मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Thursday, 13 August 2015

रफाल डील पर संकट

                                                     देश में महत्वपूर्ण मुद्दों को सुलझाने के लिए भी किस तरह से काम किया जाता है इसका ताज़ा उदाहरण भारतीय वायुसेना के लिए खरीदे जाने वाले रफाल विमानों से देखा जा सकता है. यह मामला कई वर्षों से देश के लिए महत्वपूर्ण रहा है पर आज भी इसमें इतने पेंच नज़र आ रहे हैं कि खुद पीएम के शीर्ष स्तर पर निर्णय लिए जाने तथा रक्षा मंत्री के दो महीने में इनकी कीमतों पर फैसला किये जाने का बयान देने के बाद भी आज यह सौदा असमंजस में ही दिखाई दे रहा है क्योंकि इसके समझौते में पहले संप्रग सरकार ने १०८ रफाल  भारत में ही बनाये जाने की शर्त रखी थी जिससे देश में निवेश और रोज़गार को बढ़ाया जा सके पर पीएम की फ़्रांस यात्रा के दौरान इस पर त्वरित निर्णय लिया गया जिससे वायुसेना की आवश्यकता की पूर्ति की जा सके और भविष्य में इसके लिए देश में ही एक हब बनाने की बात भी हुई थी जो अब सरकार के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के अनुरूप नहीं हो पा रही है क्योंकि जिस तरह से ३०% विनिर्माण भारत में किया जाना प्रस्तावित है उसके लिए आज देश में रफाल बनाने वाली कम्पनी के पास कोई आधारभूत ढांचा भारत में नहीं है और उसे विकसित करने में लम्बा समय लगाने वाला है.
                                             इस परिस्थिति में अब सरकार और संसद को देशहित में काम करते हुए इस समझौते पर पुनर्विचार करने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि वायुसेना को विमान चाहिए पर खरीद की लम्बी प्रक्रिया उसे यह सुविधा देने से रोक रही है क्या कोई ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जिसमें रक्षा मामलों की स्थायी संसदीय समिति ही इस तरह के फैसलों को भविष्य में लेने के लिए अधिकृत कर दी जाये जो कि रक्षा मंत्रालय के साथ मिलकर सम्बंधित सेना और विशेषज्ञों की राय और सहमति के आधार पर काम करने के बारे में निर्णय लेने में सक्षम हो ? अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आज भी सभी रक्षा उत्पादक देश और कंपनियां पूरी दुनिया में अपने प्रतिनिधियों को नियुक्त कर उन पर पैसे खर्च करती हैं और यह लम्बे समय से चला आ रहा है खरीद पक्की होने पर इन प्रतिनिधियों को उसका कुछ हिस्सा दिए जाने की परंपरा आज भी चल ही रही है क्या भारत अपने स्तर पर इसे रोकने में सक्षम है या अब उसे भी अन्य देशों की तरह प्रतिनिधियों को किसी भी सौदे के बीच में वैध रूप से स्वीकार कर लेना चाहिए ? यह बहुत महत्वपूर्ण बात है और कोई भी दल अपने स्तर पर इसे करना नहीं चाहता है क्योंकि अन्य दल राजनैतिक कारणों से उस पर इन कम्पनियों के हाथों में खेलने का आरोप लगाने से नहीं चूकने वाले है.
                                          पिछले रक्षा मंत्री एके एंटनी ने जिस तरह से इस गिरोहबंदी को तोड़ने के गंभीर प्रयास किये थे आज उसका नतीजा यही है कि देश के रक्षा सौदे काफी हद तक पारदर्शी हुए हैं पर साथ ही उन कम्पनियों के साथ खरीद मुश्किल होती जा रही है जिनके उत्पाद तो हमारी आवश्यकता के अनुरूप हैं पर उनके प्रतिनिधियों को ये कंपनियां किनारे नहीं करना चाहती हैं जिससे देश के लिए खरीद करना और भी मुश्किल होता जा रहा है. अब इस मामले पर सरकार को संसद में विपक्ष को विश्वास में लेते हुए कुछ स्थायी समाधान के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि इस तरह से खुद पीएम के स्तर पर लिए गए निर्णय नियमों के शिकार होते रहे तो देश की सेनाओं के पास देश की रक्षा करने के लिए आवश्यक उपकरण और संसाधन ही नहीं बचेंगें. आने वाले समय में पीएम इसराइल के दौरे पर जाने वाले हैं और वहां रक्षा उद्योग बहुत कुछ ऐसा भी बनता है जो भारत की आवश्यकताओं के अनुरूप होता है तो क्यों न इस मामले में पहले ही पीएम देश के शीर्ष नेताओं से विमर्श के बाद कम से कम इसराइल के साथ इस तरह के समझौते करने के लिए आगे बढ़ने के बारे में प्रयास शुरू कर दें जिससे आने वाले समय में देश की रक्षा आवश्यकताएं पूरी करने के बारे में एक नयी सोच विकसित हो सके.   
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