मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Tuesday, 8 December 2015

दिल्ली-इस्लामाबाद वाया उफ़ा-बैंकॉक

                                                                            विपक्ष में रहते हुए और पिछले आम चुनावों में पाकिस्तान को सीख सिखाने के लम्बे चौड़े दावे करने वाले पीएम मोदी ने जिस तरह से अपने शपथ ग्रहण में ही नवाज़ शरीफ को दिल्ली बुलाया था उससे लगने लगा था कि संभवतः पाक की तरफ से इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल भी की जा सकती है पर समय बीतने के साथ जिस तरह से दोनों देशों के बीच कश्मीर में उग्रवादियों को लेकर तनातनी शुरू हुई उसने फिर से संबंधों को उसी स्तर पर पहुंचा दिया जहाँ वे २६/११ से पहले हुआ करते थे. अभी तक संघ-भाजपा और उग्र हिंदुत्व का समर्थन करने वाले समूहों को भाजपा की पाक के प्रति नीति और चुनावों तक मोदी की बयानबाज़ी के चलते यह उम्मीद थी कि अब पाकिस्तान के साथ खुलकर हर मुद्दे पर बात होगी पर जिस तरह से पिछले डेढ़ वर्षों में जिस तरह से मोदी सरकार का रवैया पाकिस्तान के प्रति दिखाई दे रहा है उससे यही लगता है कि भाजपा के पाक से सम्बंधित रणनीतिकारों की समझ में यह नहीं आ रहा है कि इस देश से किस तरह से निपटा जाये तो यह उनकी इस विषय पर समझ को ही दर्शाता है.
                                           अभी तक पाकिस्तान को सबक सिखाने वाले और एक के बदले दस सर काटने जैसे बयानवीर नेताओं के बिना किसी ठोस आश्वासन के ही इस तरह से पाक से बात करने से खुद संघ और भाजपा समर्थकों की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है और वर्तमान परिस्थिति में वे कुछ भी बोलने की स्थिति में नहीं है. जिस तरह से संसद का सत्र चल रहा है तो इस परिस्थिति में सरकार के लिए इन मुद्दों का जवाब सदन में भी देना मुश्किल हो सकता है क्योंकि मोदी सरकार जिस नीति के तहत पाक से गुपचुप तरीके से बात करने में लगी हुई है उससे कहीं न कहीं संदेह भी होता है. मोदी जैसे कड़े निर्णय लेने वाले नेता की इस तरह से भ्रम की स्थिति दर्शाने से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति ही कमज़ोर होती है क्योंकि २००८ में जब २६/११ के बाद मनमोहन सरकार ने द्विपक्षीय संबंधों पर बातचीत रोक दी थी तो उस समय भाजपा ने भी यही मांग की थी और मनमोहन सरकार पर देश को असुरक्षित करने का आरोप भी लाया था पर आज खुद अंतर्राष्ट्रीय दबाव के सामने झुकते हुए मोदी उससे भी आगे जाने का काम करने में लगे हुए हैं ऐसी स्थिति में भाजपा के उग्र समर्थकों की समझ में नहीं आ रहा है कि वे अपने नेता के इस कदम का जनता के सामने किस तरह से बचाव करें ?
                                          यदि पाक से सभी मुद्दों पर बातचीत होती है तो यह अच्छा ही है और संप्रग सरकार भी यही करना चाहती थी पर भाजपा उस पर पाक एक सामने टेकने के आरोप लगाने में नहीं चूकती थी. उफ़ा में जिस तरह से उग्रवाद को केंद्र में रखकर बात करने का फैसला दोनों विदेश सचिवों के संयुक्त बयान में था बैंकॉक की सहमति में वह अचानक से गायब हो गया है उस समय कश्मीर किसी भी तरह से बातचीत का हिस्सा भी नहीं था पर आज वह भी मुद्दों में शामिल हो चुका है इससे यही लगता है कि मोदी सरकार पाक से रिश्ते सुधारने के लिए एक बार फिर से वही गलती करने जा रही है जैसी वाजपई सरकार ने पाक के साथ रिश्ते सुधारने की धुन में करते हुए यह ध्यान ही रखा कि पाक के लोकतंत्र के लोग सेना की कठपुतली से अधिक कुछ भी नहीं होते हैं और उनसे बातचीत कब बीच रास्ते में ही दम तोड़ जाये इसका भी भरोसा नहीं होता है. कारगिल के सबक से लगता है कि भाजपा और संघ ने कुछ भी नहीं सीखा था तभी वे बिना खुला एजेंडा तय किये एक बार फिर से गुपचुप एजेंडे के तहत पाक से बात करने के लिए तैयार दिखाई दे रहे हैं. पाक से रिश्ते सुधरने चाहिए इस पर पूरी दुनिया एकमत है पर क्या संबंधों का सुधार इस तरह से गुप्त एजेंडे के अंतर्गत किया जाना भारत के दृष्टिकोण से सही है यह आज समझने की सबसे अधिक आवश्यकता भी है.        
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