मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शुक्रवार, 5 जून 2020

चीन की चालें

                                                   एक तरफ जहाँ पूरी दुनिया कोरोना से जूझने में लगी हुई है वहीं चीन पूरी दुनिया में अपनी विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाने में लगा हुआ है. भारत के साथ लगती उसकी अरुणाचल प्रदेश से लद्दाख तक की सीमा को वह समय समय पर विवादित बनाने की कोशिशों में सदैव लगा ही रहता है पर १९६२ के बाद से ही भारत की सरकारों और जनता की निगाहों में चीन की स्थति ऐसे पडोसी की हो गयी है जो ज़रा सी नज़र चूकने पर बाहर दाना चुग रही मुर्गी को चुराने से भी बाज़ नहीं आता है. पंचशील के सिद्धांतों को जिस तरह से अनदेखा करते हुए चीन ने भारत की उन सीमाओं पर युद्ध लड़ा जहाँ किसी भी तरह के युद्ध के लिए पहुँचने के लिए भारत के पास उस समय न तो धन था और न ही संसाधन जिससे सीमावर्ती क्षेत्रों के बड़े भाग पर आज भी कब्ज़ा जमाकर विवाद बताकर चीन इसे मुद्दा बनाने की कोशिशों में लगा रहता है.
                            आज एक बार फिर से वही स्थिति दोहराई जा रही है और चीन भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों तक अपनी पहुँच को मज़बूत करने वाले रास्तों और सुदूरवर्ती गांवों तक संपर्क मार्ग बनाने को लेकर सदैव ही आक्रामक रहा करता है. अब उसने उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में भी विवाद शुरू किया हुआ है तो इस परिस्थिति से निपटने के लिए सरकार युद्ध के बजाय कूटनीतिक रास्तों से इसे हल करने का प्रयास करने में लगी हुई है. इस तरह की स्थिति में कोई भी सरकार युद्ध के बारे में नहीं सोचना चाहेगी वह भी तब जब चीन जैसा प्रतिद्वंदी सामने हो. अभी तक चीन केवल अरुणाचल, सिक्किम और लद्दाख में ही अपना विरोध दिखाता था पर जिस तरह से अब वह पूरी सीमा को ही चुनौती देने के मूड में दिखायी देने लगा है वह भारत के लिए चिंता का विषय ही है.
                              चीन से लगते अपने सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुँच को सुगम करने के लिए भारत की कोशिशें लम्बे अरसे से चल रही है और वर्तमान में मोदी सरकार ने इस पर और भी तेज़ी से काम करना शुरू किया है जिससे चीन को यह अच्छा नहीं लग रहा है. भारत के पास इतने सुदूरवर्ती क्षेत्र में कारगिल जैसी एक और लड़ाई लड़ने का विकल्प सीमित ही है क्योंकि कोरोना के चलते अर्थव्यवस्था को झटका लगा है उसे निपटना वैसे ही मुश्किल हो रहा है फिर भी भारत का अपने निर्माण कार्यों को जारी रखते हुए चीन के साथ कूटनीतिक स्तर पर बातचीत को बढ़ावा देने की दिशा में बढ़ना उचित है. चीन को कहीं न कहीं इस बात का अंदेशा भी है कि आज भारत में चीन विरोधी भावनाएं बढ़ रही हैं जिससे आज के माहौल में निपटना किसी भी सरकार के लिए मुश्किल हो सकता है. वैश्विक बाध्यताओं के चलते भारत सरकार चीन पर सीधे प्रतिबन्ध तो नहीं लगा सकती है पर अपनी जनता से दूसरे माध्यमों से चीनी सामान के बहिष्कार की बात तो कर ही सकती है जो कि किसी भी स्थिति में चीन के लिए सही नहीं होगा। कोरोना से उत्पन्न श्रमिक संकट से निपटने के लिए भारत देश के ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते श्रमिकों की उपलब्धता को देखते हुए विनिर्माण क्षेत्र के लिए नई नीतियों पर काम कर चीन को सीधे तौर पर चुनौती तो दे ही सकता है.
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शनिवार, 25 मई 2019

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का संकट-1

                                          देश में हाल ही में संपन्न हुए आम चुनावों में जिस तरह से पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के संयुक्त नेतृत्व में भाजपा ने अपनी सफलता के नए आयाम स्थापित किये हैं उनको देखते हुए आने वाले समय में भाजपा की रणनीति का ही पता चलता है जिसमें उसने आखिल भारतीय स्तर पर उसका मुक़ाबला करने की स्थिति में आ सकने वाली पार्टी कांग्रेस को परिणामों के अनुसार बहुत कमज़ोर स्थिति में पहुंचा दिया है. इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए कांग्रेस को गंभीर आत्ममंथन करने और कमियों को वास्तव में खोजने पर ध्यान देना ही होगा वर्ना पहले से कमज़ोर हुई कांग्रेस के लिए भाजपा के नेता-द्वय और भी बड़े संकट उत्पन्न करने से नहीं चूकने वाले हैं. यह बात सभी जानते हैं कि आखिर भारतीय स्तर पर केवल कांग्रेस के पास ही किसी न किसी स्तर पर संगठन और कार्यकर्त्ता मौजूद हैं जो एक सुसंगठित भाजपा के सामने कहीं ठहरते तो नहीं हैं फिर भी आवश्यकता पड़ने पर वे एक विकल्प भी साबित हो सकते हैं. परन्तु पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से कांग्रेस ने अपने संघर्ष करने की इच्छा को ही समाप्त कर रखा है उसमें उसकी और भी दुर्दशा होने से वह नहीं बच सकती है. 
                                मोदी-शाह की जोड़ी इस बात को अच्छी तरह समझती है कि आने वाले समय में यदि भाजपा के लिए कोई चुनौती बन सकता है तो उसमें केवल कांग्रेस का ही नाम है इसलिए वे प्रतीकात्मक तौर पर सधी हुई रणनीति के चलते कांग्रेस का मनोबल तोड़ने का काम करने में लगे हुए हैं जिसका लाभ उन्हें मिलने भी लगा है. इस चुनाव में गंभीरता से देखा जाये तो भाजपा ने अपना पूरा ध्यान कांग्रेस के उन बड़े नेताओं की सीटों पर लगाया जो भविष्य में उनके लिए चुनौती बन सकते हैं इस कड़ी में राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद, दीपेंदर हुडा, सुष्मिता देव जैसे उन नामों पर अधिक ध्यान दिया जिनको हराने से कांग्रेस के मनोबल को तोडा जा सकता था और जो युवा होने के साथ संसद और सड़क पर अपनी बातों का प्रभाव दूसरों पर डालने में सक्षम भी दिखाई देते हैं. इस चुनाव में मोदी-शाह की जोड़ी ने कांग्रेस की इस मज़बूती पर सुनियोजित तरीके से प्रहार किया जिसका परिणाम सामने दिखाई दे रहा है. जातीय समीकरणों को साधते हुए जिस तरह से इन स्थानों पर ज़मीनी कार्यकर्ताओं को मज़बूती दी गयी उसके जवाब में उन्होंने अपने वोटों को परिणाम में बदलने में कोई कसर भी नहीं छोड़ी।
           यदि कांग्रेस को आने वाले समय में अपनी बची हुई राजनैतिक ज़मीन को बचाये रखना है तो उसे पूरे देश में आगामी विधानसभाओं के कार्यकालों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न राज्यों में अपने संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन करना ही होगा क्योंकि जनता के मुद्दों पर बिना संघर्ष किये राजनीति करने वाले नेताओं के दिन अब समाप्त होने को हैं. इस संकट से बचने के लिए कांग्रेस को एक बार फिर से सदैव हमलावर रहने के स्थान पर मुद्दों पर आधारित राजनीति के अनुसार काम करने की नीति अपनाने होगी। कांग्रेस नेतृत्व को विभिन्न राज्यों में अपने दिखावे के लिए बनाये गए पार्टी अध्यक्षों से अगले एक महीने में ही पीछा छुड़ाना होगा जिससे नए नेतृत्व के लिए रास्ते खोले जा सकें।  जनता के मुद्दों से जुड़ने और विभिन्न स्थानों पर सड़कों पर संघर्ष करने के बाद ही अब कांग्रेस की स्वीकार्यता जनता में बन सकती है. पार्टी को सबसे पहले यूपी बिहार और बंगाल पर ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि इन तीन महतवपूर्ण राज्यों में उसके पास कोई संगठन और मज़बूत नेता नहीं बचा है जो हर बात में बिना केंद्रीय नेतृत्व की तरफ देखे अपने स्तर से विभिन्न मुद्दों पर संघर्ष कर सके. लगभग १/३ लोकसभा सीटों पर अप्रासंगिक होकर कांग्रेस कभी भी भाजपा का सामना नहीं कर पायेगी क्योंकि इन राज्यों से ही भाजपा अपने को सत्ता के निकट पहुँचाने का काम करती हुई दिखाई देती है. क्रमशः ......                      
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शनिवार, 2 जून 2018

गैर भाजपाई गठबंधन

                                                          संसद में सबसे अधिक सदस्यों को भेजने वाले यूपी में विपक्षी तालमेल के चलते भाजपा को जिस तरह से लगातार भाजपा विरोधी वोटों के लामबंद होने से उपचुनावों में हार का मुंह देखना पड़ रहा है उससे आश्चर्यचकित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि भाजपा की मोदी सरकार भी पता नहीं क्यों अटल सरकार की तरह पुनः आत्ममुग्धता का शिकार होती जा रही है ?  भाजपा के सामने २००४ का उदाहरण बहुत पुराना नहीं हुआ है फिर भी उसकी तरफ से जिस तरह से एक प्रचारवादी अभियान चलाया जाने लगा है वह कई बार धरातल की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता है जो उसके साथ पहली और पिछली बार चुनावों में जुड़े उन तटस्थ मतदाताओं को उससे दूर करने का काम करता है जिसके दम पर उसे लोकसभा में स्पष्ट बहुमत मिला था। मोदी शाह और भाजपा को यह समझना ही होगा कि आज उनको राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की विकल्पहीनता का लाभ अधिक मिल रहा है और यदि किसी मज़बूत एजेंडे पर विपक्षी दल एकजुट होते हैं तो २०१९ का चुनाव भाजपा के लिए एक दुःस्वप्न भी बन सकता है जहाँ कम अंतर से हारने वाले उसके सांसदों की संख्या बहुत अधिक रह सकती है.
                       विपक्ष में जिस तरह से हर बड़े नेता की आकांक्षा पीएम बनने की तरफ जाती हुई दिखाई देती है उसे किसी भी स्तर पर गलत नहीं कहा जा सकता है क्योंकि हर राजनीतिज्ञ के लिए आगे बढ़ना एक बड़ा सपना होता है और वह किसी भी परिस्थिति में अपने को आगे बढ़ाना भी चाहता है. जब एक बड़ी चुनौती के रूप में मोदी विपक्ष के सामने हैं तो उनसे निपटने के लिए अपनी तात्कालिक विरोध को दरकिनार कर अगर यूपी में माया मुलायम अजीत और कांग्रेस ने समझदारी से सीटों का बंटवारा कर लिया तो भाजपा के लिए बहुत बड़ी चुनौती सामने आ सकती है जहाँ तक यह कहा जा रहा है कि यह बेमेल गठबंधन अधिक समय तक नहीं चल पायेगा तो यह भी संभव है कि अंतर्विरोधों के चलते गठबंधन दो साल भी न चल पाए पर उसके बीच में आकर सत्ता सँभालने से भाजपा के लिए बहुत समस्या हो सकती है क्योंकि आज मोदी शाह की जिताऊ जोड़ी की तानशाही संघ से लगाकर पार्टी के हर स्तर पर नेताओं द्वारा महसूस की जा रही है पर सत्ता हाथ से जाते ही क्या भाजपा के महत्वाकांक्षी नेता इन पर हमला नहीं करने लगेंगें ? आज जो दबी जबान से सुनाई देता है वह कल खुलेआम दिखाई भी दे सकता है जिससे खुद भाजपा की संभावनाओं पर असर पड़ने से इंकार नहीं किया जा सकता है.
                         परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों पर अब राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस को खुद को साबित करने का अंतिम अवसर मिला हुआ है और जिस तरह से अपने वजूद के लिए संघर्ष करती हुई कांग्रेस ने अहमद पटेल के चुनाव के बाद से हर मोर्चे पर लड़ने की इच्छा दिखाई है उससे उनके हताश कार्यकर्ताओं का मनोबल भी मज़बूत हुआ है. राहुल गाँधी के पास अभी बहुत समय है और इस सच्चाई को वह समझ रहे हैं यह उनके और कांग्रेस के लिए अच्छी बात है क्योंकि देवेगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लेने और गुजराल सरकार को समर्थन देने की राजनीति करने वाली कांग्रेस में पिछले २२ सालों में बहुत कुछ बदल चुका है. विपक्ष के पास भी अधिक समय नहीं है क्योंकि मोदी सरकार में जिस तरह से संगठित तरीके से विपक्षी नेताओं को देशविरोधी साबित करने की कोशिश की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है और यदि यह परिस्थिति २०२४ तक बनी रही तो देश के ताने बाने में बहुत कुछ बदल सकता है. कौन पीएम होगा और कौन नहीं इस बात पर विचार करना अभी जल्दबाज़ी होगी क्योंकि जब तक भाजपा की संख्या को २०० तक सीमित करने में विपक्षी दल सफल नहीं होंगें तब तक नेताओं के चयन की कोई बात कम नहीं करने वाली है राज्यों में मज़बूत दलों को अपने राज्य में खुद के लिए अधिक और कांग्रेस के लिए कम सीटें छोड़ने और केंद्र में कांग्रेस के लिए अधिक सीटें छोड़ने जैसे किसी सम्मानजनक स्तर पर बात करनी होगी तभी २०१९ में उनके लिए कुछ संभव होगा वर्ना मोदी अपनी पूरी ताकत झोंक कर एक और आजम चुनाव को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए तैयारी करने में व्यस्त हो चुके है.    
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शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

राष्ट्रपति और राजनीति

                                                       निर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के जीतने पर एक बार फिर से उनके दलित्त होने को मुखर रूप से समाचारों में रेखांकित किया जा रहा है जबकि उनके जीत जाने के बाद इस तरह की बातें किये जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी. निश्चित तौर पर अपने प्रत्याशी को जिताने लायक संख्या होने पर कोई भी सरकार या पीएम अपनी पसंद के कम समस्या पैदा करने वाले व्यक्ति को ही राष्ट्रपति पद पर देखने के आकांक्षी होते हैं और साथ ही देश के राजनैतिक पटल पर भी अपने समीकरणों को साधने की कोशिशें करते हुए देखे जाते हैं तो ऐसी स्थिति में पीएम मोदी और भाजपा की तरफ से यदि ऐसा किया गया तो कोई बड़ी बात नहीं है. वैसे भी पीएम मोदी के बारे में कहा जाता है कि उन्हें असहमति के शब्द अच्छे नहीं लगते हैं तो आज किसी को भी इस पद तक पहुँचाने की स्थिति में मज़बूत पीएम मोदी ने भी देश के सर्वोच्च पद के लिए कोविंद का चुनाव करके एक तरह से अपनी स्थिति को और मज़बूत ही किया है. सरकार किस व्यक्ति को इस पद पर देखना चाहती है यह उसकी मर्ज़ी है और उस पर सवाल लगाने का कोई मतलब भी नहीं बनता है पर दलित होने के साथ विवादों से दूर रहना कोविंद के लिए उस समय बहुत काम आया जब पीएम मोदी उनके जैसे व्यक्ति को खोज रहे थे.
                                     देश में राष्ट्रपति पद पर बैठे राजनैतिक व्यक्तित्वों में से कई लोगों ने तो अपने पद के साथ पूरी तरह से न्याय किया वहीं कई लोगों की तरफ से केवल सरकार के रबर स्टैम्प की भूमिका ही निभाई गयी. एक समय इंदिरा गाँधी कि हाँ में हाँ मिलाने वाले ज्ञानी जैल सिंह ने भी राजीव गाँधी की मज़बूत सरकार के लिए परेशानी भरे पल पैदा कर देने में कोई कस्र नहीं छोड़ी थी. देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी जिस तरह से इस पद की गरिमा को बचाये रखने के लिए लगातार कोशिशें की थीं वे अपने आप में एक उदाहरण हैं और आज कोविंद से उस तरह एक आचरण की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती है. आम तौर पर पार्टी में सक्रिय नेताओं को जीवन के अंतिम चरण में राष्ट्रपति बनाकर पुरुस्कार देने की परंपरा सी चलती आयी है पर इस मामले में सबसे चौंकाने वाला निर्णय कमज़ोर कहे जाने वाले पीएम मनमोहन सिंह की तरफ से उठाया गया था जब वे राजनैतिक स्तर पर संसद से सड़क तक घिरे हुए थे तो भी उन्होंने अपनी सरकार में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले और विभिन्न विपरीत परिस्थितियों में उनकी सरकार को संकट से उबारने वाले लम्बे राजनैतिक जीवन के अनुभवी प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद के लिए आगे किया था.
                                प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल अपने आप में बहुत अच्छा कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने देश में पहली बार स्पष्ट बहुमत के साथ बनने वाली भाजपा की सरकार और पीएम मोदी के साथ तीन वर्षों से भी अधिक समय तक काम किया और कहीं से भी सरकार या विपक्ष के साथ किसी भी तरह के अनुचित व्यवहार या पक्ष का पोषण नहीं किया. बिहार के राज्यपाल के रूप में कोविंद का कार्यकाल भी बहुत अच्छा रहा तभी जेडीयू ने विपक्ष से अलग चलते हुए उनके लिए वोट करने के बारे में सोचा था. कोविंद से भी पूरा देश निष्पक्ष रूप से अपनी राय रखने और सरकार के साथ विपक्ष और देश के मौजूदा हालातों पर नज़र रखने की अपेक्षा ही रखता है. मज़बूत पीएम मोदी अपने गुरु आडवाणी या सुषमा स्वराज जैसे राजनैतिक रूप से बेहद मुखर नेता को इस पद तक पहुँचाने का वो साहस नहीं दिखा पाए जो पीएम के रूप में मनमोहन सिंह ने अपने सबसे विश्वसनीय सहयोगी को यहाँ पहुंचाकर किया था. वैसे तो राष्ट्रपति के लिए करने को कुछ ख़ास नहीं होता है फिर भी कोविंद से देश यह आशा तो कर ही सकता है कि अब वे भी केवल संघ, भाजपा या मोदी के पीएम के स्थान पर पूरे देश के राष्ट्रपति बनकर उसी तरह का आचरण दिखाएंगें जैसा उनके पूर्ववर्ती प्रणब मुखर्जी द्वारा दिखाया गया है.   
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मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

आदित्यनाथ योगी और भाजपा की चुनौती

प्रदेश में हुए विधान सभा चुनावों के बाद जिस प्रचंड जनादेश के साथ पूर्वांचल में पूरी तरह से स्थापित हिन्दू युवा वाहिनी के संरक्षक, गोरक्ष पीठ के पीठाधीश्वर और भाजपा नेता आदित्यनाथ योगी ने भाजपा के एक हफ्ते के गहन मंथन के बाद सत्ता संभाली उसके बाद भाजपा और सीएम योगी को विपक्ष से मिलने वाली चुनौतियाँ स्वतः ही कम हो गयी हैं क्योंकि सरकार के सत्ता सँभालते ही उस की आलोचना करना सही नहीं कहा जा सकता है इसलिए अभी सरकार की प्राथमिकताओं और उसके प्रारंभिक क़दमों के बारे में विश्लेषण का काम सत्ता और विपक्ष दोनों तरफ ही चल रहा है. सदन के अंदर विधान सभा में तो कमज़ोर संख्या बल के कारण विपक्ष सीएम आदित्यनाथ को किसी भी तरह की चुनौती देने की स्थिति में नहीं है पर विधान परिषद् में उसकी तरफ से मुद्दों के आधार पर सरकार को रोकने की कोशिश की जा सकती है. प्रदेश की व्यापक सीमाओं और आसन्न चुनौतियों को देखते हुए सरकार के लिए चुनावों और उससे पहले अखिलेश सरकार पर कानून व्यवस्था को लेकर किये गए हमलों के चलते आज एक बार फिर से सीएम आदित्यनाथ के लिए यही मुद्दा सबसे बड़ा साबित होने वाला है और जिस तरह से उन्होंने गृह मंत्रालय अपने पास ही रखा हुआ है उससे कानून व्यवस्था के सभी मामलों पर विपक्ष को सीधे उन पर हमले करने के अवसर मिलते ही रहने वाले हैं.
पिछली सरकारों में प्रदेश में जिस तरह से नेताओं, अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत के चलते अधिकांश जगहों पर कानून व्यवस्था की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई देता था कमोबेश खुद सीएम आदित्यनाथ की स्पष्ट चेतावनी के बाद अब भी वही स्थिति बनी हुई है और पहले जो कार्य सपा के कार्यकर्ता किया करते थे आज वह हिन्दू युवा वाहिनी और भाजपा के कार्यकर्ता करने में लगे हुए हैं. सत्ता प्रतिष्ठान के दलाल हर सत्ता में अपना हिस्सा बांटने पहुँच ही जाते हैं क्योंकि किसी भी दल में वैचारिक समानता के कारण जो लोग जुड़े होते हैं वे कभी भी आसानी से अपनी सरकार के लिए इस तरह की चुनौतियाँ उत्पन्न नहीं करते हैं पर जो लोग सत्ता के साथ चिपकने वाले और सत्ता का लाभ उठाने की कोशिश हर सरकार में करने के माहिर होते हैं वे किसी भी परिस्थिति में सत्ताधारी दल की कमज़ोर और लालची कड़ियों को खोज ही लेते हैं और अपना काम निकालने में जुट जाते हैं. इन लोगों से निपटने के लिए खुद सीएम आदित्यनाथ को अपने स्तर पर सक्रिय होना होगा वर्ना सत्ता के ये दलाल उनकी सरकार के लिए भी चुनौतियाँ खडी करने से बाज़ नहीं आएंगे. लम्बे समय बाद प्रदेश की सत्ता में आयी भाजपा के कार्यकर्ता भी जिस तरह से अपने पुराने हिसाबों को चुकता करने और हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता नई नई जगहों पर समस्याएं खड़ी करने का काम कर रहे हैं वह सरकार और प्रदेश के लिए शुभ नहीं कहा जा सकता है.
खुद सीएम आदित्यनाथ न्याय की बात कर रहे हैं और गोरखपुर में उनके लम्बे धार्मिक, सामाजिक और राजनैतिक जीवन में न्याय की बात काफी हद तक परिलक्षित भी होती है पर प्रदेश भर में फैले हिन्दू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता जिस तरह से अतिउत्साह में दिख रहे हैं और आज समाज के अराजक तत्व भी गले में केसरिया अंगौछा डालकर सत्ता का प्रभाव दिखाने में लग चुके हैं भाजपा को अविलम्ब इस पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि अब चुनौती विपक्ष से निपटने के स्थान पर अपने में छिपे उन तत्वों की पहचान करने और सुधार करने की है जो आने वाले समय में सरकार के लिए समस्या बन सकते हैं. सत्ता की तरफ लाभ कमाने के लिए भागने वाले इस मानसिकता के लोगों को अपने अंदर चिन्हित करने के साथ ऐसे तत्वों के संगठन में प्रवेश पर भी कड़ाई से ध्यान देना होगा जिससे आने वाले समय में सरकार के साथ खड़े लोग उसके लिए विभिन्न स्तरों पर अनावश्यक चुनौतियाँ न खडी कर सकें. वैसे तो मंत्रिमंडल चुनना सीएम का विशेषाधिकार होता है पर यूपी की विशालता और चुनौतियों को समझते हुए सीएम आदित्यनाथ यदि दो गृह राज्य मंत्रियों की नियुक्ति करने के बारे में सोचें जिन्हें पूर्वी और पश्चिमी यूपी के कुछ जनपदों की ज़िम्मेदारियों को दिया जाये और मध्य यूपी के बड़े हिस्से को खुद वे अपने नियंत्रण में रखें तो आने वाले समय में कानून व्यवस्था में गुणात्मक सुधार आ सकता है.
सरकार सँभालने के बाद अभी तक सीएम आदित्यनाथ ने किसी भी विभाग में बड़े स्तर पर स्थानांतरण नहीं किये हैं जिससे यह लगता है कि वे अधिकारियों को यह स्पष्ट सन्देश देना चाहते हैं कि जो कानून के अनुसार चलेगा उसके लिए कोई समस्या नहीं आने वाली है पर सरकार की मंशा के अनुरूप खरे न उतरने वाले अधिकारियों के लिए अब सब कुछ उतना आसान नहीं रहने वाला है. यह भी अच्छा ही है कि सीएम आदित्यनाथ खुद आगे आकर सरकार चलाने के लिए कृत संकल्पित दिखाई दे रहे हैं पर आने वाले समय में सीएम के रूप में विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी सहभागिता जितनी बढ़ती जाएगी व्यस्तता के चलते सरकार चलाने पर उनके लिए इतना ध्यान दे पाना संभव नहीं रह जायेगा इसलिए अभी से उन्हें अपने मंत्रियों और अधिकारियों के सामने पहले साल का लक्ष्य निर्धारित करना होगा जिससे वे २०१९ में होने वाले आमचुनावों तक भाजपा के २०१४ और २०१७ के प्रदर्शन को दोहराकर केंद्र में मोदी सरकार की वापसी का मार्ग भी खोल सकें. यूपी में आज भाजपा के नेताओं में पारस्परिक हितों का टकराव न के बराबर है और इस स्थिति का लाभ कहाँ तक सीएम आदित्यनाथ उठा पाते हैं यह उनके राजनैतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होने वाला है. सरकार बन चुकी है और चूंकि सीएम आदित्यनाथ अधिक लोगों के लिए जवाबदेह नहीं हैं इसलिए उनके लिए कड़े निर्णय करना आसान भी रहने वाला है वे अपने और भाजपा के लिए समाज में स्वीकार्यता को कितना बढ़ा पाते हैं यह तो आने वाले एक दो सालों में स्पष्ट हो पायेगा.
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बुधवार, 28 सितंबर 2016

भारत-पाक-सार्क और आतंक

                                             जिस भावना के साथ एक समय दक्षिण एशिया के देशों के बीच आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और खेल के स्तर पर सहयोग करने के लिए सार्क देशों के समूह की स्थापना की गयी थी लगता है अब वह पाकिस्तान के आतंक समर्थक रवैये के चलते समाप्त होने की कगार पर है. अस्सी के दशक से पाक और भारत के बीच सीमा पर आतंक को लेकर चल रही शंकाओं और आरोप प्रत्यारोप के बीच ही सार्क नेताओं ने इस समूह का गठन भी किया गया था पर हर मामले में भारत से लाभ उठाने वाले पाकिस्तान ने समय आने पर कभी भी कोई ऐसा सहयोगात्मक रवैया नहीं अपनाया जिससे यह समझा जा सकता कि वह भी इस संगठन को मज़बूती से आगे बढाकर पूरे क्षेत्र की तरक्की के लिए काम करना चाहता है. पहले पंजाब और फिर कश्मीर में आतंकी संगठनों को हर तरह का सहयोग के साथ ही उसने देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपने यहाँ प्रशिक्षित आतंकियों के लिए जिस तरह से हर स्तर पर सुरक्षा उपलब्ध कराई उससे वह पूरी वैश्विक बिरादरी के सामने बेनकाब तो हो गया पर पाकिस्तान जैसा हाँ में हाँ मिलाने वाला कोई दूसरा क्षेत्रीय देश न होने के कारण अमेरिका और अन्य देश भी उस पर मजबूरी में भरोसा करते हुए दिखाई देते हैं. अमेरिका ने अपने सबसे बड़े शत्रु ओसामा को भी पाकिस्तान में घुसकर मार पर अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते आज वह फिर से पाकिस्तान पर भरोसा करने के लिए मजबूर ही दिखाई देता है जबकि उसकी छोटी सी कोशिश भी पाक के जेहादी समूहों से निपटने में बहुत कारगर साबित हो सकती है.
                                   भारत ने जिस तरह से आगामी सार्क शिखर सम्मलेन से किनारा किया है उसके बाद अब पाकिस्तान के लिए इस समस्या से निपट पाना बहुत मुश्किल ही साबित होने वाला है क्योंकि हर तरह एक तनाव के बीच भी भारत ने इस सहयोग पर अपने पाकिस्तान के साथ चल रहे बेहद ख़राब द्विपक्षीय संबंधों के चलते कोई आंच नहीं आने दी. सार्क चार्टर के अनुसार यदि एक भी देश का प्रमुख इसमें आने से मना करता है तो यह बैठक हो ही नहीं सकती है इसलिए अब पाकिस्तान पर इस शिखर बैठक को कराने का दबाव भी आ गया है. आज जिस तरह से पाक का रवैया है और भारत की तरफ से युद्ध से पहले के हर उस विकल्प पर गौर किया जा रहा है वह मोदी सरकार की सही नीति को ही दिखाता है क्योंकि किसी भी मामले में युद्ध केवल अंतिम विकल्प ही होना चाहिए उसे सबसे पहले शुरू करने से हर पक्ष का नुकसान ही होता है. बिना युद्ध किये भी भारत के पास बहुत सारे ऐसे विकल्प खुले पड़े हैं जिसके चलते वह पाकिस्तान के लिए कुछ वर्षों के लिए बहुत बड़ी समस्या खड़ी कर सकता है जिससे उबरने में पाकिस्तान की कोई भी देश मदद नहीं कर पायेगा. सिंधु नदी के समझौते को रद्द करने से पहले भारत के पास यह विकल्प भी उपलब्ध है कि वह अपने हिस्से में मिले २०% पानी का पूरा उपयोग करना शुरू कर दे और पाकिस्तान के लिए कृषि क्षेत्र में एक बड़ा संकट उत्पन्न कर दे. भारत जम्मू कश्मीर में पहले से ही सिंधु और अन्य नदियों पर अपने २०% हिस्से के उपयोग के सम्बन्ध में पन-बिजली परियोजनाओं को बनाना शुरू कर चुका है और आने वाले समय में बगलिहार जैसी अन्य परियोजनाएं भी सामने आ सकती हैं जिससे कश्मीरियों के लिए तो आसानी होगी पर पाकिस्तान के लिए हर स्तर पर परेशानियों का दौर शुरू हो जायेगा. घाटी के लोग सिंधु समझौते को अपने खिलाफ भी मानते रहे हैं तो इसे रद्द किये जाने की किसी भी घोषणा या संसाधनों के भरपूर दोहन से जुड़े मसलों में भी घाटी का पूरा सहयोग भी साथ ही रहने वाला है.
                                   भारत की तरफ से १९९६ में हुए डब्लूटीओ समझौते के चलते ही पाकिस्तान को अपनी तरफ से मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा दिया गया है पर अभी तक पाकिस्तान ने ऐसा कदम नहीं उठाया है जबकि सार्क में भी इस तरह के द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने के लिए व्यापक चर्चाएं होती रहती है. यदि सिंधु नदी के समझौते को तोड़ने से पहले भारत केवल अपने हिस्से के पानी का इस्तेमाल करने के साथ ही पाकिस्तान के साथ सहयोगी व्यापार के स्थान पर इसे रोकने के बारे में विचार करे जिससे पाक को भी अन्य सभी तरह के टैक्स भी देने पढ़ें तो वहां सबसे अधिक कपड़ा कारोबार ही प्रभवित होने वाला है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के साथ कपडा उद्योग में पाक और बांग्लादेश ही कड़ी प्रतिस्पर्धा में रहा करते हैं. यदि भारत की तरफ से पाक को डब्लूटीओ के तहत मिली सुविधाएँ वापस ले ली गयीं तो उसके कपडा उद्योग के लिए सस्ते कच्चे माल का विकल्प समाप्त हो जायेगा तथा पाक सरकार पर भी उद्योग जगत का दबाव बन सकता है. आम घरों में रोज़ ही उपयोग में आने वाली बहुत सारी वस्तुएं भी पाकिस्तान को एमएफएन के चलते ही सही मूल्य पर भारत से आसानी से मिल जाती हैं जिससे वहां मंहगाई पर भी नियंत्रण रहा करता है पर आने वाले समय में इन सभी वस्तुओं के मंहगे होने के बाद आम जनता के लिए भी समस्याएं बढ़ सकती है जिससे पाकिस्तान सरकार और सेना पर भी दबाव बन सकता है. भारत सरकार की तरफ से अब इस दिशा में आगे बढ़ने का सही समय आ गया है क्योंकि पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा तो है और उसे सबक सिखाने की एक चाह भी बढ़ती जा रही है ऐसी स्थिति में युद्ध से पहले ही पाकिस्तान को आर्थिक स्तर पर कमज़ोर करके और वहां की जनता में सरकार के क़दमों के प्रति गुस्सा उत्पन्न कर ही उसे रणनीतिक मात दी जा सकती है.
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सोमवार, 28 मार्च 2016

उत्तराखंड की नियति

                                                                छोटे राज्य के महत्वाकांक्षी नेता किस तरह से अपनी पार्टी के लिए समस्याएं पैदा करते रहते हैं इसको देखने के लिए उत्तराखंड आज सबसे उपयुक्त उदाहरण हो सकता है क्योंकि इस राज्य १६ सला के इतिहास में एनडी तिवारी के अलावा किसी भी सीएम को अपने कार्यकाल पूरा करने का मौका न मिलने से पता चलता है कि हर दल के हर नेता को केवल सीएम ही बनना है और उससे कम किसी भी पद पर वे रुकना ही नहीं चाहते हैं. एनडी तिवारी जिस कद के नेता थे तो उनके खिलाफ किसी भी तरह का विद्रोह कर पाना किसी भी नेता के बूते से बाहर था क्योंकि उनकी अपनी छवि ही ऐसी थी कि उनके खिलाफ जाना मतलब राज्य के विकास के खिलाफ जाना ही माना जाता था जिस कारण से वे छुटपुट विरोध के बाद भी अपना कार्यकाल पूरा करने में सफल रहे वहीं राज्य में विकास को भी गति दे सके. छोटा राज्य होने से सरकार चलाने में जो सुगमता होने के आत्मविश्वास के चलते अटल सरकार ने चार नए राज्यों का गठन किया था वह आज अपने आप में बुरे सपने से अधिक कुछ भी नहीं साबित हुआ है. राज्य में जहाँ कांग्रेस ने भाजपा से लम्बे समय तक राज किया और केवल तीन सीएम से ही उसका काम चल गया वहीं भाजपा को इससे कम समय में पांच बार सीएम बदलने को मजबूर होना पड़ा है.
                             देश में आज सत्ता और विपक्ष में होने से संविधान की व्याख्या पर प्रभाव पड़ जाता है क्योंकि एस आर बोम्मई मामले के बाद से भी जहाँ केंद्र सरकारें ३५६ का दुरूपयोग करने से नहीं चूकती हैं वहीं सत्ता सँभालने वाली कांग्रेस और भाजपा पार्टियां भी पूरी बेशर्मी के साथ सत्ता या विपक्ष में होने के अनुसार संविधान की व्याख्या करने लगती हैं तथा दोनों को ही लोकतंत्र की हत्या तो नज़र आती है पर राज्यों में विरोध के सुरों को हवा देकर दूसरे दलों की सत्ताओं को संविधान के नाम पर हिलाने से वे बाज़ नहीं आती हैं. इस परिस्थिति में आखिर लोकतंत्र की रक्षा करने के लिए कौन सामने आएगा तथा किस परिस्थिति में देश का राजनैतिक तंत्र यह समझ पाएगा कि लोकतंत्र और संविधान को अपने अनुसार मरोड़कर उसकी व्याख्या करने की नेताओं की कोशिशों से केवल लोकतंत्र का मज़ाक ही बनता है और जिस जनता को लम्बे अभियानों के बाद चुनावों की तरफ लाने में सफलता मिल पायी है वह भी बेकार साबित हो सकती है. यदि किसी राज्य में सीएम को सदन का विश्वास हासिल नहीं है तो उसका निर्णय सदन के अंदर ही होना चाहिए न कि गृह मंत्रालय ओर राष्ट्रपति भवन के पास यह अधिकार होने चाहिए.
                              यूपी में कल्याण सिंह/ जगदम्बिका पाल के रूप में दो सीएम होने के चलते उत्पन हुए संवैधानिक संकट के बाद कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा था कि सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर अंतिम निर्णय लेने का अधिकार केवल सदन को ही होता है पर मोदी सरकार ने एक बार फिर से इस आदेश का उल्लंघन करते हुए राज्य में मनमानी करने में कसर नहीं छोड़ी है. जब स्पीकर की तरफ से हरीश रावत को अपनी सरकार के लिए २८ मार्च को विश्वास मत हासिल करना था तो एक दिन पहले राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाना किस तरह से उचित कहा जा सकता है ? यदि हरीश रावत की तरफ से कोई असंवैधनिक काम किये जा रहे थे तो उसके लिए क्या इस तरह का कदम उठाना आवश्यक भी था या बीच का रास्ता निकाल कर किसी तरह से उनको सदन में अपना बहुमत सिद्ध करने का अवसर देना उचित रास्ता होता और उसमें जो भी निर्णय होता उसके साथ केंद्र को अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने का काम करना चाहिए था. विजय बहुगुणा और हरीश रावत में एक यही बुनियादी अंतर है कि रावत मंझे हुए  नेता हैं और बहुगुणा इस मामले में उनके पास भी नहीं फटकते हैं तो निलम्बित विधान सभा को पुनर्जीवित करने और भाजपा द्वारा सरकार चलाये जाने की कोशिशें उसे किस तरह का लाभ या हानि पहुँचाने वाली हैं सम्भवतः इस गणना में भाजपा चूक गयी है और यदि कांग्रेस हरीश रावत पर अपना दांव लगाती है तो भाजपा के लिए अब उनका सामना करना उतना आसान भी नहीं होने वाला है.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 14 मार्च 2016

क्रिकेट और राजनीति

                                                           भारत में क्रिकेट के प्रति आम लोगों की दीवानगी को देखते हुए इस खेल से किस तरह लोगों की भावनाएं जुडी हुई हैं यह समझ पाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती ही है. टी-२० विश्व कप में भारत पाक के मैच को लेकर जिस तरह से समस्याएं सामने आईं उसके बाद यह कहा जा सकता है कि दोनों देशों के बीच पिच पर क्रिकेट होने से पहले ही बीसीसीआई से लेकर केंद्रीय सत्ता के गलियारों तक राजनीति के लम्बे और उबाऊ टेस्ट मैच खेले जाते हैं जिनके आधार पर ही खेल को नियंत्रित किया जाता है. आज़ादी के बाद से ही द्विपक्षीय संबंधों को ठेंगे पर रखने की पाक नीति के चलते आज भी दोनों देशों के बीच सम्बन्ध सामान्य नहीं हो पाये हैं इसके बाद भी भारत की तरफ से सदैव ही शुरुवाती झिझक के बाद जिस तरह से हर बार क्रिकेट खेलने पर रजामंदी दिखाई जाती है उससे यही लगता है कि खेल को लेकर भी राजनीति अपने चरम पर रहा करती है और खेलभावना को किनारे रखते हुए आज भी दोनों देश केवल खेल को भी अपनी राजनीति का मोहरा समझते हैं. भारत में पाक के लिए सुरक्षा कभी भी कोई समस्या नहीं रही है और खुद पाक के खिलाडी भी इस बात को स्वीकार भी करते हैं.
                          ऐसा नहीं है कि पाक समर्थित आतंकियों के भारत के विभिन्न स्थलों पर किये जाने वाले हमलों के बाद इस मामले पर चर्चा नहीं होती है और भारत पाक के बीच में सब कुछ रुक जाता है. जब बात अन्य खेलों की होती है तो सब कुछ सामान्य तरीके से चलता रहता है और क्रिकेट का नाम सामने आने पर ही एक तरह से राजनैतिक गलियारों में शुरू होने वाली चर्चा प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया में भरपूर जगह पाना शुरू कर देती है. जब हम अन्य खेलों को सहजता से लेकर उनको खेल भी सकते हैं तो आखिर क्रिकेट के नाम पर इस तरह का बखेड़ा खड़ा करने की क्या आवश्यकता है यह बात समझ से परे है क्योंकि अभी हाल ही में गुवाहाटी-शिलांग में संपन्न हुए सैफ खेलों में पाकिस्तान की टीम ने लगभग हर खेल में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाई और उसे किसी भी तरह की सुरक्षा सम्बन्धी कोई परेशानी भी नहीं हुई फिर क्रिकेट को लेकर दोनों पक्षों की तरफ से हाय तौबा किये जाने का क्या औचित्य बनता है यह खेल प्रेमियों से लगाकर आम जनता को भी समझ में नहीं आता है.
                           अब समय आ गया है कि भारत-पाक को यह एक बार में ही तय कर लेना चाहिए कि खेलों के नाम पर दोनों बिना किसी राजनीति के क्या क्रिकेट भी खेल सकते हैं ? यदि दोनों पक्षों में यदि इतनी सदाशयता नहीं है तो एक नीति बनकर क्रिकेट समेत सभी खेलों को आपस में खेलने से रोक लगा देनी चाहिए. पाक के नियंत्रण में वह जो भी करे पर भारत सरकार को अब स्पष्ट रूप से एक परिपक्व निर्णय लेने की आवश्यकता भी है क्योंकि अभी तक कांग्रेस नीत सरकारों पर शिवसेना और भाजपा यह आरोप लगाया करते थे कि वह देश के सम्मान को गिरवी रखकर पाकिस्तान के साथ खेलते हैं तो अब भाजपा को खुद ही यह तय करने का अवसर और समय मिल गया है कि वह क्रिकेट और पाकिस्तान के साथ कैसे सम्बन्ध चाहती है ? यदि क्रिकेट खेलने से इतनी समस्या है तो एक नीति के तहत द्विपक्षीय, एशिया और विश्व स्तरीय किसी भी स्पर्धा में भारत को पाक से न खेलने के बारे में नीति बना देनी चाहिए और कहीं भी पाक के साथ मैच होने की स्थिति में उसे वॉकओवर देने की नीति पर काम करना शुरू कर देना चाहिए. फिलिस्तीन के साथ समर्थन दिखाने के लिए लम्बे समय तक भारत ने टेनिस के खेलों में इसराइल का सामना होने पर उसे वॉकओवर देने की नीति पर अमल भी किया है तो पाकिस्तान के साथ क्रिकेट में ऐसा कर पाना कोई कठिन कार्य भी नहीं साबित होने वाला है.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 21 फ़रवरी 2016

संसद की चर्चा

                                                     आम बजट और रेल बजट प्रस्तुत करने के लिए बुलाये जाने वाले संसद के स्तर को लेकर अभी से आशंकाएं सामने आने लगी हैं क्योंकि दलित और राष्ट्रद्रोह के दो बड़े मुद्दों को लेकर जिस तरह से विपक्ष मोदी सरकार पर पूरी तरह हावी होने का प्रयास कर रहा है उसके चलते बजट सत्र में वास्तविक रूप में कितना विधायी कार्य संभव हो पायेगा यह समय ही बता सकता है पर सरकार और विपक्षी दलों के बीच इन मुद्दों पर चर्चा के लिए सहमति बनना ही अपने आप में बड़ी राहत भरी खबर है. इसे संसदीय लोकतंत्र की मज़बूती या कमज़ोरी कुछ भी कहा जा सकता है जब विपक्ष सरकार पर हमलावर होता है और सरकार को अपनी कुशलता से सदन को चलाना तथा विपक्ष के हमलों का जवाब भी देना पड़ता है. यह संसद अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अधिकांश समय सरकार अपने संख्या बल के चलते लोकसभा में विपक्ष पर हावी रहने की कोशिश करती है जिससे निपटने के लिए विपक्ष राज्यसभा में सरकार की कमज़ोर संख्या के चलते उसके कामों में रोड़ा अटकाने का काम भी करता रहा है.
                        आज यदि सरकार वेमुला और जेएनयू विवाद पर कुछ ठोस बहस करवाना चाहती है तो विपक्ष को भी अपने मुद्दे इकट्ठे कर उन पर सार्थक बहस करने के बारे में आगे बढ़ना चाहिए. किसी भी देशद्रोह से सम्बंधित मामले में कोई भी राजनैतिक दल अपने को देश विरोधियों के साथ नहीं रखना चाहता है पर जब असली मुद्दे से हटकर बात केवल राजनीति करने तक सीमित हो चुकी हो तो हर पक्ष अपने अनुसार कुछ भी करने के लिए आमादा हो जाता है जिससे कई बार यह दिखाई देता है जैसे कि कुछ लोग देश के साथ तो कुछ लोग देश के विरुद्ध खड़े हुए हैं ? आज के दौर में जिस तरह से राजनीति केवल मुद्दों और वैचारिक स्तर से हटकर व्यक्तिगत हमलों तक पहुँच गयी है उससे यही लगता है कोई भी दल गंभीर मुद्दों पर चिंतन करके उसका हल निकालने के बारे सोचना भी नहीं चाहता है जिससे देश के सामने आज खड़े हुए ज्वलंत मुद्दे भी खोखले स्वार्थ की राजनीति की भेंट चढ़ जाया करते हैं.
                       वैसे उम्मीद तो कम ही है पर यदि संसद में इन विवादित मुद्दों पर गंभीर चर्चा के बाद एक मत से कोई नीति बनाई जा सके कि जिसमें इस तरह की परिस्थितियों को रोकने और आगे से इस तरह एक मुद्दों पर उसी पर चलने के बारे में सोचा जा सके तो आने वाले समय में देश को इस तरह की एक दूसरे के खिलाफ की जाने वाली नकारात्मक राजनीति से छुटकारा मिल सकता है. देश की कीमत पर इस तरह से संसद से सड़कों तक कुछ भी करने की छूट लेना लोकतंत्र का अपमान ही है जिससे सभी दलों और उनके नेताओं को पूरी तरह से बचना भी चाहिए पर इस तरह की सोच पर काम करने से आम लोगों को छोटे मुद्दों पर उलझकर बड़े मुद्दों से अलग रखने की राजनेताओं की कोशिशें भी कमज़ोर पड़ सकती हैं. देश है तो राजनीति करने के अवसर हैं और तभी राजनेता भी रह सकते हैं इसलिए देश की चुनौतियों एक लिए सभी दलों को एक राय बनाकर आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए जिससे आने वाले समय में देश के साथ न्याय किया जा सके और जनता के बीच समरसता के उस ताने बाने को मज़बूत किया जा सके जिसे समय समय पर विभिन्न मुद्दों के चलते छिन्नभिन्न करने की कोशिशें होती ही रहती हैं.
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 23 जनवरी 2016

भारतीय युवा मुस्लिम

                                                                        एक बार फिर से एनआईए द्वारा देश भर में कई जगह छापेमारी के बाद जिस तरह से आतंकी संगठनों के स्लीपर सेल के रूप में काम कर रहे लोगों को संदेह के आधार पर पकड़ा है उसके बाद २६ जनवरी को देश भर में गड़बड़ी करने के लिए प्रयासरत लोगों के लिए यह काम करना उतना आसान नहीं रहने वाला है क्योंकि इसके बाद ख़ुफ़िया एजेंसियों और पुलिस की नज़रें भी इस तरह की गतिविधियों पर अधिक जम गयी हैं. इस स्थिति में जब तक कुछ ठोस सबूत हाथ नहीं आते हैं तब तक गृह मंत्रालय भी कुछ कहने से बच रहा है और उसकी तरफ से अभी तक इस बात की पुष्टि भी नहीं की गयी है कि इन संदिग्धों के आईएस से कोई सम्बन्ध हैं भी या नहीं. रूड़की से हिरासत में लिए गए चार संदिग्धों से मिली जानकारियों के अनुसार ही विभिन्न एजेंसियों द्वारा जाँच को आगे बढ़ाये जाने पर इस तरह की कुछ और सूचनाएँ भी सामने आती चली गईं जिससे यह संदेह होने लगा कि भले ही ये सभी लोग इस ख़ुफ़िया मिशन में सीधे तौर पर शामिल न हों पर उनके इस गतिवविधि में शामिल लोगों के साथ कुछ सम्बन्ध तो अवश्य ही थे.
                                                            आईएस और अन्य आतंकी संगठनों की यही चाल रहा करती है कि वे अपने समूह को मज़बूत करने के लिए की जाने वाली नयी भर्ती के लिए कुछ ऐसा मसाला इकठ्ठा कर सकें जिससे वे यह साबित कर सकें कि भारत में मुसलमानों के साथ बहुत अत्याचार हो रहा है. इस तरह के भ्रामक प्रचार के दम पर वे पहले से ही कुछ लोगों को अपने पक्ष में करने में कुछ हद तक सफल भी हुए हैं पर तालिबान और अल क़ायदा जैसे संगठनों की तरह उनकी नज़रें भी भारत के विशाल मुस्लिम जनमानस पर ही टिकी रहती हैं कि किस तरह से इस बड़ी आबादी के युवाओं को अपने जोड़ने में सफलता मिले. यह बहुत ही घातक स्थिति हो सकती है क्योंकि अभी तक इंटरनेट के प्रसार के कम होने के कारण किसी संगठन को नेट के माध्यम से जानकारी नहीं मिल पाती थी पर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से भारत के दूर दराज़ के क्षेत्रों में भी इंटरनेट की पहुँच हो गयी है उसके बाद यही लगता है कि आने वाले समय में इस तरह से आतंकियों दुष्प्रचार से प्रभावित होकर उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले युवाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी भी हो सकती है क्योंकि धर्म पर आधारित मामलों के सामने आने पर व्यक्ति सामाजिकता आदि को बहुत आसानी से भूल जाता है.
                                           इस परिस्थिति में जाँच एजेंसियों के साथ पुलिस की ज़िम्मेदारी भी विवेचना करने के स्तर पर बहुत बढ़ जाती है क्योंकि अभी तक इस तरह के अधिकांश मामलों में विवेचना की गुणवत्ता उतनी अच्छी नहीं होती कि संदिग्ध बताकर हिरासत में लिए गए लोगों के खिलाफ आरोपों को कोर्ट में साबित किया जा सके जिस कारण से भी कई बार निर्दोषों को लम्बे समय तक जेल में रखे जाने की कई घटनाएँ सामने आई हैं. विवेचना करने वाली एजेंसियों को अब अधिक जागरूक और कानून परक होने की आवश्यकता है तथा जिन लोगों के खिलाफ मज़बूत सबूत हों केवल उनके खिलाफ ही आरोप पत्र भी दाखिल करने के बारे में ही सोचना चाहिए अन्य लोगों को केवल निगरानी के स्तर तक ही रखा जा सकता है. हलके आरोप कभी भी अदालतों में नहीं टिक सकते हैं तो इस दिशा में बिना सबूतों के किसी को भी आरोपी बनाये जाने की मानसिकता से बचने की आवश्यकता है. यहाँ पर यह बात इसलिए सामने आती है क्योंकि अभी तक अधिकांश मामलों में यही सब होता रहा है और सामान्य कानून व्यवस्था से जुडी समस्याओं की तरह से ही इन घटनाओं की विवेचना भी की जाती है.
                                          इस परिस्थिति से निपटने के लिए अब हमारी केंद्र और राज्य की सभी जांच एजेंसियों के साथ  ख़ुफ़िया एजेंसयों का तालमेल भी किया जाना चाहिए जिससे विवेचना में आवश्यक सभी तथ्यों का समावेश किया जा सके तथा जो वास्तव में संदिग्ध हों केवल उनको ही आरोपी बनाया जाना चाहिए जिससे मुक़दमें की सुनवाई भी तेज़ी से संभव हो सके. क्या आज हमारी पुलिस के स्तर पर की जाने वाली अधिकांश विवेचना आतंकी मामलों में भी उसी तरह टिक सकती है जैसी अन्य मुक़दमों में अनावश्यक रूप से टिकी रहती है ? देश की ख़ुफ़िया व्यवस्था के साथ ही अब इस दिशा में भी अधिक तार्किक विवेचना करने की आवश्यकता है और यह हमारी पुलिस अपने आप नहीं सीख सकती है. इसके लिए उसे आधुनिकतम तकनीक से साथ कानून के उन पहलुओं की बारीक जांच भी सिखाई जानी चाहिए जिनके सबूत के तौर पर साबित न कर पाने के कारण कई बार सामान्य और आतंक आदि के मामलों में संदिग्ध लोग आसानी से छूट जाया करते हैं.
                                    इस सबके साथ जो सबसे आवश्यक बात है अब उस पर भी सभी को ध्यान देने की आवश्यकता भी है कि आखिर हमारे युवा मुस्लिमों में से कुछ लोग किस तरह से आतंकी चंगुल में आ जाते हैं ? इस पहलू पर आज भी अधिक ध्यान नहीं दिया जा रहा है क्योंकि इस शिकंजे में उनके उलझने से बचने के लिए क्या उपाय अपनाये जाने चाहिए इस बारे में युवाओं को कोई जागरूक नहीं करना चाहता है. आज युवाओं को इन आतंकी संगठनों के संपर्क में आने के खतरों के बारे में स्पष्ट रूप से समझाया जाना चाहिए और साथ ही यह भी बताया जाना चाहिए कि आतंक की राह पर चलकर उनके परिवार और मित्रों को बाद में किस तरह से समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. इस तरह के किसी भी धार्मिक, आर्थिक या सामाजिक प्रलोभन से किस तरह से बचा जाये इस बात की भी जानकारी युवाओं को दी जानी चाहिए साथ ही उनके लिए हर जिले में एक हेल्पडेस्क भी होनी चाहिए जहाँ पर वे अपने आस पास होने वाली किसी भी संदिग्ध गतिविधि और परिस्थिति की सूचना गोपनीय तरीके से भी दे सकें. जागरूक युवाओं के साथ देशद्रोह में लगे हुए लोगों को चिन्हित करना आसान रहने वाला है और जो शिक्षित युवा भी धार्मिक होने के कारण इस गिरफ्त में आ जाते हैं उनको भी बचाने की आज बहुत आवश्यकता भी है जिससे देश सुरक्षित होने के साथ एक साथ आगे बढ़ने के बारे में सोचना शुरू कर सके.           
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

सोमवार, 11 जनवरी 2016

कश्मीर राजनैतिक संकट की तरफ ?

                                                      जम्मू कश्मीर के सीएम मुफ़्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद वहां की राजनीति पर एक बार फिर से अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं क्योंकि मुफ़्ती के नाम पर भाजपा में जिस हद तक आम सहमति थी वह महबूबा के नाम पर नहीं बन पा रही है जिसके चलते भी पीडीपी और भाजपा गठबंधन के भविष्य पर इस बात का दुष्प्रभाव पड़ने लगा है. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के शोक प्रकट करने के लिए मुफ़्ती के घर तक जाने के बाद इस बात के कयास लगाये जाने लगे हैं कि कहीं यह आने वाली नयी राजनीति की आहट तो नहीं है ? अभी तक मुफ्ती के नेतृत्व में गठबंधन सरकार का प्रदर्शन कमोबेश ठीक ही कहा जा सकता है क्योंकि इतने अशांत राज्य में सब कुछ ठीक कर पाना इतना आसान भी नहीं होने वाला है. ऐसी परिस्थिति का लाभ उठकर देश में राजनीति करने को सदैव से ही एक परंपरा के रूप में निभाया जाता है और आज यदि कांग्रेस भी उसी राह पर चल रही है तो यह देखने सुनने में कुछ अजीब तो नहीं है पर जम्मू कश्मीर के भविष्य के लिए केंद्र सरकार से नाता तोड़कर महबूबा के लिए सीएम बनना भी आसान नहीं रहने वाला है.
                                                       यह राज्य और देश दोनों के लिए ही एक महत्वपूर्ण समय है क्योंकि लम्बे समय के बाद जिस तरह से वहां पर सुरक्षा बलों को आतंकियों के पाँव उखाड़ने और सीमा पार से घुसपैठ को रोकने में सफलता मिली है उसे देखते हुए राज्य में किसी भी तर का राजनैतिक शून्य नहीं बनाया जाना चाहिए और इसकी ज़िम्मेदारी कश्मीरी नेताओं से अधिक दिल्ली में बैठे भाजपा और कांग्रेस के नेताओं पर आती है. राज्य में राजनैतिक गतिविधियाँ सही तरह से चलनी चाहिए इस बात पर किसी को भी आपत्ति नहीं है तो पूरे मामले की गंभीरता को समझते हुए इस पर सभी को कश्मीर और देश के भविष्य के बारे में सोचना चाहिए. यह भी सही है कि मुफ़्ती के साथ भाजपा ने जिन शर्तों पर काम शुरू किया था उनके न रहने के बाद शर्तों को पुनर्निर्धारित करने का भी समय आ गया है और इस मसले पर संवादहीनता से काम नहीं चलने वाला है. भाजपा और पीडीपी दोनों दलों को केवल उन शर्तों के बारे में ही सोचना चाहिए जिनसे कुछ सकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं. भाजपा के विभिन्न नेताओं कि तरफ से जिस तरह की बयानबाज़ी की जाती है उसे देखते हुए आज यही लगता है कि महबूबा उस पर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से कोई ठोस आश्वासन भी चाहती हैं.
                                                 दोनों ही पक्षों को सरकार के गठन के लिए नए सिरे से सोचने के स्थान पर शर्तों को आज की परिस्थिति के अनुसार संशोधित करना ही सही रहेगा क्योंकि घाटी में पीडीपी को अपने वोटर्स को जवाब देना है जिसके लिए उसे उनकी फ़िक्र भी हो रही है पर भाजपा इस मुद्दे पर अपने जम्मू के वोटर्स को सँभालने के चक्कर में कुछ भी बोलने वाले नेताओं के साथ कठोरता से पेश नहीं आ सकती है. इस परिस्थिति में दोनों दलों के सामने अपने वोट बैंक को सँभालने की चुनौती बढ़ती ही जा रही है जिससे भी राजनैतिक अस्थिरता देखी जा रही है. महबूबा के सामने अब राज्य की कमान सँभालने के साथ अपने को सिद्ध करने का समय भी आ गया है जिसके चलते अब वे किसी भी परिस्थिति में अपने वोटर्स को नाराज़ नहीं कर सकती हैं. इस मुद्दे पर कांग्रेस के बेहतर रणनीतिकार गुलाम नबी आज़ाद के पास करने के लिए बहुत कुछ है इसलिए कांग्रेस की तरफ से महबूबा को चुनाव के बाद दिए गए समर्थन के पत्ते फिर से चल दिए गए हैं. यह समय अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं को किनारे रखकर कश्मीर के विषय में सोचने का है क्योंकि अपनी राजनीति को साधने के लिए किसी भी स्थिति में घाटी के साथ कोई खिलवाड़ कर पिछले दो दशकों में ली गयी बढ़त को समाप्त करना देशहित में नहीं होगा.   
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शनिवार, 19 दिसंबर 2015

पुलिस अधिकारियों की सालाना कॉन्फरेंस

                                                                            देश भर के आला पुलिस अधिकारियों की सालाना कॉन्फरेंस इस बार गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र में आयोजित की गयी है जिसमें सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों समेत वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी भाग लिया करते हैं. इस कॉन्फरेंस को आज़ादी के बाद शुरू किया गया था जिसका उद्देश्य देश भर की पुलिस के सामने आने वाली चुनौतियों को एक मंच पर साझा करते हुए उनसे निपटने और देश में शांति बनाये रखना था. इस बार भी यह सम्मलेन शुरू हो चुका है और पीएम, गृह मंत्री के साथ अन्य विशिष्ट लोग भी इसमें मंथन करने वाले हैं सम्मलेन का उद्घाटन भाषण देते हुए जब केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इसके केंद्र में आतंकवाद और जम्म-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर पर ध्यान होने की बात करते हैं तो उनकी सरकार का खोखलापन भी दिखाई दे जाता है क्योंकि जिस जम्मू-कश्मीर पर वे चर्चा करना चाहते हैं वहां से पीडीपी-भाजपा सरकार ने अपने डीजीपी के. राजिंद्रन और आईजी अब्दुल गनी मीर को पहले स्वीकृति देने के बाद भाग लेने के लिए ही नहीं भेजा है और इस मामले पर जम्मू-कश्मीर सरकार का क्या रुख है यह भी आधिकारिक तौर पर अभी तक उसकी तरफ से स्पष्ट नहीं किया गया है.
                             पूरी दुनिया जानती है कि भारत में आतंक से सबसे अधिक प्रभावित राज्य जम्मू-कश्मीर ही है पर जब अपनी वार्षिक कॉन्फरेंस में जब देश की पुलिस के शीर्ष अधिकारी आतंकवाद पर चर्चा करने के लिए बैठते हैं तो उसमें उस राज्य के किसी भी शीर्ष अधिकारी की शिरकत दिखाई ही नहीं देती है तो उस परिस्थिति में क्या जम्मू-कश्मीर के हालात और आतंकवाद पर सार्थक चर्चा संभव भी है यह तो केंद्र की वैश्विक स्तर पर आतंवाद पर हमला करने वाली मोदी सरकार को सोचना ही चाहिए था ? यदि जम्मू-कश्मीर में किसी भी अन्य दल की सरकार होती तो क्या केंद्रीय गृह मंत्री और पीएम इस तरह से इस मसले पर चुप्पी लगाते और क्या टीवी चॅनेल्स पर हल्ला मचाने वाले भाजपाई प्रवक्ता इस मुद्दे पर इसी तरह से चुप रह जाते ? मुफ़्ती के नेतृत्व में भाजपा की साझा सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता के साथ सोचना भी चाहिए था क्योंकि कश्मीर में हालत चाहे जैसे भी हों पर क्या इस तरह से स्थानीय कारणों के चलते इतनी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कॉन्फरेंस से राज्य के प्रतिनिधित्व को अनदेखा किया जा सकता है और क्या राष्ट्रवादी भाजपा का वर्तमान संस्करण इसे सही भी मानता है ?
                        इसी कॉन्फरेंस में गृह मंत्री यह बयान देते हैं कि जम्मू-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर में हालात में काफी सुधार आया है और दूसरी तरफ राज्य सरकार बिना कारण बताये इतनी महत्वपूर्ण बैठक में अपने पुलिस अधिकारियों को अंतिम समय पर मना कर देती है तो दोनों में से कौन सही है यह बता पाना बहुत ही मुश्किल है. यदि जम्मू-कश्मीर के हालत पहले से अच्छे हो गए हैं तो के. राजिंद्रन गुजरात क्यों नहीं भेजे गए और यदि वहां हालात इतने ख़राब हैं कि राज्य सरकार अपने पुलिस प्रमुख के साथ कुछ आला अधिकारियों को केवल तीन दिनों के लिए राज्य से बाहर भी नहीं भेज सकते हैं तो किसको सही माना जाये ? यदि वास्तव में वहां के हालात इतने ख़राब हैं गृह मंत्री किस दम पर स्थिति सुधारने के दावे करने में लगे हुए हैं या यह भी संभव है कि पीडीपी-भाजपा गठबंधन में कहीं न कहीं कुछ ऐसा भी चल रहा है जो सब सामने नहीं आ पा रहा है और संभवतः मोदी को दबाव में रखने के लिए ही मुफ़्ती ने अंतिम समय में इस तरह का निर्णय लिया है. जम्मू-कश्मीर में केवल सत्ता में साझीदार बनने के लिए जिस तरह से भाजपा ने अपने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान की अनदेखी की वह आज किसी से भी छिपी नहीं है और अब भाजपा संभवतः उसी निर्णय का भुगतान करने में लगी हुई है.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

दिल्ली-इस्लामाबाद वाया उफ़ा-बैंकॉक

                                                                            विपक्ष में रहते हुए और पिछले आम चुनावों में पाकिस्तान को सीख सिखाने के लम्बे चौड़े दावे करने वाले पीएम मोदी ने जिस तरह से अपने शपथ ग्रहण में ही नवाज़ शरीफ को दिल्ली बुलाया था उससे लगने लगा था कि संभवतः पाक की तरफ से इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल भी की जा सकती है पर समय बीतने के साथ जिस तरह से दोनों देशों के बीच कश्मीर में उग्रवादियों को लेकर तनातनी शुरू हुई उसने फिर से संबंधों को उसी स्तर पर पहुंचा दिया जहाँ वे २६/११ से पहले हुआ करते थे. अभी तक संघ-भाजपा और उग्र हिंदुत्व का समर्थन करने वाले समूहों को भाजपा की पाक के प्रति नीति और चुनावों तक मोदी की बयानबाज़ी के चलते यह उम्मीद थी कि अब पाकिस्तान के साथ खुलकर हर मुद्दे पर बात होगी पर जिस तरह से पिछले डेढ़ वर्षों में जिस तरह से मोदी सरकार का रवैया पाकिस्तान के प्रति दिखाई दे रहा है उससे यही लगता है कि भाजपा के पाक से सम्बंधित रणनीतिकारों की समझ में यह नहीं आ रहा है कि इस देश से किस तरह से निपटा जाये तो यह उनकी इस विषय पर समझ को ही दर्शाता है.
                                           अभी तक पाकिस्तान को सबक सिखाने वाले और एक के बदले दस सर काटने जैसे बयानवीर नेताओं के बिना किसी ठोस आश्वासन के ही इस तरह से पाक से बात करने से खुद संघ और भाजपा समर्थकों की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है और वर्तमान परिस्थिति में वे कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है. जिस तरह से संसद का सत्र चल रहा है तो इस परिस्थिति में सरकार के लिए इन मुद्दों का जवाब सदन में भी देना मुश्किल हो सकता है क्योंकि मोदी सरकार जिस नीति के तहत पाक से गुपचुप तरीके से बात करने में लगी हुई है उससे कहीं न कहीं संदेह भी होता है. मोदी जैसे कड़े निर्णय लेने वाले नेता की इस तरह से भ्रम की स्थिति दर्शाने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति ही कमज़ोर होती है क्योंकि २००८ में जब २६/११ के बाद मनमोहन सरकार ने द्विपक्षीय संबंधों पर बातचीत रोक दी थी तो उस समय भाजपा ने भी यही मांग की थी और मनमोहन सरकार पर देश को असुरक्षित करने का आरोप भी लाया था पर आज खुद अंतर्राष्ट्रीय दबाव के सामने झुकते हुए मोदी उससे भी आगे जाने का काम करने में लगे हुए हैं ऐसी स्थिति में भाजपा के उग्र समर्थकों की समझ में नहीं आ रहा है कि वे अपने नेता के इस कदम का जनता के सामने किस तरह से बचाव करें ?
                                          यदि पाक से सभी मुद्दों पर बातचीत होती है तो यह अच्छा ही है और संप्रग सरकार भी यही करना चाहती थी पर भाजपा उस पर पाक एक सामने टेकने के आरोप लगाने में नहीं चूकती थी. उफ़ा में जिस तरह से उग्रवाद को केंद्र में रखकर बात करने का फैसला दोनों विदेश सचिवों के संयुक्त बयान में था बैंकॉक की सहमति में वह अचानक से गायब हो गया है उस समय कश्मीर किसी भी तरह से बातचीत का हिस्सा भी नहीं था पर आज वह भी मुद्दों में शामिल हो चुका है इससे यही लगता है कि मोदी सरकार पाक से रिश्ते सुधारने के लिए एक बार फिर से वही गलती करने जा रही है जैसी वाजपई सरकार ने पाक के साथ रिश्ते सुधारने की धुन में करते हुए यह ध्यान ही रखा कि पाक के लोकतंत्र के लोग सेना की कठपुतली से अधिक कुछ भी नहीं होते हैं और उनसे बातचीत कब बीच रास्ते में ही दम तोड़ जाये इसका भी भरोसा नहीं होता है. कारगिल के सबक से लगता है कि भाजपा और संघ ने कुछ भी नहीं सीखा था तभी वे बिना खुला एजेंडा तय किये एक बार फिर से गुपचुप एजेंडे के तहत पाक से बात करने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं. पाक से रिश्ते सुधरने चाहिए इस पर पूरी दुनिया एकमत है पर क्या संबंधों का सुधार इस तरह से गुप्त एजेंडे के अंतर्गत किया जाना भारत के दृष्टिकोण से सही है यह आज समझने की सबसे अधिक आवश्यकता भी है.        
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शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

भारत-अफ्रीका परंपरा और संबंध

                                                                           देश के निर्माण में अपना किसी भी स्तर पर योगदान करने वाले नेताओं को भले ही सरकार पूरी तरह से भूल गयी हो पर भाजपा की कथित मीडिया टीम के लिए भारत अफ्रीका समिट में नेहरू-इंदिरा का जिक्र कहीं से भी संघ, मोदी और भाजपा को रास नहीं आया होगा। आज़ादी के बाद पूरी दुनिया में भारत को हर तरह से स्वीकार्य बनाये जाने के लिए नेहरू द्वारा किये गए प्रयासों को अनदेखा करते हुए जिस तरह से भाजपा ने पिछले चुनावों में उंनके चरित्र हनन से लेकर लगभग हर हथकंडा अपनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी उसकी उस मानसिकता को भी अफ्रीका के नेताओं ने पूरी दुनिया के सामने बहुत अच्छी तरह से आइना दिखा दिया है क्योंकि भारत की अभी तक की छवि पूरी तरह से सहिष्णु और सद्भाव बढ़ाने वाले राष्ट्र की ही रही है पर कहीं न कहीं से भाजपा के मातृ संगठन संघ द्वारा आज़ादी के बाद नेहरू के नेतृत्व में देश ने जो कुछ भी हासिल किया था उसे नकारने का काम ही अधिक किया जाता रहा है और उनकी कुछ नाकामियों को इस तरह से प्रदर्शित किया जाता है जैसे उन्होंने देश के लिए कुछ भी नहीं किया हो ?
                      लोकतंत्र में राजनैतिक विरोध होना अवश्यमभावी है क्योंकि विपरीत विचारधाराओं में से ही लोगों को अपने लिए सरकार चुनने की आज़ादी के बारे में अपने अधिकार का उपयोग करना होता है और इसी क्रम में देश ने कई बार शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण भी देखे हैं जो शायद दुनिया के लिए एक अचम्भे से अधिक कुछ भी नहीं हैं क्योंकि पिछली सदी में स्वातंत्र हुए देशों में जिस तरह से समस्याएं बनी रहती हैं भारत ने उससे पूरी तरह मुक्ति ही पा रखी है. संघ का देश में एक अपना ही अलग एजेंडा रहा है और उसी के तहत वह भाजपा से अपने काम करवाने की कोशिशें करता रहता है पर जिस समिट के लिए मोदी सरकार ने पूरा ज़ोर सिर्फ इस बात पर ही लगा दिया था कि यह केवल मोदी और भाजपा का ही सम्मलेन रह जाये तो दक्षिण अफ्रीका और ज़िम्बाब्वे के नेताओं ने अपनी स्पष्टवादिता से उनकी इस मंशा पर पूरी तरह से पानी ही फेर दिया जब उन्होंने मंच से ही भारत के साथ अफ्रीका महाद्वीप के रिश्तों के ज़िक्र में नेहरू और इंदिरा गांधी का ज़िक्र पूरी शिद्दत के साथ किया।
                            दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने जिस तरह से पिछली सदी में अपने देश के साथ संबंधों को बढ़ाने और विकास की बात करने के लिए नेहरू के योगदान की चर्चा की उससे यही लगता है कि भले ही देश की राजनीति में आज प्रभावी भूमिका निभा रहे संघ और मोदी सरकार के लिए नेहरू और इंदिरा की उपेक्षा करना आसान हो पर दुनिया और ख़ास तौर पर अफ्रीका के लोग आज भी उनके योगदान को नहीं भूल पाये हैं. इसी क्रम में जिम्बाब्वे के राष्ट्रपति रोबर्ट मुगाबे ने और भी आगे जाते हुए लम्बे समय तक भारत में राज करने वाली कांग्रेस पार्टी को भी महान बताया उससे केवल यही सीखा जा सकता है कि भले ही आज कोई भी दल या नेता अप्रभावी हो चुका हो पर उसके कार्यकाल में लिए गए फैसलों से प्रभावित होने वाले लोगों के लिए वह सदैव ही महत्वपूर्ण ही रहा करता है. आज यदि अफ्रीका के नेता इतने दिनों बाद भी नेहरू इंदिरा को याद कर रहे हैं तो निश्चित तौर पर उनके काम तो बहुत ही महत्वपूर्ण रहे होंगे पर आज संघ, भाजपा और मोदी अपने देश की उस विरासत से पीछा छुड़ाना चाह रहे हैं जो अब देश के इतिहास में दर्ज़ हो चुकी है.
            लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई किसी भी सरकार को देश चलाने की पूरी स्वतंत्रता संविधान में दी गयी है पर अपनी सोच से इतर किसी अन्य को अपनी विरासत विरासत का हिस्सा न मानने वाली इस संघ की परंपरा को आज मोदी सरकार आगे बढ़ाने में लगी हुई है जिससे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उसकी छोटी सोच ही प्रदर्शित होती है क्योंकि यदि विश्व के साथ लम्बे समय तक भारत के संबंधों की रखवाली करने वाले नेताओं को भी इतनी महत्वपूर्ण समिट में भुला दिया जाता है तो जिन्होंने उनके साथ काम किया या उनकी नीतियों के चलते बहुत लाभ उठाया है वे किसी भी तरह से उसे नहीं भूलने देते हैं और इस समिट में संभवतः अफ्रीका के इन शीर्ष नेताओं ने यही बात सार्वजनिक मंच से कहकर एक तरह से मोदी सरकार को सन्देश देने का काम ही किया है. दूसरे नेता इस तरह की बातों रुख अपनाते हैं यह उनकी बात है पर भारत की श्रेष्ठ परंपरा का निर्वहन करते हुए नए युग में प्रवेश करने के बारे में एक स्पष्ट सन्देश इन सीधे साधे अफ़्रीकी नेताओं स्वर तो दे ही दिया गया है.  
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गुरुवार, 29 अक्टूबर 2015

भारत से दूर होता नेपाल

                                                   नेपाल द्वारा नए संविधान को अपनाने के बाद जिस तरह से भारत की तरफ से उसके मामलों में अपरोक्ष रूप से समस्याएं बढ़ाने के आरोपों के बीच नेपाल में जन जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ और मधेशियों की भारत नेपाल सीमा पर आर्थिक नाकेबंदी से नेपाल में हर आवश्यक वस्तु की कमी होने लगी उसके बाद वहां आम लोगों के दबाव या भारत को सबक सिखाने के लिए ही नेपाल ने चीन के साथ अपने संबंधों को नए आयाम देना शुरू कर दिया है जो कि आने वाले समय में भारत के लिए नयी तरह की सुरक्षा चिंताएं भी लेकर आने वाला है. भारत एक तरफ चीन को घेरने के लिए लुक ईस्ट पॉलिसी पर काम करने में लगा हुआ है वहीं दूसरी तरफ आज़ादी के समय से ही भारत के साथ खड़ा नेपाल आज मजबूरी में चीन की तरफ जाता हुआ दिख रहा है जिससे हिन्द महासागर में जो कुछ भी भारत को हासिल होने वाला था अब उसकी भरपाई नेपाल में किसी भी स्तर पर नहीं हो पाएगी.
                                             यह सही है कि मोदी सरकार विश्व के तमाम देशों के साथ पहले से स्थापित  संबंधों को आज की परिस्थिति के अनुरूप बनाने की कोशिशों में लगी हुई है पर साथ ही उसकी तरफ से नेपाल मामले में गंभीर खामियां भी दिखाई दे रही हैं क्योंकि नेपाल भले ही एक स्वतंत्र और सम्प्रभु राष्ट्र है पर दोनों देशों में हर तरह के सांस्कृतिक सम्बन्ध सदियों से चले आ रहे हैं और आज की परिस्थिति में जब नेपाल में वामपंथियों के साथ साम्यवादियों का प्रभाव बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है तो उससे भारत की दक्षिण पंथी सरकार किस तरह से बर्दाश्त करने वाली है यह तो समय ही बता पायेगा पर इस तरह की घटनाओं से भारत की नेपाल से दूरी बढ़नी शुरू हो चुकी है. नेपाल ने चार दशकों से भारत के साथ चले आ रहे तेल आपूर्ति समझौते के साथ ही चीन से भी इसी तरह का समझौता का भारत का एकाधिकार समाप्त कर दिया है जिससे एक तरफ भारत को आर्थिक नुकसान पहुंचेगा ही पर साथ में नेपाल और भारत के संबंधों पर भी इसका बुरा असर पड़ना शुरू हो जाएगा.
                           वर्तमान में पीएम मोदी और विदेश मंत्री स्वराज पर इस बात का बहुत अधिक दबाव बनने भी वाला है पर संभवतः आज मोदी अपने कार्यक्रमों के बाच ही बिहार चुनावों में व्यस्त होने के चलते इन मुद्दों पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं और नेपाल से जुड़ा हुआ यह मामला अत्यंत गंभीर रुख लेता जा रहा है. क्या मोदी को यह लगता है कि जब उनके पास समय होगा तब वे नेपाल के साथ संबंधों पर विचार कर लेंगें तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल ही होगी क्योंकि भारत जहाँ पाक बांग्लादेश और श्रीलंका के साथ किसी न किसी तरह की समस्या में उलझा हुआ है तो नेपाल में एक नया मोर्चा खुल जाने से आखिर उससे एकदम से कैसे निपटा जायेगा यह भी सोचने का विषय है. यह सही है कि भारत पिछले दो दशकों से अन्तर्राष्ट्रीय मसलों पर अपनी बेहतर राय के साथ सदैव ही उपस्थित रहा करता है पर देशहित के मामले में नेपाल के साथ बराबरी के आधार पर कोई स्थायी समझौता क्यों नहीं किया जाता है जिसका अनुपालन हर परिस्थिति में करने की बाध्यता दोनों ही देशों पर हो.  
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रविवार, 30 अगस्त 2015

आईएस और दुनिया

                                                           पूरी दुनिया में आज आतंक के पर्याय बन चुके संगठन आईएस के चलते इस्लाम को मानने वाले लोगों पर संदेह बढ़ता ही जा रहा है जो कि कहीं न कहीं से अंत में आईएस को ही ताकत देने वाला साबित होने वाला है. आज विश्व में आतंक एक सरकारी तौर पर समर्थन और निर्यात के सबसे कुख्यात देश पाकिस्तान में भी अफगानिस्तान में आईएस के बढ़ते रसूख और पाक के कुछ हिस्सों से पुराने इस्लामिक आतंकी गुटों के आईएस के पक्ष में लामबंद होने की ख़बरों के बाद अब आईएस पर प्रतिबन्ध लगाया गया है जिसका पाक पर असर पड़ना लाजमी ही है. पिछले कुछ दशकों से पूरे विश्व में कुछ चरमपंथियों द्वारा जिस तरह से इस्लाम और इस्लामी मान्यताओं की मनमानी व्याख्या की जाने लगी है उसको देखते हुए ईरान सरकार के खर्चे पर पैगम्बर हज़रत मोहम्मद की जीवनी पर आधारित एक फिल्म तीन हिस्सों में बनायीं है जिसमें उनके समय के हालातों पर विस्तार से दिखाया गया है और उनकी मान्यताओं के बारे में भी स्पष्टीकरण देने की कोशिशें की गयी हैं क्योंकि ईरान को लगता है कि आज इस्लाम का जो स्वरुप दिखाई दे रहा है वह पैगम्बर के समय से बिलकुल ही अलग है पर इस फिल्म को भी सुन्नी समुदाय की तरफ से विरोध का सामना करना पड़ रहा है.
                                पूरे इस्लामी जगत को अब यह बात समझनी ही होगी कि आखिर वे कौन से कारण है जिसके चलते पूरे विश्व में आज उसको आतंक का पर्याय बताने की कोशिशें शुरू की जा चुकी हैं तथा किन कारणों के चलते आज युवा मुस्लिम समग्र विकास के स्थान पर केवल जेहादी बनने की सोच तक ही सीमित होने लगे हैं ? धर्म केवल तभी तक जन कल्याण सीमित तक रह सकता है जब तक उसके अनुयायी उसके बारे में खुद पढ़ते सीखते हैं पर जब भी कुछ लोगों द्वारा धर्म के व्यापक स्वरुप को केवल अपने हितों को साधने का साधन बनाया जाने लगता है तो उसकी परिणीति धर्म की बदनामी से अधिक कुछ भी नहीं हो सकती है. आज तालिबान के कमज़ोर पड़ने के बाद जिस तरह से आईएस पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भी आगे बढ़ने में लगा हुआ है तो उससे पूरी दुनिया में चिंता बढ़नी स्वाभाविक ही है क्योंकि पाक आज एक अराजक और विफल राष्ट्र के रूप में दुनिया के लिए सरदर्द बनता जा रहा है और ऐसी स्थिति में यदि उस पर आईएस का नियंत्रण हो जाता है तो यह पूरी दुनिया के लिए घातक साबित हो सकता है. परमाणु शक्ति संपन्न होने के कारण किसी भी तरह से पाक में आईएस जैसे संगठन का प्रभुत्व कहीं भी बढ़ने के दूरगामी परिणाम होने वाले हैं और यह बात पाक की सेना और सत्ता की समझ में आने लगी है.
                         अभी तक पाक ने जिस तरह से इस्लामिक देशों से जिहाद के नाम पर मिले फण्ड का दुरूपयोग ही किया है और पाकिस्तानी सेना में भारत को परेशान करने के लिए जिस तरह से जिहाद घुट्टी को पिलाया जाता है आज वही उसके लिए बड़ी समस्या बन सकती है क्योंकि आईएस आज पूरे विश्व खिलाफत की कोशिश करने वाले संगठन के रूप में खुद को खड़ा करने में लगा है जिससे इराक और सीरिया से दूर के मुस्लिम देशों में उसको समर्थन भी मिल रहा है. आज आईएस यही चाहता है कि इन आतंकी गतिविधियों एक चलते पूरी दुनिया में मुसलमान तरक्की और सद्भाव के विरोधी मान लिए जाएँ क्योंकि तभी वह इस्लामी जगत को यह समझने में सफल हो पायेगा कि पूरी दुनिया ही इस्लाम के खिलाफ खड़ी हो रही है और इसी परिस्थति के दम पर वह अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मुस्लिम युवकों को इकठ्ठा कर पायेगा जिनके माध्यम से वह और भी नए क्षेत्रों में अपने आतंक को बढ़ाने की कोशिशें कर सकता है. आज इस बात को ध्यान में रखते हुए ही गैर इस्लामिक देशों को अपने कदम उठाने पड़ेंगें जिससे आने वाले समय में वे अनजाने में ही आईएस की मदद करने वाले न साबित हो जाएँ.   
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शनिवार, 2 मई 2015

अरुण शौरी का मोदी पर हमला

                                                देश के जाने माने पत्रकार से नेता बने बाजपेई सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों को संभाल चुके अरुण शौरी ने जिस तरह से सरकार बनने के एक वर्ष पर दिए गए अपने एक इंटरव्यू में मोदी सरकार के साथ ही मोदी-शाह-जेटली की तिकड़ी पर करारा हमला किया है उससे यही पता चलता है कि आने वाले समय में भले ही मोदी को कोई बड़ी परेशानी न झेलनी पड़े पर उसके पहले पीएम अटल के वरिष्ठ और प्रभावी मंत्रियों द्वारा इस तरह के बयान दिए जाने से विपक्ष को उन पर हमले करने के अवसर आसानी से उपलब्ध होने वाले हैं. आज जब सरकार अपने कार्यकाल के बारहवें महीने में पहुँच रही है तो उसकी और पार्टी की तरफ से अपने कार्यकाल की उपलब्धियों की चर्चा बड़े स्तर पर किये जाने के साथ ही उनको जनता तक पहुँचाने की पूरी कोशिश की जाएगी पर सदन में कमज़ोर विपक्ष की बजाय जब सत्ताधारी दल के वरिष्ठ और मंझे हुए नेताओं की तरफ से इस तरह की बातें की जाने लगें तो जनता का एक वर्ग जो बड़ी उम्मीदों के साथ सरकार के साथ जुड़ा था वह भी इनकी बातों को सही मानते हुए इस पर विचार करने ही लगता है जिससे सरकार के बारे में नकारात्मकता का प्रतिशत बढ़ने की पूरी संभावनाएं होती हैं.
                             शौरी ने विपक्ष द्वारा मोदी सरकार को प्रचार की सरकार कहने की बातों का भी अपरोक्ष रूप से समर्थन ही किया और कहा कि यह सरकार केवल अपने कामों का बखान ही अधिक करती रहती है जिससे धरातल पर कोई परिवर्तन नहीं आता है इस स्थिति में जब सरकार को आये एक वर्ष पूरा हो रहा है तो उसके द्वारा किये गए अधिकांश वायदे आज भी वैसे ही हैं क्योंकि प्रचार के दौरान मोदी ने संप्रग सरकार पर हमले करते समय उन मुद्दों पर भी जमकर राजनीति की जिन पर उनका या किसी भी देश के पीएम का कोई नियंत्रण संभव ही नहीं है. आज उन बातों को पूरा करने में मोदी सरकार पूरी तरह से असफल ही नज़र आ रही है क्योंकि वे खोखले वायदे ही थे. हाँ जिन मामलों में सरकार काम कर सकती थी उसने किये भी हैं पर किसी भी देश के लिए एक दो दशक में केवल नीतियों का संशोधन और परिवर्तन ही किया जा सकता है उसके परिणाम सामने आने में कई बार काफी लम्बा समय लग जाता है. आज मोदी सरकार के अथक प्रयासों के बाद भी मेक इन इंडिया ज़ोर नहीं पकड़ पा रहा है क्योंकि सरकार नीतिगत परिवर्तन के साथ विदेशी निवेशकों को उस स्तर पर निवेश करने के लिए समझा नहीं पा रही है जिसके आज आवश्यकता है.
                          मोदी सरकार एक प्रचार वाली सरकार है यह बात अरुण शौरी ने भी स्वीकार की है और काम करने से अधिक उन बातों को प्रचारित करने को लेकर पीएम को शौरी ने कटघरे में खड़ा भी किया है. देश में रिबेरो की सामाजिक चिंता के साथ दीपक पारेख की आर्थिक चिंता आदि के बयानों से भी यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार के काम उस स्तर पर चल नहीं पा रहे हैं जिनके दावे मोदी द्वारा किये जा रहे हैं. शौरी के अनुसार देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए माहौल बिगड़ने पर भी मोदी की चुप्पी या एक आध खोखले टाइप बयान आने से भी देश की छवि को बट्टा ही लग रहा है. यदि मोदी यह समझते हैं कि अपने धार्मिक उन्मादी कट्टर हिंदुत्व के समर्थकों की हर हरकत पर चुप रहकर वे विदेशी निवेश को आकर्षित कर लेंगें तो यह उनका सपना ही रह जाने वाला है. जिन क्षेत्रों में सस्ते श्रम के दम पर मेक इन इंडिया का नारा बुलंद किया जा रहा है क्या कभी मोदी ने यह जानने की कोशिश भी की कि उन क्षेत्रों में कट्टर हिंदुत्व के पैरोकार किस तरह से माहौल को गर्माने में लगे हुए हैं ? इस तरह का धार्मिक ध्रुवीकरण संभवतः कुछ वोट बटोरने के काम तो आ सकता है पर इसके दम पर विदेशों में भारत की साख को बचाये रखने और मेक इन इंडिया जैसे नारों की हर कोशिश विफल ही रहने वाली है. आज पूरी सरकार और पार्टी मोदी के साथ पर क्या वे अपने मंत्रियों, नेताओं को वह सम्मान दे पा रहे हैं जो स्वस्थ लोकतंत्र में उन्हें दिया जाना चाहिए ? 
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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

बिहार और संविधान

                                                                     काफी लम्बे समय के बाद देश में एक बार फिर से बिहार में १९९८ के यूपी जैसी स्थिति सामने आई है और सम्भावना इस बात की दिख रही है कि अल्पमत में आये और जेडीयू से निष्कासित सीएम मांझी को विधान सभा में बहुमत साबित करने का अवसर और समय राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी द्वारा दिया जायेगा क्योंकि पहले जिस तरह से मांझी द्वारा दिल्ली में यह दावा किया गया था कि वे मंत्रमंडल का विस्तार करना चाहते हैं उससे मामला उलझ सा गया लगता है. यदि मांझी द्वारा इस तरह के दावे न किये जाते तो संभवतः केसरी नाथ उनसे आगामी बजट सत्र में पहले बहुमत साबित करने केलिए कह सकते थे पर इस मामले में मांझी और भाजपा के आंकलन में गड़बड़ी रह गयी और जेडीयू में उतने बड़े पैमाने पर विभाजन नहीं हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी. अब जब मामला जानबूझकर उलझाया जा रहा है तो बिहार के राज्यपाल के साथ ही केंद्र सरकार पर भी दबाव बनने वाला है क्योंकि इसी वर्ष चुनावी बिसात बिछने से अब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिये ही परिस्थितियां आसान नहीं रहने वाली हैं.
                             राज्यपाल के पास ऐसी परिस्थिति में खुले तौर पर सबसे सुगम संवैधानिक विकल्प यही होता है जिसमें वह सरकार से सदन में अपना बहुमत साबित करने के लिए कह सकते हैं पर इसके लिए राजयपाल द्वारा अनावश्यक रूप से जो समय लिया जा रहा है वह चुनावी वर्ष में केवल भाजपा को संभावित लाभ दिलाने के चलते ही लग रहा है. बिहार की जाति आधारित राजनीति में विधान सभा चुनावों में इसी दम पर बहुत कुछ दांव पर लगा रहने वाला है तो किसी के लिए भी इसकी अनदेखी करना आसान नहीं रहने वाला है. सदन में जब सत्ताधारी दल के अध्यक्ष के रूप में शरद यादव की तरफ से राज्यपाल को सूचित कर दिया गया है कि मांझी अब उसके विधान मंडल दल के नेता नहीं हैं और उनके स्थान पर नितीश को नया नेता चुन लिया गया है तो उन्हें सीधे तौर पर कार्यवाही करते हुए मांझी इस्तीफ़ा न देने की स्थिति उन्हें बर्खास्त करने या सदन का विश्वास हासिल करने के लिए कहना चाहिए पर वे जिस तरह से जेडीयू के इस मामले का राजनैतिक रूप से भाजपा के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं उसका कोई औचित्य नहीं है.
                            जब एक बार यह तय किया जा चुका है कि किसी भी सरकार के लिए सदन में ही विश्वास मत हासिल करने से अच्छा कोई विकल्प नहीं हो सकता है तो इस तरह से राजनैतिक अनिश्चितता को बनाये रखने से जनता में क्या सन्देश जाने वाला है ? यह भी पूरी तरह से सही है कि विगत में केंद्रीय सत्ताधारी दलों के द्वारा राज्यपाल के पद का इसी तरह से दुरूपयोग भी किया जाता रहा है पर कल्याण सिंह- जगदम्बिका पाल के मामले में एक बार सदन की सर्वोच्च्च्ता साबित हो चुकी है तो उस पर तुरंत निर्णय लेने के स्थान पर समय काटने से क्या खरीद फरोख्त का समय नहीं दिया जा रहा है ? जनता ने पिछली सरकारों के साथ भी सब कुछ देखा था और आज भी वह नैतिकता की बातें करने वाली भाजपा की स्थिति को देख रही है जो कहने और करने में कितनी अलग है संभवतः सबके सामने आ रहा है और इसीलिए जनता को वह भी राजनीति करने में किसी मामले में पार्टी विद डिफरेंस कहीं से भी नहीं लगती है. संवैधानिक संकट की परिस्थितियों में सरकार को बचाये जाने के लिए जिस तरह के उदाहरण अभी तक सामने आये हैं आज भी उन पर अमल करने से केंद्र सरकार पता नहीं क्यों डर रही है  शायद उसे इसी बहाने से बिहार में विकास एक स्थान पर जातिगत राजनीति का अगला सबक सीखने का अच्छा अवसर मिल रहा है जिसे वह पूरी तरह से भुनाना भी चाह रही है.        
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रविवार, 8 फ़रवरी 2015

चुनाव के बाद की चुनौतियां

                                                इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि सत्ता में आने के लगभग ९ महीनों बाद भी केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर समग्र रूप से काम सिर्फ इसलिए ही शुरू नहीं हो पाता है क्योंकि हर दो महीनों के अन्तराल के बाद किसी न किसी राज्य में चुनाव होते ही रहे हैं. इसके लिए केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार नहीं माना जा सकता है पर देश के राजनैतिक ढांचे में यह एक कमी की तरफ ही अवश्य संकेत करता है जिसमें राजनैतिक दलों द्वारा विभिन्न समयों पर जन साधारण से जुडी हुई योजनाओं का चुनावी लाभ उठाने के कारण ही चुनाव आयोग विकास कार्यों को भी चुनाव आचार संहिता में बाँधने के लिए विवश हुआ है. दिल्ली चुनावों के बीच ही जिस तरह से बजटीय माहौल में केंद्र सरकार देश के विभिन्न सेक्टरों के विशेषज्ञों के साथ विचार विमर्श शुरू करने की तरफ बढ़ चुकी है तो उससे अब उसका उन वास्तविकताओं से सामना होना ही है जो आर्थिक मोर्चे पर देश के लिए एक चुनौती बने हुए हैं. यह मोदी सरकार का पहला बजट होगा क्योंकि पिछली बार तो महत्वपूर्ण हिस्सा यूपीए द्वारा ही तैयार किया गया था. इन चुनौतियों से निपटने के लिए राज्यों से जिस तरह से सहयोग की आवश्यकता है संभवतः उनके विरोधियों पर अधिक हमलावर रहने के कारण वह भी स्वतः नहीं मिलने वाला है.
                                     नीति आयोग की पूर्ण बैठक में राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ विचार विमर्श के लिए जिस तरह से एक दिन निर्धारित किया गया है उसमें क्या किया जा सकता है यह भी सोचने का विषय है क्योंकि राज्यों के स्तर पर केंद्र से जिस माहौल में संवाद होना चाहिए क्या वह कुछ घंटों की बैठक में सभी मुख्यमंत्रियों के साथ एक साथ संभव है ? इससे पहले योजना आयोग राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ अलग से बैठक कर उनकी योजनाओं के बारे में विचार विमर्श किया करता था और उनकी सहमति के साथ एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिशें भी किया करता था हालाँकि वह प्रक्रिया कभी भी पूरी तरह से निरापद नहीं कही गयी क्योंकि राज्यों द्वारा जितने धन का आवंटन माँगा जाता था उतना आम तौर पर उन्हें मिल नहीं पाता था. देश के महत्वपूर्ण अर्थशास्त्रियों के साथ पीएम की बैठक के बाद जो कुछ सामने आया है वह देश के लिए चिंताजनक ही कहा जा सकता है क्योंकि एक तरफ सरकार केवल बजटीय घाटे को नियंत्रित करने की कवायद करने में लगी हुई है और इसी क्रम में वह मनरेगा जैसी बड़ी और देश के ग्रामीण इलाके को आर्थिक रूप से सबल करने वाली परियोजनाओं के स्वरुप को बदलने में लगी है जबकि अर्थशास्त्री देश के आंतरिक आर्थिक परिदृश्य के जीवंत बने रहने के लिए इसके इसी रूप में चलाये जाने के पक्ष में हैं.
                                   देश के ग्रामीण इलाकों के आर्थिक स्वरुप को सँभालने और उसे ग्राम आधारित छोटी ही सही पर एक स्वनिर्भर अर्थ व्यवस्था बनाने में मनरेगा का जो योगदान रहा है वह पूरे विश्व में अपना लोहा मनवा चुका है इसे केवल इस आधार पर बंद करना या इनके बजट को सीमित करना कि इसमें भ्रष्टाचार बहुत अधिक होता है कहीं से भी सही नहीं है. आवश्यकता है कि सरकार देश के आंतरिक आर्थिक परिदृश्य को बदलने के लिए तेज़ी से काम करने वाली इस परियोजना को भ्रष्टाचार से मुक्त करने की सभी कोशिशें करे और जिन राज्यों में इस तरह के भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाया जा पा रहा है केवल उनके बजट में इस तरह की कटौती करने के बारे में सोचा जाना चाहिए. किसी भी एक तरह की अर्थ व्यवस्था पर सभी अर्थशास्त्रियों की राय एक जैसी कभी भी नहीं हो सकती है पर किसी योजना के अधिकतर अच्छे प्रभाव को किन परिस्थितियों में कम किया जाना चाहिए यह भी कोई स्पष्ट रूप से बता नहीं सकता है. देश के ग्रामीण क्षेत्रों की क्रय शक्ति काम होने से क्या पूरे देश की आर्थिक प्रगति पर बुरा असर नहीं पड़ेगा यह तो अब पीएम, एफएम और उनके साथ  काम करने वाले अर्थशास्त्रियों को सोचना ही पड़ेगा.         
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2015

धार्मिक असहिष्णुता-गांधी,ओबामा और भारत

                                                    पिछले महीने भारत के अपने शानदार दौरे के अंतिम चरण में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जिस तरह से भारत को एक अनचाही सलाह दे दी थी कि धार्मिक रूप से सहिष्णु भारत बहुत आगे तक जा सकता है उसके बाद देश विदेश के मीडिया में इस बात की चर्चा भी हुई थी और संभवतः इस बात को अघोषित रूप से एक स्वर भी मिल गया था कि भारत अपनी जिस धार्मिक सहिष्णुता के लिए जाना जाता है उसमें कुछ परिवर्तन आना शुरू हो चुका है. अब अमेरिका में अपने हाई प्रोफाइल नेशनल ब्रेकफास्ट प्रेयर में दुनिया भर के देशों में बढ़ती हुई धार्मिक कट्टरता बोलते हुए ओबामा ने भारत के लिए बेहद कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया है जिससे भारत की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक ही है. ओबामा के अनुसार “मिशेल और मैं भारत से लौटे हैं. एक अविश्वसनीय, सुंदर देश जहां ज़बरदस्त विविधता है. लेकिन हाल के वर्षों में वहां सभी धर्म के लोगों पर एक दूसरे के हमले बढ़े हैं, ऐसी असहिष्णुता गांधीजी को भी दहला देती, जिन्होंने भारत को आज़ाद कराने में योगदान दिया था.”
                                             यह उनकी बेहद निजी राय हो सकती थी यदि वे इसे किसी और मंच पर कहते पर दुनिया भर के धार्मिक कट्टरपंथियों के हमलों के ज़िक्र में यदि भारत का इस तरह से समावेश होने लगेगा तो आने वाले समय में क्या हम भी पाकिस्तान जैसे देशों के श्रेणी में नहीं पहुँच जायेंगें और जिस प्रचंड बहुमत के साथ पीएम मोदी देश के विकास के सपने देख रहे हैं क्या उनको पूरा करने में अंतर्राष्ट्रीय स्तर से मिलने वाला सहयोग भी कम नहीं हो सकता है ? ओबामा के दस दिनों के अंदर ही इस तरह से दो बार भारत में बढ़ती हुई धार्मिक असहिष्णुता का ज़िक्र किसी भी स्तर पर देश के लिए सही नहीं कहा जा सकता है क्योंकि आज पश्चिमी देश अमेरिका के साथ उस स्तर के संबंधों में बंधे हुए हैं जहाँ से उनको केवल अमेरिका के स्वर ही सुनाई देते हैं. आज तेज़ी से हर स्थान पर आगे बढ़ते हुए वैश्विक मीडिया में भारत की इस तरह की हर बात पर चर्चा होती है और यदि मामला हमारे स्तर से किसी भी तरह की धार्मिक असहिष्णुता से जुड़ा हुआ हो तो भारत विरोधियों को देश, सरकार और सत्ता सँभालने वाले दलों पर हमले करने का अवसर मिल जाता है.
                                           ओबामा ने भारत की स्थिति को स्पष्ट करते हुए जिस तरह से गांधी जी का उद्धरण दिया उससे भी यह पता चलता है कि वे भारत के उस मर्म पर चोट करना चाहते हैं जहाँ पर हमें कुछ भी सुनना अच्छा नहीं लगता है ? देश, समाज और धर्म के बेहतर समन्वय के साथ भारत आज तक बहुत आगे बढ़ने में सफल रहा है तो उसके पीछे गांधी जी का दर्शन और उनके साथ काम करने वाले उन नेताओं की सोच रही है जो देश के सामने धार्मिक मसलों को अधिक महत्व नहीं दिया करते थे. आज के समय में भाजपा सरकार चला रहे पीएम मोदी के गांधी अनुराग के बाद भी गोडसे की मूर्तियां लगाने वाले और धार्मिक आधार देश में विभाजन को गहरा करने वाले भी पूरी तरह से सक्रिय हैं. यदि पीएम को अपने सपनों को धरातल पर उतारना है तो उसके लिये उन्हें भी इस तरह की गतिविधियों पर कड़े अंकुश के बारे में सोचना ही होगा क्योंकि व्यापार के लिए भारत आने वाले लोग उस स्थिति में कोई बड़ा निवेश करने से कतराने ही वाले हैं जिसमें भारत भी धार्मिक आधार पर बहुत बंटा हुआ दिखाई देता हो ? धार्मिक स्वतंत्रता को पल भर में धार्मिक असहिष्णुता में बदल देने वाली उस अदृश्य सीमा को अब मज़बूत करने और लोगों को उनकी हदों में रखने की ज़िम्मेदारी अब खुद पीएम पर ही आ गयी है.        
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...