चाहिए कि इस तरह की परिस्थितियों में उनके लिए क्या विकल्प उपलब्ध हैं और उन्हें किन पर अमल करना चाहिए. यात्रा के महत्व और उससे जुडी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ही मजबूर होकर अलगाववादियों तक को इस घटना की निंदा करनी पड़ी है और अभी तक किसी भी आतंकी संगठन ने इस हमले की ज़िम्मेदारी भी नहीं ली है. यह ऐसा समय है जब पूरे देश के लोगों को मारे गए लोगों के साथ संवेदना है और साथ ही इस बात की आशा भी है कि पूरा देश इस परिस्थिति से भी निपटने में सक्षम है. जिन लोगों ने इस यात्रा में भाग लिया है वे जानते हैं कि यात्रा मार्ग कितना दुरूह और दुर्गम है तो ऐसे किसी भी माहौल में सरकार से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी की बात करना ही बेमानी है क्योंकि हर सरकार की तरफ से इसे सकुशल संपन्न कराने के लिए यथ संभव प्रयास किये जाते रहे है फिर भी कभी कभी इस तरह की घटनाएं होती ही रहती हैं. यात्रा में जाने वाले यात्रियों और उनके वाहन चालकों से भी इस बात की अपेक्षा की जाती है कि वे नियमों का पूर्ण रूप से पालन करेंगें तथा किसी भी विपरीत परिस्थिति में उसी तरह से धैर्य बनाये रखेंगे जैसे कल की घटना में चालक सलीम ने घटना स्थलपर चल रही गोलियों के बीच से गाड़ी को भगाने में सफलता पायी थी जिससे बहुत सारी जाने बचायी जा सकीं.  
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गुरुवार, 29 जून 2017

सेना और राजनैतिक समझ

                                                       देश की आज़ादी के बाद से ही जिस तरह से महत्वपूर्ण मामलों में सेना की तरफ से सीधे बयान देने के अतिरिक्त किसी अन्य मसले पर कुछ भी बोलने पर के तरह से अघोषित रूप से राजनैतिक समझ बनी हुई थी और उस पर सरकार के साथ विपक्षी दल भी सहमत ही रहा करते थे अब उस स्थिति में व्यापक बदलाव दिखाई दे रहा है जिसके चलते सेना को जहाँ विभिन्न मुद्दों पर बोलने की छूट मिली है वहीं उस पर विपक्षी दलों की तरफ से राजनैतिक हमलों में भी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है. यह ऐसी स्थिति है जिससे सेना को पूरी तरह से अलग रखे जाने की आवश्यकता है क्योंकि देश के संविधान को बनाने वालों ने किसी कमज़ोर और विपरीत राजनैतिक परिस्थिति में मज़बूत सेना की तरफ से सत्ता पर कब्ज़ा किये जाने की संभावनाओं पर विचार करते हुए ही इस तरह की व्यवस्था की थी जिसमें राष्ट्पति, सरकार, रक्षा मंत्रालय के बीच में शक्तियों का बहुत अच्छा समन्वय भी किया गया था. आज जिस तरह से सेना को राजनैतिक रूप से संवेदनशील मसलों पर भी बोलने की छूट दी जा रही है वह मोदी सरकार की रणनीति है जिसमें वह उन बयानों को सेना के माध्यम से दिलवाने की कोशिश में है जिन पर उसके बोलने पर सवाल खड़े किये जा सकते हैं और बाद में वह सरकार पर सवाल खड़े करने वालों पर खुद प्रश्नचिन्ह लगाती है कि विपक्षी दल सेना पर हमले कर रहे हैं जिससे अपने पर आने वाले राजनैतिक दबाव को वह सेना की तरफ मोड़ने में सफल होते भले ही दिख रहे हैं पर भविष्य में इसके खतरे तब सामने आ सकते हैं जब मोदी भारत के राजनैतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके होंगे.
                                              भारतीय सेना को ऐसे ही संयुक्त राष्ट्र मिशन और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले द्विपक्षीय मिशनों में शामिल नहीं किया जाता है पूरा विश्व जानता है कि हमारी सेना पूरी तरह से राजनीति से सिर्फ इसलिए दूर रहती है क्योंकि उसके लिए संविधान में स्पष्ट प्रावधान किये गए हैं और कुछ भी अस्पष्ट नहीं है. भारतीय सेना ने सदैव ही विदेशों तक में अपनी कर्तव्यनिष्ठा के बल पर देश के मान सम्मान को बढ़ाने का काम किया है. वर्तमान में जिस तरह से सरकार की तरफ से सेना के अधिकारियों को प्रेस के सामने लाया जा रहा है वह सेना की उस छवि से मेल नहीं खाता है और इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं. सितम्बर में सेना की सर्जिकल स्ट्राइक का प्रारम्भ में सभी राजनैतिक दलों ने स्वागत किया पर जब सरकार की तरफ से उसका दुरूपयोग किया गया तो टीवी से लगाकर प्रेस तक उसके सबूत मांगने वाले नेता भी सामने आते दिखाई दिए. इस घटना से नेताओं की वह समझ ख़त्म सी होती लगी जिसमें वे अघोषित रूप से ही सही पर सेना को लेकर अनावश्यक वियवादों से दूर ही रहा करते थे. भारत के सेनाध्यक्ष की पूरी दुनिया में बहुत इज़्ज़त की जाती है वह सिर्फ इसलिए नहीं कि भारतीय सेना विश्व की बड़ी सेनाओं में है बल्कि इसलिए कि उनके नेतृत्व में काम करने वाली यह सेना पूरी तरह से अपनी कर्तव्य निष्ठा के लिए जानी जाती है.
                                             पहले संदीप दीक्षित फिर आज़म खान की तरफ से आने वाले बयानों से उनकी पार्टियों ने सिर्फ इसलिए ही पल्ला झाड़ लिए क्योंकि ये बयान अनावश्यक थे और इनका केवल राजनैतिक दुरूपयोग ही किया जा सकता है. इसके बाद यह सोचा जाना चाहिए कि जिन परिस्थितियों में सेना काम करती है उसमें उससे क्या अपेक्षाएं की जानी चाहिए और सेना के संयम की क्या सीमा होनी चाहिए ? नेता तो कुछ भी बोल देते हैं पर जब उस पर विवाद बढ़ता है तो वे बेशर्मी के साथ अपने बयानों के और दूसरे मतलब भी समझाने लगते हैं. संदीप दीक्षित और आज़म खान कोई कल के युवा नेता नहीं है जिनको इस बात का एहसास नहीं है कि कब क्या कहा जाना चाहिए फिर भी यदि उनकी तरफ से ऐसे बयान आते हैं तो मामले के दोनों पक्षों को भी गौर से देखा जाना चाहिए. देश की संसद जिसके पास कानून बनाने की क्षमता है और वहां बैठने वाले जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए यह समय सोचने का है कि उनकी तरफ से आखिर क्या गलती की जा रही है जिससे आज सेना उनके आपसी राजनैतिक विवादों का मोहरा बनती हुई नज़र आ रही है ? क्या सदन के दोनों पक्षों के पास इतनी समझदारी नहीं बची है कि वे सेना से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से कुछ भी बोल देने से बचने की तरफ सोचना शुरू करें ? विभिन्न राजनैतिक दलों को क्या कुछ कड़े अनुशासन के बारे में नहीं सोचना चाहिए जिसका अनुपालन करना सभी नेताओं के लिए अनिवार्य हो और उनमें विफल होने पर क्या नेताओं के लिए पार्टी स्तर पर कोई दंडात्मक प्रावधान भी नहीं होने चाहिए ? जब तक सत्ता के लिए सेना को भी बैसाखी के रूप में उपयोग कर लेने की प्रवृत्ति से छुटकारा नहीं पाया जायेगा तब तक नेताओं की इस नई बीमारी को समाप्त नहीं किया जा सकता है.
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गुरुवार, 11 मई 2017

कश्मीर की कश्मीरियत


कश्मीर के कुलगाम में जिस तरह से आतंकियों ने छुट्टी पर आये सेना के अधिकारी की एक शादी समारोह से अगवा करने के बाद गोली मारकर कर दी उसके बाद कश्मीर के लोगों को यह सोचना ही पड़ेगा कि वे अब भी पाकिस्तान के इशारों पर चलकर किसका नुकसान करने में लगे हुए हैं. इस्लाम की सीखों पर चलने के सपने के साथ इस्लामी राज्य बना पाकिस्तान किस तरह से धार्मिक कट्टरता और फिर आतंकियों के पोषक के रूप में आज पूरी दुनिया में जाना जाता है वह सब जानते हैं. पाकिस्तान में एक समय जिन्होंने तालिब बनकर समाज में स्वीकार्यता बधाई थी वे तालिबान और फिर अलग नाम के समूह बनकर उसी इस्लामी धार्मिक समाज का कितना नुकसान कर चुके हैं ? एक समय पाकिस्तान कि सेना के आश्रय में पलने वाले ये इस्लामी चरमपंथी आज सीधे पाकिस्तानी सेना को ही चुनौती देने में लग चुके हैं इस बात की अनदेखी भी नहीं की जा सकती है. दक्षिणी कश्मीर घाटी में जिस तरह से चार जिलों में पाक समर्थित आतंकियों का अधिकांश मौन एवं सीमित खुला समर्थन बढ़ रहा है वह घाटी को भी पाकिस्तान, अफगानिस्तान के रास्ते पर ले जाने का काम ही करने वाला है. आज कुलगाम के एक कश्मीरी मुसलमान सेना अधिकारी की सुनियोजित हत्या की गयी है कल को वे कश्मीरी मुसलमान सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और स्थानीय लोगों को सीधे ही निशाना बनाने लगेंगें ऐसी परिस्थिति में उन लोगों के वे बहकावे सामने आ जायेंगें जिसके तहत उन्होंने नब्बे के दशक में घाटी को कश्मीरी पंडितों से खाली करवा लिया था और आने वाले समय में यदि स्थानीय लोग इसी तरह से इन आतंकियों के प्रति सहानुभूति रखते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब इनकी बंदूकों की नलियां आम कश्मीरी मुसलमान की तरफ ही होंगीं. कश्मीर के लोगों, वहां की सम्पूर्ण राजनैतिक व्यवस्था, राज्य सरकार और केंद्र सरकार के साथ सम्पूर्ण भारत को इस मसले पर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है वर्ना पानी सर से ऊपर होने में देर नहीं लगेगी और सुरक्षा बलों को अपनी सख्ती में और बढ़ोत्तरी करने को मजबूर होना पड़ेगा जिससे आखिर में वहां का स्थानीय निवासी होने के कारण आम कश्मीरी मुसलमान ही परेशानी झेलने वाला है.

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सोमवार, 17 अक्टूबर 2016

सर्जिकल स्ट्राइक और संसद

                                                         सर्जिकल स्ट्राइक के बाद से ही जिस तरह से देश में माहौल बना हुआ है उसके बारे में कहीं न कहीं से सरकार की संवेदनशीलता में कमी ही दिखाई दे रही है क्योंकि इतने सफल और महत्वपूर्ण प्रयास के बाद जिस तरह से देश में छिछले स्तर की राजनीति शुरू हुई उसकी कोई आवश्यकता भी नहीं थी पर संभवतः हमारा लोकतंत्र और नेता अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि महत्वपूर्ण मुद्दों पर सही तरह से सामंजस्य बनाकर काम कर सकें. यह सही है कि सेना के काम में सदैव ही सही दिशा होती है पर कई बार राजनैतिक लाभ हानि पर विचार करते हुए विभिन्न राजनैतिक दल भी मनमानी करने पर उतर आते हैं जिससे परिस्थितियां सँभालने के स्थान पर और उलझ जाती हैं. सांसदों की तरफ से और संसद की रक्षा मामलों की समिति की तरफ से जिस तरह से सेना द्वारा दी गयी जानकारी पर संतोष जताया गया था उसके बाद विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष शशि थरूर ने मंगलवार के दिन डीजीएमओ की तरफ से इस मामले पर सांसदों को पूरी जानकारी देने के लिए एक बैठक बुलाई है. अच्छा होता कि इस बारे में सरकार ही सभी सांसदों या दलों के मुख्य सचेतकों को एक बैठक कर पूरी जानकारी दे देती जिससे सभी को पूरी बात भी पता लग जाती तथा इस पर होने वाली राजनीति पर पूरी तरह से रोक भी लग जाती.
                                           जिस तरह से यह बात सामने आ रही है कि इससे पहले उप-सेनाध्यक्ष द्वारा जिस तरह से सांसदों को केवल सीमित जानकारी दी गई तथा इसके बारे में किसी भी सवाल का उत्तर नहीं दिया गया उसके बाद से ही रक्षा मामलों की संसदीय समिति और सांसदों में रोष था. इस समिति के अध्यक्ष बीसी खंडूरी और अन्य दलों के सांसदों में इस मुद्दे पर कहा सुनी भी हो गयी थी. निश्चित तौर पर यह गंभीर मामला है और इस पर किसी भी तरह की राजनीति की कोई जगह नहीं होनी चाहिए पर आज देश में हर स्तर पर राजनीति करने की जो परंपरा शुरू हो चुकी है उसमें अब कब और कहाँ राजनीति अपने पैर जमा ले यह कहा नहीं जा सकता है. रक्षा मामलों की संसदीय समिति भी अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण होती है और किन कारणों से इससे पूरी जानकारी नहीं बांटी गयी इस बात पर स्पष्टीकरण दिया जा सकता था पर देश के संविधान ने सांसदों को जिस तरह के विशेषाधिकार दिए हुए हैं उसमें उनको किसी भी जानकारी को पाने का पूरा अधिकार भी है और संभवतः इस मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ होगा जब सीमित जानकारी रक्षा मामलों की समिति से साझा की गयी थी.
                                           अब यदि विदेश मामलों की समिति जिसके अध्यक्ष कांग्रेस के शशि थरूर हैं उनके प्रयासों या फिर खुद सेना और विदेश मंत्रालय की तरफ से ही इस तरह की बात की गयी है जिसमें खुद डीजीएमओ पूरी बात सांसदों के सामने रखने वाले हैं तो उससे किसी का भी नुकसान नहीं होने वाला है क्योंकि आमतौर पर संसदीय समितियों में क्या होता है उसके बारे में पूरी जानकारी मीडिया तक नहीं पहुँचती है. इस समिति में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी हैं जिससे अब सेना की कार्यवाही के बारे में पूरी जानकारी मिलने के बाद आशा की जा सकती है कि इस मुद्दे पर राजनीति बंद हो जाएगी. सरकार को निश्चित तौर पर इस बारे में बात कर लाभ उठाने की छूट होती है पर जिस तरह से अभी से ही सरकार समर्थकों द्वारा इस बारे में बातें शुरू की गयी हैं तो उसके बाद से ही विपक्षियों के सरकार पर हमले बढ़ गए हैं जब सर्जिकल स्ट्राइक के बाद इस मुद्दे पर कई दिनों तक ख़ामोशी रही तो सरकार को भी अपने समर्थकों से चुप रहने के लिए कहना चाहिए था पर प्रचार को जन जन तक पहुँचाने के लिए सरकार की तरफ से शुरुवाती चुप्पी लगायी गयी जिसके बाद से ही मामला बिगड़ता चला गया. संसद को सब कुछ जानने का हक संविधान ने दिया है पर सरकार को भी अपनी ज़िम्मेदारियों को समझना चाहिए तथा विपक्ष के साथ देश को विश्वास में लेना चाहिए जिससे रक्षा से जुड़े मामलों में राजनीति के अवसरों को समाप्त किया जा सके.   
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बुधवार, 5 अक्टूबर 2016

सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति

                                           देश में किसी भी मामले पर राजनीति करने और हर मामले पर राजनीति करने के नुस्खे खोजने की जो नयी परंपरा चल पड़ी है उससे भले ही कुछ समय के लिए राजनैतिक दलों को कुछ लाभ अवश्य मिल जाये पर आने वाले समय में इस तरह की घटिया राजनीति भारत के वैश्विक समूह में किसी भी देश के साथ संबध बनाने या बिगाड़ने का काम भी कर सकती है. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जिस तरह से देश के अंदर और बाहर दो तरह की बातें सामने आ रही हैं उन्हें देखते हुए इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि इस मुद्दे का भाजपा द्वारा लाभ नहीं लिया जायेगा और विभिन्न शहरों में लगे हुए पोस्टर अब इस बात की तरफ संकेत करने भी लगे हैं. कुछ राज्यों में आगामी विधान सभा चुनावों में भाजपा भले ही आधिकारिक तौर पर इन सर्जिकल स्ट्राइक्स का लाभ न ले पर उसके समर्थकों की तरफ से सोशल मीडिया में इसकी शुरुवात हो चुकी है जो आने वाले चुनावों तक और भी बढ़ने ही वाली है. इस मुद्दे पर राजनीति और देश हित में बहुत ही बारीक रेखा रह गयी है जिसे पार करने या न करने के बारे में सभी दलों के अपने अपने दावे भी हैं. क्या हमारे देश में मुद्दों का इतना अभाव हो गया है कि अब सेना की कार्यवाही का उपयोग/ दुरूपयोग केवल राजनैतिक लाभ उठाने और एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए भी किया जाने लगेगा ?
                               इस मामले में जिस तरह से देश के अंदर भी दो खेमे बनते नज़र आ रहे हैं उनको देखते हुए किसी भी परिस्थिति में इसे स्वस्थ शुरुवात नहीं कही जा सकती है क्योंकि सत्ता देश के राजनैतिक दल ही चलाने वाले हैं भले ही उनके सामने किसी भी तरह की परिस्थितियां क्यों न हों. इस मामले में राजनैतिक रूप से परिपक्वता दिखाने का समय अब भाजपा के सामने है क्योंकि विपक्ष में रहते हुए उसकी तरफ से जिस तरह की बयानबाज़ी लगातार की जाती थी आज उसी को लेकर जब उससे सवाल पूछे जा रहे हैं तो वह अपने को बहुत ही असहज पा रही है. निश्चित तौर पर इस मामले में पार्टी के अलावा पीएम के स्तर से भी प्रयास किये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि जहाँ सरकार इस मुद्दे की संवेदनशीलता को समझते हुए चुप्पी साधे हुए है वहीं भाजपा इस मुद्दे पर राजनीति न करने की अपील करते हुए भी खुले तौर पर अपने नेताओं को राजनीति करते रहने की छूट देती जा रही है जिसकी आज के समय में कोई आवश्यकता भी नहीं है. सर्जिकल स्ट्राइक से मोदी सरकार अपनी कमज़ोर होती छवि को चमकाने के लिए जनता तक जो सन्देश पहुँचाना चाहती थी वह पहुँच भी चुका है इसलिए अब इस मामले में राजनीति से बचा जाना चाहिए.
                           राजनैतिक दलों के अपने अपने दावे और बयान सामने आ रहे हैं जिनमें परिपक्वता के स्थान पर केवल आरोप ही अधिक दिखाई दे रहे हैं तो ऐसी परिस्थिति में क्या कोई दल देश और सेना के बारे में भी सोचना चाह रहा है ? इस तरह के अभियानों में शुरू से अंत तक जिस गोपनीयता को रखा जाना चाहिए स्पष्टः मोदी सरकार उसमें पूरी तरह से विफल हो गयी है पर अब भी समय है कि किसी भी तरह के राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते अब सरकार को इस बारे में कोई सबूत दिए जाने से पूरी तरह परहेज़ भी करना चाहिए क्योंकि भारतीय सेना और सरकार की  कार्यवाही पर सभी को पूरा भरोसा भी है. यह तो बहुत रणनीतिक कदम था सरकार तो आम मुठभेड के बारे में भी पूरी जानकारी नहीं दिया करती है इसलिए इस बारे में और भी गंभीर होने की आवश्यकता है. सभी दलों को अपने नेताओं को स्पष्ट रूप से यह समझाना चाहिए कि इस मुद्दे पर किसी भी तरह की राजनीति नहीं की जाएगी जिससे निचले स्तर और सोशल मीडिया पर अनावश्यक आरोप प्रत्यारोपों का घटिया दौर भी बंद हो सके. सरकार के सामने इसे सार्वजनिक करने की कोई आवश्यकता भी नहीं है इसलिए इन बातों से पूरी तरह किनारा करते हुए सभी राजनैतिक दलों को आगे बढ़ने के बारे में सोचते हुए आतंक के खिलाफ सर्वसम्मत कठोर कार्यवाही का सर्वसम्मत संकल्प लेना चाहिए.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

सैन्य अभियान और सरकार

                                                                    पाकिस्तान की तरफ से छेड़े गए छद्म युद्ध से निपटने की तरकीबें खोजने में व्यस्त भारत सरकार, रक्षा विशेषज्ञ और सेना के सामने पहले से ही कम गंभीर चुनौतियाँ नहीं है पर जिस तरह से सोशल मीडिया में कुछ समूहों और लोगों की तरफ से लगातार काग़ज़ी दबाव बनाने की कोशिशें की जा रही हैं उसके बाद इन सभी लोगों के लिए और भी अधिक मुश्किलें सामने आने वाली हैं. यह सही है कि पाकिस्तान और कश्मीर मामले पर संघ के सभी अनुषांगिक संगठनों और भाजपा द्वारा देश में जिस तरह का माहौल लगातार बनाया जाता रहा है आज उसके दबाव को खुद मोदी सरकार, संघ और भाजपा अच्छे से महसूस कर रहे हैं. विपक्ष में बैठकर ताना मारना और सरकार के खिलाफ इतने महत्वपूर्ण मुद्दों पर लगातार बयानबाज़ी और निचले स्तर की राजनीति के सहारे यह साबित करने की कोशिशें करने वाली भाजपा और संघ आज चुप हैं क्योंकि उनको खुद भी समझ नहीं आ रहा है कि आखिर वे कौन से तात्कालिक कदम उठाये जाएँ जिनके माध्यम से पाकिस्तान पर आम जनमानस की भावनाओं के अनुरूप दबाव बनाया जा सके. कुछ लोगों द्वारा जिस तरह से सीमा पार भारतीय सेना के द्वारा कार्यवाही किये जाने की अफवाह फैलाई जा रही है वह अब पूरी तरह से झूठ साबित हुई है और सेना की तरफ से भी इस बात का बाकायदा खंडन भी किया गया है कि उसने एलओसी के पार कोई कार्यवाही नहीं की है.
                                       हर तरह से तबाह पाकिस्तान के सामने आज कितने विकल्प शेष हैं यह पूरी दुनिया भी जानती है और यदि विश्व समुदाय इस बारे में बहुत अधिक आश्वस्त है तो उसके पीछे भारत की सुलझी हुई सोच भी बहुत बड़ा काम कर रही है. पाकिस्तान के खिलाफ यदि युद्ध करना है तो यह सेना से विचार विमर्श करने या आवश्यक होने पर विपक्षी दलों से विमर्श के बाद मोदी सरकार ही करेगी क्योंकि देश ने उनको अपना विश्वास सौंप हुआ है पर किसी भी दशा में अनावश्यक बातों पर ध्यान देकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिशों का हर स्तर पर विरोध होना चाहिए और जिन समूहों और सोशल मीडिया के पन्नों पर भड़काने वाली बातें की जा रही हैं उन पर भी सरकार को अपने स्तर से कार्यवाही करने के बारे में सोचना चाहिए. देश की सुरक्षा व्यवस्था कुछ मूर्खों के अनुसार नहीं चल सकती है और सेना के आधिकारिक पेज के अतिरिक्त उससे जुडी किसी भी गतिविधि को सोशल मीडिया में साझा करने वाले हर व्यक्ति को चेतावनी भी दी जानी चाहिए भले ही कितने प्रभावशाली क्यों न हों. सेना की सामान्य गतिविधि से जुडी कुछ तस्वीरों को कुछ लोगों ने इस तरह से सोशल मीडिया पर साझा करना शुरू कर दिया है जैसे उसके सञ्चालन की ज़िम्मेदारी सरकार ने इन छद्म राष्ट्रवादियों के हाथों में ही सौंप रखी है.
                                   स्मार्ट फ़ोन और व्यवसाय से जुड़े कार्यों तथा इन्टरनेट के सबके लिए उपलब्ध हो जाने के चलते आज ऐसे लोगों की संख्या बहुत हो चुकी है जिन्हें यह पता ही नहीं है कि सोशल मीडिया पर क्या शेयर करना चाहिए और क्या नहीं ? यह स्थिति बन्दर के हाथ में उस्तरे की तरह ही है पर कुछ मामलों में इसके लिए मोदी सरकार की नीतियां भी ज़िम्मेदार कही जा सकती हैं क्योंकि सरकार समर्थक टीवी चैनेल लगातार सीमा पर जाकर ऐसी संवेदनशील रिपोर्टिंग करते हुए देखे जा सकते हैं जिसका कोई मतलब नहीं है. सीमा पर बीएसएफ या सेना की क्या स्थिति है और किस तरह के सुरक्षा उपकरणों को वहां पर लगाया गया है आज यह सब दिखाया जाना भी रिपोर्टिंग का हिस्सा हो गया है पर क्या सरकार और रक्षा मंत्रालय को इस बात का अंदाज़ा भी है कि इन सभी संचारों की आज लगातार नेट पर उपलब्धता बनी रहती है तो किसी विपरीत परिस्थिति में क्या देश के दुश्मन इस तरह की जानकारी को नेट से हासिल नहीं कर सकते हैं ? पीएम मोदी और उनकी सरकार प्रचार में बहुत भरोसा करती है और उनकी २०१४ की सोशल मीडिया टीम आज भी चुनावी मोड से बाहर नहीं आ पायी है क्योंकि अधिकांश मामलों में उसकी तरफ से ही ऐसी संवेदनशील जानकारियां ही नेट पर डाली जा रही हैं. अच्छा हो कि सरकार के इस मामले में आशानुरूप गंभीर न होने पर भी हम नागरिक पूरी तरह से सचेत रहें और इतने महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार पर दबाव बनाने के स्थान पर अपने आसपास इस बात पर ध्यान रखें कि कोई संदिग्ध हमारे समाज में घुसपैठ तो नहीं कर रहा है.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 21 सितंबर 2016

सेना के असुरक्षित कैंप

                                                         पठानकोट के बाद उरी में हुए आतंकी फिदायीन हमले जिस तरह से सेना के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित कैम्प्स की सुरक्षा से जुड़े हुए गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं वहीं इस बात पर भी विचार करने के लिए मजबूर कर दिया है कि क्या हमारे सैनिक इस तरह के हालात में रह रहे हैं जहाँ पर उनके लिए अपनी सुरक्षा कर पाना भी मुश्किल हो रहा है ? यह सही है कि स्थायी छावनी और विभिन्न तरह के अस्थायी कैम्प्स में सुविधाओं में बड़ा अंतर हुआ करता है फिर भी जब इन कैम्प्स के माध्यम से ही हमारे जवान सीमावर्ती क्षेत्रों से लगाकर अपनी छावनी तक आते जाते हैं तो इनकी सुरक्षा को इस तरह से कैसे रखा जा सकता है ? देश में बढ़ता हुआ रक्षा बजट हमेशा से ही विदेशों में चिंता का विषय बनता रहता है पर जब हमारे सैनिकों और सैन्य प्रतिष्ठानों की सुरक्षा की बात सामने आती है तो हम क्यों इसके प्रति लापरवाह हो जाते हैं ? जिन सैनिकों के दिलों में देश के लिए लड़ने की चाहत होती है वे आखिर क्यों इस तरह से छिपकर किये गए हमलों में शहीद हो जाते हैं अब देश और सरकार के साथ सेना को भी इस विषय पर सोचने की आवश्यकता है क्योंकि पाक के रवैये को देखते हुए आने वाले समय में भी सीमा और घाटी के अंदर परिस्थितियों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आने वाला है जिससे हमारे सैनिक सदैव ही इस तरह के हमलों की जद में ही रहने वाले हैं.
                                 आज़ादी के बाद एक समय ऐसा भी था जब आर्थिक संसाधनों की कमी के चलते देश के पास अपने जवानों के लिए सर्दियों और बर्फीले क्षेत्रों में उपयोग करने लायक वर्दी खरीदने के पैसे भी नहीं होते थे पर आज स्थिति उससे बहुत अलग है तो क्यों नहीं हम एक ऐसी नीति पर आगे बढ़ने की सोचते हैं जिसमें देश भर में फैले सेना के सभी प्रतिष्ठानों को मज़बूत सुरक्षा घेरे में लाने के लिए प्रयास शुरू किये जाएँ. यह सही है कि देश के समग्र विकास के लिए सुरक्षा के अतिरिक्त हर क्षेत्र में प्रगति आवश्यक होती है पर आज जब हम सुरक्षा पर अतिरिक्त धन खर्च करने के लिए सक्षम हैं तो सेना के सभी प्रतिष्ठानों के बारे में गंभीरता से सोचने का समय भी आ गया है. एक नीति के अंतर्गत सबसे पहले सेना के आतंक प्रभावित क्षेत्रों के सभी स्थलों की सुरक्षा के लिए मज़बूत दीवार और सही डिज़ायन पर काम किया जाना चाहिए जिससे सुरक्षा संबंधी इस तरह की समस्याएं भी सामने न आने पाएं कि कोई आतंकी समूह बहुत आसानी से तार काटकर इस तरह से हमारे सोते हुए सैनिकों पर हमला कर सके. छद्म युद्ध को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता है इसलिए संसाधनों की कमी के चलते उससे होने वाली क्षति को नियंत्रित करने के बारे में तो सही दिशा में आगे बढ़ा ही जा सकता है. सेना के लिए हर तरह की व्यवस्था करते समय इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए और बैरक आदि इस तरह से बनाई जानी चाहिए कि किसी भी आतंकी हमले के समय सेना कम से कम नुकसान के साथ उनसे अच्छे से निपट सके.
                                   इस बारे में अब केंद्र सरकार अवश्य ही गंभीरता से कुछ सोच रही होगी और अब उसे अपनी सुरक्षा संबंधी नीति पर एक बार फिर से इस तरह से विचार करना ही चाहिए जिससे एक समय सीमा में हम अपने सभी सैन्य शिविरों और अन्य सामरिक महत्त्व के प्रतिष्ठानों की एक व्यापक नीति के अंतर्गत सुरक्षा कर सकें. अस्सी के दशक में पंजाब आतंक के दौर में जब राजीव सरकार ने सीमा पर कांटेदार बाड़ लगाने का काम शुरू किया था वह पूरा होने पर घुसपैठ को पूरी तरह से रोकने में सफलता मिल गयी थी तथा बाद में सरकारों ने एलओसी तथा जम्मू कश्मीर की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर भी सफलता पूर्वक लगाकर देश को पहले के मुक़ाबले अधिक सुरक्षित कर लिया है. जम्मू कश्मीर में जिस तरह की भौगोलिक परिस्थितियां हैं उनके चलते बाड़ अक्सर ख़राब हो जाती है जिसे ठीक भी किया जाता है पर आज हमें एक निश्चित बजट के साथ भविष्य में सेना के शिविरों को सुरक्षित करने के लिए अनिवार्य रूप से एक समय सीमा निर्धारित करने की आवश्यकता भी है जिससे देश की रक्षा करने वाले सैनिकों को शिविरों में और भी अधिक सुरक्षित किया जा सके. ये सैनिक भी हमारे ही परिवार का हिस्सा हैं और अब हम इनको इस तरह से असुरक्षित वातावरण में नहीं रख सकते हैं.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 12 सितंबर 2016

सीमापार से आतंक

                                                                कश्मीर घाटी में जिस तरह से दो महीनों से अराजकता की स्थिति बनी हुई है उसी बीच पाकिस्तान की तरफ से एक बार फिर से सर्दियाँ बढ़ने और बर्फ पड़ने से पहले आतंकियों की नयी खेप भारत में भेजने की कोशिशें तेज़ कर दी गयी हैं. एक ही दिन में सीमा पर जिस तरह से कई स्थानों पर आतंकी कार्यवाही देखने को मिली उससे यही लगता है कि इस मोर्चे पर अब पाक के साथ और अधिक सख्ती करने का समय आ गया है और यह काम केवल स्थानीय सीमा पर ही नहीं किया जाना चाहिए बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसे कूटनैतिक, राजनैतिक और आर्थिक हर तरह के मोर्चे आज़माया जाना चाहिए जिससे पाकिस्तान पर वास्तव में कुछ ठोस दबाव डाला जा सके. विपक्ष में रहने पर पाक के खिलाफ मुखर रहने वाली भाजपा ही सत्ता में आने पर पाक से हर तरह के सम्बन्ध मज़बूत करने की बात करने लगती है क्योंकि विपक्ष के रूप में कभी भी कांग्रेस की तरफ से बातचीत का उस स्तर पर राजनैतिक कारणों से विरोध नहीं किया जाता है जैसा करने में भाजपा को महारत हासिल है. संसद ने भी जिस तरह से कश्मीर की अशांति पर एकमत से मोदी सरकार का समर्थन किया उससे उसे आगे बढ़ने की शक्ति भी मिली और दुनिया में सन्देश भी चला गया है कि भारत के राजनैतिक दलों में चाहे कितने भी मतभेद क्यों न हों पर राष्ट्रीय मसलों पर वे सदैव एक साथ ही खड़े दिखाई देते हैं.
                                  २६/११ के बाद से जिस तरह से मनमोहन सरकार ने पाक से किसी भी तरह की द्विपक्षीय संबंधों पर एक तरह से रोक ही लगा दी थी वह २०१४ तक उसी तरह चलती रही और यहाँ तक दोनों देशों के बीच खेलों तक पर भी इस राजनैतिक कटुता का असर भी पड़ा था और एक नीति के तहत बिना कुछ बोले ही मनमोहन सरकार ने पाक को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग थलग कर दिया था पर मोदी सरकार ने अपनी पारी शुरू करते समय एक बार फिर से सभी दक्षिण एशियाई देशों को बुलाने के साथ पाक को न्योता दिया जिसका उसने अभी तक नाजायज़ फायदा ही उठाया है. सरकार बनने के लगभग दो साल बाद अब पीएम मोदी को यह लगा रहा है कि पाक को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग थलग करना आवश्यक हो गया है तो क्या सरकार की तरफ से पाकिस्तान के आंकलन में कमी नहीं रह गयी या कूटनैतिक मोर्चों पर मोदी सरकार ने पाक के सम्बन्ध में जो कुछ सोचा था वह वैसा नहीं हो पाया ? पाक आज़ादी के समय से ही विश्वसनीय नहीं रहा है तो उस स्थिति में अटल सरकार के साथ कारगिल के समय किये गए बर्ताव के बारे में आंकलन करने में मोदी सरकार से चूक तो हो ही गयी है जिसे सुधारने के लिए अब वे पाक को अलग थलग करने की बात करने लगे हैं.
                          इस मामले में अब भारत द्वारा पाक को दिया गया मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा अविलंब वापस लेना चाहिए क्योंकि आज पाक की नीतियों से परेशान बांग्लादेश और अफगानिस्तान तक उसके खिलाफ अपने विरोध को खुलेआम प्रदर्शित कर रहे हैं जबकि चुनावी भाषणों में पाक को चुटकियों में मसलने की बाते करने वाले पीएम मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी अब पाक को लेकर निर्णय ही नहीं कर पा रहे हैं. पाक के आतंक निर्यात करने के कारण जनता और राजनैतिक दलों में उसके खिलाफ सख्त क़दमों की राय सदैव ही रही है पर अब जब पाक किसी भी तरह से मान नहीं रहा है तो समय आ गया है कि उसको पूरी तरह से अलग थलग करने के प्रयास भी शुरू किये जाएँ तथा वह मध्य एशिया तक माल की आवाजाही पर जितनी रोक लगता है उतनी ही अब भारत को भी पाक पर लगानी चाहिए. सीमा पर व्यापार को एक चेतावनी के रूप में एक दायरे में सीमित कर देना चाहिए तथा पाक की तरफ से बदलाव न दिखाई देने की स्थिति में सीमा पर व्यापार को पूरी तरह से प्रतिबंधित भी कर देना चाहिए. केवल एक तरफ व्यापार से पाक को ही अधिक लाभ मिल रहा है तो उस परिस्थिति में भारत को कड़े कदम उठाने और पाक पर दबाव बनाने से भी नहीं चूकना चाहिए तभी पाक पर सही मायनों में दबाव बनाया जा सकेगा.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 31 अगस्त 2016

भारत-अमेरिका रक्षा समझौता


                                                     दूसरे विश्वयुद्ध में जापान के विरुद्ध दो बार परमाणु बम का दुरूपयोग करने के बाद जिस तरह से अमेरिका अपने को विश्व में सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए कुछ भी करता रहता है उसकी परिणीति पूरी दुनिया ने एक लंबे शीत युद्ध के रूप में देखी है. उस समय भारत समेत बहुत सारे अन्य देश जो या तो आज़ाद हो रहे थे या उसके बाद आज़ाद हुए हैं उनकी तरफ से भारत के नेतृत्व में गट निरपेक्ष आंदोलन की शुरुवात की गई थी जो कई दशकों तक अपने उद्देश्य को प्रभावी ढंग से निभाने में सफल भी रहा और बहुत बार उसके कारण ही कई देशों पर अमेरिका नाटो या उसके प्रतिद्वंदी रूस और वारसा संधि वाले देशों का दुष्प्रभाव नहीं पड़ सका. आज़ादी के बाद से ही निर्गुट होते हुए भी भारत ने रूस के साथ बहुत मज़बूत आर्थिक, राजनैतिक और रक्षा सम्बन्ध स्थापित किये जो आज भी काफी हद तक दोनों देशों की आवश्यकताएं पूरी करने में लगे हुए हैं. आज एक ध्रुवीय विश्व में जिस तरह से अमेरिका हर तरफ अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों में लगा हुआ है भारत के साथ उसका ताज़ा रक्षा समझौता उसी कड़ी का एक हिस्सा है.
                         वैसे तो अमेरिका ने इस पूरी दुनिया में लगभग १०० देशों से इस तरह के समझौते कर रखे हैं पर भारत को इस तरह के निर्णय के लिए झुकाना उसकी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है क्योंकि चीन के विरुद्ध अब वह भारत के रक्षा प्रतिष्ठानों का बखूबी दुरूपयोग कर सकेगा जबकि भारत को उससे किसी भी तरह का लंबी अवधि का लाभ नहीं मिलने वाला है. अमेरिका विश्व में एक मात्र ऐसा राष्ट्र है जिसको केवल अपने राष्ट्रीय हित ही दिखाई देते हैं और वह समय आने पर किसी भी सहयोगी देश को भी अकेले छोड़ने में चूकता नहीं है. ऐसी परिस्थिति में यह समझौता हमारे देश के लिए किस तरह की चुनौतियाँ लेकर आएगा यह तो समय ही बता सकता है पर इतना निश्चित है कि भारत के हितों की रक्षा करने के लिए अमेरिका कभी भी चीन या पाकिस्तान के विरुद्ध इस समझौते के चलते भारत के साथ नहीं खड़ा होने वाला है. एक समय मनमोहन सरकार ने भी इस समझौते की कोशिश की थी और ड्राफ्ट भी बनाया गया था पर नौसेना और वायु सेना की तरफ से कड़ी आपत्तियां आने के बाद उनकी सरकार ने इस मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया था.
                      कश्मीर घाटी में जिस तरह से पाक ने खुले तौर पर जिहाद के नाम पर प्रॉक्सी वॉर छेड़ा हुआ है अमेरिका आज तक उस पर कठोर बयानबाज़ी भी करने से बचता रहता है क्योंकि उसे पाकिस्तानी सेना का हर स्तर पर समर्थन मिलता ही रहता है भले ही वहां के नेता कुछ भी कहते रहें. अमेरिका सिर्फ इसलिए ही पाकिस्तान में तानशाहों को झेलता है क्योंकि उसे राजनेताओं से डील करने में समस्या होती है. क्या इस समझौते के अन्तर्गत अब अमेरिका भारत के साथ मिलकर पीओके से लगाकर लाहौर और स्वात घाटी तक भारतीय हितों की रक्षा करने के लिए हवाई हमले करने की स्थिति में भारत के साथ देगा ? यदि भारत के लिए सामरिक महत्व के इन मुद्दों पर अमेरिका चुप्पी लगता है तो यह समझौता हमारे किस काम का है ? भारत के महत्वपूर्ण सहयोगी सद्दाम हुसैन पर अमेरिका ने जो आरोप लगाए थे वे आज झूठे साबित हो चुके हैं पर भारत के विश्वसनीय सहयोगी आज उसके साथ नहीं है तालिबान ने जिस तरह से अफगानिस्तान में भारत समर्थक पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को फांसी पर चढ़ाया था तब अमेरिका ने क्या किया था ? इस समझौते के बाद अब अमेरिका को भारत के रूप में एक सुविधा संपन्न सैन्य सहयोगी तो मिल गया है क्योंकि उसकी दुनिया के हर देश से किसी न किसी मुद्दे पर तकरार होती रहती है तो वह हमारे सैन्य प्रतिष्ठानों का दुरूपयोग करता रहेगा और भारत ने आज तक संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के अतिरिक्त केवल १९७१ में बांग्लादेश और १९८७ में श्रीलंका में अपनी फौजों को भेजा था. ऐसे में यह समझौता हमें अमेरिका के हितों को सँभालने में एक मजबूरी के रूप में ढोना पड़ सकता है अगर पाक को लेकर अमेरिका अपनी आज की स्थिति को नहीं बदलता है तो भारत के लिए इस समझौते में पाने लायक कुछ भी नहीं दिखाई देता है.          मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 27 अगस्त 2016

स्कॉर्पीन लीक का असर

                                                             देश की नौसेना के लिए भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए खरीदी जा रही स्कॉर्पीन पनडुब्बियों से जुडी महत्वपूर्ण जानकारी लीक होने के बाद केंद्र सरकार और रक्षा मंत्रालय की तरफ से इसे बहुत ही हलके में लिया गया वह चिंता का विषय भी है क्योंकि नौसेना की सामरिक तैयारियों में हमारी पनडुब्बियों के साथ लगातार होने वाले हादसों के बाद हमारी समुद्री ताकत कमज़ोर होती जा रही है और भविष्य की तैयारियों के लिए बेड़े में शामिल की जाने वाली इन महत्वपूर्ण पनडुब्बियों की जानकारी इस तरह से पूरी दुनिया के सामने आने के बाद हमारी ताकत पर असर पड़ना अवश्यम्भावी है भले ही सरकार कुछ भी कहती रहे. हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि यह जानकारी किस स्तर और किस देश से लीक हुई है पर इसके सार्वजनिक होने से भारत की रक्षा तैयारियों पर बुरा असर अवश्य ही पड़ने वाला है क्योंकि इस पनडुब्बी के माध्यम से हम अपनी समुद्री सामरिक ताकत को बढ़ाने की कोशिशों में लगे हुए है.
                         लीक दस्तावेजों के बारे में बात करते हुए ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार ने जिस तरह से भारतीय रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के बयानों से असहमति दिखाई है उससे लगता है कि या तो भारत सरकार और रक्षा मंत्री को पूरी बात नहीं बतायी गयी है या फिर वे जानबूझकर इस मामले को हल्का करने की कोशिश कर रहे हैं ? मोदी सरकार के सामने रक्षा मामलों में इस तरह से सेंध लगने का यह पहला मामला है पर सरकार को इससे जिस तरह से निपटना चाहिए था वैसा दिखाई नहीं दे रहा है संभवतः अंदरूनी तौर पर सरकार सब जान चुकी हो पर नौ सेना और देश के मनोबल को बनाये रखने के लिए ही इस तरह की बयानबाज़ी की जा रही हो. ऑस्ट्रेलिया के पत्रकार ने जिस तरह से संवेदनशील जानकारियां लीक होने के बारे में भी कहा है उससे लगता है कि कहीं न कहीं बड़ी गड़बड़ी अवश्य ही हुई है क्योंकि भारत सरकार के स्वीकार करने या न करने से तथ्य बदलने वाले भी नहीं हैं. हालाँकि इस मामले में संतोष की बात यही है कि पत्रकार की तरफ से यह कहा जा रहा है कि वह ऐसी कोई भी जानकारी सार्वजानिक नहीं करेगा जिससे स्कॉर्पीन की विस्तृत जानकारी मिल सकती हो पर भारत के रक्षा मंत्री के उस दावे को गलत साबित करने के लिए वह उन तथ्यों को छिपाकर कुछ दस्तावेज़ सार्वजानिक करेगा जिससे यह पता चले कि सारी जानकारी लीक हो चुकी है.
                       भारत जिस तरह से आने वाले समय में बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के साथ हिन्द महासागर में भी अपनी नौसेना की प्रभावी उपस्थिति चाहता है उसमें यह लीक मामला काफी समस्या पैदा कर सकता है क्योंकि हमारी महत्वपूर्ण जानकारी सार्वजनिक हो जाने के बाद हमारी गतिविधि और मारक क्षमता के बारे में सभी को पता चल जाने वाला है. उग्र राष्ट्रवाद के नाम पर जिस तरह से पहले से ही चल रही तैयारियों में मोदी सरकार का रवैया रहा करता है तो वह नागरिकों के उत्साहवर्धन के लिए राजनैतिक तौर पर तो ठीक कहा जा सकता है पर उसके बहुत सारे दुष्परिणाम भी होते हैं. अच्छा होता की पूरे मामले की जानकारी सामने आने तक रक्षा मंत्री चुप ही रहते और किसी प्रवक्ता से एक बयान दिलवा कर सरकार का रुख स्पष्ट करवा देते पर अब सरकार और रक्षा मंत्री के दावों को झूठ साबित करने के लिए जो जानकरियां सामने आने वाली हैं उन पर पूरे विश्व की नज़र रहने वाली है और खासकर चीन तथा पाकिस्तान इन जानकारियों को बहुत उत्सुकता से देखने वाले हैं क्योंकि भारत के रक्षा मामलों से जुडी अधिकतम जानकारी आने वाले समय में उन्हें भारत के इन सामरिक उपकरणों से निपटने के लिए मज़बूत आधार भी प्रदान कर सकते हैं.     
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

हंदवाड़ा और कानून

                                                             हंदवाड़ा में सेना के जवान द्वारा कथित रूप से एक स्थानीय लड़की को छेड़ने की अफवाह के बाद जिस तरह से पूरे मामले में जिस तरह से राजनीति शुरू हुई वह भले ही कुछ दलों और स्थानीय नेताओं के साथ कश्मीरी अलगाववादियों के लिए कुछ समय तक एक जीवंत मुद्दे के रूप में वोट दिलवाने का काम करती रहे पर आने वाले समय में पूरी कश्मीर घाटी के लिए उसका सन्देश अच्छा नहीं रहने वाला है. सेना के एक जवान पर आरोप लगाने के बाद अलगाववादियों ने जिस तरह से स्थानीय निवासियों को भड़काया और उसके साथ ही फैली हिंसा में चार कश्मीरी युवक भी मारे गए तो उससे हंदवारा या कश्मीरियों को क्या मिला आज यह सवाल कोई भी कश्मीरी अपने आप से क्यों नहीं पूछना चाहता है ? इस मामले में सेना को बदनाम करने की जिस स्तर पर एक सुनियोजित साज़िश की गयी अब उसके विरोध में कुछ भी क्यों नहीं कहा जा रहा है सम्भवतः लड़की के बयान के बाद उन लोगों की कलई खुल गई जो सेना पर आम कश्मीरियों को प्रताड़ित करने के आरोप लगाने से कभी भी नहीं चूकते हैं अब क्यों उन लोगों से कोई सवाल नहीं पूछा जा रहा है जिनकी घिनौनी राजनीति में युवकों की जान चली गयी है ?
                               लड़की के दो बार दिए गए बयान के बाद से यह स्पष्ट हो गया है कि उसे स्थानीय लड़के छेड़ा करते थे और इस मामले में उन्होंने लड़की को माध्यम बनाकर घाटी में अशांति का नया दौर शुरू करने की एक कोशिश की जा रही थी जिसे अब पूरी तरह से नाकाम कर दिया गया है. लड़की के अपने चाचा या मामा के घर पुलिस सुरक्षा में रहने को लेकर भी अनावश्यक सवाल खड़े किये जा रहे हैं कि अभी भी लड़की पुलिस की हिरासत में है जबकि जम्मू कश्मीर सरकार और पुलिस का कहना है कि उसे उन लड़कों और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए केवल पुलिस सुरक्षा दी गयी है उसके कहीं भी आने जाने पर सरकार की तरफ से कोई भी प्रतिबन्ध नहीं लगाए गए हैं. सरकार की तरफ से उसकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ गयी है. यह भी संभव है कि आने वाले समय में कोई निर्दयी अलगाववादी उस निर्दोष लड़की की जान लेने की कोशिश भी कर सकता है क्योंकि उसके सच बयान करने के बाद उनकी राजनीति सबके सामने आ गयी है और उनके लिए मुंह छिपाने जैसी स्थिति बन गयी है.
                            पिछले कई वर्षों से जम्मू कश्मीर में पर्यटन का समय शुरू होने के साथ इस तरह की सुनियोजित साज़िश अलगाववादियों की तरफ से लगातार की जाती रही है और इनकी इस मंशा को आम कश्मीरी या तो समझना ही नहीं चाहता है या उनके भय के कारण उनके हाथों में खेलने को मजबूर रहा करता है. पर्यटन से आमलोगों को होने वाली आय के माध्यम से गरीब कश्मीरियों और व्यापारी वर्ग के लिए लाभ कमाने का मौका होता है पर जब घाटी में इस तरह के प्रदर्शन और बंद के साथ कर्फ्यू जैसे हालात रहेंगें तो पूरे देश और दुनिया से कोई क्यों वहां जाना चाहेगा ? अलगाववादियों की एक बड़ी मंशा यह भी रहा करती है कि आम कश्मीरी के सामने सदैव ही रोज़ी रोटी की समस्या बनी रहे जिससे हताश होकर नौजवान वर्ग भी अलगाववादियों की तरफ मजबूरी में झुकने को मजबूर हो जाये. जब तक इस मंशा के साथ काम करने वाले लोगों को घाटी के लोग अलग थलग नहीं करेंगें तब तक उनकी धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों में कोई बड़ा सुधार नहीं होने वाला है. महबूबा मुफ़्ती के रूप में राज्य के पास अब ऐसी नेता हैं जो राज्य के समग्र विकास और परिवर्तन के लिए सही दिशा में काम करने की क्षमता रखती हैं तो अब कश्मीरियों के पास उनके साथ आगे बढ़कर घाटी को झूठे प्रचार से बाहर निकलने का अवसर भी है जो सम्भवतः समय चूक जाने पर दूसरी बार नहीं मिलने वाला है.                                           
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शुक्रवार, 25 मार्च 2016

महबूबा की नयी पारी

                                                             लगभग ढाई महीने की लंबी निरर्थक सी लगने वाली लड़ाई के बाद जिस तरह से जम्मू कश्मीर में एक बार फिर से पीडीपी-भाजपा की गठबंधन सरकार सत्ता में आने जा रही है उससे यही लगता है कि मुफ़्ती मोहम्मद सईद के समय में किये गए समझौते के प्रारूप में बिना किसी बड़े बदलाव के ही यह राजनैतिक कवायद शुरू होकर अपने परिणाम तक पहुँच रही है. अपनी पाकिस्तान से लगती भौगोलिक स्थिति, स्थानीय निवासियों के बीच आसानी से घुल मिल जाने वाले आतंकियों और घाटी में कुछ प्रतिशत जनता द्वारा अलगावादियों को हर तरह का समर्थन दिए जाने के चलते ही महबूबा के लिए सरकार चला पाना आसान नहीं होने वाला है. वैसे तो पूरे देश में ही खंडित जनादेश आने पर एक दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में ताल ठोंक चुके विभिन्न दल साथ में खड़े होकर किसी भी तरह से सरकार बनाने के प्रयास करते हुए दिखाई देते हैं पर कई बार इस स्थिति के बीच ही कुछ ऐसे बेमेल गठबन्धन भी हो जाते हैं जिनसे पार पाना आसान नहीं होता है. दोबारा बनने वाली इस सरकार को चलाने के लिए अब बड़ा दबाव पीडीपी पर ही आने वाला है क्योंकि भाजपा जम्मू क्षेत्र में अपना अधिकतम प्रदर्शन कर चुकी है और उससे अधिक उसे मिलने वाला भी नहीं है और पीडीपी इस गठबंधन से बहुत कुछ खो सकती है.
                               मुफ़्ती मोहम्मद सईद पुरानी पीढ़ी के नेता थे और लगभग हर दल में उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले लोग भी होते थे पर महबूबा मुफ़्ती की अधिकांश राजनीति केवल घाटी से ही सम्बंधित रही है और उन्हें अलगाववादियों के प्रति नरम रुख रखने के लिए भी जाना जाता है. इस तरह की परिस्थितियों में भाजपा के साथ उनका राजनैतिक सम्बन्ध कहाँ तक चल पाएगा यह तो समय ही बताएगा पर जम्मू कश्मीर में राजनैतिक प्रक्रिया को दोबारा से चालू कर चुनी हुई सरकार के हाथों में राज्य को सौंपना अच्छी खबर है क्योंकि केंद्र सरकार के हाथों में राजनैतिक शक्ति रहने पर अलगाववादी अपनी हरकतों से घाटी में यह सन्देश देने की कोशिश करने लगते हैं कि केंद्र सरकार ही घाटी के लोगों के हितों को नुकसान पहुँचाने का काम करने में लगी हुई है. जब पीडीपी भी सरकार का हिस्सा होगी तो इस पूरी कवायद को झूठ के पंख नहीं मिल पाएंगें और अलगाववादियों की हर बात को जनता तक पहुँचने में समय भी लगेगा क्योंकि तब बीच में पीडीपी की राजनैतिक इकाइयां भी अपना काम करने में लग जाएंगीं.
                              महबूबा का सीएम बनना राज्य के लिए एक बड़े बदलाव को लेकर भी आने वाला है क्योंकि इस कदम से जहाँ वे अपने को सरकार चलाने में सही तरह से साबित भी कर सकती है और इसमें पूरी तरह से विफल भी हो सकती हैं. भाजपा और पीडीपी दोनों को ही अपने उकसावे वाले बयान देने के लिए आगे रहने वाले नेताओं को रोकना ही होगा क्योंकि पूरी राजनैतिक प्रक्रिया को दोनों ही दलों में मौजूद इस तरह की अति वाली मानसिकता से बहुत नुकसान पहुँच सकता है. जम्मू कश्मीर और देश के हित के लिए इस सरकार का कार्यकाल पूरा होना बहुत आवश्यक भी है क्योंकि उसके माध्यम से ही जनता में विश्वास पैदा किया जा सकता है. महबूबा खुद ज़मीन से जुडी हुई नेता हैं तो उन्हें अपनी पार्टी के उन तत्वों पर लगाम कसनी होगी जो खुलेआम अलगाववादियों का समर्थन करने में लगे रहते हैं यदि केंद्र और राज्य सरकार द्वारा चलायी जा रही विभिन्न पुनर्वास प्रक्रियाओं को सही दिशा में आगे बढ़ाया जाता है तो इससे युवाओं में केंद्र सरकार के प्रति झूठे आक्रोश को बढ़ने से रोका जा सकेगा. साथ ही पीडीपी को इस बात का विशेष ख़याल रखना होगा कि जहाँ भी युवाओं पर अलगाववादियों का प्रभाव अधिक है वहां खुद महबूबा को अतिरिक्त संवाद बनाए जाने के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि सेना द्वारा सुरक्षा सम्बन्धी किसी भी मामले में हस्तक्षेप करने की स्थिति में युवाओं को उससे सहयोग का महत्त्व समझाना होगा और सेना की तरफ से चलने वाली कार्यवाहियों में स्थानीय जनता को स्वेच्छा से सहयोग करने के लिए तैयार करना होगा वर्ना किसी भी मुद्दे पर घाटी और जम्मू में अपने वोटों को सँभालने के लिए दोनों दल कभी भी पुरानी स्थिति में लौट सकते हैं जो पूरे राज्य के लिए घातक ही साबित होगा.     
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शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

सेना दिवस और सेना की चुनौतियाँ

                                            आज़ादी के बाद पहली बार १५ जनवरी १९४९ को भारतीय सेना के अंतिम ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ जनरल फ्रांसिस बुचर से ले० जनरल (बाद में फील्ड मार्शल) के.एम. करियप्पा द्वारा पद भार सँभालने के दिन को भारतीय सेना अपने लिए महत्वपूर्ण मानते हुए प्रति वर्ष सेना दिवस मनाती है जिसमें नई दिल्ली के मुख्यालय के साथ ही अन्य मुख्यालयों पर परेड और अन्य कई कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं. भारतीय सेना से जुड़े हर व्यक्ति के लिए यह बहुत ही गौरव का विषय होता है क्योंकि किसी भी सैनिक के लिए उसकी सेना की स्थापना दिवस और देश की रक्षा से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं हो सकता है. आज के परिप्रेक्ष्य में भारतीय सेना जिस तरह से देश के अंदर और बाहर लगातार सामने आने सामने वाली चुनौतियों से निपटनेमें सक्षम होती जा रही है उस स्थिति में अब सरकार और सेना दोनों को भविष्य की महत्वपूर्ण तैयारियों के बारे में सोचने के लिए त्वरित निर्णय लेने की आवश्यकता भी है. अभी तक अपने सीमित संसाधनों और बजट के चलते तथा विभिन्न तरह की अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियों से निपटने के लिए सेना की तैयारियों को पूरा नहीं कहा जा सकता है.
                        इस कमी को इस तरह से भी देखा जा सकता है कि भारत की तरफ से कभी भी युद्ध को भड़काने की कार्यवाही नहीं कि जाती है और अपनी इस पहले हमला न करने की नीति के चलते ही देश के नेताओं की सोच संभवतः उस तरफ नहीं गयी जिसके माध्यम से आज़ादी के बाद से देश की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के साथ आक्रमण की क्षमता में विस्तार की नीति भी होती. आज़ादी के बाद नेहरू के नेतृत्व में भारत ने जिस तरह से दो ध्रुवों में बंटी हुई दुनिया के लिए निर्गुट आंदोलन का रास्ता सुझाया और उस पर काफी हद तक सफलता भी पायी थी तो उसके बाद भारत को इस दिशा में अधिक सोचने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई, हालाँकि इस नीति का खमियाजा पाक और चीन से हुए युद्धों में भारत ने झेला तब जाकर सेना को कुछ सुधारने की कवायद शुरू की गयी. वह समय ऐसा था कि अंग्रेज़ों के जाने और बंटवारे के बाद देश के पास संसाधनों का बहुत अभाव था जिसके चलते युद्ध से जुड़े मुद्दों पर बजट बढ़ाने पर देश के नेता कभी भी बहुत उत्साहित नहीं दिखाई देते थे.
                          आज सेना के सामने जो चुनौतियाँ हैं उनसे निपटने के लिए सरकार ने पहल करनी शुरू कर दी है और पिछले कुछ वर्षों में सेना के उपकरणों की सप्लाई में स्वदेशी योगदान लगभग ७७% से बढ़कर ८७% तक पहुँच गया है. सेना के पास मनोबल की कमी नहीं है और इस मनोबल के साथ यदि सही नीति और आवश्यक उपकरणों का सामंजस्य बैठाया जा सके तो भारतीय सेना किसी भी चुनौती से और भी आसानी से निपट सकती है. आज देश पर मंडरा रहे आतंकी खतरों से निपटने के लिए सेना से जुडी स्पष्ट नीति की आवश्यकता महसूस की जा रही है क्योंकि किसी भी हमले की स्थिति में सेना को पहले पीछे रखने की कोशिशें की जाती हैं और बाद में स्थिति को राज्यों द्वारा न संभाल पाने की स्थिति में सेना को बुलाया जाता है जबकि इस तरह की स्थिति में स्थानीय पुलिस-प्रशासन के साथ सेना की एकीकृत कमान की अविलम्ब स्थापना कर पूरे अभियान से सही तरीके से निपटा जाना चाहिए. हमारी सेना के पास सब कुछ है पर उसे स्पष्ट नीति और समस्या से निपटने की पूरी छूट नहीं मिल पाती है जो कि किसी भी लोकतान्त्रिक देश की समस्या होती है फिर भी अब इस मुद्दे पर सरकार को एक स्पष्ट नीति बनाकर सेना को इसके बारे में निर्णय लेने की छूट देने पर विचार करना चाहिए. 
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मंगलवार, 5 जनवरी 2016

भारतीय सुरक्षा परिदृश्य

                                                                   देश भर में जिस तरह से पाक समर्थित आतंकियों द्वारा अपने मनमाने तरीके से कहीं भी बड़ा हमला किया जाना सदैव से ही संभव रहा है वहीं इस सबसे निपटने में भारत की जो तैयारियां होनी चाहिए वे अभी भी बहुत ही निचले स्तर पर हैं. २६/११ की चुनौतियों के बाद निश्चित तौर पर भारतीय नेताओं की सोच में बदलाव आया और किसी स्तर पर कुछ तैयारियों के लिए खाका भी खींचा गया क्योंकि कंधार विमान अपहरण के समय जिस तरह से हमारे नेताओं की बैठक सीएमजी और क्यूआरटी जैसी बातें केवल सतह पर ही तैर रही थीं २६/११ के समय उनमें कुछ सुधार अवश्य ही दिखा था. जम्मू कश्मीर में पूरी सीमा की बाड़ बंदी और चौकसी का स्तर बहुत ही ऊंचा कर दिए जाने के बाद से ही आतंकी संगठनों के लिए वहां से अपने जेहादियों को भेजना आसान नहीं रहा गया है इसलिए वे अब नजदीकी राज्य पंजाब और राजस्थान की सीमाओं पर एक बार फिर से नज़रें गड़ाने में लग गए हैं. इस परिस्थिति में अब सरकार को यह सोचना ही होगा की १९८४ में जब पंजाब आतंक की चपेट में था तो कैसे सीमा सुरक्षित करके आतंकियों को पाक से मिलने वाली मदद को काटा गया था.
                       किसी भी आतंकी हमले के बारे में क्या हमारे विभिन्न राज्यों की पुलिस के पास उतना प्रशिक्षण है जिसकी ऐसे समय में आवश्यकता होती है यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि जब भी कोई आतंकी हमला होता है तो असैन्य क्षेत्र में होने की स्थिति में लगभग हर राज्य को सेना की कुशल टीमों की मदद की जरूरत तो होती है पर वे अपने राज्य के सुरक्षा बलों की पीठ थपथपाने के लिए उन्हें ही आगे रखने का काम किया करते हैं. हर राज्य सरकार को यह पता है कि इस तरह से उच्च प्रशिक्षण पाये हुए आतंकियों से लड़ने के लिए जितने प्रशिक्षित जवानों की आवश्यकता होती है उनके जवानों को वह प्रशिक्षण दिया ही नहीं जाता है. संभवतः यही कारण है कि इस बार आतंकी हमले की सूचना होने और सरकार के अनुसार उनसे निपटने की तैयारी भी होने के बाद हमारे इतने जवान शहीद हो गए. इस तरह की स्थिति से निपटने के लिए अब क्या पूरे देश के हर राज्य में एक विशेष योजना के अंतर्गत प्रशिक्षित कम से कम एक यूनिट नहीं होनी चाहिए जो एनएसजी या अन्य सुरक्षा बलों के आने तक स्थिति पर यथासंभव अपने नुकसान को सीमित करते हुए नियंत्रण कर सकें.
                    राज्य और केंद्र के बीच सदैव ही ऐसे मामलों में खींचतान ही रहा करती है और केवल राजनैतिक कारणों से राज्य पुलिस एवं विशेष सुरक्षा बलों के जवान भी चाहकर केंद्रीय एजेंसियों के साथ बेहतर तालमेल से काम नहीं कर पाते हैं. अब देश के किसी भी हिस्से में आतंकी हमले से निपटने के लिए एक विशेष प्लान भी होना चाहिए जिसके अंतर्गत किसी भी घटना के बारे में पता चलते ही वहां पर उपलब्ध बल उस पर अमल कर सकें. जिला स्तर के अधिकारियों के माध्यम से केंद्र सरकार की तरफ से आने वाले बलों के साथ सामंजस्य बिठाकर कैसे आतंकियों को जवाब दिया जाये यह पूरी तरह से स्पष्ट होना चाहिए. आतंकी मानसिकता वाले लोगों से निपटना आसान नहीं होता है क्योंकि वे मरने मारने के लिए ही आते हैं पर सुरक्षा बलों को हर बात का ध्यान भी रखना होता है. राज्यों को एक विशेष और स्पष्ट निर्देश भी होना चाहिए कि जब तक सही तरह से प्रशिक्षित सहायता और निर्देश देने वाले न कहें तो बिना किसी मज़बूत तैयारी के आतंकियों से सीधे निपटने से बचना चाहिए क्योंकि उनकी सीमित संख्या हमारे अधिकतम जवानों की शहादत के लिए प्रयासरत रहती है तो जब तक अपरिहार्य न हो जाये तब तक किसी भी परिस्थिति में बिना पूरी तैयारी के आतंकियों से सीधे उलझने के स्थान पर उनको स्थान विशेष में सुरक्षित दूरी से घेरने की कोशिश करनी चाहिए.    
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बुधवार, 28 अक्टूबर 2015

पाक - इस्लामी आतंक का पोषक

                         अपनी स्थापना के समय से ही भारत के लिए समस्या बने हुए पाक ने कभी भी सही राह पर चलते हुए दोनों देशों के बीच के संबंधों को सही करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया है जिसके मूल में संभवतः पाक की वह मानसिकता है जो भारत को अपना प्रतिद्वंदी मानती है जबकि आज भी पाक यदि अपने यहाँ से भारत में चलने वाले कश्मीरी अलगाववादी को समर्थन और सहयोग देना बंद कर दे तो स्थितियों को सँभालने में कोई ख़ास समय नहीं लगने वाला है. दुर्भाग्य से आज़ादी के बाद से पाक के लोगों को नेताओं और सेना द्वारा कुछ इस तरह की घुट्टी पिलाई गयी है जिसमें उन्हें भारत अपना सबसे बड़ा दुश्मन दिखाई देता है और पाक के अनावश्यक रूप से सीमा पर तनाव बढ़ाने की कोशिशों के चलते आज भारत में भी पाक का नाम लेना एक समस्या ही है.
                    पाकिस्तानी टीवी चैनेल दुनिया को दिए गए एक बयान में वहां के पूर्व शासक परवेज़ मुशर्रफ ने जिस तरह से इस बात को स्वीकार किया है कि दुनिया भर के लिए आतंक का पर्याय बने हुए ओसामा, जवाहरी और अन्य आतंकी संगठन उनके हीरो हैं तो उसके बाद कुछ भी कहने सुनने के लिए शेष नहीं रह जाता है क्योंकि अभी तक पाक के वर्तमान या पूर्व शासक इस तरह की बातें खुलकर नहीं किया करते थे पर शायद मुशर्रफ अपने को एक तानाशाह के बाद राजनेता के रूप में किसी भी तरह से स्थापित करना चाहते हैं जिससे उनके द्वारा इस तरह के बयान दिए जा रहे हैं.  अमेरिका को शुरू से ही यह सब पता है पर दक्षिण एशिया की सबसे मज़बूत ताकत भारत के लगातार बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने और उसे स्थानीय समस्याओं में उलझाये रखने के लिए वह भी इन घटनाओं से आँखें मूंदे ही रहता है जिसका दुष्परिणाम वह ९/११ के रूप में भुगत भी चुका है.
                   पाकिस्तानी नेताओं की तरफ से ऐसे भारत विरोधी बयान सदैव ही दिए जाते रहे हैं पर पहली बार जिस तरह से मुशर्रफ ने कभी अमेरिका और दुनिया के लिए सरदर्द बने आतंकियों को पाकिस्तान का हीरो बताने की कोशिश की है वह पाक के घरेलू राजनैतिक दबाव की तरफ ही इशारा करती है. हालाँकि बाद में मुशर्रफ ने यह भी माना कि आज ये आतंकी संगठन पाक के लिए एक चुनौती बन चुके है और इनसे सख्ती से निपटा जाना भी ज़रूरी है तो शायद इस्लाम के नाम पर निर्दोषों रक्त बहाये जाने को लेकर भारत को महसूस होने वाली पीड़ा को वे भी महसूस कर रहे हैं. आतंकियों को केवल आतंक फैलाना है जहाँ गैर इस्लामिक लोग हैं वे वहां उनको मार रहे हैं और जहाँ केवल इस्लाम को मानने वाले हैं वहां वे फिरकों के आधार पर मुसलमानों को मारने में भी परहेज़ नहीं कर रहे हैं. फिलहाल तो पाक ऐसे दलदल में फँस चुका है जहाँ से निकलने के लिये जिस दृढ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है वह शायद ही पाक में आ पाये।
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गुरुवार, 13 अगस्त 2015

रफाल डील पर संकट

                                                     देश में महत्वपूर्ण मुद्दों को सुलझाने के लिए भी किस तरह से काम किया जाता है इसका ताज़ा उदाहरण भारतीय वायुसेना के लिए खरीदे जाने वाले रफाल विमानों से देखा जा सकता है. यह मामला कई वर्षों से देश के लिए महत्वपूर्ण रहा है पर आज भी इसमें इतने पेंच नज़र आ रहे हैं कि खुद पीएम के शीर्ष स्तर पर निर्णय लिए जाने तथा रक्षा मंत्री के दो महीने में इनकी कीमतों पर फैसला किये जाने का बयान देने के बाद भी आज यह सौदा असमंजस में ही दिखाई दे रहा है क्योंकि इसके समझौते में पहले संप्रग सरकार ने १०८ रफाल  भारत में ही बनाये जाने की शर्त रखी थी जिससे देश में निवेश और रोज़गार को बढ़ाया जा सके पर पीएम की फ़्रांस यात्रा के दौरान इस पर त्वरित निर्णय लिया गया जिससे वायुसेना की आवश्यकता की पूर्ति की जा सके और भविष्य में इसके लिए देश में ही एक हब बनाने की बात भी हुई थी जो अब सरकार के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के अनुरूप नहीं हो पा रही है क्योंकि जिस तरह से ३०% विनिर्माण भारत में किया जाना प्रस्तावित है उसके लिए आज देश में रफाल बनाने वाली कम्पनी के पास कोई आधारभूत ढांचा भारत में नहीं है और उसे विकसित करने में लम्बा समय लगाने वाला है.
                                             इस परिस्थिति में अब सरकार और संसद को देशहित में काम करते हुए इस समझौते पर पुनर्विचार करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि वायुसेना को विमान चाहिए पर खरीद की लम्बी प्रक्रिया उसे यह सुविधा देने से रोक रही है क्या कोई ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जिसमें रक्षा मामलों की स्थायी संसदीय समिति ही इस तरह के फैसलों को भविष्य में लेने के लिए अधिकृत कर दी जाये जो कि रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर सम्बंधित सेना और विशेषज्ञों की राय और सहमति के आधार पर काम करने के बारे में निर्णय लेने में सक्षम हो ? अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आज भी सभी रक्षा उत्पादक देश और कंपनियां पूरी दुनिया में अपने प्रतिनिधियों को नियुक्त कर उन पर पैसे खर्च करती हैं और यह लम्बे समय से चला आ रहा है खरीद पक्की होने पर इन प्रतिनिधियों को उसका कुछ हिस्सा दिए जाने की परंपरा आज भी चल ही रही है क्या भारत अपने स्तर पर इसे रोकने में सक्षम है या अब उसे भी अन्य देशों की तरह प्रतिनिधियों को किसी भी सौदे के बीच में वैध रूप से स्वीकार कर लेना चाहिए ? यह बहुत महत्वपूर्ण बात है और कोई भी दल अपने स्तर पर इसे करना नहीं चाहता है क्योंकि अन्य दल राजनैतिक कारणों से उस पर इन कम्पनियों के हाथों में खेलने का आरोप लगाने से नहीं चूकने वाले है.
                                          पिछले रक्षा मंत्री एके एंटनी ने जिस तरह से इस गिरोहबंदी को तोड़ने के गंभीर प्रयास किये थे आज उसका नतीजा यही है कि देश के रक्षा सौदे काफी हद तक पारदर्शी हुए हैं पर साथ ही उन कम्पनियों के साथ खरीद मुश्किल होती जा रही है जिनके उत्पाद तो हमारी आवश्यकता के अनुरूप हैं पर उनके प्रतिनिधियों को ये कंपनियां किनारे नहीं करना चाहती हैं जिससे देश के लिए खरीद करना और भी मुश्किल होता जा रहा है. अब इस मामले पर सरकार को संसद में विपक्ष को विश्वास में लेते हुए कुछ स्थायी समाधान के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि इस तरह से खुद पीएम के स्तर पर लिए गए निर्णय नियमों के शिकार होते रहे तो देश की सेनाओं के पास देश की रक्षा करने के लिए आवश्यक उपकरण और संसाधन ही नहीं बचेंगें. आने वाले समय में पीएम इसराइल के दौरे पर जाने वाले हैं और वहां रक्षा उद्योग बहुत कुछ ऐसा भी बनता है जो भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप होता है तो क्यों न इस मामले में पहले ही पीएम देश के शीर्ष नेताओं से विमर्श के बाद कम से कम इसराइल के साथ इस तरह के समझौते करने के लिए आगे बढ़ने के बारे में प्रयास शुरू कर दें जिससे आने वाले समय में देश की रक्षा आवश्यकताएं पूरी करने के बारे में एक नयी सोच विकसित हो सके.   
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शनिवार, 8 अगस्त 2015

वायु सेना संयुक्त अभ्यास और विवाद

                                                         म्यांमार के साथ हुए आतंक विरोधी अभियान में भारतीय सेना और सरकार के दावों को खुद म्यांमार द्वारा झुठलाने के बाद जिस तरह से अनावश्यक विवाद सामने आये थे लगता है कि भारत सरकार, रक्षा मंत्रालय और सेना ने उनसे कोई सबक नहीं सीखा है क्योंकि हाल ही में ब्रिटेन में संपन्न हुए दो हफ़्तों के संयुक्त अभ्यास के बाद जिस तरह से भारतीय वायु सेना के ग्रुप कैप्टेन द्वारा ब्रिटेन पर अभ्यास में विजय पाने की बात कही उसने एक बार फिर से उसी तरह के विवाद को हवा दे दी है. क्या सरकार या रक्षा मंत्रालय के स्तर पर हुई कमी मानी जाये या सम्बंधित अधिकारी का बड़बोलापन क्योंकि ऐसे अभ्यासों में जीत हार की कोई बात नहीं होती और विभिन्न तरह के लड़ाकू विमानों से लैस सहयोगी देश अपने द्विपक्षीय अभ्यासों के अंतर्गत इस तरह से मिलते ही रहते हैं जिससे उन्हें सहयोगी देश के अलग तरह के विमानों के साथ उड़ान भरने और उनकी क्षमताओं के बारे में अधिक जानकारी हो जाती है जो आज के आतंक भरे वैश्विक परिवेश में सभी के  लिए लाभकारी भी साबित होती है क्योंकि जिस तरह से इराक और सीरिया में शहरों पर कब्ज़े के चलते आईएस के पास रुसी तकनीक के सैन्य साजो सामान उपलब्ध हो रहे हैं तो दुनिया को भविष्य में उनसे निपटने के लिए हर प्रयास करने आवश्यक भी हैं.
                                  पश्चिमी देशों और नाटो के पास रुसी तकनीक के किसी भी सैन्य उपकरण के साथ साझा कार्यक्रम चलाने का कोई अनुभव कभी भी नहीं रहा है क्योंकि शीत युद्ध के समय से ही भारत जैसे कुछ ही ऐसे देश रहे हैं जिनके पास रूस के साथ पश्चिमी देशों की तकनीक वाले बेड़े भी हैं और जिनका संयुक्त रूप से सञ्चालन करना भारतीय सेना के तीनों अंगों को बहुत अच्छे से आता है. ऐसे में अमेरिका, फ़्रांस, इसराइल और अन्य देश भी भारत के साथ संयुक्त अभ्यासों को लेकर एक सतत कार्यक्रम चलाने की कोशिश में लगे रहते हैं. इस तरह के अभियानों के बारे में केवल यही बताया जाता है कि किन देशों के साथ संयुक्त अभ्यास किन परिस्थितयों में और कहाँ पर किया जा रहा है पर जिस तरह से इस अभियान में जीत हार की बात करके मामले को गरम किया गया है यह भारत सरकार की किसी रणनीति का अंग हो सकता है या फिर यह केवल एक ग्रुप कैप्टेन द्वारा दिखाया गया बड़बोलापन ही है इस बारे में अब सरकार को ब्रिटेन को जवाब देना ही होगा क्योंकि उनको भी इस तरह की ख़बरों के सामने आने के बाद अपने देश के नागरिकों को जवाब देना है.
                                  अच्छा हो कि इस तरह के मामलों में गोपनीयता का स्तर पहले की तरह ही बनाये रखा जाये तथा किसी भी परिस्थिति में सेना के आधिकारिक बयान के अतिरिक्त अभ्यास में शामिल किसी भी सैनिक/अधिकारी को उस पर कुछ भी बोलने से पूरी तरह रोकने की व्यवस्था भी बनायीं जानी चाहिए. सरकार को यह समझना ही होगा कि द्विपक्षीय अभ्यासों की भी कोई गरिमा होती है और किसी भी परिस्थिति में उसको बनाये रखने की आवश्यकता भी होती है. भारतीय सेना अपने आप में सर्वश्रेष्ठ ऐसे ही नहीं कही जाती है पर संभवतः कई बार कुछ राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए भी सरकारें इस तरह की बयानबाज़ी करवाती रहती हैं जिनका राजनैतिक लाभ भी उठाया जा सके. मोदी सरकार के समय में सेना की गोपनीयता से जुड़े हुए मसले में जल्दी में ही यह दूसरी बार हुआ है कि रणनीतिक रूप से कुछ भी बयान न देने की स्थिति में सेना की तरफ से किसी ने बयान जारी कर दिया है जिससे पहले म्यांमार के सामने और अब ब्रिटेन के सामने स्थितियां सँभालने की मजबूरी आ गयी है. आखिर क्या आवश्यकता है कि सैन्य अभ्यासों और कार्यवाहियों से जुड़े मसलों पर भी बयान दिए जाएँ क्योंकि कोई युद्ध काल नहीं चल रहा है और इस तरह से विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करने से आने वाले समय में दुनिया के विभिन्न देश भारत के साथ क्या संयुक्त अभ्यास करने के लिए इच्छुक होंगें ?       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 6 अगस्त 2015

कश्मीर में आतंक का बदलता स्वरुप

                                                   लम्बे समय से जम्मू कश्मीर में पाक समर्थित आतंकियों द्वारा लगातार अपनी हरकतों के माध्यम से जिस तरह से अशांति फ़ैलाने की कोशिशें की जाती रही हैं अब उस परिस्थिति के बीच ही आतंक का एक नया चेहरा भी सामने आना शुरू हो चुका है. अभी तक आतंकी कश्मीर क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठाने के साथ अपनी घुसपैठ को बनाये रखने के लिए पाक सेना और रेंजर्स का सहारा लिया करते हैं अब उनकी रणनीति में परिवर्तन दिखाई देने लगा है क्योंकि एलओसी पर कड़े उपाय करने के बाद पाक के लिए घुसपैठ को जारी रख पाना उतना आसान भी नहीं रह गया है जितना कभी हुआ करता था इसलिए ही वह इस मौसम में हर वर्ष ही सीमा पर अकारण गोलीबारी करते हुए अातंकियों को सीमा पर भेजने की कोशिशें भी जम्मू क्षेत्र में अधिक करने लगा है. वार्षिक अमरनाथ यात्रा के दौरान सदैव ही कुछ सनसनी फैलाकर पाक की यही कोशिश होती है कि इसके माध्यम से वह आम कश्मीरियों के लिए साल भर की आमदनी पर वह कुछ रोक लगाने में सफल हो सके फिर इन बेकार और परेशान हुए लोगों को वह आसानी से इस्लाम के नाम पर अपने आतंकी जाल में उलझाने में सफल हो सके.
                           उधमपुर क्षेत्र में जिस तरह से बीएसएफ की बस पर हमला करने के बाद जंगलों में दो लोगों का अपहरण कर ले जाने वाले नावेद को ग्रामीणों की बहादुरी के बाद पकड़ा गया है वह पाकिस्तान के आतंकी खेल का खुलासा करने के लिए अपने आप में बहुत ही बड़ा सबूत है पर दुनिया में आतंक को जिस तरह से दो चश्मों से देखा जाता है उसके बाद अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ चीन इस बात को किस तरह से स्वीकार करेंगें अब यही देखने का विषय है. अभी तक जिस भी स्थान पर आतंकी हमले हुए उनमें केवल कसाब ही ज़िंदा पकड़ा गया है पर नावेद को पकडे जाने से पाक पर भारत में आतंक फ़ैलाने की पुष्टि भी होती है क्योंकि दो दिन पहले ही पाकिस्तानी एजेंसी के पूर्व अधिकारी ने २६/११ के लिए पाक के प्रयासों का खुलासा भी किया था. ऐसी स्थिति में क्या अब नावेद को नए सिरे से त्वरित कार्यवाही के द्वारा सजा दिए जाने के बारे में नहीं सोचा जाना चाहिए क्योंकि उसका गुनाह सबके सामने है फिर अब यह सही समय है कि किसी भी आतंकी घटना में शामिल रहे किसी भी व्यक्ति को उसके कारनामों की सजा देने के लिए सरकार नए सिरे से सोचना शुरू करे. यह अपने आप में अकेला आतंकी नहीं है क्योंकि इसके और भी साथी घाटी या देश के अन्य हिस्से में आतंक फ़ैलाने का काम करने के लिए घुसपैठ कर चुके हैं.
                       भारत सरकार के सामने अब कुछ ही विकल्प शेष रह जाते हैं क्योंकि जिस तरह से इसी अगस्त माह में दोनों देशों के एनएसए की दिल्ली में बैठक होने जा रही है तो आज की बदली हुई परिस्थिति में क्या पाक अपनी तरफ से इस बैठक में आना भी चाहेगा क्योंकि इस तरह के अप्रत्याशित सवालों के बारे में सीधे आमने सामने जवाब दे पाना अब पाक एक बूते से बाहर ही होता दिख रहा है और वैसे भी पाक के नेतृत्व में इतना साहस भी नहीं है कि वह भारत के साथ अब खुले तौर पर बात कर सके. एक सम्भावना यह भी है कि पाक इस बैठक में शामिल हो जाये और हमेशा की तरह ही भारत के आरोपों को सिरे से नकारने का काम करने लगे जिससे वार्ता और बातचीत के साथ सम्बन्ध सुधारने की कोई भी कोशिश पूरी तरह से विफल ही होने वाली है. पाक ने जिस तरह से जम्मू को सेना और आतंकियों की प्राथमिकताओं में ले लिया है उसे देखते हुए अभी सितम्बर तक सीमा पर ऐसा ही माहौल बने रहने की पूरी संभावनाएं भी हैं. बातचीत शुरू करने का दबाव अब मोदी सरकार को कड़े कदम उठाते हुए पाक पर डालने की तरफ बढ़ना चाहिए क्योंकि पाक से बात करने का कोई मतलब नहीं बनता है साथ ही पाक के साथ प्रस्तावित किसी भी बैठक से दूर रहकर भारत को अब कड़े सन्देश देने की तरफ बढ़ना चाहिए. देश में सरकार बदलने के साथ जो लोग मोदी से पाक के प्रति कठोर रवैया अपनाये जाने की आस लगाये बैठे थे आज वे ही सबसे अधिक निराश नज़र आ रहे हैं इसलिए सरकार को बातचीत के प्रस्ताव पर पुनर्विचार करने के बारे में गंभीरता से सोचने की आवश्यकता भी है.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...