मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Wednesday, 12 August 2015

जीएसटी, ललित मोदी और दलीय राजनीति

                                                 देश में आर्थिक सुधारों के साथ विभिन्न मुद्दों पर जिस तरह से सदैव ही राजनीति की जाती रहती है वह अब और भी निचले स्तर पर पहुँचती हुई दिखाई दे रही है क्योंकि देश की साख बढ़ाने के लिए शुरू किये गए जिन प्रयासों के कारण कभी भाजपा मनमोहन सरकार पर हमलावर रहा करती थी आज उनमें कुछ प्रावधानों को जन विरोधी बताते हुए कांग्रेस भी उसी तरह से विरोध कर रही है. सबसे मज़ेदार बात यह है कि जनता की सेवा करने के लम्बे चौड़े दावे करने वाले देश के दोनों ही बड़े दल आज एक जैसी घटिया राजनीति में उतरते हुए दिखाई देते हैं और चिंताजनक यह बात है कि देश की संसद को कुछ सांसद कभी भी इस तरह से गिरवी रख लिया करते हैं जिसका कोई मतलब नहीं होता है. जैसा कि सभी जानते हैं कि लोकतंत्र में सदन सुचारू रूप से चल सके इसके लिए सरकार को बड़ी ज़िम्मेदारी भी निभानी पड़ती है और कल सदन में हुई घटनाओं के बाद जिस तरह से सदन के वरिष्ठतम सदस्य लाल कृष्ण आडवाणी ने खुद को आहत महसूस किया वह भी सरकार के लिए संभवतः कोई मायने नहीं रखता है क्योंकि आडवाणी ने हंगामा देखकर स्पष्ट रूप से सदन से बाहर यह भी कहा कि नायडू से कहिये कि सदन स्थगित करवाएं तो इससे सरकार की स्थिति का अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है.
                                       आर्थिक सुधारों पर पहले जिस तरह से भाजपा हर बात का अनावश्यक विरोध किया करती थी आज अपने बिलों में किये गए कुछ बड़े परिवर्तनों के चलते कांग्रेस भी वही काम करने में लगी है. क्या इस समस्या का समाधान खोजा जा सकता है जिसमें सदन भी चल सके और सरकार तथा विपक्ष आवश्यक विधायी कार्यों को भी निपटाने में सफल हो सकें क्योंकि दलीय राजनीति में देश का नुकसान नहीं होना चाहिए यह बात सरकार और विपक्ष को समझनी ही होगी. भाजपा ने मनमोहन सरकार के समय इस तरह की हरकतें अनगिनत बार की थीं और इस बार ललित मोदी, व्यापम को लेकर जब विपक्ष के पास बड़ा मुद्दा है तो वह इसके बहाने से ही सरकार पर दबाव बनाने की कोशिशें करने में लगा हुआ है. सरकार में मुखिया मोदी को जिस तरह से केवल अपनी बात कहने का शौक है और वे किसी अन्य की कोई बात सुनना ही नहीं चाहते हैं तो सरकार में उसका असर दिखाई देना अवश्यम्भावी ही है और सरकार का संसदीय कार्य मंत्रालय भी मोदी की राह पर चलते हुए अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभा पाने में पूरी तरह से असफल ही साबित हुआ है. सरकार ललित मुद्दे पर सीधे चर्चा करना चाहती है जबकि विपक्ष कार्य स्थगन प्रस्ताव के साथ अपनी बात कहना चाहता है यदि सरकार की तरफ से थोड़ी समझदारी दिखाई जाती तो यह इतना बड़ा मुद्दा ही नहीं बन पाता.
                                    पिछले वर्ष के आम चुनावों में बुरी तरह से हारने के बाद और केवल ४४ सांसदों के दम और विपक्ष के साथ बेहतर सामंजस्य के चलते कांग्रेस ने सदन में काफी हद तक अपना वजूद फिर से बना लिया है और अब इस बात का राजनैतिक लाभ उठाने के लिए वह तैयार भी दिखाई देती है. प्रचंड बहुमत के बाद मोदी की सबसे बड़ी गलती यही रही कि उन्हें यह लगा कि अब वे देश को गुजरात की तरह निरंकुश होकर चला सकते हैं जबकि केंद्रीय स्तर पर कब मित्र दूर हो जाएँ और दूर से कोई नया दल आकर मित्र बन जाये कोई नहीं जानता है. कांग्रेस और भाजपा की रणनीति का अंतर सदन में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है क्योंकि कांग्रेस के अनुभवी नेताओं ने अपने अनुभव के दम पर सरकार के लिए लगातार मुश्किलें खड़ी करने में सफलता पायी है वहीं भाजपा की युवा ब्रिगेड एक तरह से बेहतर तालमेल न होने के कारण भ्रमित सी दिखाई देती है और संभवतः देश के इतिहास में पहली बार इतना शोर करने वाला सत्ता पक्ष दिखाई दे रहा है यह तब हो रहा जब मोदी को बहुत सख्त प्रशासक माना जाता है ? क्या इस तरह की छोटी छोटी घटनाओं से मोदी सरकार अपनी कमज़ोरी को छिपाने का प्रयास करती हुई नज़र नहीं आ रही है जो उसके पास अनुभव की कमी के चलते पैदा हो रही है पर अब देशहित में सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है जिससे देशहित में सही निर्णय लिए जा सकें.      
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