मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

Monday, 7 December 2015

छोटी बचत योजनाएं और ब्याज दरें

                                                                             केंद्र सरकार अपने नए प्रयासों के तहत जिस तरह से विशेषकर गरीबों और अन्य सामान्य नागरिकों को बचत के लिए प्रोत्साहित करने वाली विभिन्न योजनाओं की समीक्षा करने की बात कहना शुरू कर चुकी है उससे यही लगता है कि लम्बे समय में अपने लिए बचत करने वाले नागरिकों के लिए आने वाले दिन कठिनता से भरे ही साबित होने वाले हैं. अभी तक जिस तरह से डाकघर की विभिन्न बचत योजनाओं पीपीएफ, मासिक आय योजना, फिक्स्ड डिपाजिट, वरिष्ठ नागरिक योजना, सुकन्या समृद्धि योजना को आम नागरिकों को बचत करने के हिसाब से अधिक आकर्षक रखने की मंशा के साथ काम किया जाता रहा है और उनका मुक़ाबला किसी भी तरह से बैंकों से नहीं किया जाता रहा है अब उस परिदृश्य में वित्त मंत्री अरुण जेटली बड़ा बदलाव करना चाहते हैं तथा बैंकों के दबाव में जिस तरह से अब डाकघर की विभिन्न योजनाओं को भी बैंकों के सामान ब्याज दरों पर लाने का प्रयास शुरू कर दिया गया है वह अपने आप में आत्मघाती निर्णय भी हो सकता है. देश के दूर दराज़ के क्षेत्रों में काम करने वाले डाकघरों के पास सीमित संसाधन होने के कारण आज भी वे सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के व्यावसायिक बैंकों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते हैं और इस लड़ाई में पिछड़ते ही जाते हैं.
                                              ग्रामीण अंचलों में उपलब्ध डाकघरों की इन शाखाओं के माध्यम से नागरिकों तक सही पहुँच बनाने और भविष्य के डिजिटल इंडिया के स्वप्न को पूरा करने के लिए संप्रग सरकार ने डाकघर को भी एक बैंक के रूप में मान्यता देने की तरफ कदम बढ़ा दिए थे और आज उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए तेज़ी से डाकघर अपने पुनरुद्धार की दिशा में आगे बढ़ना शुरू कर चुके हैं. इस परिस्थिति में अभी तक जो सामाजिक ज़िम्मेदारी इन डाकघरों द्वारा उठाई जाती रही है यदि सरकार उस क्षेत्र में भी सुधार के नाम पर जनता के साथ छल करना चाहती है तो यह भारत के गरीबों के लिए बहुत ही बेकार समय लाने वाला भी हो सख्त है. आज छोटी बचत योजनाओं के माध्यम से सरकार को अच्छा खास धन संग्रह मिलता है पर यदि वह विकास और बैंकों के लाभ को देखते हुए इस तरह से आकर्षक योजनाओं के लिए भी अलग व्यवहार करती है तो फिर सरकार को खुद भी बड़े धन संग्रह से वंचित होना पड़ेगा. एक तरफ जहाँ सरकार ग्रामीण भारत से बचत सीखने की आशा करती है वहीं दूसरी तरफ उनके लिए बचत के इन छोटे संसाधनों को भी बंद करने कि दिशा में भी बढ़ना चाहती है तो क्या सरकार के इन निर्णयों को सही ठहराया जा सकता है ?
                                           यह सही है कि देश में सभी बैंकों और वित्तीय संस्थानों के कार्य करने के लिए समान अवसर उपलब्ध कराना सरकार की ज़िम्मेदारी होती है पर क्या देश के दूर दराज़ के किसी गांव में एक कमरे में चल रहे डाकघर की तुलना शहरों के वातानुकूलित बैंकों से की जा सकती है ? क्या दोनों के काम करने के क्षेत्र एक जैसे होते हैं और क्या इस तथ्य की अनदेखी भी की जा सकती है इसके साथ ही सरकार को यदि दोनों के कार्यक्षेत्र एक जैसे लगते हैं तो इसका मतलब यही है खुद सरकार को ग्रामीण भारत का कोई अंदाज़ा ही नहीं है. इस तरह के किसी भी निर्णय को लेने से पहले सरकार को अपने बचत संग्रह के साथ इन डाकघरों की जीवंतता बनाये रखने के बारे में भी सोचने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक एक संस्थान के रूप में डाकघर अपना खर्च निकालकर कुछ लाभ देने की स्थिति में नहीं होंगें तब तक उनके लिए भविष्य में शहरी क्षेत्रों में भी टिक पाना मुश्किल ही साबित होने वाला है. यह मानना कि बैंक स्वेच्छा से ग्रामीण क्षेत्रों तक अपनी सुविधाओं का विस्तार करेंगें एक छलावे से अधिक कुछ भी नहीं है क्योंकि टेलीकॉम सेक्टर में निजी क्षेत्र ने ग्रामीण भारत को किस तरह से बीएसएनएल के भरोसे छोड़ रखा है यह किसी से भी छिपा नहीं है. सरकार व्यापारिक समूह की तरह हर काम लाभ हानि के तराजू पर नहीं रख सकती है क्योंकि सरकार व्यापारिक संस्थान नहीं जनता के सरोकारों से जुड़े हुई व्यवस्था होती है.  
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

No comments:

Post a Comment