मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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सोमवार, 29 अप्रैल 2019

दिखावे की राजनीति

                                                        देश में जिस तरह से आम चुनावों या विधानसभाओं के चुनावों में विभिन्न दलों के प्रत्याशियों के पक्ष में सम्बंधित दलों के स्टार प्रचारकों की तरफ से रोड शो करने माहौल बनाये जाने का काम किया जाता है वह निश्चित रूप से उनका संवैधानिक अधिकार है पर पहले बड़े नेताओं की छुटपुट होने वाली बड़ी रैलियों के अलावा प्रत्याशी स्थानीय स्तर पर अपने प्रयासों से ही शांत वोटर्स को प्रभावित करने का काम किया करते थे. इधर कुछ चुनावों से रोड शो जैसा दिखावा सामने आने से इनकी चपेट में आने वाले क्षेत्रों में सामान्य जनजीवन प्रभावित होने लगा है जिससे सभी राजनैतिक दलों के साथ चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन को भी इस बारे में विचार करने का समय आ गया है कि चुनाव के नाम पर आम नागरिकों को किसी भी तरह की अनावश्यक परेशानी का सामने न करना पड़े. इस बारे में केंद्रीय चुनाव आयोग को ही कुछ ठोस कदम उठाने के बारे में सोचना शुरू करना होगा क्योंकि अपने माहौल बनाने के भ्रम के चलते कोई भी राजनैतिक दल इसको रोकने की बात से सहमत नहीं होगा।
                            देश के उच्च सुरक्षा प्राप्त नेताओं के इस तरह से रोड शो करने से जहाँ सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ जाती है वहीं खुद इन बड़े नेताओं की सुरक्षा में गंभीर चूक हो जाने की संभावनाएं बढ़ जाती है. इन नेताओं की चुनावी सभाओं में आम जनता का जो धन पानी की तरह बहाया जाता है वह संगठित रूप से किसी बड़े प्रोजेक्ट में डालकर उसकी गति बढ़ाने के काम भी आ सकता है पर देश के राजनैतिक दीवालियेपन के कारण इस दिशा में कोई सोचना भी नहीं चाहता है। यहाँ पर यह बात भी सामने आ सकती है कि देश के संविधान ने हर चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति को अपने हिसाब से प्रचार करने की छूट दे रखी है पर साथ उसी संविधान ने देश के आम नागरिकों को भी अपनी स्वतंत्रता के साथ जीने की आज़ादी भी दे रखी है. नेताओं की इस तरह की दिखावे वाली राजनीति के चलते अब यह कौन तय करेगा कि यहाँ पर नेताओं और आम जनता के अधिकारों की रक्षा किस तरह से की जा सकती है?
                          इस बारे में सबसे सही यही रहेगा कि सभी दल मिलकर इस बारे में सोचें क्योंकि कई बार नेताओं के इस तरह से प्रचार करने के समय आम यातायात न चाहते हुए भी बाधित हो जाता है जिससे आवश्यक कार्य से आने जाने आम लोगों के साथ अति आवश्यक कार्यों में लगे हुए पुलिस, प्रशासन, फायर और एम्बुलेंस के लिए बहुत बड़ी समस्या खडी हो जाती है. क्या कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता है कि जिसमें नेताओं को समुचित रूप से अपने प्रचार को करने की छूट भी मिल जाये और आमलोगों को किसी भी परेशानी का सामना न करना पड़े ? क्या रोड शो को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए या फिर इसमें शामिल वाहनों और लोगों की संख्या को उसके मार्ग के अनुरूप सीमित रखने की कोशिश की जानी चाहिए जिससे नेताओं को भी कानून के अनुरूप कार्य करने की आदत पड़ सके. इस बात को उन लोगों के बारे में सोचते हुए भी आगे बढ़ाना चाहिए जिन पर इस तरह के दिखावे का सबसे ज़्यादा असर पड़ता है क्योंकि जब तक पीड़ितों के बारे में गंभीरता से नहीं सोचा जायेगा तब तक इसका कोई सही हल नहीं निकाला जा सकेगा।      

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बुधवार, 24 अप्रैल 2019

लोकतंत्र, चुनाव और शालीनता

                                                 ऐसा नहीं है कि २०१९ में देश में पहली बार कोई आम चुनाव हो रहे हैं पर वर्तमान में चल रहे चुनावों में जिस तरह से हर दल के शीर्ष नेता द्वारा मर्यादाओं का उल्लंघन किया जा रहा है वह भले ही उस सम्बंधित दल को कुछ वोट दिलवाने में मदद कर दे पर इससे हमारे उस लोकतंत्र की गंभीर खामी ही सामने आती है जिसमें चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था भी चाह कर कुछ ठोस नहीं कर पाती है. यह सही है कि आज चुनाव प्रचार को जिस स्तर पर ले जाया गया है उसमें पुरानी पीढ़ी के नेता अपने आपको सहज नहीं पाते हैं फिर भी उनके पास कोई अन्य रास्ता भी नहीं बचता है क्योंकि यदि उन्हें राजनीति में रहना है तो इस सबका सामना करना ही होगा. इस मामले में सभी दलों ने एक जैसा रवैया अपना रखा है इसलिए किसी एक दल की तरफ इंगित करने से काम नहीं चलने वाला है फिर भी क्या देश के राजनैतिक दलों को यह नहीं सोचना चाहिए कि चुनाव जीतने-हारने के बाद कमोबेश उन्हीं चुनिंदा बड़े नेताओं के साथ जब सदन में बैठना है तो विमर्श का स्तर इतना घटिया करने की आवश्यकता क्या है?
                                              आज की परिस्थिति में यदि देखा जाये तो हर नेता किसी भी तरह से दुसरे दल के नेता को नीचे दिखाना ही अपनी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण मानने लगा है जिससे लोकतंत्र और शिष्टाचार की वह सामान्य सीमा रेखा भी कई बार अनावश्यक रूप से लांघी जानी लगी है जिसको अभी तक सदन या चुनावों में लांघना उचित नहीं मना जाता था।  इस बात पर विचार करना भी आवश्यक है कि आखिर देश के नेताओं की यह स्थिति क्यों बन गयी है कि जो अपने चुनावी घोषणापत्रों में किये जाने वाले विकास के लम्बे चौड़े वायदों को भूलकर इतनी घटिया बातचीत पर उतर आते हैं जिसका कोई औचित्य नहीं दिखता है?  संभवतः आज नेताओं को यह लगने लगा है कि जनता से चाहे कुछ भी कह दो पर जब चुनाव हों तब जनता की बातों को गंभीर मुद्दों की तरफ मत जाने दो और हलकी छिछली राजनीति में को उलझाकर देश के समक्ष खड़े वास्तविक मुद्दों को दूर दफ़न कर दो जिससे भावनाओं में बहती हुई जनता अपनी प्राथमिकताओं को भूलकर उन्हीं घटिया बातों में उलझकर गंभीर सवाल करने की शक्ति खो दे?
                                               क्या यह सही समय है कि राजनेता अपने स्तर से एक बार फिर से चुनावी माहौल की गरिमा को वापस लौटाने का काम शुरू करें?  क्या हमारे विविधता भरे देश में अब इस बात की आवश्यकता नहीं है कि अन्य अखिल भारतीय सेवाओं की तरह चुनाव सुधार करते हुए एक चुनाव से सम्बंधित कैडर भी बनाया जाये जिसमें शुरुवात से ही चुनावी माहौल को समझने के लिए अधिकारियों को तैयार किया जाये और उनमें से ही वरिष्ठ लोगों को संवैधानिक बाध्यता के साथ शीर्ष स्तर पर काम करने का अवसर दिया जाये ? ऐसा करने से चुनाव आयोग की गरिमा तो बढ़ेगी ही साथ नेताओं को अपने प्रिय लोगों को चुनाव आयोग में बैठाने की परंपरा पर भी लगाम लगायी जा सकेगी।  निश्चित तौर पर चुनाव आयोग ने १९९१ में शेषन युग के बाद इस बार सबसे अधिक बेबसी दिखाई है क्योंकि शेषन के बाद लगभग हर चुनाव आयुक्त ने नियमों का कड़ाई से अनुपालन किया और जनता में आयोग की साख को मज़बूत किया पर वर्तमान में आयोग ने अपनी उस बनी हुई साख को गंवाना शुरू कर दिया है और कोई नहीं जानता है कि यह अभी और कितने नीचे तक जाने वाला है?  देश को मज़बूत नेता ही नहीं बल्कि मज़बूत संवैधानिक संस्थाओं की भी बहुत अधिक आवश्यकता है क्योंकि जब तक सभी सम्बंधित तंत्र मज़बूत नहीं होंगे तब तक लोकतंत्र को मज़बूत करना केवल एक सपना ही रहने वाला है.
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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

अस्पष्ट जनादेश और नैतिकता

                                                               आज़ादी के बाद काफी समय तक देश की जनता ने केवल कांग्रेस को सत्ता देने को अपनी प्राथमिकता में रखा उसके बाद एक समय ऐसा भी आया जब संविधान के अनुरूप किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत का अभाव दिखाई देने लगा जिसके बाद गठबंधन और अल्पमत की सरकारों का दौर भी आया जिससे कई बार मध्यावधि चुनावों की स्थिति आयी जिसमें भी स्पष्ट बहुमत दूर की कौड़ी ही साबित हुआ. इस पूरी परिस्थिति के बारे में संभवतः संविधान में विचार किया गया था और साझा सरकारों की परिकल्पना भी की गयी होगी पर निर्णय लेने और जनहित में काम करने के लिए स्पष्ट बहुमत वाली सरकारों के हाथ सदैव खुले रहते हैं इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. केंद्रीय स्तर से लगाकर राज्यों तक में जिस तरह से मामूली या अस्पष्ट जनादेश दिखाई देना शुरू हुआ है उसके चलते क्या कोई और मार्ग नहीं सोचा जाना चाहिए जिससे फिर से चुनावों में जाने से पहले एक और विकल्प उपलब्ध कराया जा सके ?
                                  कर्णाटक से एक बार फिर से सत्ता पलट की खबरें आना शुरू हो चुकी हैं तो उस परिस्थिति में आखिर किसी के पास क्या विकल्प बचता है कि किस तरह से संवैधानिक रूप को बनाये रखते हुए सत्ता को चलाया जाये ? देश के प्रमुख दलों कांग्रेस और भाजपा द्वारा भी समय समय पर संविधान प्रदत्त अधिकारों का जमकर दुरूपयोग किया जाता रहा है जिनके हाथों में अधिकांश समय तक देश की बागडोर रही है. आज इनमें से कोई दल अपनी सरकार के गिरने या बनने को अपनी परिस्थिति के अनुसार इसे लोकतंत्र की हत्या या लोकतंत्र की जीत बताने में कोई शर्म महसूस नहीं करते हैं. ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए जिससे देश का लोकतंत्र मज़बूत हो और जनता की अपेक्षा के अनुरूप सरकार चलाने की व्यवस्था भी की जा सके ? क्या ये दोनों दल कभी इस तरह की किसी सम्भावना पर विचार कर कोई स्पष्ट नीति बनांने के बारे में सोचेंगें या इसी तरह से अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिए कुछ भी करने की तरफ बढ़ते चले जायेंगें ?
                               क्या यह संभव नहीं है कि किसी एक दल द्वारा बहुमत साबित न कर पाने की स्थिति में सभी दलों द्वारा जीती गयी सीटों के अनुपात में उन्हें सबसे बड़े दल को सीएम और मंत्रिमंडल में उपयुक्त स्थान देते हुए देश या राज्य की स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम बनाया जाए और अगले चुनावों तक उस पर अमल किया जाये ? हालाँकि भारत की राजनैतिक परिस्थितियों में इस तरह का कोई भी कार्य किया जाना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि सभी दलों की प्राथमिकताएं समग्र विकास के स्थान पर केवल अपने वोटबैंक को मज़बूत करने तक ही सीमित हैं. इसे इस तरह से समझा जा सकता है कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा जिस जीएसटी और एफडीआई का खुलकर विरोध किया करती थी सत्ता में आने पर वह उसकी सबसे बड़ी पैरोकार दिखाई देने लगी जिससे दलीय राजनीति के चलते देश के आर्थिक सुधारों को लागू करने में अनावश्यक रुप से विलम्ब हुआ और चिंता की बात यह है कि हम देशवासी इसके लिए किसी को भी उत्तरदायी नहीं ठहरा सकते हैं ? नीतियों पर राष्ट्रीय सहमति के साथ आगे बढ़ने की मानसिकता जब तक हमारे सभी दलों और राजनैतिक नेताओं में नहीं आएगी तब तक उनकी राजनैतिक अपेक्षाओं की प्रतिपूर्ति करने के लिए जनता के हितों का बलिदान किया जाता रहेगा।   
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शनिवार, 12 जनवरी 2019

सीबीआई विवाद और न्याय

                                   आज सिर्फ अपनी साख बचाने के लिए जिस तरह से मोदी सरकार ने सीबीआई वाले मामले में अनावश्यक दखलंदाज़ी की इससे यही पता चलता है कि इस सरकार के लिए संस्थाओं की साख कोई मायने नहीं रखती है क्योंकि जब सीबीआई का झगड़ा सतह पर आकर पूरे देश के लिए चिंता का विषय बना हुआ है उस समय सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को भी किनारे करते हुए सरकार द्वारा एक दिन पहले ही पद पर पुनर्स्थापित किए गए अलोक वर्मा को इस तरह से हटाना किस संकेत की तरफ ले जाता है ? आज जो भी समस्या है उसके लिए कहीं न कहीं सरकार के स्तर पर बरती गयी हद दर्ज़े की लापरवाही भी है जिसके चलते पूरे देश के सामने सरकार अपने तोते की गर्दन उमेठती हुई दिखाई दे रही है और अपने साथ देश के सर्वोच्च संस्थाओं की गरिमा को भी धूल में मिलाने में लगी हुई है जिसका दूरगामी परिणाम आने वाले समय में दिखाई देने वाला है क्योंकि अभी तक मोदी से सहमत लोग भी इस मामले में वर्मा के साथ हुए अन्याय को स्वीकार करने लगे हैं.
                     अस्थाना की शिकायत पर जस्टिस पटनायक की सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट में आलोक वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों को किसी भी स्तर पर सही नहीं पाया गया है और इस बात के बारे में खुद जस्टिस पटनायक ने इंडियन एक्सप्रेस से जो कुछ कहा है वह अपने आप में चिंताजनक ही लगता है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से पद पर स्थापित किये गए आलोक वर्मा की बात सुने बिना ही उनको एकतरफा तरीके से पद से हटा दिया गया अब मोदी सरकार इस निर्णय को किस तरह से सही ठहरा पायेगी यह देखने की बात होगी। हो सकता है कि आलोक वर्मा की तरफ से सेवा के दौरान कुछ अनियमितताएं भी की गई हों पर उनका पक्ष सुने बिना ही इस तरह से निर्णय करना क्या सरकार और चयन समिति के हल्केपन को नहीं दिखाता है ? यह अधिक चिंतनीय इसलिए भी हो जाता है कि इस समिति में सुप्रीम कोर्ट का प्रतिनिधित्व भी था जिसके बाद भी बिना पक्ष सुने इस तरह का निर्णय किया गया।
                     संवैधानिक मामलों के जानकारों के साथ विपक्ष भी मोदी सरकार पर देश के संवैधानिक ढांचे परम्पराओं और मूल्यों से खिलवाड़ करने के आरोप २०१४ से लगा रहे हैं फिर भी मोदी सरकार इन सारे आरोपों की अनदेखी करती चली आयी है और अब इस मामले को कांग्रेस द्वारा जिस तरह से राफेल खरीद से जोड़ना शुरू कर दिया गया है उसको देखते हुए आने वाले समय में मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ने ही वाली हैं. अच्छा होता कि एक बार में निर्णय लेने के स्थान पर अलोक वर्मा को भी अपना पक्ष समिति के सामने भी रखने का मौका दिया जाता और उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाता पर सरकार की हड़बड़ी ने पूरे माहौल में संदेह पैदा करने की गुंजाइश छोड़ दी है. कांग्रेस संसदीय दल के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने समिति के निर्णय से असहमति जताकर यह सन्देश देने में भी सफलता पाई है कि इस मामले का राफेल खरीद से जुड़ाव हो सकता है और आगामी चुनावों में यह कांग्रेस के लिए एक हथियार के रूप में प्रयोग किया जाने वाला है.       
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शुक्रवार, 4 जनवरी 2019

राम मंदिर और कानून

                                              किसी भी गंभीर मुद्दे पर देश के लोकतंत्र के चारों मुख्य स्तम्भों को किस तरह से कार्य करते हुए संविधान की रक्षा की तरफ कदम बढ़ाने चाहिए इस पर कोई एक राय अभी तक नहीं बन पायी है क्योंकि देश के सामने समय समय पर आने वाले विभिन्न मुद्दों पर जिस तरह की विभक्त राय सामने आती है उसमें कोई सर्वसम्मत हल निकाल पाना आसान भी नहीं है फिर भी इन मुख्य स्तम्भों की तरफ से किये जाने वाले प्रयासों को भी सही नहीं कहा जा सकता है. आज़ादी के बाद से देश में जिस तरह से विधायिका का क्षरण हुआ उसे कोई भी नकार नहीं सकता है जिससे उसका दुष्प्रभाव हर उस क्षेत्र पर भी पड़ा जहाँ उसका किसी तरह का दबाव संभव था. लोकतंत्र में भी देश को आखिर में नागरिकों के द्वारा ही चलाया जाना है और समाज में हर तरह के लोग मौजूद रहते हैं जिससे समय के साथ कार्यपालिका और न्यायपालिका में भी यह परिलक्षित होता दिखाई दिया।
                   इस कड़ी में ताज़ा मुद्दा राममंदिर भूमि के स्वामित्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट के सामने आने वाली सुनवाई है जिस पर हर स्तर पर राजनीति चालू है और जिस भी दल को जो कुछ अपने हित में लग रहा है सभी बिना कुछ सोचे समझे अपनी राजनीति चमकाने की कोशिशों में लगे हुए हैं. क्या किसी दल की राजनीति को देश से ऊपर समझा जा सकता है और यदि किसी विवादित मुद्दे पर जो कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित भी हो उस पर किसी को बयानबाज़ी करने से रोकने का कितना अधिकार खुद कोर्ट के पास है ? आज जिस स्तर पर राममंदिर को लेकर माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है उसका एक बार फिर से देश की उग्र राजनीति पर ही प्रभाव पड़ने वाला है और चुनावी वर्ष में आम लोगों से जुड़े मुद्दों को पीछे रखने का काम शुरू किया जा चुका है. क्या किसी दल को राजनैतिक लाभ मिलने या किसी दल को हानि होने की सम्भावना के बीच सुप्रीम कोर्ट के पास यह अधिकार उपयोग करने की शक्ति नहीं है कि वह किसी भी मामले को देश के माहौल के अनुरूप सुनवाई करने के लिए ले सके ?
                                    बीते तीन दशकों में राममंदिर को लेकर जिस स्तर पर राजनीति हो चुकी है क्या हमारा सुप्रीम कोर्ट उसे नहीं समझता है? आज एक बार फिर से कोर्ट के बाहर इस मुद्दे को गर्माने की कोशिशें शुरू की जा चुकी हैं क्योंकि चुनावी वर्ष में जनता के बीच आज देश चला रही भाजपा और उसके पीएम मोदी का प्रभाव कम हुआ है. वैसे पीएम मोदी ने बहुत कुछ किया है पर पिछले आम चुनावों से पहले उन्होंने जनता की आकांक्षाओं को जिस हद तक बढ़ाया था उसे पूरा करने में आज वे खुद को विफल पा रहे हैं जिससे विपक्षी दल भी इस मसले को लेकर उन पर हमलावर हैं. राममंदिर के मुद्दे को पूरी तरह से कोर्ट के निर्णय आने तक स्थगित रखना चाहिए क्योंकि इस मुद्दे पर देश में पहले ही बहुत कुछ हो चुका है और तेज़ी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था यदि आज इस तरह के मामलों में उलझती है तो आने वालेसमय में देश के लिए अपने विकास की गति को बनाये रखना मुश्किल ही होने वाला है.
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शनिवार, 15 दिसंबर 2018

राजनीति का अपराधीकरण ?

                                 एमपी में हुए चुनावों के बाद जिस तरह से वहां जीते हुए विधायकों के बारे में सूचना सामने आयी है वह वास्तव में चौंकाने वाली है क्योंकि २३० की विधान सभा में ९४ विधायकों के खिलाफ मुक़दमें दर्ज़ हैं जो लगभग ४१% होते हैं. इसमें भी ४५ के खिलाफ गंभीर किस्म के मामले दर्ज़ हैं तो ऐसी स्थिति में यह प्रश्न स्वाभाविक ही है कि क्या आने वाले दिनों में राज्य की सत्ता सँभालने वाली कमलनाथ सरकार इनके मामलों में कुछ तेज़ी लाने का प्रयास करेगी ? यह भी संभव है कि कुछ नेताओं के खिलाफ मात्र राजनैतिक दुर्भावना के तहत ही मामले दर्ज़ हों पर जिन लोगों के खिलाफ गंभीर मुक़दमे चल रहे हैं उनके लिए अब केवल एमपी सरकार ही नहीं बल्कि केंद्रीय स्तर पर भी कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है. एक राज्य के प्रयासों को पूरे देश में लागू नहीं किया जा सकता है इसके लिए सुरीम कोर्ट की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए अब ठोस और प्रभावी क़दमों के बारे में सोचना शुरू करना ही होगा.
                        देश की राजनीति में अपराधियों का प्रभाव बढ़ने की घटना पर विचार करना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि एक समय अपनी लोकप्रियता में कमी आने के कारन कुछ स्थानों पर नेताओं ने स्थानीय अपराधियों के माध्यम से मतदान केंद्रों पर कब्ज़े कर चुनाव जीतना शुरू कर दिया था. कुछ समय बाद अपराधियों की समझ में यह आया कि जब इन हथकंडों से वे किसी नेता को चुनाव जितवा सकते हैं तो इनका अपने लिए उपयोग क्यों नहीं कर सकते हैं ? भारतीय राजनीति के अपराधीकरण की पृष्ठभूमि यहीं से तैयार हुई जो आज देश की विधायिका के लिए भले ही चिंता की बात न हो पर न्यायपालिका ने अपने स्तर से कई बार इस बारे में कड़े कानून बनाने के लिए निर्देशित भी किया है परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि अपराधियों से सांठगांठ के चलते आज किसी भी दल के लिए अपने दल को अपराधियों और उनके प्रभाव से मुक्त करने की इच्छाशक्ति ही नहीं बची है।
                       अब समय आ गया है कि किसी एक राज्य से इस परिवर्तन को शुरू किया जाये जिससे भारतीय राजनीति को आज़ादी के बाद की स्वच्छता के स्तर पर लाया जा सके. क्या स्वच्छ भारत अभियान सिर्फ भौतिक कूड़े कचरे से निपटने के लिए ही चलाया जा रहा है ? क्या अब समय नहीं आ गया है कि इस स्वच्छ भारत अभियान में हर तरफ की सफाई को शामिल किया जाये जिससे समाज को राजनीति का वह स्वरुप दिख सके जिसकी परिकल्पना भारतीय संविधान में की गयी है।  नेताओं को केवल वही बातें अच्छी लगती हैं और वे केवल उन्हीं पर अपना पूरा ध्यान केंद्रित रखना चाहते हैं जिनसे उन्हें तात्कालिक और दूरगामी परिणाम मिलते रहते हैं. अब समय आ गया है कि जनता भी अपने स्तर से यह देखे कि किस राजनैतिक दल ने किस श्रेणी के अपराधों में शामिल लोगों को अपने प्रत्याशी बना रखा है इससे राजनैतिक दलों पर भी समुचित दबाव बनाया जा सके और आने वाले समय में देश की राजनीति में अपराधियों के स्तर को कम करने में सफलता पायी जा सके.   

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शनिवार, 2 जून 2018

गैर भाजपाई गठबंधन

                                                          संसद में सबसे अधिक सदस्यों को भेजने वाले यूपी में विपक्षी तालमेल के चलते भाजपा को जिस तरह से लगातार भाजपा विरोधी वोटों के लामबंद होने से उपचुनावों में हार का मुंह देखना पड़ रहा है उससे आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि भाजपा की मोदी सरकार भी पता नहीं क्यों अटल सरकार की तरह पुनः आत्ममुग्धता का शिकार होती जा रही है ?  भाजपा के सामने २००४ का उदाहरण बहुत पुराना नहीं हुआ है फिर भी उसकी तरफ से जिस तरह से एक प्रचारवादी अभियान चलाया जाने लगा है वह कई बार धरातल की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता है जो उसके साथ पहली और पिछली बार चुनावों में जुड़े उन तटस्थ मतदाताओं को उससे दूर करने का काम करता है जिसके दम पर उसे लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला था। मोदी शाह और भाजपा को यह समझना ही होगा कि आज उनको राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की विकल्पहीनता का लाभ अधिक मिल रहा है और यदि किसी मज़बूत एजेंडे पर विपक्षी दल एकजुट होते हैं तो २०१९ का चुनाव भाजपा के लिए एक दुःस्वप्न भी बन सकता है जहाँ कम अंतर से हारने वाले उसके सांसदों की संख्या बहुत अधिक रह सकती है.
                       विपक्ष में जिस तरह से हर बड़े नेता की आकांक्षा पीएम बनने की तरफ जाती हुई दिखाई देती है उसे किसी भी स्तर पर गलत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि हर राजनीतिज्ञ के लिए आगे बढ़ना एक बड़ा सपना होता है और वह किसी भी परिस्थिति में अपने को आगे बढ़ाना भी चाहता है. जब एक बड़ी चुनौती के रूप में मोदी विपक्ष के सामने हैं तो उनसे निपटने के लिए अपनी तात्कालिक विरोध को दरकिनार कर अगर यूपी में माया मुलायम अजीत और कांग्रेस ने समझदारी से सीटों का बंटवारा कर लिया तो भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ सकती है जहाँ तक यह कहा जा रहा है कि यह बेमेल गठबंधन अधिक समय तक नहीं चल पायेगा तो यह भी संभव है कि अंतर्विरोधों के चलते गठबंधन दो साल भी न चल पाए पर उसके बीच में आकर सत्ता सँभालने से भाजपा के लिए बहुत समस्या हो सकती है क्योंकि आज मोदी शाह की जिताऊ जोड़ी की तानशाही संघ से लगाकर पार्टी के हर स्तर पर नेताओं द्वारा महसूस की जा रही है पर सत्ता हाथ से जाते ही क्या भाजपा के महत्वाकांक्षी नेता इन पर हमला नहीं करने लगेंगें ? आज जो दबी जबान से सुनाई देता है वह कल खुलेआम दिखाई भी दे सकता है जिससे खुद भाजपा की संभावनाओं पर असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है.
                         परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों पर अब राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस को खुद को साबित करने का अंतिम अवसर मिला हुआ है और जिस तरह से अपने वजूद के लिए संघर्ष करती हुई कांग्रेस ने अहमद पटेल के चुनाव के बाद से हर मोर्चे पर लड़ने की इच्छा दिखाई है उससे उनके हताश कार्यकर्ताओं का मनोबल भी मज़बूत हुआ है. राहुल गाँधी के पास अभी बहुत समय है और इस सच्चाई को वह समझ रहे हैं यह उनके और कांग्रेस के लिए अच्छी बात है क्योंकि देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने और गुजराल सरकार को समर्थन देने की राजनीति करने वाली कांग्रेस में पिछले २२ सालों में बहुत कुछ बदल चुका है. विपक्ष के पास भी अधिक समय नहीं है क्योंकि मोदी सरकार में जिस तरह से संगठित तरीके से विपक्षी नेताओं को देशविरोधी साबित करने की कोशिश की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है और यदि यह परिस्थिति २०२४ तक बनी रही तो देश के ताने बाने में बहुत कुछ बदल सकता है. कौन पीएम होगा और कौन नहीं इस बात पर विचार करना अभी जल्दबाज़ी होगी क्योंकि जब तक भाजपा की संख्या को २०० तक सीमित करने में विपक्षी दल सफल नहीं होंगें तब तक नेताओं के चयन की कोई बात कम नहीं करने वाली है राज्यों में मज़बूत दलों को अपने राज्य में खुद के लिए अधिक और कांग्रेस के लिए कम सीटें छोड़ने और केंद्र में कांग्रेस के लिए अधिक सीटें छोड़ने जैसे किसी सम्मानजनक स्तर पर बात करनी होगी तभी २०१९ में उनके लिए कुछ संभव होगा वर्ना मोदी अपनी पूरी ताकत झोंक कर एक और आजम चुनाव को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए तैयारी करने में व्यस्त हो चुके है.    
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शुक्रवार, 18 मई 2018

केंद्र और संवैधानिक पद

                                                                   कर्नाटक में त्रिशंकु विधानसभा के सामने आने के बाद जिस तरह से राजनैतिक घटनाक्रम में तेज़ी से बदलाव दिखाई दिया उससे किसी को भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि हमारे नेताओं की नैतिकता केवल तभी तक रहती है जब तक उनको अनैतिक कार्य करने का मौका नहीं मिलता है और इस काम में केंद्र में सत्ताधारी दल की तरफ से सदैव ही दबाव देकर काम किया जाता रहता है. आज़ादी के बाद से जिस तरह से धीरे धीरे केंद्र सरकार ने अपने अधिकारों का नैतिकता के मापदंडों को किनारे करते हुए दुरूपयोग शुरू किया था उसका दुष्परिणाम आज सबके सामने है और सबसे अधिक चिंता की बात तो यह है कि आज़ादी के बाद से जो गलती गैर-भाजपाई दलों ने सदैव ही की थी आज उसको नज़ीर बताकर खुद भाजपा भी उससे नीचे जाने को तैयार दिखाई देती है. खुद को पार्टी विद डिफ़रेंस कहने वाली भाजपा कुछ मौकों पर यदि पूर्ववर्ती सरकारों से अलग हटकर राजयपालों को संविधान की मंशा के अनुरूप काम करने के लिए खुला छोड़ना शुरू कर देती तो वास्तव में उसकी तरफ से एक नए राजनैतिक युग की शुरुवात की जा सकती थी पर देश को येन केन प्रकारेण कांग्रेस मुक्त करने की धुन में मोदी शाह की जोड़ी भाजपा को कांग्रेस का अन्य संस्करण बनाने की तरफ बढ़ती ही जा रही है जिससे देश में मूल्यों की राजनीति के और भी नीचे जाने की संभावनाएं हैं.
                                                 निश्चित तौर पर जब संविधान लिखा गया तो उस समय देश की आज़ादी के लिए लड़ने वाले नेताओं की पूरी फौज मौजूद थी जिनमें नैतिकता कूट कूट कर भरी हुई थी तो उन्होंने अपनी सोच के अनुरूप ही काम शुरू किया और राज्यों में सरकार बनाने के लिए पूरा दारोमदार राज्यपाल के विवेक पर सिर्फ इसलिए  छोड़ दिया क्योंकि यह माना गया था कि लोकतंत्र की मूल भावना बहुमत के आधार पर राज्यपाल को निर्णय लेने का अधिकार दिया जाना चाहिए। कालांतर में अपनी राजनीति और अपने या सहयोगी दलों की सरकारों को बचाने के लिए केंद्र सरकारों की तरफ से जिन हथकंडों का उपयोग किया उससे निश्चित तौर पर भारतीय लोकतंत्र कमज़ोर ही हुआ है और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि आम जनमानस को भाजपा से कुछ उम्मीदें थीं कि वह इस तरह के क़दमों से खुद को दूर रखेगी उसकी आशाओं पर भाजपा पूरी तरह से विफल रही है. यह भी सही है कि हर राजनैतिक दल को अपने विस्तार के लिए काम करने की पूरी छूट है पर क्या यह विस्तार किसी भी कीमत पर किसी भी तरह से किये जाने को सही माना जा सकता है ?
                                                 राज्यपालों की तरफ से लगातार विवादित फैसले लेने की स्थिति में क्या अब समय नहीं आ गया है कि देश से राज्यपाल पद की ही विदाई कर दी जाये क्योंकि उनके राजनैतिक विचारधाराओं और पूर्वाग्रह के चलते जिस तरह से अधिकांश मामले कोर्ट में पहुँचने लगे हैं तो क्यों न सरकार गठन में चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के साथ राज्यों के हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों की भूमिका को निर्धारित कर दिया जाये ?  इन दोनों संवैधानिक पदों पर बैठे हुए लोगों के पास राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं लगभग नहीं होती हैं और कम से कम अभी तक तो इन दोनों संस्थाओं के काम काज से आम जनता संतुष्ट ही नज़र आती है तो संविधान के अनुरूप प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चुनने की ज़िम्मेदरी आखिर उनको क्यों नहीं दी जा सकती जिससे राज्यपाल के अनावश्यक पद पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपयों को बचाने के बारे में सोचने की ज़िम्मेदारी आखिर किसकी है ?  देश में सरकार के खर्च को कम करने में लगे हुए वित्त मंत्री को इस दिशा में कानून मंत्रालय के साथ विचार विमर्श करना चाहिए जिससे इस फालतू पद को समाप्त किया जा सके। क्या राजनीति के बूढ़े शेरों के आरक्षित अभ्यारण्य बन चुके राजभवनों को देश की वर्तमान राजनीति पर हमला करने की स्थिति से बचाने के लिए अब इन अभ्यारण्यों को बंद करने का समय नहीं आ गया है ?
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 15 अप्रैल 2018

एक राष्ट्र एक चुनाव की परिकल्पना

                                                मोदी सरकार की देश में लोकसभा- विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाने की मंशा पर विभिन्न स्तरों पर विचार करने की दिशा में काम शुरू हो गया है पर क्या इस तरह प्रयास से आने वाले समय में देश को कोई लाभ होगा या फिर देश एक नयी तरह की तानाशाही युक्त लोकतान्त्रिक अराजकता की तरफ बढ़ जायेगा ? आज के समय भी जिस तरह से त्रिशंकु सदन बनने पर सरकार बनाना पूरी तरह से केंद्र सरकार की मंशा पर ही निर्भर हो चुका है उससे आने वाले समय में केंद्र की तरफ से पड़ने वाले अनावश्यक दबाव से राज्यों के नेता किस तरह से निपट पायेंगें यह बहुत बड़ी चुनौती होने वाला है. यह सही है कि हर वर्ष कभी भी किसी न किसी राज्य में चुनाव होने से लागू होने वाली आचार संहिता के चलते विकास कार्यों की गति में रुकावट पैदा होती है पर क्या नेताओं को यह सोचने का समय नहीं है कि आज उनको आचार संहिता लागू होने से इतना कष्ट क्यों होता है जबकि यह परंपरा आज़ादी के बाद से ही चली आ रही है ? आचार संहिता लगाने का सीधा सा मतलब यही हुआ करता था कि सत्ताधारी दल और पूरे विपक्ष के लिए चुनावों से पूर्व एक समान वातावरण में जनता के सामने जाने का विकल्प खुला रहे. आज आचार संहिता से विकास रुकने की प्रक्रिया का आरोप लगाने वाले नेता क्या यह स्वीकार कर सकते हैं कि उनकी नीतियां भी चुनावों को प्रभावित करने के लिए ही होती हैं ?
                                         एक साथ चुनाव होने पर सबसे बड़ी समस्या तब सामने आएगी जब केंद्र या किसी राज्य में कोई सरकार अल्पमत में आ जाएगी तब किस तरह से सांसदों या विधायकों की खरीद फरोख्त की जाएगी इसका अंदाज़ा आज आसानी से लगाया जा सकता है क्योंकि राज्यसभा और राज्यों की विधान परिषदों के चुनावों में जिस तरह से कुछ हद तक धन कुबेरों को हर पार्टी मैदान में उतारती रहती है उससे अल्पमत वाली सरकार को  बचाने के लिए सरकार समर्थक धन कुबेर और उद्योगपति परदे के पीछे के खेल में धन का दुरूपयोग कर क्या लोकतंत्र का मज़ाक नहीं उड़ाएंगे ?  लोकतंत्र नैतिकता के आधार पर टिकता और चलता है पर केन्द्र की मोदी सरकार ने जिस तरह से कई राज्यों में सबसे बड़े दल की राज्यपालों के माध्यम से अनदेखी कर किसी भी परिस्थिति में अपने गठबंधन की सरकारें बनाने की गलत परंपरा शुरू कर दी है वैसी स्थिति में कोई महत्वाकांक्षी केंद्र सरकार सभी राज्यों में राजनैतिक गतिविधियों को आसानी से अपने अनुसार मोड़ने की तरफ क्या नहीं बढ़ जाएगी? भारत जैसे विविधता भरे देश में जनता के सामने हर स्तर पर अपने मनपसन्द उम्मीदवार को चुनने का अवसर संविधान की तरफ से दिया गया है जिससे आज देश के कई हिस्सों में क्षेत्रीय दल भी सफलता के साथ सरकारें चला रहे हैं पर एक साथ चुनाव होने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति भी बन सकती है जो राजनीति को केवल राष्ट्रीय दलों के बीच में ही सीमित करने का काम भी क्र सकती है ?
                                         सबसे बड़ा मुद्दा धन को बचाने और विकास की गति को निरंतर बनाये रखने से जुड़ा है तो इस मामले के लिए सबसे पहले नेताओं को अपने गिरेबान में झाँकना होगा क्योंकि सरकार कोई भी दल चलाये पर देश की समस्याएं तो वही रहती हैं तो संसद और विधान सभाओं से होने वाले विधायी कार्यों पर ध्यान देकर नीतियों को लम्बे समय के लिए लागू करने की दिशा में सोचना चाहिए जैसे एक समय देश में पञ्चवर्षीय योजनाएं और २० सूत्री कार्यक्रम चला करते थे जिससे किसी भी चुनाव के आने जाने से इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर किसी तरह की रोक नहीं होती थी. क्या आज देश के नेताओं को एक चुनाव से अधिक एक अलग सोच के साथ विकास के बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है? योजना आयोग हो या बदले नाम नीति आयोग जब तक नेताओं की मंशा साफ़ नहीं होगी तब तक किसी भी परिस्थिति में चुनावी सुधारों को सही तरह से लागू नहीं किया जा सकता है।  आखिर सरकार की मंशा केवल चुनाव एक साथ कराने के सुधारों तक ही क्यों रुकी हुई है क्या देश के सम्पूर्ण चुनाव परिप्रेक्ष्य पर विचार का उसमें आज के अनुसार बदलाव करने की आवश्यकता सरकार को महसूस नहीं हो रही है ?  चुनाव सुधारों को केवल अपने परिप्रेक्ष्य में देखने से परिस्थितयां बदलने वाली नहीं है और सबसे बड़ी समस्या त्रिशंकु और अल्पमत की सरकारों वाले राज्यों में सामने आने वाली है क्योंकि वहां पर चुनाव हो नहीं पायेंगें तो क्या अघोषित रूप से केंद्र अपने हिसाब से राष्ट्रपति शासन लगाकर वहां की बागडोर सीधे अपने हाथों में नहीं ले लेगा ?
                                       इस सबसे अच्छा यही रहेगा कि चुनावों के लिए प्रति वर्ष एक महीना निर्धारित कर लिया जाये और पूरे वर्ष में कभी भी होने वाले चुनावों को केवल उसी महीने में कराने की दिशा में काम शुरू कर दिया जाये इससे जहाँ राज्यों में एक साथ एक वर्ष में चुनाव समाप्त हो जायेंगें वहीं किसी भी तरह की समस्या आने पर अगले वर्ष उसी महीने में फिर से चुनाव कराये जा सकेंगें। क्या किसी भी राज्य में चुनाव कराने के लिए आयोग को इतना लम्बा समय देना चाहिए कि नेता अपने अनुसार पूरे चुनाव को मोड़ने का समय पा जाएँ और खुलेआम लोकतंत्र का चीर हरण कर सकें ?  विकास अवरुद्ध होने  की अवधारणा सामने लाने वाले दलों को अब यह सोचना होगा कि उनकी  प्रभावित करने वाली नीतियों के चलते समस्याएं अधिक होती है न कि देश में अलग अलग समय चुनाव होने से यह सब प्रभावित होता है। 

मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

एक साथ चुनाव

                               देश में इस समय लोकसभा और विधानसभा चुनावों के एक साथ कराये जाने की संभावनाओं पर गंभीर विचार शुरू भी नहीं हुआ है पर जिस तरह से इस पर बातें की जा रही हैं वे कहीं न कहीं से इस बात को रेखांकित अवश्य करती हैं कि सरकर चुनाव आयोग इस दिशा में सोच अवश्य रहे हैं. यह बात कहने में जितनी आसान लगती है क्या उसे धरातल पर उतार पाना भी संभव है अब इस बात पर विचार की आवश्यकता भी है. लोकतंत्र में राजनैतिक अस्थिरता के आने के साथ ही १९६७ में लोकसभा और विधान सभा चुनावों का साथ छूट सा गया और उसके पहले होने वाले चुनावों की गति टूटती सी नज़र आयी क्योंकि केंद्र और राज्यों में स्पष्ट बहुमत या गठबंधन की सरकारों के न चल पाने से चुनावों की तिथियां एक दूसरे से अलग होती चली गयी जिसका आज का स्वरुप हम सबके सामने है. आज जो परिस्थिति है उसमें भाजपा या एनडीए शासित राज्य तो पीएम की इस योजना को आगे बढ़ाने के लिए राज़ी हो सकते हैं पर विपक्षी दलों की तरफ से जहाँ उसकी सरकारें अभी दो वर्ष पुरानी भी नहीं है क्यों इस प्रयोग का साथ दिया जायेगा ? आज पीएम मोदी की जो छवि है उसके साथ दोनों चुनाव एक साथ होने की दशा में भाजपा का काम आसान हो जायेगा वहीं विपक्षी दलों के लिए लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों को संभाल पाना कठिन ही होने वाला है इसलिए राजनैतिक स्तर पर इस विचार को बहुत अधिक समर्थन नहीं मिलने वाला है क्योंकि यह सब बिना संविधान संशोधन के संभव नहीं हो सकता है जिसके लिए केंद्र को दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी.
                         यह सही है कि इस तरह से एक साथ होने वाले चुनावों में समय और धन की बर्बादी को रोका जा सकता है पर क्या सभी चुनाव एक साथ कराने के लिए सरकार चुनाव आयोग को इतना धन दे पाने में समर्थ हो सकती है ? एक अनुमान के अनुसार यदि पूरे देश के लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराये जाते हैं तो आयोग को वीवीपैट मशीनों के लिए लगभग २००० करोड़ रुपयों की आवश्यकता पड़ेगी साथ ही जब ये चुनाव एक साथ होंगें तो इन मशीनों का १५ वर्ष की आयु होने के कारण केवल तीन बार ही उपयोग किया जा सकेगा तो क्या केंद्र सरकार इस तरह के खर्चे को वहन करने के लिए तैयार है जिसमें सरकार को हर वर्ष आज की कीमत के अनुसार १०० करोड़ रूपये प्रतिवर्ष से भी अधिक खर्च करने पड़ेंगें ? सरकार की सोच सही हो सकती है पर इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए लम्बा समय लगने वाला है जिसके लिए अभी हमारे देश में संसाधन ही उपलब्ध नहीं हैं. यदि यह मान लिया जाये कि आगामी २०१९ में ही यह दोनों चुनाव साथ में किये जाएँ तो उसके लिए आवश्यक धन की व्यवस्था तो हो सकती है पर इतने कम समय में वीवीपैट मशीनों की उपलब्धता के बारे में पहले से ही विचार करने की ज़रुरत होगी क्योंकि उनके बिना इस तरह के चुनाव करा पाना संभव ही नहीं होगा.
                            सरकार का यह कहना कुछ हद तक सही है कि लगातार कहीं न कहीं होते रहने वाले चुनावों से विकास की गति आचार संहिता के कारण धीमी पड़ती रहती है जिसको कुछ हद तक सही माना जा सकता है पर समस्या यहाँ विकास के धीमे होने की नहीं बल्कि अपनी अपनी दलीय राजनीति को चमकाने को लेकर ही है क्योंकि सदनों में राज्यों और केंद्र की योजनाएं केवल अपने हितों को साधकर बनाये जाने की जो परंपरा चल पड़ी है जब तक इस पर राजनैतिक दल खुद ही अंकुश नहीं लगायेंगें तब तक विकास अपनी गति को नहीं पा सकता है. क्या सरकारें बदल जाने से जनता के विकास से जुड़े सरोकार बदल जाते हैं ? क्या राजनैतिक दलों को भी इसके लिए संविधान में उत्तरदायी नहीं बनाया जाना चाहिए कि वे सदनों में बैठकर कुछ मुद्दों पर कम से कम बीस वर्षों के लिए एक राष्ट्रीय नीति बनायें और उस पर हर दल चलने को बाध्य हो साथ ही समय समय पर उसकी समीक्षा के साथ आवश्यक संशोधनों को भी करने की व्यवस्था भी की जाये जिससे सब कुछ सही दिशा में सही तरह से चल सके. कोई भी दल केवल अपने राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए इस तरह के विचारों को सामने लाता है तो उसको स्वीकार कर पाने में सभी को कठिनता होने वाली है.
                          इस दिशा में शुरुवात इस तरह से की जा सकती है कि देश भर में जहाँ भी विधान सभा चुनाव होने हैं उसका समय वर्ष भर में एक महीने में ही कर दिया जाये जिससे हर वर्ष आयोग और सरकार चुनावों के लिए तैयार रह सकें. जैसे किसी राज्य में जनवरी किसी में अप्रैल और किसी में अक्टूबर नवम्बर में चुनाव होने हैं तो उनको वर्ष के एक महीने में ही कराने की दिशा में कदम बढ़ाये जाएँ जिससे पूरे वर्ष होने वाले इस चुनावी उत्सव को कुछ महीनों में ही निपटाया जा सके. यदि यह प्रक्रिया सही तरह से पटरी पर आ जाती है तो आने वाले समय में लोकसभा और विधान सभा चुनावों को भी एक साथ कराने की दिशा में सोचा जा सकता है. पर्वतीय राज्यों में चुनाव गर्मियों के मौसम में कराये जाने के बारे में सोचा जाना चाहिए जिससे प्रशासन को कम चुनौतियों का सामना करना पड़े और जनता की भागीदारी को भी बढ़ाया जा सके. केंद्र सरकार को इस दिशा में केवल बयान देने के स्थान पर सर्वदलीय बैठक से शुरुवात करनी चाहिए फिर जिन राज्यों के चुनाव लोकसभा के १ साल के आगे पीछे होने हैं वहां की सरकारों और विधानसभा अध्यक्षों की एक बैठक बुलानी चाहिए जिससे इस पर सही दिशा में आगे बढ़ने पर सफलता मिलने की सम्भावना बढ़ सके.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

अधिकारियों का सरकार प्रेम

ऐसा नहीं है कि देश में पहले कभी अधिकारियों द्वारा सरकार या पार्टी की नीतियों और मंशा के अनुरूप काम न किया जाता हो पर जिस तरह से अयोध्या विवाद में यूपी के डीजी होमगार्ड्स ने भाजपा से जुड़े मुसलमानों के एक मंच पर उनके साथ भव्य राम मंदिर निर्माण के लिए शपथ खायी उससे यही लगता है कि अब अधिकारियों में कार्यवाही का डर ही नहीं रह गया है. यह सही है कि हर व्यक्ति की निजी ज़िंदगी भी होती है और देश का संविधान उसे अपने धर्म, परंपरा और मूल्यों के अनुरूप जीवन जीने की पूरी स्वतंत्रता भी देता है पर जब कोई शासन या प्रशासन में जाता है उसे भारत के संविधान के प्रति शपथ लेनी होती है. फिर भी जिस तरह से पहले बरेली के डीएम ने कानून व्यवस्था में रोज़ ही सामने आने वाली नयी समस्या को लेकर प्रश्न उठाया वह भी सर्विस रूल के अनुसार गलत ही कहा जायेगा पर उनकी मंशा उन लोगों की तरफ इशारा करने की थी जो किसी भी परिस्थिति में अपनी ज़िद के कारण यूपी में लगातार प्रशासन के लिए सर दर्द बनते जा रहे हैं. डीजी होमगार्ड्स ने जिस तरह से एक कार्यक्रम में शपथ ली उससे स्थिति की गंभीरता को आसानी से समझा जा सकता है अयोध्या मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और किसी भी विचाराधीन मामले पर टिप्पणियां करने या उनके पक्ष विपक्ष के किसी कार्यक्रम को आयोजित करने से कोर्ट की अवमानना होती है. वैसे तो देश के सभी राजनैतिक दल अपने चुनावी लाभ को देखकर विभिन्न मुद्दों पर कोर्ट के आदेशों कि धज्जियाँ उड़ाते रहते हैं पर एक वरिष्ठतम पुलिस अधिकारी जिस पर कानून व्यवस्था को बनाये रखने की ज़िम्मेदारी हो ऐसे विचाराधीन मामले में किस तरह से ऐसा कर सकता है ? बरेली के डीएम के मामले में उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या ने उनके पार्टी प्रवक्ता जैसी बात करने और अनुशासन में रहने की बात की थी पर डीजी के मामले में अभी तक चुप्पी संदेहों को जन्म देती है.   
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शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

राष्ट्रपति और राजनीति

                                                       निर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के जीतने पर एक बार फिर से उनके दलित्त होने को मुखर रूप से समाचारों में रेखांकित किया जा रहा है जबकि उनके जीत जाने के बाद इस तरह की बातें किये जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी. निश्चित तौर पर अपने प्रत्याशी को जिताने लायक संख्या होने पर कोई भी सरकार या पीएम अपनी पसंद के कम समस्या पैदा करने वाले व्यक्ति को ही राष्ट्रपति पद पर देखने के आकांक्षी होते हैं और साथ ही देश के राजनैतिक पटल पर भी अपने समीकरणों को साधने की कोशिशें करते हुए देखे जाते हैं तो ऐसी स्थिति में पीएम मोदी और भाजपा की तरफ से यदि ऐसा किया गया तो कोई बड़ी बात नहीं है. वैसे भी पीएम मोदी के बारे में कहा जाता है कि उन्हें असहमति के शब्द अच्छे नहीं लगते हैं तो आज किसी को भी इस पद तक पहुँचाने की स्थिति में मज़बूत पीएम मोदी ने भी देश के सर्वोच्च पद के लिए कोविंद का चुनाव करके एक तरह से अपनी स्थिति को और मज़बूत ही किया है. सरकार किस व्यक्ति को इस पद पर देखना चाहती है यह उसकी मर्ज़ी है और उस पर सवाल लगाने का कोई मतलब भी नहीं बनता है पर दलित होने के साथ विवादों से दूर रहना कोविंद के लिए उस समय बहुत काम आया जब पीएम मोदी उनके जैसे व्यक्ति को खोज रहे थे.
                                     देश में राष्ट्रपति पद पर बैठे राजनैतिक व्यक्तित्वों में से कई लोगों ने तो अपने पद के साथ पूरी तरह से न्याय किया वहीं कई लोगों की तरफ से केवल सरकार के रबर स्टैम्प की भूमिका ही निभाई गयी. एक समय इंदिरा गाँधी कि हाँ में हाँ मिलाने वाले ज्ञानी जैल सिंह ने भी राजीव गाँधी की मज़बूत सरकार के लिए परेशानी भरे पल पैदा कर देने में कोई कस्र नहीं छोड़ी थी. देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी जिस तरह से इस पद की गरिमा को बचाये रखने के लिए लगातार कोशिशें की थीं वे अपने आप में एक उदाहरण हैं और आज कोविंद से उस तरह एक आचरण की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. आम तौर पर पार्टी में सक्रिय नेताओं को जीवन के अंतिम चरण में राष्ट्रपति बनाकर पुरुस्कार देने की परंपरा सी चलती आयी है पर इस मामले में सबसे चौंकाने वाला निर्णय कमज़ोर कहे जाने वाले पीएम मनमोहन सिंह की तरफ से उठाया गया था जब वे राजनैतिक स्तर पर संसद से सड़क तक घिरे हुए थे तो भी उन्होंने अपनी सरकार में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले और विभिन्न विपरीत परिस्थितियों में उनकी सरकार को संकट से उबारने वाले लम्बे राजनैतिक जीवन के अनुभवी प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए आगे किया था.
                                प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल अपने आप में बहुत अच्छा कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने देश में पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ बनने वाली भाजपा की सरकार और पीएम मोदी के साथ तीन वर्षों से भी अधिक समय तक काम किया और कहीं से भी सरकार या विपक्ष के साथ किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार या पक्ष का पोषण नहीं किया. बिहार के राज्यपाल के रूप में कोविंद का कार्यकाल भी बहुत अच्छा रहा तभी जेडीयू ने विपक्ष से अलग चलते हुए उनके लिए वोट करने के बारे में सोचा था. कोविंद से भी पूरा देश निष्पक्ष रूप से अपनी राय रखने और सरकार के साथ विपक्ष और देश के मौजूदा हालातों पर नज़र रखने की अपेक्षा ही रखता है. मज़बूत पीएम मोदी अपने गुरु आडवाणी या सुषमा स्वराज जैसे राजनैतिक रूप से बेहद मुखर नेता को इस पद तक पहुँचाने का वो साहस नहीं दिखा पाए जो पीएम के रूप में मनमोहन सिंह ने अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी को यहाँ पहुंचाकर किया था. वैसे तो राष्ट्रपति के लिए करने को कुछ ख़ास नहीं होता है फिर भी कोविंद से देश यह आशा तो कर ही सकता है कि अब वे भी केवल संघ, भाजपा या मोदी के पीएम के स्थान पर पूरे देश के राष्ट्रपति बनकर उसी तरह का आचरण दिखाएंगें जैसा उनके पूर्ववर्ती प्रणब मुखर्जी द्वारा दिखाया गया है.   
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मंगलवार, 18 जुलाई 2017

नेता, अधिकारी और शासन

                                          देश के हर राज्य से कभी न कभी इस तरह की ख़बरें सामने आती ही रहती हैं कि किसी अधिकारी ने किसी राजनैतिक दबाव की परवाह न करते हुए केवल कानून की परवाह की और किसी भी स्तर के नेता से जुड़े मसले पर केवल कानून सम्मत कोशिशें ही की हों. ईमानदारी अधिकारियों के दंडात्मक तबादलों में देश के हर राज्य और हर राजनैतिक दल का रिकॉर्ड लगभग एक जैसा ही है इसलिए यह बहस करना ही बेमानी है कि इस समस्या से आखिर किस तरह से निपटा जा सकता है ? आज जिस तरह से आम लोगों का रुझान सरकार और उसके कामों की तरफ बढ़ता ही जा रहा है उस परिस्थिति में किसी भी नेता या सरकार की हरकत को छिपाना बहुत ही मुश्किल काम हो गया है फिर भी नेता पूरी बेशर्मी के साथ अपने काम को करने में नहीं हिचकते हैं. कहने के लिए तो पूरे देश में कानून का राज है पर इस ग़लतफ़हमी को पालने वाले अधिकांश अधिकारी किस तरह से लगभग हर दल की सरकार में केवल धक्के ही खा रहे हैं यह किसी से भी छिपा नहीं है फिर भी केंद्र सरकार ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के साथ काम करने वाले अधिकारियों को हर वर्ष विभिन्न तरह के सम्मान देने की अपने खोखली प्रक्रिया को जारी रखे हुए है.
                            ताज़ा मामले में शशिकला को जेल में दी जा रही विशेष सुविधाओं से जुड़े खुलासे के बाद कर्णाटक सरकार ने जिस तरह से डी रूपा का स्थानांतरण किया वह अपने आप में नेताओं की उस मानसिकता को ही दर्शाता है जो हर परिस्थिति में अधिकारियों को दबा कर रखने में ही विश्वास किया करते हैं. कहने के लिए यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के अंतर्गत ही आता है पर इसके पीछे कितनी राजनीति छिपी होती है यह सभी जानते हैं. वैसे भी जेल में बंदी नेताओं और उनके समर्थकों को लेकर भारत भर में कानून की लगभग हर समय धज्जियाँ ही उड़ाई जाती रहती हैं पर किसी ईमानदार अधिकारी के चलते कई बार इसका खुलासा भी हो जाता है. परिस्थिति तब और गंभीर और चिंताजनक हो जाती है जब किरण बेदी जैसी अधिकारी भी सुविधा के अनुसार मामलों पर प्रतिक्रिया देने का काम करने लगती हैं. अभी कुछ समय पहले यूपी में कई अधिकारियों और भाजपा नेताओं के बीच भी इसी तरह की ख़बरें आयी थीं तब बेदी ने किसी का भी समर्थन नहीं किया क्योंकि वहां पर उनकी पार्टी की सरकार चल रही है पर कर्णाटक से जुड़ा मामला होने के कारण उन्हें अधिकारी की ईमानदारी दिखाई देने लगी है. भारतीय राजनीति के साथ सामंजस्य बैठाने में जब किरण बेदी जैसी पूर्व पुलिस अधिकारी का यह हाल हो जाता है तो आम अधिकारियों से किसी निष्ठा की आशा कैसे की जा सकती है ?
                            ऐसे किसी भी मामले से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को कड़े नियम बनाने और उन पर अमल करने के बारे में सोचना ही होगा तभी कुछ सही किया जा सकता है वर्ना हमेशा की तरह कोई अधिकारी खेमका, नागपाल या रुपा की तरह तबादले ही झेलने को अभिशप्त रहने वाला है. राजनैतिक मामलों से जुड़े किसी भी प्रकरण में तबादला आखिरी हथियार होना चाहिए और इस तरह के मामलों में विधायिका के पूरी तरह से फेल हो जाने के कारण न्यायपालिका को इसमें खुला हस्तक्षेप करने की छूट भी होनी चाहिए क्योंकि ये जनहित से जुड़े मुद्दे ही होते हैं. अधिकारियों के समय पूर्व तबादले के लिए विशेष कड़े नियम होने चाहिए और उन पर अमल करना सरकार के लिए बाध्यकारी भी होना चाहिए किसी भी तरह के विवाद के सामने आने पर जिला जज, जिलाधिकारी और राज्य व केंद्र की तरफ से आये हुए प्रतिनिधियों की समिति में ही उनके तबादले पर निर्णय किया जाना चाहिए जिससे ईमानदार अधिकारियों के लिए काम करने लायक माहौल को बनाये रखा जा सके. कहने को नेता यह कह सकते हैं कि इससे सरकार की कार्यक्षमता पर दुष्प्रभाव पड़ेगा और अधिकारी निरंकुश हो जायेंगें पर सोचने की बात तो यह है कि आज ऐसे कितने अधिकारी बचे हैं जो हर तरह की परिस्थिति में केवल कानून के अनुसार चलने की हिम्मत और विश्वास रखते हैं ? अधिकारियों को नेताओं के इस चंगुल से निकालने के लिए किसी न किसी को किसी न किसी स्तर पर प्रयास करना ही होगा जिससे आने वाले समय में प्रशासन और शासन के बीच इस तरह के खेल को बंद किया जा सके और ईमानदार अधिकारी अपना कार्य पूरी क्षमता के साथ कर सकें.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 29 जून 2017

सेना और राजनैतिक समझ

                                                       देश की आज़ादी के बाद से ही जिस तरह से महत्वपूर्ण मामलों में सेना की तरफ से सीधे बयान देने के अतिरिक्त किसी अन्य मसले पर कुछ भी बोलने पर के तरह से अघोषित रूप से राजनैतिक समझ बनी हुई थी और उस पर सरकार के साथ विपक्षी दल भी सहमत ही रहा करते थे अब उस स्थिति में व्यापक बदलाव दिखाई दे रहा है जिसके चलते सेना को जहाँ विभिन्न मुद्दों पर बोलने की छूट मिली है वहीं उस पर विपक्षी दलों की तरफ से राजनैतिक हमलों में भी बढ़ोत्तरी देखी जा रही है. यह ऐसी स्थिति है जिससे सेना को पूरी तरह से अलग रखे जाने की आवश्यकता है क्योंकि देश के संविधान को बनाने वालों ने किसी कमज़ोर और विपरीत राजनैतिक परिस्थिति में मज़बूत सेना की तरफ से सत्ता पर कब्ज़ा किये जाने की संभावनाओं पर विचार करते हुए ही इस तरह की व्यवस्था की थी जिसमें राष्ट्पति, सरकार, रक्षा मंत्रालय के बीच में शक्तियों का बहुत अच्छा समन्वय भी किया गया था. आज जिस तरह से सेना को राजनैतिक रूप से संवेदनशील मसलों पर भी बोलने की छूट दी जा रही है वह मोदी सरकार की रणनीति है जिसमें वह उन बयानों को सेना के माध्यम से दिलवाने की कोशिश में है जिन पर उसके बोलने पर सवाल खड़े किये जा सकते हैं और बाद में वह सरकार पर सवाल खड़े करने वालों पर खुद प्रश्नचिन्ह लगाती है कि विपक्षी दल सेना पर हमले कर रहे हैं जिससे अपने पर आने वाले राजनैतिक दबाव को वह सेना की तरफ मोड़ने में सफल होते भले ही दिख रहे हैं पर भविष्य में इसके खतरे तब सामने आ सकते हैं जब मोदी भारत के राजनैतिक परिदृश्य से ओझल हो चुके होंगे.
                                              भारतीय सेना को ऐसे ही संयुक्त राष्ट्र मिशन और अन्य अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चलने वाले द्विपक्षीय मिशनों में शामिल नहीं किया जाता है पूरा विश्व जानता है कि हमारी सेना पूरी तरह से राजनीति से सिर्फ इसलिए दूर रहती है क्योंकि उसके लिए संविधान में स्पष्ट प्रावधान किये गए हैं और कुछ भी अस्पष्ट नहीं है. भारतीय सेना ने सदैव ही विदेशों तक में अपनी कर्तव्यनिष्ठा के बल पर देश के मान सम्मान को बढ़ाने का काम किया है. वर्तमान में जिस तरह से सरकार की तरफ से सेना के अधिकारियों को प्रेस के सामने लाया जा रहा है वह सेना की उस छवि से मेल नहीं खाता है और इसके दुष्परिणाम भी हो सकते हैं. सितम्बर में सेना की सर्जिकल स्ट्राइक का प्रारम्भ में सभी राजनैतिक दलों ने स्वागत किया पर जब सरकार की तरफ से उसका दुरूपयोग किया गया तो टीवी से लगाकर प्रेस तक उसके सबूत मांगने वाले नेता भी सामने आते दिखाई दिए. इस घटना से नेताओं की वह समझ ख़त्म सी होती लगी जिसमें वे अघोषित रूप से ही सही पर सेना को लेकर अनावश्यक वियवादों से दूर ही रहा करते थे. भारत के सेनाध्यक्ष की पूरी दुनिया में बहुत इज़्ज़त की जाती है वह सिर्फ इसलिए नहीं कि भारतीय सेना विश्व की बड़ी सेनाओं में है बल्कि इसलिए कि उनके नेतृत्व में काम करने वाली यह सेना पूरी तरह से अपनी कर्तव्य निष्ठा के लिए जानी जाती है.
                                             पहले संदीप दीक्षित फिर आज़म खान की तरफ से आने वाले बयानों से उनकी पार्टियों ने सिर्फ इसलिए ही पल्ला झाड़ लिए क्योंकि ये बयान अनावश्यक थे और इनका केवल राजनैतिक दुरूपयोग ही किया जा सकता है. इसके बाद यह सोचा जाना चाहिए कि जिन परिस्थितियों में सेना काम करती है उसमें उससे क्या अपेक्षाएं की जानी चाहिए और सेना के संयम की क्या सीमा होनी चाहिए ? नेता तो कुछ भी बोल देते हैं पर जब उस पर विवाद बढ़ता है तो वे बेशर्मी के साथ अपने बयानों के और दूसरे मतलब भी समझाने लगते हैं. संदीप दीक्षित और आज़म खान कोई कल के युवा नेता नहीं है जिनको इस बात का एहसास नहीं है कि कब क्या कहा जाना चाहिए फिर भी यदि उनकी तरफ से ऐसे बयान आते हैं तो मामले के दोनों पक्षों को भी गौर से देखा जाना चाहिए. देश की संसद जिसके पास कानून बनाने की क्षमता है और वहां बैठने वाले जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए यह समय सोचने का है कि उनकी तरफ से आखिर क्या गलती की जा रही है जिससे आज सेना उनके आपसी राजनैतिक विवादों का मोहरा बनती हुई नज़र आ रही है ? क्या सदन के दोनों पक्षों के पास इतनी समझदारी नहीं बची है कि वे सेना से जुड़े मुद्दों पर सार्वजनिक रूप से कुछ भी बोल देने से बचने की तरफ सोचना शुरू करें ? विभिन्न राजनैतिक दलों को क्या कुछ कड़े अनुशासन के बारे में नहीं सोचना चाहिए जिसका अनुपालन करना सभी नेताओं के लिए अनिवार्य हो और उनमें विफल होने पर क्या नेताओं के लिए पार्टी स्तर पर कोई दंडात्मक प्रावधान भी नहीं होने चाहिए ? जब तक सत्ता के लिए सेना को भी बैसाखी के रूप में उपयोग कर लेने की प्रवृत्ति से छुटकारा नहीं पाया जायेगा तब तक नेताओं की इस नई बीमारी को समाप्त नहीं किया जा सकता है.
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शुक्रवार, 23 जून 2017

राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति

                                                अपने संख्या बल के आधार पर अपने प्रत्याशी को रायसीना हिल्स तक पहुँचाने की मज़बूत स्थिति में राजग के सामने विपक्ष की तरफ से कोई बड़ी चुनौती नहीं है क्योंकि इस चुनाव में अधिकांशतः सत्ता पक्ष अपने व्यक्ति को महत्वपूर्ण पद पर लाना चाहता है जिसे किसी भी तरह से गलत भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश के संवैधानिक मुखिया के पद पर बैठने वाले व्यक्ति और प्रधानमंत्री के बीच किसी भी तरह की अनबन या विवाद की ख़बरें सामने आती हैं तो वे दलीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के लिए सुखद नहीं कही जा सकती हैं. इस पद का केवल शोभन महत्व होने के चलते ही देश के गणतंत्र बनने के बाद से हर सत्ताधारी दल अपने प्रत्याशी को चुनने में सभी संभव राजनैतिक समीकरणों को साधने के लिए प्रयासरत रहा करता है. वर्तमान में यदि भाजपा और मोदी सरकार इस पर के लिए कोविंद को सामने लायी हैं तो यह उनका पार्टी और राजग से जुड़ा हुआ मामला है उनके चुने गए प्रत्याशी पर किसी को भी सवाल उठाने का अधिकार नहीं है. आज देश में राजनीति का स्तर बहुत निम्न हो चुका है जिससे बचने का कोई समाधान नहीं है तथा सोशल मीडिया के बढ़ते चलन और नेताओं की हरकतों ने उन्हें पूरे देश में मज़ाक का विषय बना दिया है.
                                  वैसे तो देश में पूर्ण बहुमत की सरकार है और कोई विशेष संकट भी दिखाई नहीं देता है पर क्या हमारे देश के नेताओं को अपने देश के राष्ट्रपति और भारतीय सेना के सर्वोच्च कमांडर को चुनने में कुछ और सावधानियां नहीं बरतनी चाहिए ? वैसे तो राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह मानने को बाध्य होता है पर किसी विशेष परिस्थिति में उनकी भूमिका अचानक से बहुत बढ़ जाती है जैसे १९८४ में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद देश के लिए नए प्रधानमंत्री को शपथ दिलाने का काम ज्ञानी जैल सिंह पर आ गया था और उन्होंने कांग्रेस की सलाह से राजीव गाँधी को इस पद की शपथ दिलाई थी ज़रा सोचिये उस या उसके जैसी किसी भी संकट कालीन परिस्थिति में किसी महत्वाकांक्षी व्यक्ति के राष्ट्रपति होने पर वह अपने किसी व्यक्ति को शपथ दिला सकता है क्योंकि जब उसको सलाह देने वाला पीएम ही नहीं होगा तो उस स्थति में उसके अधिकारों का दुरूपयोग संभव हो सकता है. अभी तक राष्ट्रपति पद पर सत्ताधारी दलों ने अपने सीनियर नेताओं को ही बिठाया है जिसमें से केवल डॉ कलाम एक अपवाद हैं क्योंकि उस समय अटल सरकार अपनी पसंद के किसी राजनैतिक व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाने की स्थिति में नहीं थी तो उनका चुनाव सरकार की मंशा के अनुरूप राष्ट्रपति चुनने की सफल कोशिश कहा जा सकता है.
                                   दुर्भाग्य है कि आज भी देश के राजनैतिक तंत्र को शीर्ष पदों के लिए जातीय गणित भी देखनी होती है क्योंकि समाज के हर वर्ग को हर राजनैतिक दल अपनी तरफ खींच कर अपने वोटबैंक में शामिल करना चाहता है तो उस स्थिति में इन शीर्ष पदों तक राजनीति से किसी भी तरह से परहेज़ नहीं किया जा सकता है. आज की भाजपा में अटल-आडवाणी-जोशी की राजनीति और उसका समर्थन करने वालों की संख्या नगण्य होती जा रही है और निजी कारणों से मोदी शाह की जोड़ी भी भाजपा की अंदरूनी राजनीति में अपने लिए आने वाले दशक तक कोई संकट न आने देने के लिए इनके प्रभाव को और भी कम करने में लगी हुई है. ऐसी परिस्थिति में कोविंद का राष्ट्रपति चुना जाना लगभग तय ही है क्योंकि भाजपा में बड़े स्तर पर कोई क्रॉस वोटिंग होगी इसकी सम्भावना न के बराबर है हाँ आडवाणी के घोर समर्थक कहीं कहीं पर भाजपा के प्रत्याशी को वोट देने से कतरा सकते हैं क्योंकि विपक्ष की तरफ मीरा कुमार को प्रत्याशी बनाये जाने से राजग के लिए यह चुनाव थोड़ा चुनौतीपूर्ण अवश्य हो गया है पर कोविंद के जीतने की पूरी सम्भावना है. भाजपा में आज कोई भी मोदी शाह के निर्णय के विरोध में नहीं बोल सकता है क्योंकि आडवाणी, जोशी, राजनाथ, सुषमा का हाल किसी से भी छिपा नहीं है इसलिए क्रॉस वोटिंग की आशा करना ही बेकार है हाँ भाजपा के सामूहिक नेतृत्व के आदी रहे नेताओं के लिए मोदी शाह का कांग्रेसी संस्कृति के अनुरूप काम करना चुभ तो रहा है पर वे कुछ भी करने कई स्थिति में नहीं है. इस चुनाव में कोविंद के लिए विपक्ष की तरफ से कोई खतरा नहीं है पर भाजपा में यदि भितरघात (जिसकी संभावनाएं बहुत कम हैं) होता है तो चुनाव पेचीदा हो सकता है.    
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शनिवार, 20 मई 2017

तीन तलाक़

                                  मुसलमानों में तीन तलाक़ की स्थिति को लेकर जिस तरह से हर पक्ष अपनी अपनी बातों को लेकर स्पष्टीकरण देने में लगा हुआ है उससे यही लगता है कि यह पूरा मामला इस्लाम में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से सम्बंधित होते हुए भी कानूनी उलझनों और बिना बात के बयानों में उलझता जा रहा है. किसी भी देश में नागरिकों को मिले मौलिक अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त हैं और भारतीय संविधान लिंग, धर्म, जाति, भाषा और नस्ल के आधार पर किसी भी भेदभाव के खिलाफ अपनी मंशा दिखाता है पर साथ ही मौलिक अधिकारों के अनुपालन में सभी नागरिकों से यह अपेक्षा भी रखता है कि वे संवैधानिक और कानूनी मुद्दों से टकराने वाले विभिन्न धार्मिक मुद्दों पर स्वयं ही कोई राह निकालने की मंशा भी रखें जिससे हर बात पर अनावश्यक रूप से विवाद न खड़े हो सकें. निश्चित तौर पर तीन तलाक़ की व्यवस्था इस्लामी निकाह में है पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट में यह स्वीकार किया कि वह भी मानता है कि तीन तलाक़ का ज़िक्र पवित्र क़ुरान में नहीं है उससे यही लगता है कि बोर्ड में भी तीन तलाक़ को लेकर मतभेद रहे हैं कि इस मुद्दे से किस तरह से निपटा जाये जिससे महिलाओं के अधिकारों की समग्र रक्षा भी हो सके और समाज की इस परंपरा पर कोई अनावश्यक रूप से उंगली भी न उठा सके.
                                 भारतीय मीडिया में जिस तरह से तीन तलाक़ को ख़त्म किये जाने की बात कही जा रही है असलियत में वैसा कुछ भी नहीं है क्योंकि हर पक्ष अपनी आवश्यकताओं के अनुसार बयान देने में लगा हुआ है और वह तथ्यों को अपने अनुसार मोड़ने का काम भी करने से नहीं चूक रहा है. मसला तीन तलाक़ को पूर्ण रूप से ख़त्म करने का कभी भी नहीं रहा है क्योंकि इस व्यवस्था को इस्लामिक माना जाता है अभी भारत में तीन तलाक़ की जो व्यवस्था चल रही है उसका क़ुरान में कहीं भी ज़िक्र नहीं है यह बात अब बोर्ड ने भी मानी है क्योंकि एक साँस में तीन बार तलाक़ बोले जाने को वर्षों दशकों पहले कई इस्लामिक देशों में खत्म किया जा चुका है जिसमें पाकिस्तान और सऊदी अरब जैसे देश भी शामिल हैं. देश की आम जनता जिसमें हिन्दू मुसलमान सभी शामिल है उनको यह लग रहा है कि इस बार कोर्ट या सरकार तीन तलाक़ को ही ख़त्म कर देगी जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है क्योंकि मामला असलियत में तलाक़ दिए जाने की प्रक्रिया पर ही टिका हुआ है जिससे भ्रम की स्थिति बनती जा रही है. यह भी अच्छी बात है कि खुद बोर्ड की तरफ से भी निकाह के समय ही मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ से सम्बंधित और अधिकार दिए जाने सम्बन्धी संशोधनों और मुस्लिम समाज में तीन तलाक़ के वर्तमान स्वरूप के बारे में स्पष्टीकरण देने और समाज को जागरूक करने की बात की जा रही है क्योंकि समाज के अंदर की कमियों को समाज के प्रबुद्ध वर्ग और समाज के लिए काम करने वाले संगठनों के माध्यम से ही बड़े परिवर्तन बिना किसी विरोध के आसानी से किये जा सकते हैं.
                           सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ ने इस मामले में अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है और आने वाले समय में उसका इस मुद्दे पर निर्णय भी आ सकता है ऐसी स्थिति में जो भी निर्णय हो पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को अपने स्तर से भारत के इस्लामी समाज में वे वदलाव लाने के बारे में प्रयास शुरू करने ही चाहिए जिससे केवल तीन तलाक़ ही नहीं बल्कि अन्य मुद्दों पर भी जहाँ मुसलमानों को विभिन्न तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है उन पर भी सुधारात्मक प्रयास शुरू करने चाहिए. इस प्रयास से जहाँ पूरे समाज में विमर्श और सुधार की प्रक्रिया को शुरू करने में आसानी होगी वहीं आस्था से जुड़े वे मुद्दे जो समय के साथ परंपरा में बदल गए उन पर भी क़ुरान के अनुसार चलने की व्याख्या की जा सकेगी. मुस्लिम समाज में इस्लाम धर्म से जुड़े उन मसलों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता को यदि बोर्ड समझता है तो यह भारत के मुसलमानों और देश के लिए अच्छा ही साबित होगा क्योंकि मुद्दों को टालने से उन पर विवाद बढ़ते हैं जो अंत में न्यायिक समीक्षा और कानून बनाने की स्थिति तक चले जाते हैं. यदि विभिन्न इस्लामिक देशों में तीन तलाक़ के भारतीय स्वरुप को गैर इस्लामिक किया जा चुका है तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को भी इस मुद्दे पर तभी निर्णय ले लेना चाहिए था जिससे इस्लाम के मूल सिद्धांतों की अनदेखी किये बिना ही सही रास्ते पर चलने के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ जाती.          
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मंगलवार, 7 मार्च 2017

चुनाव सुधार में नैतिकता

                                                       देश में होने वाले चुनावों में नेताओं की भाषा और नैतिकता का स्तर जिस तरह से निरंतर रसातल की तरफ जा रहा है उसको देखते हुए अब चुनाव सुधारों में ही इस बात की आवश्यकता भी समझी जानी चाहिए कि नेताओं को दंड के भय से अनुचित बातें कहने और आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने से रोकने के बारे में भी उचित और कठोर संशोधन किये जाएँ. एक समय था जब बड़े नेताओं से लगाकर छोटे स्तर तक की राजनीति में सक्रिय लोग किसी भी परिस्थिति में नैतिकता की सीमाओं का सम्मान किया करते थे पर आज जिस तरह से हम आधुनिक हुए उसके साथ ही हम अपनी सभ्यता और शिष्टाचार के साथ संस्कारों को कहीं बहुत पीछे छोड़ चुके हैं. इसका समाज पर तो कुछ कम असर दिखाई देता है पर राजनेता हर स्तर पर निरंतर अपने निम्नतम स्तर तक पहुँचने में लगे हुए हैं. इस परिस्थिति से निपटने के लिए अब चुनाव आयोग के पास केवल प्राथमिकी दर्ज कराने से आगे बढ़कर तुरंत ही इस पर सुनवाई करके नेताओं को त्वरित रूप से प्रचार से वंचित कर दिया जाना चाहिए जिससे वे आने प्रचार को ध्यान में रखते हुए शालीनता को किसी भी स्तर पर छोड़ने से पहले कई बार सोचने को मजबूर हो जाएँ.
                                  आज सोशल मीडिया चुनाव प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगा है पर उसके लिये स्पष्ट दिशा निर्देश नहीं होने के चलते वहां पर भी चुनावी लाभ के लिए विभिन्न दलों द्वारा विरोधी दलों पर हमले करने के लिए फ़र्ज़ी वेबसाइट्स चलायी जा रही हैं और जिनके माध्यम से समाज में विभाजन के माध्यम से वोट बटोरने के काम किया जाता रहता है. नियमों में कमी के चलते आज चुनाव आयोग केवल शिकायतों के सही पाए जाने पर प्राथमिकी दर्ज करने तक ही सीमित रह जाता है और नेता भी जानते हैं कि उनकी इस समाज को विभाजित करने वाली भाषा या व्यक्तिगत आरोपों से जो चुनावी लाभ मिलना है वह तो मिल ही जायेगा पर आयोग तुरंत उनका कुछ भी नहीं बिगाड़ पायेगा. आज जब आयोग के पास सीमित अधिकार ही हैं तो उन्हें बढ़ाये जाने की आवश्यकता पर कोई क्यों विचार नहीं करता है ? किसी भी चुनावी क्षेत्र में किसी भी नेता द्वारा आचार संहिता का उल्लंघन करने के मामले को चुनाव आयोग के प्रेक्षक को शिकायत आने के स्थान पर स्वतः संज्ञान के माध्यम से देखना चाहिए और राज्य या केंद्रीय स्तर पर इस पर विचार करने के स्थान पर जिला जज की अदालत में उपलब्ध सबूतों के आधार पर विशेष चुनावी अदालत में एक सुनवाई में ही फैसला देने का प्रावधान किया जाना चाहिए और जिस नेता के विरुद्ध मामला दर्ज हो जाये उसे फैसला आने तक प्रचार से दूर कर दिया जाना चाहिए.
                                  एक ज्वलंत प्रश्न यह भी है कि आज की परिस्थिति में चुनाव आयोग को क्या देश कि विधायिका इतनी अधिक शक्तियां देना भी चाहेगी क्योंकि अंत में यह उनके कुछ भी बकवास करने के असीमित अधिकार पर ही वार करने में प्रयुक्त किये जाने वाला हैं ? पर अब समय आ गया है कि सभी दलों को इस बारे में विचार करना ही होगा वर्ना एक दिन किसी जनहित याचिका की सुनवाई में कोर्ट की तरफ से ऐसा कोई आदेश आ जायेगा जिसमें ऐसे संशोधनों को करने के अतिरिक्त संसद और सरकार के पास विकल्प शेष ही नहीं बचेंगें. इसलिए इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर अनमने ढंग से संशोधन करने के स्थान पर एक चुनाव संशोधन आयोग बनाया जाए जिसमें केंद्र और राज्य चुनाव आयोग के पूर्व आयुक्तों के साथ सभी पक्षों की राय को व्यापक रूप से जानने का प्रयास किया जाये तथा इंटरनेट और पत्राचार के माध्यम से आम जनता को भी इस मामले में अपनी राय देने के लिए कहा जाये. इतना महवपूर्ण संधोधन केवल संसद के माध्यम से ही न किया जाए क्योंकि आम लोग इस बारे में क्या कमियां पाते हैं इस पर भी विचार अवश्य किया जाना चाहिए. चुनाव संशोधन में समग्रता की आवश्यकता है क्योंकि आज चुनाव देश की आवश्यकता से अधिक विकास और नीतियों से जुड़े हुए हो गए हैं कोई भी राजनैतिक दल अपने लाभ के लिए किसी भी स्तर पर मनमानी न कर सके इसे रोकने के बारे में अब सोचने का सही समय आ गया है.      
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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

चुनाव सुधार-इन्टरनेट और मतदान

                                                       चुनाव सुधारों के साथ ही बेहतर मतदान प्रतिशत में जिस तरह से हमारे देश ने पिछले ढाई दशकों में महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है उसे किसी भी स्तर पर कम नहीं कहा जा सकता है फिर भी इतनी बड़ी आबादी में हर बूथ पर लगभग १५०० अधिकतम मतदाताओं से सीमित समय में मतदान करवा पाना आयोग के साथ मतदान कर्मियों के लिए भी एक बड़ी चुनौती के रूप में बचा हुआ है. देश की घनी आबादी वाले राज्यों में आज भी कुछ मतदान केंद्रों पर इतने अधिक मतदाता हैं कि समय सीमा में उनसे वोट डलवाने में हर बार समस्या ही होती रहती है. इससे निपटने के लिए जहाँ हज़ार की आबादी पर मतदान केंद्र सुनिश्चित किया जाना चाहिए वहीं मतदान कर्मियों को भी इस बात के लिए जागरूक किया जाना चाहिए कि सम्पूर्ण काम तेज़ी से किया जाये जिससे मतदान में लगातार तेज़ी बनी रहे और मतदान के प्रतिशत को भी बढ़ावा दिया जा सके. इसके अतिरिक्त कुछ क्षेत्रों में प्रायोगिक तौर पर इन्टरनेट से मतदान करवाने की प्रक्रिया पर भी विचार किया जाना चाहिए जिससे जो आम लोग इन्टरनेट का उपयोग करते हैं वे इसका उपयोग करके देश के सुरक्षित भविष्य के लिए अपनी भागीदारी भी सुनिश्चित कर सकें और भीड़ का बहन बनाकर मतदान न करने वालों को भी चुनावी प्रक्रिया में सफलता से जोड़ा जा सके.
                                  इसके लिए तैयारियों के रूप में सबसे पहले वोटर आईडी को आधार संख्या से जोड़ना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिससे फ़र्ज़ी रूप से दो जगह वोट डालने और इन्टरनेट पर पहचान को सुनिश्चित करने के लिए कड़े कदम उठाये जा सकें. इन्टरनेट से चुनाव की तैयारियों के लिए आयोग को नेट पर ही लोकसभा/ विधान सभा/ स्थानीय निकाय/ पंचायतों के लिए क्षेत्र के अनुसार वेबसाइट्स बनानी होंगीं जिन पर अंतिम रूप से वोटिंग मशीन की जो प्रतिकृति हो उसे प्रदर्शित किया जाये जिससे इच्छुक मतदाता इस पेज पर जाकर अपना वोट डाल सकें. इसके बाद जो भी मतदाता इस सुविधा का उपयोग करना चाहता हो उसके लिए मतदान शुरू होने से तीन दिन पूर्व ही अपने आधार से जुड़े मोबाइल या इन्टरनेट के माध्यम से सम्बंधित क्षेत्र की वोटिंग के लिए पंजीकरण करना भी आवश्यक हो इस पंजीकरण के साथ ही मतदाता को उसके पंजीकृत मोबाइल पर एक ओटीपी भेजा जाये जिसका उपयोग मतदान के समय किया जाये तथा केवल इससे ही नहीं वरन इन्टरनेट से मतदान करने के समय अपनी वोटिंग मशीन का बटन दबाने के पूर्व एक और ओटीपी भेजा जाये जिसके भरने के बाद ही वोट को वैध माना जाये वरना उस वोट की गिनती नहीं होनी चाहिए. इस तरह की दोहरी व्यवस्था से जहाँ फ़र्ज़ी रूप से मतदान को रोकने में मदद मिलेगी वहीं मतदाता को भी यह आश्वासन मिल जायेगा कि उसका मतदान सुरक्षित और गोपनीय तरीके से हो चुका है. मतदान के बाद मतदाता को उसके वोट के बारे में एक सन्देश भेजा जाये जिसमे यह बताया जाये कि उसका वोट किस प्रत्याशी को गया है जिससे मतदाता के अधिकार भी सुरक्षित रह सकें.
                         इसके साथ ही आधार से जुड़े मतदाताओं के लिए आने वाले समय में जब देश भर में ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क और भारत ब्रॉडबैंड सेवाएं पूरी तरह से चालू हो जायेंगीं तब मोबाइल वोटिंग वैन/ बूथ के बारे में भी सोचा जा सकता है जिसमें वोटिंग मशीन में बायोमेट्रिक व्यवस्था भी की जाए और इन्टरनेट से जुड़े होने के कारण यह मतदाता की पहचान को सुनिश्चित करने के बाद उसे वोट डालने की अनुमति दे सकता है जिससे सुरक्षा और अन्य खर्चों में कटौती के साथ बहुत कुछ तेज़ी से सुरक्षित मतदान को किया जा सकता है. एक वैन की सुरक्षा में उतने पुलिस बल की आवश्यकता भी नहीं पड़ेगी और न ही किसी अन्य तरह के मतदान कर्मियों की क्योंकि एक बार जिसका वोट पड़ जायेगा वह दोबारा वोट नहीं डाल सकता है. एक सम्भावना यह भी हो सकती है कि पहले इन्टरनेट से वोट डालने के बाद मतदाता बूथ पर जाकर भी वोट डालने का प्रयास करे तो उस स्थिति से निपटने के लिए इन्टरनेट की वोटिंग बूथ की वोटिंग बंद होने के बाद पांच बजे से ही खोली जा सकती है जिससे इस समस्या से भी बचा जा सके. इस वोटिंग को अगले दिन शाम पांच बजे तक खुला भी रखा जा सकता है क्योंकि इन वोटों की गिनती मशीन से अलग इन्टरनेट के माध्यम से ही होगी. इस पूरी प्रक्रिया में निश्चित तौर पर राजनैतिक दल हो हल्ला ही मचाने वाले हैं क्योंकि उनको यही लगता रहेगा कि इसका दुरूपयोग होगा जबकि इनकी तरफ से सबसे पहले वोटिंग मशीनों के उपयोग को शुरू करने के समय भी यह सब कहा गया था और उनका यह संदेह पूरी तरह से निराधार ही साबित हुआ है. इसलिए अब चुनाव आयोग को नेट आधारित डिजिटल चुनाव के बारे में भी विचार करना चाहिए और तकनीक का पूरा लाभ आम मतदाताओं तक भी पहुँचाना चाहिए.            
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बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

चुनाव सुधार की तरफ

                                                       केंद्र सरकार की तरफ से चुनाव सुधारों पर कुछ पहल करते हुए जिस तरह से लोकसभा और राज्यों के विधान सभा चुनावों के एक साथ कराने की बात कही जा रही है उससे निश्चित तौर पर देश के धन को बचाने में मदद मिलेगी पर क्या भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में इस तरह की किसी गतिविधि से केंद्र में शासन कर रहा दल निरंकुश नहीं हो सकता है ? आज की परिस्थिति में चूंकि कहीं न कहीं किसी राज्य में प्रतिवर्ष चुनाव होते रहते है तो उनके कारण कुछ कदम उठाने से पहले सरकारों को सोचना भी पड़ता है पर जब यह सब पूरी तरह से ख़त्म हो जायेगा तो सरकारों पर किसी भी तरह का अंकुश नहीं रहेगा और स्पष्ट जनादेश को कुछ भी करने की मनमानी वाली व्याख्या के साथ राजनैतिक दल देश के लिए कभी भी बड़ी समस्या खड़ी कर सकते हैं जिससे किसी भी स्तर पर लोकतंत्र को मज़बूत नहीं किया जा सकेगा. इसके साथ ही किसी भी राज्य में राजनैतिक अस्थिरता आने पर क्या वहां की सरकार को भंग कर राष्ट्रपति शासन के माध्यम से कमान केंद्र को सौंप दी जाएगी या दलों के विधायकों की संख्या के आधार पर एक प्रादेशिक सरकार बना दी जाएगी जो अगले चुनाव तक सामान्य शासन चलाने के लिए अधिकृत होगी ? खर्च बचाने के लिए जिस तरह के बेतुके तर्क आज सामने आ रहे हैं तो क्या सरकार चला रहे दलों और उनके नेताओं से यह सवाल भी नहीं पूछा जाना चाहिए कि जनता के पैसों को वे राज्यों में घूमकर क्यों बर्बाद करते रहते हैं ? क्या वे देश को डिजिटल करने के साथ अपने घूमने फिरने पर होने वाले खर्च को रोकने के लिए तत्पर हैं क्योंकि देखा जाये तो अधिकांश बर्बादी हमारे नेताओं की तरफ से होती रहती है.
                              किसी भी तरह के सुधार से पहले देश को शत प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करने के बारे में अधिक ध्यान लगाना होगा जिसके लिए डिजिटल मंच का उपयोग विभिन्न परीक्षणों के बाद किया जा सकता है. जो लोग डिजिटल तरीके से अपने वोट को देना चाहते हों उनकी वोटर पहचान संख्या को सबसे पहले आधार से जोड़ने का काम किया जाना चाहिए जिससे उनकी पहचान के बारे में सुनिश्चित हुआ जा सके इसके बाद जिन क्षेत्रों में चुनाव हो रहा है उनकी वोटिंग मशीन के अंतिम प्रारूप को चुनाव सम्बंधित आयोग की वेबसाइट पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए. जो भी मतदाता डिजिटल माध्यम से अपने वोट को डालना चाहते हैं उनको मतदान से पहले एक सन्देश के माध्यम से पंजीकरण कि सुविधा देनी चाहिए तथा मतदान शुरू होने के बाद मतदाता को फिर से अपने चुनाव क्षेत्र के पेज पर जाकर अपनी जानकारी भरनी हो जिसके बाद एक ओटीपी सन्देश मतदाता के मोबाइल पर आये जिसे समुचित स्थान पर भरकर मतदाता अंतिम रूप से अपने वोट को देने का पात्र बन सके. इस तरह से मिलने वाले सभी वोटों को नेट पर ही सुरक्षित रखे जाने के साथ ही भविष्य में वोटिंग मशीनों को भी नेट से जोड़ना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिससे सारे वोट एक साथ में जोड़े जा सकें और मशीनों को भी सिंक्रोनाइज़ किया जा सके. इसके बाद मतगणना केंद्रों पर एजेंटों कि उपस्थिति में यह सारा काम करने के बाद परिणाम जानने की तरफ बढ़ना चाहिए. इस पूरी व्यवस्था से जहाँ सरकार के संसाधनों को कम किया जा सकता है वहीं भीड़ के कारण मतदान का प्रतिशत कम होने की समस्या से भी निपटा जा सकता है क्योंकि आज बहुत से मतदाता भीड़ के चलते भी वोट डालने से परहेज़ कर जाते हैं.
                                       ऐसी परिस्थिति में क्या चुनावों को भी राष्ट्रीयकृत करने सरकार की तरफ से चुनावी खर्च दिए जाने की बातें नहीं होनी चाहिए ? क्या देश में धर्म और जातियों पर आधारित हो चुकी हमारी राजनैतिक व्यवस्था को भी इस मसले के साथ ही हल किये जाने की आवश्यकता नहीं है ? हमारे चुनाव सुधारों में कुछ ऐसे प्रयास भी होने चाहिए कि विभिन्न राजनैतिक दल केवल पार्टी के नाम पर ही वोट मांग सकें हालाँकि भारत जैसे विविधता वाले देश में यह बहुत ही कठिन काम साबित होने वाला है फिर भी यदि प्रयास किये जाएँ तो कुछ भी कठिन नहीं है. आज टिकट वितरण से लगाकर सीएम और मंत्रियों के चुनाव तक में भी जातीय, क्षेत्रीय और धार्मिक आधार पर विचार करना एक मजबूरी सी बन गयी है और सभी राजनैतिक दल इस समस्या को खड़ी करने के बाद अब इससे जूझते ही नज़र आते हहिं जिससे जातीय और धार्मिक आधार पर बनती हुई जनता को भी सही विकल्प नहीं मिल पाते हैं और कई बार दलीय निष्ठा के चलते बहुत बुरे विकल्प जनता के सामने चुनाव में दिखाई देने लगते हैं. चुनाव आयोग और संसद को इस मसले पर गंभीरता से विचार करना ही होगा तभी राजनीति के नाम पर जो सामाजिक विद्वेष लगातार बढ़ाया जाता है उस पर अंकुश लगाया जा सकता है साथ ही चुनावी माहौल में बढ़ती हुई कटुता को भी कम किया जा सकता है.
                                       देश के लिए समग्र नीति नेताओं के स्थान पर विशेषज्ञों से बनवाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि एक बार जब हमारे लिए दीर्घावधि की योजनाएं बन जाएंगीं तो उन पर चलना लगभग हर सरकार की मजबूरी ही हो जायेगा इन दीर्घ कालीन नीतियों में बदलाव के लिए संसद के २/३ बहुमत की आवश्यकता भी अनिवार्य की जानी चाहिए जिससे अच्छी नीतियों को केवल विरोध के कारण कोई भी राजनैतिक दल अनावश्यक रूप से रोक न सके. क्या हमारे नेता इस मसले पर भी एक मत नहीं हैं कि देश के लिए क्या आवश्यक है और क्या प्राथमिकताएं होनी चाहिए क्योंकि जब तक हम लंबे काल के लिए सोचना शुरू नहीं करेंगें दलीय प्रतिबद्धताएं हमारे हर क्षेत्र में बाधाएं खड़ी करती रहने वाली हैं. चुनाव पूरी तरह बिना अनाप-शनाप खर्च के संपन्न होना चाहिए और इसमें आयोग को भी तकनीक का अधिक उपयोग करते हुए सुरक्षा बलों और अन्य मदों में होने वाले खर्चों को रोकने की कोशिश करने में विधायिका को पूरी मदद भी देनी चाहिए जिससे देश में आदर्श रूप से चुनाव  कराये जाने की परिस्थितियों को लाया जा सके.       
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रविवार, 8 जनवरी 2017

असम और हिन्दू बांग्लादेशी शरणार्थी

                                                      दिल्ली से सुदूर पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम में एक बार फिर से विदेशी शरणार्थियों के मुद्दे पर स्थानीय निवासी आक्रोशित हैं और अब वे जिस तरह से राज्य और केंद्र की भाजपा सरकार के बांग्लादेशी हिंदुओं को राज्य के वैध नागरिक बनाये जाने और नागरिकता देने का विरोध कर रहे हैं उस परिस्थिति में बहुत ही संवेदनशीलता के साथ दोनों सरकारों को आगे बढ़ने की आवश्यकता भी है. पूरे देश में विभिन्न स्थानों पर जिस तरह से अलग अलग परिस्थितियों में विदेशी शरणार्थियों और अवैध प्रवासियों के बीच अंतर करना कठिन ही रहा है उस परिस्थिति में एक बार फिर से असम में चुनौती उभर सकती है जिससे १९८५ के असम समझौते से राज्य में शांति लाने के तत्कालीन पीएम राजीव गाँधी के गंभीर प्रयासों को एक बार फिर से धक्का भी लग सकता है जिसके चलते आज तक असम में यह मुद्दा कभी भी इतना प्रभावी नहीं रहा है. उल्लेखनीय और चिंताजनक यह भी है कि उस समझौते पर आल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) की तरफ से हस्ताक्षर करने वाले असम गण परिषद के नेता और राज्य की सत्ता संभाल चुके प्रफुल्ल महंत आज भाजपा के सहयोगी दल के रूप में भी इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं.
                                देश में नेता राजनैतिक दल और आम जनता भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर कितना बंटी हुई है यह इस मामले में देखा जा सकता है क्योंकि अपने चुनावी घोषणा पत्र में भाजपा ने बांग्लादेशी हिन्दूओं को राज्य में नागरिकता देकर बसाने का वायदा किया था और चूंकि यह मुद्दा पूरे देश में भाजपा की राजनीति को मज़बूती प्रदान करता है तो उस परिस्थिति में अब भाजपा सरकार भी इसे लागू करना चाहती है जिसे वह अपने चुनावी वायदे को पूरा कर सके और १.७० लाख लोगों को असम में कानूनी तौर पर बसा भी सके जो आने वाले समय में उसके बड़े वोट बैंक के रूप में काम कर सकते हैं साथ ही वे उन बहुत सारी सीटों पर चुनावी समीकरणों को बदल भी सकते हैं जहाँ आज भाजपा के लिए राजनैतिक शून्य ही अधिक है. इस पूरी परिस्थिति में सीएम के रूप में सर्बानंद सोनोवाल की भूमिका भी संदिग्ध होने वाली है क्योंकि वे भी आसू की राजनीति से भाजपा में होकर आज सीएम पद तक पहुंचे हैं इसलिए जनजातीय समूहों की अनदेखी उनको भी भारी पड़ सकती है. असम की जनता की यह गलती है कि उसने भाजपा के घोषणापत्र पर ध्यान ही नहीं दिया और उसे चुनाव में स्पष्ट बहुमत दिया तो अब भाजपा पर इस बात का दबाव बनाने का कोई औचित्य भी नहीं है कि वह इस तरह के कदम उठा रही है. असम गण परिषद और अन्य जनजातीय समूह भी इस मामले में कम दोषी नहीं हैं क्योंकि उनकी तरफ से भाजपा के चुनावी घोषणापत्र में कही गयी इस बात की उस समय अनदेखी की गयी थी. साथ ही अब भाजपा के लिए अपने लिए भविष्य की राजनीति के साथ पूर्वोत्तर की राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए इस मुद्दे पर दोहरी चुनौती सामने आकर खडी हो गयी है.
                                 देश में शरणार्थियों के लिए एक स्पष्ट नीति बनाये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि सीमा पार से आये हुए शरणार्थी जिस तरह से देश के सीमावर्ती राज्यों में राजनीति को प्रभावित करते हैं तो उसके लिये अब स्पष्ट रूप से संसद, सरकार, गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय को यह विचार करना चाहिए कि भविष्य में देश में आने वाले शरणार्थियों के लिए किस तरह की नीति अपनायी जाये जिससे वे स्थानीय लोगों के साथ संघर्ष के स्थान पर सामंजस्य के साथ रह सकें. इसके लिए सबसे उपयुक्त यही हो सकता है कि इन समूहों के लिए देश के विभिन्न शहरों में आवासीय कालोनियां बनायीं जाएँ जिनमें रहने के इच्छुक लोगों को ही नागरिकता प्रदान की जाये ये कालोनियां उनके उन सीमावर्ती भारतीय राज्यों से दूर के राज्यों में होनी चाहिए जहाँ जाने से उनके द्वारा कोई राजनैतिक उलटफेर किये जाने की त्वरित आशंकाएं भी न हों साथ ही उनके साथ नागरिकता को स्थायी रूप से बनाये रखने के लिए कुछ विशेष नियम भी होने चाहिए जिसे उन पर केंद्र, राज्य सरकार के साथ कानून का अंकुश भी बना रहे. सरकार भी केवल उतने लोगों को ही नागरिकता प्रदान करे जिनके लिए वह समुचित रूप से आधार भूत सुविधाएँ दे पाने में सक्षम हो इससे जहाँ उनकी देश के नए स्थानों पर बसने की परिस्थिति को अच्छा किया जा सकेगा वहीं बिना किसी अतिरिक्त समस्या के इस पूरी व्यवस्था को संचालित किया जा सकेगा. साथ ही भारत आने और नागरिकता पाने के १० वर्षों तक उनके व्यवहार को देखकर ही उनको मताधिकार आदि की सुविधाएं देने की बात भी होनी चाहिए जिससे कोई भी राजनैतिक दल अपने त्वरित लाभ के लिए ऐसे कदम उठाना शुरू न कर सके.        
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