मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

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शनिवार, 6 जून 2020

बढ़ता संक्रमण और नागरिकों के कर्तव्य

                                                       देश विश्व स्वाथ्य संगठन के निर्देशों के अनुरूप ७८ दिनों का लॉक डाउन ८ जून के बाद से चरणबद्ध तरीके से अनलॉक होना शुरू होने वाला है इसके पहले ही १ जून से बहुत सारे राज्यों ने आने यहाँ विभिन्न तरह की गतिविधियों को शुरू कर दिया है. यह सही है कि लॉक डाउन के साथ जीने की एक नई विधा आम नागरिकों के सामने आई है और आने वाले समय में जब तक देश को इस वायरस से निपटने का कारगर उपाय नहीं मिल जाता है हम सभी को कुछ प्रतिबंधों और अपने आचरण से इस बीमारी के संक्रमण को रोकने की दिशा में काम करना होगा. लॉक डाउन को लेकर राजनैतिक बहस चाहे जिस भी स्तर पर हो पर इससे होने वाले लाभ और हानियों के बारे में आम जनता को सोचना ही होगा क्योंकि अस्पतालों में बढ़ती भीड़ में राजनेताओं को कोई परेशानी नहीं होने वाली है सिर्फ आम जनता के लिए ही वहां पहुंचना और सुविधाएँ ले पाना हमेशा की तरह बड़ी चुनौती बनने वाला है.
                          सरकार ने लॉक डाउन के माध्यम से देश को एक हद तक कोरोना के संक्रमण के पीक पर पहुँचने पर उससे लड़ने के लिए तैयार करने का काम ही किया है. अब जब हम लोग इससे जुडी सावधानियों के साथ जीना सीख चुके हैं तो इस बात पर एक बार फिर से विचार करने की आवश्यकता है कि हमें अब यह अपने जीवन का हिस्सा बनाना होगा क्योंकि जब तक बीमारी है तब तक इससे बचने के लिए सभी को आवश्यक सावधानियों पर ध्यान देना ही होगा। अब अपने को इस बीमारी से बचाने की ज़िम्मेदारी एक तरह से हम नागरिकों की ही है. सरकार हर जगह ध्यान नहीं दे सकती है इसलिए खुद एवं अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए अब समय समय पर जारी होने वाले निर्देशों को मानना हम लोगों पर ही है. इन उपायों पर ध्यान रखकर ही हम अपने को सुरक्षित रखते हुए पूरे समाज को बीमारी से मुक्त रख सकते हैं.
                         सबसे पहले तो यही ध्यान रखना होगा कि १० वर्ष से कम के बच्चे और ६५ से ऊपर के बुजुर्ग के साथ गर्भवती महिलाओं के बाहर निकलने पर हम लोग स्वतः ही प्रतिबन्ध लगाएं जिससे हमारे परिवार का यह हिस्सा सुरक्षित रह सके. जो लोग स्वस्थ हैं वे भी बहुत आवश्यक कार्यों से ही बाहर निकले और काम करने वाले महिला पुरुष अपने कार्यस्थल पर पूरी तरह से सरकार की सूची के अनुरूप ही अपने बचाव को सुनिश्चित करें। ऐसी किसी भी परिस्थिति में जब हमारा बाहर निकलना आवश्यक हो तो अपने काम को समाप्त कर जल्दी से वापस अपने घरों में आ जाना चाहिए क्योंकि अभी जिस तरह से समुदाय में संक्रमण फैलना शुरू हुआ है तो कोई भी संक्रमित व्यक्ति हमारे संपर्क में आ सकता है जिसमें बीमारी के कोई लक्षण तो न हों पर वह संक्रमण का कैरियर हो और इस संक्रमित व्यक्ति से यह बीमारी हमारे घर तक भी आ सकती है. ऐसी परिस्थिति में हम सभी को एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का परिचय देना होगा और बीमारी से खुद को बचाते हुए इसके प्रसार को रोकने में अपना योगदान देना ही होगा।
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सोमवार, 25 मई 2020

कोरोना - केंद्र राज्य समन्वय

                                               मार्च से शुरू हुए लॉक डाउन के साथ ही देश में एक अलग तरह की उठापटक दिखाई दे रही है आज जब पूरे देश को मिलकर इस महामारी के सामने खड़े होने की आवश्यकता है तो देश के राजनैतिक दल और उनके शीर्ष नेता एक दुसरे पर आरोप लगाने में व्यस्त दिखाई दे रहे हैं. ऐसा नहीं है कि केंद्र ने इस बारे में नीतियां नहीं बनायी और राज्यों ने उन पर अमल नहीं किया पर केंद्र और राज्यों में सत्ता तथा विपक्ष से जनता ऐसे कठिन समय में जिस गंभीरता की आशा कर रही थी उसमें देश के सभी राजनैतिक दल और नेता पूरी तरह से फेल दिखायी दे रहे हैं. देश की जनता अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इन नेताओं के साथ अधिकारियों पर खर्च करती है उसके बाद भी कठिन समय में सबसे अधिक जनता को ही सहना पड़ता है.
                               पहले जोन निर्धारण को लेकर अव्यवहारिक तरीके से केंद्र का दखल रहा जिससे कई ऐसे जिले भी केवल एक मरीज होने के बाद भी ऐसे माना गया जैसे पूरे ज़िले में ही कोरोना फ़ैल गया हो इसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यह हुआ कि हमारे मेडिकल, पुलिस और अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े विभागों पर अनावश्यक रूप से दबाव बना जबकि उनको केवल कुछ स्थानों पर ही अपना ध्यान केंद्रित कर अपने स्टाफ को लम्बे समय तक काम करने के लिए तैयार करने की आवश्यकता थी. आज इस क्षेत्र के सभी लोग कोरोना की लड़ाई में थके से लगते हैं जबकि देश में संक्रमण बढ़ने के साथ अब अधिक सतर्कता की आवश्यकता है. केंद्र राज्य में वार्तालाप शून्य होने के कारण आज देश के आर्थिक प्रगति में सबसे बड़ा योगदान देने वाला मजदूर सड़कों पर है और अभी भी उनको मिलने वाली सहायता उनकी संख्या के हिसाब से बहुत कम ही है.
                               लॉक डाउन जिस तरह से राज्यों को विश्वास में लिए बिना किया गया आज उसका खामियाज़ा पूरा देश भुगत रहा है. यदि मार्च में संक्रमण के स्तर के कम रहते ही मजदूरों और अन्य कामों से अपने घरों से बाहर निकले लोगों को वापस जाने के लिए कुछ समय दिया जाता तो आज राज्यों क्या जनपदों और तहसीलों तक संक्रमण रोकने की जो लड़ाई लड़ी जा रही है उससे लॉक डाउन में ही निपट लिया गया होता और संक्रमण को अच्छी तरह से रोकने में मजबूती से रोका भी जा सकता था. आज रेलवे की जो हालत है वह भी ख़राब समन्वय का ही नतीजा है और आज से शुरू होने वाली हवाई यात्रा को भी जिस तरह से एक नियम में नहीं बांधा जा सका है उससे इन यात्रियों के लिए समस्याएं और बढ़ने ही वाली हैं. आज के युग में भी समन्वय की इतनी कमी आखिर क्यों है क्या राज्य अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं या केंद्र सरकार खुद ही सब कुछ करने में विश्वास रखती है ? राज्यों के मुख्य सचिवों और पुलिस महानिदेशकों के साथ सीधी बैठक कर क्या पीएम मोदी राज्यों की सत्ता को किनारे करने की कोशिशें नहीं कर रहे हैं ?अब समय है कि केंद्र को अपने स्तर से विश्वास बहाली के लिए काम शुरू करना चाहिए जिससे आपस में लड़ने के स्थान पर कोरोना से प्रभावी लड़ाई लड़ी जा सके.  
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शनिवार, 23 मई 2020

भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था

                                                                        कोरोना के कारण पूरे विश्व में जिस तरह का माहौल बना हुआ है उससे निपटने के लिए सभी देश अपनी अपनी रणनीति बनाने में लगे हुए हैं. मार्च महीने में जिस तरह से देश में सम्पूर्ण लॉक डाउन किया गया वह उस समय उपलब्ध विकल्पों में सबसे अच्छा था और भारत सरकार ने भी उस पर अमल करने का प्रयास किया चूंकि उस समय उस बात पर चर्चा करना उचित नहीं था तो अब इस बात पर विचार किया जाना आवश्यक है कि हमारी नीतियों में आखिर कौन सी कमी रह गयी जिसको हम समय रहते आसानी से ठीक कर सकते थे. पीएम मोदी ने जिस तरह सिर्फ ४ घंटे की नोटिस पर लॉक डाउन की घोषणा की उससे बचा जा सकता था क्योंकि होली के बाद का माहौल था और सरकार घर गए मजदूरों को अपने घरों से अपने काम की जगहों पर जाने से रोकने का आह्वाहन कर सकती थी पर उस समय तक सरकार इसकी गंभीरता को समझ ही नहीं रही थी. साथ ही मजदूरों को अपने घरों तक पहुँचाने के लिए रेल और बसों को बंद नहीं करना चाहिए था जिसके कारण आज भी देश के एक हिस्से में काम करने वाले श्रमिक अपने घरों को लौटने के लिए संघर्ष करते दिखाई दे रहे हैं.
                              अब सरकार को पिछली गलतियों को सुधारते हुए सिर्फ बड़े उद्योगों के बारे में ही न सोचते हुए ग्रामीण भारत को मज़बूत करना होगा क्योंकि आज भी भारत का बड़ा हिस्सा या तो गांवों में रहता है या शहरों में काम न होने के चलते अब वापस गांवों की तरफ जा चुका है. ग्रामीण भारत में आज भी बहुत सारी समस्याएं हैं और सरकार मनरेगा को विस्तार देते हुए अधिकांश ग्रामीणों को इस तरह से काम दे सकती है. कृषि लागत को कम करने के लिए सरकार एक निश्चित संख्या में छोटे और मंझोले किसानों के लिए मनरेगा के द्वार खोल सकती है जिससे मजदूरों को आगामी फसलों के समय काम मिल सके और किसानों को भी कुछ राहत मिल सके. इसके लिए अभी से एक नियम बनाकर लाभार्थी किसानों का चयन शुरू किया जाना चाहिए या फिर भूलेखों के आधार पर उनको या मनरेगा के मजदूरों को धन स्थानांतरित करने के बारे में सोचना चाहिए। इस तरह से जब ग्रामीण भारत के पास उसके गांवों में ही काम उपलब्ध होगा तो उसकी क्रय शक्ति भी बढ़ाई जा सकेगी जो अंत में देश की आर्थिक प्रगति का चक्का फिर से घुमाने में बहुत सहायक हो सकती है.
                                बरसात शुरू होते ही कई जगहों पर मनरेगा के तहत काम करवाने असुविधा होने लगती है तो इन्हीं मजदूरों के लिए एक नीति बनाकर किसानों और मजदूरों की एक साथ मदद की जा सकती है. किसान के सामने इस समय अपनी लागत को एक सीमा में रखने की चुनौती है तो मजदूरों के सामने काम की. यदि सरकार इस तरह से कोई प्रयास करे तो देश के दो बड़े क्षेत्रों की एक साथ मदद की जा सकती है और गांवों की आर्थिक स्थिति को और बिगड़ने से संभाला भी जा सकता है. फिलहाल बरसात शुरू होने से पहले गांवों में तालाबों और मार्गों को मजबूत किये जाने के काम में तेज़ी भी लाई जा सकती है जिससे सरकार को आमलोगों तक राशन पहुँचाने के लिए अपनी पूरी मशीनरी का उपयोग करने से बचाया जा सके और साथ ही इन मजदूरों के काम करने के दिनों के लिए काम के बदले अनाज योजना को भी शुरू किया जा सकता है जिससे एक साथ कई क्षेत्रों की मदद की जा सकती है. अब समय है कि देश को समग्र रूप से सोचना ही होगा तभी इस वैश्विक संकट के साथ वैश्विक मंदी से निपटा जा सकेगा।    

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शुक्रवार, 22 मई 2020

छिछली राजनीति

                                           कांग्रेस भाजपा के बीच शुरू हुए बस विवाद ने अब अगले चरण पर स्थान पा लिया लगता है क्योंकि देश में जो कुछ भी सामान्य प्रशासनिक कार्य किये जाते हैं अभी तक उनको गोपनीय ही रखा जाता था पर यूपी रोडवेज की तरफ से राजस्थान को किये गए भुगतान को लेकर जिस तरह भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा ने एक ट्वीट किया तो उससे यही लगता है कि अब राज्यों के सामान्य प्रशासनिक कार्यों तक पार्टी के प्रवक्ताओं की पहुँच होने लगी है. यह भी हो सकता है कि यह पत्र गोपनीय न भी हो पर सामान्य पत्राचार का उपयोग इस तरह से एक दूसरे पर आरोप लगाने में किया जाने लगे तो देश की राजनीति का स्तर समझा जा सकता है. इस पत्र के सामने आने के बाद राजस्थान सरकार ने भी यूपी सरकार को पूरा बिल भेज दिया है और भुगतान करने की मांग भी की है जिससे मजदूरों की समस्याओं के स्थान पर इन नेताओं की लड़ाई का एक और रूप सामने आने वाला है.
                               किसी भी राज्य में ऐसी आपातकालीन परिस्थिति में स्थानीय प्रशासन से सहयोग के लिए देश का दूसरा राज्य अपने स्तर से पत्राचार करता है और उसमें बहुत सारी बातें भी होती हैं पर इस पत्र को प्रियंका गाँधी पर हमला करने के लिए इस्तेमाल किये जाने से किसको राजनैतिक लाभ होने वाला है ? संबित पात्रा ने कहीं पर उस पत्र का ज़िक्र नहीं किया है जो यूपी सरकार ने राजस्थान सरकार को इस सम्बन्ध में लिखा था उसमें संभवतः यूपी सरकार ने भुगतान किये जाने की बात की होगी जिसको ज्ञानी प्रवक्ता संबित द्वारा जानबूझकर छिपाया गया है ? राज्यों के सामान्य काम काज में किसी भी राजनैतिक दल का इस तरह का दखल सामान्य नहीं कहा जा सकता है और यह विचारणीय भी है. कई बार राज्य अपनी परिस्थितियों पर विचार कर एक बीच का रास्ता निकालने के लिए कई बार पत्राचार भी करते हैं पर क्या उसका राजनैतिक लाभ किसी भी दल द्वारा उठाया जाना चाहिए ?
                                 इस मामले में सभवतः जो धनराशि डीज़ल पर खर्च हुई होगी उसके बिल का भुगतान किया गया होगा जबकि राजस्थान सरकार का यह कहना है कि बसें कम पड़ने पर राजस्थान रोडवेज ने छात्रों को उनके गंतव्य तक पहुँचाया जिसका भुगतान अभी तक नहीं किया गया है ? जब ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाले केंद्र की सरकार मज़दूरों को उनके घरों तक रेल द्वारा निशुल्क नहीं भेज सकती तो हिली हुई आर्थिक परिस्थिति में राज्य सरकारों से किसी भी तरह की आर्थिक उदारता की उम्मीद आखिर कैसे की जा सकती है ? लंबी चौड़ी बातें करने वाले दल और नेता अपने यहाँ की परिस्थिति पर विचार नहीं करते हैं और किसी भी बात पर राजनीति शुरू कर देते हैं जिससे केवल जनता की परेशानियां ही बढ़ती हैं. अच्छा हो कि सभी राजनैतिक दल और उनकी सरकारें इस तरह के मामलों पर राजनैतिक लाभ लेने की कोशिशों से दूर ही रहें और जनता को सही तरह से सहायता करने हेतु नीतियों का क्रियान्वयन करने पर ध्यान दें.
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शनिवार, 16 मई 2020

गांवों की सतर्कता

                                                 देश भर के बड़े शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों से अपने घरों की तरफ जाने वाले मजदूरों के लिए अब एक नई तरह की समस्या सामने आ रही है जब वे किसी भी तरह से लम्बी परेशानियाँ झेलकर अपने खुद के गाँव में पहुँच रहे हैं तो वहां इन लौटते मजदूरों से कोरोना फैलने के भ्रम और अफवाह के चलते बहुत जगहों पर उन्हें अपने घरों तक जाने नहीं दिया जा रहा है. यह एक ऐसी समस्या है जिससे केवल सही जानकारी के द्वारा ही निपटा जा सकता है. अभी तक जो कुछ भी जानकारियां देश में थीं उनका भी दुरूपयोग ही किया जा रहा है. देश की बड़ी आबादी ने पहले तो इस संकट को समझा ही नहीं फिर जब समझने की कोशिश की तो अब ज़्यादा सख्ती करने के चक्कर में अधिकांश लोग अपने लोगों को ही गाँव में आसानी से स्वीकार नहीं कर रहे हैं जिससे पुलिस का काम अनावश्यक रूप से बढ़ता जा रहा है.
                                       एक तरफ जहाँ ग्रामीण भारत का बड़ा हिस्से जिस तरह से इस बीमारी के प्रति सचेत दिखाई दे रहा है वहीं अभी भी कुछ जगहों से ऐसी ख़बरें भी सामने आ रही हैं कि लोग खुद ही भीड़ के रूप में इधर उधर घूम रहे हैं और खुद के साथ अन्य लोगों को भी संक्रमण के खतरे में डाल रहे हैं. आज की परिस्थिति में सभी को आवश्यक कार्यों के लिए ही आवश्यक दिशा निर्देशों का पालन करते हुए घरों से निकलना चाहिए जिससे समाज में संक्रमण को फैलने से रोका जा सके. ग्रामीण भारत में आज आवश्यकता है कि सभी लोग इस बात के लिए जागरूक किये जाएँ जिससे उनको खतरों का आभास तो हो ही साथ ही वे अपने लोगों को भी सही तरीके से घरों तक जाने में बाधा भी न बनें. यह सही है कि शहरों के मुक़ाबले अधिक स्थान में कम लोगों के रहने के चलते भी गाँवों में संक्रमण का फैलाव थोड़ा कम स्तर पर होता है पर संक्रमण फैलने पर समस्याएं गांवों में भी उसी तरह से सामने आती हैं.
                   इस परिस्थिति से निपटने एक लिए अब समाज को सरकार के कोरोना से बचाव के नियमों का कड़ाई से अनुपालन सीखना होगा जिसमें खुद को संक्रमण से बचाने के उपायों के साथ ही क़्वारण्टीन किये गए लोगों के साथ किये जाने वाले व्यवहार पर भी ध्यान देना होगा। प्रधान, ग्राम पंचायत सदस्यों, ग्रामीण स्वास्थ कार्यकर्ताओं, चौकीदार और ग्राम विकास विभाग के कर्मचारियों को मिलकर गांवों में नज़र रखने के लिए स्थानीय स्तर पर समितियों का गठन किया जाना चाहिए जिससे वहां आने वाले मजदूरों को सही ढंग से १४ दिनों तक निगरानी में रखा जा सके और आम लोगों के दिलों में उठने वाले सवालों के भी सही तरह से जवाब दिए जा सकें. घर के किसी एक सदस्य को ही आवश्यक कार्यों से बाहर निकलने की सीमित अनुमति होनी चाहिए और उसको भी आम लोगों से दूर रहने की सही जानकारी दी जानी चाहिए। इस तरह से कुछ मौलिक सवालों के बारे में लोगों को सही उत्तर देकर इस समस्या से सही ढंग से निपटा जा सकता है और पूरे ग्रामीण परिवेश में करोनके संभावित संक्रमण को रोकने हेतु  प्रभावी कदम भी उठाये जा सकते है.  
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गुरुवार, 14 मई 2020

मजदूरों की घर वापसी का यथार्थ

                                         कोरोना संकट के चलते देश में मजदूरों को लेकर जिस तरह की अफरा तफरी दिखाई दे रही है क्या उससे कुछ बेहतर तरीके से निपटा जा सकता था आज यह सवाल हर किसी को अपने आप से ही पूछने की आवश्यकता है. देश की आज़ादी के बाद से पहली बार इतनी बड़ी संख्या में दूसरे राज्यों में काम करने वाले मजदूर जिस तरह से देश के स्वर्णिम विकास की खोखली गाथा के साथ बनाये गए राष्ट्रीय राजमागों के हर हिस्से पर आत्मनिर्भरता दिखाते हुए अपने घरों की तरफ बढ़ते ही जा रहे हैं क्या उसे और अच्छी तरह से नहीं किया जा सकता था ? यहाँ सवाल केंद्र और राज्यों की सरकारों की आलोचनाओं का नहीं बल्कि उन गरीब लोगों का है जो सिर्फ बेहतर जीवन और खाने पीने लायक कमा लेने की जुगत में ही अपने घरों से सैकड़ों हज़ारों किमी दूर पहुँच गए थे. आखिर वे कौन से कारण थे जिनको केंद्र ने पूरी तरह अनदेखा किया और तीसरे लॉकडाउन के बाद इन मजदूरों ने अपने घरों की तरफ बिना कुछ विचारे ही कूच कर दिया ? विकसित देशों की कतार में खड़े होने का हमारा सपना किस तरह से चूर चूर होता दिखा आज इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है ?
                                         आज जब महानगरों और औद्योगिक क्षेत्रों में कोरोना ने अपना रूप दिखाना शुरू ही किया है तो उस परिस्थिति में इन प्रवासी मजदूरों को अनमने ढंग से कुछ रेलगाड़ियां चलाकर उनके राज्यों और सम्बंधित जिलों में भेजने की आधी अधूरी कोशिश की जा चुकी है वह भी अपने आप में बड़ा संकट बन सकती है. केंद्र सरकार ने इस मामले में बेहद हल्का रुख ही अपनाया क्योंकि यदि दो लॉक डाउन के बाद इन मजदूरों को घर भेजने की स्थिति सामने आ सकती थी तो इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने किस स्तर पर क्या प्रयास किये आज किसी को भी इस बारे में कोई जानकारी नहीं है. राज्यों में जिन जगहों पर ये मजदूर थे तो वे वहां पर किसी कम्पनी, ठेकेदार आदि के माध्यम से ही पहुंचे थे तो इन लोगों की शुरुवाती ४० दिनों में कोई सूची बनाने का कार्य भी आसानी से किया जा सकता था और सीमित संख्या में रेलगाड़ियां चलाकर इनको चरणबद्ध तरीके से इनके घरों तक भेजने की व्यवस्था आसानी से भी की जा सकती थी पर देश के निर्माण में लगे इन मजदूरों की गिनती आज कोई भी अपने लोगों में नहीं करना चाहता है जिससे इनके और भी दुर्दशा हो रही है.
                                           अब भी समय है कि सरकार देश के विभिन्न हिस्सों में खाली खड़ी रैक्स को बड़े शहरों के स्थान पर कुछ सौ किमी के दायरे में ही चलाकार इन के पैरों में पड़ने वाले छालों पर तरस खाये। क्या ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना देखने वाला देश कुछ सौ करोड़ रूपये खर्च कर इन लोगों को आसानी से घरों तक सम्मानजनक रूप से भेजने की मूलभूत आवश्यकता को भी पूरा नहीं कर सकता ? यदि सरकार के पास आर्थिक तंगी है तो जनता इन ट्रेनों को चला सकती है केवल एक बार एक खाते का नंबर देने की आवश्यकता है और इन मजदूरों को घरों तक भेजने पर होने वाले खर्च के लिए आम लोग खुलकर मदद दे सकते हैं. भारत सरकार और रेल मंत्रालय को अविलम्ब यह उपाय करना चाहिए जिससे पूरे देश में गरीबों की इस मजबूरी और दुर्दशा को जल्दी से समाप्त किया जा सके.  
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शुक्रवार, 9 जून 2017

समग्र कृषि नीति की आवश्यकता

                                                                 म० प्र० और महाराष्ट्र में किसानों की तरफ से शुरू किया गया असहयोग आंदोलन मंदसौर में हिंसक होकर ५ परिवारों के लिए अँधेरे लेकर ही आया और अब इस पर सीधे आरोप प्रत्यारोपों के साथ, मीडिया और सोशल मीडिया पर सरकार समर्थक और विरोधी एक दूसरे को गलत साबित करने में लगे हुए हैं. जहाँ तक मंदसौर की बात है तो यह इलाका हर प्रकार से संपन्न और शांत ही माना जाता है और यहाँ से कभी भी किसी भी प्रकार के हिंसक आंदोलनों की लगातार होने वाली घटनाएं भी सामने नहीं आयी हैं तो आखिर ऐसा क्या हुआ कि किसान इतने उग्र हो गए और मामला पुलिस की तरफ से फायरिंग तक जा पहुंचा. सरकार का यह कहना भी उचित है कि शांति व्यवस्था और हाईवे पर यातायात सुचारु बनाये रखने के लिए ऐसा करना आवश्यक था पर उसकी तरफ से मामले को सही तरह से सम्भालने में किसी न किसी स्तर पर कोई चूक तो अवश्य ही हुई है जिसे उसे आज नहीं तो कल स्वीकारना ही होगा. सरकार को उस परिस्थितियों पर भी विचार करना होगा जिनके चलते इन दोनों राज्यों के किसानों ने एक तरह से खाद्य आपूर्ति रोकने की तरफ इतना बड़ा कदम बढ़ा दिया ? इस मामले में महाराष्ट्र सरकार ने अपनी तरफ से पहल करते हुए किसानों के सगठनों से बात की और कुछ अश्वासनों के साथ ठोस कार्यवाही करने की बात की जिसके बाद वहां का आंदोलन कुछ ठंडा पड़ा पर अभी भी वहां भी सभी किसान इस समाधान से खुश नहीं है जिसके लिए फडणवीस सरकार को और अधिक संवेदनशील होकर काम करना होगा. इस मुद्दे को शिवराज सरकार ने या तो हलके में लिया या फिर उन्हें वास्तविक स्थिति का अंदाज़ा ही नहीं था कि मामला कहाँ तक पहुँच गया है जिस कारण उससे इतनी बड़ी चूक हुई.
                                       निश्चित तौर पर ऐसे मामलों में विपक्ष के पास करने के लिए कुछ खास नहीं होता है अलबत्ता वह पीड़ितों तक सरकार से पहले पहुंचकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिशें अवश्य ही करता है. देश में केंद और राज्यों की सत्ता दलीय व्यवस्था में बदलती रहती है पर कहीं से भी उसमें वो गुणात्मक परिवर्तन दिखाई नहीं देता है जो देश की आवश्यकताओं को बिना किसी राजनीति के समझने और उसे पूरा करने के लिए आगे बढ़ने की कोशिश में लगा हुआ दिखाई दे. विभिन्न कारणों से देश के हर राज्य का किसान बदहाल है पर उसके लिए स्थायी समाधान खोजने के स्थान पर तात्कालिक उपायों से समस्या को अस्थायी रूप से टालने पर ही सभी नेताओं का ध्यान रहा करता है जिससे कुछ समय बाद समस्या और भी विकराल स्वरुप में सामने आती है. आज कृषि को देश की आवश्यकताओं के अनुरूप करने और किसानों को पूरी तरह से जागरूक करने की आवश्यकता है क्योंकि प्राचीन काल से चली आ रही मिश्रित और परंपरागत खेती को छोड़कर किसान आज नकदी वाली फसलों पर अधिक ध्यान देने लगा है जिससे मानसून पर आधारित क्षेत्र के किसानों के लिए लगातार समस्या ही बनी रहती है क्योंकि कम पैदावर होने उसके पास लागत निकालना एक बड़ी समस्या होती है और मौसम के साथ देने पर अधिक उत्पादन भी कम मूल्य के कारण उसको लागत नहीं दे पाता है. क्या इस समस्या से निपटने के लिए अब एक बार देश के किसानों को मिश्रित खेती के लिए प्रोत्साहित करने की आवश्यकता नहीं है जिससे वे स्थानीय खपत के अनुरूप फसलों का उत्पादन कर सकें और अपने साथ देश के विकास में भी उचित योगदान दे सकें.
                                     आज भी हमारे देश में किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यही है कि उन्हें पारिवारिक रूप से विरासत में मिली खेती को उन्नत करने और आवश्यकता अनुरूप मिश्रित खेती करने के लाभ के बारे में जागरूक नहीं किया जाता है जिससे वह आसानी से एक नकदी फसल पर निर्भर होकर काम करता है. किसी भी तरह की विपरीत परिस्थिति में उसके पास अपने क़र्ज़ चुकाने से लगाकर कृषि लागत पाने तक की समस्या एकदम से सामने आ जाती है जिसका उसे कोई समाधान दिखाई नहीं देता है. इसके लिए तात्कालिक उपायों पर विचार करने के स्थान पर देश के कुछ राज्यों के अधिक समस्याग्रस्त जिलों में किसानों के लिए इस तरह की निगरानी वाली खेती करने का पायलट प्रोजेक्ट चला कर देखना चाहिए और उसके परिणामों पर विचार कर उसे देश के किसानों के सामने विकल्प के रूप में रखना और अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. इस तरह से संभव है कि किसानों की समस्या का कोई स्थायी समाधान सामने आये. देश की सरकार अर्थ व्यवस्था को सुधारने की कितनी भी कोशिश क्यों न कर ले पर मानसून में कमी की कोई भी खबर सत्ता प्रतिष्ठान के चेहरे की रंगत को उड़ाने के लिए काफी होती है. सामान्य मानसून जिस तरह से पूरे देश के लिए समृद्धि लेकर आता है और किसानों को भी मानसून के साथ झूमने और अपनी प्रगति के बारे में जागरूक करने पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर समग्र विचार करने की आवश्यकता है.
                                        आज देश का लगभग ९५% हिस्सा आकाशवाणी के प्रसारण क्षेत्र में आता है तो इसके सभी चॅनेल्स के माध्यम से नियमित तौर पर सुबह और शाम स्थनीय कृषि विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों की तरफ से मौसम पर विचार करने के बाद फसलों के अनुरूप सलाह दी जानी चाहिए जिससे किसानों को सही सलाह रोज़ ही मिल सके. किसान चॅनेल अपने अनुसार सही काम कर रहा है. खेत में पहुंचे हुए किसान के लिए रेडियो आसान होता है इसलिए संचार के इन माध्यमों का सदुपयोग करने किसानों को नियमित तौर पर जागरूक करने के बारे में सोचना चाहिए एक पूरा चॅनेल उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना समय पर सुबह शाम दी जाने वाली सलाह क्योंकि किसान चॅनेल दूसरे तरह से सहायता कर पा रहा है पर इसे अभी भी और अधिक दूर तक पहुँचाने की आवश्यकता है जिससे किसानों को खेती के इस अनदेखे दबाव से बचाया जा सके जो न चाहते हुए भी उन पर लगातार बना रहता है.      
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बुधवार, 27 जुलाई 2016

आधार, डीबीटी और योजनाएं

                                                                                    यूपीए-२ सरकार द्वारा देश में नागरिकों की सही पहचान करने और उन्हें अपने को साबित करने के लिए शुरू किये गए आधार कार्यक्रम ने कम समय में ही बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर ली है इसके साथ ही पात्रों को किसी भी तरह की सब्सिडी का भुगतान भी सीधे उनके खातों में करने के लिए डीबीटी योजना को भी शुरू किया गया था. इस सबमें एलपीजी सब्सिडी को प्रारम्भ में प्रायोगिक तौर पर देश के कुछ जिलों में शुरू किया गया था पर जिस उद्देश्य से इस योजना को शुरु किया गया था उस समय देश का सम्पूर्ण बैंकिंग और एलपीजी तंत्र पूरी तरह से अपने उपभोक्ताओं से जुड़ा हुआ नहीं था और कुछ नए काम के होने के चलते भी इसके अनुपालन में कमियां सामने आयीं जिन्हें दूर करने के लिए तत्कालीन सरकार ने निर्देश जारी किये और योजना की रफ़्तार को धीमा कर दिया. देखा जाये तो सरकारी योजनाओं में इस तरह की संभावनाएं टटोलने का मुख्य उद्देश्य ही भ्रष्टाचार को रोकना और सही लोगों तक आर्थिक सहायता को पहुँचाना ही था जिसका लाभ आज इसके नए स्वरुप में दिखाई भी देने लगा है और सरकार को सब्सिडी के क्षेत्र में काफी बचत भी हो रही है.
                            निश्चित तौर पर यह केंद्र सरकार की बड़ी उपलब्धि ही कही जा सकती है कि जनता के पैसा का सदुपयोग हो रहा है और जो धन बच रहा है उसके माध्यम से अब नयी योजनाओं और विकास पर ध्यान केंद्रित किये जाने कि बातें भी होने लगी हैं. बॉयोमेट्रिक सिस्टम को पीडीएस में लागू करने के बाद जिस तरह से हर पांचवे व्यक्ति के भौतिक सत्यापन में सफलता नहीं मिल पा रही है उसके बाद एक बार फिर से इस समस्या पर विचार किये जाने कि आवश्यकता है क्योंकि जब तक पात्रों को इस सुविधा का लाभ नहीं मिल पायेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में सरकार की मंशा पूरी नहीं हो सकती है. जिन लोगों के बॉयोमेट्रिक सत्यापन में समस्या आती है उन्हें उनके पंजीकृत मोबाइल पर आवश्यक रूप से सन्देश भेजे जाने के लिए भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था की जानी चाहिए क्योंकि गांवों में रहने वाले बुजुर्गों के लिए इस सिस्टम के काम न करने पर बहुत बड़ी समस्या भी उत्पन्न हो जाती है. आज देश में निचले स्तर तक भ्रष्टाचार का जो स्वरुप हो चुका है उस पर भी विचार किये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि पंचायती राज के सबसे निचले पायदान ग्राम सभाओं में मनरेगा को लेकर ही भ्रष्टाचार चरम पर फैला हुआ है.
                         इस तरह से घरेलू गैस से बचने वाले धन को लेकर सरकार की तरफ से जो आंकड़े पेश किये जा रहे हैं कैग ने उस पर भी भारी संदेह जारी किया है और यहाँ तक कह दिया है कि सरकार १२००० करोड़ रुपयों की बचत होने कि बात कर रही है जबकि वास्तव में यह केवल २००० करोड़ रूपये ही है और इसमें जो बचत दिखाई जा रही है वह तेल मूल्यों में कमी के कारण है न कि यह बचत डीबीटी के कारण हो रही है. अब कैग या सरकार में से कोई एक ही सही कह रहा है पर कैग को किसी आंकड़े को गलत पेश करने से कुछ भी नहीं हासिल होने वाला है जबकि सरकार इन जादुई और भ्रामक आंकड़ों के माध्यम से अपनी वित्तीय स्थिति को सुदृढ़ घोषित कर सकती है तथा यही आंकड़े उसके लिए चुनावों में एक बड़े मुद्दे के रूप में भी काम कर सकते हैं. राजनीति में विरोधियों को घेरने के लिए बहुत सारे मुद्दे सदैव ही उपलब्ध रहते हैं इसलिए सरकार को एक बार फिर से डीबीटी और आधार के संयोजन में होनी वाली समस्याओं पर गंभीरता से विचार करते हुए इनके निराकरण के बारे में भी सोचना चाहिए जिससे आम गरीबों को सही तरह से बिना परेशानी के ही सम्पूर्ण लाभ दिया जा सके.
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शनिवार, 19 मार्च 2016

छोटी बचत योजनाएं

                                                         अपनी पहले से घोषित मंशा के अनुरूप जाते हुए मोदी सरकार ने जिस तरह से डाकघर की लोकप्रिय छोई बचत योजनाओं की बयाज दरों में ०.६ से १.३ % तक की बड़ी कटौती की है उससे यही लगता है कि देश के छोटे बचतकर्ताओं को ध्यान में रखकर बनायीं गयी इन योजनाओं को भी समाप्त करने के लिए उसकी तरफ से गंभीर प्रयास शुरू कर दिए गए हैं. देश के अधिकांश क्षेत्रों में आज भी जिस तरह से छोटी बचत करने के इच्छुक लोगों के लिए डाकघर की ये बचत योजनएँ एक वरदान से कम नहीं हुआ करती हैं उस परिस्थिति में अब सरकार के ये प्रयास किसी भी तरह से आमलोगों के हितों में नहीं कहे जा सकते हैं. इन छोटी योजनाओं का माध्यम से भी सरकार के पास लम्बी अवधि में उपयोग करने के लिए बड़ी मात्रा में धन इकट्ठा हो जाया करता था जिसका उपयोग वह उच्च ब्याज दरों पर अन्य क्षेत्रों में लगाकर लाभ कमाने के लिए भी किया करती थी पर जब ये योजनाएं इस तरह से अपना आकर्षण ही खो देंगीं तो आने वाले समय में बैलेंस शीट पर इसका प्रभाव दिखाई देना अवश्यम्भावी भी है.
                                             मौजूदा दरें वित्त वर्ष २०१६-१७ के पहले दिन यानी १ अप्रैल से लागू होंगीं इन नई दरों के मुताबिक अगर किसी ने पीपीएफ में एक तिमाही के लिए १ लाख रुपये जमा किया है तो उसका सालना ब्याज ८१०० रुपये होगा जबकि पुरानी दरों से उसे ८७०० रुपये मिलता, यानी उसे सीधे-सीधे ६०० रुपये का घाटा होगा। इसी तरह किसान विकास पत्र में जमा किए गए १ लाख रुपये का ब्याज ८७०० रुपये से घट कर ७८०० रुपये रह जाएगा। सुकन्या समृद्धि योजना में जमा किया जाने वाला 1 लाख रुपये का ब्याज ९२०० रुपये से घट कर ८६०० रुपये रह जाएगा। बुजुर्गों ने अगर डाकघर स्कीम में १ लाख रुपये लगाया हो तो उन्हें ९३०० रुपये के ब्याज की जगह ८६०० रुपये मिलेंगे। देखने में यह धनराशि भले ही ६०० से लगाकर १३०० रूपये प्रतिवर्ष प्रति लाख की हो पर इससे उन लोगों पर बुरा प्रभाव पड़ने वाला है जो इन योजनाओं के माध्यम से किसी भी तरह से बचत करने की कोशिशें किया करते थे पर अब उनके पास विकल्प सीमित ही रहने वाले हैं जिसका सामाजिक असर भी अवश्य ही दिखाई देने वाला है.
                                           एक तरफ सरकार आम जनता से बचत योजनाओं में निवेश करने के लिए कहती हुई नज़र आती है पर साथ ही वह इन सरकारी योजनाओं पर इस तरह से कैंची भी चलाना चाहती है जिसका सीधे तौर पर निजी क्षेत्र के बैकों को ही लाभ मिलने वाला है क्योंकि रिज़र्व बैंक द्वारा सामान्य बचत खाते पर न्यूनतम ब्याज को ४% रखा गया है पर बैंकों को इसे अपने अनुसार बढाकर देने की छूट भी दे रखी है उससे आज सरकारी बैंकों में जहाँ औसतन ४% का ब्याज मिल रहा है वहीं निजी क्षेत्र के कुछ बैंक ६% तक ब्याज दे रहे हैं. सरकारी बैंकों के लिए ब्याज का निर्धारण सरकार के हाथों में है और निजी क्षेत्र का प्रबंधन यह निर्णय अपने स्तर पर ही ले सकता है जिससे भी पहले से ही अपने बड़े एनपीए से जूझ रहे सरकारी बैंकों पर और भी अधिक मार ही पड़ने वाली है. क्या मोदी सरकार सदियों पुराने कुछ भारतीय बैंकों को अब निजी क्षेत्र के बैंकों से मुक़ाबला करने लायक भी नहीं छोड़ना चाहती है क्योंकि जब दोनों क्षेत्रों के लिए काम करने के समान अवसर ही नहीं बचेंगें तो सरकारी बैंक कब तक शहरों में निजी बैंकों के सामने टिक पायेंगें यह भी कोई नहीं जानता है पर अपने एजेंडे को लागू करने के लिए अब डाकघर के साथ सरकारी बैंकों के लिए भी कड़ी चुनौती पेश करने वाली मोदी सरकार इनके भविष्य को समस्याग्रस्त करने में लगी हुई है.   
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सोमवार, 18 जनवरी 2016

देश का आर्थिक परिदृश्य

                                                                     देश में राजनैतिक कारणों से जहाँ वैश्विक आवश्यकता के अनुरूप बहुत सारे बड़े सुधारात्मक परिवर्तन करने के लिए मुख्य राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा के बीच रस्सा कशी के चलते रोड़े अटकते ही रहते हैं उसी परिस्थिति में आज चीन के चलते सामने आ रही वैश्विक मंदी के कारण देश पर भी उसका असर पड़ना शुरू हो चुका है. आज जिस तरह से पूरे विश्व में आर्थिक गतिविधियों में गिरावट देखी जा रही है और मई २०१४ में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सरकार की तरफ से आवश्यक आर्थिक सुधारों को लेकर जिस आशा और विश्वास का प्रदर्शन किया गया था आज वह उसमें कहीं से भी खरी उतरती नहीं दिख रही है. यह देश के लिए एक ऐसा समय है जिससे बच पाने का कोई रास्ता अभी दिखाई भी नहीं दे रहा है.जिन सुधारों के भरोसे सरकार देश की आर्थिक स्थिति को बदलना चाहती है आज इन सुधारों को लागू कर चुके देश भी गंभीर संकट से जूझ रहे हैं और इस तरह के सुधारों को ही भारत की उच्च आर्थिक प्रगति के लिए अंतिम नहीं माना जा सकता है क्योंकि घरेलू आर्थिक परिदृश्य के अनुरूप व्यवस्था को न ढालने का दुष्परिणाम भविष्य में देश को भुगतना ही पड़ेगा.
                    मूलतः कृषि पर आधारित भारतीय अर्थ व्यवस्था के लिए क्या विदेशों में अपनाये जा रहे किसी भी मॉडल से राहत लायी जा सकती है सबसे पहले इस पर गंभीर विचार आवश्यक है क्योंकि सरकार में चाहे कोई भी दल हो पर देश की आर्थिक संरचना से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है. भारत यदि २००८ की मंदी की चपेट में बुरी तरह से आने से बच गया था तो उसका मुख्य कारण हमारी मिश्रित अर्थव्यवस्था भी थी क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर से मांग में कमी आने की स्थिति में घरेलू बाज़ार ने भी देश की न्यूनतम आर्थिक गतिविधियों को जीवंत बनाये रखा जिससे देश ने यदि उस दौर में कुछ ख़ास पाया नहीं तो उसके पास खोने के नाम पर भी कुछ नहीं गया. हमारे देश के किसानों की स्थिति सुधारने के लिए अब सही दिशा में राष्ट्रीय नीति के माध्यम से कदम उठाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक हम अपने देश की कृषक आबादी की क्रय शक्ति को बेहतर नहीं कर पाते हैं तब तक हमारे उद्योगों के लिये केवल निर्यात पर टिके रहकर चल पाना संभव नहीं रहने वाला है. इस स्थिति में परिवर्तन अब बहुत आवश्यक है और सिक्किम में केंद्र सरकार इस विषय पर जो मंथन करने जा रही है उसके बेहतर परिणाम सामने आने की पूरी सम्भावना भी है.
                   आज सरकार और नीति आयोग द्वारा जिस तरह से आर्थिक विकास दर के ८% तक जाने की जो आशा दिखाई जा रही है उससे यही लगता है कि सरकार ने केवल अपनी बात को आगे रखने की कसम खा रखी है क्योंकि निर्यात दर और अन्य सूचकांक कहीं से भी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत नहीं दिखा रहे हैं और इन आंकड़ों से ज़्यादा असर बाज़ार पर दिखाई दे रहा है. अच्छा हो कि सरकार इस तरह के आंकड़ों में उलझने के स्थान पर अब संसद से लगाकर संसदीय समितियों तक में इस बात पर गंभीर चर्चा शुरू करे क्योंकि आज विपक्ष के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं है तो इस स्थिति में पहल सरकार को ही करनी होगी. महत्वपूर्ण बिलों पर दबाव के साथ आगे बढ़ने के स्थान पर विमर्श पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि राजनैतिक कारणों से किये जाने वाले विरोध को साथ में बैठकर सुलझाने से ही नीतिगत सुधार किये जा सकते हैं. अब देश के नेताओं को दलीय राजनीति से आगे बढ़कर यह देखना ही होगा कि इस समस्या से किस तरह से निपटा जा सकता है. राजनीति करने के लिए अन्य बहुत से अवसर भी हैं पर सत्ता और विपक्ष में हावी होने की राजनीति से देश का किसी भी तरह से भला नहीं होने वाला है.      
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रविवार, 10 जनवरी 2016

रेलवे और लापरवाही

                                              भारतीय रेल को लगातार सुधारने की कोशिशें जो एक समय देश के युवा रेल मंत्री माधव राव सिंधिया के समय शुरू हुई थीं विभिन्न राजनैतिक कारणों और समस्याओं पर सही ध्यान न देने के कारण वे उस तरह से फलीभूत नहीं हो पायीं जैसी उनसे अपेक्षा की गयी थी. इसके लिए देश की राजनैतिक परिस्थितियों को भी काफी हद तक ज़िम्मेदार माना जा सकता है क्योंकि जब भी रेल के सुधार की बातें शुरू हुई तो रेल कर्मचारियों से जुड़े हुए संगठनों ने ही सबसे अधिक विरोध करने की प्रवृत्ति सदैव ही बनाये रखी है जिससे वे आवश्यक सुधार भी कहीं रुक से गए जो समय के साथ भारतीय रेल के लिए जीवनदायी और आर्थिक रूप से बहुत प्रभावशाली भी हो सकते थे. लम्बे समय तक राज्यों के प्रभावी नेताओं को उनके सांसदों की संख्या के अनुपात में केंद्र में गठबंधन सरकार के मुखिया को यह महत्वपूर्ण मंत्रालय मजबूरी उन्हें में देना पड़ा जिसका सीधा असर यही हुआ कि उनमें से अधिकतर की सीमित सोच ने रेलवे के संसाधनों को पूरी तरह से खाली करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. आज रेल मंत्री सुरेश प्रभु द्वारा पूरी ज़िम्मेदारी के साथ एक बार फिर से रेलवे के कायाकल्प की कोशिशें की जा रही हैं पर उनके बीच आज भी रेलवे कर्मचारियों में काम न करने की प्रवृत्ति के चलते यात्रियों को विभिन्न तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.
                                           अभी हाल ही में चंडीगढ़ से लखनऊ चलने वाली १२२३२ सुपरफास्ट एक्सप्रेस में सफर करने का अवसर मिला तो उसके बी१ / बी२ कोचों में शौचालयों की दुर्दशा देखकर यही लगा कि इतनी महत्वपूर्ण ट्रेन के रखरखाव में भी किस तरह की लापरवाही की जाती है. चार में से तीन शौचालयों में अंदर और बाहर से बंद करने की व्यवस्था ही नहीं थी और एक में रस्सी बांधकर बंद किया गया था जिससे उनका उपयोग कर पाना असंभव ही था उसके साथ लगे बी २ कोच के शौचालयों में पानी ही नहीं था तो उनके उपयोग की सम्भावना भी ख़त्म ही हो गयी थी. ऐसी परिस्थिति में यदि कोई अकेली महिला सफर कर रही हो तो रेलवे उससे क्या अपेक्षा करता है कि वह कितने कोच आगे जाकर शौचालय का उपयोग करे ? निश्चित तौर पर यह रखरखाव से जुड़े मामलों में गंभीर लापरवाही का उदाहरण ही है और रेल मंत्री के लगातार किये जा रहे अच्छे प्रयासों के विपरीत ही है. इस मामले में वैसे तो चंडीगढ़ में वाश लाइन से जुड़े हुए स्टाफ की कमी ही दिखाई देती है पर उस स्टाफ को नियंत्रित करने के लिए जो भी व्यवस्था बनायीं गयी है क्या वह भी सही तरीके से काम कर रही है और इस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं है. रेलवे आज भी आम लोगों के आवागमन का महत्वपूर्ण साधन है पर इसमें निचले स्तर के स्टाफ द्वारा जिस तरह से लापरवाही की जाती है उसका ख़मियाजा पूरे कोच के सभी यात्रियों को भुगतना पड़ता है.
                          जब महत्वपूर्ण मार्गों पर चलने वाली सुपरफास्ट ट्रेन का यह हाल है तो सवारी गाड़ियों की हालत का अंदाज़ा आसानी से लगाया ही जा सकता है. इस तरह के मामले में जिस तरह से सभी अपनी ज़िम्मेदारी दूसरों पर डालने के लिए ही तैयार दिखाई देते हैं उससे भी परिस्थिति और बिगड़ती जाती है क्योंकि टीटीई के पास शिकायत पुस्तिका के अतिरिक्त संभवतः और ऐसा अधिकार नहीं होता है जिसका उपयोग कर वह ट्रेन के सामान्य रखरखाव से जुड़े मसले पर उस स्टाफ के खिलाफ शिकायत भी कर सके. ऐसे में जब यात्रियों द्वारा इस तरह की समस्या की तरफ उनका ध्यान दिलाया जाता है तो वे भी लाचार से ही दिखाई देते हैं क्योंकि शौचालय की कुण्डियों और टैंक में पानी न होने जैसी शिकायतों को चलती हुई गाड़ी में किसी भी तरह से दूर नहीं किया जा सकता है. ऐसे किसी भी मामले के लिए निश्चित तौर पर रेलवे के पास कोई व्यवस्था होगी पर संभवतः उसका अनुपालन नहीं किया जा रहा है जिससे भी आमतौर पर यात्रियों को इस तरह की समस्याओं से जूझना पड़ रहा है. इनसे निपटने के लिए अब रेल मंत्रालय को कुछ नयी तरह से सोचने की भी आवश्यकता है क्योंकि बिना इसके स्टाफ पर दबाव नहीं बनाया जा सकता है. अभी तक जिस तरह से इन शिकायतों के लिए यात्री भी पहल नहीं करना चाहते हैं तो उस स्थिति में स्टाफ को और भी अधिक निरंकुश होने की छूट मिल जाती है.
                                जिस तरह से रेल मंत्री के ट्वीटर हैंडल से कई लोगों को सही समय पर उचित मदद मिलनी शुरू हो चुकी है उस परिस्थिति में अब इस व्यवस्था को और भी अधिक मज़बूत बनाये जाने की भी आवश्यकता है क्योंकि यदि रेलमंत्री के हैंडल पर इस तरह की शिकायतों की भरमार जो जाएगी तो आने वाले समय में उनके हैंडल से भी इसे सही तरह से नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा. इसके लिए रेलवे को एक पहल करके विभिन्न मार्गों पर चलने वाली ट्रेनों के लिए एक मंडल स्तर पर एक ट्वीटर हैंडल की व्यवस्था करनी चाहिए जिस पर आवश्यकता पड़ने पर यात्री अपनी बात कह सकें और यह हैंडल उस मंडल से जारी होने वाले हर टिकट पर स्पष्ट रूप से अंकित भी होना चाहिए जिससे किसी को भी इसे खोजने की आवश्यकता न पडे. इस हैंडल को २४ घंटे मंडल मुख्यालय के किसी कर्मचारी द्वारा लगातार देखा जाये जिससे किसी भी समस्या के बारे में रेलवे को जानकारी मिल सके और यात्रियों की यात्रा को भी सुखद बनाया जा सके. पूरे भारत के लिए एक शिकायती फ़ोन नंबर होने के स्थान पर मंडल स्तर पर टोलफ्री नंबर भी होना चाहिए जो हर टिकट पर छपा हो जिससे सोशल मीडिया का उपयोग न करने वाले लोग भी अपनी बात सही जगह तक पहुँच सकें. इसके साथ ही लापरवाह कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने के बारे में भी सोचना शुरू करने का अब समय आ गया है क्योंकि केवल यात्रा टिकट और कैसी भी यात्रा करने के लिए अभिशप्त रेलयात्रियों की यात्रा को सुखद बनाने के लिए अब इस तरह के परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की जा रही है.                     
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गुरुवार, 3 दिसंबर 2015

रेलवे, ट्विटर और सुगम यात्रा

                                                                        पिछले १० दिनों में दूसरी बार रेल सफर के दौरान यात्री को ट्विटर के माध्यम से मदद मिलने की घटना को बड़े बदलाव के रूप में देखा जाना चाहिए क्योंकि जिस तरह से चलती ट्रेन के कोच में बैठे हुए यात्री को किसी भी तरह की समस्या उत्पन्न होने पर यात्रा के बीच में कोई विकल्प न होने की दशा में मज़बूरी में यात्रा को जारी रखना पड़ता है उसे देखते हुए आने वाले समय में रेल यात्रियों के लिए ट्विटर बेहतरीन साधन बनकर उभर सकता है. देश में रेलवे के व्यापक नेटवर्क को देखते हुए इस तरह की स्थायी व्यवस्था के बारे में भी सोचा जाना चाहिए जिसके चलते आम नागरिकों को कुछ सहायता मिल सके और उनकी यात्रा को और भी सुगम बनाया जा सके. इस परिवर्तन का सही लाभ उठाने के लिए अब रेलवे को इसकी मज़बूत व्यवस्था भी करनी चाहिए जिससे लोगों को आवश्यकता पड़ने पर सही सहायता मिल सके और उन लोगों के मन में भय भी उत्पन्न किया जा सके जो यात्रा के दौरान सहायता न मिल पाने की मजबूरी का दुरूपयोग भी किया करते हैं और रेलवे चाहकर भी इन मामलों में कुछ नहीं कर पाती है.
                                इस प्रक्रिया को हर नागरिक के लिए सुगम बनाने के लिए ट्विटर का एक नया और अलग खाता भी होना चाहिए जिसे हर मंडल स्तर पर सुचारू रूप से देखने और तात्कालिक प्रतिक्रिया करने की व्यवस्था भी की जानी चाहिए क्योंकि भले ही शुरुवाती दौर में रेल मंत्री या मंत्रालय के ट्विटर के हैंडल पर इस तरह की सहायता मिलना आसान हो पर आने वाले समय में इसके बढ़ने पर रेल मंत्री के खाते की आवश्यक जानकारियों को आम लोगों तक पहुँचाने का मकसद भी कमज़ोर पड़ सकता है. यह अच्छा है कि रेल मंत्री के खाते के अपडेट्स को लगातार देखा जाता है और लोगों को सहायता भी मिल रही है पर इसके लिए आने वाले समय में अलग व्यवस्था भी करने के बारे में रेलवे को सोचना ही होगा. एक सहायता से जुड़े अलग खाते के सञ्चालन और मंडल स्तर पर उसे फॉलो करने से जहाँ मंडल और केंद्रीय स्तर पर शिकायत या समस्या पहुँच जाएगी वहीं ट्रेन में नियुक्त स्टाफ पर भी इस बात का दबाव बन जायेगा कि अब उन पर जनता के द्वारा नज़र रखी जा रही है तथा किसी भी समस्या पर जनता सीधे मंडल कार्यालय, रेल मंत्रालय या रेलमंत्री तक अपनी पहुँच रखती है.
                               रेल कर्मियों पर इस तरह के दबाव की आवश्यकता लम्बे समय से महसूस की जा रही थी क्योंकि अभी तक जनता के पास विकल्प न होने के कारण ही जिस तरह से वह चुप रह जाती थी अब वह भी सही शिकायतों को सही जगह तक पहुंचा सकती है. इस क्रम में रेलवे को जहाँ शीघ्र ही इस तरह के ट्विटर हैंडल को जनता के लिए शुरू करना चाहिए वहीं उसका प्रचार हर टिकट पर भी होना चाहिए फिलहाल इंटरनेट से मिलने वाले टिकटों में इसकी शुरुवात तुरंत ही की जा सकती है तथा भविष्य में छपने वाले टिकटों पर भी इसका अंकन किया जा सकता है. स्टेंसिल के रूप में रेलवे जिस तरह से अपनी सूचनाओं को हर कोच में लिखती है तो इस ट्विटर हैंडल को भी हर कोच में सूचनाओं के साथ लिखा जा सकता है जिससे किसी को भी आवश्यकता पड़ने पर इसका लाभ मिल सके. जनता के हाथ में यह एक हथियार के रूप में ही आने वाला है जिसके दुरूपयोग से भी आम जनता को बचना होगा जिससे सही लोगों की शिकायतों पर रेलवे पूरा ध्यान दे सके. आना वाला समय देश के लिए महत्वपूर्ण साबित होने वाला है उसमें यदि डिजिटल क्रांति को इस तरह से आम जनता की सुविधाओं तक पहुँचाया जाने लगे तो सारा मामला बहुत आसान भी हो सकता है.  
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सोमवार, 28 सितंबर 2015

नेपाल समस्या और भारत

                                      जब नए संविधान को स्वीकार करने के बाद तराई क्षेत्रों में फैले हुए असंतोष को समाप्त करने के लिए भारत की तरफ से उचित और त्वरित निर्णय लिए जाने की आवश्यकता है तो उस स्थिति में भारत सरकार का स्थितियों को उनके भरोसे ही छोड़ देने की नीति किसी भी तरह से भारत नेपाल संबंधों को मज़बूत नहीं कर सकती है. यह सही है कि संविधान में किये गए कुछ प्रावधानों से वहां तराई क्षेत्र में रह रहे मधेशीयों के अधिकारों में कटौती होने की पूरी संभावनाएं है पर इस तरह से क्या मधेशियों के हाथों भारत सरकार नेपाल का भविष्य छोड़ सकती है जहाँ से सब कुछ सम्भालना एक बार फिर से कठिन हो जाये ? प्राकृतिक आपदा के समय जिस तरह से भारत ने अपने पडोसी होने का धर्म निभाया था क्या आज जब नेपाल के सामने इतना बड़ा संकट आ चुका है तो उसे सुलझाने के लिए उसके साथ खड़े होने की आवश्यकता हमारे सत्ता के गलियारों में महसूस नहीं की जा रही है ? माओवादियों के संकट के समय भारत के पास लम्बे समय तक कोई विकल्पहि नहीं था जिस पर वह विचार कर सकता पर आज जब सब कुछ लगभग सामान्य ही है तो सरकार का इस तरह का बर्ताव आखिर नेपाल के निवासियों को भारत के साथ कैसे रख पाने में सफल हो सकेगा ?
                                 कहीं ऐसा तो नहीं है कि नेपाल के अपने आप को धर्म निरपेक्ष बनाये जाने के फैसले से मोदी सरकार नाराज़ है क्योंकि उसके मातृ संगठन का सपना विश्व में हिन्दू राष्ट्रों की स्थापना का ही है तो अब मोदी और उनकी सरकार नेपाल को यह सबक सीखने की कोशिशें कर रही हो जिसमें उनकी राय की अवहेलना करने के परिणाम नेपाल को भुगतने के लिए छोड़ने का विकल्प भी हो ? नेपाल के साथ अब भारत को बड़े भाई जैसा व्यवहार बंद करना ही होगा और मधेशियों के साथ वहां की मूल जनता किस तरह के सम्बन्ध चाहती हैं यह भी उनके लिए ही छोड़ना चाहिए क्योंकि यह उनकी अपने समस्या है और उनके द्वारा अपनाये गए संविधान के साथ भारत को खड़े होना चाहिए क्योंकि किसी भी सम्प्रभु देश के निर्णय को किसी भी अन्य देश द्वारा कैसे प्रभावित किया जा सकता है ? नेपाल के सामने आई इस परिस्थिति से निपटने में भारत को वहां की सरकार की मदद करते हुए उसके निर्णय का सम्मान करना सीखना चाहिए क्योंकि आज भारत के पड़ोसियों में नेपाल और भूटान की तरफ से ही हमें कोई खतरा नहीं है और बाकि सभी देशों के साथ सीमा पर लगती समस्याओं के चलते ही बहुत कठिन परिस्थिति उत्पन्न होती रहती है.
                                भारत के मज़बूत कहे जाने वाले पीएम मोदी की सरकार किस तरह से मधेशियों की मांगों का मूक समर्थन कर रही है यह किसी से भी छिपा नहीं है भारत की तरफ से नेपाल को हर तरह की सहायता और सहयोग देने की स्थिति को किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जाना चाहिए क्योंकि यह एक ऐसी बुरी स्थिति होगी जिसका आज भारत सरकार को अंदाज़ा नहीं है. नेपाल को भारत की इस चुप्पी या मधेशियों का मौन समर्थन किये जाने की स्थिति में यदि नेपाल का झुकाव चीन की तरफ अधिक होता है तो भारत उससे कैसे निपटेगा ? चीन के साथ भले ही मोदी के कितने भी अच्छे रिश्ते दिखाई देते हों वह कभी भी मज़बूत होते भारत के लिए रास्ता साफ़ नहीं करना चाहेगा यूएन की वार्षिक बैठक में उसके वक्तव्यों से तो ऐसा ही लगता है. नेपाल की जनता ने आखिर क्या गलती की है जो उसे मधेशियों के द्वारा शुरू किये गए इस आर्थिक नाकेबंदी को अनावश्यक रूप से झेलना पड़े. नेपाल ने अपने सबसे विनाशकारी भूकम्प से अभी पूरी तरह निजात भी नहीं पायी है तो ऐसे में भारत की तरफ से इस अघोषित आर्थिक नाकेबंदी का क्या मतलब बनता है ? भारत को नेपाल जाने वाले सामान की पूरी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी खुद ही उठानी चाहिए और नेपाल सरकार से अपने क्षेत्र में मालवाहक वाहनों की सुरक्षा की मांग करते हुए आपूर्ति को बहाल करने के लिए कड़े निर्णय लेने चाहिए.         
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शुक्रवार, 25 सितंबर 2015

हज हादसा

                                                             दुनिया भर के मुसलमानों की पवित्र हज यात्रा के दौरान एक बार फिर से हुए हादसे ने जहाँ है यात्रा पर गए लोगों के परिजनों को हिलाकर रख दिया वहीं दूसरी तरफ कुछ लोग इस हादसे के बाद भी अपनी अनावश्यक राय देने से बाज़ नहीं आये. ईरान की तरफ से आये बयान को कहीं से भी सही नहीं कहा जा सकता है क्योंकि सऊदी सरकार की तरफ से यात्रा के लिए हर संभव अच्छे प्रयास किये ही जाते हैं पर जहाँ दुनिया भर से लाखों लोग इस तरह से यात्रा पर आये हों वहां पर कई बार कुछ समस्याओं के कारण हादसे हो भी जाते हैं. पूरी हज यात्रा में बकरीद के दिन ही सारे यात्री एक ही जगह पर इकठ्ठा होते हैं क्योंकि इसी दिन हज को पूरा माना जाता है भले ही कुछ यात्री पहले गये हो या अभी दो दिन पहले ही पहुंचे हों. इस यात्रा के विभिन्न चरणों को अलग अलग चरणों में संपन्न कराया जाता है पर बकरीद का दिन सबसे बड़ी चुनौती का होता है क्योंकि सभी यात्रियों को यात्रा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण और आवश्यक काम इस दिन ही करने होते हैं जिससे सरकार और यात्रियों पर इसे सुरक्षित रूप से संपन्न कराने का दबाव बढ़ जाता है.
                              पूरी दुनिया का कोई भी हिस्सा हो और चाहे कितने भी अनुशासित लोग क्यों न हों पर जब बड़े समूह में कुछ अचानक से ही गड़बड़ होता है तो व्यवस्था में लगे हुए लोगों के लिए इसे सम्भालना मुश्किल हो जाता है. इस हादसे की क्या वजह रही यह तो समय के साथ ही पता चल पायेगा पर आरम्भिक जांच में गर्मी और है यात्रियों के दो समूहों के आमने सामने आ जाने से इस तरह की घटना होने की बात कही जा रही है. मानवीय स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि धार्मिक मामलों में अचानक से सभी एक जैसे हो जाते हैं और शिक्षित या अशिक्षित लोगों का फर्क मिट जाता है हर व्यक्ति धार्मिक मान्यताओं एक अनुसार परम्पराओं को सबसे पहले ही निभाना चाहता है और जब भी महत्वपूर्ण व्यवस्था गत मामलों में इस तरह से नियमों से अलग हटना शुरू किया जाता है तो कहीं न कहीं इ इस तरह के गंभीर हादसों के होने से बचा नहीं जा सकता है. इतनी बड़ी भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अब सऊदी सरकार को भी कुछ महत्वपूर्ण कामों पर ज़ोर डालना होगा साथ ही सम्बंधित देशों में भी हज यात्रियों को आवश्यक ट्रेनिंग दी जानी चाहिए.
                               पूरी हज यात्रा में किस तरह से कब और क्या करना है यह हर यात्री को पता होना चाहिए और किसी गंभीर हादसे के होने पर यात्रियों को क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए इस बात की भी पूरी ट्रेनिंग देकर इनें भेजा जाना चाहिए क्योंकि कई बार अपनी जान बचाने के लिए गलत तरीके से किये गए प्रयासों से भी राहत में बाधा पड़ने लगती है और स्थापित व्यवस्था भंग हो जाती है. सऊदी सरकार को दुनिया भर के देशों से संपर्क कर एक कारगर व्यवस्था के बारे में यात्रियों को जागरूक करना चाहिए और जो संभावित हादसे के स्थान हो सकते हैं वहां पर यात्रियों को किस तरह से सावधानियां बरतनी चाहिए इस बारे में भी पहले से ही समझाया जाना चाहिए. हज यात्रा की तैयारियों में कई महीने लगते हैं तो चयनित यात्रियों को इस बारे में उनके सम्बंधित ज़िले या तहसील और ब्लॉक में एक बार इस सम्बन्ध में पूरी जानकारी देने की कोशिश करनी चाहिए जिससे लोग जागरूक भी रहें और किसी भी हादसे के लिए वहां के प्रशासन के लिए किसी भी तरह की समस्या न पैदा करें. भारत से बहुत बड़ी संख्या में लोग हज करने जाते हैं तो सभी को इस यात्रा के बारे में पूरी जानकारी देनी चाहिए. सऊदी सरकार को भी दोबारा यात्रा करने के इच्छुक लोगों को हर तरह से रोकने का प्रयास भी करना चाहिए जिससे जो लोग एक बार भी वहां नहीं पहुँच पाये हैं उनको भी यह अवसर मिल सके और वहां की भीड़ को भी रोका जा सके. 
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...

रविवार, 30 अगस्त 2015

आईएस और दुनिया

                                                           पूरी दुनिया में आज आतंक के पर्याय बन चुके संगठन आईएस के चलते इस्लाम को मानने वाले लोगों पर संदेह बढ़ता ही जा रहा है जो कि कहीं न कहीं से अंत में आईएस को ही ताकत देने वाला साबित होने वाला है. आज विश्व में आतंक एक सरकारी तौर पर समर्थन और निर्यात के सबसे कुख्यात देश पाकिस्तान में भी अफगानिस्तान में आईएस के बढ़ते रसूख और पाक के कुछ हिस्सों से पुराने इस्लामिक आतंकी गुटों के आईएस के पक्ष में लामबंद होने की ख़बरों के बाद अब आईएस पर प्रतिबन्ध लगाया गया है जिसका पाक पर असर पड़ना लाजमी ही है. पिछले कुछ दशकों से पूरे विश्व में कुछ चरमपंथियों द्वारा जिस तरह से इस्लाम और इस्लामी मान्यताओं की मनमानी व्याख्या की जाने लगी है उसको देखते हुए ईरान सरकार के खर्चे पर पैगम्बर हज़रत मोहम्मद की जीवनी पर आधारित एक फिल्म तीन हिस्सों में बनायीं है जिसमें उनके समय के हालातों पर विस्तार से दिखाया गया है और उनकी मान्यताओं के बारे में भी स्पष्टीकरण देने की कोशिशें की गयी हैं क्योंकि ईरान को लगता है कि आज इस्लाम का जो स्वरुप दिखाई दे रहा है वह पैगम्बर के समय से बिलकुल ही अलग है पर इस फिल्म को भी सुन्नी समुदाय की तरफ से विरोध का सामना करना पड़ रहा है.
                                पूरे इस्लामी जगत को अब यह बात समझनी ही होगी कि आखिर वे कौन से कारण है जिसके चलते पूरे विश्व में आज उसको आतंक का पर्याय बताने की कोशिशें शुरू की जा चुकी हैं तथा किन कारणों के चलते आज युवा मुस्लिम समग्र विकास के स्थान पर केवल जेहादी बनने की सोच तक ही सीमित होने लगे हैं ? धर्म केवल तभी तक जन कल्याण सीमित तक रह सकता है जब तक उसके अनुयायी उसके बारे में खुद पढ़ते सीखते हैं पर जब भी कुछ लोगों द्वारा धर्म के व्यापक स्वरुप को केवल अपने हितों को साधने का साधन बनाया जाने लगता है तो उसकी परिणीति धर्म की बदनामी से अधिक कुछ भी नहीं हो सकती है. आज तालिबान के कमज़ोर पड़ने के बाद जिस तरह से आईएस पाकिस्तान और अफगानिस्तान में भी आगे बढ़ने में लगा हुआ है तो उससे पूरी दुनिया में चिंता बढ़नी स्वाभाविक ही है क्योंकि पाक आज एक अराजक और विफल राष्ट्र के रूप में दुनिया के लिए सरदर्द बनता जा रहा है और ऐसी स्थिति में यदि उस पर आईएस का नियंत्रण हो जाता है तो यह पूरी दुनिया के लिए घातक साबित हो सकता है. परमाणु शक्ति संपन्न होने के कारण किसी भी तरह से पाक में आईएस जैसे संगठन का प्रभुत्व कहीं भी बढ़ने के दूरगामी परिणाम होने वाले हैं और यह बात पाक की सेना और सत्ता की समझ में आने लगी है.
                         अभी तक पाक ने जिस तरह से इस्लामिक देशों से जिहाद के नाम पर मिले फण्ड का दुरूपयोग ही किया है और पाकिस्तानी सेना में भारत को परेशान करने के लिए जिस तरह से जिहाद घुट्टी को पिलाया जाता है आज वही उसके लिए बड़ी समस्या बन सकती है क्योंकि आईएस आज पूरे विश्व खिलाफत की कोशिश करने वाले संगठन के रूप में खुद को खड़ा करने में लगा है जिससे इराक और सीरिया से दूर के मुस्लिम देशों में उसको समर्थन भी मिल रहा है. आज आईएस यही चाहता है कि इन आतंकी गतिविधियों एक चलते पूरी दुनिया में मुसलमान तरक्की और सद्भाव के विरोधी मान लिए जाएँ क्योंकि तभी वह इस्लामी जगत को यह समझने में सफल हो पायेगा कि पूरी दुनिया ही इस्लाम के खिलाफ खड़ी हो रही है और इसी परिस्थति के दम पर वह अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए मुस्लिम युवकों को इकठ्ठा कर पायेगा जिनके माध्यम से वह और भी नए क्षेत्रों में अपने आतंक को बढ़ाने की कोशिशें कर सकता है. आज इस बात को ध्यान में रखते हुए ही गैर इस्लामिक देशों को अपने कदम उठाने पड़ेंगें जिससे आने वाले समय में वे अनजाने में ही आईएस की मदद करने वाले न साबित हो जाएँ.   
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शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

जन-धन योजना का प्रचार ?

                                                 पिछले वर्ष १५ अगस्त पर लालक़िले से अपने देश के नाम पहले सम्बोधन में जिस जन-धन योजना की घोषणा पीएम मोदी ने की थी आज लगभग १७ करोड़ खाते खुलने के बाद भी यह योजना अपने लक्ष्य से भटकी हुई ही अधिक दिखायी देती है और आज इसकी जो स्थिति वित्त मंत्रालय के सामने आ रही है उससे खुद अधिकारियों की समझ में नहीं आ रहा है कि अब इस योजना को पटरी पर लाने के लिए वे किस तरह से प्रयास शुरू करें. कोई भी योजना जब केवल ऊपरी स्तर से शुरू की जाती है और उसके पूरे नियम कानून का सही तरह से प्रचार नहीं किया जाता है तो वह इसी तरह दुर्व्यवस्था का शिकार हो जाती है क्योंकि जिस तरह से पिछले वर्ष जन-धन योजना का प्रचार किया गया उससे लोगों को यह लगा कि सरकार इसके माध्यम से ५००० रूपये उनके खाते में भेजेगी जिसके चलते उन लोगों ने भी लालच में खाते खुलवाये जिनको इसकी आवश्यकता और सञ्चालन सम्बन्धी समझ ही नहीं थी जिसके चलते आज इनमें से आधे से भी कम खाते ही इस योजना के सभी लाभों को पाने के लिए पात्र बचे हैं और बाकी खाते बैंकों पर एक बोझ के रूप में बड़ा सर दर्द ही साबित होने वाले हैं.
                                           ग्रामीण क्षेत्रों के लिए यह योजना कितनी असुविधाजनक है इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी तहसील स्तर के एटीएम बूथों में निकालने के लिए पैसे ही नहीं होते हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में तो एटीएम हैं ही नहीं फिर इस योजना को क्या केवल शहरी क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया था यह बात आज भी समझ से बाहर है. हर ४५ दिन पर एटीएम के सञ्चालन की बाध्यता होने के चलते कितने खाते इस पूरी योजना का लाभ उठा पायेंगें यह आज कोई भी नहीं बता सकता है. देश के ज़िले स्तर के शहरों में निजी क्षेत्रों के बैंकों द्वारा विभिन्न तरह की सुविधाएँ दी जा रही हैं जिनके चलते ग्राहक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लेन देन कम करने लगे हैं और आने वाले समय में भी यदि सरकार की सोच इसी तरह की रहती है तो क्या यह अपने आप में एक और समस्या नहीं होगी क्योंकि ग्रामीण क्षेत्र में खुली राष्ट्रीयकृत बैंकों की शाखाओं में बैंकिंग कम और सरकारी योजनाओं का अनुपालन ही अधिक होता रहता है जिससे पूरे बैंकिंग तंत्र पर आने वाले समय में और भी बोझ पड़ने की संभावनाएं भी हैं. ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के पास काफी बड़ी संख्या में मनरेगा के खाते थे पर केवल रिकॉर्ड बनाने के लिए जिस तरह से सरकार ने उनके भी नए खाते खुलवाये क्या वे आज सञ्चालन की स्थिति में हो सकते हैं यह भी सोचने का विषय है.
                            केंद्र सरकार को एक बार फिर से इस तरह की योजनाओं को बनाते समय ध्यान देने की आवश्यकता है जिससे सरकारी दुर्व्यवस्था से निपटने में सहायता मिल सके किसी भी अच्छी योजना का इस तरह से बुरा हश्र न हो और वह भारतीय बैंकों या अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक साबित न हो अब इस पर भी गंभीरता से विचार किये जाने की आवश्यकता है. सरकारें योजनाएं बना सकती हैं पर उनके क्रियान्वयन की पूरी ज़िम्मेदारी सम्बंधित मंत्रालय और अधिकारियों कर्मचारियों की ही होती है. जन-धन योजना में जो भी धरातल पर कमियां रह गयी हैं एक बार वित्त मंत्रालय को उन पर भी विचार करना हो होगा तभी देश की आंतरिक अर्थव्यवस्था से पैसे निकालने में सरकार को आसानी हो सकती है. निश्चित तौर पर सरकार की तरफ से प्रयास अच्छा था पर इसका सही तरह से प्रचार प्रसार नहीं किया गया जिसका नतीजा आज हमांरे सामने है. अब इस योजना के अंतर्गत खुले हुए खातों के लिए बैंकों ने भी ग्राहकों को पत्र भेजने शुरू किये हैं जिनमें खातों को लगातार संचालित करते हुए लाभ उठाने की बात कही जा रही है अब इसके लिए पूरे देश में निष्क्रिय खातों वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर नागरिक जागरूकता अभियान चलाये जाने की आवश्यकता है जिससे यह योजना आने वाले समय में अपने विश्व रिकॉर्ड को धन जमा करने के रूप में भी सबसे आगे रख पाने में सफल हो सके.    

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सोमवार, 20 जुलाई 2015

घरेलू गैस सब्सिडी #गिवइटअप

                                                                   केंद्र सरकार के पास अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में पिछले एक वर्ष में कच्चे तेल की कीमतों में आये बदलाव के बाद तेल क्षेत्र में कुछ अहम सुधारों की तरफ बढ़ने का बहुत ही अच्छा मौका आया हुआ है पर संभवतः आज सरकार इस अवसर का लाभ केवल अपने बजटीय घाटे को कम करने के लिए ही इस्तेमाल करना चाह रही है इसलिए ही उसने अभी तक यूपीए द्वारा बनायीं गयी तेल नीति में कोई बड़ा परिवर्तन करने के बारे में सोचना भी शुरू नहीं किया है. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में आज तेल की कीमतें ५५ से ६० डॉलर प्रति बैरल पर चल रही हैं और गिरावट का यह ट्रेंड पिछले एक वर्ष से ही बना हुआ है. ईरान का मामला सुलझ जाने के बाद इसमें और भी कमी की सम्भावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. शुरुवाती समय में सरकार की तरफ से यह कहा गया कि मंहगा तेल खरीदे जाने के कारण ही इसके दामों में कटौती नहीं की जा रही है जबकि वास्तविकता कुछ और ही थी क्योंकि जिस कीमत पर तेल खरीदा जाता है वह चार महीने बाद ही घरेलू बाजार पर लागू हो पाती है आज जो मूल्य चल रहा होता है वास्तव में वह चार महीने पहले के उस मूल्य से ही निर्धारित किया जाता है जिस पर तेल कम्पनियों द्वारा कच्चा तेल खरीदा जाता है.
                           मोदी सरकार के सत्ता में आने बाद ही जिस तरह से सब्सिडी छोड़ने की बात खुद पीएम की तरफ से की जाने लगी उसका ज़मीनी स्तर पर कोई विशेष प्रभाव भी नहीं दिखाई दिया क्योंकि इस मुद्दे पर कोई भी व्यक्ति लोकप्रियता के कदम उठाने से नहीं चूकता है. जब सरकार की तरफ से स्वेच्छा से यह काम करने की अपील कुछ कारगर नहीं हुई तो अब तेल कम्पनियों की तरफ से नए हथकंडे अपनाये जाने लगे हैं जिसमें आईवीआरएस के माध्यम से गैस बुक करने पर शून्य विकल्प पर जाने के साथ ही सब्सिडी एक झटके में समाप्त कर दी जाती है और इस बदले हुए सिस्टम के बारे में सरकार या कम्पनियों की तरफ से कोई जानकारी अभी तक आम उपभोक्ताओं को देने की कोई कोशिश भी नहीं की गयी है. बिना बताये इस सुविधा में परिवर्तन करने से जहाँ आज सैकड़ों लोगों को बिना पूछे ही सब्सिडी के दायरे से बाहर किया जा रहा है वहीं इसके बाद उनकी सुनवाई किस तरह से की जाये इस पर भी कोई निर्णय नहीं लिया गया है. सब्सिडी को स्वेच्छा से छोड़ने के साथ ही आय की एक सीमा के बाद आने वाले सभी लोगों की सब्सिडी समाप्त करने के बारे में सरकार को कदम उठाने चाहिए थे और सबसे पहले सांसदों, विधायकों, जिला पंचायत अध्यक्षों, नगर निगम/ पालिका परिषद के अध्यक्षों तथा ग्राम प्रधानों के साथ इसकी शुरुवात करनी चाहिए थी और इसे प्रथम श्रेणी के राजपत्रित अधिकारियों तक बढ़ाया जाना चाहिए था पर सरकार ने संभवतः इसके लिए चोर रास्ता खोजना अच्छा समझा.
                            जिन लोगों को सब्सिडी मिल रही है क्या उनके पास इस तरह की किसी भी सम्भावना से बचने के लिए कोई मार्ग नहीं होना चाहिए जिसमें गलती से सब्सिडी छोड़ने का विकल्प दब जाने पर भी एक बार में सब्सिडी खत्म न हो और उपभोक्ता को एसएमएस भेजकर अपनी इस मांग की पुष्टि करने के लिए भी कहा जाये. इस तरह से दोहरी व्यवस्था करने से जहाँ किसी भी गलत मेनू को दबाने से उपभोक्ता की सब्सिडी बंद नहीं होगी वहीं उसके पास अपनी इस गलती को सुधारने का मौका भी होगा. यदि सरकार की तरफ से इस तरह की कोई पहल नहीं की जाती है तो आने वाले समय में एजेंसियों पर इस समस्या से जूझने वाले उपभोक्ताओं की भीड़ बढ़ने ही वाली है जिससे निपटना सरकार के लिए मुश्किल होने वाला है. हर काम में पारदर्शिता का होना बहुत आवश्यक है पर क्या इस तरह से आम लोगों से जुड़े हुए मुद्दों पर सरकार के एकतरफा काम करने वाले सॉफ्टवेयर को चलाने की अनुमति दिया जाना सही है या इसमें दोहरी व्यवस्था करने की आवश्यकता भी है ? यह आम लोगों से जुड़ा हुआ मुद्दा है जिस पर चुप्पी लगाने से काम नहीं चलने वाला है और संसद का स्तर शुरू होने के चलते सरकार या पेट्रोलियम मंत्रालय को इस बात पर जवाब भी देना पड़ सकता है. 
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रविवार, 12 जुलाई 2015

"स्वच्छ भारत अभियान" के सच्चे दूत

                                                             पिछले वर्ष पीएम मोदी के स्वच्छ भारत अभियान चलाये जाने के साथ ही देश में सफाई को लेकर कुछ जागरूकता आने के बाद अभी भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना शेष है क्योंकि जिन लोगों ने केवल राजनैतिक कारणों के लिए ही इस अभियान के साथ जुड़ना शुरू किया था आज वे कहीं पर भी दिखाई नहीं दे रहे हैं और धरातल पर परिवर्तन कहीं से भी दिखाई नहीं दे रहा है. देश की सफाई केवल इंटरनेट पर पोस्ट करके नहीं हो सकती है इस बात को समझने के लिए अभी देश का जनमानस तैयार भी नहीं दिखता है. सफाई से जुड़े हुए सच्चे सपूतों के बारे में मीडिया भी कुछ अच्छी ख़बरें देना नहीं चाहता क्योंकि आज मीडिया का अधिकांश हिस्सा केवल राजनैतिक चाटुकारिता और विज्ञापन हासिल करने तक ही सिमटा हुआ है. ऐसे में पंजाब के कपूरथला से एक बेहतर खबर सामने आई है जिसके बारे में पूरे देश को जानना भी बहुत आवश्यक है क्योंकि यह एक ऐसा उदाहरण है जिसमें पंजाब पुलिस के एक सब इंस्पेक्टर सुखविंदर सिंह की कोशिश से थाने के आस पास लगभग ३५ किमी की दूरी तक सफाई के हर मानक पूरे दिखाई देने लगे हैं और वह भी बिना किसी प्रचार और सरकारी सहायता के जिसे अपने आप में बड़ी उपलब्धि कहा जा सकता है.
                                                     एक घटना पर यदि कोई एक व्यक्ति ही गंभीरता के साथ सोचना शुरू कर दे तो किस तरह से पूरे इलाके की सोच बदल सकती है इस बात को सब इंस्पेक्टर सुखविंदर सिंह ने पूरी तरह सच साबित कर दिया है नकोदर में २०१३ में एक वन और ट्रक के बीच हुई टक्कर में १८ छात्रों की मौत हो गयी थी जिसके बाद सुखविंदर सिंह ने इस तरह की घटनाओं को पूरी तरह से रोकने की ठान ली थी और इसके लिए उन्होंने सड़क के किनारे लगी हुई झाड़ियों और उगने वाले पौधों को पूरी तरह से साफ़ करने का बीड़ा उठाया था.इस काम के लिए उन्होंने अपने स्तर पर प्रयास शुरू करते हुए ग्राम पंचायतों को यह समझने में सफलता पायी कि इन सबके चलते ही सड़कों पर बड़ी दुर्घटनाएं होती रहती हैं. उनके इस प्रयास का सभी सम्बंधित ग्राम पंचायतों ने पूरी तरह से समर्थन किया और अपने क्षेत्रों में पड़ने वाली सभी सड़कों कि किनारे उगने वाले झाड़ झंखाड़ को पूरी तरह से हटाने का प्रयास शुरू कर दिया जिसका नतीजा आज यह है कि सड़क के किनारे साफ हुए होने से वाहन चालक भी को आसपास के यातायात पर भी अच्छी नज़र रख पाने में में सहायक हुए जिससे इस तरह से होने वाली दुर्घटनों को काफी हद तक रोका भी जा सका है.
                                                   सुखविंदर सिंह ने अपने प्रयास यही पर नहीं रोके और हर थाने में पुलिस कर्मियों के लिए उचित शौचालयों की व्यवस्था करने के बारे में भी निर्णय लिया और पीपीपी के आधार पर जनता से सहयोग लेकर थानों में शौचालयों के निर्माण की दिशा में भी कदम उठाने शुरू किये जिससे आज तक उन्हें १०७ शौचालयों के निर्माण में सफलता मिल गई है और उनका यह काम निरंतर ही आगे बढ़ता जा रहा है. सामान्य पुलिस कर्मियों के लिए थानों में शौचालयों की समुचित व्यवस्था न होने की दशा में उनका यह प्रयास पुलिस कर्मियों के लिए एक वरदान बनकर सामने आया है. क्या पंजाब और केंद्र सरकार को उनके इस कार्य को एक मानक मान कर पूरे देश में सडकों की सफाई और अन्य स्वच्छता अभियान से जुड़े हुए मसलों पर एक व्यापक कार्य योजना नहीं बनानी चाहिए ? बेहतर योजनाएं केवल नीति आयोग में ही नहीं बन सकती हैं देश के आम नागरिक भी आवश्यकता पड़ने पर अपने लिए कोई न कोई मार्ग निकाल ही लिया करते हैं पर इन बातों का मीडिया में सही प्रचार नहीं हो पाता है जिससे इन अच्छे कार्यों से अन्य लोगों को इनका अनुसरण करने की प्रेरणा भी नहीं मिल पाती है. अच्छा है कि पंजाब पुलिस ने अपने इस योद्धा का इस बार स्वतंत्रता दिवस पर सम्मान करने का प्रयास भी शुरू कर दिया है जो कि आने वाले समय में और लोगों को जागरूक करने का काम भी करने वाला है.
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शनिवार, 11 जुलाई 2015

इसरो की छलांग

                                                  दुनिया भर के देशों के अंतरिक्ष संगठनों के बीच भारतीय इसरो ने जिस तरह से पिछले कुछ समय से लगातार अपनी सफलता के मानकों को ऊंचा करने के लिए काम करना शुरू किया है वह निश्चित तौर पर देश के वैज्ञानिकों के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है और उन लोगों के अनर्गल सवालों का सर्वोत्तम जवाब भी है जिनको आज भी यही लगता है कि जिस देश में गरीबी हो उसे इस तरह के अनावश्यक अंतरिक्ष कार्यक्रमों में निवेश नहीं करना चाहिए. देश के वैज्ञानिक विपरीत परिस्थितियों में भी जितनी दृढ़ता के साथ सर्वोत्तम परिणाम देने के लिए जाने जाते हैं पीएसएलवी( पोलर सैटेलाइट लांच वेहिकल) की सफल २८ वीं उड़ान ने उसे नए मानक प्रदान कर दिए हैं. इसरो ने अपनी स्थापना के समय से ही जिस तरह से भारतीय मेधा की क्षमताओं को दुनिया के सामने स्थापित करना शुरू किया था आज वह अपने गंतव्य की तरफ निरन्तरं ही सही प्रगति करती हुई दिखाई दे रही है. इसरो के पास करने के लिए बहुत कुछ है पर अभी इस क्षेत्र में देश में विज्ञान की गुणवत्ता वाली पढ़ाई की आवश्यकता है जिसकी अभी बहुत कमी महसूस हो रही है तथा आने वाले समय में इस क्षेत्र की दिशा भी बदलने ही वाली है जिस पर अभी से ध्यान दिए जाने की आवश्यकता भी है.
                                         बहुत से लोगों को यह लगता है कि गरीब देशों की श्रेणी और कमज़ोर नागरिक सुविधाओं वाले देश भारत में अंतरिक्ष विज्ञान पर धनराशि खर्च करना कहीं से भी सही नहीं है संभवतः इस तरह की मानसिकता वाले लोग हर जगह पाये जाते हैं तभी जिस इंग्लैंड ने भारत पर दो सदियों तक राज किया था आज हम उसके उपग्रहों को अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक भेजने में सक्षम हो चुके हैं. निश्चित तौर पर इंग्लैंड ने अपने निवेश को अंतरिक्ष विज्ञान की दिशा में मोड़ने में रूचि नहीं दिखाई तभी आज उसे भारत की सफलता की कहानी से लाभ उठाने के बारे में सोचना पड़ रहा है. कोई भी देश अपने शासकों की दूरदर्शिता पर ही अधिक तरक्की कर सकता है और भारत सरकार ने सदैव ही इसरो के विकास के लिये पूरा सहयोग दिया भले ही किसी भी दल की सरकार केंद्र में क्यों न रही हो. इस सबमें इसरो बधाई का पात्र है क्योंकि उसने सरकार की तरफ से दिए गए अवसरों का भरपूर लाभ उठाया और अपने को आगे बढ़ाने की हर संभव कोशिश भी की जिसका परिणाम आज सबके सामने है.
                                          अब इसरो को और भी तेज़ी से आगे बढ़ने के लिए जिस तरह की आज़ादी चाहिए अब देश और सरकार को उस बारे में भी सोचना चाहिए जिससे आने वाले समय में इसरो इस क्षेत्र का बड़ा खिलाडी बन सके और किसी भी तरह से उसके किसी भी काम में सरकार की तरफ से कोई अड़चन भी न आने पाये. अभी तक केवल देश के सम्मान और विज्ञान को बचाये रखने के लिए काम करने वाला इसरो आज पूरी दुनिया के देशों के लिए अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने का सबसे सस्ता और भरोसेमंद विकल्प बन चुका है जिसका लाभ उठाने का समय भी आ गया है. अब भौतिक विज्ञान के छात्रों की नयी पौध को तैयार करने का सही समय भी आ गया है जिससे इसरो की प्रगति की यह कहानी लगातार भारत के लिए बनी ही रहे किसी भी क्षेत्र में समग्र और लम्बे समय तक विकास की परंपरा को बनाये रखने के लिए जिस तरह से युवाओं को उससे जोड़ने की आवश्यकता होती है अब इसरो को खुद ही उस पर काम करना होगा और भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में रुझान रखने वाले छात्रों के लिए अधिक अवसर उपलब्ध करने के बारे में भी सोचना ही होगा तभी देश इस क्षेत्र में आने वाले दशकों में सिरमौर बन सकेगा. 
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शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

भारतीय वीआईपी संस्कृति

                                     एक हफ्ते में ही दो बार पहले मुंबई में महाराष्ट्र के सीएम और फिर लेह में गृह राज्य मंत्री किरण रिजूजू के कारण एयर इंडिया की उड़ानों में विलम्ब होने की ख़बरों के सामने आने के बाद जिस तरह से पीएमओ ने पूरे मामले की रिपोर्ट मांगी है उससे उड्डयन मंत्रालय से लगाकर सत्ता के गलियारों में सनसनी मच गयी है. यह सही है कि लम्बे समय से महत्वपूर्ण व्यक्तियों की यात्राओं को लेकर जिस तरह से सरकारी विमान कम्पनी के दुरूपयोग की बातें सदैव ही सामने आती रही हैं उन पर अभी तक कोई रोक नहीं लगायी जा सकी है. इस बार खुद पीएमओ के स्तर से मामले को देखने के कारण सबसे पहले रिजूजू और फिर नागरिक उड्डयन मंत्री राजू ने प्रभावित लोगों से असुविधा के लिए माफ़ी मांगी और साथ ही जांच के आदेश भी दे दिए हैं. इस बारे में अब पूरा दारोमदार एयर इंडिया की रिपोर्टों पर ही टिक् गया है क्योंकि यदि जानबूझकर इन विमानों को देरी से उड़ाया गया है तो रिपोर्ट में यह सामने भी आ सकता है पर क्या वह रिपोर्ट भी निष्पक्ष रूप से बनायीं जाएगी अब सब उस पर ही निर्भर करता है.
                       वैसे तो इन मामलों में कोई कार्यवाही आम तौर पर नहीं हो पाती है क्योंकि शिकायतों को गंभीरता से किया और लिया ही नहीं जाता है जिससे शिकायतकर्ता के पास न्याय पाने की सम्भावना भी कम ही होती पर इस इस बार इन दोनों मामलों को मीडिया द्वारा जिस तरह से उठाया गया और उसके बाद से लगातार इस पर कड़ी नज़र भी रखी जा रही थी उसके बाद इससे बचने की सम्भावना समाप्त हो जाने पर पीएमओ ने मामले को सँभालने की कोशिश की है. वैसे तो यदि इन दोनों मामलों में कोई गड़बड़ी पायी जाती है तो नेताओं का तो कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला है पर एयर इंडिया के कर्मचारियों पर सजा की मार अवश्य ही पड़ सकती है. क्या देश के महत्वपूर्ण नेताओं को लाने ले जाने के मामले में एयर इंडिया पर किसी तरह का दबाव होना चाहिए या फिर उसे अपने हिसाब से काम करने की खुली अनुमति होनी चाहिए ? जिन लोगों के अघोषित आदेशों पर यह दोनों उड़ने देर से रवाना हुईं क्या उनके खिलाफ कोई कार्यवाही आज के परिप्रेक्ष्य में संभव भी है क्योंकि दोनों ही सरकारों में महत्पूर्ण पदों पर बैठे हुए लोग हैं.
                    यदि किसी तकनीकी कारण से ही उड़ान देरी से जाती है तो इसका ब्यौरा सम्बंधित विमानन कम्पनी और हवाई अड्डे से मिल सकता है क्योंकि ऐसी स्थिति में परिचालन का पूरा परिदृश्य दोबारा से निर्धारित किया जाता है और कई बार अन्य उड़ानों पर भी इसका असर पड़ जाता है यदि कोई बड़ा परिवर्तन हुआ होगा तो वह हवाई अड्डों पर भी संज्ञान में आ चुका होगा और पूरा मामला वहीं से स्पष्ट हो जायेगा पर क्या सरकार अपने लोगों के बचाव के लिए इस तरह की रिपोर्ट नहीं बनवा सकती है यह भी सोचने का विषय है. इस मामले में चाहे जो भी बात सामने आये पर आने वाले समय में किसी भी वीआईपी के लिए इस तरह की गतिविधि पर पूरी तरह रोक लगाये जाने के लिए अब एक पूरी तरह से पारदर्शी तंत्र बनाया जाना चाहिए और उस पर कड़ाई से अमल करने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए जिससे भविष्य में इस तरह से सरकारी विमान कम्पनी एयर इंडिया का दुरूपयोग न किया जा सके. देश की जनता और मीडिया के चलते अब हर बात सबकी नज़रों में आ जाती है इसलिए वीआईपी लोगों को खुद ही इस संस्कृति से बाहर निकलने के बारे में सोचना चाहिए जिससे पूरे परिदृश्य जो सुधारा भी जा सके.    
मेरी हर धड़कन भारत के लिए है...