मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 2 जून 2018

गैर भाजपाई गठबंधन

                                                          संसद में सबसे अधिक सदस्यों को भेजने वाले यूपी में विपक्षी तालमेल के चलते भाजपा को जिस तरह से लगातार भाजपा विरोधी वोटों के लामबंद होने से उपचुनावों में हार का मुंह देखना पड़ रहा है उससे आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि भाजपा की मोदी सरकार भी पता नहीं क्यों अटल सरकार की तरह पुनः आत्ममुग्धता का शिकार होती जा रही है ?  भाजपा के सामने २००४ का उदाहरण बहुत पुराना नहीं हुआ है फिर भी उसकी तरफ से जिस तरह से एक प्रचारवादी अभियान चलाया जाने लगा है वह कई बार धरातल की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता है जो उसके साथ पहली और पिछली बार चुनावों में जुड़े उन तटस्थ मतदाताओं को उससे दूर करने का काम करता है जिसके दम पर उसे लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला था। मोदी शाह और भाजपा को यह समझना ही होगा कि आज उनको राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की विकल्पहीनता का लाभ अधिक मिल रहा है और यदि किसी मज़बूत एजेंडे पर विपक्षी दल एकजुट होते हैं तो २०१९ का चुनाव भाजपा के लिए एक दुःस्वप्न भी बन सकता है जहाँ कम अंतर से हारने वाले उसके सांसदों की संख्या बहुत अधिक रह सकती है.
                       विपक्ष में जिस तरह से हर बड़े नेता की आकांक्षा पीएम बनने की तरफ जाती हुई दिखाई देती है उसे किसी भी स्तर पर गलत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि हर राजनीतिज्ञ के लिए आगे बढ़ना एक बड़ा सपना होता है और वह किसी भी परिस्थिति में अपने को आगे बढ़ाना भी चाहता है. जब एक बड़ी चुनौती के रूप में मोदी विपक्ष के सामने हैं तो उनसे निपटने के लिए अपनी तात्कालिक विरोध को दरकिनार कर अगर यूपी में माया मुलायम अजीत और कांग्रेस ने समझदारी से सीटों का बंटवारा कर लिया तो भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ सकती है जहाँ तक यह कहा जा रहा है कि यह बेमेल गठबंधन अधिक समय तक नहीं चल पायेगा तो यह भी संभव है कि अंतर्विरोधों के चलते गठबंधन दो साल भी न चल पाए पर उसके बीच में आकर सत्ता सँभालने से भाजपा के लिए बहुत समस्या हो सकती है क्योंकि आज मोदी शाह की जिताऊ जोड़ी की तानशाही संघ से लगाकर पार्टी के हर स्तर पर नेताओं द्वारा महसूस की जा रही है पर सत्ता हाथ से जाते ही क्या भाजपा के महत्वाकांक्षी नेता इन पर हमला नहीं करने लगेंगें ? आज जो दबी जबान से सुनाई देता है वह कल खुलेआम दिखाई भी दे सकता है जिससे खुद भाजपा की संभावनाओं पर असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है.
                         परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों पर अब राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस को खुद को साबित करने का अंतिम अवसर मिला हुआ है और जिस तरह से अपने वजूद के लिए संघर्ष करती हुई कांग्रेस ने अहमद पटेल के चुनाव के बाद से हर मोर्चे पर लड़ने की इच्छा दिखाई है उससे उनके हताश कार्यकर्ताओं का मनोबल भी मज़बूत हुआ है. राहुल गाँधी के पास अभी बहुत समय है और इस सच्चाई को वह समझ रहे हैं यह उनके और कांग्रेस के लिए अच्छी बात है क्योंकि देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने और गुजराल सरकार को समर्थन देने की राजनीति करने वाली कांग्रेस में पिछले २२ सालों में बहुत कुछ बदल चुका है. विपक्ष के पास भी अधिक समय नहीं है क्योंकि मोदी सरकार में जिस तरह से संगठित तरीके से विपक्षी नेताओं को देशविरोधी साबित करने की कोशिश की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है और यदि यह परिस्थिति २०२४ तक बनी रही तो देश के ताने बाने में बहुत कुछ बदल सकता है. कौन पीएम होगा और कौन नहीं इस बात पर विचार करना अभी जल्दबाज़ी होगी क्योंकि जब तक भाजपा की संख्या को २०० तक सीमित करने में विपक्षी दल सफल नहीं होंगें तब तक नेताओं के चयन की कोई बात कम नहीं करने वाली है राज्यों में मज़बूत दलों को अपने राज्य में खुद के लिए अधिक और कांग्रेस के लिए कम सीटें छोड़ने और केंद्र में कांग्रेस के लिए अधिक सीटें छोड़ने जैसे किसी सम्मानजनक स्तर पर बात करनी होगी तभी २०१९ में उनके लिए कुछ संभव होगा वर्ना मोदी अपनी पूरी ताकत झोंक कर एक और आजम चुनाव को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए तैयारी करने में व्यस्त हो चुके है.    
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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

चीनी सामान का बहिष्कार ?

                           देश में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकियों के लगातार होते हमलों के और चीन द्वारा पाकिस्तान में बैठे कश्मीर की आज़ादी का समर्थन करने वाले जेहादी संगठनों के समर्थन किये जाने के बाद जिस तरह से आम जनमानस में चीन में बने समान का बहिष्कार करने की इच्छा बलवती हो रही है उसे देखते हुए व्यापारिक स्तर पर चीन के साथ अब भारत के रिश्ते बिगड़ने ही वाले हैं. अभी तक भारत चीन में बने हर तरह के सामान का प्रमुख बाजार बना हुआ है उस परिस्थिति में यदि आम जनता की तरफ से इस पर स्वेच्छा से रोक लगायी जाती है तो यह स्थिति मोदी सरकार के लिए चीन से संबंधों में विकट परिस्थियों को उत्पन्न कर सकती है जिससे निपटने के लिए सरकार के पास संभवतः कोई मार्ग शेष नहीं बचने वाला है. बेशक राजनीति और व्यापार अपनी जगह पर हैं पर दुनिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह वही भारत है जिसके नागरिकों ने १९६५ की लड़ाई में पीएम शास्त्री के आह्वाहन पर एक समय का खाना भी छोड़ दिया था तो आज जब स्थितियां देश के पक्ष में झुकी हुई हैं तो किसी देश विशेष के सामान का बहिष्कार करना कोई मुश्किल काम भी नहीं है पर सरकार की स्थिति इस पूरे प्रकरण में अजीब सी होने वाली है क्योंकि उसकी तरफ से देश की आर्थिक प्रगति के लिए भरपूर प्रयास किये जा रहे हैं.
                                                  पूरी दुनिया में कम टिकाऊ साबित होने बाद भी चीनी सामान अपनी सस्ती कीमत के दम पर आम लोगों तक पहुँच बना सकने की क्षमता के चलते मज़बूत पैठ बनाये हुए हैं जिससे अन्य देशों के व्यापारिक हितों पर गंभीर चोट पहुँच रही है इस परिस्थिति में यदि भारत जैसे बहुत बड़े बाज़ार में चीन की पहुँच राष्ट्र के नाम पर कम होती है तो यह उसके व्यापारिक हितों के खिलाफ भी जाने वाला हो सकता है इसलिए ही चीन की तरफ से विशेषज्ञों ने स्टील आदि उद्योगों पर एंटी डंपिंग शुल्क लगाकर भारत द्वारा अपने उद्योगों की रक्षा करने की कोशिशें का विरोध भी शुरू कर दिया हैं. ऐसे में यदि आम भारतीय भी पाकिस्तान का आँख मूंदकर समर्थन करने के कारण चीन से नाराज़ होकर उसके यहाँ बनी वस्तुओं का उपयोग चरणबद्ध तरीके से बंद करना शुरू कर दे तो चीन के लिए एक बड़ा संकट भी खड़ा हो सकता है क्योंकि दुनिया भर में आर्थिक/ व्यापारिक गतिविधियां वैसे भी कम ही चल रही हैं तो उस परिस्थिति में चीन के लिए इतना बड़ा नया बाज़ार खोज पाना काफी मुश्किल भरा काम भी हो सकता है जिसके चलते वह भारत पर लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में दबाव बना सकता है.
                                       यह उचित भी है कि चीन का पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए भारत को सभी तरह के विकल्पों पर विचार करना आवश्यक है पर अति उत्साह में क्या हम अपने व्यापारियों का ही अहित नहीं करने जा रहे हैं ? उरी हमले के बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों में जिस स्तर पर भारत में पाक के खिलाफ आम लोगों का गुस्सा चरम पर है उसे कम करने के लिए ही सर्जिकल स्ट्राइक के भरपूर प्रचार के माध्यम से सरकार ने अपने प्रयास कर ही दिए हैं उसके बाद अब जिस तरह से भारत की जनता पाक और चीन के विरुद्ध किसी भी तरह के संबंधों पर पुनर्विचार के लिए अड़ सी गयी है तो उसमें सरकार के चाहने या न चाहने का कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है. दीवाली के लिए जिस तरह से व्यापारियों ने अपने गोदामों को चीन के सामान से भर लिया है और उसमें से बहुत सा हिस्सा खुदरा व्यापारियों तक पहुँच भी गया है उससे यह सन्देश समझना चाहिए कि चीन ने तो इसमें लाभ कमा लिया है पर अब बहिष्कार से केवल हमारे अपने लोगों को ही हानि पहुँचने वाली है. इस वर्ष भी थोड़ी मात्रा में ही सही अपने व्यापारियों का समर्थन और चीन का विरोध करते हुए आमलोगों को अपने लोगों के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए और जो चीनी सामान बाज़ार में उपलब्ध है उसकी खरीद पर उतनी सख्ती नहीं करनी चाहिए और व्यापारियों को भी यह समझना चाहिए कि अब चीन के सस्ते सामान के स्थान अपर कुछ मंहगा साबित हो रहा भारतीय सामान ही प्राथमिकता में रहने वाला है इसलिए आने वाले समय में उन्हें भी चीन के सामान से किनारा करने के बारे में गंभीरता से सोचना ही होगा.  
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बुधवार, 24 अगस्त 2016

अशांत कश्मीर और पाकिस्तान

                                                         पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े के चलते जम्मू कश्मीर देश के लिए आज़ादी के बाद से ही एक बड़ी समस्या के रूप में लगातार सामने आता रहा है क्योंकि पाकिस्तान को यह लगता है कि भारत के बंटवारे के समय जो नीति अपनायी गयी थी वह सही नहीं थी और कश्मीर में अधिक मुस्लिम आबादी होने के कारण पाकिस्तान का हिस्सा ही होना चाहिए भले ही वहां के शासक कुछ भी कहते रहें पर साथ ही वह गिलगित बाल्टिस्तान और बलोचिस्तान के लिए इस सूत्र को लागू नहीं करना चाहता जहाँ की जनता के लिए आज भी सामान्य जीवन जीना कठिन ही है. पाकिस्तान की राजनीति में सर्वाधिक प्रभावी पंजाबी समुदाय ने जिस तरह से सेना के साथ हर क्षेत्र में बढ़त बनायीं हुई है और वह आज भी अन्य क्षेत्रों और लोगों के दमन में लगा हुआ है उसके बाद उसके लिए कभी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समस्याएं भी खड़ी हो सकती हैं. पाकिस्तान के चीन को छोड़कर अपने किसी भी पडोसी से मधुर सम्बन्ध नहीं है और आज भी उसके साथ केवल यही तमगा काम करता है कि वह मुसलमानों के लिए अलग से बनाया गया राष्ट्र है जो मुस्लिम समुदाय के लिए सर्वोत्तम साबित हो सकता है पर अपने गठन के तीन दशक में ही इस्लाम के नाम पर बनाये गए इस राष्ट्र ने बांग्लादेश में अपनी बढ़त खो दी थी जब मुक्तिवाहिनी के संघर्ष और पाकिस्तान के दमन के चलते पूर्वी पाकिस्तान उससे अलग हो गया था.
                                            निश्चित तौर पर पाकिस्तान में सेना सबसे आगे है पर सैन्य समाधान सदैव सही नहीं हुआ करते हैं और देश को सही दिशा देने के लिए राजनैतिक पहल भी आवश्यक हुआ करती है. अमेरिका के सन्दर्भ में यदि गौर से देखा जाये तो पाकिस्तान से जिस दिन उसका मतलब समाप्त हो जायेगा और वह उसके काम आना बंद हो जायेगा तो वह नाटो और अन्य क्षेत्रीय संगठनों को साथ लेकर उसके वर्तमान स्वरुप को बिगाड़ने का काम भी आसानी से कर सकता है. वर्तमान रूप का अखंड पाकिस्तान केवल तब तक ही दुनिया के नक़्शे पर है जब तक उसके पास अमेरिका की शक्ति है और जब भी अमेरिका के हितों पर पाकिस्तान से सीधे चोट की जाएगी तो वह इसके टुकड़े करने से भी बाज़ नहीं आएगा यह बात पाकिस्तान की समझ में नहीं आ रही है. आने वाले समय में पाकिस्तान के सिमटते स्वरुप से जहाँ पश्चिमी देशों को आसानी होगी वहीं वे इसके लिए अपनी सुविधा के अनुसार मानवाधिकार की बातें करते हुए पाकिस्तान पर भी हमला करने से नहीं चूकेंगें. वैसे भी केवल इस्लाम और सेना के नाम पर ही पाकिस्तान एक है वर्ना आज वहां के हर क्षेत्र में बड़ा असंतोष आसानी से महसूस किया जा सकता है जो कभी भी एक राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान के लिए समस्या खड़ी कर सकता है.
                                        पूरी दुनिया जानती है कि पाकिस्तान के दावे को कश्मीर में सही नहीं माना जा सकता है सिर्फ इसलिये ही आज तक संयुक्त राष्ट्र से लगाकर किसी भी अन्य मंच से पाकिस्तान द्वारा यह मामला लगातार उठाये जाने के बाद भी उसे कोई मजबूत समर्थन या आश्वासन नहीं मिल पाया है जबकि अमेरिका उसकी आज़ादी के बाद से उसके साथ हर तरह की सुविधा और सहायता लेकर मौजूद रहा करता है. आने वाले समय में अराजक होते पाकिस्तान के खिलाफ उसका परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र होना ही बहुत बड़ा हथियार बन सकता है क्योंकि किसी एक बड़ी घटना के बाद पाकिस्तान के असुरक्षित परमाणु ज़खीरे को निष्क्रिय करने के लिए पूरी दुनिया में एक सहमति भी बन सकती है. भारत से पाकिस्तान की चाहे जितनी भी असहमति हो पर खुले तौर पर भारत के खिलाफ परमाणु हथियार का उपयोग करने के दुष्परिणाम से पाकिस्तान अच्छी तरह से वाकिफ है और वह जेहादियों को विभिन्न हथियारों की जानकारी देकर पश्चिमी देशों और अमेरिका के खिलाफ उन्हें उकसाने का काम करने में ही अपने हित भी देखता है. भारत यदि पाकिस्तान के अंदरूनी मामलों उसी तरह से हस्तक्षेप करने लगे जैसा पाकिस्तान किया करता है तो उसके लिए अपने अस्तित्व को बचाये रखना भी कठिन होने वाला है यह बात खुद पाकिस्तान की सेना और राजनेताओं के संज्ञान में है संभवतः इसलिए ही वे कश्मीर में हर तरह का परोक्ष समर्थन देकर उसकी आज़ादी की बातें किया करते हैं और कश्मीरियों को भड़काने का काम करते रहते हैं.
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गुरुवार, 26 नवंबर 2015

शीतकालीन सत्र और शंकाएं

                                                            भारतीय राजनीति में नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय पटल पर तीन दशकों बाद पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता सँभालने के साथ ही बहुत कुछ ऐसा भी होना शुरू हुआ जिसके चलते आज संसद में काम होने के स्थान पर गतिरोध अधिक रहा करता है क्योंकि खुद पीएम और उनके महत्वपूर्ण मंत्रियों की तरफ से जिस तरह से संख्या बल को लेकर अपनी बढ़त का ज़िक्र किया जाता रहता है उससे विपक्ष हमला करने के किसी भी अवसर को हाथ से नहीं जाने देना चाहता है और सत्ता पक्ष की तरफ से भी मामले को शांत करने लायक मंत्री और नेता काम करते हुए नहीं दिखाई देते हैं. सर्वदलीय बैठक की औपचारिकता को लेकर कल जिस तरह से दोनों ही पक्षों ने विभिन्न मुद्दों पर अपनी सीमायें खींच दी हैं वह इस बात की तरफ ही इशारा करता है कि यह सत्र भी कुछ बहुत महत्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय नहीं ले पायेगा. सदन को चलाने की ज़िम्मेदारी सरकार की होती है इसलिए ही कई बार सरकारों को सामान्य कामकाज को सुचारू ढंग से चलाये रखने के लिए विपक्ष के सामने बहुत सारे मुद्दों पर झुकते हुए काम करना पड़ता है जो कि सामान्य परिस्थितियों में कोई भी सरकार पसंद नहीं करती है.
                                 देश में आज़ादी के बाद से ही चुनाव होते रहते हैं और केंद्र में सरकारें भी चलती रहती हैं पर पिछले कुछ वर्षों में देश के बड़े नेताओं की तरफ से जिस तरह से चर्चा के स्तर को लगतार गिराया जा रहा है उसके बाद छोटे नेता भी उसी श्रेणी में जाते हुए दिखाई देने लगे हैं. आज देश के सामने आने वाले विभिन्न मुद्दों पर जिस तरह से सत्ता और विपक्ष में तनातनी बढ़ी रहती है और उसका सीधा असर सदन की कार्यवाही पर भी दिखाई देता है तो क्या सरकार को उससे सबक लेने की आवश्यकता नहीं महसूस होती है ? विमर्श और आरोपों का स्तर जितना व्यक्तिगत होता चला जाता है संवाद की संभावनाएं भी उतनी ही क्षीण हो जाती हैं क्योंकि तब नेताओं के मन में सदन के सञ्चालन से अधिक उनका अहम आगे आ जाता है जिसकी परिणीति हंगामे युक्त सत्र में होती है. क्या सरकार ने कुछ ऐसा तलाशने की कोशिश की है जिसके अंतर्गत वह देश के लिए किसी बड़े नीतिगत परिवर्तन से पहले गुणवत्ता परक विचार करने के बारे में सोचे और सदन में देश के नेताओं की समवेत कोशिश सभी को दिखायी दे ? संसदीय कार्यमंत्री के रूप में वेंकैय्या नायडू अभी तक पूरी तरह से विफल ही साबित हुए हैं क्योंकि जब बात फ्लोर मैनेजमेंट की आती है तो उनका विरोधी दलों के साथ कोई तालमेल नहीं दिखाई देता है इसके बाद भी वे पीएम को इस पद के लिए उपयुक्त लगते हैं और सरकार को समस्या झेलनी पड़ती है.
                          आज जब जीएसटी पर सरकार के हाथों से समय फिसलता जा रहा है तो जेटली के साथ अन्य नेताओं ने भी यह कहना शुरु कर दिया है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों से बात कर उनकी शंकाओं का निवारण भी किया जायेगा. क्या यह उचित नहीं होता कि इस मामले पर संसदीय समिति अपना काम लगातार ठीक से करती रहती और विभिन्न दलों के नेताओं की उपस्थिति में ऐसे प्रयास कर लिए जाते जो सदन में इस विधेयक को बिना किसी समस्या के ही पारित करवाने में मदद करते ? मोदी सरकार केवल आवश्यकता पड़ने पर काम चलाऊ तरीके से विपक्ष के साथ तालमेल चाहती है जो कि किसी भी परिस्थिति में सही नहीं कहा जा सकता है क्योंकि जब मन में एक दूसरे के प्रति विद्वेष चरम पर होता है तो देश का क्या नुकसान हो रहा है इसे देखने वाला कोई भी नहीं होता है अब सरकार को इस परिस्थिति को समझना चाहिए तथा विपक्ष को भी भाजपा की तरह विरोध करने की राजनीति के स्थान पर मुद्दों पर आधारित विरोध को प्राथमिकता देनी चाहिए. नीतियां देश के लिए बनती हैं और उसके लिए जितनी सरकार ज़िम्मेदार होती है उतना ही विपक्ष भी ज़िम्मेदार होता है क्योंकि परिपक्व लोकतंत्र में सभी की भूमिका से इंकार भी नहीं किया जा सकता है.  
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बुधवार, 11 नवंबर 2015

भाजपा में बे-असर अंदरूनी स्वर

                                                          सफलता के वाहक सभी होते हैं पर विफलताएं अपने आप ही ढोनी पड़ती हैं आज यह बात भाजपा में मोदी-जेटली-शाह की जोड़ी पर पूरी तरह से सही बैठती हुई नज़र आ रही है क्योंकि लोकसभा चुनावों के बाद बिखरे और हताश विपक्ष के चलते जिस तरह से कई राज्यों में भाजपा को लगातार सफलताएं मिलती रहीं उसके बाद इस तिकड़ी का वर्चस्व भाजपा और सरकार में बढ़ता ही चला गया था. जैसा कि पूर्वानुमान लगाया जा रहा था कि किसी भी स्तर पर बिहार में ब्रांड मोदी की आशा के अनुरूप प्रदर्शन न आने की स्थिति में भाजपा के वरिष्ठ अपनी तरफ से खुले विरोध को नहीं दबा पायेंगें आज लगभग वैसा ही दिखाई भी दे रहा है. इस पूरी कवायद में भाजपा में मोदी समर्थकों या विरोधियों के हाथों चाहे कुछ भी न आये पर देश का एक बड़ा नुकसान अवश्य ही होने वाला है क्योंकि जनता की तरफ से दिए गए स्पष्ट बहुमत का उतना लाभ देश को नहीं मिलने वाला है जितना मिल सकता था. कोई कुछ भी कहे पर सरकार चलने के कौशल में तो अभी तक मोदी उतने प्रभावशाली साबित नहीं हो पा रहे हैं जितना वे अन्य जगहों पर दिखाई देते हैं और संभवतः उनके इस कमी का लाभ पार्टी के वरिष्ठ और उनके विरोधी उठाना भी चाह रहे हैं.
                                       भाजपा में मोदी विरोधियों को एक बात समझनी ही होगी कि आज भी भाजपा में मोदी एक बड़ा ब्रांड हैं और देश में यह मानने वाले मोदी समर्थक बड़ी संख्या में हैं कि दिल्ली और बिहार में मुस्लिम ध्रुवीकरण के कारण ही मोदी की हार हुई है जबकि वास्तविकता केवल इतनी ही नहीं है और इसमें आगे भी बहुत कुछ आता है जिससे मोदी और पार्टी को अपने स्तर से ही निपटना भी होगा. निश्चित तौर पर भाजपा की राजनीति में अपने को मज़बूत करने के लिए ही मोदी ने वरिष्ठों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया पर मोदी की यही मानसिकता है कि वे अपने विरोधियों कोअभी तक इसी तरह से कुचलते रहे हैं तो क्या वरिष्ठ नेताओं के पास करने के लिए कुछ नहीं बचा है जो वे एक संख्या बल में मज़बूत पर वास्तविक रूप से परिणाम से पाने में कमज़ोर साबित हो रही भाजपा की मोदी सरकार पर हताशा में हमले करना शुरू कर चुके हैं ? इस तरह के बयांन और पार्टी में मोदी की स्वीकार्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले किसी भी नेता को आज की परिस्थिति में भाजपा का हितैषी तो नहीं माना जा सकता है वे हमलावर इसलिए भी हैं क्योंकि मोदी से उन्हें वह सब नहीं मिल रहा है जो भाजपा की सरकार आने के बाद उन्होंने अपना हक़ समझ रखा था.
                                   एक बात मोदी के सन्दर्भ में और भी महत्वपूर्ण साबित होने वाली है कि क्या वे इस तरह की परिस्थिति से तालमेल बिठाने की कोशिश करेंगें या वे अपनी शैली को ही आगे बढ़ाते रहेंगें ? मोदी का दोहरा रवैया ही आज उनके लिए संकट बन चुका है क्योंकि वे जानते हैं कि गुजरात के २००२ के मोदी की स्वीकार्यता आज भी भारत के अधिकांश जन मानस में नहीं है और यदि मोदी का वह स्वरूप सामने आता है तो उनकी अंतर्राष्ट्रीय छवि को भी बड़ा धक्का लग सकता है. बिहार चुनावों में मोदी की तरफ से संभवतः यही सबसे बड़ी गलती रही है कि जिन मुद्दों पर उन्हें खुलकर अपनी राय रखनी चाहिए थी वे चुनावी रैलियों में इस उम्मीद से उन पर नहीं बोले कि शायद इससे उनके वोट बढ़ सकते हैं पर कुछ मौकों पर उन्होंने अस्पष्ट रूप से अपनी राय भी रखी जो शायद उस वोटर को उनसे जोड़े नहीं रख पायी जो उनके पक्ष में जाना चाहता था. कट्टर राजनीति और मध्यमार्ग में भारतीय जन मानस आमतौर पर मध्य मार्ग को ही चुनता है यह बात इस चुनाव से स्पष्ट हो गयी है क्योंकि अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस के मुकाबले हर राज्य में पहुँचने की कोशिश कर रही भाजपा के कट्टर रवैया कितना विपरीत असर डाल सकता यह उन सीटों से पता चल गया है जिन्हें कांग्रेस की कमज़ोर स्थिति के चलते नितीश लालू ने सौंप दिया था पर शहरी वोटर्स ने भी भाजपा से दूरी बनाकर वहां पर हाशिये पर पड़ी हुई कांग्रेस के लिए चौंकाने वाले परिणाम दे दिए हैं जो कि अन्य जगहों पर भाजपा के लिए बड़ा सरदर्द भी साबित हो सकती है.
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बुधवार, 12 अगस्त 2015

जीएसटी, ललित मोदी और दलीय राजनीति

                                                 देश में आर्थिक सुधारों के साथ विभिन्न मुद्दों पर जिस तरह से सदैव ही राजनीति की जाती रहती है वह अब और भी निचले स्तर पर पहुँचती हुई दिखाई दे रही है क्योंकि देश की साख बढ़ाने के लिए शुरू किये गए जिन प्रयासों के कारण कभी भाजपा मनमोहन सरकार पर हमलावर रहा करती थी आज उनमें कुछ प्रावधानों को जन विरोधी बताते हुए कांग्रेस भी उसी तरह से विरोध कर रही है. सबसे मज़ेदार बात यह है कि जनता की सेवा करने के लम्बे चौड़े दावे करने वाले देश के दोनों ही बड़े दल आज एक जैसी घटिया राजनीति में उतरते हुए दिखाई देते हैं और चिंताजनक यह बात है कि देश की संसद को कुछ सांसद कभी भी इस तरह से गिरवी रख लिया करते हैं जिसका कोई मतलब नहीं होता है. जैसा कि सभी जानते हैं कि लोकतंत्र में सदन सुचारू रूप से चल सके इसके लिए सरकार को बड़ी ज़िम्मेदारी भी निभानी पड़ती है और कल सदन में हुई घटनाओं के बाद जिस तरह से सदन के वरिष्ठतम सदस्य लाल कृष्ण आडवाणी ने खुद को आहत महसूस किया वह भी सरकार के लिए संभवतः कोई मायने नहीं रखता है क्योंकि आडवाणी ने हंगामा देखकर स्पष्ट रूप से सदन से बाहर यह भी कहा कि नायडू से कहिये कि सदन स्थगित करवाएं तो इससे सरकार की स्थिति का अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है.
                                       आर्थिक सुधारों पर पहले जिस तरह से भाजपा हर बात का अनावश्यक विरोध किया करती थी आज अपने बिलों में किये गए कुछ बड़े परिवर्तनों के चलते कांग्रेस भी वही काम करने में लगी है. क्या इस समस्या का समाधान खोजा जा सकता है जिसमें सदन भी चल सके और सरकार तथा विपक्ष आवश्यक विधायी कार्यों को भी निपटाने में सफल हो सकें क्योंकि दलीय राजनीति में देश का नुकसान नहीं होना चाहिए यह बात सरकार और विपक्ष को समझनी ही होगी. भाजपा ने मनमोहन सरकार के समय इस तरह की हरकतें अनगिनत बार की थीं और इस बार ललित मोदी, व्यापम को लेकर जब विपक्ष के पास बड़ा मुद्दा है तो वह इसके बहाने से ही सरकार पर दबाव बनाने की कोशिशें करने में लगा हुआ है. सरकार में मुखिया मोदी को जिस तरह से केवल अपनी बात कहने का शौक है और वे किसी अन्य की कोई बात सुनना ही नहीं चाहते हैं तो सरकार में उसका असर दिखाई देना अवश्यम्भावी ही है और सरकार का संसदीय कार्य मंत्रालय भी मोदी की राह पर चलते हुए अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभा पाने में पूरी तरह से असफल ही साबित हुआ है. सरकार ललित मुद्दे पर सीधे चर्चा करना चाहती है जबकि विपक्ष कार्य स्थगन प्रस्ताव के साथ अपनी बात कहना चाहता है यदि सरकार की तरफ से थोड़ी समझदारी दिखाई जाती तो यह इतना बड़ा मुद्दा ही नहीं बन पाता.
                                    पिछले वर्ष के आम चुनावों में बुरी तरह से हारने के बाद और केवल ४४ सांसदों के दम और विपक्ष के साथ बेहतर सामंजस्य के चलते कांग्रेस ने सदन में काफी हद तक अपना वजूद फिर से बना लिया है और अब इस बात का राजनैतिक लाभ उठाने के लिए वह तैयार भी दिखाई देती है. प्रचंड बहुमत के बाद मोदी की सबसे बड़ी गलती यही रही कि उन्हें यह लगा कि अब वे देश को गुजरात की तरह निरंकुश होकर चला सकते हैं जबकि केंद्रीय स्तर पर कब मित्र दूर हो जाएँ और दूर से कोई नया दल आकर मित्र बन जाये कोई नहीं जानता है. कांग्रेस और भाजपा की रणनीति का अंतर सदन में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है क्योंकि कांग्रेस के अनुभवी नेताओं ने अपने अनुभव के दम पर सरकार के लिए लगातार मुश्किलें खड़ी करने में सफलता पायी है वहीं भाजपा की युवा ब्रिगेड एक तरह से बेहतर तालमेल न होने के कारण भ्रमित सी दिखाई देती है और संभवतः देश के इतिहास में पहली बार इतना शोर करने वाला सत्ता पक्ष दिखाई दे रहा है यह तब हो रहा जब मोदी को बहुत सख्त प्रशासक माना जाता है ? क्या इस तरह की छोटी छोटी घटनाओं से मोदी सरकार अपनी कमज़ोरी को छिपाने का प्रयास करती हुई नज़र नहीं आ रही है जो उसके पास अनुभव की कमी के चलते पैदा हो रही है पर अब देशहित में सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है जिससे देशहित में सही निर्णय लिए जा सकें.      
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मंगलवार, 21 जुलाई 2015

संसद का मानसून सत्र

                                                               आज से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में जिस तरह से पूरी अराजकता दिखाई देने की संभावनाएं बनती जा रही हैं उससे यही लगता है कि इस बार भी महत्वपूर्ण संसदीय कार्यों को कर पाने में सरकार को कड़ी मेहनत करनी पड़ सकती है. अभी तक जिस तरह से जीएसटी बिल पर कमोबेश सहमति बनती दिखाई दे रही है उससे यही लगता है कि यह महत्वपूर्ण विधेयक इस बार पारित हो सकता है पर लैंड बिल पर अभी भी गतिरोध बने रहने की संभावनाएं है अभी तक लैंड बिल के पास न होने के चलते संभवतः सरकार चौथी बार इस विधेयक को सदन में ला सकती है. लैंड बिल के ठन्डे बस्ते में जाने के संकेत इस बात से भी मिलते हैं कि लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन का भी बयान आया है कि संयुक्त संसदीय समिति का कार्यकाल अगस्त तक बढ़ा दिया गया है जिससे यही लगे कि अभी भी विमर्श की स्थिति बनी हुई है. सरकार के नीति आयोग में इस मुद्दे पर सहमति बनाने के प्रयास के विफल होने के बाद अब इसे राज्यों के भरोसे ही छोड़े जाने की संभावनाएं दिखाई देने लगी हैं जिससे एक केंद्रीय मज़बूत कानून की संभावनाएं और भी क्षीण हो सकती हैं.
                                             एक तरफ जहाँ राज्यों के क्षेत्रीय दल केंद्र सरकार की राज्य सभा में कमज़ोर स्थिति और अपनी अखिल भारतीय उपस्थिति न होने के चलते केवल अपने राज्यों से जुड़े हुए मुद्दों पर ही केंद्र से सौदेबाज़ी करना चाहते हैं वहीं अपनी खोयी हुई ज़मीन को तलाश रही कांग्रेस लगभग हर राज्य से जुड़े मुद्दों को लेकर सामने आने वाली है जिसमें व्यापम घोटाला केंद्र का सबसे बड़ा सर दर्द साबित हो सकता है क्योंकि इसमें अभी तक दोषियों को पूरी तरह से खोजा भी नहीं जा सका है पर अन्य राज्यों के छात्रों को हिरासत में लिए जाने और उन मसलों में कुछ खास न मिलने से विपक्षी दल भी सरकार को घेरने का काम कर सकते हैं. ललित मोदी इस मामले में दूसरा बड़ा गतिरोध साबित हो सकते हैं क्योंकि जब तक उस पर सदन में खुद सुषमा स्वराज का बयान नहीं आता तब तक विपक्ष इस मुद्दे को हवा देने से नहीं चूकने वाला है और सरकार की कोशिश यही रहने वाली है कि विदेश मंत्री अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए अपना बयान सदन में जल्दी से जल्दी दे सकें जिससे सदन को चलाने में मदद मिल सके. दिल्ली पुलिस और केजरीवाल सरकार के विवाद का वैसे तो कोई असर सदन पर नहीं पड़ेगा पर यह समय समय पर सरकार के लिए सदन के बाहर चिंता का विषय बना रह सकता है.
                                         पिछले कुछ वर्षों से सदन में किसी भी आरोप के सामने आने पर जिस तरह से सरकार और विपक्ष में अनावश्यक तनातनी देखने को मिलती है अब उसकी जगह मुद्दों पर देश हित में आम सहमति की तरफ बढ़ने के प्रयास किये जाने चाहिए जिससे विकास के मोर्चे पर देश में लगातार विमर्श की प्रक्रिया चलती रहे. हमारा लोकतंत्र दुर्भाग्य से अभी उतना परिपक्व नहीं हुआ है जहाँ असहमति को मुद्दों पर छोड़कर देश हित में व्यापक चर्चा शुरू की जा सके. आज भी छोटे छोटे मुद्दों पर संसद से लगाकर राज्यों की विधानसभाओं के सदन बाधित होते रहते हैं जिनसे निपटने के लिए सरकार के पास कोई विकल्प भी नहीं हैं क्या आज सरकार के साथ विपक्ष को भी यह सोचने की आवश्यकता नहीं है कि देश के लिए आवश्यक नीतिगत परिवर्तन करने के लिए एक सतत प्रक्रिया की आवश्यकता है ? क्या सदन का सत्र चलते रहते समय ही इन मुद्दों पर बातचीत होनी चाहिए जैसा कि अभी तक किया जाता है या फिर इन मुद्दों पर सरकार को लोकसभा और राज्य सभा टीवी पर लगातार सजीव चर्चा करते रहने पर सहमत होना चाहिए जिससे विभिन्न मुद्दों पर क्या चल रहा है यह सम्बंधित पक्ष भी जान सकें और अपने बहुमूल्य सुझाव भी समितियों या सरकार तक भेज सकें.     
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शुक्रवार, 13 मार्च 2015

विधि आयोग और चुनाव सुधार

                                                                                           देश में चुनाव आयोग के हाथों में चुनाव को और भी अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने के साथ अन्य समस्याओं पर जिस तरह से विधि आयोग ने सुझाव दिए हैं यदि उन पर अमल किया गया तो आने वाले समय में आम जनता के लिए चुनाव और भी अधिक सरल हो जाने वाले हैं. सबसे महत्वपूर्ण सुझाव निर्दलीयों को चुनाव लड़ने से रोकने के बारे में है क्योंकि जब तक केवल किसी व्यक्ति विशेष के वोटों को ख़राब करने की नेताओं की नियति पर पूरी तरह से रोक नहीं लगायी जा सकेगी तब तक चुनावों की पवित्रता संदेह से पर नहीं हो पायेगी. आज कई स्थानों पर सिर्फ किसी को हराने के लिए उसकी जाति, धर्म और समान नाम के लोगों को विरोधियों द्वारा चुनाव में उतार दिया जाता है जिसके बाद वोटों के बंटने की संभावनाएं बढ़ जाती हैं और कई बार इस सबसे महत्वपूर्ण लोग चुनाव हार भी जाया करते हैं. हालाँकि इस तरह से चुनाव लड़ने के इच्छुक लोगों के लिए जिस तरह से प्रक्रिया कठोर की जा सकती है वह किसी भी व्यक्ति के चुनाव लड़ने के अधिकार की रक्षा करते हुए अनावश्यक उम्मीदवारों की भीड़ को काम करने का काम करने वाली है. चुनाव आयोग के पास पंजीकरण कराने के बाद कोई भी चुनाव लड़ सकता है ज़ाहिर है कि इस तरह से केवल गंभीर लोग ही चुनाव के लिए आगे आयेंगें और अन्य लोग स्वतः ही मैदान से हट जायेंगें.
                                 दूसरे महत्वपूर्ण सुझाव की आज बहुत ही आवश्यकता है क्योंकि आज कई नेता कई जगहों से चुनाव में खड़े हो जाते हैं और जीतने के बाद वे एक जगह से त्यागपत्र दे देते हैं जिससे दुबारा चुनाव करने की व्यवस्था करनी पड़ जाती है चूंकि उप चुनाव जल्दी ही करने पड़ते हैं तो उस स्थिति में इस खर्चे से बचने के लिए दो जगहों से चुनाव लड़ने पर पूरी तरह से रोक लगाने की बात कही गयी है पर इसके लिए नेता आसानी से राज़ी नहीं होने वाले हैं क्योंकि कई बार हार की संभावनाओं या फिर अपनी पार्टी के पक्ष में माहौल बनाये रखने के लिए भी बड़े नेता दो जगहों से चुनाव लड़ा करते हैं. दोबारा चुनाव के खर्चे को बचाने के लिए एक काम और भी किया जा सकता है कि दूसरे स्थान पर आने वाले व्यक्ति को यदि कुल पड़े वोटों या जीतने वाले व्यक्ति के वोटों के आधे से अधिक वोट मिलें तो उपचुनाव की जगह उसे विजयी घोषित कर दिया जाना चाहिए और यदि दूसरे स्थान पर आने वाले व्यक्ति को बहुत काम वोट मिले हों तो जीतने वाले व्यक्ति की पार्टी को यह अधिकार दे दिया जाना चाहिए कि वह उसके स्थान पर किसे नामित करना चाहती है जो सदन में पार्टी का प्रतिनिधित्व कर सके.
                          देश में जाति, धर्म, क्षेत्र और अन्य तरह के बंधनों से मुक्त चुनाव कराने के लिए चुनाव केवल पार्टी सिंबल पर भी लड़ने के बारे में सोचा जा सकता है क्योंकि यदि निर्दलीय मैदान में नहीं होंगें तो चुनावों को पार्टी के स्तर पर लड़ने में कोई दिक्कत भी नहीं होने वाली है. जिस स्थान से जिस पार्टी को सर्वाधिक वोट मिलें वहां से पार्टी द्वारा नामित व्यक्ति को सदन में भेजने के लिए नामित किया जा सकता है. देखने में यह प्रक्रिया पेचीदा लग सकती है पर देश की राजनीति में जाति, समाज, धर्म, भाषा आदि के पचड़ों से दूर होकर सभी नेता अपने दल विशेष के लिए वोट मांगते नज़र आने वाले हैं जिससे समाज में समरसता बढ़ सकती है और जिस तरह का विद्वेष चुनाव से पूर्व और पश्चात दिखाई दे जाता है वह भी स्वतः ही कम हो जायेगा क्योंकि किसी भी नेता को यह पता ही नहीं चल पायेगा कि उसके यहाँ से चुनाव में किसे नामित किया गया है. चुनाव आयोग के पास इस तरह की पूरी सूची भी पार्टियों द्वारा चुनाव से पहले ही जमा की जा सकती है जिसमें जीतने पर किस व्यक्ति को प्रमाणपत्र दिया जायेगा या फिर कौन से व्यक्ति को नामित किया जायेगा. यदि इस तरह का आमूल चूल परिवर्तन किया जा सके तो चुनाव के कारण फैलने वाले विद्वेष को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है और चुनावों को समस्या नहीं बल्कि समाधान के तौर पर भी देखा जा सकता है.  
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बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

आतंक - अमेरिका,पाक और भारत

                                                           भारतीय मीडिया में बेहद सफल बताये जा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के जनवरी दौरे के बाद जिस तरह से ओबामा ने पाकिस्तान को फिर से अपना आतंक के खिलाफ वैश्विक युद्ध में करीबी सहयोगी बताने की कोशिश की है वह कहीं से भी भारत को रास नहीं आने वाली है. सामान्य बजटीय प्रावधानों को बहुत पीछे छोड़ते हुए जिस तरह से ओबामा ने अपने भारत दौरे के बाद चिढ़े हुए पाक के सामने प्रस्तावित धनराशि से छह गुना धनराशि आवंटित किये जाने के बारे में कहा है उससे भारत की उस चिंता को पूरी तरह अनदेखा किये जाने के सन्देश के रूप में ही देखा जाने वाला है. भारत सदैव ही अमेरिका के इस तरह के आवंटन का यह कहकर विरोध किया करता है कि पाक इसका दुरूपयोग भारत के खिलाफ आतंकी कार्यवाही करने में ही किया करता है और सीमा पार से आतंकियों के लिए हर संभव मदद भी करने में इसी सैन्य और असैन्य धनराशि का जमकर इस्तेमाल किया करता है. ओबामा के इस कदम से जहाँ भारत के लिए एक नयी चिंता सामने आई है वहीं पाक ने भारत पर वरीयता पाते हुए अमेरिका की नज़रों में अपनी महत्ता फिर से साबित कर दी है.
                                                      इस प्रस्ताव के मंज़ूर होने में इसलिए भी कोई संदेह नहीं है क्योंकि ओबामा इस मसले पर आसानी से अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल कर मंज़ूर कर सकते हैं और भारत इसमें केवल अपने सहयोगी लोगों के माध्यम से विरोध का सन्देश ही पहुंचा सकता है. अच्छा होता कि इस मामले पर भारत सरकार की तरफ से एक अधिकृत प्रतिक्रिया भी सामने आती जिसमें स्पष्ट रूप से यह कहा जाता कि भारत को पाक से उसके विरुद्ध चलाये जा रहे आतंकी अभियानों के चलते इस तरह की किसी भी सहायता से घोर आपत्ति है पर संभवतः भारत सरकार अभी दिल्ली चुनावों में ही उलझी हुई है और उसे दिल्ली में पूरी ही दुनिया दिख रही है जबकि हमारे पीएम खुद को ओबामा का बहुत करीबी बताते हैं तो इस मसले को उन्होंने किस तरह से अमेरिकी प्रशासन के सामने रखा है यह भी जनता को बताया जाना चाहिए. पीएम की भारत के हक़ में बोलने या विदेश मंत्रालय के स्तर पर कुछ भी न कहे जाने से आखिर जनता को क्या सन्देश दिया जा रहा है ? पहले हर मामले में चिल्लाने वाली भाजपा तक ने इस मसले पर सरकार से कोई मांग नहीं की है जो कि चिंताजनक स्थिति है.
                                                इस तरह के मामलों में भारत के आधिकारिक रुख को सरकारी स्तर पर दृढ़ता से दोहराये जाने की भी आवश्यकता है क्योंकि जब तक भारत की तरफ से कुछ विरोध नहीं किया जायेगा तब तक अमेरिका को इसका सही आभास नहीं होने वाला है. आखिर क्या कारण है कि अमेरिका की तरफ से इन मसलों पर कुछ भी कहने से पहले भारत के पक्ष की पूरी तरह से अनदेखी की जा रही है और हमारी सरकार की तरफ से कोई भी बयान तक जारी नहीं किया जा रहा है ? इस मामले पर विपक्षी दलों द्वारा चुप्पी साधे जाने को भी सही नहीं ठहराया जा सकता है क्योंकि उनकी तरफ से इस मसले को उठाने से जहाँ सरकार को देश के सामने असहज स्थिति का सामना करना पड़ सकता है वहीं उस पर कोई बयान जारी करने का दबाव भी बन सकता है. पीएम की ओबामा के साथ की निकटता किस तरह से भारत के हितों के खिलाफ जा रही है और वे इन मसलों पर पूरी तरह से चुप्पी लगाये हुए हैं यह भी देश की बदलती विदेश नीति का ही कोई हिस्सा लगती है या फिर ओबामा के साथ किये गए किन्हीं वायदों के तहत पीएम ने इन मसलों को अनदेखा कर चुप्पी ओढ़ रखी है. 
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सोमवार, 26 जनवरी 2015

राष्ट्रपति का सम्बोधन और सरोकार

                                                  गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर परंपरागत राष्ट्र के नाम सन्देश में जिस तरह से एक मंझे हुए नेता और लम्बे राजनैतिक जीवन के साक्षी रहे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश के हर मुद्दे को बहुत ही सामान्य ढंग से छूने की कोशिश की वहीं इसे एक तरह से देश के नागरिकों के लिए एक बहुत ही अच्छे रूप में अपनाने का आह्वाहन भी किया. राजनैतिक मामलों में जहाँ देश की जनता द्वारा तीस वर्षों बाद एक पूर्ण बहुमत की सरकार का ज़िक्र किया वहीं दूसरी तरफ सरकार को भी विधायिका का पाठ भी पढ़ाया क्योंकि पूर्ण बहुमत की सरकार के लिए ज़िम्मेदारियों अधिक हो जाती हैं और निर्णय लेने में उसकी शक्ति का सही दिशा में उपयोग भी आवश्यक होता है. एक बार फिर से जहाँ उन्होंने सत्ता पक्ष को अध्यादेशों के माध्यम से महत्वपूर्ण निर्णयों को करने से बचने की सलाह दी वहीं विपक्ष के लिए भी उनकी स्पष्ट नसीहत थी कि उसे भी देश हित में सहयोग की तरफ बढ़ना सीखना चाहिए और विधायिका की विशिष्टता को बनाये रखने के बारे में अपनी स्थिति को बनाये रखना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों का ही एक जैसा महत्व होता है.
                          वाणी के संयम को मुखर्जी ने गांधी जी के प्रसंग के माध्यम से भी समझाने का प्रयास किया की हमें उनके उस उपदेश को याद रखना चाहिए जिसमें उन्होंने यह कहा था की आँखें खुली रहनी चाहिए और ज़ुबान बंद. वाणी में संयम न बरतने से ह्रदय को चोट लगती है और उससे पार पाना मुश्किल होता है इसलिए देश में सभी को अपनी वाणी पर संयम भी रखना चाहिए. भारतीय संविधान को एक पवित्र पुस्तक बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि इसमें भारत की बहुलतावादी संस्कृति को बनाये रखने के लिए पूरे प्रयास किये गए हैं और उन पर चलने से देश का ही कल्याण होना है तथा विद्वेष को फैलने से रोका जा सकता है. धर्म के दुरूपयोग से आज पूरे विश्व में किस तरह से समस्याएं बढ़ रही हैं यह रेखांकित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की सौम्य शक्ति ही भारत की विशिष्टता है और जब तक हम इस सौम्यता के साथ खड़े हैं तब तक हम पूरे विश्व से अलग ही दिखाई देने वाले हैं. आज धर्म को लेकर जिस तरह का असंयम देश में कुछ लोगों द्वारा दिखाया जा रहा है उन्हें उन देशों कई हालत से सबक लेना चाहिए जो धर्म के दलदल में फंस चुके हैं.
                           देश के विकास और स्वच्छता के अभियान को जनांदोलन बनाये जाने के लिए उन्होंने १९०१ में महात्मा गांधी के पहले भारत दौरे का उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के बाद जब वे रेपोन कॉलेज में एक समारोह में गए तो उन्हें यह देख कर बहुत बुरा लगा कि आने वाले लोगों ने स्थान को बहुत गन्दा कर दिया है इससे क्षुब्ध होकर उन्होंने खुद ही झाड़ू उठा ली और सफाई में जुट गए उनके इस तरह से सफाई करने से जहाँ देखते ही देखते पूरा स्थल साफ़ हो गया वहीं एक संदेश भी आम लोगों तक पहुंचा कि हमें इस तरह के कामों के लिए सतर्कता के साथ काम करना चाहिए और गंदगी से बचना चाहिए तथा खुद ही सफाई को हर स्तर पर प्राथमिकता देनी चाहिए. आज इतने लम्बे अरसे बाद चल रहे स्वच्छता अभियान को भी आम लोगों को इस संदर्भ में ही लेने की आवश्यकता है जिससे पूरे माहौल को बेहतर बनाया जा सके. इसके साथ ही उन्होंने पुस्तकों के अध्ययन को कक्षाओं से आगे बढाकर जन सामान्य तक पहुँचाने का आह्वाहन भी किया क्योंकि अध्ययन से बहुत कुछ पाया जा सकता है और लोगों की सोच को भी बदला जा सकता है.   
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शनिवार, 17 मई 2014

नरेंद्र मोदी का युग

                                              देश ने आम चुनावों में जिस तरह से मोदी के नेतृत्व में भाजपा को पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ अन्य दलों के लिए एक बड़ा सबक भी छोड़ा है उससे यही लगता है कि आने वाले समय में देश की राजनीति में परिवर्तन आने की संभावनाएं सामने आने लगी हैं. अभी तक जिस तरह से परंपरागत तरीके से वोट मांगने और अपनी गोटियां बिठाने का काम सभी राजनैतिक दल किया करते थे उसके बाद विकास और बदलाव के नाम पर वोट मांगना और देना काम महत्वपूर्ण नहीं रहा करता था. देश के राजनैतिक दृश्य में जिस तरह से भाजपा ने परंपरागत चुनावी तरीकों के साथ विकास को भी महत्व दिया और गुजरात के विकास को एक मॉडल के रूप में जनता के सामने रखने में सफलता भी पायी उससे यही लगता है कि अब जनता में बढ़ने वाले युवा वोटर्स की नज़रें सभी पर रहा करती हैं और वे उन मुद्दों पर भी गंभीरता के साथ विचार कर सकते हैं अभी तक जिन्हें भारतीय राजनीति में केवल पर्दे के पीछे ही स्थान मिला करता था.
                            इस चुनाव के बाद राजनैतिक विश्लेषक जहाँ अपने स्तर से मुद्दों को तलाशने वाले हैं वहीं पूर्वाग्रह से ग्रसित कुछ लोग अपने आप में अभी से भाजपा और नरेंद्र मोदी पर हमले करने से बाज़ नहीं आ रहे हैं. देश में लोकतंत्र सर्वोपरि है और यह भी सही है कि कुछ दलों द्वारा सदैव लोगों की भावनाओं का शोषण करके ही वोट बटोरने की प्रक्रिया को संपन्न किया जाता रहा है पर इस बार जिस तरह से स्थानीय और अगड़े पिछड़ों के साथ अन्य समीकरण भी मोदी के आगे छोटे पड़ते चले गए उनसे भारतीय जनमानस में परिवर्तन की चाह भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है. देश में आज भी बहुत से ऐसे राजनैतिक दल हैं जो अपनी मौजूदगी को दूसरे दल पर केवल हमलावर रहकर ही बचाने की कोशिशें किया करते हैं और इस स्थिति में जब तक सकारात्मक राजनीति को बढ़ावा नहीं दिया जायेगा तब तक माहौल को सुधारने में मदद नहीं मिल सकती है.
                            अभी तो मोदी ने भाजपा को सत्ता तक पहुँचाया ही है और उनके पास अपनी पारी शुरू कर काम करने का पूरा अवसर भी है तो अभी से उन पर प्रश्नचिन्ह लगाने वालों को नैतिक रूप से इसका कोई अधिकार नहीं मिला हुआ है क्योंकि जनता ने मोदी के बारे में सब कुछ जानते हुए ही उन्हें इतना प्रचंड बहुमत सौंपा है तो लोकतंत्र में जनता के फैसले पर सवाल लगाने का अधिकार किसी को भी नहीं है. जनता ने इस परिवर्तन को जिस चाह से किया है अब उसे भी धरातल पर परिवर्तन महसूस होने के लिए प्रतीक्षा की आवश्यकता है क्योंकि देश राष्ट्र और समाज से जुड़े किसी भी मसले पर स्थायी परिवर्तन दिखने में समय लगा करता है. मोदी को पहले सरकार बनाकर अपनी प्राथमिकताएं और स्वयं की तरफ से उसकी समय सीमा निर्धारित करने के बाद ही उन पर किसी मसले को लेकर विरोध करने का मतलब बनता है. खुद मोदी की तरफ से यह सकारात्मक संकेत दिए जा चुके हैं कि वे सरकार चलाने में सभी का सकारात्मक सहयोग चाहते हैं तो किसी पूर्वाग्रह से उन पर हमले का कोई मतलब नहीं बनता है और अब जब लोकसभा में कोई आधिकारिक विपक्षी दल नहीं होगा तो उस स्थिति में सदन के नेता होने के नाते मोदी पर सदन की गरिमा बनाये रखने की और भी ज़िम्मेदारी आने वाली है. जनता ने उन्हें समय दिया है तो देशहित में विरोधी दल के नेताओं को भी सदन के अंदर और बाहर भी शालीनता से उनके युग को समझने का प्रयास करना चाहिए.
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रविवार, 11 नवंबर 2012

महिलाएं और राजनीति

            सपा प्रमुख मुलायम सिंह के महिलाओं के सम्बन्ध में दिए गए एक बयान के बाद उससे उत्पन्न होने वाली समस्याएं कम होने का नाम ही नहीं ले रही हैं. यह पहले से ही सपा की घोषित नीति है कि महिलाओं को राजनीति में अधिक आरक्षण नहीं मिलना चाहिए और इसके तहत ही पार्टी संसद और विधान सभाओं में ३३ % आरक्षण के बिल का शुरू से ही विरोध करती रही है. पार्टी की नीतियां किसी के पक्ष या विपक्ष में झुकी हुई हो सकती हैं पर महिलाओं के लिए किसी भी तरह के इस तरह के बयान को आसानी से स्वीकार नहीं किया जा सकता है. मुलायम मंझे हुए राजनेता हैं अगर उन्होंने यह सब कहा है तो इसके पीछे भी उनकी सोची समझी रणनीति ही होगी क्योंकि समाजवादी विचारधारा के होने के साथ ही गाहे बगाहे विवादस्पद बयान देना अब नेता जी की आदत बन चुकी है. कभी महिला आरक्षण बिल के विरोध में संसद में पहुँचने वाली महिलाओं को देखकर लोगों के सीटी बजाने वाले बयान से भी इसी तरह का विवाद हो चुका है.
      यहाँ पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सपा प्रमुख खुद पानी बहू को चुनावों में उतारने से कभी नहीं चूकते हैं पर जब अन्य महिलाओं की बात होती है तो उन्हें इस पूरे प्रस्ताव पर ही परेशानी होने लगती है. कहीं ऐसा तो नहीं कि नेता जी अपनी पार्टी के लोगों को अच्छी तरह से जानते हैं तभी उन्होंने यह कहा हो कि संसद में महिला सदस्यों को देखकर उनके सांसद ही सबसे ज्यादा सीटियाँ बजा सकते हैं ? देश में आज भी इस तरह की विचारधाराएँ पनप रही हैं जो विकास के इस दौर में महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकने का काम करते रहना चाहती हैं जिससे महिलाओं की भागीदारी को सुनिश्चित करने के बारे में संविधान के अनुसार काम करने में समस्या उत्पन्न हो रही है. खुद अखिलेश सरकार और नेताजी की मंशा इस मुद्दे पर अलग अलग दिखती है क्योंकि अभी हाल ही में अखिलेश सरकार ने ग्राम सभाओं और अन्य निकायों में महिलाओं के स्थान पर उनके पतियों या अन्य रिश्तेदारों के काम करने पर सख्ती से रोक लगाने के आदेश जारी किये हैं ?
              महिलाओं में आकर्षण हो न हो पर उनमे ज़िम्मेदारी हमेशा से ही कूट कूट कर भरी होती है इसके लिए न तो उन्हें किसी संस्था में प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता होती है और न ही उन्हें किसी नेता से कोई प्रमाणपत्र प्राप्त करने की आवश्यकता होती है. जो गुण प्रकृति ने महिलाओं में जन्मजात ही दिए हैं उन नारी सुलभ गुणों को किसी भी ऊंचे पद पर पहुंची हुई किसी भी महिला में आसानी से देखा जा सकता है. जिन स्थानों पर महिला अधिकारी होती हैं वहां पर भ्रष्टाचार कम होता है और यह भी हो सकता है कि कमीशन लेकर सांसद/ विधायक निधि को बांटने वाले माननीयों से ये महिला सदस्य कम भ्रष्टाचार करती हों ? जब हर स्थान पर महिलाओं के स्वाभाव ही उनके आकर्षण का कारण हैं तो फिर किस आकर्षण की बात नेता जी ने की है ? कुछ भी कह कर मीडिया पर यह आरोप जड़ देना कि उसने बयान का गलत अर्थ लगाया है अब भारतीय नेताओं के बड़बोले पन को ही साबित करता है और साथ ही यह भी दिखाता है कि किसी भी उच्च पद पर पहुँच जाने के बाद भी पुरुष प्रधान समाज की ग्रंथि दिल से नहीं निकल पाती है.     
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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

"४९ ओ" की वास्तविकता

देश के संविधान ने मतदाताओं को "४९ ओ" के अंतर्गत किसी भी प्रत्याशी को न चुन कर उन्हें नकारने का अधिकार दे रखा है कल यूपी के प्रथम चरण के मतदान में जब सीतापुर जनपद की लहरपुर विधानसभा १४८ की १८ संख्या सूची के १०१६ पर पंजीकृत मतदाता के रूप में जब मैंने कल इस अधिकार का उपयोग करने का प्रयास किया तो पीठासीन अधिकारी द्वारा दिया उत्तर अप्रत्याशित था. उन्होंने मुझे सलाह दी कि क्यों चक्करों में पड़ रहे हो अपना वोट डाल दो और हमें भी अपना काम करने दो. सबसे पहले उन्होंने इस नियम से ही अनभिज्ञता दिखाई और मुझसे पूछा कि वोट डालना हो तो ईवीएम को ऑन करूँ ? मेरे द्वारा मना करने पर उन्होंने कहा कि वे ईवीएम का प्लग निकल कर इस वोट को समाप्त कर देंगें और मुझे ईवीएम प्रयोग करने वाली पुस्तिका भी दिखाई. इसके बाद उन्होंने अन्य लोगों के वोट डलवाने शुरू कर दिए मेरे द्वारा अड़े रहने पर उन्होंने कहा कि उनके पास इस सम्बन्ध में उचित प्रपत्र नहीं है जिन पर यह काम किया जा सकता है. क्या चुनाव आयोग जिस काम को करने में अपना पूरा जोर लगा देता है उसके द्वारा पीठासीन अधिकारी के रूप में काम करने वाले राज्य कर्मचारी इतने अनजान हैं कि वे बिना पूरे प्रपत्रों के ही मतदान केंद्र तक आ गए ? या फिर सीतापुर जिले के निर्वाचन कार्यालय ने इन अधिकारियों को इस बारे में कोई ट्रेनिंग ही नहीं दी थी ? क्या वास्तव में इसके लिए किसी प्रपत्र की आवश्यकता होती है ? आयोग के नियम के अनुसार मतदाता रजिस्टर पर मतदाता से यह लिखवा लिया जाना चाहिए कि वह किसी को भी वोट नहीं देना चाहता है जबकि मेरे मामले में पीठासीन अधिकारी ने इस बात से भी इनकार कर दिया और कहा कि उस रजिस्टर पर वे कुछ भी नहीं लिखवाएंगें ? साथ ही उन्होंने अपने किसी भी उच्चाधिकारी से बात करने से भी मना कर दिया.
      क्या इस तरह की स्थिति में मतदाता के पास कोई विकल्प रह जाता है कि वह अपने मन का काम कर सके या फिर उस जानबूझकर इस स्थिति को पैदा करने वाले या वास्तव में अनभिज्ञ पीठासीन अधिकारी को अपने मनमानी करने दे ? क्या ऐसी किसी भी स्थिति की शिकायत मौके पर करने की कोई कोई व्यवस्था है ? और है तो मतदाता को इस स्थिति के बारे में कोई कागज़ी सबूत मिल सकता है या नहीं ? मुझे नहीं पता कि मेरे वोट का क्या हुआ क्योंकि जिस तरह से पीठासीन अधिकारी मेरी इस मांग से विचलित थे तो मुझे नहीं लगता कि उन्होंने मेरे वोट को मतदान से मना करने वाली श्रेणी में रखा होगा ? जब मैंने मतदान रजिस्टर पर हस्ताक्षर कर दिए मेरी ऊँगली पर इंक लगायी जा चुकी तो फिर क्या मैं मतदान करने से मना नहीं कर सकता हूँ ? चुनाव आयोग इस बारे में स्पष्ट हैं कि इस स्थिति में मतदाता से रजिस्टर पर यह लिखवा लिया जाना चाहिए कि वह किसी को भी वोट नहीं देना चाहता है पर चुनाव का सञ्चालन करने वाले इन अधिकारियों को इस बात का पता नहीं होता है ? क्या मेरा वोट वास्तव में नहीं पड़ा या फिर मेरे वोट को संख्या पूरी करने के लिए किसी और से मशीन का बटन दबवा कर डलवा दिया गया ? मुझे इस बात का कतई अंदाज़ा नहीं था कि वहां पर ऐसा भी कुछ हो सकता है वर्ना मैं इस बारे में और अधिक तैयारी के साथ जाता और किसी भी स्थिति में अड़कर ४९ ओ का प्रयोग करके ही मानता पर मैं जानबूझकर अपना मोबाइल भी घर पर ही छोड़ गया था क्योंकि मतदान केंद्र पर मुझे उसकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ने वाली थी ? मेरे मत देने या न देने के अधिकार का हनन हुआ है अगर मेरा वोट ४९ ओ के तहत लिख लिया गया तो ठीक है वर्ना क्या मुझे अपने अधिकार से वंचित करने वाले अधिकारी के कृत्य को देखते हुए क्या निर्वाचन आयोग इस केंद्र पर पुनर्मतदान के आदेश जारी करेगा ? शायद नहीं क्योंकि उसके लिए एक बार चुनाव कराना ही कठिन काम होता है और केवल बड़ी गड़बड़ी के कारण ही आज तक पुनर्मतदान की बात की जाती है.   
     
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बुधवार, 18 जनवरी 2012

क्रिकेट और बाज़ार

    जिस तरह से आस्ट्रेलिया में बीसीसीआई की क्रिकेट टीम की भद्द पिटी है उसके बाद क्रिकेट के खिलाड़ियों को भगवान का दर्ज़ा देने वाले बाज़ार की आँखें भी खुल गयी हैं और अब बड़ी कम्पनियों ने इस बारे में मंथन करना शुरू कर दिया है कि किस तरह से क्रिकेट खिलाड़ियों से सम्बंधित विज्ञापनों को रोका जाये ? यह ठीक ही है क्योंकि जब इतने पैसे खर्च करके ये कम्पनियां अपने ब्रांड के लिए इन खिलाड़ियों को अपनाती हैं तो इनके पिट जाने पर भला कोई कम्पनी कैसे अपने पैसों को बर्बाद करना चाहेगी ? अब यह सही समय है कि इस बात पर विचार किया जाए कि देश के कानून से भी अपने को ऊपर समझने वाले इस बोर्ड का आख़िर क्या किया जाये क्योंकि कई अवसरों पर इसने देश के सम्मान के साथ खिलवाड़ किया है और कई बार भारत की अंतर्राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय छवि को अपने मनमाने रवैये से धूमिल भी किया है. देश में खेलों को बढ़ावा मिले इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं है पर इस तरह से खेल के नाम पर एक समानांतर व्यवस्था से कानून का लगातार उल्लंघन करने वाले इस तरह के बोर्ड के परिचालन का आख़िर क्या औचित्य है ? 
     देश में बाज़ार ने क्रिकेट को पैसे वाला खेल बना दिया जिससे बड़ी बड़ी कम्पनियों ने भारत के बड़े खिलाड़ियों से समझौते किये और उन पर अरबों रूपये पानी की तरह बहाए पर अब जब ये टीम पूरी तरह से ठिकाने लगी हुई है तो बाज़ार अपना काम करना शुरू कर चुका है जिससे इन खिलाड़ियों की कमाई पर असर होने वाला है. एक तरफ़ जहाँ ख़राब प्रदर्शन के कारण इनके सामने अपनी साख बचाने का संकट है वहीं दूसरी तरफ़ आर्थिक नुक्सान भी होने वाला है क्योंकि बिना अच्छे प्रदर्शन के बोर्ड तो पैसा दे सकता सकता है पर जब विज्ञापन में इनका उपयोग करने वाली कम्पनियों की बात आती है तो इनके साथ कोई भी नहीं होगा. अब बोर्ड की यह टीम देश के लिए नहीं खेलती है क्योंकि उसे और बोर्ड को केवल पैसों से ही मतलब है देश के सम्मान की इन सभी को कोई परवाह कभी से नहीं रही इन्हें केवल खेलने और पैसे पैदा करने में ही सारी दिलचस्पी है. ऐसे में उस बोर्ड के चुने हुए ये पैसों के भूखे लोग आख़िर कब तक देश के साथ न्याय कर सकेंगें ? 
     यह सारी बातें अभी अप्रैल से शुरू होने वाले आई पी एल के घोटाले में सामने आने वाली है इन्हीं खिलाड़ियों का प्रदर्शन खेल के इस प्रारूप में अचानक ही निखर जाया करता है और आज के दगे हुए कारतूस कल पूरी गर्जना के साथ सामने आने को बेताब दिखाई देने लगेंगें ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि क्रिकेट खेल के स्थान पर वास्तव में सट्टा बाज़ार के हाथों बिक गया है क्योंकि बोर्ड की टीम जिस तरह से अनियमित पदर्शन करती है उससे यही संदेह होते हैं कि कहीं बाज़ार की मंदी में कुछ कारोबार करने वाले सट्टा बाज़ार में इसी तरह से पैसा बनाने में लगे हुए हों ? अभी फिलहाल चाहे कुछ भी हो पर इस खेल में बहुत कुछ ऐसा भी होता है जिसे खेल के पीछे का दूसरा खेल कहा जा सकता है क्रिकेट के नाम पर देश के नौजवानों को जो अफीम चटाई जा रही है वह देश की ऊर्जा को नष्ट कर रही है और जो युवा आगे बढ़कर देश के लिए कुछ कर सकते हैं वे इस खेल की चका-चौंध में फंसकर अपने भविष्य को बिगाड़ने में लगे हुए हैं.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

कुडनकुलम और कलाम

तमिलनाडु के कुडनकुलम में परमाणु ऊर्जा संयंत्र के विरोध में जो आन्दोलन चल रहा है उसमें पूर्व राष्ट्रपति और जाने माने वैज्ञानिक डा० अब्दुल कलाम ने हस्तक्षेप करते हुए कहा है कि वे स्थानीय नागरिकों की चिंताओं के बारे में वैज्ञानिकों से बाते करेंगें और १० दिनों में एक रिपोर्ट तैयार करके उसे वैज्ञानिकों को सौपेंगें जिसमें सारे पहलुओं का अध्ययन किया जायेगा. जापान में फुकुशिमा हादसे के बाद से यहाँ पर स्थानीय लोगों की चिंताएं बढ़ गयी हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उस तरह की कोई दुर्घटना यहाँ भी हो सकती है. यह सही है कि इस तरह की दुर्घटनाओं पर नियंत्रण रखने के लिए व्यापक सुरक्षा प्रबंध किये जाते हैं और उन पर पूरी तरह से सख्ती से ध्यान भी दिया जाता है पर किसी भी स्तर पर वैज्ञानिकों की समझ और आम नागरिकों की समझ में एक जैसा साम्य नहीं लाया जा सकता है जिस कारण से ही इस तरह की चिंताएं अपना सर उठाने लगती हैं इन्हें दबाने के स्थान अपर खली बैठक करके इन लोगों की शंकाओं का समाधान किया जाना चाहिए.
    इस तरह के विवादों से भारत की ऊर्जा ज़रूरतों पर एक बार फिर से ब्रेक लग सकता है क्योंकि आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा ही सबसे स्वच्छ ऊर्जा साबित होने वाली है और इस स्थिति में किसी भी तरह से इससे दूर नहीं रहा जा सकता है. वर्तमान में कोयले की खुदाई और ढुलाई में आई समस्या से पूरा उत्तर भारत बिजली की किल्लत से जूझ रहा है जो कि सभी को पता है पर केवल कोयले के भरोसे बिजली का उत्पादन करने की नीति से तो देश में आने वाले १० सालों में ही अँधेरा छा जायेगा और औद्योगिक गतिविधियाँ पूरी तरह से ठप पड़ जायेंगीं ? इस समस्या के समाधान के लिए ही १२३ समझौते पर इतना ध्यान दिया गया था जिसका आने वाले २० वर्षों में देश के लिए योगदान सामने आने वाला है. फिलहाल सरकार और सभी दलों के नेताओं को यह बात समझनी ही होगी कि इस तरह के मालों में सुरक्षा की अनदेखी नहीं की जा सकती है और अन्य मसलों की तरह इसे निपटाया भी नहीं जा सकता है. इसे अलग स्तर अपर निपटा चाहिए और किसी भी तरह से इसके ख़िलाफ़ चलने वाले प्रदर्शनों में बल प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए. साथ ही एस एकं प्राथमिकता के आधार पर निपटाए जाने चहिये जिससे इनकी लगत भी न बढ़ने पाए.
   देश को अपने संसाधनों से बिजली के भरपूर उत्पादन पर ध्यान देना ही होगा और साथ ही जिन स्थानों का इसके लिए चयन किया जाये वहां के निवासियों को पहले विश्वास में लिया जाना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि किसी भी स्तर पर कोई संयंत्र शुरू कर दिया जाये और बाद में उसका विरोध शुरू हो जाये तो उससे होने वाले लाभ को देश सही समय से नहीं उठा पायेगा जिससे विकास से सम्बंधित अन्य गतिविधियों पर भी असर पड़ने लगेगा. इस तरह के किसी भी प्रोजेक्ट के लिए एक सही कार्य योजना बनाये जाने की परंपरा विकसित किये जाने की बहुत आवश्यकता है क्योंकि बिना उसके कोई भी कदम सही दिशा में नहीं जा सकते हैं. इन मामलों को राजनैतिक स्तर के स्थान पर वैज्ञानिक स्तर पर निपटा जाना चाहिए क्योंकि देश के वैज्ञानिकों का जनता बहुत सम्मान करती है और वे जो कुछ भी करते हैं उस पर जनता पूरा भरोसा भी करती पर इसमें जब राजनैतिक लोग अपनी टांग घुसा देते हैं तभी से मामला बिगड़ने लगता है. अगर संसाधनों के हिसाब से उपयुक्त जगह पर इन संयंत्रों का विरोध होने लगेगा तो आखिर इन्हें कहाँ पर लगाया जायेगा ? अच्छा ही है कि डा० कलाम ने इस मामले में हस्तक्षेप कर दिया है जिससे यह मामला अब आसानी से सुलझ सकता है.     

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

कश्मीर पर बयानबाज़ी

     आजकल कश्मीर को लेकर जिस तरह से फ़ालतू की बयानबाजी छिड़ी हुई है उससे यही लगता है कि अब देश में प्रसिद्धि पाने के लिए लोग कुछ भी कहने में नहीं चूकते हैं प्रशांत भूषण ने जिस तरह से बेकार में ही इस मसले पर अपनी राय दी उसकी कोई ज़रुरत नहीं थी क्योंकि कश्मीर में भारत जो कर रहा है वह दुनिया का कोई दूसरा देश दुनिया के किसी भी हिस्से में नहीं कर रहा है. कश्मीर के लिए जितने संसाधन और अन्य तरह की सहायतायें लगातार दी जाती हैं उनके बिना आज के कश्मीर की कल्पना सपने में भी नहीं की जा सकती है. इन लोगों को पाक अधिकृत कश्मीर की वास्तविक स्थिति दिखाई जानी चाहिए और तब इनसे पूछा जाना चाहिए कि भारत ने क्या ग़लत किया है ? आज देश में कश्मीर को लेकर कोई भी कुछ भी बोलने से परहेज़ नहीं करता है. कश्मीर भारत के लिए केवल एक राज्य नहीं है बल्कि पूरे देश की आत्मा उससे जुड़ी हुई है यही बात आज भी कुछ तथाकथित पढ़े लिखे लोगों को समझ नहीं आती या फिर वे अपने को जल्दी आगे लाने के लिए इसका दुरूपयोग करने से नहीं मानते हैं.
   कश्मीर पर अरुंधती रॉय की बकवास सभी सुनते रहते हैं और अब प्रशांत भूषण को भी वहां पर न जाने क्या क्या दिखने लगा है ऐसी स्थिति में अब अन्ना के लिए वास्तव में बहुत कठिन समय आने वाला है क्योंकि देश के वर्तमान स्वरुप से छेड़-छाड़ करने वाली किसी भी बात को जनता बर्दाश्त नहीं कर सकती है क्योंकि राजनैतिक लोग अपने लाभ हानि की हिसाब से बातें कर सकते हैं पर जनता के जुड़ाव से खिलवाड़ करने वाले लोगों को आसानी से माफ़ नहीं किया जा सकता है. कश्मीर की वास्तविक स्थिति को समझने के कारण टीम अन्ना का अहम सदस्य किरण बेदी ने तुरंत ही इसे भूषण की निजी राय मानकर इसकी ज़िम्मेदारी उन पर डाल दी क्योंकि ऐसे बयान किस हद तक किसी आन्दोलन या व्यक्ति को चोट पहुंचा सकते हैं इसे वे अच्छे से समझती हैं. अब अन्ना को भूषण को अपनी टीम का हिस्सा बताने के साथ यह भी कहा है कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है जो कि स्पष्ट तौर पर दिखाई देता है कि अन्ना को यह पता है कि कश्मीर कहाँ तक नुकसान कर सकता है ? भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बोलना अलग बात है और कश्मीर पर भारत विरोधी सुर में बोलना बिलकुल दूसरी बात है. इस बात को मैं पहले भी कह चुका हूँ कि इस तरह के लोग अन्ना के लिए बड़ी समस्याएं खड़ी करने वाले हैं.  
  अजीब बात यह  है कि जब कश्मीर से कश्मीरी पंडित एक योजना के तहत भगाए जा रहे थे तब ये अरुंधती और भूषण जैसे लोग क्या कर रहे थे तब इनको कुछ क्यों नहीं दिखाई दिया और आज जब पूरी तरह से कश्मीर में शांति लौट रही है तो ये फिर से अपने बिलों से बाहर निकल कर फालतू की बातें बोल रहे हैं ? क्यों इनको किसी लाचार कश्मीरी पंडित की मजबूरी नहीं दिखाई देती है ? इनको केवल सेना और अर्ध सैनिक बलों का अत्याचार दिखाई देता है पर जब घाटी का युवा पत्थरों से पुलिस पर हमला करता है तो ये दिल्ली में बैठक अपने केस सुलझाते रहते हैं और इन्हें तब कुछ भी ग़लत नहीं लगता है ? अपने कक्ष में दो झापड़ खाकर ही इनको बुरा लग रहा है और वे युवक जेल मने हैं पर कश्मीरी पंडितों को उनके घरों में ही मार दिया गया और घाटी से निकाल दिया गया तो किसी को जेल नहीं हुई ? १९८९ में घाटी में एक सुनियोजित षड़यंत्र के तहत कश्मीरी पंडितों को भगाया गया और उनकी हत्याएं की गयीं जिसमें वहां के स्थानीय भी शामिल थे तब अरुंधती को यह भी नहीं पता होगा कि कश्मीर भारत के किस हिस्से में है ? अगर इन लोगों को यह लगता है कि घाटी में कुछ ग़लत हो रहा है तो इन्हें १९८९ की स्थिति से ग़लत होने पर फिर से ध्यान देना होगा बल्कि इन्हें कबाइलियों की घुसपैठ तक का भी विश्लेषण करना होगा ? पर ये नहीं कर सकते क्योंकि ये सनसनी तो फ़ैला सकते हैं पर देश के बारे में कुछ नहीं सोच सकते हैं... 

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

हरियाणा और टीम अन्ना

    अन्ना हजारे ने जिस तरह से हिसार उपचुनाव में कांग्रेस को हराने की बात कही है आज के परिपेक्ष्य में उसका क्या महत्त्व है यह सभी जानते हैं पर जिस तरह से अन्ना की टीम हिसार में व्यवहार कर रही है उससे यही लगता है की इस बहुत अच्छे और सटीक अभियान की जिस तरह से शुरुवात की गयी थी अब वह अपने मूल से हटने लगा है. सभी जानते हैं कि हरियाणा अपने आप में राजनैतिक रूप में बहुत संवेदनशील है और इस राज्य ने जिस तरह के मानदंड राजनीति में पेश किये वे हमेशा से ही लोकतंत्र का मज़ाक उड़ने के लिए काफ़ी रहे हैं और अब अगर आज भी हरियाणा कुछ नया और अजीब कर गुज़रे तो उससे सभी राजनैतिक दलों और टीम अन्ना को कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए. जिस तरह से सभी दल हरियाणा में भ्रष्टाचार के आरोपों को झेलते रहते हैं उसमें आख़िर जनता अब किसका समर्थन करे ?
    हरियाणा के इस उपचुनाव में ख़ुद को बीच में डालकर अन्ना की टीम ने बहुत बड़ी ग़लती की है क्योंकि वहां पर समीकरण पहले से ही ऐसे हैं कि लोग उनसे हटकर सोचना नहीं चाहते हैं हाँ अगर अन्ना खुले तौर पर किसी को अपने उम्मीदवार के तौर पर उतारें और तब कांग्रेस या किसी दल विशेष को हराने की अपील करें तो उसका अच्छा प्रभाव पड़ सकता है पर जिस तरह से अभी तक अन्ना कि तरफ से केवल कांग्रेस को दबाव में लेने की कोशिश की जा रही है और उससे उत्पन्न होने वाली नयी नयी बातों पर ध्यान भटकाया जा रहा है उससे लोगों का ध्यान और ऊर्जा जो इस आन्दोलन को मज़बूत कर सकती थी वह भी कमज़ोर हो रही है. अभी भी स्वामी अग्निवेश और आर्य समाज का हरियाणा में इतना प्रभाव तो है ही कि वे किसी भी चुनाव अपर अपना प्रभाव तो दाल ही सकते हैं. आज अन्ना के आन्दोलन की ऊर्जा को संगठित करके उसे एक तरफ मोड़ने की आवश्यकता है जबकि इस ऊर्जा का दुरूपयोग केवल कुछ कामों में ही किया जा रहा है जिससे आने वाले समय में इस अभियान की विश्वसनीयता पर भी संदेह के बादल उठा सकते हैं.
   केवल प्रयोग के तौर पर टीम अन्ना को किसी युवा ईमानदार और प्रतिभाशाली को इस चुनाव में उतारना चाहिए था  क्योंकि किसी एक सीट पर इस तरह के अभियान को जांचने के लिए यह सही समय था अभी पूरे देश में टीम अन्ना इस स्थिति में नहीं है कि वह चुनाव लड़ या लडवा सके. इस उम्मेदवार के उतरने से लोगों के मन में भ्रष्टाचार से लड़ने की जो ललक है वह और भी जग जाती पिछली सरकारों में सभी दलों ने हरियाणा में जिस तरह से शासन किया है तो उस स्थिति में कांग्रेस को हराकर अन्ना आख़िर किसको सामने लाना चाहते हैं ? सभी ख़राब विकल्पों में से कम ख़राब को चुनने की बात करना अब बेमानी है क्योंकि जनता आज तक यही कर रही है. अच्छा होता कि टीम अन्ना उन लोगों के बीच जाती जो चुनाव के दिन घर पर बिठकर छुट्टी का लुत्फ़ लेते हैं और फिर पूरे ५ साल तक अपने घरों की बैठकों में घुसकर देश की हालत पर चिंता ज़ाहिर करने में पीछे नहीं रहते हैं? देश को घटिया लोगों के हाथों में पहुँचाने का सारा ज़िम्मा इन पढ़े लिखे और संभ्रांत लोगों का ही है क्योंकि इनके कारण ही कम % में पड़ा वोट ख़राब लोगों को सत्ता तक पहुंचा देता है. अब भी समय है कि सही जगह पर चोट कि जाये और रही बात हिसार की तो यह सीट कांग्रेस के पास नहीं थी जो वह हार जाएगी और अगर किसी भ्रम में वह जीत गयी तो अन्ना के आन्दोलन के लिए यह देश के राजनीतिकों की तरफ से एक नयी चुनौती होगी.          

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

हम भी नंगे तुम भी नंगे....

        जिस तरह से सर्वदलीय बैठक के बाद सभी राजनैतिक दलों ने एक सुर में जन लोकपाल बिल के बारे में एकमत होकर इसे ख़ारिज़ में ज़रा सी भी देर नहीं लगायी उससे यही लगता है कि आने वाले समय में देश के लिए भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए देश की जनता को बहुत संघर्ष करना पड़ेगा. इस बैठक से पहले जहाँ ऐसा लग रहा था कि शायद इस मुद्दे पर कोई राजनैतिक समाधान निकल आये और अन्ना की टीम भी शायद कुछ मसलों पर झुक जाये पर अब फिर से बात वहीं पर जाकर अटक गयी है. भ्रष्टाचार पर संप्रग सरकार को पानी पी कर कोसने वाले विपक्षी दलों को भी पता नहीं क्या हुआ कि वे भी सरकार की भाषा में बोलने लगे ? इस बात पर जो आक्रोश कल तक केवल कांग्रेस के ख़िलाफ़ था अब वह देश के पूरे राजनैतिक तंत्र के ख़िलाफ़ होने वाला है. अब उन लोगों के पास क्या जवाब है जो कल तक भ्रष्टाचार के बारे में ही बातें कर रहे थे और आज उन्हें कैसा लगा रहा है ? भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है जिससे निपटने के लिए सजग तंत्र का होना बहुत आवश्यक है. कांग्रेस ने यहाँ पर सर्वदलीय बैठक से दो निशाने एक साथ साध लिए एक तरफ अन्ना को सन्देश दे दिया कि सभी दल ऐसा नहीं चाहते तो दूसरी तरफ़ विपक्षियों को भी इस हमाम में नंगा दिखा दिया ?
           एक तरह से यह कहा जा सकता है कि कल तक सरकार टीम अन्ना की कई बातें लोकपाल बिल में डालने पर सहमत थी पर जब उसे ऐसा लगा कि सभी दल उसकी बात से सहमत हैं तो उसने कुछ भी ऐसा करने से मना कर दिया. इस मामले में अड़ने के कारण जो कुछ सुधार तात्कालिक तौर पर लोकपाल बिल में कुछ कड़े प्रावधान करके मिल सकता था वह भी जाता रहा. क्या हुआ विपक्षी दलों के मनोबल को आखिर क्यों उन्होंने इस तरह से चुपचाप सरकार के साथ समर्थन दिखाया ? वज़ह साफ़ है कि जो भी सत्ता में है वह दलाली में लगा हुआ है और इस तरह के कड़े कानून से उसकी दुकान बंद होने की पूरी संभावनाएं हैं ? जब देश का पूरा राजनैतिक तंत्र इस क़दर सड़ा हुआ है तो कोई किससे क्या कहे ? मनमोहन सिंह के पास अब भी बहुत कुछ करने के लिए शेष है क्योंकि पूरे देश के साथ सरकार भी चाहती है कि अन्ना का अनशन समाप्त हो. चूंकि मनमोहन इस देश के राजनैतिक तंत्र की उपज नहीं हैं इस लिए ही वे मतभेद के बाद भी पीएम को लोकपाल के तहत लाने में सहमत हो गए हैं अब उनसे देश को यही आशा है कि वे उतना तो अवश्य करें जितना देश का स्थापित राजनैतिक तंत्र नहीं कर सका ?
   सरकार को तत्काल इस बात पर विचार करना चाहिए जो आश्वासन दो दिन पहले उसने अन्ना की टीम को दिया था उस पर अमल करे और पीएम को लोकपाल बिल में शामिल करवाएं. जहाँ तक बात सभी सरकारी कर्मचारियों के और सांसदों को इसमें लाने की है तो इसके लिए आगे बात की जा सकती है. साथ ही सरकार को यह बिल जल्दी से जल्दी पारित करवाना चाहिए जिससे देश को ७०% प्रावधानों वाला लोकपाल ही मिल सके. अन्ना के यह कहने से देश को राहत मिली है कि उन्हें अस्पताल ले जाते समय किसी तरह से शक्ति प्रदर्शन न किया और बाद में नेताओं के आवासों पर शांति पूर्वक प्रदर्शन किया जाये. अब समय है कि टीम अन्ना को वर्तमान में सरकारी लोकपाल बिल को स्वीकार कर लेना चाहिए और साथ ही उससे होने वाले असर को आने वाले समय में देखना चाहिए. इसमें आने वाली कमियों और अन्य बातों पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है जिससे लोकसभा के आम चुनावों से पहले एक बार फिर इस तरह की मांग को लेकर अनशन किया जाना चाहिए.  जनता में भूलने की बीमारी लगी हुई है जिससे वह चुनावों तक इन नेताओं के पापों को भूल जाएगी और फिर से इनके चंगुल में फंसेगी. आने वाले लोकपाल कानून की गहन समीक्षा टीम अन्ना को करनी होगी और इस तरह के माहौल को एक बार फिर से बनाना ही होगा.        

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 4 जून 2011

डीज़ल पर नियंत्रण कब तक ?

         प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति का मानना है कि अब यह सही समय है जब सरकार डीज़ल को भी पेट्रोल की तरह बाज़ार के साथ मूल्य निर्धारित करने के लिये तेल कम्पनियों को छूट दे सकती है. पहले यह माना जा रहा था कि जब तक मुद्रा स्फीति की दर ७ % तक नहीं आती तब तक ऐसा करने में दिक्कत होगी और सरकार भी उस स्तर के लिए प्रतीक्षा करने के मूड में लग रही थी. पर जिस तरह से तेल कम्पनियों का घाटा भी बढ़ता जा रहा है और उसे पूरा करने के लिए अब सरकार के पास कोई और तरीका नहीं बचा है तो डीज़ल को बाज़ार के द्वारा ही मूल्य नियंत्रित करने की छूट अब तेल कंपनियों को मिलनी ही चाहिए. इसके लिए सरकार द्वारा जितनी देर की जाएगी तेल कंपनियों के लिए आने वाले समय में अपने संसाधन जुटाने में उतनी ही समस्या आने वाली है. इस पहलू पर अविलम्ब विचार करके सरकार को डीज़ल के मूल्यों को बाज़ार के आधीन कर देना चाहिए.
   यह सही है कि देश में डीज़ल की मूल्य वृद्धि से बहुत सारी अन्य आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई आदि मंहगी हो जाएगी जिससे एक बार फिर से मुद्रा स्फीति बढ़ने का खतरा रहेगा और यही कारण है कि सरकार भी मुद्रा स्फीति को और नीचे आने देना चाहती है जिससे आर्थिक तंत्र इस बढ़े हुए मूल्य को आसानी से झेल सके. देश में सार्वजानिक क्षेत्र की तेल कम्पनियों को ढंग से चलते रहने के लिए अब यह आवश्यक हो गया है कि मूल्यों को सरकार नहीं बल्कि उसके अंतर्राष्ट्रीय मूल्य निर्धारित करें ? अभी लोगों तक सस्ता तेल पहुँचाने की सस्ती लोकप्रियता वाला फार्मूला आने वाले समय में इन तेल कम्पनियों का दीवाला ही निकाल देगा जिससे फिर भारत की ये नवरत्न कम्पनियाँ ख़त्म हो जाएँगी और तब निजी क्षेत्र के व्यापारी अपने हितों को पूरी तरह से साधने का काम कर पायेंगें. देश में ऊर्जा का संकट उस समय नहीं आना चाहिए जब देश विकास में अन्य देशों को भी बहुत पीछे छोड़ने की ताकत दिखा रहा हो. हमें देश में भविष्य की ऊर्जा ज़रूरतों के लिए अभी से तैयारी करनी ही होगी. 
   तेल मूल्य में वृद्धि का राजनैतिक कारणों से विरोध करने वालों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि अगर उनकी बात मान ली जाये और तेल के मूल्यों को नियंत्रित रखा जाये तो उससे देश और इन सार्वजानिक क्षेत्र की तेल कंपनियों को क्या लाभ होने वाला है ? जब तक देश में सार्वजानिक क्षेत्र की तेल कम्पनियाँ हैं तभी तक सरकार आवश्यकता पड़ने पर मूल्यों को अपनी इच्छा से निर्धारित कर सकती है अपर इनके समाप्त हो जाने के बाद आख़िर देश में कौन सस्ते मूल्यों पर तेल देगा ? आज आवश्यकता के अनुसार चलने की और सख्त क़दम उठाने की आवश्यकता है फिर भी केवल विरोध के लिए विरोध हमेशा ही जारी रहेगा. देश कि अब यह समझना चाहिए कि केवल सस्ती लोकप्रियता से देश नहीं चला करते हैं और हमें भी तेल के उपयोग पर ध्यान देना चहिये जहाँ तक संभव हो सके इसकी बचत करनी चाहिए क्योंकि ऊर्जा के ये भंडार सीमित हैं और आने वाले समय में इनको समाप्त ही होना है. अब यह हम पर है कि इनका अँधा धुंध दोहन पर रोक लगायें या फिर इनके उपयोग में ही कमी लाने का प्रयास करें.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 28 मार्च 2011

मुशर्रफ़ की स्वीकारोक्ति

                पाक के पूर्व तानाशाह परवेज़ मुशर्रफ़ ने भारत को पाक के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बताकर एक बार फिर से दोनों देशों के बीच अविश्वास की खाई को और चौड़ा करने का काम ही किया है. २००४ में भी क्रिकेट के ज़रिये शुरू हुई कूटनीतिक पहल २६/११ तक चलती ही रही थी जब तक पाक समर्थित आतंकियों ने मुंबई पर हमला नहीं बोला था. आज भी यह देखने का विषय है की पाक के नेता किस सुर में बातें करते हैं ? मुशर्रफ़ ने फिलहाल आतंकवाद को पाकिस्तान के लिए ख़तरा तो बताया पर उन्हें भारत एक स्थायी शत्रु दिखाई देता है और जिसके लिए वे कुछ भी कहने में नहीं चूकते हैं. मुशर्रफ़ को लगता है कि भारत की ९० % सेना पाक के ख़िलाफ़ है और वे इसे भारतीय सेना का स्थायी भाव भी बताने से नहीं चूकते हैं. मुशर्रफ़ के दिल का फ़ौजी हमेशा की तरह शंका ही व्यक्त करता रहता है और उसके पास कोई काम नहीं होता है. 
         ऐसा कुछ भी कहने से पहले वे यह भूल जाते हैं कि पाक ने अपने जन्म के समय से भारत के ख़िलाफ़ किस तरह के मोर्चे खोल रखे हैं और वहां के शासकों के लिए भारत का अनावश्यक रूप से विरोध करना एक मजबूरी बन चुकी है. हर देश के सामने अलग तरह की परिस्थियाँ होती हैं और उनसे निपटने के लिए समय समय पर अलग अलग तरह के प्रयास किये जाते हैं. पाक के पास भारत के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत नहीं हैं फिर भी वह अपने यहाँ आतंकियों को ट्रेनिंग देते समय इसी बात को आगे रखता है कि भारत में मुसलमान असुरक्षित हैं और पूरे भारत पर इस्लाम का वर्चस्व करने के लिए वह अपनी भोली भाली जनता को गुमराह करता रहता है. जबकि उसे भी पता है कि पूरे विश्व में जिन अधिकारों के साथ मुसलमान भारत में रह रहे हैं वैसे तो पाकिस्तान ने भी उन्हें नहीं दिए हुए हैं. इसके बाद भी वह अपने यहाँ भारत का विरोध करने के लिए हर तरह की बातें करने से पीछे नहीं रहता है.
        कभी मुशर्रफ़ को यह समझ नहीं आता कि जिस भारत के ख़िलाफ़ पाक ने ४ प्रत्यक्ष और लगातार परोक्ष युद्ध छेड़ रखा है उसकी सेना क्या उनके हक़ में हो सकती है ? वे खुद फ़ौजी रहे हैं और उन्हें यह पता है कि सेनाएं सरकारों की तरह अपने रुख नहीं बदला करती हैं उनकी अपनी कार्यप्रणाली होती है. किसी सरकार के कहने से कभी तो कुछ हद तक कटौती की जा सकती है पर किसी भी शत्रु के लिए अपनी रणनीति को इतनी आसानी से बदला नहीं जाता है. पाक ने भारत को परेशान करने में अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी है तो वह भारत की रक्षा के लिए ज़िम्मेदार सेना को पाक के हक़ में कैसे मान भी सकते हैं ? भारत की अपनी ज़रूरतें है और आज पाक भारत के सामने किसी भी मोर्चे पर नहीं टिकता है. आज भारत विश्व की सबसे तेज़ी से उभरती हुई शक्ति है तो पाक अपने वजूद से लड़ता हुआ कबीलों का एक समूह भर है ? अच्छा हो कि इस तरह की बातों में फंसने के बजाय पाक अपने गिरेबान में झांक कर देखे जिससे रिश्ते और ख़राब होने से बच सकें.              
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...