मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 6 जून 2020

बढ़ता संक्रमण और नागरिकों के कर्तव्य

                                                       देश विश्व स्वाथ्य संगठन के निर्देशों के अनुरूप ७८ दिनों का लॉक डाउन ८ जून के बाद से चरणबद्ध तरीके से अनलॉक होना शुरू होने वाला है इसके पहले ही १ जून से बहुत सारे राज्यों ने आने यहाँ विभिन्न तरह की गतिविधियों को शुरू कर दिया है. यह सही है कि लॉक डाउन के साथ जीने की एक नई विधा आम नागरिकों के सामने आई है और आने वाले समय में जब तक देश को इस वायरस से निपटने का कारगर उपाय नहीं मिल जाता है हम सभी को कुछ प्रतिबंधों और अपने आचरण से इस बीमारी के संक्रमण को रोकने की दिशा में काम करना होगा. लॉक डाउन को लेकर राजनैतिक बहस चाहे जिस भी स्तर पर हो पर इससे होने वाले लाभ और हानियों के बारे में आम जनता को सोचना ही होगा क्योंकि अस्पतालों में बढ़ती भीड़ में राजनेताओं को कोई परेशानी नहीं होने वाली है सिर्फ आम जनता के लिए ही वहां पहुंचना और सुविधाएँ ले पाना हमेशा की तरह बड़ी चुनौती बनने वाला है.
                          सरकार ने लॉक डाउन के माध्यम से देश को एक हद तक कोरोना के संक्रमण के पीक पर पहुँचने पर उससे लड़ने के लिए तैयार करने का काम ही किया है. अब जब हम लोग इससे जुडी सावधानियों के साथ जीना सीख चुके हैं तो इस बात पर एक बार फिर से विचार करने की आवश्यकता है कि हमें अब यह अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा क्योंकि जब तक बीमारी है तब तक इससे बचने के लिए सभी को आवश्यक सावधानियों पर ध्यान देना ही होगा। अब अपने को इस बीमारी से बचाने की ज़िम्मेदारी एक तरह से हम नागरिकों की ही है. सरकार हर जगह ध्यान नहीं दे सकती है इसलिए खुद एवं अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए अब समय समय पर जारी होने वाले निर्देशों को मानना हम लोगों पर ही है. इन उपायों पर ध्यान रखकर ही हम अपने को सुरक्षित रखते हुए पूरे समाज को बीमारी से मुक्त रख सकते हैं.
                         सबसे पहले तो यही ध्यान रखना होगा कि १० वर्ष से कम के बच्चे और ६५ से ऊपर के बुजुर्ग के साथ गर्भवती महिलाओं के बाहर निकलने पर हम लोग स्वतः ही प्रतिबन्ध लगाएं जिससे हमारे परिवार का यह हिस्सा सुरक्षित रह सके. जो लोग स्वस्थ हैं वे भी बहुत आवश्यक कार्यों से ही बाहर निकले और काम करने वाले महिला पुरुष अपने कार्यस्थल पर पूरी तरह से सरकार की सूची के अनुरूप ही अपने बचाव को सुनिश्चित करें। ऐसी किसी भी परिस्थिति में जब हमारा बाहर निकलना आवश्यक हो तो अपने काम को समाप्त कर जल्दी से वापस अपने घरों में आ जाना चाहिए क्योंकि अभी जिस तरह से समुदाय में संक्रमण फैलना शुरू हुआ है तो कोई भी संक्रमित व्यक्ति हमारे संपर्क में आ सकता है जिसमें बीमारी के कोई लक्षण तो न हों पर वह संक्रमण का कैरियर हो और इस संक्रमित व्यक्ति से यह बीमारी हमारे घर तक भी आ सकती है. ऐसी परिस्थिति में हम सभी को एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का परिचय देना होगा और बीमारी से खुद को बचाते हुए इसके प्रसार को रोकने में अपना योगदान देना ही होगा।
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गुरुवार, 28 मई 2020

आपदा संकट में भ्रष्टाचार

                                                                      देश में बाढ़ सूखा जैसी नियमित और भूकंप जैसी आपदाओं के समय सदैव ही प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं जिससे संकट ग्रस्त जनता के मन में देश के सरकारी तंत्र के लिए घृणा का भाव ही उभरता है. ऐसा नहीं है कि पूरे देश में सदैव से ही भ्रष्टाचार का इतना बोलबाला रहा हो पर इसने जिस तरह से देश के राजनितिक तंत्र और नौकरशाही को अपने में जकड़ रखा है उसको देखते हुए किसी भी तरह के अप्रत्याशित सुधार की आशा नहीं की जा सकती है. इस तरह की आपदा में जिस बड़े स्तर पर लोग प्रभावित होते हैं और उसी स्तर पर केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न तरह की योजनाएं लाई जाती हैं इस भ्रष्ट तंत्र के लोग उनका हर परिस्थिति में लाभ उठाने से नहीं चूकते हैं. यह सही है कि आधार के बैंक खातों से जुड़ने के बाद जिस तरह से सहायता को सीधे लाभार्थियों तक पहुँचाने की व्यवस्था को सुनिश्चित करने में सफलता मिल रही है वहीं आज भी भ्रष्टाचारियों के पास इसी व्यवस्था से अपने हिस्से को निकालने की नई नई तरकीबें सामने आ रही हैं.
                          देश के अधिकांश राज्यों में जिस तरह से सहायता में गड़बड़ी की जा रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है. दूसरे राज्यों से आये हुए मजदूरों को आश्रय स्थल /क़्वारण्टीन सेंटर्स से घर भेजने के समय एक किट देने की व्यवस्था की गई है परन्तु उसकी लम्बी प्रक्रिया बनाकर उबाऊ कर दिया गया है जिससे अधिकांश लोग जिनमें कोई लक्षण नहीं होते सरकारी कागज़ों पर हस्ताक्षर करके अपने घरों को प्रस्थान कर जाते हैं और उनके लिए नियत किये गए किट आसानी से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाते हैं. इस तरफ किसी भी सरकार या अधिकारी का ध्यान नहीं जाता है जिससे अब यह खेल अधिकांश जगहों पर बड़े पैमाने पर खेला जाने लगा है और लाचार मजदूरों को उनके घर पहुँचने पर कुछ आवश्यक सामान के साथ भेजने की सरकारी मंशा की धज्जियाँ उड़ायी जा रही हैं।
                           गुजरात से बिना मानकों को पूरा किये वेंटिलेटर्स की सप्लाई की बात भी सामने आयी पर उसमें कुछ भी कड़े कदम नहीं उठाये गए हैं इस समय यह समझने की आवश्यकता है कि इस तरह का संस्थागत भ्रष्टाचार अंत में किसी भी सरकार के लिए बड़ी समस्या ही बन सकता है तो उस पर नियंत्रण किया जाना चाहिए और जो भी लोग इसमें किसी भी स्तर पर शामिल मिलें उनके खिलाफ विशेष परिस्थितियों में रासुका लगाने की संस्तुति की जानी चाहिए जिससे आने वाले समय में ऐसी विषम परिस्थिति में लोग भ्रष्टाचार करने से पहले सौ बार सोचने को विवश किये जा सकें। जब देश के सामने इस स्तर संकट हो तो भ्रष्टाचारी को देशद्रोही से कम नहीं माना जा सकता है. हिमाचल प्रदेश में जिस तरह से पीपीई किट घोटाला सामने आया है उससे यही लगता है कि आज भी देश में ऐसे लोग मौजूद हैं जो हर परिस्थिति में भ्रष्टाचारी हो सकते हैं और उन्हें किसी के जीने मरने से कोई अंतर नहीं पड़ता है.  
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शुक्रवार, 22 मई 2020

छिछली राजनीति

                                           कांग्रेस भाजपा के बीच शुरू हुए बस विवाद ने अब अगले चरण पर स्थान पा लिया लगता है क्योंकि देश में जो कुछ भी सामान्य प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं अभी तक उनको गोपनीय ही रखा जाता था पर यूपी रोडवेज की तरफ से राजस्थान को किये गए भुगतान को लेकर जिस तरह भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने एक ट्वीट किया तो उससे यही लगता है कि अब राज्यों के सामान्य प्रशासनिक कार्यों तक पार्टी के प्रवक्ताओं की पहुँच होने लगी है. यह भी हो सकता है कि यह पत्र गोपनीय न भी हो पर सामान्य पत्राचार का उपयोग इस तरह से एक दूसरे पर आरोप लगाने में किया जाने लगे तो देश की राजनीति का स्तर समझा जा सकता है. इस पत्र के सामने आने के बाद राजस्थान सरकार ने भी यूपी सरकार को पूरा बिल भेज दिया है और भुगतान करने की मांग भी की है जिससे मजदूरों की समस्याओं के स्थान पर इन नेताओं की लड़ाई का एक और रूप सामने आने वाला है.
                               किसी भी राज्य में ऐसी आपातकालीन परिस्थिति में स्थानीय प्रशासन से सहयोग के लिए देश का दूसरा राज्य अपने स्तर से पत्राचार करता है और उसमें बहुत सारी बातें भी होती हैं पर इस पत्र को प्रियंका गाँधी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किये जाने से किसको राजनैतिक लाभ होने वाला है ? संबित पात्रा ने कहीं पर उस पत्र का ज़िक्र नहीं किया है जो यूपी सरकार ने राजस्थान सरकार को इस सम्बन्ध में लिखा था उसमें संभवतः यूपी सरकार ने भुगतान किये जाने की बात की होगी जिसको ज्ञानी प्रवक्ता संबित द्वारा जानबूझकर छिपाया गया है ? राज्यों के सामान्य काम काज में किसी भी राजनैतिक दल का इस तरह का दखल सामान्य नहीं कहा जा सकता है और यह विचारणीय भी है. कई बार राज्य अपनी परिस्थितियों पर विचार कर एक बीच का रास्ता निकालने के लिए कई बार पत्राचार भी करते हैं पर क्या उसका राजनैतिक लाभ किसी भी दल द्वारा उठाया जाना चाहिए ?
                                 इस मामले में सभवतः जो धनराशि डीज़ल पर खर्च हुई होगी उसके बिल का भुगतान किया गया होगा जबकि राजस्थान सरकार का यह कहना है कि बसें कम पड़ने पर राजस्थान रोडवेज ने छात्रों को उनके गंतव्य तक पहुँचाया जिसका भुगतान अभी तक नहीं किया गया है ? जब ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाले केंद्र की सरकार मज़दूरों को उनके घरों तक रेल द्वारा निशुल्क नहीं भेज सकती तो हिली हुई आर्थिक परिस्थिति में राज्य सरकारों से किसी भी तरह की आर्थिक उदारता की उम्मीद आखिर कैसे की जा सकती है ? लंबी चौड़ी बातें करने वाले दल और नेता अपने यहाँ की परिस्थिति पर विचार नहीं करते हैं और किसी भी बात पर राजनीति शुरू कर देते हैं जिससे केवल जनता की परेशानियां ही बढ़ती हैं. अच्छा हो कि सभी राजनैतिक दल और उनकी सरकारें इस तरह के मामलों पर राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों से दूर ही रहें और जनता को सही तरह से सहायता करने हेतु नीतियों का क्रियान्वयन करने पर ध्यान दें.
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शुक्रवार, 15 मई 2020

लाचार मजदूर और त्वरित सहायता

                                                 देश के हर भाग से आती मजदूरों की मजबूरी भरी सच्चाई देखने के बाद भी क्या केंद्र और राज्य सरकारों के साथ स्थानीय प्रशासन की संवेदनाएं पूरी तरह से समाप्त हो गयी हैं कि उनके लिए इतने दिनों बाद भी कोई सुधारात्मक विकल्प तलाशा नहीं जा सका है ? क्या कारण है कि इन लाचार मजदूरों को अपने परिवार के साथ चिलचिलाती धुप में अपने घरों की तरफ निर्बाध रूप से जाने दिया जा रहा है जिस क्रम में कुछ की मार्ग दुर्घटनाओं और बीमारी के कारण दुखद मृत्यु भी हुई जा रही है फिर भी कहीं से शासन प्रशासन की संवेदनाएं जगती हुई नहीं दिखाई दे रही हैं ? क्यों हमारा तंत्र इतना अंधा और बहरा साबित हो रहा है जो करोड़ों प्रवासियों में से केवल कुछ लाख के बारे में प्रयास कर अपने कर्तव्य को पूरा मान कर बैठा हुआ है ? आखिर इन सब को किस बात की प्रतीक्षा है जिसके बाद इन मजदूरों के हालात पर सोचने का समय मिलने वाला है ?
                        इतने बड़े पलायन पर बेरुखी दिखाने वाली सरकारें किस तरह से चुनाव के समय इनके लिए कुछ भी करने की कसमें खाती रहती हैं पर आज जब इस भीड़ को अपने द्वारा चुने हुए नेताओं की अधिकांश बातें खोखली ही लग रही हैं तो वह कितने भी बड़े नेता की कोई भी बात मान कर उस पर अमल करने के लिए तैयार नहीं हो पाता है ? आज जिलों के अधिकारियों राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रधानमंत्री को सिर्फ इस बात पर सोचने की आवश्यकता है कि प्राथमिकता के आधार पर इन मजदूरों को यह आश्वासन दिलाया जा सके कि आप अब जहाँ पर भी हो वहीं पर रूककर स्थानीय प्रशासन की मदद कीजिये जिससे आप लोगों को समुचित व्यवस्था कर यात्रा के कष्टों को कम करने का प्रयास किया जा सके. परन्तु पिछले कुछ समय से देश के राजनैतिक नेतृत्व की सोच के चलते आज कोई भी उस पर यकीन नहीं करना चाहता वही इस गंभीर समस्या की जड़ है.
                       हर राज्य के पास पर्याप्त संख्या में राज्य परिवहन की बसें उपलब्ध हैं और आवश्यकता पड़ने पर निजी क्षेत्र की बसों को भी इस काम में लगाया जा सकता है. एक नीति के तहत सड़क पर चलने वाले लोगों को विभिन्न श्रेणियों में बाँट कर उनको दूरी के अनुसार घरों तक पहुँचाने का काम अविलम्ब शुरू किया जाना चाहिए। ५०० किमी के दायरे या राज्य परिवहन के क्षेत्र में आने वाले और अधिक दूरी के मजदूरों को बसों द्वारा भेजने की व्यवस्था की जानी चाहिए। जो इससे अधिक दूरी के लोग हैं उनको बसों द्वारा पास के बड़े शहरों पर पहुँचाया जाये और वहां से उनको अपने गृह जनपद तक जाने के लिए ट्रेन उपलब्ध कराई जाये। जब तक इस दिशा में समन्वित और एकीकृत प्रयास नहीं किए जायेंगे तब तक इन मजदूरों की पीड़ा को कम नहीं किया जा सकता है. इस बारे में केंद्र सरकार को राज्यों से अविलम्ब चर्चा करके ठोस समाधान करने की आवश्यकता है जिससे देश के इन कामगारों को इस विषम परिस्थिति में कम से कम सुरक्षित रूप से उनके घरों तक पहुँचाया जा सके.
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सोमवार, 24 दिसंबर 2018

बेरोजगारी भत्ता और युवा शक्ति

                                   देश में बढ़ती बेरोजगारी और घटते रोजगार के अवसरों के बीच युवाओं के लिए उनकी प्रगति के साथ उम्मीदों को पूरा करना आज हर राजनैतिक दल के लिए एक समस्या बनता जा रहा है. आज जिस तरह से देश की अधिकांश आबादी युवा होती दिख रही है उसके बीच इस बड़े वोट समूह की अनदेखी करना किसी भी दल के लिए आसान नहीं रह गया है. इस तरह की परिस्थिति के बीच ही राजनैतिक दलों की तरफ से युवाओं को बेरोजगारी भत्ता दिए जाने की विभिन्न तरह की घोषणाएं की जाती रहती हैं पर उससे धरातल पर युवाओं की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता है वरन सभी राजनैतिक दलों पर इस तरह की घोषणाएं अपने चुनाव घोषणा पत्रों में किये जाने की मजबूरी सामने आती है. इस परिस्थिति से निपटने के लिए क्या केंद्र सरकार राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक नए तरह की सोच के साथ सामने नहीं आना चाहिए ?
                  युवा बेकार न रहे उसे अपने घर के आस पास ही काम करने के अवसर मिलें इससे सभी का भला हो सकता है यूपी में आदित्यनाथ सरकार ने जिस तरह से एक जिला एक उत्पाद की अवधारणा को मज़बूती के साथ आगे बढ़ाया है यदि उसे नौकरशाही से बचाया जा सका तो निश्चित तौर पर उसके सार्थक परिणाम सामने आयेंगें जिससे युवा खुद का काम शुरू करने के साथ कुछ लोगों के लिए रोजगार का सृजन करने की स्थिति में भी आ सकते हैं. यूपी जैसे राज्य में जिस तरह से हर स्तर पर आज भी भ्रष्टाचार पूरी तरह से व्याप्त है उस पर कडा प्रहार किए बिना स्थिति को सुधारा नहीं जा सकता है और यह योजना भी एक भ्रष्टाचार करने के अड्डे के रूप में विकसित हो सकती है जिससे किसी का लाभ नहीं होने वाला और बैंकों का क़र्ज़ एक बार फिर से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ने की तरफ बढ़ सकता है. 
                  क्या केंद्र सरकार अपने सफ़ेद हाथी बन चुके कौशल विकास कार्यक्रम की समीक्षा करने को तैयार है जिसके माध्यम से जितने कुशल श्रमिकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की तरफ कदम बढ़ाये जाने थे आज वे कहीं ठिठके हुए ही अधिक नज़र आते हैं ? अच्छा हो कि युवाओं को सीमित संख्या में चिकित्सा, यातायात, सामान्य प्रशासन, कृषि, शिक्षा, समाज कल्याण, बाल एवं महिला कल्याण के कार्यक्रमों में कार्य करने के लिए प्रशिक्षित किया जाये जिससे समय आने पर आवश्यकतानुसार विभिन्न विभागों के कामों में कर्मचारियों के सहयोग के लिए उनका सीमित दिनों के लिए उपयोग किया जा सके। मनरेगा की तरह ही शिक्षित और प्रशिक्षित युवाओं  के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक ऐसा कार्यक्रम शुरू किया जा सकता है जिससे इनको घर बैठे बेरोजगारी भत्ता देने के स्थान पर माह में  १० दिन या आवश्यकता पड़ने पर उससे अधिक दिन भी काम कराया जा सके. इस तरह से प्रशिक्षण और विभागों के साथ काम कर चुके युवाओं को समय पड़ने पर सम्बंधित विभागों में नौकरियों निकलने पर उनकी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप प्राथमिकता के आधार पर चयनित करने के बारे में भी सोचा जा सकता है। अच्छा हो कि इन सभी प्रयासों को केवल तात्कालिक उपायों के स्थान पर दीर्घकालिक योजना के अनुरूप देखा जाये जिससे समय आने पर युवाओं के साथ न्याय किया जा सके।
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मंगलवार, 12 जून 2018

सड़क सुरक्षा - नियम और अनुपालन

                           देश में तेज़ी से बेहतर होती सड़कों और वाहनों में नयी तकनीक आने के बाद बढ़ती हुई रफ़्तार ने जिस तरह से आम लोगों के सफर को आसान किया है वहीँ कुछ लापरवाहियों से उनकी ज़िंदगियों को बहुत खतरे में डालना शुरू कर दिया है अब इस पर व्यापक विचार विमर्श और राजमार्गों पर चलते समय नियमों का पूरी तरह पालन करने की तरफ सोचने का समय आ गया है. संत कबीर नगर के छात्र छात्रों का एक टूर हरिद्वार के लिए निकला था जिसमें से एक बस में डीज़ल ख़त्म हो जाने के कारण पूरा काफिला एक्सप्रेस वे पर ही रुक गया था. एक बस से प्राचार्य समेत कुछ  लोग डीजल की व्यवस्था के लिए गए हुए थे उसी समय शिक्षकों और छात्रों ने एक्सप्रेस वे पर ही घूमना शुरू कर दिया जो कि अपने आप में बहुत बड़ी चूक ही कही जा सकती है क्योंकि सुबह सवेरे तीन बजे क्या एक्सप्रेस वे पर किसी भी समय इस तरह से पैदल घूमना अपने आप एक बहुत बड़ा खतरा ही है फिर भी इस रास्ते और यातायात से अनजान इस समूह ने जाने अनजाने जो गलती की उसके फलस्वरूप ही कई छात्रों और एक शिक्षक की जान भी चली गयी. इस पूरी घटना के लिए अब किसी को भी ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है पर क्या हम एक नागरिक के तौर पर सड़क सुरक्षा से जुडी अपनी ज़िम्मेदारियों का अनुपालन करते हैं अब खुद से यह गंभीर सवाल पूछने का समय आ गया है.
                                  इस दुर्घटना में जब नुकसान हो चुका है तो क्या आगे आने वाले समय में इस तरह की पुनरावृत्ति रोकने के लिए हम सब को जागरूक होने की आवश्यकता नहीं है? आखिर क्यों हम अपनी लापरवाही  से खुद और दूसरों की जान से खिलवाड़ क्यों करते हैं? क्या हम सभी की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती है कि खुद को सुरक्षित रखते हुए दूसरों को भी सुरक्षित महसूस कराने की तरफ कदम बढ़ायें? निश्चित तौर पर सरकार की तरफ स इस मामले में बहुत कुछ नहीं किया जा सकता है क्योंकि आजकल जिस तरह से सामान्य प्रशासनिक कार्यों तक के लिए जनहित याचिकाओं के माध्यम से सरकार को काम करने के लिए मजबूर करने की स्थिति बन चुकी है उस परिस्थिति में सरकार और यातायात पुलिस पूरे वर्ष खुद इस कार्य के लिए तत्पर रहेगी यह सोचना ही गलत है क्योंकि सभी कार्य केवल राजनैतिक हानि लाभ और व्यक्तिगत सुविधा को ध्यान में रखते हुए ही किये जाने की जो परंपरा देश में विकसित हो चुकी है उससे पार पाने की आवश्यकता भी है. अच्छा हो कि हमारे शैक्षिण विषयों  में यातायात से जुड़े हुए कुछ अध्याय अवश्य होने चाहिए जिससे भविष्य के नागरिक हमारे बच्चे सड़क पर सामने आने वाली समस्याओं और चुनौतियों के लिए खुद को तैयार करना सीख सकें। एक विषय के रूप में यह भले ही न पढ़ाया जा सके पर इसकी आवश्यकता पर विचार करने की मजबूरी आज सामने आ चुकी है.
                                   यदि इस टूर पर जाने वाले समूह के लोगों को एक्सप्रेस वे पर घूमने के  संभावित खतरों के बारे में जानकारी होती तो निश्चित रूप से वे सचेत रहते और पूरे समूह को सचेत रखने का प्रयास भी करते पर जिस तरह से यह दुर्घटना हुई वह थोड़ी सावधानी से टाली अवश्य जा सकती थी. अच्छा हो कि पूरे देश के राजमार्गों और एक्सप्रेस वेज़ के बारे में सड़क परिवहन मंत्रालय को अपनी वेबसाइट पर पूरी जानकारी और सावधानियों को दिखाना चाहिए और निजी क्षेत्र या पीपीपी मॉडल पर बनने वाले हर एक्सप्रेस वे के लिए अपनी वेबसाइट बनाना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिसमें उस पूरे मार्ग पर उपलब्ध सुविधाओं आपातकालीन सेवाओं तथा दुर्घटना सम्भाव्य स्थानों के बारे में वहां जानकारी उपलब्ध करानी चाहिए जिससे इन मार्गों का उपयोग करने वाले यह जानकारी पहले से ही ले सकें। एक नागरिक और यात्री के रूप में हम सभी को भी यह समझना होगा कि सरकार हमें अच्छी सड़कें दे सकती है पर उस पर चलने के लिए हमें खुद ही सभी कानूनों का अनुपालन करना होगा जिससे खुद सुरक्षित चलते हुए दूसरों को भी सुरक्षा का एहसास दिला सकें। लम्बी दूरी के यात्रियों के लिए एक वीडियो जारी किया जाना चाहिए जिसे रास्ते में पड़ने वाले पेट्रोल पम्प्स और टोल केंद्रों पर एक हाल में चलाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे आराम करते समय चालक और अन्य यात्री इन सावधानियों के बारे में जानकारी ले सकें और हमारी यात्रा सुगम होने के साथ सुरक्षित भी हो सके.

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शनिवार, 20 जनवरी 2018

रक्षा तैयारियां और मोदी सरकार

                                                         सत्ता सँभालने के बाद से ही लगातार जिस तरह से संसद से लेकर सड़क तक भाजपा, खुद पीएम मोदी और उनकी सरकार के मंत्री जिस तरह से अपनी पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार पर आक्रामक रहा करते हैं और उस पर यह आरोप लगाया करते हैं कि उसने देश की रक्षा से समझौता किया और सेनाओं के लिए १० वर्षों तक पर्याप्त धन की व्यवस्था भी नहीं की उसकी पोल खुद उनके सांसद मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी की अध्यक्षता में गठित रक्षा मामलों की संसदीय समिति ने खोल कर रख दी है. समिति ने जिस स्तर पर सरकार की आलोचना की है उससे यही लगता है कि रक्षा क्षेत्र में मोदी सरकार की कथनी और करनी में बहुत बड़ा अंतर है और हालत यहाँ तक पहुंच गयी है कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में रक्षा बजट केवल २.७४ लाख करोड़ रुपयों का रखा गया है जो कि प्रस्तावित जीडीपी का १.५६ % और १९६२ के चीन युद्ध के बाद से न्यूनतम है. समिति ने सेना के आधुनिकीकरण के लिए जरूरत भर का फंड उपलब्ध नहीं कराने और रक्षा खरीदारी को फास्ट ट्रैक नहीं करने के लिए सरकार की कड़ी आलोचना की है। इस वित्तीय वर्ष में आर्मी, नेवी और वायुसेना को आधुनिकीकरण की उनकी मांग की तुलना में क्रमशः महज ६०, ६७ और ५४ फीसदी फंड उपलब्ध कराया गया है। समिति ने इस बात की आशंका और चिंता भी जताई है कि फंड की अनुपलब्धता का प्रतिकूल असर सेना के ऑपरेशंस पर पड़ सकता है।
                                          समिति ने मोदी सरकार को सेना के सुस्त आधुनिकीकरण के लिए फटकार लगाई और कहा है कि चीन और पाकिस्तान की तरफ से देश की सुरक्षा के लिए खड़े किए जा रहे मौजूदा खतरों के दौरान भी सेना के आधुनिकीकरण में सुस्ती बरती जा रही है। भारतीय सेना कई मोर्चों पर कार्रवाई के लिए संसाधनों की कमी से जूझ रही है इनमें सबमरीन, फाइटर जेट, हॉवित्जर्स और हेलिकॉप्टर्स की कमी के साथ नई जेनरेशन की असॉल्ट राइफल, मशीन गन, बुलेट फ्रूफ जैकेट्स और हेल्मेट्स जैसे बेसिक संसाधनों की कमी भी शामिल हैं। ये वो आंकड़े हैं जो हमारी सेनाओं और उनके लिए सरकार द्वारा किये जा रहे प्रयासों की वास्तविक तस्वीर को सामने लेकर स्थिति की गंभीरता को बता रहे हैं फिर भी सरकार की तरफ से केवल पूर्व की सरकार पर हमले किये जाने और उसकी आलोचना तक खुद को सीमित किया जाना आखिर किस तरह से देशहित में अच्छा कहा जा सकता है ? यह सही है कि देश में रक्षा सौदों में दलाली के चलते कोई भी सरकार कुछ भी खरीद करे उस पर आरोप बहुत आसानी से लगाए जा सकते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि हथियारों को बनाने वाले देश और निर्माण करने वाली लगभग हर कम्पनी ने पूरी दुनिया में अपने एजेंट नियुक्त कर रखे हैं जिनके माध्यम से देश और कम्पनी किसी भी सौदे में उनकी सहभागिता होने या न हो पाने की दशा में भी कमीशन का भुगतान किया करती हैं जो कि पूरे विश्व में एक सामान्य प्रक्रिया है पर भारत में इसे जिस तरह से घूस कहा जाता है वह कमीशन की श्रेणी में नहीं आ सकता है इसलिए सरकार को भी सौदों में तत्परता के लिए अपनी शर्तों में इन एजेंट्स के लिए एक सीमा तक आधिकारिक रूप से कमीशन दिए जाने को वैध कर देना चाहिए जिससे आने वाले समय में रक्षा खरीद को पटरी पर लाया जा सके और भ्रष्टाचार के कथित आरोपों से बचने के लिए सरकारें देश की सुरक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप रख पाने में सफल हो सकें.
                                   जिस तरह से पूरा देश जानता है कि देश में रक्षा खरीद की प्रक्रिया बेहद पेचीदी है जिसके चलते कोई भी सरकार केवल अपने को बचाने के प्रयास में ही लगी दिखाई देती है कि कहीं उस पर देश की सुरक्षा के मामले में समझौता करने और कमीशन लेने का आरोप न लग जाये. बोफोर्स कांड के बाद से जिस तरह से वह देश में एक बड़ा राजनैतिक मुद्दा बन गया था उसे देखते हुए भी वर्तमान खरीद प्रक्रिया में बेचने वाले देशों की सरकारों या कंपनियों के एजेंट्स की भूमिका को स्पष्ट करने की आवश्यकता भी सामने आ चुकी है क्योंकि अब नीतियों में व्याप्त कमियों को सुधारने की आवश्यकता अधिक है जबकि हम एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने में ही व्यस्त हैं ? हम सभी जानते हैं कि पाकिस्तान में सेना ही सर्वोपरि है और उसके निर्णय के सामने खड़े होने का साहस कोई भी नहीं कर सकता है जिसके चलते वहां रक्षा सौदे करना आसान है और चीन अब रक्षा क्षेत्र में खुद एक उत्पादक देश के रूप में स्थापित हो रहा है जिससे उसको रक्षा खरीद के लिए दूसरे देशों पर उतना निर्भर नहीं रहना पड़ता है पर भारत की स्थिति को देखते हुए क्या संसद में ही सर्वसम्मति से एक नयी रक्षा खरीद नीति को लागू करने की आवश्यकता नहीं है जिससे आने वाले कुछ वर्षों में देश की रक्षा आवश्यकताओं को मानकों के अनुरूप किया जा सके ?  
                                    देश ने बहुत काम करने वाले और सादगी से भरे दो रक्षा मंत्री ए के अंटोनी और मनोहर पणिकर भी देखे पर ईमानदारी से काम करने के बाद भी वे देश की रक्षा आवश्यकतों को पूरा करने में असफल ही रहे जिसके लिए उन्हें दोषी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश की रक्षा खरीद की प्रक्रिया की पेचीदियों पर काबू पाए बिना इसे सुधारा नहीं जा सकता है. खरीद में अब एक सीमा तक कमीशन को कानूनी रूप से सही घोषित किया जाना चाहिए और उसे हर हालत में कम्पनी द्वारा ही दिया जाना चाहिए साथ ही मंत्रालय को इस बारे में गुणवत्ता की जाँच कर उसकी न्यूनतम अंतर्राष्ट्रीय कीमत पर खरीदने की अनुमति होनी चाहिए जिससे सरकार का दखल उसमें कम किया जा सके और ऐसी किसी भी खरीद को संसदीय समिति के सामने भी निश्चित समय सीमा में रखने और उसकी संस्तुतियों के आधार पर सीधे संसद से अनुमोदन कराने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए. इस तरह की पारदर्शी व्यवस्था बनाये जाने से जहाँ खरीद को आसान बनाया जा सकता है वहीं हमारी सेनाओं की आवश्यकताओं को भी हर समय पूरा रखने की एक सीमा को जल्दी ही पाया जा सकता है. मोदी सरकार को भी इक्का दुक्का मामलों को देश के सामने रखकर अपनी रक्षा तैयारियों के बारे में प्रदर्शन करने के स्थान पर पूरी सेना की समग्र तैयारियों के बारे में गभीरता से सोचना शुरू करना चाहिए जिससे सेना को सही तरह से आधुनिक किया जा सके.  
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शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

२ जी घोटाला वास्तविक या काल्पनिक ?

                                   लम्बे समय के बाद जिस तरह से २०१० की कैग रिपोर्ट में सामने आये २ जी घोटाले को लेकर सभी आरोपियों को विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में छोड़ दिया है वह देश की राजनीति, जाँच एजेंसियों अभियोजन और न्यायालय की सीमाओं पर गभीर सवाल पैदा करता है क्योंकि जिस घोटाले को देश का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक घोटाला माना गया या जनता के सामने उसे इस तरह से प्रस्तुत किया गया जैसा उसके माध्यम से मनमोहन सिंह की सरकार ने देश को बड़े राजस्व की चोट दी है आज वह कहीं से भी कानूनी दलीलों के सामने टिक नहीं पाया ? आज देश की जनता यह सोच रही है कि जिस घोटाले को लेकर इतना बड़ा राजनैतिक तूफ़ान खड़ा किया गया था उसकी परिणिति इतनी हास्यास्पद होगी ? यह सही है कि नीतिगत समस्याओं के चलते या उन नीतियों के पीछे छिपकर अपने या सहयोगियों के लिए किसी तरह का लाभ उठाये जाने की कोशिशों का संदेह आज भी इस पूरे मामले से छंटता हुआ नहीं दिख रहा है फिर भी कहीं न कहीं से यह अवश्य दिख रहा है कि यह मामला आर्थिक घोटाले से अधिक राजनैतिक लाभ लेने का अधिक है.
                                   जिस मामले को खुद पीएम के भाजपा उम्मीदवार होने के बाद से लगातार अपनी २०१४ की चुनावी सभाओं में उठाया जाता रहा था और पीएम मोदी के सत्ता सँभालने के साढ़े तीन साल बाद यदि उसकी यह स्थिति है कि देश की सर्वोच्च अभियोजक सीबीआई को किसी भी तरह के ऐसे सबूत नहीं मिले जिनके आधार पर न्यायालय उन्हें दोषी मानता तो इस मामले का स्तर आसानी से समझा जा सकता है. निश्चित तौर पर इतने सालों से चल रहे मामले में निश्चित तौर पर मोदी सरकार ने सब कुछ किया होगा पर आज जब सभी आरोपी सबूतों के आधार पर बरी कर दिए गए हैं तो इस मामले की वास्तविकता पर संदेह होने लगता है. जिस तरह के आंकड़े एकदम से बताये गए थे आज वे कहीं से भी किसी वित्तीय अनियमितता के चलते किये गए हों ऐसा साबित नहीं  हो पाना आखिर देश के लिए किस तरह से सही कहा जा सकता है ? नीतिगत मामलों के चलते जिन कंपनियों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था और केवल उस समय स्पेक्ट्रम आवंटित होने के चलते लगभग सभी कंपनियों को भ्रष्टाचारी मान लिया गया था और सुप्रीम कोर्ट ने १२२ लइसेंस निरस्त भी कर दिए थे तो आज उन कंपनियों के लिए क्या सरकार माफ़ी मांगने को तैयार है ?
                               इस पूरे प्रकरण से यह बात तो स्पष्ट ही है कि कैग की एक रिपोर्ट में नीतिगत परिवर्तन न किया जाने के चलते एक अनुमान भर लगाया गया था जिसको भ्रष्टाचार का प्रतीक मान लिया गया और जिसके चलते ही कांग्रेस सत्ता से भ्रष्टाचारी के रूप में जनता के द्वारा सीमित संख्या में बाहर कर दी गयी पर सभी को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस नीति के चलते देश में दूरसंचार क्रांति भी आयी थी जिसने हर भारतीय के हाथों तक संचार के आधुनिक स्वरुप को पहुँचाने का काम भी किया था. राजनीति अपनी जगह है पर केवल सत्ता पाने या दूसरे दल को नीचा दिखाने के लिए इस तरह के हथकंडों का दुरूपयोग करके अंत में देश की छवि को ही नुकसान पहुँचाया जाता रहा है. राजनैतिक दल और उनकी सत्ता अस्थायी होती है पर देश स्थायी है और जिस परिकल्पना के साथ देश में संसद की स्थापना की गयी थी अब केवल सत्ताधारी दल के निर्णयों और मंशा के स्थान पर संसद में सर्वानुमति की राजनीति पर ध्यान देने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब सभी की सहमति से नीतियों का निर्धारण किया जायेगा तो देश आगे बढ़ पायेगा. निश्चित तौर पर सीबीआई और सरकार के पास अगली अदालत में जाने के विकल्प खुले हुए हैं पर जो सीबीआई पहले ही सबूत जुटाने में सफल नहीं हो पायी अब उसके जुटाए गए सबूत किस आधार पर न्यायालय में टिक पायेंगें यह सोचने का विषय है पर कांग्रेस को भ्रष्टाचारी साबित करने के लिए मोदी के लिए इस मामले को आगे बढ़ाना ही होगा अन्यथा गुजरात में सुधरे प्रदर्शन के चलते कांग्रेस मोदी पर पूरी क्षमता के साथ भजपाऔर मोदी पर पलटवार करने के लिए तैयार दिख रही है.   
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रविवार, 3 दिसंबर 2017

डॉक्टर-लैब-फार्मा कम्पनी गठजोड़

                                                       एक समय में चिकित्सा व्यवसाय को सबसे अच्छा माना जाता था और यह भी माना जाता था कि कोई भी डॉक्टर किसी भी परिस्थिति में अपने यहाँ आये हुए किसी भी रोगी के हित के लिए ही सदैव प्रयत्नशील रहता है पर आज के बदलते परिवेश में जिस तरह की ख़बरें और घटनाएं सामने आती हैं उनसे आम लोगों की इस धारणा को बहुत धक्का भी लगता है. नयी दवाओं और चिकित्सा जगत में होने वाले नए अनुसंधानों से देश के विभिन्न भागों में काम कर रहे डॉक्टर्स को परिचित कराने तथा उनको रोगियों के हितों में उपयोग करने के लिए लगभग हर दवा कम्पनी अपने स्तर से प्रयास करती है और अपने उत्पादों की बिक्री के लिए डॉक्टर्स को विभिन्न तरह के उपहारों से उपकृत भी करती रहती है. जब तक चिकित्सा जगत में व्यावसायिक घरानों की पैठ नहीं हुई थी तब तक सब कुछ ठीक ही चल रहा था पर जब से दवा कंपनियों ने फार्मा लाइन से जुड़े हुए डी फार्मा, बी फार्मा और एम फार्मा अभ्यर्थियों के स्थान पर एमबीए किये हुए लोगों के हाथों में बिक्री को सौंप दिया है तब से इस क्षेत्र का पूरा परिदृश्य ही बदल गया है और दूसरी कम्पनी के बिकते हुए उत्पादों की होड़ में अब हर छोटी बड़ी कम्पनी कुछ भी बनाकर बेचने की राह पर चल चुकी हैं और इसमें दुर्भाग्य की बात यह है कि डॉक्टर्स सब कुछ जानते हुए भी सिर्फ अपने लालच के कारण इन कंपनियों के जाल में उलझे हुए हैं.
                                       यह सही है कि कई बार लक्षणों के आधार पर रोग का पता लगा पाना कठिन हो जाता है और दिखाई देने वाले लक्षणों के अतिरिक्त कोई और रोग भी किसी रोगी में हो सकता है जिसे जानने के लिए विभिन्न तरह की जांचें करवाने की आवश्यकता भी पड़ती रहती है. जब तक आवश्यकता हो तब तक इसे सही समझा जा सकता है पर जब यह भी कमाई का एक और जरिया बन जाए तो इस पर लगाम लगाने की आवश्यकता आ जाती है. आज बड़े शहरों में बड़ी लैब्स के साथ हज़ारों छोटी लैब्स मौजूद हैं जो अपने असली काम के साथ इस तरह के काम में भी लिप्त हैं पर सोचने वाली बात यह है कि लाखों रुपयों के खर्च के बाद स्थापित होने वाली लैब्स आखिर छोटे शहरों और कस्बों तक में कैसे खुलती जा रही हैं जबकि उनके पास आवश्यक चिकित्सक और लैब सुविधाएँ भी नहीं हैं ? यदि इन छोटे शहरों में बैठे हुए झोलाछाप चिकित्सकों और इन कुकुरमुत्तों की तरह उग आयी लैब्स पर ध्यान दिया जाये तो पूरे देश में यह हज़ारों करोड़ का अनैतिक कार्य सामने आ सकता है. इन कथित चिकित्सकों के पास कोई डिग्री नहीं होती जिससे वे केवल लैब से मिलने वाले अपने कमीशन के चक्कर में भी अनाप शनाप जांचें कराते रहते हैं जिससे पहले से ही परेशान रोगी पर और अधिक आर्थिक दबाव पड़ता है पर इस दिशा में सोचने का समय संभवतः किसी के पास नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार के साथ राज्य सरकारों की नज़रें अभी तक इस गठजोड़ पर नहीं पड़ रही हैं.
                               इन सबसे बचने के लिए आखिर किस स्तर पर प्रयास किये जाने की आवश्यकता है अभी हमारे देश में किसी को भी इस बात की जानकारी भी नहीं है क्योंकि लोग आज भी भरोसे के चलते आँखें बंद करके अपने डॉक्टर और उसके बताये रास्ते पर चलते हैं. बंगलुरु में जिस तरह से चिकित्सकों और लैब के बीच का गठजोड़ सामने आया है और उसमें करोड़ों रुपयों की ज़ब्ती के साथ विदेशी मुद्रा भी मिली है तो क्या केंद्र सरकार और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को अविलम्ब इस बात पर सोचने की आवश्यकता नहीं है कि आखिर यह सब कैसे रोका जाना चाहिए ? ऐसा नहीं है कि नेताओं और अधिकारियों को यह नहीं पता है पर उनके अपने स्वार्थ हर तरह की परिस्थिति में सिद्ध हो जाते हैं तो उन्हें आम लोगों की इस समस्या पर सोचने की आवश्यकता ही नहीं है. इस बारे में अब सरकार को हर डॉक्टर की डिग्री को आधार से जोड़कर उसके द्वारा पूरे साल में कराई जाने वाली जांचों पर नज़र रखने के लिए एक व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए जिससे यह पता चल सकेगा कि वह डॉक्टर कितने रोगी देख रहा है और कितना धन लैब्स से ले रहा है साथ ही आयकर देने और उसके इस तरह की आमदनियों के बीच किस तरह का सामंजस्य है भी या नहीं ? इस तरह के कदम से जहाँ सरकार को अधिक राजस्व मिल सकता है वहीँ रोगियों के लिए सही जांचों तक डॉक्टर्स और लैब्स को सीमित किया जा सकता है.
                             ऐसा भी नहीं है कि आज सारे चिकित्सक लैब्स और फार्मा कंपनियां इस तरह के कामों में लिप्त है फिर भी यह मानकर काम नहीं चलाया जा सकता है कि हर जगह कुछ लोग गलत तरह से काम करते हैं. सरकार को इस दिशा में सुधार के लिए पहले एक व्यापक नीति बनानी होगी जिसके बाद ही उसको कानून का रूप दिया जा सकता है. रोगियों को अच्छी सुविधाएँ देने के लिए जन औषधि केंद्रों की तरह लैब्स की अवधारणा को भी मूर्त रूप दिया जा सकता है कम से कम जिला अस्पतालों की क्षमता को इतना अधिक बढ़ाये जाने पर बल दिया जाना चाहिए जो कम से कम अपने जिले के रोगियों को इस तरह की सुविधाएँ उचित दरों पर उपलब्ध कराने के केंद्र के रूप में विकसित किये जा सकें. इसके लिए सरकार को चिकित्सा में उच्च शिक्षा के लिए व्यापक सुधार करते हुए एमडी डीएम आदि स्तरों पर शिक्षा की अधिक व्यवस्था के बारे में सोचना ही होगा साथ ही आयुष मंत्रालय को इस दिशा में और अधिक कारगर बनाये जाने की आवश्यकता पर ही ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे रोगी के सामने हर स्तर की चिकित्सा सेवा लेने का विकल्प खुल सके और वह अपनी समस्या में किसी बड़े व्यावसायिक गठबंधन का शिकार न हो जाए.        
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शनिवार, 25 नवंबर 2017

इंटरनेट बैन समस्या या समाधान ?

                                          निश्चित तौर पर इंटरनेट आज के समय में आम लोगों के बीच संवाद का बड़ा मंच बन चुका है जिसके चलते इसका दुरूपयोग रोकने के लिए सरकार की तरफ से कानून व्यवस्था से निपटने के लिए विभिन्न जगहों पर इस पर अस्थायी रोक लगाए जाने की परंपरा सी शुरू कर दी है जिससे आम लोगों को बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है. हरियाणा में एक जाट संस्था और सत्ताधारी दल के एक सांसद की जनसभा से आखिर वहां की कानून व्यवस्था किस तरह बिगड़ सकती है यह समझ से परे है पर इन सभाओं को लेकर राज्य के १३ जिलों में इंटरनेट सेवाओं पर २६ नवम्बर की मध्यरात्रि से तीन दिनों के लिए रोक लगा दी जाएगी. यहाँ पर यह समझना आवश्यक है कि आखिर सरकारों को इस तरह के कदम उठाने की आवश्यकता आखिर क्यों पड़ती है और संविधान से मिले लोकतान्त्रिक तरीके से जनसभा के अधिकार के साथ कोई भी सरकार ऐसे कैसे कर सकती है ? क्या आज इंटरनेट इतना प्रभावी है कि उसके चलते सरकारों के ख़ुफ़िया तंत्र खोखले और कमज़ोर साबित हो जाते हैं या आमलोगों में ही अपने अधिकारों के दुरूपयोग करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है जिसके चलते सरकारें भी सोशल मीडिया की इस शक्ति से निपटने के लिए इस पर रोक लगाने को ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प मानने लगी हैं ?
                                           यह ऐसा मुद्दा है जिसके बारे में कोई भी स्पष्ट रूप से यह नहीं खोज सकता है कि आखिर गलती किसकी है और किस तरह से इससे निपटा जाना चाहिए क्योंकि आज के युग में जब देश को डिजिटल बनाये जाने की कोशिशें की जा रही हैं तो समय समय पर इस डिजिटल युग में यह ब्लैक आउट किस तरह से सही ठहराया जा सकता है ? निश्चित तौर पर आज आमलोगों के बहुत से काम इंटरनेट के माध्यम से ही होते हैं बैंकिंग सेवाओं से लगाकर अधिकांश प्रशासनिक कार्यों को भो जिस तरह से नेट के माध्यम से किये जाने की सुविधाएँ देने के साथ सरकार इनको बढ़ावा देने में लगी है तो इस तरह की रोक आखिर इस अभियान को कहाँ तक सफल होने देगी ? जिन लोगों के आवश्यक बैंक या अन्य कार्य इंटरनेट के माध्यम से किये जाने होंगे वे भी इस अवधि में नहीं हो सकते जिससे इन ज़िलों की बहुत बड़ी आबादी को व्यापक रूप से समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. इस बारे में सरकार को भी अन्य विकल्पों पर सोचना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर ऐसे कदम उठाने के स्थान पर केवल सोशल मीडिया पर ही प्रतिबन्ध लगाए जाने की व्यवस्था पर काम करना चाहिए क्योंकि सरकार की समस्या पूरा इंटरनेट नहीं बल्कि सोशल मीडिया अधिक होता है और इससे निपटने के लिए सही दिशा में सही तरह से काम किये जाने की आवश्यकता भी है.  
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रविवार, 12 नवंबर 2017

छवि बचाने के संकट में मोदी

                                                           २०१४ में अपने मज़बूत प्रचार और सटीक नीति के चलते गुजरात के सीम नरेंद्र मोदी ने जिस बड़े परिदृश्य का उपयोग करके देश की जनता के सामने कुछ ऐसा दिखाने में सफलता पायी थी जिसके चलते उन पर विश्वास करके देश ने उन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के लिए स्पष्ट जनादेश दिया था. गुजरात में गुजराती अस्मिता और विकास की बातें करके जिस तरह से उन्होंने कई क्षेत्रों में बड़े बदलाव करने में सफलता पायी थी संभवतः वही उनकी राजनैतिक शक्ति भी थी पर पूर्ण बहुमत की भारत सरकार को भी बिना किसी जवाबदेही के गुजरात सरकार की तरह चलाने की मूलभूत गलती प्रारम्भ से ही मोदी और उनकी सरकार द्वारा की जाती रही है और कहा तो यहाँ तक जाता है कि यह केवल दो लोगों की सरकार है और उससे आगे वहां किसी की भी कोई सुनवाई नहीं होती है. अपने से लम्बे राजनैतिक और प्रशासनिक अनुभव रखने वाले नेताओं को मोदी की टीम द्वारा जिस तरह से किनारे किया गया था आज संभवतः उसके चलते भी कुछ मामलों में सरकार के पास ऐसे नेताओं की कमी दिखाई देती है जो सड़क से संसद तक सामने आने वाले मुद्दों पर गंभीरता से विपक्ष और जनता के साथ विश्वसीय संवाद बनाये रखने की हैसियत रखते हों.
                              ऐसी किसी भी स्थिति से निपटने की अभी तक मोदी और उनकी टीम को कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी थी क्योंकि सत्ता में आने के साढ़े तीन वर्षों से वे, उनके मंत्री और भाजपा की तरफ से केवल कांग्रेस पर हमले ही किये जाते रहे हैं और भ्रष्टाचार के अधिकांश मामलों केंद्र और सम्बंधित राज्यों में भाजपा की सरकार होने के बाद भी कोई विशेष प्रगति दिखाई नहीं देती है जिससे कहीं न कहीं जनता के उस वर्ग में संदेह उत्पन्न होने लगता है जो किसी भी दल से जुड़ा हुआ नहीं है पर २०१४ में उसने मोदी के नाम पर भाजपा को वोट दिया था. यह एक विचारशील वर्ग का वोट है जो किसी भी समय किसी एक दल के साथ नहीं रहता है और समय आने पर अपने विवेक के अनुरूप काम करता है. आज भाजपा की मोदी सरकार और संघ जिस तरह से अपने मूलभूत वैचारिक सिद्धांतों पर जिस तरह से एक दूसरे के सामने खड़े नज़र आते हैं तो भाजपा की मोदी सरकार और विपक्ष में रहते हुए बयान देने वाली भाजपा में बहुत अंतर् दिखाई देता है. राष्ट्रवाद के नाम पर दूसरों को दबाने और स्वयं उस दिशा में कोई ठोस प्रयास न करने के कारण ही आज मोदी अपनी छवि को लेकर सोचने के लिए मजबूर होते दिख रहे हैं ऐसा नहीं है कि आज उनकी छवि बहुत कमज़ोर हो चुकी है पर जब इसी तरह की परिस्थिति में उलझ कर अटल सरकार जा चुकी हो तो संघ, भाजपा और मोदी के लिए यह सोचने का सही समय कहा जा सकता है.
            देश के बहुत सारे मामलों पर जिस तरह से संघ भाजपा और मोदी एक सुर में बोलते रहते थे उन पर सरकार में आने पर मोदी की तरफ से कुछ ख़ास नहीं जा सका है कश्मीरी पंडितों, धारा ३७०, राम मंदिर और समान नागरिक संहिता पर इतनी अधिक बातें की जा चुकी थीं कि आज पूर्ण बहुमत की मोदी सरकार को उसे बोझ समझ कर ढोना पड़ रहा है साथ ही उसे इन ज्वलंत मुद्दों से बचने का कोई रास्ता भी दिखाई नहीं दे रहा है. कश्मीर में महबूबा सरकार में शामिल भाजपा आज जम्मू और लद्दाख के हितों की बात ही नहीं कर पाती है जबकि आज की परिस्थिति में जम्मू और लद्दाख को कश्मीर घाटी की राजनीति से मुक्त करने की कोशिश करने का एक अवसर भाजपा के पास था. चुनावी जीत के लिए मुद्दों को बनाये रखना एक बात है पर सत्ता में होकर उन पर निर्णय कर पाना बहुत ही मुश्किल काम है. अभी तक कांग्रेस को भ्रष्टाचार और नीतिगत जड़ता के मामले पर लगातार घेरने वाले पीएम की तरफ से आर्थिक मोर्चे पर कोई ऐसा काम नहीं किया गया है जिससे देश को कांग्रेस की नीतियों से हटकर चलने का मार्ग दिखाई देता ? एफडीआई, जीएसटी आदि ऐसे मुद्दे हैं जिन पर भाजपा ने विपक्ष में रहते हुए कभी देशहित में मनमोहन सरकार का साथ नहीं दिया और लागू करने के बाद जीएसटी जैसे महत्वपूर्ण कर सुधार को जिस तरह से मज़ाक बना दिया गया है आज वह सरकार के लिए बहुत बड़ी चुनौती है.
               अभी तक २०१४ की हार से मूर्छा में पड़ी कांग्रेस को अपने अतिवादी और जबरदस्ती उठाये जाने वाले क़दमों से अपने गृह राज्य गुजरात में जिस तरह से सामने खड़े होने का अवसर मोदी ने दिया है आज वह उनकी गलतियों का परिणाम ही अधिक लगता है क्योंकि एक तरफ आज वित्त मंत्रालय और सरकार जीएसटी के अनाप शनाप तरीके से निर्धारित किये गए स्लैब्स को सुधारने की कोशिशों में लगे हुए हैं वहीँ हाशिये पर पहुँच चुके कांग्रेस उपाध्यक्ष गुजरात के व्यापारियों के सामने हुंकार भरकर कहते हैं कि वे १८% के एक स्लैब के लिए संघर्ष करते रहेंगें और मौका मिलने पर वे केवल एक स्लैब करने की दिशा में काम भी करेंगें. यदि गौर से देखा जाये तो संघ-भाजपा के हिंदुत्व और विकास की प्रयोगशाला में कहीं न कहीं कुछ ऐसा अवश्य हो गया है जिसने पूरे देश में भाजपा का सामना न कर पाने की स्थिति में पहुंची कांग्रेस को गुजरात में दहाड़ने का मौका दे दिया है. इसके चुनावी परिणाम जो भी हों पर कांग्रेस और राहुल गांधी इस बात को रेखांकित करने में सफल होते दिख रहे हैं कि मोदी सरकार व्यापारियों और आम जनता के हितों पर विचार किये बिना ही हर सुधार को ज़बरदस्ती थोपने की कोशिशों में लगी हुई है.
                           आज भले ही व्यापारियों की समस्याओं के चलते सरकार जीएसटी के स्लैब्स का पुनर्निधारण कर रही हो पर इस मामले पर पहले से हमलावर रहने वाली कांग्रेस को यह कहने का मौका हर बार मिलता जा रहा है कि यह उसके द्वारा विरोध किये जाने का परिणाम है और उसके राज में केवल १८% का एक ही स्लैब होगा. आज मोदी के साथ खड़े रहने वाले भाजपा के नेताओं में भी कमी सी दिखाई देती है क्योंकि उन्होंने अपने संदेह असुरक्षा की भावना के चलते बड़े नेताओं को कुछ ख़ास ज़िम्मेदारी दे ही नहीं रखी है और उसके साथ ही अब जिस तरह से अधिकारियों द्वारा दिए गए आंकड़ों के आधार पर मंत्री बयान देते नज़र आते हैं उससे जनता को कोई जुड़ाव महसूस नहीं होता है. फिलहाल ४२ महीनों में मोदी के नायकत्व पर उनकी नीतियों के चलते उठते हुए सवाल आज उन्हें वो सब करने के लिए मजबूर कर रहे हैं जिनके लिए वे कभी कांग्रेस पर हमले किया करते थे.
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मंगलवार, 7 नवंबर 2017

एक्सप्रेस वे और सुगमता


देश के हर कोने में यातायात को सुगम बनाने के उद्देश्य से बनने वाले किसी भी एक्सप्रेस वे से निश्चित तौर पर दो बड़े शहरों के बीच की दूरी भले ही सिमट जाती हो पर जिस उद्देश्य को लेकर इनका निर्माण शुरू किया गया था हमारे देश में वह कहाँ तक पहुँच पाया है संभवतः इस पर अभी किसी का भी ध्यान नहीं गया है. राज्य सरकारों राजमार्ग प्राधिकरण और बीओटी के अंतर्गत निजी क्षेत्र द्वारा बनाये जाने वाले विभिन्न एक्सप्रेस वे पर यदि कोई समग्र रिपोर्ट तैयार की जाये तो वह कहीं से भी बहुत उत्साहजनक नहीं होगी क्योंकि इनकी वर्तमान अवधारणा और उसके आस-पास बसे हुए शहरों को इनसे कितना लाभ हुआ है इस पर अभी तक कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. अब भी इस बारे में नीतिगत सुधार नहीं किये गए तो आने वाले दिनों में इनको बनाने वाली सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की संस्थाओं के लिए बैंकों से लिए गए लोन के ब्याज के खर्चे निकलना भी मुश्किल हो सकता है और देश में शहरों को जोड़ने के लिए अच्छे, सुरक्षित तथा सस्ते मार्ग उपलब्ध कराने की पूरी कवायद पर भी पानी फिर सकता है. इस बारे में पहले से बनाये गए एक्सप्रेस मार्गों की पूरी स्थितियों का आंकलन करके अब नए सिरे से इन्हें नई नीति के अंतर्गत बनाये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि दो दशक पहले की नीतियां आज के समय में उतनी प्रभावशाली साबित नहीं हो सकती हैं.
इस बात को समझने के लिए देश में सबसे कम समय में बिना किसी विवाद के उच्च गुणवत्ता से बनने वाले आगरा लखनऊ एक्सप्रेस वे का उदाहरण लिया जा सकता है जो निश्चित तौर पर आने-जाने वालों को पसंद आ रहा है पर इसके साथ जिन बातों पर ध्यान दिया जाना चाहिए संभवतः आज भी सरकार का ध्यान वहां तक नहीं पहुंचा है जिससे यह बेहद उपयोगी साबित हो सकने वाला मार्ग आज भी उपेक्षा का शिकार सा लगता है. इस तरह से बनने वाले हर एक्सप्रेस वे के बारे में विस्तृत योजना अवश्य बनायीं जानी चाहिए जिससे इसके दोनों तरफ बसने वाले लगभग १०० किमी दूरी तक के शहरों से यहाँ तक पहुँचने के लिए कम से कम टू लेन मार्ग व्यवस्था होनी चाहिए और यदि कहीं पर यातायात अधिक है तो वहां की आवश्यकता के अनुरूप इसे फोर लेन करने के बारे में कार्य किया जाना चाहिए. आज यदि दिल्ली से चलने वाले तीर्थयात्री या पर्यटक आगरा से नैमिषारण्य (सीतापुर) तक जाना चाहें तो उनके पास अच्छा मार्ग होने के साथ ही छोटा मार्ग चुनने का विकल्प नहीं है जिससे वे मजबूरी में अच्छे और लम्बे मार्ग से चलने को अभिशप्त हैं और उन जगहों पर अनावश्यक यातायात बढ़ रहा है जहाँ पर इसको नहीं होना चाहिए साथ ही पुराने बसे शहरों में जाम की समस्या और भी विकराल होती जा रही है. कन्नौज से नैमिषारण्य की दूरी लगभग ८० किमी से भी कम है पर सीधे गंगा नदी पार कर प्रतापनगर चौराहे आने वाले मार्ग की दशा आज भी अच्छी नहीं है जिससे यह यातायात या तो हरदोई या फिर बांगरमऊ होते हुए नैमिषारण्य तक आ सकता है जिसमें समय ईंधन आदि बर्बाद होते हैं. यदि इस सीधे मार्ग को सीतापुर से अच्छी सड़क से जोड़ दिया जाये तो इस मार्ग का उपयोग करने वाले आसानी से बिना किसी जाम में फंसे अपने गंतव्य तक पहुँच सकते हैं.
यह तो एक मात्र उदाहरण ही है क्योंकि जब इस तरह से एक्सप्रेस मार्गों तक पहुँच को अच्छा बनाया जायेगा तो इनका उपयोग भी बढ़ाया जा सकता है जिससे इनको बनाने और चलाने में लगने वाली लागत को भी कम किया जा सकेगा. आज मंहगे टोल के चलते भी निजी गाड़ियों से कभी-कभार सफर करने वाले लोग इन मार्गों से सिर्फ इसलिए भी बचने की कोशिशें करते हैं क्योंकि उन्हें टोल के रूप में भी काफी धन खर्च करना पड़ जाता है. यदि प्रयास कर इन मार्गों तक पहुँच को अच्छा बनाया जाये और टोल को भी तर्क संगत किया जा सके तो आने वाले समय में इनको बनाने वाली संस्थाओं के पास अपनी लागत को वापस पाने के बेहतर विकल्प उपलब्ध हो जायेंगें जिस वे अन्य जगहों पर मार्गों को बनाना के लिए अपने उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर पाने के लिए स्वतंत्र हो सकेंगें. हम भारतीय जिस तरह से लम्बी दूरी की सड़क यात्रा में आनंद को खोजते हैं तो नीतियों में उन पर भी ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है और जहाँ से अन्य शहरों को जाने के लिए कट बनाये गए हैं वहां पर खाने-पीने, गाड़ियों की मरम्मत से जुडी व्यवस्थाओं के बारे में भी काम किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि ४/५ घंटे के सफर में एक दो स्थानों पर रुकने की आवश्यकता भी होती है जिसको किसी भी स्तर पर अनदेखा नहीं किया जा सकता है. आने वाले समय के लिए इन स्थानों के समग्र विकास से लम्बी दूरी की यात्रा करने वालों के लिए यह बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं.
अब समय आ गया है कि यूपी जैसी घनी आबादी वाले राज्यों में बनने वाले एक्सप्रेस मार्गों और पहले से बने हुए मार्गों कि बारे में आंकड़े इकट्ठे किये जाएँ जिससे आने वाले समय में आज होने वाली समस्याओं से निपटने में सहायता मिल सके तथा जिन उद्देश्यों से इनका निर्माण किया जा रहा है उसकी पूर्ति भी हो सके. आज की स्थितियों कि अनुरूप यदि भविष्य की योजनाओं के बारे में विचार नहीं किया गया तो इन एक्सप्रेस मार्गों की दशा भी पहले से उपलब्ध राजमार्गों जैसी ही हो जाने वाली है. बड़े राज्यों में राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर इस दिशा में अभी से सोचने की आवश्यकता है जिससे आबादी और यातायात के दबाव को झेलने के हिसाब से पूरे देश में राजमार्गों और एक्सप्रेस मार्गों का सही उपयोग किया जा सके. आर्थिक रूप से उपयोग में सस्ते और सुरक्षित होने के साथ इन पर भरपूर यातायात भी हो जिससे इनकी लागत को समय से निकाला जा सके और देश में राजमार्गों के विकास के वर्तमान परिदृश्य को और भी सुधारा जा सके अब यही समय की आवश्यकता हो गयी है.मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

गुरुवार, 13 जुलाई 2017

यूपीआई और बैंक

                                                 नोटबन्दी और डिजिटल भुगतान प्रणाली को पूरी तरह से लागू करने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से जिस तरह आम लोगों को डिजिटल भुगतान के विभिन्न तरीके उपलब्ध करवाए थे उनमें से सबसे महत्वपूर्ण यूपीआई साबित हो सकता है पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तरफ से इसके उपयोग को लेकर कोई उत्साह नहीं दिखाए जाने के चलते आज यह अपने उद्देश्य को प्राप्त करने से बहुत पीछे ही रहा जा रहा है. एनसीपीआई(राष्ट्रीय भुगतान निगम लिमिटेड) के आंकड़ों के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में ४ करोड़ यूपीआई भुगतान का लक्ष्य रखा गया था जिसके सापेक्ष्य केवल २.६ करोड़ भुगतान ही इसके माध्यम से संपन्न हो सके हैं तो इससे यह पता चलता है कि पूरी व्यवस्था को आम लोगों और बैंकिंग सेवाओं का उपयोग करने वालों के लिए अभी भी सही तरह से प्रचारित नहीं किया गया है जिससे आज यह अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल नहीं हो पा रही है. केंद्र सरकार, रिज़र्व बैंक और एनसीपीआई केवल काम करने के प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा सकते हैं उनका उपयोग सही तरह से अधिकांश लोगों द्वारा किया जाये यह सुनिश्चित करने की ज़िम्मेदारी तो सीधे तौर पर बैंक प्रबंधन पर ही आती है पर वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह अच्छी तरह से समझा जा सकता है कि आने वाले समय में बैंकों के लिए डिजिटल भुगतान को प्रभावी बनाने के लिए बहुत कड़ी मेहनत करने की आवश्यकता है.
                                       धन के लेन देन से जुड़ा मामला होने के चलते आम लोग किसी धोखाधड़ी का शिकार होने के डर से भी डिजिटल तरीके से भुगतान करने की प्रक्रिया को अपनाने से बचते हुए नज़र आते हैं जिसे दूर करने के लिए आज तक बैंकों की तरफ से कोई गंभीर प्रयास नहीं किये गए हैं. आम लोगों की शंकाओं के निवारण के साथ ही यूपीआई के भुगतान को बढ़ावा दिया जा सकता है जिससे इस तकनीक का अधिकतर लोग उपयोग कर सकें पर दुर्भाग्य से यह अभी तक केवल सरकारी काम जैसा ही समझा जा रहा है जिससे इसके लिए अपने लक्ष्य को प्राप्त करना और भी कठिन हो सकता है. बैंकों के माध्यम से भुगतान करने की इस प्रक्रिया के साथ ही भीम या बैंकों के यूपीआई एप्लीकेशन्स में भुगतान करने के सभी विकल्प उपलब्ध होने चाहिए जैसे कि आज यूपीआई के माध्यम से केवल पैसों का लेनदेन ही संभव हो पा रहा है जबकि इन ऍप्लिकेशन्स के माध्यम से सीधे ही बिजली, पानी, फ़ोन,स्कूल फीस आदि रोज़ की आवश्यकताओं को भी जोड़ा जाना चाहिए जिससे एक एप्लीकेशन से ही सभी काम किये जा सकें. आज यस बैंक की तरफ से जितनी पहल यूपीआई को लेकर की जा रही है यदि अन्य बैंक भी इसी तरह से आगे बढ़ने की कोशिश करते तो पूरे देश में डिजिटल पेमेंट की तस्वीर को बदला जा सकता है. यस बैंक ने पहले फ़ोन पे फिर हाइक मेसेंजर के माध्यम से आम लोगों को विभिन्न तरह के भुगतान करने की सुविधा प्रदान की है वह बहुत उपयोगी साबित हो रही है और लोकप्रिय एप्लीकेशन व्हाट्सएप की तरफ से भी यूपीआई भुगतान शुरू करने की बात की जा रही है तो बहुत बड़ी संख्या में इसे उपयोग में लाने वाले लोग इस तरह से डिजिटल व्यवस्था से आसानी से जुड़ने का विकल्प पा सकेंगे.
                                     देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई की तरफ से पहले ही ई बडी एप्लीकेशन को चलाया जा रहा था पर यूपीआई के शुरू होने के बाद इसकी तरफ से अन्य लोगों की तरह कोई महत्वपूर्ण प्रयास सामने आते नहीं दिख रहे हैं जबकि इसके द्वारा इस एप्लीकेशन को और सुधार कर यूपीआई के माध्यम से भुगतान करने की सेवा शुरू करने के बारे में काफी पहले ही तेज़ी से सोचा जाना चाहिए था. यदि एसबीआई की तरफ से ऐसे किसी प्रयास को सामने लाया जा सके तो सार्वजानिक क्षेत्र के अन्य बैंकों के यूपीआई से जुड़े खातों से भुगतान कर बहुत सारे विकल्प अपनाने की छूट आम लोगों को मिल सकती है. सरकार और रिज़र्व बैंक को भी डिजिटल भुगतान बढ़ाने के लिए कम से कम दो हज़ार रूपये तक के भुगतान पर किसी भी तरह का चार्ज लगाने से बचना चाहिए क्योंकि अनावश्यक चार्ज भी बहुत बार आम लोगों को इस तरह की सुविधाओं से जुड़ने से रोकने का काम ही किया करते हैं. एसबीआई को अविलम्ब अपने ई बडी को सुधार करने और हर तरह के भुगतान करने की सुविधाओं से लैस करना ही होगा क्योंकि आम लोगों तक पहुँच बनाये रखने के लिए ऐसा कदम उठाये जाने बहुत आवश्यक भी हैं जिससे देश को समग्र रूप से डिजिटल क्रांति से जोड़ने कि दिशा में और भी आगे बढ़ा जा सके और आम लोगों के बैंक और विभिन्न कार्यालयों में भुगतान के लिए लगने वाले चक्करों को भी कम किया जा सके. 
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मंगलवार, 11 जुलाई 2017

श्री अमरनाथ यात्रा और सुरक्षा

                                               जम्मू-कश्मीर स्थिति श्री अमरनाथ बाबा की पवित्र गुफा में दर्शन की वार्षिक यात्रा पर जिस तरह से अंनतनाग में आतंकियों ने हमला किया है वह अपने आप में बड़ी घटना तो है ही साथ ही व्यवस्था से अलग चलने वालों के लिए एक सबक भी है प्रारंभिक खबरों में अधिकारियों की तरफ से जिस तरह से यह बात कही गयी कि यह बस नियमों का उल्लंघन करके रात के प्रतिंबंधित समय में चल रही थी वहीं बस मालिक का कहना है कि उसकी बस भी यात्रा में शामिल थी पर टायर पंक्चर होने के चलते वे काफिले से अलग हो गया थे. यह वार्षिक यात्रा विभिन्न सुरक्षा कारणों से सदैव ही केंद्र और राज्य सरकार के लिए चुनौती और चिंता का विषय बनी रहती है और पिछले वर्ष इस यात्रा से पहले ही आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से लगातार यात्रा पर भी प्रभाव पड़ता नज़र आ रहा है. घाटी में संपन्न होने वाली यह वार्षिक यात्रा दक्षिणी कश्मीर के लिए व्यापार के व्यापक आयामों को लेकर आती है क्योंकि पूरे देश और विदेशों से भी आने वाले यात्रियों से उनको अच्छी खासी कमाई भी हो जाती है पर पिछले दशक से जिस तरह से पाकिस्तान समर्थित आतंकियों द्वारा इस यात्रा को निशाने पर लेकर सुरक्षा सम्बन्धी चिंताओं को उभारने का काम किया जा रहा है उसके बाद भी यात्रियों की संख्या में कोई कमी नज़र नहीं आ रही है.
                     निश्चित तौर पर हर मुद्दे पर राजनीति करने वालों के लिए एक दूसरे पर आरोप लगाने के लिए यह सही समय है पर इस सबके बीच केंद्र और जम्मू कश्मीर राज्य सरकारों को एक बार फिर से इस पर विचार करना चाहिए कि भविष्य में इस तरह की स्थिति से किस तरह बचा जा सकता है. यात्रा में शामिल किसी वाहन के ख़राब होने की दशा में यात्रा सुरक्षा प्रभारी के पास क्या विकल्प शेष बचते हैं यह सोचने और उस पर अमल किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि किसी तकनीकी गड़बड़ी से यात्रा में शामिल कोई भी वाहन कभी भी ख़राब भी हो सकता है. इसके साथ ही जम्मू से निकलते समय यात्रा में शामिल सभी वाहनों की सघन जांच भी तेज़ी से किये जाने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए जिससे इस तरह की परिस्थिति सामने आने की दर को और कम या नगण्य किया जा सके. यह ऐसी परिस्थिति थी जिसके बारे में संभवतः सरकार ने भी नहीं सोचा था इसलिए यात्रा के बीच में ही किसी भी ख़राब होने वाले वाहन के यात्रियों की सुरक्षा के बारे में अब नए सिरे से रणनीति बनाये जाने की आवश्यता भी है. विशेष अपरिहार्य परिस्थितयों में पूरे काफिले को रोकना अधिक खतरनाक हो सकता है इसलिए यदि संभव हो तो घाटी में पड़ने वाले यात्रा मार्ग में हर १० किमी पर एक वैकल्पिक बस की व्यवस्था किये जाने के बारे में सोचा जाना चाहिए या फिर यात्रा के साथ हर दिन एक खाली बस भी इस तरह की किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए चलनी चाहिए.
                 सुरक्षा इनपुट्स के बाद इस परिस्थिति में यात्रा के साथ चलने वाले जवानों को भी इस बात के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश होने चाहिए कि इस तरह की परिस्थितियों में उनके लिए क्या विकल्प उपलब्ध हैं और उन्हें किन पर अमल करना चाहिए. यात्रा के महत्व और उससे जुडी संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए ही मजबूर होकर अलगाववादियों तक को इस घटना की निंदा करनी पड़ी है और अभी तक किसी भी आतंकी संगठन ने इस हमले की ज़िम्मेदारी भी नहीं ली है. यह ऐसा समय है जब पूरे देश के लोगों को मारे गए लोगों के साथ संवेदना है और साथ ही इस बात की आशा भी है कि पूरा देश इस परिस्थिति से भी निपटने में सक्षम है. जिन लोगों ने इस यात्रा में भाग लिया है वे जानते हैं कि यात्रा मार्ग कितना दुरूह और दुर्गम है तो ऐसे किसी भी माहौल में सरकार से पूर्ण सुरक्षा की गारंटी की बात करना ही बेमानी है क्योंकि हर सरकार की तरफ से इसे सकुशल संपन्न कराने के लिए यथ संभव प्रयास किये जाते रहे है फिर भी कभी कभी इस तरह की घटनाएं होती ही रहती हैं. यात्रा में जाने वाले यात्रियों और उनके वाहन चालकों से भी इस बात की अपेक्षा की जाती है कि वे नियमों का पूर्ण रूप से पालन करेंगें तथा किसी भी विपरीत परिस्थिति में उसी तरह से धैर्य बनाये रखेंगे जैसे कल की घटना में चालक सलीम ने घटना स्थलपर चल रही गोलियों के बीच से गाड़ी को भगाने में सफलता पायी थी जिससे बहुत सारी जाने बचायी जा सकीं.  
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गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

५० दिन बाद के विकल्प

                                                                     ८ नवम्बर को की गयी नोटबंदी की घोषणा के बाद ५० दिन पूरे होने पर जिस तरह से बड़ी घोषणाओं के बारे में खुद पीएम ने कहा था पर लगता है कि अधिकांश रुपयों के वापस आ जाने के कारण अब सरकार के हाथ कुछ अधिक ही बंधे रहने वाले हैं जिससे आम लोगों को उस तरह की छूट या सुविधाएँ नहीं मिल पाएंगीं जैसा सरकार और जनता ने सोचा था. अब इस पूरी कवायद के कारण देश को होने वाले लाभ-हानि पर लंबे समय तक विचार विमर्श किया जाता रहेगा क्योंकि अभी भी किसी को यह नहीं पता है कि इसके कितने अच्छे और कितने बुरे परिणाम सामने आ सकते हैं ? कुल मिलाकर पुराने नोटों में से अभी तक ९०% से भी अधिक नोटों के वापस आ जाने से सरकार को बड़ा धक्का ही लगा है क्योंकि उसके अनुमान के अनुसार लगभग ३ से ५ लाख करोड़ रूपये वापस नहीं आने चाहिए थे जिससे सरकार को शुद्ध रूप से इतना लाभ हो जाता पर आज की स्थिति को देखने के बाद तो यही लगता है कि सरकार अपने इस मंसूबे को किसी भी तरह से पूरा कर पाने में विफल हो चुकी है हाँ इसका एक तात्कालिक लाभ यह अवश्य दिखाई देने लगा है कि जो लोग अभी तक शंकाओं के कारण डिजिटल पेमेंट के बारे में सोचना भी नहीं चाहते थे आज वे भी इस तरफ कुछ कदम बढ़ा चुके हैं.
                              जिस तरह से सरकार की तरफ से आश्वासन दिए जा रहे हैं तो उनको देखते हुए आम लोगों की नज़रों में इस नोटबंदी को सफल बताने के लिए सरकार आयकर में छूट की सीमा को बढ़ा सकती है जिससे उसकी आमदनी पर बहुत बड़ा अंतर नहीं पड़ने वाला है क्योंकि प्रारंभिक स्तर पर कर देने वाले नागरिकों की संख्या बहुत कम है और छूट का स्तर बढ़ाये जाने से नए लोगों को आयकर की सीमा में होने के बाद आयकर चुकाने के लिए प्रेरित भी किया जा सकता है. सरकार की तरफ से रियल स्टेट में भी बड़े कदम उठाये जाने की प्रबल संभावनाएं भी हैं क्योंकि इस क्षेत्र में भी काले धन का बड़ी मात्रा में निवेश किया जाता है जिस पर नियंत्रण किये बिना किसी भी तरह से सरकार को काले धन पर रोक लगाने में पूरी मदद नहीं मिलने वाली है. आम आदमी अभी भी यही मान रहा है कि मोदी सरकार इस नोटबंदी के बाद उसके लिए सुविधाओं का पिटारा खोलने वाली है जबकि सरकार को भी यह अच्छे से स्पष्ट हो चुका है कि किसी भी परिस्थिति में अब वह लोगों को अधिक नहीं दे सकती है जिससे विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने एक और भी अवसर मिल सकते हैं. पांच राज्यों में आगामी चुनावों को देखते हुए सरकार के लिए कुछ घोषणाएं करना मजबूरी ही है क्योंकि इन राज्यों के लोगों को नोटबंदी का समर्थन करने के बदले कुछ मिलने की आशा को भी सरकार को पूरा करना है.
                              देश का दुर्भाग्य है कि हर वर्ष कहीं न कहीं चुनाव ही होते रहते हैं जिससे कई बार महत्वपूर्ण घोषणाएं करने पर चुनाव आयोग से अनुमति लेने की आवश्यकता भी पड़ जाती है पर केंद्र सरकार की तरफ से किये जाने वाले कामों पर आमतौर पर कोई रोक नहीं लगती है. इन चुनावों के बीच ही देश का आम बजट भी आना है जिससे लोगों की निगाहें उस पर भी टिक चुकी हैं क्योंकि जिन वायदों को किया गया है उनमें से कुछ को पूरा करने के लिए अब सरकार भी दबाव में आ चुकी है. आर्थिक मामलों को दलीय राजनीति से पूरी तरह अलग ही रखना चाहिए जिससे देश के लिए उठाये जाने वाले क़दमों पर किसी भी तरह की राजनीति संभव ही न हो पाए पर भारत में इस तरह से सोचने की दृष्टि अभी किसी भी राजनैतिक दल के पास नहीं है. सरकार और विपक्ष को मिलकर कम से कम अगले २० वर्षों के लिए नीतियों को अंतिम रूप देना चाहिए जिसमें किसी भी तरह का संशोधन केवल ३/४ बहुमत से ही किये जाने का प्रावधान भी होना चाहिए जिससे समय रहते देश की आवश्यकताओं के लिए स्पष्ट नीतियों का निर्धारण किया जा सके. राजनीति अपनी जगह है पर देश के विकास से जुड़े मुद्दों पर सरकार और विपक्ष दोनों को सकारात्मक होना ही पड़ेगा क्योंकि यदि भाजपा ने संयोग किया होता और २०१० में ही जीएसटी लागू करने की तरफ कदम बढ़ा दिए गए होते तो आज मोदी सरकार के पास काम करने के लिए दूसरी प्राथमिकताएं निर्धारित करने के लिए समय और ऊर्जा बची रहती जिसे आज वह इस बिल पर खर्च करने में लगी हुई है.       
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शुक्रवार, 23 दिसंबर 2016

उभरते राजनैतिक ध्रुव

                                                             पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी ने सीधे पीएम मोदी के खिलाफ विभिन्न मुद्दों पर मोर्चे खोल रखे हैं उसके चलते उनकी बातों को भी हर तरह के राष्ट्रीय मीडिया में भरपूर स्थान मिलना शुरू हो चुका है. आज जब देश में संघ और खुद सत्ताधारी भाजपा भी पीएम मोदी के साथ खड़े होने वाला दूसरा नेता खोजने में लगी हुई है तो उस परिस्थिति में गैर भाजपाई दलों से आगे बढ़कर राहुल का मोदी विरोध की कमान को संभालना कांग्रेस का एक सोचा समझा कदम भी हो सकता है. पहले भूमि अधिग्रहण फिर जीएसटी और अब नोटबंदी पर जिस तरह से राहुल ने आगे आकर पीएम मोदी पर हमले किये हैं वे राजनैतिक विश्लेषकों के लिए भी बड़े आश्चर्य से कम नहीं हैं क्योंकि बोलने में राहुल गांधी के पास पीएम मोदी जैसी शैली आक्रामकता के साथ उतनी परिपक्वता भी नहीं है जिससे वे सीधे तौर पर मोदी का मुक़ाबला कर सकें पर उन्हें कहीं न कहीं से इस तरफ आगे बढ़ना ही था जिस पर बढ़ना शुरू करके उन्होंने अपने राजनैतिक भविष्य के लिए धरातल तलाशना शुरू कर दिया है जिसका असर लंबे समय में देश की राजनीति पर भी पड़ने की सम्भावना है क्योंकि राजीव गाँधी के बाद संभवतः राहुल गाँधी कांग्रेस की तरफ से आम जनता से जुड़ने के लिए अब प्रयासरत दिखाई दे रहे हैं जबकि बीच के समय में पार्टी में इस बात की कमी दिखाई दे रही थी.
                                          बेशक कम अनुभव के साथ ही सही पर अब राहुल ने जिस तरह से सीधे पीएम मोदी को भी अपने बारे में बात करने के लिए उकसाने में सफलता पायी है वह प्राथमिक चरण में उनकी नीति की सफलता ही कही जा सकती है क्योंकि पिछले कुछ समय से जिस तरह से भाजपा और संघ के संगठन सीधे राहुल पर आक्रामक हो रहे हैं उससे उन्हें समाचारों में स्थान मिलना खुद ही शुरू हो गया है. कुछ आरोप केवल राजनैतिक लाभ और विरोधी पर थोड़ी सी प्रारंभिक बढ़त बनाने के लिए ही लगाए जाते हैं पर जिस तरह से उनको सामने लाया जाता है इससे जिस व्यक्ति पर आरोप लगते हैं वह खुद को निर्दोष साबित करने के लिए संघर्षरत और प्रयासरत दिखाई देने लगता है. भाजपा और उसकी सोशल मीडिया टीम ने जिस तरह से राहुल पर लगातार हमले किये और अब राहुल भी पलटवार करने के लिए सीधे पीएम मोदी को ही चुन रहे हैं तो उसके बाद वाराणसी में पीएम ने जितना समय राहुल पर संकेतों में बोलने में खर्च किया वह राहुल की रणनीतिक जीत कही जा सकती है कि वे हर मोर्चे पर भले ही कितने कमज़ोर और वक्ता के रूप में कितने भी अपरिपक्व क्यों न हों उनको खुद ही भाजपा और पीएम मोदी मजबूरी में या अनजाने में वह स्थान देना शुरू कर चुके हैं जो कांग्रेस चाहती है.
                                         पीएम मोदी की शैली और वाक्पटुता का राहुल मुक़ाबला नहीं कर सकते हैं पर कल राहुल की तरफ से वाराणसी में मोदी द्वारा उनको लेकर मज़ाक उड़ाने पर भी एक वक्तव्य में ही बड़ी लाइन खींच दी वह अपने आप में किसी आश्चर्य से कम नहीं है. बेशक राहुल को लेकर पीएम मोदी के हलके फुल्के बयान से वहां बैठे लोगों का मनोरंजन हुआ हो पर शाम तक बहराइच में राहुल ने जिस तरह से यह कहा कि भले ही उनका मज़ाक उड़ाया जाये पर जनता के सवालों का जवाब भी दिए जाएँ वह अपने आप में भाजपा और उसके थिंक टैंकों के लिए चिंता का सबब बन सकता है क्योंकि मई २०१४ में जिस कांग्रेस और राहुल गाँधी को लोग चुका हुआ मान रहे थे आज वह पीएम की मज़बूत छवि पर निशाने साधने की स्थिति में आखिर किस तरह से पहुँच चुके हैं ? भूमि अधिग्रहण पर सरकार को अपने कदम वापस खींचने पर कमज़ोर कांग्रेस ने ही मज़बूर किया था जिस बात को आज यूपी की जनसभाओं में राहुल बखूबी इस्तेमाल करने में लगे हुए हैं और आज जिन आरोपों को पीएम मोदी पर लगाया जा रहा है आने वाले समय में उनको लेकर भी राजनीति किये जाने की पूरी संभावनाएं भी हैं. नोटबंदी पर आज भी आम जनता सरकार के कदम के साथ है पर आने वाले दिनों में लोगों की समस्याओं पर जब बातें की जायेंगीं तो कांग्रेस अपनी आज की रणनीति का स्वाभाविक रूप से भरपूर लाभ उठाने की स्थिति में होगी. आज कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है पर ढाई वर्षों में पीएम मोदी पर हमलावर होकर वह देश के राजनैतिक मंच पर राहुल गांधी को उनके सामने के छोटे रूप में ही सही स्थापित करने में सफल हो गयी है जो कि उसके लिए किसी सफलता से कम नहीं है.    
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सोमवार, 12 दिसंबर 2016

सबसे पहले देश

                                                                 आज पूरे देश में विमुद्रीकरण के चलते जो स्थिति दिखाई दे रही है उसे सही तरह से सँभालने के लिए जो भी कदम उठाये जाने चाहिए उनके लिए सरकार कोशिश तो कर रही है पर जिस तरह से इस कदम की गंभीरता को समझे बिना ही आगे बढ़ने का काम किया गया है वह अब सरकार, रिज़र्व बैंक और जनता के लिए काम करने वाले बैंकों के लिए एक बहुत बड़ी समस्या लेकर आ गया है. देश को यह स्पष्ट चाहिए कि अब यह विमुद्रीकरण किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जा सकता है इसलिए देश की जनता और सरकार को यह समझना और समझाना ही होगा कि इससे किस तरह से कम समस्या के साथ निपटा जाये. सरकार यदि इस बात के लिए मन बनाये हुए थी तो सबसे आसान तरीका यही हो सकता था कि दो महीने पहले से ही बड़े नोटों की संख्या को कम करते हुए छोटे नोटों को चलन में लाने की कोशिश की जाती जिससे भुगतान और व्यापार में जो असंतुलन आज दिखाई दे रहा है उससे पूरी तरह से बचा जा सकता और आम लोगों की स्थिति पर इतना कुप्रभाव पड़ने से रोका भी जा सकता था पर इस पूरे मामले में जिस तरह की जल्दबाज़ी दिखाई गयी उससे भी परिस्थितियों को संभालना मुश्किल हो रहा है.
                                             जनता का जो हिस्सा डिजिटल बैंकिंग की तरफ बढ़ सकता है उसके लिए पहले से तैयारियों की आवश्यकता भी थी क्योंकि आज लोगों के पास खातों में पैसे तो हैं पर उनको खर्च करने लायक जगहें नहीं हैं. आज बड़े शहरों में भी लोगों की डेबिट कार्ड पर निर्भरता बहुत कम ही है तो उस स्थिति में किस तरह से पूरी स्थिति सामान्य रह सकती है ? क्या राज्य सरकारों की तरफ से इस बारे में नकदी को रोकने और डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए कोई कदम केंद्र के साथ मिलकर उठाया गया था ? आज इस स्थिति को सँभालने के लिए जिस तरह के प्रयास किये जा रहे हैं क्या वे पूरी तरह से स्थिति में अपने को फिट पा रहे हैं ? बड़े रिटेल आउटलेट और पेट्रोल पम्प्स को इस बात के लिए पहले से ही तैयार किया जाना चाहिए था कि आवश्यकता पड़ने पर वे कैश का भुगतान भी कर सकें. यह व्यवस्था अपने आप में बहुत कारगर हो सकती है क्योंकि इन जगहों पर बड़ी मात्रा में रोज़ ही कैश इकठ्ठा होता है और यदि इनको इस तरह से जनता को धन देने के लिए तैयार किया जा सका तो बैंकों में कैश के लिए लगने वाली लाइन को हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है. इससे जहाँ इन केंद्रों को बैंकों तक अधिक कैश पहुँचाने की समस्या से निजात मिल जायेगी वहीं आम जनता को भी आसानी हो जाएगी.
                                    अब इस समस्या से निपटने के लिए जो कुछ भी किया जाये वह एक क्षेत्र से समग्र रूप से होना चाहिए क्योंकि यदि पूरे देश में यह व्यवस्था करने की कोशिश की जाएगी तो इतने संसाधन जुटा पाना संभव नहीं होगा इसलिए अब केंद्र सरकार को राज्य सरकारों के साथ मिलकर हर पिछड़े इलाके में समस्या का समाधान करने की पहल करनी चाहिए क्योंकि शहरों में तो किसी तरह काम चल भी रहा है पर गांवों और दूर दराज़ के क्षेत्रों में लोगों की ज़िन्दगी बहुत कठिन हो गयी है. आधार पर आधारित पेमेंट को सबसे पहले गांवों में ही लागू करना चाहिए क्योंकि उनके पास बैंक की सेवाएं भी उपलब्ध नहीं है और शहरों में जो काम साक्षरता वाली या मलिन/ पिछड़ी बस्तियां हैं वहां पर जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए जिससे इन दोनों क्षेत्रों के लोगों के कष्टों को कम किया जा सके. गांवों में लोगों के लिए डेबिट कार्ड और पिन आदि संभालना भी कठिन होता है और उनके आस पास बैंकों की उपलब्धता भी नहीं है तो उस परिस्थिति में उनके लिए केवल आधार आधारित पेमेंट गेटवे स्थापित किये जाने चाहिए भले ही वे डेबिट कार्ड का उपयोग कर सकते हो और बिना किसी राजनीति के अब आधार को वोटर लिस्ट से भी जोड़ देना चाहिए जिससे आने वाले समय में एक राष्ट्रीय पहचान से आम लोग हर काम कर पाने में सफल हो सकें.  
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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

विमुद्रीकरण की समस्याएं

                                                 देश में बड़े नोटों के विमुद्रीकरण को एक महीना बीत जाने के बाद भी जिस तरह से आम लोगों की समस्यायों का अंत होता नहीं दिखाई दे रहा है उससे यही लगता है कि इतने बड़े फैसले पर सरकार और रिज़र्व बैंक के आंकलन में कहीं न कहीं बहुत बड़ी चूक भी हुई है जिससे पूरे देश में बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा है. यह भी सही है कि आम लोग आज भी सरकार के इस फैसले को पूरी आशा के साथ पूरा होते हुए देखने के आकांक्षी भी हैं पर उनकी दैनिक जीवनचर्या जिस तरह से प्रभावित हुई है वह कब कम हो पायेगी इस बात का जवाब भी खोजते हुए सभी दिखाई दे रहे हैं. अब यह भी स्पष्ट हो रहा है कि अगले वर्ष पञ्च राज्यों में होने वाले विधान सभा चुनावों को देखते हुए ही सरकार ने आनन फानन में इतनी बड़ी घोषणा कर दी जबकि उसके पास नकदी के सम्बन्ध में सटीक आंकड़े भी नहीं थे क्योंकि जिन १४ लाख करोड़ से कुछ अधिक नोटों में से ५/६ लाख करोड़ रूपये कालेधन के रूप में होने का सरकार को अनुमान था विभिन्न कारणों से वह ध्वस्त हो चुका है और सरकार का यह कहना पूरी तरह से बेमानी लगता है कि इससे वह आम लोगों की भलाई के लिए नयी योजनाएं शुरू कर पायेगी क्योंकि जितनी भलाई होनी है उससे अधिक नुकसान तो देश में आर्थिक माहौल थमने से हो ही चुका है.
                                   अब स्थिति यह है कि सरकार अपनी कवायद को विभिन्न कारणों से सफल बताना चाहती है पर उसके पास इन बातों के समर्थन में प्रस्तुत करने लायक आंकड़े ही नहीं हैं और उसकी इस मजबूरी का लाभ विपक्ष उठाना चाहता है जिससे वह भी जनता की समस्याओं में अपनी राजनीति को सम्मिलित कर सके. जैसी कि खबर दी जा रही है कि पौने चार लाख करोड़ की नकदी एक महीने में बाज़ार में बैंकों के माध्यम से पहुँच चुकी है तो अभी भी सरकार को लगभग १४ लाख करोड़ की व्यवस्था करनी है जिसमें संभवतः ६ महीने या उससे भी अधिक समय लग सकता है. यह एक लंबी प्रक्रिया थी जिस के लिये कई महीनों की समग्र तैयारी की आवश्यकता भी थी पर इस बारे में एक ही झटके में फैसला ले लिए गया था जिसके दुष्परिणाम आज सामने आ रहे हैं. यह सही है कि देश में लोगों की पहुँच आधुनिक संसाधनों की तरफ बढ़ रही है जिससे वे अधिक जागरूक भी हो रहे हैं पर जिस तरह से निजी वालेट कंपनियों को इस क्षेत्र में खुली छूट मिल गयी है उससे हमारे बैंकिंग सिस्टम पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ने की पूरी संभावनाएं भी हैं क्योंकि एनपीसीए की तरफ से जारी किये गए यूपीआई एप्लीकेशन्स के बारे में न तो बैंक ही जागरूक हैं और न ही जनता को इस बारे में पहले से बताया गया था. साथ ही प्रारंभिक स्तर पर होने के कारण अधिकांश ग्राहक अपने पंजीकरण को भी पूरा नहीं कर पा रहे हैं जिससे निजी वालेट पर उनकी निर्भरता बढ़ती ही जा रही है.
                                   देश के अपने ढांचे को मज़बूत करने के लिए जिस तरह से कोशिशें की जानी चाहिए थीं आज वे अधूरी ही है और आने वाले समय में नोटबंदी के चलते अब उनको समय से पूरा कर पाना भी संभव नहीं है जिससे स्थितियां और भी खराब होती जा रही हैं. एक अच्छी बात यह है कि सरकार ने तकनीकी विशेषज्ञ, आधार के जनक और कांग्रेसी नेता नंदन नीलकेणी के साथ मिलकर आज की स्थितियों को सँभालने के लिए एक समिति बना दी है जो देश को नकदी पर निर्भरता कम करने के लिए उचित काम करने की दिशा में बढ़ना शुरू कर चुकी है जिससे कुछ मोर्चों पर तो अगले कुछ हफ़्तों में ही परिवर्तन महसूस हो सकता है. अब समय आ गया है कि सरकार और विपक्ष संसद में चल रहे गतिरोध को आगे बढ़कर समाप्त करने के बारे में सोचें जिससे देश की जनता के लिए कष्टों पर बात करने के स्थान पर कुछ ठोस कदम भी उठाए जा सकें. देश को काले धन के नाम पर उपजी इस समस्या के उचित समाधान की आवश्यकता भी है जिससे सम्पूर्ण रूप से देश की आर्थिक गतिविधियों को वापस पटरी पर लाया जा सके पर वर्तमान परिस्थिति में देश का राजनैतिक तंत्र अपनी इस ज़िम्मेदारी को निभा पाने में पूरी तरह से असफल  होता ही दिखाई दे रहा है.         
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मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

प्रीमियम ट्रेन और समस्या

                                                                     सीमित रूप से आर्थिक रूप से सक्षम यात्रियों को राजधानी जैसी सुविधाओं से युक्त ट्रेन के संचालन के साथ बेहतर सेवाएं देने के उद्देश्य के साथ २०१३ में शुरू की गयी भारतीय रेलवे की प्रीमियम ट्रेन सेवा शुरुवाती परीक्षणों में बहुत सफल रही थी जिसके बाद केंद्र में सरकार बदलने के बाद उन नीतियों पर संभवतः पुनर्विचार किया गया कि रेलवे की आमदनी को बढ़ाने में इन प्रीमियम ट्रेनों का उपयोग किस तरह से किया जा सकता है. इस मामले में संभवतः रेल मंत्री के सामने केवल लाभ के आंकड़े ही प्रस्तुत किये गए जिससे उन्हें यह बात समझ में आयी कि विभिन्न मार्गों पर चलने वाली अन्य महत्वपूर्ण ट्रेनों में भी इस तरह की व्यवस्था को लागू करने से रेलवे की आमदनी को बिना अतिरिक्त संसाधनों के ही बढ़ाया जा सकता है. यह योजना सफल नहीं हो सकती है इस बात पर पहले से ही आशंकाएं व्यक्त की जा रही थीं पर सितंबर में सर्ज प्राइसिंग लागू होने के बाद जिस तरह से उच्च श्रेणियों में रेलवे को त्यौहारी सीजन के बावजूद आमदनी में मामूली बढ़त के साथ बड़ी संख्या में यात्रियों को खोना पड़ा है उसके बहुत ही दूरगामी परिणाम आ सकते हैं और छोटी दूरी तक यात्रा करने वाले यात्री हमेशा के लिए रेलवे से दूर भी जा सकते हैं.
                                            इसे इस तरह से समझ जा सकता है कि यदि एक परिवार के पांच लोग किसी अवसर पर ५०० से ७०० किमी की यात्रा रेल से करना चाहते हैं तो सामान्य किराये में वे रेलवे को ही प्राथमिकता दिया करते थे पर सर्ज प्राइसिंग लागू होने के बाद उनका यह किराया निजी टैक्सी लेकर जाने से भी मंहगा पड़ जाता है जिसमें स्टेशन तक आने जाने और सामान उठाने आदि के खर्चे भी लगते हैं पर अपनी बुक की हुई टैक्सी से जहाँ यात्रा आसानी घर से घर तक की जा सकती है वहीं अपने सामान के बारे में भी अधिक चिंता नहीं करनी पड़ती है. इस तरह से एक बार यात्रियों का यह समूह यदि रेलवे से अलग होकर इस तरह की यात्राओं का आदी जो जाता है तो रेलवे के लिए उन्हें दोबारा अपने से जोड़ पाना भी आसान नहीं होने वाला है क्योंकि रेलवे की तरफ से जब तक इन किरायों को दोबारा तर्क संगत करने के बारे में सोचा जायेगा तब तक राजमार्गों पर दबाव बढ़ ही जाने वाला है. इससे जहाँ एक तरफ रेलवे को नुकसान होना है वहीं देश के पर्यवरण को भी बहुत नुकसान होने वाला है क्योंकि हज़ारों यात्रियों को एक साथ सफर पर ले जाने वाली रेल के यात्री भी सड़क मार्गों पर भीड़ बढ़ाते हुए नज़र आने वाले हैं जिससे पहले से ही दबाव को झेल रहे मार्गो की हालत और भी ख़राब ही होने वाली है.
                                        अच्छा हो कि रेलवे अपनी इस नीति पर पुनर्विचार करे और आने वाले समय में हर ट्रेन में सर्ज प्राइसिंग लागू करने के स्थान पर केवल विशेष श्रेणियों की नयी ट्रेनों का सञ्चालन करे और आम यात्रियों से अनावश्यक रूप से खास किराया वसूलने और अपने घाटे को कम करने के तरीके से बच सके. यदि रेलवे यात्रियों को बहुत अच्छी सुविधाएँ देने में सफल होता है तो वह यात्रियों से तर्क संगत रूप में किराया लेने का हक़दार भी है पर जिस तरह से केवल आंकड़ों के हेरफेर से आमदनी को बढाए जाने की कोशिशें की जा रही है वे लंबे समय में रेलवे के आर्थिक हितों पर भी चोट करने वाली ही साबित होने वाली है. रेलवे इस बात के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है कि वह अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयासरत रहे पर उसे यह भी ध्यान में रखना होगा कि रेलवे पूरे देश की रगों में दौड़ते हुए खून की तरह है जिससे सभी को जीवन मिलता है कहीं ऐसा न हो कि आमदनी बढ़ाने के चक्कर में रेलवे आम लोगों से बहुत दूर चली जाये और आने वाले समय में इसे फिर से पटरी पर लौटाना कठिन साबित हो जाये. आज जब खुद पीएम देश में बुलेट ट्रेन चलाये जाने के लिए बहुत गंभीर हैं तो रेलवे के बाकी हिस्से को अपने दम पर प्रचालन के योग्य बनाये रखना भी अपने आप में बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी ही साबित होने वाली है.       
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

बुधवार, 23 नवंबर 2016

नोट बंदी जनता और जन-प्रतिनिधि

                                                   ८ नवम्बर की रात हुई घोषणा के बाद जिस तरह से देश में आम लोगों की समस्याओं में दिन प्रतिदिन बढ़ोत्तरी ही होती जा रही है उससे यही लगता है कि यह मामला अभी बहुत लंबा खिंच सकता है क्योंकि बैंकों के पास जिस संख्या में नए नोट होने चाहिए थे वह उसके कहीं से भी बराबर तो क्या चौथाई हिस्से तक भी नहीं पहुंच पा रहे हैं जिसका मुख्य कारण नए नोटों की छपाई होना भी है क्योंकि पूरी क्षमता से छापने के बाद भी इस स्थिति से निपटने और देश की ८६% करेंसी को बदलने में इस रफ़्तार से अभी भी दो महीने लग सकते हैं. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर सरकार और देश के राजनैतिक तंत्र के पास क्या विकल्प शेष हैं जिनको अपनाकर इस समस्या की तीव्रता को कुछ कम किया जा सकता है. इस तरह की स्थिति में संसद के शीत कालीन सत्र में भी कोई काम नहीं हो पा रहा है क्योंकि सत्ता पक्ष और विपक्ष अपनी अपनी स्थितियों में डटे रहकर हर तरह का राजनैतिक लाभ उठाने की मंशा पाले हुए हैं. बिना ठोस तैयारी के जिस तरह से आनन् फानन में यह कदम उठाया गया उससे इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि भाजपा ने इस मामले का लाभ यूपी चुनावों में उठाने के मकसद से ऐसा किया वहीं आम लोगों की समस्याओं को उठाकर विपक्ष भी सरकार पर हर तरह से हमलावर हो रहा है जिसका देश या देश की जनता को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है.
                                          ऐसी स्थिति में संसद के शीतकालीन सत्र और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चल रहे सत्रों को पूरी तरह से स्थगित किया जाना चाहिए तथा जिन राज्यों में ये सत्र शुरू होने हैं वहां पर इनको आगे बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि देश की जनता के लिए संसद और विधानसभाओं में होने वाले हंगामे से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आम लोगों को देश के नेता इस विपरीत परिस्थिति में किस तरह से मदद पहुंचा सकते हैं. भले ही इस बात को स्वीकार न किया जाये पर ज़मीनी हकीकत को देखा जाये तो देश में आर्थिक आपातकाल जैसी स्थिति तो चल ही रही है लोगों के खातों में पैसा है पर बैंकों के पास भुगतान करने के लिए धन की व्यवस्था नहीं है ऐसी स्थिति में अब जनता और बैंकों के पास कितने विकल्प शेष बचते हैं ? देश के संविधान ने माननीयों को बहुत सारी सुविधाएँ दे रखी हैं तो आज की परिस्थितियों के अनुसार जब जनता को व्यवस्था की आवश्यकता है तो इन माननीयों को संसद और विधान सभाओं के स्थान पर बैंकों और डाकघरों के बाहर लाइन में खडी जनता के साथ दिखाई देना चाहिए. देश में ऐसा संकट पहली बार है जब आर्थिक व्यवस्था करीब करीब चरमरा चुकी है और जनता के पास बेहतर भविष्य के लिए इसका समर्थन करने के अतिरिक्त कोई चारा भी नहीं है तो देश के राजनैतिक तंत्र को क्या जनता की मदद के लिए सड़कों पर नहीं होना चाहिए ? हमारे माननीय सदैव ही अपने को किसी और प्रजाति का मान लेते हैं जिनको जनता से जुड़े हुए सरोकारों से कोई ख़ास मतलब नहीं होता है जिससे जनता अपने को ठग हुआ महसूस करती है.
                                          सभी सांसदों और विधायकों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे अपने क्षेत्र के बैंक और डाकघरों का दौरा करें तथा स्वयं या अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से जनता की समस्याओं को सुलझाने की कोशिशें भी करें. यदि हज़ारों की संख्या में माननीय अपने क्षेत्रों में निकल पड़ेंगें तो बैंकों, डाकघरों और पुलिस प्रशासन का काम आसान ही होने वाला है क्योंकि दिल्ली और मुम्बई से जारी होने वाले सरकार और रिज़र्व बैंक के निर्देशों को बैंकों तक पहुँचने में जो समय लग रहा है वह भी जनता की परेशानियों को बढ़ाने वाला ही है. समय चाहे जो भी लगे पर जनता के लिए बैंक और डाकघरों के बाहर सुचारू रूप से टोकन देने की व्यवस्था की जानी चाहिए जो सभी राजनैतिक दलों के द्वारा सहयोग से की जाये क्योंकि सबसे बड़ा सवाल यह है कि वोट मांगने के समय फैले हुए हाथ आज किसानों के खेतों तक बीज और खाद पहुंचाने के लिए सामने क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं ? जनता को आम जन प्रतिनिधि से वैसे भी कोई विशेष काम या उम्मीद नहीं होती है तो कम से कम इस आर्थिक विपत्ति में उनके खेतों तक बीज पहुँच जाये तो देश का भला हो सकता है पर क्या देश का राजनैतिक तंत्र अपनी झूठी शान से बाहर निकल कर जनता के लिए इस तरह से काम करने के लिए मानसिक रूप से तैयार भी है ? क्या वह जनता के उन उलाहनों को सुनने की शक्ति रखता है जो लाइन में खड़े होकर परेशानी झेलते हुए उसकी तरफ से लगातार दिए जा रहे हैं ? देश में ऐसा कोई कानून ही नहीं है जिसके चलते सांसदों और विधायकों के लिए यह आवश्यक कर दिया जाए कि अपने क्षेत्र के कम से कम १०० बैंक और डाकघरों से उपस्थित रहने के प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के बाद ही उनको सदन के अगले सत्र में भाग लेने की अनुमति मिल पायेगी. यदि ऐसा कर दिया जाए तो आने वाले समय में विभिन्न समस्याओं से निपटने के लिए इस प्रमाण पत्र पर जनता की संस्तुति भी ली जाये जिससे हमारे माननीय कुछ और ज़िम्मेदार हो सकें.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...