मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 26 January 2015

राष्ट्रपति का सम्बोधन और सरोकार

                                                  गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर परंपरागत राष्ट्र के नाम सन्देश में जिस तरह से एक मंझे हुए नेता और लम्बे राजनैतिक जीवन के साक्षी रहे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश के हर मुद्दे को बहुत ही सामान्य ढंग से छूने की कोशिश की वहीं इसे एक तरह से देश के नागरिकों के लिए एक बहुत ही अच्छे रूप में अपनाने का आह्वाहन भी किया. राजनैतिक मामलों में जहाँ देश की जनता द्वारा तीस वर्षों बाद एक पूर्ण बहुमत की सरकार का ज़िक्र किया वहीं दूसरी तरफ सरकार को भी विधायिका का पाठ भी पढ़ाया क्योंकि पूर्ण बहुमत की सरकार के लिए ज़िम्मेदारियों अधिक हो जाती हैं और निर्णय लेने में उसकी शक्ति का सही दिशा में उपयोग भी आवश्यक होता है. एक बार फिर से जहाँ उन्होंने सत्ता पक्ष को अध्यादेशों के माध्यम से महत्वपूर्ण निर्णयों को करने से बचने की सलाह दी वहीं विपक्ष के लिए भी उनकी स्पष्ट नसीहत थी कि उसे भी देश हित में सहयोग की तरफ बढ़ना सीखना चाहिए और विधायिका की विशिष्टता को बनाये रखने के बारे में अपनी स्थिति को बनाये रखना चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों का ही एक जैसा महत्व होता है.
                          वाणी के संयम को मुखर्जी ने गांधी जी के प्रसंग के माध्यम से भी समझाने का प्रयास किया की हमें उनके उस उपदेश को याद रखना चाहिए जिसमें उन्होंने यह कहा था की आँखें खुली रहनी चाहिए और ज़ुबान बंद. वाणी में संयम न बरतने से ह्रदय को चोट लगती है और उससे पार पाना मुश्किल होता है इसलिए देश में सभी को अपनी वाणी पर संयम भी रखना चाहिए. भारतीय संविधान को एक पवित्र पुस्तक बताते हुए उन्होंने यह भी कहा कि इसमें भारत की बहुलतावादी संस्कृति को बनाये रखने के लिए पूरे प्रयास किये गए हैं और उन पर चलने से देश का ही कल्याण होना है तथा विद्वेष को फैलने से रोका जा सकता है. धर्म के दुरूपयोग से आज पूरे विश्व में किस तरह से समस्याएं बढ़ रही हैं यह रेखांकित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की सौम्य शक्ति ही भारत की विशिष्टता है और जब तक हम इस सौम्यता के साथ खड़े हैं तब तक हम पूरे विश्व से अलग ही दिखाई देने वाले हैं. आज धर्म को लेकर जिस तरह का असंयम देश में कुछ लोगों द्वारा दिखाया जा रहा है उन्हें उन देशों कई हालत से सबक लेना चाहिए जो धर्म के दलदल में फंस चुके हैं.
                           देश के विकास और स्वच्छता के अभियान को जनांदोलन बनाये जाने के लिए उन्होंने १९०१ में महात्मा गांधी के पहले भारत दौरे का उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने के बाद जब वे रेपोन कॉलेज में एक समारोह में गए तो उन्हें यह देख कर बहुत बुरा लगा कि आने वाले लोगों ने स्थान को बहुत गन्दा कर दिया है इससे क्षुब्ध होकर उन्होंने खुद ही झाड़ू उठा ली और सफाई में जुट गए उनके इस तरह से सफाई करने से जहाँ देखते ही देखते पूरा स्थल साफ़ हो गया वहीं एक संदेश भी आम लोगों तक पहुंचा कि हमें इस तरह के कामों के लिए सतर्कता के साथ काम करना चाहिए और गंदगी से बचना चाहिए तथा खुद ही सफाई को हर स्तर पर प्राथमिकता देनी चाहिए. आज इतने लम्बे अरसे बाद चल रहे स्वच्छता अभियान को भी आम लोगों को इस संदर्भ में ही लेने की आवश्यकता है जिससे पूरे माहौल को बेहतर बनाया जा सके. इसके साथ ही उन्होंने पुस्तकों के अध्ययन को कक्षाओं से आगे बढाकर जन सामान्य तक पहुँचाने का आह्वाहन भी किया क्योंकि अध्ययन से बहुत कुछ पाया जा सकता है और लोगों की सोच को भी बदला जा सकता है.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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